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Lok Sabha Debates

Combined Discussion On The Budget (General)-2011-12 And Supplementary Demands ... on 8 March, 2011

> Title: Combined discussion on the Budget (General)-2011-12 and Supplementary Demands for Grants in respect of Budget (General) for 2010-11.

   

MR. DEPUTY-SPEAKER: Item Nos. 17 and 18 are to be taken up together.

          Motion moved:

“That the respective supplementary sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1 to 5, 7, 9, 11 to 23, 26, 29 to 33, 35, 40 to 43, 45 to 51, 53 to 55, 57 to 62, 64, 65, 67 to 74, 77, 79 to 81, 83 to 88, 90, 92 to 98, 100 and 103 to 105.”   डॉ. मुरली मनोहर जोशी (वाराणसी): सभापति जी, मैं आपका आभारी हूँ कि आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर विचार रखने के लिए मुझे आमंत्रित किया।
          हमारे वित्त मंत्री जी ने पिछले वर्ष 26 फरवरी को जो भाषण दिया था, उसमें उन्होंने एक बहुत मार्मिक और सही बात कही थी कि -
 
“The Union Budget cannot be a mere statement of Government’s accounts.  It has to reflect the Government’s vision and signal the policies to come in future.”   यह बहुत सही बात है, यह होना चाहिए। बजट न केवल आँकड़ों का खेल हो, बल्कि बजट में उन नीतियों का और उस सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन का दिशा संकेत ही नहीं, बल्कि उस तरफ बढ़ने के कदम भी होने चाहिए। नई सरकार बनने के बाद उनका जो बजट था, उसमें उन्होंने यह कहा, लेकिन न तो पिछले साल इस सिद्धांत का पालन हुआ और न इस साल ही इस सिद्धांत का पालन हो रहा है। इस बार इस बात को उन्होंने नहीं दोहराया, बल्कि बजट के आंकड़े संतुलित करके संसद के सामने रख दिए और इस आशा से रख दिए कि शायद लोग इस भुलावे में आ जाएंगे कि बहुत अच्छा बजट देश के सामने रखा गया है। अब हमें यह देखना है कि वर्ष 2011-12 का बजट क्या कहता है, किधर जाता है और यह किसके लिए बना है? क्या यह बड़े आदमियों के लिए बना है या यह आम आदमी के लिए बना है या गरीबों के लिए बना है या परिगणित जातियों और जनजातियों के बना है या किसानों के लिए बना है या बेरोजगार नौजवानों के लिए बना है या असंगठित मजदूरों के लिए बना है या इसमें जनजातियों के लिए कुछ कहा गया है। किसके लिए बना है? देश की आम आबादी के लिए बना है या बहुत छोटे तबके के लिए बना है, यह देखने की बात है। इस बजट भाषण के पैरा 4 में हमारे वित्त मंत्री जी ने कहा है-
 “We have to ensure a stronger fiscal consolidation to enlarge the resource space for private enterprise and addressing some policy constraints. We have also to improve the supply response of agriculture to the expanding domestic demand. Determined measures on both these issues will help address the structural concerns on inflation management.”   पैरा 7 में आप फिर कहते हैं-
“Corruption is a problem that we have to fight collectively.”   And very lightly also, उसको आगे देखेंगे, उसका कोई जिक्र है या नहीं। इस तरह से पांच बातें मुख्य रीति से बजट की शुरूआत में वित्त मंत्री जी ने उठायी। वित्तीय प्रबंधन, फिसकल मैनेजमेंट, ग्रोथ, विकास, इनफ्लेशन पर नियंत्रण, महंगाई पर नियंत्रण, कृषि क्षेत्र, एग्रीकल्चर का डेवलपमेंट और भ्रष्टाचार का उन्मूलन। इन पांचों बातों पर यदि हम इस बजट को कसें तो बड़ी निराशा होगी।
महोदय, इस बजट को देखें तो हमारे वित्त मंत्री जी ने कहा था कि मैंने खर्च तो ज्यादा किया, लेकिन राजकोषीय घाटा पिछले साल के 5.5 प्रतिशत से घटाकर जीडीपी का 5.1 प्रतिशत कर दिया है। अब ज़रा आंकड़ों की करामात पर गौर करें। वर्ष 2009-10 में वास्तविक घाटा 418482 करोड़ रूपये था। वर्ष 2010-11 में अनुमानित था, 381408 करोड़ और इसका संशोधित वर्ष 2010-11 में हुआ 400998 करोड़ और वर्ष 2011-12 में अनुमानित है, 412817 करोड़। यानी वर्ष 2009-10 में जो वास्तविक घाटा था, उससे भी कम दिखाया जा रहा है। अब जरा इस बात को देखिए कि वर्ष 2010-11 में जो संशोधित राजकोषीय घाटा था, वह अनुमान से लगभग 20 हजार करोड़ रूपए, 19590 करोड़ रूपए बढ़ गया। यानी 381408 करोड़ रूपए से बढ़कर 400998 करोड़ रूपए हो गया। इस बार भी यदि यह समझा जाए कि यह 412817 करोड़ पर नहीं रहेगा, इससे कहीं ज्यादा जाएगा, तो हालात बहुत बिगड़े हुए हैं।
महोदय, यह इसलिए हुआ, क्योंकि 3जी की नीलामी से छप्पर फाड़ कर आमदनी हुई है। पिछले बजट में कहीं उसका जिक्र नहीं था। लेकिन हजारों करोड़ की आमदनी छप्पर फाड़ कर मिल गई, जिसका पहले अंदाज़ नहीं था, लेकिन आ गई। जिसके कारण राजकोषीय घाटा 5.5 से घटकर 5.1 प्रतिशत पर आ गया। इसमें वित्त मंत्री जी की करामात नहीं है। इसमें वित्तीय प्रबंधन की कोई करामात नहीं है। इसमें उनके बजट के प्रवाह का कोई योगदान नहीं है। 3जी की नीलामी से जो बहुत सा पैसा आ गया, यह उसकी करामात है। आप एक बात और देखें कि वर्ष 2010-11 में जीडीपी 69.35 लाख करोड़ थी।
तब 3,81408 करोड़ का घाटा 5.5 माना गया था। सन् 2010-11 में जीडीपी करंट प्राइसेस पर थी, लेकिन मुद्रा विस्तार के कारण जीडीपी, जिसे हम नोमिनल जीडीपी कहते हैं, वह बढ़ कर 59.35 लाख करोड़ से 78.78 लाख करोड़ हो गई। वित्त मंत्री जी ने ऐलान कर दिया कि इन्होंने घाटा 5.1 परसैंट कर दिया पर यह इनफ्लेशन की वजह से हुआ। मिडटर्म पॉलिसी स्टेटमेंट जो दिया जाता है, उसमें भी इन्होंने यह स्वीकार किया है कि हम मुद्रा विस्तार की वजह से राजकोषीय घाटा कम रखने में सफल हुए। अगर मुद्रा विस्तार न होता तो क्या होता, तो यह घाटा 5.1 परसैंट की जगह 5.8 परसैंट होता। यानी आप आंकड़ों की बाजीगरी से यह समझा रहे हैं कि आम जनता को इस बात का पता ही नहीं लगेगा कि मुद्रा विस्तार से जीडीपी की मात्रा कैसे बढ़ गई और उसकी वजह से वह घाटा कम हो गया। लेकिन अगर इस मुद्रा विस्तार को निकाल दें या आप छप्पर फाड़ कर जो आमदनी हुई, उसे निकाल दें तो यह 5.8 परसैंट जाएगा, यह कम नहीं होगा, बढ़ जाएगा।
          उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि अब आप जरा नॉन प्लान व्यय को देखें। सन् 2010-11 में इसका एस्टीमेट 7,35,657 करोड़ था। यह जब रिवाइज्ड हुआ तो 8,21,552 करोड़ हो गया। सन् 2011-12 में 8,16,182 करोड़ का अनुमान है। ये इतना रहेगा नहीं, ज्यादा बढ़ जाएगा, क्योंकि महंगाई बढ़ रही है, सरकार के पास पैसे कहां हैं? इस व्यय को करने के लिए पैसे कहां हैं? अगर आप प्लान व्यय को देखें तो सन् 2010-11 में 3,73,092 अनुमान था और रिवाइज 3,95,000 हुआ। सन् 2011-12 में एस्टीमेट 4,41,547 करोड़ है। इन सब के लिए रिसोर्सेस कहां से आएंगे? वित्त मंत्री जी ने कहा है कि हमें रिसोर्सेस लाने हैं। आपका इनफ्लेशन, मुद्रा विस्तार पर कोई नियंत्रण नहीं है। कच्चे तेल की कीमतें बेहिसाब बढ़ रही हैं और खाद्यान्नों के दाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसी हालत में यह कहना कि यह जो सन् 2011-12 का कुल खर्चा 12,57,729 करोड़ रखा गया है, यह निरर्थक है। इसका कोई मतलब नहीं है। पता ही नहीं है कि यह आंकड़ा कहां जाएगा। आप बार-बार कह रहे हैं कि प्राइस राइज़ हो रही है। अगर क्रुड ऑयल के दाम बढ़ गए तो हम नहीं जानते कि कहां जाएंगे। फिर आप कहते हैं कि यह बजट रिफार्म्स का एक खाका पेश करेगा। सवाल यह है कि आपको रिफार्म चाहिए या अर्थव्यवस्था के मौलिक सिद्धांत ठीक करने चाहिए। लोगों को खाना और रोजगार मिले, ग्रामीण क्षेत्रों में विकास हो, कृषि का विकास हो, यह जरूरी है या आप रिफार्म्स, जीएसटी लाओ, ये लाओ, वे लाओ, इधर करो, वह जरूरी है। इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि इस वक्त हमारी मौलिक आवश्यकताएं क्या हैं। अगले साल थ्री-जी की नीलामी से कोई छप्पर फाड़ आमदनी की गुंजाइश नहीं है। इस साल आप नोमिनल जीडीपी की वृद्धि से राजस्व घाटा घटा कर दिखा रहे हैं। अगले साल का आपने जो 4.6 परसैंट घाटा दिखाया है, कोषीय फिस्कल डेफिसिट, ये कैसे रह पाएगा? यह सवाल है, जो आपको हमें बताना एवं समझाना है कि हम ऐसा प्रबंध करेंगे कि ये निश्चित रूप से 4.6 परसैंट रहेगा। मुझे नहीं लगता कि आप इसे इतना रख सकें। अब आप कहेंगे कि हम उधार ले लेंगे। अगर आप बजट को ठीक से देखें तो लगभग 4,70,000 करोड़ रुपए उधार के चाहिए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इससे चिन्तित है। वह कहता है कि लिक्वीडिटी तंग हो गई है। बैंकों में जमा होने वाली राशि का ग्रोथ, उसका विकास कम है और बाजार में उधार की मांग बढ़ रही है। अगर आप इंडस्ट्री एवं व्यापार को बढ़ाएंगे तो उन्हें पैसा चाहिए।
           उपाध्यक्ष महोदय, वे बैंकों से पैसा लेंगे, तो बैंकों के पास पैसे होने चाहिए। आर.बी.आई. कहता है कि लिक्विडिटी कम है। वह स्क्वीज हो रही है। अगर आप बाजार से उधार लेंगे, सरकार पैसा बाजार से उठा लेगी, तो आम उद्योगों के लिए कहां से पैसा आएगा, फिर ब्याज दर बढ़ जाएगी, क्योंकि उधार के लिए राशि कम हो जाएगी? जब बाजार से आप ले लेंगे, तो उद्योगों को पैसा कहां से मिलेगा? फिर आप कहेंगे कि ये उद्योग अगर ऐसे चलेंगे, तो नॉन-कॉम्पीटीटिव हो जाएंगे। अगर उन्हें ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा, उन्हें ब्याज का ज्यादा रेट देना पड़ेगा, तो उद्योग नॉन-कॉम्पीटीटिव हो जाएंगे। इसका असर आपके एक्सपोर्ट पर होगा और अगर एक्सपोर्ट पर असर होगा, तो इनफ्लो ऑफ फॉरेन एक्सचेंज कम होगा। इसलिए इस बात को पूरी तौर पर और इंटीग्रेटेड रूप में देखने की जरूरत है। इससे महंगाई की आंच और तेज होगी। खर्चे बढ़ेंगे। सरकारी प्रोजैक्ट्स या तो आपको कम करने पड़ेंगे या वे ठप्प हो जाएंगे। आपकी ग्रोथ यानी विकास कहां से होगा? मंत्री जी ने कहा है कि वित्तीय प्रबन्धन और विकास बड़े महत्वपूर्ण मसले हैं। मुझे दिखाई नहीं देता कि इसमें से आप कोई विकास कर पाएंगे या आप देश में महंगाई पर नियंत्रण कर पाएंगे।
          महोदय, एक और विरोधाभास है। सरकार अर्थव्यवस्था का विस्तार चाहती है और मौद्रिक नीतियों पर अंकुश भी रखना चाहती है। अगर तेल के दाम बढ़ेंगे, तो यह आप कैसे कर पाएंगे। इसके साथ-साथ अगर आप खाद्य सुरक्षा बिल ले आए, तो उसके लिए पैसा कहां से लाएंगे? अगर आप उस बिल को ले आए और लागू किया, तो कम से कम 1 लाख करोड़ रुपए चाहिए। इसका बजट में प्रावधान कहां है? अगर आप फूड सिक्योरिटी बिल को लाने की बात कर रहे हैं और ले आए और लागू कर दिया, तो उसके लिए धन का कोई प्रावधान आपने इसमें नहीं किया गया है। हालांकि उसे लागू करने की कठिनाइयां अलग हैं, वह भी अपने आप में एक गोरखधंधा है, लेकिन मैं आपके इरादों को मान लूं कि आप उसे लाने वाले हैं और ले आए, तो यह बहुत अच्छी बात होगी। इससे मुझे बड़ी खुशी होगी। फूड सिक्योरिटी बिल जैसा भी है, वैसा ही लाकर अगर आपने लागू कर दिया, तो मैं समझूंगा कि आपने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है, हालांकि फूड सिक्योरिटी बिल यूनीवर्सल होना चाहिए या टार्गेटेड होना चाहिए, सीमित होना चाहिए या नहीं होना चाहिए, यह एक अलग सवाल है। अगर आपने इस सीमित बिल को भी लागू कर दिया, तो मैं आपकी बड़ी तारीफ करूंगा। मुझे बड़ी खुशी होगी, अगर आप यह कर सकें, लेकिन मुझे नहीं लगता कि आप यह कर पाएंगे।
          महोदय, अगर आप और देखें। फिर आप कहते हैं कि एम.एन.आर.ई.जी.ए. में जो मजदूरी है, उसे आप कंजूमर प्राइस इंडैक्स के साथ जोड़ देंगे, तो कितना पैसा और बढ़ाएंगे, इसके लिए पैसा कहां से लाएंगे? ये वित्तीय प्रबन्धन के बड़े कठोर सवाल हैं, जो आपके सामने हैं और जिन पर आपको गहराई से विचार ही नहीं, बल्कि संसद और देश को समझाना होगा कि आप यह करामात कैसे कर पाएंगे? कहीं से छप्पर फाड़ कर कोई आमदनी होने वाली हो, तो वह बताइए या इसके लिए क्या इंतजाम करेंगे, वह बताइए?
          महोदय, श्री रंगराजन जो आपके आर्थिक मामलों के सलाहकार हैं और बहुत प्रसिद्ध अर्थशास्त्री भी हैं, वे कहते हैं कि सरकार सारे मॉनीटरी और फिस्कल तरीके अपना कर महंगाई 8.23 परसेंट से घटाकर 4 या 5 परसेंट तक ले आएगी। मैं पूछना चाहता हूं कि कैसे ले आएगी? तेल के दाम बढ़ जाएं, अनाजों के दाम बढ़ जाएं, बाजार में लिक्विडिटी न हो, मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज के अंदर ग्रोथ न हो, एक्सपोर्ट न बढ़े, तो आप कहां से ले आएंगे? इसे देखकर तो मुझे लगा कि यह बिलकुल हवाई बात है, बिलकुल निरर्थक बात है। आर.बी.आई. कहती है कि अन्तर्राष्ट्रीय खाद्यान्न व अन्य वस्तुओं के बढ़ते दाम तथा कच्चे तेल की मूल्य वृद्धि इन प्रयत्नों पर पानी फेर देगी। इसका प्रभाव इनर्जी पर भी पड़ेगा। इनर्जी के मूल्यों पर भी पड़ेगा और वह फिर आपके सारे प्रोडक्शन को नॉन-कॉम्पीटीटिव बनाएगी। इसलिए यह सवाल है कि आप कैसे वित्तीय प्रबन्धन करेंगे। मुझे बहुत डर लग रहा है कि आपने जैसे ऊंची बातें कही हैं उन्हें आप पूरा कर पाएंगे या नहीं या उनका कितना हिस्सा आप पूरा कर पाएंगे, उसे लागू भी कर पाएंगे या नहीं, यह सवाल है?
         महोदय, वित्त मंत्री ने कहा कि कराधान के द्वारा, टैक्सेशन के द्वारा इस बार उन्होंने कोई रिसोर्स नहीं किया, तो वे पैसा कहां से लाएंगे, कहां से पैदा करेंगे? अगर बाजार से उधार लेंगे, तो इसका परिणाम मैं बता चुका हूं उद्योगों पर पड़ेगा। उद्योग नॉन-कॉम्पीटीटिव होंगे, एक्सपोर्ट कम होगा और फॉरेन एक्सचेंज कम आएगा।  या फिर आप डिस-इन्वैस्टमेंट करेंगे। यह बाजार की हालत पर निर्भर करेगा। पिछले साल आपने 40 हजार करोड़ रुपये की बात कही थी, 20-22 हजार करोड़ रुपया आपको मिला। अब इस साल अभी बाजार की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आप देखें तो बाजार लड़खड़ा रहे हैं। इसलिए इस बार आप कितना डिस-इन्वैस्टमेंट करेंगे, किस हद तक जाएंगे, यह भी साफ नहीं है। बाजार आपका साथ देगा या नहीं देगा, इसके लिए आप कोई प्रार्थना करेंगे तो बात अलग है।
          फिर आप कहेंगे कि एफ.डी.आई. और एफ.आई.आई. बढ़ाएंगे, एफ.डी.आई. लाएंगे। फाइनेंशियल इंस्टीटय़ूशंस को कहेंगे कि आप आइये। आप जानते हैं कि एफ.आई.आई. तो उड़न छू हो जाते हैं। जहां उन्हें ज्यादा पैसा दिखाई देता है, वहां चले जाते हैं। आपका स्टॉक मार्केट उसे पैसा देगा तो यहां रहेंगे, नहीं तो कहीं और जाएंगे, वहां चले जाएंगे। ये एफ.आई.आई. वालों की हरकतें हम कई दफा देख चुके हैं। पहले साउथ ईस्ट एशिया में यह हो गया। ये क्राइसिस तो ये लोग पैदा करते जाएंगे और आपके हाथ में वह नहीं है। आपके हाथ में उनका नियंत्रण नहीं है और एफ.डी.आई. अभी बढ़ नहीं रहा है।
          अब आप चाहते हैं कि एफ.डी.आई. रिटेल सैक्टर में आ जाये। मैं आपसे हाथ जोड़कर निवेदन करता हूं कि आप एफ.डी.आई. को कभी भी रिटेल में मत लाइये। देखिये, मुझे पता नहीं, आप ये रिपोर्ट्स पढ़ते हैं या नहीं पढ़ते हैं, यह कॉमर्स कमेटी की तरफ से रिपोर्ट है, जिसमें बहुत स्पष्ट रीति से फॉरेन एण्ड डोमैस्टिक इन्वैस्टमेंट इन रिटेल सैक्टर को मना किया हुआ है। रिटेल सैक्टर में बड़ी पूंजी आप मत लाइये, वह चाहे लोकल हो, डोमैस्टिक हो या फॉरेन हो। आप इस देश को तबाह कर देंगे, अगर आप यहां रिटेल के अन्दर विदेशी पूंजी लाएंगे। आप इस बात को समझ लीजिए कि अनाज मॉल्स में पैदा नहीं होता। वहां टी.वी. रखे जा सकते हैं, वहां लैपटॉप्स रखे जा सकते हैं, ऐसी चीजें रखी जा सकती हैं, लेकिन अनाज तो खेत में पैदा होता है। अगर वहां पैदा नहीं होगा तो मॉल्स में क्या है। हमने देखा है, सारी दुनिया में क्या हालात थे, वालमार्ट के खिलाफ क्या हो रहा है, कैरीफोर के खिलाफ क्या हो रहा है।
          हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को आप तबाह मत कीजिए। यह परम्परा से चली आई है। इसमें सुधार कीजिए, इसके सुधार के मैं खिलाफ नहीं हूं। आप रिटेल में जो सुधार आवश्यक हैं, एक आम व्यापारी की दृष्टि से, चीजों की गुणवत्ता की दृष्टि से, फेयर प्रैक्टिसिज़ की दृष्टि से, साफ-सफाई की दृष्टि से तो यह बात समझ में आती है, लेकिन अगर आप उसे तबाह करेंगे तो रिटेल सैक्टर एग्रीकल्चर के बाद इस देश के अन्दर सबसे बड़ा एम्पलायमेंट जैनरेटिंग सैक्टर है। आप उस पर अपनी नज़र मत डालिये। यह राहू और केतू आप और जगह ले जाइये, लेकिन यहां पर मत लाइये।
          मैं आपको इसमें बता रहा हूं, क्योंकि मैं इस देश में घूमता हूं। आप भी घूमते हैं, लेकिन आप जरा बड़े लोगों के पास ज्यादा जाते हैं, जबकि मैं छोटे लोगों के पास जाता हूं। मेरी कांस्टीट्वेंसी में खुदरा व्यापारी हैं। वहां बड़े मॉल्स नहीं हैं। वे रो रहे हैं, जब सुनते हैं कि आप रिटेल सैक्टर में एफ.डी.आई. लाना चाहते हैं। वे सोचते हैं, वे बन्द हो जाएंगे, जब दुकानें खत्म हो जाएंगी, जब वे बाहर हो जाएंगे। मैं हाथ जोड़कर आपसे निवेदन करता हूं कि आप इस रिपोर्ट को पढ़ लीजिए। मुझे पता नहीं कि आप पढ़ते हैं या नहीं। आप इसको रद्दी की टोकरी में डाल देते होंगे, मगर यह आपकी स्टेंडिंग कमेटी ने बहुत सोच-समझ कर रिपोर्ट दी है, विचार करके दी है, घूम-फिर कर दी है। देश में जहां बड़े मॉल्स बने हैं, उन्होंने वहां भी जाकर देखा है, वे छोटे व्यापारी से भी मिले हैं। उसके साथ सुझाव भी दिये गये हैं कि अगर मॉल्स खोलने हैं तो कैसे खोले जायें, कौन खोले, कहां खुलें, लेकिन आप बराये मेहरबानी रिटेल के ऊपर दया कीजिए। रिटेल और कृषि, इन दोनों पर आप दया दृष्टि रखिये, क्रूर दृष्टि मत रखिये। अगर आपने यह दृष्टि क्रूर कर ली तो भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता।
          अगर आप एक सफल वित्त मंत्री के नाते इस देश में कुछ करना चाहते हैं तो रिटेल सैक्टर को सुधारिये, इसको मजबूत कीजिए, क्योंकि यह हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। आपकी डोमैस्टिक बचत बहुत कुछ उसी मात्रा पर निर्भर करती है। जब सारी दुनिया में मैल्ट डाऊन हुआ, उसको बचाने वाला सबसे बड़ा कुशन यही है। इसी की वजह से आप बचे हैं। आप यह मत समझिये कि आप सरकारों की वजह से बचे हैं-नहीं। अगर हम बचे हैं तो इन लोगों की वजह से, जिन्होंने उस सारे दबाव को झेला और गांवों तक जाने को रोक दिया। आप इस बात को गहराई से समझिए। भारत की अर्थव्यवस्था को, इसकी परम्परागत अर्थव्यवस्था को समझिये। हां, 21वीं सदी के अनुसार इस परम्परा में जो सुधार करने हैं, उतने सुधार जरूर कीजिए। उसमें कोई आपका विरोध नहीं करेगा, परन्तु इसको नष्ट मत कीजिए।
          मेरे पास अभी आफ्थोलमोलोजिस्ट्स आये थे, चश्मे की दुकान वाले आये थे, वे घबरा रहे थे कि ये जो गांवों में बैठे हुए चश्मे वाले हैं, ये क्या करेंगे, अगर आप चश्मे में एफ.डी.आई. ले आये।
सारा काम हिंदुस्तान में हो रहा है।  सारी टेक्नॉलाजी हिंदुस्तान को मालूम है।  कौन सी टेक्नॉलाजी बाहर से आएगी?  अगर लाना है तो वहां के इंजीनियर एप्वाइंट कर लीजिए, कोई दिक्कत नहीं है। मैं थोड़ा बहुत विज्ञान भी जानता हूं और टेक्नॉलाजी भी जानता हूं। मैं आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि इस पर गहराई से सोचिए और इस रिपोर्ट पर ध्यान दीजिए, तब आपको पता लगेगा कि वास्तविक चीजें क्या हैं? देश में भयंकर तबाही आएगी, जिस दिन आप बड़ी पूंजी वालों को रिटेल में ले आएंगे। एक आदमी हवाई जहाज भी बेचे और सब्जी भी बेचे, यह कैसा तारतम्य है?  एक आदमी टेलीविजन भी बेचे और सुई भी बेचे, क्या तारतम्य है? ब्रांडेड और मल्टी ब्रांड के चक्कर में मत डालिए, हम सब समझते हैं कि किस तरह से सिंगल ब्रैंड के अंदर भी घपले हो रहे हैं। आप दुकानों में झांककर देखिए कि उसके अंदर क्या-क्या हो रहा है? इस पर आप गहराई के साथ ध्यान दीजिए। आप घरेलू बचत बढ़ाकर अपने लिए रिसोर्सेज ला सकते हैं।  रिजर्व बैंक भी कहता है कि घरेलू बचत बढ़ाइए।  आरबीआई के गवर्नर ने भी कहा है कि अगर विकास दर बढ़ानी है, तो बचत को बढ़ावा देने के लिए बैंकों में जमा ब्याज की दरें बढ़ाइए और साथ ही कहता है कि लोन की दरें घटाइए। क्या सरकार ऐसा कर सकती है?  क्या आपमें हिम्मत है कि आप इस तरह के कदम उठा सकें।  अगर आप बैंकों में बचत लाएंगे तो बैंकों की लिक्विडिटी बढ़ेगी।  अगर आपको अपनी मैन्युफैक्चरिंग को, इंडस्ट्री को कांपटीटिव बनाना है, तो लोन रेट्स कम करने होंगे। इस अंतर को, इस चीज को सरकार बैंकों के प्रबंध में सुधारकर कर सकती है, अपने खर्चे कम करके कर सकती है।  अपने यहां पिलफ्रेज को रोककर कर सकती है।  स्कीम्स के अंदर जो भारी भ्रष्टाचार, भारी पिलफ्रेज है, उसे रोककर कर सकती है।  साथ ही साथ जो आप कारपोरेट हाउसेज को लूट करने की जो छूट दे रहे हैं, उसे रोककर हो सकती है। 
          आरबीआई के गवर्नर की एक चिंता और भी है - बढ़ते हुए करेंट एकाउंट डेफीसिट।  इसका सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था के स्थायित्व पर पड़ेगा। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत के करेंट एकाउंट डेफीसिट को शार्ट टर्म कैपिटल इन्वेस्टमेंट से आप पूरा करें, यह ठीक नहीं है।  यह बहुत रिस्की है और खतरे से खाली नहीं है। दीर्घावधि एफडीआई जो किसी इफ्रास्ट्रक्चर में आता है, एसेट फार्मिंग के रूप में आता है, वह स्थायी होता है, जो आपको परिपक्वता के साथ इस गैप को रोकने में मदद करता है।  भारत या तो कामर्शियल बारोइंग कर रहा है या एफआईआई द्वारा इसे कर रहा है। ये दोनों रास्ते ठीक नहीं हैं। कामर्शियल बारोइंग आपसे जब मांगी जाएगी, आपको उसे वापस करनी पड़ेगी और एफआईआई जैसा मैंने बताया कि वह उड़न-छू होता है, जब चाहे उड़कर चला जाता है।  आपका यह असंतुलन बहुत खतरनाक है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार वर्ष 2011-12 में करेंट एकाउंट डेफीसिट जीडीपी के चार पर्सेंट तक जा सकता है।  यह खतरनाक है।  दो पर्सेंट लिमिट होती है, बहुत हुआ तो ढाई पर्सेंट हो, जिसके आते ही खतरा होने लगता है।  यह देखिए कि अगर आपका पूंजी प्रवाह स्थायी नहीं हुआ, तो विदेशी उधार पर बहुत ज्यादा निर्भरता सोवरेन डेट क्राइसिस की तरफ भेज देगी। यह वर्ष 1991 में हो चुका है।  इसलिए आप करेंट एकाउंट डेफीसिट को खत्म कीजिए।  वित्तीय प्रबंध की दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि आप करेंट एकाउंट डेफीसिट को कम करें। 
          आपने लक्ष्मी जी से प्रार्थना की है कि भगवती लक्ष्मी प्रसन्न हो जाएं और आपको इतना धन दें कि आप यह प्रबंध कर सकें। आप अब अपने ऊपर निर्भर नहीं रह रहे हैं, आप अपने पुरूषार्थ पर निर्भर नहीं कर रहे हैं।  अब आप लक्ष्मी जी की सेवा में जा रहे हैं।  ...( व्यवधान) पहली बात तो आपको यह बताऊं ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शांत रहें।  आप उनको बोलने दीजिए।
…( व्यवधान)
डॉ. मुरली मनोहर जोशी : धन का असली मालिक कुबेर है। लक्ष्मी जी धन देने में कृपा कर सकती हैं, डायरेक्शन दे सकती हैं, मगर धन कुबेर के पास है।  
          आप कुबेर की उपासना कीजिए। मगर इससे भी बड़ी बात यह है कि आप 21वीं शताब्दी में है। अब धन लक्ष्मी जी के पास नहीं है, सरस्वती जी के पास चला गया है। अब नॉलेज बेस्ड सोसाइटी का समय है। अब ज्ञान को हम धन में परिवर्तित कर रहे हैं।...( व्यवधान) कुबेर खा गए, अब सरस्वती के पास चला गया है। It is a knowledge society now. इसमें आप ज्ञान को धन में परिवर्तित कर रहे हैं। It is a knowledge based society. 21st century is based on knowledge. यह ज्ञान पर आधारित है। ज्ञान की अधिष्ठात्री सरस्वती है। मुझे खतरा यह है कि आप सरस्वती कहेंगे तो आपके बंगाल के  मार्कसिस्ट आपको भगवाधारी कहने लग जाएंगे। कहेंगे कि आप अर्थव्यवस्था का भगवाकरण कर रहे हैं। डॉ. जोशी ने शिक्षा का भगवाकरण किया था और आप वित्त व्यवस्था का भगवाकरण कर रहे हैं। उससे डरिए मत। सरस्वती की उपासना कीजिए। ज्ञानाधारित समाज बनाइए। लोगों को प्रशिक्षित कीजिए। टैक्नीकली एडवांस देश बनाइए और पेटैंट अधिक से अधिक कीजिए।...( व्यवधान) आज उससे पैसा...( व्यवधान) आज लक्ष्मी की उपासना से पैसा नहीं है।...( व्यवधान) आज ज्ञान की उपासना कीजिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय :  टोका-टाकी मत कीजिए।
…( व्यवधान)
डॉ. मुरली मनोहर जोशा: थोड़ा शान्त रहना अच्छा होता है। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि आप अपने दृष्टिकोण को भी ठीक कीजिए।
          अब केन्द्रीय बजट के एक और पहलू की तरफ ध्यान दीजिए। ये कारपोरेट इनकम टैक्स में हर रोज 245 करोड़ रुपये माफ कर रहे हैं, रिवैन्यू फोरगोन। मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं कि लगभग इतनी ही राशि प्रतिदिन भारत से हवाला कारोबार द्वारा विदेशों में जा रही है। इस वर्ष आपने 4,60,972 करोड़ रुपये राजस्व छोड़ा जिसमें 88,263 करोड़ रुपये आयकर छोड़ा। इसी से आप प्रतिदिन 245 करोड़ रुपये छोड़ रहे हैं। 1,98, 291 करोड़ रुपये आपने उत्पाद कर में छोड़े जो आजकल 2जी स्कैम के जो आंकड़े आ रहे हैं, उससे ज्यादा है। सीएजी ने 1,76,000 करोड़ रुपये प्रिजम्पटिव लॉस बोला है और आपने एक्साइज़ में 1,98,291 करोड़ रुपये दान कर दिए। फिर कस्टम में 1,74,418 है। यह लूट आज की नहीं है, वर्ष 2005-06 से जो आंकड़े मेरे पास हैं, मैंने देखा तब आप 2 लाख 9 हजार 108 करोड़ रुपये तीनों में मिलाकर दे रहे थे। अब 4,60,972 करोड़ रुपये दे रहे हैं यानी दुगुने से ज्यादा। आपने वर्ष 2005-06 से आज तक जो कुल राजस्व छोड़ा है, वह 21 लाख 25 हजार 23 करोड़ रुपये है। यह आपने किसको दिया है? किसान को, खेती को, बेरोजगार आदमी को, शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स को, महिलाओं को, किसको दिया है? यह आपने कारपोरेट हाउसेज़ को दिया है। यह आपने क्यों दिया? पांच साल में दुगुने से ज्यादा हो गया यानी 101.2 प्रतिशत। आप कहते हैं कि हमने एक्साइज़ इसलिए छोड़ी कि आम आदमी को राहत मिलेगी क्योंकि यह उत्पाद शुल्क है, इनडायरैक्ट टैक्स है। यह कम हो जाएगा। क्या वह टैक्स आम आदमी तक गया है? आपने पिछले पांच सालों में सदन के सामने कोई विवरण रखा है कि हमने इतना एक्साइज़ में छोड़ा था और यह आम आदमी को स्थानान्तरित हो गया, transferred to the common man. कुछ नहीं। आप देखें, यह सिर्फ वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी के कारण नहीं है, यह छूट तो आप वर्ष 2005-06 से दे रहे हैं। फिर आप कहते हैं कि हम जो कुछ कह रहे हैं, पुअर मैन्स इंटरस्ट कर रहे हैं। यह एक और तरीका है लूट करवाने का। अभी श्री साईनाथ में एक आर्टीकल में लिखा है -- this is  corporate socialism. गरीब आदमी के नाम पर कारपोरेट को फायदा पहुंचाना। बड़ों को छूट और गरीब की लूट, यह इसका सिद्धान्त है। आप देखिए कि आपने किस पर कस्टम्स घटाए। सोने, हीरे और ज्वैलरी के ऊपर कस्टम्स घटाए। यह कहा गया कि इसे आपने इसलिए किया ताकि इनका एक्सपोर्ट बढ़े।
 इसमें काम करने वाले जो गरीब कामगार हैं, उनकी नौकरी बची रहे। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि सूरत, जहां हीरों का काम होता है वहां से हजारों लोग उड़ीसा और बिहार में लौटकर वापस आ गये, क्योंकि काम बंद हो गया था। उनका काम रुका नहीं था। सूरत में कुछ लोगों ने डायमंड के क्षेत्र में आत्महत्या भी की थी। इसलिए यह कहना कि अगर आपने कस्टम डय़ूटी कम की है और उसका फायदा उनको मिला, तो जी नहीं। अगर मिला होता, तो मुझे बहुत खुशी होती। लेकिन आप गरीब के नाम पर कारपोरेट हाउस को लाभ पहुंचा रहे हैं। इस देश में नारा है कि गरीबी हटाओ--गरीब को हटा दो। आदमी सब बड़े-बड़े रहेंगे और गरीब हट जायेगा, तो गरीबी हट गयी। इसी तरह से बड़ों को छूट और गरीब को लूट-- यह सिद्धांत आप कर रहे हैं। आप कह सकते हैं कि हमने यह इसलिए दिया, क्योंकि हमारी इंडस्ट्रीज घाटे में चल रही थीं या उनको तकलीफ थीं, तो ऐसा भी नहीं है।
           वर्ष 2005-06 में जिन कम्पनियों को आपने राजस्व छोड़ा है, देखा है, उनका लाभ 4.8 लाख करोड़ रुपये, वर्ष 2007-08 में यह लाभ 7.11 लाख करोड़ रुपये, वर्ष 2008-09 में, जो ग्लोबल मेल्टडाउन का साल था, यह लाभ 6.65 लाख करोड़ रुपये और वर्ष 2009-10 में यह बढ़कर 8.24 लाख करोड़ रुपये हो गया, तो फिर आप रेवन्यू फोरगो क्यों कर रहे हैं? उनका लाभ बढ़ता जा रहा है। किस चीज की वजह से आप रेवन्यू फोरगो कर रहे हैं? क्यों? वे अगर घाटे में हों, उनको नुकसान हो रहा हो या इंडस्ट्री बंद हो रही हो और आप उन्हें राहत दे रहे हो, तो समझ में आता है। लेकिन यह क्या हो रहा है? ...( व्यवधान) वर्ष 2005-06 से अब तक रेवन्यू फोरगो 21 लाख 25,023 करोड़ रुपये है। It is about half a trillion dollars.  ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट के अनुसार इस देश से विदेशी बैंकों में अवैध ढंग से गया धन 462 बिलियन डालर--लगभग हाफ ट्रिलियन है। आपने जो छूट घरानों की दी है, वही विदेशों में काले धन के रूप में जमा हो गयी है। यह क्या हो रहा है? गरीब आदमी का पेट काटकर, खेती को सुखाकर, रिटेल को बंद करके आप काला धन विदेशों में दे रहे हैं। यही वजह है कि आप काला धन विदेशों से लाना नहीं चाहते हैं, क्योंकि आपकी नीति के अनुसार वहां गया हुआ है। यह कोई क्रिमिनल कौन्सप्रीरेंसी से नहीं गया। ...( व्यवधान)
THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Will you yield for a second?
DR. MURLI MANOHAR JOSHI : Yes, please.
SHRI PRANAB MUKHERJEE : The figures, which you have quoted of $ 462 billion is from 1948 to 2008 and not from 2005-2006.
DR. MURLI MANOHAR JOSHI : I have quoted for 2009-2010 also for the profit earned by them. आपकी सरकारी नीति के अनुसार काला धन ट्रंसफर हो रहा है। किसी क्रिमिनल एक्टीविटीज की वजह से नहीं हो रहा। यह वह धन है, जो आपकी पालिसी के कारण जा रहा है। ...( व्यवधान) अब कृषि और अन्न का संकट ...( व्यवधान) आप देखें ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शांति बनाये रखें।
…( व्यवधान)
डॉ. मुरली मनोहर जोशी : आपकी सरकार...( व्यवधान) पीडीएस लागू नहीं करना चाहती, बल्कि जो पीडीएस है ...( व्यवधान) उसे भी ठीक ढंग से लागू नहीं करना चाहती। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय :   आप उन्हें बोलने दीजिए।
…( व्यवधान)
डॉ. मुरली मनोहर जोशी :  अब तो कहा जा रहा है कि हम कैश ट्रंसफर करेंगे। मेरी समझ में नहीं आता कि कैश ट्रंसफर इस देश में कैसे हो सकता है? मैक्सिको और ब्राजील के उदाहरण दिये जाते हैं। मुझे मालूम है कि वहां कैसे होता है। लेकिन यहां आप कहते हैं, अभी मैंने अखबार में पढ़ा, पता नहीं कहां तक सही और कहां तक गलत है कि आप सस्ते दाम पर गैस सिलेंडर गरीब आदमी को देंगे। गरीब आदमी गैस सिलेंडर कहां रखेगा, चूल्हा कहां खरीदेगा?  गैस सिलेंडर जब यहां से जायेगा, तो वह ब्लैक मार्केट में नहीं जायेगा, इसकी क्या गारंटी है? केरोसिन जा रहा है, तो वह भी जा सकता है। सवाल यह है कि आपका सिस्टम ठीक होना चाहिए, डिलीवरी का सिस्टम ठीक होना चाहिए। ...( व्यवधान) आपने कहा कि हम कैश ट्रंसफर बैंक में कर देंगे, पोस्ट आफिस में कर देंगे। क्या गांवों में आपके इतने बैंक हैं? क्या पोस्ट आफिस के पैसे उन्हें ठीक से मिलते हैं? ...( व्यवधान) आप इन सब पर गहराई से विचार कीजिए कि सिस्टम क्या होगा? कैश ट्रंसफर हो, अगर ठीक ढंग से हो, उसका इंतजाम आप कर सकें, सदन को कनविंस करें, देश को कनविंस करें कि उसमें पिलफ्रेज नहीं होगी। उसमें भारी मात्रा में कदाचार-दुराचार नहीं होगा। यह एक बड़ी बात होगी, अगर आप कर सकें।
मुझे अफसोस है कि उसका बजट में कहीं हिसाब ही नहीं है कि आप उसके लिए कोई इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना चाहते हैं। आज दुनिया की सबसे बड़ी भूखी जनसंख्या हिन्दुस्तान में है, उसको आप अनाज नहीं देना चाहते हैं, खाना नहीं खिलाना चाहते हैं, खास तौर पर जबकि खाद्यान्नों के दाम निरन्तर बढ़ रहे हों और दुनिया भर में अन्न का संकट हो, चाइना में अन्न का संकट है, उनकी फसल फेल हो गयी है। अमेरिका में अन्न का संकट है, अफ्रीकन देशों में अन्न का संकट है। आज 37 देशों में फूड रॉयट्स हुए हैं और ऐसे हालात हैं कि हैती में, इसी सदन में और राज्य सभा में भी मैंने कहा था, मिट्टी के बिस्किट बच्चों को खिलाए जाते हैं। 37 देश अनाज पैदा नहीं कर पा रहे हैं। क्या आप भारत को भी उसी तरफ ढकेलना चाहते हैं कि आप अनाज पैदा मत करो? क्या आपका ख्याल यह है कि अनाज मॉल में और प्लास्टिक के डिब्बे में मिल जाता है, थैली में मिल जाता है? अनाज खेत में पैदा होता है, किसान पैदा करता है। उसके लिए जमीन, बीज, पानी, खाद आदि का इंतजाम करना पड़ता है, बाजार का इंतजाम करना पड़ता है, किसान को अच्छा दाम मिले, इसका इंतजाम करना पड़ता है। आपका इकोनोमिक सर्वे कहता है कि वर्ष 2009-10 में प्रति व्यक्ति अन्न की उपलब्धता वर्ष 1955 और 1959 के बीच के साल से यानी 50 साल पहले जितना प्रति व्यक्ति अनाज मिलता था, उससे कम है। शर्म आनी चाहिए हमें, इस देश के सांसदों और अधिकारियों को। प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता श्रीलंका में हमसे ज्यादा है, नेपाल में ज्यादा है, बांग्लादेश में ज्यादा है। हमारे देश की यह हालत है, जबकि सबसे अधिक उपजाऊ जमीन यहां है, सबसे अधिक लोग खेती में यहां काम करते हैं, सरकार रोज खेती का नाम लेती है, मगर अन्न की उपलब्धता गिर रही है। मैल-न्यूट्रिशन्ड स्टेट बन रही है, एक कुपोषित देश, मैल-न्युट्रिशन्ड पापुलेशन महाशक्ति नहीं बन सकती। एक सशक्त, पेट भरा हुआ, भुजाओं में बल वाला मजदूर भी चाहिए काम करने के लिए। मुझे एक चाइनीज मिला था, वह कहने लगा कि आप हमारे मजदूरों का विरोध कर रहे हैं, आप कर नहीं सकेंगे। मैंने पूछा क्यों? वह बोला कि हमारा हट्टा-कट्टा मजदूर बहुत ज्यादा काम कर सकता है, हिन्दुस्तान का मजदूर मरा-गिरा, कुपोषित है, मैल-न्यूट्रिशन्ड है, वह काम नहीं कर सकता। इस बात पर आप ध्यान दीजिए कि इस देश के अंदर क्या हो रहा है?...( व्यवधान) आपका इकोनोमिक सर्वे कहता है कि पिछले सालों में जितना पूंजी निवेश हुआ है देश की अर्थव्यवस्था में, कृषि में उसका केवल 7.5 प्रतिशत हुआ है और कृषि 58 प्रतिशत लोगों का जीवनयापन कराती है। आप वहां पूंजी निवेश कैसे करेंगे? कैसे बढ़ाएंगे? अगर आप इस कारपोरेट छूट या लूट को उधर न देकर, उसका आधा हिस्सा भी इधर दे दें, तो इस देश के किसान आपका गुण गाएंगे। देश के किसान याद रखेंगे कि प्रणब मुखर्जी नाम का एक वित्त मंत्री हुआ था, जिसने कारपोरेट लूट को बंद करके किसानों को छूट दी।...( व्यवधान) यह बहुत बड़ी बात होगी।...( व्यवधान) मगर मुझे नहीं लगता है कि आपमें हिम्मत है यह काम करने की। मेरे सामने चिदम्बरम जी, जो वर्ष 2004 में वित्त मंत्री थे, का बयान है। आपने कहा था:
"कृषि क्षेत्र में अत्यधिक निवेश की आवश्यकता है। ऐसा निवेश ऋण सक्षम निजी निवेश तथा वर्धित सार्वजनिक निवेश के माध्यम से करना होगा। मेरी मंशा कृषि में निवेश को बढ़ाने हेतु राजकोषीय उपायों के प्रयोग करने की भी होती है।"
 

          लेकिन अब जरा देखें कि आपने किया क्या है। आपने 14744 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। यह योजना व्यय का मात्र 2.46 प्रतिशत है। वर्ष 2010-11 में यह अनुपात 2.86 प्रतिशत है। इसलिए कृषि का निवेश घट गया है, बढ़ा नहीं है। चिदम्बरम साहब तब से कह रहे हैं, आपके बगल में ही बैठे हैं। इन्हीं का भाषण है, यह भी वित्त मंत्री थे कि इसे बढ़ना चाहिए। हम समझते थे वर्ष 2004 से 2011 आ गया, कम से कम इसे अगर दो गुना या ढाई गुना नहीं, तो डय़ोढ़ा बढ़ना ही चाहिए, लेकिन यह घट गया।...( व्यवधान) फिर आप कहते हैं कि कृषि की विकास दर बढ़ाने पर बहुत जोर दिया गया है और इन्द्र भगवान से आपने प्रार्थना की है। इन्द्र भगवान बड़े खतरनाक हैं, जरा से में उनका सिंहासन डोलने लगता है, तो वे अच्छे-अच्छों की तपस्या भंग करा देते हैं, कहीं मेनका भेज देते हैं, कहीं कुछ कर देते हैं, चलने नहीं देते हैं। इस देश में पूजा होती है गोवर्धनधारी गोपाल श्रीकृष्ण की, जो पशुपालन और कृषि करते हैं, जिनका भाई बलराम है, जिसके कंधे पर हल है।

यहां हम हलधर की पूजा करते हैं, यहां हम गोपाल कृष्ण की पूजा करते हैं। हमारे देश में इन्द्र भगवान का कोई मंदिर आपको नहीं मिलेगा। हम जानते हैं कि वह खतरनाक चीज हैं। वैसे भी जल का देवता वरुण है।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: कृपया उन्हें बोलने दें। बीच में टोका-टाकी ठीक नहीं है।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी : आपने 2007 में जो नेशनल फार्म पालिसी इस सदन में रखी थी, उसकी घोर उपेक्षा की है। किसानों को एक सुनिश्चित आय का बंदोबस्त नहीं किया है। कृषि विकास को किसानों की वास्तविक आय की विकास दर से नहीं जोड़ा है। युवा किसानों को खेती को जीवन पद्धति और लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए आकृष्ट नहीं किया गया है। खेती और खेता आधारित उद्योगों का एक इंटीग्रेटिड एक्शन प्लान नहीं है।

          मुझे बताते हुए दुख हो रहा है कि कुछ मित्रों ने कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के आसापास के गांवों का सर्वे किया, एक लाख लोगों से मिलने के बाद एक भी नौजवान नहीं मिला जो कृषि को अपनाना चाहता हो। क्यों! जिस देश में कृषि अर्थव्यवस्था का मूल 58 प्रतिशत लोग कृषि पर आधारित हों, वहां का नौजवान खेती में नहीं जाना चाहता। वह उसे जीवन पद्धति के तौर पर नहीं अपनाना चाहता। क्यों, क्योंकि उसे मालूम है कि प्रणब दा की दृष्टि उधर नहीं है, क्योंकि उसे मालूम है कि सरकार की नज़र बड़े औद्योगिक घरानों की तरफ है। उसे मालूम है कि सरकार उसे खेती की तरफ नहीं जाने देना चाहती।

          मैं कहना चाहता हूं कि यदि रखें चीन और अमेरिका में बढ़ते हुए अन्न संकट को दोहराते हुए कहना चाहता हूं कि उसे अनदेखा न कीजिए। चिदम्बरम साहब ने अपने बजट भाषण में कहा था कि जल किसी भी सभ्यता की जीवन रेखा होती है। ठीक बात है। हमें चेतावनी दी गई है कि 21वीं शताब्दी में विश्व को सबसे बड़े संकट का सामना जल संकट के रूप में करना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने प्रस्ताव किया कृषि से जुड़े सभी जल निकायों की मरम्मत, नवीकरण तथा पुनर्स्थापना के लिए बड़ी योजना आरम्भ की जाए। चालू वित्त वर्ष के दौरान हम कम से कम पांच जिलों में प्रायोगिक योजनाओं से शुरूआत करेंगे। हम देश के पांच क्षेत्रों में से प्रत्येक में कम से कम एक जिले का चयन करेंगे। कहां हैं वे जिले और कहां हैं वे क्षेत्र? किन निकायों का विकास हुआ है, किन एक्वाबाडीज़ का विकास हुआ है? कौन से तालाब ठीक किए गए हैं और कौन से कुएं ठीक किए गए हैं? जल कहां है, जल का भारी संकट आने वाला है। पीने के पानी का भी और सिंचाई के जल का भी संकट आने वाला है। मुम्बई में अभी आया है कि दो दिन तक पानी नहीं मिलेगा, दिल्ली में मिलना बंद हो गया है। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि इस बारे में आपने क्या किया है? आप इसके लिए कैसी नीति बनाएंगे?

          चिदम्बरम जी का 2004 में बजट भाषण था -

“राजीव गांधी पेयजल मिशन को मिशन मोड के रूप में कार्यान्वित करने का इरादा था, परंतु हाल के वर्षों में नए कार्यक्रम उभर कर आए हैं और मूल मिशन को भुला दिया गया है। 75,000 से अधिक निवासियों को अभी भी पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराया जाना है। सरकार का इरादा सभी पेयजल स्कीम्स को राजीव गांधी पेयजल मिशन के अंतर्गत लाने का है।” इसका जिक्र आपके बजट में नहीं है। पीने के पानी का क्या होगा, सिंचाई के पानी का क्या होगा? इन्द्र भगवान ऊपर से पानी देंगे या नहीं देंगे, उस पर निर्भर न रहें।

          मैं आपको बताता हूं, आप देखिए इस मामले में अगर आपको सीखना है तो हमारे देश की परम्परा से सीखिए। हमारे देश की खेती के लिए कहने से पहले मैं एक बात आपको कहना चाहता हूं कि फूड प्राइस में जो आप स्पेकुलेशन करते हैं, कमोडिटी ट्रेडिंग उसे बंद कर दीजिए। मेरे पास एक लेख है देवेन्द्र शर्मा का, जो एक फूड पालिसी एनेलिस्ट हैं। वह लिखते हैं -

Author and columnist Alex Preston wrote in New Statesman in August, 2010:

“I was a trader at ABN Amro in March, 2007 when the bank launched the first product that allowed retail investors to speculate in rice prices. In 2008, at the height of the food crisis, a marketing email went out from ABN pointing out that rice inventories were at an all-time low. Now we are told was the moment to invest in one of the world’s most important food crops before prices rose further. And this was at a time when street children in Haiti were eating cakes made of mud, and hundreds of millions across the globe were threatened with starvation. A few months later global prices of rice, wheat and corn touched an all-time high. By early 2008, food riots had taken place in 37 countries while Goldman Sachs was accused of profiteering as millions went hungry, the UN Special Rapporteur on the Right to Food, Olvier De Schutter categorically pointed out to speculation in food prices as the main reason behind the surge in 2008 food prices.”    यह आज फिर से वही स्थिति आ रही है। मैं आपको सावधान करना चाहता हूं कि आप इससे बचिये। मैं आपको बताओं कि हमारे देश में ईसा से कई शताब्दी पहले कौटिल्य ने क्या कहा था। Kautilya indicated that agriculture should receive policy and administrative support from Government. For production of crop, supply of good seed and other purchases; inputs need to be arranged; assistance have been provided to make available other resources, such as, labour, machinery, implements and bullocks. Contingency plans were made for alternative crops. In case, the monsoon fails or floods occur, irrigation was provided wherever water source existed. Arrangements were made to protect crops, harvest and to safely store them.  यह कृषि की इस देश में व्यवस्था थी। वह यह भी कहता है कि the work of the above men shall not suffer on account of any want of ploughs, and necessary implements or bullocks.   आज वह फर्टिलाइजर्स, सीड और पानी के तौर पर आ गया है, इलैक्ट्रिक्स सप्लाई के तौर पर आ गया है। Nor shall there be any delay in procuring for them the assistance of blacksmith, carpenters, basket sellers, rope-makers as well as those who catch snakes and similar persons. Any loss in production because of the above persons should invite fine equal to the loss.  क्या सरकार इस बात के लिए तैयार है। ...( व्यवधान) आपने कहा है कि कृषि ऋण को जमा करने पर तीन परसेंट की छूट दी जाएगी यानी 7 परसेंट से घटकर 4 परसेंट हो जाएगी। माननीय वित्त मंत्री जी क्या आपके पास इस बात के आंकड़े हैं? कौन किसान है जो 7 परसेंट पर ऋण ले रहे हैं और वे कितनी बड़ी जोत के आदमी हैं? कौन किसान है जो 7 परसेंट ऋण लेने के लिए तड़फड़ाते रहते हैं और उन्हें ऋण मिलता नहीं है, उनकी क्या जोत है? किन किसानों ने समय पर वापस किया है? जो बड़ा किसान है और वही 7 परसेंट पर लोन लेता है, समय पर वापस कर देता है और तीन परसेंट की छूट ले लेता है। लेकिन छोटा किसान जो है उसका क्या हाल है? हमें पूरे आंकड़े चाहिए? पिछली बार आपने बड़ा हल्ला मचाया था कि 60 हजार करोड़ किसानों को दे दिया, लेकिन वह सब आपने बैंकों को दिया, किसानों को नहीं दिया, बैंकों का एनपीए कम कर दिया। हम आपसे आंकड़े चाहते हैं।
          हम आंकड़े चाहते हैं कि किसानों की आत्महत्या अभी तक बंद क्यों नहीं हुई? माननीय वित्त मंत्री जी, मेरा आपसे निवेदन है कि आपकी नीति होनी चाहिए - ऋण मुक्त किसान, रोजगार युक्त ग्रामीण नौजवान, तब होगा भूख मुक्त और समृद्ध हिंदुस्तान। गांव के नौजवान को रोजगार दीजिए, किसान को ऋणमुक्त कीजिए, उसे एक सुनिश्चित आमदनी दीजिए।  एक सरकारी कर्मचारी काम करे या न करे उसकी आमदनी, पेंशन, दवाइयां सुनिश्चित है लेकिन एक किसान 24 घंटे 12 महीने काम करे, बीमार हो जाए तो दवाई नहीं है, मर जाए तो कफन नहीं है। आप कैसा किसान पैदा कर रहे हैं, आप उसके साथ क्या व्यवहार करना चाहते हैं।  58 प्रतिशत लोगों के लिए कोई सामाजिक और स्वास्थ्य की सुविधा नहीं है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जो रिपोर्ट्स मैं नेशनल रुरल मिशन की देख रहा हूं जो सीएजी ने दी है।
श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी): यह आंकड़ा 58 प्रतिशत नहीं 65 प्रतिशत है।
डॉ. मुरली मनोहर जोशी :  मैं तो इन्हीं का आंकड़ा दे रहा हूं। आप देखिये वह क्या कहते हैं। वह रिपोर्ट कहती है कि हैल्थ सेंटर्स के क्या हालात हैं।  Bihar – in a PHC, the operation theatre was used as a medical store.  While in three PHCs, minor operations were carried out in wards. 
           “In Uttar Pradesh, in Banda and Etawah districts, the premises of sub-centres at Baragaon and Akbarpur respectively were used as a cattle shed for villagers. In Bahraich district, three out of four wards of CHC Risia were used as a meeting hall and store for vaccines and one OT was used as a delivery room. In Barabanki district at PHC Suratganj, Leprosy clinic was running while the PHC, Jaswantnagar in Etawah district was under the occupation of the Tehsil.
 
          In West Bengal, in four districts, the staff quarters of 24 PHCs were in a dilapidated condition and were being used by villagers for storing straw, cow dung cakes, etc.”             यह ग्रामीण स्वास्थ्य योजना में है। यह सीएजी की रिपोर्ट है, मेरी नहीं है। क्या हालात हैं? आप इस रिपोर्ट को पढ़ लीजिए, देख लीजिए, ऐसे पी.एच.सी. बने हैं, जिनमें भूसा रखा जा रहा है। ऐसे पी.एच.सी. बनें हैं, जिनमें पी.डी.एस. की स्कीम का अनाज रखा जा रहा है। यह क्या हो रहा है? आप बार-बार कहते रहिए कि हमने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कार्य किया है। आपके ग्रामीण स्वास्थ्य में आयुर्वेद का कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। हमारे देश की यूनानी और होम्योपैथी का जिक्र नहीं है। आप उनको कौन सा पैसा दे रहे हैं और वे क्या उसका उपयोग कर रहे हैं? 10 हजार से ज्यादा आयुर्वेदिक छात्र जो क्वालीफाइड हैं, बी.एम.बी.एस., सैकड़ों की तादाद में यूनानी छात्र, हजारों की तादाद में होम्योपैथी के छात्रों को आप वहां नियुक्त नहीं कर रहे हैं और करना चाहते हैं तो आप उन्हें एलोपैथी के डॉक्टर से कम तनख्वाह देना चाहते हैं। आपका अब एक नया सिस्टम आया है कि ग्रामीण लोगों के लिए एक नया कोर्स बनाएंगे। सब-स्टैंडर्ड कोर्स बनाएंगे। यह कैसा मज़ाक है। आप क्वालीफाइड लोगों को नियुक्त नहीं करते हैं और क्वैक्स बनाकर, अधूरे लोगों को गांव वालों को देना चाहते हैं। भगवान के वास्ते ग्रामीण स्वास्थ्य के साथ यह मजाक बंद कीजिए, ग्रामीण महिलाओं की प्रसूति के साथ मज़ाक मत कीजिए, उनकी डिलीवरी के साथ मज़ाक मत कीजिए। उनके बच्चों की वैक्सीनेशन एवं सारी चीजों के लिए मजाक बंद कीजिए। आपकी ये कैसी योजनाएं हैं? हम चाहते हैं कि आप इन रिपोर्ट्स को पढ़ा करें। पानी का आपने जिक्र किया। पानी की रिपोर्ट तो और भी मजेदार है। एक्सलरैटिड इरिगेशन बैनीफिट के 44 प्रोजेक्ट हैं, जिनको बताया गया है कि कम्पलीट हो गए हैं और पैसा भी चला गया है। मैंने 44 फोटोग्राफ्स दिए हैं। आप यह रिपोर्ट ले सकते हैं। यह रिपोर्ट संसद मे पेश हो चुकी है। देखिए कैसे-कैसे लोग हैं और क्या स्थिति है? यह कम्पलीट प्रोजेक्ट है, लेकिन इसमें पानी नहीं है। आप कह रहे हैं कि हमने किसान को पानी दे दिया है। मैं इन बातों से बहुत दुखी हूं। ऐसा कोई राज्य नहीं है मध्यप्रदेश में भी है, बिहार में भी है, गुजरात में भी है, आंध्र में भी है, उत्तर प्रदेश में भी है, अरुणाचल प्रदेश में भी है। ये दिखाया गया है कि ये कम्प्लीटेड प्रोजेक्ट्स हैं। मैं किताब के माध्यम से दिखाना चाहता हूं कि क्या स्थिति है। क्या ये कम्प्लीटेड प्रोजेक्ट्स हैं, कहीं घास उगी हुई है, कहीं पानी ही नहीं है, बल्कि कई जगह तो ऐसी हैं, जहां प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुआ है। आप कह रहे हैं कि आपने किसान को पैसा दे दिया, वे उपज बढ़ाएं, खेती बढ़ाएं। वे कैसे उपज और खेती बढ़ा सकते हैं? खेती और उपज बढ़ाने के लिए आप दी गई सिफारिशों को पढ़िए कि सीएजी ने सिंचाई और नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के लिए क्या कहा है और मनरेगा के लिए क्या कहा है। आप सोशल सैक्टर के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा क्यों दे रहे हैं। आम आदमी को पैसा नहीं जा रहा है। आम आदमी को सुख-सुविधा नहीं मिल रही है। आप सभी स्कीमों को रिस्ट्रक्चर कीजिए। बिना ऐसा किए आप कुछ नहीं कर सकते हैं।
          महोदय, मैं आपसे एक निवेदन और करना चाहता हूं। वित्त मंत्री जी ने गुरु रविन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं वर्षगांठ के लिए बहुत कुछ कहा है।
 15.00 hrs. लेकिन आप पी.सी.रॉय को क्यों भूल गये? वह भी बंगाल के हैं। उनका भी जन्म 1861 में हुआ था। उन्होंने ही बंगाल कैमिकल की स्थापना की थी। वह कैसे थे, कितने विद्वान थे, इसको भी मैं दो लाइन पढ़कर सुनाता हूं तो आपको पता लगेगा कि आपने किस व्यक्ति की अवहेलना की है। फ्रैन्च वैज्ञानिक वरथोल ने उनके लिए लिखा कि आपने पहली बार हमें यह साबित किया कि एशिया में भी रसायन विज्ञान उतना ही विकसित था जितना कि यूरोप के देशों में बल्कि उसके पहले के समय से था। फ्रेन्च आरकाइव्स में यह लिखा गया है कि आचार्य पी. सी. रॉय का काम रसायन शास्त्र के इतिहास के लिखने में कितना जबर्दस्त है लेकिन आप उनको भूल गये। बंगाल कैमिकल्स को आप पैसा दे रहे हैं लेकिन उसके संस्थापक पी.सी.राय को भूल गये। क्यों? क्योंकि उनको कहा जाएगा कि वह भगवावादी थे, वह दाढ़ी रखते थे, साधारण रूप में रहते थे, भारतीय संस्कृति के उपासक थे और हिन्दू कैमिस्ट्री लिखी थी। उनकी किताब का नाम हिन्दू कैमिस्ट्री था।...( व्यवधान)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: This is not fair. Shri P.C. Roy is definitely a respectable man.

DR. MURLI MANOHAR JOSHI : But you have not done anything for him.

SHRI PRANAB MUKHERJEE:  On what occasion?

DR. MURLI MANOHAR JOSHI : You have not done anything for his 150th Anniversary.… (Interruptions)

SHRI PRANAB MUKHERJEE:  It is not correct.  We have taken over Bengal Chemicals.

DR. MURLI MANOHAR JOSHI : You might have taken over Bengal Chemicals but what are you doing on his 150th Anniversary?

SHRI PRANAB MUKHERJEE: That is a different story.

DR. MURLI MANOHAR JOSHI : Why not?  That is why I am saying that you do not remember him. Why can you not announce some very strong and very viable 150th Anniversary programme for him?  It will give a message to the scientists of India. It will give a message to those who feel proud in the scientific heritage of this country. सवाल इस बात का है जिससे भारत की वैज्ञानिक परम्पराओं में विश्वास बनेगा। हम कितने समय से विज्ञान की साधना करते आ रहे हैं। यह ज्ञान लोगों को पता होना चाहिए। आप बताना चाहते हैं कि अमेरिका में क्या हो रहा था, फ्रान्स और जर्मनी में क्या हो रहा था। भारत में क्या हो रहा था, यह क्यों नहीं बताना चाहते? भारत के आम आदमी को उसका अभिमान क्यों नहीं देना चाहते?

          मालवीय जी के लिए आपने क्या किया? मालवीय जी चार बार इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। मालवी जी के चित्र आपने यहां लगा रखे हैं। मालवीय जी ने इस देश में ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी बनाई थी। आज भी वह सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है, जहां तक फैकल्टीज का सवाल है, आपने एक छोटी कमेटी बनाई और आपने ऐसी कमेटी बनाई कि मैं वहां का सांसद हूं, मुझे भी उसमें शामिल नहीं किया। मेरी समझ में नहीं आता कि आप क्यों मालवीय जी से परेशान हैं? मालवीय जी भी भारतीय सभ्यता के, हिन्दू सभ्यता के पुजारी थे। ...( व्यवधान) इसलिए जो भारत में, जो हिन्दू संस्कृति में अभिमान रखता हो, उसको काट दो। जो भारत की परम्पराओं के अनुसार चलना चाहता हो, उसे काटो। यह क्या बात आप कर रहे हैं? वोट के लिए आपने गुरुदेव चूंकि नाम वोट के लिए अच्छा है, आपने किया। मैं उसका तो बहुत स्वागत करता हूं लेकिन एएमयू के दो सेंटर्स केवल केरल और बंगाल में इस बार क्यों खोले? यह मांग तो बहुत पुरानी थी। पिछले साल क्यों नहीं खोले? पैसा आपके पास नहीं है लेकिन आपने ये खोल दिये। केरल में चुनाव होना है, बंगाल में चुनाव होने हैं, इसलिए एएमयू की दो शाखाएं खोल दीं। क्या बात कर रहे हैं?

SHRI PRANAB MUKHERJEE: I did it last year, not this year.  I did it last year and this year I have extended it.

डॉ. मुरली मनोहर जोशी : वही मतलब है। पिछले साल तो आपने चुपके से कुछ किया जिसे नोटिस नहीं किया गया। इस बार आपने हल्ला मचाकर किया ताकि लोग देख लें।

           सिर्फ एक बात और कहना चाहता हूं कि हमारे प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि दुनिया भारत के मॉडल की बहुत प्रशंसा करती है। दुनिया करती होगी। पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के लिए भी यही कहा गया था कि महान नेता हैं। दुनिया के लोग बोलते हैं, हम भी मानते हैं। लेकिन इस मॉडल को हम क्या करें जिसमें अनऑरगेनाइज्ड लेबर का हिस्सा नहीं है, जिसमें किसान पिस रहा है, जिसमें गरीबी बढ़ रही है, जिसमें डिसपैरिटी बढ़ रही है, जिसमें महंगाई बढ़ रही है, इसलिए इस मॉडल का हम क्या करें क्योंकि 5 या 7 प्रतिशत लोगों के लिए अगर आकाश छूती हुई इमारतें बन रही हैं, अगर दो आदमी के रहने के लिए 27 मंजिल की बिल्डिंग बनने को आप विकास मानते हैं और बाकी 2 कमरों में 27 आदमी न रह पाएं, अगर इसको आप विकास मानते हैं, लेकिन मैं ऐसे विकास से सहमत नहीं हूं।

इस देश के विकास का यह मतलब नहीं है। हम इस मॉडल को अस्वीकार करते हैं। जब तक कोई मॉडल इस देश की बड़ी आबादी के जीवनस्तर को ऊंचा नहीं उठाता, इस देश के असंगठित मजदूरों, किसानों और रिटेल व्यापारियों के जीवन को ठीक नहीं करता, ग्रामीण युवाओं को रोजगार और सुशिक्षित, स्वस्थ जीवन के लिए आशान्वित नहीं करता, देश को अस्वीकार्य है। यह स्वीकार नहीं हो सकता। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि इस देश में उबलते हुए आक्रोश को देख लीजिए। वित्त मंत्री जी, शायद यहां बैठे हुए हम लोगों को समझ में नहीं आ रहा है। ...( व्यवधान) लेकिन मुझे देश के अनेक राज्यों में आज एक आक्रोश दिखाई दे रहा है। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कोई बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।

...( व्यवधान)* डॉ. मुरली मनोहर जोशी : इस मॉडल ने अमरीका को तबाह कर दिया, यूरोप को तबाह कर दिया। इस मॉडल से चीन भी बहुत दिनों तक चलने वाला नहीं है, उसने अपने मॉडल में सुधार किया। भारत को अपना मॉडल बनाना चाहिए। भारत के सामने जो आर्थिक विकास के मुद्दे हैं, उनको ध्यान में रखना चाहिए। आप कहना चाहते हैं कि आईएमएफ वर्ल्ड बैंक ही ठीक हैं तो मैंने अभी पढ़कर सुनाया है कि 37 देशों में आज विध्वंस की स्थिति है। आप भारतीय मॉडल बनाएं, भारत की जनता के लिए मॉडल बनाएं तो हम उसका स्वागत करेंगे लेकिन इस वर्तमान मॉडल को देश का आम आदमी कभी स्वीकार नहीं करेगा। मुलायम सिंह जी, आप स्वीकार करेंगे, नहीं करेंगे। आप बताइए स्वीकार करेंगे। अंत में मैं केवल एक बात कहना चाहता हूं कि आप भी स्वीकार नहीं करते, आप अंदर से सहमत हैं लेकिन आप लाद देते हैं तो क्या करें? मंत्री जी, आपने आंगनवाड़ियों की मानदेय को बढ़ाया, अच्छा किया है और बढ़ना चाहिए। आप उसे मानदेय ही रखें, आप इसे वेज़ या वेतन न बनाएं। आपने एससी और एसटी बच्चों के लिए स्कॉलरशिप की स्कीम में कुछ इज़ाफा किया, मैं इसका स्वागत करता हूं। लेकिन आपने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में जो भेदभाव किया है, मैं उससे सहमत नहीं हूं। आपने लद्दाख को 100 करोड़ रुपए दिए, बहुत अच्छा किया लेकिन जम्मू को सिर्फ 150 करोड़ रुपए क्यों दिए? ...( व्यवधान)

SHRI PRANAB MUKHERJEE:  Joshiji, that is the first instalment.

डॉ. मुरली मनोहर जोशी : आपने जम्मू की आबादी, जनसंख्या और आवश्यकता को देखते हुए सिर्फ 150 करोड़ रुपए दिए? इसलिए क्योंकि वहां इलैक्शन नहीं हैं। ...( व्यवधान) एमपी जम्मू में ज्यादा हैं, आप ही के साथ हैं, आप क्या बात कर रहे हैं?...( व्यवधान)

          आखिर में मुझे कहना है कि यह बजट सिवाय बढ़ती हुई गरीबी के, सिवाय लूटे जाने की इजाजत के गरीबों को और कुछ नहीं देता है। मुझे इस बजट में और कोई सराहनीय काम दिखाई नहीं देता है जिसके लिए आप अपने को शाबाशी देना चाहते हैं। यह बजट बड़े आदमियों के लिए, बड़े आदमियों द्वारा और बड़े आदमियों के वास्ते बनाया गया है। इसमें गरीबों का कोई जिक्र नहीं है सिवाय उनकी बढ़ती हुई गरीबी के। मैं इस बजट के तमाम आंकड़ों और तमाम प्रस्तावों से बहुत चिंतित हूं। जैसा मैंने पहले कहा कि आप वित्तीय प्रबंध को ठीक कर सकें तो मैं आपको बहुत मुबारकबाद दूंगा। लेकिन जो तथ्य हैं, उन्हें देखकर संदेह होता है कि आप इसे पूरा कर सकेंगे।

   

श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज प्रणब दा द्वारा प्रस्तुत सामान्य बजट के समर्थन पर चर्चा में भाग लेने के लिए खड़ा हुआ हूं। मुझे कई बार सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि आदरणीय जोशी जी के बाद अपना वक्तव्य दे सकूं। वे बड़े पंडित हैं, बहुत विद्वान हैं इसलिए उनके बाद हमें कुछ ऐसी चीजें कहने के लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ता है जिनका अपने में कोई मतलब हो। मैं एक बात से जरूर अचंभित था, यह बजट भाषण से संबंधित नहीं है, जोशी जी आदरणीय प्रणब दा की बात पर आपत्ति व्यक्त कर रहे थे और कह रहे थे कि लक्ष्मी जी से हमने भत्ता मांगा है। अरे, जिसने श्री राम से सत्ता मांग ली उसे लक्ष्मी के भत्ते से क्या दिक्कत होनी चाहिए, यह मुझे समझ में नहीं आता। यह अलग बात है इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे।

मैं पहले बजट के उन मूल मुद्दों पर आता हूं, क्योंकि जोशी जी ने शुरू में कहा कि वित्त मंत्री जी ने आंकड़ों के घेर में हम लोगों को फंसाने की कोशिश की, लेकिन कुछ वह भी उस चक्कर में फंस गये। मैं भी उनके बहुत से आंकड़े नहीं समझ पाया, क्योंकि पहली बार जिंदगी में यह सुनाई पड़ा कि रेवेन्यू फॉर ग्रोन और बाहर जो काला धन जाता है, उसमें कोई कनैक्शन होता है। यह इन्होंने इकोनोमिक्स की कोई नई थ्योरी बताई है। आदरणीय चिदम्बरम साहब यहां बैठे हैं, मैं कोशिश करूंगा कि वह भी उसे समझने की कोशिश करें, प्रणवदा भी समझने की कोशिश करें।

          अब इन चीजों से अलग बात करते हैं। सबसे पहले जब हम किसी भी बजट का विश्लेषण करते हैं तो जो देश की आंर्थिक स्थिति है, उसका वर्णन करना आवश्यक है। यह ठीक है कि हम लोग कभी उस पर ध्यान देते हैं और कभी नहीं देते हैं। लेकिन किसी भी राज्य सरकार या सरकार की जो एक मूल   15.11 hrs. (Shri P.C. Chacko in the Chair) जिम्मेवारी होती है तो वह यह होती है कि हम मूल विकास के रथ को चलायें। उसमें अलग-अलग खंड किस तरह से विकसित होते हैं या नहीं होते हैं, कभी उसमें आचार-विचार होता है, कभी उसमें कुछ कमजोर पड़ते हैं और जहां कमजोर पड़ते हैं, वहां हमें सरकार को सचेत भी करना चाहिए और इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि वह वर्ग या वह खंड भी उसी तरह से विकसित दर पर चले। लेकिन इस दुनिया में पिछले चार-पांच साल की थरथराती हुई अर्थव्यवस्था के बीच एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसके बारे में भले ही जोशी जी कहते हों कि जिसमें इंडियन मॉडल नहीं है, लेकिन जिस अर्थव्यवस्था को स्थापित करने में, जिसके चरित्र को स्थापित करने में पिछले 10 साल की, 15 साल की हर सरकार ने बराबर का योगदान दिया है। कहीं किसी ने भिन्न मत नहीं रखा है। मैं इस बात को भी यहां रखना चाहता हूं। अगर यह कहना चाहते हैं कि पक्ष-विपक्ष इस अर्थव्यवस्था को अगर अलग करने का कोई तरीका अपनाता है तो उस थरथराती हुई अर्थव्यवस्था के बीच में, उन सब संकेतों के बीच में कि हमारी अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है, उन सब संकेतों के बीच में कि घिरती हुई दुनिया की अर्थव्यवस्था के बीच में हमारे जैसा गरीब देश शायद सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। हमारी इस सरकार ने इस देश के लोगों के साथ काम करते हुए, यहां के मजदूर, यहां के किसान, यहां के हर वर्ग के व्यक्ति को साथ लेते हुए थरथराती हुई अर्थव्यवस्था में 8.6 प्रतिशत की विकास दर प्राप्त की है। यह अपने आप में भले ही आंकड़ा हो सकता है, लेकिन यह आंकड़ा हमें दिशा-निर्देश भी देता है और यही नहीं इस 8.6 को यदि आप और विखंडित करें तो हमारा जो सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र कृषि का होता है, उसमें आज हमने 5.4 प्रतिशत की विकास दर दी है। इसी पर जब पिछले साल विकास दर नहीं दिखाई देती थी या एक या दो प्रतिशत पर हम चलते थे तो सारा सदन एक होकर चिंता व्यक्त करता था और वित्त मंत्री जी से कहता था कि साढ़े नौ प्रतिशत की विकास दर से ज्यादा बेहतर है कि हम चार-पांच प्रतिशत भले ही कृषि में ले आएं। आज हमारी सरकार 8.6 प्रतिशत के साथ-साथ पांच प्रतिशत की विकास दर कृषि में लाई है।

          महोदय, जैसे वित्त मंत्री जी ने अपने खुलते हुए पन्नों में कहा कि कहीं तो उसका संबंध, जिन नीतियों पर हम पिछले पांच सालों से चल रहे थे, उसका कुछ न कुछ तो संबंध होगा। आदरणीय जोशी ने खुलते ही 2004 के उस भाषण का वर्णन किया, जो चिदम्बरम साहब ने दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम कृषि पर विकास केन्द्रित करेंगे, कृषि के ऋण का हम विस्तार करेंगे, हम इर्रिगेशन प्रोग्राम में पैसा देंगे। जो हमारे जलाशय, तालाब आदि हैं, जो मरते चले जा रहे हैं, उनमें पैसा देंगे। बाद में उन्होंने और बात करते हुए यह भी कहा कि वह तथ्य में कहां हैं। शायद जिस तरीके से उन्होंने उन रिपोर्टों का वर्णन किया कि वे हमें पढ़नी चाहिए, शायद एआईबीपी की या जब चिदम्बरम जी वित्त मंत्री थे तो वह बार-बार वर्णन करते थे कितने जलाशयों को हमने पुनर्जीवित किया। शायद उन रिपोर्टों को उन्होंने पढ़ा होता तो आज वह भी कोट कर देते तो हो सकता है कि आज इस बात की चर्चा करने की मुझे आवश्यकता नहीं होती। लेकिन इसके लिए हमें वित्त मंत्री जी को साधुवाद देना चाहिए कि 8.6 प्रतिशत इस साल और हमें पूरा विश्वास है कि अगले साल से हम वापिस 9 दशमलव के विकास रथ पर फिर से चढ़ेंगे, जो विकास रथ दुनिया में मंदी होने के कारण हमारे यहां रुका था।

          मुझे याद है इसी सदन में तीन साल पहले जब दुनिया की आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ा रही थी और यहां चर्चा चल रही थी, तब कुछ और सांसद यहां पर थे। आदरणीय मुलायम सिंह जी यहां नहीं थे, लेकिन और साथीगण यहां मौजूद थे और सबने इस बात के लिए हमें सचेत किया था कि हम लोग गलत कांफीडैन्स में बैठे हैं, दुनिया की अर्थव्यवस्था में यह देश चरमरा कर इतनी बुरी तरह से गिरेगा कि इस देश की नीतियां उसे संभाल नहीं पायेंगी। मेरे ख्याल से सारे संकेतों के बीच इस देश के प्रधान मंत्री और हमारी सरकार की नीति और हमारे मंत्रियों ने जिस तटस्थता से इस देश की अर्थव्यवस्था की रक्षा की है, मेरे ख्याल से पूरे सदन को उन्हें धन्यवाद देना चाहिए और उनका साधुवाद देना चाहिए।

          महोदय, आगे बढ़ते हुए उन्होंने एक्सपोर्ट्स के बढ़ते हुए तरीकों के बारे में बताया है। कुछ ऐसे आंकड़े भी बतायें हैं, जिनका थोड़ा सा मैं उल्लेख भी करना चाहूंगा, वैसे मैं चाहता नहीं हूं कि आंकड़ों में हमारा भाषण दबे, लेकिन इसकी एक व्याख्या करने की आवश्यकता होती है।

          आज हमारा टैक्स रेवेन्यू पिछले वर्ष के मुकाबले 25 परसेंट के करीब बढ़ा है। इसके कारण आज हम दो लाख करोड़ रूपये के करीब राज्यों को दे पाये हैं। यह मैं खास इस कारण से कहना चाहता हूं कि जब भी कभी राज्यों में राजनीतिक चर्चाएं होती हैं और पक्ष-विपक्ष की कुछ बातें होती हैं तो अकसर, खासकर वे राज्य सरकारें, जिनमें यूपीए के या उसके घटक दल के लोग राज्य नहीं करते हैं, उनसे कहा जाता है कि अगर भारत सरकार ने हमें पैसा दे दिया तो कौन सा अहसान कर दिया। यह तो वित्तीय कमीशन है, वह बांटता है। मैं मानता हूं कि कोई अहसान नहीं करते हैं, लेकिन अगर साल दर साल आपको दिया हुआ पैसा बढ़ रहा है तो वह इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि इस सरकार ने विकास दिया है और कर ज्यादा इकट्ठा किया है। अगर पिछले साल 13, 300 करोड़ रूपया मिलता था तो आज 13,350 करोड़ रूपया मिल रहा है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कोई किसी पर अहसान करता है, लेकिन भारत सरकार न केवल अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन मुस्तैदी से करती है, बल्कि इस तरह से करती है कि वह अपने विकास के लिए तो है ही, उन राज्यों में भी पैसा दे, जहां की राज्य सरकारें भले ही हर दिन भारत सरकार को कोसती हों। हम उसमें कभी पीछे नहीं हटते हैं और कोशिश करते हैं साल दर साल राज्य सरकारों को उनके हक का पैसा हम अपनी मेहनत से पूरा करें। इसीलिए राज्य सरकारों को दिया जाने वाला पैसा आज पिछले वर्ष की बनिस्पत 23 प्रतिशत बढ़ा है। आज 2 लाख 1 हजार 773 करोड़ के करीब रूपया राज्य सरकारों को बांटा गया है। फिजिकल डैफीसिट की बात करते हैं, जोशी जी ने बखूबी बताया कि 35 या 50 हजार करोड़ के करीब हमें 3जी के लाइसेंस की फीस के बारे में जानकारी दी जाये और उस कारण से पूरा का पूरा घाटा 5.5 से घटकर 5.1 प्रतिशत के करीब हो गया है।

          महोदय, मैं बड़ी विनम्रता से कहता हूं कि अगर जोशी जी इन्हीं आंकड़ों को और ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि 35 हजार करोड़ के करीब तो हमने पहले ही एस्टीमेट कर रखा था कि वह इससे मिलेगा और उससे कुछ ही ज्यादा पैसा हमें मिला है। जो हमारा असली में 5.5 परसेंट से घटकर 5.1 परसेंट तक डैफीसिट कम हुआ है, उसमें मुख्य कारण वे हैं, जो टैक्स बायोन्सी की बात की जाती है। हर क्षेत्र में कहीं 15 हजार करोड़, कहीं 20 हजार करोड़, कहीं 8 हजार करोड़ के करीब भारत सरकार ज्यादा इकट्ठा कर पायी है। केवल यही बात नहीं है कि आज यह सारा का सारा पैसा हमने निकालकर अपने घाटे को कम करने में लगाया है। मैं सांसदों को बताना चाहता हूं कि मूल इफ्रास्ट्रक्चर के इलाके में हमने जितना पिछले साल बजट किया था, उस पर इस साल इस सरकार ने 30 हजार करोड़ रूपया ज्यादा धन इकट्ठा करके निवेश किया है। उसके बावजूद घाटा कम करने में हम सफल हुए हैं। घाटा कम करने का एक कारण यह होता है, हमें अर्थशास्त्री बताते हैं कि अगर आप घाटा कम रखेंगे तो उसका असर अंततः इंफ्लेशन पर भी पड़ता है। हम सब जानते हैं कि इस समय हमारे, हमारे देश और हमारे लोगों के सामने अगर शायद सबसे बड़ी चुनौती है तो वह बढ़ते हुए इंफ्लेशन की है। जो अब जरूर पिछले कुछ महीनों में कम हुआ है, लेकिन उसका एक राक्षस स्वरूप अभी भी बहुत बुरे तरीके से हमारे सामने है। मैं इंफ्लेशन कंट्रोल की बात जरूर कहना चाहता हूं क्योंकि बार-बार यह बात कही जाती है कि बजट इस पर खामोशी साधे हुए था। इसमें उन बातों का वर्णन नहीं किया गया जो आगे चलकर महंगाई की दर को कम सकती हैं। यह बात निरर्थक है। अगर आप ध्यान से वित्त मंत्री जी के पैसेजेज को बार-बार पढ़ेंगे, वित्त मंत्री जी के भाषण के साथ-साथ जो बाकी कागज हमें दिये गये हैं, अगर आप उन्हें धीरे-धीरे पढ़ेंगे तो आप देखेंगे कि विशेषकर चार इलाकों में हमारी सरकार ने कोशिश की है। सबसे पहले मॉनीटरी पॉलिसी पर लांग टर्म इम्पैक्ट के लिए उन्होंने इम्पैक्ट किया है, मैं उसकी पेचीदगियों में नहीं जाऊंगा क्योंकि मुझे नहीं लगता कि इसमें लोगों को बहुत ज्यादा रूचि होगी, लेकिन उसका एक या दो परसेंट के करीब अंततः इंफ्लेशन को कम करने में असर पड़ेगा। आज कृषि में जो बूस्ट दी गयी है, ऐसा क्यों है कि सामान्यतः पिछले आठ या दस साल से हमारे यहां जो दलहन का उत्पादन होता था, वह प्लैटो की तरह चलता चला जा रहा था। पिछले एक, डेढ़ साल के बाद दलहन का उत्पादन पहली बार पिछले दस-बारह सालों में हिन्दुस्तान में बढ़ता चला जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कृषि में पैसा निवेश किया गया है। वित्त मंत्री जी का जो छह हजार गावों में दलहन को बढ़ाने के लिए विशेष पैसा देने का आयोजन था, उससे भी इसमें कहीं न कहीं अंतर आया है, एक फर्क पड़ा है। आज ऑयल सीड्स में शायद अगर मेरे आंकड़े गलत न हों तो पहले शायद हम लोग 246 लाख टन बनाते थे, आज 274 लाख टन के करीब हमारी प्रोडक्शन बढ़ी है। ऑयल सीड्स में इसलिए आवश्यकता है क्योंकि आज भी हम अपना 50 परसेंट के करीब तिलहन बाहर से आयात करके लाते हैं, इसलिए उसका महंगाई पर बहुत बुरा असर पड़ता है। आज इन्होंने एग्रीकल्चर में बूस्ट करके वेयरहाउसिंग की बात की है। वर्ष 2007 में इस देश में केवल 1.7 लाख टन की वेयरहाउसिंग की कैपेसिटी थी और तब एक लाख सात हजार टन के करीब हमारे एफसीआई के गोदामों में खाद्य जाता था। आज वह चार लाख 70 हजार टन के करीब है। उसे अगर हम चाहते हैं कि किसी भी माध्यम से चाहे आने वाले नेशनल फूड सिक्योरिटी बिल के बाद उसे बांटना पड़े, लेकिन उसे रखने के लिए अगर हम वेयरहाउसिंग कैपेसिटी नहीं बढ़ायेंगे तो वह कहां जायेगा?

बड़े दुर्भाग्य से कहना पड़ता है कि 2000 से पहले की सरकारों को हो सकता है कि ज्ञात न हो या यह बात उनके ज़हन में न आई हो, या हो सकता है इस तरफ उनकी कोई रुचि ही न रही हो, लेकिन किसी सरकार ने भी इस वेयरहाउसिंग कैपेसिटी को हिन्दुस्तान में बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। पिछले तीन-चार सालों में यह यूपीए की ही सरकार है जिसके समय में आज डेढ़ लाख मीट्रिक टन क्षमता की वेयरहाउसिंग बन गई है, 40 हज़ार टन रूरल गोदामों में बन रही है और बाकी अन्य कार्यक्रमों में बन रही है। मुझे उम्मीद है कि अगले साल तक दो लाख मीट्रिक टन से ज्यादा की वेयरहाउसिंग कैपेसिटी हमारे पास बढ़ेगी। यह सुनने में बड़ी एक्सप्लोज़िव चीज़ लगती है, लेकिन जब उसका असर आता है तो उसका असर खाद्यान्न सुरक्षा में और किसान जहाँ भंडारण कर सकता है, उस पर सही सही फील्ड पर दिखेगा। एक और बहुत बड़ी बात उन्होंने डिस्ट्रिब्यूशन के नैटवर्क को बदलने की बात कही है। बड़े विस्तार से जोशी जी ने बात कही कि एफडीआई को आप रीटेल में नहीं लाइए। मैं इसमें बहुत ज्यादा नहीं जाऊँगा। इतना कहूँगा कि वित्त मंत्री जी और बाकी सरकार जब भी इस पर कोई कदम ले तो बड़े ध्यान से ले। लेकिन एक चीज़ के बारे में मेरे दिल में ज़रूर दर्द हुआ। राजनीति से पहले जिन क्षेत्रों में मैं काम करता था, वहाँ जब रेडीमेड गारमैन्ट की फैक्ट्री आई तो किसी ने जुलाहे के बारे में भाषण संसद में क्यों नहीं दिया, यह मैं संसद में पूछना चाहता हूँ। जब इसी देश में और ऐसी चीज़ें आने लगीं कि हमारा इंडिया गेट पर जो पॉपकॉर्न बेचने वाला था, वह बाहर हो गया क्योंकि पोटैटो चिप्स आने लगे, तब संसद में इस तरह की चर्चा क्यों नहीं हुई, या एनडीए के छः साल के राज में उसको विपरीत क्यों नहीं कर दिया गया कि वापस वह आदमी आकर अपना काम कर सके। मैं किसी पर आक्षेप नहीं कर रहा, लेकिन अगर व्यवस्था बदलती है तो व्यवस्था को बदलने के लिए कुछ कारगर कदम लोग उठाते हैं। मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि ऐसे उदाहरण इस देश में हुए हैं। मैं आपके सामने एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत करता हूँ जो मुझे हिन्दुस्तान के मध्य प्रदेश के एक आदमी ने मुझे बताई थी। मैं उसके साथ एक बस स्टॉप पर बैठा हुआ था और वह आदमी मूँगफली बेच रहा था। यह बात करीब 1998-99 की होगी और एक दौर चल रहा था कि बाहर से पोटैटो चिप्स की कंपनियाँ आ रही थीं, बाहर से नए-नए कपड़े बनाने की कंपनियाँ आ रही थीं, नई-नई गाड़ियों का निवेश हो रहा था और उन वर्षों में एक उदीयमान भारत की, शाइनिंग भारत की नींव रखी जा रही थी। उस समय उस आदमी ने मुझसे कहा कि साहब आपकी जेब में पाँच रुपये हैं? मैंने कहा कि हैं। वह कहने लगा कि मैं आपकी जेब से पाँच रुपये निकाल लूँ तो उसको क्या कहा जाएगा? मैंने कहा चोरी कहा जाएगा। वह कहने लगा कि मेरे पास बचपन से सिर्फ मूँगफली बेचने का यह कारोबार है। मेरे माँ-बाप ने, प्रकृति ने, भगवान ने मुझे केवल मूँगफली बेचने वाला बनाया है। मैंने कहा कि वह तो बनाया है। वह कहने लगा कि यदि कोई विदेशी कंपनी आकर मेरी मूँगफली का कारोबार मुझसे ले जाती है, तो उसे तो चोरी नहीं कहा जाता, उसे विकास कहा जाता है। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि उस परिभाषा से भी हम थोड़ा बचें। कहीं न कहीं हमारी आर्थिक नीतियाँ उन चीज़ों पर असर करेंगी जिससे लोगों के रोज़गार पर असर हो तो मैं एफडीआई की बात नहीं कर रहा। सारे रोज़गारों पर मुझे इसलिए दर्द होता है कि शायद इससे पहले हमारे वित्त प्रबंधन करने वाले तमाम मंत्रियों की रीटेल पर आवाज़ है जिसको सुनने की उन्होंने हिम्मत की। शायद उस गरीब की भी हिम्मत की होती, तो जो थोड़े बहुत दुष्परिणाम आर्थिक विकास के हुए, शायद वे आज हमें देखने को न मिलते। अब मैं आता हूँ कि सरकार कहाँ से पैसे लाई, कैसे पैसे लाई, इसके बारे में मैंने कहा है। उसके निवेश की भी बहुत आवश्यकता होती है।

          आज हम लोग कृषि पर कितना खर्च कर रहे हैं? जोशी जी ने कहा कि कृषि में बखूबी पूरा खर्च नहीं हो रहा है। वह खर्च कहाँ किया जा रहा है, वह सबसे आवश्यक बात होती है। क्योंकि राज्यों पर भी यह बात निर्भर है कि एग्रीकल्चर में वह क्या स्पैन्डिंग करे। पिछले साल अगर हम राष्ट्रीय कृषि विकास योजना पर 6700 करोड़ रुपये के करीब खर्च कर रहे थे तो इस साल वित्त मंत्री जी ने 7760 करोड़ रुपये के करीब इसमें पैसा दिया है। उसमें जो महत्वपूर्ण चीज़ों पर इन्होंने विशेष ध्यान दिया है, उसका मैं विशेष उल्लेख करना चाहता हूँ। पिछली बार जब उन्होंने कहा था कि हिन्दुस्तान के पूर्वी अंचलों में हरित क्रंति का कभी असर नहीं हुआ, मैं एक छोटे पैसे से उसकी शुरूआत करता हूँ तो कुछ लोग हँसे भी थे इस संसद में इतने कम पैसे से शुरूआत हो रही है। उन्होंने कहा था कि यह शुरूआत है, आगे आगे देखिये। उस शुरूआत को, उस पहल को वित्त मंत्री जी ने आगे बढ़ाते हुए और अधिक पैसा ईस्टर्न स्टेट्स में ग्रीन रिवॉल्यूशन को बढ़ाने का दिया है। मैं वित्त मंत्री जी को धन्यवाद करता हूँ और आशा करूँगा कि जिस तरह से हरित क्रंति ने पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और दक्षिण हिन्दुस्तान के कुछ राज्यों और जिलों का चेहरा बदला है, वहीं पूर्वी हिन्दुस्तान में कुछ बहुत गरीब इलाके हैं, कुछ ऐसे राज्य हैं जिनके पास कृषि की क्षमता तो बहुत है लेकिन क्षमता पूर्ण करने के लिए साधन नहीं हैं। इस नयी हरित क्रंति से उनको असर पड़ेगा।

          मैंने आपसे दलहन की बात कही थी कि छह हजार गांव प्रोत्साहित किए गए हैं। इस बारे में और ज्यादा असर डालने की जरूरत है। आप को यह जानकर खुशी होगी, जो मैंने कहा था कि 135, 140, 145 लाख टन की खरीद का जो प्लेटो बना हुआ था, उसे हमारे किसानों ने अपनी मेहनत से और हमारी सरकारों के थोड़े-बहुत योगदान से ब्रेक किया और पिछले साल 167 लाख टन के करीब दलहन का उत्पादन उन लोगों ने किया है। आज यह छोटी पहल आगे जाकर एक सकारात्मक रूप लेगी।

          महोदय, ऑयल सीड्स और ऑयल पॉम पर एक नई योजना की घोषणा की गई है। एक जमाना था जब पामोलीन ऑयल बाहर से आता था और बहुत से लोग इसको खाने से परहेज करते थे, लेकिन अब वह समय चला गया है। आजकल यह तेल घर-घर में, रेस्टोरेंट्स और छोटे ढाबों में जाता है। इसका हम स्वयं उत्पादन शुरू करेंगे। इससे तीन लाख मीट्रिक टन की बढ़ोतरी होगी। इससे हमारी तिलहन की कीमतों पर असर पड़ेगा।

          महोदय, मंत्री जी ने वैजीटेबल क्लस्टर्स की बात की है। इसकी शुरूआत इन्होंने मेट्रो सिटीज़ से की है, क्योंकि शहरों पर सब्जी की कीमतों का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। उसके साथ-साथ मैं तीन-चार कार्यक्रमों का भी उल्लेख करना चाहूंगा। हमारे किसानों को कहा जाता है कि तुम जो रागी, ज्वार और बाजरा बोते हैं, वह देश हित में नहीं है। आप तो केवल धान या गेहूं लगाइए क्योंकि खाद्य सुरक्षा इनसे होगी। हमारे पुराने कृषि के पंडित कहते थे कि इन पुराने अनाजों को नहीं हटाया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें बहुत से ऐसे मिनरल्स और विटामिन्स हैं, जो शायद इन नये खाद्यान्नों में हमें नहीं मिलेंगे। लेकिन हरित क्रंति के बाद इन मिलैट्स के बारे में इस तरह की बात इस देश में फैलायी गई थी। मैं वित्त मंत्री जी के भाषण का स्वागत करता हूं जिन्होंने कहा है कि इन अनाजों के पुनर्जीवन की आवश्यकता है। मेरा वित्त मंत्री जी से एक छोटा सा निवेदन है कि राज्यों में कृषि विभाग 30 साल से ज्वार और बाजरा का तिरस्कार करते आ रहे हैं, यदि आप इसको चलाने की कोई पद्धति बनाते हैं तो उन साइंटिस्टों की पद्धति से अलग कोई पद्धति बनाइए, क्योंकि जिन लोगों ने इसको तिरस्कृत समझा है, शायद वे इनका विकास नहीं कर पाएंगे। आपने प्रोटीन सप्लीमेंट में एनीमल फीड की बात की है। फॉडर डेवलपमेंट का कार्यक्रम चल रहा है। कृषि विशेषज्ञों से बात करने पर वे बताते हैं कि आने वाले समय में सबसे बड़ी समस्या जानवरों के चारे और अनाज के बीच होगी। वित्त मंत्री जी ने 25 हजार गांवों में फॉडर डेवलमेंट की बात की है। यदि आप इसको पायलट रूप में ले रहे हैं तो ठीक नहीं है, अन्यथा इस तरह का कार्यक्रम 6 लाख गांवों में चलना चाहिए। ऑर्गेनिक कृषि की काफी दिनों से बात चल रही थी। लेकिन स्पैसीफिकली वित्त मंत्री जी इसे स्कीम के रूप में लेकर आए हैं, जो कि स्वागत योग्य है। मुझे इस बात की खुशी है कि देश का एडमिनिस्ट्रेशन ऑर्गेनिक कृषि को आज महत्वपूर्ण समझ रहा है। आज से 10-15 साल पहले जैविक कृषि की बात करने वाले पर लोग हंसते थे, उसे रूढ़िवादी व्यक्ति कहते थे। मैं मानता हूं कि आधुनिक कृषि ने इस देश में काम किया है। इस देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया। लेकिन उसके कारण हम पारम्परिक कृषि को भूल गए थे और उसको नीचे दिखाने की प्रवृत्ति हमारे यहां बन गई थी। आज उसी के दुष्परिणाम हैं कि भिण्डी में कैमिकल मिलता है, इसके कारण हम सेब नहीं खा पाते हैं। जैविक कृषि के प्रोत्साहन से हम एक बैलेंस और सस्टैनेबल कृषि के ग्रोथ की ओर बढ़ सकेंगे।

एग्रीकल्चर क्रेडिट की जो बात बताई है, जोशी जी अभी यहां बैठे नहीं हैं, जोशी जी पूछ रहे थे कि आपने जो यह क्रेडिट बढ़ाया है, यह किस के लिए है। आज जो 4,75,000 करोड़ के क्रेडिट की सीमा बांधी गई है कि इतनी कम से कम ले जानी चाहिए, जोशी जी, उसमें अगर दो शब्द और पढ़ लेते तो उसमें साफ अंकित था कि यह स्माल और मार्जिनल फार्मर्स के लिए किया जाता है। स्माल और मार्जिनल फार्मर्स की जमीन पर क्या परिभाषा है, जोशी जी इस बात को जानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मुझे कम से कम या यहां जो सांसद बैठे हुए हैं, उन्हें पता चलेगा कि यह जो फोकस था, ये उन कृषकों के लिए है, जो छोटी जमीनों पर काम करते हैं। आज नाबार्ड की री-स्ट्रेंथनिंग की बात पर बहुत बढ़िया कहा गया, हम सब जानते हैं कि नाबार्ड का जितना भी काम रहा है, सकारात्मक रहा है। आज अगर नबार्ड को दस हजार करोड़ रुपया वित्त मंत्री जी ने ज्यादा दिया है तो उस सिस्टम को सुदृढ़ करने के लिए दिया है, जिसने पिछले बीस सालों में अपनी मेहनत से हमारे उन बैंकों को, जो प्रॉयरटी सैक्टर लैंडिंग में न पड़ता हों, उनकी तरफ देखते तक नहीं थे। उन नाबार्ड के अधिकारियों ने और उस संस्था ने धीरे-धीरे प्रोत्साहित करके कृषि और एनिमल हसबैंड्री में क्रेडिट देने की आदत जो बैंकों को डाली है, उसमें उसने सराहनीय कदम रखा है। उसके लिए मैं उनका बहुत स्वागत करता हूं।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहता हूं, मैं इसमें एक बात जरूर जोड़ना चाहूंगा कि एफसीआई की काफी साल पहले, जब चिदम्बरम साहब वित्त मंत्री थे तो उस समय एफसीआई के री-स्ट्रक्चरिंग की बात की गई थी। पिछले चार-पांच सालों से मैं देख रहा हूं कि एफसीआई के री-डेवलपमेंट या री-स्ट्रक्चरिंग के प्रॉयरटी की जो बात थी, वह कहीं न कहीं चर्चा से बाहर चली गई। मैं आदरणीय वित्त मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि उस पर दोबारा फोकस की बात करें। वित्त मंत्री जी ने यह भी कहा है कि एपीएमसी के एक्ट को राज्यों में मोडिफाई करना चाहिए, उनमें शायद एपीएमसी के एक्ट को मोडिफाई करने का राज्यों की तरफ से जो काम आना चाहिए था, वह नहीं आया है। मुझे मालूम है कि शायद पूरा सदन उसमें समर्थन करेगा। हम सब को मिल कर अपने-अपने राज्यों में अपनी-अपनी सरकारों से निवेदन करना चाहिए कि एपीएमसी एक्ट में जो बदलाव लाने की आवश्यकता है, उसे लाएं। इसमें डिस्ट्रीब्यूशन में हमें जो आज दिक्कतें मिल रही हैं, शायद आगे चल कर वे दिक्कतें कम हों। इफ्रास्ट्रक्चर के बूस्ट की बात आती है, पिछले साल की बनिस्पत आज 23 परसैंट के करीब कोर इफ्रास्ट्रक्चर की फंडिंग में इस बजट में ज्यादा पैसा दिया गया है और 2,14,000 करोड़ के करीब आज हम लोग इसमें ज्यादा पैसा निवेश कर रहे हैं। यह बात भी बहुत सराहनीय है कि कोर इफ्रास्ट्रक्चर में जो फंडिंग है, आज प्लॉन एक्सपेंडीचर का 49 परसैंट के करीब आता है। आज 50 परसैंट के करीब पैसा, इस देश की जो मूलभूत संरचना है, उसे सुदृढ़ करने में और नये निर्माण करने में प्लान में हम लोगों ने खर्च किया है। जवाहर लाल नेहरू अरबन रिन्यूवल मिशन की बात वित्त मंत्री जी ने की है। उसमें उन्होंने दिल्ली मेट्रो की बात की। मैं स्वयं उस इलाके से आता हूं, इसलिए मैं उस चीज का विशेष स्वागत करूंगा। लेकिन मैं वित्त मंत्री जी से एक आग्रह जरूर करूंगा कि वे अपने द्वारा शहरी विकास मंत्री जी को भी बताएं कि मेट्रो कनेक्टिविटी को हम केवल बड़े शहरों की मेट्रो से न जोड़ें। आज जो हमारे छोटे एवं मध्यम वर्ग के शहर हैं, वे सब के सब आज से दस साल बाद मेट्रो की शेप ले लेंगे। आप चाहे कानपुर, नागपुर या सूरत की बात करें, ये सब आज उस स्थिति पर हैं, दस-15 साल के बाद कोई दिल्ली, मुंबई और पुना का रूप ले लेगा। तब हम संघर्ष कर रहे होंगे कि इन बिगड़े हुए शहरों को हम किस तरीके से सुधार सकें। अपने प्रयासों से इन जगहों पर भी, जवाहरलाल नेहरू अरबन रिन्यूवल मिशन के अंदर चाहे हाउसिंग की बात हो या उनके म्युनिसिपल कार्पोरेशंस के रिफार्म की बात हो या मेट्रो लाइंस के प्लानिंग की बात हो, ये कम से कम आज से कर दें तो कल उन जमीनों पर, जहां आप न्यू हाउसिंग एवं न्यू इन्वेस्टमेंट्स प्लान करेंगे, शहर के लोगों को भी पता रहेगा कि नये आने वाले हमारे शहरों का क्या स्वरूप होता है। इसलिए नये आने वाले शहरों के समझे और जाने हुए स्वरूप के साथ-साथ वे अपनी जिन्दगियों को जोड़ेंगे। रोज जो बात होती है कि कभी कालोनियां एवं कभी झुग्गियां टूट रही हैं तथा कभी इफ्रास्ट्रक्चर के लिए जगह नहीं मिल रही है, कम से कम आगे ये दिक्कत नहीं होगी। जो आदमी जानबूझ कर गलत काम करता है, उसके लिए तो हमेशा पुलिस एवं अन्य कई चीजें हैं, जो उसे रोक सकती हैं। आज सोशल सैक्टर के फंडिंग की बात होती है और इसमें इनक्लुसिव ग्रोथ की बात कही गई है। इसमें मैं चाहता हूं कि सदन और हम लोग विशेष मंत्री जी का स्वागत करें। राइट टू एजुकेशन या राइट टू वर्क की बात हो रही है। उसमें यह पहला वर्ष है, जब हमने राइट टू एजुकेशन को इम्प्लीमेंट किया है और पहले वर्ष के आते-आते हमारे वित्त मंत्री जी ने शिक्षा विभाग को दस हजार करोड़ रुपए एडिशनल देने की बात की है, जो 24 परसैंट के करीब पिछले साल से ज्यादा हैं। बार-बार जो चीज कही जाती थी कि राइट टू एजुकेशन के लिए आप फंड कहां से लाएंगे। वित्त मंत्री जी ने यह दर्शाया है कि हमारी राजनीतिक प्रॉयरटीस हैं।  

 

           सभापति महोदय, जब पैसा लगाने की बात आती है, वहां सरकार बढ़-चढ़ कर उन प्रॉयर्टीज में पैसा अवश्य लाकर देती है। एम.जी.एन.आर.जी. की बात कही है, जो कहा गया है कि उसे सी.पी.आई.एल. से जोड़ा जाएगा, कंजूमर प्राइस इंडैक्स और एग्रीकल्चर्ल लेबर्स को आपस में जोड़ने की जो बात कही गई है। मैं बताना चाहता हूं कि दुनिया में ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि किसी भी सरकारी कार्यक्रम को कंजूमर प्राइस इंडैक्स के साथ जोड़ा गया है। वैसे हमेशा होलसेल प्राइस इंडैक्स के साथ जोड़ा जाता है। मुझे यह उम्मीद है कि सी.पी.आई.एल. से जोड़ने के बाद, बार-बार हमारी जो चर्चा होती थी या विवाद होता था कि हमारे पास जो बेसिक रेट्स मनरेगा के अन्दर होने चाहिए वह दुविधा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी और जो हमारे लेबरर्स हैं, उन्हें न्यायोचित पैसा जरूर मिल पाएगा।

          महोदय, भारत निर्माण में पैसा निवेश करने की बात कही गई है। आने वाले इस वर्ष में लगभग 58 हजार करोड़ रुपए हम भारत निर्माण योजना में देंगे। इसमें पी.एम.जी.एस.वाई. है, इसमें ए.आई.बी.पी. है, इसमें राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना की बात है, इसमें मनरेगा की बात है। इसमें मैं एक-दो बात जरूर जोड़ना चाहूंगा। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना का हर राज्य में अलग-अलग तरह का अनुभव है। मूलतः देखें, तो अनुभव अच्छा रहा है, लेकिन मैं इस माध्यम से राज्य सरकारों से भी विनम्रता से अपील करना चाहूंगा कि वे लोग भी राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अन्दर जो फेसिलिटीज दी जा रही हैं, उससे ऊपर जाकर काम करें। अगर आपको भारत सरकार की ओर से गांव तक बिजली ले जाने या बस्ती के प्रत्येक घर में एक बल्ब देने के लिए पैसा मिल रहा है, तो वह तो आप करें, लेकिन अपने संसाधनों से इससे और आगे जाकर लोगों को बिजली पहुंचाने की कोशिश करें। इस काम में सरकारें अपने आपको सकारात्मक रूप में जोड़ेंगी, तो राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना को वहां तक पहुंचाने की जो व्यवस्था है, उससे आगे जोड़ कर, दोनों सरकारें, राज्य सरकार और भारत सरकार मिलकर इस देश की जनता की बेहतर सेवा कर पाएंगी।

श्री रेवती रमण सिंह (इलाहाबाद): भारत सरकार की ओर से राज्य सरकारों को पैसा नहीं जा रहा है।

श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली):  महोदय, वह अलग बात है। इस समय मैं बजट में पैसा देने की बात कर रहा हूं। हर राज्य का अलग अनुभव हो सकता है। ...( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): महोदय, मैं बताना चाहता हूं कि केन्द्र सरकार की ओर से पिछले दो वर्षों से उत्तर प्रदेश को एक पैसा भी नहीं गया है। ...( व्यवधान)

श्री सन्दीप दीक्षित :  शैलेन्द्र जी, वह अलग बात है। मैं उसमें नहीं पड़ना चाहता हूं। सभी साथी वहीं बैठे हुए हैं।

          महोदय, आज स्किल्ड डैवलपमेंट की बात कही गई है, हायर एजूकेशन संस्थाओं की बात कही है। जोशी जी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के दो केन्द्र खोलने के लिए अपनी टिप्पणी करते समय, जो कम से कम बाकी संस्थाएं थीं, जिनके लिए पैसा दिया जा रहा है, उन पर पता नहीं क्यों टिप्पणी कर दी। मैं इस बात से अचम्भित हूं कि उन्होंने यह कहा, चूंकि इस साल कहीं चुनाव था, इसलिए हम किसी चीज को ज्यादा जोर-शोर से कह रहे हैं। पहली बार मैंने सुना है, हो सकता है कि उनकी आदत रही हो कि जिस साल चुनाव हो, उस साल बिलकुल ही नहीं बोलेंगे, बाकी साल बोला करेंगे? हो सकता है कि राजनीति में यह एक नई सीख हो? हमने तो यह सोचा था कि चुनाव वर्ष ही ऐसा एक वर्ष आता है जब हम पांच साल का व्याख्यान जनता के सामने करते हैं। जनता हमें खाली वोट नहीं देती है। जब कुछ देते हैं, तब वह देखती है कि इस क्या इस व्यक्ति को हमें दुबारा मौका देना चाहिए? मैं तो गर्व से कहता हूं कि अगर हम अपनी एचीवमेंट्स को नहीं कहेंगे, तो कोई और नहीं कहेगा। यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी बात कहें और हमने किसी के सामने क्या कहा है, इस बारे में हम जनता के बीच में जाकर बेहिचक अपनी बात को कहें।    

          महोदय, अब स्वास्थ्य की जहां तक बात आती है, मैं बताना चाहता हूं कि इस मद में यहां से 20 परसेंट पैसा बढ़ाया गया है। जोशी जी ने जो हैल्थ मिशन की रिपोर्ट पढ़ी, मुझे पता नहीं, रिपोर्ट में उन्हें केवल वही राज्य मिले, जिसमें कहीं भी यू.पी.ए. के किसी राज्य की अथवा उसके किसी घटक की बात नहीं कही। उन्होंने बंगाल की बात कही। उनके बगल में, उनके साथी बैठे हैं, उन्होंने बिहार की बात कही, उन्होंने उत्तर प्रदेश की बात कही और वहां की चरमराती अर्थव्यवस्था की बात कही। मैं तो यही जानना चाहता हूं कि भारत सरकार से गए हुए पैसे का दुरुपयोग क्या उन्हीं राज्यों में हो रहा है, जहां एन.डी.ए. की सरकार है या पूरे हिन्दुस्तान में हो रहा है, यह मुझे उनकी रिपोर्ट से पता नहीं लगा। हो सकता है कि उन्होंने कुछेक पैराग्राफ पढ़े हों, क्योंकि सिलैक्टिव रीडिंग उनकी पूरी बजट स्पीच का एक हिस्सा था कि कुछ-कुछ अंश निकाल कर पढ़ लो, तो बेध्यानी में उन्होंने शायद वे अंश पढ़ लिए, जो अन्ततः उनके लिए ठीक नहीं पड़ते थे, लेकिन वह अलग बात है।

          महोदय, आज बी.आर.जी.एफ. के पैसे बढ़ाने की बात होती है। बी.आर.जी.एफ. में पैसा बढ़ाया गया है। आज जम्मू-कश्मीर के लिए ज्यादा पैसा दिया गया है। आज लैफ्टिंग विंग एक्स्ट्रीमिज्म एक्टीविटीज में ज्यादा पैसा बढ़ाया गया है। मैं आज यहां एक बात आप सबकी तरफ से वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि वित्त मंत्री जी, आपने अपने भाषण में कहा कि जो हमारे लैफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म से अफैक्टेड डिस्ट्रिक्ट्स हैं, उनमें इस साल हम 25 और अगले साल 30 करोड़ रुपए हम देंगे और उसमें हम सांसदों की भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। अगर ऐसा कोई तौर-तरीका है, तो मैं वित्त मंत्री जी को सुझाव देना चाहता हूं कि एम.पी.एल.ए.डी. स्कीम छोड़ दीजिए, हमें भी 25-30 करोड़ रुपए हर साल दीजिए और हमारी भागीदारी बढ़ा दीजिए, फिर हम कभी एम.पी.एल.ए.डी. नहीं मांगेंगे। अगर लैफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म जिले में आप यह कर सकते हैं, तो मैं तो यह कह रहा हूं कि यह ज्यादा सकारात्मक काम है कि जितना विकास का पैसा है, उसके विकास में आप सिर्फ हमारी भागीदारी डाल दीजिए, फिर हमारा विवेक है, हमारी हिम्मत है कि हम उसमें कुछ सकारात्मक असर ला सकें या न ला सकें। एम.पी.एल.ए.डी. का झंझट छोड़िए।

हमें पूरे जिले के विकास में डाल दीजिए, हम पूरी तरह आपके साथ हैं और मैं जानता हूं कि अगर आप यह करेंगे तो जोशी जी भी आपके लिए उस तरफ से बैठकर ताली बजाएंगे।

          बात फ्यूचर एजेण्डे की आती है। मैं फ्यूचर एजेण्डे की भी थोड़ी बहुत बात करना चाहता हूं। जो फ्यूचर एजेण्डे की बात आती है, इसमें 2-3 चीजें हैं। खासकर दो महत्वपूर्ण चीजों पर माननीय वित्त मंत्री जी ने आपका ध्यान आकर्षित किया, एक डायरैक्ट टैक्स कोड पर और एक जनरलाइज़ सेल्स टैक्स पर। मैं अपने इस भाषण के माध्यम से, आदरणीय अध्यक्ष जी के माध्यम से, वित्त मंत्री जी के माध्यम से तमाम राज्य सरकारों से यह अपील करूंगा कि जी.एस.टी. को ज्यादा ध्यान से देखें। आपको शायद याद होगा कि जब हिन्दुस्तान में वैट लगाया जा रहा था तो तमाम राज्यों को अलग-अलग डर थे। कुछ लोग कह रहे थे कि हमारा पैसा कम हो जायेगा, कुछ लोग कह रहे थे कि इसका क्रियान्वयन कैसे होगा, लेकिन वैट आने के बाद हर राज्य सरकार ने देखा कि उसकी आमदनी बढ़ी, सेल्स टैक्स में बेहतर इम्प्लीमेंटेशन हुआ और व्यापारियों का, लोगों का भी यह कहना था कि सेल्स टैक्स के बनिस्बत आज वैट में कम दिक्कतें आती हैं और सरकारी आफिसरों द्वारा जो हमारा दोहन हुआ करता था, उसमें कमी आई है। मुझे यह उम्मीद है कि जी.एस.टी. के कारण और डायरैक्ट टैक्स कोड, इन्कम टैक्स में जिसकी बात कर रहे हैं, उससे भी हम लोगों को बहुत बेहतर फर्क पड़ेगा।

          मैं एक बात और वित्त मंत्री जी से कहना चाहूंगा, चूंकि रिफॉर्म्स की बात आ रही थी। आज हमारी सरकार राइट टू एजुकेशन लाई है, एक तरफ राइट टू वर्क में सुनिश्चित किया है कि कम से कम 100 दिन का रोजगार हर व्यक्ति को मिले, हर परिवार को मिले, लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है और शायद हर सांसद का यह अनुभव है कि जो क्षेत्र इस देश में कम से कम न केवल गरीब वर्ग, बल्कि निम्न इलाके के वर्ग के व्यक्ति के जीवन को भी तोड़ देता हू, वह स्वास्थ्य है। मेरे ख्याल से अब समय आ गया है कि इस साल अगर हम राइट टू फूड का बिल लाये हैं तो अगले साल राइट टू फ्री हैल्थ की भी अब बहुत आवश्यकता है। मुझे कोई दिक्कत नहीं है, किसी अस्पताल को, किसी व्यक्ति को, किसी डॉक्टर को अपना काम करने देने की, अगर आप सब को नहीं कर सकते तो कम से कम यह निवेदन है कि बच्चों के लिए और बुजुर्गों के लिए तो राइट टू फ्री एंड गुड प्राइमरी हैल्थ की बात करें, क्योंकि उसमें कुछ चीजों की दिक्कत कम आती है। हमारे पास सरकारी अस्पताल हैं, हमारे पास पी.एच.सी. हैं, लेकिन आज उनके सामने दिक्कत क्या आ रही है कि आज एक डॉक्टर निपुणता प्राप्त करके किडनी का ऑपरेशन कर रहा है और दिल्ली में सफदरजंग अस्पताल में बेचारा 30 हजार रुपये तनख्वाह पाता है तो बगल में मैक्स अस्पताल है, जहां वह मरीज अगर वह 10 रुपये दिन के रोजगार से पैदा करता है तो वहां उस मरीज से वह 10 लाख रुपये लेता है और 10 लाख का उसको 50 परसेंट मिलता है तो कितने ऐसे हमारे सर्जन हैं, जो दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में रुके रहेंगे और मैक्स अस्पताल में नहीं जाएंगे, क्योंकि यह एक मानवीय आकर्षण होगा। लेकिन कितने दिन तक आप अपने डॉक्टरों को रोक पाएंगे। यह कहना कि हम दोनों व्यवस्थाएं साथ-साथ चलाएंगे तो और चीजों में तो व्यवस्थाएं साथ-साथ चल सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य में मुझे नहीं लगता कि ये दोनों व्यवस्थाएं साथ-साथ चलती रहेंगी। क्योंकि, अन्ततः क्या होगा कि हमारे जो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, क्योंकि डॉक्टर टीचर की तरह नहीं हैं, जो साल दो साल में निपुण होकर, पक कर आ जायें। डॉक्टर आठ, दस, 15 साल में निपुणता हासिल करता है और जब वह निपुणता हासिल करेगा तो वह अपने इलाके के अस्पताल से निकलकर चाहे मैक्स में चला जायेगा या अपोलो में चला जायेगा या कहीं और चला जायेगा, जहां आप और हम तो सी.जी.एच.एस. से ऑपरेशन करवा लेंगे, लेकिन हमारे घर में काम करने वाला, हमारे परिवार को चलाने वाला जो व्यक्ति है, मेरी बेटी के साथ चलने वाली जो आया है या जो व्यक्ति बाहर सब्जी बेचता है, वह अपने बच्चों को वहां नहीं ले जा पाएगा। इसलिए सरकार को इस तरफ भी ध्यान देना पड़ेगा कि क्या हम एकीकृत राष्ट्रीयकृत स्वास्थ्य योजना की तरफ देख सकते हैं। मुझे मालूम है कि इसमें फाइनेंशियल कॉस्ट की बड़ी बात है, लेकिन मैं अपनी तरफ से एक सुझाव जरूर आपके सामने रख रहा हूं।    

          मैं आखिर मैं एक बात और करूंगा। मैंने अभी बात सुनी है और मैं चीजें सुनता रहता हूं। हम लोग प्रशासनिक सुधारों की बात सुनते हैं, ब्लैकमनी कम करने की बात करते हैं, करप्शन को कम करने की बात करते हैं, लेकिन जब क्रियान्वयन की बात आती है, प्रधानमंत्री जी ने भी कई बार इस बात को कहा है कि जो मंत्रियों की डिस्क्रिशनरी पावर्स हैं, उन्हें हम कम करेंगे, जो सरकार के करप्शन के तौर-तरीके हैं, वे कम करेंगे। मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि इसको जरूर कम करिये, क्योंकि आज इस देश में एक ट्रस्ट डैफीसिट है, इसलिए आपकी तरफ से कारगर कदम उठाने बहुत आवश्यक हैं, लेकिन उस डैफीसिट का क्या है, जहां हमारा आम आदमी रोज़ सरकारी अधिकारियों के डिस्क्रिशन से मरता है, वहां कौन एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स लाएगा? कोई राज्य का रेवेन्यू मिनिस्टर नहीं है, जो हर एस.डी.एम. को कहता है या हर रेवेन्यू अधिकारी को कहता है कि जब भी आप प्रोपर्टी का रजिस्ट्रेशन करो तो ऊपर से 10 परसेंट मत लो। वहां कौन एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स लाएगा। आज भी अगर ट्रेन में आपको रिजर्वेशन नहीं मिलता है और ट्रेन में बैठना पड़ता है तो अगर आपके पास 50 रुपये का नोट नहीं है तो आप जनरल डिब्बे में बैठे रहिये और जिनके पास टिकट नहीं है, वे रेलवे में लेट जाते हैं और आपको जगह नहीं मिलती है, वहां पर प्रशासनिक सुधार कौन लाएगा?

आज जब हम पीडीएस की बात करते हैं, बीस किलो अनाज हर गरीब को मिलता है।  उसको बारह किलो अनाज मिलता है, उसके बाद उसे लताड़ दिया जाता है।  हर भाषा के स्थानीय शब्दों में उसे अपशब्द कहे जाते हैं, वह वहां से चला जाता है।  वहां प्रशासनिक सुधार कौन लाएगा? मैं उस प्रशासनिक सुधार की बात कर रहा हूं। प्रधानमंत्री जी के कदम सराहनीय हैं कि हम अपने पर अंकुश लगाएं लेकिन जिन पर अंकुश लगाने के लिए हमें जनता ने भेजा है, उन पर अंकुश कौन लगाएगा? यह आज बहुत बड़ी आवश्यकता है।  यह बजट का हिस्सा नहीं है, लेकिन सरकार के मंत्री यहां बैठे हैं, इसलिए मैं अपना एक निवेदन आपके सामने रखना चाहता था। ...( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार : जो गड़बड़ियां हो रही हैं, रेल मंत्री जी से कहिए।  ...( व्यवधान)

श्री सन्दीप दीक्षित : सभी को दे रहे हैं।  शैलेन्द्र जी, यह सब पर है।  ...( व्यवधान) मैं यही आपसे निवेदन करता हूं कि अगर इस लड़ाई में हम और तुम हो गए, तो यह लड़ाई हम नहीं जीत पाएंगे, अधिकारी जीत जाएगा। इस लड़ाई में आपको और हमें एक होना है।  इस लड़ाई में हम चाहे किसी वर्ग के हों, हम अपनी लड़ाई हर पांच साल बाद चुनावों में लड़ लेते हैं, लेकिन हमारा वोटर जो रोज की लड़ाई लड़ता है, वह आपकी और हमारी इस लड़ाई के कारण पिस जाता है, क्योंकि हम एक दूसरे के ऊपर आंखे गाड़ते हैं, उन पर आंखें नहीं गाड़ते हैं, जिस धरातल पर हमारे गरीब से रोज पैसा चूसा जा रहा है। इसलिए मैं निवेदन करता हूं, इसको पार्टी लाइन से उठकर इसमें संशोधन करें। वित्त मंत्री जी, मुझे लगता है कि आज की परिस्थितियों में जो बजट आप लाए हैं, उसने इस देश की स्थिति में हमें प्रगति दी है, प्रगति आगे आने वाले समय में मिलेगी।  जितने भी यूपीए सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रम हैं, उसमें आपने बढ़-चढ़कर पैसा दिया है। इन्फलेशन पर धीरे-धीरे आपने कंट्रोल करने की कोशिश की है, जिसके असर दिखे हैं।  इसमें और ज्यादा मुस्तैदी से सामने खड़े होने की आवश्यकता है।  आपने उल्लेख किया है कि करप्शन आफ ब्लैक मनी को देश में वापस लाने के लिए कदम उठाएंगे।  हम जरूर यह विश्वास करेंगे कि आने वाले साल में धरातल पर भी उनका हमें असर दिखे। इस आशा से कि इसी मुस्तैदी से हमारी सरकार इस देश की वित्तीय व्यवस्था का संरक्षण रखेगी, इसको सुरक्षित रखेगी और इस देश को प्रगति पर आगे ले जाएगी। इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस बजट का पूरा समर्थन करता हूं।

   

श्री अखिलेश यादव (कन्नौज): सभापति महोदय, मैं अभी भाषण सुन रहा था, उसमें जिक्र चल रहा था कि थरथराती अर्थव्यवस्था, अर्थनीति बनायी है या इस देश की थरथराती आर्थिक स्थिति बनायी है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि यह थरथराती व्यवस्था कौन सी है? उसके बाद जब भाषण खत्म हो रहा था, जो इनकी सरकार है, सरकार की तरफ से जो बात कही गयी कि इलाज में, देश की राजधानी दिल्ली में भी इलाज को लेकर भी दो तरह के फासले या खाई हैं।  अगर सरकारी अस्पताल में इलाज होगा तो कितने में डाक्टर करेगा और बाहर कितने में करेगा। इनकी ही पार्टी कभी-कभी इस बात की चिंता करती है कि भारत आखिरकार दो तरह का भारत कैसे बन गया?  ये पहाड़ जैसी समस्यायें कहां से आ गयीं? देश को चलाने का सबसे ज्यादा मौका अगर किसी को मिला है तो इन्हीं लोगों को मिला है।  इसके बावजूद भी जो सहूलियतें, सुविधायें और मदद किसानों और गरीबों को मिलनी चाहिए थीं, वह अभी तक नहीं मिल पायी हैं। यह सही है कि इंद्र देव की तरफ इन्होंने देखा है। सरकार इंद्र देव की तरफ देख रही है, जिनकी तरफ देखना चाहिए, उसकी अनदेखी इन्होंने हमेशा की है।  सही मायने में अगर जीडीपी को बढ़ाना है, देश को खुशहाल बनाना है, तो किसान की तरफ ध्यान देना होगा। किसान को जो सुविधायें मिलनी चाहिए, वह अभी भी नहीं मिल पा रही हैं। इसीलिए इस सरकार को इंद्र देव की तरफ देखना पड़ रहा है। आज जो किसान तकलीफ में है, परेशानी में है, गरीबी में है, उसमें कहीं न कहीं इनकी ही जिम्मेदारी है। किसान आजादी के इतने सालों के बाद भी खुशहाल नहीं हो पाया है।  हम अखबार में पढ़ते हैं कि सरकार की तरफ से कहा जाता है कि इक्वेटेबल ग्रोथ है, इन्क्लूसिव ग्रोथ है और सस्टेन ग्रोथ है। अगर ये सब बातें मैं सच मान लूं, तो यह दो तरह का भारत बनाने का काम कौन कर रहा है? किसान तकलीफ में है, उसे कोई सहूलियत नहीं मिल रही है। किसान को सही समय पर बीज उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।  

          किसानों को पानी, इरीगेशन की जो सुविधा मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पा रही है। किसान को फसल तैयार होने के बाद उसका लाभकारी मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। मैं उत्तर प्रदेश से आता हूं। वहां धान की फसल अभी कहीं नहीं खरीदी गई है। धान का किसान देखता रह गया कि सरकार खरीदेगी या नहीं, लेकिन नहीं खरीदी गई। महंगाई लगातार बढ़ रही है। इसका सीधा असर किसान, गरीब और गांवों में रहने वाले लोगों पर पड़ रहा है। बिजली, पानी, खाद नहीं है। बिजली का इंतजाम कौन करेगा। इसलिए लोग कहीं न कहीं खेती से दूर हो रहे हैं। युवा वर्ग खेती से प्रभावित नहीं हो पा रहा है। किसान खेती से अपनी गुजर कैसे करेगा, क्योंकि महंगाई बढ़ती जा रही है। अब सवाल उठता है कि हरित क्रान्ति आएगी। हरित क्रान्ति से कितने लोगों को लाभ मिलेगा। कुछ इलाकों में केवल हरित क्रान्ति लाने से देश का लाभ नहीं होगा। तमाम प्रदेश ऐसे हैं जो खेती पर ही निर्भर हैं। वहां खेती से ही सुधार हो सकता है। इस सरकार को गांवों की अर्थव्यवस्था ठीक करने का मौका कई बार मिला है। लेकिन अभी तक गांवों की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं हो पाई है, क्योंकि किसान को जो सहूलियत, मदद और लाभकारी मूल्य मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पाता।

          आज पूरा देश काले धन और महंगाई से चिंतित है। काला धन कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है, इसके बारे में सरकार अभी तक खुलकर नहीं कह पाई है। काला धन बढ़ता जा रहा है।...( व्यवधान)

उधर महंगाई भी बढ़ती जा रही है। महंगाई के लिए भी साफ तरीके से कोई योजना नहीं है कि आखिरकार महंगाई को कैसे रोका जाएगा। जो अड़चनें बताई गई हैं, मैं समझता हूं कि अगर काले धन को वापस लाने में अड़चनें हैं तो सरकार को कोई रास्ता निकालना पड़ेगा जिससे काला धन वापस आए। आखिरकार काला धन कैसे कमाया जा रहा है, कहीं न कहीं इसकी जिम्मेदारी भी सरकार की है। सरकार के गलत कानून या गलत नीतियों की वजह से ही काला धन इकट्ठा हो रहा है।

          बजट में बताया गया है कि ग्रामीण बैंक लोन के लिए 500 करोड़ रुपये उपलब्ध करवाए गए हैं। यह अच्छी बात है कि बजट में किसानों के लिए 500 करोड़ रुपये उपलब्ध करवाने का इंतजाम किया गया है। लेकिन कितने ग्रामीण बैंक ऐसे हैं जहां से किसान ऋण ले पाएंगे। बजट में यह भी बताय़ा गया है कि समय पर कर्ज चुकाने वाले किसान को कर्ज की ब्याज दर में तीन प्रतिशत की छूट दी जाएगी। किसान सिंचाई पर पूरी तरह निर्भर रहता है। कभी-कभी मौसम खराब होने या समय पर बरसात न होने से उसकी फसल आगे-पीछे हो जाती है। यह कहा गया है कि तीन प्रतिशत की छूट उसी किसान को मिलेगी जो समय पर पैसा वापस करेगा। मैं कहना चाहता हूं कि किसान को ज्यादा समय मिलना चाहिए। अरहर की दाल की पैदावार एक साल में तैयार होती है। अगर किसान लोन ले लेगा और उसे एक साल में नहीं चुका पाएगा तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है।

          किसान गरीब है इसलिए वह अपना इलाज नहीं करवा पाता। गरीब किसान के लिए इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को उनके लिए जो व्यवस्था उपलब्ध करवानी चाहिए, वह नहीं करवा पा रही है। डाक्टर पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। आज पांच लाख से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में डाक्टरों की जरूरत है, लेकिन वहां डाक्टर नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों की हालत बहुत खराब है। वहां कोई इलाज नहीं करवा सकता। वहां इतनी खराब दुर्दशा है कि सही दवा नहीं है और डाक्टरों का इंतजाम भी नहीं है। यह स्थिति पैदा हो गई है। इलाज भी काफी महंगा है। गरीब व्यक्ति, किसान और आम आदमी अपना इलाज नहीं करवा सकता। एक परिवार में यदि एक व्यक्ति भी बीमार हो जाए तो उस परिवार में गरीबी आ जाती है। सरकार को सस्ता इलाज और सस्ती सुविधाएं देने का इंतजाम करना होगा।

          गोरखपुर जैसे इलाके में जैपनीज़ इनसैफ्लाइटस कई वर्षों से फैली हुई है। मलेरिया से लेकर तमाम ऐसी बीमारियां हैं जिनके लिए सरकार को इंतजाम करना चाहिए। योजना है लेकिन कोई इंतजाम उपलब्ध नहीं है।  इस बारे में कोई योजना नहीं है कि कैसे उन बीमारियों से लड़ा जायेगा, कैसे उन्हें दूर किया जायेगा।

          सभापति महोदय, जहां तक बेरोजगारी का सवाल है, तो रोजगार के अवसर कैसे प्राप्त होंगे, उसके लिए कोई ठोस योजनाएं नहीं हैं। उस संबंध में कोई योजनाएं दिखाई नहीं दे रही हैं। युवाओं के लिए  जितने रोजगार के इंतजाम होने चाहिए, उतने रोजगार नहीं हैं। वहां बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। आज पढ़ाई बहुत महंगी है। वह इतनी महंगी है कि गरीब पढ़ नहीं सकता। सबसे पहले तो उसके एडमिशन का ही इंतजाम नहीं होता। अगर इंतजाम हो जाये, पढ़-लिखकर डिग्री भी हासिल कर ले, तो उसे नौकरी नहीं मिलती। आज पढ़ने-लिखने वाला युवा नौजवान बेरोजगार होता जा रहा है। आज स्थिति ऐसी पैदा हो गयी है कि बहुत बड़ी संख्या में बेरोजगारों नौजवानों की फौज खड़ी हो गयी है। इसके लिए कुछ न कुछ ठोस कदम सरकार को उठाने चाहिए। जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जायेंगे तब तक नौजवानों के लिए रोजगार के इंतजाम नहीं हो पायेंगे।

          सभापति महोदय, भारत निर्माण की बात की गयी है, जिसमें तमाम योजनाएं हैं जैसे इंदिरा आवास योजना, नैशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम, ग्रामीण विद्युतीकरण योजना आदि हैं। लेकिन आप हकीकत में जानते होंगे कि मनरेगा में कितना भ्रष्टाचार व्याप्त है। उस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए क्या इंतजाम किये गये हैं? मनरेगा के तहत इतनी मिट्टी खुद गयी, जिसका हिसाब-किताब लगाया जाये, तो दिखाई देगा कि एक महासागर खुद गया है। मनरेगा से इतनी मिट्टी खोद दी गयी है। कहीं न कहीं मनरेगा की वजह से किसानों को भी सीधे-सीधे मजदूरों का संकट पैदा हो गया है। उनकी खेती पर असर पड़ा है।  कहीं-कहीं बिजली का इंतजाम नहीं हुआ है और जहां हुआ है वहां अभी तक बिजली नहीं पहुंची है।

          सभापति महोदय, इंदिरा आवास योजना कई वर्षों से चल रही है। अभी भी गरीब लोगों को जितने घर मिलने चाहिए थे, वे नहीं मिल पाये हैं। उसमें भी बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है। यह जो जनरल बजट पेश हुआ है, उसमें किसानों की अनदेखी की गयी है। बजट में किसानो और युवाओं को निराश किया गया है। आज देश में जिस पैमाने पर युवा हैं, उस हिसाब से रोजगार के इंतजाम होने चाहिए, लेकिन वे नहीं हो पा रहे। इस बजट में कहीं भी ऐसा फैसला या ठोस कदम दिखाई  नहीं दे रहे, जिससे रोजगार के इंतजाम हो सकें। किसानों के लिए बिजली से लेकर पानी तक का इंतजाम नहीं है। यह सही है कि कुछ फैसले ऐसे लिये गये हैं, जिससे किसानों को कुछ मदद मिलेगी। उनको ऋण में कुछ मदद मिलेगी, लेकिन किसान के हित के लिए अभी भी ठोस कदम उठाने बाकी हैं। किसान के बिना इस देश की खुशहाली नहीं आ सकती, जीडीपी आगे नहीं बढ़ सकती। किसान अभी भी परेशान और दुखी है।

          सभापति महोदय, यह कहा गया कि किसान की खेती बढ़ जायेगी। बजट में यह चर्चा आयी है कि आर्गेनिक फर्टिलाइजर का इंतजाम होगा। लेकिन आखिरकार आर्गेनिक फर्टिलाइजर  कहां से आयेगा? उसका इंतजाम कैसे होगा, किसानों को कैसे मिलेगा और किसानों को उससे कैसे जोड़ेंगे? ये तमाम ऐसे पहलू हैं, जिन पर सरकार को बहुत ध्यान से देखना होगा। सरकार यदि इन पर ध्यान देगी, तभी उनकी यह योजना कामयाब हो सकती है। किसान की दुर्दशा की जिम्मेदार वे सरकारें रही हैं जिन्हें पहले तमाम बार शासन करने का मौका मिला है। इस बजट से किसानों को जो आशाएं थीं, वे पूरी नहीं हुई हैं। महंगाई के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। किसान का सामान बाजार तक पहुंच ही नहीं पाता। महंगाई के कारण वह अपना घर तक नहीं बना पाता।  आज जो काला धन इकट्ठा होता जा रहा है, उसे रोकने के लिए सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा। जो काला धन विदेशी बैंकों में पहुंच गया, उसे वापस लाने का कोई इंतजाम नहीं है।

          सभापति महोदय, हमें उम्मीद है कि यह सरकार किसानों को और सुविधा उपलब्ध करायेगी और  कर्ज माफी ही नहीं, बल्कि सस्ता कर्ज और ज्यादा सहूलियत देकर उनकी तकलीफों को कम करेगी।

   16.00 hrs. कालाधन जो बाहर चला गया, उसे वापस लाने का सरकार इंतजाम करेगी और           युवाओं को जो रोजगार के अवसर मिलने चाहिए, उसके लिए सरकार ठोस कदम उठाकर कुछ काम करेगी।

          इन्हीं शब्दों के साथ आपको धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

       

श्री मंगनी लाल मंडल (झंझारपुर): सभापति महोदय, वित्त मंत्री जी बड़े ज्ञानी हैं, संसदीय मामलों में भी प्रखर हैं एवं बहुत वरिष्ठ हैं। हम सब लोग उनको आदर करते हैं, लेकिन बजट आने से पहले हम लोगों ने सोचा था कि देश में कितनी समस्याएं हैं, गरीबी है, बेकारी है, गैर-बराबरी है, क्षेत्रीय असंतुलन है, इन तमाम चीजों का बजट में समावेश किया जाएगा, लेकिन सम्पूर्ण बजट दो बिन्दुओं पर केन्द्रित है - एक बिन्दु है विकास दर और दूसरा बिन्दु है कि फिस्कल डेफिसिट कैसे कम करना है। यह भी आवश्यक है देश के विकास के लिए, देश की उन्नति के लिए और इसके  लिए मैं उनको बधाई देता हूं, धन्यवाद देता हूं कि आपने राजकोषीय घाटे को घटाया है, इसे वर्ष 2013-14 तक और घटाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन डा. जोशी ने ठीक ही कहा कि आखिर इतनी मदद आपको कहां से मिली। 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई, तो यशवंत सिन्हा जी का कहना है कि भारत सरकार को एक लाख करोड़ रुपये मिले, लेकिन आज मुझसे एक अर्थशास्त्री कह रहे थे कि इससे भारत सरकार को 67718 करोड़ रुपये मिले। जो भी हो, ज्यादा जानकारी माननीय वित्त मंत्री जी को होगी। आगे भी 3जी स्पेक्ट्रम से पैसा मिलने वाला है। अच्छी बात है कि जो राजस्व प्राप्ति होती है, उससे अगर राजकोषीय घाटा कम होता है, तो देश को लाभ होगा, देश को फायदा होगा, देश की तरक्की होगी, पैसा उसमें विनियोग होगा, लेकिन यह जो बजट है, इसका स्वरूप यथास्थितिवादी है।

  16.01 hrs. (Shri Inder Singh Namdhari in the Chair)             मैंने पहले कहा कि गरीबी मिटाने का इसमें कोई संकल्प नहीं है और संकल्प इसलिए नहीं है कि सरकार ने अभी तक यह नहीं तय किया है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग देश में कितने हैं और उनका सही आकलन कैसे होगा। सही आकलन करके गरीबी को मिटाने के लिए योजना के द्वारा कितना बड़ा प्रहार गरीबी पर किया जाएगा, ताकि लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठें। योजना आयोग का जो फार्मूला है और विश्लेषण है, स्वयं केन्द्र सरकार ने या योजना आयोग ने प्रोफेसर सुरेश डी तेंदुलकर की अध्यक्षता में जो कमेटी बैठाई, दोनों की रिपोर्ट्स में अंतर है। सरकार ने इसकी समीक्षा आज तक नहीं की कि तेंदुलकर कमेटी की जो रिपोर्ट है, वह स्वीकार्य है या नहीं, यद्यपि कमेटी की रिपोर्ट समर्पित है। वर्ष 1993-94 के आधार पर ग्रामीण और शहरी लोगों को मिलाकर 26 प्रतिशत था और वर्ष 2004-05 के आधार पर 27.5 प्रतिशत था। तेंदुलकर साहब कहते हैं कि वर्ष 1993-94 के आधार पर ग्रामीण और शहरी, दोनों मिलाकर 45.3 प्रतिशत और वर्ष 2004-05 के आधार पर 37.2 प्रतिशत था। यह जो इतना फर्क है, हम सोचते थे कि प्रणब बाबू इस मामले में कोई स्पष्ट नीति रखेंगे। गरीबी मिटाने के लिए, गरीबी का मूल्यांकन करने के लिए, गरीबी तय करने का जो पैरामीटर है, वह सर्वमान्य हो और उस पैरामीटर से नीचे रहने वाले लोगों को ऊपर लाया जाए। इस बजट में प्रणब दा से बड़ी अपेक्षा थी, लेकिन यह पूरी नहीं हुई। टैक्स के बारे में इन्होंने कहा है कि दो बिल लाएंगे जिनमें से एक जीएसटी है। पहले वैट पर बहुत हल्ला था, बहुत से राज्यों ने विरोध किया था। धीरे-धीरे जब केन्द्र सरकार वैट ले आई, तो स्टेट का जो कॉमर्शियल टैक्स कानून था, उसको सरकार ने समाप्त करके वैट में समाहित कर दिया।

          लेकिन जीएसटी कानून को लागू करने के लिए कम से कम 20 राज्यों की सहमति चाहिए। इस बात को भी वित्त मंत्री जी द्वारा अपने बजट भाषण में बताना चाहिए था कि अभी तक कितने राज्यों की सहमति मिली है। जहां तक हमारी जानकारी है, हो सकता है सही न हो, 14 या 15 राज्यों ने ही इस पर सहमति दी है। इन राज्यों में भी अधिकांश राज्य कांग्रेस पार्टी शासित हैं और उनमें भी कई छोटे-छोटे राज्य हैं। दूसरे जो राज्य हैं, अपेक्षाकृत बड़े राज्य हैं, वे इसका विरोध कर रहे हैं। यह ठीक है कि सब राज्यों का अपना-अपना इंटरेस्ट है और समर्थन करने वाले छोटे-छोटे राज्यों का भी अपना-अपना इंटरेस्ट है, क्योंकि वे ज्यादातर केन्द्रीय सहायता पर निर्भर रहते हैं। इसलिए जीएसटी के मामले में सरकार को अपना दृष्टिकोण जाहिर करना चाहिए। आपने अपने बजट भाषण में जो संकल्प लिया है, वह क्लियर करना चाहिए। यह ठीक है कि छोटे राज्यों का हित नहीं होना चाहिए। आपने जो संविधान संशोधन लाने की बात कही है, उसका हम समर्थन करते हैं, लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूं कि ऐसे राज्य जो गरीब हैं, जहां गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले अधिकांश लोग हैं, जहां कुपोषण और अशिक्षा ज्यादा है, गैर बराबरी है, उनकी तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए। आपने डायरेक्ट टैक्सेज़ कोड की बात कही है। यह एक अच्छी बात है और हम इसका स्वागत करते हैं। लेकिन इस मामले में आपको जल्दी करनी चाहिए। 

          हमारे देश का जो कृषि उत्पादन है, मैं उस बारे में कुछ बातें कहना चाहूंगा। हमारे यहां पर हेक्टेयर ईल्ड दुनिया के कई देशों से कम है। ईल्ड इसलिए कम है, क्योंकि सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। अल्टीमेट क्रीएटेड पोटेंशियल जिसे सिंचाई विभाग कहता है कि यह हमारे यहां इतना है, उसका भी पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। जितनी कृषि योग्य भूमि है, उसके लिए हम सिंचाई की सुविधा देंगे, जो कि अभी तक नहीं दी गई है। यह जरूर है कि आपने लघु सिंचाई की छोटी-मोटी योजनाओं की व्यवस्था की है। इसके साथ ही आपने दूसरी हरित क्रंति की बात भी कही है और उसके लिए 400 करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। इसके पहले भी प्रथम चरण में इतनी राशि की व्यवस्था की गई थी। अब आप ही सोचें कि 400 करोड़ रुपए में क्या दूसरी हरित क्रंति हो सकती है, मैं समझता हूं कि यह नहीं होने वाली है। इसलिए इस बजट में सिंचाई के मामले में आपको ध्यान देने की जरूरत है। बाढ़ से सुरक्षा करके, जल प्रबंधन करके हम सिंचाई की समुचित व्यवस्था कर सकते हैं, लेकिन इस पर लगातार कोई प्रावधान नहीं किया जाता रहा है और न ही इस बजट में किया गया है। सन् 2009 के अंत तक जो अल्टीमेट क्रीएटेड पोटेंशिएलिटी थी, चरम सिंचाई क्षमता देश में थी वह 149.9 मिलियन हेक्टेयर थी, लेकिन उसमें सिर्फ 84.90 मिलियन हेक्टेयर का ही उपयोग किया गया है। मैं वित्त मंत्री जी से पूछना चाहूंगा कि आप फूड प्रोडक्शन में वृद्धि की बात करते हैं, लेकिन फूड सिक्योरिटी कैसे होगी, फूड इंफ्लेशन कैसे रुकेगा? आपने यह जरूर कहा है कि इस बार देश में अन्न का उत्पादन जरूरत से ज्यादा होगा। कृषि विभाग ने 230 मिलियन टन अनुमानित प्रोडक्शन की बात कही है। लेकिन जो सिंचाई की सृजित क्षमता है, उसका उपयोग राज्यों द्वारा नहीं हो रहा है। जैसे जीएसटी के मामले में आप राज्यों से बात करते हैं, इस मामले में भी आपको बात करनी चाहिए। फ्लड प्रोटेक्शन के अभाव में जल प्रबंधन नहीं हो रहा है। हर साल कई राज्यों में बाढ़ से तबाही होती है। ऐसे राज्यों में फ्लड प्रोटेक्शन के लिए, वाटर मेनेजमेंट के लिए, इरीगेशन के लिए आपको समुचित व्यवस्था करनी चाहिए, जिसका इस बजट में जिक्र नहीं है।

          मैं वित्त मंत्री जी अनुरोध करूंगा कि आप दूरदृष्टि वाले व्यक्ति हैं, जब भी यूपीए में कोई संकट या पेचीदा मामला आता है तो यह कहा जाता है प्रणब बाबू से बात करें, वह कोई न कोई फार्मूला निकाल लेंगे।

 इस मामले में अगर कोई व्यवस्था आप नहीं करेंगे तो आपकी जो दूसरी ग्रीन रैवोल्यूशन की कल्पना है वह विफल हो जाएगी और जितना आपने तिलहन, दलहन, गेहूं, चावल और बाजरा के लिए लक्ष्य रखा है वह पूरा नहीं होगा। बिहार सहित कुछ राज्यों में आपने चावल और गेहूं पैदा करने के सघन अभियान चलाने का काम किया है वह 400 करोड़ रुपये में नहीं होगा।

          जहां तक बेकारी की बात है तो सरकारी आंकड़ा है कि 4 परसेंट ग्रामीण इलाके में और 10 परसेंट शहरी इलाके में बेकारी है। लेकिन सरकार ने जो उत्तर दिया है उसके अनुसार अगर 80 करोड़ जनसंख्या हुई तो उसका लगभग 4 करोड़ हो गया और 10 परसेंट का 10 करोड़ हो गया। इस तरह से 14 करोड़ तो सरकार मानती है कि लोग बेकार हैं और वे बेकार कुशल और अकुशल दोनों हैं, क्योंकि सरकार के जवाब में यह बात नहीं कही गयी है कि ये जो चार परसेंट ग्रामीण और दस परसेंट शहरी लोग बेरोजगार हैं ये कुशल हैं या अकुशल हैं। ...( व्यवधान) महोदय, कालेधन के बारे में बहुत चर्चा होती है और इस पर सब लोगों ने चर्चा की है। माननीय प्रणब बाबू कालाधन नहीं निकालेंगे तो कौन निकालेगा? प्रणब बाबू पर किसी प्रकार की उंगलियां नहीं उठती हैं, ये बुजुर्वा नहीं हैं, ये सर्वहारा के लिए सोचने वाले आदमी हैं, गरीब के लिए सोचने वाले आदमी हैं, संसदीय जीवन का एक लम्बा इनका इतिहास है। सारे लोग इन्हें आदर से देखते हैं, मैं यह सही बात कह रहा हूं। इसीलिए माननीय प्रणब बाबू, कुछ उपाय आप कीजिए। क्योंकि जो पैसा आता है इसके बारे में सरकार की स्वयं की जो सूचना है वह मॉरिशस है।  सरकार ने 128 देशों की सूची कहीं दी है और उसमें मॉरिशस सबसे ऊपर है। मॉरिशस में पैसा कहां से आता है। टोटल जो डायरेक्ट इंवैस्टमेंट से पैसा इस देश में आता है उसमें से 42.15 परसेंट मॉरिशस से आता है। यह कहना मेरा नहीं है, यह सरकार का ही आंकड़ा है कि यह मॉरिशस से आता है। यह पैसा क्यों आता है। माननीय वित्त मंत्री जी ने अपने भाषण में कहा है कि हम दो समझौते विदेशों से करेंगे, डीआईए और डीटीए क्योंकि बगैर एग्रीमेंट के आदान-प्रदान नहीं होगा। वे देश कौन हैं जहां से पैसा आता है, बहामास, बरमुडा, ब्रिटिश वर्जिन आईलेंड्स, आईल ऑफ मैन, कैरीमैन आईलैंड, जरसी, मोनाको, सेंटर किट्स एंड नेविस, अर्जेंटिणा एंड मार्शल आईलेंड्स, ऐसे असंख्य देश हैं। इन देशों में पैसा जाकर छुपाया जाता है और पीआईएल के चलते सरकार ने कार्रवाई की है। सुप्रीम कोर्ट को हम धन्यवाद देना चाहते हैं क्योंकि जो सदन नहीं कर सका, वह न्यायालय ने कर दिया। जर्मन सरकार ने वर्ष 2008 में जब सूचना दी थी तो इतने दिनों तक जिन लोगों ने करवंचना की, पैसा चुराया था, उनके बारे में सरकार ने जानकारी क्यों नहीं ली?

          सरकारी दस्तावेजों में बीजेपी के बारे में उल्लेख किया है। कहा है कि आम चुनाव 2009 के दौरान कथित बीजेपी कार्यदल की अंतरिम सिफारिश में 500 बिलियन डालर यानी 25 लाख करोड़ रुपया और 1400 बिलियन डालर यानी 70 लाख करोड़ रुपये के बीच राशि का अनुमान लगाया गया।

A study titled ‘The Drivers and Dynamics of Illicit Financial Flows from India 1948-2008’ was released by the Global Financial Integrity (GFI). जीआईएफ के बारे में कहा गया है कि वर्ष 2008 में स्वतंत्रता के बाद यह अनुमान लगाया कि 2213 बिलियन डालर का नुकसान हुआ है। फिर कहा है कि वर्तमान में यह 400 बिलियन डालर कहा जा सकता है। सरकार कहती है कि हमारे पास कोई ऐसा मैकेनिज्म नहीं है कि हम पता लगा सकें।

सभापति महोदय: आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री मंगनी लाल मंडल : काले धन के बारे में मंत्री जी मैं ही नहीं कहता, बल्कि देश की जनता जानती है कि आपके समय में अगर काला धन नहीं निकलेगा और जिन्होंने काला धन छुपा कर रखा है, अगर उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा, तो आने वाले समय में कांग्रेस सरकार के पास काला धन निकालने वाले वित्त मंत्री होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता है।

सभापति महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री मंगनी लाल मंडल:हसन अली को आपने गिरफ्तार किया। आज समाचार में आ रहा था कि 500 बिलियन डालर उसके पास विदेशों में जमा है। हमारे रिजर्व में जो पैसा है, उससे ज्यादा पैसा उसके पास है। वह पैसा एक दिन में जमा नहीं किया गया है। अगर सुप्रीम कोर्ट का सरकार पर प्रहार नहीं होता, तो शायद यह बात कभी सामने नहीं आती। इसलिए मैं इस बजट का विरोध करता हूं।

सभापति महोदय : मंगनी लाल जी, आप बैठ जाएं।

श्री मंगनी लाल मंडल : यह बजट गरीब विरोधी है। यह बजट गैर-बराबरी बढ़ाने वाला बजट है। यह बजट रोजगार विरोधी है। यह बजट गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की परवाह करने वाला नहीं है।

सभापति महोदय : माननीय सदस्य की बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

श्री मंगनी लाल मंडल : मैं इस बजट का विरोध करता हूं।...( व्यवधान) *         DR. RATNA DE (HOOGHLY): Sir, thank you. I am grateful to you for allowing me to speak.         I welcome the Budget presented by the hon. Finance Minister, Shri Pranab Mukherjee.

The Budget of 2011-2012 needed a great balancing act. On one hand, there is challenge of sustaining growth momentum at the rate of nine per cent and on the other the UPA’s supreme objective of inclusiveness had to be taken care of. Over and above, this year, there remained an added responsibility of containing inflation, which is a matter of great concern for all of us. And to top it all, the Finance Minister had to balance all these three objectives under the strict condition of fiscal consolidation. Now, the question is : Had he succeeded in doing so? To my mind, he has not only succeeded, but he has also displayed great pragmatism in doing so. This was not an easy task at all.

          Now, coming to the growth, there is no doubt that this year’s Budget is one for “Growth”. Amidst the real concern of inflation and fiscal consolidation, it is nice to see the Finance Minister not compromising on this front at all. The great care which he has taken to boost infrastructure and education is most welcome. While infrastructure investment would ease supply bottlenecks on the physical front, a 24 per cent rise in education expenditure would meet the gap of much needed human-capital formation and Skill building. Needless to say, these two together would create a firm foundation for long-term growth story of India.

          With this, one has to add his promise to introduce two path-breaking Bills, that is, GST and Direct Tax Code (DTC) in the next Parliament Session. These two, while implemented, would stimulate growth both from supply and demand sides.

           Heartening to see that he has kept his commitment towards fiscal consolidation, and reduced fiscal deficit to 4.6 per cent of the GDP in the current fiscal. If the geo-political situation doest not create havoc with oil prices, then I do hope that he would be able to keep his commitments and thus encourage growth further.

          The only area of concern is high Current Account deficit which, I am sure, he will find means in course of time this year to tackle.

          Inclusiveness: UPA’s overriding objectives of inclusiveness and rural development  is a continuous process. It got its reflection in last two Budgets as well as in the present one. A staggering Rs. 58,000 crore had been allocated for ‘Bharat Nirman’, that is, rural infrastructure building, despite fiscal constraints. This is a rise of Rs. 10,000 crore as compared to last Budget. This money will go to rural roads, rural electrification, accelerated irrigation programme, drinking water, sanitation, and housing scheme in rural India.

          This may be considered “Investment for agriculture”, if not strictly Investment in agriculture.” And in Indian context, it has been seen that it is such investment for agriculture by the Government which in turn encourage.” Investment in agriculture by the private sector. Thus, much has been done for agricultural growth through such huge spending. Needless to say, such spending would boost rural empowerment and rural demand even in the short-term.  Empowering rural India does not stop here.

          The Budget also declares to provide rural broadband connectivity to all 2,50,000 village Panchayats in rural India. This is a step which can empower rural people to  great extent and save them from misinformation and exploitation.

          UPA Government’s flagship programme of employment guarantee of one person per family for 100 days goes unabated. A sum of Rs. 40,000 crore had been allocated again for MGNREGA this year. This not only creates the safety net against high food inflation, but also intends to protect their real wage by linking nominal wage to Consumer Price Index. This is extremely heartening. I do hope all administrative lacunae in the delivery system will be taken care of this time so that real needy gets the benefit.

           The increase of remuneration of Anganwadi workers and helpers was long pending. By doubling their remuneration from Rs. 1500 to Rs. 3000, the Finance Minister had benefited 22-lakh Anganwadi workers most of whom are women. This brings immediate cheer to all of us.

          The increased coverage of National Health Insurance to cover mining workers and other associated unorganized industry is an excellent step; so is the empowerment of women through Self-Help Women’s Development Fund of Rs. 500 crore this year.

          UPA’s commitment to Social Empowerment gets its reflection in its “Right to Education”. Allocation was increased by 40 per cent this year. And a pre-matric scholarship scheme being introduced for four million needy students belonging to Scheduled Caste and Scheduled Tribe categories in Class IX and X is extremely welcome. I would like to see more quality upgradation and teachers which should mean real empowerment.

          Heartening to see, Finance Minister’s efforts did not stop only at allocation of fund. He at least had ventured into the improvement of the delivery by introducing Direct Cash Transfer System in place of “subsidy in fertilizer and food.” I would urge necessary administrative steps in this regard so that these schemes reach the real beneficiaries and do not get misused like in MGNREGA.

          Now, I come to Inflation, as we all know is a matter of major concern for all of us, especially food inflation because it is food inflation which affects the poor relatively more.

Now the question is, had the Finance Minister addressed this issue sufficiently? To my mind, within the limited scope of budget-making he tried his best. It is true that all these measures are not sufficient to tackle inflation. Much also would depend on RBI’s monetary management. To that extent. Inflation still remains a matter of worry.

          To ease supply bottlenecks in Agriculture, several measures have been taken. I have already mentioned how the huge allocation for Bharat Nirman will ease bottlenecks in agriculture by encouraging of private investment. Moreover, all previous schemes relating to bringing Green Revolution to Eastern India, development of 60,000 arid  villages for pulses and oilseeds, still continue with further allocation of Rs.400 crore and Rs.300 crore respectively. Rs.300 crore have been allocated for promotion of Bajra, Jwar, Ragi and other millets.

          On the credit front, additional amount has been made available to agriculture. Plus, Interest Rate Subvention had been hiked thereby reducing the effective Interest rate to four per cent for short-term crop loans. Enough has been provided to encourage cold storage which would take care of distribution efficiency. It is true that all these measures would ease production and distribution efficiency in case of food and other agricultural crops.      But much more needs to be done to make agriculture productive and a viable job option for today’s Indian youth. 

          Funds sent by the Central Government to the State of West Bengal are not utilised because the West Bengal Government is not in a position to contribute its share for implementation of the Central Government schemes and programmes. Financial position of the West Bengal Government is very poor. There cannot be two opinions about it. For example the Jawaharlal Nehru National Urban Renewal Mission where the State Government of West Bengal is not in a position to contribute its share. The JNNURM is not being implemented properly with the result that development is retarded and the ultimate losers are the people.

          Before I finish I would like to congratulate the hon. Finance Minister for some of his touching efforts to Bengal. I will also urge upon him to roll back the five per cent service tax on healthcare. As a Doctor, I find it difficult to swallow. The allocation of Rs.3000 crore to NABARD or Rs.15,000 crore for revival of co-operative societies in handloom sector is a relief for three lakh handloom weavers as well as for me. His special thought about Senior Citizens over 80 years of age for whom tax exemption limit rises to Rs.5 lakh is really touching.

          Allocation of Special Education Grant to IIT Kharagpur and IIM Kolkata make all of us in Bengal happy. Grant of Rs.50 crore to Aligarh Muslim University at Murshidabad was much needed. Last but not least, declaring the prize money of Rs.1 crore in the name of Gurudev Rabindranath Tagore reminds  whole of India the need for universal brotherhood, a value all of us cherish in Bengal since childhood.

          Thank you again, sir, for allowing me to express my general view on the General Budget in this august House.

 

श्री लालू प्रसाद (सारण): महोदय, सरकार जो बजट लाई है, मैंने उसका मोटा-मोटा अध्ययन किया है और देखा है कि इसमें कृषि पर और अन्य चीजों पर बहुत कम टैक्स लगाने का प्रयास प्रणब दा ने किया है, मैं इसकी सराहना करता हूं। ऊंट के मुंह में जीरे की तरह देश की गरीबी, गुरबत, लाचारी और बेबसी है। इस देश में एक श्रेणी के लोग फैशन में बहस करते हैं कि जातपात और बिरादरी मिटनी चाहिए।

          लेकिन यह जात-पात, बिरादरी मिटने का नाम नहीं लेती है। जब तक इस देश में चंद हाथों में नौकरियां हैं, शिक्षा चंद हाथों में कैद है और आज राजनीति में भी इसी तरह के लोग आ रहे हैं, जो कानून बनाते हैं, जो सुप्रीमेसी ऑफ पार्लियामैन्ट, जो हायर लेजिस्लेचर की पावर है, लेकिन जब हम कानून बनाने लगते हैं तो हमारा ध्यान हर इनडिविजुअल पर पड़ता है कि इन इंटरैस्ट ऑफ दि स्ट्रंगर पीपुल हम जो कानून बनाने जा रहे हैं, इससे हम प्रभावित होते हैं कि नहीं, यह हम पर लागू होता है कि नहीं, यह परख लेते हैं, तभी इसमें लोग भाग लेते हैं। यह देश का दुर्भाग्य है। अगर इस देश की गरीबी, गुरबत और समाजवाद का मतलब, समतामूलक समाज का मतलब, गैर बराबरी का मतलब गैर बराबरी मिटे, सभी पंथ, सभी धर्मों में सभी भाई और बहन हैं, उधर हमारा ध्यान नहीं जाता है।

          महोदय, इस देश की रीढ़ एग्रीकल्चर और पशुपालन है। पशुपालन के अलावा जो कृषि है, इसी सदन में कृषि मंत्री जी ने कहा था कि नॉर्थ इंडिया खासकर हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और कोलकाता पर ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ने वाला है। हमारी पैदावार कम होने वाली है, बारिश कम होने वाली है। आज बिहार के समाचार पत्र को मैंने देखा, उसमें लिखा था कि 17 जिलों में पीने के पानी का अभाव है। वहां की सरकार ने, वहां के मुख्य मंत्री ने भी कबूल किया है, जो मैंने पढ़ा है। वहां जो वाटर लैवल है, वह पाताल लोक में जा रहा है। प्रणव बाबू आप पता कर लें कि आखिर हम शुरू से ही बिहार के लोग माइग्रेट क्यों करते हैं। एक तरफ उत्तर बिहार, जहां हमारी बैस्ट फर्टाइल लैंड है और डेन्सिटी ऑफ पापुलेशन बहुत थिक है। वहां अंतर्राष्ट्रीय नदियां हर साल नेपाल से होकर निकलती हैं और हमारी जो टूटी-फूटी जैसी भी व्यवस्था है, वह उनके कारण चरमरा जाती है। कोसी नदी की पिछले साल की बाढ़ इसका उदाहरण है कि उसके कारण बिहार की क्या हालत हुई थी। जो मध्य बिहार है, जमींदार और सामंतों की वजह से मध्य बिहार में नक्सलवाद आया। मेरे शासनकाल में ये सब झारखंड में चले गये और आपस में लड़ते रह गये। हम लोग जिस बिहार से आते हैं, उस बिहार की उपेक्षा, बिहार पर ध्यान नहीं देना, उसके साथ भेदभाव करना, हमेशा से होता रहा है। मैं समझता हूं कि जब तक बिहार नहीं उठेगा, बिहार के लोग नहीं उठेंगे, तब तक देश की उन्नति नहीं हो सकती है। बिहार के मुख्य मंत्री, नीतीश जी ने कहा है कि हम बिहार को 2015 तक विकसित राज्य बना देंगे। उनके पास मशीन है, वे देखते रहते हैं। इस पर हमने कहा कि छः महीने के बाद ही बोलेंगे। प्रणव बाबू ज्ञानी आदमी हैं, जानकार आदमी हैं, उनके पास काफी अनुभव है, उनके सामने हम लोगों की उम्र भी बहुत कम है। लेकिन भारत सरकार का ग्रोथ रेट क्या है, आप जो पैसा देते हैं, बांटते हैं। जो मालिक हैं, जिसके पास रिसोर्सेज हैं, जो राज्यों को पैसे पम्प करता है। यूपीए-1 सरकार में हमने जो पैसा पम्प किया। भारत निर्माण के तहत नरेगा से लेकर सर्व शिक्षा अभियान, अस्पताल, प्रधान मंत्री सड़क योजना, हाईवे, नेशनल हाईवे उन दिनों में राज्य सरकारों के पास अपने कर्मियों को तनख्वाह देने का भी पैसा नहीं था। उनमें महाराष्ट्र भी एक राज्य था, जो अपने कर्मियों को तनख्वाह भी नहीं दे पाता था। यूपीए-1 सरकार में मैं भी आपके साथ में था। उस समय दुनिया में जो इकोनोमी बूम हुई थी, उसका लाभ भारत को भी मिला। हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और वही पैसा हम लोगों ने हर राज्य सरकार को पम्प किया और पम्प करने का नतीजा क्या हुआ कि आप यहां से जो चावल, गेहूं देते हैं। लेकिन हर राज्य सरकार को मैं देखता हूं कि जब चुनाव आता है तो कहते हैं कि हम दो रुपये किलो चावल बेचेंगे। आप भी बेचते हैं और बीजेपी भी बेचने लगती है।

          सरकार का सामान ही बेचने लगती हैं। यह समस्या का इलाज नहीं है, निदान नहीं है। हम बिहारी लोग, बिहार के लोग, कई अवसरों पर चर्चा हुई थी कि नेपाल से बात कीजिये। हमारे महरूम नेता जननायक कर्पूरी ठाकुर जी ने बार-बार कहा था कि बिहार तब तक उठने वाला नहीं है, हमारा किसान, उत्तर बिहार गार्डन ऑफ बिहार कहा जाता था, लेकिन उत्तर बिहार की क्या हालत है? नक्सलपंथ, पीपुल्स वार ग्रुप ईस्ट जिले में फैल गया है। चारों तरफ गांव से शहर को घेरो, गांव से शहर को घेरो, वे आपके और हमारे सिस्टम को स्वीकार नहीं करते हैं।

          महोदय, जननायक कर्पूरी ठाकुर जी ने कहा था कि नेपाल से बात कीजिए। जब तक नेपाल से बात नहीं होगी, जब तक बिहार की नदियों का रख-रखाव, रैगयुलराइज, वहां डैम हों, वहां बिजली पैदा हो, बिहार मामूली राज्य नहीं है, ईस्ट बिहार का कायाकल्प तब होगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। हम जब यूपीए वन में थे तो हम लोगों ने बात की थी और उसके लिए पैसा भी दिया था। मिनिमम कॉमन प्रोग्राम में इन सब बातों का जिक्र है, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पायी है। बाढ़ के बाद, बाढ़-सुखाड़, नदियों का कटाव, माननीय प्रधानमंत्री जी ने ऐलान किया था, गंगा नदी नेशनल रीवर है, हम इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन क्या एक पैसा, एक छटांक पैसा भी नदियां के रख-रखाव के लिए है। गंगा नदी जो डिवाइड करती है, राइट, लेफ्ट इरोजन करती है, मिट्टी काटकर लेकर चली जाती है, गांव को डुबो देती है, उसके लिए एक पैसे का जिक्र नहीं है। फिर यह बिहार कैसे बढ़ने वाला है, कौन करने वाला है? सिर्फ बिहार ही नहीं, ईस्टर्न यूपी से लेकर सेवन सिस्टर्स, उड़ीसा से लेकर झारखंड का जो इलाका है, पूर्वांचल, पूर्वोत्तर जो राज्य हैं, उनका कायाकल्प होने वाला नहीं है। हम बिहार के लोग मेहनत करके, रिक्शा चलाकर, ठेला चलाकर, मॉरीशस में जाकर, लीबिया में जाकर, दुनिया में जाकर, सिंगापुर में जाकर पैसा लाते हैं, हम अरब देशों में जाते हैं। हम मजदूर के रूप में जाते हैं और मुद्रा लेकर आते हैं। पैसा कहां जमा होता है, किसकी तरक्की में पैसा जाता है? जो हमारे बिहारियों का क्रेडिट है, जो हमारा पैसा बैंकों में, रिजर्व बैंक में डिपोजिट है, यह जो पैसा है, आप बताइये कि क्या उसकी बराबरी में एक भी पैसा बिहार को मिला है? क्रेडिट डिपोजिट रेश्यो पर कई बार आते-जाते वित्त मंत्री जी मुंह खोलते हैं, मैं भी था, 33 परसेंट हैव बीन इनवेस्टमेंट, जितना क्रेडिट बिहारी लोग करते हैं, जमा करते हैं, हम बिहार में खर्चा करेंगे, लेकिन कुछ नहीं है। आज बिहार को वर्ल्ड बैंक से लोन लेना पड़ रहा है, बिहारियों को कर्जे में डाला जा रहा है। इसीलिए हमारी लड़ाई थी। आरबीआई का महाराष्ट्र में जो हैडक्वार्टर है, जहां हमारे देश का कामर्शियल सेंटर है, सारा मुख्यालय बंबई में हैं। उसे डी-सेंट्रलाइज कीजिए और हमारा जो क्रेडिट है, उसके अनुरूप पैसा बिहारियों को दीजिए, हमें भीख नहीं मांगनी है। बिहार सरकार बार-बार कहती है, हम लोग भी कहते हैं, लेकिन आप कहते हैं कि स्पेशल कैटेगरी नहीं होगा, राज्य को स्पेशल कैटेगरी का दर्जा नहीं दोगे तो बिहार आगे बढ़ने वाला नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री जी ने भी कह दिया।

सभापति महोदय :   अब आपको कंक्लूड करना पड़ेगा।

श्री लालू प्रसाद : महोदय, स्पेशल कैटेगरी, हम लोग माननीय प्रधानमंत्री जी से भी मिले थे, सबसे मिले थे, लेकिन आखिर क्या एक भी पैसे का इन्वेस्टमेंट बिहार में हुआ? क्या एक भी इंडस्ट्री बिहार में है, क्या एक भी इंटरनेशनल एयरपोर्ट बिहार में है, नहीं है, आज से नहीं, शुरू से ही नहीं है। जब तक हमारा किसान, बिहार में हमारी कृषि की उपज सड़-गल जाती है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। रीजनल इनबैलेंस को मिटाना पड़ेगा और यही नहीं अगर बिहार के मुख्यमंत्री जी का सपना है कि वर्ष 2015 तक हम बिहार को विकसित राज्य बना देंगे, आप कहां से बना दोगे?

कैसे बना देंगे? कोई मशीन है जो बना देंगे? कैसे बनाएँगे? हम लोग देहात में गाय, बकरी चराते थे तो बोलते थे,...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN :  Please conclude now.

श्री लालू प्रसाद : अरे सुनिये ना पहले आप।

सभापति महोदय : आप बहुत अच्छा बोल रहे हैं।

श्री लालू प्रसाद: तो सुन तो लीजिए।

सभापति महोदय : मैं तो सुन रहा हूँ।

श्री लालू प्रसाद : महोदय, यह ठीक है कि हमारी पार्टी हार गई लेकिन हमारे यहाँ से निकले हुए लोग ही वहाँ बने हुए हैं। ठीक है, अच्छी बात है, शुभकामना है। लेकिन महोदय, जब गाय, भैंस बकरी चराते थे तो कान में अंगुली डालकर हम बोलते थे - ‘ एक बीर चले अकुलाई’ यानी हड़बड़ा कर एक बीर चला तो  ‘अस्सी कोस जमुना का तीर’ – वह बीर कितने दिन में पहुँचा? बिहार इतना ही अस्सी कोस पीछे है और हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र कितना आगे हैं - हम दिन भर चलते हैं तो जौ भर आगे बढ़ते हैं। जौ - जिसका बारले वाटर बनता है। कैसे विकसित राज्य बना देंगे? इनका ग्रोथ रेट है छः या सात और बिहार में जो    …* कुछ लोग हैं, वे बोलते हैं कि 11 परसेंट है। ...( व्यवधान)

प्रो. रंजन प्रसाद यादव (पाटलिपुत्र): बिहार जो पिछड़ा रहा, उसका कारण कौन था?     …*   ...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद (सारण): उस में    …*   

सभापति महोदय : यह सब रिकार्ड में नहीं जाएगा।    

(Interruptions) …*   

श्री लालू प्रसाद :  आप बैठो। आप फालतू बात करते हैं। ...( व्यवधान)     *        

… * ...( व्यवधान)   

सभापति महोदय : रंजन जी, आप बैठिये। लालू जी, आप आसन को संबोधित करें।    

…( व्यवधान)   

सभापति महोदय :  ये सब बातें रिकार्ड में नहीं जाएँगी।    

(Interruptions) …*   

सभापति महोदय : लालू जी, आप आसन की तरफ देखिये। मैं तो उनको मना कर रहा हूँ लेकिन आप उनको देखकर बोल रहे हैं, मैं क्या करूँ? 

(Interruptions) … सभापति महोदय : ये सारी बातें रिकार्ड में नहीं जाएँगी।

(Interruptions) …* सभापति महोदय : अब कनक्लूड कीजिए।

श्री लालू प्रसाद : क्रेडिट डिपॉज़िट रेशियो बिहार का हमको मिलना चाहिए। स्पेशल कैटागरी हमें दो। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब कनक्लूड कीजिए, पंद्रह मिनट हो गए हैं।

श्री लालू प्रसाद : और बीच में ये जो बोले थे ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : वह एक मिनट था। पंद्रह मिनट हो गए हैं।

...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : आपको मालूम है इस आदमी के विषय में?  …*   ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please maintain decorum.

श्री लालू प्रसाद : महोदय, इसलिए स्पेशल कैटागरी का दर्ज हमें मिलना चाहिए। बिहार को मेनस्ट्रीम में लाना है तो छलांग लगानी पड़ेगी और बराबरी में लाना पड़ेगा। इस बराबरी के लिए मैं प्रणब बाबू से आग्रह करना चाहता हूँ कि बिहार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। जब तक बिहार का आदमी आगे नहीं बढ़ेगा, तब तक देश आगे बढ़ने वाला नहीं है। आपको मैं धन्यवाद देता हूँ। लेकिन ऐसे   …* लोगों के आने से पंद्रह साल बिहार में कुछ नहीं हुआ। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : यह असंसदीय शब्द है, इसको एक्सपंज किया जाए। 

                                                                                                   

SHRI R. THAMARAISELVAN (DHARMAPURI): Thank you, Sir, for giving me an opportunity to speak on the General Budget.  I welcome the Budget for 2011-12.

          Chairman, Sir, before dwelling into the General Budget 2011-12, presented by the hon. Finance Minister, I would like to highlight some of the welfare schemes being initiated and implemented by the Tamil Nadu Government under the dynamic leadership of Dr. Kalaignar for the past nearly five years for the upliftment of poor and downtrodden sections of our society.

          The Tamil Nadu Government has presented its Interim Budget on 5th February, 2011 which contains a number of schemes aimed at ameliorating the problems of the poor and under-privileged sections of society.  The DMK Government in the State has announced a major welfare scheme which targeted all sections of people, including Differently Abled Persons.

          The DMK Government in Tamil Nadu has a vision to convert 21 lakh huts into concrete houses over a period of six years and the same is being implemented under Kalaignar Housing Scheme.  Already more than 3 lakh concrete houses have been built and distributed freely to the needy and for the remaining 18 lakh concrete houses work is under progress in different parts of Tamil Nadu.  During the current year a sum of Rs.1,800 crore has been allocated for converting nearly three lakh huts.  It is certainly a major achievement of the Tamil Nadu Government headed by our beloved leader Dr. Kalaignar.

Another important achievement of the DMK Government in the State is in the health sector under the name and style of Kalaignar Health Insurance Scheme which will cover all the people whose annual income is below Rs.72,000 per annum, apart from more than 13 lakh government employees. This Health Insurance Scheme aims at extending medical assistance for major surgeries of critical illness to the poor people, government employees and their family members.

Many such People Friendly Schemes were implemented by the DMK Governments in the past and is being implemented presently. The founder leader of our DMK Party, Peraringnar Anna had once said that "EAZHAIYIN SIRIPPIL IRAIVANAI KANBOM" which means, "we can see God in the smile of poor". Our leader Dr. Kalaingnar, by implementing many welfare schemes as above said, as also giving rice at cheaper and unimaginable price of Rs.1.00 per kilogram, distribution of gas stove and colour Television freely, besides free clothes and shelters, translating the vision of our founder leader Peraringnar Anna into reality. Our leader Dr. Kalaingar considers this smile on the face of the poor and downtrodden as the major achievement of his Government as his Government has met with the three basic needs of any human being such as food, cloth and shelter.

I would strongly urge upon the Central Government to imbibe the achievements and good work being done by the DMK Government in Tamil Nadu and replicate the same at the Centre for the benefit of larger sections of people across the country.

I would like to say that the Budget for 2011-12 presented by the Finance Minister will take forward the country's economic growth at  a steady pace.

The budget has schemes for increasing farm productivity, reducing wastage, improving storage facilities and providing credit to farmers. At a time when the farm produce prices are ruling high, the schemes listed out in the budget would result in increased farm productivity and control prices. It has also taken the welcome step of hiking the income tax exemption limit, as well as to carry out the caste-based census between June and September 2011.

In this Budget Agriculture sector has received a big boost again, as this Budget has given the farm loan target by Rs.1 lakh crore and also given further interest incentives to farmers if they pay timely repayment of loans. The Finance Minister has revised the agricultural loan target to Rs.4.75 lakh crore for 2011-12. Earlier, it was Rs.3.75 lakh crore. This would not only help the farmers to pay the loan in time but also give solace to the farmers who are facing the nature's wrath almost every year either in the form of drought or floods. I would suggest that banks should make the terms and conditions simple so as to enable the farmers to get the loans without any difficulty. It is because of stringent formalities followed by banks, farmers are keeping away from banks and going after the moneylenders who take advantage of their ignorance and cheat them by charging high rate of interest.

Another important suggestion I would like to make is that Government should not import any agricultural produce when it is not required. If they do so, it affects the farmers very seriously. They will not be in a position to sell their produce at a better  rate. I would go to the extent of requesting the Government to formulate a policy to the effect that unless it is essential, the Government would not import any agricultural produce.

The major components of the 2011-12 Budget relating to farming include bringing Green Revolution to the eastern region, integrated development of 60,000 plus villages in rain-fed areas, promotion of oil palm, increasing the production of fruits and vegetables and the promotion of nutritious millets like bajra, jowar, ragi, and initiation of a national mission for protein supplements through dairy farming, piggery, goat rearing and fisheries in selected blocks. Provision has also been made for accelerated fodder development programme and the promotion of organic farming methods. It is a welcome step that the Government proposed to attract private investment in agriculture sector. On the whole, the Budget contains several good proposals but it lacks a vision and a strategy for keeping farmers on the farm and for attracting and retaining youth in farming.

The major deficiency of this Budget is that it has not addressed two goals of the National Policy for Farmers placed in Parliament in November 2007. This policy calls for an income orientation to farming and the measurement of agricultural growth in terms of growth rate in the real income of farm families. Also it calls for an integrated action plan involving higher farm productivity and larger income to encourage youth farmers to take to farming as a profession.

It is unfortunate that in a year of emerging global food crisis and persistence of food inflation, an opportunity to accelerate agricultural progress and agrarian prosperity have been missed. The only hope for farmers is the enactment of a Food Security Bill which confers legal access to food. While the right to information can be implemented with the help of files, the right to food can be implemented only with the help of farmers.

I am of the firm opinion that population explosion is one of the main reasons for all our ills. If we can stop population explosion, we can easily take care of our people with the resources available with us. According to a report one child is born every 1.26 second in India. This is the highest in the world. 25 million children are born in India every year. It is also estimated that India would overtake China in a short span of ten years. How to stop population explosion should be the immediate task of the Central Government.

Health is one area in which India's position is not worthy to mention Though, we have made a great strides in the field of health, according to a report, more than 26 crore people cannot afford healthcare and the Government hospitals cater to only a quarter of the people who approach the Government hospital desperately without any source of treatment. The role of healthcare in improving a nation's wealth and spurring economic growth is well established. India is the among the fastest growing economies in the world and is poised to become the second largest economy in the world according to a recent report from PwC. India's Human Development Index score, weighed down by poor healthcare indicators at 119 out of 169 countries.

Several factors that contribute to poor healthcare indicators in India are:

• India's healthcare infrastructure is inadequate to meet the burden of disease.   India has just 90 beds per 100,000 population against a world average of 270 beds ·       India also has just 60 doctors per 100,000 population and 130 nurses per 100,000 population against world averages of 140 and 280 respectively ·       Public spending on healthcare has also been less than 1% of GDP for the past thirty years ·       India's healthcare financing mechanisms are poor with 66% percent of healthcare expenditure being out of pocket. World Bank estimates that 2.2 % of India's population (around 24 Million people) goes into poverty every year because of catastrophic health expenditure. Together, these factors result in a poor per-capita spending on healthcare.
In an effort to address, the problem of low public spending, the Government, in its Common Minimum Programme outlined in 2004, promised to increase public spending on healthcare to 2-3% of GDP by 2012. However, the allocation so far has not met with the need. So it needs to be increased.
Another thing which I would like to highlight here is about our children. The child protection Budget for a country of more than 440 million children had been as low as a mere 0.34 percent of the total Union Budget in 2010-11, which is perhaps why India has become a child trafficking hotspot. There has been a demand to invest at least 10 percent of India's Gross Domestic Product (GDP) in children's education and health as ignoring childhood poverty and education will affect the nation's economic standing.
The World Bank estimates that India is ranked 2nd in the world of the number of children suffering from malnutrition, The prevalence of underweight children in India is among the highest in the world, and is nearly double that of Sub-Saharan Africa. The UN estimates that 2.1 million Indian children die before reaching the age of 5 every years - four every minute - mostly from preventable illnesses such as diarrhea, typhoid, malaria, measles and pneumonia. Every day, 1,000 Indian children die because of diarrhea alone. Children with infections are more susceptible to malnutrition and the cycle of poverty and malnutrition continues. Child malnutrition is responsible for 22 percent of India's burden of disease. Therefore, it is my humble request before the Government to enhance the allocation of fund for child protection substantially as we should not lose our children any more.
MR. CHAIRMAN :  Please conclude now. You can lay your speech. 
SHRI R. THAMARAISELVAN : Sir, I would just like to make two more points. 
Education is another area, where we have to lay more emphasis in the years to come. Drop outs from schools have not reduced over the years. Innovative and effective steps should be made to ensure that each and every child, particularly from the underprivileged sections of the society and people living in despicable conditions attend the schools. If we provide education to one and all, there is no doubt our country would become a developed country sooner rather than later. I would like to suggest that a model school be set up in each and every district of the country; centers providing health care particularly to the needy and poorest of the poor should be started in the nook and corner of the country; proper roads should be laid in the remotest areas of the country so that people living in those areas would become part of the national mainstream.
Unemployment is one of the gravest problems India is facing not only today but for many years. New thrust should be given by the UPA Government to take the problem of unemployment with all its seriousness it deserves. Employment generation is to be given top priority. Jawahar Rozgar Yojana should be taken up with more vigour. It should be reviewed to see that whether it is moving on the right lines.
Tourism is another area where we can bring in more foreign exchange. Maintenance of historical sites along with improvement of infrastructure with low budget hotels, airports facilities and rail services would undoubtedly improve the inflow of foreigners. As you are aware that tourism is an industry which does not pollute but bring revenue for the country. But the present Budget has not been well received by the captains of tourism industry as they allege that no good financial packages have been outlined in the Budget 2011.
Instead, the Government has increased Service Tax on essential components of tourism such as air tickets and rooms which will adversely affect the tourism industry and slow down its growth.
The UPA Government, of which DMK was a major alliance partner, had made great strides in every conceivable field in the past over six  years. No section of the society is unhappy with this Government. The problems being faced by the common man is addressed in a befitting manner.
Sir, I thank you once again for allowing me to express my views on the General Budget debate. With these words, I conclude my speech and I support the Finance Bill.
                                                                                                   
श्री निशिकांत दुबे (गोड्डा):  सभापति जी, मेरा पाइंट ऑफ आर्डर है कि बजट पर अत्यन्त महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है, लेकिन सदन में वित्त मंत्री एवं वित्त राज्य मंत्री उपस्थित नहीं हैं।  ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN:  When the Minister for Parliamentary Affairs is sitting here, he represents the Government.
… (Interruptions)
 श्री निशिकांत दुबे:  सभापति महोदय, मैं वित्त मंत्री अथवा वित्त से संबंधित मंत्री की अनुपस्थिति की बात कह रहा हूं। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN:  I have myself said from the Chair that when the Minister for Parliamentray Affairs is sitting here, he represents the Government.
… (Interruptions)
THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS, MINISTER OF SCIENCE AND TECHNOLOGY AND MINISTER OF EARTH SCIENCES (SHRI PAWAN KUMAR BANSAL):   Sir, the hon. Finance Minister himself was here and the MoS is here.  He has just gone out for half a minute and will be back soon.  I am here and Shri Kamal Nath is here.… (Interruptions)
SHRI BANSA GOPAL CHOWDHURY (ASANSOL):  Sir, I rise to participate in the discussion on General Budget today. While we are discussing the General Budget in the House, the whole country is facing a serious problem. The problem is related to price rise and inflation.  Price rise is unchecked.  The whole country is facing this problem.  Some days back, when the hon. Union Finance Minister presented his Budget here, lakhs of people from different parts of the country came here, particularly the workers from the private sector, public sector and unorganized sector, to demonstrate in front of the Parliament House and they were very eager to show their protest in Delhi regarding the living conditions of the people of our country which are very poor now.
          Sir, I would like to know what steps the Government is going to take in order to combat inflation.  There is not even one concrete step that is being stated here to combat inflation. In the Budget speech, the hon. Union Finance Minister has not mentioned any concrete step to check and ban speculation of essential commodities. Its value has reached about Rs. 15 lakh crore a year. Forward trading has become a serious problem and today, the value traded in the forward trading and commodity exchange is 1.5 times the value of our Annual Budget. This is the real economic scenario when the Government is placing the Economic Survey in the Parliament for the welfare of the country men.
16.59 hrs                         (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair) Why would anybody invest in speculative trading unless he makes profit out of it? Everybody knows that without any profit, no one would enter speculative market. 

          Another aspect is that, there is no mention about strengthening of the Public Distribution System. It is a fact that you have got 2.5 times excess food grains in your godowns.  What is the verdict of the Supreme Court in this regard?  The Supreme Court has directed the Government to distribute these food grains to the common people of the country.  But the Government is silent on this direction of the Supreme Court. Where will people go?

          Regarding the price rise, I would like to say that everybody is surprised that the Government has de-regulated the price of petrol. As a result of this, what have we witnessed?  We witnessed that petroleum prices have been hiked seven times in the last eight months. At the time of de-regulating the petrol prices, the assurance that was given to the Parliament and to the country was that there would be a re-look at this tax structure. But there is no re-look at the tax structure.  Later on I will talk about the position of direct taxes and indirect taxes in our country. The ad valorem tax on petroleum continues. Today, we are told that that more than Rs. 2 lakh crore is being collected as revenue from the petroleum sector.  The petroleum prices are de-regulated; prices of these products are increasing; the Government is collecting Rs. 2 lakh crore from the petroleum sector; and what is surprising is that the entire burden is being transferred to the people of the country. This is the fun which is going on in the Union Budget, and this is the fun which is going on in the whole country.

          The Government should study the United Nations’ Special Report on the Right to Food. It has stated that 70 per cent of the rise in global prices of food is because of speculation. We must learn at least from that. Our country should learn and the Government should learn from that.  The Union Budget should be aimed in that direction. Will you ban speculative trading? Is there any specific direction in the Budget?  The answer is “No.”  Will you restructure the tax system in the petroleum sector so that the rise in the prices of petroleum products could be checked.  There is no specific direction in the Union Budget. 

          The Government is talking about the black money. We have heard about so many scams during this period. The entire country is ashamed of these scams. You have talked of black money when there is a lot of discussion going on about it.  Now, you are talking about the formation of a Committee.  What will that Committee do?  Can it plug the avenues?  Can it plug the sources? Can it stop the Mauritius route through which money laundering, black marketing, etc. take place? The Government has no policy regarding checks and balances for money laundering. In other words, I would like to say the Government is “not discouraging” – this word I must use – the money laundering system in the country. That is why the Government is not going to stop these routs of money laundering. On the other hand, in the Budget the Government is announcing only about the formation of a Committee to check these types of activities in the country. This is not the question about the integrity of any individual. This is about the entire system. This is about the neo liberal economy of the country.

As you know, in the last Budget also, the Government declared for the disinvestment.  The Government has declared to sell out the public assets.  The Government has already tried to sell off the assets of Coal India Limited and other public sector undertakings.  What is the benefit of doing this?  I want to say here that the workers and the working class of the coal sector did not participate in it. … (Interruptions) You can see as to what has happened through this process.  Before the Government was just to place the Budget, coal prices were hiked by the Coal India Limited.  How is it possible that when the Government was going to place the Union Budget in the Parliament, before one or two days, more than 30 per cent coal price has been raised?  There is no proper direction from the Government as to where the people will go and how the people will manage to earn something to maintain their livelihood.

          I would like to mention another important point.  How are we allowing our system to generate to such an extent? I believe the Government is gradually creating crony capital.  They are promoting crony capitalism in India.  It is this crony capitalism that is being nurtured and protected today which is leading to all the scams.  Corruption today is siphoning off of money that we can use to improve the livelihood of our people.  You can imagine that Rs. 1,76,000 crore is equivalent for two years of providing food to the poor.  According to Shrimati Sonia Gandhi headed National Advisory Council’s estimate, you would require Rs. 88,000 crore to provide 35 kgs of foodgrains to every family in our country including all the APL families; Rs. 35,000 crore is required annually as per the Planning Commission for new school buildings, to recruit new teachers and for the Mid-Day Meal, etc.    But the hon. Prime Minister is saying that he has chosen not to collect revenues because he wants to give incentives to corporate houses. It is very sorry to say that during the last three years, the Government has not collected Rs. 3,61, 415 crore from the corporates and individuals.  This is from the budgetary statement of Revenue Foregone.

          Sir, in conclusion, what I would like to say is that the Government should not allow the foreign capital for the banking sector, insurance sector and all these sectors which will ruin our economy.  

          Lastly, I would like to say that our hon. Minister of Finance is not only a knowledgeable person but he is also a very good engineer for the jote politics. He can organize the derailed bogies in West Bengal, but he cannot manage the dismal condition of the Indian economy.

           

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK):  Mr. Chairman, Sir, I would like to thank you very much for giving me the opportunity  to speak on the General Budget.

          I stand here to deliberate on the General Budget for the year 2011-12. At the very outset, I would like to say that there has not been, in recent times, a more complex economic situation combined with a more volatile political one for the Government to present the Budget. It is not a situation of economic crisis. Nor is it quite the situation of a   political instability, but, and this is what makes it critical, it can quickly go that way. होते-होते रह गया है। The Members from that party are not present here. But what was transpiring two days before, it can go that way quickly and that is the critical mass which is actually hovering over the political system of this country. The overall situation of pervasive uncertainty and drift that engulfs the economy and the polity is far more difficult and complex to deal with than the crisis.

          The Budget could have initiated definitive action on both fronts. Indeed the Finance Minister did set the objective right at the start of his speech. I quote: “I see the Budget 2011-12 as a transition towards a more transparent and result-oriented economic management system in India.” The problem is that having said that, he did not back it with any credible plan.  The closest  that he comes to addressing the corruption, governance issue is to recall the earlier initiatives of securing a membership of the Financial Action Task Force of G-20 and concluding of the Tax Information Exchange Agreement and the Double Taxation Avoidance Agreements. These measures do not add up to a strategy to improve transparency. In fact, the Finance Minister spent more time talking endlessly on  bamboo for agarbattis, lactose for homeopathic medicines and on sanitary napkins and diapers.

The Finance Minister made a reference to Goddess Lakshmi while tabling the Budget. Today is the International Day for Women. But he forgot about the centrality of women to a dynamic economic activity. The assessment of the Gender Budgeting Statement brought out by the Government shows that the total Union Budget outlay has gone up marginally from 6.1 per cent to 6.2 per cent. Is this adequate for them who constitute half the population and emerge a strong political force?

Sir, no new interventions have been introduced for women from the most-marginalized sections: the tribals and the minorities. The Schemes meant for working women, Swadhar and Priyadarshini, have all registered  a decline in the allocation from the last year. The only silver-lining appears for the Anganwadi workers whose salaries have been doubled, of course, with all constraints.. But that closes the option of recruiting a second Anganwadi worker for now. Here,  I would like to mention that the Anganwadi workers are devoted to the children who are above three years. We have to look after the children who are below three years. There was always a need, a demand from a large number of Non-Governmental Organizations to appoint a second Anganwadi worker especially to look after these children. They are the ones who will look after these children.

          Who will look after these children? But by doubling this, which was a necessity, we have closed the appointment of another Anganwadi worker in the Anganwadis.

          About 29 lakh credit linked women Self Help Groups that depend on micro finance institutions got some relief, no doubt, but without any regulatory body for micro finance institutions, one does not know how it is going to work.

          The worst hit by the rising inflation, the housewife, received no relief from the Budget adding to her woes. Travel and eating out will cost more.

          Allocations for social sectors have increased by 17 per cent. But public expenditure on health hovers around 1 per cent of the GDP or half the expected outlay. National Rural Health Mission’s absorption capacity is considerably higher now and hence a much higher level of public health spending can be absorbed by it. We need to provide for major increases year after year to this sector so that the public health spending reaches at least 3 per cent of GDP by 2015.

          The increase in the education sector budget is welcome, but we would like to see more quality upgradation funds for primary schools. We need to start looking at learning and teaching outcomes. In his book, ‘Imagining India’, the writer Shri Nandan Nilekani mentions; “India may have a huge demographic advantage in the form of world’s largest young population, but this can turn into a disadvantage if we fail to educate them properly”. Right now, we are nowhere close to providing a suitable education to our children, especially during their formative years. This is a privation that is bound to upset the rosy picture of 9 to 10 per cent GDP growth rates.

          Controlling inflation, reining in fiscal deficit, searching for ways to unearth black money and managing social and infrastructure sector outlay to maintain the growth momentum is the Finance Minister’s priority. But lack of extensive and effective irrigation network on the one hand and absence of a marketing infrastructure on the other are dual curses on the rural supply and demand chain. It should be clear to all by now that distributional constraints are more responsible for food insecurity suffered by crores of people in this country than low rate of farm production. Recent RBI data shows that while a total FCI stock of around 55 million tonnes of wheat and rice are lying over the last five months, the off-take has been only around 2 million tonnes. Naturally, this has raised open market prices. Still 60 per cent of agricultural land across the country has not been integrated with any irrigation grid.

          Lack of adequate work has created much restlessness among the youth. India will continue to have a youthful population of 500 million in the next 15 years as compared to other emerging economies. But this can turn the situation into a nightmare in which semi-skilled and semi-literate young population may not find a place in the job market as manufacturing and service sector jobs are growing very slowly. The unemployment rate is now around 10.1 per cent in the rural areas and 9.4 per cent across the nation. This means that around 40 to 50 million youth are without jobs.

What will the young job seekers, in their 20s and 30s, do?  This task of educating and training the young to the labour force cannot be left to the private sector alone. 

          We are in the middle of demographic dividend situation.  Unless we invest now and train our youths, demographic dividend will pass by.  Vocational training scheme is being revamped and there has been a mention in the Budget also on that. But the cause of concern is who are going to train the youths and make them skilled?  Have we taken adequate steps to train the trainers? 

It is said that there are three India now.  One is affluent India with more millionaires than in the United Kingdom.  There are 69 dollar billionaires compared to Britain’s 29.  We have one middle India and the bottom of the pyramid, that is, the other India. Each with different incomes, each with different concerns and each significantly have different footprints.

Affluent India is a major investor.  Let me look at it in a positive way.  They are the major investor in the Indian economy.  They are a very relieved lot.  There are no major taxations for them in this Budget; proposals are limited, share markets have moved out.   Middle India is the engine of consumption economy, reeling under huge inflation, especially, food.  The Rs.2000 IT reduction looks pitifully small – it is not Rs.2000, but it will be Rs.1700 to be precise – when you have to pay higher taxes on branded apparels, hospitals, insurance and aircraft.  The bottom of the pyramid segment is the future growth of Indian consumer market.  Food inflation has hit very hard here. 

Promise of leakage free transfer of subsidies to recipients is in the air.  With the proposal to move towards direct tax transfers, this Budget has but upfront the agenda of reforms in the public sector delivery.  The attractiveness of such transfers lies in the beneficiary getting what is due to him directly without any intermediary.  Therefore, in theory, maybe there is more to cash transfers than it suggests. 

Evidence of leakages in PDS has often been cited to argue the benefits that would accrue with cash transfer.  The Economic Survey using National Sample Survey data has shown leakages to the extent of 40 per cent to 50 per cent in PDS, but has conveniently ignored the success stories that leakages were almost nil in 2007-08 in Tamil Nadu and Chhattisgarh.  Tamil Nadu achieved this simply by not targeting and in Chhattisgarh near universal PDS average led to negligible leakages. 

MR. CHAIRMAN :  You have little time now.

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Yes, I know, Sir. We have some idea of the extent of leakages in social pension schemes and Indira Awas Yojana, which are cash transfer programmes.  Leakages do take place in these programmes.  Actually, the problem lies not in what form the subsidy takes but in identifying the right beneficiaries since cash is fungible and can be used for various needs.  There is greater incentive to subvert the system in the case of cash transfer than with direct provisioning of subsidies.

I would suggest that direct cash transfer should be an option not the alternative to the targeted PDS. 

          The Budget does not offer a prescription to address the problem of rising oil prices.  The Finance Minister hopes to bring down the fiscal deficit from 5.1 per cent of the GDP to 4.6 per cent, but rise in crude prices could belie his expectation.  Unless the Government reduces the duties on petroleum products and also persuades the State Governments to forgo some part of the revenue, this will have a cascading effect.

          The hike in iron ore export duty is to gradually restrain the export of iron ore, a crucial raw material for domestic industry. Should we continue to export iron ore or conserve it for future?  That is a question which is being discussed in our country.  What to do with 200 million tonnes of iron ore we produce now, while domestic demand at present is less than half of that?  Through this Budget, the Government has put domestic mining companies and exporters on notice that the liberal policy of iron ore exports would be progressively tightened.  At the same time, the export of value-added iron ore in palletised form, free of export tax, is going to help exporters realise higher prices from the overseas market.  It is therefore desirable that a part of the revenue generated from export duty is specifically earmarked for development activities, including greening of the mining areas, mining safety, and mine workers’ welfare.

          The Government has adopted a five-point strategy to deal with black money.  Illegal outflows make up 72 per cent of India’s estimated underground economy. However, taxmen should nab evaders through intelligence and creative use of information technology rather than through raids and searches that are archaic, blunt instruments in law enforcement. 

          The major components of the 2011-12 Budget relates to farming including bringing Green Revolution to the eastern region, integrated development of 60,000 pulses villages in rain-fed areas, and promotion of oil palm.  These are the three components; and there are some more provisions which the Finance Minister has mentioned in the Budget.  The Finance Minister has also proposed some of the subsidies like the one relating to fertilizer and kerosene will be paid to the farmers directly. Excise duty has also been reduced in the case of equipment for drip irrigation.  These are welcome steps.  A welcome step is the creation of the Women’s Self-Help Group Fund with an outlay of 500 crores of rupees.  If this is linked to the Mahila Kisan Programme, it will have an impact on rural income. 

          On the whole, the Budget contains several good proposals but it lacks a vision and a strategy for keeping farmers on the farm and for attracting and retaining youths in farming.  While the Finance Minister is emphasising the need for reaping a demographic dividend from our youthful population, where is the strategy or programme for attracting and retaining youth in farming?  Most of the farm graduates seek employment in the organised sector and are not interested in agriculture.

          The major deficiency of this Budget is that it has not addressed the two goals of the National Policy for Farmers placed in Parliament in last November 2007. 

          This Policy calls for an income orientation to farming and the measurement of agricultural growth in terms of growth rate… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN :  Please do not look at them.  Please address the Chair.

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): There are two goals which have been set up since 2007 by Dr. Swaminathan, and they are a part in the public domain.  Did the Budget look at those aspects?  That is my last point which I was harping on.

          This Policy calls for an income orientation to farming and the measurement of agricultural growth in terms of growth rate in the real income of farm families.  That has not been done.

          Also it calls for an integrated action plan involving higher farm productivity and larger income to encourage young farmers to take to farming as a profession.

          I would say that in a year of emerging global food crisis and persistence of food inflation an opportunity to accelerate agricultural progress has been missed. Here, I would conclude by referring to page no. 41 of the Economic Survey 2010-11.  I would like to quote the idea that has been put forth in the last paragraph of the Economic Survey:

“For India to develop faster and do better as an economy, it is therefore important to foster the culture of honesty and trustworthiness. … ”   I hope, and I only hope, that with all the scams that Shri Bansa Gopal ji has just mentioned, with all that is happening around us in our country, with all that has happened in the past or will happen in future, there have been some suggestions in this Economic Survey as to how our society should develop.  I hope, Members sitting here, who have been discussing this Budget, will carefully read the second Chapter of the Economic Survey and try to find out where they stand, what is their view, and how they behave with the situation that is prevalent here today. 
          With these words, I conclude.
                                                                                                   
SHRI ADHALRAO PATIL SHIVAJI (SHIRUR): Mr. Chairman, Sir, I am grateful to you for giving me this opportunity to present our views on the Union Budget 2011-12.
          Last year was marked by unsavoury scandals, deficit of public confidence in the UPA Government and burdensome inflation. The public was looking at this Budget for major relief.  Sadly, the hon. Finance Minister has delivered a Budget which belies public expectation.  At its best it makes some cosmetic changes. 
          During the last nine to twelve months, the prices of all the essential commodities and agricultural produce have shown immense volatility resulting in great discomfort to the public.  This has also hit the farmers.  The Finance Minister has spoken about it in the Budget and sought to take some corrective measures.
          Under the blockhead ‘Agriculture’, the Finance Minister has referred to agriculture development being central to our growth strategy.  He has listed multi-pronged measures that focus on agricultural growth.  I come from agricultural background and I am actively engaged in regeneration of rural community.  I would sincerely wish that the vision which the Finance Minister has unfolded here bear success. 
But there is one component, which does not find any mention in his Speech and it is about improvement. No steps have been taken on improving the quality of soil and seeds in the country.  We believe that without proper water and soil management, yields will continue to languish in the country and we will lack the agricultural productivity.
          As a part of agricultural growth, the Government has raised its credit flow to farmers to Rs. 4,75,000 crore.  It has also increased interest rate subvention from two per cent to three per cent thus bringing down the effective rate to four per cent.  The interest rate subvention is applicable subject to farmers paying their dues on time. The Government has also promised to contribute about Rs.10,000 crore to NABARD as Short-Term Rural Credit Fund. As we all know, agriculture is highly risk prone and subject to natural calamities.  Besides interest subvention, there  should have been provisions for waiver of their loans.
          Now, I would like to come to electronic hardware and computer industry.  India enjoys global reputation as a software power. Conducive policies such as tax holidays and export benefits as incentives, has played a major role in achieving  consistent growth for the Indian software industry. This contributes substantively to India’s GDP. We can do a similar exercise in the promotion of electronic hardware industry.  I would like to remind the Ministers from the UPA Government here that when the late Rajiv Gandhiji was the Prime Minister, he had announced a policy in this regard.  When the Central Excise Duty on computer and electronic hardware was 22 per cent, he had brought it down to zero per cent, just to promote the electronic and computer industry, which grew during that time immensely. The electronic hardware industry is such an industry, which can generate a lot of employment – not only the skilled employment but also the semi-skilled employment. The economies of the countries like China, Taiwan, Korea and South Korea have grown just because of the promotion of their electronic hardware industry.  Hence, I would request the hon. Finance Minister to bring down the excise duty and some of the taxes, specially for electronic hardware industry to zero so that this industry grows and  our economy grows like that of South Korea, Hong Kong and Taiwan.
          Now, I would like to come to certain Centrally-funded Government schemes, which are not being implemented properly; and thereby, the intended benefits of the schemes do not reach to the poorer sections of the society.  There is a rampant corruption in the selection of the Anganwadi Workers. Their appointment is done by the local MLAs or the representatives appointed by the Guardian  Minister of the State without consulting the local Member of Parliament. This situation should be avoided. The local Member of Parliament should be consulted  while making these appointments.
          Mr. Chairman, Sir, the Central Government initiates several  developmental schemes, which need to be implemented  at the State level. On many occasions, the local MP has to work hard to get the funds from the Central Government, allocated under appropriate schemes.  But it is the local MLA and the State Authorities, who take crucial decisions and oversee the implementation of the schemes.  Under the JNNRUM scheme, the Urban Development Ministry has been spending thousands of crores of rupees on several urban developmental projects. But it is the local Guardian Minister, MLAs and the State Government Authorities, who take the call on what projects should be taken and considered.  This amounts to a gross neglect of the local MP.  Hence, I would request the hon. Finance Minister and the relevant Ministers to implement the schemes in such a way that the sanctity and status of elected Member of Parliament is maintained. In certain parts of urban Pune, which fall under my Constituency, major projects like SRA, BRTS and water distribution schemes are being implemented.  For these initiatives to be really effective, it is imperative that the local MP has a decisive say in the implementation of the schemes. 
          Mr. Chairman, Sir, the PMGSY, Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana, is a 100 per cent Centrally-funded scheme, which provides all-weather road connectivity in rural areas. This has been one of the few successful schemes and has managed to make progress in giving connectivity to far flung areas by providing good quality road.
          My constituency in Maharashtra, Pune has immensely benefited from the successful implementation of this scheme. In order to further take the road connectivity to rural India, we need to increase the scope of this scheme by even bringing those villages which fall outside the core network. There is an urgent need to relax the existing norms of implementing the PMGSY scheme to bring in more and more remote villages to the road network. There are different scales for implementation of PMGSY among the States. As of now, the tenth phase of the PMGSY scheme in Maharashtra is not sanctioned whereas many States have already completed the work of tenth phase and eleventh phase. So, I would like to request the Central Government to sanction the tenth phase of the PMGSY scheme from Maharashtra which is under consideration.
 महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय वित्त मंत्री जी का ध्यान एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर आकर्षित करना चाहूंगा। एमपी लैड स्कीम कोई नयी स्कीम नहीं है। 15-20 सालों से चलती आयी हुई स्कीम है और इस स्कीम के जरिये गांवों गांवों में, बस्तियों में, लोकल एमपी के द्वारा बहुत सारे अच्छे काम किये जाते हैं। पता नहीं कुछ मीडिया के लोग या कुछ विशेषज्ञ ऐसा समझते हैं कि एमपी लैड स्कीम का मतलब भ्रष्टाचार है। मैं नहीं समझता। कई ऐसे एमपीज हैं, उदाहरण के लिए मेरे निर्वाचन क्षेत्र में, मेरे घर पर...( व्यवधान) हर एमपी के घर पर रोजाना 100-200-500 लोग इस आशा में आते हैं कि एमपी साहब की तरफ से हमारे गांव में कुछ पानी की स्कीम हो जाएगी, कुछ पाइप लाइन की स्कीम हो जाएगी, कुछ छोटी सी रोड हो जाएगी। कई ऐसी योजनाएं हैं जो गवर्नमेंट के प्लान में नहीं आतीं। उदाहरण के लिए राज्य सरकार के पास अगर कुछ स्कीम के लिए एप्लाई किया जाए तो उसमें मंजूरी के लिए समय लग जाता है। सारे रोड्स या ये काम नॉन-प्लान होते हैं। इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से विनती करूंगा कि या तो एमपी लैड स्कीम पूरी बंद कर दीजिए या कम से कम 8-10 करोड़ की तो होनी चाहिए।...( व्यवधान) बढ़ती महंगाई के साथ 2 करोड़ का मूल्य पर्याप्त नहीं है। कम से कम 8-10 करोड़ रुपया होना चाहिए। महाराष्ट्र में लोकल विधायक को डेढ़ करोड़ रुपये का फंड मिल जाता है। उससे 6 गुना हमारा चुनाव क्षेत्र होता है। इसलिए सरकार से मैं विनती करूंगा कि इस पर गंभीरता से विचार किया जाए। I would like to come to another important point. In a year of high inflation and record food prices, the Government should have done something substantial by widening the tax limits and increasing the exemption rate. An exemption limit up to Rs.2 lakh to Rs.2.5 lakh would have brought welcome relief to the aam aadmi.
MR. CHAIRMAN :  Please conclude.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Listen, the hon. Minister is sitting there. The Minister of State is sitting there. He is taking note of your point. Please conclude.
… (Interruptions)
सभापति महोदय : आप बैठ जाइए। आपकी बात रिकार्ड में नहीं जाएगी। केवल शिवाजी साहब की बात ही रिकार्ड में जाएगी।
श्री अधलराव पाटील शिवाजी (शिरूर): आदरणीय वित्त मंत्री जी अभी यहां आए हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदय :  आनरेबल मैम्बर को बोलने दीजिए। क्या अभी कोई घोषणा हो सकती है? वे रिप्लाई देंगे या नहीं, उनके ऊपर डिपेंड करता है। आप ऐसे मत कीजिए।
…( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN :  It would not go on record.
(Interruptions) …* श्री अधलराव पाटील शिवाजी : मैं आदरणीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि महाराष्ट्र में हर एमएलए को डेढ़ करोड़ रुपए सालाना लोकल एरिया फंड उपलब्ध होतो है। झारखंड में तीन करोड़ रुपए है और झारखंड में और भी ज्यादा है। मैंने हाउस में विनती की है कि इसे या तो पूरा बंद कीजिए या 8-10 करोड़ तक सीमा बढ़ाइए। एमपीज़ के घर लोग आते हैं, लिटरली टैम्पो या ट्रक में बैठकर 50 लोग आशा से आते हैं और कहते हैं कि गांव में पानी चाहिए।
सभापति महोदय : आप तो रिपीट कर रहे हैं।
…( व्यवधान)
श्री अधलराव पाटील शिवाजी : मुझे पूरी आशा है कि माननीय वित्त मंत्री जी इस समस्या को पूरी तरह समझकर एमपीलैड का फंड कम से कम 8-10 करोड़ रुपए करेंगे।
सभापति महोदय : श्री संजय सिंह चौहान।
श्री अधलराव पाटील शिवाजी : महोदय, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है।
सभापति महोदय : आपकी पार्टी को दिए गए समय से आपने पांच मिनट ज्यादा ले लिए हैं।
श्री अधलराव पाटील शिवाजी : महोदय, मैं दो लाइनों में अपनी बात कह दूंगा। मुझे आशा है कि 25 बैड से ज्यादा के अस्पताल, जो एयरकंडीशन्ड हैं, उन पर सर्विस टैक्स के बारे में आदरणीय मंत्री जी जरूर विचार करेंगे।
          जहां तक ब्रांडिड गारमेंट्स पर एक्साइज डय़ूटी की बात है, इंडिया में गारमेंट इंडस्ट्री की बहुत बुरी हालत है। They are trying to compete with the world market. I would like to request the hon. Minister to roll back the 10 per cent Excise Duty on branded garment.
          Overall, the Budget is a non-event and has not taken any step to ease the burden of aam admi.
श्री संजय सिंह चौहान (बिजनौर): सभापति महोदय, मुझे बहुत लंबी चौड़ी टेक्नीकल स्पीच नहीं देनी है, मुझे आम आदमी की भाषा में अपनी बात कहनी है। जब हम अपने क्षेत्र में जाते हैं तो बहुत उम्मीद के साथ वोटर्स कहते हैं कि इस मुद्दे को संसद में उठाना। उन्हें लगता है कि संसद मे मुद्दा उठाएंगे तो वह हल हो जाएगा। माननीय मंत्री जी पहले भी बैठे थे तो वे सुझाव नोट कर रहे थे। लेकिन दुखद स्थिति यह हुई कि उन्हें किसी काम से जाना पड़ा। बाकी मंत्री जो यहां बैठे थे, जिनका नाम भी आपने लिया था, माननीय सदस्यों ने जो कहा, उन्हें जो भी जरूरी लगे उसे नोट करके मंत्री जी के सामने जरूर रखना चाहिए।
सभापति महोदय : वे नोट कर रहे थे।
SHRI PRANAB MUKHERJEE: We are doing it. We are taking note of it. Even if I am not here, even if I am in my room, I am watching it on the television. Sometimes I have to go to my room to discharge some important business. I can assure you that all the points which you are making are taken due note of by my colleague, whoever is sitting here.
SHRI SANJAY SINGH CHAUHAN :  Thank you, Sir. मैं छोटी सी बात कह रहा हूं कि समस्याएं रखी जाती हैं जैसे सड़क नहीं है, नाली नहीं है, नहरों में पानी नहीं आता, हैंडपंप नहीं हैं, स्कूल में टीचर्स नहीं हैं, स्कूल की छत नहीं है। मेरा कहना है कि अगर जवाब में सिर्फ ये कहें कि जीडीपी बढ़ रही है। 
 जीडीपी बढ़ रही है। Sir I am not a very technical man. Basically I am an advocate.  मैं तर्क के आधार पर एक बात कहना चाहता हूं, जो चीज़ आम आदमी को दिखाई दे रही है। माननीय मंत्री जी जमीन से जुड़े हुए हैं। इस देश के नेता हैं। मैं मोटी सी बात कहना चाहता हूं कि किसान को ट्रैक्टर देने के लिए क्या सुविधा है? कारों से यह देश पट गया। एक घर में मां के पास अलग कार है, बेटे के पास अलग है, बहू के पास अलग है। हमारी गवर्मेंट ने कारों को बढ़ावा देने के लिए पूरी उदारता दिखाई है। बैंकों ने लोन देने में पूरी उदारता दिखाई है। आप ट्रैक्टर के केस मंगवा कर के देख लें कि कितने ट्रैक्टरों के लेनदारी में किसानों की जमीनें नीलाम हो गईं। क्या जैसी कारों लिए आसान पॉलिसी है, जैसी कंप्यूटर के लिए आसान पॉलिसी है, जैसी मोटर साईकिल के लिए आसान पॉलिसी है, ऐसी ट्रैक्टर्स के लिए या एग्रीकल्चर इक्युपमैंटस हैं, हैरो है, टिलर है, रोटेवेटर है, उनके लिए क्यों नहीं हो सकती? किसान क्रेडिट कार्ड बना है, मैं आपके माध्यम से आदरणीय वित्तमंत्री जी का स्वागत करूंगा कि सब्सिडी खत्म करने की बात हो रही है। सब्सिडी को अगर किसान क्रेडिट कार्ड की ही तरह बनाया जाए, जैसे एक उदाहरण है कि यह किसान है उसी के आधार पर डायरेक्ट किसान की सब्सिडी खाते में जो भी तय करें वह जमा करा दें। अरबपती लोग उस सब्सिडी का फायदा उठा रहे हैं, इस चीज़ से बचने की कोशिश होनी चाहिए। एक्ज़ैक्ट आदमी की पहचान हो जाए। क्या ऐसी पॉलिसी माननीय वित्तमंत्री जी नहीं बना सकते हैं? यह तय हुआ था रेल के लिए माननीय ममता बनर्जी ने कल भी कहा। क्या रेलवे को जो इस देश का इतना बड़ा इफ्रास्ट्रक्चर है उसको आप ज्यादा पैसा नहीं दे सकते? जैसे मनरेगा स्कीम है। मनरेगा के बारे में सारे हाऊस ने चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है। हमने अगर कोई योजना बना दी तो इसमें बेइज्ज़ती नहीं होगी कि उसकी समीक्षा दोबारा कर लें। सारा पैसा मिट्टी में मिल गया, मिट्टी में चला गया। उसका मैटीरियल कंपोनेंट नहीं बढ़ने में आ रहे हैं। वह पैसा सही हाथों में नहीं जा रहा है। हम बार-बार चिल्ला के कह रहे हैं कि पेमेंट विदाउट प्रडक्शन हो रहा है, लोग काहिल हो रहे हैं, कामचोर हो रहे हैं, 41 हजार करोड़ रूपया उसका उसमें जा रहा है। अगर इफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने के लिए पीएमजीएसवाई स्कीम थी। मुझे याद नहीं आ रहा है कि किस सरकार की योजना थी। न मैं पक्ष में बोल रहा हूं, न विपक्ष में। वह बहुत शानदार योजना थी। लेकिन आज उसे बिल्कुल अनदेखा कर दिया गया है। जो सड़कें बनी थीं, वे टूट कर पत्थर हो गई हैं। लेकिन पीएमजीएसवाई का कोई इंप्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है। सबसे बड़ी बात जो मैं कहना चाहता हूं कि स्टेट और सैंट्रल रिलेशन्स का आपसी कोर्डीनेशन नहीं है। सारा काम रोक कर सदन में चर्चा कराई जाए। माननीय प्रधानमंत्री जी मीटिंग बुलाते हैं लेकिन बहुत से प्रदेशों के मुख्यमंत्री उस मीटिंग में आते ही नहीं है। राजीव गांधी परियोजना, बिजली परियोजना साढ़े सात हजार करोड़ रूपए दिए गए। हम चिल्लाते-चिल्लातेथक गए। इतना ही कर देते कि एक सांसद को कह देते कि बीस गांवों का काम डायरेक्ट तुम करा लेना। तो हम कम से कम उसे दे तो देते। हम कहते हैं कि राजीव गांधी योजना के पैसे आए होंगे, वे जवाब देते हैं कि हमारे पास नहीं आए कोई पैसे। सब स्टेट्स में यह हाल है जहां गवर्नेन्स नहीं है। चार आल इंडिया इंस्टीटय़ूट्स बनाने की बात हुई थी। आपके यहां आल इंडिया इंस्टीटय़ूट का और सफदरजंग का आपके यहां क्या हाल है? देश के जो भी सरकारी अस्पताल हैं उनका यह हाल कि अगर आपको कैंसर डिटैक्ट हो गया है तो आपको ऑपरेशन की डेट छह महीने बाद की देते हैं । आपके हार्ट में प्रॉब्लम है, तो चार महीने बाद की डेट देते हैं कि आप दोबारा दिखाने आ जाना। हमारा इफ्रास्ट्रक्चर टोटली फेल हो गया है। किसान की बात आप बार-बार करते हैं। किसान को तो आप जो सब्सिडी डायरेक्ट दे सकते हैं, वह दें। उसकी उपज का मूल्य सही मिले। ये बीच के दलाल और फॉरवर्ड ट्रेडिंग खत्म होनी चाहिए। इस बात पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा और सख्ती से काम करना पड़ेगा। मैं समझता हूं कि बिना इकबाल के कोई सरकार चल नहीं सकती है। 
एमपीलैड पर कितना खर्चा हो रहा है, जो लोग इतना शोर मचा रहे हैं? मैं बताना चाहता हूं कि हम सबको मिलाकर करीब 750 सांसद हैं। दो करोड़ के हिसाब से लगभग 1500 करोड़ रुपये बनते हैं। मैं दावे का साथ कह सकता हूं कि सिर्फ एक यही योजना है, जो सही तरीके से चल रही है और सब योजनाएं बेकार हैं। यदि 1500 करोड़ के बजाय आप इसे 15 हजार करोड़ कर दें तो इसका आपको डेढ़ लाख करोड़ रुपये के बराबर फायदा होगा और जहां आप डेढ़ लाख करोड़ रुपये लगा रहे हैं, वहां आपको 15 हजार करोड़ रुपये का भी फायदा नहीं होगा। यह क्लियर कट है, आदमी की जवाबदेही है। कोई सासंद बेईमानी नहीं कर सकता। अगर करेगा तो जनता हिसाब मांगकर उसका बिस्तरा बांधकर भेज देगी। इससे ज्यादा जवाबदेही का काम और कोई नहीं है।
          मेरा निवेदन है कि बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की चार-पांच चीजें सड़कें, रेल, एमपीलैड आदि हैं, इन पर माननीय मंत्री जी पूरा ध्यान दें और जब वह जवाब दें तो हमने उनसे जो आशा बांधी है, वह किसी हद तक पूरी हो। 
           
*DR. RATTAN SINGH AJNALA (KHADOOR SAHIB): Hon’ble Chairman Sir, I thank you for providing me the opportunity to participate in the debate on the General Budget, 2011-12.  Sir, 63 years have passed since we attained independence.  General Budget is presented every year in this august House. The first Budget presented after independence had a Budget outlay of Rs.193 crores.  The population of India at that time was 135 crores.  The Budget for the year 2011-12 has an outlay of Rs.12,47,944 crores and our population has increased by leaps and bounds to 120 crores.  Sir, poverty has also increased considerably since we attained independence.  There is rampant corruption everywhere. Hence, the Budget generally fails to make any positive impact on the common man.
          Sir, I fail to understand as to whose interest is protected by this Budget presented by Hon’ble Finance Minister.  The poor, the labourers, the farmers and the downtrodden will not gain anything from this Budget.  This is a pro-corporate Budget.  It caters to the affluent and rich sections of society.  The poor and the downtrodden have been conveniently ignored in this Budget.
          Chairman Sir, it is rather surprising that even after we attained our independence, poverty has increased sharply.  The gulf between the rich and the poor has widened.  Poor people have been left in the lurch.  They are leading miserable lives and dying of hunger and starvation.
          Sir, the majority of people in India live in villages.  Agriculture or farming is the backbone of rural economy. But, the Government has turned a blind eye to their problems.  Approx. 5000 tonnes of foodgrains rots in the Government godowns.  This never reaches the needy and the poor.  Last year, the Government had kept Rs.56,000 crores as food subsidies.  However, for the construction of   * English translation of the speech originally delivered in Punjabi   godowns, only a paltry amount of RS.40 crores was earmarked.  This year, the Government has allotted 60,572 crores for food subsidies.  Again, hardly 42 crores have been granted for the construction of godowns.  It is evident that the priorities of the Government are lop-sided.  Unless we have adequate number of godowns for the storage of foodgrains, these are bound to rot in the open. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN :  Hon. Member, please wait a second. Is it the sense of the House that the time for today’s discussion should be extended till the business is over?
THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Let it be extended till the hon. Member completes his speech.
MR. CHAIRMAN: Then, the House will take up ‘Zero Hour’ SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
DR. RATTAN SINGH AJNALA (KHADOOR SAHIB):     Chairman Sir, silos are constructed by rich contractors.  Even this amount will go to these rich people.  The poor farmers will not gain anything. 
          Sir, the cost of keeping the buffer stock of foodgrains safely is approx. Rs.11 crores per day.  There is another stock of foodgrains which is in addition to the buffer category. The Government spends Rs.4000 crores annually for the maintenance of this stock of foodgrains.  This stock sometimes rots.  It is then of no use.  However, the Government is not ready to distribute this stock of foodgrains to the poor and the needy.  Hon’ble Supreme Court has had to intervene in this matter.  However, despite the rulings of the Supreme Court, the Government has refused to abide by its directions.
MR. CHAIRMAN:  Hon’ble member, just a second. It is the sense of the House that the time of this discussion may be extended by another five minutes, till the speech of Hon’ble member is finished.  Then we will take Zero Hour.
DR. RATTAN SINGH AJNALA : Chairman Sir, the Government is spending a whopping sum of Rs.4000 crores for the upkeep of a stock of foodgrains that is in addition to the buffer stocks.  This should be distributed among the poor and the deprived sections.  The poor will get two square meals a day whereas the Government will be able to utilize Rs.4000 crores for some other purpose.
          Sir, 7000 poor people die daily due to lack of food.  Still, the Government is adamant and refuses to distribute additional stock of foodgrains among the poverty-ridden masses.  Why is the Government so short-sighted?  Why does it let the foodgrains rot instead of judiciously utilizing it for the poor?
         Sir, the Government makes tall claims about the Minimum Support Price.  The MSP of wheat is hardly Rs.1080 per quintal. This is a pittance.  The farmer spends much more from his pocket per hectare. It comes out to be approx. Rs.48,756 per hectare, whereas the income of the farmer per hectare is only Rs. 45,665. The farmer suffers a loss. Who will compensate him for this loss?  We have been demanding that the system of MSP should be done away with.  Instead, it should be linked to the price-index. Let the price-index take care of it. MSP is a loss-making venture for the farmers.  Every year, a measly amount of Rs.10/- or Rs.20/- is increased in the MSP. It is of no use.
18.00 hrs.           Sir, the Government announces the MSP of wheat at Rs.1080/- per quintal. However, wheat-flour is sold in the market at a rate of Rs.18 to Rs.25 per Kg.  this actually means a loss of 213% to the farmers. Neither the farmer, nor the consumer benefits from this system.  Only the middlemen reap all the profits.  But, the Government conveniently looks the other way.

          Sir, corruption is eating into the vitals of our society and economy. There is rampant corruption every where.  According to one estimate, approx.  Rs.90 lakh crores of Black Money is stashed in foreign bank accounts.

MR. CHAIRMAN  Please conclude.

DR. RATTAN SINGH AJNALA : Since 1947, this Black Money is being stashed away in foreign bank accounts by offenders.  The Government should approach the concerned countries and bring back this astronomical amount to India.  Our entire Budget can become tax-free if the entire amount of Black Money is brought back to India and utilized judiciously.   Why are we protecting these tax-offenders? Sir, prior to independence, the white people indulged in loot and plunder of the public money.  After we attained independence, a class of our own country-men have started indulging in the same loot and plunder of public money.  Nothing has changed.

          Sir, this money belongs to the citizens of this country.  This is the money of the poor Indians.  This whopping sum must be brought to India and utilised for the welfare of the poor and mariginalised sections of society.

MR. CHAIRMAN  Please wind up your speech.

… (Interruptions)

DR. RATTAN SINGH AJNALA : …* MR. CHAIRMAN :  This is unfair.

THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF WATER RESOURCES (SHRI PAWAN KUMAR BANSAL): Sir, this is casting an aspersion on the Chair.

सभापति महोदय :  आपको मालूम है कि आपका एलॉटेड टाइम कितना है? आपका एलॉटेड टाइम चार मिनट है, लेकिन you have taken more than 15 minutes.

… (Interruptions)

DR. RATTAN SINGH AJNALA : Sir, kindly give me two minutes more.

 Sir, Punjab has hardly 1.5% of the total land area of the country. However, we contribute approx 60% foodgrains in the central pool.  It is by the dint of the sweat and blood of the hard-working farmers of Punjab. But, what have they got in return? Absolutely nothing.

          Sir, all facilities are being given to Himachal Pradesh, J&K, Uttarakhand and Haryana. Their industries have been made tax-free.  But, step-motherly treatment has been meted out to Punjab. As a result, our industries are in shambles or they have migrated to the neighbouring states to avail the benefits being provided there.

          Sir, we in Shiromani Akali Dal, demand that there should be extension of such facilities from Ludhiana to Amritsar.  Even this is not being done by the Government.

          Chairman Sir, the water-table is rapidly going down in Punjab.  The situation has assumed alarming proportion. In the times to come, we will be staring at an extraordinary situation of grave water-crisis.  Time and again, we have demanded a special package for augmenting our irrigation system, but to no avail.

          Sir, Punjab is reeling under the debt of Rs.70,000 crores.  How has the situation come to such a pass? During the years of terrorism in Punjab, this amount was foisted on us.  We fought the nation’s battle against terrorism.  Our people lost their lives in the war against terrorism.

MR. CHAIRMAN  Please conclude.

DR. RATTAN SINGH AJNALA : Sir, the centre must waive off this entire amount of Rs.70,000 cores which has become a burden on Punjab.  This is the least a grateful nation can do for Punjab.

          Sir, the farmers are in a miserable condition.  They are committing suicides.  They are suffering massive losses.  However, the Government has turned a blind eye towards their agony. The Government must give a compensation and relief package to the farmers of Punjab immediately.  Their loans should be waived off.  Who else will come to their rescue?  Who else will provide relief and succor to Punjab?

          Sir, I humbly appeal to the Hon’ble Finance Minister to provide justice to Punjab and to waive off the loan of Rs.70,000 crores that has become a burden and a drag on Punjab.

           

MR. CHAIRMAN: The remarks the hon. Member made against the Chair should not go on record.