State Consumer Disputes Redressal Commission
P N B vs Bhagwati Prasad Maurya on 19 December, 2023
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2005/2101 ( Date of Filing : 09 Dec 2005 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. P N B a ...........Appellant(s) Versus 1. Bhagwati Prasad Maurya a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY MEMBER PRESENT: Dated : 19 Dec 2023 Final Order / Judgement
मौखिक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ०प्र० लखनऊ अपील संख्या- 2101/2005 जनरल मैनेजर, पंजाब नेशनल बैंक लखनऊ व एक अन्य बनाम भगवती प्रसाद मौर्या समक्ष:-
माननीय श्री सुशील कुमार, सदस्य माननीय श्रीमती सुधा उपाध्याय, सदस्या अपीलार्थी की ओर से उपस्थित: विद्वान अधिवक्ता श्री राजीव भटनागर प्रत्यर्थी की ओर से : कोई उपस्थित नहीं।
दिनांक- 19.12.2023 माननीय सदस्या श्रीमती सुधा उपाध्याय द्वारा उदघोषित प्रस्तुत अपील, अपीलार्थी पंजाब नेशनल बैंक की ओर से विद्वान जिला आयोग, द्धितीय लखनऊ द्वारा परिवाद संख्या- 306/2003 भगवती प्रसाद मौर्या बनाम पंजाब नेशनल बैंक में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक- 07-11-2005 के विरूद्ध योजित की गयी है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री राजीव भटनागर उपस्थित हुए। प्रत्यर्थी की ओर से कोई उपस्थित नहीं है।
पीठ द्वारा केवल अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता के तर्क को सुना गया तथा पत्रावली पर उपलब्ध समस्त प्रपत्रों का सम्यक रूप से परिशीलन किया गया।2
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने दिनांक 09-12-1977 को फिक्स डिजाजिट योजना के अन्तर्गत रू० 20,000/-रू० जमा करने का कथन किया है परन्तु उसके सन्दर्भ में कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया है।
जिला आयोग द्वारा पारित निर्णय के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि एफ०डी०आर० से संबंधित दस्तावेज के सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं दिया गया है परन्तु प्रत्यर्थी/परिवादी का यह कथन रहा है कि एफ०डी०आर० की मूल प्रति बैंक प्रबन्धक द्वारा फाड़कर फेंक दी गयी थी अत: इस स्थिति में एफ०डी०आर० के सम्बन्ध में जिला उपभोक्ता आयोग के समक्ष परिवाद के साथ प्रस्तुत करने का कोई अवसर नहीं था। परिवाद पत्र में वर्णित तथ्यों का खण्डन जिला उपभोक्ता आयोग के समक्ष नहीं किया गया है।
अपीलार्थी/विपक्षी का तर्क है कि उन्हें कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुयी है, परन्तु जिला आयोग द्वारा अपने निर्णय में अंकित किया गया है कि पंजीकृत डाक से नोटिस विपक्षी को प्रेषित की गयी थी जो वापस प्राप्त नहीं हुयी इसलिए नोटिस का तामीला उन पर पर्याप्त मानते हुए एकतरफा सुनवाई की गयी।
भारतीय संहिता की धारा 114 के अन्तर्गत यह अवधारणा की जा सकती है कि सभी न्यायिक कार्य उसी अनुरूप सम्पादित हुए हैं जिस अनुरूप सम्पादित होना वर्णित है। चूंकि जिला उपभोक्ता आयोग ने निर्णय में यह अंकित किया है कि नोटिस पंजीकृत डाक से भेजी है अत: यह कहा जा सकता है कि यथार्थ में नोटिस भेजी गयी और वापस प्राप्त न होने पर यह उपधारणा की जा सकती है कि यदि 30 दिन के अन्दर 3 नोटिस वापस प्राप्त नहीं हुयी है तब तामीला पर्याप्त माना जाएगा। चॅूंकि परिवाद पत्र में वर्णित तथ्यों का कोई खण्डन अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा नहीं की गया है, इसी प्रकार प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत शपथ-पत्र का भी कोई खण्डन नहीं किया गया है। अत: अखण्डनीय साक्ष्य के आधार पर जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा जो निष्कर्ष दिया गया है वह विधि सम्मत है।
अत: अपीलार्थी/विपक्षी के विद्वान अधिवक्ता का यह कहना कि दिनांक 09-12-1977 को प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा कोई एफ०डी०आर० नहीं बनवाया गया है यदि बनवाया गया है तो उसका भुगतान कर दिया गया है, यह अपीलार्थी द्वारा इस आयोग के समक्ष अपने अभिलेखों द्वारा साबित किया जा सकता था। परन्तु भुगतान के सम्बन्ध में अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया है अत: केवल मौखिक तर्क के आधार पर यह निष्कर्ष देना सम्भव नहीं है कि दिनांक 09-12-1977 को प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा कोई एफ०डी०आर० नहीं बनवाया गया है यदि बनवाया गया है तो उसका भुगतान किया जा चुका है।
अपीलार्थी/विपक्षी बैंक के विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि दिनांक 09-12-1977 को एक सावधि जमा योजना के अन्तर्गत 20,000/-रू० 61 माह के लिए जमा किया था। इस अवधि के पश्चात 02 दो वर्ष के अन्दर परिवाद प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। चूंकि प्रत्यर्थी/परिवादी का यह कथन रहा है कि उसका धन बैंक में अवशेष रहा है अत: बैंक में धन अवशेष रहने की स्थिति में वाद का कारण निरन्तर बना रहा। बैंक में जमा राशि को प्राप्त करने के लिए कोई 4 समयावधि विधि के अन्तर्गत संस्थित नहीं है। अत: अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता के इस तर्क में कोई बल नहीं है कि परिवाद समयावधि से बाधित है। जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय को परिवर्तित करने लायक कोई आधार इस पीठ के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है।
उपरोक्त समस्त तथ्यों एवं साक्ष्यों पर विचार करने के उपरान्त पीठ इस मत की है जिला आयोग द्वारा समस्त तथ्यों एवं साक्ष्यों को उचित ढंग से विश्लेषित करते निर्णय एवं आदेश पारित किया गया है जिसमें हमारे विचार से किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती है तदनुसार प्रस्तुत अपील निरस्त किये जाने योग्य है।
आदेश प्रस्तुत अपील निरस्त की जाती है। उभय-पक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
प्रस्तुत अपील में अपीलार्थी द्वारा यदि कोई धनराशि जमा की गयी हो तो उक्त जमा धनराशि अर्जित ब्याज सहित संबंधित जिला आयोग को यथाशीघ्र विधि के अनुसार वापस की जाए।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(सुधा उपाध्याय) (सुशील कुमार) सदस्य सदस्य कृष्णा-आशु0 कोर्ट नं0 3 [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY] MEMBER