Lok Sabha Debates
Discussion On The Motion For Consideration Of The Provision Of Social Security To ... on 7 December, 2012
> Title: Discussion on the motion for consideration of the Provision of Social Security to Senior Citizens Bill, 2010 (Discussion not concluded).
MADAM CHAIRMAN: The House shall now take up Item No. 76. Shri J.P. Agarwal.
श्री जय प्रकाश अग्रवाल (उत्तर पूर्व दिल्ली): मैं प्रस्ताव करता हूं:
“कि वरिष्ठ नागरिकें के लिए सामाजिक सुरक्षा का उपबंध विधेयक, 2010 पर विचार किया जाए।” माननीय सभापति महोदया, मुझे बहुत खुशी है क्योंकि मैं बहुत दिन से कोशिश में था कि यह बिल किसी तरह पेश कर सकूं। मैं आज बहुत खुश हूं कि मुझे आज यह बताने का मौका मिला कि मैं जिन लोगों के लिए बात कहना चाहता हूं, वे किन हालात में हैं। यह बिल सीधा उनसे जुड़ता है। सवाल यह नहीं है कि हम सिर्फ सीनियर सिटीजन्स की पेंशन के बारे में बात कह रहे हैं। सवाल यह है कि वे किन हालात में हैं और वे हमसे क्या अपेक्षा करते हैं? कानून जो पहले से बने हुए हैं, क्या उनमें किसी सुधार की जरूरत है? अगर जरूरत है तो हम कहां तक सुधार कर पाए? हमने कहां तक कोशिश की कि हम उन्हें छू सकें? वे लोग जिनके लिए मैं यह बिल लाया हूं, उनके पास पैसा नहीं है। वे एक ऐसी उम्र पर आ गए हैं, पड़ाव पर आ गए हैं कि उनको सहारे की जरूरत है फिर चाहे वह सहारा घरवालों से मिले या सरकार से मिले। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी और भी ज्यादा हो जाती है क्योंकि वे इस देश के नागरिक हैं। वे ऐसे हालात में हैं और सरकार को उनकी तरफ देखना चाहिए और उनके लिए साधन जुटाने चाहिए, कानून बनाने चाहिए ताकि उन्हें फायदा मिल सके। ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें मां-बाप की संज्ञा भी दी जा सकती है। चाहे वे जिंदा हैं, कई जगह दो में से एक जिंदा है, उनके पास कोई साधन नहीं है, सारा दिन वे सड़क पर रहते हैं, पार्क में रहते हैं और उनके पास खाने के लिए रोटी नहीं है। हमने भगवान तो नहीं देखा लेकिन हम सीनियर सिटीजन्स के रूप में मां-बाप देखे हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया। ये वे लोग हैं जो खुद दुख सहते हैं ताकि उनके बच्चों का समाज या परिवार खुशहाल रह सके, तंदुरुस्त रहे। उनके बच्चे इज्जत और नाम कमाएं। वे लोग हैं, जो सारा जीवन काम करते हैं। मेहनत करते हैं। अपनी स्कूलिंग खत्म करने के बाद वे जो जो भी काम करते हैं, वह सीधा परिवार और देश के साथ जुड़ता है। अगर वे किसी फैक्ट्री में काम करते हैं, तो पैदावार करते हैं। पैदावार करते हैं, तो वह सामान बिकता है। सामान बिकता है तो देश की प्रोडक्शन के साथ जुड़ता है। वे जो कमा कर लाते हैं, वह परिवार की आमदनी के साथ जुड़ता है। उन्होंने अपना सारा जीवन देश और और समाज को किसी न किसी रूप में दिया है।
कोई सैनिक है, कोई पुलिस वाला है या कोई सरकारी कर्मचारी है, कहीं न कहीं वह कार्यरत रहे और उन्होंने अपना जीवन इस देश या परिवार के लिए समर्पित किया है।
आज जरूरत है और इनको दो हिस्सों में भी बांटा जा सकता है। हमारे कुछ ऐसे परिवार हैं, जो बीपीएल में भी आते हैं, उनके हालात और भी बदतर हैं। कुछ ऐसे हैं, जो पैसे वाले परिवार हैं। जिनके पास पैसा है, वे अपने साधन रख सकते है, वे अपना पैसा खर्च कर सकते हैं, वे ऐशो-आराम में जी सकते हैं। लेकिन उसके बनिस्पद बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो आज बहुत बुरी स्थिति में हैं। मैं आंकड़ों के साथ उन्हीं की बात आपके सामने पेश करना चाहता हूँ।
मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने कुछ दिन पहले राज्य सभा में फ्रीडम फाइटर्स के बारे में एक सवाल उठाया था। इस संबंध में उस समय के गृहमंत्री जी से मेरी तीखी झड़प हुई थी कि हम उन्हें सिर्फ 4000 रूपये की पेंशन देते हैं जिन्होंने इस देश की आज़ादी के लिए अपनी जान दे दी। सरकार ने उसको बढ़ा कर 10 हज़ार रूपये या 15 हज़ार रूपये किया है और कुछ और साधन भी उनके लिए बढ़ाए थे। आज भी वही वख्त है। फिर वह समय है, जब हम कोई फ़ैसला ले सकते हैं।
इस हाउस की जो परिपाटी चली हुई है, कि कोई भी प्राइवेट मेंबर बिल हम पेश करते हैं, आखिर में खड़े हो कर हमें उसे वापस लेना पड़ता है। शायद मैं सरकार से अनुरोध करूंगा, दरख्वास्त करूंगा कि वे इस बिल को मानें, अडाप्ट करें और कोशिश करें कि वे मेरी इस बात को मान जाएं और इसमें सुधार करें।
यह सामाजिक व्यवस्था में एक खराबी भी कही जा सकती है। आज की हमारी जो सामाजिक व्यवस्था है, वह यह है कि शायद उन परिवारों में पैसा नहीं है। जितना कमाते हैं, उतना खर्च करते हैं। वह खर्च करने के साथ-साथ, वे अपने बूढ़े माँ-बाप की तरफ ध्यान कम देते हैं, कम तवज्जो देते हैं। सामाजिक परिस्थिति ऐसी हो गई है, जिसमें सरकार का दायित्व और ज्यादा बढ़ गया है। ताकि वह सरकार उनके लिए और साधन मुहैया करा सके। मुझे लगता है कि आज के समय में यह बहुत कम है।
मैं एक छोटा सा उदाहरण आपके सामने देना चहाता हूँ कि जो दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी है, वह तकरीबन 500 या हज़ार रूपये देती है। माफ़ कीजिए आज के समय में हज़ार रूपये किसी एक आदमी को गुज़ारे लायक, एक वक्त की रोटी के लिए, रहने के लिए, मेडिकल फैसिलिटीज़ के लिए या आने जाने के लिए बिल्कुल नाकाफी है। उसके अलावा कोई और पेंशन दी जाती है, जो कि शायद 1500 रूपये है या शायद मंत्री जी के यहां से कुछ लोगों की पेंशन बंधी हुई है। मैं आपके सामने यही रखना चाहता हूँ कि हम इस परिस्थिति को किसी तरह बदल सकें।
अब इसके दो-तीन-चार पहलू हैं। ये कौन लोग हैं? कितने हैं? हम इनको क्या देते हैं औ ये हमसे क्या मदद की अपेक्षा करते हैं? इसकी कई जगह बहुत सारी व्याख्या दी गयी है कि आप सीनियर सिटीजन किसे कहेंगे, वे कौन लोग हैं? मैंने कई देशों की अलग-अलग व्याख्या पढ़ी। किसी में तो यह कहा गया कि जहां भी वह काम करता है, अगर वहां से रिटायर हो जाता है और अगर उसकी उम्र 50 साल भी है तो भी वह सीनियर सिटीजन की कैटेगरी में आयेगा और उसे वे सारे बैनीफिट्स मिलने चाहिए, जो सरकार देती है। यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका ने 65 वर्ष उम्र रखी है, यू.के. में 60 साल उम्र रखी है, तकरीबन 50 साल से ऊपर के जो लोग हैं, अलग-अलग देशों ने अलग-अलग कानून के साथ उसकी व्याख्या की है और उन्हें सीनियर सिटीजन की कैटेगरी में रखा है और उसके अनुसार उन्होंने अपने कानून में भी अलग-अलग तब्दीलियां की हैं। अब बात आती है कि कितना पैसा उन्हें मिल रहा है। वर्ल्ड लेबर रिपोर्ट 2000 में यह बताया गया है कि जीडीपी के हिसाब से वर्ष 1996 के आंकड़े, माफ करना मैं एक बात और आपके सामने रखना चाहता हूं कि यह बड़ा अजीब लगता है कि जब भी हम कोई रिपोर्ट पढ़ते हैं, जब भी हम कहीं से कोई आंकड़े निकालते हैं, तो आपको आज की तारीख के आंकड़े कहीं नहीं मिलेंगे। मैंने कोशिश की, पिछले दस साल के आंकड़े हमारे पास नहीं है, जीडीपी के हिसाब से जो सबसे पुराना आंकड़ा उपलब्ध है, परसेंटेज के हिसाब से जो पैसा दिया जा रहा है, वह वर्ष 1996 के आंकड़ों के आधार पर दिया जा रहा है। मैंने डाटा इकट्ठा किया है, इसलिए मैं उसे आपके सामने रखना चाहता हूं। हिन्दुस्तान में वह 1.88 परसेंट है, श्रीलंका में 4.7 परसेंट है, मलेशिया में 2.9 परसेंट है, चाइना में 3.6 परसेंट है, अर्जेंटीना में 12.4 परसेंट है, ब्राजील में 12.2 परसेंट है। मैं यह कहना चाहता हूं कि इन सारे देशों के मुकाबले हिन्दुस्तान में हम उनको सबसे कम पैसा दे रहे हैं या जो भी साधन दे रहे हैं, वह सारा मिलाकर नाकाफी है और हमें उसे बढ़ाना चाहिए। यह अच्छा नहीं लगता कि हमसे भी बहुत छोटे-छोटे देश, हमसे कमजोर देश, जिनके साधन कम हैं, जिनकी जीडीपी कम हैं, जिनका प्रोडेक्शन कम है, वे बुजुर्ग लोगों की तरफ ज्यादा तवज्जो दें, हम इतना बड़ा मुल्क, जिसकी आबादी सौ करोड़ से भी ज्यादा है और जिसका 12 लाख करोड़ रूपये का बजट है, वह उतना पैसा उन लोगों के लिए नहीं रखता। मुझे इस बात का अफसोस है और मैं आशा करता हूं कि सरकार इस ओर जरूर ध्यान देगी।
अब मैं आपके सामने सीनियर सिटीजन के आंकड़े रखना चाहता हूं। हमारे पास आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। मैंने पता करने की बहुत कोशिश की, कई बार मैंने जवाब भी मांगा तो उन्होंने यह कहा कि हमारे पास पूरे हिन्दुस्तान का आंकड़ा नहीं है, किसी एक जगह का आंकड़ा उन्होंने दिया, जो मेरे लिए नाकाफी था। मैंने और देशों के आंकड़े इकट्ठा किये हैं कि कहां कितने परसेंट सीनियर सिटीजन हैं? जापान में 14 परसेंट हैं, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में 12 परसेंट हैं, स्वीडन में 18 परसेंट हैं, ग्रेट ब्रिटेन में 16 परसेंट हैं, आस्ट्रेलिया में 12 परसेंट हैं, हालैंड में 20 परसेंट हैं, तकरीबन किसी भी देश की 20 परसेंट की आबादी सीनियर सिटीजन में आती है। जितना उनका बजट है, उसके हिसाब से वे तकरीबन अपना पैसा उन लोगों के ऊपर खर्च करते हैं या उनकी रिटायरमेंट्स स्कीम्स के ऊपर या बैनीफिट्स पर उन्हें देते हैं। इसके साथ-साथ हमारी जो पॉपुलेशन है, मुझे नहीं मालूम कि ये आंकड़े सही हैं या कितने सही हैं और क्यों सही नहीं हैं, और जगह आपने देखा होगा की 20 परसेंट है, तो आपको यह जानकर बहुत ताज्जुब होगा कि हमारे यहां 60 साल से ऊपर के जिन लोगों की गिनती, नेट पर ये आंकड़े उपलब्ध हैं, आध्र प्रदेश में इन्होंने लिखा है कि सिर्फ 7.6 परसेंट हैं। अरुणाचल प्रदेश में 4.5औ है, असम में 5.8औ है, बिहार में 6.6औ है। उसके बाद दिल्ली में 5.2औ है, गोवा में 8.3औ है। और भी जगह के जितने आँकड़े इन्होंने यहाँ दिये हैं, सिवाय केरल के जहाँ 10औ है, बाकी जगह तकरीबन 7.5औ, 6औ या 8औ के नीचे हैं जो फिगर मुझे लगता है कि किसी भी सूरत में सही नहीं हो सकती। या तो हम यह मानें कि रिटायरमैंट एज के बाद उनका लाइफ स्पैन बहुत कम है। हम यह मानें कि रिटायर होने के बाद दो-चार या पाँच साल में उनका जीवन खत्म हो जाता है। मुझे नहीं लगता कि ये आँकड़े सीनियर सिटिज़न्स के हिसाब से किसी भी सूरत में सही होंगे। मेरी आपके द्वारा सरकार से पुरज़ोर मांग है, यदि सरकार के मंत्रियों के कान में मेरी बात जा रही हो, कि वे ज़रूर इस ओर ध्यान दें क्योंकि ये आँकड़े मुझे नहीं लगता कि सही हैं और अगर कहीं कोई इंटरनेशनल फोरम पर इन चीजों को देखेगा तो बहुत ताज्जुब करेगा या वह सोचेगा कि इनकी इतनी बुरी स्थिति है कि वे वरिष्ठ नागरिक होने के पाँच साल में या दस साल में मर जाते हैं।
सभापति महोदया : सबका ध्यान अच्छी तरह से आपके विषय पर है क्योंकि सबको उस कैटागरी में कभी न कभी जाना है। आप चिन्ता न करें।
श्री जय प्रकाश अग्रवाल : सभापति महोदया, इस संबंध में सरकार की बहुत सारी स्कीम्स हैं। As per the 2001 Census, total population of senior citizens was 7.7 crore. It is about seven or eight per cent. उसके बाद इन्होंने उसका अलग अलग डिविज़न दिया है। अब मैं आपके सामने कुछ चीज़ें रखना चाहता हूँ कि जो अनइंप्लॉइड हैं, ओल्ड एज सिकनैस और डिसएबल्ड में हैं, जिस तरह कांस्टीटय़ूशन के आर्टिकल 41 में इन्होंने डेस्क्रिप्शन दिया है और उसके साथ जो मेरे मुद्दे हैं, Officially in the United Nations, subsequently the United Nations General Assembly, while adopting the universal declaration of human right, also recognized the right to social security, जो यूएन ने अलग-अलग देशों के लिए एक रिज़ॉल्यूशन एडॉप्ट किया कि इन लोगों का हमें ध्यान रखना चाहिए। उसके बाद सोशल सिक्यूरिटी पर मैंने आपके सामने आँकड़े रखे कि कितना पैसा कौन सा देश खर्च कर रहा है। उसके बाद है - In a world, where the joint families are breaking down, the children are unable to take care of their parents. Millions of elderly face destitution. उसके बाद है - Life expectancy is increasing while birth rates are on the decline. The share of population above the age of 60 is growing at a rapid rate. यह और जगह है, हमारे यहाँ यह नहीं है, जिसके आँकड़े अभी मैंने आपके सामने रखे। Population worldwide are ageing. In India, while the total population is expected to rise by 49 per cent to 1263.5 million in 2016, the number of aged persons aged 60 and above is expected to increase by 107 per cent from 54.7 million to 113 million.
The organized and unorganized sectors get the benefit of adequate Provident Fund, Old-age Pension Fund and National Senior Citizen Fund to live a reasonable decent line in their old-age. The amount of old-age pension which was Rs.500 until recently should be increased. 500 रुपये की जगह इन्होंने इसको 1000 रुपये कर दिया है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ।
एक सर्कुलर प्रॉविडैन्ट फंड का निकला है जिसका उल्लेख मैं यहाँ करना चाहता हूँ जिसमें वहाँ के कमिश्नर ने यह कहा कि जो लोग या कंपनियाँ प्रॉविडैन्ट फंड का पैसा काटती हैं, लेकिन वे जमा नहीं करतीं, उनको उन्होंने माफ कर दिया कि उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। मैं मंत्री जी से दर्ख्वास्त करूँगा कि यह कौन सा कमिश्नर है प्रॉविडैन्ट फंड का और किस धारा के तहत उसने यह कह दिया? यह सरकारी पैसा है। प्रोविडेण्ट फण्ड का पैसा काटा जाता है, उस गरीब मजदूर से काटा जाता है, वह इसलिए कि बाद में उसको उसके बैनीफिट दिए जा सकें। उसने यह कहा कि जो एम्पलोयर है, अगर वह बैंकों में पैसा जमा नहीं कर रहा है, उसको उसमें माफ कर दिया। मैं चाहता हूं कि आप इस पर कानूनी कार्रवाई ज़रूर करें।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री पी.बलराम नायक): यह लैबर डिपार्टमेंट के तहत आता है।
श्री जय प्रकाश अग्रवाल : किसी डिपार्टमेंट में आता हो, यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप देखें कि वह सीनियर सीटिजन का पैसा उस तक पहुंच जाए और इस तरह का आर्डर कोई भी पास न कर सके। इस पर मुझे बहुत सख्त एतराज़ है। In the developed countries like Canada, the amount of full monthly pension that may be paid to any person per month is 273 dollar and 80 cent per month. अब आप अंदाजा लगाइए कि यहां जो मिल रहा है और वहां जो मिल रहा है, उसमें ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। मुझे लगता है कि हम रोज़ की कार्रवाई की तरह से इसे लेते हैं और यह समझते हैं कि हमने पांच सौ से हजार रुपये कर दिए तो यह जो बूढ़े मां-बाप सीनियर सीटिजन हैं, इनका गुज़ारा हो जाएगा। आपने कभी उनकी हालत देखी है कि वह किस तरह से पेंशन के फार्म भरकर लाते हैं। माफ करना आप भी उन पर साइन करती होंगी। उस फार्म में उनकी सारी जायदाद लिखवा ली जाती है, उनके आई कार्ड की फोटोकॉपी लगवा लेते हैं। जब बैंक एकाउंट खुलवाने की बात आती है तो उनसे बैंक गारण्टी मांगते हैं और देते हैं केवल हजार रुपये। उसके बाद भी जब तक वह डिपार्टमेंट के सौ चक्कर नहीं लगा लेता है, वह गरीब, कमजोर और बुजुर्ग आदमी, तब तक उनको पेंशन नहीं मिलती है। आप निकाल कर देख सकते हैं कि जिस एजेंसी ने भी पेंशन देनी है, क्या वह मंथली पेंशन उनको देते हैं? मेरे पास दिल्ली का आंकड़ा है। दिल्ली म्यूनिसिपल कार्पोरेशन को जो पेंशन देनी थी, वह नौ-नौ महीने, अभी भी छः महीने की पेंशन बाकी है। आप बंद करें जो पैसा आप कहीं और खर्च करते हैं। इसके लिए किसी भी इन्स्टीटय़ूशन के ऊपर कानूनी पाबंदी होनी चाहिए, जिनकी जिम्मेदारी है गरीब आदमी को पैसा देने की। आप उनको क्या कहना चाहते हैं कि जो पेंशन हमें तुम्हें हजार रुपये देनी है, उसकी रोटी छः महीने बाद खाना। छः महीने आप भूखे सो, छः महीने तुम कपड़े मत पहनो, छः महीने किसी पार्क में जाकर किसी पेड़ से बंध कर खड़े हो जाओ, तुम्हें भूख नहीं लगेगी, तुम्हें खाने की जरूरत नहीं है, कपड़े की जरूरत नहीं है। तो माफ करना हम कई बार बहुत बड़े-बड़े काम करते समय इन गरीब आदमियों की आत्माओं को नहीं देखते, इनकी तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि यह वह लोग हैं जिन्होंने जीवन दिया है, यह चले जाएंगे, लेकिन हमें जीवन दे गए। क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि जो लोग भी इस तरह का काम करते हैं, उनके ऊपर हम इतनी सख्त निगाह रखें कि वह कानून की धारा से डरें और इस तरह के काम न करें। एक दिन भी उनमें से अगर कोई भूखा सोता है तो माफ करना यह हमारे लिए सबसे बड़ी लानत की बात होगी कि 60-65 साल का आदमी एक रोटी के लिए तरस जाए हमारे राज के अंदर। हम कितने भी बड़े हो जाएं, माफ करना उनके आशीर्वाद से बड़े कभी भी नहीं हो सकते हैं और उनकी बददुआ बहुत दूर तक जाती है।
मैं यह कहना चाहता हूं कि मुझे मालूम नहीं है, लेकिन यह जो सरकारी एजेंसियां पैसा देती हैं, यही ध्यान रखती हैं। यही कहती हैं कि हमने रैन बसरे खोल दिए, ओल्ड ऐज होम खोल दिए, स्कीम्स चालू कर दीं। Some United States companies like Senior Helpers, Home Instead Senior Care, FirstLight Home Care, Home Helpers, Professional HealthCare At Home, Visiting Angels, All Valley Home Care, Home Care Assistance, Medi Home Private Care, Concerning Aging and Comfort Keepers, offer long-term, in-home care for seniors. तकरीबन 10-12 ऐसी एजेंसीज हैं जो उन लोगों के लिए काम करती हैं और इनको सरकार से सहायता मिलती है। लेकिन हम में से, मुझे नहीं मालूम शायद कुछ लोगों को मालूम हो, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हमारे यहां कोई भी ऐसा काम करने वाली ऐसी एजेंसियां हैं। जो इस तरह का काम कर रही हों और उनकी मदद कर रही हों या उनके बारे में आवाज उठाती हों। अगर करती भी होंगी तो मेरे ख्याल से आधे से ज्यादा पैसा तो एडवरटाइज़मेंट में खर्च कर देती होंगी, जो बचता होगा, उसे अपने एडमिनिस्ट्रेशन में खर्च करती होंगी। जो हाल आपने देखा होगा, कई बार अखबारों में आता है कि जो मेंटली रिटार्टिड बच्चे हैं, वे जिस जगह रहते हैं, आपने कई बार उनके बारे में अखबारों में पढ़ा होगा, उनके कितने बुरे हालात हैं, उनको कोई देखने वाला नहीं है, वे नहाते नहीं हैं, उनको कोई खाना देने वाला नहीं है, उनको जानवरों की तरह से रखा जाता है। कई बार अखबारों में इसके बारे में चर्चा हुई। लेकिन मैंने आज तक यह नहीं सुना कि कोई भी एजेंसी, जिसको सरकारी पैसा मिलता है, वह ऐसा काम कर रही है और उसे सजा मिली हो, उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई हुई हो, हुई हो और जिसे दुनिया ने देखा हो। मान लीजिए, आपने घर में बैठकर कोई कार्रवाई उसके खिलाफ कर ली, कोई चालान कर दिया, कुछ कर दिया और काम खत्म हो गया। लेकिन जो बाहर देखने वाले लोग हैं, उनको तो इसके बारे में नहीं मालूम कि आपने उसको क्या सजा दी। आप आजीवन कारावास देते हैं, आप फांसी की सजा देते हैं, क्यों देते हैं, दुनिया अखबारों के अन्दर पढ़ती है कि इस आदमी ने गलती की है और इसलिए इसको यह सजा दे रहे हैं, ताकि आइन्दा से और करने वाले लोग वह गलती न करें। माफ करना, आज जरूरत है, मैं सरकार से दरख्वास्त करूंगा कि ऐसी बीसियों एजेंसीज़ चालू करें, क्योंकि, हमारे देश की जो तादाद है, जो पोपुलेशन है, वह बहुत ज्यादा है तो आपके पास हर जगह ऐसी एजेंसीज़ होनी चाहिए, जो उन गरीब आदमियों का ध्यान रखें, उन ओल्ड एज पेंशनधारकों का ध्यान रखें, 55 साल, 60 साल से ऊपर की उम्र के लोगों के लिए वे साधन मुहैया करायें और उनकी केयर करें। सरकार उनको यह साधन मुहैया कराये।
अब मैं आपके सामने अपनी कुछ मांगें रखता हूं। मुझे लगता है कि इसका कुछ उल्लेख मैंने अपने बिल में भी किया है। सामाजिक सुरक्षा अगर आप देखें, आप अखबारों में भी पढ़ती हैं, कितनी ही बार यह समाचार आता है कि जो बूढ़े लोग रहते हैं, उनको जान से मार देते हैं, वे किसी अच्छे फ्लैट या कोठी में रहते हैं, उनके बच्चें कहीं हैं या नहीं हैं, हैं तो बाहर हैं, कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं है। उनको कभी नौकर मार देता है, कभी वहां के जो प्रोपर्टी बेचने वाले होते हैं, बिना किसी काम के पता लगता है कि वे मर गये, पता लगता है कि किसी ने उनको जहर दे दिया, पता लगता है कि किसी ने गला घोंट कर मार दिया और उसके बाद उस पर कब्जा हो जाता है तो मेरी दरख्वास्त और मेरी मांग सरकार से यह है कि उसके पास हर ऐसे व्यक्ति का आंकड़ा होना चाहिए, गिनती होनी चाहिए, चाहे उसे वे म्युनिसिपल कारपोरेशन से जोड़ें, चाहे वे उसे पुलिस स्टेशन से जोड़ें, चाहे वहां के दरोगा से जोड़ें, चाहे वहां के डिप्टी कमिश्नर से जोड़ें, उनके पास वह गिनती, वह घर, उन लोगों का कोई न कोई कम्युनिकेशन चैनल ऐसा होना चाहिए कि कभी कोई ऐसा हादसा हो तो यह न हो कि उनकी जो बॉडी है, वह 2-2, 3-3 दिन उस कमरे में सड़ती रहे, उसके बाद जब बदबू आती है तो पड़ोसी कहते हैं कि इस घर में शायद कुछ हुआ है और तब पुलिस आकर उसे देखती है। मेरी दरख्वास्त यह है कि उनको सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, उनको किसी सरकारी एजेंसी से जोड़ा जाना चाहिए।
दूसरा कि जो उनका खाना है, अब बहुत सारे भण्डारे लगते हैं, मुझे तो उन लोगों पर बड़ा ताज्जुब है, जिनके मां-बाप घर में भूखे होते हैं और वे बाजार में जाकर भण्डारे करते हैं। मैंने कई ऐसे उदाहरण देखे हैं कि मां-बाप के लिए उनके पास जगह नहीं है। मेरी दरख्वास्त यह है कि अगर कुछ ऐसे लोग हैं, जिनके बच्चे नहीं हैं या जो परेशान हैं, जिनके पास साधन नहीं हैं, जो अपने साधन में गुजारा नहीं कर सकते तो सरकार की तरफ से कोई ऐसा साधन हो कि उनको गुरुद्वारों से या मंदिर से, मैंने लोटस टैम्पल वालों के बारे में पढ़ा था कि इनका कोई इस तरह से भण्डारा चलता है, कहीं न कहीं सरकार इन लोगों को उससे जोड़े, ताकि लोग कम से कम दो वक्त की रोटी तो खा सकें और अपना पेट भर सकें।
तीसरा मेरा पाइंट उनकी हैल्थ के बारे में है। गवर्नमेंट एक स्कीम लायी थी कि एक रूपए रोज के ऊपर वे उनको हेल्थ केयर इंश्योरेंस देगी। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि लोग उसके साथ अभी तक जुड़े हैं, क्योंकि कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है। मुझे नहीं लगता है, जो अखबार में एडवरटाइजमेंट आया है, उसके बाद किसी ने जाकर उन लोगों को यह कहा हो कि तुम इस स्कीम का फायदा उठा सकते हो। इसके लिए कोई एजेंसी या फोरम नहीं है। कोई पढ़ा-लिखा है, समझदार है, तो वह चला गया, वरना बाकी बहुत बुरी हालत में हैं। आपको मालूम है कि आज कितनी बुरी हालत मेडिकल फैसिलिटीज की है, किस तरह की लाइनें लगती हैं। अगर वह किसी प्राइवेट नर्सिंग होम के हाथ में पड़ गया, तो उसके वे कपड़े और मकान बिकवा देते हैं। एक-एक दिन का पचास-पचास हजार रूपए का बिल, लाख-लाख का बिल आता है। उनके पास पैसे नहीं हैं, तब दो ही रास्ते हैं। अगर वह सरकारी अस्पताल में जाता है, तो भी उसके पास उतने साधन नहीं हैं, तो दो ही सूरत हैं या तो वह उस बीमारी के साथ मर जाएगा या वह कहीं से उधार लेगा, मकान बेचेगा, कपड़े बेचेगा, तब वह गुजारा करेगा।
मेरी पुरजोर मांग है और मैं आशा करता हूं कि सरकार इस बात को मानेगी कि आप उनको किसी तरह का आइडेंटीफिकेशन कार्ड दें, ताकि वे लोग किसी भी सरकारी अस्पताल में जाकर मुफ्त इलाज करा सकें। हार्ट की बीमारी, लंग्स की बीमारी और कैंसर की बीमारी सहित बहुत सी ऐसी बीमारियां हैं, जिनका इलाज बहुत महंगा है। वह इलाज, आपकी जो एक रूपए की मेडिकल फैसिलिटी है, जो इंश्योरेंस है, उसमें भी शायद वह कवर नहीं हो पाएगा। उस कार्ड के साथ वे किसी भी सरकारी अस्पताल में जाकर इलाज करा सकें और उनका सारा इलाज मुफ्त होना चाहिए।
इसके बाद इनके रिक्रिएशन सेंटर्स की बात आती है। मैंने इसे पढ़ा है, इनके बिल में लिखा है, तो अगर आप रिक्रिएशन सेंटर्स की हालत किसी जगह जाकर देखें, तो माफ करना, आपको भी ताज्जुब होगा। मैं चाहता हूं कि आप जरूर किसी दिन जाएं। आज आप चेयर पर बैठी हैं और उस बात को रखने का मुझे मौका मिला है। आप महिला हैं, आपका महिला का दर्द है, आपने समाज को देखा है, परिवारों को देखा है। आप उनकी हालत देखिए। क्या वे रिक्रिएशन सेंटर्स हैं? वहां दरवाजे नहीं हैं, अखबार नहीं है, सिर्फ एक छत बना दी है और अगर वहां बरसात होती है, तो पानी टपकता है, वहां कोई कैरमबोर्ड नहीं है। वह घर में अकेला है, बेटा उसका कहीं चला गया, उसकी बहू वहां अंदर काम करती है, एक कमरे का मकान है, वह वहां बैठ नहीं सकता है। इसलिए वह सारा दिन पार्क में पड़ा रहता है या उस कमरे के अंदर पड़ा रहता है, दूसरा कोई काम उसके पास नहीं है। सिर्फ पार्क के अंदर बगैर दरवाजों का कोई कमरा बना देना, उसे रिक्रिएशन सेंटर नहीं कहा जा सकता है। अगर उसकी सांस फूलती है, तो उसे कोई देखने वाला नहीं है। मेरी यह मांग है और मैं यह चाहता हूं कि जिस तरह के रिक्रिएशन सेंटर्स दुनिया में हैं, वैसे यहां भी हों। जो मैंने 10-15 पढ़कर नाम सुनाये, इन सरकारी कर्मचारियों को वहां भेजें, पार्लियामेंट के डेलीगेशन को भेजें कि जाकर देखकर आओ कि किस तरह के रिक्रिएशन सेंटर्स हैं? अगर वे दे सकते हैं तो हम क्यों नहीं दे सकते हैं, अगर वे उनकी केयर कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं? क्या हमारे अंदर वह वैल्यू नहीं रही, क्या हमारे अंदर अपने मां-बाप की वह इज्जत नहीं रही, क्या हम पुराने जमाने के लोग नहीं हैं?
पांचवां, जो पैसा हम पेंशन का उनको दे रहे हैं, वह नाकाफी है। मेरी मांग है कि इसको देश की जीडीपी की ग्रोथ के साथ जोड़ा जाए। आप तरक्की कर रहे हैं। आप कह रहे हैं कि हमारा बजट एक लाख करोड़ से बढ़कर बारह लाख करोड़ हो गया। हमारी इतनी पंचवर्षीय योजनायें हो पूरी हो गयीं, इतने बड़े-बड़े डैम बन गए, हमने हवाई जहाज बना लिया, पानी के जहाज बना लिए, तोपें खरीद ली, लेकिन इनका क्या करेंगे? इनके पास पैसा नहीं है। अगर उसका मन एक आइसक्रीम खाने का करता है तो उसे सौ बार सोचना पड़ता है। अगर वह अपने पोते-पोती के ऊपर एक रूपए खर्च करना चाहता है, तो उसे उसके लिए सोचना पड़ता है। अगर उसकी ऐनक टूट जाती है तो उसे सोचना पड़ता है, वह आधी टूटी हुयी ऐनक से ही गुजारा करता है। मैं चाहता हूं कि आप उसकी पेंशन, जो मुझे लगता है कि सिर्फ सिंबॉलिक है, उसे बढ़ाकर इस हद तक ले जाएं कि वह उससे अपना गुजारा कर सके। उसे पांच हजार रूपये महीना करें, दस हजार रूपये महीना करें। आपकी गिनती होगी, आपको पता लग जाएगा कि इसकी टोटल तादाद कितनी होगी। आपके पास गिनती होगी तो आप यह कह सकते हैं कि हमें पांच हजार करोड़ रूपये खर्च करना है, हमें दस हजार करोड़ रूपये खर्च करना है, करो। एक सड़क मत बनाओ लेकिन उनका दिल मत दुखाओ। उनकी तरफ देखो कि ये कौन लोग हैं, जो हमें भविष्य दे गए।
प्रोटेक्शन ऑफ देयर प्रॉपर्टी, एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिसे आप भी अखबारों में पढ़ती होंगी। जो उनकी प्रापर्टी है, जो उन्होंने सस्ते जमाने में बनाई होगी। बच्चे उनके साथ नहीं रहते हैं। बच्चे बाहर रहते हैं। बूढ़े मां-बाप अकेले रहते हैं तो उस प्रापर्टी को हड़पने के लिए पच्चासियों तरह के लोग लग जाते हैं, झूठे कागज बना लेते हैं, लोगों को मिला लेते हैं और यह कोशिश करते हैं कि किसी तरह उनको निकाल कर सड़क पर फेक दें और जो अब करोड़ों की प्रापर्टी है उसके ऊपर कब्जा करने की कोशिश करते हैं। कई बार उसमें बच्चे भी शामिल होते हैं।
मैं आपको एक बहुत छोटा-सा उदाहरण देना चाहता हूं। मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा। एक आदमी का बेटा अमेरीका में रहता था। उसके बाप की डेथ हुई तो मां अकेली रह गई। जब बाप मरा तो वह आया नहीं लेकिन बाद में वह आया। वह यहां आने के बाद अपनी मां को फुसला कर कहने लगा कि यहां से चलो। हम यहां क्या करेंगे? उसने रूपया इकट्ठा किया और जाते हुए उस मां को एयरपोर्ट पर छोड़ दिया। अब आप अंदाजा लगाइए। वहां पर कोई जज साहब थे उन्होंने सुओमोटो वह केस कोर्ट में लिया। उसके बाद उसको वहां से अम्बेसी के थ्रू बुलवाया। फिर उसने माफी मांगी और उसका पैसा उसको दिया। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रापर्टी की वैल्यू बढ़ रही है उसके हिसाब से, सबसे ज्यादा ये लोग खतरे में हैं। मैं आशा करता हूं कि कोई ऐसा सिस्टम बनाया जाए, कोई अलग कोर्ट हो, कुछ हो जिससे इस पर रोक लग सके कि उनकी प्रापर्टी किसी के नाम ट्रंसफर न हो। मान लीजिए कोई जबर्दस्ती बंदूक दिखा कर उनको कहता है कि साइन कर दो और ऐसे बहुत सारे केस होते हैं, ये कैसे रूकेगा? साधरणतया यह नहीं रूकेगा। जब साहब के पास भी वह जाएगा तो कह देगा कि देखों, तुम्हारे दस्तख्त हैं। उस बूढ़े को पता है वह देख तो रहा नहीं है, उसे मालूम नहीं है कि काहे के दस्तख्त हैं। उसे पता है कि क्या कह कर किसने दस्तख्त करा लिए। किसी भी तरह से हो सकता है। ऐसे बहुत केसेज हो रहे हैं। मैं अनुरोध करूंगा कि सरकार इसकी तरफ भी ध्यान दे।
बहुत सारी टैक्सेज हैं। मान लीजिए इनकम टैक्स है। जो आपने साधारण खाते-पिते आदमी के लिए, कमाऊ आदमी के लिए, फर्मों के लिए जो स्लैब रखा है वह स्लैब इनके लिए नहीं होना चाहिए। आप यह कह दें कि लाख रूपये महीने तक, पचास हजार रूपये महीने तक, कि सिनियर सिटिजन्स के ऊपर इनकम टैक्स लागू नहीं होगा। अगर एक लिमिट के बाद इनकम है तो वह अलग बात है। मान लीजिए कि किसी को दस लाख रूपये किराया आ रहा है तो मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं। मैं गरीब आदमी की बात कर रहा हूं जिसकी प्रापर्टी भी है, जिसका बिजनेस है, उसका बिजनेस पर कोई कब्जा नहीं है। उस पर बेटों का कब्जा है, औरों का कब्जा है। मेरा अनुरोध है कि उनको इनकम टैक्स में रिबेट मिलनी चाहिए। ...( व्यवधान)
एक इंट्रेस्ट फ्री लोन, अभी मैंने एक स्कीम सुना था कि बैंकों ने उनके मकान को गिरवी रख कर उनको महीना बांध दिया। कुछ लोग खुश हैं। मेरा यह कहना है कि इन लोगों को कभी लोन चाहिए तो बैंक इन्हें इंट्रेस्ट फ्री लोन दे। जो भी सिनियर सिटिजन्स हैं, जब भी इनको पैसे की जरूरत पड़े, मुझे नहीं लगता कि इन्हें दस लाख रूपये चाहिए, मुझे नहीं लगता है कि इन्हें लाखों रूपये चाहिए। इनको पांच हजार रूपये, दस हजार रूपये या बीस हजार रूपये चाहिए जो इन्हें अपने इलाज कराने के लिए जरूरत होगी या किसी और चीज के लिए जरूरत होगी। किसी तरह उनकी जरूरत के साथ बैंकों के लोन को जोड़ा जाना चाहिए। किशोर भाई को ध्यान होगा कि इंदिरा जी के जमाने में लोन मेले लगे थें और बैंकों का नेशनलाइजैशन करने के बाद यह कहा गया कि आप गरीब आदमी को वगैर किसी सिक्युरिटी के लोन दें इससे बढ़िया लोन मेला और किस के लिए हो सकता है। जो हमारे सीनियर सिटिजन्स हैं, उनके लिए लोन मेला लगा दें, एक लिमिट रख दें कि 65 साल से ऊपर के जो गरीब आदमी हैं, चाहे बीपीएल के हों या किसी अन्य कैटेगरी में हो, उनको हम दस हजार या पन्द्रह हजार रुपये एकमुश्त पैसा देंगे। बैंकों में बहुत पैसा है। आपने अरबों रुपये अमीर आदमियों को दे दिए, माफ कर दिया, एक लाख करोड़ रुपये माफ कर दिया। ले गए लूट के। बड़ी-बड़ी कंपनियां खुल गयीं, डूब गयीं, बैड-डेट हो गए और बैंकों ने एक मिनट में हाथ खड़े करके माफ कर दिए कि हम क्या करें। उनसे आप कानूनी पेंच लगाकर पैसा वसूल कर सकते हैं। सीनियर सिटिजन्स को दीजिए, उनको पैसे की जरूरत है। उनको 90 प्रतिशत तक फ्री, मैं कहूंगा कि फ्री दे दो, आप एमपीजी और एक्स-एमपीज को फ्री देते हो, एयर और रेल टिकट दे दो। उसको अपनी बेटी या बेटे से मिलने जाना है, तीर्थ पर जाना चाहता है। कहां जाते हैं ये लोग? ये लोग व्यापार करने नहीं जाते हैं, इनकी जरूरत है। दवाई खा रहा है, मर रहा है, भाग रहा है, रेल में कहां सफर करने जाएगा, शौक के लिए घूमने नहीं जाएगा, चौपाटी पर घूमने नहीं जाएगा। उसे वैष्णो देवी जाना है या किसी अन्य तीर्थ स्थान तक जाना है। मेरी सरकार से मांग है कि आप इनकी एयर और रेल टिकट में 90 प्रतिशत छूट दें।
ओल्ड एज हाउसेज के बारे में मैंने बताया है। यहां ओल्ड एज हाउसेज बनाएं, उनमें सुविधाएं दें, साधन मुहैया कराएं। उसके अंदर इनडोर गेम्स रखें, अखबार-मैगजीन्स रखें, अगर कोई लिखाई-पढ़ाई करना चाहता है, तो उस तरह के साधन देकर उसे किसी से जोड़ें ताकि वह वहां उसका काम कर सके। उन एनजीओज को जो इन लोंगों के लिए काम करती हैं, उनको प्रोत्साहन दिया जाए। मैं कहूंगा कि जो बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं, उनको इसके साथ जोड़िए। उनको कहिए कि आपको परमीशन तभी मिलेगी, जब वह ओल्ड एज होम बनाएगी। मत दो उनके शेयर निकालने की परमीशन। सब्सक्राइब कर रहे हैं, करोड़ों रुपये जनता से इकट्ठे कर रहे हैं। माफ करना, कहना नहीं चाहिए, मैंने पढ़ा था कि एक बहुत बड़ा इंडस्ट्रियलिस्ट है, जिसने अपनी पत्नी को बोइंग गिफ्ट किया उसके जन्मदिन पर। यह क्या मजाक है? एक आदमी अपने बाप को खाना नहीं खिला पा रहा है, मां को खाना नहीं खिला पा रहा है और दूसरी तरफ हम क्या उदाहरण पेश कर रहे हैं। क्या यही समाजवाद है? क्या यही सोशल वेलफेयर स्टेट है? मजाक बना दिया है कि अपनी बीवी को इससे बड़ा गिफ्ट नहीं दे सकते। इसके लिए सख्त से सख्त कानून बनाइए। 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं, जो खाने की तलाश में मारे-मारे घूमते हैं, रोटी और रोजगार की तलाश में मारे-मारे घूमते हैं और हम उनको क्या दिखाना चाहते हैं। क्या यह उनका देश नहीं है? उन्होंने इस देश की आजादी में हिस्सा नहीं लिया? क्या उन्होंने अपना खून नहीं दिया, क्या उनके मां-बाप जेल नहीं गए। लेकिन दिखा रहे हैं कि हम बङे हैं। इनक्रीज इन पेंशन मनी की बात अभी मैंने आपके सामने रखी है।
मैंने एक स्कीम देखी थी कि सब-डिवीजन में ट्रिब्यूनल्स बनेंगे। ट्रिब्यूनल्स हमने बना रखे हैं एक डिस्ट्रिक्ट में, मेरे पास आंकड़े हैं। मैं भी दिल्ली में रहता हूं, मुझे नहीं मालूम है कि कहां पर यह ट्रिब्यूनल है? कहां पर जाकर वह अपनी शिकायत कर सकता है? अगर कोई उसे तंग कर रहा है, तो वह सिर्फ एसएचओ के पास जाकर बैठ जाता है कि मेरी मदद कर दो। मैंने ऐसे ट्रिब्यूनल्स नहीं देखे हैं। हो सकता यहां बैठे हुए माननीय सदस्यों को मालूम हो कि कहां पर ऐसे ट्रिब्यूनल्स खुले हुए हैं। आप ऐसे साधन मुहैया कराइए कि वह वहां पहुंच सके। उसे मालूम हो कि आपने इतना दिया है, जबकि हकीकत यह है कि उसे तो मालूम नहीं, लेकिन आपको मालूम है, तो फिर ऐसे ट्रिब्युनल्स का कोई फायदा नहीं है। जो कानून की पेचीदगियां हैं, कानून की पाबंदियां हैं, उन्हें ठीक करके आप इन लोगों के हक में काम करें।
वरिष्ठ नागरिक की आयु सीमा 55 वर्ष की जानी चाहिए। सरकार के कई विभागों में 65 साल रिटायरमेंट उम्र की गई है। मेरा कहना है कि सरकार को इस पर ध्यान देकर वरिष्ठ नागरिक की आयु सीमा कम करनी चाहिए। सरकारी आंकड़ें जो इस बारे में बताए जाते हैं, मैं चाहता हूं कि इन आंकड़ों का डिवीजन भी करें कि अगर सीनियर सिटीजन है तो किस केटेगरी में है। क्या वह पैसे वाला है या कम पैसे वाला है, क्या इनकम टैक्स अदा करता है या बीपीएल है या राशन की लाइन में लगने वाला सीनियर सिटीजन है या जे.जे. कलस्टर वाला है या फिर सड़क की पटरी पर रहने वाला है। इस हिसाब से आपको सीनियर सिटीजन के आंकड़े देने चाहिए और उन्हें सुविधाएं देनी चाहिए। इस काम में कई विभाग और मंत्रालय काम करते हैं, चाहे वह रेल मंत्रालय हो या गृह मंत्रालय हो या वित्त मंत्रालय हो या अन्य कोई विभाग हो। लेकिन जिस मंत्रालय का भार आपको मिला है, वह बहुत जिम्मेदारी वाला है। इसलिए अगर आप डंडा लेकर चलेंगे तो काफी फायदा होगा। आप 500 रुपए और अन्य बातों को छोड़िए, सख्ती से काम करिए। मेरा मानना है कि जो काम करता है उसका नाम इतिहास में लिखा जाता है, जो समय बिताता है, उसका नाम नहीं लिखा जाता है। यह बात मैं इसलिए आज यहां कह रहा हूं कि मुझे समय मिला है। इस देश में जितने भी पेंशनधारी हैं।
डॉ. भोला सिंह (नवादा): सरकार के जवाब के बाद भी आपको मौका मिलेगा।
श्री जय प्रकाश अग्रवाल : मेरे दिल में काफी दर्द है इसलिए मैं कह रहा हूं। मैं यह कहना चाहता हूं कि सीनियर सिटीजंस को बैंकों से सहायता मिलनी चाहिए, कम्युनिटी वर्क में लगाया जा सकता है। जहां भी सरकारी बोर्ड, एजेंसीज या कमेटीज हैं, इन्हें प्रतिशत के हिसाब से आप जगह दें और काम लें। आपने 65 साल के बाद इन्हें बाहर कर दिया, वे सड़कों पर पड़े हुए हैं, उनकी युटिलिटी और उनके अनुभव का फायदा आपको उठाना चाहिए।
केन्द्रीय सहायता द्वारा ओल्ड एज होम्स जो स्थापित किए गए हैं, मैं उस बारे में भी कुछ कहना चाहता हूं। यह दर्द भी अपने मन का मैं सदन में रखना चाहता हूं। सरकार का 2011 का आंकड़ा है, अरुणाचल प्रदेश में जीरो, असम में 11, बिहार में एक, छत्तीसगढ़ में दो, दिल्ली में एक, हरियाणा में सात, हिमाचल प्रदेश में एक, कर्नाटक में 50, केरल में दो, मध्य प्रदेश में चार, महाराष्ट्र में 16, मणिपुर में 15, ओड़िशा में 44, पंजाब में पांच, तमिलनाडु में 42 और आंध्र प्रदेश में तो सबसे ज्यादा 112 हैं।
17.00 hrs. मेरी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि जिस समय मैंने यह बिल डाला था उस समय मुझे नहीं लगा था कि मुझे कभी मौका मिलेगा और यह बैलेट में आयेगा और मैं यहां खड़े होकर बोल सकूंगा और अपना दर्द बयान कर सकूंगा। आज भी उन लोगों की जगह कम से कम मेरी निगाह में भगवान के बराबर है। मुझे बड़ा दुख होता है जब वे अपने पेंशन के फार्म साइन कराने आते हैं। आज वक्त है कि हम कुछ ऐसा करें जिसे दुनिया देखे और बाकी देश हमारे बारे में मिसाल देकर अपनी-अपनी संसद में ये कहें कि हिंदुस्तान में इतना बढ़िया काम हुआ है। इसमें बहुत सारी चीजें मैनेजमेंट की हैं, लोगों को साथ जोड़ेंगे, चीजों को मुहैया कराएंगे तो पैसा नहीं लगेगा, पैसा खाली पेंशन में लगेगा। क्या हर्जा है, आपके पास किसी साधन की कमी नहीं है। मैं हाथ जोड़कर सरकार से प्रार्थना करता हूं कि जो बिल मैंने यहां रखा है इस बिल को औपचारिकता से ऊपर उठकर देखें और सरकार इसे मंजूर करके लागू करे।
सभापति महोदया : प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ “कि वरिष्ठ नागरिकें के लिए सामाजिक सुरक्षा का उपबंध विधेयक, 2010 पर विचार किया जाए।” श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): माननीय सभापति महोदया, सबसे पहले तो मैं माननीय भोला सिंह जी का धन्यवाद करूंगा कि अपने से पहले बोलने का मौका दिया। बहुत ही वरिष्ठ सदस्य श्री जयप्रकाश अग्रवाल जी ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा का जो उपबंधन 2010 लेकर इस सदन में आये हैं उसका पुरजोर समर्थन करते हुए सभापति महोदया से आग्रह करुंगा, क्योंकि मेरे भी दो बिल नहीं आये तो मैंने देने ही छोड़ दिये। ये प्राइवेट बिल बड़ी मेहनत से सदस्य बनाकर लाते हैं लेकिन उन पर केवल चर्चा होती है कोई रिजल्ट नहीं निकलता। मैं चाहूंगा कि जो भी माननीय सदस्य यहां बैठे हैं वे आदरणीय जयप्रकाश जी के दर्द को समझ रहे होंगे और जितनी बातें उन्होंने कही हैं उससे सम्बद्ध करते हुए यही आपसे अपील करना चाहूंगा कि यह बिल अडाप्ट हो और जो उनकी मांगे हैं वे पूरी हो सकें। मैंने सुना है कि प्राइवेट मैम्बर बिल 30-40 साल पहले आया था, आज तक उस पर कुछ नहीं हुआ। इसे जरूर लाएं, इसका समर्थन करने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। माननीय जयप्रकाश जी ने सभी आंकड़े प्रस्तुत कर दिये हैं लेकिन एक मांग करना चाहूंगा कि ऐसे लोगों की कम से कम गणना तो होनी चाहिए और परिभाषा फिक्स होनी चाहिए। आपने रिटायरमेंट के बाद नौकरियों में ऐज-रिलेक्सेशन की है, लोगों को फायदे दिये हैं लेकिन जो वरिष्ठ नागरिक हैं उनकी कोई परिभाषा नहीं दे पाये हैं और न ही गणना कर पाये हैं कि कितने पुरुष हैं कितनी स्त्रियां हैं? रोटी-कपड़ा-मकान-स्वास्थ्य का सवाल इनके सामने विकट है, जिसके बारे में जयप्रकाश जी ने बताया है। यह पीढ़ी आने वाले बच्चों को एक सीख देती है, संस्कार देती है जिससे बच्चे अपने संस्कारों को सुरक्षित रखें।
कुछ लोग कहते हैं कि 40-50 साल के बाद बुढ़ापा शुरू हो जाता है। अगर इन वरिष्ठ लोगों की स्थिति देखी जाए तो मेरे ख्याल से एक तरीके से जो छोटा बच्चा होता है, जिस प्रकार से एक छोटे बच्चे को प्यार दिया जाए, वैसे यदि इनको प्यार मिले तो मेरे ख्याल से इनकी जिंदगी भी बढ़ेगी और जो परवरिश करने वाले लोग हैं, जो इनका इमदाद करते हैं, उनको बहुत दुआ लगे। लेकिन बहुत कम लोग इसको मानने वाले हैं।
दूसरे, ये वरिष्ठ नागरिक अपने परिवार के लिए सपने देखते हैं और मेहनत मशक्कत करके अपने बच्चों का पालन पोषण करके बच्चों को आगे बढ़ाते हैं कि ये आगे चलकर हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे लेकिन होता उल्टा है। मैंने बहुत परिवार देखे हैं और बहुत कम ही परिवार ऐसे हैं जहां मां बाप को भगवान समझा जाता है बल्कि होता यह है कि ऐसे लोगों को बहुत दुर्दिन देखने पड़ते हैं। इसलिए मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि इस बिल पर हमें विशेष ध्यान देने की जरुरत है। खासकर अगर यह बिल देखा जाए तो जो असहाय टाइप के लोग हैं, यह उनके लिए है और जैसे कि आज जय प्रकाश जी ने कहा कि देश की आजादी से लेकर विकास में, उत्पादन में, सरकारी नौकरियों में चाहे किसान हों या मजदूर हों, इसमें सबका योगदान है और सब बूढ़े होते हैं। ये इनकी कैटेगरी है।
बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनके पास बहुत सी सहूलियतें होती हैं और जो अपने मां-बाप की परवरिश कर सकते हैं। लेकिन बहुत से परिवार हैं जो पैसे के लालच में हैं और जैसे अभी कहानी सुनाई गई कि एयरपोर्ट पर उनको छोड़कर चले आए। बहुत से ऐसे लोग हैं जो सब कुछ होते हुए भी समाज से उनको तिरस्कृत किया गया। वे लावारिस की तरह पड़े रहते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को देखने की आवश्यकता है। आज इनको सहारा चाहिए। इनकी कैटेगरी अगर देखी जाए तो मजदूर, किसान, गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार और बड़े लोग भी हैं। दूसरी बात, बड़े विस्तार से इस बिल के बारे में जय प्रकाश जी ने कहा कि वृद्धा आश्रम, रैन बसेरा तमाम तरीके के आश्रम खोले गये हैं औऱ बहुत से एनजीओज हैं जो लाखों रुपये ले जाते हैं लेकिन इनकी कोई मदद नहीं करता। वृद्धा आश्रम के नाम पर एनजीओज बहुत पैसे ले जाते हैं लेकिन मैंने आज तक अपने इलाके में, इलाहाबाद में, कौशाम्बी में या प्रतापगढ़ में ऐसा नहीं देखा कि दस वृद्ध को लेकर कोई एनजीओ चला रहा हो कि हम इनकी परवरिश कर रहे हैं, इनको हम मकान, रोटी दे रहे हैं और इनके स्वास्थ्य पर हम ध्यान दे रहे हैं। कोई कुछ नहीं देता है। जय प्रकाश जी ने कहा कि ऐसे लोगों को मदद देनी चाहिए लेकिन ऐसे लोगों को मदद देने से पहले हमें सोचना पड़ेगा कि जो हम मदद दे रहे हैं, उसका सही उपयोग हो रहा है या नहीं। अब आपने एनजीओज को देखा होगा लेकिन बहुत से लोग पैसा ले जाते हैं। वृद्धा पेंशन की बात कही गई। इसमें बहुत से लोग विकलांग हैं। चूंकि गोल मार्केट के पास मेरा एम.एस.फ्लैट है। मैं कभी कभी गुरुद्वारे के पास देखता हूं कि बेचारे वे ट्राई साइकिल पर अपंग लोग हैं, वृद्ध हैं लेकिन उनको खाने को मिल जाता है। लोग दर्शन करने के लिए जाते हैं तो लोग पैसे दे देते हैं। वे भीख भी मांगते हैं और बड़े अच्छे परिवार के लोग होते हैं। जब वे अपनी कहानी सुनाते हैं तो आंखों में आंसू आ जाते हैं कि बेटे, हम इस परिवार के हैं और आज भीख मांग रहे हैं।
जो हमारा सामाजिक तानाबाना है, उसमें भी बड़ा अमूलचूल परिवर्तन हुआ है। जो पुराने लोग सांस्कारिक लोग हैं, जिन्होंने इस व्यवस्था को देखा है, वे तो इन लोगों का ख्याल रखते हैं लेकिन जो आगे आने वाली नयी पीढ़ी है, उनके अंदर संस्कार का भी बहुत फर्क है। उनको अच्छे संस्कार नहीं दिये गये हैं। वे तो बस कमा-खाकर मौज मस्ती करना चाहते हैं और वे घर से अलग हो जाते हैं। ये लावारिस न जाने कहां कहां भटकते रहते हैं। ऐसे लोगों की तरफ हमें देखना पड़ेगा। मैं इन्हीं शब्दों के साथ कहना चाहूंगा कि जो भी जयप्रकाश जी ने मांग की है, इस बिल के माध्यम से अपने दिल की बात बड़े दर्द के साथ कह रहे थे, मैं पूरी तरह से उनकी मांग को अपने से सम्बद्ध करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं और इस बिल पर बल देता हूं कि आगे आने वाले समय में इस बिल पर तमाम लोगों के विचार आए और इसको जरूर लागू किया जाए।
डॉ. भोला सिंह (नवादा): माननीय सभापति महोदया, मैं आसन के प्रति शुक्रगुजार हूं कि आपने मुझे यह अवसर दिया। मैं सबसे पहले श्री जय प्रकाश अग्रवाल जी को इस विधेयक के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं। इस विधेयक के माध्यम से उन्होंने वृद्ध नागरिकों आंसू, पीड़ा, वेदना और संत्रास को जिस रूप में रखा है, वह हमारे लिए वरण्य है। महाभारत में लिखा है जब युधिष्ठिर को बहुत प्यास लगी तो उन्होंने भीम से कहा - अगल-बगल में देखो क्या कोई सरोवर है? भीम ने देखा सरोवर है, वह पानी लेना चाहते थे। जैसे ही उन्होंने पानी लेना चाहा, यक्ष ने कहा- यह सरोवर मेरा है, अगर तूं पानी लेना चाहता है तो तुझे मेरे सवालों का जवाब देना होगा। भीम पानी लेने के लिए उतारु थे लेकिन वे बेहोश हो गए। उसके बाद नकुल, सहदेव, अर्जुन को भेजा और यक्ष ने यही प्रश्न किया लेकिन सभी बेहोश हो गए। तब युधिष्ठिर स्वयं सरोवर के नजदीक आए, वह पानी लेना चाहते थे। यक्ष ने कहा- ठहरो, युधिष्ठिर, तूने अपने भाइयों की यह गति देखी है, तुझे मेरे प्रश्नों का जवाब देना होगा, अगर नहीं दिया तो तेरी भी यही दशा होगी। युधिष्ठिर ने कहा- पूछिए, क्या प्रश्न है? यक्ष ने पूछा- धरती से महान कौन है? युधिष्ठिर ने कहा- मां। यक्ष ने पूछा- आसमान से महान कौन है? युधिष्ठिर ने कहा- पिता।
महोदया, मैं सदन में इस बात को इसलिए रखना चाहता हूं कि हमारी सांस्कृतिक अवधारणाओं में मां मीठे जल का कुंआ है। मां के चुंबन में सप्तऋषि हैं। मां के चुंबन के ऋण से उद्धार होना संपूर्ण जिंदगी में संभव नहीं है। हमने भारत की सांस्कृतिक धरोहर में परिवार में मां और पिता को ईश्वर की अनुपस्थिति में ईश्वर माना है, देवता माना है। हमारे जीवन में जिस तेजी से पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का दुप्रभाव आ रहा है, उससे मां-बाप की स्थिति और जीवन नारकीय हो गया है। मैं बिहार के नवादा से आता हूं मैं वहां एक कार्यक्रम में था, मैंने देखा वृद्ध नागरिकों का बहुत बड़ा जलूस निकल रहा है। उन्होंने मुझे देखा तो वे रुक गए, वे मांग कर रहे थे कि जो बच्चे मां-बाप की सेवा नहीं करते, उनकी देखभाल नहीं करते उन्हें गिरफ्तार करो। मैंने सुना और कहा - ये क्या कर रहे हैं? आपकी अपेक्षाओं और शुभकामनाओं का ये बच्चे फल हैं। मां भरे हुए पेट और गर्भ को देखने के लिए कितनी लालायित होती है, समाज कितना लालायित होता है, न जाने कितनी मनौतियां होती हैं, तब ये बच्चे मां के गर्भ से आते हैं। अगर बच्चा बीमार पड़ता है तो न जाने कितने देवी-देवताओं की पुकार होती है कि इसे बचा लो, हम ये करेंगे, वह करेंगे। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि माँ-बाप घोर उपेक्षित हैं।
महोदया, मैं आज इस सदन में अपने ही गांव की बात कहना चाहता हूँ। हम जिस गांव से आते हैं, वह बिल्कुल देहाती गांव है। एक आदमी अपनी जवानी में दुकान चलाता था और उसकी जेब पैसे से भरी रहती थी। जब उसकी उम्र बढ़ गई या पैसे नहीं रहे तो अपनी जेब में वह कंकड़ ले कर चलता था ताकि उसको पैसे का अहसास हो। उसके पांच बेटे थे। जब वह मरा तो पांच दिनों तक उसकी लाश को कुत्ते खाते रहे। जब पांचवें दिन दुर्गंध फैली तो उसके बेटे को गांव के लोगों ने दिखाया कि उसके बाप को कुत्ते नोंच-नोंच कर खा रहे हैं। लोग उसको उठा कर ले गए और उसके श्राध्द पर पूरे गांव ने भोजन किया और खुशी मनाई। भोजन करना है तो पूरे गांव का भोजन करो। यह हमारा समाज है।
महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूँ कि आखिर ये परिस्थिति क्यों पैदा हुई है? ये परिस्थिति जीवन के प्रति हमारी सोच की वजह से पैदा हुई है। पश्चिम में शरीर के अलावा कुछ नहीं है। यही दुनिया है। पश्चिम में बुढ़ापा नहीं है। पश्चिम बुजुर्गी नहीं है। मैंने ताशकंद, मॉस्को और लेनिनग्राद में 80 वर्ष के बुजुर्ग को 18 वर्ष की लड़की के हाथ को चूमते हुए देख है। और 18 वर्ष की लड़की को 80 वर्ष के बुजुर्ग के हाथ को चूमते हुए देखा है। उनके जीवन में स्वर्ग नहीं है। उनके जीवन में नर्क नहीं है। जो कुछ है, वह वर्तमान है। वे बुढ़ापे को नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि हम 80 वर्ष के जवान हैं। वे कहते हैं कि हम 85 वर्ष के जवान हैं। वहां बुढ़ापा नहीं है।
लेकिन आज हमारे देश में यह स्थिति क्यों हुई है। उसका कारण है कि पहले हमारी औसतन उम्र 27 वर्ष थी। अब हमारी औसतन उम्र 74-76 वर्ष हो गई है। ज्यों ही बेटा जन्म लेता था, उसका बाप मर जाता था। बेटा दस वर्ष का हुआ, उसका बाप मर गया, माँ मर गई। तब उनकी उम्र कम होती थी। लेकिन अब तो बूढ़ा मरता ही नहीं है। अब तो बुढ़िया मरती ही नहीं है। वह 80-85 वर्ष तक जीवित रहती है। उसका बेटा भी दादा बन गया है। उसके भी बच्चे हो गए। वह अपने बोझ से परेशान है। वह अपने माँ-बाप को कहां से देख सकता है? वह स्वयं बोझ से परेशान है। माँ-बाप की अलग अपेक्षाएं हैं।
महोदया, इसलिए मैं महसूस करता हूँ कि आज की जो परिस्थितियां हैं, जिस ओर श्री जय प्रकाश अग्रवाल जी ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है, हम कहना चाहते हैं कि सरकार को इस मामले में सोचना होगा। यह बात ठीक है कि भारत सरकार ने हमारे बड़े नागरिकों के प्रति कुछ कदम उठाए हैं। उनके प्रति कुछ कुछ सकारात्मक कदम उठे हैं। लेकिन इन कदमों से काम नहीं चलेगा। ये माँ-बाप जो बच्चों के लिए दादा-दादी हो गए हैं, ये बच्चों के लिए टेलिविज़न थे, ये बच्चों के लिए रेडियो थे, ये बच्चों के लिए अनुभव का खजाना थे और प्यार-स्नेह के झरने थे। लेकिन आज इस परिस्थिति में कहा जा रहा है कि उनका होम लैण्ड होना चाहिए। कहां होना चाहिए? जहां हमने मोची को भी गांव से दूर रखा। मल्लिक हैं, उनको भी गांवों से बाहर रखा है। पीपल और वट के गाछ के पास रखा है। उनको दूर रखा है। समाज की निगाहों से वह दूर है। समाज की आवश्यकता का वह पोषण करता है। लेकिन वह समाज की निगाहों से दूर है।
हमने भी अपने माँ-बाप को गांव से बाहर होम लैण्ड बनाने का कदम उठाया है। जिस तरह से यूरोप में हमने देखा है कि उन्होंने मां-बाप को कहीं दूर ले जाकर होम लैंड में रख दिया है और वे मन्थली पैसा दे देते हैं। जब उसके मां-बाप मर जाते हैं, जब उस बच्चे को खबर होती है तो वह कहता है कि क्या बात है, कोई बड़ी घटना तो नहीं हुई, मरना ही था, तुमने हमें रात को 12 बजे जगा दिया, सुबह कहती तो क्या हो जाता, जाओ उनको जला दो। ऐसी परिस्थिति है। हमने इस परिस्थिति के दर्द को आपके सामने रखा है, जय प्रकाश अग्रवाल जी ने रखा है।
महोदया, महाभारत में भी हमने देखा है कि जब महाभारत की लड़ाई समाप्त हो गयी और गान्धारी भूख से मरने लगी तो उसने देखा कि जंगल में आग लगी हुई है। बेर के कुछ दाने जले पड़े हैं, गान्धारी खड़ी होकर दाने को तोड़ना चाहती है, लेकिन वह तोड़ नहीं पाती, उछलना चाहती है, लेकिन तब भी तोड़ नहीं पाती है, अगल-बगल में उसके बेटों की लाश है। गान्धारी लाश को उठा-उठाकर, लाश के टीले पर खड़ी होकर बेर तोड़ती है। जब वह बेर तोड़ रही है तो कृष्ण ने कहा कि गान्धारी क्या कर रही हो, बेटे की लाश पर खड़ी हो। गान्धारी ने कहा- हे वसुदेव, बुढ़ापा दुख का कारण है, जवान बेटे का मरना दुख का कारण है, गरीबी उससे ज्यादा दुख का कारण है, लेकिन भूख से मरना सबसे ज्यादा दुख का कारण है। इसलिए मैं भूख से मरना नहीं चाहती हूं, मैं जिन्दा रहना चाहती हूं, गान्धारी ने यह कहा।
महोदया, मैं ऐसे अवसर पर सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि जब मैं घर जाया करता था, मेरी मां कहती थी बौराहा आ गया है, जो भी मिले वह उससे कहती कि बौराहा आ गया है। वह सूरज भगवान को अर्घ देते हुए कहती थी, समाज को रखिओ, गांव को रखिओ और उसके पीछे बौराहा को रखिओ। ऐसे मॉ-बाप हुआ करते थे, लेकिन आज वह आशीर्वाद, वह शुभकामना आंसुओं में तब्दील हो गयी है, घोर उपेक्षा का प्रतीक हो गयी है। इसलिए हम आज केंद्र सरकार से आग्रह करना चाहते हैं कि यह जो हड्डी टूटी हुई है, यह जो हड्डी झुकी हुई है, यह जो कमर झुकी हुई है, उसके पेट से इंजीनियर निकला है, उसके पेट से आई.ए.एस. निकला है, उसके पेट से आई.पी.एस. निकला है, उसके पेट से साहित्यकार निकला है, उसके पेट से कथाकार निकला है और सब कुछ उसने अब दान के रूप में इस समाज को सौंप दिया है। इसलिए आज उसकी कमर झुक गयी है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी सुरक्षा करें।
महोदया, जब सामाजिक सुरक्षा पेंशन हम गांव में देने लगे तो बुढ़िया को सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिलती थी। चार-पांच महीने की पेंशन मिली तो उसकी बहू पैर दबाने के लिए आयी। बुढ़िया कहती आज क्या बात है, बहू पैर दबाने के लिए आयी है और पैर दबाते-दबाते बहू पूछती सुनिए, बुढ़िया कहती हां कहो, क्या चाहिए, बहू कहती स्नान करने के लिए तौलिया है, धोती नहीं है, बुढ़िया मां कहती कि आज हमारा पैसा मिला है, बेटा को दे देना, धोती खरीद लेगा। उसने रूपया दिया, बहू ने रूपया ले लिया और कल से पैर दबाना बंद कर दिया। बेटा आया, वह देख रहा है कि मां खांस रही है, उसने अपनी पत्नी से कहा कि इनको थोड़ा दवा दे दो। मां की पेंशन के कारण उसका बेटा-बहू उसे जीवित रखना चाहता है, उसकी इज्जत करना चाहता है कि अगर यह जीवित रहेगी तो कम से कम सब्जी और तरकारी तो हमें प्राप्त होगी, कम से कम हमारा नून-तेल का हिसाब-किताब तो रहेगा। इसलिए जब वह बुढ़िया खांसती है तो वह अपनी पत्नी से कहता है कि जरा दवा लाकर देना। वह देखता है कि माँ खाँस रही है। सामाजिक सुरक्षा पैंशन में जो आप 400 रुपये महीना देते हैं, उसमें बुढ़िया की इज्ज़त बढ़ जाती है, बुढ़वा की इज्ज़त बढ़ जाती है। अगर आप इनको पैंशन देंगे तो उसका बेटा और बहू भी उसकी इज्ज़त करेंगे। मैं बड़ी पीड़ा से कहना चाहता हूँ कि लाखों करोड़ों रुपये, न जाने कितने टन कागज़ खर्च हो गए, न जाने कितने टन रोशनाई खर्च हो गई गेसुओं पर, चमचम चोलियों पर, लेकिन उनकी अर्थी अंधेरे में उठी, कोई उनको कंधा देने वाला नहीं था, कोई पहरेदार नहीं था। चमचम चोलियों और गेसुओं पर न जाने कितने टन कागज़ खर्च हुए, रोशनाई खर्च हुई, लेकिन जिसने संपूर्ण जीवन समाज को अर्पित कर दिया, जिसकी रोशनी से समाज को रोशनी प्राप्त हुई, जिसके शरीर से बहुत सारे पौधे निकले और वृक्ष बने, समाज को छाया मिली, समाज को फल प्राप्त हुए, आज अंधेरे में उसकी अर्थी उठती है, कोई कंधा देने वाला नहीं है। यह उस त्याग और कुर्बानी के प्रतीक का अपमान है।
महोदया, हम आपके माध्यम से सरकार से आग्रह करना चाहते हैं कि जय प्रकाश अग्रवाल जी ने जो मांगें की हैं और जो सुझाव उन्होंने दिये हैं, हम चाहते हैं कि जो वरिष्ठ नागरिक हैं, उनके संपूर्ण जीवन की जिम्मेदारी के लिए केन्द्र सरकार इतनी निधि की व्यवस्था करे ताकि वह सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ जीवन जी सकें। एक समय था कि श्रवण कुमार अपने माँ और पिता को लेकर तीर्थाटन के लिए जा रहा था। दशरथ के तीर से वह मरा और उस पीड़ित माँ-बाप की बददुआ से दशरथ को दुख भोगना पड़ा। आज हम श्रवण कुमार की अपेक्षा नहीं करते। आज हम श्रवण कुमार की खोज भी नहीं कर सकते। वह समय की उपज थी, वह काल और समय का नियमन था। आज इस अवस्था में जब श्रवण कुमार नहीं है, आज इस अवस्था में जब बेटे पिता और माँ की सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं, वे स्वयं बोझ से दबे हुए हैं, पारिवारिक बोझ से दबे हुए हैं। ऐसी अवस्था में हम चाहते हैं कि सरकार स्वयं इन वरीय नागरिकों की सुरक्षा और उनके पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी ग्रहण करे ताकि हम देखें कि यह भारत की एक बहुत बड़ी आबादी जीवित रहे जो अनुभव का खजाना भी है। इसलिए हम कहते हैं कि माँ तीरथ है, माँ पूजा है, माँ ज़िन्दगी की रफ्तार है, माँ दिशा-निर्देश है।
महोदया, हम चाहते हैं कि श्री जय प्रकाश अग्रवाल जी द्वारा लाए गए इस बिल में जो सुझाव और डिमांड है, केन्द्र सरकार इस दिशा में उस पर ध्यान देकर कार्रवाई करे और विश्व में भारत के आदर्श को प्रतिस्थापित करे कि भारत की सरकार भी बुज़ुर्गों के प्रति संवेदनशील है, जिन्होंने राष्ट्र का पोषण और संपोषण किया है, उनकी सुरक्षा के लिए सरकार चिन्तित है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Thank you Madam Chairperson for giving me this opportunity to speak on the Provision of Social Security to Senior Citizens Bill initiated by hon. and senior Member, Shri J.P. Agarwal.
Madam, at the outset I would like to appreciate the efforts of the hon. Member, Shri J.P.Agarwal for bringing about such an excellent Bill pertaining to the welfare of senior citizens. Now a days, social security to senior citizens has become very essential. By 2050 nearly one-fifths of the world population will be above 60 years of which India the proportion would be around 24 per cent. Thanks to the increase in the average life expectancy. Generally, senior citizens suffer from economic insecurity, physical and psychological problems and also psycho social problems. The existing old age pension scheme does not meet fully the needs of the elderly people. Solitude, neglect, indifference and abuse are some of the problems that elders in our country today are faced with.
A recent survey conducted by Help Age India reveals that the elderly people face abuse from their own family members. In Calcutta, 40 per cent of the elders are facing abuse; in Delhi 30 per cent of the elders are facing abuse from their own family members. The percentages in Mumbai and Chennai are 29.46 and 27.56 respectively. Disappearance of joint family systems, Westernised way of living is some of the factors that push elders to lead a miserable life. Economic prosperity is also one of the reasons. Disrespect, neglect and verbal abuse are faced by elders very often. The provisions of the existing law, namely, Maintenance and welfare of parents and senior citizens Act, 2007 does not give adequate security to the elderly persons. That is why, I support this Bill it has been brought by hon. Member, Shri J.P.Agarwal and it has paved the way to fulfil the directions of the General Assembly of the United Nations.
Madam, hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Puratchi Thalaivi has doubled the old age pension from Rs. 500 to Rs. 1,000. But the Central Government is providing only Rs. 200 per month. I would like to request the Central Government to emulate the path shown by the hon. Chief Minister of Tamil Nadu and enhance the OAP from Rs. 200 to Rs. 1000. Now, under the OAP, an old age pensioner can get only Rs. 6.60 per day. It is very pitiable and meagre. How can one person manage with a meagre amount of Rs. 6.60 per day? The hon. Minister, Shri Jairam Ramesh once said that it was an insult to the dignity of our nation. The Government may think over the plight of such persons. Our rich cultural values are on the wane. Disintegration of families is the order of the day. As average life span increases, the senior citizens, the grey haired men and women will be more in numbers in our country. Consequently, need for providing social security to the senior citizens has become more essential.
As the need arises, we need more Geriatricians, the doctors. Counselling and healing touch centres for the elderly people have to be set up as our hon. Member Shri Jai Prakash Agarwal has said just now. Both the Centre and the States have to formulate and chalk out social welfare measures to the aging persons. On the evening days of life, the elders need affection and bondage. They need nothing but affection and bondage. So, it is the healing medicine for them. In their old age, affection and bondage given by their children is the healing medicine to them.
So, in fine, I support the Bill and I would like to conclude my speech with these words which is for all: “The best thing you can do for your elders is to spend your leisure time with them.” With these words, I conclude my speech.
श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा): महोदया, श्री जयप्रकाश अग्रवाल जी वरिष्ठ नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए जो उपबंध करने वाला विधेयक लाये हैं, मैं उसका स्वागत करता हूं।
वैसे तो जयप्रकाश जी हमारे सभी सांसदों का ख्याल रखते हैं कि किसी के आवास में कोई तकलीफ है या नहीं है। आज वे वरिष्ठ नागरिकों की चिन्ता लेकर आये हैं, मैं उनको इसके लिए बहुत धन्यवाद देता हूं। यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है, बहुत दर्द भरा विषय है और इस पर वे जो बोले, वह भी इतना अच्छा बोले कि मुझे इस पर ज्यादा बोलने की जरूरत भी नहीं है।
हमारे समाज में वरिष्ठ नागरिकों को बहुत अच्छा स्थान दिया गया है। हमारी पार्लियामेंट में एक श्लोक लिखा हुआ है, जिसका मतलब होता है कि उस सभा का क्या मतलब कि जिसमें वरिष्ठ लोग बैठे न हों और उन वरिष्ठों का क्या मतलब, जो धर्म का पालन न करते हों और उस धर्म का क्या मतलब, जो सत्य पर आधारित न हो और उस सत्य का क्या मतलब, जो समष्टि का कल्याणकर्ता न हो। अगर मानें तो हमारी संस्कृति में पुराने समय से वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान दिया गया है। वैसे पहले जमाने में जब हम संयुक्त कुटुम्ब में, संयुक्त परिवार में रहते थे तो उनका खूब महत्व था। उस समय जो वरिष्ठ लोग थे, उनका परिवार में एक प्रभावशाली स्थान था, बच्चों को भी वे पालते थे। धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाओं द्वारा उनको अच्छे संस्कार देने का भी, शिक्षा देने का भी काम करते थे और अपने परिवार को, परिवार के युवाओं को अपने अनुभव का लाभ देते थे और समाज के लिए दिवादांडी बन गये थे। इसके बाद कौटुम्बिक भावना में परिवर्तन आया, जो संयुक्त परिवार थे, उऩकी जगह विभक्त परिवार की भावना बढ़ रही है और जिन माता-पिताओं ने कष्ट सहन करके अपने बच्चों को बड़ा किया है, वही बच्चे आज अपने माता-पिता को बोझ समझने लगे हैं। वृद्ध माता-पिता के घर में होने से उनके स्वतंत्र जीवन में वे तकलीफ महसूस करने लगे हैं। बाद में ऐसे वृद्धों की उपेक्षा की जाती है और उनका ठीक से ध्यान भी नहीं रखा जाता है। कई पीड़ित, उपेक्षित माता-पिता बाद में वृद्धाश्रम में जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। वृद्धाश्रम जो हैं, वे हमारे देश की प्रगति की निशानी नहीं हैं, वे अधोगति की निशानी हैं। ज्यादा वृद्धाश्रम होना कोई अच्छी बात नहीं है। वृद्धाश्रम परदेशों में ठीक है, लेकिन हमारे देश की जो संस्कृति है, सभ्यता है, उसमें माता-पिता को तो हमने देवता समान समझा है और उनकी पूजा होती है। आज वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा बहुत जरूरी है।
मैं एक बार स्टेट बैंक में गया था तो वहां पेंशन लेने के लिए बड़ी लम्बी लाइन थी। वहां उनके लिए एक ही काउण्टर था, उसमें 70-80 साल के लोग खड़े थे। जो साहब लोग थे, वे अन्दर बैठकर चाय पी रहे थे। मैंने उन्हें बोला कि इतने वृद्ध लोग लाइन में खड़े हैं, कोई गिर भी सकता है तो क्या आप दो काउण्टर चालू नहीं कर सकते, लेकिन वे असंवेदनशील आफिसर्स ने उनकी परवाह भी नहीं कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति से हमारे वरिष्ठ लोग गुजर रहे हैं।
ऐसे वरिष्ठ नागरिक जब घर में अकेले रहते हैं, तो उनको जान का और ज्यादा जोखिम रहता है, क्योंकि, चोर, बदमाश लोग ऐसे घरों को पहले टार्गेट करते हैं कि जिसमें ऐसे वृद्ध रहते हों और बाद में उनके नौकर के साथ मिलकर धन लूटने के इरादे से उनकी हत्या भी कर देते हैं। ऐसे वरिष्ठ नागरिकों की सलामती और पोषण की जिम्मेदारी गम्भीरता से निभानी चाहिए। वरिष्ठों को बीमारी के वक्त ठीक से सहारा भी नहीं मिलता है। कोई उनको पैसा देने वाला भी नहीं होता है। ऐसे वृद्ध लोगों की मुफ्त ट्रीटमेंट सभी अस्पतालों में हो। मैं इसकी मांग करता हूं। वरिष्ठ नागरिकों के पोषण एवं सलामती के लिए सरकार आर्थिक मदद करे और सरकार कड़ा कानून बनाकर उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करे। मैं यह मांग करता हूं, ताकि वरिष्ठ नागरिक सम्मान तथा स्वाभिमान से जी सकें। जो अग्रवाल साहब ने प्रस्ताव पेश किया है, उसके साथ मैं अपने आपको सम्मिलित करता हूं।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदया, जय प्रकाश अग्रवाल साहब ने बहुत अच्छा काम किया है कि देश में बुजुर्गों की इज्जत बढ़े और बुजुर्गों का सम्मान हो और उनकी ठीक देखभाल हो सके, इसके लिए वे विधेयक लाए हैं।
महोदया, मैं भगवान बुद्ध के समय से शुरू करता हूं। भगवान बुद्ध वैशाली में आए थे, तब उन्होंने कहा था - " वज्जिनाम सत अपरिहानिया धम्मा। " यह पाली भाषा में है, पाली में उनका प्रवचन होता था। इसका मतलब अंग्रेजी में है - Seven virtues of Vajjians leading not to decline. सत अपरिहानिया धम्मा, मतलब सात धर्मों का जिस समाज में पालन होगा, उसकी तरक्की होगी, उसकी अवनति नहीं होगी। सात धर्म, सेवेन वर्ज्यूज और वज्जियंस लीडिंग नॉट टू डिक्लाइन। वज्जी समझो वैशाली, लिच्छवी रिपब्लिक दुनिया के मुल्कों में सबसे पहले था, वहीं भगवान बुद्ध ने वचन दिया। उन्होंने जो कहा, मैं संक्षेप में बताना चाहता हूं।
नंबर एक, वह अपने शिष्य आनंद से कहते हैं कि आनंद वज्जी संघ के लोग आपस में एक साथ बार-बार असेंबल होते हैं, एक साथ जुटते हैं। महोदया, डेमोक्रैसी का कांसेप्ट वहीं से शुरू होता है कि एक साथ जुटकर लोग विचार-विमार्श करते हैं। यहां पार्लियामेंट है, असेंबली है, तो कहीं पंचायत है, समिति है, सभा है, सोसाइटी है, जहां आपस में बैठकर निर्णय होता है। ढाई हजार वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने कहा था कि यहां बार-बार लोग जुटकर एक साथ असेंबल होते हैं, बैठकर विचार-विमर्श करके निर्णय लेते हैं, उसे लागू करते हैं। यह उनकी दूसरी बात है। तीसरी बात, जब नियम बनाते हैं, तब हुक्म जारी करते हैं। Democracy is the rule of law. विद्वानों ने वहीं से इसे लिया कि कानून का राज हो, हम लोग यहां कानून बनाते हैं और वह देश में लागू होता है। इसी तरह से यह डेमोक्रैसी का प्रथम सिद्धांत है। यह तीसरा है।
चौथी बात, यहां बुजुर्गों की इज्जत है, सम्मान है। बुजुर्गों की बात लोग सुनते हैं। चौथा सूत्र है - Directive principles of the Constitution, जो उस समय वज्जियन रिपब्लिक का था कि बुजुर्गों की इज्जत और सम्मान जिस समाज में होगा, उस समाज की तरक्की होगी, उसकी अवनति नहीं होगी, उसकी गिरावट नहीं होगी।
Fifth directive principle, जहां महिलायें और बच्चे जिस समाज में सुरक्षित हों, उस समाज की तरक्की होगी। छठा था कि पवित्र स्थल, जो जन्मभूमि, पुण्यभूमि, कर्मभूमि आदि सभी हैं, उनका सम्मान और सुरक्षा हो। सातवां और अंतिम था कि जो धर्माचार्य हैं, विचारक हैं, ज्ञानी हैं, वैज्ञानिक हैं, ध्यानी हैं, जिस समाज में इनकी इज्जत होगी, इन सात धर्मों का जहां पालन होगा, उस समाज की तरक्की होगी, अवनति नहीं होगी।
सात धर्मों में जो चौथा सिद्धांत है, उसी को लाकर बाबूजय प्रकाश अग्रवाल जी ने ठीक काम किया है कि बुजुर्गों की इज्जत और सम्मान के लिए, उनकी देखभाल और हिफाजत के लिए एक निजी विधेयक इस सदन में लाए हैं। इससे हम लोगों को मौका मिल रहा है कि इस पर बहस चलायी जाए और इसे सरकार स्वीकार करे।
महोदया, किसी भी सभ्य समाज में देखा गया है, व्यावहारिक और सैंद्धांतिक रूप दोनों से, वैसे तो अपने देश की संस्कृति जो भगवान बुद्ध के समय से शुरू हुयी और शास्त्रों में भी यह रही है। हम लोगों ने कानून बनाया है कि जिन बुजुर्गों का बेटे-बेटी देखभाल नहीं करते हैं, उनके लिए कानून भी बनाना पड़ा, चूंकि व्यवहार आजकल बदल रहा है। ले लो, ले लो दुआएं मां-बाप की, सर से उतरेगी गठरी पाप की। हमारे शास्त्र और पुराण में है कि माता-पिता का कितना सम्मान होना चाहिए लेकिन व्यवहार में देखा कि जहां-तहां कमियां हैं इसलिए कानून भी बनाना पड़ रहा है। इसलिए हम देख रहे हैं कि सोसायटी में जो लोग हैं उसमें कितने प्रकार के लोग हैं? एक तो नौकरीपेशा लोग होते हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी विभाग में लगा दी। उनके लिए सभ्य मूल्क में, सभ्य जगह में यथासंभव पेंशन का प्रावधान है। जो व्यक्ति अपनी जिंदगी, जवानी, बुद्धि, बल और विवेक सब किसी काम में लगा दिया, बूढ़ा होने के बाद जब वह कमजोर हो गया, अक्षम हो गया उस हालत में उनकी जीविका ठीक चले और नहीं तो वे उपेक्षित भी हो जाते हैं। विदेश में तो परिवार का कोई कंसेप्ट ही नहीं है। पिता जी बूढ़े हो गए। लड़का जवान हो गया और शादी-व्याह कर के वह बाहर हो गया। बूढ़ा-बूढ़ी को ओल्ड ऐज होम में रख दिया। जन्म दिन के अवसर पर उन्हें होटल में ले गया, खाना खिला दिया औहर माला पहना दिया। हम बाहर में यही सुनते हैं। इसलिए हम लोग यहां अपने बाल-बच्चे का जितना देख-रेख करते हैं, लोग अपने कुत्तों को भी देश में ज्यादा देखभाल करते हैं। बाल-बच्चा तो हट जाएगा, साथ छोड़ देगा लेकिन कुत्ता साथ में रहेगा। जब हम विदेश और यहां से तुलना करते हैं कि भाई क्या है? वे लोग ज्यादा दावा करते हैं कि हम लोग तो विकसित हैं लेकिन हम लोग की जो परिवार की संस्कृति है कि परिवार में जो बूढ़ हो गए हैं, कहीं-कहीं देखा जाता है कि उनको कोई नहीं सुनता है। अपना बाल-बच्चा भी है तो वे लोग सब कुछ बांट लिया और अलग हो गया। पहले संयुक्त परिवार का कंसेप्ट अपने यहां था। तीन, चार, पांच, या आठ पीढ़ी तक लोग साथ होते थें। अब विदेशी संस्कृति का कुप्रभाव हमारी संस्कृति पर भी पड़ने लगा। इसलिए संसद सावधान और सजग है, कानून भी बनाया गया है कि कैसे उनका रोजी-रोटी ठीक ढंग से चले। इसलिए पेंशन का प्रावधान है जो नौकरी में हैं। ओल्ड ऐज पेंशन का प्रावधान पहले नहीं था लेकिन इसका प्रावधान कुछ वर्षों से हुआ है। इंदिरा गांधी पेंशन योजना नाम रखा गया लेकिन उसमें बीपीएल के लिए पेंशन का प्रावधान है। जो बुर्जूग हैं उनके लिए पहले 200 रूपये पेंशन का प्रावधान था फिर 300 रूपये का प्रावधान भारत सरकार ने किया है।
महोदया, यह पहले 100 रूपये का ही था। 75 रूपये भारत सरकार और 25 रूपये राज्य सरकार देती थी। कुछ राज्य अपनी तरफ से पेंशन दे रहे हैं। भारत सरकार ने इसे 200 रूपये किया। 200 रूपये के बाद अब इसे 300 रूपये किया गया है। अभी जो देश के नामी-गिरामी संगठन हैं, एनजीओ, गैरसरकारी संगठन या उसे सिविल सोसायटी कहिए, श्रीमती अरूणा राय और निखिल डे, ये सब पिछले सत्र के समय में प्रदर्शन और जंतर-मंतर पर धरणा किए थे तो हम वहां पर गए थे। उन्होंने अपना सवाल उठाया था। उनकी मांग थी कि देश के सभी बुजूर्गों को कम से कम तीन हजार रूपये का पेंशन होना चाहिए। हम को उनकी मांग जायज लगती है। जो किसान हैं उनके लिए कुछ प्रावधान नहीं है। वे भी जिन्दगी भर कमाते-कमाते, मतलब किसान मशीन की तरह खट रहे हैं। जाड़ा, गर्मी, बरसात हर समय किसान अपने खेत में खटता है। जब बुजूर्ग हो जाता है तो उनकी देखभाल के लिए इंतजाम नहीं है। उनके लिए पेंशन का प्रावधान नहीं है। बीपीएल के लिए है लेकिन किसानों के लिए नहीं है। मजदूर बीपीएल हैं तो उनके लिए है। ...( व्यवधान) दिल्ली में 1000 रुपये है। लेकिन उससे क्या होता है। हम लोग यह मानकर चलते हैं कि अगर 1000 है, तो चाय वगैरह के लिए हो जाएगा या बूढ़ा के आएगा, तो धिया-बुतवा भी उसको थोड़ा लाड-प्यार देंगे कि बूढ़े के लिए 1000 रुपये आते हैं, तो उसका कुछ खर्च का काम चल जाएगा। इसलिए यह थोड़ा साहस वाला काम सरकार करे। श्री जय प्रकाश अग्रवाल जी, आप सक्षम हैं। जब हम दुनिया में अपनी जीडीपी का दावा करते हैं कि हम one of the largest democratic country of the world हैं। हम सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। हमारी संस्कृति है कि अयं निजो परेवेति गणना लघुचेतसाम, उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम। हमको ग्लोबलाइजेशन सिखाने चले हैं। वैश्वीकरण हमारी संस्कृति में पहले से है। वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात विश्व एक परिवार सदृश है। राजा रन्ति देव का दर्शन हमारे यहां है। राजा रन्ति देव का दर्शन है - न हम कामये राज्यं, न स्वर्गम्, न पुनर्भवम्। अर्थात हमें कोई राज्य की कामना नहीं है, न कोई स्वर्ग की कामना है, न मोक्ष पाने की अभिलाषा है। हमारी एक ही अभिलाषा है कि पृथ्वी पर जो प्राणी मात्र हैं, वे तकलीफ से मुक्त हो जाएं, कोई दुख-तकलीफ न रहे। हमारा इतना ऊंचा दर्शन है, इतनी ऊंची संस्कृति है जो हमारे पुरखों ने दी है। भगवान बुद्ध ने देखा कि एक जगह बुढ़ापा है, दूसरी जगह देखा कि एक बीमार आदमी है, तीसरी जगह देख कि मरे हुए आदमी को लोग ले जा रहे हैं। इन सभी पीड़ाओं को देखकर भगवान बुद्ध, जो एक राजकुमार थे, निर्वासन में चले गए और जब ज्ञान हासिल हुआ, तब जाकर फिर उपदेश दिए। दुनिया के अनेक मुल्कों में उनके उपदेश और धर्म फैल गया। हमारी संस्कृति में ऐसा ऊंचा दर्शन है। यही केन्द्र सरकार से हमारी अपेक्षा है और राज्य सरकारें भी इस पर ध्यान दें। राज्य सरकारों की हालत और भी खराब है। पहले बिहार में 100 रुपये दिए जाते थे जिसमें से 75 रुपये भारत सरकार और 25 रुपये राज्य सरकार देती थी। फिर भारत सरकार ने बढ़ाकर 300 रुपये कर दिए और राज्य सरकार पहले जो 25 रुपये दे रही थी, वह भी बंद कर दिया और भारत सरकार वाले 300 रुपये के लिए ही असत्य प्रचार कर रही है कि हमने 300 रुपये दिए। इसलिए मैं चाहता हूं कि भारत सरकार और राज्य सरकार, दोनों कमर कसें, समाज में जो बुजुर्ग हैं, नौकरीपेशा वालों के लिए पेंशन है, जिस पेशे में पेंशन नहीं है, उसमें भी प्रावधान हो। किसान-मजदूर आदि जो लोग हैं, उन सभी लोगों के लिए कम से किम 3000 रुपये पेंशन का प्रावधान करें। अग्रवाल साहब की मांग थी कि इसे जीडीपी से जोड़ दिया जाए। यह बात अच्छी है, जोड़ दिया जाए, लेकिन इसमें ऐसा नहीं है सरकार की बैंकरप्सी हो जाएगी, केवल छाती थोड़ी चौड़ी करने की जरूरत है, माथा थोड़ा बड़ा करने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान, जो इतना विशाल देश है, जो दुनिया का छठा हिस्सा है, आबादी हमारी 16-17 प्रतिशत और जमीन 2.4 प्रतिशत है। अमेरिका से हम सीखेंगे। अमेरिका से हमारी क्या तुलना है। वहां कहते हैं कि प्रजातंत्र के लिए, प्रजातंत्र से संचालित शासन व्यवस्था प्रजातंत्र है। अब्राहम लिंकन से प्रजातंत्र सीखा है। हिन्दुस्तान में जनतंत्र पैदा हुआ है, इसलिए यह हमारी संस्कृति है। इसलिए हम दुनिया के मुल्कों को बताएं कि जो हमारे बुजुर्ग हैं, उनके लिए समाज में सोशल सिक्योरिटी, सामाजिक सुरक्षा है, हम दायित्व लेते हैं कि हमारे समाज में कोई बुजुर्ग तकलीफ में न रहे। उनको सुविधाएं दी जाएं। इनकम टैक्स, रेल, हवाई जहाज, बैंक आदि में पहले से सीनियर सिटिजन के लिए कुछ सुविधाएं हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए सोसाइटी में जहां कहीं भी बुजुर्ग देखे जाएं, उनके लिए सरकार सोशल सिक्योरिटी का इंतजाम करे। अभी के हिसाब से उनको कम से कम 3000 रुपये महीना देने का प्रावधान करे।
अगर हिसाब जोड़ा जाए तो यह कोई इतना आर्थिक बोझ नहीं है कि जिसे सरकार न उठा सके। सिर्फ सरकार को साहस दिखाने की जरूरत है। सीनियर सिटीजंस के इलाज के लिए, क्योंकि बुढ़ापे में बीमारियां ज्यादा आती हैं, इसलिए उनके इलाज का, मनोरंजन का, देखभाल का, यात्रा का, सभी सुविधाओं का इंतजाम हो जाए तो दुनिया के मुल्कों में हिन्दुस्तान गौरवान्वित होगा। सरकार साहस दिखाए, यही मुझे कहना है।
इन्हीं शब्दों के साथ माननीय सदस्य ने जो गैर सरकारी विधेयक रखा है, मैं उसका समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी (अहमदनगर): सभापति महोदया, माननीय जयप्रकाश अग्रवाल ने जो गैर सरकारी विधेयक सदन में पेश किया है, मैं उसका समर्थन करता हूं। मैं इस बारे में कहना चाहता हूं कि उन्होंने बहुत वेदना के साथ इस विषय को रखा है। इस बारे में भोला सिंह जी ने और रघुवंश बाबू ने जो अपने विचार यहां रखे हैं वे काफी महत्वपूर्ण हैं। यह ठीक बात है कि जिनके हाथ में चाबियां होती हैं, लोग उनके साथ जुड़े रहते हैं। हमारे देश में काफी समय पहले परिवार नियोजन कार्यक्रम चला। उससे हमारे परिवार सीमित होते गए। किसी के एक बच्चा तो किसी के वह भी नहीं। ऐसी परिस्थिति में वृद्धाश्रम बनाने की बात आई। यह भी अच्छी बात है कि सीनियर सिटीजंस को पेंशन का प्रावधान किया गया है। अलग-अलग राज्यों में पेंशन का अलग-अलग रूप है और राज्य सरकारों ने उन्हें अन्य सुविधाएं भी दी हैं। बैंक्स ने भी सुविधा दी है कि 65 वर्ष से ऊपर वाली आयु के लोगों को एक टका ज्यादा ब्याज मिलेगा। गुजरात सरकार ने बसों में यात्रा करने में रियायत दी है। मेरा आपसे अनुरोध है कि इनकी पेंशन 5,000 रुपए मासिक की जाए और उसे महंगाई के सूचकांक से जोड़ना चाहिए। जैसे आज जब हम इसे अमल में लाएंगे तो जिस चीज की कीमत एक रुपया है, वह 20 रुपए की आगे चलकर हो जाएगी। आप जो 300 रुपए पेंशन दे रहे हैं, उसकी कीमत अब 3,000 रुपए हो गई है इसलिए कम से कम इन्हें 5,000 रुपए पेंशन देनी चाहिए, ऐसा मेरा मानना है।
मैं पुनः इस गैर सरकारी विधेयक का समर्थन करता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): सभापति महोदया, जयप्रकाश अग्रवाल जी कुछ ऐसे विषयों पर गैर सरकारी विधेयक लाते रहते हैं जो बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इससे पहले वह सदन में कम्पलसरी वोटिंग का बिल लाए थे। उस पर सदन में काफी चर्चा हुई और हमने सदन में तथा सदन के बाहर भी उन्हें इसके लिए धन्यवाद दिया था कि आप इस तरह के चिंतनशील सांसद हैं, और संघर्ष करते रहते हैं। संघर्ष आप दिल्ली में भी कर रहे हैं, हमें पता है। आप लोक सभा की आवास समिति के प्रमुख भी हैं और सांसदों के आवास की जिम्मेदारी भी आप पर है। कभी-कभी आप कुछ अधिकारियों के साथ सांसदों का सम्वाद भी कराते हैं जैसे रेलवे में या बीएसएनएल के संदर्भ में सांसदों को क्या तकलीफ है? ऐसा संवाद आपने कराया था।
आप आज जो यह विषय लाए हैं, लगता है कि आपका पूरा हृदय मानवता से भरा हुआ है। यह विषय अपने आपमें बहुत महत्वपूर्ण है। मैं अपनी बात शुरू करने से पहले कहना चाहता हूं कि मेरे साथ एक अधिकारी थे, यहां उनका नाम नहीं लूंगा। वह बड़े अधिकारी बन गए। उस समय मैंने उनसे पूछा कि आप मां-बाप की सेवा क्यों नहीं करते, जबकि आप सक्षम हैं, तो उन्होंने कहा कि मां-बाप ने मेरे लिए किया ही क्या है। जैसे रघुवंश बाबू बता रहे थे कि परिवार से झगड़ा शुरू होता है। ठीक है कि हम भौतिकतावादी संस्कृति में जी रहे हैं और पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण कर रहे हैं, लेकिन उसका परिणाम यह हो रहा है कि हम परिवार से पृथक हो रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि मां-बाप ने हमें पैदा किया है, यही बहुत बड़ी बात है। जैसा अभी कहा गया कि भगवान को किसी ने नहीं देखा, लेकिन मां-बाप को देखा है इसलिए उन्हें ही भगवान मानो, उसने कहा कि नहीं।
18.00 hrs. मैं मेरी मेहनत से अफसर बना हूं। मैं उसकी इस भावना से सहमत नहीं हूं। मैंने उससे कहा कि आज तो तुम अफसर हो लेकिन जिस समय आप पांच साल के थे और जिस समय तुम्हें स्कूल भेजना था या मजदूरी में डालना था, ये काम तुम्हारा नहीं था। तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें स्कूल भेजने का काम किया जिसके कारण तुम पढ़-लिखकर अफसर हो गये।
सभापति महोदया : मेघवाल जी, 6 बज गये हैं, आपकी बात अगली बार पूरी हो जाए तो ठीक रहेगा। अब शून्यकाल ले लेते हैं।