Lok Sabha Debates
Discussion On The Agrarian Situation In The Country. on 19 July, 2017
Sixteenth Loksabha an> Title: Discussion on the agrarian situation in the country.
HON. DEPUTY SPEAKER: The House shall now take up Item No.16 -- Discussion under Rule 193 on the agrarian situation in the country.
Shri Jyotiraditya M. Scindia.
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया (गुना) : उपाध्यक्ष महोदय, आज के इस दिवस पर मैं कहना चाहूंगा कि सौ साल पूर्व चंपारण में सत्याग्रह का एक आंदोलन खड़ा किया गया था, जो किसान विरोधी नीति के वातावरण में हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने किसानों के हित में वह आंदोलन रचा था, जिसके आधार पर उस समय की मौजूदा सरकार को घुटने टेकने पड़े थे, आज वैसा ही एक माहौल पूरे देश में उत्पन्न हो चुका है। जब किसान अपनी मांगों को लेकर, अपनी जायज मांगों को लेकर सरकार के समक्ष जाता है, तो केवल उसकी आवाज को ही नहीं दबाया जाता, बल्कि उसकी छाती को गोलियों से छलनी किया जाता है। यह वह देश है, जब वर्ष 1960 में हम अनाज का आयात करना चाहते थे, अमेरिका द्वारा पीएल 480 इस देश में लगाई गई थी, हमें अपने सोने को गिरवी रखना पड़ा था और आज इंदिरा गांधी जी की हरित क्रांति के आधार पर, राजीव गांधी जी की दूध की क्रांति के आधार पर और किसान की मेहनत और मशक्कत के आधार पर आज हमारा देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है। आज उसी किसान की छाती को छलनी किया जाता है। पूनम पाटीदार, 23 साल का नौजवान, जो बी.एस.सी. की पढ़ाई कर रहा था, अपने पिता के आकस्मिक निधन के आधार पर उसे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार की आमदनी के लिए वह खेती में लग चुका था।
नोटबंदी के बारे में राष्ट्र भर में और विश्व भर में एक माहौल, एक मायाजाल पिरोया जा रहा है कि यह एक सर्जिकल स्ट्राइक है। उस सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में असली कहानी मैं आपको बताना चाहता हूं।
बड़ी मेहनत और मशक्कत के आधार पर वह अपना उत्पादन मंडी में बेच पाया। उसे 10,800 रुपये का यूको बैंक का चेक मिला। चार बार वह बैंक का चक्कर काटता रहा और हर बार बैंक के मैनेजर ने उसको कहा कि दस दिन बाद आओ, अभी मेरे पास तुम्हें देने के लिए नकद राशि नहीं है। उसी पूनम पाटीदार के परिवार में, उसकी मां के आपरेशन के लिए उसे राशि की जरूरत थी। उस चेक की नकद राशि उसे नहीं मिली। 50 हजार रुपये का ऋण उसने लिया और जब आशा की किरण पूरी तरह से समाप्त हो चुकी थी, तब वह किसान के आंदोलन में सम्मिलित हुआ और अपनी मांगें रखने में उसकी छाती पर पुलिस के अफसर और सरकार द्वारा गोली चलाई गई। जो दृश्य मैंने मंदसौर, पीपिया मंडी में देखे हैं, वे हृदय को झंझोड़ने वाले दृश्य हैं। चाहे पूनम चंद की बात हो, मैं जानना चाहता हूं कि सरकार उस परिवार को क्या जवाब देगी, चाहे अभिषेक पाटीदार की बात हो, जो 19 वर्षका बालक, उसके परिवार को सरकार क्या जवाब देगी? चाहे कन्हैया लाल पाटीदार हो, जिसके घर में 18 साल की बच्ची है, जिसका लग्न होना है, 11 साल का बच्चा जो पढ़ाई कर रहा है, चाहे मांगीलाल धनकर, जो 30 वष्ाऩ का एक दिहाड़ी मजदूर था, चाहे घनश्याम धाकड़ हो और चाहे चैनराम पाटीदार हो, जिसका दो महीने पहले ही अक्षय तृतीया के दिवस पर लग्न हुआ था, आज उसकी पत्नी विधवा के रूप में अपना जीवनयापन कर रही है। एक ही क्षण में इन छह परिवारों के चिराग को सरकार ने मिटा दिया,...(व्यवधान) अगर आप पूर्व के इतिहास में जाएंगे तो मैं कहता हूं कि गलत काम गलत होता है सही काम सही होता है, एक गलत काम होने से दूसरे गलत काम का इंसाफ नहीं हो जाता। मैं स्पष्ट कह रहा हूं, मैं बेबाक इंसान हूं, गलत काम गलत होता है, सही काम सही होता है। आपको सरकार में इसलिए नहीं लाया गया था कि आप छह किसानों को छलनी कर दें।
उपाध्यक्ष महोदय, प्रजातंत्र में सरकार को जीवन की, उन्नति की, प्रगति और एक नए भविष्य की रखवाली की जिम्मेदारी दी जाती है। इनके हाथ में न लाठी, न पत्थर, न दंगा, लेकिन एक-एक करके इनको लाइन में खड़ा करके गोलियों से उड़ाया गया। सरकार, जिसे रक्षा करनी चाहिए, वह जानलेवा और हत्यारा बन जाए, तब देश में प्रजातंत्र कहां बचा, मैं इस प्रश्न को आपसे पूछना चाहता हूं। 700 किसानों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
यह सरकार बुजुर्गों की बात करती है, कमला बाई गांव की महिला जो 84 वर्षकी हैं, मैं उनके घर गया, इतने बड़े-बड़े आंसू के गोले, एक-एक कमरे के अंदर पुलिस ने रेड डाली, बाल पकड़ कर उसे घसीटा गया, पुरुष पुलिस ऑफिसर ने पैर से चेहरे पर लात मारी और उसके घर के एक-एक व्यक्ति और पोते को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। ...(व्यवधान) वह महिला न्याय के लिए आवाज उठा रही थी, सरकार का एक मंत्री या संतरी वहां नहीं गया। ...(व्यवधान) आपको भी गणेश सिंह जी समय मिलेगा। मैं उसके घर में गया हूं आप नहीं गए, आप कृपा करके सुन लीजिए, कृपा करके अपने प्रदेश के परिजनों की व्यथा सुन लीजिए। ...(व्यवधान) आपकी भी बारी आएगी। राकेश जी और गणेश जी मंदसौर में दुध का दुध और पानी का पानी हो चुका है।
उपाध्यक्ष महोदय, जब वह महिला गुहार लगा रही थी कि मुख्यमंत्री उनकी आवाज सुनें, सरकार का एक मंत्री या संतरी, एक भी व्यक्ति उसके घर नहीं गया, जब वह अनशन पर बैठीं थीं जब तक उसके बच्चे और पोते रिहा न हो गए। सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह देश की रक्षा करे, जनों की रक्षा करे, जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो प्रजातंत्र देश में कहां बचेगा। ...(व्यवधान) आप लोग रिअर व्यू मिरर में कब तक ड्राइविंग करोगे, कब तक पीछे देखकर गाड़ी चलाएंगे, गणेश सिंह जी आप आगे देखिए और लोगों को न्याय दिलवाइए। आप जितना जोर से यहां बोल रहे हैं उतने जोर से मध्य प्रदेश की जमीन पर लोगों के हित में न्याय दिलाने के लिए बोलिए। जिन घरों में आत्महत्याएं हुई हैं, वहां भी जाइए तभी मैं मानूंगा कि आप कुशल जनसेवक हैं और मैं आपकी प्रशंसा सदन में करूंगा। जहां एक तरफ सरकार किसानों की छाती पर गोली चला रही है दूसरी तरफ मुख्यमंत्री उन किसानों की जान पर मध्य प्रदेश में नीलामी की बोली लगाई गई, पहली घोषणा 1 लाख रुपये की गई, फिर घोषणा 5 लाख रुपये की घोषणा की गई, फिर 10 लाख रुपये की घोषणा की गई, सच कड़वा होता है, फिर 1 करोड़ रुपये की घोषणा की गई। जो लोग कहते हैं कि किसानों की रक्षा करेंगे, जब स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री, ...(व्यवधान) मैं विनम्रपूर्वक निवेदन कर रहा हूं कि आपकी भी बारी आएगी, मैं आपका बहुत सम्मान करता हूं, कृपा करके बैठ जाएं। ...(व्यवधान) मैं आपसे विनम्रपूर्वक निवेदन करता हूं, आपकी भी बारी आएगी। ...(व्यवधान) जब स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री, जिनको लोगों की जान की रक्षा करनी चाहिए, वह स्वयं उपवास पर बैठ गए। यह कहां की ... *है?...(व्यवधान) जो पार्टी हिन्दुत्व की बात करती है, जो पार्टी हिन्दुस्तानी सभ्यता की बात करती है, जो पार्टी हिन्दू धर्म की बात करती है,...(व्यवधान) जब परिवार शोक में होता है, हमारा दायित्व बनता है कि उनका ढांढस बंधाएं, सांत्वना दें। लेकिन यहां यह दृश्य निकला कि मंत्रियों द्वारा दूत भेजे गए, मंदसौर की पिपलिया मंडी के छः परिवार के लोगों को साढ़े चार सौ किलोमीटर मंदसौर से भोपाल बुलाया गया, कहा गया कि अगर मंच पर जाकर... * श्री गणेश सिंह (सतना) : आप प्रमाण दीजिए।...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: खुलासा है न्यूज चैनल का...(व्यवधान)I am not yielding. … (Interruptions) उसके बाद उपवास तोड़ा गया।...(व्यवधान) नारियल पानी से उपवास तोड़ा गया। ...(व्यवधान)
रसायन और उर्वरक मंत्री तथा संसदीय कार्य मंत्री (श्री अनन्तकुमार):इन्होंने जो भी बताया है, उसका प्रमाण, आथेन्टिकेशन होना चाहिए।...(व्यवधान) He should not mislead the House. … (Interruptions)
Whatever you are placing before the hon. House, you have to authenticate them. You should not be misleading.
SHRI JYOTIRADITYA M. SCINDIA: There is a video to prove that. … (Interruptions)
SHRI ANANTHKUMAR: Whatever he has said, I request the Chair to go into the record. If it is not authenticated, it should be expunged. … (Interruptions)
HON. DEPUTY SPEAKER: I will go through the record.
… (Interruptions)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : उपाध्यक्ष जी, जहां घर में जाकर किसानों को निकालकर पीटा गया, किसानों की बोली लगाई गई, उसके बाद उपवास में मंच पर गांधी जी के चित्र के पीछे छुप गए। ...(व्यवधान) वह दल गांधी जी के चित्र के पीछे छुपा है, जिस दल के एक सांसद कहते हैं कि नाथुराम गोडसे देशभक्त हैं।...(व्यवधान) वह दल गांधी जी के चित्र के पीछे बैठा है, जिस दल के हरियाणा के मंत्री कहते हैं कि अच्छा किया,...*का चित्र ग्रामोद्योग के कलैंडर से उतारकर ... * का चित्र लगाया क्योंकि बिक्री में कमी आई है।...(व्यवधान)
SHRI ANANTHKUMAR: I take strong objection to this. … (Interruptions) महात्मा गांधी जी के बारे में और महात्मा गांधी जी की राह पर यदि कोई पार्टी चल रही है, सरकार चल रही है तो नरेन्द्र मोदी जी की सरकार चल रही है।...(व्यवधान)
श्री बिष्णु पद राय (अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह) : ... * SHRI JYOTIRADITYA M. SCINDIA: I am not yielding. … (Interruptions) पार्टी के कार्यकर्ता कहते हैं, जिनके मंत्री ने कहा कि ... * यह बहुत आश्चर्य की बात है। मैं उन परिजनों को दाद देता हूं, जब मुख्यमंत्री जी वहां गए थे, विधवा महिला घूमकर बोली - अगर एक करोड़ रुपया मुझे दिया जा रहा है, मेरे पति की जान ली है, मैं दो करोड़ रुपए दूंगी, क्या मेरे पति वापिस दिलवाएंगे? मैं दाद देता हूं उस पिता को, जिस पिता ने घूमकर कहा कि अगर आप एक करोड़ मुझे दे रहे हैं, अनुमति प्रदान करने के लिए, मेरे पुत्र की जान लेने के लिए, तो मैं दस करोड़ रुपए आपको दूंगा क्या मुझे किसी की जान लेने की अनुमति देंगे? मुख्यमंत्री निरुत्तर रहे।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं मानता हूं कि किसान आत्महत्या कर रहा है। मध्य प्रदेश में पिछले 30 दिनों में 65 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, लेकिन एक भी संतरी-मंत्री उनके घर सांत्वना देने के लिए नहीं गया। स्वयं मुख्यमंत्री के गृह जिले सिहोर में 11 लोगों ने आत्महत्याएं कीं, लेकिन सांत्वना देने के लिए कोई नहीं गया। सबसे झंझोरने वाली कहानी सिहोर जिले के किसान सरदार बरेला की है। उसके पास बैल नहीं थे, तो उसने अपनी बेटी राधा और कुंती, जो 13 साल और नौ साल की थीं, उन्हें हल पर लगाकर खेत को जोतने का काम किया।...(व्यवधान) इन्होंने देश की कृषि की यह स्थिति कर दी है। ...(व्यवधान) आप सच सुनने की आदत डालिए। ...(व्यवधान) जहां एक तरफ प्रदेश सरकार असंवेदनशील है वहां दूसरी तरफ केन्द्र सरकार भी उतनी ही असंवेदनशील है। हमारे प्रधान मंत्री देश-विदेश का दौरा करते हैं और हर अंतर्राष्ट्रीय त्रासदी पर जल्द से जल्द ट्विट करते हैं। लेकिन मंदसौर के गोलीकांड पर प्रधान मंत्री जी ने एक भी ट्विट नहीं की। ...(व्यवधान) मंदसौर के गोलीकांड के बाद मैंने सोचा था कि कम से कम राष्ट्र के कृषि मंत्री मंदसौर में पीड़ित परिवारों के बीच जायेंगे। लेकिन वहां कृषि मंत्री नहीं गये, क्योंकि उनके पास समय नहीं था। वे व्यस्त थे, लेकिन बाबा रामदेव जी के साथ योग करने के लिए व्यस्त नहीं थे. ...(व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय, आज यह वास्तविकता है। किसानों में निराशा की जो आग है, वह केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश समेत देश के कोने-कोने तक यह निराशा की आग फैली हुई है। ...(व्यवधान) कर्नाटक में भी है। ...(व्यवधान) देश के हर राज्य में है। ...(व्यवधान) प्रहलाद सिंह जी, आप चिंता मत कीजिए, क्योंकि मैं सच कहूंगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा। ...(व्यवधान) आप मुझसे यह आशा रख सकते हैं। ...(व्यवधान) यह वास्तविकता है कि आज देश के किसान को आशा की किरण नहीं दिख रही। यह सरकार स्मार्ट सिटी की बात करती है, तो स्मार्ट सिटी क्या है ? स्मार्ट सिटी वह योजना है, जहां ऊंची-ऊंची इमारतें बनेंगी। इतनी ऊंची इमारतें बनेंगी कि गर्दन को टेढ़ा करना पड़ेगा। ...(व्यवधान) लेकिन हम यह भी याद रखें कि अगर उस इमारत की नींव मजबूत नहीं होगी, तो वह इमारत ढह जायेगी।
उपाध्यक्ष महोदय, अगर भारत की इमारत की नींव कोई है, तो वह भारत का किसान है। अगर वह नींव मजबूत न होकर कमजोर हुई, तो भारत कभी प्रगति और विकास के रास्ते पर नहीं चल पायेगा। ...(व्यवधान) आपके 50 साल भी निकल जायेंगे, तो आप उसी 50 साल की बात करते रहेंगे। ...(व्यवधान) वर्ष2014 में जब हमारे प्रधान मंत्री जी प्रत्याशी थे, तब उन्होंने बहुत सारी घोषणाएं की थीं। उन्होंने कहा था कि किसान की आय दोगुनी की जायेगी। भाजपा के घोषणा पत्र में यह शामिल किया गया था कि हम सरकार में आयेंगे तो स्वामीनाथन रिपोर्ट को कार्यान्वित करेंगे और लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफा डालकर हम समर्थन मूल्य तय करेंगे। लेकिन सरकार में आते ही इस सरकार ने यू-टर्न ले लिया और इन्होंने अटार्नी जनरल को सुप्रीम कोर्ट में यह कहने के लिए भेजा कि यह बिल्कुल नामंजूर है और यह संभव ही नहीं हो सकता।
16.59 hours (Hon. Speaker in the Chair) अध्यक्ष महोदया, मैं पूछना चाहता हूं कि इनकी सोच और विचारधारा में, नीति और नीयत में जमीन-आसमान का फर्क क्यों है ? आज हकीकत यह है कि किसान का गला घोंटा जा रहा है। अगर किसी का गला घोंटना हो, तो दो हाथों की जरूरत होती है।
17.00 hours एक हाथ वह है जो इनपुट की लागत है, उन सभी चीजों पर महंगाई का वातावरण है, चाहे खाद हो, चाहे बीज हो, चाहे बिजली हो, हरेक चीज और दूसरा हाथ इस शिकंजे के साथ आए कि समर्थन मूल्य में कोई वृद्धि नहीं हो। जब दोनों हाथ मिल जाएं, तब उसमें किसान पिस जाता है, जो वर्तमान का वातावरण है। इन्होंने कहा था - अबकी बार किसानों की सरकार। आंकड़े कभी गलत नहीं बोलते हैं। इनको तीन साल हो गए। तीन साल में भारत की कृषि की विकास दर में केवल 1.7 प्रतिशत वृद्धि हुई है। जब यूपीए की सरकार थी, आखिरी तीन सालों में 3.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। वह हमारा रिकॉर्ड था।...(व्यवधान)
कृषि और किसान कल्याण मंत्री (श्री राधा मोहन सिंह) : मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि मोदी सरकार आने के बाद,वर्ष2016-17 के आंकड़े चीखकर बोल रहे हैं कि 4.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है। दूसरी बात, जो माननीय सदस्य ने सदन और देश को गुमराह किया है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने चुनाव से पहले कहा था कि हम लागत मूल्य का 50 फीसदी मुनाफा देंगे और अब हम दो गुना कह रहे हैं। इन्होंने इसमें समर्थन मूल्य की बात जोड़ दी है। हमारे प्रधानमंत्री जी ने समर्थन मूल्य नहीं बोला था, लागत मूल्य का 50 फीसदी ज्यादा देने की बात कही थी और अब हम दो गुना देंगे। सुप्रीम कोर्ट में जो एफिडेविट है, वह इन्हीं के समय से चल रहा है और उसी को हम दे रहे हैं कि स्वामीनाथन आयोग ने जो सिफारिश की थी, उस सिफारिश को इन्होंने किसान नीति में नहीं माना था। अब कोर्ट में जो प्रक्रिया चल रही है, हम उसी पर चल रहे हैं, लेकिन लागत मूल्य का डेढ़ गुना देने की बात थी, हम अब दो गुना देने के लिए प्रयास कर रहे हैं। समर्थन मूल्य इन्होंने अपनी तरफ से जोड़ा है। समर्थन मूल्य इनका शब्द है और इस तरह से माननीय सदस्य सदन और देश को गुमराह कर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी के भाषण को अपने शब्दों में दे रहे हैं।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:अध्यक्ष महोदया, मैं मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं।
माननीय अध्यक्ष: अब आप कन्क्लूड भी कीजिए।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : अध्यक्ष महोदया, मैंने अभी अपनी बात शुरू की है। अभी समाप्त करने की बात ही नहीं है। ...(व्यवधान)
श्री राकेश सिंह (जबलपुर):कांग्रेस पार्टी का जितना टाइम है, आप उसी में से बोलेंगे। ...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:ठीक है, राकेश सिंह जी, मैंने आपका कहना मान लिया। अब मैं आगे बढ़ता हूं। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष: आपको बोलते हुए 20 मिनट से ज्यादा समय हो गया है, आप अभी शुरूआत नहीं कर रहे हैं।
...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:जीएसटी के बाद खाद की एक बोरी के दाम में 11 रुपये वृद्धि हुई, डीएपी की एक बोरी पर 40 रुपये की वृद्धि हुई है, ट्रैक्टर और उपकरणों में महंगाई आई है। हम बिजली की बात करते हैं, हर राज्य के ग्रामीण अंचल में बिजली के अनाप-शनाप बिल मिलते हैं और अगर किसान उस बिजली बिल का भुगतान नहीं कर पाता है तो उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है। ...(व्यवधान) जहां तक डीजल की बात है, मैं भौचक्का रह गया, जब यूपीए सरकार थी, अंतर्राष्ट्रीय जगत में कच्चे तेल का दाम 125 डालर प्रति बैरल था और देश में डीजल का दाम 55 रुपये प्रति लीटर था। आज अंतर्राष्ट्रीय जगत में कच्चे तेल का दाम 50 डालर प्रति बैरल है और डीजल का दाम 65 रुपये प्रति लीटर क्यों है ? ...(व्यवधान) यह प्रश्न मैं पूछना चाहता हूं कि यह टैक्स का पैसा किसकी बोरी में जा रहा है ? यह सूट-बूट की सरकार नहीं है तो क्या है ? मैं पूछना चाहता हूं कि श्रीलंका में डीजल का दाम 41 रुपये प्रति लीटर, पाकिस्तान में डीजल का दाम 52 रुपये प्रति लीटर है, लेकिन मेरे भारत में डीजल का दाम 65 रुपये प्रति लीटर क्यों है? यह कहां का न्याय है?
आज हर अन्नदाता की सबसे मूलभूत मांग है कि अपने उत्पादन का मिले जायज दाम। आज तूर का क्या हाल है ? एनडीए सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम जी ने कहा है कि वर्ष2017 में तूर का दाम 6,000 प्रति क्विंटल होना चाहिए औरवर्ष2018 में तूर का दाम 7,000 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आज तूर का दाम 5050 रुपये प्रति क्विंटल क्यों है?
रिपोर्ट और क्रियान्वयन के बीच में इतना अंतर क्यों है? यूपीए सरकार के समय में सोयाबिन का मूल्य 5,050 रुपये प्रति क्विंटल होता था लेकिन आज उसका मूल्य 2,600 रुपये तक सिमट चुका है। आंध्र प्रदेश में मिर्ची का मूल्य 12,000 रुपये प्रति क्विंटल होता था, लेकिन आज वह 3,000 रुपये प्रति क्विंटल हो चुका है। अजवैन की बात ही न करें, उसका मूल्य 17,500 रुपये प्रति क्विंटल होता था, लेकिन आज वह 5,500 रुपये प्रति क्विंटल है। टमाटर, प्याज और आलू अब खेत में नहीं उगते हैं, आप उन्हें सड़क पर पायेंगे। आप सड़क पर टमाटर, आलू और प्याज के साथ दूध की नदियां भी पायेंगे, यह हाल कर दिया है।
महाराष्ट्र के नासिक में मेथी का समर्थन मूल्य 4,000 रुपये प्रति क्विंटल से 5000 रुपये प्रति क्विंटल होता था, आज वह 2,500 रुपये प्रति क्विंटल तक सीमित है। अंगूर जो 50 रुपये प्रति किलोग्राम होता था, आज वह 15 रुपये प्रति किलोग्राम है। हरियाणा में एक किलोग्राम आलू एक रुपये के दाम पर बिक रहा है और उत्तर प्रदेश में 12 रुपये प्रति किलोग्राम की जो लागत है। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : दाम बताने में ही समय खत्म हो जायेगा, समय नहीं है।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:अध्यक्ष महोदया, मुझे बोलने दीजिए, यह किसानों का मामला है। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : अन्य लोगों को भी इस विषय पर बोलना है।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : अगर हम गुजरात की बात करें तो वहां 20 किलोग्राम मूंगफली का दाम 844 रुपये होता था, लेकिन आज वह 550 रुपये तक सीमित हो चुका है। मार्च के महीने से कपास का दाम नौ प्रतिशत गिर चुका है, कपास के किसान भी मुश्किल में हैं। जहां तक हम प्याज की बात करें तो प्याज का मूल्य 850 रुपयेरुपये प्रति क्विंटल होता था, आज वह 450 रुपये प्रति क्विंटल तक सीमित हो चुका है। आज 60 प्रतिशत किसानों को एमएसपी नहीं मिलता है और 40 प्रतिशत किसानों को भी अपनी उत्पाद एमएसपी से कम मूल्य पर बेचना पड़ता है। एक तरफ किसानों के नसीब में कर्जा है और दूसरी तरफ बिचौलियों के नसीब में चांदी है। यह स्थिति पूरे देश में हो चुकी है।
यूपीए के समय में धान का मूल्य 590 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ कर 1400 रुपये प्रति क्विंटल हो चुका था, प्रतिवर्ष 13 प्रतिशत की वृद्धि थी, गेहूं के समर्थन मूल्य में 14 प्रतिशत की प्रतिवर्षवृद्धि थी, अरहर के दाम में 22 प्रतिशत प्रतिवर्षवृद्धि होती थी। अगर हम मुनाफा की बात करें तोवर्ष2011 में धान का लागत मूल्य 670 रुपये प्रति क्विंटल होता था और समर्थन मूल्य 950 रुपये प्रति क्विंटल होता था, किसानों को 42 प्रतिशत का मुनाफा मिलता था, लेकिन आज वही मुनाफा साढ़े छः प्रतिशत तक सीमित हो चुका है।
अध्यक्ष महोदया, बोनस की प्रक्रिया समाप्त की गयी। अगर किसान ज्यादा उत्पादन करे तो उनकी पीठ थपथपाने की बजाय, सरकार ने उन पर पेनल्टी लगा दी। अगर आप मंडियों में जायेंगे तो वहां भ्रष्टाचार और अनियमितता पायेंगे। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि नोटबंदी के बाद दोबारा कभी भी देश की जनता को लाइन में नहीं लगाऊंगा, तो मैं आज पूछना चाहता हूं कि मंडियों में 10-10 किलोमीटर लंबी लाइन प्याज को बेचने के लिए क्यों लगी है ? ...(व्यवधान)
HON. SPEAKER: Now complete.
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: अध्यक्ष महोदया, मुझे किसान के बारे में अभी बहुत कुछ कहना है। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : इस विषय पर बोलने के लिए सभी को समय देना है। ऐसा नहीं होता है।
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:अध्यक्ष महोदया, आपके आने से पहले बहुत इंटरप्शंस भी हुए थे। मैं पूछना चाहता हूं कि आज किसान वर्षा ऋतु में बुआई करे।
माननीय अध्यक्ष : आपको बोलते हुए आधा घंटा हो गया, how much time you required?
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : अध्यक्ष महोदया, 20 मिनट हुए हैं और बहुत इंटरप्शंस भी हुए हैं।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : कृपया आप बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: अध्यक्ष महोदया, दो सूखे के बाद, प्राकृतिक आपदा के बाद यह मैनमेड डिजास्टर ’नोटबंदी’ के आधार पर, ’डिजिटल इंडिया’ के आधार पर लेकर आये हैं। बीमा राशि की योजना पूरी तरह से समाप्त,...(व्यवधान) Madam, I am initiating. Please give me six more minutes. मैं किसान की व्यथा सुनाना चाहता हूं।
माननीय अध्यक्ष : आप सिक्स मिनट बोलिए।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: अध्यक्ष महोदया, बीमा राशि की योजना थी, प्रधानमंत्री जी हमारे राज्य में आये थे, उनकी सभा के लिए दो किसानों की फसल चौपट की गयी थी, बड़े शोर-शराबे के साथ घोषणा हुई थी, आज मैं पूछना चाहता हूं कि एकवर्षमें सारे निजी कंपनियों को बीमा राशि योजना के तहत कॉन्ट्रैक्ट क्यों दिया गया ? 9,081 करोड़ रुपये इकट्ठे हुए थे और केवल 2,725 करोड़ रुपये के क्लेम आये हैं, बाकी 6,000 करोड़ रुपये निजी कंपनियों के खाते में क्यों गये, इसका जवाब देना होगा।
मेरा दूसरा प्रश्न है कि 2,725 करोड़ रुपये के क्लेम आये, लेकिन आज तक केवल 640 करोड़ रुपये का पेमेंट हुआ है, बाकी पेमेंट कब तक होगा, मैं आपके माध्यम से सरकार से यह पूछना चाहता हूं।
अध्यक्ष महोदया, सरकार की असंवेदनशीलता, मध्य प्रदेश में कहा जाता है कि ऋण माफी का कोई मुद्दा नहीं है, यहां केन्द्र सरकार कहती है कि हम ऋण माफ नहीं करेंगे। कर्नाटक की सरकार ने 22 करोड़ किसानों का ऋण माफ किया है। पंजाब की सरकार ने 10 करोड़ किसानों का ऋण माफ किया है। यूपीए सरकार 72 हजार करोड़ रुपये की ऋण माफी की योजना लेकर आई। आज यह सरकार कहती है कि हम ऋण माफ नहीं करेंगे। चुनाव के समय इनका नारा था कि " भाजपा का कहना साफ, हर किसान का कर्जा माफ " और आज चुनाव के बाद एक नया नारा दिया गया कि " भाजपा अपने बल पर जीते जात, अब काहे का कर्जा माफ। " अगर ऋण माफी की गुहार नहीं है, तो देश में 12 हजार किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं ? आपके और मेरे मध्य प्रदेश में 13 सालों में 21 हजार किसानों ने आत्महत्या क्यों की है? मन्दसौर के कांड के बाद 60 किसानों ने आत्महत्या क्यों की और पांच लाख बत्तीस हजार करोड़ रुपयों का ऋण किसानों का बकाया क्यों है? आज जंतर-मंतर में तमिलनाडु के मेरे किसान भाई अपने भाइयों के मृत शव लेकर आए हैं। चालीस लड़के वहां बैठकर रो रहे थे। वे सभी अनाथ हो गए क्योंकि उनके माता-पिता दोनों गुजर गए थे और यह सरकार नतमस्तक होकर बैठी है।
मेरी आपसे पांच मांगें हैं। मेरी पहली मांग है कि मंदसौर गोली कांड के दोिषयों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए। ऋण माफी की योजना पूरे देश में लागू होनी चाहिए और समर्थन मूल्य स्वामीनाथन रिपोर्ट के आधार पर, आपके घोषणा-पत्र के आधार पर लागू होना चाहिए। मुझे आश्चर्य है कि प्रधान मंत्री जी द्वारा कहा जाता है कि देश में सब कुछ ठीक है। गौरक्षा के नाम पर लोगों का नरसंहार हो रहा है। दूसरी तरफ भीड़ द्वारा मासूमों का कत्ल किया जा रहा है। जुनैद हम सभी का भाई और हम सबका लड़का है, जिसका बेरहमी से ट्रेन में कत्ल किया गया। आज कश्मीर में अशांति का माहौल है, दार्जलिंग में अशांति का माहौल, चीन और पाक के साथ तनाव का वातावरण, महिलाओं के साथ अत्याचार, किसानों द्वारा आत्महत्या और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह से प्रहार किया जा रहा है और प्रधान मंत्री जी कह रहे हैं कि सब कुछ ठीक है। " तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लूटा, मुझे रहजनों की गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। " आपको इसका उत्तर देना होगा, जिसके दम पर ये सरकार में आए थे, उन्हीं का दमन ये कर रहे हैं। जहां तक किसानों का मुद्दा है उनके आत्मसम्मान के लिए, उनकी आत्मरक्षा के लिए, उनके अस्तित्व की लड़ाई हम अंत तक लड़ेंगे, क्योंकि " उसूलों पर आंच आए तो टकराना जरूरी है, अगर जिंदा हो तो फिर जिंदा नज़र आना जरूरी है। अगर चमन की जिद है बिजलियां गिराने की, तो हमें भी जिद है, वहीं आशियां बनाने की। " धन्यवाद।
माननीय अध्यक्ष : युवाओं को ऐसे लड़ना चाहिए।
श्री वीरेन्द्र सिंह।
श्री वीरेन्द्र सिंह (भदोही) : अध्यक्ष महोदया, जब किसानों और कृषि की चर्चा संसद में होती है, तो किसान होने के नाते मुझे लगता है कि इस लोकतंत्र के यज्ञ मंडप में वेद का पाठ हो रहा है और किसान होने के नाते मैं कह सकता हूं कि मैं बहुत प्रसन्न होता हूं, जब हर सत्र की बैठक में आपकी कृपा से किसान और कृषि की चर्चा जरूर होती है। कृषि हमारी जीवन धारा है। श्री...*, श्री... * जैसे कुछ लोगों को लगता है कि यह देश आजादी से पहले का ही देश है, आजादी के बाद का हमारा देश नहीं है। इन लोगों को जानना चाहिए कि हमारा देश हजारों साल पुराना देश है और हमारे देश का आदर्श इतिहास रहा है।
किसानों और कृषि के बारे में हमारे देश की वैदिक परम्परा, सनातन परम्परा, वेद की ऋचाओं में, ऋग्वेद और यजुर्वेद में जो बातें कही गयी हैं, उन बातों का ही पालन करते हुए किसान कृषि करते हैं। ऐसा नहीं है कि किसान आज कृषि को सीखते हैं। जब वैदिक परम्परा नष्ट हो गयी थी, उस समय इस देश के लोगों ने उस वैदिक परम्परा को जीवित रखते हुए, अपने देश की सभ्यता, अपने देश की संस्कृति, अपने देश की परम्परा के द्वारा दुनिया में संदेश दिया। वही परम्परा सनातन परम्परा है, जिसे हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहते हैं।
जिस बात को ज्यातिरादित्य जी कह रहे थे, वह चम्पारण के आंदोलन के बाद की बात कह रहे थे। मैं इस बारे में उनको बताऊँगा। ज्योतिरादित्य जी, यह चम्पारण के आंदोलन के पहले का भी भारत है। चम्पारण का आंदोलन तो उसी परम्परा का एक हिस्सा है। सत्याग्रह करना, गांधी जी ने स्वयं अन्वेषण नहीं किया था, इस देश की लोक-परम्परा ने उनको प्रेरित किया था कि सत्याग्रह होता क्या है।
दुनिया की कई सभ्यताएँ मिट गयीं। लेकिन भारत की सभ्यता इसीलिए आज तक टिकी हुई है क्योंकि वैदिक परम्परा ने हमें संस्कृति की, सभ्यता की प्रेरणा दी है। इसीलिए हमारी सभ्यता आज भी टिकी है, यह हजारों साल तक टिकी रहेगी और यह हजारों साल से चली आ रही है।
किसान इस देश का ही नहीं, बल्कि दुनिया का अन्नदाता है। ऋिष और कृिष की परम्परा में, जब भी इस देश में आपदा आयी है, तो ऋिषयों ने शासकों का मार्गदर्शन किया है। मैं त्रेता युग का एक उदाहरण बताता हूँ। सभी लोग जानते होंगे, सूखा पड़ा था, उस समय ऋिषयों ने जनकपुर के शासक को कहा था- हल चलाएगा शासक, तालाब खुदवाएगा शासक, यज्ञ करवाएगा शासक, तो वृिष्ट होगी और सृष्टि का संरक्षण होगा। इस देश में पहली प्रमाणिकता है कि राजा जनक ने हल चलाया था। अश्विनी कुमार के दो नौजवान बच्चों ने ब्रह्मा और इन्द्र को हल चलाने की पहली बार प्रेरणा दी थी। ...(व्यवधान) मैं किसान हूँ। आप जानते हैं, किसान कौन होता है? जो शान से रहता है, वही किसान होता है। वीरेन्द्र सिंह शान से रहता है, इसीलिए किसान है। राजा लोग शान से नहीं रहते हैं। शान से तो किसान रहता है। ये राजा लोग शान से नहीं रहते हैं, इसलिए मैं राजा-रानी के बारे में कुछ नहीं जानता हूँ। मैं शान से रहता हूँ, इसलिए मैं किसान हूँ। ...(व्यवधान) राजा-रानी को किसान नहीं जानता है, इसलिए यह किसानों का देश है।
मैं चाहता था कि किसानों और कृिष पर चर्चा होगी, तो यह सदन सहमत होगा कि एक निर्णायक मुकाम तक हम पहुंचे हैं। मैं आज भी आपसे प्रार्थना करता हूँ, इधर के लोगों से और उधर के लोगों से भी प्रार्थना करता हूँ, किसानों की समस्या आज की समस्या नहीं है। किसानों की समस्या के बारे में आजादी के बाद के भारत में भी बताएंगे और आजादी के पहले के भारत में भी बताएंगे। मैं सोचता था कि उधर के लोग और हम लोग मिलकर किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए जैसे संविधान सभा बुलायी गयी थी संविधान को बनाने के लिए, वैसे ही किसानों की समस्याओं के निर्धारण के लिए एक निर्णायक सत्र में आपके आदेश से चर्चा होगी और उसमें एक निर्णायक मुकाम तक पहुंचेंगे। विशेष सत्र बुलाकर उस मुकाम तक पहुंचेंगे। इस संबंध में मैंने आपको पत्र भी लिखा था। यह इस सत्र में भी हो सकता है।
ज्योतिरादित्य जी, हम पर आरोप लगाकर और उधर आरोप लगाकर ...(व्यवधान) किसानों की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। ...(व्यवधान) किसान आज ही आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। ...(व्यवधान) इस देश में पहली बार किसान आत्महत्या का प्रचार हुआ था, जब वहाँ श्री नरसिंह राव जी बैठते थे और आपने जिसे दस वर्षों तक प्रधानमंत्री बनाया था, वे उस समय वित्त मंत्री थे। पहली बार इस देश में किसानों की आत्महत्या तब चर्चा में आयी थी। मैं नहीं कह रहा हूँ कि हमारे प्रधानमंत्री जी के शासनकाल में किसानों ने आत्महत्याएँ नहीं कीं।
कृिष का विषय शासन के स्तर पर बड़ा जटिल है। यह बात आप लोगों को जाननी चाहिए। आप लोग शासन में रहे हैं। कृिष के विषय में जब धन की जरूरत होती है, तो वित्त मंत्रालय में जाओ, जब कृिष उत्पादों के व्यापार की जरूरत होती है, तो वाणिज्य मंत्रालय में जाओ, जब उसके सप्लाई की जरूरत होती है, तो फूड एण्ड सप्लाई विभाग में जाओ, कृिष में सिंचाई की जरूरत होती है, तो सिंचाई और ऊर्जा मंत्रालय में जाओ। जब दैवीय आपदा की बात आती है, तो गृह मंत्रालय में जाओ। जब खाद्य की जरूरत होती है, तो रसायन और उर्वरक मंत्रालय में जाओ। हमारे अनन्तकुमार जी इस तरह के मंत्री हैं कि उन्होंने नीम कोटेड यूरिया बनाने का फैसला किया, जिससे कीटनाशक का प्रयोग बंद हो गया, नहीं तो आप लोगों ने तो कीटनाशकों के उपयोग से पूरे देश को किडनी और कैंसर का मरीज बना दिया था। जब ये सारे विषय खत्म हो जाते हैं, तो राज्यों का विषय आता है।
अध्यक्षा जी, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि संविधान सभा में जिस तरह से संविधान के निर्माण के लिए हम निर्णायक भूमिका में बैठे थे, उसी तरह किसानों की समस्या के समाधान के लिए आप ही यह काम कर सकती हैं। इस समस्या के समाधान के लिए आप एक सत्र का समय तय कर दें कि किसानों की समस्या को हल करने के लिए कानूनी तौर पर हम क्या निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।...(व्यवधान)
HON. SPEAKER: It is a good suggestion. आरोप-प्रत्यारोप लगाए बिना भी यह काम हो सकता है।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह: मैं किसान हूँ। आप वहाँ नहीं पहुँचेंगे, जहाँ मैं पहुँचूंगा। ...(व्यवधान)
श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा (रोहतक) : हम भी किसान हैं। हम हैरो लगाकर खेत जोतते हैं। कौन सा प्रे बंद हुआ है? कौन सा पेस्टीसाइड बंद हुआ है ?
माननीय अध्यक्ष : आप बैठ जाइए। आपस में चर्चा मत कीजिए। वीरेन्द्र जी, प्लीज़।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : यह कोई आपस में चर्चा की बात नहीं है। वे ठीक सजेशन दे रहे हैं। मैं एक दिन ऐसा सत्र भी करूँगी। हमें यह देखना पड़ेगा कि हम बिना आरोप-प्रत्यारोप इसका सामना कर के किसी निर्णय पर पहुँच सकते हैं या नहीं। आप ऐसे मत कीजिए। सब लोग किसान हैं और यदि नहीं भी हैं, तो हम सब नेता हैं, इसलिए हम जनता के बीच में जाने के कारण यह जानते हैं कि किसानी क्या है। आप उन्हें बोलने दीजिए। हर समय जवाब देने की आवश्यकता नहीं है।
श्री वीरेन्द्र सिंह : …* माननीय अध्यक्ष : वीरेन्द्र जी, प्लीज़।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आप प्लीज़ चेयर को संबोधित कीजिए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आप प्लीज़ बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : मेरा सभी से निवेदन है कि आप लोग बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
SHRI K.C. VENUGOPAL (ALAPPUZHA): Madam, it should be expunged from the record. … (Interruptions)
माननीय अध्यक्ष : मैं उसे देखूँगी। यदि ऐसी कोई बात है, तो उसे मैं करूँगी। प्लीज़, आप सभी से मेरा निवेदन है कि चेयर को संबोधित करें। एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए यह सभा नहीं है। आई एम सॉरी। हम उसे कर देंगे।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह : अध्यक्षा जी, चम्पारण किसान आंदोलन की बात की गई थी। गाँधी जी ने सत्याग्रह के समय एक बात कही थी। उन्होंने कहा था कि सत्याग्रह में हिंसा की कोई जगह नहीं होती है। श्री जयप्रकाश नारायण और मेरा गाँव अगल-बगल में है। गुजरात में छात्रों पर भोजन के लिए गोली चली थी। उस समय कांग्रेस की सरकार थी। अनन्तकुमार जी उस इमरजेन्सी के सेनानी हैं। 1984 में पंजाब में किसान मारे गए। मंदसौर में किसान मारे जा रहे हैं। मैं किसान होने के नाते इन घटनाओं से दुखी हूँ। कोई किसान मारा नहीं जाना चाहिए। श्री जयप्रकाश नारायण ने उस आंदोलन से पहले सभी छात्र नेताओं से कहा था कि पहले पटना के गाँधी मैदान में संकल्प करो कि हम मारेंगे नहीं, लेकिन हम मानेंगे भी नहीं। यह सत्याग्रह की पहली शर्त है कि हम मारेंगे नहीं, लेकिन हम मानेंगे भी नहीं।
मंदसौर के किसान सत्याग्रह कर रहे थे। हमारे प्रधान मंत्री जी इस बात को बार-बार कहते हैं कि लोकतंत्र की शक्ति असहमति पर ही टिकी हुई है। मैं समझता हूं कि किसानों में सत्याग्रह लोक जागरण के कारण से हो रहा है। मैं प्रधान मंत्री जी को इसके लिए सलाम करता हूं। उसी लोक जागरण का हिस्सा है कि किसान अब यह जानता है कि हम शासन से अपनी बात कह भी सकते हैं, मान भी सकते हैं और मनवा भी सकते हैं। लोग इस भ्रम में मत रहें कि हम किसानों के आंदोलन में चले जा रहे हैं तो किसान हमारे लिए आते हैं। इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए। किसानों के उत्पादन की लागत की लाभकारी कीमत के लिए यह एक कठिन सवाल है। किसान को लोग जानते हैं कि वे केवल अन्न पैदा करते हैं, किसान केवल फल पैदा करते हैं और सब्जी पैदा करते हैं। किसान केवल वहीं तक नहीं हैं। किसान पशुपालन भी करते हैं। किसानों की समस्या कई हिस्सों में बटी हुई है। कुछ किसानों का उत्पादन ऐसा होता है, जो जल्दी नुकसान हो जाता है जैसे नागपुर का संतरा, कश्मीर का सेब, अंगूर, आलू, प्याज, लहसुन, टमाटर और दूध। ये किसान पैदा करता है तो जल्दी नुकसान होने की संभावना रहती है। अगर हम ऐसे उत्पादन की जल्दी खपत की संभावना तलाश लेंगे तो नुकसान होने की संभावना खत्म हो जाएगी।
मुझे इस बात की खुशी थी कि जब चर्चा होगी तो हम सर्वसम्मति से किसानों की समस्या का समाधान करेंगे। हम किसी पर दोषारोपण नहीं कर रहे हैं। मैं इस बात को कहता हूं कि ऐसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादन की खपत की व्यवस्था तलाश कर लेंगे तो ठीक रहेगा। नुकसान होने से किसान उकता जाता है, घबराकर कभी टमाटर फेंक देता है, कभी आलू फेंक देता है, कभी प्याज व दूध फेंक देता है। हम उसकी खपत की संभावना तलाश लेंगे तो उस समस्या का समाधान कुछ हद तक निकल सकता है। उसकी खपत की संभावना है जैसे सेना की कैंटीन में, अर्द्धसैनिक बलों की कैंटीन में, मिड-डे-मील में, सिविल पुलिस की सोसायटी में 50 से 60 करोड़ लोग रोज भोजन करते हैं। हम जल्दी नुकसान होने वाली चीजों की खपत की संभावना तलाश कर सकते हैं तो किसान की उत्पादन की कीमत भी मिल सकती है। उनके जल्दी नुकसान होने की संभावना भी खत्म हो सकती है। मैं यह एक सुझाव आपके माध्यम से देना चाहता हूं। इस पर विचार करना चाहिए।
अध्यक्ष महोदया, कर्ज माफी के संबंध में मैंने अपने उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री जी को कहा था कि इस प्रदेश में आलू का उत्पादन भारी मात्रा में होता है। अभी तक मिड-डे-मील बना था। मिड-डे-मील में आलू, केला व फल शामिल नहीं था। मैंने कहा कि आलू, केला व फल को मिड-डे-मील में शामिल कर लेंगे तो बहुत से आलू उत्पादन करने वाले किसानों की समस्या का समाधान हो जाएगा। जब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक लाख टन आलू खरीदने की घोषणा की तो मैं नहीं कहता हूं कि उत्तर प्रदेश के किसानों के आलू के उत्पादन के बहुत दाम गिरे होंगे, लेकिन उनको राहत तो मिली है। हमारी सरकार कर्नाटक में है, पंजाब मे सरकार है, कर्नाटक की सरकार यह करती है तो इससे काम नहीं बनने वाला है। किसानों की समस्या के समाधान के लिए उसे लाभकारी कीमत दिलाने के लिए जैसे स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट है, स्वामीनाथन कोई ब्रह्मा नहीं हैं, स्वामीनाथन की कई रिपोर्ट इस तरह की हैं कि मैं किसान होने के नाते उनसे खुद भी सहमत नहीं हूं। वह एक निर्देशक हैं, एक कमेटी बनी उसके निदेशक होने के नाते उन्होंने राय दी जो माननी चाहिए, उसे हमको मानना चाहिए, सरकार को मानना चाहिए। ऐसा करेंगे। वह कोई ब्रह्मा तो है नहीं कि जो कहें, वह सब हम मान लें। ...(व्यवधान) आप बात सुनिए।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज शांति से बात सुनें।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह: आप मान लीजिएगा। मैं अपनी बात कहता हूं। अध्यक्ष जी, जैसे किसान के कर्ज माफी की बात है...(व्यवधान) सुन लीजिए। कर्ज माफी की बात है। कर्ज माफी के बारे में मैं ऐलानिया तौर पर कह सकता हूं कि समस्या का समाधान नहीं है। किसान कर्जदार न बने, शासन के स्तर पर इसकी व्यवस्था बनायी जानी चाहिए। हमने जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में समझा है...(व्यवधान) आप मेरी बात सुन लीजिए, ऐसा नहीं है कि हम नहीं बोलना जानते हैं, आप हमें बोलने दो। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : दीपेन्द्र जी आप उनकी बात सुनो, जब आपकी बारी आएगी तो आप भी बोलना, ऐसे बीच में मत टोकिये, यह ठीक नहीं है, फिर वह कुछ बोलेंगे, फिर आप गुस्सा हो जायेंगे। उन्हें टोकना नहीं है।
श्री वीरेन्द्र सिंह: आप बैठिये।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आप बैठ जाइये, आप क्यों बोल रहे हो।
श्री वीरेन्द्र सिंह: आप हमें बोलने नहीं देंगे, हमारा बोलना भी बंद कर देंगे।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज, आप बैठिये। आपने बैठे-बैठे नहीं बोलना है।
श्री वीरेन्द्र सिंह: लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन की भी एक भूमिका है।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:यह कोई तरीका है।
श्री वीरेन्द्र सिंह: आप तरीका मुझे मत सिखाइये, तरीका मैं बहुत जानता हूं। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : यह क्या तरीका है, आप उन्हें क्यों टोक रहे हैं, आप बैठिये, आई एम सॉरी।
श्री वीरेन्द्र सिंह: लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन की भी एक भूमिका है, समाज की भी एक भूमिका है और प्रशासन की भी एक भूमिका है। शासन, समाज और प्रशासन मिलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में समस्या का समाधान कर सकते हैं। शासन की भूमिका केवल यह नहीं है कि सारी समस्या का समाधान कर दे। लोकतांत्रिक व्यवस्था को मैंने जो समझा है, पूरा स्वरूप यही समझा है। हम कहते हैं कि किसानों को लाभकारी कीमत देकर 2022 तक उनकी आमदनी दोगुना कर देंगे। मेरे मन में एक सवाल पैदा होता है कि हम किसानों के उत्पादन की कीमत बढ़ा देंगे, उनकी आमदनी दोगुना कर देंगे, लेकिन इससे किसानों की आर्थिक समृद्धि नहीं आने वाली है। हमारे देश में एक आदर्श बचत की परम्परा रही है और जब तक बचत की परम्परा से हम अपने सामान्य जीवन को सम्बद्ध नहीं करेंगे, तब तक आर्थिक समृद्धि नहीं आएगी। ऋिष पराशर ने अपनी कृिष पराशर की पुस्तक में लिखा है और आचार्य कौटिल्य ने भी लिखा है कि कृिष उत्पादन से हम धन कमा सकते हैं, लेकिन कृिष उत्पादन से धन कमाने के बाद या धन प्राप्त करने के बाद किसान को अपव्ययी नहीं होना चाहिए, मितव्ययी होना चाहिए और कृपण भी नहीं होना चाहिए। जब तक हम अपने जीवन में मितव्ययिता नहीं लायेंगे, तब तक चाहे कितनी आमदनी बढ़ा दी जाए, हमारी आर्थिक समृद्धि नहीं हो सकती है, यह मैं एक किसान होने के नाते कह सकता हूं। हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था पिछले कुछ समय में ऐसी बदली है कि समाज में एक सैक्शन ऐसा हो गया है, जो अनाप-शनाप खर्चा करने के लिए विवश है। इसीलिए जब नोटबंदी का सवाल आया था तो मैंने इसी सदन में कहा था कि प्रधान मंत्री जी नोटबंदी करके आपने शास्त्र सम्मत काम यह किया है कि फिजूलखर्ची बंद हो गई और फिजूलखर्ची शास्त्र सम्मत नहीं है, अध्यक्ष जी यह आप भी जानती है, आप शास्त्रों का अध्ययन करती हैं। बचत होगी तो किसानों की समृद्धि शाश्वत रहेगी। इसलिए बचत की परम्परा से किसानों को अपने जीवन को सम्बद्ध करना चाहिए। इसके लिए धार्मिक क्षेत्र, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों, गुरुद्वारों से भी इस बात का संदेश जाना चाहिए कि समाज को मितव्ययी होना चाहिए। हमारी आर्थिक आमदनी आज दस हजार रुपये है, कल बीस हजार कर दें, खर्चा 25 हजार रुपये बढ़ जायेगा तो समृद्धि नहीं हो सकती। इसलिए अध्यक्ष महोदया मेरा आपसे भी निवेदन है कि एक संदेश आपका भी जाना चाहिए कि समाज में मितव्ययिता जरूर होनी चाहिए।
मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि छोटी जोत होने से खेती की लागत बढ़ रही है। बहुत से वैज्ञानिकों ने कहा कि छोटी जोत होने से खेती की लागत बढ़ रही है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि छोटी जोत क्यों हो रही है। आदिकाल से भूमि की बंदोबस्ती शासन के द्वारा परिवार को होती रही है। रिकार्ड में लिखते हैं, पांच भाई होते हैं तो एक भाई का नाम होता है, चार भाइयों का नाम नीचे होता है, रकबा में पांच बीघा लिखते हैं। लेकिन सबसे दुखद बात यह है, मैं बहुत दुखी होकर इस बात को कह रहा हूं कि कुछ समय से अपने देश में परिवार टूट रहे हैं और परिवार टूटने के बाद जोत का रकबा कम हो रहा है। रकबा कम हो जाने पर जो कल तक पांच बीघे जमीन का मालिक था, 24 घंटे में परिवार टूटने पर एक बीघा जमीन का मालिक हो जायेगा तो खेती की लागत तो बढ़ेगी ही बढ़ेगी। इसलिए यह समाज का काम है। मितव्यता समाज का काम है। शासन का काम नहीं है। शासन इसके लिए संदेश दे सकता है। केंद्र की सरकर ने जो योजनाएं लागू की हैं, जैसे प्रधान मंत्री सिंचाई योजना है, अपने देश में 50औ जमीन सिंचाई वाली नहीं है। लेकिन प्रधान मंत्री सिंचाई योजना, सोलर से सिंचाई करने की जो योजना चली है, उसमें 80 से 90 फीसदी छूट है। एक फसली खेती जहां होती है, वहां दो फसली खेती होने लग जाएगी। उसी तरह प्रधान मंत्री बीमा योजना है। डेढ़ फीसदी - दो फीसदी खरीफ में और रबी में है। उसी तरह पशुओं की योजना है। दूध का उत्पादन बढ़ा है।
अध्यक्ष जी, जितने भी किसानों की आमदनी बढ़ रही है, खेती के उत्पादन बढ़ रहे हैं, किसानों के शासन की नीतियों के द्वारा उनको नीचे तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए। यह मेरी प्रार्थना है। भारत सरकार और राज्य सरकार के कृिष के विकास का केंद्र ब्लॉक होता है। जब तक ब्लॉक तक हम उन योजनाओं को केंद्रित नहीं करेंगे, किसान विज्ञान केंद्र, कृिष विज्ञान केंद्र हर जिले में रहते हैं, उसको हम ब्लॉक तक इम्पलिमेंट नहीं करेंगे तो जो मैं कह रहा था कि शासन, समाज और प्रशासन मिल कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्य करते हैं, वह नहीं हो पाएगा। प्रशासन पर इस वक्त मैं दोषारोपण करता हूँ कि प्रशासन शासन की नीतियों को नीचे तक पहुंचाने में हीलाहवाली करता है। इस बात का ध्यान हम करेंगे कि ब्लॉक तक उसको केंद्रित किया जाए तो गांवों का किसान ब्लॉक तक पहुंचने में सक्षम होता है, वहां पहुंचता है। जैसे प्रधान मंत्री सड़क योजना है। गांवों से खेत को जोड़ता है, खेत में आवाजाही बढ़ेगी तो उत्पादन बढ़ते हैं। मेढ़ पर पेड़, यह उत्पादन बढ़ाने की योजना है कि मेढ़ पर पेड़ लगेंगे, उसमें कोई खर्चा नहीं होता है, किसानों को एक बड़ा भारी लाभ मिल सकता है। उसी तरह पशुपालन में, दूध का उत्पादन बढ़ रहा है।
अध्यक्ष जी, मनरेगा जैसे लूट के क्षेत्र में प्रधान मंत्री जी के निर्देश पर दस लाख तालाबों का निर्माण इस देश में कराया जा रहा है। जल संरक्षण का इससे बड़ा काम कुछ नहीं हो सकता है। यही राजधर्म है। जब यहां कैमिकल खादों और कीटनाशकों पर सब्सिडी दी जाती थी, तो मैंने सवाल उठाया कि कैमिकल खादों पर सब्सिडी दी जाती है तो गोबर की खादों पर सब्सिडी क्यों नहीं दी जा सकती है। भारत सरकार ने 1500 रूपये प्रति टन गोबर की खादों पर सब्सिडी देने का फैसला दिया और दो लाख कम्पोस्ट के गड्डे मनरेगा के पैसे से खोदे जा रहे हैं। यह राज्य सरकार का भी काम है कि राज्य सरकार उसको क्रियान्वित करे। भारत सरकार किसान पेंशन योजना, महिलाओं के लिए किसान और कृिष क्षेत्र में जो काम करते हैं, उनकी योजना लागू कर रही है। यहां समाजवादी आंदोलन के लोग अब चले गए हैं, डॉक्टर लोहिया इसी सदन में कहे थे कि किसानों के उत्पादन के दाम को तय करने में करखनिया माल और खरहनिया माल के दाम की एकरूपता होनी चाहिए। किसान केवल उत्पादक नहीं है, उपभोक्ता भी है। जो उत्पादन करता है, उसका दाम नहीं मिलता है, लेकिन जो उपभोग करता है, उसके दाम रोज बढ़ते हैं, इसलिए वह नुकसान में जाता है। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि किसानों की सारी समस्याओं का समूचा अध्ययन कर के एक विशेष सत्र में, जैसे संविधान सभा बुलाई गई थी, उस तरह किसान के कल्याण की सभा आपके आदेश से बुलायी जानी चाहिए। इस पर एक विशेष सत्र होना चाहिए और चर्चा होनी चाहिए।
अध्यक्ष जी, किसान इस देश का राजा है। इसलिए राजा है कि वही अन्न उत्पादन करता है। कम्युनिस्ट देशों में, जब यूरोप के देशों में नारा लगता था कि कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा, इसी देश के किसानों ने और इसी देश के किसान नेता दत्तोपंत जी ने कहा था कि कमाने वाला खाएगा ही नहीं, खिलाएगा भी और इस देश के किसान यही करते हैं। हम भारत का विकास भारत की तरह करना चाहते हैं। भारत का विकास अमरीका या दूसरे देशों की तरह नहीं करना चाहते हैं और यह नहीं होना चाहिए।
अध्यक्ष जी, इसलिए मैं कहता हूँ कि किसानों की कृिष की समस्या के समाधान के लिए बापू मोहन दास करमचंद गांधी ने जो कहा था कि इस देश के किसानों के लिए आजादी की लड़ाई में जो, चाहे चंपारण का आंदोलन हो, चाहे सहजानंद सरस्वती का किसान आंदोलन हो, चाहे अवध किसान आंदोलन हो, चाहे बारदोली का किसान आंदोलन हो, आजादी की लड़ाई के दिनों में किसानों ने बड़ी भागीदारी की थी और उन्होंने देश को आज़ाद कराया था। किसान तो अपने अधिकार चाहते ही हैं और इसीलिए उस कांग्रेस के झंडे के नीचे आन्दोलन हुआ था, डॉ0 हैडगेवार भी उस कांग्रेस में होते थे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी होते थे, आचार्य नरेन्द्र देव भी होते थे, जे0पी0 भी होते थे, लोहिया जी भी होते थे, नेहरू भी होते थे और पटेल जी भी होते थे। मैं दो-तीन मिनट में अपनी बात पूरी करूँगा। जब देश आजाद हो गया, तो गाँधी जी ने उसके पहले कहा था कि कांग्रेस का विसर्जन कर देना चाहिए, लेकिन लोगों ने नहीं माना। आजादी के बाद गाँधी जी के सपनों को सबसे ज्यादा, सबसे ठीक से साकार अगर कोई कर रहा है, तो पहला नाम हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जी का है। वे गाँधी जी के सपनों को साकार कर रहे हैं। दूसरा नाम...* का है। दो लोग गाँधी जी के सपनों को साकार कर रहे हैं। वे भी कांग्रेस का विसर्जन कर रहे हैं और प्रधानमंत्री जी भी कांग्रेस का विसर्जन कर रहे हैं।...(व्यवधान)
SHRI K.C. VENUGOPAL : Madam, what is this? Every time, what is he doing?
माननीय अध्यक्ष : आपकी बात हो गयी। अब आप समाप्त कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह : महोदया, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किसान और कृिष का सवाल उठाया। इनको किसी ने बता दिया कि किसान की बात करोगे, तो देश के लोग सुनेंगे। पता नहीं कहाँ किस विषय पर ये जा रहे हैं।
माननीय अध्यक्ष : ठीक है-ठीक है। वीरेन्द्र जी, आप अपना भाषण पूरा कीजिए।
श्री वीरेन्द्र सिंह: यह दीपेन्द्र हुड्डा इस विषय को उठाता तो ठीक रहता। मैं एक बात कहकर अपनी बात पूरी करता हूँ। हमारे क्षेत्र में रामलीला होती है, गाँव के किसान रामलीला करते हैं। एक दिन ऐसा हुआ कि जो रावण का पाठ करता था, वह नहीं आया। सीता जी वहाँ थीं, तो रामलीला का आयोजन करने वाले ने कहा कि सीता जी ही रावण का पाठ कर लें। वह हनुमान जी के पाठ की बात थी। हनुमान जी का पाठ करने वाला जो किसान था, वह उस दिन नहीं आया था। सीता जी वहाँ थीं। रामलीला का आयोजन करने वाले ने कहा कि सीता जी ही हनुमान जी का पाठ कर लें। हनुमान जी का पाठ करने वाला जो किसान था, वह उस दिन नहीं आया था। वहाँ सब लोग मिलकर रामलीला करते हैं, लोक सभ्यता को, लोक संस्कृति को जीवित करने के लिए रामलीला करते हैं। उस दिन हनुमान जी नहीं आये, तो जो सीता का पाठ करता था, लोगों ने उसे ही कहा कि तुम ही आज हनुमान जी का पाठ करो। उसने कहा कि ठीक है और वह हनुमान जी का पाठ करने लगा। उस दिन लंका दहन का नाटक मंचन करना था। वह रोज सीता बनता था, हनुमान को लंका दहन का उस दिन पाठ करना था, जब उसकी पूँछ में आग लगाने की बात होने लगी, तो जो रोज सीता बनता था, उसने कहा कि हम आज हनुमान जी नहीं बनेंगे, हम जाते हैं। हम हनुमान जी नहीं बनेंगे, हम सीता बनते थे, आज लंका दहन के मंचन में हमें हनुमान जी बनाते हैं। वही बात मुझे याद आ रही थी, जब.....* किसान और कृिष की बात कर रहे थे, तो वही बात मुझे याद आयी कि यह उनका पाठ नहीं है। यह पाठ हम लोगों का है, यह पाठ उधर के कुछ लोगों का है।...(व्यवधान) अगर हनुमान जी सीता जी का पाठ करेंगे, यह उनका काम नहीं है।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : श्री कल्याण बनर्जी। आपकी बात हो गयी है।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह : महोदया, मैं यही कहना चाहता हूँ कि यह उनका विषय नहीं है।...(व्यवधान) इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करना चाहता हूँ कि संविधान सभा की तरह बजट पास होना चाहिए।...(व्यवधान)
SHRI K.C. VENUGOPAL : Madam, I am raising a point of order. … (Interruptions) This is insinuation. He is insinuating. It is against the rule. You please expunge it. He is accusing a sitting Member. … (Interruptions)
HON. SPEAKER: I will see it. If there is something, I will see to it that it is removed.
श्री वीरेन्द्र सिंह: यह रूल बनना चाहिए कि किसानों के उत्पादन का उचित मूल्य उन्हें कैसे मिलेगा।...(व्यवधान) मैं प्रधानमंत्री जी को बार-बार सलाम करते हुए उनको प्रणाम करता हूँ।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आपकी बात हो गई है। वीरेन्द्र जी, आपकी बात हो गई है। आप बैठिए।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह : चाहे कहीं का भी किसान हो, चाहे उत्तर प्रदेश का किसान हो, चाहे गुजरात का किसान हो, चाहे पंजाब का किसान हो, चाहे मध्य प्रदेश का किसान हो, उसे उसकी उपज का उचित दाम मिलना चाहिए।...(व्यवधान) मध्य प्रदेश की सरकार ने कृिष क्षेत्र के लिए बहुत काम किया है। वहाँ के मुख्यमंत्री ने किसानों के लिए बहुत अच्छा काम किया है।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आपकी बात हो गई है। वीरेन्द्र जी, समाप्त कीजिए। आपका माइक बन्द हो गया है।
…( व्यवधान)
श्री वीरेन्द्र सिंह: ये मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।...(व्यवधान) ये नहीं बन पायेंगे।...(व्यवधान) ऐसा नहीं होगा।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : कल्याण जी, आप बोलिए। वीरेन्द्र जी, आपकी बात हो गयी है। आप बैठ जाइए। हर कोई थोड़ा समय का ध्यान रखेंगे, तो सबको चांस मिलेगा।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : कोई डैरोगेटरी नहीं था। I have seen it. It is okay. I will see it. He has said nothing derogatory.
SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Please allow me to speak. Hon. Speaker, Madam, I am really grateful that you have given me the chance to speak on the subject.… (Interruptions) Madam, what is this?
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:माननीय अध्यक्ष महोदया, इस सदन में कब तक व्यक्तिगत आरोप लगते रहेंगे? ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं है, मैं हूँ ना यहाँ! थोड़ा विश्वास रखो। There is nothing.
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:अध्यक्ष महोदया, बार बार अगर यह किया जाएगा तो हम भी उल्लंघन करेंगे। इनको सदन की मर्यादा का पूरी तरह से ध्यान रखना चाहिए। ...(व्यवधान) ऐसा नहीं हुआ तो हम भी उल्लंघन करेंगे। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : मैं खुद देखूँगी। I know it.
… (Interruptions)
माननीय अध्यक्ष : ज्योतिरादित्य जी, आप थोड़ा तो विश्वास रखो। I will see it. मैं खुद इसको देखूँगी। I will see it. Please sit down. Yes, Kalyan Ji.
… (Interruptions)
HON. SPEAKER: I will see it. I am saying if anything is derogatory, I will see to it that it is removed.
… (Interruptions)
SHRI KALYAN BANERJEE: Kindly allow us also to speak.
Hon. Speaker Madam, I am really grateful to you for giving me a chance to speak on the subject, and it is a great privilege for me that you yourself are in the Chair.
Madam, now the issue of death of farmers, whether committing suicide or killed, has become a national issue, and it is now almost every day’s headline in the media. Madam, the National Policy on Agriculture is affecting the inalienable fundamental right to life, which includes livelihood of the farmers.
Madam, India is an agrarian country with around 70 per cent of its people depending directly or indirectly upon agriculture. Farmers’ suicides account for 11.2 per cent of all suicides in India. Madam, today Shri Jyotiraditya M. Scindia has talked about certain incidents, according to him, in Madhya Pradesh. He went there. He said that. I will give some figures which will speak itself about the state of affairs in this country regarding the farmers.
Madam, as per the National Crime Records Bureau, the number of suicides by farmers and farm labourers increased to 12316 in 2014. A study conducted in 2014 found that there are three specific reasons for this. They are (1) those that grow cash crops such as coffee and cotton; (2) marginal farmers with less than one hectare; and (3) those who are having debts. The study also found that in the States these three characteristics are most common and the highest suicide rates also accounted for almost 75 per cent of the variability in State level suicides. The farmers’ suicide increased by 42 per cent between 2014 and 2015. The number of suicides by those in the farming sector rose from 12316 in 2014 to 12602 in 2015, according to the data.
Madam, Maharashtra is now at the top of the list. There were 3330 deaths in Maharashtra with an increase of 18 per cent jump from 2014. Telangana is second with 1358 cases and Karnataka is third with 1197 cases. Six States -- Maharashtra, Telangana, Andhra Pradesh, Chhattisgarh, Madhya Pradesh and Karnataka -- saw more than three-fold rise in farmers’ suicide in 2015 as compared to 2014, which accounted for 94.1 per cent of the total farmers’ suicide.… (Interruptions) Please sit down. Have some patience. This is the report of the National Crime Records Bureau. I am not talking from any other data. The States which reported nil suicides in 2015 includes Bihar, West Bengal, Goa, Himachal Pradesh, Jammu & Kashmir, Jharkhand, Mizoram, Nagaland and Uttarakhand.
Local moneylenders are usually portrayed as villains in India’s farmer-suicides narrative, but Government data shows that 80 per cent of farmers killed themselves in 2015 because of bankruptcy or debts after taking loans from banks and registered microfinance institutions. Bankruptcy and indebtedness emerged as the single largest underlying cause behind farmer suicides in 2015 with 38.7 per cent of the 8,007 farmer suicides linked to these factors. Farming-related issues formed the second major cause, accounting for 19.5 per cent of the cases. Therefore, two reasons for farmer suicides are there – the first reason is debt and the second is farming related issues.
Till April 2016, as many as 116 farmers have committed suicide due to agrarian reasons. As per data, 57 cases of farmers’ suicides were reported in Maharashtra on February 29, 2016, while 56 farm labourers’ suicide cases reported in Punjab were registered on March 11. In Telangana, there were three cases. As per the reports received from various sources, the number of farmer suicides was 6867 from just five States – Madhya Pradesh, Maharashtra, Karnataka, Telangana and Tamil Nadu. This is 55 per cent of 2015 numbers from just five States. In January 2017, 319 cases of suicide by farmers were registered in Maharashtra alone. Surprisingly, there is also a report of farmers’ suicide from Kerala, Uttar Pradesh and Gujarat.
Hon. Madam, Shri Scindia has very vividly stated these incidents. At least, five farmers were killed and several injured in Madhya Pradesh’s Mandsaur district on Tuesday when police fired on protesters demanding better prices in the drought-ravaged region that recorded a farm suicide every five hours in 2016-17.
Data from National Crime Records Bureau shows that from February 2016 to mid-February this year, at least 1982 farmers and farm labourers committed suicide in Madhya Pradesh, which is an average of one suicide every five hours. The incident in Madhya Pradesh is a very recent incident.
The ill effect of demonetization itself is also a reason for farmers’ suicide. Madam, I have put up the data about the plight of poor farmers before the House. But for the last 35 years, if there is anyone, who has fought for the cause of farmers in this country, it is Mamata Banerjee in Singur. You have to appreciate it. … (Interruptions) In 2006, she fought for farmers’ rights in Singur. The then Government acquired the agricultural land of the farmers. Our leader, Mamata Banerjee, the present Chief Minister of West Bengal, started an agitation at that time. She went for 26 days of fasting. Ultimately, with the verdict of the people of West Bengal, she came to power in 2011.
Incidentally, those acquisition cases were challenged in Kolkata High Court in 2006. It is my great privilege that I argued the case. But I lost that case there. But, in 2016, the Supreme Court upheld what Mamata Banerjee had said in 2006. This is the first time in India that all lands have been returned to farmers and they have started farming on that land.
Our Chief Minister has taken the lead role in the matter. Today, I am hearing so many things, but how many leaders of this country have fought like Mamata Banerjee for the benefit of the farmers? Their rights have been established by fighting not only in the democratic field. There was a democratic fight also. There was a serious criticism at that point of time, but today their rights have been established. The Supreme Court has said that all the acquisitions were bad and the lands have been restored back to the farmers.
Madam, the rights of the farmers have to be considered in the most respected manner. It is a very sensitive and emotional issue. So, the farmers have to be protected. I am not taking any more time because another hon. Member, Prof. Saugata Roy, from my party will also speak.
Madam, I will end by saying this. Data will not tell, any yojana will also not tell whether it is in the name of X, it is in the name of Y or it is in the name of Z. One person will give one data and another person will give another data, but that will not solve the problem of our country. Our country’s problem is to see why farmers are committing suicides and see that these problems are taken away from within the country so that no farmer commits suicide and no farmer resorts to agitation and because of agitation, no farmer is killed by the police.
With these words, I end my speech. Thank you.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Madam Speaker, invariably, in every season, we discuss about the plight of the farmers of our country in every Session. This time, I was expecting that we would be discussing a specific issue because on the previous occasion, I hope our Agriculture Minister and good friend, Radha Mohan babu will agree with me, the discussion was centering around natural calamities and its effects on farmers, the drought situation that was prevailing in the country, the floods that had ravaged our fields and even the poverty that is actually creeping into the farming community, but this year the problem is very different. To a certain extent, Shri Scindia also mentioned it. Of course, the narration went into the incident of Mandsaur and जो इलेक्शन के पहले दिया गया था, उसे प्रतिश्रुति या वादा कहते हैं। यह कुछ ज्यादा ऊपर आ गया। Shri Virendra Singh, being a farmer himself and also having allegiance to Dr. Ram Manohar Lohia and to other samajwadi vichardhara, has also narrated what is happening in the country. But this year is very different. That is why, my notice for a discussion under Rule 193 was on fixation of MSP mechanism that is prevalent in the country. That is one of the major problems, I feel, which our farmers are facing. State Governments have very little role to play in it; it is the Union Government which has to take a decision.
Madam, I will be dwelling today on three issues and I may be allowed to complete those three issues. One is the mechanism that is in place relating to fixation of MSP for specific crops of our country. The second one is relating to the Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana which is, of course, a very improved version of the previous Fasal Bima Yojana which was prevalent during the UPA regime. I am told that the Prime Minister himself has put in a lot of efforts to see that this Fasal Bima Yojana becomes successful, but it has certain constraints which many of us, while travelling throughout the country and in our constituencies, come across. That needs improvement and I would urge upon the hon. Minister to look into that. I will give some details on that.
18.00 hours माननीय अध्यक्ष : एक मिनट रुकिए। एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं, तो मुझे लगता है कि हम समय बढ़ा देते हैं। लोगों को अच्छे तरीके से बोलने का चांस भी मिलेगा।
श्री अनन्तकुमार : अध्यक्षा जी, यह किसानों और कृिष संकट के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। आने वाला जो सत्र बचा है, उसमें हमें आर्डिनेंस को भी बिल में परिवर्तन करना है, विदाई कार्य भी है और बाद में सप्लीमेंट्री बिजनेस भी है, इसलिए मेरी प्रार्थना यह होगी कि आज ही इसको कंप्लीट करें और रिप्लाई भी करवा दें। ...(व्यवधान)
SHRI K.C. VENUGOPAL : How is it possible? … (Interruptions) Every Member wants to speak on this important issue. … (Interruptions)
माननीय अध्यक्ष : आप एकदम से मना मत करिए।
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:मैडम, 40 वक्ता हैं। ...(व्यवधान)
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB: It is a suggestion for consideration. … (Interruptions) The House will take a decision on this issue. … (Interruptions)
माननीय अध्यक्ष : फिर भी कुछ समय तो तय होना चाहिए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आज ही कंप्लीट करेंगे, लेकिन फिर भी समय-सीमा तो तय होनी चाहिए।
…( व्यवधान)
श्री अनन्तकुमार : हम 9 बजे तक बैठ सकते हैं।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : अभी दो घंटे का समय बढ़ाइए, फिर हम बाद में सोचेंगे।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : दो घंटे का समय बढ़ाते हैं, फिर बाद में देखेंगे।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : कोई समय-सीमा तो तय होनी चाहिए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : दो घंटे के लिए आप सभी एग्री हैं।
…( व्यवधान)
एक माननीय सदस्य :सांसद की शादी भी है। ...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:मैडम, सबकी बात सुनी भी जाए। ...(व्यवधान)40 वक्ता हैं। ...(व्यवधान) हर दल का व्यक्ति बोलना चाहता है। ...(व्यवधान)
SHRI K.C. VENUGOPAL: Madam, we have been cooperating with the Government. … (Interruptions) We have discussed the Bill also. … (Interruptions)
एक माननीय सदस्य : आज कई शादियां हैं। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : मैंने इसीलिए दो घंटा बढ़ाने की बात कही है। आप सभी एग्री कर रहे हैं।
अनेक माननीय सदस्य : हां,जी।
माननीय अध्यक्ष : अभी दो घंटा बढ़ाते हैं, फिर अगर लगा, तो और देख लेंगे।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:इसको आगे भी ले जाना होगा।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आज ही कंप्लीट करिए, क्योंकि विषय बहुत महत्वपूर्ण है। आप सब बोलिए। आप बैठिए।
…( व्यवधान)
SHRI K.C. VENUGOPAL: Madam, how is it possible? … (Interruptions)
माननीय अध्यक्ष : एक भाव बना है, तो उसको बनाये रखिए और आज ही बोलिए।
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:मैडम, बहुत सारे वक्ता हैं, जो बोलना चाहते हैं। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : बोलने दीजिए, इसीलिए बोलने दीजिए।
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:मेरा आपके माध्यम से निवेदन है। ...(व्यवधान)
श्री अनन्तकुमार : ज्योतिरादित्य जी, हमने दो बिल का तय किया था, लेकिन बाद में एक बिल कर दिया। ...(व्यवधान) आज ही कंप्लीट करवाने का हमारा आग्रह है। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : यह कोई चर्चा का विषय नहीं है, बैठिए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : सब बोलेंगे। यह विषय ऐसा है कि बोलने दीजिए और बैठकर सुनिए भी। अगर वास्तव में हम सिंसिअर हैं, तो ऐसे मत बांधो। आज बैठे हैं, तो आज ही इस विषय को कंप्लीट करना चाहिए। कल तक जाने से क्या होता है? यह महत्वपूर्ण विषय है, सब बोलिए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : यस, भर्तृहरि जी।
…( व्यवधान)
प्रो. सौगत राय (दमदम) : मैडम, यह बात महत्वपूर्ण है। ...(व्यवधान) हड़बड़ी में यह गंभीर चर्चा नहीं हो। ...(व्यवधान) थोड़ा रहम करिए। आज एक घंटा करना चाहते हैं, वह तो ठीक है। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज बैठिए। अभी शुरू तो करिए।
…( व्यवधान)
प्रो. सौगत राय: लेकिन आज खत्म करने की बात मत करिए। आज समाप्त नहीं हो पाएगा। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आपको क्या फर्क पड़ रहा है?
भतृहरि जी, प्लीज कंटीन्यू।
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:आज समाप्त कैसे हो पाएगा? ...(व्यवधान)
प्रो. सौगत राय: आज समाप्त नहीं हो पाएगा। ...(व्यवधान)
श्री भर्तृहरि महताब: महोदया, मुझे एमएसपी मैकेनिज्म के बारे में कुछ बोलना है, जो फसल बीमा योजना है, उसके बारे में थोड़ा बोलना है और फाइनेंशियल इंस्टीटय़ूशन और नॉन-फाइनेंशियल इंस्टीटय़ूशन की तरफ से जो लोन फार्मर्स को दिया जाता है, उसकी दिक्कत के बारे में थोड़ा बोलना है। इन तीन इश्यूज के ऊपर मुझे बोलना है, पर हमारे बीच बस एग्रीकल्चर मिनिस्टर ही हैं। Of course, the Agriculture Minister will be in-charge of the MSP mechanism. जैसे वीरेन्द्र सिंह जी ने कहा कि इतनी सारी मिनिस्ट्रीज हमारे यहां हैं, जिनके पास हमारे फार्मर्स को जाना पड़ता है।
प्रो. सौगत राय: फाइनेंस मिनिस्टर क्यों नहीं हैं?
श्री भर्तृहरि महताब: जब आप बोलेंगे, उस समय बताइएगा।
माननीय अध्यक्ष : ऐसे बीच-बीच में मत टोकिए।
…( व्यवधान)
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : Madam, there has been unrest throughout the country today, and this unrest is nothing new -- new in the sense that during the colonial period the unrest was there. We have read in our history books as to what type of unrest had started during the colonial rule. Some instances were also mentioned about the Nil Chasi of Bihar or the Bardoli agitation led by Sardar Patel and a number of agitations that were there during that period of time. Even in States like Odisha, Bengal and in South agitations were there. They were agitation by farmers because of the colonial strangulation of the farming community.
In the post-Independence era when new modern temples came into being, Bhakra-Nangal came up, Hirakud came up and flow irrigation became the rule of the day. Green Revolution also came up. Even during that time, specially in the 1980s, we had a number of other types of agitation, who were the well to do farming community. We had Shri Sharad Joshi - who relinquished a job - a jean-clad farmer, many of us used to say. He was a Member of Parliament. He was with us. He led the agitation. Shri Mahendra Singh Tikait also led an agitation. But those agitations were from the irrigated area; they were not actually getting the rate for their produce. That was the cause of agitation. There were a number of other people throughout the country.
Today we have an agitation and this agitation in 2017 is, there is a problem of plenty. लार्ज स्केल प्रोडक्शन है, ज्यादा उत्पादन है और इस उत्पादन को बेचने के लिए आज बाजार नहीं है, आज का प्रोबल्म यही है, ड्राउट का प्रोबल्म नहीं है, नेचुरल कलैमटी का प्रोबल्म नहीं है, प्रोडक्शन ज्यादा है। This is a problem of plenty. That is why our farmers are agitating throughout the country, across several BJP-ruled States, and this has caught the Government by surprise. Ever since 2014, BJP promised farmers in the specific form of doubling of farm income in five years; and public procurement at prices ensuring 50 per cent return over cost as recommended by the National Commission of Farmers headed by Shri M.S. Swaminathan. Farmers have been waiting for these promises to be fulfilled. Three years down the line farmers of this country feel cheated; they feel betrayed by the effects of demonetisation and its prolonged effect on rural markets which have depressed all crop prices and not allowed them to reap the benefits of a bountiful monsoon. What has really gone wrong with agrarian situation in the country and how can it be fixed? Although agriculture suffers from a number of problems, we can focus today on prices and farm loans. The protest in Madhya Pradesh was triggered by crash in onion prises but it also drew strength from the news of loan waivers in Uttar Pradesh and Maharashtra.
What is that farmers are demanding? I heard Shri Jyotiraditya Scindia’s speech, a very emotional speech. I didn’t hear him saying that these are the demands of farmers.… (Interruptions)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: हाँ, मैने एमएसपी, मंडी में अनियमितता और फसल बीमा योजना के बारे में कहा था। … (Interruptions)
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB: Their demand was remunerative prices for their farm produce. The party in Government today had promised in its 2014 election manifesto. Where does the Modi Government stand on that promise after three years in power compared to the last three years of the Manmohan Singh Government? Let us make a comparison.
The Commission for Agriculture Costs and Prices Reports of the last six years narrates the bitter truth that net margin, that is, MSP minus cost, C2; in most agriculture commodities such as paddy, maize, cotton, gram, sugarcane, have actually declined during these three years. The information is, if one looks at just 2016-17 data, there were negative margins on several commodities. Jowar grain – minus 18 per cent; ragi – minus 20 per cent; sesamum - minus 14 per cent; sunflower – minus 13 per cent; groundnut – minus four per cent; moong dal – minus seven per cent; urad dal – minus four percent. With a glut in toor dal production, market prices fell way below the MSP and the real losses were even higher.
No wonder there is widespread unrest amongst farmers today. They suffered back to back droughts in the first two years of this Government. Now, in the third year, despite good rains and bumper harvest, they are suffering due to the collapse in prices. Loan waivers are not a solution. I would say that they are band-aids, which give temporary breathing space. The best way to handle prices is to get the market right. Remember, prices are determined by the forces of demand and supply. Factoring in only the cost plus prices without considering the demand side can lead to even greater distortions and, therefore, needs to be avoided. You may ask this. How does one get market right?
Take the case of toor. This is a very recent occasion. I think, the Minister is aware of this. If Shri Ram Vilas Paswanji would have been here, he could have explained it much better. We had a bumper harvest in the last season. But the Government banned its exports. Private entities were not allowed to hold stocks and trading in future had also been banned. With bumper harvest on the one hand and strangulated markets on the other side, prices crashed tumbling way below the MSP. It is creating misery for farmers and causing unrest. The solution is simple. You abolish all export ban, private stocking limits and restrictions on future trading in all commodities. This is all the more desirable in commodities whose imports are open and lower at zero duty. If this is not done, the Government will be forced to buy all commodities whose prices nose-dived. This is neither an efficient nor a feasible policy option. They do not have that much of money. They do not have that mechanism throughout the country to help the farmers in that respect. Leave it to the market. Market will stabilise the price.
Two things need to be done to put things in proper perspective. First, the declared MSP has not been at the promised levels. Secondly, the poor implementation of even these prices in Government purchases has meant that they have not generated as floor prices for agriculture market. Calculating the Minimum Support Price by the Commission for Agricultural Costs and Prices (CACP) is highly technical and faulty. Generally, one can say that costs for crops are calculated as weighted average across the State for which the costs exceed these averages. So, the MSP may not even cover costs in some States, much less provide a margin over them. Here is the crux of the problem. In the case of wheat – I am not talking about paddy by which my State has been affected; our farmers have been affected – the estimated average cost of the CACP of Rs.1203 covers a range from a low of Rs.1100 per quintal in Punjab to a high of Rs.2,200 per quintal in West Bengal with Maharashtra showing a cost of Rs.1900 per quintal, well above the MSP. Who is the loser? It is Punjab. Yet, they compensate them by buying the full stock from Punjab and filling up our warehouses in Odisha where we are unable to put our paddy. This problem needs to be tackled. I do not know whether the Agriculture Minister will be able to do that. It is the problem of the Food Minister. It is the decision of the Food Minister. Once you have an MSP across the States with Rs.2200 in West Bengal, Rs.1900 in Maharashtra and Rs.1100 in Punjab, the farmers are forced to agitate.
I will just mention about cultivation of mustard seeds which go from Rs. 2,200 per quintal in Madhya Pradesh to Rs. 4,500 per quintal in West Bengal. Somehow or the other, West Bengal can manage to get a higher rate with the national weighted average at Rs. 2,773. When we go on and on on respective specific farm produce, we find what the problem is. What is actually pinching our farmers today? We are declaring MSP but that MSP is actually not the floor price. It is far, far below the manner in which the market is operating.
The CACP Report for the rabi season of 2017-18 admits that, and I quote, the pricing policy is not routed in the cost plus “exercise” though cost is one of its important determinants. For this formula, the recommended prices for the crops do not come anywhere near the promise of 50 per cent above the total cost of comprehensive cost. What the Prime Minister has been saying and what the Minister had also said while responding to some queries that it is not coming very near that. The question is whether the recommended MSPs actually function as a floor price to the market price that the farmers face. That question needs to be answered. The answer is negative and it highlights the ineffectiveness of the procurement policy in different States. The farmers’ unrest is not a political conspiracy. But, actually, it is because the Government has been quite poor in ensuring that the market prices stay above the MSP which is an essential function of the procurement process.
I would come to my second point, Madam. Now, Pradhan Mantri Fasal Bima Yojna is definitely a great improvement from all the previous ones. But it also needs further tweaking. There is hardly any accountability of the insurance companies to the district administration where they operate. They are only interested to cover the loanees, not non-loanee farmers. Their penetration is negligible. There is another issue which I would like to mention, Madam, which I came across while dealing with this problem in my Cuttack District. The insurance company is only interested in loanees. He goes to the cooperative bank and different branches. He takes out the list. These are the loanees, and when a loan is sanctioned, some amount is also appropriated to the company. So, I asked him as to how much non-loanee farmers have taken crop insurance? The number is 600 and 900 in two districts. This is the answer.
The cooperative loan is there. There is another problem that this insurance is covered till 30th July. Loan can be given till 30th September. A person who takes loan in the month of September is not covered under this insurance unless he desires to. It does not get deducted automatically. Every year, Madam, that insurance company changes because he files a tender and it is finalised in the State capital annually. There is a list given by the Union Government or the list that is prepared by the State Government. He is not accountable to anyone as to how he has functioned in that district. Next year, he is in another state. He moves around the country like this. There is no accountability, I doubt, whether at the Union Government level, there is any accountability of these insurance companies. That is why Saugata Babu says that Finance Minister should also come in to intervene in this issue.
It is necessary. Dr. Moily is present here today. The Standing Committee has given a report. Of course, that was in the initial stage when we took only ten months under our review. Now, I think it is necessary that the Agriculture Minister goes into this aspect. This is a suggestion which I would like to make. It is necessary that, at least, you make him responsible for three years in that district, make him responsible to the district administration if you do not have that much faith in the public representative. Let us make them responsible. Let us see to it that not just the loanee farmers but the non-loanee farmers also get this insurance coverage. Then only that will be of help.
Another problem in Fasal Bima Yojana is this. The decision of the Government is that the village will be the unit. It is a welcome step. What is ‘the village’? In Odisha, ‘the village’ is the Gram Panchayat. And Gram Panchayat comprises about 12,000 to 15,000 people. That is the problem. What I consider ‘the village’ is a village, not the Gram Panchayat. Gram Panchayat has a number of villages in it.
If there is some problem in the crop, we are told to use the smart phone and send a message to the person concerned and we would get the relief. But that does not happen here. When the Gram Panchayat is the village, the problem persists. I think there needs to be a better clarification of this. … (Interruptions) Yes, the revenue village should be the unit.
I will now come to my third point, Madam.
श्री गणेश सिंह (सतना) : महताब जी, किसान का खेत इसकी इकाई होना चाहिए।
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : There are a number of other aspects to it and I am not going into all that now. At some other time when we would be discussing the Fasal Bima Yojana, we could deal with those things in detail. Some other hon. Members may be dealing with that.
I would now come to my third point, Madam. In 1950-51, in our country there were 24 crore people who were dependent on farming. Now that number has grown three fold and has become 72 crores. This is the reason why the per capita income has come down in agriculture.
Indebtedness among farmers is a big challenge in the present agricultural scenario in our country. It has been acknowledged as one of the major stumbling block in the way of rural economy. NSSO in 2014 stated that about 52 per cent of the total agricultural households in the country are in debt. Indebtedness and farmers’ suicides are closely linked. The vicious circle of debt has aggravated the agrarian crisis and agricultural loan to farmers has gone manifold.
Farmers are indebted to institutional and non-institutional sources of credit. According to NSSO report of 2014, about 60 per cent of the outstanding loans were taken from institutional sources like banks, cooperative banks, etc., which include: Government with 2.1 per cent, cooperative societies with only 14.8 per cent, and commercial banks with 42.9 per cent. Among the non-institutional sources, agricultural professional moneylenders with 25.8 per cent had the major share in terms of outstanding loans.
Share of institutional loans increases with the increase in land possessed by the farmers. This is an interesting thing and I think the hon. Ministers who are present here should take it up at their level, at the Cabinet level. Who takes the maximum loan? Our system is such that a person who has more landed property, more farm land, takes more loan. And who is affected? It is the small and marginal farmer because he is not allowed to take the loan that he needs. He is forced to take more loan from non-institutional sources, from moneylenders, because he gets from them the loan that covers his requirement. He is unable to take loan from institutional sources because financial institutions do not give him the money that is required.
This is an interesting piece of information. It says that agricultural households covered in the lowest class of land possessed of less than 0.01 hectares is only about 15 per cent of the outstanding loans from institutional sources. However, the share is about 79 per cent for the households belonging to the highest class of land possessed of more than 10 hectares.
Here lies the dichotomy. This needs to be corrected. Seventy per cent of our farmers are marginal and small ones. They are dependent on this finance. They need finance at the time of sowing; they need finance at the time of harvesting; they need finance in the middle period of August and September when the crop is coming up, when fertilizers and pesticides are required. When that finance is not available to them, they are forced to go to moneylenders to get that money. If it is a bumper harvest and they are unable to sell it in the market, they are forced to commit suicide. I would say agriculture credit has been provided by successive governments and by this Government also. The agriculture credit being provided through banking institutions is mounting. But that money is actually going to big farmers who have more than 10 hectares of land. That needs to be corrected. Farmers have good reason to be angry. The demonetization-induced collapse in rural liquidity has meant low prices for perishables like fruits and vegetables. Therefore, we need more and better storage facilities linkage with processing firms, contract farming etc. I would like to mention another issue. In the month of March this year, Odisha Legislative Assembly, where there are Congress Members, BJP Members and Communist Members also, passed a unanimous resolution. For the last three years Odisha has been requesting to raise the Minimum Support Price of paddy. For last seven or eight weeks, in every block headquarters Biju Janata Dal is agitating for raising the Minimum Support Price. The raise of Minimum Support Price is a pittance; it is just Rs. 1470. Earlier, there was a report to make it to Rs. 2550. The resolution of Odisha Legislative Assembly said that it should be Rs. 2930 and they have justified it. This has been pending in the Ministry of Agriculture for the last four or five months. Our Minister of Agriculture from Odisha has also written a letter to the Union Minister of Agriculture Shri Radha Mohan Singh on 19th May this year. It says, "Paddy procurement operation pumps in around Rs. 6500 crore into the rural economy of Odisha every year. There is no doubt that around seven lakh farmers get benefitted from the Minimum Support Price. But the Minimum Support Price of paddy fixed by the Government of India is not commensurate with the rising cost of inputs such as seeds, fertilizers, manure, irrigation charges and hiring charges." These are the criteria by which the Minimum Support Price is determined. That is the reason I would insist that the Government should take up this issue. Joint liability groups which have also been recognized by banking institutions have to be promoted to bring small and marginal farmers, tenant farmers, oral lessees etc. into the fold of institutional credit.
While concluding, I would say that indebtedness in one form or another has been in existence for centuries though it may not be the root cause of the present farm crisis. Proper access to institutional credit, cost effective means for agriculture production, proper irrigation facilities, a well-built marketing system and extension facilities should be provided to farmers. This could result in an increase in their farm income and reduce their dependence on loan for their requirements.
With these, words, I expect that this Government would respond positively to the issues that farmers are facing today in our country, especially relating to re-do or revisit of the Minimum Support Price mechanism.
माननीय अध्यक्ष : आपके द्वारा उठाए गए बिंदु बहुत अच्छे थे, इसलिए आपको बहुत ज्यादा समय बोलने के लिए दिया।
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर।
ग्रामीण विकास मंत्री, पंचायती राज मंत्री, पेयजल और स्वच्छता मंत्री तथा आवासन और शहरी कार्य मंत्री (श्री नरेन्द्र सिंह तोमर): अध्यक्ष महोदया, आपने बहुत ही अहम सवाल पर चर्चा करने की मुझे स्वीकृति दी है, इसके लिए मैं निश्चित रूप से आपके प्रति आभार प्रकट करता हूं। हमारा देश कृिष प्रधान देश है और सभी लोग चाहे किसी भी विचारधारा के हों, राजनैतिक दल के हों किसान को अन्नदाता कहते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं। आजादी का 70वां वर्ष चल रहा है और देश की प्रधानता कृिष है, इसके बावजूद भी आज किसान संकट में है, किसान परेशान है और उसकी समस्याओं पर हम सभी आज चिंता कर रहे हैं। मुझे लगता है कि आजादी के बाद जब देश को कृिष प्रधान और धर्म प्रधान कहा गया, तो कृिष प्रधानता को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार और राज्य सरकार गांव से, खेती से जुड़ी हुई नीतियों का सृजन करती, तो मैं समझता हूं कि आज हम लोगों को यह दिन देखने को मिलता। किसान अधिक उत्पादन करे तो परेशानी में है और कम उत्पादन करे तो परेशानी में है। समर्थन मूल्य उसे कम मिले तो वह दिक्कत में है और समर्थन मूल्य बहुत ज्यादा मिले तो वस्तुओं के दाम बढ़ जाएं, तो किसानों से लोगों को दिक्कत होने लगती है। ऐसी परिस्थिति अभी भी विद्यमान है, यह हम सभी के लिए बहुत चिंता का विषय है।
मुझे प्रसन्नता है कि पिछले दिनों जब नई सरकार ने आकार लिया, तो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस प्रधानता को स्वीकार किया और तब से लेकर आज तक लगातार तीन वााॉ में मैं समझता हूं कि खेती के क्षेत्र में कई नए काम करने की कोशिश की गई है जिससे कि किसान लाभकारी मूल्य प्राप्त कर सके और किसान की खेती लाभ का धंधा बन सके। हम सभी इस बात को जानते हैं कि जो परम्परागत खेती है, अगर गेहूं और धान की फसलों पर किसान आश्रित रहता है, तो खेती फायदे में नहीं आ सकती है। किसान दूसरी उन्नत खेती पर भी ध्यान दे सके, उस दृिष्ट से उसका प्रशिक्षण हो सके, उस दृिष्ट से उसकी सरकार द्वारा मदद हो सके, इस दिशा में केंद्र सरकार ने काफी कदम बढ़ाए हैं और उनका लाभ भी हम लोगों को धीरे-धीरे परिलक्षित हो रहा है। किसानी का क्षेत्र बहुत व्यापक है, बड़ी आबादी कृिष के क्षेत्र में काम करती है और इतने बड़े क्षेत्र में किसी भी नए आयाम का प्रशिक्षण देकर परिणाम प्राप्त करना निश्चित रूप से समय मांगता है और वह समय की आवश्यकता भी है। यह सच है कि जब तक किसान लाभकारी मूल्य प्राप्त नहीं करेगा और जब तक किसान की खेती लाभ का धंधा नहीं बनेगी, तब तक हम जिस प्रकार के सुखी हिंदुस्तान की कल्पना करते हैं, शायद उस मुकाम तक पहुंचना हमारे लिए कठिन होगा।
यह संतोष की बात है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की गई। उससे पहले जो पूर्ववर्ती फसल बीमा योजना थी, उसका आम तौर पर किसी को लाभ नहीं मिलता था, लेकिन केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नई फसल बीमा योजना का सृजन किया। किसानों पर जो 15-16 परसेंट का प्रीमियम लगता था, उसे डेढ़ और दो परसेंट पर लाए। मैं मध्य प्रदेश का रहने वाला हूं। पिछले दिनों किसान ओले से पीड़ित हुआ। मध्य प्रदेश सरकार ने फसल बीमा योजना का क्रियान्वयन बहुत त्वरित गति से किया और उसका परिणाम हुआ कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के माध्यम से ओला पीड़ित किसान को 4660 करोड़ रुपया मुआवजे के रूप में प्राप्त हुआ। मैं समझता हूँ कि इतनी बड़ी रकम किसान को कभी प्राप्त नहीं हुई। यह किसान की सुरक्षा की दृिष्ट से एक बड़ा कदम है और धीरे-धीरे इसका लाभ सामने आने वाला है। चाहे सॉइल हेल्थ कार्ड का मामला हो, चाहे परम्परागत खेती को बढ़ावा देने का मामला हो, जैविक खेती की बात भी की जाती है, यह रस्मी विषय नहीं है। जैविक खेती को जितना बढ़ावा मिलेगा, उतनी ही तब्दीली किसानी में आएगी। आज सिक्किम जैसा राज्य पूरी तरह से जैविक राज्य घोिषत हो गया है। यह हम सभी के लिए बहुत ही प्रसन्नता की बात है। केन्द्र सरकार और कृिष मंत्री जी लगातार प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में कोशिश कर रहे हैं कि जैविक खेती को बढ़ावा मिले। कलस्टर बनाए जाएं, कलस्टरों को आर्थिक सहायता दी जाए ताकि किसान उस दिशा में प्रवर्त्त हो सके । लेकिन इसके बावजूद, किसानी का इतना बड़ा क्षेत्र है कि इस क्षेत्र में लगातार काम करते रहने की आवश्यकता है। जो काम अभी हुए हैं, उससे आगे बढ़कर और काम करने की आवश्यकता है। आपने अनुभव किया होगा कि पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री जी ने फसल बीमा योजना को लांच किया था, तो उस समय उन्होंने देश के किसानों का आह्वान किया था और अपनी सरकार तथा राज्य सरकारों को निर्देश दिये थे कि वर्ष2022 तक किसान की आमदनी दोगुनी हो, इस लक्ष्य को लेकर हम सबको काम करना चाहिए।
मैं समझता हूँ कि केन्द्र सरकार ने भी उसका रोडमैप बनाया है। राज्य सरकारें भी उस दिशा में आगे बढ़कर काम कर रही हैं। अगर हम फसल से आमदनी वर्ष 2022 तक दुगुनी कर सकेंगे, तो देश को आगे बढ़ाने और खेती को लाभकारी बनाने में यह रोडमैप हमको बहुत ही मदद करने वाला है।
सामान्यतः जब किसानी की बात होती है, तो यह माना जाता है कि उस पर विस्तार से चर्चा होगी। श्री महताब जी अभी अपने विचार रख रहे थे। उन्होंने बहुत-से ऐसे बिन्दु रखे, जो निश्चित रूप से सरकार के लिए विचारणीय हैं। मैं समझता हूँ कि कृिष मंत्री जी उस दिशा में विचार करेंगे। लेकिन किसानों की समस्या को भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा, आरोप-प्रत्यारोप की दृिष्ट से देखा जाएगा, तो मैं अपने प्रतिपक्ष के मित्रों से कहना चाहता हूँ कि इसी में 70 साल गुजर गये और आने वाले समय में भी इसी प्रकार के चश्मे से देखने में कोई लाभ नहीं मिलेगा।
मेरे मित्र श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने इस विषय पर चर्चा को आरम्भ किया। मुझे लगता था कि वे व्यापक दृिष्टकोण से देश भर के किसानों की समस्या को सदन के सामने रखेंगे, लेकिन वे मध्य प्रदेश की घटना तक ही सीमित रहे। मैं आपके माध्यम से पूरे सदन को बताना चाहता हूँ कि कृिष के क्षेत्र में मध्य प्रदेश की सरकार ने आगे बढ़कर जितना काम किया है, मैं समझता हूँ कि उसकी तारीफ की जानी चाहिए। आज मध्य प्रदेश की ही सरकार है, जो किसानों को ज़ीरो पर्सेंट ब्याज पर कर्ज उपलब्ध कराती है। मध्य प्रदेश की एकमात्र सरकार है, जो किसानों को कर्ज देती है। वह कहती है कि आप एक लाख रुपये ले जाइए और 90 हजार रुपये दे जाइए। जब वर्ष2003 में हम लोग सरकार में आए थे, तो पूरी तरह से ध्यान है कि नहर से सिंचाई का रकबा सात लाख हेक्टेयर था, जो इन बारह सालों में बढ़कर 40 लाख हेक्टेयर हुआ है। जब हमने वर्ष 2003 में सरकार संभाला था, तो उस समय नहर, कुआँ, बावड़ी, नदी आदि साधनों से सिंचित होने वाला कुल रकबा 46 लाख हेक्टेयर था, जो बढ़कर आज 110 लाख हेक्टेयर हुआ है। यह इसी का परिणाम है।
यदि आप देखेंगे कि मध्य प्रदेश में कोई भी आपदा आती है, तो एक समय था, मुझे ध्यान है कि प्राकृतिक आपदा के लिए बजट प्रावधान मध्य प्रदेश में 300 करोड़ रुपये होता था। हम लोग सरकार में आये थे, आजादी के बाद से लेकरवर्ष2003 तक 300 करोड़ रुपये कभी भी ट्रेजरी से निकलकर किसानों में नहीं बंटा। लेकिन आज मध्य प्रदेश की ऐसी स्थिति है कि किसानों के हित में लगातार आरबीसी को परिवर्तित किया गया। जब यह नयी योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना नहीं बनी थी, उस समय भी किसान सूखे से पीड़ित था। मध्य प्रदेश सरकार ने 4000 करोड़ रुपये अपने बजट से निकालकर किसानों के बीच में बांटा।
यह सरकार किसानोन्मुखी है। किसानों के परंपरागत धंधे जैसे पशु-पालन, मधुमक्खी-पालन और फिशरीज़ को बढ़ावा मिलना चाहिए और किसानों को भी अन्य प्रकार की सभी सुविधाएं प्राप्त हों। मध्य प्रदेश की सरकार बिना किसी मदद का इंतज़ार किए हुए लगातार इस दिशा में काम करती आई है। उसी का यह परिणाम है कि सन् 2011-12 से आज तक लगातार मध्य प्रदेश की सरकार को राष्ट्रीय कृषि कर्मण पुरस्कार मिलता आया है। यदि आप देखेंगे तो पाएंगे कि सन् 2011-12 में देश में कुल खाद्यान के उत्पादन में मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर था। सन् 2012-13 में भी मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर रहा था। सन् 2013-14 में गेहूँ के उत्पादन में मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर था। सन् 2014-15 में फिर से देश में कुल खाद्यान के उत्पादन में मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर था और सन् 2015-16 में गेहूँ के उत्पादन में मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर था। आप सन् 2014-15 के बारे में तो एक बार कह सकते हैं, लेकिन सन् 2011-12, 2012-13 और 2013-14 में तो यू.पी.ए. की सरकार थी। यू.पी.ए. की सरकार कोई मेहरबानी कर के मध्य प्रदेश की सरकार को पुरस्कृत करने वाली सरकार तो थी नहीं। यदि मध्य प्रदेश में खेती के क्षेत्र में काम नहीं हुआ होता और वहाँ की सरकार किसान हितैषी न होती, तो मध्य प्रदेश में कभी ये परिस्थितियाँ नहीं बनतीं।
मैं सन् 2003 से लेकर अभी तक की तुलनात्मक स्थिति बताना चाहता हूँ। सन् 2004-05 में मध्य प्रदेश की कृिष विकास दर 1 से 3 प्रतिशित के बीच में थी। आज आप देखें कि वह 20 प्रतिशत है। सन् 2004-05 में मध्य प्रदेश में कुल फसल उत्पादन 2.14 करोड़ मेट्रिक टन था। आज वह 5.44 करोड़ मेट्रिक टन है। सन् 2004-05 में कुल खाद्यान उत्पादन 1.43 करोड़ मेट्रिक टन था, जो कि आज 4.39 करोड़ मेट्रिक टन है। सन् 2004-05 में कुल दलहन का उत्पादन 33.51 लाख मेट्रिक टन था और आज वह 79.23 लाख मेट्रिक टन है। उस समय गेहूँ की उत्पादकता 18.21 क्विंटल प्रति हैक्टेयर थी, जो कि आज 35.2 क्विंटल एक हैक्टेयर में पैदा होता है।
सन् 2004-05 में 8.18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर धान का उत्पादन होता था। आज 32.10 क्विंटल प्रति हैक्टेयर धान का उत्पादन होता है। सन् 2003-04 में गाँवों में किसानों को सिर्फ दो या तीन घंटे बिजली मिला करती थी। आज किसान को 10 घंटे बिजली मिलती है। इसके कारण मध्य प्रदेश में किसान में कहीं कोई अनरेस्ट नहीं है। निश्चित रूप से यह बात सच है कि बीच में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी हुईं, जिनके कारण फसलों के दाम कुछ गिर गए। इसके चलते किसान अपनी समस्याओं के लिए आंदोलन कर रहे थे। मध्य प्रदेश का किसान यह मानता था कि जब वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के पास जाएगा, तो श्री शिवराज सिंह चौहान हर हालत में उसकी मदद करेंगे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री किसानों के नेता हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी ने 4 जून को आंदोलनकारी किसानों से बात की। किसानों ने उनसे कहा कि उनकी मूँग, उड़द और प्याज का दाम घट गया है। इसकी खरीद जल्दी प्रारंभ कर दीजिए। मुझे यह कहते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है कि मेरे राज्य में मूँग 5,225 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से 31 जून तक खरीदी गई है। उड़द 5,000 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदी जा रही है। पूरे देश में कहीं भी 8 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से प्याज नहीं खरीदा गया, लेकिन मध्य प्रदेश में 8 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से सभी किसानों का प्याज खरीदने का काम हुआ। यह काम होने के बाद किसानों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया। उनके द्वारा आंदोलन वापस लेने के बाद हमारे कुछ राजनीतिक मित्र जो अपनी खोई हुई राजनीतिक भूमि को मध्य प्रदेश में तलाश रहे हैं, उनको लगा कि किसानों के इस जहाज पर वे निश्चित रूप से बैठ सकते थे, लेकिन उनका यह मंसूबा अब तो पूरा नहीं हो सकेगा।
इस बात को पूरा देश जानता है कि मध्य प्रदेश का आंदोलन किसानों का आंदोलन नहीं था। मध्य प्रदेश का किसान कभी भी हिंसक नहीं हो सकता है। मध्य प्रदेश के किसान शांतिप्रिय हैं और परिश्रमी हैं। कांग्रेस के लोगों ने जानबूझ कर उस आंदोलन को हिंसक बनाने का काम किया।...(व्यवधान) हमारे कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता श्रीमान राहुल गांधी जी जब वहां जाने का प्रयास कर रहे थे और जिस मोटर साइकिल पर वह बैठे थे और जो व्यक्ति उस मोटर साइकिल को चला रहा था। सारे देश ने देखा कि उस व्यक्ति ने उस आंदोलन को भड़काने का काम किया। कांग्रेस के अन्य विधायक आंदोलन को भड़काने का काम कर रहे थे और दूसरा यह कि ज्योतिरादित्य जी कह रहे थे कि मुख्य मंत्री जी उपवास पर बैठ गए थे। अगर क्षेत्र में समस्या है तो उपवास करना कौन सा गलत काम है। मैं अगर यह पूछूं कि आप दो दिन बाद धरने पर बैठ गए थे तो इसका क्या जवाब होगा। मध्य प्रदेश के इस पूरे किसान आंदोलन को मीडिया ने पूरे देश में दिखाया। मैं मध्य प्रदेश का रहने वाला हूं। कांग्रेस पार्टी ने कुरेद-कुरेद कर मध्य प्रदेश में कोशिश की, लेकिन कहीं भी डेढ़ सौ किसानों को किसी जिले में कांग्रेस के लोग इकट्ठा नहीं कर पाए। किसान का जब आंदोलन होता है तो देखायी देता है। मुझे ध्यान है वर्ष 1998 में बैतूल में, मुलताई में किसान आंदोलन हुआ था और उस समय 5 हजार किसान तहसील पर इकट्ठा थे। 5 हजार किसानों पर गोली चली। 18 व्यव्ति मारे गए। उस समय कौन सी सरकार थी। एस.पी. से लेकर 143 कर्मचारी घायल हुए। खाण्डवा में गोली चली, जतारा में गोली चली, अमरवाड़ा में गोली चली उस समय कांग्रेस के लोग कहां थे। उस समय किसान की हमदर्दी कहां खो गई थी, लेकिन इस स्थिति में इस आंदोलन को भ्रमित करने के लिए, प्रदेश को गुमराह करने के लिए कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
माननीय अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से पूरे देश को कहना चाहता हूं कि मध्य प्रदेश की सरकार किसान हितैशी सरकार है। मध्य प्रदेश की सरकार ने किसानों के हित में जितना काम किया है, देश में और किसी सरकार ने उतना काम नहीं किया। मध्य प्रदेश की सरकार आज भी किसानों के हित के लिए पूरी तरह चिंतित है। मैं आज भी यह आग्रह करना चाहता हूं कि कोई भी किसी राजनैतिक दल का व्यक्ति हो, जब किसान की बात हो तो राजनैतिक चश्मा उतारकर किसान की स्थिति को देखें। अगर राजनीति किसान के विषय पर होती रहेगी तो निश्चित रूप से किसान की दुर्दशा होती रहेगी, लेकिन मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं मध्य प्रदेश में भी और देश में भी। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, केंद्र में नरेन्द्र मोदी जी की सरकार है। हम लोग किसान के प्रति हमदर्दी रखने वाले हैं और हमारी मान्यता आरंभ से रही है।...(व्यवधान) ज्यातिरादित्य जी मैं आपकी बात का जवाब दे चुका हूं। मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन नहीं था। मध्य प्रदेश में कांग्रेस का आंदोलन था और मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने आंदोलन को भड़काने की बहुत कोशिश की लेकिन आप सफल नहीं हुए। ...(व्यवधान)
HON. SPEAKER: Nothing will go on record.
…(Interruptions)…* माननीय अध्यक्ष : इस तरह से रिकॉर्ड में कुछ नहीं जाएगा। आप बैठ जाइए। ज्योतिरादित्य जी आपका भाषण हो चुका है। प्लीज़ बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज बैठ जाइए। इस तरह से जो आप बोल रहे हैं, वह रिकॉर्ड में नहीं जा रहा है। केवल हल्ला-गुल्ला दिख रहा है। आपको बोलने का समय मिला था, अब आप बात सुनिए।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : यह क्या हो रहा है?
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज, आप बैठिये। यह आप जो बोल रहे हैं, रिकार्ड में कुछ नहीं जा रहा है, केवल हल्ला-गुल्ला दिख रहा है। आपको हल्ला-गुल्ला करना हो तो करते रहिये। आपको बोलने का पूरा समय मिला था, आप उनकी बात सुनिये, सुनने की क्षमता भी रखो।
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज बैठिये, आप बीच में मत कूदिये।
…( व्यवधान)
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : अध्यक्ष महोदया, मैं पूर्व में ही यह कह रहा था कि जब किसान के विषय को हम राजनीतिक चश्मे से देखेंगे तो ऐसी स्थिति खड़ी होगी। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि ऐसा नहीं है कि ज्योतिरादित्य जी ने भी प्रयास नहीं किया हो, ऐसा नहीं है कि बाकी और नेताओं ने प्रयास नहीं किया हो, सारे लोगों ने प्रयास किया और मध्य प्रदेश में तीन-चार जगह कार्यक्रम करने की कोशिश की। शिवराज जी उपवास पर बैठे तो उपवास करना तो गांधीवादी तरीका है। ...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:मुख्य मंत्री स्वयं उपवास करेगा तो जनता क्या करेगी।...(व्यवधान) शांति व्यवस्था कैसे रहेगी।...(व्यवधान) गोली सरकार चलाये और मुख्य मंत्री उपवास करे और सरकार उन पर गोलियां चलाये...(व्यवधान)
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : मुख्य मंत्री जी ने उपवास किया, इस पर ज्योतिरादित्य जी को आपत्ति है।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : लेकिन मेरा कहना यह है...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:इन्होंने गोली चलवाई...(व्यवधान)
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : मेरा कहना यह है कि कांग्रेस ने हिंसा भड़काने का प्रयास क्यों किया?
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : हमने हिंसा नहीं भड़काई...(व्यवधान)
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : आपकी पार्टी के विधायक को पूरे देश ने देखा...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : आप … *पूर्व मुख्य मंत्री जी से पूछिये, यहां सदन में कहने के पहले आप ... * से पूछिये।...(व्यवधान) मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं...(व्यवधान) वह भी मानते हैं कि वहां कांग्रेस का एक भी कार्यकर्ता नहीं था।
माननीय अध्यक्ष : ज्योतिरादित्य जी, आप बैठिये।
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : अध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से कांग्रेस के लोगों को कहना चाहता हूं कि भारतीय जनता पार्टी किसान हितैषी राजनीतिक दल है, हमारी आरंभ से मान्यता रही है, किसान उठेगा तो देश उठेगा, किसान सुखी रहेगा तो देश आगे बढ़ेगा। इसलिए जहां तक मध्य प्रदेश की बात है, मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लोग कितना भी जमीन खोजने का प्रयास करें, पहले भी उन्हें वहां जमीन नहीं मिली, आने वाले कल में भी उन्हें जमीन नहीं मिलेगी। बहुत-बहुत धन्यवाद।
SHRIMATI V. SATHYABAMA (TIRUPPUR): Hon. Speaker Madam, I thank you for allow me to speak in this important discussion.
I express my gratitude and indebtedness to our immortal leader Puratchi Thalaivi AMMA before I speak in this august House in the discussion on the agrarian crisis in the country.
Agriculture is the lifeline of our country. More than 70 crores of people are solely depending on agriculture or agro-based industries for their life and livelihood. India has a huge population and no wonder that the farmers population in our country is more than the total population of most of the countries in the world. Therefore, emphasis on agriculture and enhancing farmers’ income are most important. The Government has to address the problems arising out of acute drought situation which has affected agriculture in Tamil Nadu. A special package for drought affected farmers would have been the apt decision on the part of the Union Government.
In a vast country like India, due to varied climatic conditions prevailing in different parts of the country, some places are severely affected by scarcity of rainfall causing drought, whereas some places are affected by excess rainfall and subsequent flooding. In both the cases, farmers and agriculture are affected the most. Due to natural calamities and failure of monsoon, most parts of the country are affected either by drought or severe flood. There are many reasons for this. But, in my opinion, the foremost reason is the Government’s prolonged delay and reluctance in nationalisation of all the rivers in the country and also inter-linking of major rivers in the country.
The nationalisation of rivers and inter-linking of the rivers are very important as they not only solve the inter-State water sharing disputes among the Indian States but also the only way through which adequate water for irrigation in various States could be ensured and the problems faced by the farmers due to lack of water and drought could be solved permanently. Also the Government should consider creating a comprehensive national policy on Indian rivers and National River Water Grid and routes to enhance the process of inter-linking of rivers flowing in various States. In this way the Government can harness the excess water in the rivers cleverly and judiciously to benefit drought-hit parts of the country.
Water is indispensable for agriculture. Irrigation is the blood circulation of agriculture. Without water nothing could be done. Even if we spend crores of rupees, without adequate water farmers have no chance to flourish. The river Cauvery is the lifeline of Tamil Nadu, particularly the millions of farmers in the delta regions in Tamil Nadu. But unfortunately, year after year Tamil Nadu farmers are betrayed due to the non-release of adequate water from river Cauvery even after the final order of the Cauvery Water Disputes Tribunal. The unconcerned attitude of the higher riparian State of Karnataka to obey the orders of the Cauvery Water Dispute Tribunal has killed hundreds of farmers in Tamil Nadu and has driven several thousand out of agriculture. The total loss due to the non-release of Cauvery water during crop seasons in Tamil Nadu has taken a heavy toll on agriculture and farmers of Tamil Nadu.
Our beloved leader Puratchi Thalaivi Amma has been conferred with a title ‘Restorer of River Cauvery’ and “Pennycuick of Modern Tamil Nadu’ by the people of Tamil Nadu for her remarkable and outstanding success in the long legal battle for restoring the water rights of Tamil Nadu, in getting the rightful share in the Cauvery river water sharing issue with Karnataka State, and in raising the water levels up to 142 feet in the Mullai Periyar Dam. Both the victories are historical, but the Union Government should expedite the process and constitute the Cauvery Management Board immediately to direct the Karnataka State to release water from Cauvery river in accordance with the award of the Cauvery Water Disputes Tribunal in monthly deliveries to ensure adequate release of Cauvery water from Karnataka for irrigation in Tamil Nadu.
With the notification of the final order of the Cauvery Water Disputes Tribunal, the scheme for modernisation of the canal system in the Cauvery basin at a cost of Rs. 11,421 crore may be accorded approval. This request of our beloved leader Puratchi Thalaivi Amma on 3.6.2014 may be approved at the earliest.
The Tamil Nadu Government has submitted the proposal for the extension, renovation and modernisation of Grand Anicut Canal to develop agriculture in the delta districts of Thanjavur and Pudukottai costing Rs. 2,610 crore to the Central Water Commission and the Commission also gave the in-principle consent. I urge the Government to allocate the funds at the earliest for the speedy implementation of the Grand Anicut project.
The Tamil Nadu Government had also sought the assistance of the Union Government for implementation of the several important proposals linking the rivers Cauvery-Vaigai-Gundar at a cost of Rs.5,166 crore, the Athikadavu-Avinashi flood canal scheme at an estimated cost of Rs. 1,862 crore. This may be sanctioned on priority basis. Likewise, the Pennaiyar, Sathanur Dam – Palar Link Scheme and Pennaiyar – Nedungal Anicut – Palar Link at an estimated cost of Rs.500 crore may kindly be expedited.
The rural economy contributes around 50 per cent of Indian Gross Domestic product and is already showing signs of strain as the Government cuts the once generous and subsidies that shielded farmers and villagers.
19.00 hours Agriculturists’ income dropped due to drought. They borrowed loans from banks for buying seeds and fertilizers. But now they do not know how to repay the loan. This is the plight of farmers in India, particularly the micro, small and marginal farmers with less land holdings. This issue needs to be addressed on war footing.
Madam, farmers need to be encouraged in all possible ways like introduction of comprehensive crop insurance schemes, issuance of kisan credit cards to all farmers in the country and providing them with adequate financial support as well as ensuring them with adequate supply of seeds, fertilizers, insecticides and pesticides, farm equipments etc. Also, farmers should be encouraged with good, reasonable Minimum Support Price (MSP) for their produce. The Government should also instil confidence in their minds by effecting good procurement policies. Without these two vital actions, farmers will be reluctant to take up agriculture and it will affect our agrarian economy and agriculture will decline fast. The Cabinet Committee on Economic Affairs has authorized the Food Corporation of India, along with other procuring agencies, to undertake procurement of food grains, pulses and oilseeds. If the money we spend on importing pulses reaches our farmers, there will not be any suicides or shortage of food grains. There has been an overall increase in the prices of almost every commodity now.
At the time of drought or other natural calamities like flood, their crops are damaged completely and at such times, the entire agricultural loans provided to them need to be waived off completely. Also, farmers should be given proper compensation for the loss of crops and it should be done on a war footing mode. Otherwise, the cash starving farmers may not be in a position to continue to practise agriculture after the damage of crops due to flood or loss of revenue due to severe drought conditions.
Madam, the years 2015 and 2016 were not kind on Tamil Nadu, especially its farmers. Tamil Nadu witnessed an unprecedented and extremely heavy rainfall in December, 2015 which caused devastations of gigantic proportions. This was followed by severe drought in two consecutive years and it had literally crippled our farmers to despair. After losing much of their Kuruvai (summer) crop to the dispute between Tamil Nadu and the neighbouring State of Karnataka over sharing of water from the Cauvery river, a weak North East Monsoon in 150 years caused the Samba (winter) crops to fail too. Drought, debt and despair had totally ruined the life of farmers. Rubbing salt on the wound, Karnataka had refused to release water from the Cauvery river to Tamil Nadu despite several directions from the Supreme Court. This year, the Mettur Dam has consistently registered low levels of water which is awfully inadequate for farmers.
The crops had dried up and farmers are unable to do anything about it. Farmers are getting very upset and are deeply worried about their rising debts. Now they are fighting for their life to draw the attention of the Union Government. Out of 16,682 revenue villages in the State, 13,305 villages have been identified as drought affected. The Government of Tamil Nadu had declared all 32 districts of the State as drought affected and urged the Centre to sanction Rs. 39,565 crore to provide relief to the farmers for the damage caused due to the drought situation. I urge the Union Government to release a special package and funds to address the plight of farmers in Tamil Nadu at the earliest. The Union Government should take all possible steps to improve the socio-economic status of farmers in the country and make them happy so as to enable them to continue with agriculture and farming to make our country self-sufficient and self-reliant in agriculture and its related fields. Thank you.
श्री प्रतापराव जाधव (बुलढाणा) : माननीय अध्यक्ष महोदया, आज आपने इस सदन में नियम 193 की चर्चा के माध्यम से इस देश के किसानों की आज की स्थिति पर चर्चा के लिए अनुमति दी है, उसके लिए मैं पूरे देश के किसानों के माध्यम से आपको धन्यवाद देता हूँ। सही मायने में पूरे देश में किसानों की जो स्थिति है, उस पर यहाँ आज चर्चा हो रही है।
मैं आपके माध्यम से कहना चाहूँगा कि स्वतंत्रता के बाद से यहाँ सरकारें आईं और गईं, हर साल कभी सूखा होता है, कभी किसान लोग आत्महत्या करते हैं। वे मुद्दे हमारे सदन में उठे और जब हम यहाँ चर्चा करते हैं तो सब लोग आँकड़े गिनते हैं कि पिछली सरकार ने क्या किया था, कितना खर्चा किया था, हम क्या कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह तो हर सरकार का काम है कि जो भी किसान हो या इस देश के नागरिक कर के माध्यम से सरकार की तिजोरी में पैसा देते हैं, वह इस देश के हित के लिए और इस देश के लोगों के लिए ही खर्च होना चाहिए। खर्च होता रहता है और आगे भी होगा।
माननीय अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूँगा कि इस देश को कृिष प्रधान देश कहा जाता है, इस देश के किसान को अन्नदाता कहा जाता है, इस देश के किसान को बलीराजा भी कहा जाता है। यह बात भी सही है कि इस देश का अन्नदाता जो दूसरे को जगाने का काम करता है, दूसरे के पालन पोषण का काम करता है, आज वही किसान इस देश में आत्महत्या कर रहा है जो हम सबके लिए कोई सम्मान की बात नहीं है। इस विषय पर इस सदन में चर्चा होनी चाहिए कि जो किसानों की स्थिति है, उस पर हमें क्या करना चाहिए।
अध्यक्ष महोदया, आज किसान कर्ज़ तले डूबा है जिसके बहुत से कारण हैं। मुझसे पूर्व हमारे साथियों ने यहाँ कहा कि कर्ज़ामुक्ति करना कोई उपाय नहीं है। मैं भी मानता हूँ कि सिर्फ कर्ज़ माफ करना ही एक उपाय नहीं है। अगर हम किसी पेशेंट को हॉस्पिटल में लेकर जाते हैं, उसको कोई बीमारी हो, कैंसर हो या हार्ट की बीमारी हो, तो डाक्टर उसको पहले एक सेलाइन लगा देता है कि वह तंदुरुस्त हो जाए और उसको जो भी दवाई दी जाए, उसकी बॉडी उस दवाई को रिस्पांड करे। आज किसान की भी वही हालत है कि इतनी मरणासन्न अवस्था में किसान है कि उसको कर्ज़ा माफी देने से वह सेलाइन का काम करेगी और आगे वह कर्ज़ तले नहीं डूबेगा। इसके लिए हमारे देश की सरकार और हम सबको मिलकर काम करना चाहिए।
अध्यक्ष महोदया, किसान कर्ज़ के तले क्यों डूबा हुआ है? कभी सूखा आता है, कभी ओले पड़ते हैं - ये नैसर्गिक कारण तो हैं ही, लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार संसद में रहने वाले हम सब लोग हैं कि हर चुनाव में हम किसानों को वायदा करते हैं कि हमारी पार्टी के हाथ में अगर सत्ता देंगे तो हम आपको कर्ज़ा मुक्त कर देंगे, आप लोगों का कर्ज़ा माफ कर देंगे। जब लोग बड़ी आशा से किसी के हाथ में सत्ता देते हैं तो लोगों की भी आशा बढ़ जाती है कि जिन लोगों को हमने वोट दिया, जो हमारी वजह से आज सत्ता में आए हैं और जिन्होंने वोटों के लिए हमसे वादा किया था कि हम आपको कर्ज़ा मुक्त करेंगे, तो ऐसे में कुछ लोग कर्ज़ा भरने की स्थिति में होने के बावजूद भी कर्ज़ा नहीं भरते। अगर हमने वादा किया है तो वादा निभाने का काम भी हमारा है, नहीं तो लोग यही समझेंगे कि ये सब चुनावी जुमले होते हैं, चुनाव में कहने की बातें होती हैं जैसा मुझसे पहले भी माननीय सदस्यों ने यहाँ पर बताया।
अध्यक्ष महोदया, किसान जैसा ईमानदार आदमी इस देश में कोई दूसरा नहीं हो सकता। वह अगर कर्ज़ा चुका नहीं पाता तो उसे लगता है कि मैं स्वाभिमान से यहाँ पर नहीं रह सकूँगा, वह खुदकुशी कर लेता है। लेकिन इस देश में इतने बेईमान लोग हैं कि हज़ारों करोड़ का कर्ज़ा लेकर इस देश के बैंकों को चूना लगाकर भाग जाने वाले लोगों की कमी भी इस देश में नहीं है।
हमारे महाराष्ट्र में किसानों के लिए कर्ज़ा मुक्ति की घोषणा की गई। मैं आदरणीय कृिष मंत्री जी से भी आपके माध्यम से पूछना चाहूँगा कि महाराष्ट्र में पिछले तीन सालों से सूखा था, लेकिन पिछले साल थोड़ी अच्छी बारिश हुई। जो भी फसल महाराष्ट्र के किसानों ने उगाई, उसके दाम इतने कम हो गए कि 40 प्रतिशत तक भी किसानों के हाथ में दाम नहीं आए। मैं आपके ध्यान में लाऊंगा कि जब बुआई के समय तूर के भाव 10 हजार रुपये क्विंटल महाराष्ट्र में हुआ करते थे, जब वही तूर की फसल महाराष्ट्र के किसान मंडी में बेचने गए तो उनके हाथ में 4000 रुपये तक नहीं आए। सोयाबीन के भाव बुवाई के समय में जो चार हजार रुपये प्रति क्विंटल थे, जब फसल बाजार में बेचने के लिए हमारा किसान गया तो सोयाबीन के भाव ढाई हजार रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए। एक एकड़ वाले किसान को 20,000 रुपये से 25,000 रुपये का नुकसान सिर्फ इस भाव में फर्क़ के कारण हो गया। अगर उसे सही दाम मिलते तो मैं महाराष्ट्र के किसान के बारे में बोल सकता हूं कि वह खुद अपना कर्ज़ बैंक में जाकर भर सकता था और कर्ज़मुक्त हो सकता था।
अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कृिष मंत्री जी से कहूंगा कि आप महाराष्ट्र का हिसाब लीजिए। महाराष्ट्र के किसानों के लिए बुवाई का महीना जून का होता है। पूरा जून महीना बीत गया, जुलाई की भी आज 19 तारीख है। हर साल इस समय तक हर नेशनलाइज्ड बैंक द्वारा लगभग 75औ किसानों को फसल ऋण दिया जाता था। आज की स्थिति यह है कि महाराष्ट्र के 2औ किसानों को भी बैंक ने अभी तक कर्ज़ नहीं दिया है। कृिष मंत्री निश्चित रूप से मेरी बात का ब्यौरा महाराष्ट्र सरकार से या बैंकों से लेंगे।
कर्ज माफी की घोषणा होने के बाद महाराष्ट्र के किसानों को बताया गया था कि हम आपको दस हजार रुपये एडवांस में देंगे और बाद में कर्ज़ में से उसे वसूल कर लेंगे। मैं पूछना चाहूंगा कि आज 2औ किसानों को भी जो रुपये एडवांस में मिलने वाले थे, वे भी नहीं मिले। मैं पूछना चाहता हूं कि किसान खेती कैसे करेगा? उसे खाद खरीदना है, बीज खरीदना है, प्रे करना है और इसके लिए आज किसानों के पास पैसे नहीं हैं। उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च है, घर के बुजुर्ग लोगों के इलाज़ का खर्च है, खेती का खर्च है और जब कोई किसान यह खर्च नहीं कर सकता, वह हतबल हो जाता है तो उसके सामने आत्महत्या के सिवा दूसरा कोई पर्याय नहीं रहता है।
अध्यक्ष महोदया, हमारी सरकार बोलती है कि किसानों को ऋणमाफी देने के लिए केन्द्र सरकार से कोई मदद नहीं मिली। मैं पूछना चाहूंगा कि क्या बड़े-बड़े नेशनलाइज्ड बैंकों के एन.पी.ए. को कम करने के लिए हमारी सरकार ने कभी मदद नहीं की? क्या उसके लिए सरकार की तिज़ोरी में से पैसे नहीं दिए जाते हैं? मैं आपके माध्यम से यह पूछूंगा कि पिछले साल जो बड़े-बड़े उद्योगपतियों के ऊपर कर्ज़ चढ़ गया था, तो उनके एक लाख पचास हजार कोटि का कर्ज़ क्या इन नेशनलाइज्ड बैंकों ने राइट-ऑफ किया या नहीं? राइट-ऑफ का मतलब क्या है? राइट-ऑफ का मतलब कर्ज़ माफी नहीं है, पर सीधा मतलब है कि यह कर्ज़ वसूल नहीं हो सकता, इसे बाजू में रख दिया जाए। फिर अगर उद्योगपतियों के साथ एक न्याय और इस देशों के किसानों के साथ दूसरा न्याय होता है, उनके साथ भेदभाव होता है तो इससे किसानों का मनोबल कम हो जाता है और फिर किसान आत्महत्या करने के लिए मज़बूर हो जाता है।
अध्यक्ष महोदया, इस देश में हमारा जो मौसम विभाग है, इन 70 सालों में वह जब यह फोरकास्ट करता है कि कल बरसात होगी तो लोगों को धूप का सामना करना पड़ता है। जब यह विभाग यह फोरकास्ट करता है कि कल धूप रहेगी तो हम पानी में भीग जाते हैं। इस कृिष प्रधान देश में, अगर किसानों को सही ढंग से फोरकास्ट की जानकारी मिले तो किसानों का जो नुकसान होता है, वह अपने नुकसान को भी बचा सकता है।
अपने देश की आयात-निर्यात नीति क्या है? अभी पिछले साल मीडिया में यह आया कि बाजार में तूर दाल के दाम बढ़ गए, प्याज के दाम बढ़ गए। तुरंत हमारी सरकार निर्णय लेती है कि तूर दाल के दाम बढ़ गए तो दूसरे देश से तूर दाल आयात करेंगे। प्याज के दाम बढ़ गए तो प्याज के निर्यात पर प्रतिबन्ध लादे जाते हैं। किसानों की बहुत सारी फसलें, जैसे टमाटर, आलू, सब्जी, तूर दाल और सोयाबीन के जो भाव हैं, ये आज बहुत कम हो गए हैं। सरकार ने पिछले साल कितना तूर दाल आयात किया, कितना वह बाजार में गया, इसका पता नहीं है। क्या हमारी सरकार को यह पता नहीं था, क्या हमारा कृिष विभाग यह नहीं जान सकता कि इस साल में हमारे यहां तूर दाल की फसल कितनी होने वाली है? अगर ज्यादा फसल होने वाली है तो उसके लिए क्या करना चाहिए? अभी भी महाराष्ट्र के किसानों के लाखों क्विंटल तूर दाल की गिनती नहीं हुई है। हमारी सरकार ने नेफेड से कुछ खरीदारी की, अभी तक दो‑दो महीने हो गए, लेकिन किसानों को उसका पेमेंट नहीं मिला। अगर किसान को फसल की बुवाई के टाइम पैसा नहीं मिलेगा, तो इस देश के किसानों की क्या हालत होगी?
मैं आपके माध्यम से इतना कहूंगा कि आज इस देश में प्रतिदिन कम से कम ढाई हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। देश के इस सर्वोच्च सदन में किसानों की स्थिति के ऊपर चर्चा हो रही है और ऐसा भी हो सकता है कि उधर कोई किसान आत्महत्या भी कर रहा हो। हर रोज ढाई हजार किसान अपनी खेती का व्यवसाय छोड़ रहे हैं। अगर ढाई हजार किसान रोज खेती का व्यवसाय छोड़ देंगे, यहां पर कोई अनाज उत्पादन करने वाला ही नहीं रहेगा, तो मुझे नहीं लगता है कि इस देश में कोई जिंदा रह सकता है। लोग पैसा कमा सकते हैं, लेकिन कोई भी आदमी पैसा खाकर जिंदा नहीं रह सकता है। अगर इस देश का किसान जिंदा रहेगा, इस देश का किसान समृद्ध रहेगा, तो मैं सोचता हूं कि यह देश भी समृद्धि की तरफ बढ़ता जायेगा। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
श्री प्रतापराव जाधव: महोदया,अभी मुझे बोलते हुए पाँच मिनट ही हुए हैं। मैं चाहता हूं कि मुझे दो‑तीन मिनट और बोलने दिया जाए।
माननीय अध्यक्ष : आपको बोलते हुए दस मिनट से ज्यादा हो गए हैं। अब आप अपनी बात कम्प्लिट कीजिए।
श्री प्रतापराव जाधव: अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से इतना ही कहूंगा कि आज हमारे देश के किसानों की जो स्थिति है, उसके बारे में बोलने वाले तो हम सभी लोग हैं। किसानों के बारे में हमदर्दी बताने वाले हम सभी लोग हैं, लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी आज किसानों तथा खेती की जो स्थिति है, वह बहुत ही बद से बदतर होती जा रही है।
जैसा कि आपसे पहले भी अनुरोध किया गया था कि आज किसानों की जो स्थिति है, अगर उनके लिए एक स्पेशल अधिवेशन बिना कोई टीका‑टिप्पणी किए यहां पर बुलाया जाता, तो अच्छा होगा। हम लोग यहां बैठकर अपने देश के किसानों के हित की बात करते हैं। आज जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, हम उनको कैसे बचा सकते हैं और किसानों की आमदनी भी कैसे बढ़ा सकते हैं, इसके बारे में यहां बैठकर हम लोगों को विचार करना चाहिए।
अभी यहां पर कहा गया कि हम वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने वाले हैं। मैं मानता हूं कि यह हो जाएगा और हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं। उनके बारे में किसी के दिल में कोई शक नहीं है, लेकिन मैं यहां पर यह भी कहना चाहूंगा कि जब हमारे देश में वर्ष 1972 में सूखा पड़ा था, तो इस देश के लोग खाने के लिए तड़प रहे थे और भूख से मर रहे थे। उस समय हमें अमेरिका से एक विशेष प्रकार के हरे कलर का गेहूं लाकर लोगो को खिलाना पड़ा था। वर्ष 1972 के बाद हमारी सरकार ने किसानों को आह्वान किया और हरित क्रांति का नारा दिया था। हमारे किसानों ने भी बहुत जी‑जान से मेहनत की, जिससे आज हमारे देश के किसानों ने हमारी सरकार के भंडारों में इतना अनाज भर दिया कि अगर दो‑तीन साल भी सूखा पड़ जाता है, तो भी इस देश का कोई नागरिक भूखा नहीं मरेगा। हमारे देश के किसानों ने इतना उत्पादन करके सरकार के भंडारों में भरकर रखा है। अगर कोई पूरी दुनिया को पालने‑पोसने की ताकत रखता है और दूसरी तरफ किसानों के ऊपर आत्महत्या करने की नौबत आ रही है, यह बहुत ही चिंता का विषय है। इसलिए, हम सभी लोगों को इसके बारे में गहनता से चिंता करके एक स्पेशल अधिवेशन बुलाना चाहिए, जिसमें यह चर्चा हो कि हमारे देश के किसान कैसे समृद्ध हों और किसानों को स्वाभिमान से जीने का अधिकार कैसे मिले, इस बारे में यहां पर चर्चा होनी चाहिए। धन्यवाद।
SHRI THOTA NARASIMHAM (KAKINADA): Madam Speaker, I am very much thankful to you for giving me an opportunity to speak on a very important subject, agriculture, on the floor of this august House under Rule 193.
Whenever I heard or thought of agriculture, the first thing that came to my mind is misery and pain of poor farmers. On one issue or the other, the pictures of their suffering make me sleepless. In one word, I am sorry to say that this is the current agrarian situation of the small and marginalized farmers in the country.
Since the inception of Green Revolution, agriculture produce in India has increased manifold and now we have robust public stockholdings and public distribution system in the country. In my view, all these were playing a limited role in weeding out the miseries of the farmers in many parts of the country. We are evidencing a puzzling situation where farmers are suffering either from bumper produce and subsequent price fall in the market or crop loss due to drought or pest attacks. As per the National Crime Records Bureau, there is a substantial increase in farmer suicides over the last few years. From the other side, the Government is spending crores of rupees to make agriculture remunerative and for the welfare of the farmers. During the drought years of 2014 to 2016, we had witnessed crippling situation in rural India that is, mainly of agrarian nature, which in turn has affected the whole Indian economy with distressed growth.
I would like to highlight some institutional factors. We are highly dependent on monsoon. Nearly 60 per cent of our arable lands are rainfed. The irrigated potential created year after year is becoming inefficient due to various reasons. Nearly 80 per cent of the farmers are small and marginal with landholding sizes of less than one acre. This is multiplying the intensity of external shocks on the sector. There is a bleak situation in respect of agricultural credit. Only the rich and the landed farmers are getting benefited leaving the landless and the tenant farmers in gallows. I recommend to make Aadhar mandatory for aided loans. Inefficient and unfriendly APMCs at the State level are causing further pain.
Now, I would like highlight the physiography and climatic factors. There is an increase in erratic nature of monsoons. There are effects of climate change. There is growing unfavourability of climatic conditions in various parts of the country and also the emergence of new diseases, pest attacks and pest resistance etc. There are unscientific agricultural practices and its after effects like increasing soil toxicity and salinity. Disrespecting the diversified agro-climatic and agro-ecological conditions in cropping is also on the increase.
It is high time for the Government to enact a National Agriculture Policy on the lines of National Industrial Policy in a comprehensive manner to resolve all the issues in agriculture in all dimensions including employment generation for unskilled and semi-skilled workforce to change the disguised nature of employment in agriculture sector.
The Government had brought in many innovative steps to address the above issues like soil health card schemes, e-NAM, nutrition based subsidy programme, Krishi Unnati Yojana, PM Krishi Vikas Yojana, PM Kaushal Vikas Yojana, PM Fasal Bima Yojana and so on and so forth. All these need to be included in the above said policy which must recognise the diversified and localized problems of the sector. I would also like the Government to monitor the Minimum Support Price for farmers who are mainly in the agriculture sector.
Coming to my State, Andhra Pradesh, which is already reeling under the difficulties of Capital and infrastructure development, growing instability in the agriculture sector mounted much pressure on the Government. The recent downfall of mirchi prices in the State is one such issue. Above all, everybody feels that Andhra Pradesh has a well-developed agriculture sector. However, as discussed above, all these were playing limited role in driving the farmers towards growth.
Keeping all these issues in mind, the Government of Andhra Pradesh in consultation with ICRISAT had drawn a holistic roadmap for the overall development of primary sector called Swarnandhra Vision 2029. It includes both front end and back end issues like social empowerment, skill development, drought mitigation, post-harvest management, involvement of NGOs for effective ground level implementation etc. With all the ground level experience, I sincerely urge the hon. Minister for Agriculture and the officers administering agriculture and allied sectors to be more possessive and practical to take forward this nation and make sure that we achieved our intended aim of doubling farmers’ income by 2022.
Once again thank you Madam for giving me this opportunity to put forth my view points.
श्री ए.पी. जितेन्द्र रेड्डी (महबूबनगर): अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे नियम 193 के तहत फार्मर के इश्यू के ऊपर बात करने का मौका दिया, धन्यवाद। मैं एक किसान का बेटा हूं, हालात ऐसा हुआ कि मुझे पार्लियामेंट तक पहुंचा दिया। मैं एक किसान का बेटा हूं और गांव से आता हूं। किसान के ऊपर इतना महत्वपूर्ण मुद्दा था, कल बीएसी में तय हुआ था कि आज इसे स्टार्ट करेंगे और आगे बढ़ाएंगे क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस मुद्दे पर सभी को बोलना है। मेरी तबीयत थोड़ी खराब थी, लेकिन मैंने घर में टेलीविजन में देखा, अनंत कुमार जी बोलते कुछ हैं और करते कुछ हैं, बीएसी में कुछ बोलते हैं। आज उन्होंने बोला कि रात में ही डिस्कशन को खत्म करना है, मैं फिर दौड़ते-दौड़ते आ गया कि अन्नदाता के ऊपर बात करनी है, किसानों के ऊपर बात करनी है। पांच ऊंगली मुंह के अंदर जाती है तभी हम जी सकते हैं नहीं तो नहीं जी सकते। इस पांच ऊंगली को अंदर भेजने वाला किसान है, किसान अन्न पैदा करेगा तभी हम जीवित हैं, इस बारे में हमें चर्चा करने के लिए आना पड़ा। उनका जो कट है उसे हर तरीके से देखना है।
Madam, the agriculture sector employs nearly half of the workforce in the country. However, it contributed 17.5 per cent of the GDP, at current price, in 2015-16. Over the past few decades the manufacturing services have increasingly contributed to the growth of the economy, while the agriculture sector’s contribution has decreased from more than 50 per cent of GDP in the 1950s to 15.4 per cent in 2015-16.
एग्रीकल्चर पहले 50 परसेंट कंट्रीब्यूट करता था आज यह 15.5 परसेंट पर पहुंच गया है, उसकी क्या दिशा है? जो आज खेतीबाड़ी कर रहे हैं उनको उस पर भरोसा नहीं है, वे अपने बच्चों को खेतीबाड़ी नहीं करने दे रहे हैं। उन्होंने देखा है कि खेतीबाड़ी से कुछ फायदा नहीं हो रहा है और उनको कुछ भी आसरा नहीं मिल रहा है। इसलिए लोग आईटी सेक्टर, मैकेनिक सेक्टर इम्पलायमेंट की तरफ भेज रहा है। इस तरीके से यह होता रहेगा तो देश के अंदर अन्न कम होते जाएगा। जो किसान खेती करके खाना खिलाता है, आज इम्पोर्ट करके खाना पड़ रहा है, दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
India’s production of food grains has been increasing every year and India is among the top producers of several crops such as wheat, rice, pulses, sugarcane and cotton. It is the highest producer of milk and the second highest producer of fruits and vegetables. In 2013 India contributed 25 per cent of the world’s pulses production, the highest of any country. Madam, India also contributed 22 per cent of rice production and 13 per cent of wheat production. It also accounted for 25 per cent of the total quantity of cotton produced, besides being the second highest exporter of cotton for the past several years.
However, the agriculture yield, quantity of a crop, produce per unit of land is found to be lower in the case of most crops as compared to other top producing countries such as China, Brazil and the United States. Although India ranks third in the production of rice, its yield is lower than Brazil, China and the United States. The same trend is observed for pulses where it is the second highest producer.
Agriculture growth is fairly volatile over the past decades ranging from 5.8 per cent till 2005-06 to 0.4 per cent in 2009-10 and minus 0.2 per cent in 2014-15. Such a variance in agriculture growth has an impact on farm incomes as well as farmers’ ability to take credit for investing in their landholdings.
19.30 hours (Hon. Deputy Speaker in the Chair) एग्रीकल्चर क्यों डेटेरिओरेट हो रहा है, किसान क्यों सुसाइड कर रहे हैं? हर आदमी भाषण देता है, हम इतने सालों से भाषण सुनते आ रहे हैं। माननीय कृिष मंत्री जी ने बहुत ही तरीके से समझाया है कि किस तरह से कृिष को बढ़ाया जाए। हम आज देख रहे हैं कि गरीब किसान आसमान की तरफ देखता है और सोचता है कि बारिश होगी तो फसल अच्छी होगी। यही सोचकर वह खेत में हल चलाता है, बीज बोता है। बीज बोने और हल चलाने के लिए मिनिमम 4,000 रुपए प्रति एकड़ खर्च होता है। जब वह बीज बोता है तो सोचता है कि बारिश अच्छी हो जाए, फसल अच्छी हो जाए, लेकिन हमेशा किसान का दुर्भाग्य रहता है कि वह बैंक से, मनी लैंडर्स से कर्ज लेता है, लेकिन बारिश नहीं होती है। कभी ओला पड़ जाता है, कभी कीड़ा लग जाता है, आखिर में जो फसल हाथ में आनी चाहिए, वह नहीं आ पाती है। किसान को हर दिन यही चिंता रहती है कि मेरे ऊपर जो कर्जा है वह किस तरह से चुकाऊंगा। कभी-कभी वह एक, दो या तीन साल बाद भी कर्ज के पैसे नहीं लौटा पाता है और साल के साल उस पर भार बढ़ता जाता है। किसान बहुत आत्मविश्वास वाला आदमी है, वह न तो सोसाइटी में चोरी कर सकता है, न भीख मांग सकता है और न ही किसी के आगे हाथ फैला सकता है। उसे अपने ऊपर विश्वास होता है, वह बहुत खुदगर्ज होता है, इसलिए किसी को कुछ न कहकर खुदकुशी कर लेता है। हमें इनके बारे में सोचना चाहिए।
महोदय, मैं अपने राज्य के चीफ मिनिस्टर के.सी. राव जी के बारे में बताना चाहता हूं कि उन्होंने 35 लाख किसानों का 17,000 करोड़ रुपए कर्ज तीन-चार किश्तों में वेव आफ कर दिया, माफ कर दिया। उन्होंने माफ करने के बाद सोचा कि हर साल एक करोड़ पचास लाख एकड़ जमीन है जबकि इन लोगों का प्रति एकड़ इन्वेस्टमेंट 4,000 रुपए है। हम हर साल कर्ज माफ करते जा रहे हैं जो कि कम से कम चार से साढ़े चार करोड़ रुपए है। हमारे राज्य के मुख्यमंत्री ने सोचा कि हर साल कर्ज माफ करने के बजाय यही पैसा इन्वेस्टमेंट, इनपुट में दे सकते हैं। माननीय के.सी. राव पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने हर किसान को 4,000 रुपए प्रति एकड़ हर सीजन के लिए देने की बात कही। हमारे यहां रबी और खरीफ की फसल होती है, यानी खरीफ में एक एकड़ पर 4,000 और रबी फसल के लिए हर साल 4,000 रुपए देने की बात कही। एक करोड़ पचास लाख एकड़ जमीन पर सिंचाई होती है, फार्मिंग होती है, किसानों को फ्री आफ कास्ट बिना इन्टरस्ट के पैसे दिए जिसे उनको पैसा वापिस नहीं करना है। अगर किसान के भाग्य ने साथ दिया, चार हजार रुपए से खेती की, बारिश अच्छी हुई, कीड़ा नहीं हुआ, अगर ग्रेन्स डाले, तो एक एकड़ में दस क्विंटल पैदा होता है। एक क्विंटल के हिसाब से एमएसपी रेट 4 हजार रुपये है, यानी 40 हजार रुपये उसके घर पहुंच जाते हैं। जो यह पैसा दिया गया है, वह उसे वापस करने की भी जरूरत नहीं है। अगर बाई चांस उसकी फसल खराब हो गयी, उस दिन यील्ड नहीं हुई, फायदा नहीं हुआ, तो उसके दिमाग में यह बात भी नहीं है कि मुझे यह चार हजार रुपया वापस करना है। उसके दिमाग में यह बात कभी नहीं आती कि मैं सूसाइड करूं, क्योंकि उसे वह पैसा भारी नहीं पड़ता है। अगर इस साल वह उस 4 हजार रुपये में फसल नहीं उगा सका, तो उसे वह 4 हजार रुपया अगले साल भी मिलेगा। उस पैसे से he can, again, do farming. इस तरीके से उसे फायदा होता है।
दूसरी बात यह है कि मार्केट में फार्मर्स को एमएसपी इसलिए नहीं मिलता, क्योंकि हमारे पास प्लानिंग नहीं है कि कौन सी फसल कहां बोनी है और उसके लिए कौन सी सॉयल सूटेबल है। उदाहरण के तौर पर मेरे डिस्ट्रिक्ट महबूबनगर में कॉटन ग्रो होती है, लेकिन दूसरी जगह राइस ग्रो होता है। अगर कॉटन ग्रोवर्स को केवल कॉटन ग्रो करने का आदेश दिया जाये, तो फायदा होगा। आप दूसरी जगह कहें कि तुम यहां मिर्ची, चावल, व्हीट पैदा करो, तो फायदा होगा। इसे क्रॉप कालोनीज डिवाइड करना बोलते हैं। It should be known as ‘crop colonies’. उन्हें तभी अपना एमएसपी मिल सकता है। लेकिन अबकी बार मिर्ची को एमएसपी 4200 रुपये मिल रहा है, तो सब किसानों ने उसे 4500 रुपये में डाल दिया। यदि उसे मालूम होता है कि 5200 रुपये कॉटन पर मिल रहा है, तो ninety per cent of the farmers today have grown cotton. उन्हें एमएसपी नहीं मिलेगा। हम जो प्लानिंग कर रहे हैं, उसमें हम इस तरह की क्रॉप कालोनीज बना रहे हैं। मैं आपसे भी रिक्वैस्ट करता हूं कि आप इस तरह की प्लानिंग करें। उदाहरण के तौर पर तेलंगाना में 40 हजार टन मटन और 40 हजार टन फिश का इम्पोर्ट होता है। हमारे यहां यादव जाति सबसे ज्यादा शीप पालन करती है। उन्हें स्किल डेवलपमैंट के लिए किसी ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है। वह अंगुली में ही बता सकता है कि लाखों बकरों में से किस बकरे को कौन सी बीमारी है। उसका स्किल उसके दिमाग में है। हमारे मुख्यमंत्री जी ने सोचा कि हम क्यों न 40 हजार टन मटन का एक्सपोर्ट करें, उसके लिए उन्होंने यूनिट्स बनाकर 20 फीमेल और एक मेल उन लोगों को फ्री ऑफ कास्ट दिया। आज हम करोड़ों शीप यादव जाति को दे रहे हैं, ताकि वे उससे अपना भरण-पोषण करें। वे केवल भरण-पोषण ही नहीं करें, बल्कि उसे एक्सपोर्ट भी करें।
हमारे यहां मुदराज कम्युनिटी है, जिनकी ट्रेडिंग फिशिंग है। उन्हें फिशिंग के लिए फ्री ऑफ कास्ट मछली दी हुई है। आपको मालूम है कि हमने मिशन काकतीय लिया हुआ है। मिशन काकतीय में हमने 66 पांड्स को खोला है। हमारे पास कोरामाटा नामक फेमस फिश है। उसका पहले भाव 400 और 500 रुपये पर केजी था। जब से उन फिशरमेन को मछली दी गयी है और उन लोगों ने पॉण्ड में डाला है, तब से उसका भाव 250 रुपये आ गया है। इस तरीके से एग्रीकल्चरिस्ट्स को एलाइड चीजों के बारे में भी सुझाव देना चाहिए। ऐसा नहीं हो कि हर आदमी केवल भाषण दे रहा है। अभी माननीय सदस्य बोल रहे थे कि सिंधिया जी कृिष के बारे में क्या जानते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि खाली हल चलाने से होगा। इसके साथ ही पढ़ने से, सोचने से, देखने से, विदेशों में जाकर देखने से भी सीख सकते हैं। अगर कोई हमारे यहां तेलंगाना में आए तो वहां से कुछ सीखकर जा सकते हैं। हमारे मुख्यमंत्री जी जो काम कर रहे हैं, मिशन भागीरथ हो, मिशन काकतीय हो, जिस तरीके से लोगों को फिश दे रहे हैं, जिस तरीके से लोगों को शीप दे रहे हैं, जिस तरीके से हम लोग किसानों को 8000 रुपये दे रहे हैं, वे सभी चीजें सीख सकते हैं और दूसरे राज्यों में हम उन चीजों को इम्पलीमेंट कर सकते हैं। एक प्रॉपर एक्शन लेकर, काम करने से किसानों को फायदा होगा, ऐसा नहीं कि केवल भाषण देते हुए, श्लोक पढ़ते हुए या कविता पढ़ते हुए यह काम हो जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता है। हमें ठोस तरीके से किसानों की रक्षा करनी होगी। मैं आप सभी को इनवाइट करता हूं, इजरायल छोड़िए, पहले आप तेलंगाना में आइए। तेलंगाना में आज कृिष के बारे में क्या हो रहा है, उसे देखिए।
HON. DEPUTY SPEAKER: Mr. Reddy, please take your seat.
… (Interruptions)
श्री ए.पी. जितेन्द्र रेड्डी: कृिष मंत्री जी को मालूम है, किस तरीके से उन्होंने दाल के लिए एक्सेस काउण्टर्स खोले थे और आपने हमें उसे खरीदने में मदद की थी। It was the largest thing where you bought dal from us. Tomorrow, सीसीआई का थर्ड सेंटर किसी भी राज्य में खुला। The third CCI Centre has been opened in Telangana and we still urge the Government that more purchasing centres are to be opened in Telangana. … (Interruptions) I will also tell about Mahabubnagar. … (Interruptions) मैं आपको बताना चाहता हूं कि सरकार द्वारा इस तरीके से एग्रीकल्चर को आगे बढ़ाने के लिए ठोस प्रयास करना चाहिए।
SHRI JITENDRA CHAUDHURY (TRIPURA EAST): Hon. Deputy-Speaker, Sir, I think that you would be generous as we are discussing a very important issue, namely, the agrarian issue.
सर, यह हमारा सौभाग्य भी है, आजादी के पहले से और आजादी के 70 साल बाद भी हमारी 70 फीसदी आबादी की जीविका कृिष है, लेकिन आजादी के बाद, शुरूआत में जहां जीडीपी में कृिष का योगदान 52 प्रतिशत था, उसमें गिरावट होकर यह लगभग 15 प्रतिशत पर आ गया है। फिर भी, किसान हमारा अन्नदाता रहा। इस साइड और उस साइड के हम सभी लोग यह बोलने में बहुत खुश होते हैं कि हम किसान के बेटे हैं, हम किसान के प्रतिनिधि हैं। कल पूरे हिन्दुस्तान से लगभग दस हजार से ज्यादा किसान संसद को जगाने के लिए पूरे देश में जो हो रहा है, उनके दुख-दर्द को वहां पहुंचाने के लिए जन्तर-मन्तर पर आए हैं। I am not blaming this Government entirely. मैं सिर्फ एनडीए सरकार, मोदी सरकार पर आरोप नहीं लगा रहा हूं। This is the legacy of the past. This suffering of the farmers has started long before.
The issue of committing suicide, etc. has started from mid-1990s because of the new liberal policy and so many other things as also the fact that commitment has not been met by the previous Government also. लेकिन मेरा कहना है कि जब पिछले चुनाव हुए, उसमें सबसे बड़ा मुद्दा था कि किसान की खुदकुशी और परेशानी को कैसे हल किया जाए। इसको हल करने के लिए पिछली गवर्नमेंट ने भी बहुत वायदा किया था और मौजूदा सरकार ने भी ऐसे बहुत वायदे किये हैं, क्योंकि इसकी बहुत चर्चा हुई है, इसलिए मैं इसके डिटेल में नहीं जा रहा हूं, यहां पर बहुत बातचीत हो रही है, मैं सिर्फ यह याद दिलाना चाहता हूं। स्वामीनाथन कमीशन के रिकमैंडेशन के अनुसार यह वायदा किया गया था कि एमएसपी, कॉस्ट प्लस 50 प्रतिशत मूल्य दिये जायेंगे, तीन साल गुजर गये लेकिन अभी इसके बारे में बहस हो रही है।
It has been promised that more investment will be made in agriculture. कृिष में बहुत ज्यादा निवेश होंगे, कृिष से ज्यादा रोजगार जेनरेशन करने की कोशिश होगी। Higher wages would be paid under MGNREGA. यहां पर तोमर साहब हैं, क्योंकि मनरेगा के साथ गांव के विकास का सफर जुड़ा हुआ है। हर खेत में पानी देंगे, किसानों को पेंशन दी जायेगी, इफैक्टिव इश्योरैंस पॉलिसी अपनायेंगे, लेकिन आज देश का जो हाल है, मैं बहुत विनतीपूर्वक बोलना चाहता हूं कि अभी खुदकुशी के बारे में बात हुई है कि एनसीआरबी के आंकड़े के अनुसार महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में जो पार्टी राज कर रही है, इन दोनों स्टेट्स में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा खुदकुशी हुई, पिछले साल 4,291 खुदकुशी हुई है। Sir, in both these States – Maharashtra and Madhya Pradesh - 51.8 per cent of suicides have taken place. Overall, in the BJP-ruled States, 7,723 suicides have taken place, which is 61.28 per cent. पंजाब और हरियाणा, जहां पर ग्रीन रिवोल्यूशन हुआ, वहां पर भी खुदकुशी हो रही है। In your own State, Tamil Nadu, during the last four months, according to the NCRB, 200 farmers have committed suicide. Why is this? Promises were made on bad debts but the steps which were supposed to be undertaken were not undertaken, and the same is ignored. Earlier, we have discussed about arhar dal and toor dal. तूर दाल का एमएसपी गवर्नमेंट ने 5,050 रुपये प्रति क्विंटल एनाउंस किया है, लेकिन अभी जितेन्द्र जी, तेलंगाना के माननीय सदस्य बोल रहे थे। In Telangana, Karnataka, Andhra Pradesh, the production cost is Rs.5,722, Rs.6,841, and Rs.5,100 per quintal respectively but the MSP is less than that of the production cost there. It happened when drought and flood situation was there. This is the situation not just in the case of arhar and toor dal but also in the case of all other crops throughout the country.
गवर्नमेंट ने व्हीट का एमएसपी 1,625 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। In some very advanced countries like Australia, USA, France, Russia and Ukraine, higher subsidy is given. Import duty has almost been abolished. Earlier, it was 25 per cent; now, it has been brought down to zero per cent. Farmers are selling their produce at a very low rate because the Government is importing wheat from other countries.
Farmers of our country are suffering. हमारे देश का किसान मर रहा है। उन्हें फसल का पूरा दाम नहीं मिल रहा है और आईटीसी, कारगिल, रिलायंस, अदानी आदि कम्पनियों को फायदा हो रहा है। किसानों की समस्या को देखने की आवश्यकता है।
महोदय, अब मैं प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना की बात कहना चाहता हूं। सत्ता पक्ष की तरफ से कहा जाता है कि किसानों के लिए बहुत अच्छा काम किया है। अभी महताब जी ने भी इसके बारे में कहा है। During the 2017-18 Budget, the allocation has been reduced to Rs.4,240 crore from Rs.14,240 crore in the earlier Budget. The Government has been saying that more coverage will be there, but the Budget allocation has been declining. वर्ष2016-17 में प्राइवेट इंश्योरेंस कम्पनियों को 21500 करोड़ रुपए का प्रीमियम मिला है, लेकिन 4270.55 करोड़ रुपए का क्लेम सैटल हुआ। According to the Report, the disbursement that has been made so far is of the order of Rs.714 crore, that is, only 3.31 per cent of the total claim. इसका बेनिफिट किसान के पास नहीं जा रहा है। सरकार ने अच्छी स्कीम बनाई है, लेकिन किसान को बेनिफिट देने के लिए जो कार्रवाई होनी चाहिए, वह नहीं हो रही है। सरकारी खजाने से प्राइवेट इंश्योरेंस कम्पनी के पास हजारों करोड़ रुपया जा रहा है और किसान को कोई फायदा नहीं हो रहा है। ग्राम और ब्लाक स्तर पर जो कार्रवाई होनी चाहिए, वह नहीं हो रही है। Regarding the loan waiver scheme, there has been a lot of discussion. Even the Ruling Party has been given the assurance on this. मेरा कहना है कि कारपोरेट्स को जो माल्या जैसे लोग हैं, इनके लोन को हम छोड़ देते हैं। Our banks are suffering due to the NPA’s of more than Rs.8.55 lakh crore. Who has taken that loan? बैंक से जो लोन लेते हैं, उनका अपना पैसा बैंकों में नहीं पड़ा रहता है। मिडिल क्लास लोगों के पैसे बैंक में जमा रहते हैं, लेकिन कारपोरेट लोग बैंकों से पैसा लेकर वापिस नहीं करते हैं। कारपोरेट्स का पैसा माफ किया जा सकता है, लेकिन किसानों का कर्ज माफ करने के लिए कुछ नहीं किया जाता है।
महोदय, "हर खेत को पानी" का नारा लगाया गया है। यह बहुत अच्छा नारा है लेकिन हर खेत को पानी देने के लिए जो राशि चाहिए, जो तैयारी चाहिए, वह दिखाई नहीं देती है। इस बजट में 40 हजार करोड़ रुपए दिए गए, लेकिन हमारी जो अनइर्रिगेटिड लैंड है, according to the Report, we need to bring 47 million hectares under irrigation. But, the money for this is not sufficient. Where is the money? Where is the planning?
I will mention about another thing. Of course, that does not pertain to the Agriculture Ministry. It pertains to the Environment Ministry. One order has been issued by the Government about animal trading. According to the financial report, from the animal husbandry, the total GDP which comes out is 7.65 per cent. कृिष की जीडीपी का 26 प्रतिशत पशुपालन से है। पशुपालन कौन करते हैं, जिनके पास जमीन कम है, हिन्दुस्तान में जिनके पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है। यह टोटल 26 प्रतिशत है। लेकिन जो पशुपालन करते हैं, 50 पर्सेंट उनके पास है। काऊ ट्रेडिंग बंद हो गया। अभी क्या होगा? इससे लाखों किसानों की जीविका पर असर पड़ेगा। इसलिए यह एक बहुत ही अहम मुद्दा है। That is why the kisans are agitating like in Mandsaur.
19.56 hours (Hon. Speaker in the Chair) माननीय अध्यक्ष : अब आपकी बात पूरी हो गयी। It is eight o’clock, please conclude now.
SHRI JITENDRA CHAUDHURY: A comprehensive loan waiver scheme should be announced immediately. Second, a legislation on MSP should be there. ऐसा कानून होना चाहिए। इससे सभी फार्मर्स को यह ऑटोमैटिकली मिल जाएगा। All suicide cases and victims of Mandsaur in Madhya Pradesh should be compensated adequately. Loan should be available for the farmers. All agricultural inputs – seeds, fertilizers, pesticides, insecticides and agriculture appliances – should be available at subsidised rates. The Government should appoint a committee to re-examine, I am not asking you that in toto to implement Swaminathan Commission’s recommendations but to re-examine the Swaminathan Commission’s recommendations and declare a time-frame by which the recommendation will be implemented benefiting 70 per cent of our population. It means, not only our economy but also other economies will grow and I believe, the Government will definitely take care of it.
SHRI MEKAPATI RAJA MOHAN REDDY (NELLORE): Thank you, Madam Speaker, for giving me an opportunity to speak on agrarian crisis in the country. The whole farming community is in great distress in the entire country. It is a great irony. Farmers who supply food to the country do not have proper food to eat. It is really a great irony. According to estimates, in every thirty minutes, a farmer commits suicide. In the last two decades, around five lakh farmers committed suicide. Madam, in Andhra Pradesh also, last year, the Northeast monsoon failed which gives water to entire Rayalaseema, Nellore and Prakasam Districts. Many small and marginal farmers have migrated to places like Cochin and Bangaluru as labourers. Thousands of farmers have migrated to other States as lobourers. Their living condition is very pathetic. Madam, after failure of monsoon also, people in these districts have sown some crops like Mirchi, Yellow Gram and Pulp for paper industry. Their prices have also fallen down. They could not even get the minimum price. Their condition is very pathetic. Such is the situation. According to NITI Aayog, 53 per cent of farmers are below poverty line.
20.00 hours Madam, many political parties promise loan waivers at the time of elections. In Andhra Pradesh also the party in power now had promised loan waiver to the tune of Rs.87,000 crore and Rs.14,000 crore of DWACRA loans. However, they waived off only loans of Rs.11,000 crore.
माननीय अध्यक्ष : आठ बज गए हैं। इस डिस्कशन को आज ही पूरा करने के लिए हम सदन का समय बढ़ाते हैं, लेकिन इनके बाद बोलने वाले कम समय में बोलें ताकि 8.30 बजे हम रिप्लाई शुरू कर सकें।
SHRI MEKAPATI RAJA MOHAN REDDY: Madam, they could waive off loans amounting to Rs.11,000 crore as against Rs.87,000 crore promised. Such is the situation. Farmers have been duped. When a party makes a promise in its election manifesto, it should fulfill it. It should be taken care of.
Madam, we know that only 40 per cent of land in the country is under irrigation. A farmer in a delta area gets irrigation facility and a farmer in non-delta area has to dig a borewell, fit a motor and use electricity to bring the water up for irrigation purposes. When the two farmers raise the same crop, they get the same rates for their produce. That is why Dr. Rajasekhara Reddy supplied power free of cost to farmers when he was the Chief Minister of Andhra Pradesh. As a result of that free power supply, food production of 130 lakh tonnes was raised to 206 lakh tonnes. Many other States followed the same practice after that.
If the entire area is not provided irrigation facility, the farmer will be in a disadvantaged position. It is high time we thought of linking of major rivers. When Dr. Rajasekhara Reddy was the Chief Minister, he began a programme to connect Godavari and Krishna rivers. He started construction of Polavaram project. He completed the work of 140 km of right canal. That is why now the Godavari water is flowing into Krishna river basin in a little way. The Government of India should think in a big way to link all the major rivers. Then only the country will prosper.
The farmer should get timely and quality seed supply and loans. Even tenant farmers also should be given loans. Seeds, fertilizers and all input costs should be provided. As Shri Jitender Reddy said, the Telangana Government is thinking of giving input costs of Rs.4,000 per acre in one season and Rs.8,000 per acre in one year. The Government of India should also think on these lines. Unless and otherwise the Governments thinks in a big way, takes the opinions of experts and comes to the rescue of farmers, the country will face the problem of food security.
Madam, population is growing day by day. The amount of land available remains the same, the amount of rainfall remains the same. Therefore, if we do not take care of our farmers in a big way, the country is going to face the problem of food security. That is why I urge upon the Government of India to please think in a sincere way on how to help the poor farmer and try to save the country. Thank you very much.
श्री तारिक अनवर (कटिहार): अध्यक्ष महोदया, मैं कोशिश करूँगा कि आपके द्वारा घंटी बजाए जाने से पहले अपनी बात समाप्त कर सकूँ। आज हम लोग एक बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यापक विषय पर बातचीत कर रहे हैं। किसानों का जो मसला है, उनकी जो समस्याएं हैं, उनकी जो पीड़ा है, मैं समझता हूँ कि यह पूरा सदन उससे चिंतित है। इस सदन के बाहर जो हमारे किसान भाई हैं, जो कि हमारे अन्नदाता हैं, वे हमारी ओर बड़ी उम्मीद और आशा के साथ देख रहे होंगे कि देश की सब से बड़ी पंचायत में उनके भविष्य के लिए क्या फैसला किया जाता है अक्सर यह देखा गया है, लोगों ने इस बात का जिक्र भी किया है कि हर सत्र में हम लोग किसानों की समस्या को लेकर बातचीत तो करते हैं, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचते हैं। सरकार की तरफ से ऐसी कोई योजना नहीं आती, जिससे भविष्य में फिर उस तरह की समस्या न खड़ी हो, किसानो को फिर से उस तरह की परेशानी न झेलनी पड़े। ऐसी कोई योजना अभी तक सरकार की तरफ से नहीं आई है।
सरकार की एक राष्ट्रीय नीति होती है। मैं समझता हूं कि किसान को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट नीति नहीं है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए और उसी तरह से शिक्षा के क्षेत्र में सब जगह एक राष्ट्रीय नीति बनती है कि किस तरह से सारे देश में उसका लाभ पहुंचा सकते हैं। उसी तरह किसानों के मामले में भी हम लोगों की एक राष्ट्रीय नीति होनी चाहिए, लेकिन दुख की बात है कि अभी जब पिछले दिनों कुछ राज्यों ने किसानों का कर्ज माफ किया तो हमारे वित्त मंत्री जी का बयान आया कि यह राज्यों की जिम्मेदारी है। केंद्र को इससे कोई लेना-देना नहीं है। अगर कोई राज्य कर्ज माफ कर रहा है तो उनको यह भार सहना पड़ेगा। उन्होंने इस तरह से कहा कि जैसे यह मामला सिर्फ राज्य तक ही सीमित है। जैसा अभी यहां लोगों ने आंकड़े दिए कि लगभग हर वर्ष 12 हजार किसान, बल्कि उससे भी ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यह तो रिकॉर्ड की बात है, जो रिकॉर्ड में आता है, उसकी सूची सरकार के पास होती है, लेकिन बहुत सारी ऐसी भी आत्महत्याएं होती हैं, जो शायद सूची में शामिल नहीं होती हों। जहां 12 हजार किसान हर वर्ष आत्महत्या कर रहे हों, वहां हमारे मंत्री जी या सरकार यह कहे कि यह राज्यों का मामला है। कृषि तो स्टेट सबजेक्ट है, इस तरह की बात करना मेरे हिसाब से उचित नहीं है। इससे किसानों में एक निराशा पैदा होती है।
हम चाहेंगे कि आने वाले दिनों में सरकार कोई ठोस नीति बनाए और कोशिश यह होनी चाहिए कि किसानों की दशा बदलनी चाहिए। हम कभी-कभी खुश होते हैं कि महंगाई की दर नीचे जा रही है, लेकिन किसानों की यही सबसे बड़ी पीड़ा है, क्योंकि किसान को जब उसके पैदा किए हुए अनाज या उपज का सही दाम नहीं मिलता है, तो वहीं से उसकी परेशानी शुरू होती है। हम लोगों ने देखा है, जहां तक हमारे देश में उत्पादन का सवाल है उसमें कमी नहीं है। हम लगातार उसमें आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन जब उस उत्पादन की कीमत किसान को नहीं मिलती है तो वहां से किसान के लिए परेशानी बढ़ती है। जब उसके ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ता है और सामाजिक तनाव उस पर बढ़ता है, उसकी परेशानी बढ़ती है, पारिवारिक परेशानी बढ़ती है, कर्ज की परेशानी बढ़ती है, फिर उसके सामने कोई रास्ता नहीं बचता। फिर वह आत्महत्या करने को मजबूर होता है। हम सब जानते हैं कि हर इंसान को, कोई भी व्यक्ति हो उसको अपनी जान सबसे ज्यादा प्यारी होती है। यह सोचने की बात है कि क्यों आदमी अपनी जान दे रहा है। यकीनन इसके पीछे कुछ न कुछ ऐसी बात है, जिस पर वह अपनी जान देने के लिए मजबूर होता है। इसका निदान निकलना चाहिए। हम सब लोगों को इस बात का अंदाजा है, उसका जिक्र भी यहां पर किया गया है कि मिनिमम सपोर्ट प्राइस, न्यूनतम समर्थन मूल्य अगर उनको सही मिल जाए। जिसका जिक्र लोगों ने किया कि स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट का जो रिकमेंडेशन है, जिसका जिक्रवर्ष2014 में भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में किया गया था।
जब लोग वोट देते हैं, जब लोग किसी पार्टी को समर्थन देते हैं तो यकीनन उन्हें इस बात की उम्मीद होती है कि नई सरकार आयेगी, नये प्रधान मंत्री बनेंगे तो हमारी समस्या का निदान होगा, हमारी कठिनाइयां दूर होंगी। लेकिन अभी तक उस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। प्रधान मंत्री जी कह रहे हैं, अभी मंत्री जी भी कह रहे थे कि हमारा लक्ष्य वर्ष 2022 का है। इसका मतलब है कि उतने समय तक लगभग साठ हजार किसानों की जान चली जायेगी और तब तक हम बैठे रहेंगे। उसका एक तरीका यह हो सकता है कि हमें दो तरह की योजना बनाने की जरूरत है, इसमें एक तात्कालिक हो, ताकि आत्महत्याओं का जो सिलसिला चल रहा है, वह रुक जाए और दूसरा भविष्य के लिए एक लांग टर्म कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता है, जिससे फिर भविष्य में इस समस्या का सामना न करना पड़े और किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिले। मैं समझता हूं कि सारे किसान कर्ज माफी नहीं चाहते कि हर बार उनका कर्ज माफ किया जाए। वे चाहते हैं कि जो हम पैदा करते हैं, हमें उसका सही मूल्य मिल जाए और उसका वही तरीका है कि स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट को सरकार स्वीकार करे और उसे इम्पलीमैन्ट करे।
महोदया, अभी बहुत सारी बातें बाकी हैं, लेकिन समय का अभाव है, इसलिए मैं अपनी बात को इस उम्मीद के साथ यहीं समाप्त करता हूं कि मोदी सरकार आने वाले दिनों में कम से कम किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए कोई न कोई ऐसा उपाय जरूर करेगी, जिससे कि इस देश के किसान अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकें। धन्यवाद।
माननीय अध्यक्ष : श्री अशोक चव्हाण जी, आप बोलिये। अशोक जी, आपके छोटे भाई ने आपके लिए कुछ समय नहीं बचाया, आपको थोड़े समय में बोलना पड़ेगा।
श्री अशोक शंकरराव चव्हाण (नांदेड़) : मैडम, आपके होने के बाद मुझे चिंता नहीं है, आप मेरी मदद करेंगी।
माननीय अध्यक्ष महोदया, मैं उम्मीद करता हूं कि आप यदि थोड़ा समय देंगी तो महाराष्ट्र का इश्यू मैं सदन के समक्ष रख पाऊंगा, क्योंकि इस विषय की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए यदि मुझे थोड़ा ज्यादा समय मिले तो बेहतर रहेगा। इस विषय पर सदन में पिछले तीन सालों से या उससे भी पहले लगातार काफी चर्चा हुई है और मैं समझता हूं कि जिन-जिन सदस्यों ने एक्रॉस पार्टी लाइन इस विषय पर चर्चा करते हुए जो भी सुझाव सदन में माननीय मंत्री जी के सामने रखे हैं, अगर उनके ऊपर गंभीरता से अमल होता तो शायद आज मामला इतना गंभीर नहीं होता, जितनी आज देश के सामने एक गंभीर समस्या पैदा हुई है। यदि हम किसानों की आत्महत्याओं की समस्या को देखें तो वर्ष 2015 के फिगर्स हमारे सामने हैं, उनमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर है। महाराष्ट्र में तकरीबन 42 परसैन्ट लोगों ने आत्महत्याएं की हैं, यह हाइएस्ट है। बाकी तेलंगाना, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश आदि ऐसे 12-13 राज्य हैं कि जहां सूखे के कारण या अन्य कारणों से यह समस्या होती है। मैं ऐसा नहीं मानता हूं कि कोई भी किसान अपनी मर्जी से या खुशी से आत्महत्या करता है। हालात ही ऐसे पैदा हुए हैं, जिनकी वजह से उसे मजबूरी में आत्महत्या करनी पड़ती है। इसीलिए माननीय मंत्री जी से मेरी गुजारिश रहेगी कि इस विाय पर आज आपके रिप्लाई में कोई ठोस फैसला आना चाहिए कि हम ऐसे कदम उठा रहे हैं।
लांग टर्म मैजर्स अलग बात है। तारिक भाई ने जिक्र किया कि शार्ट टर्म मैजर्स अलग हैं, लांग टर्म मैजर्स अलग हैं। आप दीर्घकालीन उपाय जरूर कीजिए, उसमें कोई चिंता की बात नहीं है। वर्ष 2022 की बात है तो आप जरूर कीजिए, परंतु हम तुरंत क्या करेंगे और कितनी जल्दी करेंगे, इसके ऊपर काफी चीजें निर्भर करती हैं। अगर मैं यह कहूंगा तो यह गलत नहीं होगा। जैसे कि आज जो हालात हैं, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसमें अपनी ओपीनियन दी है, सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक जजमैंट में कहा है - “It is a national issue of larger public interest.” जहां इस पूरे सदन को चिंता होती है तो सर्वोच्च न्यायालय भी एक तरफ अपनी चिंता व्यक्त कर रहा है कि यह एक नेशनल इश्यू है, इसलिए लार्जर पब्लिक इंटरैस्ट में इसके ऊपर ध्यान देना जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए पूरे महाराष्ट्र के साथ-साथ बाकी अन्य राज्यों की समस्याओं के ऊपर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। हम देखते हैं कि जब हमारे यहां बारिश अच्छी होती है, बम्पर क्रॉप होती है तो दाम नीचे गिर जाते हैं और दाम नीचे गिरने के बाद एक अलग समस्या पैदा हो जाती है और सूखा होने पर एक अलग समस्या पैदा हो जाती है। मैं समझता हूं कि इसमें लांग टर्म पालिसी मैजर्स हमारे पास होने चाहिए।
हम लोग इसमें इम्पोर्ट पर ध्यान क्यों नहीं देते हैं। जब इम्पोर्ट होता है तो इम्पोर्ट की समस्या की वजह से हमारे देश के किसानों की समस्या निर्माण होती है तो हम सोच-समझकर इम्पोर्ट का फैसला करते हैं। कब इंपोर्ट करना चाहिए, कितना इंपोर्ट करना चाहिए, उसका असर अल्टीमेटली दामों पर क्या होना चाहिए। हम जो मिनिमम सपोर्ट प्राइस करते हैं तो उसके बारे में भी हमें सोचना होगा। अभी मैं यह कम्पैरिजन नहीं करना चाहता हूँ कि यूपीए ने क्या किया और एनडीए ने क्या किया। परंतु यह जरूर मैं कहना चाहूंगा कि अगर हर साल 13-14 प्रतिशत बढ़ोत्तरी एमएसपी में होती और अपने साल-दो साल में अगर सिर्फ डेढ़ दो प्रतिशत हुई होगी, यह भी सोचने वाली बात है कि हम एमएसपी हर साल एडिक्वेट रखें, ताकि किसानों को राहत मिले। आज मैं आपको महाराष्ट्र की बात बताऊंगा कि किसानों ने हड़ताल पुकरी है। देश के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ है कि किसानों ने हड़ताल की है। रास्तों पर दूध फेंक दिया, टमाटर फेंक दिए, प्याज़ फेंक दिया, आलू फेंक दिए। ये हालात जब किसी प्रदेश में पैदा होते हैं तो आप गंभीरता सोच लीजिए कि तमिलनाडु के किसान न्युड हो कर प्रधान मंत्री के कार्यालय के सामने जा कर धरना करते हैं तो आप समझ सकते हैं कि इसकी गंभीरता कितनी भयानक हो सकती है। ये जो हालात पैदा हुए हैं, यह एक विस्फोटक परिस्थिति आज देश में निर्माण हुई है। इसको अगर हम ठीक तरीके से नहीं निभाएंगे और जो हमारे साथी कभी-कभी बयान करते हैं, बदकिस्मती है कि कुछ लोग कहते हैं कि आत्महत्या एक फैशन हो गया है, कोई कहता है कि किसान मरता है तो मरने दीजिए। ऐसे बयान कोई भी पार्टी का व्यक्ति करता है, तो निश्चित तौर पर यह ठीक नहीं है। जिसकी वजह से उसका बुरा असर पूरे देश पर पड़ता है।
अध्यक्ष महोदया, ड्रिप इरिगेशन की बात है, कई लोगों ने अच्छा सुझाव दिया है कि इसे कंप्लसरी किया जाना चाहिए। वैसे महाराष्ट्र ने फैसला किया है कि ड्रिप इरिगेशन कंप्लसरी किया जाए। परंतु 25 प्रतिशत सब्सिडी दे कर ड्रिप इरिगेशन नहीं हो सकता है। उसमें करीब 70-80 प्रतिशत सब्सिडी मिलनी चाहिए। आज स्माल एण्ड मार्जिनल किसान की संख्या बहुत बड़े पैमाने पर है। बड़े किसानों को समस्या नहीं है, लेकिन जो छोटा किसान है, उसको सब्सिडी की आवश्यकता है। 25 प्रतिशत प्रतिशत सब्सिडी में उसको कोई फायदा नहीं होगा। स्वामीनाथन कमेटी की जो रिपोर्ट यहां पर आई है, उसके अमल करने के बारे में कई चीज़ें उन्होनें बताई हैं। It has recommended that agriculture should come under the Concurrent List in the Indian Constitution. उन्होंने कहा है कि एग्रीकल्चर सब्जेक्ट को कनकरेंट लिस्ट में लीजिए। कई बार आप कह देते हैं कि यह तो स्टेट सब्जेक्ट है, हम तो सिर्फ ऊपर से इतनी मदद करेंगे, तो मेरी यह विनती रहेगी कि स्वामीनाथन कमेटी ने जो रिक्मेंडेशंस की हैं, उनको इन टोटो एप्लिकेबल किया जाए और कनकरेंट लिस्ट में कृिष कि रखा जाए, ताकि भारत सरकार और राज्य सरकार दोनों की बराबर जिम्मेदारी रहेगी।
दूसरी बात है कि कई योजनाओं का जिक्र हमारे कई साथियों ने किया था। किसान क्रेडिट कार्ड की बात कही गई। मार्केट इंटरवेंशन स्कीम के बारे में कही गई। प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना के बारे में बात कही गई। स्कीम तो अच्छी बात है, सवाल यह है कि डिलिवरी कितना है, इम्पिलिमेंटेशन कितना है और सही वक्त पर कितना पहुंच रहा है। सरकार की स्कीमों में कोई भी कमी नहीं है। परंतु स्कीमों के लागू करने में जो मुश्किले हैं, वे दूर होनी चाहिए। जो आप पैसा देते हैं, जैसे आपने देखा कि सन् 2015-16 में तकरीबन हज़ार करोड़ रूपये आपने माइक्रो इरिगेशन के लिए रखे थे, उसमें सिर्फ 312 करोड़ रूपये रिलीज़ किए गए थे। अप्रैल 2016 तक सिर्फ 48 करोड़ रूपये खर्च हो गए। आप समझ सकते हैं कि आपने बजट में हज़ार करोड़ रूपये की घोषणा की है, लेकिन 320 करोड़ रूपये ही रिलीज़ किए और खर्चा हुआ सिर्फ 48 करोड़ रूपये। मतलब आप समझ सकते हैं कि सरकार की जो योजनाएं आती हैं, नीचे तक पहुंचने में कटौतियां और डिले इतना हो जाता है कि वक्त पर कुछ होता नहीं है, जिसकी वजह से हालात और भी बदतर हो जाते हैं। इकॉनमिक सर्वे सन् 2016-17 में आपने पेश किया था, उसमें ये बातें कही हैं कि किसान की आमदनी सिर्फ 20 हज़ार रूपये सालाना रह गई है, इतनी बुरी हालत है, यह बात इकॉनमिक सर्वे में सामने आई है। जब 20 हज़ार रूपये की सालाना इनकम होती है, तो फिर लोग क्या करेंगे, आत्महत्या करने को मज़बू होंगे। एक तरफ बच्चों की पढ़ाई लिखाई का सवाल है। दूसरी तरफ उसकी जो उसकी हैल्थ इंश्योरेंस के बारे में आपने कहा तो हैल्थ के बारे में जो खर्चा हो रहा है, वह भी आज बड़ी मुश्किल से गुज़र रहा है। हेल्थ की प्रॉब्लम है, अलग से खर्चे हैं, ये जो नई प्रॉब्लम्स सामने आयी हैं, इन सबको हमें ध्यान में रखना होगा। आज तकरीबन 83 परसेंट स्मॉल एंड मीडियम फार्मर्स देश में हैं और उनकी हालत बहुत खराब है।
अन्त में मैं दो-तीन चीजों की तरफ मंत्री जी का ध्यान आकर्िषत करना चाहूँगा। मैं ज्यादा समय नहीं लूँगा, मैं यहाँ पर सिर्फ तीन-चार चीजें मंत्री जी से कहूँगा। एक बात तो यह है कि स्वामीनाथन कमेटी की रिकमंडेशंस का अमल जल्द से जल्द हो। दूसरी बात यह है कि the farmers’ demand is the implementation of recommendations of the National Commission on Farmers and payment of 50 per cent over and above the cost of the crop as the Minimum Support Price, मतलब उसका जो कुल खर्चा है, उसके ऊपर 50 परसेंट मुनाफा तो किसान को मिलना ही चाहिए। आपकी सरकार ने यह वादा किया था। अब आप यह मत कहिए कि यह चुनावी जुमला था। यह मेरी आपसे दरख्वास्त है। आप यह मत कहिए कि यह चुनावी जुमला था, यह तो बोलना ही पड़ता है। मेरी आपसे दरख्वास्त है कि इस पर जरूर ध्यान दिया जाये। जिस घर के, परिवार के व्यक्ति ने आत्महत्या की है, उस परिवार के पुनर्वसन के लिए कुछ ठोस कदम उठाये जाने चाहिए, उसके रिहैबिलिटेशन के लिए कुछ काम होना चाहिए। जैसे आप बिजनेस के लिए, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में हर तरीके की सहूलियत व्यापारियों को देते हैं, ट्रेडर्स को देते हैं, तो मैं समझता हूँ कि ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग का भी कोई विचार सरकार को करना चाहिए ताकि जब किसान कोई काम करता है, तो आसानी से स्कीम्स उसको उपलब्ध हो जायें। उसे आसानी से पैसा उपलब्ध हो जाये और जो मिनिमम सपोर्ट प्राइस है, वह उसे सही वक्त पर देना चाहिए। वक्त की कमी के कारण मैंने संक्षेप में अपनी बातें रखी हैं। धन्यवाद।
*SHRI MOHANBHAI KALYANJIBHAI KUNDARIYA (RAJKOT) : Hon'ble Speaker Madam, I rise to take part in this important discussion and I thank you for giving me this opportunity. Many members took part in this discussion today and I was listening to them. We have discussed in this House the condition of farmers for so many hours. There have been discussions about flood and famine yet we have not succeeded in finding proper solution to these problems. Hon'ble Speaker Madam, when farmers go to APMC to sell their agriculture produce, they cannot decide the price of their produce but it is decided by the traders through auction and the farmers have no option but to accept this price. For a permanent solution of this problem, the BJP led government took a decision of linking all states through E-market. Farmers take their produce to APMC and at this time if they are not happy with the prices, they can sell their produce to any market of any state. The commission agents can purchase agriculture produce from any market of the state.
Hon'ble Speaker Madam, we discuss here to bring about a solution at the time of famine or flood. In this regard I want to say that in Gujarat, in the regions like Saurashtra, Kachchh and North Gujarat, famine takes place frequently and the people face shortage of water. For the solution of this problem a scheme named "SAUNI" based on Narmada project has been launched and the water of Narmada is distributed in more than 115 dams of Saurashtra. The then Chief Minister and the present Prime Minister Shri Narendrabhai Modi worked for this project and ensured its completion. With the help of this project the dams of Saurashtra have been filled with water. Hon'ble Speaker Madam, we talked about loan waiver, but this loan waiver is not a permanent solution. We should think about a permanent solution for this.
Hon'ble Speaker Madam, I want to say a few words about MSP. I was present in the meeting of MSP held in the year 2015. How prices should be fixed was discussed in that meeting. Prices are fixed considering the produce of the whole nation and the world. MSP or loan waiver is not a permanent solution to the problem of farmers. If we provide sufficient water, electricity and quality seeds to the farmers, I feel that the problems of farmers will be solved.
Hon'ble Speaker Madam, many dams in India remained incomplete but by launching Pradhan Mantri Sinchayee Yojna, the BJP led government has tried to complete the construction work of dams and fill them with water so that the famers get water. Many such schemes have been launched by the government. Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana is also helpful to the farmers. In case of damage to the crops, the farmers are given compensation under this scheme. The BJP led government has worked for the farmers by launching various schemes. Mr. Scindia was speaking about farmers, but he could not come out of Mansor, Madhya Pradesh. So instead of indulging in useless discussion and accusations, if we give good suggestions for formulating useful schemes, it will be beneficial to the farmers. Hon'ble Speaker Madam, I thank you very much for giving me this opportunity.
श्री प्रेम सिंह चन्दूमाजरा (आनंदपुर साहिब) : स्पीकर साहिबा, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे बोलने का समय दिया। मैं समझता हूँ कि जो एग्रेरियन क्राइसेज़ पर यह चर्चा हो रही है, यह बड़ी महत्वपूर्ण है और गंभीर है। जब यह चर्चा शुरू हो रही थी तो देश के किसान अपेक्षा कर रहे थे कि चर्चा में से कुछ बात निकलेगी। मुझे दुख इस बात का है कि चर्चा शुरू करने वाले ने शुरुआत में ही जैसे राजसी रोटियाँ सेंकने की कोशिश की, उसमें गंभीरता नज़र नहीं आ रही थी। आग लगाने वाला जब आग बुझाने के लिए दौड़े तो लोग उस पर विश्वास नहीं करते। मेरे गाँव में एक बैल सबको मारता था। गली में से एक माई गुज़र रही थी। मैंने कहा - माई! बचकर रहना, बैल मारता है। उसने कहा कि बेटा मुझे इसी ने विधवा किया हुआ है। जिन्होंने विधवा किया हुआ है, वे अपनी सच्चाई दिखाएँ तो उसमें कोई अच्छी बात नहीं है। मैं इस बात पर नहीं जाना चाहता, मगर मैं यह ज़रूर चाहता हूँ कि इसको गंभीरता से लेना चाहिए। मैं तीन बातें करना चाहता हूँ। एक तो यह कि ग्राउंड रियैलिटी क्या है, दूसरा इसके कारण क्या हैं और तीसरा, इसके उपाय क्या हैं।
आज जो ग्राउंड रियैलिटी है, देश का किसान गंभीर संकट में है, देश का किसान सड़कों पर आ उतरा है। यह सच है कि जब देश आज़ाद हुआ तो देश का कुल 52 प्रतिशत खेती का हिस्सा था जो आज घटकर केवल 12 परसेंट रह गया है। किसान की स्थिति यह बन गई है कि किसान कर्ज़ई हो गया है। किसान के गन्ने के दाम अभी तक नहीं मिल रहे। यह भी सच है कि किसान के नाम पर बहुत सारी कंपनियों ने, बहुत सारी पैस्टिसाइड्ज़ और वीडीसाइड्ज़ कंपनियों ने और बहुत सारे इंप्लीमैंट तैयार करने वाले लोगों ने अरबों रुपये कमा लिये लेकिन किसान खुदकुशियाँ करने को दौड़ रहा है। यह सच है कि देश का पेट भरने वाला किसान आज खुद ही भूख से मर रहा है। इसके कारण क्या हैं, यह मैं सदन में रखना चाहता हूँ। ...(व्यवधान)...* माननीय अध्यक्ष : आप चेयर को एड्रैस कीजिए।
श्री प्रेम सिंह चन्दूमाजरा : मैडम, मैं कारण बताना चाहता हूँ। कारण यह है कि देश में 70 वर्षों से कोई कृिष नीति नहीं बन पाई, यह दुख की बात है। दूसरी बात यह है कि उपज के सही दाम नहीं मिल पाए। दुख की बात है कि किसान पैदा करे और उसके दाम कोई और निश्चित करे। किसान का नुमाइंदा भी उसमें न हो तो उससे किसानी घाटे में गई। तीसरी, वोट के नाम पर कुछ लोग झूठे वादे करते हैं, पूरे नहीं करते। जैसे हमारे पंजाब में हो रहा है। जब चुनाव थे तो कहा गया कि हम सबका कर्ज़ माफ कर देंगे - आढ़ती का भी, साहूकार का भी, कोआपरेटिव बैंक का, कॉमर्शियल बैंक का, लेकिन अब हुआ नहीं। इससे किसानों की खुदकुशी का दौर बढ़ गया। कर्ज़ तो क्या माफ होना था, किसान को आगे के लिए कर्ज़ नहीं मिल रहा है। ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, इस पर कोई बंदिश होनी चाहिए।
दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ कि जो ब्याज दर है, जो लोनिंग सिस्टम है, वह बहुत गलत है। कार के लिए ब्याज दर कम है और ट्रैक्टर के लिए ब्याज दर ज्यादा है। लोनिंग सिस्टम ऐसा है कि किसान को कर्ज़ लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। इसलिए किसान कर्ज़ई हुआ है। तीसरी बात है कि कुदरती आफतों से बचाव का कोई उपाय नहीं किया गया और मंडी कर सिस्टम भी ठीक नहीं है।
एक बात मैं और कहना चाहता हूँ कि जो कृिष मंत्रालय है, इसको कई हिस्सों में बांट दिया।वर्ष1977 में इमरजैंसी के समय मैं दो वर्षजेल में लगाकर बाहर आया। बरनाला साहब हमारे कृिष मंत्री थे, मैं उनके मंत्रालय में गया तो उन्होंने मुझे बताया कि 8 मंत्रालय हैं। आज अगर हमने तालाब खोदने हैं तो कहीं फॉरैस्ट वाले आ जाते हैं, कहीं माइनिंग वाले आ जाते हैं। पैदा कृिष क्षेत्र करता है और बेचता फूड सप्लाई डिपार्टमैंट है। सिंचाई मंत्री अलग है, पावर मंत्री अलग है। अगर हम इसके ऊपर सीरियसली कोई उपाय खोजना चाहते हैं तो सारे मंत्रालय इकट्ठे होने चाहिए।
मैडम स्पीकर, मैं आखिर में कुछ सुझाव देना चाहता हूं। अगर यह नहीं हुआ तो मैं नहीं समझता कि इसमें कोई सीरियसनेस होगी। आज हमारे सभी सांसदों को, प्रधान मंत्री जी से लेकर सभी मंत्रियों को, सभी सांसदों को हाउस में इकट्ठे होकर अन्नदाता किसान से माफी मांगनी चाहिए कि तुमने हमारे देश को पाला-पोसा, पर आज हम तुम्हें संभाल नहीं सके, हम अपनी गलती मानते हैं। आगे के लिए सुझाव तैयार किए जाएं।
दूसरा, इसको ‘क़ौमी आफत’ डिक्लेयर किया जाए। जितनी देर तक इसको ‘राष्ट्रीय आफत’ नहीं डिक्लेयर किया जाएगा, मैं समझता हूं कि इसके उपाय भी उस किस्म के नहीं हो पाएंगे।
तीसरी बात जो सबसे जरूरी है, वह को-ऑपरेटिव सेक्टर है। ज़मीनें, होल्डिंग्स कम हो रही हैं। किसानों के इंप्लीमेंट्स के खर्चे बढ़ रहे हैं। को-ऑपरेटिव सेक्टर को हमें सब्सिडी देनी चाहिए, हमें को-ऑपरेटिव सेक्टर को इन्करेज करना चाहिए और को-ऑपरेटिव सेक्टर को ब्यूरोक्रेटिक सेट-अप से आज़ाद कराना चाहिए। तभी को-ऑपरेटिव सेक्टर से हम किसान को बचा पाएंगे। माननीय मंत्री जी से मैं कहना चाहता हूं कि इसको सीरियसली लेना चाहिए।
यह ठीक है कि आज की सरकार ने, मोदी साहब की सरकार स्वॉयल हेल्थ कार्ड लेकर आई, ‘प्रधानमंत्री सिंचाई योजना’ लेकर आई, ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ लेकर आई और गांव को, किसानों को, गरीबों को इस बजट में प्रायॉरिटी दी, मगर बहुत कुछ करना बाकी है। इससे वह पूरा नहीं हो पाएगा। मैं कहना चाहता हूं कि कृिष में ब्याज की दर कम से कम 4 प्रतिशत होनी चाहिए।
हमारी पिछली बादल सरकार ने एक ‘डैट रिस्ट्रक्चरिंग एक्ट’ बनाया था। उसमें कहा गया था कि जितना किसी ने पैसा लिया, अगर उसने एक लाख रुपये लिए तो अगर उसने दो लाख रुपये वापस कर दिए तो उससे ज्यादा नहीं लिए जाएंगे और ब्याज दर 9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगी। इस तरह का एक्ट नेशनल लेवल पर होना चाहिए।
हमारा मंडी कर सिस्टम और मार्केटिंग सिस्टम जो आया है, वह अच्छा है। मगर, उसे और मज़बूत करने की जरूरत है।
स्पीकर मैडम, प्लीज़, मैं एक बात कहना चाहता हूं। कम पानी या डायवर्सिफिकेशन-ऑफ-एग्रीकल्चर के बारे में कहा जाता है। पर, उसके लिए मार्केट तो है नहीं। जो बासमती है, वह कम पानी लेती है। मगर, इसकी मार्केटिंग ही नहीं है। आलू आज सड़कों पर फेंके जा रहे हैं। यह कम पानी लेता है, मगर उसके लिए कोई मार्केट नहीं है। इसलिए जो फसलें कम पानी लेती हैं, जल्दी तैयार हो जाती हैं, उनको प्रोत्साहित करना चाहिए, उन पर सब्सिडी देनी चाहिए।
मैडम, लास्ट में, मैं एक बात कहना चाहता हूं। जितनी देर किसान को कर्ज़ मुक्त नहीं किया जाएगा, उतनी देर किसान बच नहीं पाएगा। किसानों को कर्ज़ मुक्त करने के लिए पिछले समय वित्त मंत्री जी ने कहा था कि लोक अदालतों से इसका निपटारा हो सकता है। लोक अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए जल्दी से जल्दी कोई न कोई उपाय करना चाहिए। जैसे सिंचाई को सस्ती करनी चाहिए। हमारा बारिश का पानी खराब हो रहा है।
माननीय अध्यक्ष : अब हो गया, कृपया अपनी बात समाप्त करें।
श्री प्रेम सिंह चन्दूमाजरा:मैडम स्पीकर, मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जितना हिस्सा हम देश की टोटल सेन्ट्रल किट्टी में डालते हैं, कम से कम हमें उतना तो देना चाहिए। हमारा 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है।
मैडम, मैं आधे मिनट में अपनी बात खत्म करता हूं। सिंचाई तो सस्ती होनी चाहिए। प्रधान मंत्री जी ने बहुत कोशिशें की हैं, जैसे वन-ड्रॉप-वन-सिस्टम की, वन-ड्रॉप-मोर-क्रॉप की बात की है, तालाबों की खुदाई की बात की है। हम पंजाब और हरियाणा पानी के लिए लड़ते हैं, मगर इनकी नदियों का पानी बाहर दूसरे के पास चली जा रही हैं। ये उनको तो संभाल नहीं पा रहे हैं। इसलिए अगर हम बारिश के पानी को संभाल लें तो उससे अच्छी बात बन सकती है।
मैडम, लास्ट में, मैं कहना चाहता हूं कि जो जी.एस.टी. है, वह इंप्लीमेंट्स और फर्टिलाइज़र पर एग्जेम्प्ट होनी चाहिए, वह ज़ीरो स्लैब में होना चाहिए। यह हमारी मांग है।
तीसरा, लास्ट में, मैं कहना चाहता हूं कि खुदकुशियों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। जब हमारी बादल सरकार थी, ...* वहां चले गए। एक बेटे की उसके बाप के साथ लड़ाई हो गयी और उसको यह बना दिया गया कि इसने खुदक़ुशी कर ली, उसने दवाई पी ली। आज 100 दिनों में 150 किसान मर गए। आज वे पंजाब में नहीं जा रहे हैं, बल्कि मध्य प्रदेश में जा रहे हैं। ऐसी राजनीति, जो खुदक़ुशियों पर करते हैं, मैं समझता हूं कि यह अच्छी बात नहीं है।
मैडम, नैचुरल कैलेमिटी का जो कम्पेनसेशन है, वह बढ़ाना चाहिए। 3,500 रुपये तो कुछ भी नहीं होते। कम से कम 20,000 रुपये प्रति एकड़ कम्पेनसेशन होने चाहिए।
ऐसे मेरे कुछ सुझाव हैं। मैं समझता हूं कि अगर इनको लागू किया जाए तो किसानी बच सकती है, संकट से निकल सकती है।
श्री जय प्रकाश नारायण यादव (बाँका) : माननीय अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, मैं आपका बहुत‑बहुत धन्यवाद करता हूं।
आज एक दिन में ही किसानों से जुड़े हुए सारे सवालों पर बहस की समाप्ति होगी। आज पूरा देश देख रहा है और हम सदन में बहस भी कर रहे हैं। हमारे किसानों की अपेक्षाएं भी होगी। हमारे किसान देश की आत्मा और धड़कन है। जब वह धड़कता है, तो सुख, शांति और समृद्धि का रास्ता निकलता है और राष्ट्र मजबूत होता है। आज स्व. चौधरी चरण सिंह जी नहीं है, लेकिन एक प्रधान मंत्री जिनके नाम लेने से ही किसान शब्द आता है। जैसे कम्प्यूटर में होता है कि स्व. चौधरी चरण सिंह यानी किसान। आज उनको हम सभी लोग याद करते हैं। स्व. चौधरी चरण सिंह जी कहा करते थे कि देश की समृद्धि का रास्ता किसानों के खेत तथा खलिहानों से होकर गुजरता है। अगर देश को समृद्ध बनाना है, तो खेती को मजबूत करना पड़ेगा। हमारे किसानों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
महोदया, हमें ज्यादा बोलने का मौका तो आपकी कृपा से मिलेगा। किसान और जवान दोनों हमारे देश के रक्षक हैं। देश के अंदर की रक्षा हमारे किसान करते हैं, किसान ही अन्न उपजा कर हम लोगों को खिलाते हैं और हमारे देश के जवान सीमा की रक्षा करते हैं। हर मौसम का चौकीदार किसान है। जाड़ा, गर्मी या बरसात हो, किसान अपने खेत पर जरूर जाता है। हम नहीं जाते हैं, लेकिन हमारे किसान सभी मौसमों में अपनी खेती का चौकीदारी करता है। आज बीस हजार से ज्यादा किसानों की मौत हुई। इसका गुनाहगार कौन है? इसको तय करना चाहिए। किसानों की मौत क्यों हुई? हमारी नीतियां खराब है। किसानों की मौत किन कारणों से हुई? इन बातों को हमें समझना पड़ेगा। जो किसान धमनभट्टी में अपनी हड्डी को गलाता है, उसमें सबसे अधिक किसान अपनी हड्डी को गलाता है। आज भी झारखंड में एक किसान ने आत्महत्या कर ली, इसको हमने टी.वी. पर देखा। मैं कोई जान‑बूझकर नहीं बोल रहा हूं, बल्कि आज हमने टी.वी. पर यह समाचार देखा। महात्मा गांधी जी ने चंपारण में निल्हो के खिलाफ आवाज उठायी थी, जहां से हमारे माननीय कृिष मंत्री श्री राधा मोहन सिंह जी आते हैं। महात्मा गांधी जी ने एक बड़ी लड़ाई गोरी सल्तनत के खिलाफ लड़ी थी।
आज मंदसौर, मध्य प्रदेश की जो घटना है। इसने पूरे आवाम को दहला दिया है, किसान को दहला दिया है। यह ज्वालामुखी की तरह जरूर विस्फोट करेगा। आज हम लोग इस सदन में बहस कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर खतरा बढ़ा है और एक दिन यह जरूर विस्फोट करेगा। इस विस्फोट में सत्ताधारी को पस्त और परास्त होना पड़ेगा। यह समय जरूर आएगा। दिल्ली के जंतर‑मंतर पर जो घटना घट रही है, आप कोई भी मंत्र दीजिएगा, लेकिन हमारे देश के किसान सड़क पर जरूर उतरेंगे।
माननीय अध्यक्ष : प्लीज, आप अपनी बात कम्प्लिट कीजिए।
श्री जय प्रकाश नारायण यादव: अध्यक्ष महोदया, मैं बहुत ज्यादा समय नहीं लूंगा। मैं दो‑तीन मिनट में अपनी बात समाप्त कर दूंगा। मैं नहीं चाहता हूं कि आप हमें आदेश करें। आज हमें इन सारी चीजों को देखना पड़ेगा।
आज मध्य प्रदेश के मंदसौर में जो घटना घटी, इस घटना के बारे में माननीय सिंधिया साहब ने जिन बातों को रखा, मैं उनको नहीं दोहराऊंगा। इन्होंने कमलाबाई की चर्चा की तो सभी के आँखों में आँसू आया। जब वह यहां पर बोल रहे थे। इन्होंने कहा कि उनको लात भी मारा गया। अब हम उधर नहीं जाना चाहते हैं, लेकिन हमने जालियांवाला बाग को देखा नहीं, सुना नहीं; लेकिन हमने इसे किताब में जरूर पढ़ा है। मध्य प्रदेश के मंदसौर की घटना जालियांवाला बाग की याद दिलाता है। वहां पर छह किसानों को गोली से मारा जाता है। इसे कौन बर्दाश्त करेगा, क्या इससे बड़ी कोई घटना हुई है? अगर आग लगी है, तो धुंआ जरूर निकलेगा। अगर किसान को गोली लगी है, तो मध्य प्रदेश और दिल्ली की सत्ता पस्त व परास्त होगी, यह रूकने वाला नहीं है। इसका फैसला बुलेट से नहीं; बल्कि बैलेट से होगा। वहां पर जिन किसानों की शहादत हुई है, वह बेकार नहीं जाएगा।
आप अच्छे दिन की बात करते हैं, मेक इन इंडिया की बात करते हैं, नोटबंदी की बात करते हैं, लेकिन किसानों को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता है। आप स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को बढ़ाइए। यूपीए सरकार ने किसानों के 72 लाख रूपये का कर्ज माफ किया था। आज की तारीख में मैं दो‑तीन बातें कहना चाहूंगा। आज हमारे जो सीमांत किसान है, जो छोटे किसान हैं, वे परेशान हैं। आज किसकी मौत हो रही है, छोटे व सीमांत किसान कौन है?सदन में यह बात जरूर आनी चाहिए। ये बैंक से कर्ज नहीं ले पाते हैं। इसमें मौत 80 पर्सेंट सीमांत किसान की हो रही है, छोटे किसान की हो रही है। जो गरीब हैं, एससी हैं, एसटी हैं, ओबीसी हैं, बैंक से कर्ज नहीं ले पाते हैं।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : भगवंत मान जी, क्या आपको नहीं बोलना है?
…( व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : अब हो गया, बैठ जाइए। आप शुरू करिए।
…( व्यवधान)
श्री जय प्रकाश नारायण यादव: ...(व्यवधान)उन्होंने कहा था, हम पूरा करते हैं, ..(व्यवधान) राम ने मारा रावण को, ...(व्यवधान)।
माननीय अध्यक्ष : पूरे राम, रावण सब बातें हो गईं।
…( व्यवधान)
श्री जय प्रकाश नारायण यादव: राम ने मारा रावण को और कृष्ण ने मारा कंस को, गांधी ने मारा गोरी सल्तनत को और जो किसानों पर ये गोलियां चल रही हैं, उसमें आपका सिंहासन जाएगा। ...(व्यवधान)
HON. SPEAKER: Nothing will go on record now.
…(Interruptions) * श्री भगवंत मान (संगरूर): महोदया,देश में बहुत बड़े किसानी संकट के इस गंभीर मुद्दे पर आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
यह अब किसी राज्य का विषय नहीं है, किसी राज्य का मुद्दा नहीं है, यह अब राष्ट्रीय मुद्दा है, नेशनल इश्यू बन चुका है। हर रोज पूरे देश में आंदोलन, किसानों द्वारा धरने, हड़ताल, आत्महत्यायें हो रही हैं। हमारा देश खेती प्रधान देश के तौर पर जाना जाता था, लेकिन आजकल सरकारों की गलत एग्रीकल्चरल पॉलिसीज की वजह से खेती खुदकुशी प्रधान देश बनता जा रहा है। कितने शर्म की बात है कि जो दूसरों का पेट पालता है, पूरे देश का पेट पालता है, वह खुद भूखे पेट सोने पर मजबूर हो रहा है।
इस सरकार ने लगभग 6 लाख 11 हजार करोड़ रुपये इंसेंटिव के नाम पर, जो कि इनडायरेक्टली रियायत होती है, वह इंडस्ट्री का माफ किया। इतना इंसेंटिव दिया, क्योंकि इंडस्ट्री रोजगार देती है। मैं खुद एक किसान परिवार से आता हूं और पंजाब स्टेट एग्रीकल्चर स्टेट है। जो किसान है, वह भी तो रोजगार पैदा करता है। कितने खेत मजदूर हैं, जो किसान की खेती पर डिपेंडेंट हैं, कितने छोटे दुकानदार हैं, जो किसान की खेती पर डिपेंडेंट हैं, मंडियों में कितने मजदूर काम करते हैं, जब फसल आती है, ट्रैक्टर इंडस्ट्री किसान पर डिपेंडेंट है, ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री ट्रक, ये किसान पर डिपेंडेंट हैं। किसानों को भी इंसेंटिव में रखना चाहिए।
10 औद्योगिक घरानों पर 8 लाख 45 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है।
माननीय अध्यक्ष : आप अपनी बात समाप्त करिए।
श्री भगवंत मान: मैडम, बोलने दीजिए, हम पंजाब से आते हैं। मछली उद्योग के बारे में तो हम बोलते नहीं हैं, जब उनकी डिबेट होती है, तो वह टाइम हमारा इधर एडजस्ट कर लिया करिए। दो मिनट में मैं अपनी बात खत्म कर लूंगा।
10 औद्योगिक घराने हैं, जिन पर 8 लाख 45 हजार करोड़ रुपये के लगभग कर्ज है। वे विदेशों में सैर कर रहे हैं, उनको कोई चिंता नहीं है। वे चिंतामुक्त हैं, लेकिन किसी किसान पर 1 लाख रुपये का कर्ज है, किसी किसान पर 80 हजार रुपये का कर्ज है, वह हर रोज खुदकुशी कर रहा है। मेरी कांस्टीच्युएंसी में आज भी खुदकुशियां हुई हैं। मेरे से पहले जो बोल रहे थे, उनको भी मैं कहना चाहना चाहूंगा, चन्दूमाजरा जी इस बारे में बोल रहे थे। मैडम, एक किलो चावल पैदा करने के लिए 5 हजार लीटर पानी लगता है। ...(व्यवधान)पंजाब में पिछले 15 साल से टय़ूबवेल को गहरा करने के लिए...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : अरूण कुमार जी, अब आप बोलिए।
…( व्यवधान)
डॉ. अरुण कुमार (जहानाबाद) : महोदया, यह बहुत ही गंभीर विषय है। किसान का सवाल एक बड़ा ही गंभीर विषय है। इस विषय पर जिस तरह की राजनीतिक चर्चा हो रही है। इससे किसानों की समस्या का निदान होने वाला नहीं है। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं और सरकार से भी निवेदन करना चाहता हूं कि आजादी के बाद यह पहली सरकार है, जिसने किसानों के बारे में चिंता की है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज किसान खलिहान से, खेत से अपना सामान बाजार में बेच देता है। यह जो प्रबंधन है, इस प्रबंधन के विपरीत समुचित बाज़ार की व्यवस्था करनी चाहिए। कर्ज कोई समस्या नहीं है। किसान के सामने सबसे बड़ी समस्या बाजार की है और बाजार का प्रबंधन यदि सरकार करे, उसके अनाज का, उसके उत्पादन का, उसके पैरिशएबल मैटेरियल का, रख-रखाव का प्रबंधन करे तो मैं समझता हूं कि किसानों की स्थिति बदलेगी।
आज जिस तरीके से बीज के लिए हो रहा है, बीस साल पहले किसान को बीज के लिए कोई धन नहीं लगाना पड़ता था, लेकिन आज हमारे खेत में जो अन्न पैदा होता है उस बीज का हम उपयोग नहीं कर सकते हैं। मैं माननीय मंत्री जी से अनुसंधान की दृिष्ट से कहना चाहूंगा कि हम उस बीज को कामयाब कैसे बनाएं, इस दिशा में अनुसंधान करना चाहिए, किसान बाजार का गुलाम न बने, उसका प्रबंधन करना चाहिए। आज मध्य प्रदेश में फसल का उत्पादन चार गुना बढ़ा, लेकिन वहां कुछ राजनीतिक कारणों से किसानों को इस तरह से उकसाया गया कि जो परिवर्तन का आंदोलन चल रहा है उसमें एक ठहराव आ जाए, सभी चीजों में राजनीति नहीं करनी चाहिए, इस परिवर्तन को रोकने के लिए एक साजिश की गई है।
यदि कोई भी सरकार विकास के पथ पर चल रही है उसमें किसान के आंदोलन में सहयोग करना चाहिए। आज मध्य प्रदेश देश में प्रथम राज्य है, जहां उत्पादन चार गुणा बढ़ाने का काम किया है, हम मध्य प्रदेश की सरकार को बधाई देना चाहते हैं। जिस तरह की दुर्घटना हुई है वह एक साजिश के तहत हुआ है, इसका कारण यही है कि बाजार का प्रबंधन नहीं है, हम मार्केट में सामान ले जाते हैं लेकिन उसका कोई खरीदार नहीं है। पेरिशेबल मैटेरियल के लिए हरेक पंचायत में स्टोरेज की क्षमता विकसित होनी चाहिए, हमारे यहां किसान पहले चचरी पर आलू और प्याज रखते थे, जब बाजार में डिमांड बढ़ता था तो वह उसे बेचते थे। अब किसी भी किसान के घर में स्टोर का प्रबंधन नहीं है। सरकार को विकसित व्यवस्था में निश्चित तौर से स्टोर का प्रबंधन पंचायत के स्तर पर करना चाहिए। सपोर्ट प्राइस नहीं बल्कि लाभकारी मूल्य देने का प्रबंधन करे। बड़े उद्योग जो संकट के दौर से गुजर रहे होते हैं उन बड़े उद्योग को संकट से निकालने के लिए सरकार समय-समय पर जो प्रबंधन करती है उसी प्रकार का प्रबंधन कृषि उद्योग के लिए करना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में जिन उपायों को किया गया है मैं उस पर विस्तार से चर्चा नहीं करना चाहता हूं, सभी लोगों ने बताया है। हम इतना ही कहना चाहेंगे कि इस प्रबंधन से उपज बढ़ेगा लेकिन उस उपज से किसानों को पुनः झटका लगेगा क्योंकि स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है। हरेक पंचायत में स्टोरेज की व्यवस्था होनी चाहिए, कोल्ड स्टोरेज का चेन बनना चाहिए। जब किसान अपना सामान इस स्टोरेज में रखे तो वहां एक बाँड भी जारी किया जाए, जब किसान को जरूरत हो तो वह अपने रखे हुए सामान के ऐवज में पैसा ले, इसलिए बांड का भी प्रबंधन हमें करना चाहिए। माननीय सांसद वीरेन्द्र बाबू ने कहा कि किसानों की संपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा के लिए स्पेशल सेशन करके निस्तारण का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए। इसमें राजनीति नहीं करनी चाहिए, किसान देश का भविष्य है। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने कहा था जो अन्न, वस्त्र उपजाएगा वही कानून बनाएगा। भारतवर्ष उसी का है शासन वही चलाएगा। हम इस उद्देश्य से कांग्रेस के साथियों को कहना चाहेंगे कि स्वामी सहजानंद सरस्वती आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के साथ थे। कांग्रेस की किसान विरोधी चरित्र के कारण 60-70 वर्षों तक यह देश भुगता है। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने कहा था कि कांग्रेस के रहते इस देश में किसानों का भविष्य नहीं सुधर सकता है।
श्री बदरुद्दीन अजमल (धुबरी): अध्यक्षमहोदया,आपने सीरियस विषय पर बोलने का अवसर दिया, धन्यवाद। मंत्री जी अगर कल के लिए भी टाइम दे देते, यह किसानों का मसला है, जय जवान जय किसान, ये दो हैं तो हम लोग हैं, अगर ये दोनों जिंदा नहीं हैं तो हम कहीं भी नहीं हैं। मंत्री जी वक्त देते और कल भी कुछ लोगों को बोलने का मौका देते। हमें इसका अफसोस है कि ऐसे सीरियस इश्यू के ऊपर, जो पूरे मुल्क की जान है, उसमें भी हम लोग पार्टीवाद करते हैं, चाहे इस तरफ वाले या उस तरफ वाले, एक-दूसरे का मजाक उड़ाते हैं, यह अच्छी बात नहीं है। आज इसे टेलीविजन पर किसान भी देखता है। उन्हें दुख होता होगा कि हमारे 12 हजार, 14 हजार या 50 हजार लोग फांसी लगाकर मर गये और यहां मज़ाक उड़ाया जाता है। मेरे हिसाब से दो चीजों के कारण किसान की हालत खराब है। पहला, महाराट्र में पिछले साल भी ड्राउट पड़ा और इस साल भी ड्राउट शुरू हो गया। वहां लोग सूखे की वजह से मर रहे हैं, किसान खुदकुशी कर रहे हैं।
दूसरा, मैं असम क्षेत्र से आता हूं। असम, मणिपुर में डेढ़ महीने से बाढ़ आयी हुई है। इससे तकरीबन 20-22 लाख लोग इफैक्टेड हैं। इसमें किसानों की बहुत बड़ी तादाद हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि 70 लाख मुतासिर हैं, 22 हजार जिलों में सैलाब है और 850 गांव प्रभावित हैं। इन हालात में किसानों की हर चीज बर्बाद हो जाती है। उनके घर उखड़ गये, रहने के लिए जगह नहीं है। वे झोंपड़ों में रहते हैं। टेलीविजन पर उनकी हालत देखकर आंखों से आंसू आ जाते हैं।
अध्यक्ष महोदया, मैं कहना बहुत चाहता था, लेकिन समय कम है। मैं आपके हुक्म को मानते हुए यह कहना चाहूंगा कि मंत्री जी इस ओर ध्यान दें। मैं अनंत कुमार जी से कहना चाहूंगा कि असम के इस फ्लड इश्यू, जो हर साल होता है, उससे सबसे ज्यादा किसान बर्बाद होते हैं। मैं उनसे रिक्वैस्ट करूंगा कि इसे नैशनल कैलेमिटी डिक्लेयर किया जाये और इस पर खास ध्यान दिया जाये, वर्ना असम तबाह-बर्बाद हो जायेगा। बहुत-बहुत शुक्रिया।
SHRI E.T. MOHAMMAD BASHEER (PONNANI): Thank you, Madam, for giving me this opportunity. This House is today discussing a burning problem pertaining to this country.
We are all facing the same agrarian crisis whether it is in Maharashtra, Madhya Pradesh or even in our State. As far as our traditional crops like coconut and rubber are concerned, we are also facing this crisis. What exactly is our handicap? We are governed by adhocism. Instead of having clear cut formula and programme of action, we are governed by adhocism.
We were discussing about loan waiver. Our Party is also in favour of it. Yesterday, we met the hon. Minister and made that request. What we have to think is to make our farmers free from indebtedness. That is the point to be discussed. We have to ask some questions from our inner wisdom.
We have a lot of study reports including the Report of the Swaminathan Commission who is known as the Father of the Green Revolution in India. What is happening now? All vital recommendations of this Commission are kept in cold storage. We have to make a programme of action on that Report.
As far as the minimum support price is concerned, we were all discussing about that. Unfortunately, nothing has been effectively done in that case also.
As far as the policy formulation process is concerned, various commissions have recommended that we must have a comprehensive policy formulation. In that case also we are much backward.
With regard to the productivity related issue, cost effectiveness, cost of input and what exactly we are getting as output, that gap is widening like anything. It is very hard to bridge that gap. That point also requires to be discussed along with this.
Similarly, availability of quality seeds at an affordable rate is really a pertinent problem for the farmers. Unfortunately, that has also not been properly addressed. Reduction in the interest rate is also a vital point. We should also think as to how exploitation by the middleman can be curbed. That may also be addressed.
Madam, agricultural labourers are migrating to non-farming sectors. That also is a problem. We are not talking about great India or economic growth. We should all discuss such kind of things. We have to take such programmes. We are proud enough to say about our achievements. Unfortunately, we have miserably forgotten our farmers.
My last point is this. Now, I am talking about coconut. It is our traditional crop. There also we are having a lot of problems. Procurement is not being done properly. A value added production should be there in that side. The Government of India should also give proper support to this.
I am concluding by saying one sentence. We are all saying, ‘farming is a profession of hope’ but unfortunately, now, it has become a profession of hopelessness, disappointment and distress. The Government of India should come forward to rescue our farmers.
Thank you.
माननीय अध्यक्ष : श्री दुष्यंत चौटाला जी, आप बोलिए।
आप दो मिनट में अपनी बात समाप्त कीजिए।
श्री दुष्यंत चौटाला (हिसार) : अध्यक्ष महोदया, मैं किसान की बातों को आपके सामने रखूंगा और कोशिश करूंगा कि जल्दी कन्क्लूड भी करूं।
यह बड़ा अहम मुद्दा है। मुझे इस सदन में तीन साल हो गए और मुझे लगता है कि हर सेशन में हम इस मुद्दे पर चर्चा करते हैं। पिछले साठ सालों से हमेशा इस मुद्दे पर ही चर्चा हुई कि किस तरीके से किसान को समृद्ध किया जाए। सरकार भी प्रयास कर रही है और हम भी जगाने का काम करते हैं, लेकिन किसान तभी समृद्ध होगा, जब इस देश की पॉलिसी मेकिंग की जगहों पर किसान आकर बैठेंगे। आज सरकार बताए कि नीति आयोग में एक भी किसान की सोच वाला व्यक्ति है? आज नाबार्ड के लिए पैसा दे दिया जाता है, लेकिन किस तरह से किसान के खेत में चाहे सिंचाई योजना के लिए पैसा जाए, उस पर कभी चर्चा नहीं होती है। आज सरकार को यह फैसला लेना पड़ेगा कि जो लोग फार्मिंग कम्यूनिटी से हैं या खेती करते हैं, उनमें से लोगों को उठाकर नीति आयोग में लाने का काम करें। आज फसल बीमा योजना बना दी गयी है।
पिछले सत्र में जब इस पर हुई थी, तब माननीय मंत्री जी ने चर्चा में बड़ी गंभीरता से इसका जवाब भी दिया था। आज फसल बीमा योजना में, अगर मैं हरियाणा की बात करूं, तो आईसीआईसीआई बैंक ने 57 करोड़ रुपये इकट्ठे किए, किसान को क्लेम दिए गए केवल 38 लाख रुपये और मुनाफा 50 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा। बजाज के पास 51 करोड़ रुपये क्लेम आया, पैसा दिया गया एक करोड़ 41 लाख रुपये और उनका मुनाफा लगभग 48 करोड़ रुपये रहा। पैसा इकट्ठा करने का काम सरकारी बैंकों का है। किसान क्रेडिट कार्ड से जबरन पैसा काटा गया। एग्रीकल्चर सर्वे करने का काम सरकारी एजेंसी एडीए करती है और मुनाफा प्राइवेट कंपनी का होता है। जब तक हम पॉलिसी को किसान के प्रति डायवर्ट करके नहीं बनाएंगे, तब किसान का फायदा नहीं होगा। पहले लड़ाई होती थी कि फसल खराब हुई तो उस चीज के बारे में चर्चा की जाए। आज यह लड़ाई है कि फसल ज्यादा हो गयी, उसे हम कैसे कन्ज्यूम करें।
मैं आपको लाडवा, हरियाणा का किस्सा बताना चाहूंगा। हमारे यहां इस बार सूरजमुखी की खेती फालतू हो गयी। किसानों को पांच-पांच दिन जेल में रहना पड़ा कि सरकार जागे और उनकी फसल खरीदे। मुख्यमंत्री का दौरा हुआ, पांच दिन मण्डी खोल दी गयी, वहां से फसल उठा ली गयी। मुख्यमंत्री जी वापस गए, मण्डी भी गई और फसल वहां वैसे ही बारिश में सड़ रही है। आपको एक अहम चीज बताऊं। हमने किसान क्रेडिट कार्ड पर लोन देना शुरू कर दिया। किसान को हम सात प्रतिशत ब्याज को सब्सिडाइज करके चार प्रतिशत ब्याज पर देते हैं और कहते हैं कि छः महीने के अंदर पैसा वापस करें। अगर आज मैं गन्ने की उपज लगाता हूं तो साल भर बाद मेरी फसल आती है, तो एक साल तक मैं उसका इंट्रेस्ट कहां से पे करूंगा। मैंने सदन में भी मांग की थी कि किसान क्रेडिट कार्ड की जो इंट्रेस्ट लिमिट है, उसे छः महीने से बढ़ाकर एक साल किया जाए। आज मेरी जमीन 18 लाख रुपये की है, बैंक 70 हजार या 80 हजार रुपये मुझे लोन देता है और अगर मैं उसे एक साल में नहीं लौटाता हूं तो मेरी जमीन को कुर्क करने का काम किया जाता है। आज हमें फैसले लेने पड़ेंगे। मैं सरकार से आग्रह करूंगा कि आपके कड़े फैसले लेने पड़ेंगे। हम हर सेशन में किसान के बारे में इसी तरह चर्चा करते हैं। एक एग्जाम्पल देना चाहूंगा।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आपकी बात आ गयी है। आपने अच्छे उदाहरण दिए हैं।
श्री दुष्यंत चौटाला: अध्यक्ष महोदया, सरकार को बताना भी जरूरी है।
इस बार आलू की फसल ज्यादा हुई। किसान खेत से आलू मण्डी ले जाने लगा तो मण्डी में उसका भाव लगा 20 पैसे प्रति किलोग्राम। आलू निकालने का खर्च 1.50 रुपये आया और बेचने पर 20 पैसे मिले, इस तरह से किसान की जेब से प्रति किलो एक रुपये तीस पैसे लग गए। हम कैसे उस किसान का समृद्ध कर सकते हैं? पूरे देश में कोई भी फसल आप देख लीजिए, एक भी ऐसा किसान नहीं है जो अपने आपको समृद्ध कहता हो, चाहे वह हॉर्टिकल्चर करता हो, फ्लोरीकल्चर करता हो या एग्रीकल्चर करता हो। यह स्थिति इसीलिए है कि आज जो हमारे पॉलिसीमेकर्स हैं, उनमें से एक भी किसान नहीं है। मैं माननीय प्रधानमंत्री जी एवं माननीय कृिष मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि अगर आपको कदम उठाना है तो सबसे पहले नीति आयोग जैसी जगह पर, जहां योजनाएं बनती हैं, वहां पर किसान को लाने का काम कीजिए।
माननीय अध्यक्ष : बहुत अच्छा सुझाव है। अब समाप्त कीजिए।
श्री सुरेश सी. अंगड़ी।
श्री दुष्यंत चौटाला : अध्यक्ष महोदया, आज एक प्रदेश किसानों का कर्ज माफ करता है तो दूसरे प्रदेशों में आंदोलन होता है। क्यों नहीं सरकार ऐसी पॉलिसी बनाती है कि एक बार किसान का पूरी तरह से कर्ज माफ किया जाए, उसके बाद अगर कोई डिफाल्टर होता है तो उस पर कदम उठाए जाएं। आज आधे से ज्यादा किसानों की जमीनें केसीसी और सोसाइटी के माध्यम से बैंकों में कुर्क पड़ी हैं। फसल बीमा के लिए आप सोसाइटी में भी पैसा काट रहे हैं और केसीसी में भी पैसा काट रहे हैं। उस किसान पर आप दिन-प्रतिदिन बोझ बढ़ाने का काम कर रहे हैं। मैं आपसे यही मांग करूंगा कि सबसे पहले आप ऐसे कदम उठाएं।
अध्यक्ष महोदया, मैं आखिरी लाइन बोलना चाहता हूं, माननीय मंत्री जी यहां बैठे हैं, कल मैंने उनसे एक सवाल पूछा था, उसका उन्होंने जवाब दिया है कि स्वामीनाथन जी का रिकमेंडेशन - एमएसपी 50 प्रतिशत प्लस, इस देश में लागू नहीं कर सकते हैं, यह मंत्री जी का कल का जवाब है और कहते हैं कि स्टेट गवर्नमेंट रिकमेंड करके भेजे। अगर आज यूनियन टेरिटरीज स्टेट्स बनाये तो आप रिकमेंडेशन में दब जायेंगे। आपको कम्परैटिव, जिस तरह प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि हमें फेडरलिज्म को लाना पड़ेगा तो क्यों नहीं आप पूरे देश के एग्रीकल्चर मिनिस्टर्स को एक जगह लाकर यह पॉलिसी बनाते और एक एमएसपी तय करते, जिसके तहत हरियाणा के किसान को भी उसी चीज का दाम बराबर मिले। पहली बार हरियाणा के किसान ने उत्तर प्रदेश में गन्ना और गेहूं बेचा है क्योंकि उत्तर प्रदेश में एमएसपी ज्यादा था। यह पहली बार इसलिए हुआ है कि हरियाणा प्रदेश की सरकार ने किसानों के लिए कोई कदम नहीं उठाया है।
मैं आपसे आग्रह करता हूं कि अगर फेडरलिज्म की बात की जाती है तो जिस तरह से हमने जीएसटी लागू करने के लिए देश के सभी राज्यों के फाइनैंस मिनिस्टर्स को एक किया, उसी तरह से क्यों नहीं हम सभी राज्यों के एग्रीकल्चर मिनिस्टर्स को एक पोडियम पर लायें और एक ऐसा आयोग बनायें कि किसान मजबूती से अपनी बात रख पाये और उस किसान की चर्चा इस सदन से पहले उस जीएसटी काउंसिल की तरह एग्रीकल्चर काउंसिल में हो और वे वहां अपनी बात रखें। आपने मुझे सदन में बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।
21.00 hours माननीय अध्यक्ष : सुरेश अंगड़ी जी, केवल दो मिनट में अपनी बात समाप्त करें ताकि मुझे बोलना न पड़े।
श्री सुरेश सी. अंगड़ी (बेलागवी):अध्यक्ष महोदया, मुझे भी बहुत खुशी होती है, मैं भी किसान का एक बेटा हूं, आज मुझे आपने सदन में बोलने के लिए अवसर दिया है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। 70 सालों से इस देश में किसानों के बारे में लोग भाषण कर रहे हैं। आज यह एक गंभीर विषय है। अगर पार्लियामेंट के सभी मैम्बर्स के पूर्वजों का इतिहास देखा जाये तो सभी माननीय सदस्य एग्रीकल्चर फैमिली से संबंधित हैं। फिर भी, हम लोग एग्रीकल्चर की समस्या पर चर्चा कर रहे हैं।
किसान अपने खेत के लिए पानी चाहते हैं, 24/7 विद्युत चाहते हैं और अपनी फसल का मार्केट प्राइस चाहते हैं। हम लोग किसानों के प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं, यह सहानुभूति दिखाने का अवसर नहीं है, अभी हमें किसानों के आत्म स्तर को बढ़ाना चाहिए। आज हमारे प्रधानमंत्री जी ने पार्लियामेंट चालू होने से पहले इस देश के किसान को नमन करते हुए एड्रेस किया, अनंत कुमार जी और वह दोनों मिल कर उस दिन प्रस्ताव भी किये हैं। उनके लिए सभी लोग बात कर रहे हैं, केवल भाषण नहीं होना चाहिए। राजनीति का चश्मा निकाल कर, जैसे हम 20 साल से जीएसटी लागू करने के लिए काम करते थे, उसी तरह सभी अनुभवी लोगों के साथ बैठ कर किसानों की समस्या को हल करने के लिए सोचना चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री जी ’फसल बीमा योजना’ लाये हैं, उसमें जो समस्या है, बैंको का सहकार नहीं मिल रहा है, उधर स्टेट गवर्नमेंट का सहकार नहीं मिल रहा है, उसमें इंश्योरैंस कंपनी की समस्या है, इंश्योरैंस कंपनी वाला पैसा नहीं जाना चाहिए, राज्य सरकार को उसके ऊपर कार्रवाई करनी चाहिए। मैं कृिष मंत्री जी से विनती करता हूं।
मैं राधा मोहन जी से परसों भी मिला हूं, पिछले चार सालों से कर्नाटक में सूखा पड़ रहा है, चार सालों से वहां बारिश नहीं हो रही है, कर्नाटक के बहुत किसान संगठन और किसान मेरे पास आये थे, प्रह्लाद जोशी जी के घर के सामने भी गये थे, आज उनकी प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए हम सभी मिल कर, राज्य सरकार और केन्द्र सरकार द्वारो बैठ कर रास्ता निकालने का यह समय है, एक-दूसरे को टोकने की जरूरत नहीं है। हमारे तोमर सिंह जी ने बहुत अच्छी बात की है कि राजनीति का चश्मा निकाल कर किसानों के सहकार के लिए सभी को आगे आना चाहिए, यही मेरा प्रस्ताव है। मैं विनंती करता हूं कि आप इसके ऊपर लीड लेकर काम करेंगी। धन्यवाद।
SHRI C.N. JAYADEVAN (THRISSUR): Madam, the country is in the grip of an unprecedented agrarian crisis. Farmers all over the country are finding it unbearable and being unable to face the crisis, they are on the streets in a do or die mood. Thousands of farmers are committing suicide in different parts of the country. When there is a record production of pulses and foodgrains, the farmers are trading at even below the Government’s Minimum Support Price at many producing centres.
Now the Government has increased the MSP of agricultural produce but it is not sufficient. Considering the increase in the input costs to the farmers, the MSP should be fixed as per the recommendations of M.S. Swaminathan Committee, that is, 50 per cent above the actual cost of production. Though the continuing farm crisis can be attributed to the policy of neoliberalisam, the present worsening crisis is the creation of this Government which promised to waive the farmers’ loan during election campaigns but did nothing in this regard after coming to power. Instead, the Government has been writing off the debts of corporate houses amounting to crores of rupees.
Though the loan waiving is an immediate relief to some farmers, it is not going to help majority of the farmers because, according to the NSSO data, less than half of the small and marginal farmers in the country owe money to banks. Majority of such debtors have taken loans from informal and non-institutional sources like local moneylenders, traders, friends and relatives. So loans taken from all the nationalized and cooperative banks and other agencies should be brought under the loan waiver scheme. Steps should be taken to bring down the agriculture input cost. Seed, fertilizer, pesticide, diesel, electricity, pumping set and generators must have zero tax, which means they should be put out of the GST. Thank you very much.
*ADV. JOICE GEORGE (IDUKKI): Madam, I will be confined to one point which has not been dealt with here. I may be permitted to speak in my mother tongue also since the matter is very close to my heart.
Sir, I do not want to repeat what the previous speakers have said about the countrywide crisis that has affected our agricultural sector. Madam, this government as well as the previous governments have taken several policy decisions that have adversely affected our farmers. When do to, international agreements like ASEAN and GATT agreement, we are compelled to import indiscreetly, the farmers, especially farmers growing cash crops like rubber, pepper, cardamom, are affected adversely. There should be a policy review in this regard.
Another important point, is regarding the havoc created by wild animal who raid the fields and destroy crops and endanger human lives. Yesterday, in my constituency, a blind women of thirty, by the name Babby, was squashed to death by a wild elephant. Whether farmers are compelled to commit suicide or they lose lives agitating against the government, or farmers are killed by wild animals, the loss to their family members is the same. Therefore, madam, we should sympathetically consider ways to protect the lives of farmers.
Similarly, the right to property. There are fanatic environmental protection groups, who in the name of protecting environment and in the name of Kasturirangan report are denying farmers their lawful right to own land.
When the policies of other ministries (Ministry of Environment) affect the farmers, there should be an inter-ministerial system of functioning to protect the farmers’ interest.
The Ministry of Agriculture should take the lead and co-ordinate with the Commerce Ministry and the Ministry of Environment, forest and Climate Change. Because only if the farmers’ interest and their land rights are protected can we protect their lives too and remedy farmer’s suicides.
Thank you Madam.
श्री राजेश रंजन (मधेपुरा) : माननीय अध्यक्ष महोदया, मैं माननीय मंत्री महोदय से जरूरी बातों के ऊपर आग्रह करना चाहूँगा।
76 फीसदी ग्रामीण युवा खेती करना पसंद नहीं करते हैं। हिन्दुस्तान में मात्र 9.58 करोड़ ही किसान बचे हैं, इन 70 सालों में। वर्ष 1991 में 11 करोड़ किसान थे। वर्ष 2011 में 9.58 करोड़ किसान हैं। अभी लगभग 2000 किसान रोज खेती के काम को छोड़ रहे हैं। सरकार ने एक रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी होगी। लेकिन गंभीर प्रश्न यह है कि 12 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यह सरकार की ही रिपोर्ट है। वर्ष 2020 तक 12 रुपये आमदनी का ख्वाब दिखाया जा रहा है, तो आप सोचिए कि उस समय इसकी क्या स्थिति होगी।
मैडम, मैं अपनी बात बिन्दुवार बोल रहा हूँ और अपनी बात दो मिनट में समाप्त कर दूँगा।
मेरा यह कहना है कि हम गांव जाते हैं, तो देखते हैं कि एक किसान की फैमिली में कम से कम छः लोग होते हैं। जब हमारी जनसंख्या 150 करोड़ होगी, तब हम 12 हजार रुपये आमदनी की उम्मीद कर रहे हैं। राजनीति से सभी लोग अलग होना चाहते हैं। कर्ज़ और मुआवजे के नाम पर 70 सालों से राजनीति हो रही है।
यहाँ पर इतना महत्त्वपूर्ण डिबेट चल रहा है, यह प्रेस में नहीं जाएगा। तमिलनाडु में किसानों की जो स्थिति है, उसके लिए उन लोगों ने जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया था, जिस पर आपने भी दुःख प्रकट किया है। उन्होंने मूत्र तक पिया है। जो स्थिति तमिलनाडु में है, जो छत्तीसगढ़ में मिर्च वाली स्थिति है, जो स्थिति महाराट्र की है, मैं उस पर नहीं जाऊँगा। मेरा सिर्फ यह कहना है कि सरकार ने एक रिपोर्ट दी है, जिसके अनुसार 48.5 फीसदी लोग किसान से जुड़े हुए हैं। उसी रिपोर्ट के अनुसार 22.5 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।
जब 70 प्रतिशत किसानों में से 40 करोड़ दिहाड़ी मजदूर हो गये, बाकी बटदार हो गये।
माननीय अध्यक्ष : राजेश रंजन जी, अपनी बात समाप्त करें।
श्री राजेश रंजन: मैडम, सिर्फ एक मिनट में मैं अपनी बात समाप्त कर दूँगा। मैं आपको बहुत ही गंभीरता से बता रहा हूँ। इंश्योरेंस कम्पनी को लगभग 347 करोड़ रुपये मुनाफा मिला। उसने किसानों को 180 करोड़ रुपये लौटाये। आपको आश्चर्य होगा, पैसे देने का काम बैंक करती है। फसल खराब होता है, तो सरकार मुआवजा देती है। बजाज कम्पनी को जो इतना मुनाफा मिलता है, तो मेरा यह कहना है कि इसे उद्योग का दर्जा नहीं दिया जाता है।
माननीय अध्यक्ष : आपकी बात पूरी हो गयी।
श्री राजेश रंजन : मैडम, मैं लास्ट पॉइंट बोलना चाहता हूँ।
श्री सुधीर गुप्ता (मंदसौर) : माननीय अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे एक अति संवेदनशील विषय पर, जो मेरे संसदीय क्षेत्र का विषय भी है, पर बोलने का मुझे अवसर दिया है।
हालांकि कृिष क्षेत्र की स्थिति पर चर्चा होनी थी, लेकिन जब यह चर्चा प्रारम्भ हुई, तो उसमें मेरे संसदीय क्षेत्र का जिक्र हुआ है। मैं इस बात को बहुत ही गंभीरता से रेखांकित कर रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जी, जिनको मैं एक गंभीर नेता के रूप में जानता हूँ, ने इस विषय को गलत तरीके से उठाया है। उससे मेरे भाव आहत हुए हैं। मैं उनसे यही कहूँगा कि कांग्रेस के उनकी आंतरिक राजनीति के कारण कौन आगे बढ़े, इस लड़ाई में मंदसौर को आग में झोंकने का जो कुत्सित प्रयास किया है, वह बहुत ही निन्दनीय है। ...(व्यवधान) इसलिए मैं कहूँगा-
“ कागज की कश्ती से पार जाने की न सोच, चलते हुए तूफानों को हाथ में लाने की न सोच, दुनिया बड़ी बेदर्द है, इससे खिलवाड़ न कर, जहाँ तक मुनासिब हो, इससे प्यार करने की सोच।” माननीय अध्यक्ष जी, आज यह प्रश्न उठता है कि मध्य प्रदेश में किसानों ने शांतिपूर्वक तरीके से एक तारीख से दस तारीख तक ‘हाहाकार आंदोलन’ में एकत्रित हुए थे। यह आंदोलन नौ जिलों में चला। माननीय मुख्यमंत्री जी के समक्ष किसान भाइयों ने शांतिपूर्वक अपनी मांगें रखी। किसान संगठनों के साथ माननीय मुख्यमंत्री जी की चर्चा के उपरांत यह आंदोलन समाप्त हुआ था।
प्याज खरीदी प्रारम्भ हुई। फसलों के समर्थन मूल्य पर क्रय की कार्रवाई प्रारम्भ हुई। राज्य शासन द्वारा खरीफ व रबी की फसलों को अल्पकालिक ऋण देने के विकल्प पर काम प्रारम्भ हुआ। मगर प्रश्न उठता है कि जब सब कुछ समाप्त हो गया, तो यह क्यों उठा। यह उठा है, कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में कौन नेता आगे बढ़े। इस लड़ाई को लड़ने के लिए इन्होंने मंदसौर को रणभूमि बनाया। मंदसौर को पहले भी रणभूमि बनाया था। इसी सदन में बीफ कांड के नाम से एक बदनाम कांड लाया गया, मैं उस पर यहाँ चर्चा नहीं करना चाहता हूँ। प्रश्न उठता है कि वे कौन लोग हैं, जिन्होंने शांतिपूर्वक किसानों की बात रखने के अधिकारों का हनन करते हुए उसमें...* अंदर प्रवेश करते हुए, इस आंदोलन के कारण किसानों को देश और दुनिया में बदनाम किया। आखिर वे कौन हैं? वह ... * जो फेसबुक के माध्यम से रेल-पटरी उखाड़ने व दुग्ध संयंत्र को लूटने की प्रेरणा बना। आखिर वे कौन हैं, जिन्होंने करेरा थाने में आग लगाने हेतु उकसाया। आखिर वे कौन हैं, जिन्होंने चोइथराम मण्डी में तोड़-फोड़ और आगजनी की है। ...(व्यवधान)
आखिर वे कौन हैं, जिन्होंने दलेधा में रेलवे संसाधनों को बाधित करने की प्रेरणा दी। आखिर वे कौन हैं, जिन्होंने पिपलिया मण्डी के क्षेत्र में उग्रता की है। ...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : आप किनकी बात कर रहे हैं? यह किसानों के संदर्भ में नहीं है।
... * ...(व्यवधान)...*...(व्यवधान)
श्री सुधीर गुप्ता: अध्यक्ष महोदया, मैं जानना चाहता हूँ, ज्योतिरादित्य बाबू फेसबुक पर वह ... * आपने उसे डांटने का प्रयास नहीं किया। आप एक गंभीर नेता हैं। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : इसे एक्सपंज करो।
…( व्यवधान)
श्री सुधीर गुप्ता : आखिर कौन लोग हैं वो, जो दंगा भड़काने के प्रेरक बने और दूसरे दिन अपने बाल मुंडवाकर ... * की मोटरसाइकिल चला रहे थे। वे लोग उनके चालक बने हुए थे। कोई तो मुझे यह बताए कि कौन हैं वो जो ... * की आँख को स्थाई रूप से बाधित करते हैं?
अध्यक्षा महोदया, जन-जन की जबान पर एक ही उत्तर है। आप चाहे कैसे भी उसको घुमा दीजिए। उसका एक ही उत्तर है कि ये सब हमारी...* के नेता हैं। ये लोग कांग्रेस के पदाधिकारी हैं, सदस्य हैं और उसके विधायक हैं। ये वैसे ही नेता हैं जैसे ...(व्यवधान) सुन लीजिए आप ...(व्यवधान) आपको मैंने बहुत शांतिपूर्वक सुना है। ये वही नेता हैं, जैसे...* थे।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : किसी भी ऑफिसर या अन्य किसी का नाम रिकॉर्ड में नहीं जाएगा।
SHRI JYOTIRADITYA M. SCINDIA: Madam, I take objection to that. It has to be expunged.
श्री सुधीर गुप्ता :वे नारा लगाते थे - यूथ कांग्रेस जिंदाबाद, एन.एस.यू.आई. जिंदाबाद। वे गाय के बछड़े की गर्दन अलग कर देते थे। इन्हें ... * नहीं पहचानते। ये हमारी गौरवमयी कांग्रेस के स्थानीय पार्लियामेन्ट प्रेसीडेन्ट हैं। वाह ... * केरल में गाय काटने पर वोट मिलेंगे। मध्य प्रदेश में चूँकि गाय किसान के साथ है, इसलिए गाय के साथ रहने पर वोट मिलेंगे। आप किस तरीके से मध्य प्रदेश में काम कर रहे हैं। हम जानते हैं कि गाँव में जाने के लिए मोटर साइकिल के ऊपर का मडगार्ड हटाना पड़ता था। हम जानते हैं 2004 का वह मध्य प्रदेश जिसमें टॉर्चों के सहारे किसानों का जीवन बीतता था। हम जानते हैं उस मध्य प्रदेश को जो आपने हमें कंगाल कर के दिया था। आज के मध्य प्रदेश में हमारे किसान भाई श्री शिवराज सिंह चौहान को दिल और गले से लगाकर कंधों पर बैठाकर ले जाते हैं। आप उसे बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं। आप षड़यंत्र कर रहे हैं ताकि सत्ता आपके हाथ में आ जाए। सत्ताएं ऐसे हाथ में नहीं आती हैं। आपके परिवार घराने का अपना इतिहास है। मैं आप पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता हूँ। मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि राजनीति संजीदगी से किया करो। आज गिरफ्तारी देने आए और वज्र-वाहन पर आपके साथी झंडा लेकर चढ़ गए। जैसे अफगानिस्तान में सेना के साथ वह फोटो इस बात की गवाही देता है कि आप पुलिस के वाहन पर अपने साथियों को चढ़ाने में सफल रहे। इससे आपको कौन सी जीत हासिल हुई? आपने कौन से वज्र-वाहन को कैप्चर कर लिया? आप किस भीड़ के माध्यम से पुलिस के काम को बाधित कर के अपना काम करना चाहते हैं? हम आपसे ये सब बातें पूछना चाहते हैं। आप उपहास उड़ा रहे थे? आप लोगों से कह रहे थे कि 1 करोड़ की बोली लगाई। क्या यह कहना शोभा देता है? मुल्ताई कांड में आपके नेता ने सदन को बताया कि आर.बी.सी. के हिसाब से हम नहीं दे पाएंगे। आपने पहले प्रॉमिस किया, लेकिन बाद में आपने कहा कि 700 करोड़ रुपए नहीं दे पाएंगे। जनता 7.5 हजार करोड़ रुपए मांग रही है। आपके नेता कह रहे हैं कि राज्य शासन के पास पैसा नहीं है। मैं आपको उन नेताओं के यहाँ कोई दर्शन नहीं करवा रहा हूँ।
मैं जानना चाहता हूँ कि अगर 1 करोड़ की मदद उस परिवार को दे दी, जो बेगुनाही में शिकार हो गया, तो आपको तकलीफ हो गई? आपके पेट में बलवटें पड़ गईं? आपके पेट में मरोड़ आ गई? आप उस गरीब किसान का उपहास उड़ा रहे हैं? ... * आप हमारे राजा रहे हो, मैं आपकी प्रजा रहा हूँ, लेकिन आप उपहास मत उड़ाइए। मैं आपको चुनौती देता हूँ। आप मेरी बात सुनने का माद्दा रखिए। यदि आप राज परिवार से हो, तो मेरी बात गंभीरता से सुनिए। विगत एक वर्ष के अंदर...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : किसानों पर गोली क्यों चली, इसका आप जवाब दीजिए।...(व्यवधान)
श्री सुधीर गुप्ता : मध्य प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी ने जो काम किया है, उस विगत एक वर्षका लेखा-जोखा लेकर मैं यहाँ आया हूँ।
माननीय अध्यक्ष : बस हो गया, अब आप कन्क्लूड कीजिए।
श्री सुधीर गुप्ताः मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी ने, विगत एक वर्षका लेखा-जोखा लेकर आया हूं।...(व्यवधान) कृिष उद्यान के विभाग, फसल दावा बीमा, खरीफ 2015, रबीवर्ष2014-15, खरीफ 2014, विभागीय योजनाएं, शून्य प्रतिशत ब्याज पर अनुदान, मुख्य मंत्री कृषि सहायता योजना, आपदा राहत कोष 2015 सूखा, आपदा राहत कोा बाढ़ अन्य सहायता।...(व्यवधान)
HON. SPEAKER: Nothing will go on record.
…(Interruptions)…* माननीय अध्यक्ष : बैठ जाइए। मैंने राम कुमार शर्मा जी को अनुमति दी है। सुधीर गुप्ता जी, आप भी बैठिए।
श्री राम कुमार शर्मा (सीतामढ़ी) : धन्यवाद अध्यक्ष महोदया, जो आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिए मौका दिया है।...(व्यवधान) आज भीषण संकटों से गुजरने वाला...(व्यवधान) भीषण संकटों से गुजरने वाले दयनीय खेती के उद्योग जो देश की बहुसंख्यक आबादी से जुड़ा हुआ है। इस मुद्दे पर आज हम विचार के लिए बैठे हैं। यह चर्चा केवल विचार तक ही सीमित न रह जाए, बल्कि धरातल के आधार पर आचार हेतु पहुंचने के लिए उपाय खोजना इस चर्चा का मकसद बने। यह मेरी कामना है।
अध्यक्ष महोदया, आपने समय का ज्यादा अधिकार नहीं दिया है। मैं आपको सम्मान करते हुए अपनी ओर से सिर्फ दो-तीन सुझाव रखना चाहता हूं। आज देश में फसल की उत्पादकता बढ़ायी जा रही है। उस पर कंट्रोल करने की बहुत जरूरत है, उसके उत्पादन में जो खर्च लगता है, उसको निश्चित रूप से हमको व्यवस्थित करने की जरूरत है। आज जो खाद्य सामग्री उपजाने वाले उपकरण सब्सिडी दर पर दिए जाते हैं, खेती करने का सामान दिया जाता है, उन सभी चीजों पर जी.एस.टी. के आधार पर जो कमी की गई है, इसके लिए मैं अपने प्रधान मंत्री महोदय के प्रति आभार व्यक्त करता हूं। मैं जानना चाहता हूं और आग्रह करता हूं कि कृिष के क्षेत्र में जो भी उपकरण का उपयोग होता है। उन सबको जी.एस.टी. से मुक्त कर दिया जाए।
माननीय अध्यक्ष : आप दो मिनट में अपनी बात पूरी नहीं कर पाएंगे। आप आरोप-प्रत्यारोप न करते हुए सुझाव रखिए। आज आपकी परीक्षा है।
श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा (रोहतक) : अध्यक्ष महोदया, आपके सुझाव के लिए धन्यवाद। मैं आपकी बात से सहमत हूं और कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं होगा। जितनी गहराई से चर्चा होनी चाहिए थी, दुर्भाग्य से उतनी गहराई से नहीं हो पायी। … * भाजपा के सत्ता पक्ष, मैं उन विवादों में नहीं जाऊंगा। यहां पर देश के किसानों के बारे में चर्चा होनी चाहिए। किसान की व्यथा भी सबके सामने है, उजागर हो चुकी है, क्या यह क्राइसिस है। मैं नौ सुझाव और नौ मांगें कृिष मंत्री जी के सामने अपनी तरफ से रखता हूं। बहुत लोगों ने प्रश्न किया कि यह जो आंदोलन हो रहा है, यह राजनैतिक आंदोलन है। मैं यह कहना चाहता हूं कि यह राजनैतिक आंदोलन नहीं है, क्यों। क्यों आंदोलन हुआ, इसकी पृष्ठभूमि में हम जाएं। वर्ष2004 से लेकर वर्ष2014 तक, 10 वर्ष तक गेहूं, धान, अरहर, कपास इन सबमें जो न्यूनतम समर्थन मूल्य है। प्रतिवर्षऔसतन 10 से 15 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई। उसके बाद जब वर्ष 2014 का चुनाव हुआ तो वायदा किया गया कि स्वामीनाथन कमीशन लेकर आएंगे। वह वायदा भी सत्तापक्ष का था, इनके घोषणा-पत्र में था, इनके भाषणों में था। स्वामीनाथन कमीशन के हिसाब से कहा गया कि जो वृद्धि हो रही है, उसको और तेजी से बढ़ाया जाएगा। किसान को उसकी फसल का भाव मिलेगा। मगर पिछले तीन वााॉ में क्या हुआ, जो पैडी, जो धान 10 साल से 13 प्रतिशत प्रतिवर्षवृद्धि हो रही थी, उसमें पिछले तीन वर्षों में केवल दो प्रतिशत तक की वृद्धि हुई।
माननीय अध्यक्ष : आंकड़े दिए जा चुके हैं, आप केवल सुझाव दे दीजिए।
श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा: सारी फसलों का औसत देखिए। मैं एक-एक फसल की परत खोलता हूं। मगर सारी फसलों का औसत देखें तो 10 से 15 प्रतिशत हर साल वृद्धि हो रही है, वह घटकर अब पिछले तीन साल में 3 से 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृद्धि हुई है। जो कि महंगाई की दर से भी कम है। मीडिया के लोग भी पूछते हैं। वे अपने मालिकों से जो तनख्वाह लेते हैं। उनको भी अगर हर साल 15 परसेंट इनक्रीमेंट की बजाए 3 परसेंट इनक्रीमेंट हो जाए तो मीडिया के लोग भी आंदोलन करने के लिए सड़क पर आ जाएंगे। यह पृष्ठभूमि है। इसलिए हमारी पहली मांग सरकार से है कि जो आपने कहा था कि स्वामीनाथन कमीशन रिपोर्ट लागू करेंगे। सरकार को अविलम्ब करना चाहिए।
मुनाफे के बारे में भी मैं कृिष मंत्री जी को एक आंकड़ा दूंगा कि 2011 में जब धान पर खर्च 670 रुपये प्रति क्विंटल था, तब एम.एस.पी. 950 रुपये प्रति क्विंटल दिया गया था, यानी धान पर प्रोफिट मार्जिन 39 परसैन्ट दिया गया था। वह 2015-2016 में घटकर 6.5 और 6.3 प्रतिशत रह गया। जिसे 39 परसैन्ट से बढ़ाकर पचास परसैंट तक ले जाने का आपने खुलेआम वायदा किया था, वह 6.5 प्रतिशत आ गया तो किसान सड़क पर आया।
दूसरी मांग यह है कि कर्जा माफी के बारे कहा गया कि कर्जा माफी स्थाई समाधान नहीं है। मगर मैं कहना चाहता हूं कि जब किसान की अनदेखी होगी तो उस पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। हमसे सवाल किया जाता है कि सत्तर सालों में आपने क्या किया। मैं बताता हूं कि आपने तीन वर्षों के अंदर क्या किया। 60-70 सालों में किसानों पर जितना कर्जा था, हमारे देश के इतिहास में सबसे तेज गति से किसानों पर किन्हीं तीन वर्षों में अगर कर्जा चढ़ा है तो वह पिछले तीन वर्षों में चढ़ा है और यह 8 लाख करोड़ से 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपये पिछले तीन वर्षों में चढ़ा है। इस तरह से साठ प्रतिशत कर्जा किसानों पर बढ़ा है और इसीलिए कर्ज माफी की मांग आ रही है। ...(व्यवधान)
मैडम, मैं वीरेन्द्र जी की बहुत इज्जत करता हूं, वह मेरे पिता तुल्य हैं, उन्होंने सही कहा कि वह मेरे पिता जी के साथ थे। उन्होंने कहा कि कर्ज माफी इसका समाधान नहीं है, अगर यह समाधान नहीं है तो फिर यू.पी. में आपने इसकी घोषणा क्यों की। अगर यह समाधान नहीं है तो महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री ने क्यों कर्ज माफी की। इसीलिए हमारी दूसरी मांग है कि सरकार किसानों का कर्ज माफ करे।
तीसरी मांग में मैं गन्ना उत्पादकों के लिए कुछ कहना चाहता हूं। 2013-14 में केन कंट्रोल बोर्ड गन्ने का फैसला करता है, जब चीनी 30 रुपये किलो थी तो हरियाणा में गन्ने का भाव 310 रुपये प्रति क्विंटल था। आज चीनी 40-45 रुपये किलो है, मगर गन्ने का भाव 320 रुपये क्विंटल है। चीनी और गन्ने का जो रेश्यो है, यह बीच में कौन सी शुगर मिल्स हैं, जिनका प्रोफिट मार्जिन बढ़ गया है। जब 30 रुपये प्रति किलो के भाव की चीनी पर 310 रुपये गन्ने का भाव हो सकता है तो 40 रुपये किलो चीनी पर हमारी मांग है कि 410 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने का भाव देना चाहिए, यह हमारी बिल्कुल जायज मांग है।
अब मैं अगली मांग पर आता हूं। शिवराज जी ने एक अच्छा काम किया। उन्होंने प्याज का न्यूनतम समर्थन मूल्य डिक्लेयर किया। अगर किसानों के हक में कोई फैसला होगा तो मैं बेबाकी से बोलूंगा, क्योंकि मैं यहां किसान की बात कर रहा हूं। मगर केवल मध्य प्रदेश में नहीं बल्कि पूरे देश में जो सब्जियां हैं, जो पापुलर के पेड़ हैं, हमारे समय में पापुलर के पेड़ का जो भाव था, हरियाणा में यमुना नगर की मंडी में जाकर आप पूछोगे तो 1200 रुपये पापुलर का भाव था, आज वह घटकर तीन सौ रुपये पर आ गया है। हमारी मांग है कि सभी सब्जियों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। जैसे सरकार अनाज का न्यूनतम समर्थन मूल्य डिक्लेयर करती है, वैसे ही सब्जियों, पेड़ों और फलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य डिक्लेयर करे। हमारे समय में पापुलर का जो समर्थन मूल्य हरियाणा के अंदर 1200 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा था, सरकार अब भी 1200 रुपये न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का काम करे।
अब मैं अगली मांग पर आता हूं। माननीय सांसद, श्री दुष्यंत जी ने सही कहा, वह सही दिशा में बात कर रहे थे और भाजपा पर प्रहार कर रहे थे, मैं इनकी बात से सहमत हूं। जो प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना है, इस योजना में हमारे हरियाणा प्रदेश में आईसीआईसीआई, बजाज एलायंस और रिलायंस बीमा कंपनियां हैं, इन कंपनियों ने किसानों से जो प्रीमियम कलैक्ट किया, वह 177 करोड़, 78 लाख रुपये कलैक्ट किया। उन्होंने आलमोस्ट 178 करोड़ रुपये कलैक्ट किया और किसान को 1 करोड़ 81 लाख रुपये दिया। यह कैसा बिजनेस मॉडल है, किसान पचास परसैन्ट मुनाफा मांग रहा है, मगर यह कैसा बिजनेस मॉडल है कि 1 करोड़ 81 लाख रुपये देने पर उन्हें 180 करोड़ रुपये का फायदा हो रहा है, यानी दस हजार प्रतिशत मुनाफा हरियाणा के किसानों से बीमा कंपनियों को हुआ और पूरे देश के अंदर केवल खरीफ की फसल में यह आंकड़ा 11 हजार करोड़ रुपये का है। जो पूरे साल में 22 हजार करोड़ रुपये का इनका औसत प्रोफिट है। इसलिए हमारी मांग है कि जो प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना है, इसमें सही तरीके से बदलाव किया जाए।
अब मैं अगली मांग पर आता हूं। मैं एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की बात कहूंगा। जो आपकी एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट पालिसी है, आपने शायद इनफ्लेशन को ध्यान में रखते हुए इम्पोर्ट पालिसी बनाई है। मगर इसमें किसान का नुकसान हुआ है। जो गेहूं, मक्का, नॉन-बासमती और पैडी है, इनका एक्सपोर्ट 2014-2015 में 134 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 9009 करोड़ रुपये हो गया है। यानी कि 6623 प्रतिशत का इजाफा इम्पोर्ट में हुआ है, जो बाहर से आ रहा है। जो एक्सपोर्ट 2014-15 में 1 लाख 31 हजार करोड़ रुपये था, वह घटकर अब एक लाख करोड़ रुपये पर आ गया है। इस तरह से हमारी एग्रीकल्चर प्रोडय़ूस का एक्सपोर्ट तीन साल में कोलैप्स हुआ है। मगर इंपोर्ट आपने इतनी तेज़ी से बढ़ाया, क्योंकि इंपोर्ट डय़ुटी 25 प्रतिशत से घटा कर शून्य प्रतिशत कर दी। जो पाम ऑयल है, उस पर पांच प्रतिशत इंपोर्ट डय़ुटी आपने घटा दी है। हमारी मांग है कि एक्सपोर्ट दोबारा खोला जाए। पूसा 1121, 1509 बासमती जो खाड़ी के देशों के अंदर एक्सपोर्ट होता है, उनका एक्सपोर्ट खोला जाए।
जीएसटी को ले कर भी मैं मांग करना चाहूंगा। मैं दो-तीन चीज़े जीएसटी में समझता हूँ कि कृिष विरोधी हैं, किसान विरोधी हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि कृिष मंत्री जी उन बातों को उठाएंगे। एक तो इम्पिलिमेंट की बात चंदू माजरा जी ने कही है, जिससे हम सहमत हैं। इम्पिलिमेंट को जीएसटी से बाहर रखा जाए। यूरिया की बात कही है। हमारे समय में हरियाणा के अंदर फर्टीलाइज़र पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार का मिला कर शून्य प्रतिशत टैक्स लगता था। अब जीएसटी पांच प्रतिशत लगेगा। पहले आप लोग 12 प्रतिशत सोच रहे थे। वह हटाया जाए। पेस्टिसाइड की बात कहूंगा, आपने कहा कि कीटनाशक देश में कोई किसान इस्तेमाल नहीं कर रहा है। आज भी प्रे इस्तेमाल कर रहे हैं। पेस्टिसाइड इस्तेमाल कर रहे हैं। मैं खुद अपने खेत में कर रहा हूँ। पेस्टिसाइड पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया है। पहले ज़ीरो प्रतिशत जीएसटी थी। मेरी मांग है कि पेस्टिसाइड को 18 प्रतिशत में नहीं लाया जाए, उसको ज़ीरो पर्सेंट पर रखा जाए। और जो ठेके पर खेती होती है, बाटे पर खेती होती है, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग होती है, अगर कोई किसान ठेके पर खेती कराता है, उस पर कभी इस देश में टैक्स नहीं लगा। लेकिन जीएसटी में उस पर भी 18 प्रतिशत टैक्स लगाया गया है। उस पर भी टैक्स कम किया जाए।
आखिरी बात कह कर मैं अपना भाषण समाप्त करूंगा। जब पूरी दुनिया में क्रूड ऑयल का प्राइस गिरा, तो फर्टीलाइज़र और डीज़ल का प्राइस कम कर के सभी देशों ने अपने किसानों को उसका फायदा दिया। तभी ये बाकी मुल्क सस्ते दामों में हमारे देश में गेहूं और बाकी इंपोर्ट के माध्यम से अपनी फसलें बेच रहे हैं। हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ है। मेरी मांग है कि जब सन् 2014 के अंदर 110 डॉलर प्रति बैरल क्रूड ऑयल का भाव था, वह 125 तक भी गया था तो उस समय 56 रूपये डीज़ल का भाव था। आज जब 40 डॉलर प्रति बैरल है, तो आज भी 56 रूपये ही डीजल का भाव है। इस आधार पर हमारे समय में प्रति वर्ष एक लाख करोड़ रूपये की सब्सिडी हम खाली डीजल में देते थे। सरकार दो लाख 33 हज़ार करोड़ रूपये का मुनाफा डीजल और फर्टीलाइज़र के माध्यम से किसान से कमा रही है। मेरी सरकार से मांग है कि बाकी चीज़ें तो इन्होंने जीएसटी में ला दी हैं। जीएसटी में अगर किसी को लाना है तो किसान के लिए डीज़ल को जीएसटी के दायरे में ले कर आएं, ताकि डीज़ल का भाव आधा हो सके। मैं आखिर में यही कह कर अपनी बात समाप्त करूंगा कि - किसान चुप है, मगर किसान गूंगा नहीं है। किसान सो रहा है, मगर किसान मरा नहीं है, किसान का जो पसीना है, उसमें खुशबू है। लेकिन अगर आप उस पसीने को नज़रअंदाज करोगे तो वह ज्वाला बन कर एक दिन फूटेगा, जिसका परिणाम आपको भुगतना पड़ेगा। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
कृषि और किसान कल्याण मंत्री (श्री राधा मोहन सिंह) : माननीय अध्यक्ष महोदया, मैं उन 13 माननीय सदस्यों का आभारी हूँ, जिन लोगों ने इस नियम-193 के तहत चर्चा का नोटिस दिया था। जिसमें कांग्रेस के चार सदस्य थे। अभी तीन उनमें से नहीं हैं, एक हैं। तीन कांग्रेस के हमारे वक्ता थे, उनमें से दो हैं। इसके लिए मैं आपके प्रति भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ कि आप अंत तक हैं और अंत तक बने रहेंगे, इसकी मैं उम्मीद करता हूँ।
माननीय सिंधिया जी ने चर्चा की शुरूआत की थी और हमारी ओर से वीरेंद्र जी बोल रहे थे। चंपारण की बात और वेद-पुराण की बात हुई, लेकिन मैं उतना पीछे नहीं जा रहा हूँ। विभाजन का दंश झेल रहा स्वतंत्र भारत, जहां एक तरफ अनेक आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था। वहीं बिगड़ती राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थियों के कारण रोज़गार के अवसरों की अत्यंत कमी के चलते हम तीव्र औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ रहे थे। किंतु इसके अतिरिक्त हमें कृषि के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया भी हमारे लिए आवश्यक है। कृषि की स्थिति को सुधारने के लिए शीघ्रतम प्रयास करने भी आवश्यक थे। इसमें हमने क्या किया, यह एक अध्ययन का विषय है।
जो मेरी जानकारी में है कि 60 के दशक के प्रारम्भ में यानी 15-16 वर्ष के बाद नीति निर्धारक ऐसी कृषि तकनीकियों की खोज में थे, जो रूपान्तर कर सके और यह तकनीक चमत्कारी बीजों के रूप में सामने आयी, जो कि मैक्सिको में सफल हो चुकी थी। इस प्रकार भारतीय कृषि में हरित क्रान्ति के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार हुई और यह क्रान्ति उच्च पैदावार के बीज, रसायन, कीटनाशक, भू-मशीनीकरण पर आधारित थी। इस क्रान्ति के कारण भारतीय कृषि की कला में परिवर्तन हुआ और हमारे यहाँ खाद्यान्न का संकट दूर हुआ। अब 60 के दशक के मध्य में, मध्य से लेकर, 65 से लेकर 80 के दशक तक हरित क्रान्ति उत्तर पश्चिम के राज्य, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दक्षिण के राज्यों तक फैली। 80 के दशक के प्रारम्भ में यह तकनीक मध्य भारत, पूर्वी भारत की ओर भी बढ़ी, लेकिन बहुत मन्द गति से बढ़ी। फिर भी देश के अन्दर ज्वार, बाजरा, मक्का विशेषकर चावल और गेहूँ उच्च पैदावार के बीजों के प्रयोग ने कृषि उत्पादकता को पर्याप्त तेजी प्रदान की और इससे हरित क्रान्ति के प्रारम्भिक दौर में गेहूँ की उत्पादकता में 75 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। यह अच्छी बात है, परन्तु भारतीय मानसून अत्यधिक अनिश्चित, अनियमित एवं मौसम आधारित होने के कारण उच्च पैदावार के बीजों की अधिक सिंचाई और उर्वरक की माँग को झेल पाने में काफी असमर्थता रही।
अब हरित क्रान्ति को प्रभावी बनाने के लिए उच्च क्षमता, विश्वसनीय और कम ऊर्जा उपभोग करने वाले उपकरणों एवं मशीनों की भी आवश्यकता महसूस हुई, जिन्हें सीमित संसाधनों से पूरा किया जाना बहुत जरूरी था। सिंचाई की विभिन्न तकनीकियों के बाद भी भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर थी और 1980 से 1987 में खराब मानसून के कारण पड़े सूखे ने हरित क्रान्ति की दीर्घकालीन उपयोगिता पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा किया। उच्च पैदावार बीजों के सीमित खाद्यान्नों के प्रयोग ने अन्तर खाद्यान्न असन्तुलन उत्पन्न किया। भारत के समस्त क्षेत्रों में हरित क्रान्ति के एक समान प्रयोग और परिणाम न होने के कारण अन्तर क्षेत्रीय असन्तुलन भी सामने आये। हरित क्रान्ति ने भारतीय कृषि का व्यावसायीकरण किया। इसमें कहीं दो राय नहीं है और उसके लाभ भी हमें हुए, किन्तु कृषि से जुड़े हुए जब हम परम्परागत, ये जब वेद, पुराण की बात कर रहे थे, तो बहुत लोगों को लग रहा था कि ये कहाँ चले गये, लेकिन कृषि से जुड़े हुए परम्परागत मूल्य एवं संस्कृति, जो दशकों से 85 फीसदी लघु, सीमान्त जिनसे जुड़े थे, लुप्त हो गये और साथ ही हानिकारक उर्वरकों, कीटनाशकों ने पर्यावरण को दूषित कर कृषि श्रमिकों के स्वास्थ्य को प्रभावित किया। इसका प्रभाव जैव विविधता पर भी पड़ा। मैं एक रात लुधियाना में था, वहाँ लोग बता रहे थे कि आपके यहाँ जो गेहूँ पैदा होता है, उसके आटे की रोटी से ज्यादा लोग बाजार में मध्य प्रदेश के गेहूँ से बने आटे की रोटी खोजते हैं। हम इसके विस्तार में नहीं जाना चाहते। इसके अलावा पम्पिंग सेट, टय़ूबवेल के अत्यधिक प्रयोग ने भूमिगत जल के प्राकृतिक संसाधनों को भी प्रभावित किया है। हरित क्रान्ति के लाभ हुए हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है।
जब हम कोई योजना बनाते हैं, तो उसके नुकसान क्या होने वाले हैं, इसकी यदि चिन्ता नहीं करते हैं, तो लाभदायी योजना भी हमारे लिए बड़ी हानिकारक भविष्य में सिद्ध होती है। अब यह जो जल स्तर नीचे गया, उच्च पैदावार के बीज, उर्वरक और मशीनों की पहुँच तो निर्धन किसानों के नजदीक कम होती है। किसान हूँ, किसान हूँ, हम सब लोग यह कहते हैं, किसान के बेटे हों या पढ़े-लिखे हों, तो भी कृषि की जानकारी है, लेकिन मैं इतना तो निश्चित रूप से कहूँगा कि हमारे गाँव में 95 लोग छोटी जोत वाले हैं, चार-पाँच लोग बड़ी जोत वाले हैं। उनके पास टय़ूबवेल है। हम छोटे किसान हैं, तो हम 200 रुपया प्रति घंटा के हिसाब से उससे पानी लेते हैं। जो बड़ा किसान है, उसका बेटा या उसका आदमी कुर्सी लेकर टय़ूबवेल के नजदीक बैठता है और घड़ी देखता रहता है। यदि खेत में 8 घंटे पानी गया, तो 1600 रुपया उसको देना पड़ता है। ये जो बीज, उर्वरक और मशीन है, फिर जल स्तर नीचे जाना, तो निर्धन कृषकों तक इसकी पहुँच न होने के कारण कृषक समुदाय में असमानता बढ़ गयी। अनेक निर्धन किसानों में इस कारण से ऋणग्रस्तता भी दृिष्टगोचर हुई है। एक प्रकार से जिसे आर्थिक जगत में हम बोलते रहते हैं कि इस देश में 70 वर्ष की आज़ादी में एक बहुत बड़ी उपलब्धि हुई कि देश में गरीबों की गरीबी बढ़ी और अमीरों की अमीरी बढ़ी।
अब कौन सी नीतियाँ थीं उसकी चर्चा हम नहीं करना चाहेंगे, लेकिन इस मामले में हम भी अपने गाँव में देख रहे हैं कि जो गरीब किसान थे, उनकी पहुँच से सब कुछ दूर हुआ और वे ज्यादा प्रभावित हुए। इन सब प्रभावों को खत्म करने के लिए जैविक कृषि, जैविक और पर्यावरणपरक तकनीकों का प्रयोग, जल प्रबंधन, संचयन, सॉइल क्वालिटी, नमी को बनाए रखने के प्रयासों को बढ़ावा देना, ऐसी विकसित तकनीकों का प्रयोग करना जो न केवल लागत कम करे, अपितु प्राकृतिक वातावरण को हानि न पहुँचाए, आवश्यक हो गया। साथ ही भारत को पूर्ण खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए कृषि और अधिक आधुनिक उपकरण विविधीकरण की आवश्यकता हुई। भारतीय कृषि में व्यापारिक फसलों के विविधीकरण, वर्षा जल संरक्षण, एग्रो प्रोसैसिंग, उद्योगों को प्रोत्साहन, वन संरक्षण, बेकार पड़ी भूमि का प्रयोग, निर्यात संवर्द्धन के साथ साथ सतत् उत्पादकता और उत्पादकता क्रांति की आवश्यकता भी महसूस हुई जिसकी तरफ ठोस कदम बढ़ाना अति आवश्यक हो गया। कदम बढ़े थे लेकिन ठोस कदम बढ़ाना बहुत आवश्यक हुआ। हरित क्रांति ने हमें यह सीख भी प्रदान की कि तकनीकों के प्रयोग के माध्यम से शीघ्रातिशीघ्र उत्पादकता तो बढ़ाई जा सकती है, परंतु इस वृद्धि को दीर्घकाल तक सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त संस्थागत एवं सार्वजनिक नीतियों का क्रियान्वयन अति आवश्यक है। हरित क्रांति आवश्यक है लेकिन उसके लिए यह मौलिक आवश्यकता है, शायद इसकी चिन्ता हमने नहीं की।
इसके अतिरिक्त भारतीय कृषि की सफलता के अन्य सहायक क्षेत्रों में किसानों की आमदनी बढ़ाने के और जो क्षेत्र हैं - फूलवानी, बागवानी, मत्स्य पालन, सेरिकल्चर, पशुपालन, दुग्धपालन, मुर्गीपालन, मधुपालन इत्यादि, सफलता में यह सब दृिष्टगत होना स्वाभाविक है, तब इसकी सफलता मानी जाएगी। इसी विाय पर हमारे पहले भी काम हुआ लेकिन इसी को हम तेज कर रहे हैं और इसी के दम पर हमने चुनाव के पहले बहुत साफ साफ कहा, सुनने में किसी को गड़बड़ी हो सकती है, पढ़ने में गड़बड़ी हो सकती है या पढ़ने और समझने के बाद भी राजनीतिक कारणों से कोई बोलता हो, लेकिन हमारे प्रधान मंत्री जी ने साफ कहा था कि हम लागत मूल्य का डेढ़ गुना देंगे, डेढ़ गुना आमदनी बढ़ाएँगे। जब हम सरकार में आए तो सरकार में आने के बाद हमने तुरंत आमदनी बढ़ाने के लिए एक कमेटी बनाई और बरेली की सभा में हमारे प्रधान मंत्री जी ने कहा कि हम 2022 तक आते आते दो गुना कर देंगे। ऐसे ही नहीं कहा। हमने कमेटी बनाई और कमेटी ने 2015 में जो अनुशंसा की तो 2016 में उसको लागू भी किया। 2017-18, 2018-19 और 2019-20 के लिए हमने कार्य योजना भी बनाई, रोडमैप भी बनाया है। हमारे महताब जी नहीं हैं, वे हमें कह रहे थे कि आप यह बताइए कि दस सालों में जो हुआ, आपने तीन सालों में क्या किया? यह सवाल आपने सुना होगा। इस दृष्टि से मैं उनको दस साल पीछे ले जाऊँगा। वे सुन रहे होंगे नहीं तो बाकी मित्र बताएँगे। 2000 से 2004 के बीच में एक राष्ट्रीय मंडी बनाई जाए, ई-मार्केटिंग हो, किसानों में अच्छा कंपीटीशन हो और मुनाफा हो, इसके लिए 2001 से 2003 तक राज्य के कृषि मंत्रियों के साथ कई बैठकें हुईं और 2004 के प्रारंभ में राज्यों को मॉडल मंडी भेज दिया गया। एक और निर्णय हुआ कि जो यूरिया बनाने वाली कंपनियाँ हैं, 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा उसमें सरकार के खजाने से जाता है और वह जो पैसा जाता है, किसान को उचित दाम पर, उचित समय पर यूरिया मिले। लेकिन, उस समय भी वह मिलता नहीं था।
मुझे याद है, जब हम वर्ष 1989 में लोक सभा में आए थे, उस समय अटल जी थे तो पहली बार जब मुझे शून्य काल में बोलने का मौका मिला था तो हमने यही मांग की थी कि मेरे यहां मोतीहारी में यूरिया का रैक हो। यह उस समय भी चिंता का विषय था। हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने इसी पूसा के अन्दर काफी मेहनत करके, वर्ष 2003 से वर्ष 2005 के बीच में फील्ड ट्रायल करके कृषि मंत्रालय को यह सुझाव दिया कि इसे नीम कोटेड कर दो, ताकि यह जो इसका दुरूपयोग हो रहा है, जैसे सिंथेटिक दूध के बनाने में, जैसे यह केमिकल फैक्ट्री में जा रहा है, यह बंद हो जाएगा, किसान को सहूलियत मिलेगी।
मुझे दो चीज़ स्मरण है। वर्ष 2004 के लगभग यह हो चुका था। महताब जी यहां नहीं हैं। वे पूछ रहे थे कि उस समय क्या हुआ और आपने क्या किया। मैं आपके माध्यम से, इस सदन के माध्यम से उनके पास यह संदेश भेजना चाहता हूं कि दस वर्षों में जो मार्केटिंग का मॉडल एक्ट गया, तो सितम्बर, 2010 में एक बैठक हुई। इससे आगे गाड़ी नहीं बढ़ी। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की बात करते हैं। हम उस पर भी आएंगे। उनकी रिपोर्ट में भी यह बात थी और किसान नीति में भी यह बात आई। लेकिन, फल नहीं मिला।
हमारी सरकार बनते ही, जो वर्ष 2004 का मॉडल एक्ट पड़ा हुआ था, जिसके बारे में स्वामीनाथन जी ने कहा था, उसका सर्कुलर हमने राज्यों को भेजा कि आप इसमें से तीन कानून अपने राज्यों में लागू करें। कानून बदले। विलम्ब हुआ तो सभी राज्यों के कृषि मंत्रियों को और जो मिनिस्टर मार्केटिंग के चार्ज में थे और मार्केटिंग सेक्रेटरी को साथ लेकर कर्नाटक के हुबली में तीन दिन रहे। जब येदियुरप्पा जी कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे तो वर्ष 2004 के बाद की स्वामीनाथन आयोग की जो रिपोर्ट थी या सितम्बर में यू.पी.ए. सरकार में जो बैठक हुई, वह कहीं लागू नहीं हुआ था, पर वहां उन्होंने इसे शुरू किया था। उसके बाद की सरकारों ने भी वहां बड़ी तेजी से काम किया। उस समय जब हम गए थे तो वहां ‘वन ई-ट्रेडिंग’ से 50 मंडी जुड़े थे। जब हम सब वहां दो-तीन दिनों तक रहे तो उसके बाद वहां से आने के बाद 17 राज्यों ने नियमों में परिवर्तन किए। आज 13 राज्यों की 455 मंडियां उससे जुड़ गयीं हैं। अख़बारों में भी कुछ खबरें छपती हैं और हम लोग भी इसकी गहराई में न जाने के कारण परेशानी में पड़ जाते हैं। मंडी के अंदर, हमारे प्रधान मंत्री जी ने, हम लोगों ने जो एक सॉफ्टवेयर विकसित किया था तो उन्होंने उसे 14 अप्रैल, 2016 को लॉन्च किया था और राज्यों को हम लोगों ने 30-30 लाख रुपये देना शुरू किया कि वहां पर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण करें, लैब लगाएं। जब वहां पर किसान आएं तो उनकी ग्रेडिंग हो और फिर बीडिंग हो। यह मात्र एक साल पहले शुरू हुआ। राज्य जो प्रस्ताव भेजते हैं और उसको हम अनुमोदित करते हैं तो हमने ऐसे 455 प्रस्ताव अनुमोदित किए हैं। कुछ राज्यों ने कानून बदले हैं, कुछ बदल रहे हैं। बिहार, केरल, मणिपुर को छोड़कर सैद्धांतिक रूप से बाकी सारे राज्य इसमें लग गए हैं। जिन राज्यों ने कानून नहीं बदला है, उनके लिए एक नया मॉडल एक्ट अभी हमने कृषि मंत्रियों की बैठक में जारी किया है। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के जो बचे हुए थे, वर्ष 2004 की रिपोर्ट के जो बचे हुए शेष थे, उसके ऊपर हमने कार्य किया। प्रधान मंत्री जी खुद इसकी मॉनिटरिंग भी करते हैं। उन राज्यों के लिए हमने नए मॉडल एक्ट में यह दिया है कि चूंकि सरकार कानून नहीं बनाती है तो आप कोई एक एजेंसी तय करिए जिसके माध्यम से मार्केट को ‘वन ई-ट्रेडिंग’ प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए।
स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा थी कि कम से कम 80 वर्ग किलोमीटर के अंदर एक मार्केट हो और आज देश की हालत यह है कि 480 किलोमीटर के अंदर एक मार्केट है। हमने जो नया मॉडल एक्ट जारी किया है, उसके अंदर प्राइवेट मार्केट और फार्म गेट तक मार्केट के बारे में राज्यों को कानून बनाने हैं। कई राज्य इसमें लग गए हैं। लेकिन, जो हमने अभी ई-मार्केटिंग शुरू किया है तो अभी मैं तेलंगाना और छत्तीसगढ़ को जरूर बधाई दूंगा कि इसके पहले चरण में मार्केट के अंदर ही ई-ट्रेडिंग हुई।
दूसरे चरण में एक मार्केट से दूसरे मार्केट के अंदर और तीसरे चरण में राज्यों के एक मार्केट से दूसरी मार्केट हुई। जो पहले चरण का है, उसमें दो राज्यों ने 44 में से 40 मंडियों के अंदर ई‑ट्रेडिंग शुरू की है। कुछ मंडियों में एक‑दूसरे से भी शुरू हो गया और यह छत्तीसगढ़ की 10 मंडियों में शुरू हुआ है। मध्य प्रदेश ने परसों सूचना दी कि उसने 40 मंडियों में इस काम को शुरू कर दिया है। सभी राज्यों के मार्केटिंग मिनिस्टर के साथ मेरी दो बैठक हो चुकी हैं। अगले तीन महीने में बड़ी तेजी से सभी लोग लगे हैं कि मार्केट के अंदर ई‑ट्रेडिंग हो और फिर एक दूसरे मार्केट के साथ हो। हम 585 मार्केट्स के करते हैं और इसीलिए हमने राज्यों को जो नया मॉडल दिया है, उसमें यह सुविधा दी है कि फॉर्मगेट से लेकर प्राइवेट मंडी तक को जोड़ो। कर्नाटक का एक अपना पोर्टल है, इससे दो सौ मार्केट जुड़े हुए हैं। हम लोग मार्च 2018 तक सिर्फ 585 मंडियों को जोड़ेंगे, जो देश की बड़ी मंडियाँ हैं। हमने राज्यों को भी कहा है कि अपना पोर्टल और नया मॉडल कानून बनाकर राज्य में भी बड़ी संख्या में इस प्रकार से ई‑ट्रेडिंग के लिए तैयारी कीजिए।
अब तीसरा विषय प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना का है। आप देखिए, देश में बीमा योजना वर्ष 2000 के पहले से चल रही है, लेकिन जब हम सरकार में आए थे तो हमने मोडिफाइड राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना शुरू किया। यह लागू करने का निर्णय हो चुका था। कुछ राज्यों ने लागू भी कर दिया था और बाकी राज्यों ने भी लगभग शुरू किया है। अब उसकी क्या विसंगति है? आप जरा उस इतिहास को देखिए। बीमा का मतलब है‑बीमा। अभी श्री चौटाला जी बोल रहे थे तो उनकी कुछ बातें मुझे समझ में नहीं आई। हम इसे बाद में बताएंगे। इन्होंने कहा कि समर्थन मूल्य यहां दूसरा है और वहां दूसरा है। मैं कहता हूं कि ऐसा नहीं है, बल्कि यह देश भर में है। अगर कोई राज्य बोनस देता है, तो यह एक अलग विषय है, लेकिन समर्थन मूल्य पूरे देश में है। पूरे देश में समर्थन मूल्य हमेशा एक रहा है, अलग‑अलग नहीं रहा है। अभी हमारे कुछ सदस्य बता रहे थे तथा फसल बीमा के आंकड़ें दे रहे थे। मुझे पता नहीं कि इस प्रकार के आंकड़ें कहा से आते हैं।...(व्यवधान) आंकड़ों का ऐसा पोस्टमार्टम नहीं होना चाहिए।...(व्यवधान) कुछ सदस्य बता रहे है कि आंकड़े वेबसाइट से लिये गए हैं। ये आंकड़ें कब के लिए गए हैं? मैं आपको बता रहा हूं कि पहले कई फसल बीमा योजनाए थीं। जो प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना का विषय है, यह बीमा है, इंश्योरेंस है। आप लोग भी अपना बीमा कराते होंगे। अगर आपके परिवार के लोग आपके जिंदगी में पहुंच जाएं और कहें कि हमारे बीमा का पैसा दो, तो क्या यह संभव है, आप बताइए? ...(व्यवधान) पहले आप लोग बीमा को समझ लीजिए।...(व्यवधान) अब मैं बीमा के विषय पर आ रहा हूं।...(व्यवधान) बीमा के विषय में जितने लोगों ने भी बोला, उन्होंने कहा कि यह अच्छी योजना है।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : प्लीज, आप लोग बैठिए। पहले पूरी तरह से सुन लीजिए, उसके बाद चर्चा कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री राधा मोहन सिंह: इस योजना में क्रियान्वयन की गड़बड़ी है। मैं इस विषय पर भी आऊंगा। यह योजना अच्छी है। यह बीमा है। हमारे पूर्वांचल के सदस्य भी बोल रहे थे कि यह योजना अच्छी है। अब बीमा की जो स्थिति है, हमारे एक मित्र ने इसके बारे में चर्चा की कि प्रीमियम ज्यादा था और प्रत्येक जिले में उसका रेट अलग‑अलग था। फसलों का भी अलग‑अलग रेट था और ज्यादा था। हम लोगों ने इसमें प्रावधान किया कि यह डेढ़ प्रतिशत और दो प्रतिशत रहेगा। अब किसानों के ऊपर का बोझ बहुत कम हो गया है।
दूसरा, जो पहले बीमा योजना थी, उसमें यह था कि नुकसान चाहे जितना हो, लेकिन उसमें कैपिंग था। यदि एक हेक्टेयर में पचास हजार रूपये लगते हैं, तो उसको 25 हजार रूपये, 20 हजार रूपये या 18 हजार रूपये मिलेगा। अब तक यह किसानों के लिए सुरक्षा कवच नहीं था। स्वामीनाथन जी का कहना था कि उसको एक सुरक्षा कवच दो। इसकी चिंता किसने की, जिसने अपनी जवानी गांव में, चाय की दुकान से प्लेटफार्म तक और खेत के मेड़ से घर तक बितायी थी। जिसने पूरी जवानी खेत खलिहानों में बिताई, चाहे उत्तराखंड हो, हिमाचल प्रदेश हो, पंजाब हो या गुजरात हो। उसने कहा कि यह तो बहुत अन्याय है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जब आई तो उसमें कैपिंग हटा दी गई। उसमें पहले जो व्यवस्था थी कि फसल यदि कट जाती है और खेत में पड़ी हुई है और आपदा आएगी, तो उसको पैसा नहीं मिलेगा। इसमें कहा गया कि 14 दिन तक भी पड़ा रहेगा, तो इससे रिस्क बढ़ा। रिस्क बढ़ा, तो प्रीमियम भी बढ़ता और कैपिंग भी हटा दिया गया, तो प्रधानमंत्री ने कहा कि राज खजाने पर चाहे जितना भी बोझ पड़े लेकिन रिस्क तो इतना रहेगा। इसका नतीजा यह हुआ कि किसान को कम देना है और उससे ज्यादा जो भी प्रीमियम होगा, आधा भारत सरकार देगी और आधा राज्य सरकार देगी। किसान को डेढ़ प्रतिशत है, दो प्रतिशत है, उस पर कोई बोझ नहीं है।
मैं दो दिन गुजरात में था। यह समस्या है। जिन समस्याओं की बहुत लोगों ने चर्चा की, वह समस्या सही में आ रही है। एक साल अभी हुआ है। ...(व्यवधान) जो समस्या आ रही है, वह मैं बता रहा हूं। हम उसकी समीक्षा जब एक साल पर कर रहे हैं, तो उसमें बहुत साफ दिखाई दे रहा है। ...(व्यवधान) पहले बीमा को समझ लीजिए और समस्या भी समझ लीजिए, तो आपको सुविधा होगी, जब आगे बैठेंगे। यह जो प्रीमियम है, एक बार हम प्रीमियम समझाते हैं, जो आप बोल रहे थे कि कंपनियों के पास बहुत जाता है, तो मैं एक आंकड़ा आपको बता रहा हूं। आपने कहा कि दस हजार करोड़ रुपए चले गए। ...(व्यवधान) जो आंकड़े हैं, वे आपके अलग हैं, अपने हिसाब से हैं। ...(व्यवधान) मैं जो बता रहा हूं, उसको सुनिए कि वर्ष 2010-11 और 2012-13, 2012-13 में जितना प्रीमियम कंपनी को गया, जबकि इतना रिस्क नहीं था, 2011-12 में ...(व्यवधान) सर, जरा इधर ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : मंत्री जी, स्पीकर चेयर में बैठी हैं, उनको संबोधित करो, तो ज्यादा अच्छा है।
श्री राधा मोहन सिंह : मैं आपके माध्यम से सभी माननीय सदस्यों को यह बताना चाहता हूं कि 2010-11, 2011-12 और 2012-13 में जो प्रीमियम कंपनियों के पास गया, ...(व्यवधान) चूंकि मौसम अनुकूल था, इसलिए मात्र 63 प्रतिशत ही किसान को भुगतान किया। इसके बाद 2014-15 और 2015-16 में देखिए। 2014-15 में 3,560 करोड़ रुपये का प्रीमियम जमा हुआ, 2014-15 में आपदा आई थी, 2014-15 में प्रीमियम 3,560 करोड़ रुपये हुआ और भुगतान हुआ 3,548 करोड़ रुपये। वर्ष 2015-16 में भी आपदा थी, तो प्रीमियम गया 3,076 करोड़ रुपये और भुगतान हुआ 4,071 करोड़ रुपये का, अब यदि वर्ष 2016-17 में आपदा नहीं आई तो कहां से आपदा लाई जाए? ...(व्यवधान) यह तो है कि आपदा आए तो सुरक्षा कवच मिले। अब जो 2015-16 में पहला सीजन लागू हुआ, उसका जो एक अंदाज है, अभी तक जो दावा आया है, वह दावा है कि खरीफ जो 2016-17 में थी, जिसमें पहली योजना शुरू हुई, इसमें प्रीमियम जमा हुआ ...(व्यवधान)
श्री दुष्यंत चौटाला: अध्यक्ष महोदया, हाउस को बताएं कि कितना दावा किया गया और कितना किसान को पैसा दिया गया।...(व्यवधान)
श्री राधा मोहन सिंह : मैं वही बता रहा हूं। आप सुनिए। ...(व्यवधान) मैं वही बता रहा हूं, आप सुनिए। ...(व्यवधान)
श्री दुष्यंत चौटाला: नहीं बता रहे हैं। आपने उस समय के आंकड़े दिए, जब विवरण नहीं लिया जाता था।...(व्यवधान)
श्री राधा मोहन सिंह : आप सुनिए, सुनने का साहस रखिए।
श्री दुष्यंत चौटाला: आज किसान को क्रेडिट कार्ड से जबरन ...(व्यवधान)
श्री राधा मोहन सिंह : आप मेरी पूरी बात सुनने के बाद सवाल पूछिए। ...(व्यवधान) आप मेरी बात नहीं सुन रहे हैं। ...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:आपका उत्तर है कि 2,700 करोड़ के दावे में 600 करोड़ जो है ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : माननीय मंत्री जी प्लीज चेयर से बात करिए, बाकी किसी से नहीं करिए। हर एक के प्रश्न का उत्तर नहीं देना है।
…( व्यवधान)
22.00 hours श्री राधा मोहन सिंह : अध्यक्ष महोदया, माननीय सदस्य कन्फ्यूज हैं, जिस दिन मेरा उत्तर था, उस दिन कितना भुगतान हुआ, आज मैं जब बोल रहा हूं, अब तक कितना भुगतान हुआ, वह आंकड़ा दे रहा हूं।
माननीय अध्यक्ष : यह बीमा है, आपदा आएगी तो बीमा पे होता है, ऐसे नहीं होता है, यह समझ नहीं रहे हैं। आप आगे बढ़िए। आप बैठिए बार-बार ऐसे प्रश्न नहीं होता है।
…( व्यवधान)
श्री राधा मोहन सिंह : अध्यक्ष महोदया, यह स्थिति वैसी है ...(व्यवधान) यह विषय ऐसा है, मैंने एक बार इसी सदन में कहा कि इतने इलाके ओलावृष्टि से प्रभावित है, उसके बाद मैंने रकबा बताया, 15 दिनों के बाद फिर सवाल आया, हर सप्ताह के बाद राज्य सरकार जो रिपोर्ट भेजती है, उसी तरफ के एक माननीय सदस्य ने कहा कि आंकड़ों में हेराफेरी कैसे? 15 तारीख को राज्यों ने आंकड़ा दिया कि हमारे इलाके में एक लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित हुई। साप्ताहिक रिपोर्ट आती है और बीच में आपदा आ गई तो 15 दिनों के बाद फिर उसका रिपोर्ट बढ़ गया, यहां पूछते रहे, दो दिनों तक परेशान रहें कि आंकड़ों में हेराफेरी क्यों हो गई? जो बीमा कंपनियां दावा भुगतान कर रही हैं, हम प्रत्येक सप्ताह इसकी जानकारी ले रहे हैं, इसके मुताबिक इस वर्ष भी ...(व्यवधान) इस बार जो मेरा अंदाजा है जो दावा बना है, वह लगभग प्रीमियम का 63 प्रतिशत तक जाने की संभावना है। अब आप कहेंगे कि विलंब क्यों हो रहा है? विलंब का कारण है नीचे के स्तर पर आंकड़ों को इकट्ठा करने की मशीनरी चाहिए, इसके अभाव में बीमा कंपनियां भी लाभ उठाने की कोशिश करती हैं उनको टहलाती हैं, आंकड़ा कम करती है। सही बात सुनने को आप तैयार कहां हैं? अगर आज नहीं समझेंगे तो भविष्य में भी नहीं समझ पाएंगे। ...(व्यवधान) राजनीतिक जवाब आपको मिल चुका है, मुझे मजबूर न करें। ...(व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : महोदया, मुझे कुछ भी नहीं सुनना है। आठ महीने की नोटबंदी के बाद भी कोई सूचना नहीं है कि कितना पैसा वापस आया।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : माननीय मंत्री जी, आप बैठ जाइए, Nothing will go on record like this. मंत्री जी, यह डिस्कसन आज ही समाप्त करना है, दस बज रहे हैं। प्लीज आज इसे देखिए। आप केवल उनको मत कहिए बल्कि पूरे सदन को जानकारी दीजिए।
श्री राधा मोहन सिंह : अध्यक्ष महोदया, एक आकलन के मुताबिक जहां भी यह विवाद उठ रहा है हम स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं और छह राज्यों का बीमा कंपनियों के साथ बैठाकर निपटान किया है। नई स्पेस टेक्नोलॉजी के आधार पर कर रहे हैं। बीमा कंपनी को लाभ न हो, इसके लिए सभी राज्यों को पत्र लिखा है कि राज्य की एक बीमा कंपनी कराओ, किस राज्य में किस फसल का बीमा होना है इसे राज्य सरकार को नोटिफाई करना है, राज्य सरकार को टेंडर करना है, कंपनी चुनना है, पंजाब और गुजरात अपनी कंपनी बनाने जा रहे हैं। माननीय सदस्य भी जिस राज्य में हैं, वे भी मदद करें, कंपनी न लूटे, राज्य सरकार वहां बीमा कंपनी बनाए।...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : आप बैठ जाइए, अभी कुछ नहीं होना है।
…( व्यवधान)
श्री राधा मोहन सिंह : अध्यक्ष महोदया, यह बीमा है, रिस्क है, किसी राज्य को लगता है, दो बीमा कंपनियों के खिलाफ आवेदन आया है, तमिलनाडु और राजस्थान से आवेदन आए हैं, जिसकी हम जांच करा रहे हैं। अगर इसमें गलती मिलेगी तो उसको कैन्सिलेशन करेंगे लेकिन राज्य सरकार भी बीमा कंपनी बनाएं और माननीय सदस्य ये समझ लें। इसी सदन के एक सांसद हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में 90 प्रतिशत किसानों का बीमा कराया और वहां आपदा आई तो भुगतान कराया। बीदर के सांसद के एक तहसील में 3,65,000 किसान हैं।उसमें 3 लाख 25 हजार किसानों का बीमा कराया गया है। इसमें सब लोग मदद करें और आपदा आये तो किसानों को सुरक्षा कवच मिले। यह सुरक्षा कवच है और राज्य के खजाने पर जितना बोझ पड़ेगा, उसे सरकार उठाने को तैयार है। ...(व्यवधान) अगर कम्पनियां हेराफेरी करेंगी, तो हम उन पर कार्रवाई करेंगे। हमने राज्यों को भी कहा है कि वे अपनी-अपनी बीमा कम्पनी बनायें। कहीं-कहीं ये कम्पनी वाले टेंडर के समय आपस में मिल जाते हैं, ऐसा मुझे गुजरात की बैठक में जानकारी मिली। अब गुजरात सरकार अपनी बीमा कम्पनी बनाने जा रही है। हरियाणा ने भी अपनी बीमा कम्पनी बनाने के लिए तय कर लिया है।
दूसरी बात मैं आमदनी बढ़ाने के बारे में बताना चाहता हूं। आमदनी बढ़ाने के लिए सिर्फ अनाज की खेती ही काफी नहीं है। इसके लिए हमें ऐलाइड सैक्टर में जाना होगा। यदि आप हमारी वेबसाइट देखते हैं, तो मुझे समझ में नहीं आता कि आप कहां सोये थे। जब पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों ने कहा कि क्लाइमेट चेंज हो रहा है, तो जितनी संकर और विदेशी नस्ल की दुधारू गाय हैं, उनकी प्रजनन क्षमता समाप्त हो जायेगी, उनका नामो-निशान नहीं मिलेगा। आप उस समय कहां सोये हुए थे? महोदया महोदया यदि आप सवाल पूछते हैं, तो आपको यह बताना पड़ेगा। इस संबंध में कोई योजना नहीं चली। देश में 80 प्रतिशत देसी नस्ल की गाय केवल 20 प्रतिशत दूध देती हैं। मोदी सरकार ने आते ही गोकुल मिशन चलाया। राज्यों से प्रस्ताव आये और दो वर्ष पहले 35 परियोजनाएं राज्यों में शुरू हो गयीं। दो राज्यो में नैशनल कामधेनु ब्रीडिंग सैंटर बन गया। एक आंध्र प्रदेश में बन गया और दूसरा मध्य प्रदेश में बन रहा है। इसके अलावा राष्ट्रीय बोवाइन उत्पादकता मिशन को देखें, तो पिछले तीन साल में उत्पादन में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हम यहां आंकड़े नहीं बताना चाहते। आप उनकी वेबसाइट पर देख लीजिए। इसी तरह से नीली क्रांति में सारी योजनाओं को एक साथ लाया गया। इसे हम पिछले दो वर्षों से कर रहे हैं। इन तीन वर्षों की तुलना में इसमें 17 फीसदी की वृद्धि हुई है। इतना ही नहीं, डीप फिशिंग योजना शुरू की गयी। अब 12 नॉटिकल मील में मछली कहां है। हमारे मछुआरे बरसों से मछली पकड़ रहे हैं, लेकिन उसमें मछली ही नहीं है। इसके लिए डीप फिशिंग की कोई योजना नहीं थी। हम देश में डीप फिशिंग की योजना लेकर आये हैं और पांच-सात मछुआरों का ग्रुप या सोसायटी को 40 लाख रुपये का अनुदान दे रहे हैं। हमने यह योजना तमिलनाडु से शुरू की है और उसे 200 करोड़ रुपया दिया है, क्योंकि सभी तटवर्ती राज्यों के लिए यह सबसे बड़ा संकट है। इसी प्रकार से दुनिया के वैज्ञानिकों ने कहा कि मधुमक्खी पालन से उत्पादकता बढ़ती है, किसान की आमदनी बढ़ती है। आप उस समय कहां थे और आपने क्या किया? महोदया यदि इसी तरह से किसान की आमदनी बढ़ानी है तो पेड़ लगाने चाहिए। पहले राज्यों में ऐसे कानून थे कि अगर कोई किसान हरा पेड़ काटेगा, तो उसे पुलिस पकड़ कर ले जाती थी। जबकि हिन्दुस्तान दुनिया में सबसे ज्यादा इमारती लकड़ियों का आयातक देश है। प्रधान मंत्री जी की पहल के बाद राज्यों को इस संबंध में कानून बनाना है। सब राज्य सरकारों को चिट्ठी लिखी गयी, बैठक हुई और आठ राज्यों ने पिछले वर्ष कानून में परिवर्तन किया कि किसान 20 प्रजाति की लकड़ियों को खेत में रोपे, काटे और ढोये, इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। आठ राज्यों ने पिछले वर्ष कानून बदला है और पांच राज्यों ने अभी कानून बदला है। राज्यों को पैसे दिये जा रहे हैं। दूध उत्पादन, मछली उत्पादन, मधुमक्खी पालन, राष्ट्रीय कृषि वानिकी आदि कार्यक्रम चलाये गये।
अभी कृषि ऋण की बात हो रही थी। किसान को साहूकार से मुक्ति मिले, इसके लिए कृषि ऋण प्रवाह योजना शुरू की गयी। वर्ष 2013-14 में 7 लाख करोड़ रुपये का ऋण प्रवाह था और इस वर्ष 10 लाख करोड़ रुपये का है। जो ब्याज सहायता है, वह 2013-14 में 6 हजार करोड़ रुपये था और इस वर्ष, यानी 2017-18 में 20339 करोड़ रुपये है।
अभी कोई सदस्य चर्चा कर रहे थे कि जो भूमिहीन किसान है, एकदम छोटा किसान है, उसे ऋण कहां से मिलेगा। अब उसकी योजना वर्ष 2007 में शुरू हुई। इसमें नियम है कि चार से दस लोगों का ग्रुप बनाकर ऋण देना है। इसे जॉइंट लायेबिलिटी कहते हैं। अब वर्ष 2007 से लेकर 2014 तक 6.7 लाख जॉइंट लायेबिलिटी ग्रुप्स बने और उन्हें 6630 करोड़ रुपये दिये गये। ...(व्यवधान) यह सात साल का काम था और पिछले तीन वर्षों में 22.57 लाख समूहों को 22,898 करोड़ रुपये दिए गए। ...(व्यवधान) आप सुनने का भी साहस रखिए। ...(व्यवधान)
माननीय अध्यक्ष : मंत्री जी, आप बोलिए।
...(व्यवधान)
HON. SPEAKER: Nothing else will go on record.
…(Interruptions)…* श्री राधा मोहन सिंह : अध्यक्ष महोदया, इनके पास सुनने का साहस नहीं है। ...(व्यवधान) आप समर्थन मूल्य की चर्चा कर रहे थे। ये अपने आंकड़े स्वयं गढ़ते हैं, इनको पता नहीं है।...(व्यवधान) इनमें सुनने का साहस नहीं है।...(व्यवधान)
22.11 hours (Shri Jyotiraditya M. Scindia and some other hon. Members then left the House.) श्री अनन्तकुमार : अध्यक्षा जी, कांग्रेस पार्टी ने कृषि संकट के बारे में, किसानों की समस्याओं के बारे में चर्चा मांगी थी। आपने चर्चा के लिए इजाजत दी और साढ़े पांच घण्टे से ज्यादा समय तक पूरे सदन ने चर्चा की, लेकिन वह आखिरी तक सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी संख्या भी देखिए, सिर्फ दो-तीन लोग बैठे हैं। हम सोच रहे थे कि पूरी संख्या रहेगी, हम बहुत गंभीरता से इस बारे में चर्चा करेंगे, लेकिन मुझे पीड़ा हो रही है कि ऐसा नहीं हुआ है। माननीय मंत्री जी इस पर जवाब दे रहे हैं।
श्री राधा मोहन सिंह : अध्यक्ष महोदया, समर्थन मूल्य की चर्चा कर रहे थे, जब हम सरकार में आए, उससे पहले का वर्ष था 2013-14, उस वर्ष में अरहर का एमएसपी 4300 रुपये था। अभी हमने खरीफ फसल में इसे बढ़ाकर 5450 रुपये अर्थात 1150 रुपये की बढ़ोत्तरी की गयी है। हमारी सरकार आने के बाद हमने 26.74 प्रतिशत बढ़ोत्तरी तूर दाल में की है। इसी प्रकार से मूंग में लगभग 24 प्रतिशत, उड़द में 26 प्रतिशत बढ़ोत्तरी की गयी है और कोकोनट, सनफ्लावर आदि तिलहनों में भी इसी प्रकार बढ़ोत्तरी की गयी है।
महोदया, मूल्य लागत आयोग की जो सिफारिश आती है, उससे भी बढ़ाकर बोनस इसमें दिया गया है और समर्थन मूल्य भी बढ़ाया गया है। इसी तरह से फसल बीमा में ठीक मुआवजा मिलता है, लेकिन जो आपदाएं आती हैं, पहले यह कहा जाता था कि 50 फीसदी नुकसान होने पर किसान को राहत मिलेगी। ...(व्यवधान) हमारे प्रधानमंत्री जी ने सरकार बनने के बाद तुरंत पहल की और यह प्रावधान किया गया कि अगर 33 प्रतिशत नुकसान हो, तब भी किसान को राहत मिलेगी। इतना ही नहीं, पहले प्रति हेक्टेअर जो राशि मिलती थी, उसे बढ़ाकर डेढ़ गुना करने का काम भी हमारे प्रधानमंत्री जी ने किया। इसी तरह से आप देखेंगे कि जो राष्ट्रीय आपदा कोष है, इससे राज्यों को पैसा जाता है। एक राज्य आपदा कोष होता है, जिसमें राज्यों को पैसा दिया जाता है और पांच वर्ष का आवंटन जाता है। हमारी सरकार बनने से पहले पांच वर्ष का आवंटन 33,000 करोड़ रुपये था और मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राज्य आपदा कोष की राशि को बढ़ाकर 61,000 करोड़ रुपये किया गया। इसके बाद भी यदि राज्य में गंभीर आपदा आती है, राज्य की ओर से प्रस्ताव आता है तो उस परिस्थिति में, हमारी सरकार बनने से पहले, वर्ष 2011 से 2014 तक के तीन वर्षों में राज्यों ने मांग की कि हमारे यहां बड़ी आपदा आई है, केन्द्र सरकार हमारी मदद करे, ऐसी मांग की तुलना में केवल 9,099 करोड़ रुपये दिए गए। मोदी सरकार आने के बाद पिछले तीन वर्षों में हमने 29,000 करोड़ रुपये दिए हैं।
इसी तरह से अभी माननीय सदस्य किसानों द्वारा आत्महत्या की चर्चा कर रहे थे। आत्महत्या किसी की भी हो, वह दुखद है। ऐसी एक भी घटना हो, वह दुखद है। जब वर्ष 2002 में सूखा पड़ा था, वर्ष 2001 की तुलना में इनकी संख्या 16.3 प्रतिशत बढ़ी थी। जब वर्ष 2009 में सूखा पड़ा था, तब वर्ष 2008 की तुलना में इसमें 13.7 प्रतिशत वृद्धि हुई थी। यह भी दुःखद है। वर्ष 2014-15 में सूखा पड़ा था तो यह आठ प्रतिशत की तुलना में नौ प्रतिशत बढ़ा। वर्ष 2016 में वर्ष 2015 के आंकड़े थे, जिसकी सभी चर्चा कर रहे थे, लेकिन हमने कल ही अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से आंकड़ा लिया है, जो अब पब्लिश होगा, यह वर्ष 2016 का आंकड़ा है, वह एक साल बाद आता है। वर्ष 2015 में यह 12,602 था और वर्ष 2016 का आंकड़े 11,458 है, इसके कई कारण हैं। निश्चित रूप से आत्महत्या चिंता का विषय है और इसके लिए हमारी सरकार पूरी ताकत के साथ लगी हुई है, इसका उपाय सिर्फ और सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ाना है। इस दिशा में इन तीन वर्षों से जो काम किया जा रहा है, यदि यह पहले किया गया होता तो आज किसानों की यह स्थिति नहीं होती। यह करतब कोई दिखाता है, हमने तीन वर्षों में जो किया है, हम यह भी बताना चाहेंगे कि पहले इनका बजट कम होता था, हमारा बजट ज्यादा हो रहा है। इनका जो बजट होता था, वे साल में उतना खर्च नहीं करते थे। वर्ष 2011-12 में इनका बजट 24,000 करोड़ रुपये का था और इन्होंने 23,000 करोड़ रुपया खर्च किया। वर्ष 2012-13 में इनका बजट 28,000 करोड़ रुपये का था और इन्होंने 24,000 करोड़ रुपया खर्च किया। वर्ष 2013-14 में इनका बजट 30,000 करोड़ रुपये का था और इन्होंने 25,000 करोड़ रुपया खर्च किया। हमारा वर्ष 2016-17 का बजट 45,000 करोड़ रुपये का था लेकिन प्रधानमंत्री जी के मॉनिटरिंग के कारण और मैं खुद 29 राज्यों में गया हूं, राज्यों के साथ बैठक की है, उसका परिणाम यह हुआ है कि वर्ष 2016-17 में खर्चा 57,000 करोड़ रुपया हुआ है। इसी तरह से वर्ष 2010-2011 से वर्ष 2013-2014 तक तीन वर्षों का इनका कृषि का बजट 1,04,000 करोड़ रुपये का था और हमारी सरकार का तीन साल का बजट 1,64,415 करोड़ रुपया है। हम पूरी ताकत के साथ, प्रतिबद्धता के साथ किसानों की आमदनी बढ़ाने में लगे हैं।
इंटीग्रेटेड फार्मिंग की क्या कोई योजना थी, आज ढ़ाई लाख किसान इस काम को कर रहे हैं, इन तीन वर्षों के अंदर रेन फेड एरिया डेवेलपमेंट चलाया है ताकि किसानों की आमदनी बढ़े, इसमें ढ़ाई लाख किसान लगे हैं। जितने कृषि विज्ञान संस्थान हैं, जितने यूनिवर्सिटीज हैं, आईसीएआर के संस्थान हैं, वहां उसके मॉडल बनाये जा रहे हैं। मोदी सरकार के आने के बाद हमने राज्यों को रेन फेड एरिया डेवेलप करने के लिए जो पैसा दिया है तो इंटीग्रेटेड फार्मिंग योजना के तहत लगभग ढ़ाई लाख किसानों की आमदनी बढ़ रही है, हम पूरी ताकत के साथ इस प्रयास में लगे हैं और किसान इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अब वे इसको रोकना चाहते हैं। अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए, उनके कर्तव्य उजागर न हो, इसके लिए प्रयास बहुत कर रहे हैं, लेकिन देश के किसान जिसको मान रहे हैं, देश का प्रधानमंत्री एक ऐसा व्यक्ति बना है, जिनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित है। इन लोगों ने देश के लिए नारे बहुत लगाये लेकिन ...* देश का पहला ऐसा व्यक्ति प्रधानमंत्री है, जिनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित है। वह जगते हैं या सोते हैं तो वह केवल राष्ट्र की चिंता करते हैं, राष्ट्र के किसानों की चिंता करते हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री से मीडिया ने उस दिन पूछा तो उन्होंने क्या कहा था कि हमारी सरकार गांव, गरीब और किसानों के लिए समर्पित है और फिर उन्होंने दोबारा दोहराया था कि मैं अपने लोगों के लिए प्रधानमंत्री नहीं बना हूं, मैं देश के गांव, गरीबों और किसानों के लिए प्रधानमंत्री बना हूं।
आजादी के बाद जितना बड़ा निवेश कृषि, गांव और गरीबों के लिए किया गया है, उतना बड़ा बजटीय आवंटन आज तक नहीं हुआ है। किसान पूरी उम्मीद के साथ लगा हुआ है और हम भी विश्वास दिलाना चाहते हैं कि देश के किसानों को एक समर्पित व्यक्ति मिला है, आपकी चिंता है, हम इस दिशा में काम कर रहे हैं। वर्ष 2022 आते-आते, हमने वर्ष 2017 से वर्ष 2019-2020 तक के लिए रोड मैप भी बनाया है, जिसका सिर्फ प्रधानमंत्री जी योजना नहीं बनाते हैं, उसकी वह मॉनिटरिंग भी करते हैं, क्रियान्वयन भी देखते हैं और फसल बीमा या कृषि बाजार के अंदर जितनी विसंगतियां हैं, मेरी नजर से लेकर प्रधानमंत्री जी की नजर में है और लगातार उन विसंगतियों को दूर करने को दूर कर रहे हैं। एक वर्ष पहले इन योजनओं को लाया गया है तो बदलाव के समय थोड़ी-बहुत विसंगतियां उजागर होंगी, उसका समाधान करेंगे और निश्चित रूप से वर्ष 2022 तक यदि आमदनी दोगुनी नहीं की, तब हमें कटघरे में खड़ा करें, आज वे कटघरे में खड़े हैं। ऐसे करतब दिखाये हैं कि आज देश समस्याओं के जाल में फंसा हुआ है, उस जाल से देश को निकालने के लिए हमारे प्रधानमंत्री जी पूरी प्रतिबद्धता के साथ प्रयास कर रहे हैं।
मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं कि इस अवसर पर आपने मुझे बोलने का मौका दिया है।
HON. SPEAKER: The House stands adjourned to meet again on Thursday, the 20th July, at 11.a.m. 22.21 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Thursday, July 20, 2017/Ashadha 29, 1939 (Saka).
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