Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Constitution ... on 5 August, 2011
> Title: Further discussion on the motion for consideration of the Constitution (Amendment) Bill, 2009 (Insertion of New Articles 275a and 371j) moved by Prof. Ranjan Prasad Yadav on the 11th March, 2011 (Discussion not concluded).
MADAM CHAIRMAN : The House will now take up item No. 28. Prof. Ranjan Prasad Yadav may continue now.
प्रो. रंजन प्रसाद यादव (पाटलिपुत्र):सभापति महोदया, मैं आपकी अनुमति से अपने विघेयक पर अपनी बात आगे रखना चाहूंगा। पिछले सत्र में मैंने संक्षिप्त रूप में बिहार के विभाजन के परिणामस्वरूप राज्य को जो क्षति हुई है, इसके बारे में सदन को अवगत कराया था। यों तो बिहार आर्थिक रूप से हमेशा से पीछे रहा है, परन्तु सन् 2000 में, जब बिहार का विभाजन हुआ, उसके बाद बिहार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई।
मैं बताना चाहूंगा कि बिहार जब 54 जिलों का बिहार था तो उसका एरिया लगभग 1,79 स्क्वायर वर्ग किलोमीटर था। जब सन् 2000 में बिहार दो भागों में बंट गया तो 18 जिलों के बिहार से झारखण्ड नाम के राज्य का निर्माण हुआ। उसमें लगभग पूरे एरिया का 46 परसेंट एरिया उन 18 जिलों में झारखण्ड 15.43 hrs. (Shri Satpal Maharaj in the Chair) राज्य में चला गया और लगभग 54 परसेंट जो 38 जिलों का बिहार बचा, उसमें गया। उन 18 जिलों में, जिनका एरिया 46 परसेंट है, उसमें लगभग 1.5 करोड़ लोग गये। जब बिहार एक था तो बिहार की जनसंख्या लगभग 10.5 करोड़ थी और बिहार बंटने के बाद जो 18 जिलों के झारखण्ड राज्य का निर्माण हुआ, जहां उनका एरिया लगभग 46 परसेंट बचा, उसमें लगभग 1.5 करोड़ लोग उधर गये और जो 38 जिलों का लगभग 54 परसेंट एरिया बचा, उसमें लगभग 9 करोड़ जनसंख्या बची। हालात यह हुए कि उन 18 जिलों में देश में जितनी खनिज सम्पदा है, उसका 40 परसेंट आयरन ओर, कॉपर ओर, बॉक्साइट, ग्रेफाइट, लाइमस्टोन, माइका और यूरेनियम, इसका लगभग 99 परसेंट उन 18 जिलों में चला गया और जो फोरैस्ट था, वह भी लगभग 99 परसेंट उधर चला गया, जिसके कारण जो 54 जिलों का राजस्व आता था, जब बिहार एक था तो 100 रुपये में से 70 रुपये उन 18 जिलों से आता था और लगभग 30 रुपये, जो 38 जिलों का राज्य बचा, यहां से आता है।
बिहार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई और जो 38 जिलों का बिहार बचा, उसमें जो 38 जिले बचे, उनकी भोगौलिक स्थिति यह रही कि बिहार में लगभग 13 बड़ी-बड़ी नदियां घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला बलान, कोसी, महानन्दा, सोन, पुनपुन, क्यूल, चांदन और गंगा, इसके कारण बिहार के हालात यह हुए कि जो बिहार बचा, उसमें 70 परसेंट इन 13 नदियों के कारण फ्लड प्रोन एरिया रहा और जो लगभग 70 परसेंट बचा, उसमें 27 परसेंट ड्राउट प्रोन एरिया बचा। हालात इतने बुरे हो गये कि अब वहां का विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि सैण्ट्रल गवर्नमेंट बिहार को स्पेशल पैकेज नहीं देती। इसलिए मैं विभाजन से सम्बन्धित इन बातों को सदन के समक्ष इस कारण रख रहा हूं कि इन बातों को मैंने दूसरे सदन में उस समय रखा था, जब सदन बिहार का विभाजन करने वाले विधेयक पर विचार कर रहा था।
उसी समय मैंने यह मांग की थी कि लगभग 1 लाख 79 हजार करोड़ रूपए का आर्थिक पैकेज देने की घोषणा की जाए और बिहार के ऊपर लगभग 31 हजार करोड़ रूपए का जो कर्ज है, उसे माफ किया जाए। बिहार सरकार के दो हजार करोड़ रूपए प्रतिवर्ष केवल सूद के रूप में चले जाते हैं। बहुत से मेरे रखे तथ्यों को स्वीकार करते समय उस समय की सरकार के गृहमंत्री ने सरकार की तरफ से यह आश्वासन दिया था कि बिहार की आर्थिक जरूरतों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। यह भी घोषणा की गयी कि सरकार ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष के नियंत्रण में एक सेल की स्थापना की है जो सिर्फ बिहार के विकास संबंधी मामलों को देखेगी। उस समय सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी कि राज्य में कोर इफ्रास्ट्रक्चर के विकास को सुनिश्चित किया जाएगा। उस समय सदन में विपक्ष के नेता माननीय मनमोहन सिंह जी ने भी तत्कालीन गृहमंत्री एल. के. आडवाणी जी के वक्तव्य से सहमति जतायी थी और गृहमंत्री से यह आश्वासन भी मांगा था कि बिहार राज्य के विकास के लिए विशेष व्यवस्था की जाए। मैं प्रधानमंत्री से यह उम्मीद करता हूं कि उन्हें दस वर्ष पहले कही गयी अपनी बात याद होगी और वे बिहार के विकास के लिए कोई विशेष पैकेज की व्यवस्था करने का निर्देश देंगे।
महोदय, राज्य के विभाजन के दस वर्ष से भी ज्यादा गुजर गए हैं। मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है और यह समझा जा सकता है कि केंद्र सरकार बिहार सहायता के प्रति कितनी गंभीर है। 25 फरवरी, 2011 को वित्तमंत्री प्रणव दादा ने लोकसभा में आर्थिक समीक्षा पेश करते हुए कहा था कि विकास की रफ्तार में बिहार दूसरे नंबर पर है।
महोदय, मैं जो संविधान संशोधन विधेयक सदन के समक्ष विचार करने के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं। यह विधेयक अत्यंत गहन विचार-विमर्श के बाद लाया गया है। बिहार का विकास सिर्फ उस राज्य का ही नहीं, बल्कि पूरे देश की भी आवश्यकता है। इसलिए मैं बताना चाहता हूं कि हमने दस वर्ष इंतजार कर लिया और अब ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार की कथनी और करनी में अंतर है।
महोदय, सीमित संसाधनों के बावजूद राज्य ने विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं। आज बिहार आर्थिक प्रगति के रास्ते पर मजबूती से चल रहा है। बिहार सरकार द्वारा विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों को और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए मेरा अपने विधेयक के माध्यम से यह प्रस्ताव है कि बिहार राज्य के विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, रोजगार के अवसरों का सृजन, बाढ़ और सूखा से प्रभावित रहने वाले क्षेत्रों में राहत एवं पुनर्वास कार्य इत्यादि में उपयोग करने के लिए भारत की संचित निधि को बिहार को एकमुश्त सहायता अनुदान के रूप में प्रतिवर्ष तीस हजार करोड़ रूपए दिए जाएं। इस विधेयक में यह भी कहा गया है कि यह राशि बिहार राज्य को वित्त आयोग द्वारा दिए गए वार्षिक आबंटन और भारत सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली अन्य वित्तीय सहायताओं के अतिरिक्त होगी।
महोदय, ऐसा नहीं है कि मैंने अपने विधेयक में सिर्फ वित्तीय सहायता की ही बात की है, सिर्फ केंद्र सरकार से पैसे मांगना ही हमारा उद्देश्य नहीं है, हम यह भी चाहते हैं कि इस वित्तीय सहायता को जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। इसके लिए हमने यह भी प्रावधान किया है कि केंद्र सरकार निम्न विकासोन्मुखी कार्यक्रमों के लिए उपबंध कर सकेगी।
पहला राज्य के विकास के हेतु दीर्घकालीन योजनाओं का कार्यान्वयन, दूसरा पड़ोसी देशों से आने वाली नदियों में होने वाली बाढ़ का नियंत्रण, तीसरा राज्य के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति और सिंचाई के लिए एक समेकित योजना, चौथा इफ्रास्ट्रक्चर यानी सड़क, राजमार्ग, विद्युत, उद्योग, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों के विकास के लिए योजनाएं और पांचवां सरकारी एवं निजी क्षेत्र की सेवाओं मे रोजगार के लिए तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा अन्य कल्याणकारी योजनाएं।
महोदय, सर्वप्रथम इस राज्य को औद्योगिक विकास की जरूरत है। यहां कृषि आधारित उद्योगों के लिए काफी संभावनाएं हैं। बिहार बिजली के क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है। बिहार की वर्तमान विद्युत स्थापित क्षमता मात्र 586 मेगावाट है जो देश की कुल स्थापित क्षमता का मात्र 0.4 प्रतिशत है, जबकि इस राज्य में पूरे देश की जनसंख्या का 8.15 प्रतिशत आबादी है। राज्य के थर्मल पावर स्टेशनों में विद्युत उत्पादन नहीं हो पा रहा है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आज हम पूर तरह से केन्द्र सरकार पर निर्भर हैं। केन्द्र सरकार द्वारा बिहार को विशेष आर्थिक पैकेज दिया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र इस सरलीकृत कर प्रणाली से इतना प्रभावित हुआ कि उसने बिहार को 30,000 हजार डालर दे कर पुरस्कृत किया। सरलीकृत कर प्रणाली का अनुकरण कर श्रीलंका, अफ्रीकी देशों और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किया जा रहा है।
विश्व बैंक ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि देश में दिल्ली के बाद पटना दूसरा स्थान है जो व्यवसाय शुरू करने के लिए सबसे अच्छा है।
वर्तमान राज्य सरकार का मूलमंत्र है सुशासन के माध्यम से राज्य का सर्वांगीण विकास। राज्य सरकार ने अपने सीमित संसाधनों से राज्य को विकास दर में देश में दूसरे नम्बर पर पहुंचा दिया है। यह अभी शुरूआत है। विकास की यात्रा काफी लंबी है लेकिन बिना विशेष केन्द्रीय आर्थिक सहायता के यह संभव नही है।
महोदय, बिहार में निवेश के लिए उद्यमी आना चाहते हैं। लेकिन मैं यह बताना चाहूंगा कि बिहार की आर्थिक विकास में तेजी उस दशा में आ सकती है जब यहां की आधारभूत संरचना का विकास हो सके।
मैं यह जानता हूँ कि इन सब कार्यों को रातों-रात पूरा नहीं किया जा सकता है। इसके लिए राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को मिल कर प्रयास करने की जरूरत है। मैं इस सदन को बताना चाहता हूं और यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि राज्य सरकार की पूरी प्रतिबद्धता है। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि केन्द्र सरकार मजबूती से राज्य सरकार के पीछे खड़ी हो जाए और हर तरह से उसका साथ दे। अभी-अभी समाचार पत्रों की खबरों के मुताबिक भारत सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार को, जिसे अभी एक महीना भी नहीं हुआ है, 20,000 करोड़ रुपये का स्पेशल पैकेज देने का काम किया है। हम चाहेंगे कि भेदभाव न बरता जाए और बिहार को भी, जो यहां हालात हैं उसमें स्पेशल पैकेज तुरन्त दिया जाए। मैं जानता हूं कि बिना सत्ता पक्ष के समर्थन के मेरा विधेयक पास नहीं हो सकता। लेकिन मैं यहां सदन में सिर्फ अपनी पार्टी - जनता दल (यूनाइटेड) की तारफ से नहीं बोल रहा हूं बल्कि मैं राज्य के प्रतिनिधि और राष्ट्र के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर भी खड़ा हूं। बिहार का समग्र विकास किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। यदि बिहार का विकास होता है तो इससे पूरे देश को लाभ है।
इसलिए मैं हर दल और प्रत्येक माननीय सांसद से यह अनुरोध करता हूं कि मेरे विधेयक को पढ़ें और इस पर अपनी राय सदन में व्यक्त करें। यह कोई आवश्यक नहीं है कि सिर्फ बिहार के सांसद इस पर बोलें। मैं सभी राज्यों और सभी दलों के माननीय सांसदों से अनुरोध करूंगा कि वे मेरे विधेयक पर अपने विचार संसद में व्यक्त करें और अपना समर्थन दें। यदि सभी दलों का समर्थन है तो हम इस विधेयक को पास भी करा सकते हैं।
महोदय, आपने मुझे अपनी बात विस्तारपूर्वक कहने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूं और इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना विधेयक सदन के समक्ष विचारर्थ प्रस्तुत करता हूं।
MR. CHAIRMAN: Motion moved:
“That the Bill further to amend the Constitution of India , be taken into consideration.” श्री अधीर चौधरी (बहरामपुर):सभापति महोदय, प्रो. रंजन प्रसाद यादव जो कौन्सटीटय़ूशन (अमैंडमैंट) बिल, 2009 लाए हैं, मैं इनकी भावनाओं का बहुत सम्मान करता हूं। हम सब जानते हैं कि बिहार वर्ष 2000 में बाइफरकेट हो गया और बिहार से झारखंड राज्य का जन्म हुआ। मैं बगल वाले सूबे बंगाल से आता हूं। इस बात की सबको जानकारी है कि बंगाल में 34 साल तक वामपंथियों की सरकार रही। इसके चलते बंगाल की आर्थिक स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि उसे हर साल 15 हजार करोड़ रुपये सिर्फ उधार के बोझ के ब्याज के जरिए देने पड़ते हैं। अभी बंगाल सरकार के ऊपर 2 लाख 10 हजार करोड़ रुपये उधार का बोझ है। बंगाल सरकार को हर साल 15 हजार करोड़ रुपये उसका ब्याज देना पड़ता है। इसलिए हम चाहते हैं कि बंगाल के लिए भी कोई स्पैशल पैकेज दिया जाए। हां, यह सही है कि बिहार बाइफरकेट हुआ है, इसलिए उसकी डिमांड थोड़ी अलग है और बंगाल की डिमांड अलग है। लेकिन मैं आर्थिक स्थिति को मद्देनज़र रखते हुए कहना चाहता हूं कि बिहार के साथ-साथ बंगाल की आर्थिक स्थिति भी उतनी ही गंभीर है। हम सब बिहार का आदर करते हैं क्योंकि बिहार हिन्दुस्तान में ऐसी जगह है जिसे cradle of civilisation कहा जाता है।
Bihar is recognized as the cradle of civilization. You will be astonished to note that the first republic in our country, named after Lichavi, came into existence in Bihar. Etymologically it is called abode. Bihar is the abode of spiritual wisdom. Bihar is the abode of intellectual exercises. It had witnessed the vicissitudes of great empires. The Magadha Empire was established in this land. Sir, Bihar is not only an ancient region of our country but also a place where two most popular religions were born: one, Jainism and the other Buddhism. A number of eminent persons, male and female, were born in Bihar. It is the land of the Buddha, Mahavira, Aryabhatta, Chanakya, Valmiki, Viswamitra, Patanjali and Gargi. In the medieval period also, Bihar was known for Sher Shah, Guru Gobind Singh.
Over the years and especially in the wake of bifurcation of Bihar, the demand for a special package has often been raised by various forums.
16.00 hrs. A PIL for the grant of special status to Bihar was filed in the Patna High Court. As a Respondent, the Union Government stated that Bihar does not fit the bill for the grant of special package. The reasons were cited for not allowing Bihar as a State for obtaining special package – geographical isolation, inaccessible terrain, poor resource base, remoteness to larger market and poor infrastructure. These are the parameters which are required before offering any State a status of special package.
In India, the States have been divided between special category and non-special category. It is true that after bifurcation of Bihar, it has lost a great deal of its resources. The division of Bihar only gave debt and disaster. Actually, Bihar was bequeathed upon by debt and disaster in the wake of bifurcation because all the mineral-rich areas that once belonged to the State of Bihar were left to Jharkhand. Naturally, the revenue earning capacity of Bihar got dwindled and the situation was further aggravated by the recurring floods. The devastating floods in Kosi is still haunting our memory. River Kosi consists of the catchment area in Himalaya and even Kanchanjunga. Every year, Bihar has been the victim of discharging the water through Kosi, which even turned into a flowing sea, destroying everything in its trail and thus led Bihar pauperised. Therefore, both north Bihar and South Bihar are the victims of flood because in South Bihar it is destined to discharge the water into River Ganges. So, Bihar is such a State which is very much prone to floods. More than 73 per cent of area in Bihar is prone to floods. Large chunk of Bihar also is prone to drought. So, Bihar is destined to be invaded by floods on the one hand, and by drought, on the other hand.
It is ironical to note that after bifurcation, three-fourth of the assets went to Jharkhand but three-fourth of the liability went to Bihar.
Sir, 46 per cent of land area went to Jharkhand whereas 3/4th of the population of the former State remained with Bihar.
Sir, actually, the entire eastern region, after the permanent settlement brought about by Cornwallis in the year 1793, over the centuries, has been the victim of primitive capital accumulation without generating any productive assets and still that colonial hang over has been bearing upon the State of Bihar, Bengal and even Orissa.
Sir, in so far as the National Human Development Report is concerned, the report was prepared by the Planning Commission in the year 2001 which says that Bihar is at the lowest position among major States in India. Today, when the hon. Member from Bihar Shri Jagadanand Singh put a question to the hon. Minister Shri Sushil Kumar Shinde in regard to power, we came to know the dismal power situation in Bihar. This is because all the power generation centres, which earlier belonged to Bihar, have now been shifted to Jharkhand. Therefore, Bihar is compelled to depend upon the Central power sector to have power in Bihar.
Bihar has the weakest infrastructural base among all major States in India even worse than some of the Special Category States. It has the lowest road density in the country with 100 kms. per lakh population which is lower than the Special Category States because most of the major road networks have now gone to the State of Jharkhand.
The problem is, India is a country which is following the norm of federal structure. We have the Union List, State List, and Concurrent List and for the devolution of finances we have to follow some specific norms. Here, if we go by the precedents, we will find that prior to the Fourth Five Year Plan, the allocation of Central Assistance to States was based upon the schematic pattern. There was no definite formula for allocation prior to the Fourth Five Year Plan. But in view of the general demand for an objective and transparent formula for allocation of Central Assistance to States, a formula, which is known to us as Gadgil Formula, was devised in the year 1969 and since then up to the Fifth Five Year Plan, the Gadgil Formula was set in motion and it was continuing, after some modification, up to 1980. The modified formula became the basis for allocation of Central Assistance to States in the Sixth and Seventh Five Year Plans. That formula was again revised in the year 1990 which formed the basis for allocation of Central Assistance for the year 1991-92 only. Following representation, the formula was further revised in the year 1991 and a new formula called Gadgil-Mukherjee Formula came into existence.
It has been in operation since the Eighth Five Year Plan. However for comparison purposes all the four formulae, with criteria and weight, in respect of distribution among States are also prescribed. So, the problem is that we have been entangled by the various criteria that were devised for the allocation of fund to various States of our country. But the fact is that bifurcation of Bihar had cost a lot to the people of Bihar.
Sir, in Bihar, as I have already stated and I may again refer, the rural road density is as merely as 36.75 kms. per lakh population as against the all India average of 141.34 kms. In case of Railway infrastructure, Bihar is the weakest; it has 4.15 kms. per lakh population, while Gujarat has 7.34 kms. per lakh population. In Bihar, only 40 per cent to 45 per cent people have access of public telephone facilities. About 47 per cent villages in Bihar have no electricity.
Post-bifurcation, Bihar had got only the wealth of soil and water. As far as water is concerned, Bihar does not have the requisite financial capacity to channelise the water resources so as to optimally utilise the water wealth. So far as soil is concerned, Bihar basically is a State of agrarian economy where primarily villagers are earning their livelihood by subsistence farming. This is the problem. Bihar has a 700 kms. of international border. Naturally, we have to look into the plight of Bihar in a more cordial way.
Sir, I would simply give you an example to ascertain the loss of Central funds being incurred upon Bihar. The Union Government has been providing food subsidy to all the States of our country. But the fact is that three-fourth of rice and more than 80 per cent of wheat purchased by Food Corporation of India are from relatively well off States, like Haryana, Punjab and Andhra Pradesh. Haryana and Punjab are called the rice bowl of our country.
I am not envious upon any State, but the reality is that those are the States which are getting the benefit of food subsidy.
Those States are giving us three-fourth of rice and 80 per cent of wheat through FCI, even though these States produce only one-fourth of India’s rice and about one-third of India’s wheat. Punjab and Haryana together account for 67 per cent of the subsidy and receive more in FCI subsidy than they do through the formal transfer system.
The annual loss of Bihar in this transfer could be more iniquitous for its huge agrarian base. About 11 per cent of State’s population inhabit in urban areas. That means nearly 90 per cent population of Bihar lives in rural areas. While productive capacity of its farmers is severely crippled by poor infrastructure base, a huge volume of Central funds annually by-passes them in favour of States having stronger infrastructural base and richer agrarian economy. As Punjab, Haryana and Andhra Pradesh are rich in infrastructure so they are deriving the large chunk of food subsidy, whereas in the case of Bihar, it has been deprived because it does not have the requisite infrastructural facilities to raise the productivity of the farming community.
It is estimated that in the two years, that is, 2002-03 and 2003-04 a sum of Rs.23,196 crore of Central revenue has by-passed the farmers of Bihar in favour of rich farmers of other States. That is why सर, मैंने पहले ही कहा था कि उनकी भावनाओं का मैं काफी सम्मान करता हूं और चाहता हूं कि बिहार को ज्यादा मदद की जाए। उन्हें जो भी मुआवजे दिये जा सकते हैं दिये जाएं। हमारे फैडरल स्ट्रक्चर का जो सिलसिला जारी है, इसमें हमें बदलाव लाना पड़ेगा क्योंकि बहुत सारे राज्य हिंदुस्तान में ऐसे हैं जहां प्रगति हुई है तथा बहुत सारे राज्यों में प्रगति नहीं हुई है। इसलिए एक रीज़नल असंतुलन पैदा हो रहा है, जिसे दूर करने के लिए हमें कप्रीहैंसिव तरीके से सोचना पड़ेगा।
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी): माननीय सभापति जी, श्री अधीर रंजन चौधरी जी को मैं हृदय से धन्यवाद देना चाहूंगा। उन्होंने बिहार के बारे में विस्तार के साथ सभी बिंदुओं को सदन के सामने और देश के सामने रखा है। उन्होंने आंकड़ों के साथ, कागज और तथ्यों के साथ, जो विशलेषण किया है, इसके लिए बिहार के लोग आपके अनुगृहीत रहेंगे। माननीय रंजन प्रसाद यादव जी विद्वान हैं, प्राध्यापक हैं, अध्ययनशील हैं, उन्होंने काफी आंकड़ों और तर्कों के साथ अपनी बात को रखा है, जो सदन के सामने अभिलेख में है और वह बिहार के लोगों के लिए एक मार्ग-दर्शक सिद्धांत के रूप में रहेगा।
महोदय, मैं बिहार के उस क्षेत्र का हूं, जहां नदियों के जाल हैं, कोसी, कमला, गंडक, भूतही, बालान, लखनदेई और अधवारा समूह -ये सभी नदियों के ऐसे जाल हैं कि हम उस जाल के बीच में फंसे रहते हैं। आपने संसार में सड़कें देखी होंगी लेकिन पानी पर तैरने वाली सड़क आपने कहीं नहीं देखी होगी। आप बाढ़ के समय में बिहार जाएंगे तो हमारी सड़कें ऐसी लगेंगी जैसे पानी पर तैर रही हों। ऐसे दिखाई पड़ी। जब हम चलते थे, छात्र जीवन में तो पढ़ने के लिए अपने गांव से दूर मिडिल स्कूल में जाते थे, बरसात के समय में, जब कभी साइकिल से जाते थे, तो कब साइकिल मेरे कन्धे पर चढ़ती थी और कब हम साइकिल पर चढ़ते थे, इसकी गिनती नहीं कर सकते थे क्योंकि जब कीचड़ आ जाए, पानी आ जाए, तो साइकिल को कन्धे पर लेते थे और जब सूखी सड़क आ जाए, तो साइकिल पर हम चढ़ते थे। उस कोसी, कमला और गंडक के बीच में, उस बाढ़ की विभीषिका में, जब हम 15 दिन, महीने भर पेड़ की डाली पर बैठे रहते हैं और घुटने भर पानी में हमारी औरतें जब शौच करती हैं, तो उस दर्द का एहसास उसी को होगा, जो उस स्थिति में जीवन गुजारता होगा। ऐसी परिस्थिति है। उससे निकलने के लिए प्रयास भी किए गए। युग-युग से मेरे पूर्वज, हम सभी बैठते हैं और आज तक भोर के समय गांव के किसान लोग परमात्मा की जो पराती गाते हैं, मैं भी गाता था जब मैं गांव का प्रधान था और विधायक था। आज भी कभी-कभी गा लेता हूं। वह पराती जो हम लोग आज तक गाते रहे हैं, उसमें हम यही गाते हैं, यह हमारी मैथिली में है, इसे मैं वैसे ही सुना दूंगा :
“कखन हरब दुख मोर, हे भोला बाबा, कखन हरब दुख मोर। दुख ही जनम भेल दुख ही गमाउल, सुख सपनेहु नाहि भेल। हे, भोला बाबा, कखन हरब दुख मोर। ” युगों से हम इसे गाते आ रहे हैं, लेकिन न जाने भोला बाबा कहां चले गए, जो युग-युगांतर से मेरे पूर्वजों और हमसे यह गीत सुनते चले आ रहे हैं, लेकिन मेरा दुख अब तक दूर नहीं हुआ है। प्रयास हो रहे हैं, मैं यह नहीं कहूंगा कि प्रयास नहीं हुए हैं, यह नकारात्मक चिंतन है। सरकार किसी की भी रही हो, चाहे कांग्रेस की रही या किसी की रही, लेकिन विकास करने की या उस दुख को दूर करने की जो दृष्टि थी, दिशा थी, वह गलत रही। पिछले छह साल से हम दृष्टि और दिशा के साथ कुछ संकल्प की तरफ बढ़े हैं। जब हमारी दृष्टि सही है, दिशा सही है, संकल्प है, प्रतिबद्धता है और हम पूर्ण निष्ठा के साथ बिहार को खड़ा करके भारत के किसी विकसित राज्य से बढ़ा कर आगे ले जाने का संकल्प ले कर चले हैं और वहां की सरकार, वहां के मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री सब मिल कर प्रयत्नशील हैं, वहां की राजनीति में लगे लोग, प्रशासन के लोग सभी एक सूत्र से प्रयत्नशील हैं, तो उस समय केंद्र सरकार का हमें सहयोग मिल जाए, तो वह हमारे लिए वैसे ही कारगर होगा, जैसे खंभे हैं, तार हैं, ट्रंसफार्मर हैं, लेकिन उसमें अगर बिजली ही नहीं होगी, तो इन सारी चीजों का क्या करेंगे। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में सभी चीजें हैं, लेकिन लाइन नहीं है, बिजली नहीं है और केंद्र सरकार कहती है कि बिजली देने का काम राज्य सरकार का है, तो हम बिजली कहां से लाएं? बिजली एक-दो दिन में नहीं आ सकती है। हम खेत में बिजली पैदा नहीं कर सकते हैं, हम पम्पिंग सैट लगा कर बिजली नहीं निकाल सकते हैं। बिजली पैदा करने के लिए जो पैसा चाहिए, साधन चाहिए, कोयला चाहिए, गैस चाहिए या तेल चाहिए, इन्हीं चीजों से बिजली पैदा होगी। क्या ये सभी साधन हमारे पास हैं? न कोयला है, न तेल है, न गैस है बल्कि इन सभी चीजों के लिए हम केंद्र पर आश्रित हैं। बिजली पैदा न करें और कह दिया जाए कि बिहार ने बिजली क्यों नहीं पैदा की है, तो यह ऐसे ही कहना होगा जैसे किसी आदमी का लीवर खराब है और उससे कहा जाए कि तुमने अपनी तंदुरुस्ती के लिए एक लीटर दूध रोज क्यों नहीं पिया।
जिसका लिवर खराब है, वह एक लीटर दूध पी जाए और जल्दी मर जाए। हमारे पास साधन नहीं हैं। आपसे साधन मांगते हैं। बिजली के थर्मल स्टेशन का शिलान्यास भी बाढ़ में किया गया और बनाने की योजना भी पड़ी हुई है। जार्ज फर्नान्डीज की कृपा है कि 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार में वह मंत्री बने थे तो काँटी में उन्होंने एक थर्मल स्टेशन बनवाया था और जार्ज फर्नान्डीज जो महाराष्ट्र के हैं लेकिन जब वह केन्द्र में मंत्री बने तो उन्होंने ईमानदारी के साथ बिहार को हर चीज देने का प्रयास किया। वह जिस भी क्षेत्र में गये, उन्होंने वहां काफी कुछ दिया। उन्हें लोग याद रखेंगे। इस पर चिंतन करने की बात है। 1,25,000 करोड़ के आसपास रंजन जी मांग रहे हैं। सरकार के लिए 1,25,000 करोड़ कोई ज्यादा नहीं है क्योंकि आज भारतवर्ष के अखबारों को निकाला जाए और सभी राज्यों के घोटालों को निकाला जाए तो इससे दस गुना का रोज अखबार में छपता है। इसलिए आपसे प्रार्थना है कि इस पर आप ध्यान दीजिए।
हमारे राष्ट्रीय राजमार्ग केन्द्र सरकार के हैं। मैं इस सदन में श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी जी को हृदय से धन्यवाद देना चाहूंगा और जिस मिथलांचल के हम हैं, जब तक मिथलांचल की धरती रहेगी, तब तक मिथलांचल के लोग अटल बिहारी वाजपेयी जी के ऋणी रहेंगे। इसलिए राजमार्ग संख्या 101, 102, 103, 104, 105, 106, 107 यानी 750 कि.मी. सड़कें उस सरकार ने उस उत्तर बिहार में मिथरांचल को एक बार में दी और एन.एच-57 जो पश्चिम से पूर्व को जोड़ने वाला राष्ट्रीय महाराजमार्ग है, जो द्वारिका से लेकर कोहिमा तक जाने वाला है, वह बिहार के 6 जिलों के बीच से होकर निकलता है। इससे सभी राजमार्ग जुड़े हुए हैं। नीतिश कुमार जब रेल मंत्री थे तब अटल बिहारी वाजपेयी जी को कोसी में ले जाकर रेल का महासेतु का शिलान्यास किया, जो अब तक अधूरा है। उत्तर बिहार के पूर्व और पश्चिम को जोड़कर ऐसा नक्शा बना जिससे कायाकल्प हो सकता है, लेकिन वहां गड्ढा है।
मैं एक दिन जा रहा था तो मैंने देखा कि एक नौजवान अपनी पत्नी को लेकर सिनेमा देखने जा रहा था। मोटरसाईकिल पर जाते हुए बार-बार पीछे हाथ लगाकर टटोल रहा था। मैंने आगे जाकर रोका कि बार-बार पीछे क्या देख रहा है? तो उसने कहा कि देख रहा हूं कि पत्नी बैठी है या नहीं। क्या आपने सड़क के गड्ढे नहीं देखे हैं? गड्ढे में मोटरसाईकिल गिरती है तो टटोलता हूं कि पत्नी है या किसी गड्ढे में समा तो नहीं गई। ऐसी दुर्गति चलती रही तो आप समझ लीजिए कि चाहे बिहार के नेता कर्पूरी ठाकुर हों, भोला पासवान शास्त्री हों या हुक्मदेव नारायण यादव हो, बिहार के लोगों की जिंदगी की 25 परसेंट आयु सड़क खा गई है क्योंकि सड़क पर जब चलते हैं तो नीचे से लेकर ऊपर तक हड्डियां चरमरा जाती हैं और लगता है कि भारत में कहीं इलाज होगा या नहीं या ऐसे ही हड्डियां छिटक जाएंगी। हम ऐसी सड़कों पर चलते रहें हैं और बिहार सरकार ने अपने पैसों से मरम्मत करा दी। 711.97 करोड़ रुपए की मरम्मत करा दी और हमने उस राजमार्ग के लिए पैसे की मांग की तो केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य के पास निधियों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए इन कार्यों को सरकार की पूर्वानुमति लिए बिना किए जाने के कारण इस धनराशि की प्रतिपूर्ति संभव नहीं हो सकती है। क्या यह इंसाफ है? वहां की सरकार ने अपने पैसों से मरम्मत इसलिए कराई कि ट्रक, बस न उलट जाए, दुर्घटना न हो, आदमी न मरे, 711 करोड़ रुपए केंद्र सरकार देने में कहती है कि इसलिए नहीं देंगे कि बिना हमारे आदेश के खर्च क्यों किया ?
बिहार में अगर किसी गांव में आग लग जाए तो क्या केंद्र सरकार से आदेश लेंगे कि दमकल बुलाएं, आग बुझाएं, पानी डालें, आप खर्च देंगे या नहीं देंगे? आप देखिए कि यह तर्क कितना अन्यायपूर्ण है।
सभापति महोदय, मैं एक बात की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं। बिहार में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में आप देखिए कि हमारे साथ कितना अन्याय हो रहा है। रंजन जी भी मांग कर रहे हैं। यहां सड़कें स्वीकृत हुई, आपने पांच केंद्रीय एजेंसियों को सड़क बनाने के लिए लगाया जबकि इसमें हमारी कोई एजेंसी नहीं थी। प्लानिंग कमीशन ने त्रिपक्षीय समझौता करके पांच एजेंसियों को काम पर लगाया, दिसंबर 2010 तक पूरी की गई स्वीकृत सड़कों की संख्या कुल 3590, दिसंबर 2010 तक पूरी की गई सड़कों की संख्या 1383, सड़कों की कुल लंबाई 18903 किलोमीटर जबकि पूरी की गई 8448 किलोमीटर। यही गतिशीलता थी, क्योंकि पैसा नहीं दिया। सड़कें कब बनी? प्राक्कलन बन गए, अब प्राक्कलन की राशि बढ़ गई। केंद्र सरकार का कहना है कि प्राक्कलन की राशि अब बढ़ गई है इसलिए 2001-02 के प्राक्कलन के आधार पर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का पैसा देंगे, अब प्राक्कलन बढ़ गया है उसका पैसा नहीं देंगे, आप इसका खर्च उठाइए। यह अन्याय नहीं है तो क्या है? अगर बहुत ज्यादा है तो 90 परसेंट राशि आप दीजिए और 10 परसेंट बढ़ी हुई राशि हम देंगे, हम बोझ उठा लेंगे। लेकिन ऐसा हमारे साथ क्यों हो रहा है?
महोदय, आप खेती की बात कह रहे थे, समूचे भारत में मार्जिनल फार्मर 64.77 प्रतिशत हैं और स्माल फार्मर 18.52 प्रतिशत हैं। लेकिन बिहार में मार्जिनल फार्मर 89.64 यानी 90 प्रतिशत और दो हेक्टेयर से ज्यादा जमीन जोतने वाले लघु सीमांत किसान केवल सात परसेंट हैं। आप देखिए कि इतना अंतर है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए। सरकार को यह पैसा इसलिए देना चाहिए क्योंकि सड़क बनानी जरूरी हैं। मैं दो-तीन मिनट और समय लेकर कहना चाहता हूं कि हमारे ऊपर आरोप लगा देते हैं कि बिहार जातिवादी है। मेरे पास लिस्ट है - स्वर्गीय अशोक मेहता, स्वर्गीय आचार्य कृपलानी, स्वर्गीय मधु लिमै, जार्ज फर्नाडिंस, रविन्द्र वर्मा, श्याम सुंदर प्रसाद, युनूस सलीम, शरद यादव, इन्द्र कुमार गुजराल, ये सभी बिहार से एमपी बने। हिन्दुस्तान में ऐसा कोई राज्य है जो अपने को उदारवादी और विकासवादी कहता हो, जिसने अपने प्रदेश से बाहर के इतने लोगों को संसद में भेजा हो, उन्हें चुनाव से जिताकर या राज्यसभा के मार्फत भेजा हो? हमने चुनाव में जिताकर या राज्यसभा के मार्फत भेजा है, सबको भेजा है। यह कहा जाता है कि बिहार में संतुलन नहीं है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि बिहार के लोगों ने मुख्यमंत्री बनाने में कितना संतुलन किया है, उदारता दिखाई है। डॉ. कृष्ण सिंह, पंडित विनोदानंद झा, जगन्नाथ मिश्र, विद्वेश्वरी दूबे, केदारनाथ पांडे, पांच ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। सरदार हरिहर सिंह, चन्द्रशेखर सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिंह, तीन राजपूत मुख्यमंत्री बने। बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, दरोगा प्रसाद राय, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, चार यादव मुख्यमंत्री बने। अब्दुल गफूर, एक अल्पसंख्यक वर्ग से मुख्यमंत्री बने। श्री भोला पासवान शास्त्री, अनुसूचित जाति के एक शाखा के मुख्यमंत्री बने। श्री रामसुंदर दास अनुसूचित जाति के दूसरी शाखा के मुख्यमंत्री बने। कर्पुरी ठाकुर, अति पिछड़े वर्ग के थे जो मुख्यमंत्री बने। हमें इन पर गर्व है कि ये सबसे कम संख्या वाले अति पिछड़े वर्ग के थे और सबसे ज्यादा दिन तक बिहार में जन नेता के रूप में रहे। कृष्ण वल्लभ जी, कायस्थ थे, मुख्यमंत्री बने। सतीश प्रसाद कुशवाहा मुख्यमंत्री बने। नीतिश कुमार जी जाति के हिसाब से कुरमी हैं, अब मुख्यमंत्री हैं। हमारे ऊपर आरोप लगाए जाते हैं। बिहार ने अपनी प्रतिभा, योग्यता, क्षमता, दक्षता, उदारता और महानता से संपूर्ण विश्व और भारत को प्रतिभावान व्यक्ति दिए हैं। केंद्र सरकार की उपेक्षा के कारण हमारे ऊपर अन्याय हुआ, अत्याचार हुआ, शोषण हुआ। यह केवल हमारा ही नहीं हुआ, आप संपूर्ण भारत का नक्शा उलट कर देखिए, क्षेत्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक विषमता अगर देन है तो वह केंद्र सरकार की आर्थिक नीति और बजट की देन है।
इसलिए मैं श्री रंजन प्रसाद यादव को इसके लिए धन्यवाद देता हूं। लेकिन एक बात स्वीकार करके मैं अपनी बात समाप्त करूंगा कि हमारा भी अपराध है । मैं 1959 ईस्वी में ग्राम पंचायत का प्रधान बना था। मैं इतने दिनों से चुनाव लड़ता रहा हूं और बिहार की सक्रिय राजनीति में ग्राम प्रधान, ब्लाक प्रधान, जिला परिषद का अध्यक्ष, तीन बार एम.एल.ए., एम.पी., भारत सरकार का मंत्री रहा हूं। 1959 से मैं राजनीति में सक्रिय रहा। लेकिन हमने पाया कि हमारा भी अपराध था और बिहार के लोग आज इसे अंतर्मन से स्वीकार भी कर रहे हैं कि राजनीति का जातिकरण हुआ, जाति का अपराधीकरण हुआ, अपराध का समाजीकरण हुआ, समाज का भ्रष्टाचारीकरण हुआ, भ्रष्टाचार का प्रशासनीकरण हुआ और प्रशासन का चापलूसीकरण हुआ। इन सभी रोगों से बिहार पिछले पांच-छः वर्षों से मुक्त होने का प्रयास कर रहा है और इन सभी रोगों से मुक्त होकर हम एक नये बिहार की रचना करना चाहते हैं, नये समाज की रचना करना चाहते हैं, सामाजिक समरसता के आधार पर आगे बढ़ना चाहते हैं। पंचायती राज में पचास प्रतिशत आरक्षण देकर हम बिहार से महिलाओं को एक नई दिशा दे रहे हैं। हम सब तरफ नई दिशा दे रहे हैं।
इसलिए सदन से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि बिहार के साथ-साथ जहां भी भारत का जो प्रदेश अविकसित है, अल्प विकसित है, जहां क्षेत्रीय विषमता है, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषमता है, इन सभी विषमताओं का अंत करो। अगर ये विषमताएं नहीं मिटेंगी तो इन्हीं विषमताओं की अग्नि से ही कहीं न कहीं उग्रवाद और अतिवाद जन्म लेता है, जो आज भारत माता के शरीर को घावों से छिन्न-भिन्न कर रहा है और भारत माता के रोम-रोम से रक्त प्रवाहित हो रहा है और भारत माता रो रही है कि आओ इस विषमता को मिटाकर एक नए समाज की रचना के लिए यह संसद आगे बढ़े।
सभापति महोदय, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे प्रो. रंजन प्रसाद यादव द्वारा संविधान (संशोधन) विधेयक, 2009 पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मैं बड़े ध्यान से माननीय सदस्य को सुन रहा था और चूंकि यह प्राइवेट मैम्बर बिल है तो आज एक गीत भी सुनने का अवसर प्राप्त हुआ, इसके लिए मैं श्री हुकमदेव नारायण यादव जी का बहुत आभार व्यक्त करता हूं। यह बात सत्य है कि बिहार का विभाजन हुआ और झारखंड एक नया प्रदेश बना। अभी श्री रंजन प्रसाद जी कह रहे थे कि बिहार में जो प्राकृतिक सम्पदा थी, वह ज्यादातर झारखंड में चली गई। वहां से हमें जो एक आर्थिक उपज मिलनी थी, जो आर्थिक विकास की एक कड़ी थी, वह झारखंड में चली गई। इसलिए मेरे ख्याल से उन्होंने 90 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की मांग की है। मैं इस संविधान (संशोधन) विधेयक, 2009 के बिल पर बल देने के लिए खड़ा हुआ हूं और पूरे तरीके से इसे सपोर्ट भी करता हूं।
सभापति महोदय, यदि देखा जाए तो मध्य प्रदेश का भी विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य बना। हमारे उत्तर प्रदेश का भी विभाजन हुआ और उत्तराखंड बना, जहां से आप एक सम्मानित सांसद हैं। लेकिन जहां तक हमारे दल समाजवादी पार्टी और हमारे नेता श्री मुलायम सिंह यादव जी का सवाल है, हम लोग हमेशा से प्रदेश और जिलों के विभाजन के खिलाफ रहे हैं। इसे हम लोगों ने कभी सपोर्ट नहीं किया। जब भी जिलों और प्रदेश का विभाजन होता है तो हम यहां आज जो रोना यहां रो रहे हैं, उसका मुख्य कारण यही है कि जो हमारी एक शक्ति होती है, वह खंडित हो जाती है और खंडित होने के बाद सबकी अपनी आवाज और अपनी मांग होती है और इससे हम आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर कमजोर होते हैं। हर तरीके से हमारे विकास पर उसका असर पड़ता है।
जहां तक बिहार की बात है, यह बात सत्य है कि आज पूरे देश के मानचित्र पर बिहार को देखा जाए तो मेरे ख्याल से सबसे गरीब प्रदेश है। वहां प्राकृतिक संपदा बहुत है जिससे हम वहां विकास कर सकते हैं। लेकिन समय-समय पर बराबर बिहार से यह आवाज़ उठी है कि हमें स्पेशल पैकेज दिया जाए। इस बात की हमेशा मांग उठती रही है। आज तारांकित प्रश्न पर बहस हो रही थी। आपने देखा कि चाहे जेडीयू के सांसद हों या भारतीय जनता पार्टी के सांसद हों, बिहार के जितने भी सांसद थे सबकी एकजुटता बिजली की मांग और आपूर्ति पर थी। कितना हंगामा हुआ। इससे मालूम होता है कि वाकई कितना दर्द है। अभी हुक्मदेव नारायण बिजली और सड़क की बात कह रहे थे। यह तो लाइफ्लाइन है। किसी भी प्रदेश के विकास की सबसे बड़ी जरूरत है। अगर बिजली और सड़क नहीं होगी तो वह प्रदेश ही बेकार है। दारा सिंह जी भी इसी विषय पर खड़े हुए थे। वहां की जरूरत और आवश्यकता के लिए वे भी मांग कर रहे थे कि हमारे प्रदेश के साथ अन्याय हो रहा है। यह बात सत्य है कि उत्तर प्रदेश में भी हमें जितनी बिजली मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है। ये तमाम बातें आपके सामने हैं। बिहार के बारे में जितना कहा जाए वह कम है। धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं अन्य जितने स्तरों पर कहा जाए मेरे ख्याल से उसकी कोई मिसाल नहीं है। यह बात नहीं है कि बिहार पिछड़ा और गरीब है तो लोग वहां जाते नहीं है। तमाम विदेशी लोग वहां जाते हैं, वहां बौद्धिक स्थल भी है। हम विदेशी पूंजी लाने की बात करते हैं कि विदेशी धन आए, जिससे हमारा प्रदेश और देश विकास करे। अगर धार्मिक प्रवृति को लेकर वहां पर विदेशी सैलानी आते हैं, तो आज यह कोशिश करनी चाहिए कि वहां का विकास उस हिसाब से होना चाहिए। यह केन्द्र सरकार को सोचना चाहिए और उसके हिसाब से प्रदेशों को बजट का आवंटन करना चाहिए।
कोसी नदी की बात कही गई। यह बात सत्य है कि वह सबसे निचला इलाका है और तमाम नदियों का वहीं पर भराव होता है। जब बाढ़ का प्रभाव होता है तब सबसे ज्यादा बिहार को ही होता है। बिहार में जब बाढ़ का उबाल होता है और नेपाल से जो पानी आता है तो हमारे उत्तर प्रदेश में भी बाढ़ आती है। यह स्थिति है। अभी सम्मानित सदस्यों ने बिजली की मांग के लिए बात कही। बहुत अच्छे थर्मल पॉवर वहां लग सकते हैं। हम बिजली का उत्पादन कर सकते हैं लेकिन हम वह नहीं कर पा रहा हैं। हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं। छोटी-छोटी पहाड़ियां और हरे-भरे जंगल भी वहां पर हैं एवं तमाम ऐसी स्थितियां हैं जिससे हम बिहार को सजा सकते हैं और सवांर सकते हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।
सभापति महोदय, मैं एक बात कहना चाहूंगा कि यही कारण है कि जैसे तेलंगाना को लेकर आज यहां पर घमासान हुआ है। आपने यहां लोगों की भावनाएं देखीं। जो हमारे सम्मानित सदस्य हैं, चाहे तेलंगाना के हों या इधर के हों, वे जो बोल रहे थे, वह सब उनकी भावनाएं और दर्द हैं। कहीं न कहीं जनमत संग्रह करवा कर देखना चाहिए कि वहां के लोग किसके साथ कहां रहना चाहते हैं। कहां पर उनका विकास सीमित है। कहां उनका विकास समाहित है। उस ओर हमें देखना पड़ेगा। 600 बेगुनाह, बेवजह लोगों ने आत्महत्याएं की, यह बड़े शर्म की बात है। अगर आपने झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखण्ड बना दिया है तो मेरे ख्याल से आप तेलंगाना भी बना दीजिए। लोगों से राय ले लीजिए। आध्रप्रदेश और तेलंगाना के लोगों से राय लेकर बना दीजिए। बन जाए वहां पर प्रदेश, दे दीजिए वहां पर पैकेज। हमारे उत्तर प्रदेश की तो कहने की बात ही अलग है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहनजी ने तो यह कहा है कि अगर हमारा बस चले तो उत्तर प्रदेश में से चार प्रदेश बना दें। बुन्देलखण्ड बना दें, पूर्वान्चल बना दें, हरित प्रदेश, पश्चिमांचल बना दें, इसके एक नहीं चार प्रदेश बना दें।
हम इसके खिलाफ हैं। आप अपनी राय दे दीजियेगा, लेकिन हम इसके खिलाफ हैं। अगर बन जायेंगे तो यही रोना जो यहां रोया जा रहा है, जो बिल लेकर हम आये हैं, वही रोना हमारे सामने रहेगा। यह भी सत्य है कि अगर आज देश का काला धन, जो विदेशों में जमा है, जो भ्रष्टाचार फैला हुआ है, अगर इस धन को एकत्रित कर लिया जाये तो मेरे ख्याल से एक सुन्दर भारतवर्ष, स्वर्णिम भारतवर्ष बन सकता है और जितने भी पिछड़े हुए प्रदेश हैं, उनका विकास हो सकता है। हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। हमारी क्या बेबसी है, क्या लाचारी है, हमें इसकी तरफ सोचना पड़ेगा।
महोदय, मैं ज्यादा कुछ न कहकर केवल इतना ही कहूंगा कि हमारे सम्मानित सदस्य प्रो0 रंजन प्रसाद यादव जी ने, हुक्मदेव नारायण यादव जी ने और अधीर रंजन जी ने जो बात कही है, मैं उनकी बातों को पूरी तरह से बल देते हुए आपके माध्यम से यह मांग करता हूं कि बिहार प्रदेश के लिए पैकेज की जो मांग की गयी है, वह पैकेज उन्हें दिया जाये। अभी मैं इस बिल को भी देख रहा था। माननीय मुख्यमंत्री जी ने भी मोंटेक सिंह अहलूवालिया जी से मिलकर योजना आयोग में जाकर गुहार लगायी है। उन्होंने भी पैकेज की मांग की है। इस पैकेज की जरूरत है और हम इस बात पर बल देते हैं कि उन्हें पैकेज दिया जाये और बिहार प्रदेश का विकास किया जाये। इन्हीं बातों के साथ मैं पुनः इस विधेयक पर बल देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
सभापति महोदय : श्री रमाशंकर राजभर।
श्री रमाशंकर राजभर (सलेमपुर): महोदय, मुझे यहां से बोलने की अनुमति देने की कृपा करें।
सभापति महोदय : ठीक है, आप बोलिये।
श्री रमाशंकर राजभर (सलेमपुर): महोदय, प्रोफेसर साहब जो बिल लाये हैं, यह बिल किस परिणाम को प्राप्त होगा, इसका चाहे जो परिणाम हो, लेकिन इस बिल के माध्यम से जो मंशा सदन में जाहिर हुई, वह काबिलेतारीफ है। आज हमें बिहार के बारे में निश्चित रूप से सोचना पड़ेगा। जहां तक मेरी जानकारी है, देश के वे हिस्से जहां जनसंख्या का बहुत अधिक दबाव है, जहां जनसंख्या का बहुत घनत्व है, उन प्रान्तों को स्पेशल पैकेज देकर उन्हें आगे लाने की बात होनी चाहिए। काफी साथियों ने अपने विचार व्यक्त किये। यह सही है कि बिहार ने कवि भी दिया, साहित्यकार भी दिया, राष्ट्रपति भी दिया और कई धर्मों के संस्थापक भी दिये, केवल इतना ही नहीं और भी बहुत कुछ बिहार ने दिया है। मेरा संसदीय क्षेत्र सलेमपुर, बलिया और देवरिया बिहार के बॉर्डर पर है। मेरी सारी रिश्तेदारियां बिहार में हैं और बिहार के सारे लोगों, सारे मतदाताओं से मेरी सुबह-शाम मुलाकात होती है। गोपालगंज, छपरा, बक्सर और बिहार से हमारी संस्कृति और सभ्यता मिलती-जुलती है। बिहार ने केवल मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति और कवि ही नहीं बनाये। बिहार ने तो दुख, तकलीफ सहकर और ट्रेन की जनरल बोगी में चढ़कर और महोदय जब इलैक्ट्रिक लाइन नहीं थी तो ट्रेन की छत पर चढ़कर हजारों किलोमीटर दूर जाकर हरियाणा बनाया, राजस्थान बनाया, पंजाब बनाया और वहां के मजदूर ने जाकर मुंबई बनाया, वहां के मजदूर ने जाकर गुजरात बनाया। अगर देश के किसी भी कोने में चर्चा होती है और एक सड़क बनाने वाले ठेकेदार से भी पूछा जाये तो वह यह कहता है कि बढ़िया मजदूर या तो बिहार से पिच करने वाला लाओ और नहीं तो बंगाल से मजदूर लाओ, छत्तीसगढ़ से मजदूर लाओ, उड़ीसा से मजदूर लाओ। अगर हम उस बिहार को आगे ले जाना चाहते हैं तो दो-तीन बातें बहुत साफ होनी चाहिए। सब कुछ बिहार में है, चाहे जनसंख्या का घनत्व हो, सम्पूर्ण प्राकृतिक साधन हों या पानी और उपजाऊ जमीन हो, वहां सब कुछ है।
महोदय, मुझे दो-तीन प्रान्तों के बारे में जानकारी है। जिस समानता की बात अभी सीनियर साथी आदरणीय हुक्मदेव नारायण यादव जी कह रहे थे कि बिहार में एक चीज में समानता नहीं हो पाती। वहां आपको अमीर इतना अमीर मिलेगा, जिसकी कोई सीमा नहीं और गरीब भी इतना गरीब मिलेगा कि जिसकी कोई सीमा नहीं। यह कैसे होगा? धन से होगा। और यह हर क्षेत्र में होता है। मैं यह नहीं कहता कि समाज के क्षेत्र में वहाँ काम नहीं हुए, लेकिन आज भी अंधविश्वास से, जादू-टोना से वहाँ की सामाजिक स्थिति चरमरा रही है, उसकी कहीं कोई सीमा नहीं है।
सभापति महोदय, किसी भी प्रदेश को हमें आगे ले जाना है तो सबसे पहले हम वहाँ पानी ले जाते हैं। जब पानी जाता है तो हरियाली जाती है और हरियाली जाती है तो खुशहाली जाती है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क हर प्रांत की बुनियादी आवश्यकताएँ हैं। हम खजाने का जो बोझ आज तैयार कर रहे हैं, हमारे भाई साहब ने पैकेज मांगा और उस पर भारत सरकार कहेगी कि हमारे पास धन नहीं है, पैकेज नहीं दे सकते। बताया जाएगा कि खजाना खाली है। खजाना भरेगा कैसे? कई बजट आए, अनुपूरक बजट आए, चर्चा सुनी गई कि पसीने से भारत का खजाना भरा जाएगा, हमने भी अखबारों में ऐसा पढ़ा। मैं कहता हूँ कि मैं नया सांसद हूँ लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि आज एक साल से, डेढ़ साल से काले धन की चर्चा हुई। हमारा काफी रुपया स्विस बैंक में है लेकिन हमारे देश में काला धन नहीं है क्या? एक तरफ हमारा खजाना खाली है और दूसरी तरफ हमारे खजानों में दस-दस क्विंटल सोना मिलता है, पाँच-पाँच क्विंटल चांदी और एक-एक लाख करोड़ रुपये हमारे ही देश में मिलते हैं। देश का खजाना कैसे भरेगा? आप सौ रुपये छापते हैं तो पचास रुपये कार्यशील पूँजी होगी और पचास रुपये डंप हो जाएंगे तो वह पूंजी कार्यशील नहीं रह जाएगी, आपको कैसे राजस्व मिलेगा? इसलिए मैं उधर न जाकर भारत सरकार को इस बिल के माध्यम से कहना चाहता हूँ कि अधिक घनत्व के ये क्षेत्र बिहार और उत्तर प्रदेश हैं। मैं निश्चित रूप से कहना चाहता हूँ कि बँटवारे के बाद बिहार की प्रगति में उसके अपने संसाधनों से जो प्रगति हुई, उस पर तो नहीं जाना चाहता, लेकिन आबादी के घनत्व से ज्यादा प्रांतों के लिए हमें पैकेज का इंतज़ाम करना ही होगा। इसलिए करना होगा कि हमारा पूरा शरीर कितना भी तंदुरुस्त हो, केवल एक अंगुली में कैंसर हो जाए तो पूरे शरीर को मिटने में देर नहीं लगेगी। समाज के या देश के एक अंग में, देश के किसी एक कोने में अगर बीमारी होगी तो पूरे शरीर को बीमार होने में देर नहीं लगेगी और यही कारण है कि आबादी के घनत्व के ज्यादा इलाके जहाँ हम बिजली, सड़क, शिक्षा नहीं दे पाए, स्वास्थ्य का इंतज़ाम नहीं कर पाए, आज वहीं पर इसी भारत माँ का नौजवान हथियार उठाकर कानून अपने हाथ में लेने का काम कर रहा है तो हम कह रहे हैं कि उन्हें हम कैसे परास्त करें, कैसे हम अपने डीएम को बचाएँ, कैसे हम अपने सेना के जवान को बचाएँ। इसलिए यह ईमानदारी होनी चाहिए कि जो कपड़ा साफ है, उसको गंदा न किया जाए। मैं यह नहीं कहता कि उसको गंदा कर दिया जाए लेकिन जो कपड़ा गंदा हो चुका है, उसको साफ करने के लिए थोड़ा साबुन और सोडा अलग से देना ही पड़ेगा और आप देना चाहते हैं तो पैकेज के रूप में उस कपड़े को साफ करने के लिए बढ़िया टीनोपाल पैकेज मांगने वाले प्रांतों को देना चाहिए। केवल बिहार ही नहीं, यूपी में भी पैकेज मांगा गया।
सभापति जी, यूपी का बँटवारा हुआ तो आप हमारी पनबिजली परियोजनाएं लेकर चले गए। उत्तराखंड से आप बिजली दे रहे थे। वहाँ बिजली पैदा हो रही थी। उत्तर प्रदेश जो 80 सांसद देता है, 403 एमएलए का क्षेत्र है। वहां से 80 हजार करोड़ रुपए का पैकेज मांगा गया। किस बात के लिए मांगा गया?
महोदय, हम स्वास्थ्य, स्वच्छता और शिक्षा की बात करते हैं। पूरे देश की सारी भीड़ हमने एम्स में बुला ली है। आदमी को ऑपरेशन की आवश्यकता कल होती है, लेकिन उसे साल भर से पहले का टाइम नहीं मिलता है। पूरे पूर्वांचल और पूरे बिहार में पीजीआई स्तर के कितने हॉस्पीटल हमने दिए हैं। फिर तो वही हाल होगा, जब पूरा देश का बेरोजगार नौजवान मुम्बई, दिल्ली और हरियाणा में चला जाएगा तो आप कहेंगे कि यदि बिहार में फैक्ट्री लग गई होती हो दिल्ली और हरियाणा में भीड़ कम हुई होती। ठीक इसी तरह से हॉस्पीटल के क्षेत्र में इन्हीं पैकेजों के माध्यम से बिहार, यूपी में, बीएचयू यूनीवर्सिटी को, जिसमें आधा बिहार आता है। क्या हम उसे एम्स स्तर की सुविधाएं नहीं दे सकते हैं? गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज को क्या हम एम्स या पीजीआई के स्तर की सुविधाएं नहीं दे सकते हैं? हम यह नहीं कहते हैं कि इनको बहुत कुछ दे दीजिए। मैं निश्चित तौर पर कहना चाहता हूं कि पूरा यूपी और बिहार का जो बार्डर है, वहां का आदमी एक मांग के लिए, पूरा बिहार भोजपुरी भाषा बोलता है। वह मॉरीशस में भी है। भोजपुरी उसकी संस्कृति और सभ्यता है। भारत के आजाद होने के बाद से, मैथिलीशरण जी के बाद से, हमेशा से यह मांग होती रही है कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। हम क्या कर रहे हैं? यूपी और बिहार को कहां ले जाना चाहते हैं?
महोदय, हम स्वच्छता की बात करते हैं। रात को जब हम गाड़ियों से निकलते हैं और अपनी मां, बहनों और बेटियों को सड़के के किनारे शौच करते देखते हैं तो शर्म से सिर झुक जाता है। आजादी के 63 साल बाद भी हम अपनी बेटी और बहनों को शौचालय नहीं दे पाए हैं। क्या इससे बड़ी भी कोई शर्म की बात हो सकती है? यदि यह शर्म की बात नहीं है तो इससे बड़ी भी शर्म की बात है, गरीबों के साथ खिलवाड़ है कि देश में गरीब आदमी जब शौचालय बनवाएगा तो उसे ढाई हजार रुपए दिए जाएंगे। फाइव स्टार होटल में बैठकर चार सौ रुपए में अरहर की 50 ग्राम दाल खाने वाला देश। फाइव स्टार होटल में बैठक 55 रुपए में एक लीटर पानी पीने वाला देश। फाइव स्टार होटल में बैठकर ढाई सौ रुपए में एक कप चाय पीने वाला देश। लेकिन गरीबों को शौचालय बनवाने के लिए ढाई हजार रुपए की सब्सिडी दी जाती है। ढाई हजार रुपए जब शौचालय बनाने के लिए दिए जा रहे हैं तो मैं नहीं समझता हूं कि वह शौचालय बनाने के लिए दिए जा रहे हैं। मैं तो समझता हूं कि वह तो केवल कागज़ पर बनाने के लिए दिए जा रहे हैं।
सभापति महोदय, इस बिल के माध्यम से मैं यह कहना चाहता हूं कि केवल बिहार या उत्तर प्रदेश ही नहीं, अपितु उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, जहां भी इस तरह की स्थिति है। आज देश के खजाने का मुंह अवसर वंचितों की ओर करना होगा।
17.00 hrs. अगर हम सुन्दर भारत बनाना चाहते हैं तो देश के खजाने का मुंह अवसर से वंचित लोगों की ओर करना होगा। उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति विशेष पैकेज देकर हमें जल्दी-से-जल्दी इधर आगे बढ़ना होगा। मैं निश्चित तौर पर कहना चाहता हूं कि अगर इसमें देरी हुई तो यह अच्छा नहीं होगा। अभी तो हमने इस देश में गरीबों की पहचान एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. और बी.पी.एल. के रूप में की थी लेकिन अब इससे भी आगे बढ़ कर आपको देखना होगा कि इस देश में वह आदमी जो सड़क के किनारे एक बरसाती ओढ़ कर अपनी मां-बहनों के साथ वहां लोहा पीटता है और अपना जीवन यापन करता है, उसको आप किस कैटगरी में रखेंगे? अब पूरे देश में ऐसी जातियों की पहचान करनी पड़ेगी। जो घूमन्तु जातियां हैं, और मदारी जाति हैं, वे नहीं जानते कि वे एस.सी. में हैं, एस.टी. में हैं, या ओ.बी.सी. में हैं। इसलिए मैं प्रोफेसर रंजन प्रसाद यादव जी, जो प्राइवेट मेम्बर बिल लाए हैं, उसके लिए उन्हें बहुत-बहुत साधुवाद देता हूं। मैं इस बिल पर पूरा बल देते हुए उत्तर प्रदेश के लिए विशेष पैकेज के रूप में जो 80000 करोड़ रूपए की मांग है, उसको भी संज्ञान दिलाते हुए, इसका समर्थन करता हूं।
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, I stand here today to deliberate on the Bill that has been moved by Prof. Ranjan Prasad Yadav. I was also present that afternoon when he initiated the discussion, and, today, I made it a point that I should be present here.
At the outset, I would say that the concern that he has expressed would have been much better if the concern for Bihar would have been expressed by a non-Bihari Member of Parliament in the Lok Sabha. This would have demonstrated that this country is concerned for what is happening in another part of the country.
With all humility I would express here that when my friend Shri Adhir Chowdhury demanded funds for West Bengal; when my predecessor speaker demanded funds for Uttar Pradesh; should I also demand funds for Odisha? Every State will demand funds for their State, and we have a provision in our Constitution. The forefathers / makers of the Constitution in their wisdom, in 1949, in the Constitutional debates have made the provision that when we are making a Federation of States and when we are giving more power to the Union Government, then there is a need to distribute funds / taxes that are being collected and to see that there is a holistic development. Especially, attention should be given to those areas that are underdeveloped because of social, political and historical reasons, and have remained underdeveloped / undeveloped for very many reasons.
Prof. Ranjan Prasad Yadav has moved a specific Bill, and he has cited two clauses of the Constitution, namely, clause 275 and he wants to insert ‘A’, and he has also mentioned 371J. These two clauses are mentioned in it. He is not saying something beyond the Constitution. Hence, it has got support from all sections of this House.
Before I delve into the Bill, I would say that from the very beginning or from its very inception, the Constitution is loaded in favour of the Centre.
It has its historical reason -- the country was divided. Many historians were members of the Constituent Assembly and they, in their hindsight, found what had happened after the demise of Ashoka, what had happened after the demise of Akbar, what had happened when the centre of power weakens and how the country was divided. That was the main reason why when the Constitution was being framed, at that time, it was loaded in favour of the Centre, though it was mentioned that it is a Union of States, federal in character. But at the same time, the Centre was provided more power. Being a member of the regional party, I started my speech saying Constitution has loaded Centre with more power. The constitutional amendments that have been effected subsequently have tilted the balance further in favour of the Centre. The concept of a strong Centre has been incorporated in the anatomy of the Constitution through a variety of devices. I need not go into those details.
That is why, I think Prof. Ranjan Yadav has been forced to raise the issue through a Private Members’ Bill today in this House. Otherwise, he would have been agitating in Bihar, as many other political groups are agitating in very many different ways in different parts of the country.
We should remember that our Constitution provides for two layers of Government – one at the Centre and the other at the State. The federal polity of this kind requires division of powers and responsibility between the Centre and States and it has been done to a great extent. Although the taxation powers allotted to the Centre and the States are mutually exclusive, all the taxes and duties levied by the Union are not meant entirely for the purpose of the Union. Revenues from certain taxes and duties leviable by the Union are totally assigned to or shared with the States to supplement their revenues in accordance with their needs.
17.08 hrs (Shri Inder Singh Namdhari in the Chair) It is a tribute, that is what I would say, to the foresight of the founding fathers that they realised that the sources of revenue allocated to the States may not prove sufficient in view of their growing welfare maintenance and development activities. So, when a Member from the Samajwadi Party would say that he is not in favour of small States because if smaller States are made, then this type of problem will occur, that is a bigger question which needs to be deliberated separately. But at one point of time, it was construed that each State should generate sufficient revenue so that it can sustain itself, but that is not the case in our country.
The Constitution provides the Centre to allocate funds through different mechanisms which are available in the Constitution – the sharing of revenue is there, the Finance Commission is there, budgetary provisions are there. I will come to what the provisions are through which Centre allocates its funds, and provides finances to the States. Here, I would mention that specific provisions were made to set apart a portion of the Central revenue for the benefit of the States.
This provision indicates the flexibility of India’s Constitution in terms of distribution of financial resources between different layers of the Government. Over the last six decades, the economic development of India is unique in several ways.
The Planning Commission was set up in March, 1950 by a Resolution of the Government of India. It has taken responsibility on itself to discuss different plans with the respective State Governments and, accordingly, provide funds. It also advises the Central Government through different schemes as to how the money will go. This basic objective of economic plan is to ensure high rate of economic growth. We have been discussing for the last three days about what growth is. As far as I understand, it means increase in real per capita income. That also needs a long time as to how we can share the per-capita income equally.
The main issue through this Bill which Prof. Yadav has brought before this House is the regional imbalance. Regional imbalance may be natural due to unequal distribution of natural resources or even man-made in the sense of neglect of some regions and preference for others for investment and infrastructure facilities. During last 250 years since the fall of Mughal empire after 1757 or 1763, one can say that these things have multiplied. Imbalances have multiplied. At that time, people were not moving throughout the country as we are doing now or as we have been doing for the last 200 years. Regional imbalances got multiplied during the British rule. For their commercial activities, respective cosmopolis or cities were created. I would say that you would agree with me that there was a time in this country, when eastern India - Bengal, Bihar and Orissa and to a great extent, present Bangladesh and Assam was the rice bowl of this sub-continent. Eastern India provided food to the whole country. The Western part of this sub-continent was ravaged for very many reasons. To get staple food was a very difficult situation in western part of the country. But during that period, all land was rain-fed. Yet the best variety of paddy, quality rice was being produced in the eastern part of the country and was being exported. The history says that even South-East Asia was also being fed by this rice bowl of the sub-continent. And what has happened after the planned economy and the flow irrigation has started? That has shifted to western part of this country. Today Shri Adhir Ranjan Chowdhury was mentioning about Haryana, about Punjab and about western U.P. Very lately, the Government of today has provided Rs. 400 crore to make a Second Green Revolution. Prof. Ranjan Yadav is mentioning that he needs Rs. thirty thousand crore every year to develop the infrastructure. He needs financial assistance for poverty alleviation, employment opportunities. He is not asking for doles. He is asking that his brothers and sisters can earn their livelihood with self-respect. For that they need money where it can be invested. I remember in nineties, in this House, a young Member elected from Kalahandi was a non-Congress Member. Of course, today he is a Congress Member. He was fighting vociferously and was drawing the attention of the then Congress Prime Minister that he has neglected Kalahandi, he has neglected Koraput and he has neglected Bolangir. It was in 1966 when Mrs. Indira Gandhi had gone to Kalahandi and had seen how drought-stricken people were languishing there.
Again in 1986, the then Prime Minister Shri Rajiv Gandhi along with Mrs. Sonia Gandhi had visited Kalahandi. Nothing much has changed. These were the views which Shri Bhakta Charan Das was mentioning in nineties before Shri P.V. Narasimha Rao. We need special package; we need special attention. Unless the Central Government intervenes, the State of Orissa is not in a position to provide that much of funds. This is required. A special package was given and not what Prof. Ranjan Yadav has asked for – it was hardly Rs.450 crore – and that too in a staggered manner in seven years. That is a provision of Article 275. The structure of Article 275 say that the grants are for each year, which may mean all the five or any one year. The amount need not be identical, that is, they can vary among the States. No order shall be made under the clause by the President except after considering the recommendations of the Finance Commission. That is how some funds were provided.
MR. CHAIRMAN : Do you want to speak more?
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : I will take some more time.
MR. CHAIRMAN: You have already been given 18 minutes.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB: I will try to conclude in five to ten minutes.
What happens? This is an experience which we have in case of Kalahandi, Koraput and Bolangir districts. I would only express my fear that the same experience should not be repeated by others who are asking for funds from the Centre. Here, it was mentioned by Shri Hukmadeo Narayan Yadav that a person who is weak, whose liver is weak – that is the word which he used – if you give him a glass of milk, he will die of indigestion. That is why, you can first give him half a cup of milk, after seven days, a full cup of milk, then half a glass of milk and then after a three months or eight months, you give him a full glass of milk so that his body gets adapted to the food intake. That is what we did in case of KBK district, which is now been divided into eight districts. It was Shri Biju Babu who did it.
MR. CHAIRMAN: A few years back, a special plan was mooted for KBK.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : Yes, Sir. That is what I have mentioned. So, money was trickling down phase-wise so that adaptability of the people, absorption of the people to take the funds, implement it and get the benefit from it was done. But, it was to our ill luck that suddenly in 2006 or 2007 the Government stopped that project.
Our Chief Minister Shri Naveen Patnaik wrote frantically and met the Prime Minister. Now that area is absorbing the Plan funds; and thus, this is the time to give more funds so that they can benefit from that, earn their livelihood, and lead a respectable life. This is not the time to move away from that area. After much persuasion, our State Government, from its own resources came up with Biju KBK Yojana. Some funds came from different quarters; some came from the Centre also, but the demand is still there, for Rs.4,500 crore to come to that area.
Similarly I would say that a one-time grant of Rs.90,000 crore is asked for. How are they going to invest that much of money? It has to be staggered. I can understand if he asked for Rs.30,000 crore per annum – that is understandable. But I was a bit surprised to see the one-time grant of Rs.90,000 crore, as has been mentioned in the Bill.
We should remember that federalism is not only a unifying factor, but also a levelling up force. Considerable economic inequalities exist among different States of India, and their reduction is an argument in favour of centralization of resources, and vice versa. Many proponents are arguing for greater financial autonomy for the States, but what will a poor State like Bihar do with more taxation powers, in view of the already low standard of living of their people?
Prof. Yadav’s Constitution (Amendment) Bill is basically moved to provide a special package. This can only be made as a grant, under article 275 of the Constitution.
When I was going through this Bill, at first, I was a bit envious – envious because in the 21st Century, Orissa is still reeling under poverty, but when I heard the Members from the Samajwadi Party and the Congress Party speak, especially from Uttar Pradesh and West Bengal, I thought that it is better that I should not speak for Orissa now, and that one of our Party Members may move a Bill in that regard, so that we can discuss it here.
But I would be happy if the Government responds to the concerns which Prof. Yadav has expressed through this Bill. It is high time that Bihar needs attention because Bihar is the churning bowl of Indian civilization. It has created Mahavira, it has created Buddha, it has created Jayaprakash, it has created Lalu Yadav also, it has created Ranjan Yadav, it has created Nitish Kumar, and it has created very many people like the Bharat Ratna Rajendra Prasad! With these words, I conclude.
SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Thank you, Chairman, Sir, for giving me this opportunity to take part in this discussion.
First of all, I would like to associate myself with the hon. Member, Prof. Ranjan Prasad Yadav, who initiated the Private Member’s Bill, seeking one-time grants-in-aid to the State of Bihar.
Backwardness of Bihar may be related to geographic location, historic neglect of the region, complex socio-cultural factors, etc. The soil of Bihar is extremely fertile with over-flowing rivers, but with inadequate irrigation facilities. Bihar has a huge potential to develop as one of the forward-ranking States, provided the Centre extends the required financial assistance and support to the State.
If Bihar gets special status from the Centre, it would give businessmen a lot of incentives including tax benefits which would take the State on a higher growth path. Who will break the shackles of poverty in Bihar? Centre does not seem to bother about the under-development of Bihar. Let the Centre give up the step-motherly treatment towards the non-Congress ruled States.
Let me come to the general issues. The Seventh Schedule of the Constitution needs to be amended by giving more powers to the States. The Central Government now collects nearly 65 per cent of the combined tax revenue leaving only 35 per cent tax revenue to be levied by the States. But the States account for 65 of the combined expenditure. I call it a vertical imbalance.
I am sure, the hon. Members will agree with me and the hon. Minister of State for Finance may also accept it. The Constitution of India gives certain responsibilities to the States which have a direct bearing on the well being of the people. A State Government answerable to the voters needs flexibility to raise revenue and plan the expenditure pattern. Sir, as we all know, revenue sharing between the Centre and the States leaves two things; the vertical imbalance, which I have mentioned just now, is in favour of the Union, leaving the States with a large revenue gap. Utilising this gap, the Centre extends conditional grant-in-aid to the States. It is necessary. As a result of this, the States are not allowed to decide what should be the projects and also the targets. The States have to implement what the Centre says. To me this is nothing but financial slavery.
The Centre is now increasingly eroding the powers, both financial and political, of the States and is trying to make the States dependent on the Centre. When the States are ruled by the elected representatives, they know the art of governance. In the name of ensuring better governance the Centre systematically erodes the powers of the States. This is against the true spirit of federalism. Take the case of the State of Tamil Nadu. The State’s revenue deficit is estimated at Rs.3,100 crore during 2010-11 against the revenue surplus of Rs.4,545 crore in 2006-07. The fiscal deficit is projected at Rs.13,506.85 crore. To salvage the position my Leader, the hon. Chief Minister of Tamil Nadu has presented a Memorandum to the hon. Prime Minister on 14.6.2011 seeking the financial assistance of Rs.1,82,402.18 crore for various development schemes including a bail out package of Rs.40,000 crore for Tamil Nadu Electricity Board, Rs.10,000 crore towards debt relief, Rs.20,000 crore for improving urban infrastructure and another Rs.10,200 crore for giving laptop to the students. Sir, I regret to say that there is no response so far either from the hon. Prime Minister or from the hon. Finance Minister. What am I to construe? A deliberate neglect towards the development needs of Tamil Nadu! This apart, hon. Chief Minister of Tamil Nadu has requested for 1000 megawatt of electricity from the Central pool to tide over the power crisis for a period of one year. My leader has also urged the Centre to allot sufficient quantum of fertilizer to meet the needs of the farmers. In addition, a request has also been made to restore the level of quota of kerosene and also to increase the supply. Taking into account, the plight of the poor and for providing them relief, the hon. Chief Minister of Tamil Nadu, my revered leader has put forth the demands along with others.
The UPA Government with its slogan of ‘Aam Aadmi’ has not so far responded to the aam aadmi in Tamil Nadu. May I, therefore, request, the hon. Prime Minister and the hon. Finance Minister to look into all these issues raised by my revered leader and hon. Chief Minister of Tamil Nadu and provide the required financial assistance and other material relief as demanded.
I am sure the Centre will act immediately without giving room for any bi-partisan towards the people of Tamil Nadu.
श्री विश्व मोहन कुमार (सुपौल): सभापति महोदय, सबसे पहले, मैं इस स्थान से बोलने की अनुमति चाहता हूं।
सभापति महोदय : ठीक है, बोलिए।
श्री विश्व मोहन कुमार (सुपौल): महोदय, प्रोफेसर रंजन प्रसाद यादव जी द्वारा जो बिल लाया गया है, मैं उसके पक्ष में बोलने के लिए खड़ा हूं। हमारे जो साथी अन्य राज्यों से आए हैं और जिन्होंने बिहार के प्रति संवेदना व्यक्त की है और इसकी बेहतरी के लिए बातें उठाई हैं, उसके लिए उनका शुक्रगुजार हूं। मैं उनको तहेदिल से धन्यवाद देता हूं।
बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों मिलना चाहिए, इसके पीछे बहुत सारी कहानियां हैं। बिहार पहले उड़ीसा से अलग हुआ, फिर बंगाल से अलग हुआ और हमारी बदकिस्मती है कि वर्ष 2000 में झारखण्ड से अलग हुआ। हमारे जितनी भी एसेट्स, मिनरल्स एवं कल-कारखाने थे, वे सब झारखण्ड में चले गए, बिहार के पास मात्र खेती-योग्य जमीन बची। नॉर्थ बिहार में कोसी नदी के बारे में सभी ने जिक्र किया है। आप जानते हैं कि कोसी नदी मेरे ही क्षेत्र से होकर गुजरती है और जो बर्बादियां होती हैं, मेरे ही क्षेत्र में होती हैं। वर्ष 2007 की बाढ़ के बारे में आप सभी जानते हैं। वर्ष 2008 में कोसी में जो विभीषिका आई थी, हमारे प्रधानमंत्री जी वहां गए थे, कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी भी गयी थीं और वहां पर उन्होंने कहा था कि यह प्रलंयकारी बाढ़ आई है। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : विश्वमोहन जी, थोड़ा सा रुक जाइए। आप कंटीन्यू करेंगे।
Hon. Members, the allotted time for the discussion on this Bill is over. I have five more Members to speak on this Bill. If the House agrees, the time for the discussion may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
श्री विश्व मोहन कुमार : महोदय, नीतीश जी ने उस समय 14,800 करोड़ रुपये की सहायता मांगी थी, लेकिन वह हमें नहीं मिली। उस बाढ़ में इतनी बर्बादी हुई कि 34 लाख लोग परेशानी में पड़े थे, बहुत से मवेशी बह गए, हमें जान-माल की भारी क्षति हुई थी। उस समय भी हमें कोई सहायता नहीं मिली। कोसी की बर्बादी के बारे में आप जानते हैं कि कोसी की जो विभीषिका आती है, कोसी नदी का जो नेचर है, 200 साल पहले यह नदी पूर्णिया और अररिया साइड में बहती थी, वहां से आते-आते आज यह हमारे पश्चिमी बेल्ट में आ गयी है। वहां हम लोगों ने वर्ष 1953 से लेकर 1956 तक बांध बनाया था, उसके बीच नदी बह रही है। नेपाल से जो नदी आती है, खासकर यह कोसी नदी, इसके बारे में सभी को जानकारी है, इसकी मिट्टी के बारे में जानकारी है, इसके नेचर के बारे में जानकारी है कि यह कभी इधर घाट काटती है और कभी उधर गांव काटती है। नदी के बीच में हमारे बहुत से गांव हैं, बाढ़ के समय यह देखने को मिलता है कि पूरा का पूरा गांव समाप्त विलीन हो गया है, गांव कहां विलीन हो जाते हैं, उनका पता नहीं चलता है। इसलिए हमें अगर केन्द्र से स्पेशल पैकेज नहीं मिलेगा, अगर यहां से सहायता से नहीं मिलेगी, हमारे पास कुछ भी उपाय नहीं है, वहां कल-कारखाने नहीं हैं। कृषि-योग्य जमीन है, लेकिन उत्तरी बिहार में बाढ़ आती है और दक्षिणी बिहार में सुखाड़ आता है, जिसके चलते उपज कम होती जा रही है।
इस तरह बाढ़ आने से हमारे यहां रोड्स, पुलिया वगैरह सबकी तबाही होती है और सब कुछ बर्बाद हो जाता है। मेरे संसदीय क्षेत्र में डगमारा में एक हाइडल पावर परियोजना स्वीकृत हुई थी और वह बनने वाली थी, लेकिन नेपाल ने यह कहकर उसमें अड़ंगा लगा दिया कि इससे हमारे बहुत से गांव उजड़ जाएंगे, जबकि कोसी बैराज वहां से दस किलोमीटर पर ही है। मेरा अनुरोध है कि केन्द्र सरकार नेपाल सरकार से बात करके उस हाइडल पावर प्रोजेक्ट पर काम शुरू कराए। पहले पायलट प्रोजेक्ट बनाने की योजना थी, लेकिन नेपाल सरकार ने उसमें भी मदद नहीं की और जितने भी हमारे इंजीनियर्स और मजदूर वहां गए थे, उन्हें मार-मार कर भगा दिया।
किसी भी राज्य का विकास तब तक सम्भव नहीं है जब तक वहां रोड, पुलिया, बिजली आदि की पर्याप्त व्यवस्था न हो। अभी हमारे एक साथी कह रहे थे कि बिहार से बहुत सी लेबर पंजाब और हरियाणा में काम करने जाती है। मैं बताना चाहता हूं कि जब 2005 में नीतीश जी बिहार के मुख्य मंत्री बने, उनकी सरकार ने वहां विकास के काफी काम किए, जिसकी वजह से पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में बिहार की लेबर जाने में कमी आ गई है, क्योंकि जब लोगों को वहीं काम मिलेगा तो वे बाहर क्यों जाएंगे। बाढ़ के कारण और सूखे के कारण हमारी कृषि उपज में भी कमी आई है। हमारे राज्य में बहुत सी मैन पावर है, जो बाहर जाती है। उसके अलावा हमारे बिहार राज्य से कई अधिकारी भी अन्य राज्यों में जाकर काम करते हैं। इस तरह से देखा जाए तो हमारे यहां काम करने वालों की कमी नहीं है, जरूरत है वहां इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की और मजबूत करने की।
सभापति महोदय : अगर बिहार की लेबर पंजाब-हरियाणा में नहीं जाएगी तो वहां काफी दिक्कत हो जाएगी, क्योंकि यही लोग वहां का अधिकांश कृषि कार्य सम्भाल रहे हैं।
श्री विष्णु मोहन कुमार : वह तो ठीक है, लेकिन अगर हमारे राज्य में काम मिलेगा तो फिर लोग बाहर क्यों जाएंगे इसलिए बिहार में केन्द्र सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने के लिए प्रांतीय सरकार की मदद करनी चाहिए। हमारे राज्य की आबादी करीब दस करोड़ है। जब बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना तो हमारे यहां के अधिकांश उद्योग वहां चले गए, जबकि झारखंड राज्य की आबादी हमसे काफी कम है। झारखंड में खनिज सम्पदा की भरमार है। अगर बिहार में भी ऐसा हो जाए तो इस राज्य का नक्शा बदल सकता है। वहां भी अगर उद्योग लगें तो लोगों को रोजगार मिलेगा।
किसी भी राज्य की रीढ़ कानून और व्यवस्था होती है। जब नीतीश जी मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने इस पर खास ध्यान दिया और अब आप देखें कि वहां लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति काफी सुधर गई है। नीतीश जी जो काम कर रहे हैं उसका अनुकरण केन्द्र भी कर रहा है और दूसरे कई राज्य भी कर रहे हैं। नीतीश जी ने बिहार में साइकल योजना लागू की, जिसका अनुकरण कई राज्य कर रहे हैं। मैं केन्द्र सरकार से और विशेष रूप से प्रधान मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि जिस तरह आपने देश में कुछ राज्यों, जहां तक मेरी जानकारी है दस राज्य, को विशेष राज्य का दर्जा दिया है, वैसे ही बिहार को भी दें, ताकि हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें। जब नीतीश जी मुख्य मंत्री बने 2005 में तो उस समय योजना आयोग ने बिहार राज्य के लिए जो पैकेज दिया था, वह करीब 4000 करोड़ रुपए का था, लेकिन अभी हम 24,-25,000 करोड़ रुपए के काम कर रहे हैं इसलिए अगर हमें यहां से सहायता नहीं मिलेगी तो हम अपने संसाधनों से इतनी बड़ी राशि का प्रबंध नहीं कर सकते। इसके लिए मैं प्रधान मंत्री जी से और केन्द्र सरकार से अनुरोध करूंगा कि बिहार राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के लिए प्रो. रंजन यादव जी ने विधेयक यहां पेश किया है, उसे पारित किया जाए और हमें विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।
सभापति महोदय: श्री अर्जुन राम मेघवाल। माननीय सदस्य जब अपनी बात कहते हैं तो पहले तो वे बिहार के लिए बोलते हैं, लेकिन आखिर में अपने राज्य के लिए मांग करते हैं।
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): सभापति जी, मैं बिहार के लिए भी कहूंगा और कुछ अपने राज्य के लिए भी कहूंगा। प्रो. रंजन यादव जी द्वारा सदन में पेश किए गए संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन करने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं।
सभापति जी, प्रो. रंजन प्रसाद यादव जी द्वारा जो यह मोशन मूव किया गया है और कांस्टीटय़ूशनल अमेंडमेंट की बात कर रहे हैं, उसके समर्थन में मैं खड़ा हुआ हूं। अभी बिहार में आंदोलन चला और करीब सवा करोड़ लोगों ने हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन राष्ट्रपति जी को सौंपा कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। इसके मायने यह है कि बिहार की दस करोड़ की आबादी में से सवा करोड़ लोगों का हस्ताक्षर कराना, वहां तक अप्रोच करना, कोई कागज लेकर जाना और उस पर साइन कराना अपने आप में बड़ी बात है। मेरे ख्याल से स्वंय माननीय मुख्यमंत्री जी उस ज्ञापन को देने के लिए आये थे और माननीय शरद यादव जी भी उसमें शामिल थे। हमने पेपर में पढ़ा कि माननीय राष्ट्रपति जी ने भी यह आश्वासन दिया कि हम बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए भारत सरकार को निर्देशित करेंगे।
वर्ष 2000 में बिहार का बंटवारा हुआ, उस समय भी आश्वासन दिया गया और जब कभी बिहार में चुनाव आता है तो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात आती है। मेरा इस संबंध में यह कहना है कि प्रो. रंजन जी जो बिल लाए हैं, मेरी जब इनसे चर्चा हो रही थी तो यह कह रहे थे कि राष्ट्रपति जी को ज्ञापन सौंपा, बार-बार आश्वासन इस हाउस में दिया गया और अब भी अगर बिहार राज्य को दर्जा नहीं मिलेगा तो न तो इस हाउस की कोई सेंक्टिटी रहेगी न राष्ट्रपति जी की कोई सेंक्टिटी रहेगी। अगर सेंक्टिटी रखनी है, इस हाउस और माननीय राष्ट्रपति जी की या और जो चुने हुए प्रतिनिधि हैं चाहे माननीय प्रधान मंत्री जी हों, नहीं तो दूसरे जो लोकतंत्र के दूसरे अंग हैं वे हमें जीने नहीं देंगे। माननीय अंडमान-निकोबार के यह सांसद कह रहे हैं अन्ना हजारे भी पैदा होंगे।
सभापति महोदय : ये अन्ना हजारे नहीं बोल रहे हैं ये अंडमान-निकोबार बोल रहे हैं।
श्री अर्जुन राम मेघवाल : जी, दूसरे अंग पैदा होंगे क्योंकि इतने आश्वासन देने के बाद, इतने बड़े-बड़े लोगों के कहने के बाद होता नहीं तो इसका मतलब यहां कोई गड़बड़ है। बिहार विशेष राज्य का दर्जा क्यों मांग रहा है? माननीय मेहताब जी चले गये, वे बात कर रहे थे।
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF FINANCE (SHRI S.S. PALANIMANICKAM): The reply is going to take place, may be, on next Friday on Special Category States. Regarding the request of according Special Category status to Bihar to avail 90 cent grant under States’ scheme instead of 30 per cent grant does not meet the criteria laid down by the National Development Council. Now, after the recent request given again by the Chief Minister of Bihar, it is being re-examined by the Planning Commission.
MR. CHAIRMAN : We will continue the discussion till 6 p.m. The reply will come later on.
श्री अर्जुन राम मेघवाल : ये कह रहे हैं कुछ शुरू किया है। उसके लिए माननीय मंत्री जी धन्यवाद। लेकिन हमारी जानकारी के अनुसार बिहार राज्य को अभी विशेष दर्जा नहीं मिला है।
सभापति महोदय ः रंजन जी को अब खुश हो जाना चाहिए। Something concrete is being done.
श्री अर्जुन राम मेघवाल : जब अंग्रेज यहां आये और कोलकाता में उनका हैडक्वार्टर था, बिहार, उड़ीसा और बंगाल का जो एरिया था, उसकी दीवानगी प्राप्त करने के लिए उन्होंने कितनी ही लड़ाइयां लड़ी और अंत में प्लासी की लड़ाई में जीते और उन्होंने इन तीन राज्यों की दीवानी प्राप्त की और उसकी बहुत खुशी मनाई। कारण क्या था? यह एरिया इतना खुशहाल था और कृषि उपज में संपन्न था, मिनरल के भंडार में संपन्न था कि अंग्रेडों को लगा कि अब हम हिंदुस्तान पर भी शासन कर सकते हैं और इन्होंने बहुत ग्रांड पार्टी इंग्लैंड में दी कि हमने तीन राज्यों की दीवानगी प्राप्त कर ली। वे राज्य आज किस हालत में हैं, कहीं न कहीं अपनी नीतियों की खामियां हैं। क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा है जबकि संविधान यह कहता है कि हम रीज़नल असंतुलन दूर करेंगे जबकि आजादी के बाद क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा है। अमीर और गरीब की खाई भी ज्यादा बढ़ी है, शहर और गांव की खाई भी बढ़ी है। यह जो विषय प्रो. साहब लाये हैं, वे भी इसीलिए लाए हैं। मैं भी राजस्थान से आता हूं।
अभी जो जनसंख्या के आंकड़े आए हैं, वह चौंकाने वाले हैं। 34 प्रतिशत की दर से दस साल में लोग शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। हमारे राजस्थान को अरावली पर्वत दो भागों में बांटता है। अरावली हिल्स के इधर वाले एरिया में बरसात होती है। एग्रीकल्चरल रिच एरिया है और अरावली हिल्स के नार्थ-वेस्ट में इतनी बरसात नहीं होती है। उसको रेगिस्तान कहते हैं। थार का रेगिस्तान यहां तक है। भारत में थार का रेगिस्तान इस भाग से ही प्रवेश करता है और यह शुरू ईरान से होता है। थार के रेगिस्तान की और साउथ-ईस्ट, जिसमें उदयपुर इत्यादि हैं, उनकी तुलना नहीं की जा सकती है। प्रादेशिक असमानता दूर करने के लिए कोई न कोई योजना बनानी होगी अथवा नार्थ-ईस्ट की जो शेयरेबल स्कीम है, जिसमें 90 प्रतिशत केन्द्र और 10 प्रतिशत राज्य देगा या कई ऐसी स्कीम्स हैं, जिनमें सौ प्रतिशत केन्द्र का होता है, लागू की हुई हैं। इन्होंने जो 90 हजार करोड़ रुपए की मांग की है और फिर उसके बाद प्रति वर्ष 30 हजार करोड़ रुपए की मांग की है, उसमें इसी तरह की कुछ योजनाएं हैं, जिनमें इन्होंने कहा है कि बिहार की जो दस्तकारी है, उसके लिए कुछ योजना बनायी जाए। बिहार में आजीविका मिशन स्थापित करके हाथ के हुनर को और विकसित करके बिहार के लोगों को रोज़गार दिया जाए, इसलिए मैं इनकी डिमान्ड के सपोर्ट में खड़ा हुआ हूं और बोल रहा हूं। बिहार अभी करवट ले रहा है। किसी भी राज्य में एमएलए लेड स्कीम समाप्त नहीं की गई है। भ्रष्टाचार कम हो रहा है। कई अन्य राज्यों में हो रहा होगा, क्योंकि प्रयास किए गए हैं, लेकिन सबसे ज्यादा बिहार में भ्रष्टाचार कम हो रहा है। ऐसा मीडिया भी कह रहा है और स्टडी भी कह रही है। एमएलए लेड स्कीम समाप्त करना एक क्रंतिकारी कदम है। एमएलए नाराज़ भी हुए होंगे। अभी बिहार सरकार ने कहा है कि हम एमपी लेड स्कीम की मॉनीटरिंग नहीं कर सकते हैं, कोई एकाउंट नहीं रख सकते हैं। बिहार के एमपी भी चाहते हैं कि केन्द्र सरकार यदि कुछ फण्ड दे तो वे भी एमपी लेड स्कीम के माध्यम से कुछ और सहयोग इसमें कर सकते हैं। इनके एमपी भी तैयार हैं। नीतीश कुमार जी ने सरकार को कुछ सुझाव भी दिए हैं। यदि उनको मान लिया जाता है तो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद अच्छी स्थिति बनेगी। मगध के समय में अग्रणी राज्य माना जाता था। अभी जैसा बताया कि कई बड़े लीडर बिहार ने दिए, यहां तीन-चार बैठे हुए हैं। बिहार में लीडरशिप है, लेकिन नीतियों के कारण बिहार में जो असमानता बढ़ी है, इसके लिए बिहार अपने लिए विशेष राज्य का दर्जा मांग रहा है।
महोदय, बिहार में रेल लाइनें ज्यादा हैं, इसलिए बिहार से संबंधित नेता रेल मंत्री बनना चाहते हैं। पासवान जी, नीतीश जी और लालू जी रेल मंत्री बने। रेलवे लाइन के किनारे खाली जमीन पड़ी है। राजस्थान से भी यह विषय उठा था, मैंने प्लानिंग कमीशन में बायो डीजल की बात की। बायो डीजल के लिए जेटरोफा उगाने की बात कही जाती है। रेलवे लाइन के किनारे जो जमीन पड़ी है, उसमें जेटरोफा क्यों नहीं उगाते हैं। रेलवे की जो पाइप लाइन है, उससे जेटरोफा के लिए पानी दिया जा सकता है। हमारे राजस्थान की कंडीशन जेटरोफा के लिए इतनी स्यूटेबल नहीं है, लेकिन बिहार की भौगोलिक स्थिति जेटरोफा के लिए ठीक है। बायो डीजल पैदा हो जाएगा और खाली जमीन पर जो अतिक्रमण होता है, वह रुकेगा तथा रेलवे के कर्मचारी उसमें पानी देने के लिए लगा दिए जाएं, तो जो बायो डीजल पैदा होगा, वह रेलवे के काम आएगा। ये कुछ नए प्रयोग करने पड़ेंगे। प्लानिंग कमीशन ने भी कहा कि इस बात में दम है।
बिहार में कितनी ज्यादा रेलवे लाइन बिछी हुई हैं और कितनी जमीन खाली पड़ी हुई है जिसके किनारे कच्ची झोंपड़ियां बनी हुई हैं। आप उसमें जेटरोफा उगाइए, पानी वहां उपलब्ध है और जलवायु भी उपलब्ध है और जो बॉयोडीजल पैदा होगा, वह रेलवे के काम आएगा। रेलवे इसके एवज में बिहार को जो पैसा देगा, वह बिहार के विकास में लगेगा। मेरे कुछ ऐसे सुझाव इस संबंध में हैं जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के साथ साथ बिहार को विकसित करने में अपना सहयोग देंगे। आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
श्री घनश्याम अनुरागी (जालौन): सभापति महोदय, आज प्रो. रंजन प्रसाद यादव जी द्वारा जो विषय रखा गया है, यह महत्वपूर्ण विषय है और इस पर मुझे बोलने का आपने मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। चूंकि पूरे देश में बिहार की स्थिति बहुत खराब है और जिस जगह का मैं रहने वाला हं, वहां की स्थिति तो बहुत ही ज्यादा खराब है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि बिहार कभी बाढ़ से जूझता है तो कभी सूखे से जूझता है और विकास के मामले में तो सबसे ज्यादा पिछड़ा हुआ माना जाता है। सबसे ज्यादा गरीब लोग बिहार और उत्तर प्रदेश में ही रहते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश हमेशा देश के मानचित्र में पिछड़े हुए के नाम से जाने जाते है। चूंकि वहां का विकास वास्तव में नहीं हुआ। क्या कारण रहा, हम यह नहीं समझ पा रहे हैं।
देश की आजादी में बिहार का बहुत बड़ा योगदान है। जब आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो वहां के बहुत सारे लोगों ने अपनी जान की बलि दी। आजादी की लड़ाई में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया और वहां महान पुरुष पैदा हुए। उसी तरह उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड जहां मैं रहता हूं, जो रानी लक्ष्मीबाई और ढ़ेर सारे देशभक्तों की रणभूमि रहा, लेकिन दुख इस बात का है कि न वहां सिंचाई की व्यवस्था है और न ही नौजवानों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था हो पा रही है। बिजली के विषय में जो चर्चा यहां हो रही है, मै कहना चाहता हूं कि ज्यादातर गांवों में बिजली नहीं है। यदि कहीं बिजली है, यदि कहीं खम्भे लगे हैं तो उनमें तार नहीं हैं। कहीं तार हैं तो ट्रंसफॉर्मर नहीं है और कहीं ट्रंसफॉर्मर भी है तो बिजली नहीं आती। यह बड़ा गंभीर विषय है। उसी तरह से सड़क के मामले को ले लीजिए। पूरे देश में आप गाड़ी से घूमिए। कहीं और दचके नहीं लगेंगे लेकिन जैसे ही बिहार और उत्तर प्रदेश में पहुंचेंगे तो अपने आप नींद खुल जाएगी कि आप बिहार और उत्तर प्रदेश में आ गये हैं क्योंकि सड़कें नाममात्र के लिए हैं। वहां सड़कें तो हैं लेकिन उनमें बड़े-बड़े गड्ढ़े हैं। इसी तरह से झारखंड की स्थिति भी गंभीर है। हम आपके माध्यम से सरकार को जगाना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश से लगे हुए जो जिले हैं चाहे रामाबाई नगर हो, चाहे इटावा हो चाहे ओरैया हो, जो बॉर्डर के जिले बुंदेलखंड के हैं, वहां नाममात्र के लिए भी विकास नहीं हुआ है।
वहां स्थिति बहुत गंभीर है। लोग गरीबी से मर रहे हैं, भूख से तड़पकर मर रहे हैं, बड़े नगरों में मजदूरी करने के लिए पलायन कर रहे हैं। वे जहां जाते हैं अपमानित होते हैं। मुम्बई में जाते हैं तो वहां के लोग मारपीट करते हैं। अन्य प्रदेशों में जाकर अपमानित महसूस करते हैं, उनके बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। मेरा निवेदन है कि उनके बच्चों की कम से कम पढ़ाई की व्यवस्था कर दीजिए, दवाई की व्यवस्था कर दीजिए क्योंकि सबसे ज्यादा रोग हमारे यहां हैं। बिहार और बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा बीमारियां हैं। आप दवाओं, पढ़ाई और खेतों में पानी की व्यवस्था कर दीजिए। पूरे देश में जमीन का हल्ला मचा, आप हमारे यहां आइए, यहां बीहड़ अनुपयोगी जमीन पड़ी है। आप सिंचाई की व्यवस्था नहीं कर पाए तो यहां उद्योग लगवा दीजिए। बड़े उद्योग लगवा देंगे तो यहां के नौजवानों को रोजगार मिल जाएगा। रोजगार मिलने से निश्चित तौर पर कुछ तो गरीबी कम होगी। आप कुछ को रोजगार दे दीजिए और कुछ को रिक्त सरकारी पदों पर नौकरी दे दीजिए। अगर नौकरी न दे पाएं तो थोड़ा बेरोजगारी भत्ता आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए दे दीजिए। मेरा निवेदन है कि आप ऐसी प्लानिंग बना दीजिए ताकि बिहार और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से लगे जनपदों को विशेष जोन के तहत मदद मिल सके।
सभापति महोदय, हम देखते हैं कि देश में एक तरफ तो सब सुविधाएं हैं। दिल्ली में सड़कें बनाने की जगह नहीं है, जमीन के अंदर रेलवे लाइन बिछाई गई है जबकि हमारे यहां सड़कें और रेलवे लाइनें नहीं हैं। आप यहां रेलवे लाइन बिछवा दीजिए, सड़कें बनवा दीजिए। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का लगातार चार साल से उत्तर प्रदेश में बजट नहीं गया। राजीव गांधी बिजली परियोजना में गांव में बहुत दूर एक खंबा लगा देते हैं और कहते हैं कि काम पूरा कर दिया। कृपया ऐसा न करें, बिजली दें तो पूरे गांव में दें। एक बल्ब या खंबा से काम नहीं बनेगा, विकास नहीं होगा, विकास तो तब होगा जब कम से कम घर तक बिजली पहुंचेगी। आप वहां एसी नहीं चलवा सकते तो पंखा ही चलवा दें। बिहार और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की स्थिति बहुत खराब है, लेकिन क्या करें? रोज अखबारों में आता है कि विदेशों में इतना कालाधन जमा है, आप इसी को वापिस मंगा कर उत्तर प्रदेश और बिहार में लगा दीजिए ताकि विकास हो हो सके। मुट्ठी भर लोग देश के बड़े आदमी बन गए जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग भूख से मर रहे हैं। कुछ लोगों को अपनी संपत्ति का पता ही नहीं है कि कितनी इकट्ठी हो गई है। ऐसे लोगों को कहीं न कहीं सरकार ने परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाया है। ये बड़े आदमी कैसे बने, इसकी भी जांच होनी चाहिए। बड़ी बिजली परियोजनाएं बना दी गईं, जहां बनाई गयी हैं वहां भी खेल है। जैसे कॉमन वैल्थ खेल में खेल हुआ, यह गंभीर विषय है। जब आप यहां से योजनाएं भेजते हैं तो कुछ यहां से बंदरबाट हो जाता है और जो उत्तर प्रदेश में जाता है वहां आधा-आधा हो जाता है। यह बहुत गंभीर विषय है, ऐसे मामलों की जांच होनी चाहिए। बुंदेलखंड को पैकेज दिया गया, लोगों ने चर्चा की कि बुंदेलखंड को बहुत पैकेज दिया गया। लेकिन सब कुछ कागजों पर दिया गया, फील्ड पर कुछ नहीं हुआ।
सभापति महोदय : अनुरागी जी, छः बजे इस बहस को समाप्त करना है, यह आगे जारी रहेगी। आप गागर में सागर भरिए।
श्री घनश्याम अनुरागी : महोदय, बुंदेलखंड को कुछ नहीं दिया गया, केवल कागजों में आंकड़े दिए गए। क्या बकरी पालने से वहां के लोगों की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी? बीमार बकरियां लेकर गए, छः लेकर गए और बुंदेलखंड में एक हफ्ते में मर गईं। क्या बीमार बकरियों से आर्थिक स्थिति सुधरेगी?
18.00 hrs. आप खेत में पानी की व्यवस्था करिये, सिंचाई की व्यवस्था करिये, बिजली की व्यवस्था करिये और कह दीजिए कि वहां के हर व्यक्ति के लिए पढ़ाई मुफ्त करेंगे, दवाई फ्री करेंगे, सड़के बनवायेंगे। आपको ऐसी कोई व्यवस्था करनी चाहिए। यदि बांधनी थी तो भैंस बांधते, बकरी दे रहे हैं।
सभापति महोदय, आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर मुझे बोलने का मौका दिया। हम इसका समर्थन करते हैं। हम चाहते हैं कि बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पूरे देश का विकास हो और मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि केवल वहीं का विकास न हो, जिस राज्य में आपकी सरकार हो, बल्कि उन राज्यों का भी विकास हो, जहां आपकी सरकार नहीं है। इसी के साथ मैं आपका आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
सभापति महोदय : श्री दारा सिंह चौहान जी, आप बोलिये।
श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): क्या मैं जीरो ऑवर पर बोलूं?
सभापति महोदय : नहीं, आप इस पर शुरू कर दीजिए, आपका भाषण अगले दिन जारी रहेगा। आप केवल आसन को एड्रैस कीजिए। उसके बाद जीरो ऑवर लेंगे। आपको जीरो ऑवर में भी समय देंगे। लेकिन अभी आप इसी पर शुरू कर दीजिए।
श्री दारा सिंह चौहान : सभापति महोदय, आज प्रो. रंजन प्रसाद यादव जी ने बिहार के लिए जो पैकेज की बात उठाई है, निश्चित रूप से बिहार एक महत्वपूर्ण राज्य है।
सभापति महोदय : आपका भाषण अगली बार जारी रहेगा। अब हम जीरो ऑवर लेते हैं।