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[Cites 1, Cited by 1]

State Consumer Disputes Redressal Commission

State Bank Of India vs Swati Datatech Pvt Ltd on 21 August, 2017

  	 Cause Title/Judgement-Entry 	    	       STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP  C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010             First Appeal No. A/2002/316  (Arisen out of Order Dated  in Case No.  of District State Commission)             1. State Bank Of India  q ...........Appellant(s)   Versus      1. Swati Datatech Pvt Ltd  a ...........Respondent(s)       	    BEFORE:      HON'BLE MR. Udai Shanker Awasthi PRESIDING MEMBER    HON'BLE MRS. Smt Balkumari MEMBER          For the Appellant:  For the Respondent:    Dated : 21 Aug 2017    	     Final Order / Judgement    

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।                                                        

सुरक्षित अपील सं0-३१६/२००२   (जिला मंच, कानपुर नगर द्वारा परिवाद सं0-५३२/१९९७ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक     ०७-०१-२००२ के विरूद्ध)   स्‍टेट बैंक आफ इण्डिया, नवीन मार्केट ब्रान्‍च, कानपुर द्वारा ब्रान्‍च मैनेजर।

                 ...........  अपीलार्थी/विपक्षी।

बनाम

१. मै0 स्‍वामी डाटाटैच प्रा0लि0, १४/१३०, सिविल लाइन्‍स, कानपुर द्वारा मैनेजिंग डायरेक्‍टर।

                                                  ............     प्रत्‍यर्थी/परिवादी।

२. डिस्ट्रिक्‍ट फोरम कन्‍जूमर प्रोटेक्‍शन, कानपुर नगर द्वारा प्रेसीडेण्‍ट।

............     प्रत्‍यर्थी।

 

समक्ष:- 

 

१-  मा0 श्री उदय शंकर अवस्‍थी, पीठासीन सदस्‍य। 

 

२-  मा0 श्रीमती बाल कुमारी, सदस्‍य। 

 

 

 

अपीलार्थी की ओर से उपस्थित       : श्री आशीष सक्‍सेना विद्वान अधिवक्‍ता।

 

प्रत्‍यर्थी/परिवादी की ओर से उपस्थित  : श्री विकास अग्रवाल विद्वान अधिवक्‍ता।

 

दिनांक :-  १३-०९-२०१७.

 

मा0 श्री उदय शंकर अवस्‍थी , पीठासीन सदस्‍य द्वारा उदघोषित   निर्णय प्रस्‍तुत अपील, जिला मंच, कानपुर नगर द्वारा परिवाद सं0-५३२/१९९७ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक ०७-०१-२००२ के विरूद्ध योजित की गयी है।

संक्षेप में तथ्‍य इस प्रकार हैं कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी के कथनानुसार परिवादी का चालू खाता संख्‍या-१०/९४३ अपीलार्थी बैंक में था। परिवादी का व्‍यापार मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0, नई दिल्‍ली के साथ था। परिवादी ने चेक सं0-५११२३२ दिनांकित २५-०९-१९९६ अग्रिम भुगतान के रूप में मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0 के पक्ष में जारी किया था जिसके भुगतान हेतु प्रस्‍तुतीकरण उक्‍त संस्‍था द्वारा सामान की सम्‍पूर्ण एवं सन्‍तोषजनक आपूर्ति के बाद की जानी थी किन्‍तु उक्‍त संस्‍था ने दुर्भावना से यह चेक सामान की सन्‍तोषजनक आपूर्ति न किए जाने के बाबजूद भुगतान हेतु प्रेषित किया किन्‍तु परिवादी के     -२- सौभाग्‍य से परिवादी के खाते में पर्याप्‍त धन नहीं था, अत: चेक का भुगतान नहीं हुआ। इस तथ्‍य की जानकारी पर परिवादी ने अपीलार्थी बैंक को अपने पत्र दिनांकित २८-१०-१९९६ द्वारा सूचित किया कि चेक सं0-५११२३२ दिनांकित २५-०९-१९९६ का भुगतान नहीं किया जाय। अपीलार्थी बैंक ने अपने पत्र दिनांकित २८-१०-१९९६ द्वारा परिवादी के इस पत्र की प्राप्ति स्‍वीकार की तथा १०/- रू० इस प्रयोजन हेतु भुगतान भी प्राप्‍त किया किन्‍तु मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0 ने पुन: चेक भुगतान हेतु प्रेषित किया तथा परिवादी की ओर से चेक का भुगतान न किए जाने के निर्देश के बाबजूद अपीलार्थी बैंक द्वारा चेक का भुगतान कर दिया गया। इस प्रकार बैंक की लापरवाही के कारण एवं सेवा में त्रुटि कारित करने के कारण परिवादी को २.५० लाख रू० का नुकसान हुआ। परिवादी ने नुकसान की भरपाई हेतु नोटिस भी अपीलार्थी बैंक को प्रेषित की किन्‍तु बैंक द्वारा भुगतान नहीं किया गया। अत: २.५० लाख रू० मय ब्‍याज एवं क्षतिपूर्ति की अदायगी हेतु परिवाद जिला मंच के समक्ष प्रस्‍तुत किया।

अपीलार्थी बैंक ने प्रत्‍यर्थी/परिवादी का उक्‍त चालू खाता होना तथा प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा उक्‍त चेक का भुगतान रोके जाने हेतु पत्र दिनांकित २८-१०-१९९६ भेजा जाना स्‍वीकार किया किन्‍तु अपीलार्थी बैंक का यह कथन हे कि अपीलार्थी ने यह सहमति व्‍यक्‍त की थी कि यदि भूल से चेक का भुगतान कर दिया जाता है तो उसका बैंक उत्‍तरदायी नहीं होगा। अपीलार्थी बैंक के कथनानुसार प्रश्‍नगत चेक का भुगतान भूल से कर दिया गया। अपीलार्थी का यह भी कथन है कि प्रश्‍नगत परिवाद में मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0, नई दिल्‍ली भी आवश्‍यक पक्षकार था किन्‍तु परिवादी ने परिवाद में उसे पक्षकार नहीं बनाया। परिवाद आवश्‍यक पक्षकार न बनाए जाने के कारण दोषपूर्ण है।

विद्वान जिला मंच ने प्रश्‍नगत निर्णय द्वारा परिवाद स्‍वीकार करते हुए अपीलार्थी बैंक को निर्देशित किया कि वह परिवादी को २.५० लाख रू0 दिनांक २५-०९-१९९६ से १२ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्‍याज सहित एवं ५००/- रू० वाद व्‍यय तथा ५,०००/- रू० क्षतिपूर्ति केक रूप में निर्णय के एक माह के अन्‍दर अदा करे।   

इस निर्णय से क्षुब्‍ध होकर यह अपील योजित की गयी।

    -३-

हमने अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री आशीष सक्‍सेना एवं प्रत्‍यर्थी विद्वान अधिवक्‍ता श्री विकास अग्रवाल के तर्क सुने तथा अभिलेखों का अवलोकन किया।

अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा प्रश्‍नगत चेक का भुगतान रोके जाने हेतु प्रेषित पत्र दिनांकित २८-१०-१९९६ के सन्‍दर्भ में अपीलार्थी बैंक द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादी को एक पत्र निर्गत किया गया था कि अगर भूलवश कोई भुगतान हो जाता है तो अपीलार्थी बैंक उत्‍तरदायी नहीं होगा। तदोपरान्‍त भुगतान रोक भी दिया गया। अपीलार्थी द्वारा प्रेषित इस पत्र पर परिवादी की सहमति भी थी। परिवादी द्वारा दी गई सूचना के आधार पर चेक की धनराशि का भुगतान न किए जाने हेतु परिवादी के खाते से सम्‍बन्धित लेजर में पृष्‍ठांकित कर दिया गया, किन्‍तु खाता चलता रहता है और खाते का दूसरा पन्‍ना आ जाने के कारण लिपिक द्वारा पूरे खाते को नहीं देखा जा सका, जो एक मानवीय भूल थी। क्‍योंकि खाते में पर्याप्‍त धन था एवं चेकधारक का अधिकार था कि उसे भुगतान किया जाय, अत: मानवीय भूल के कारण चेक की धनराशि का भुगतान हो गया जो उपेक्षापूर्ण कार्य की श्रेणी में नहीं आता। अपीलार्थी की ओर से यह तर्क भी प्रस्‍तुत किया गया कि परिवादी द्वारा मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0 को चेक दिनांक २५-०९-१९९६ को जारी किया किन्‍तु चेक का भुगतान रोके जाने हेतु पत्र दिनांकित २८-१०-१९९६ को एक माह बाद भेजा गया। अत: परिवादी द्वारा चेक का भुगतान हो जाने पर पहले कोई आपत्ति नहीं थी किन्‍तु बाद में आपत्ति की गई। चेक जारी किए जाने के उपरान्‍त लम्‍बी अवधि बाद दिनांक ०४-०३-१९९७ को भुगतान हेतु चेक प्रस्‍तुत किया गया। इस मध्‍य परिवादी के खाते से सम्‍बन्धित लेजर का सम्‍बन्धित पृष्‍ठ बदल गया। अपीलार्थी का यह भी कथन है कि दिनांक ०४-०३-१९९७ के बाद परिवादी ने खाते का संचालन कई बार किया किन्‍तु कोई शिकायत नहीं की गई। बाद में मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0 से सम्‍बन्‍ध में कटुता होने के कारण दिनांक ०३-०४-१९९७ को बैंक को नोटिस प्रेषित की गई। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्‍तुत किया गया कि बैंक द्वारा किया गया भुगतान किसी अनधिकृत व्‍यक्ति को नहीं किया गया तथा मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0 को किया गया जिसके पक्ष में चेक जारी किया गया था जिसे परिवादी से यह धनराशि व्‍यापार के सिलसिले में प्राप्‍त करनी थी।

  -४-

प्रस्‍तुत प्रकरण में यह तथ्‍य निर्विवाद है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी का चालू खाता सं0-१०/९४३ अपीलार्थी बैंक में था। यह तथ्‍य भी निर्विवाद है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादीने २.५० लाख रू० के भुगतान हेतु चेक दिनांकित २५-०९-१९९६ मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0, नई दिल्‍ली के पक्ष में जारी किया था। यह तथ्‍य भी निर्विवाद है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी ने इस चेक का भुगतान रोके जाने हेतु अपीलार्थी बैंक को सूचना प्रेषित की थी। अपीलार्थी बैंक का यह कथन है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा प्रेषित इस सूचना के सापेक्ष प्रत्‍यर्थी/परिवादी को अपीलार्थी बैंक द्वारा पत्र प्रेषित किया गया था, जिसके द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादी को सूचित किया गया था कि बैंक खो गये या चोरी गये चेकों के सम्‍बन्‍ध में चेक जारीकर्ता के आदेशों का अनुपालन करेगा परन्‍तु इस प्रकार के चेकों के भुगतान हो जाने से होने वाली हानियों के लिए ग्राहकों को कोई गारण्‍टी नहीं दे सकता। इस सन्‍दर्भ में अपीलार्थी बैंक द्वारा प्रेषित पत्र की फोटोप्रति अपील के साथ संलग्‍नक-१ के रूप में दाखिल की गयी है। मात्र इस पत्र के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि चेक का भुगतान रोके जाने की सूचना उपभोक्‍ता द्वारा प्रेषित किये जाने और बैंक द्वारा यह सूचना प्राप्‍त किये जाने के बाबजूद चेक का भुगतान हो जाने पर बैंक का उत्‍तरदायित्‍व न होना प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा स्‍वीकार किया गया क्‍योंकि प्रत्‍येक खाताधारक बैंक में खाता अपनी धनराशि सुरक्षित रहने के आश्‍वासन के आधार पर ही रखता है। बैंक द्वारा खाते के संचालन हेतु चेक सुविधा उपलब्‍ध करायी जाती है। प्रत्‍येक खाताधारक का अधिकार होता है कि अपने खाते की धनराशि के भुगतान हेतु चेक जारी कर सके एवं यदि किन्‍हीं परिस्थितियों में खाताधारक द्वारा जारी किए गये चेक का भुगतान रोकना है तो वह चेक का भुगतान होने से पूर्व अपने बैंक को इस सन्‍दर्भ में निर्देश दे सकता है। खाते का संचालन खाताधारक के निर्देशानुसार अपेक्षित है न कि सम्‍बन्धित बैंक की सुविधानुसार। यह भी उल्‍लेखनीय है कि प्रत्‍येक बैंक चेक सुविधा उपलब्‍ध कराने के लिए अलग से भुगतान प्राप्‍त करता है तथा जारी किए गये चेक का भुगतान रोके जाने हेतु खाताधारक द्वारा दिए गये निर्देशों का अनुपालन करने के लिए भी अलग से भुगतान प्राप्‍त करता है। प्रस्‍तुत मामले में भी अपीलार्थी बैंक द्वारा उपभोक्‍ता से १०/- रू० इस प्रयोजन हेतु प्राप्‍त किया गया।

जहॉं तक अपीलार्थी बैंक की ओर से प्रस्‍तुत किए जा रहे इस तर्क का प्रश्‍न है कि   -५- प्रश्‍नगत चेक का भुगतान जानबूझकर बैंक द्वारा नहीं किया गया, बल्कि मानवीय भूल के कारण यह भुगतान हो गया। क्‍योंकि प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा चेक का भुगतान रोके जाने हेतु सूचना, पत्र दिनांकित २८-१०-१९९६ के माध्‍यम से प्रेषित की गई थी। परिवादी द्वारा प्रेषित निर्देश उसके खाते से सम्‍बन्धित लेजर में अंकित किया गया किन्‍तु परिवादी द्वारा प्रेषित इस निर्देश की लम्‍बी अवधि बीत जाने के उपरान्‍त प्रश्‍नगत चेक भुगतान हेतु दिनांक ०४-०३-१९९७ को प्रेषत किया गया। इस मध्‍य खाते का संचालन चलता रहा। अत: परिवादी द्वारा चेक का भुगतान रोके जाने हेतु भेजे गये निर्देश सम्‍बन्धित लेजर का पेज बदल जाने के कारण मानवीय भूलवश ध्‍यान नहीं दिया जा सका। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा प्रस्‍तुत किया गया यह तर्क स्‍वीकार किए जाने योग्‍य नहीं है। जब खाताधारक द्वारा प्रश्‍नगत चेक का भुगतान रोके जाने हेतु निर्देश दिया जा चुका था तब अपीलार्थी बैंक का यह दायित्‍व था कि इस निर्देश का अनुपालन किया जाना सुनिश्चित करता। इस निर्देश का अनुपालन किस प्रकार किया जाना है यह बैंक को सुनिश्चित करना है। बैंक के कर्मचारी की लापरवाही का दायित्‍व बैंक द्वारा ही वहन करना होगा न कि सम्‍बन्धित उपभोक्‍ता द्वारा।

जहॉं तक मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0, नई दिल्‍ली को पक्षकार बनाए जाने का प्रश्‍न है, प्रश्‍नगत परिवाद में उपभोक्‍ता एवं बैंक के अधिकारों एवं दायित्‍वों पर विचार किया जाना है। प्रत्‍यर्थी/परिवादी एवं मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0, नई दिल्‍ली के परस्‍पर दायित्‍वों पर विचार नहीं किया जाना है। यह तथ्‍य महत्‍वहीन है कि प्रश्‍नगत चेक के सन्‍दर्भ में मै0 टेक्‍नोट्रोन इन्‍फोर्मेशन सिस्‍टम्‍स लि0, नई दिल्‍ली के क्‍या अधिकार थे।

प्रथम अपील सं0-३६८/२०१० STATE BANK OF INDIA Vs. M/S WTD SRI ITALY, III(2017) CPJ 169 (NC) के मामले में मा0 राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा दिए गये निर्णय दिनांक २२-०२-२०१७ में भी उपभोक्‍ता का चालू खाता बैंक में था। उपभोक्‍ता द्वारा चेक का भुगतान न किए जाने का निर्देश देने के उपरान्‍त बैंक द्वारा भुगतान किए जाने पर बैंक द्वारा सेवा में कमी किया जाना माना गया तथा चेक की धनराशि की अदायगी का उत्‍तरदायित्‍व बैंक का माना गया।

प्रस्‍तुत प्रकरण में भी हमारे विचार प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा चेक का भुगतान रोके जाने का निर्देश दिये जाने के बाबजूद अपीलार्थी बैंक द्वारा भुगतान किए जाने के कारण अपीलार्थी -६- बैंक द्वारा सेवा में कमी की गई है। अत: प्रत्‍यर्थी/परिवादी चेक की यह धनराशि अपीलार्थी बैंक से मय ब्‍याज प्राप्‍त करने का अधिकारी है। विद्वान जिला मंच ने चेक की धनराशि १२ प्रतिशत ब्‍याज सहित अदा करने हेतु निर्देशित किया है। हमारे विचार से ब्‍याज की निर्धारित दर अधिक है, ०९ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्‍याज की दर से ब्‍याज की अदायगी हेतु निर्देशित किया जाना न्‍यायोचित होगा। विद्वान जिला मंच ने ५,०००/- रू० क्षतिपूर्ति के रूप में भी भुगतान हेतु निर्देशित किया है। क्‍योंकि चेक की धनराशि की मय ब्‍याज अदायगी करायी जा रही है, अत: मामले की परिस्थितियों के आलोक में क्षतिपूर्ति के रूप में अलग से अदायगी कराया जाना न्‍यायसंगत नहीं होगा। अपील तद्नुसार आंशिक रूप से स्‍वीकार किए जाने योग्‍य है।   

आदेश       प्रस्‍तुत अपील आंशिक रूप से स्‍वीकार की जाती है। जिला मंच, कानपुर नगर द्वारा परिवाद सं0-५३२/१९९७ में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक ०७-०१-२००२ इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि अपीलार्थी बैंक को निर्देशित किया जाता है कि वह प्रत्‍यर्थी को २.५० लाख रू० ०९ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्‍याज सहित निर्णय की तिथि से एक माह के अन्‍दर भुगतान करे। ब्‍याज परिवाद योजित करने की तिथि से सम्‍पूर्ण धनराशि की अदायगी तक देय होगा। इसके अतिरिक्‍त अपीलार्थी बैंक प्रत्‍यर्थी/परिवादी को ५००/- रू० वाद व्‍यय की मद में भी निर्धारित अवधि में अदा करें। क्षतिपूर्ति के सन्‍दर्भ में पारित आदेश अपास्‍त किया जाता है।

      इस अपील का व्‍यय-भार उभय पक्ष अपना-अपना स्‍वयं वहन करेंगे।

      उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्‍ध करायी जाय।

                                    

                                               (उदय शंकर अवस्‍थी)                                                   पीठासीन सदस्‍य                                                     (बाल कुमारी)                                                      सदस्‍य     प्रमोद कुमार वैय0सहा0ग्रेड-१, कोर्ट नं.-२.  

   

      [HON'BLE MR. Udai Shanker Awasthi] PRESIDING MEMBER   [HON'BLE MRS. Smt Balkumari] MEMBER