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Lok Sabha Debates

Further Discussion On Resolution Regarding Implementation Of</Span><Span ... on 1 August, 2014

Sixteenth Loksabha an> Title: Further discussion on resolution regarding implementation of recommendations of National Commission on Farmers moved by Shri Raju Sheeti on 18.07.2014 (Discussion not concluded).

   

HON. CHAIRPERSON : Now, let us take up Private Members’ Resolutions.  Shri Raju Shetti to continue.

श्री राजू शेट्टी (हातकणंगले) : सभापति महोदया, मैं डॉ. स्वामीनाथन कमीशन की जो सिफारिश है, उस पर अमल करने के बारे में एक गैर-सरकारी प्रस्ताव पर बोल रहा हूं। मुझे पूरे देश के किसानों की बात सदन में रखनी है, इसलिए मैं आपका संरक्षण चाहता हूं।

          सभापति महोदया, इस देश में किसानों द्वारा आत्महत्याएं आज भी हो रही हैं। उसका कारण है कि किसानों को लागत मूल्य से भी कम दाम मिल रहे हैं, उनकी खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है, इसलिए किसानों की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। वर्ष 2008 में किसानों के लिए सरकार ने 73,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी की घोषणा की। लेकिन इस ऋण माफी का फायदा घोटालेबाजों ने ही ज्यादा उठाया। जो किसान ईमानदारी से खेती करता था, इस ऋण माफी का फायदा उस तक नहीं पहुंचा।   यूपीए सरकार ने 73,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी का ढोल तो खूब पिटवाया, लेकिन पिछले हफ्ते जब मैंने वित्त मंत्री जी से एक सवाल पूछा था कि देश के किसानों के लिए असल में ऋण माफी कितनी हुई है तो उन्होंने जवाब दिया कि इस देश के किसानों को सिर्फ 52,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी हो चुकी है। इसका मतबल यह है कि उसमें भी 20,000 करोड़ रुपये का फर्क है। पिछले 8 सालों से पिछली सरकार कह रही थी कि हमने किसानों को बहुत मदद की है।

          सभापति महोदया, 13 दिसम्बर 2013 में सदन में एक अतारांकित प्रश्न पूछा गया और उसका मंत्री महोदय ने जवाब दिया कि वर्ष 2008 में ऋण माफी होने के बावजूद 2008 से 2012 तक इस देश में, पांच सालों में ही 77499 किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसका मतलब यह हुआ कि ऋण माफी के बाद भी किसानों की आत्महत्याएं कम नहीं हुई हैं।

          सभापति महोदया, पिछले दिनों विदर्भ के 90 किसान दिल्ली आये थे। उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति जी को अर्जी लिखी कि हमें इच्छा मरण की परमिशन दीजिए क्योंकि हमारी खेती घाटे में जा रही है। हमें मार्केट प्राइज नहीं मिलता है। जब भी कहीं अनाज के दाम बढ़ते हैं तो सरकार हस्तक्षेप करके रेट कम करवाती है और जब उत्पादन बढ़ता है और सप्लाई ज्यादा हो जाती है तथा रेट कम हो जाते हैं तब सरकार किसानों की मदद के लिए आगे नहीं आती है। इस देश के किसानों को लागत मूल्य से कम मिलता है,इसका कारण उन्हें न बुनियादी साधन मिल रहे हैं और न ही भंडारण क्षमता है,न कोल्ड स्टोरेज है। हमारे देश में प्री हार्वेस्टिंग और पोस्ट हार्वेस्टिंग में जो नुकसान होता है वह हर साल 44 हजार करोड़ रुपयों का होता है क्योंकि हमें जो तकनीकी सहायता किसानों को देनी चाहिए थी,वह नहीं दी है इसलिए किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हमारे किसानों ने पिछले दस साल में उत्पादन में काफी वृद्धि की है लेकिन जीडीपी में हमारे कृषि क्षेत्र का जो हिस्सा था,वह बीस प्रतिशत से 17 प्रतिशत पिछड़ गया है। इसका मतलब कि हम उत्पादन बढ़ा रहे हैं लेकिन उसका सही हिस्सा किसानों को नहीं मिल रहा है और इसी कारण किसान घाटे में जा रहा है। किसानों की लागत मूल्य दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके कारण किसान मार्केट से जो उर्वरक खरीदता है,उनकी कीमतें उनके हाथ में नहीं है। यह देश की नीति तय करती है कि उर्वरकों की कीमतें क्या होंगी। किसान को बाजार मूल्य से उर्वरक खरीदने पड़ते हैं। डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। बिजली की कीमतें बढ़ रही हैं। कीटनाशकों की कीमतें बढ़ रही हैं। बीज भी महंगे मिलते हैं और साथ ही साथ मजदूरी भी बढ़ रही है। इस हिसाब से अगर पिछले दस सालों में किसानों ने अनाज का जो उत्पादन किया है,उस अनाज का दाम इस अनुपात से नहीं बढ़ा है। इसी कारण आज खेती घाटे में जा रही है।

          महोदया,सैंट्रल इंस्टीटय़ूट आफ पोस्ट हार्वेस्टिंग इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी ने सरकार को वर्ष 2015-16 के लिए सुझाव दिया है कि देश के किसानों को अगर कोल्ड स्टोरेज की सुविधा देनी है तो कम से कम 55 हजार करोड़ रुपयों की आवश्यकता होगी क्योंकि आज इस देश में सिर्फ चार राज्यों में कोल्ड स्टोरेज की सुविधा मिलती है और 24 राज्यों में किसानों को कोल्ड स्टोरेज की सुविधा न मिलने के कारण उनका बहुत बड़ा नुकसान होता है। इसका मतलब यह है कि किसान मेहनत करता है और जो उत्पादन करता है वह उत्पादन मार्केट तक सुरक्षित तरीके से नहीं पहुंचता है। उसमें बहुत नुकसान होता है। किसान के पास भंडारण क्षमता नहीं है और इस कारण जब सभी किसान एक-साथ मार्केट में जाते हैं तो बाजार का भी एक नियम है कि जब एक साथ सप्लाई डिमांड से ज्यादा होती है तो कीमतें गिरती हैं। जब मार्केट में तेजी आती है तो सरकार हस्तक्षेप करती है और किसानों को मार्केट मूल्य नहीं मिलने देती है। आज की तिथि में आलू हो या प्याज हो,इसका निर्यात मूल्य बढ़ाया,इसके ऊपर सरकार ने कंट्रोल किया,लेकिन सरकार यह नहीं सोचती है कि आलू और प्याज महंगा क्यों हुआ है।

          दो महीने पहले तक इस देश में जो बारिश हुई थी और जो ओले गिरे थे,उसके कारण किसानों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ था और बेचने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा। इसलिए डिमांड -सप्लाई नियम के तहत आज तेजी आ गई है। जो किसानों का नुकसान हुआ था,उसका मुआवजा किसानों को नहीं मिला। किसान जो सोचते थे कि मुझे ज्यादा पैसा मिलने वाला है,वह पैसा देने के लिए सरकार तैयार नहीं है। कीमतें जब गिरती हैं तो किसानों को नसीब के हवाले करके सरकार देखती रहती है क्योंकि इसी सदन में मैंने एक मुद्दा उठाया था कि जब किसान आलू और प्याज सड़क पर फेंक रहे थे,उस वक्त सरकार ने कोई मदद नहीं की थी।

          इसी तरह से जब दूध के मामले में समस्या आ रही थी तो देश का किसान दूध का क्या करें,क्योंकि सरकार ने कुछ मदद नहीं की लेकिन जब मिल्क पाउडर के रेट बढ़ गये तो एक्सपोर्ट करना शुरु कर दिया। जब चीनी महंगी होती है,जब अन्तर्राष्ट्रीय मार्केट में चीनी के दाम बढ़ते हैं तो सरकार एक्सपोर्ट को बैन कर देती है। लेकिन जब दाम गिरते हैं तो किसानों की कोई मदद नहीं करता और यही कारण है कि आज किसानों की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि आज किसान महामहिम राष्ट्रपति जी से कह रहा है कि हमें इच्छामरण की इजाजत दे दीजिए। यह बहुत ही गंभीर मामला है। इस देश में अगर बुनियादी ढांचा बनाना है तो इस देश में कृषि के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

          हमारे प्रधान मंत्री जी जब चुनाव रैली में महाराष्ट्र और पंजाब में गये थे तो उन्होंने आश्वासन दिया था कि अगर हमारी सरकार सत्ता में आती है तो इस देश के किसानों को हम मरने नहीं देंगे,हम आत्महत्या नहीं करने देंगे। हम इस देश के किसानों को लागत मूल्य का पचास प्रतिशत मुनाफा देंगे। इस तरह का ऐलान मोदी जी ने महाराष्ट्र और पंजाब में किया था। इसीलिए मैं आज यहां प्रस्ताव रख रहा हूं कि मोदी जी ने जो किसानों को जो आश्वासन दिया था,वह आश्वासन पूरे करने का आज वक्त आ गया है। लेकिन बड़े दुख से इस सदन में मैं बताना चाहता हूं कि एक तरफ हमारे प्रधान मंत्री जी ने कहा कि इस देश के किसानों को हम लागत मूल्य का पचास प्रतिशत मुनाफा दे देंगे और दूसरी तरफ हमारे कृषि मंत्री जी ने जो समर्थन मूल्य की पिछले महीने घोषणा की,वह  1360 रुपये कर दिया जो पिछले साल की तुलना में केवल 50 रुपये ज्यादा था। ज्वार 1530 रुपये कर दिया जो पिछले साल की तुलना में 30 रुपये ज्यादा है। बाजरा में कुछ भी नहीं बढ़ाया। 1530 रुपये रखा। सोयाबीन में कुछ भी नहीं बढ़ाया। मेज़ 1310 रुपये रखा। अरहर 4350 रुपये किया लेकिन 50 रुपये ही बढ़ाया । उड़द 4350 किया। कपास 3750 कर दिया। सिर्फ 50 रुपये ही बढ़ाया। मूंगफली का दाम 4000 रुपये ही रखा। गेहूं 1400 रुपये कर दिया। सिर्फ 50 रुपये ही बढ़ाया। अगर यह प्रतिशत में निकाला जाए तो यह सिर्फ एक या दो प्रतिशत बढ़ोतरी है। कहां पचास प्रतिशत बढ़ोतरी करने की बात प्रधान मंत्री जी ने कही थी और कहां कृषि मंत्री जी ने केवल समर्थन मूल्य बढ़ाया है। इसका मतलब इस देश के किसानों को ऐसा लग रहा था कि अगर देश में सत्ता परिवर्तन हो गया है तो इसका मतलब यह है कि किसानों के लिए अच्छे दिन आएंगे। लेकिन इस तरह से एक या दो प्रतिशत समर्थन मूल्य बढ़ाने से कोई अच्छे दिन नहीं आएंगे। बल्कि आत्महत्या करने वालों की संख्या और बढ़ने लगी है।

          मैं माननीय मंत्री जी से एक सवाल पूछना चाहता हूं कि यह जो एक और दो प्रतिशत समर्थन मूल्य इन्होंने बढ़ाया,इसके पीछे क्या ईक्वेशन है?  किस तरह से इसका अध्ययन किया गया?अगर डीजल की कीमतें बढ़ गईं,अगर उर्वरकों की कीमतें बढ़ गईं,अगर मजदूरी बढ़ गई तो एक प्रतिशत समर्थन मूल्य हमारा किस तरह से बढ़ता है? सरकार रेल चलाती है,रेल का किराया 15 परसेंट बढ़ जाता है,एमएसपी कैसे एक परसेंट बढ़ जाता है?इसका जवाब मंत्री महोदय को देना होगा। मैं मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि लागत मूल्य निकालने का तरीका क्या है?मैं किसान नेता होने के नाते कहना चाहता हूं कि सरकार पहले जवाब ढूंढती है और उसके बाद इक्वेशन करती है। सरकार पहले यह तय करती है कि किसानों को कितना देना है और उसके बाद इक्वेशन करती है। सी वन,सी टू कितना है,इसके बारे में किसी को पता नहीं है। इस देश के 62 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर है। देश में उपज का समर्थन मूल्य फिक्स करने वाले लागत एवं मूल्य आयोग में केवल 35 लोग हैं। यही 35 लोग तय करते हैं कि इस देश के किसानों का भविष्य क्या होगा और उपज का समर्थन मूल्य क्या होगा?इनके पास कोई डाटा नहीं है। धान का समर्थन मूल्य 1307 रुपए है। राज्य और केंद्र सरकार के बहुत से इंस्टीटय़ूशन्स हैं,सोशल संस्थाएं हैं। मैं मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि क्या किसी भी इंस्टीटय़ूट में इस तरह का पेपर है?क्या इन लोगों ने धान उगाया या बोया है जो लागत मूल्य का हिसाब लगा लेते हैं। अगर है तो मुझे एक पेपर अध्ययन करने के लिए दीजिए ताकि मैं अपने राज्य के किसानों से कह सकूं कि इस तरह से खेती कीजिए,यह फायदे की खेती है,भारत सरकार में सरकारी बाबू जो बहुत सैलेरी लेते हैं,अगर वे इस तरह से कम पैसे में खेती कर सकते हैं तो किसान भी कर सकते हैं। इसकी टेक्नोलॉजी क्या है?क्या तरीका है?उन्होंने किस तरह के बीज बोए?किस तरह की जमीन थी?इसका भी हम अध्ययन करेंगे। लेकिन किसी भी जगह इनका डेमोंस्ट्रेशन प्लॉट नहीं है। क्यों नहीं है?सरकार के पास जमीन है। सरकार के पास कृषि विश्वविद्यालय है तो फिर क्यों इस तरह का कोई एक्सपेरिमेंट नहीं होता?क्यों इस तरह का डेमोंस्ट्रेशन प्लॉट नहीं होता?यह होना चाहिए ताकि किसान आकर देख सकें कि किस तरह से खेती की जाए कि लागत मूल्य कम हो जाए। इसे करने के लिए सरकार के पास वक्त नहीं है। सरकार खेती के नाम पर राजनीति कर रही है।

       महोदया,मैं इस सदन में दूसरी बार आया हूं। पिछले पांच साल से मैं सदन में बार-बार पूछता रहा हूं कि फूड कारपोरेशन आफ इंडिया में अनाज इकट्ठा होता है,उसका हिसाब कहां है?इसका एकाउंट कैसे देखते हैं?इसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिला है। कितना अनाज इकट्ठा होता है?कितना सड़ जाता है?कितने चूहे खा जाते हैं?कितना अनाज सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के जरिए गरीब लोगों तक पहुंचता है?हम इसका हिसाब मांगते हैं। किसान कम दाम में सरकार को अनाज देते हैं लेकिन वह अनाज भी गरीबों तक नहीं पहुंचता है। जब हम सवाल पूछते हैं तो जवाब मिलता है कि चूहों ने बहुत अनाज का नुकसान कर दिया। मैं सवाल पूछना चाहता हूं कि चूहे कौन से हैं,सफेद चूहे हैं या काले चूहे हैं?मुझे मालूम है ये सब सफेद चूहे हैं और किस तरह से किसानों का अनाज खा रहे हैं,शोषण कर रहे हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसान फसल उगाता है,अनाज की कीमतें कंट्रोल करने की बात होती है। इस सदन में महंगाई पर चर्चा होती है। मैंने कभी सुना नहीं कि टूथपेस्ट महंगी हो गई इसलिए किसी ने मोर्चा निकाला। मैंने अखबार में पढ़ा नहीं है कि पेट्रोल,डीजल की कीमतों के विरोध में किसी ने मोर्चा निकाला। मैंने कभी पढ़ा नहीं कि छात्रों की फीस बढ़ गई इसलिए किसी ने मोर्चा निकाला। लेकिन अगर गेहूं एक रुपये भी महंगा होता है तो मोर्चा निकल जाता है। अगर चीनी एक रुपये महंगी होती है तो मोर्चा निकल जाता है। अगर टमाटर एक रुपया महंगा होता है तो मोर्चा निकलता है। हमारे देश की एक परम्परा है,अगर देवताओं को खुश करना है तो किसी न किसी की बलि देनी पड़ती है। इसलिए सरकार क्या करती है कि महंगाई के खिलाफ बोलने वालों को खुश करने के लिए,उन्हें शांत करने के लिए किसानों की बलि चढ़ा दी जाती है,क्योंकि किसान बेचारा कोई प्रतिकार नहीं कर सकता। हमारी परम्परा है,देवताओं को मुर्गे या बकरे की बलि दी जाती है। शेर की बलि कभी किसी ने दी है,यह मैंने कभी सुना नहीं। क्योंकि शेर खुद आक्रमण करता है,इसलिए शेर की बलि कोई नहीं देता। अगर नरबलि दी जाती है तो छोटे बच्चों या महिलाओं की बलि दी जाती है,किसी वस्ताद की नरबलि कभी नहीं दी जाती है। इसी तरह से इस देश में जब-जब महंगाई पर चर्चा होती है,उस वक्त सिर्फ किसानों की बलि दी जाती है,लेकिन किसान किस हालत में जी रहा है,इसके बारे में कोई कुछ नहीं सोचता है। किसानों के उर्वरकों की कीमतें बढ़ रही हैं और किसान किस तरह से खेती करेगा,इस बारे में कोई नहीं सोचता है। अगर किसानों का लागत मूल्य कम करना है तो उन्हें बुनियादी सुविधा देनी चाहिए। आज पूरे देश के किसानों के पास जो खेती है,उस खेती के आधार पर यदि हम देखें तो यूरिया सबसे सस्ता मिलता है,इसीलिए किसान सबसे ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करता है,जबकि सुपर फास्फेट,पोटाश महंगा पड़ता है और इस तरह से कुछ विकृतियां पैदा हो गई हैं,जिसके कारण फसलों का उत्पादन कम होता है। लेकिन इसके बारे में हम किसानों को कुछ कहने के लिए तैयार नहीं हैं। आज मैं मोदी जी का अभिनंदन करता हूं कि उन्होंने पहली बार किसान हैल्थ कार्ड की बात की है,क्योंकि किसानों को भी पता चलना चाहिए कि मेरी जमीन में किस चीज की आवश्यकता है,मुझे कौन सा उर्वरक देना चाहिए और मिट्टी में आर्गेनिक खाद कम है,अगर उर्वरकों का खर्चा कम करना है तो किसानों के लिए गोबर और उनके घरों में पशु होने की आवश्यकता है। लेकिन किसान पशु पाल नहीं सकता,क्योंकि आज पशु पालना इतना आसान नहीं है। पशुओं का जो खर्चा है,दूध का जो लागत मूल्य है,वह निरंतर बढ़ता जा रहा है। इसलिए दूध का उत्पादन नहीं मिलता और पशु न होने के कारण जो आर्गेनिक मैटिरियल मिट्टी में जाना चाहिए,वह नहीं जा रहा है। इसलिए उर्वरकों की डिमांड बढ़ रही है। इसलिए इन सब बातों पर विचार करके हमें कुछ नीति बनाने की जरूरत है,लेकिन यह नहीं हो रहा है। दुर्भाग्यवश खेती के बारे में ऐसे लोग बातें करते हैं,जिन्हें खेती से कुछ लेना-देना नहीं है। इस क्षेत्र में कुछ ऐसे लोग हैं,जिन्हें किसानों के खेत खरीदने हैं और किसानों के खेत खरीदकर वहां बड़े-बड़े टावर खड़े करने हैं। लेकिन किसानों को मदद करने के बारे में आज कोई बात नहीं कर रहा है।

          महोदय,इसलिए मैं इस सदन से मांग करता हूं कि डा.स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को हमें तुरंत लागू करना चाहिए। क्योंकि हम इसी सदन में इस देश के गरीब लोगों के लिए अन्न सुरक्षा का बिल पास कर चुके हैं। अगर उन्हें अनाज देना है तो किसानों को खेती करनी चाहिए। अगर इस देश का किसान खेती करना छोड़ देगा तो 121 करोड़ जनता को खाने के लिए विश्व का कोई भी मार्केट इतना अनाज नहीं दे सकता। इसलिए गांवों में खेती करने वाले जो किसान हैं,उन्हें गांवों में खेती करनी चाहिए और उसके लिए उनकी मदद करनी चाहिए।

          इसके अलावा मैं आपको एक बात और कहना चाहता हूं कि पिछले हफ्ते मेरे पास एक किसान आया था। उसने कहा कि मेरे दो बच्चों की कालेज की फीस देनी है,लेकिन मेरें पास पैसा नहीं है। उसके बाजू में एक डिप्टी कलक्टर रहता है,उसकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी थी और वह किडनी के लिए डोनर ढूंढ रहा था। उस किसान ने मुझे कहा कि मुझे किडनी डोनेट करने के लिए परमीशन दिलवा दीजिए,ताकि जो डिप्टी कलक्टर है,वह उसके बदले में मेरे दोनों बच्चों के कालेज की फीस देने के लिए तैयार है।

          सभापति महोदया,इस देश के किसानों को अपने बच्चों की पढ़ाने के लिए अगर किडनी बेचने की परिस्थिति निर्माण होती है,तो गंभीरता से सोचना चाहिए कि हम कहां जा रहे हैं। जब हम खेती के ऊपर निर्भर थे,तब विश्व में हमारी बड़ी अर्थव्यवस्था थी। आज जीडीपी में हमारा हिस्सा 17 प्रतिशत तक गिर चुका है। 62 प्रतिशत लोग खेती पर आज भी निर्भर हैं। गांव से एक-एक बंदा आज शहर की तरफ आ रहा है। शहर की गंदी नाली में रहने लगा है। इसलिए हमें सोचना चाहिए कि खेत में काम करने वाला जो किसान है,उसके पीछे सरकार को और इस सदन को रहने की आवश्यकता है। अगर पिछले पांच साल में 77 हज़ार किसान आत्महत्या करते हैं,सभापति महोदय,मैंने भी थोड़ी बहुत हिस्ट्री पढ़ी है। विश्व में कहीं भी इतनी बड़ी तादात में आत्महत्याएं नहीं हुई हैं। अकेले किसान एक-एक कर के आत्महत्या कर रहे हैं,इसलिए इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। अगर एकसाथ इतने लोग मारे जाते तो उसके ऊपर पूरे विश्व में चर्चा हो रही होती।

          सभापति महोदय,जब कोई बंग्लादेश से निर्वासित हो कर आता है तो हम चर्चा करते हैं,कोई तिब्बत से निर्वासित हो कर आता है तो हम उसकी चर्चा करते हैं। उन निर्वासितों को मदद करने के लिए चर्चा होती है। जब खेती से पेट नहीं भरता,इसलिए खेती छोड़ कर शहर की तरफ आने वाले जो निर्वासित हैं,गांव के लोग हैं,जो शहर की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने लगे हैं,उनके बारे में हम कब सोचेंगे। आज देश का दो गुटों में विभाजन हो चुका है,एक तरफ है इंडिया,दूसरी तरफ है भारत। आज भारत से विस्थापित हो कर लोग अपने पेट भरने के लिए,अपने बच्चों के भविष्य के लिए इंडिया में आने लगे हैं। अगर इस तरह से भारत से एक-एक कर के लोग इंडिया में आते रहेंगे तो भारत पूरा बंजर हो जाएगा।

          सभापति महोदय,उस वक्त हम विश्व के किस बाज़ार में जा कर अनाज खरीदेंगे,इसके बारे में सोचना चाहिए क्योंकि हमने इतनी तरक्की की-इतनी तरक्की की लेकिन मुझे यह पता नहीं चलता,मैं मंत्री महोदय से प्रश्न पूछना चाहता हूँ,क्योंकि मैंने थोड़ा अध्ययन किया है,हरेक देश अपने किसानों को हर हफ्ते कुछ न कुछ डाटा देता रहता है। लेकिन हमारे किसानों को यह कभी मालूम ही नहीं होता कि हमारे देश की नीति क्या रहेगी,आयात-निर्यात की नीति क्या रहेगी। क्या हम निर्यात पर पाबंदी लगाने वाले हैं,निर्यात बैन करने वाले हैं या बाहर से अनाज खरीदने वाले हैं। इसके बारे में किसानों को कुछ मालूम नहीं होता है। किसानों पर आरोप लगता है कि भेड़चाल में अगर कोई एक किसान धान बोता है तो सभी किसान धान बोते हैं। कोई एक गन्ना बोता है तो सभी गन्ना बोते हैं।

          सभापति महोदय,अगर सैटेलाइट के जरिए सर्वे होता है,हरेक हफ्ते में हमारे कृषि मंत्री जी हमारे किसानों को कुछ डाटा देते कि इस साल गेहूं की घरेलू खपत इतनी है,अरहड़ की इतनी है,चीनी की इतनी है,अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में इस तरह से रेट चलने वाले हैं,अगर सोयाबीन की फसल करोगे तो हम एक्सपोर्ट कर के बाहर से पैसा ला सकते हैं। इस तरह से अगर कोई डाटा हमारे कृषि मंत्री देते तो अच्छा होता। किसान होशियार होता है,उसको अंदाजा होता है कि फसल कितनी आएगी। लेकिन उसको घरेलू बाज़ार का कोई डाटा उपलब्ध नहीं होता है,न ही अंतर्राष्ट्रीय मार्केट का कोई डाटा होता है। अगर सैटेलाइट सर्वे कर के हर आठ दिन में,हर पंद्रह दिन में हम डाटा दें कि आज गेहूं में इतनी बुवाई हो चुकी है,बाजरे में इतनी बुवाई हो चुकी है,ज्वार में इतनी बुवाई हो चुकी है तो हम किसानों को सलाह दे सकते हैं कि अब गन्ना बोना बंद करो,अब मेज़ की आवश्यकता है,क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में मेज़ के रेट बढ़ चुके हैं। हम इस तरह से डाटा दे सकते हैं। सरकार की ट्रेज़री से पैसा देने की आवश्यकता नहीं है,लेकिन यह जो जानकारी देनी चाहिए,यह जानकारी किसानों को नहीं मिलती है और जूए की तरह किसान खेती करता जा रहा है। उसको ऐसा लगता है कि आज चीनी का दाम अच्छा है,चलो हम गन्ने का उत्पादन कर लेते हैं। 

 

उसको ऐसा लगता है कि गेहूं का अच्छा दाम मिल रहा है तो गेहूं की फसल लेते हैं। उसको ऐसा लगता है कि आज प्याज का अच्छा दाम मिल रहा है तो प्याज की फसल लेते हैं।

          महोदया,हमारे देश का किसान बड़ा होशियार है। पिछले तीन महीने से मैं देख रहा हूं कि प्याज की कीमतें बढ़ रही हैं,अगर हमारे कृषि मंत्री जी,हमारे फूड एंड सिविल सप्लाई मिनिस्टर जून के महीने में ही कहते कि इस देश में प्याज की शॉर्टेज है,इस देश में आलू की शॉर्टेज है,विपरीत परिस्थितियों में भी हमारा किसान,यदि उसे ठीक पैसा मिलता है तो वह प्याज बोने के लिए तैयार है,आलू बोने के लिए तैयार है।

          महोदया,हमारे महाराष्ट्र में मैं एक ऐसे किसान को जानता हूं जो साल के 12 महीने आम का फल लेता है, 12 महीने अंगूर का फल लेता है,वह तकनीक उसके पास है,लेकिन हम किसानों को कुछ भी डाटा देते ही नहीं हैं। हम किसानों को विश्वास में लेते ही नहीं हैं। हम किसानों को कोई सलाह नहीं देते हैं। जब मार्केट में फसल आती है,तब चर्चा होती है कि इसमें क्या करना चाहिए?मैं आपको एक सीधी सी बात बताता हूं। वर्ष 2005 में ऑयल सीड इम्पोर्ट करने के लिए हमने 8,961 करोड़ रूपये खर्च किए और वर्ष 2011-12 में, यानी पांच साल में उसमें इतनी बढ़ोत्तरी हो गयी कि 45,940 करोड़ रूपये ऑयल सीड इम्पोर्ट करने में हमारी सरकार के खर्च हो गये।

          महोदया,इसका मतलब सोयाबीन,मूंगफली,सूर्यफूल आदि तरह के जो ऑयल सीड्स हैं,अगर हम उनका एमएसपी बढ़ाते,उनका समर्थन मूल्य बढ़ाते और अपने देश के किसानों से कहते कि हमें इस देश को ऑयल सीड के मामले में आत्मनिर्भर करना है। आप इनकी जितनी फसल उगाना चाहते हो उतनी फसल उगाओ,यह सरकार उसे खरीदने के लिए तैयार है तो ये जो हम विदेशी डॉलर इन्हें इम्पोर्ट करने में खर्च कर रहे हैं,वह पैसा हमारी सरकार का बचता।

          महोदया,हमारे यहां अनाज रखने की जगह नहीं है,यहां चीनी रखने की जगह नहीं है और दूसरी तरफ हम बाहर से दालें और ऑयल सीड इम्पोर्ट कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि किसानों को कुछ मालूम ही नहीं है कि किस तरह की खेती करनी चाहिए?

          महोदया,मैं जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि अगर इस देश के किसानों को इस तरह से सरकार मदद करती है तो इथेनॉल के मामले में हम देश को आत्मनिर्भर करेंगे। इस देश को हम दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनायेंगे,ऑयल सीड के मामले में आत्मनिर्भर बनायेंगे। जब ऐसा हो जायेगा तो जो डॉलर आज 60 रूपये पर गया है,वह डॉलर 40 रूपये से भी नीचे जा सकता है। ऑयल सीड,दलहन और पेट्रोल के इम्पोर्ट में हमारी सरकार का बहुत पैसा खर्च होता है। इन सब चीजों में बचत करने की क्षमता हमारे किसानों में है।

          महोदया,मैं कहना चाहता हूं कि यह करने के लिए सरकार की जो मानसिकता होनी चाहिए,वह मानसिकता आज नहीं है और इसीलिए यह सब हो रहा है। इस देश के किसानों को जिस तरह से लाल बहादुर शास्त्री जी ने विश्वास में लिया था,जिस तरह से उन्होंने किसानों के ऊपर भरोसा दिखाया था,उसी तरह से अगर सरकार किसानों पर भरोसा दिखाती है तो ये किसान फिर से इस देश को महाशक्ति बना सकते हैं।

          महोदया,मैं सदन से और मंत्री जी से एक विनती करता हूं कि आज किसानों के लिए फसल का लागत मूल्य का हिसाब करने की जो नीति है,वह बदलनी चाहिए। पूर्व लागत एवं मूल्य निर्धारण आयोग के अध्यक्ष डॉ0टी. हक ने सरकार को एक सुझाव दिया था,उन्होंने कहा था कि इस मेथोडोलॉजी में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। वर्ष 2008 में उन्होंने यह सुझाव दिया था। उस पर अमल करने की आवश्यकता है क्योंकि अगर वह होता है तो किसानों को सही मायने में समर्थन मूल्य मिलेगा,उसकी लागत मूल्य का हिसाब दिया जाएगा। इसलिए मैं मंत्री महोदय से विनती करता हूँ कि जिस समर्थन मूल्य का कृषि मंत्री जी ने ऐलान किया है,उसको वापस कर फिर से सप्लीमैंट्री देकर हमें गेहूँ,कपास,सोयाबीन,मूंगदाल,का समर्थन मूल्य नए ढंग से डिक्लेयर करना चाहिए। यह करने के लिए मैं डिमांड करता हूँ और कहना चाहता हूँ कि तुरंत एक कमेटी बनाकर यह जो गड़बड़ी हो रही है,खासकर फर्ज़ी लागत मूल्य निकालने का जो प्रयास कृषि लागत मूल्य आयोग में बैठे हुए बाबू लोग कर रहे हैं,इस पर कुछ नियंत्रण करने की आवश्यकता है और कुछ आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

16.05 hrs. (Shri Hukmdeo Narayan Yadav in the Chair) इसके बारे में मंत्री महोदय कुछ न कुछ निर्णय लें। मैं सरकार से विनती करता हूँ और सदन से भी विनती करता हूँ कि इस देश के प्रधान मंत्री ने इस देश के किसानों को एक वचन दिया है। उन्होंने कहा है कि हम समर्थन आयोग पर अमल करेंगे। इसलिए मैं मंत्री जी से विनती करता हूँ कि वे इस सदन में कहें कि हम तुरंत डॉ. स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल कर रहे हैं।

माननीय सभापति :   प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ :

“यह सभा सरकार से आग्रह करती है कि वह कृषि क्षेत्र में संकट को दूर करने के लिए राष्ठ्रीय कृषक आयोग, जिसे   ' स्वामीनाथन आयोग'  के नाम से भी जाना जाता है, की सिफारिशों को लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाए। ” SHRI ADHIR RANJAN CHOWDHURY (BAHARAMPUR):  Mr. Chairman, Sir, I would appreciate Shri Raju Shetty who has brought forward this Resolution with regard to the implementation of the recommendations of the National Commission of Farmers.
          As we all know, the Commission was led by Dr. Swaminathan and it is recognized as the  Swaminathan Commission. The Father of the Nation, Mahatma Gandhi, who led the farmers of Champaran towards the freedom struggle, was quoted as having said:  “India begins and ends in villages.” Pandit Jawaharlal Nehru exhorted: “everything else can wait but agriculture.” Sardar Vallabhai Patel exhorted “ I believe in one culture, that is, agriculture.” So, naturally, India is very much an agricultural country. Even in Kautilya’s Arthashastra, it is found that  there is a recitation for the Lord:
“Salutation to Lord Prajapathi Kashyapa.
Let the crops flourish always.
Let the Goddess reside in the grain and seed.” So, this is India where since time immemorial we have to rely upon agriculture and the farmers are the founders of our civilization and prosperity.
          The Swaminathan Commission was constituted by enshrining the terms of reference:
“To work out a comprehensive medium-term strategy for food and nutrition security in the country in order to move towards the goal of universal food security over time;
 
Propose methods of enhancing productivity, profitability and sustainability of the major farming systems of the country; suggest policy reforms to substantial increase flow of rural credit to all farmers; formulate special programmes for dry land farming for farmers in the arid and semi-arid regions, as well as for farmers for hilly and coastal areas; suggest measures for enhancing the quality of cost competitiveness of farm commodities so as to make them globally competitive; protecting farmers from imports when international prices  fall sharply; empowering elected local bodies to collect effectively; and conserve and improve the ecological foundation for sustainable agriculture.
The then UPA Government has approved the recommendations of the Dr. Swaminathan Commission and adopted various initiatives in order to implement the recommendations to the extent of the financial capacity of the country. Here, Rajiv Shetty ji was pleading for more subsidy to the farmers of our country but this Government has been caught in a great quandary.
आज सुबह प्रश्न काल में वित्त मंत्री जी ने कहा कि वह सब्सिडी घटाने की कोशिश कर रहे हैं। फ्यूल,फूड और फर्टिलाइज़र हमारा सबसे बड़ा मुद्दा subsidyका  है। बजट में यह घोषणा की गयी है कि सब्सिडी में दो परसेंट से ज्यादा की कटौती की जाएगी। दूसरी तरफ वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन,जिसका भारत भी एक सदस्य है,उनका ट्रेड फेसलीटेशन एग्रीमेंट में विकसित देश कह रहे हैं कि आप जो सब्सिडी दे रहे हैं,उसे घटाना पड़ेगा। यह डाइकोटामी है। एक तरफ सरकार कहती है कि सब्सिडी घटाएंगे,दूसरी तरफ डब्ल्यू.टी.ओ. कंट्रीज़ को कहती है कि हम सब्सिडी नहीं घटाएंगे। इस बारे में सच्चाई क्या है?हमें यह पता होना चाहिए। सरकार का इस बारे में क्या रवैया है?
Developed countries have been insisting upon the developing countries to curtail the subsidy component. So, the Government should come out with a clear objective of what is to be done by this Government. ...(व्यवधान)हां,हमने किया था। आपकी जब सरकार थी तो अरुण जेटली साहब कानकुन में जाकर बहुत ज़ोर से लड़े भी थे।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप लोग आपस में बातचीत न करें। आप अपनी बात कहें।
श्री अधीर रंजन चौधरी (बहरामपुर) : हम इसलिए कह रहे हैं कि आप बिगाड़ रहे हैं।...(व्यवधान)आप यह कीजिए,क्योंकि आप उधर यह करने के लिए ही बैठे हैं।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : माननीय सदस्य,आप अपना भाषण कीजिए।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : महोदय,आज दिन भर इरिगेशन और ड्रॉट के बारे में चर्चा हो रही थी।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : माननीय सदस्य आपस में बातचीत न करें।
श्री अधीर रंजन चौधरी : कृषि के साथ इरिगेशन का बहुत ताल्लुक है। शेट्टी साहब जहां से आते हैं, वह भी काफी सुखाड़ का इलाका है।
       महोदय, मैं एक ब्योरा देना चाहता हूं, जिससे आप समझ जाएंगे कि अभी हमारे देश में बहुत कुछ करना बाकी है। क्योंकि हमारे पास जो स्टोरेज कैपेसिटी है, जिससे इरिगेशन का काम होगा, यह पर-केपिटा बहुत कम है।  महोदय,जहां नॉर्थ अमेरिका में पर कैपिटा स्टोरेज कैपेसिटी 6,150 क्यूबिक मीटर है,वहीं रूस में 6,013 क्यूबिक मीटर,ऑस्ट्रेलिया में 4,729 क्यूबिक मीटर,चीन में 2,886 क्यूबिक मीटर और भारत में यह 262 क्यूबिक मीटर है। सोचिए हम लोग किस स्थिति से गुजर रहे हैं।
          महोदय,हमें वाटर इफिसिएंसी और वाटर प्रोडक्टिविटी पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। हमारे हिन्दुस्तान में जितने डैम हैं,उन सभी डैम को मिलाकर हमारे पास 174 क्यूबिक किलोमीटर स्टोरेज कैपेसिटी है।सर,जाम्बिया नाम का एक छोटा-सा देश है जहां करीबा नाम का एक डैम है। इस डैम की स्टोरेज कैपेसिटी 180 क्यूबिक किलोमीटर है और हिन्दुस्तान में जहां हमारे पास 2784 के आस-पास डैम हैं,वहां हमारी स्टोरेज कैपेसिटी मात्र 174 क्यूबिक किलोमीटर है। आसवान डैम के बारे में आप लोगों ने सुना होगा। आसवान डैम की स्टोरेज कैपेसिटी हमारी स्टोरेज कैपेसिटी से 12 क्यूबिक किलोमीटर ज्यादा है।
          सर,मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि एक तरफ सूखे की बात होती है तो दूसरी तरफ बाढ़ की बात होती है। हमारा 40 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र फ्लड प्रोन है। उसमें 3.5 मिलियन हेक्टेयर की क्रॉप एरिया अफेक्टेड होती है। जहां तक ड्राउट का सवाल है तो हमारे हिन्दुस्तान की 26औ आबादी ड्राउट के इलाके में बसी हुई है। हमारे देश का एक-तिहाई ज्योग्राफिकल एरिया ड्राउट से अफेक्टेड होता है। इसलिए हमें ड्राउट के साथ इर्रीगेशन की बैलेंसिंग करनी चाहिए। यह रिकमेंडेशन स्वामीनाथन जी ने भी किया है।
          सर,मैं आपके ध्यान में एक बात लाना चाहता हूं कि सबसे पहले कृषि को कन्करेन्ट लिस्ट में लाया जाए। कृषि अभी भी स्टेट लिस्ट में है। इसलिए कृषि को कन्करेन्ट लिस्ट में लाया जाए जिस से कि हम एक कॉप्रिहैन्सिव प्लान बना सके। वर्ष 2004-05 से हिन्दुस्तान में कृषि के क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। जब हम आज़ाद हुए थे तो आज़ादी के समय हिन्दुस्तान का फूड ग्रेन प्रोडक्शन 51 मिलियन टन था और आज हमारा फूड ग्रेन प्रोडक्शन 264 मिलियन टन है। स्वामीनाथन कमीशन ने एक रिकमेंडेशन किया था कि हमारी एग्रीकल्चर ग्रोथ 4औ होनी चाहिए। वह अभी हो रही है। दूसरी बात,स्वामीनाथन कमीशन ने किसानों को बैंकों से ऋण मुहैया कराने की पुरज़ोर रिकमेंडेशन की थी। आज देखिए कि इस बजट में आठ लाख करोड़ से ज्यादा रुपये कृषि क्रेडिट में दिए जा रहे हैं। यूपीए के जमाने में यह 7,35,000 करोड़ रुपये तक दिया गया था।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : अब अपना भाषण समाप्त करें।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : सर,मुझे बोलने दीजिए।
माननीय सभापति : अभी बहुत-से माननीय सदस्यों को बोलना है। यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इस पर अभी 20-25 मेम्बर बोलने वाले हैं।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : सर,अभी ज्यादा मेम्बर नहीं हैं। मुझे आराम से बोलने दीजिए।
माननीय सभापति : हमारे पास जितने सदस्यों के नाम हैं,हम उसी हिसाब से उन्हें बोलने का समय देते हैं।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : सर,वर्ष 2004-05 एक टर्निंग प्वायंट है। The Mid-Term Appraisal of the 10th Five Year Plan reviewed, for the first time, the depressing trend in agriculture and proposed multi-pronged steps to address the malaise. How was it done? A substantial correction began to be made in 2004-05 with increased allocation for various departments concerned with the development of agriculture, animal husbandry and agricultural research and education. During 2005-06, a National Horticulture Mission became operational and it extended the programme beyond fruits and vegetables and embraced medicinal plants and spices. A centrally-sponsored scheme called the Support to State Extension Programmes for Extension Reforms was launched in 2005-06. In 2005-06, a National Fund for Basic, Strategic and Frontier Application Research in Agriculture and a National Agricultural Innovation Project were launched.  It was, at that time, as per the recommendations of the Swaminathan Committee that agricultural trade was opened up by the government under the World Trade Organisation. These were also attempts to reform domestic agricultural marketing through the formulation of a model Agricultural Produce Marketing Committee (APMC) Act in 2003.  You know that model APMC Act was conceived by the former Government. लास्ट मुद्दा बता रहा हूं। Total gross capital formation as a percentage of agricultural GDP averaged 12.9 per cent during the five-year period ending 2003-04.  अनुराग जी को बता रहा हूं। But thereafter it steadily increased from 13.5 per cent in 2004-05 to 17 per cent in 2012-13. Increases in public investment in agriculture, though moderate, aided significant increases in private investment. Private investment to agricultural GDP ratios, which had hovered around 10 per cent to 11 per cent for quite some years, shot up to over 14 per cent in 2008-09 and remained at that level thereafter. अभी यह हो रहा है कि जहां हमारा हाई प्रोडक्टिविटी स्टेट था,जैसे कि पंजाब,हरियाणा,वेस्ट उत्तर प्रदेश,वहां हमारी प्रोडक्टिविटी नहीं बढ़ रही है। जहां हमारा लो-प्रोडक्टिविटी स्टेट था,वहां हमारी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है। यह देख कर हमें अच्छा लगता है कि जहां छत्तीसगढ़ से लेकर          M.P., Odisha झारखंड तक लो-प्रोडक्टिविटी थी,वहां बढ़ रही है,लेकिन जहां हमारी हाई प्रोडक्टिविटी थी,वहां नहीं बढ़ रही है। इसका मतलब यह है कि पिछली सरकार ने स्वामी नाथन कमिशन का रिकोमेंडेशन मान कर चलने की कोशिश की है। हिन्दुस्तान में आजादी के समय हमारा फूड ग्रेन प्रोडक्शन 51 मिलियन टन था,जो आज 264 मिलियन टन हो रहा है।
                                                                                               
माननीय सभापति : आपस की बातचीत को रिकॉर्ड में न लिया जाए।
...( व्यवधान)*     श्री ओम बिरला (कोटा) : सभापति महोदय,आज जिस विषय पर चर्चा हो रही है,वह देश के लिए सबसे गंभीर विषय है। जिसके लिए आजादी के बाद लगातार हर सरकार यह वायदा करती आई कि हमारी सरकार किसानों की सरकार है,किसानों की जिन्दगी को बदलने वाली सरकार है। उस किसान की जिन्दगी को बदलने के लिए एक राष्ट्रीय किसान आयोग बनाया गया,जिसकी रिपोर्ट 19 दिसम्बर, 2004, 11 अगस्त, 2005, 29 दिसम्बर, 2005 को प्रस्तुत की गई। तीसरी अंतिम रिपोर्ट 13 अप्रैल, 2006 को प्रस्तुत की।
          सभापति महोदय,आप विद्वान हैं। आपने हमेशा देश के अंदर शोषित,पीड़ित किसान का नेतृत्व किया है। आज सब को खुशी है कि जिस सभापति के रूप में आप बैठे हैं,आप किसान के दर्द और पीड़ा को जानते हैं। आज सारा सदन इस बात के लिए चिन्तित है कि किस तरीके से किसानों की बदहाली स्थिति को ठीक किया जाए। इस रिपोर्ट में जिन 3-4 बिन्दुओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया,उसमें सबसे बड़ा बिन्दु भूमि सुधार का था। भूमि सुधार के बाद पानी की समस्या तो हमारे देश में सब को पता है कि अंडरग्राउण्ड पानी हमारा समाप्त होता जा रहा है और सतही जल की स्थिति पूरे देश में ठीक नहीं है।
          पानी की समस्या पर,इस रिपोर्ट पर गम्भीरता से चर्चा और सिफारिश की गई। ऋण की समस्या पर भी इस कमेटी में सिफारिश की गई। मार्केटिंग लिंकेज कैसे हो,उसके बारे में भी इसमें सिफारिश की गई। नई तकनीकों के द्वारा किसानों को अधिक उत्पादन करने के बारे में भी इस रिपोर्ट में समीक्षा की गई। इस देश के अन्दर जलवायु परिवर्तन भी एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है,जिसके बारे में भी इस रिपोर्ट पर अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट पेश की गई है। हालांकि मैं सम्पूर्ण रिपोर्ट से सहमत नहीं हूं,लेकिन इस रिपोर्ट के बाद देश में बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। वह परिवर्तन इस बात के लिए भी हुआ है कि धीरे-धीरे जिस तरीके से कृषि भूमि गैर-कृषि कार्य के लिए काम में आने लगी है,उससे देश के अन्दर कृषि भूमि का रकबा कम होता चला गया। इतना ही नहीं कि सिर्फ रकबा कम होता चला गया,बल्कि परिवार बड़ा होता चला गया और जो किसान के पास रकबा बड़ा था,वह छोटी-छोटी खेती में परिवर्तित होता चला गया।   किसी जमाने में जब खेत पर किसान जाता था तो उसको कोई ऋण नहीं मिलता था,कोई मृदा परीक्षण की प्रयोगशालाएं नहीं थीं,कोई तकनीक नहीं थी,लेकिन उसके बाद भी किसान जाता था तो उसके चेहरे पर खुशहाली रहती थी। हमने हिन्दुस्तान में नहीं सुना था कि किसी किसान ने आत्महत्या की है,लेकिन आज इस देश के अन्दर रोज़ हम यह सुन रहे हैं कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वे आज ऋण के बोझ से डूब रहे हैं और जैसे हमारे मूल प्रस्ताव रखने वाले माननीय सदस्य ने बात बताई कि किस तरीके से कृषि उत्पादन को सड़कों पर सस्ती दर पर भी बेचा जाता है और फेंका भी जाता है। कई बार तो हमने यह भी देखा है कि किसान को उस फसल को या उस सब्जी को काटने का पैसा ज्यादा लगता है और उसको अगर काटने का पैसा दे और बाजार में बेचने जाये तो उसको उसके उत्पादन की कटाई की लागत भी नहीं मिलती।
          पंडित दीनदयाल जी ने एक बात बहुत पहले कही थी कि इस धरती पर अभी हालात क्या हैं,उन्होंने कहा था कि ‘अधेय मातृका कृषि’यानि इन्द्रावलम्बी नहीं,वरन् स्वावलम्बी कृषि का संयोजन आवश्यक है। आज जिस तरीके से जलवायु परिवर्तन हो रहा है और जिस तरीके से सतही जल कम होता जा रहा है,उसमें इस देश को पंडित दीनदयाल जी के बताये गये रास्ते पर चलने की आवश्यकता है। आज इसकी इसलिए आवश्यकता है कि हमारे गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री बनने वाले नरेन्द्र मोदी जी ने गुजरात में पानी की एक-एक बूंद का उपयोग कैसे हो और उस पानी के उपयोग के माध्यम से किसान का परिवार भी पले,समाज भी पले,उसके लिए गुजरात की धरती पर 14 साल तक मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने देश को एक दिशा दी है। आज भी हमारे देश के अन्दर इतने वाटर सोर्सेज़ हैं,कुएं हैं,पुरानी बावड़ियां हैं,उन सब का अगर पुनरुद्धार किया जाये तो हम शायद उस अंडरग्राउंड और सतही जल को,इस देश के अन्दर एक-एक बूंद पानी को रोक कर उसको सिंचाई और पीने के काम में ले सकते हैं। 
           माननीय सभापति महोदय,स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट में बहुत अच्छी बातें कही गई थी। उसमें किसानों के ऋणों को कम करने की भी बात कही गई थी। इसके बाद भी उन्होंने कई सिफारिशें लागू की। जब हमारे देश के प्रधान मंत्री जी ने देश की संसद को पहली बार संबोधित किया तो उन्होंने कहा कि गुजरात में कैसे परिवर्तन हुआ?उन्होने मृदा परीक्षण के लिए कौन सी खेती किस जमीन पर होनी चाहिए,उस जमीन में उर्वरक की मात्रा क्या होनी चाहिए,इन सारी परीक्षण प्रयोगशाला के लिए,देश को एक दिशा दी।
          माननीय सभापति महोदय,सैटेलाइट के द्वारा कहां-कहां एनिकैट बनना चाहिए?एनिकैट्स बने या नहीं बने पर,किस जमीन पर कैसी खेती होनी चाहिए,किन-किन फसलों का कितना उत्पादन होगा,उसके लिए भी सैटेलाइट,एक नई टेक्नोलॉजी के द्वारा,इस क्षेत्र में देश को एक नई दिशा देने की कोशिश की गई है।
          इस देश के अंदर कभी कोई खाद्यान्न बहुत ज्यादा पैदा हो जाता है तो उसकी कीमत कम हो जाती है। कोई खाद्यान्न कम पैदा हो तो उसकी कीमत भी बढ़ जाती है। कभी कोई सब्जी बहुत ज्यादा हो जाती है तो उसे फेकना पड़ता है। कभी कोई फल बहुत ज्यादा हो जाता है तो बाजार में उसकी कीमत कम हो जाती है। इसीलिए प्रधानमंत्री जी ने देश को एक दिशा दी है। आने वाले समय में यह देश देखेगा कि हम कृषि उत्पादन के आधार पर परिवर्तन की बात कर रहे थे,किसान को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे थे,उसकी इस देश के अंदर एक दिशा दिखेगी। मिट्टी परीक्षण के द्वारा कौन-सी खेती कहां होनी चाहिए,फसल कितनी होनी चाहिए। फसल कितनी पैदा हो रही है और भविष्य में कितनी पैदा होगी?क्या मार्केट होगा?आज हम समर्थन मूल्य की बात कर रहे थे। यह बात सही है कि इस देश में जब सरकार समर्थन मूल्य निश्चित करती है तो ऐसा लगता है कि किसानों के साथ न्याय नहीं करती है। कई बार हमें लगता है कि डी.ए.पी. का रेट,यूरिया का रेट,डीजल का रेट,बीज की कीमत ठीक नहीं है। किसान के लिए बिजली नहीं है,जहां बिजली नहीं है,वहां भगवान के भरोसे बैठा किसान है। आज हम देखते हैं कि किसान की माली हालत नहीं सुधरी है। आज भी किसानों के पैर में चप्पल नहीं है और तन पर कपड़ा नहीं है। जब वे दो रोटी खाने का इंतजाम करते हैं तो कभी बाढ़ आ जाती है,कभी तूफान आ जाता है,कभी उनकी फसल में कीड़े लग जाते हैं,कभी ओला वृष्टि हो जाती है और कभी अकाल पड़ जाता है। किसान फिर से कर्ज में डूब जाते हैं।
          सभापति महोदय,आप देखते होंगे कि किसान फिर खेत में आते हैं और मुस्कुराते हुए खेती करते हैं। जब हम गांव में जाते हैं तो देख कर सोचते हैं कि सोयाबीन की विराट फसल होगी। ऐसा लगता था कि सोयाबीन की बम्पर क्रॉप होगी। पर,जब 15 दिन के बाद वहां जाते हैं तो पता चलता है कि सोयाबीन की फसल में कीड़ा लग गया और किसान की फसल चौपट हो गई। जब हम उसकी पीड़ा को देखते हैं तो हमें देखते हैं कि वह करोड़ों रुपए के कर्ज में डूब गया है।
          माननीय सभापति महोदय,मैंने आपका भाषण सुना है। इस दुनिया के अंदर किसान अपनी कीमत तय नहीं करते हैं लेकिन एक सेठ,जो फैक्ट्री में पेन का उत्पादन करता है,वह उस पेन की कीमत खुद तय करता है। लेकिन,इस देश के अंदर किसान अपनी फसल की कीमत तय नहीं कर सकते हैं। अगर किसान अपनी फसल की कीमन तय नहीं कर सकते तो कम से कम सरकार तो किसान की फसल की मूल्य ऐसा तय करे,जिससे किसान की उत्पादन लागत और उस पर लाभ मिलने के बाद वह सुरक्षित रह सके।
          माननीय सभापति महोदय,इस देश में सबसे पहले किसान को सुरक्षित रखना है। किसान को सुरक्षित रखने के लिए यह जरूरी है कि उनकी फसल का मूल्य ठीक मिले। फसल बीमा पॉलिसी को व्यावहारिक बनना चाहिए। यह तहसील स्तर पर नहीं बनना चाहिए। यह गांव के स्तर पर बनना चाहिए। कहीं ओले पड़ते हैं,अलग-अलग जलवायु परिवर्तन है। कभी बाढ़ आती है,कहीं ओले पड़ते हैं कहीं नहीं पड़ते। इसलिए फसल बीमा ऐसी बननी चाहिए कि किसान को कम से कम उसकी उपज का लागत मूल्य फसल बीमा के आधार पर मिले। अगर हम इस देश में किसानों को सुरक्षित कर देंगे तो चाहे बाढ़ आए,चाहे तूफान आए,चाहे ओलावृष्टि हो,चाहे कीड़े लगें,किसान को उपज की लागत मूल्य के आधार पर बीमा मिले और लागत मूल्य का पैसा हमेशा बीमा के आधार पर कवर हो। अगर इस देश का किसान सुरक्षित हो गया तो हम एक नए परिवर्तन की ओर बढ़ेंगे।
          यह विषय गंभीर है। इसलिए मैं आपसे थोड़ा समय चाहता हूं।...(व्यवधान)हमारे साथी सांसद दुष्यंत सिंह जी बैठे हैं।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप संक्षिप्त में अपनी बात कहें क्योंकि अभी बहुत से सदस्य बोलने वाले हैं।
…( व्यवधान)
श्री ओम बिरला (कोटा) : जब लहसुन दो-तीन रुपये किलो बिकने लगा था,किसान सड़कों पर लहसुन फेंक रहा था। उसे कम लागत मिल रही थी। लहसुन बाजार में कम बिक रहा था। हम दिल्ली के दरवाजे पर आए। हमने कहा बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत लहसुन को खरीदना चाहिए। जहां समर्थन मूल्य हो वहां बाजार हस्तक्षेप योजना जो लागू है,उसका व्यावहारिक स्वरूप बनाना चाहिए ताकि हम किसानों को तीन तरह से सुरक्षित रख सकें। पहला,फसल बीमा के आधार पर उसको उत्पादन लागत हमेशा मिले। दूसरा,उसका समर्थन मूल्य इस तरह का तय हो कि उत्पादन लागत का लाभ हो। तीसरा,बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत जब कभी बाजार में कोई सब्जी या ऐसी वस्तु जो समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जा सकती,वह बाजार हस्तक्षेप योजना को व्यावहारिक बनाकर खरीदी जाए तो शायद देश के किसानों को सुरक्षित कर सकते हैं।...(व्यवधान)
          मेरा इतना ही निवेदन है कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की कई सिफारिशें अच्छी हैं।...(व्यवधान)किसान को सुरक्षित रखते हुए उसके उत्पादन की लागत ठीक मिले। भंडारण से लेकर तमाम चीजें जो हमारे प्रधान मंत्री जी की सोच,विचार है,हमारे साथी देखेंगे कि देश में आने वाले समय में किसान सुरक्षित होगा,उसे मार्किट मिलेगी,उसका जीवन बेहतर होगा। गांव तक फसल के साथ अन्य उत्पादन,जैसे हम कहते हैं गाय से लेकर तमाम चीजें,कृषि के सभी जुड़े हुए पहलुओं पर,आप गुजरात में चले जाइए,दो-तीन किलो दूध बेचकर भी व्यक्ति अपना पेट भर लेता है। गांव-गांव में इसी तरह का एक नेटवर्किंग सिस्टम जमेगा जिसके आधार पर कृषि के साथ कृषि से संबंधित अन्य पशुपालन,उद्योग की सामयिक योजना से किसान अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा। ...(व्यवधान)इसके लिए हमारी सरकार सामूहिक प्रयास करेगी।
                                                                                     
SHRI K. PARASURAMAN (THANJAVUR): Hon. Chairman, Sir, Thanjavur constituency in the State of Tamil Nadu needs to be provided sufficient funds for various agriculture and animal husbandry schemes. Thanjavur is the granary of South India, where most of the people are dependent on agriculture. On behalf of the hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Puratchi Thalaivi Amma, I thank the Government for the allocation of adequate funds for agriculture, animal husbandry, rural development and several other welfare schemes.
          An amount of Rs.1,000 crore has been allocated for agricultural farmers and irrigation under the Prime Minister’s Irrigation Scheme. Shyama Prasad Mukherjee Rurban Mission aims to provide road facilities to rural areas. Deendayal Upadhyaya Rural Jyoti Scheme aims to provide electricity facility to villages. In order to make the people of Tamil Nadu benefited by these schemes, necessary funds should be allocated to the State. The Union Government has proposed to set up agricultural research institutions in Assam and Jharkhand at a cost of Rs.100 crore. I request that such an institution be set up in Tamil Nadu, particularly in Thanjavur.
          An amount of Rs.50 crore has been allocated for inland fishing and cattle breeding. Hon. Amma provide milch cows, goats to the people below poverty line in Tamil Nadu in order to uplift them. The Union Government should also  allocate adequate and requisite funds for Tamil Nadu for implementing schemes relating to agriculture and animal husbandry. 
          I wish to bring to your kind notice the importance of conservation of historical moat of Thanjavur Big Temple, rainwater harvesting and revival of water bodies in my Thanjavur constituency.  Thanjavur district stands unique from time immemorial for its agricultural activities and is rightly acclaimed as the granary of South India. It lies in the deltaic region of famous river Cauvery and criss-crossed by lengthy network of irrigation canals, green paddy fields, mango gardens and other vegetation.
          Brahadeeswarar Temple, which is called the Big Temple is on the UNESCO World Heritage Site. It is also known as the Great Living Chola Temples. This is one of the largest temples in India which is 1000 years old. The temple complex sits on the banks of a river that was channelled to a moat formed 1500 years ago. At present, this moat is filled with debris and vegetation. It is the need of the hour to renovate this moat so as to attract large number of tourists to this temple in Thanjavur. Desilting and underground water connectivity at the moat is the need of the hour. Existing moat can be rejuvenated at a cost of Rs.200 crores.
          In order to make Thanjavur regain its traditional admires, I urge the hon. Minister of Environment and Forests to sanction adequately to the project of rejuvenation of moat of Thanjavur Big Temple.
          Sir, an amount of Rs.7060 crore has been allocated for creating 100 Smart Cities throughout the country. Many cities of Tamil Nadu, particularly Thanjavur should be included in the list of Smart Cities. Thanjavur has thousand years of history and tradition. Thousand years old Brahadeeswarar Temple is in Thanjavur. UNESCO has declared Darasuram Iravadeswarar temple and Jayankondam Gangaikonda Cholapuram Temple as the Great Living Chola Temples. This area should be declared as Siva Circuit and necessary provisions should be made for tourism development in my constituency.
          Tamil Nadu should be brought under National Mission on Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual Augmentation Drive and National Heritage City Development and Augmentation Yojana.
          Thanjavur is famous for Thiruvaiyaru music festival, Bharatanatyam, Thanjavur arts, veena - a musical string instrument - folk arts, heritage temples, etc. All the nine planets (Navagraha) have separate temples in my constituency. The adjoining temple in Kumbakonam where Mahamaham is performed should be declared as a heritage place and a pilgrim centre of excellence.
          Adequate funds have to be allocated for enhancing the infrastructure and rail, road and air connectivity in Thanjavur. I, therefore, urge that Thanjavur should be declared as heritage centre.
          Sir, the following are the immediate requirements of Thanjavur railway station. All departmental offices may be constructed in the area from booking office to signal cabin. For the benefit of public, a separate reservation counter office may be constructed in the place of the existing railway store. A separate ticket counter office may be constructed nearer to the subway. A two-wheeler parking may be constructed as a multi-storeyed parking as it is in Trichy. The existing subway may be extended up to platform numbers four and five. For the convenience of the public, toilet facilities may be provided in the middle of the platforms. All the departmental offices located on platform numbers two and three were built during the metre gauge period. So, they may be remodelled.
          In the Budget,  a proposal has been approved for having a double line and electrification between Trichy and Thanjavur, but no fund has been allocated till now.
माननीय सभापति :  माननीय सदस्य, कृपया विषय पर बोलें। यह चर्चा रेल बजट पर नहीं है।
SHRI K. PARASURAMAN : Please give me one minute.
          A scheme has already been approved for a railway line between Thanjavur and Pattukottai, but no fund has been allocated for it till now. There is a long pending demand of the people for a new broad gauge line from Thanjavur to Ariyalur. As a result, the travelling distance will be reduced by 100 kilometres and on the economic side, a large quantity of diesel may be saved. 
                                                                                                         
PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): Sir, I must thank Shri Raju Shetty for bringing this Resolution on farmers, highlighting their cause. He is from Ichalkaranji in Kolhapur district of western Maharashtra. He is a prosperous sugarcane farmer himself. He understands the problem of farmers. He has won his election, without support from either the UPA or the NDA, on his own strength. He had also won the last time. So, he must be having a lot of credibility among the farmers. It is good that he has brought this Resolution.
मैं यहाँ पर यह बोलने के लिए खड़ा नहीं हुआ हूँ कि आज़ादी के बाद देश में खेती में कुछ नहीं हुआ है। मैंने बचपन में देखा था कि अमेरिका से पीएल-480 गेहूँ आता था, तो हमारे राशन के दूकान चलते थे।  Today India is self-sufficient in food grains. हम हर प्रकार की चीजें बाहर एक्सपोर्ट भी करते हैं। लेकिन इतना कुछ करने के बावजूद आज भी किसानों की हालत खराब है। यहाँ पर मेरे कहने का मतलब यह है कि क्या हुआ है, उसके साथ हम अभी भी क्या कर सकते हैं और भविष्य में क्या करने की जरूरत है?
          सभापति महोदय, यह बात सब लोग बोल चुके हैं कि डॉ. स्वामीनाथन कमिशन नवम्बर, 2004 में गठित हुआ, जिसने चार रिपोर्टें दिसम्बर, 2004 में, अगस्त, 2005 में, दिसम्बर, 2005 में और अप्रैल, 2006 में दी। उसके बाद तत्कालीन सरकार, यूपीए-वन की सरकार द्वारा नेशनल पॉलिसी ऑन फार्मर्स 23 नवम्बर, 2007 में लाया गया। फिर for preparing the course of action, एक इंटरमिनिस्ट्रियल कमेटी बनी। अभी एग्रीकल्चर में भारत सरकार के कई मिशन काम कर रहे हैं। श्री संजीव कुमार बालियान हैं...(व्यवधान)
इनका तो मुज़फ्फरनगर में बहुत नाम है।  उनका एक बयान आया है। वे बोलते हैं कि पांच मिशन्स काम कर रहे हैं -नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन,मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर,मिशन ऑन ऑयल सीड्स एंड ऑयल पाम,मिशन ऑन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन एंड टेक्नोलॉजी,मिशन ऑन इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टीकल्चर। इनके अलावा भी एक नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस प्रोग्राम है,इंटिग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चरल कोआपरेशन है,इंटिग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चरल मार्केटिंग है,एग्रीकल्चरल सेंसस पर एक स्कीम है और इकोनोमिक सर्विस के लिए एक स्कीम है। स्टेट लेवल पर राष्ट्रीय कृषि विकास योजना है,जो यूपीए सरकार की योजना है,उसे दोहराया गया है। पार्लियामेंट में एक प्रश्न के जवाब में ही बालियान साहब ने बताया है,मैं उसी को कोट कर रहा हूं। अभी तक नया कुछ नहीं हुआ है। मैं यह बताना चाहता हूं कि इसके बाद,दस साल के बाद अभी भी फार्मर्स की हालत खराब है। हमारी एग्रीकल्चरल ग्रोथ चार प्रतिशत हुई है। अभी हमारे पास रिकॉर्ड फूडग्रेन्स स्टॉक है,अगर एक साल सूखा भी पड़ेगा,तो हम लोगों को खिला सकते हैं,लेकिन किसान की हालत क्या है?अभी भी फूड्स एंड वेजिटेबल्स की स्पवॉयलेज,जो खराब हो जाता है,तीस प्रतिशत है। किसानों के लिए कोई हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है। केवल 14 प्रतिशत फार्मर्स क्रॉप इंश्योरेंस से कवर्ड हैं। अभी तक क्रेडिट उन तक नहीं पहुंचा है। वर्ष 2008 में सरकार एक डेट-वेवर स्कीम लाई थी,लेकिन उसके बाद छः साल बीत गए हैं,फिर अब एक बार डेट-वेवर स्कीम की जरूरत है किसानों को बचाने के लिए,नहीं तो हम लोग किसान को सुसाइड से नहीं बचा सकते हैं। इस बारे में यूपीए और एनडीए,दोनों सरकारों का रिकॉर्ड बहुत खराब है क्योंकि किसानों की सुसाइड चलती रहती है। आपको सुनकर अचरज होगा कि कितने लोगों ने सुसाइड किया। एनडीए के समय में उनकी संख्या ज्यादा थी,यूपीए के समय में संख्या थोड़ी घटी थी। वर्ष 1999 में 16082 किसानों ने सुसाइड की,वर्ष 2000 लगभग 16603 किसान,वर्ष 2001 में 16415 किसान,वर्ष 2002 में 17971 किसान,वर्ष 2003 में 17160 किसानों ने सुसाइड की,जो एनडीए रिजीम में सबसे अधिक थी। यूपीए रिजीम के पहले साल में सुसाइड की संख्या हाई थी - 17368, उसके बाद फार्मर्स सुसाइड थोड़ी घटी। वर्ष 2010 में यह संख्या 15964 थी, वर्ष 2011 में 14027 और वर्ष 2012 में 13750 किसानों ने सुसाइड की। There was a declining trend in suicide, but that is no re-assurance. इसका मुख्य कारण क्या है? It is because farming is becoming less and less remunerative, and more and more capital-intensive. किसान फार्मिंग करने के लिए उधार लेता है और डेट में फंस जाता है,इसीलिए फार्मर सुसाइड करता है। इसी तरह से एक पॉलिसी होती है,जैसे विदर्भ के कॉटन फार्मर्स क्यों सुसाइड करते हैं,क्योंकि अचानक हम लोग कॉटन इम्पोर्ट करते हैं,कॉटन का प्राइस घट जाता है। इस तरह से पॉलिसी की वजह से भी लोग सुसाइड करते हैं। सबसे खराब हालत है पंजाब के किसानों की। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने एक सर्वे किया,उसकी रिपोर्ट आई। पंजाब की तीन यूनिवर्सिटीज ने एक सर्वे किया है,उसकी रिपोर्ट आई है। It states that : “…6,926 farmers committed suicide during 2000-2010. The situation is very bad in a State, which is known for high productivity of its farmers.” This is the maximum in the Sangrur District of Punjab. वहां पर ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। अब सवाल क्या है,बड़ा सवाल यह है कि हमारे किसान को जितना इनपुट चाहिए,वह उसे देना पड़ेगा। इनपुट में क्या चाहिए,उसे क्वालिटी सीड्स चाहिए,इरीगेशन के लिए पानी चाहिए,फर्टिलाइजर चाहिए और एग्रीकल्चरल क्रेडिट चाहिए। दुख की बात यह है कि आज़ादी के 67 साल भी हमारी कृषि में forty per cent of our agriculture is still rainfed. अब भी हम मानसून पर निर्भर हैं,अल नीनो आता है या नहीं,यह देखते हैं कि sixty per cent of gross cropped area and 45 per cent of total agricultural input. हम केवल आसमान की ओर देखते हैं कि अल नीनो आ रहा है,कितना शार्टफाल होगा मानसून में,फिर हम इरीगेशन में कवर नहीं कर पाते। हमने अभी तक कोई सॉलिड मैथेड नहीं बनाया है कि कैसे किसान को अच्छे दाम पर इनपुट दिया जाएगा और कैसे किसान को उसके उत्पादन का ठीक दाम मिलेगा। यह सही है कि हमने एमएसपी बढ़ाया है,लेकिन स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया है that the Minimum Support Price should be 50 per cent higher than the weighted cost of farming. एक क्रॉप प्रोडय़ूस करने के लिए जितनी लागत आती है,उससे 50 प्रतिशत ज्यादा देना चाहिए,तब कोई केपिटल फार्मेशन होगा। लेकिन आज तक यह हमारे मुल्क में नहीं हुआ है।
          अभी भी हमारी प्रोडक्टिविटी कम है। स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट में बताया है, how far behind we are in productivity of crops. दुनिया में पैडी प्रति हेक्टेयर किलोग्राम अगर लेते हैं तो भारत में 2929, चीन में 6321, जापान में 6414, यूएसए में 6622, मतलब we are almost one-third of the productivity of USA, China or Japan in matters of paddy. In matters of wheat, भारत में प्रति हेक्टेयर किलोग्राम अगर देखें तो वह है 2583, चीन में 3969, यूएसए में 2872 यानि गेहूं में भारत की प्रोडक्टिविटी अच्छी है। एक समय कहा जाता था कि पंजाब का किसान टैक्सास के किसान के समान प्रोडक्टिविटी देता है।
          सभापति जी,आप शूगर केन में देखें। यहां राजू शेट्टी जी बैठे हैं। इसमें हमारी उत्पादन क्षमता प्रति हेक्टेयर 68012, चीन में 85294 और यूएसए में 80786 इसका मतलब यह है कि हमारे यहां उत्पादन क्षमता और बढ़ाई जा सकती है।
          सभापति जी,मैं कुछ सुझाव देना चाहूंगा,क्योंकि मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता। मैं यह कहना चाहता हूं कि स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट आज की तारीख में आउटडेटेड हो गई है,क्योंकि वह रिपोर्ट आए आठ साल हो गए हैं,इस बीच एग्रीकल्चर में बहुत सारे बदलाव आए हैं। इसलिए सरकार को चाहिए  कि वह नया कृ­िा आयोग गठित करे। सरकार को एक फ्रेश एग्रीकल्चर पालिसी भी बनानी चाहिए और लागू करनी चाहिए। इसी तरह फ्रेश डेट वेवर की भी व्यवस्था करें,जैसा चिदम्बरम जी ने 2008 में किया था। जेटली जी को भी एक डेट वेवर की व्यवस्था करनी है, cover more farmers under crop insurance and convert micro-finance into livelihood finance. इस हाउस में चर्चा हुई इनटू लाइवलीहुड फाइनेंस। केवल खेती के लिए पैसा देने से ही कुछ नहीं होगा,उसे बचाने के लिए भी पैसा देना चाहिए।

17.00 hrs.  किसान को फैमिली हैल्थ इंश्योरेंस देना जरुरी है क्योंकि उन्हें कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं है। आप इंश्योरेंस में विदेशी पैसा लाना चाहते हैं लेकिन उसके पहले हमारा अपना हैल्थ इंश्योरेंस किसान को देने का प्रयास करें।

          हमारे बंगाल में नया ग्रीन रैवोल्यूशन हो रहा है। ईस्टर्न इंडिया में पैडी का पैदावार बहुत ज्यादा बड़ रहा है,इसे सस्टेन करना है क्योंकि पंजाब में वह शिखर पर पहुंच गया है। हमारे ईस्टर्न साइड में पैडी की पैदावार में बहुत बढ़ोत्तरी हो सकती है। मैं माननीय राजू शेट्टी को फिर धन्यवाद देना चाहता हूं कि वह सदन के माध्यम से किसान की हालत को देश के ध्यान में लाया। मेरे ख्याल में केवल स्वामीनाथन कमीशन नहीं बल्कि आज की किसान की हालत को देखते हुए एक नया कमीशन होना चाहिए और सरकार की तरफ से एक नेशनल पॉलिसी ऑफ फार्मर्स आनी चाहिए।

                                                                                                           

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): I stand here today to participate in the discussion that has been moved by our colleague Shri Raju Shetty on a specific Resolution which has two parts.  One is the operative part and the other is the result which he intends to get.  The operative part is that the Government should take effective steps to implement the recommendations of the National Commission on Farmers, also known as Swaminathan Commission.  In his speech, Shri Shetty has elaborated as to what are the steps which need to be taken.  I am of the opinion that certain steps have already been taken when the Prime Minister spoke on Vote of Thanks given to the hon. President of India.  Subsequently, in the Budget, certain other declarations have also been made.  But he wants to convey that if the Government wants to implement the recommendations in toto, we can overcome the crisis in agriculture sector.

17.03 hrs                           (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair)           I was trying to understand how far he has identified the crisis in Indian agriculture.  He has, of course, with his experience mentioned certain crises that the Indian agriculture is facing but that is not all.  We have different types of farmers in our country.  There was a time about which my previous speaker Prof. Saugata Ray mentioned.  At one point of time, eastern India was the granary of the whole undivided India i.e. including Myanmar, Bangladesh, Pakistan and even to a great extent Afghanistan.  Eastern India was providing foodgrains to all parts of the country.   It had very little irrigation facility and it was totally dependent on rain.  Subsequently, we started Green Revolution.  Then, embankments were created, large dams were constructed and the flow of irrigation started and western Uttar Pradesh and Punjab were shown the way.  Subsequently Hirakud, Damodar valley and all other projects were started.  The focus slowly shifted towards western India, and eastern India was totally neglected.  It was only during the previous UPA-II Government the then Finance Minister who is the present hon. President of India, made a course correction. Only Rs.100 crore was provided during his second or third Budget. He said: “Let us focus and bring in a second Green Revolution and Eastern India should become the laboratory of how we can increase our productivity.” It was not his idea alone. It was Dr. M.S. Swaminathan who was propagating this idea to have the Eastern India, which was the granary of 18th or 19th or even early part of 20th century of this sub-continent, to be the focus. Why not develop our agricultural produce in that area because the Western part of the country has been saturated? I was trying to find this out. It has five volumes. Prof. Roy mentioned about four volumes. The last volume listed a number of suggestions, which came in 2006.

          I would say here that we have to remember two specific dates. I want to confine my deliberations today on that. One is the year of 2004, the period in which these five reports were compiled and then the period of October 2006. It was during these two years in 2004 – I would like the Members to recollect – that the Eastern coast of our country faced severe tsunami including large areas of Tamil Nadu Coast and even Andhra Pradesh. The total livelihood of fishermen was shattered. When we talk of farmers, it is not only the cultivators; fishermen also come under that category. In that respect, I would say that it started in 2004. In 2006, the Kashmir Valley witnessed the earthquake. There were large areas of our country which also witnessed severe flood. So, in October 2006, there was severe earthquake in Kashmir, flood in Tamil Nadu and other parts of the country witnessed severe floods, acute shortfall of rain and drought-like situation was there in these years.

          It is common knowledge that institutional support to small farmers today is very weak. The same is true of post harvest infrastructure. Do we not see paddy being spread on the roads for drying in many places when we travel in our constituency? What does that signify? That signifies the poverty of our cultivators, of our farmers. Hardly ten per cent of farmers are covered by crop insurance. Farm families are also not covered by health insurance. There is no Agriculture Risk Fund. Both risk mitigation and price stabilization are receiving inadequate policy support. Shri Shetty is a very progressive farmer of our country. He is having one of the most progressive Shetkari Sangathan, the farmers’ union of our country which is very vocal to protect the interest of the farmers. … (Interruptions)

 

SHRI MD. BADARUDDOZA KHAN (MURSHIDABAD): Sir, I am on a point of order. There is no quorum in the House. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON : The bell is being rung- Hon. Members, there is no quorum in the House.

          The House stands adjourned to meet again on 4th August, 2014 at 11.00 a.m.   17.20 hrs The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, August 4, 2014/Shravana 13, 1936 (Saka).      

                                                                                             

*ण्ड्ढ म्श्र्द अ र्ठ्ठद्धत्ड्ढड्ड ठ्ठडदृध्ड्ढ ण्ड्ढ दठ्ठर्ड्ढ दृढ ठ्ठ ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्ध त्दड्डत्हठ्ठय्ड्ढद्म् ण्ठ्ठद्य् ण्ड्ढ र्द्वड्ढद्य्त्दृद र्ठ्ठद्म् ठ्ठहय्द्वठ्ठथ्न्र् ठ्ठत्ड्ढड्ड दृद ण्ड्ढ ढथ्दृदृद्ध दृढ ण्ड्ढ Hदृद्वम्ड्ढ डन्र् ण्ठ्ठद्य् ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्ध.

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