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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Ban On Witchcraft Bill, ... on 9 August, 2012

> Title: Further discussion on the motion for consideration of the Ban on Witchcraft Bill, 2011, moved by Shri Om Prakash Yadav on 27th April, 2012 (Discussion not concluded).

 

MR. CHAIRMAN:  The House shall now take up item No. 49.  Shri Om Prakash Yadav was on his feet.  You may continue please.

श्री ओम प्रकाश यादव: आदरणीय सभापति जी, जादू-टोना पर पाबंदी विधेयक 2010 पर सदन में चर्चा के लिए आपने मुझे अनुमति दी, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। यह एक महत्वपूर्ण विषय है और भारतीय जन-मानस से जुड़ा हुआ है। यूं तो जादू-टोने का अस्तित्व मानव सभ्यता के आरम्भ  से ही रहा है, लेकिन आधुनिक समय में इसका स्वरूप व्यापक और विकराल होता जा रहा है। यह चिंता का विषय है और इस सम्मानित सदन में उपस्थित सभी माननीय सदस्यों को इस गंभीर समस्या पर चिंतन-मनन कर इसका समाधान ढूंढ़ना होगा।

          संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक व्यापक रिपोर्ट जारी की है जिसमें जादू-टोना करने के आरोपी लोगों को बड़े पैमाने पर की जा रही हत्या पर अपनी चिंता जाहिर की है। भारत का नाम कुछ अविकसित देशों के साथ जोड़ा गया है, जहां जादू-टोना से संबंधित हत्याएं अधिक हो रही हैं। सरकार को इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए। यह तथ्य हमारे सामने एक विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न करता है। एक ओर जहां भारत विश्व की महाशक्ति बनने की होड़ में है, सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमने बड़ी तरक्की कर ली है, हम एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र हो गए हैं, वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों में भी जकड़े हुए हैं और इसके कारण मानवशक्ति का भी क्षरण हो रहा है। हमें पतन की ओर ले जाने वाली प्रवृतियों पर पाबंदी लगानी होगी। प्रतिबंध लगाने के लिए यह आवश्यक है कि जादू-टोना को समुचित तरीके से परिभाषित किया जाए। वर्तमान में जादू-टोना की कोई सटीक परिभाषा नहीं है इसलिए यह पता नहीं चल पाता कि किस क्रियाकलाप को जादू-टोना  में शामिल किया जाए और किसे नहीं। जादू-टोना से सामान्य अभिप्राय है “अलौकिक शक्तियों का प्रयोग कर दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रथा।” अधिकांश देशों में जादू-टोना में विश्वास व्यापक पैमाने पर फैला हुआ है चाहे उनका शैक्षिक, सामाजिक-आर्थिक और जातीय स्तर जो भी हो। कुछ देशों में इस प्रकार का विश्वास समाज के विशिष्ट समूह तक ही सीमित होता है।

          अधिकांश देशों में जादू-टोना को इस बात की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि कोई विपत्ति किसी व्यक्ति के साथ क्यों घटित हुई अर्थात जादू-टोना यह तर्क प्रदान करता है कि कोई घटना क्यों घटी। कैसे घटी इसकी कोई व्याख्या उपलब्ध नहीं होती है। उदाहरण के लिए लोग यह जान सकते हैं कि मलेरिया के कारण किसी बच्चे की मृत्यु हो गई, लेकिन जादू-टोना के उपयोग के कारण ही किसी बच्चा विशेष की मृत्यु हुई न कि उसके पड़ोसी को मलेरिया हुआ और उसकी मृत्यु हुई। समाज में जिन लोगों पर जादू-टोना करने का आरोप लगाया जाता है, उनके साथ घोर भेदभाव और पक्षपात किया जाता है। ये लोग ज्यादातर समाज के वंचित और पिछड़े वर्ग के होते हैं और इस प्रकार लांछन से अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं होते हैं। चूंकि ऐसे लोगों का समाज के लिए कोई महत्व नहीं होता है इसलिए उन्हें आसानी से टार्गेट किया जाता है। इन्हें समाज पर बोझ माना जाता है। ऐसे तो ठीक-ठीक संख्या पता नहीं लगाया जा सका है, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि आर्थिक और अन्य प्रकार के संकट के समय जादू-टोना के आरोपों और उससे संबंधित हिंसा की संख्या में वृद्धि हो जाती है।

          अब मैं सदन का ध्यान जादू-टोना के कानूनी और विधायी पहलू की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा। जादू-टोना से निपटने के मुख्यतः चार विधायी दृष्टिकोण बताए जाते हैं। एक तो यह कि वे लोग जो जादू-टोना के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और उसके दुप्रभाव से समाज को बचाने पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। विधान जो जादू-टोना की प्रथा को आपराधिक मानता है, औपचारिक न्यायिक प्रणाली के स्थान पर या उसके साथ-साथ परंपरागत अदालतों के माध्यम से भी जादू-टोना के मामलों का निपटारा किया जाता है। एक दूसरी विधायी मानसिकता के तहत जादू-टोना के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं किया जाता और जिन लोगों पर जादू-टोना करने का आरोप होता है, उन्हें बचाने की कोशिश की जाती है। जादू-टोना में विश्वास को समाप्त करने के लिए विधान हो और जो लोग जादू-टोना करने के आरोपी होते हैं उन्हें दण्ड देने की प्रक्रिया को आपराधिक मानना। वर्तमान फौजदारी और दीवानी कानून के तहत आक्रमण, हत्या, संपत्ति की चोरी और मानहानि से संबंधित जो कानूनी प्रावधान है उसके अनुसार जादू-टोना करने के आरोपित लोगों की रक्षा करना।

             जिन देशो में जादू-टोना करने के आरोपी लोगों को बचाने के लिए कानून बनाए गए हैं वहां पर उसकी समीक्षा की गई तो पाया गया कि वे कानून ठीक प्रकार से काम नहीं कर रहे हैं। यह भी पाया गया कि कानून से जादू-टोना में विश्वास कम नहीं हो रहा है और न ही उससे संबंधित हिंसा में कमी आ रही है। यह भी पाया गया कि व्यवहार में कानून जादू-टोना के आरोपी लोगों को प्रभावी सुरक्षा प्रदान नहीं करता है और न ही पीड़ित व्यक्ति के विरूद्ध हिंसा कम होती है। यह देखने में आया है कि जादू-टोना के आरोपी लोगों को दंडित करने से रोकने के कानून हैं उन्हें ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है। कानून का ठीक से लागू न होना इस कुप्रथा को रोकने में सबसे बड़ी बाधा है। कानून का ठीक से लागू नहीं होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि कानून लागू करने वाले अधिकारी की यह मान्यता होती है कि जादू-टोना के आरोपी लोगों को बेवजह बचाया जा रहा है। इसलिए इस तरह के मामलों की जांच करने वाले लोगों में एक प्रकार की अनिच्छा पाई जाती है, इसलिए वे जादू-टोना के आरोपी लोगों के विरूद्ध हिंसा करने वाले लोगों को दंडित नहीं करना चाहता हैं और न ही समाज का कोई व्यक्ति उनके खिलाफ गवाही देना चाहता है।

          जादू-टोना से निपटने की जो कानूनी प्रक्रिया भारत में उपलब्ध है उसकी ओर सदन का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। भारत के लगभग सभी हिस्सों में जादू-टोना में विश्वास पाया जाता है लेकिन जनजातीय समुदाय और उत्तर-पूर्व के राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं ज्यादा देखने को मिलती हैं। इन क्षेत्रों में ऐसी मान्यता है कि डायनों के पास अलौकिक शक्तियां होती हैं जिनसे वे दूसरों को नुकसान पहुंचाती हैं। ऐसी मान्यता है कि वे जानवर का भेष धारण कर लेती हैं, अदृश्य हथियारों का इस्तेमाल करती हैं या भूतों को भेजकर लोगों को बीमार करती हैं, जान ले लेती हैं। डायनों को नियंत्रित करने के लिए ओझा-शोखा होते हैं जो उन्हें नियंत्रित करते हैं, उनके लिए दण्ड का निर्धारण करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें दंडित किया जाए। जादू-टोना से संबंधित अधिकांश आरोप महिलाओं के विरूद्ध लगाए जाते हैं जो अक्सर या तो अविवाहित होती हैं या विधवा या नःसंतान होती हैं। ज्यादातर मामलों में इस प्रकार के आरोप संपत्ति या भूमि के विवाद के कारण लगाए जाते हैं। कुछ मामलों में पुरुषों पर भी इस प्रकार के आरोप लगाए जाते हैं। जिन लोगों पर इस प्रकार के आरोप लगाए जाते हैं उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से उत्पीड़ित किया जाता है, उनका बहिष्कार किया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है और उनकी हत्या तक कर दी जाती है।

          राष्ट्रीय स्तर पर जादू-टोना की प्रथा को आपराधिक मानने वाला कोई कानून नहीं है। झारखण्ड एकमात्र ऐसा राज्य है जहां डायन प्रथा निवारण अधिनियम बना हुआ है। यह एक ऐसा राज्य है जहां बड़े पैमाने पर महिलाओं पर डायन होने का आरोप लगाकर उन्हें प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है। भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत बहुत-सी धाराएं हैं जिनका प्रयोग जादू-टोना के आरोपों से संबंधित हिंसा, उदाहरण के लिए हत्या, चोरी, गंभीर रूप से घायल करना, शारीरिक रूप से हमला और बलात्कार पर काबू पाने के लिए किया जा सकता है। झारखंड में जो कानून बना हुआ है उसमें केवल महिलाएं शामिल हैं जबकि इस प्रकार के आरोप कभी-कभी पुरुषों पर भी लगाए जाते हैं। जादू-टोना के आरोप के मामलों से निपटने में पुलिस की भूमिका संतोषजनक नहीं रही है, इसलिए दोषसिद्ध दंडित लोगों की संख्या काफी कम है। झारखंड के कानून में जो सजा के प्रावधान हैं वे सख्त नहीं हैं। जादू-टोना के आरोपी व्यक्ति को दंडित करने वाले के विरुद्ध केवल छह माह कारावास का प्रावधान है जो काफी नहीं है।

          ग्रामीण से लेकर सभ्य शहरी समाज में ऐसे लोग बड़ी संख्या में मौजूद हैं जो समाज में अंधविश्वास फैला रहे हैं और मासूम लोगों विशेष कर महिलाओं का बड़े पैमाने पर शोषण कर रहे हैं। ये लोग बड़े पैमाने पर टेलीविजन और समाचारपत्र के माध्यम से अपना प्रचार-प्रसार करते हैं। अन्य शहरों की कौन कहे यह सब देश की राजधानी दिल्ली में हो रहा है। आए दिन यह समाचार पढ़ने को मिलता है कि अमुक बाबा ने झाड़-पूंक के भ्रमजाल में फांसकर एक महिला से लम्बे समय तक बलात्कार किया। कोई बाबा जादू-टोना, झाड़-पूंक के नाम पर सेक्स रैकेट चलाते हुए पकड़ा जाता है। यह भी देखा गया है कि कुछ बाबा लोगों की समस्या का समाधान करने का दावा कर उनका आर्थिक और मानसिक शोषण करते हैं। इनके चंगुल में फंसकर कई बार व्यक्ति को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है। इस प्रकार की समस्या से देश के करोड़ों लोग पीड़ित हैं। इसलिए इस सम्मानित सदन को, जो जन-आकांक्षा की अभिव्यक्ति और उनके हितों की रक्षा करने वाला देश का सर्वोच्च मंच है, को इस ज्वलंत समस्या पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और इस विधेयक को पारित करना चाहिए ताकि इस गंभीर समस्या से देश के करोड़ों लोगों को मुक्ति दिलाई जा सके।

          इस महत्वपूर्ण विषय पर मुझे अपनी भावना सदन के समक्ष रखने का अवसर प्रदान करने के लिए मैं आपके प्रति आभार प्रकट करता हूं।

MR. CHAIRMAN:  Motion moved:

 
“That the Bill to provide for ban on witchcraft in any form  in the country,       be taken into consideration.”   श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):सभापति महोदय, मैं श्री ओम प्रकाश यादव का जादू-टोना पर पाबंदी विधेयक, 2010 के समर्थन में बोलने के खड़ा हुआ हूं।  गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै शास्त्रसंग्रहे। या स्वयं पद्मनाभरय मुखपदमादिव नःसृता .-भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। एक सतो गुणी होता है, एक रजो गुणी होता है और एक तमो गुणी होता है। तमो गुणी व्यक्ति वह होता है, जो भूत-प्रेतों की पूजा करता है। भगवान कहते हैं कि देने वाला मैं ही हूं, लेकिन जो अज्ञानी मानव हैं, वे समझते हैं कि भूत ही हमें देने वाले हैं। जब कि वास्तविकता यह है कि देने वाला परमात्मा है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने वेदों के अंदर यह प्रार्थना की थी - तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर् मा अमृत गमय, असतो मा सदगमय, कि हे प्रभु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ। अंधकार क्या है? प्रकाश का न होना अंधकार है। इसी प्रकार से ज्ञान का न होना अंधकार है और ज्ञान के अभाव में ब्लैक मैजिक जादू-टोना हमारे गांवों के अंदर अशिक्षा के कारण प्रचलित है, जिसके कारण अनेक अमानवीय घटनाएं घटती हैं। हमारे देश पर कलंक लगता है। एक समाचार पत्र में फोटो छपी थी, जिसे देख कर आदमी का हृदय हिल जाता था, कांपने लगता था। उस फोटो में था कि एक आदमी के दोनों हाथों में किसी के सिर काट कर ले जा रहा था और उसके चेहरे पर एक विजय मुस्कान थी कि मैंने लोगों को मार कर उनका सिर काट कर बहुत बड़ा कृत किया है। यह सब ज्ञान के अभाव के कारण होता है। लोग यह नहीं समझ पाते कि जो वायरस है, बैकटीरिया हैं, इनके कारण बीमारियां पैदा होती हैं। वे समझते हैं कि कोई आदमी मंत्र बोलता है, जादू-टोना करता है, इससे उनका अहित हो रहा है। इसके लिए जागरूक अभियान देश के अंदर चलना चाहिए। इसके लिए सख्त से सख्त कानून बनना चाहिए और मैं कहना चाहूंगा कि “It is very depressing that in India, only a handful of states have laws against witch-hunting. Witch hunting in most cases constitutes an attempt to murder. But because of lack of laws that specifically targets this practice; the people involved with witch hunting are booked under article 323 of the Indian Penal Code. This means that the law now equates the crime of witch hunting with crimes where a person tries to voluntary cause hurt like slapping or physically abusing somebody. Under this law, the maximum punishment for this offense is a jail term up to one year and a fine of Rs. 1,000. ”   इस प्रकार के कुकृत्य करते हैं, जादू-टोने के नाम पर अमानवीय व्यवहार करते हैं, समाचार पत्रों में आता है कि एक महिला के घर में घुस गए। उसके हाथ-पैर बांध कर कैंची से उसकी आंखों को अंधा कर दिया। इस प्रकार के जो कुकृत्य होते हैं, जिसके अंदर विशेष कर महिलाओं का अपमान किया जाता है, इसके लिए जब सख्त से सख्त कानून होगा, तो यह कुरीति समाप्त हो जाएगी। इसलिए कबीर दास जी ने भी कहा है कि " तंत्र मंत्र सब झूठ है। " इस प्रकार का जो अंधकारमय वातावरण है, उसकी संतों ने निंदा की है और हमें भी सख्त से सख्त कानून बनाना चाहिए, जिससे कि इस प्रकार की घटना हमारे देश के अंदर न हो।
  16.00 hrs जिस देश का अर्बाचीन इतिहास वेदों के द्वारा परिष्कृत हो और वेदों ने पूरे देश और पूरी दुनिया को ज्ञान की शिक्षा पर चलना सिखाया हो, उस देश के अंदर दिये के तले अंधेरे हो, यह बड़ी दुखद बात है। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि इसके लिए सख्त से सख्त कानून बने और इसी के साथ साथ जो हमारे ऋषियों ने अपनी मानसिक शक्तियों का जिसको हम पैरानॉर्मल सेंसरी रिसर्च कहते हैं, उस पर अनेक देशों में रिसर्च हो रही है तथा पैरानॉर्मल रिसर्च भी हो रही है और रशिया के अंदर एक पुस्तिका भी लिखी गई- “पैरानॉर्मल रिसर्चेज बिहाइंड द आयरन कर्टेन।” रूस के अंदर इस प्रकार की पैरानॉर्मल साइकिक रिसर्चेज हुआ करती हैं जिसके अंदर वैज्ञानिक अपनी मानसिक शक्ति से माचिस की डिब्बी को चलाता है और बहुत से काम करता है। इसी प्रकार की रिसर्चेज अमेरिका में भी हो रही हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि ये जो चीजें हैं, इन पर हमारे देश में भी रिसर्च होनी चाहिए कि ये क्या चीजें हैं, मानव की जो आत्मिक शक्ति है, उस पर भी रिसर्च होनी चाहिए और यदि ऐसा होता है तो मैं समझता हूं कि यह जो ज्ञान और अज्ञान है, इस पर हम विश्लेषण कर पाएंगे। यह बड़ा आवश्यक है कि जिस देश के अंदर आध्यात्मिक शक्ति के बारे में चर्चा की गई हो, वहां पर इसके ऊपर सम्वर्धन होना चाहिए।

          मैं सदन का ध्यान हमारे उत्तराखंड के अंदर जो हमारे यहां ढ़ोल बजाए जाते हैं जिसके अंदर सामवेद की रचना को दर्शाया जाता है और जो ढ़ोल होते हैं, उनके अंदर हंसने, रोने, लड़ने, उत्तेजना, जोड़ने, नाचने, खेलने, आमंत्रण, रुकने, बधाई संदेश देने, झंझोरने और देवता जो अवतार लेते हैं, उसकी ताल होती है, विसर्जन और संदेश पहुंचाने की ताल होती है और ये ढ़ोल हजारों साल से हमारे देश में पल्लवित और पुष्पित होते पाये गये हैं। लेकिन आज ये जो ढ़ोल सागर है, इसके लोग लुप्त होते जा रहे हैं। मुझे डर है कि यह विद्या धीरे धीरे एक दिन समाप्त हो जाएगी। इस विद्या के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि यह विद्या पहले मौखिक थी। 1932 में पहली बार भवानी दत्त पर्वतीय ने ढ़ोल सागर पर पुस्तिका लिखी और उसके बाद गांवों के अंदर जब से बैंड बाजे बजने लगे, तब से ढ़ोल और ढ़ोली का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। टेहरी के ढ़ोल वादक सोहनलाल, उत्तरकाशी के सोहनदास, फूलदास, पनेक्षिया दास व चमन दास, चमोली के दीवान राम, पिथौरागढ़ के भुवनराम, देहरादून के जोनसार के सल्लीराम जैसे ढ़ोलवादक बड़े प्रसिद्ध हुए हैं।

           इसलिए हमें यह भी देखना है कि ढ़ोलों के अंदर क्या विद्या या क्या शक्ति है, इस पर भी अनुसंधान होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो मैं समझूंगा कि ढ़ोलों को निश्चित रूप से एक राष्ट्रीय वाद्य यंत्र के रूप में स्थापित होने का मौका मिलेगा। अमेरिका की सिंसिनाइटी यूनिवर्सिटी के लिए विजिटिंग प्रोफैसर के लिए चयनित हुए ढ़ोल वादक सोहनलाल जी के अनुसार लोक कलाओं से जुड़ी जातियों की संस्कृति और उनकी परम्परा धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि गढ़वाल विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफैसर संजय पांडे और रंगकर्मी प्रोफैसर डी.आर.पुरोहित इन लोक कलाओं को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। मैं भी कहना चाहूंगा कि आज ढ़ोल सागर के ऊपर, इस विद्या को बचाने में हमें अधिक से अधिक योगदान देना चाहिए और जो अंधविश्वास है, जो सुपरस्टीशंस हैं, इनको भी समाप्त करना चाहिए। जो पैरानॉर्मल फैकल्टी हैं, इसको हमें डवलप करना चाहिए। इसलिए इनको अगर हम विकसित करेंगे तो हमारा देश आगे बढ़ेगा। योग की कुछ शिक्षाएं हैं, ज्ञान है, इनको अगर हम विकसित करेंगे तो मैं समझता हूं कि समाज आगे बढ़ेगा।

          सभापति जी, कुछ ऐसे राज्य हैं जिनमें हरियाणा, मध्य प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा है जहां पर बहुत ज्यादा अंधविश्वास पनपता है और जहां के बहुत ज्यादा केसेज हैं। हरियाणा के 57 केसेज 2010 में पाये गये। मध्य प्रदेश के अंदर इस प्रकार के 18 केसेज, महाराष्ट्र के अंदर 11 और उड़ीसा के 31 केसेज पाये गये। इसलिए मेरा कहने का मतलब यह है कि आम जनता में एक जागरूकता पैदा करने की जरूरत है और जो साइंस के जरिए माइक्रोस्कोप के नीचे अगर हम वैक्टीरिया को, वायरस को काम करता हुआ देखेंगे तो लोगों की समझ में आएगा कि जो हम गंदगी फैलाते हैं, इससे बीमारियां पैदा होती हैं। किसी के बुरा चाहने से, नैगेटिविटी से ये चीजें नहीं होती हैं। समाज के अंदर अगर ज्ञान का प्रचार होगा तो ये कुरीतियां धीरे धीरे खत्म हो जाएंगी। मैं साधु संतों से भी आग्रह करता हूं कि वे भी अपने प्रवचनों के अंदर जो आत्मिक शक्ति है, उसके जागरण की अलख जगाएं जिससे कि कम से कम यह जादू टोना अंधविश्वास समाप्त हो और हमारा भारत विश्व गुरु की ख्याति प्राप्त करे। विश्व गुरु बनकर उभरे और सारे समाज का मार्गदर्शन करे।  इसीलिए हम गंगा की पूजा करते हैं, गंगा को मां मानते हैं। गंगा धरती की धारा नहीं थी, इसे वैतरणी कहा जाता था, यह स्वर्ग में बहती थी। लेकिन जब भगीरथ ने तपस्या की तो यह स्वर्ग की धारा धरती पर आ गई। अगर हम भी कर्म करेंगे, हम भी जागरण करेंगे, हम भी ज्ञान की अलख जगायेंगे तो निश्चित रूप में  मैं समझता हूं कि हम स्वर्ग को धरती पर ला सकते हैं और यही हमारी गंगा का संदेश है और आज देश को इसी बात की आवश्यकता है कि हम ज्ञान का जागरण करके इस अंधविश्वास को, सुपरस्टीशन को, ब्लैक मैजिक को, जादू-टोना को समाप्त करें और इसके लिए सख्त से सख्त कानून बनायें, जिससे कि ये कुरीतियां समाप्त हों और हमारा समाज एक आदर्श समाज के रूप में आगे बढ़े और भारत का निर्माण करे, भारत को आगे ले जाए, भारत को विश्व गुरू का खिताब दिलाये।

          इन्हीं शब्दों के साथ आपने मुझे बोलने का मौका दिया,इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):सभापति महोदय, आपने मुझे श्री ओम प्रकाश यादव द्वारा प्रस्तुत विधेयक जादू-टोना पर पाबंदी विधेयक, 2010 पर बोलने की अनुमति दी, उसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। मैं सबसे पहले यह कहना चाहता हूं कि आपने ठीक कहा कि जागृति आनी चाहिए, इसके लिए जागरण होना चाहिए। लेकिन मैं आपके माध्यम से इसी सदन में सवाल कर रहा हूं कि श्रीमती फूलन देवी की डैथ हुई और उनका मकान खाली था, लेकिन हम राजनेता वह मकान लेने के लिए क्यों नहीं गए? जबकि वह  मकान कई लोगों को अलॉट हुआ था।

श्री जय प्रकाश अग्रवाल (उत्तर पूर्व दिल्ली):अब वहां एक मैम्बर साहबान रहते हैं।

श्री अर्जुन राम मेघवाल: अब तो रहते हैं, लेकिन पहले वह बहुत समय तक खाली रहा। जब खाली था तो मैं किसी और के साथ उसे देखने के लिए गया था। तो लोगों ने कहा कि इसमें लोग इसलिए नहीं रहना चाहते, क्योंकि इसमें पहले श्रीमती फूलन देवी रहती थी और उनकी डैथ हो गई थी। अब यह क्या विश्वास है या अंधविश्वास है, जो हमारे में भी है। क्या हम इसकी बात करके छोड़ देंगे। हम रास्ते में चल रहे हैं, अचानक बिल्ली रास्ता काट जाती है तो हम कहते हैं कि ड्राइवर साहब गाड़ी रोक दो, लाइट्स ऑफ करो,    यहां हम उपदेश देते हैं कि जादू-टोना पर पाबंदी होनी चाहिए। पाबंदी तो होनी ही चाहिए। मैं भी यही कह रहा हूँ। लेकिन हम व्यवहार करते समय ऐसा क्यों करते है?

          सभापति जी, मैं बीकानेर संसदीय क्षेत्र से आता हूँ। एक बहुत बड़े राजनेता को हमारे बीकानेर में आमंत्रण मिला कि आप आइए, हम भैरव जी का एक अनुष्ठान करेंगे और उससे आप मुख्यमंत्री बन जाएंगे। मैं नाम नहीं लूंगा। वे राजनेता वहां आए। हम भी सांसद के तौर पर वहां गए। मैं तो वहां केवल देखने के लिए गया था। डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ठीक कह रहे थे कि मैं कलैक्टर से सीधे एमपी कैसे बन गया? आपने कौन सा जादू किया? मैंने ऐसा कोई जादू नहीं किया। मैंने जनता को प्रभावित किया। चाहे मैंने अपने आचरण से जनता को प्रभावित किया, चाहे अपनी बातों से प्रभावित किया और आज मैं आपकी कृपा से एमपी हूँ। बीकानेर में भैरव जी का बहुत बड़ा अनुष्ठान हुआ। हम भी उसमें गए। उसमें बहुत पंडित लोग भी आए और कहा कि भैरव जी की ऐसी शक्ति है कि आपको मुख्यमंत्री बना देंगे। जब चुनाव हुआ तो वे राजनेता मुख्यमंत्री नहीं बने। हमने उन पंडित जी से पूछा कि क्या हुआ? राजनेता मुख्यमंत्री क्यों नहीं बने? पंडित जी ने कहा कि जब वे मेरे अनुष्ठान में प्रवेश करने आए थे, तब उनको दायां पांव आगे रखना था। लेकिन उन्होंने दायां पांव आगे न रख के बायां पांव आगे रख दिया, इसलिए वे मुख्यमंत्री नहीं बने। फिर भी वे राजनेता उस बात पर विश्वास करते हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :   माननीय सदस्य को डिस्टर्ब न करें।

श्री अर्जुन राम मेघवाल :  वे जो भी थे, उनको आप भी जानते हैं। पंडित भंवर लाल शर्मा जी भी उनको जानते हैं। अब आप जान गए हैं। मैं यह कह रहा हूँ कि ओम प्रकाश जी यह कोई छोटा विषय नहीं लाए हैं। यह विषय बहुत गंभीर है। खाली यह कह देना कि हमारे देश में आदिवासी क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों में यह प्रथा है और हम पढ़े-लिखे लोगों में यह नहीं है। I don’t believe it. यह बहुत लोगों में है। कई बार मैं जापान में सुनता हूँ। कई बार मैं इंग्लैंड में सुनता हूँ कि वहां भी ऑर्थोडक्स फैमिलीज़ रहती हैं। उन्होंने कहा कि हमारे घरों में तो भूत घुस गया है। उसको निकालने के लिए इण्डिया से आदमी ले जाने पड़ते हैं। पेपर में आर्टिकल आया था। सभापति जी, मैं आपके विषय को ही थोड़ा आगे बढ़ा रहा हूँ। आपने कहा था कि जादू टोना क्या है और आध्यात्मिकता क्या है? इसमें कैसे भेद करोगे? यह जो मनुष्य का ढांचा है इसमें तीन तरह की चीज़ें हैं। एक तो यह जो भौतिक शरीर दिख रहा है। दूसरा इसके अंदर मन है। मन में भी दो भाग हैं। एक भौतिक मन है और एक अवचेतन मन है। अंदर आत्मा है। ये चीज़ें तो हैं। इनको तो कोई नकार नहीं सकता है या नकारता है? जब इनको कोई नकार नहीं सकता है तो कभी-कभी अवचेतन मन में क्या प्रॉब्लम आ जाती है? भौतिक मन में क्या प्रॉब्लम आ जाती है? जब आदमी बीमार हो जाता है और डॉक्टर से भी ठीक नहीं होता है, डॉक्टर कहता है कि मैंने आपके सारे टेस्ट कर लिए। आपकी सभी रिपोर्ट ठीक हैं लेकिन वह आदमी कहता है कि मुझे तो नींद नहीं आती है। तब वह कहां जाता है? ...( व्यवधान) वह कहीं भी जाए, लेकिन वह जाता है और उसको हमारे टीवी चैनल भी दिखाते हैं। भैंरो बाबा हो या कोई भी हों, उनको हमारे टीवी चैनल दिखाते हैं और कहते हैं कि वह वहां गया और ठीक हो गया। एक शनि धाम भी है। हमारे यहां अभी एक एमपी हैं। वे मुझे एक दिन कहने लगे कि मैंने तो अपने शनि महाराज की पूजा की और मैं एमपी बन गया। मैं यह कहना चाहता हूँ कि हम किसको जागृत करना चाह रहे हैं? सबसे पहले तो इस संसद में बैठने वाले लोगों को जागृत होना पड़ेगा।  जो देश को लीड करते हैं। जब वे खुद चलते हैं और उन्हें लगता है कि हम मंत्री हैं, बिल्ली ने रास्ता काट दिया, कल कोई डांट देगा तो वे तुरन्त रूक जाते हैं। वे ड्राइवर से कहते हैं कि गाड़ी रोको, थोड़ी देर रूको, पांच मिनट रूको फिर चलेंगे। इसके बाद आप उस ड्राइवर से कहोगे कि आप जादू-टोना में विश्वास मत करो। क्या ऐसा संभव होगा? इसलिए कथनी और करनी में फर्क बंद करना पड़ेगा और इस विषय की गंभीरता को समझने के लिए इसका पूरा असेस्मेंट करना पड़ेगा कि ऐसा हो क्यों रहा है, क्यों मन इसे मानता है? मैं माननीय प्रणब मुखर्जी साहब को धन्यवाद दूंगा कि वे तालकटोरा में 13 नम्बर क्वार्टर में गये थे। तब भी लोगों ने कहा था कि 13 नम्बर शुभ नहीं है।

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): वे प्रधानमंत्री कहां बन पाये?

श्री अर्जुन राम मेघवाल : राष्ट्रपति तो बन गये। उस समय भी लोगों ने कहा ने 13 नम्बर में क्यों जा रहे हो, लेकिन क्योंकि वे वाइडर सोच के आदमी थे, उन्होंने कहा कि 13 नम्बर क्या करेगा? वे वहां गये और महामहिम बन गये। लेकिन अभी भी बहुत से आदमियों को, अपने में से बहुत से लोगों को अगर होटल में भी 13 नम्बर कमरा मिल जाता है तो वे कहते हैं कि कमरा चेंज करो। हम देश को लीड करते हैं, हम लोग हैं, चाहे मीड़िया के लोग हैं, चाहे ज्यूडिशियरी के लोग हैं, चाहे टॉप एग्जीक्यूटिव्स हैं, वे जब खुद ही इसमें विश्वास करते हैं तो वे ऐसे कैसे कह सकते हैं कि जादू-टोना में गांव के लोग विश्वास न करें। सबसे पहले तो हम लोगों को सोचना पड़ेगा कि यह विषय क्या है? इस विषय की गंभीरता को देखते हुए इसका एक अध्ययन करवाना पड़ेगा कि आदमी ऐसा क्यों सोचता है? मन से सोचता है, आन्तरिक मन से सोचता है, आत्मा से सोचता है या शरीर से सोचता है, आदमी ऐसा क्यों सोचता है? आपने ठीक कहा कि आदमी त्रिगुणात्मक होता है, सात्विक गुण वाला आदमी ऐसा नहीं सोचता, तामसिक गुण वाला ज्यादा सोचता है और राजसिक प्रवृत्ति वाला कम सोचता है। इसी तरह गीता में कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग तीनों का उल्लेख किया गया है। जो भक्ति योग वाले हैं, वे तो कहते हैं कि आप इसमें विश्वास ही मत करो। जो भगवान कहेंगे, आप वह समर्पण में मान लो, लेकिन ज्ञान योग वाले, आप जैसे लोग कहेंगे नहीं, ज्ञान यह है कि जादू-टोना ठीक नहीं है, लेकिन भक्ति योग वाले तो नहीं मानते, वे तो इसे मान जायेंगे। मैं यह कह रहा हूं कि मेरे गांव में, शीशराम जी ठीक कह रहे थे, सांप काटने का झाड़ा दिया जाता है। मैं भी कभी-कभी झाड़ा देने वाले को देखता हूं। उस आदमी के पास दूर-दूर से लोग आते हैं। अब तो उस आदमी की दो-तीन साल पहले मृत्यु हो गयी। मैंने भी पता किया कि क्या मामला है?

          महोदय, होता यह है कि अधिकतर सांप जहरीले नहीं होते हैं। वह आदमी ऐसा करता है कि जहां सांप ने काटा हुआ होता है, हम रेगिस्तान के लोग हैं, ये लोग जानते हैं कि दूर-दूर तक हमारे यहां अस्पताल नहीं हैं। कौन स्नेक बाइट का इंजेक्शन लाये, वह इंजेक्शन मिलेगा या नहीं मिलेगा, अस्पताल में भी इंजेक्शन नहीं मिलता है। कौन इंजेक्शन लगाये, आदमी क्या करे, उसे सांप काट गया तो फिर वह तुरन्त ही झाड़ा देने वाले के पास जाता है। एक तो उसे मानसिक रिलीफ मिलता है कि उसने कई लोगों को झाड़ा देकर सांप काटने का इलाज कर दिया। इससे एक तो उसे मेंटल रिलीफ मिलता है कि अगर मैं वहां जाऊंगा तो मैं भी ठीक हो जाऊंगा। जब वह आदमी वहां पहुंचता है तो मैंने देखा कि वह क्या करता है, जहां भी सांप ने काटा हुआ होता है, वहां वह अपना मुंह लगाता है और मुंह से कुछ चूसता है और चूसकर जहर  फेंकता जाता है। मैं सोचता हूं कि यह साइंटिफिक है, लेकिन बाद में वह मंत्र भी बोलता है। पता नहीं वह क्या बोलता है? हमारे यहां गोगा पीर हुए हैं, वह उनका कोई मंत्र बोलता है। वह कहता है कि हमारे गोगा पीर ने इसे ठीक कर दिया। अब आप कहोगे कि वह जादू-टोना है, लेकिन सांप का काटा हुआ ठीक भी होता है, यह क्या है? इसमें कुछ सच्चाई भी है। यह  भेद की  लाइन बड़ी पतली है, लेकिन आपको भेद करना पड़ेगा कि जादू-टोना क्या है, जिससे आदमी अंधविश्वास में आकर ठगा जाता है और एक असली ताकत क्या है, जिसमें जाकर आदमी ठीक भी हो जाता है। यह भेद तो आपको करना पड़ेगा, अन्यथा आप वर्षों से देखते आ रहे हैं कि लोग किसी के यहां जाते हैं और ठीक भी हो जाते हैं। किसी के यहां ऐसे ही गये और उसने बोला कि कैसे आये, बोला कि यह गड़बड़ हो गयी थी, वह कहता है कि घबराओ मत ठीक हो जाएगा, वह ठीक भी हो जाता है। अच्छा आजकल यह वास्तु और चल गया, वास्तु एक नया चला है कि आपके मकान में पीछे लैट्रीन, बाथरूम बन गया, इसलिए आपके घर में अशान्ति रहती है।  आपको इन सारी चीज़ों का अध्ययन करके यह देखना पड़ेगा कि क्या जादू-टोना है और क्या रीयल स्टोरी है जिसके कारण आदमी बिलीव करता है, और आदमी के अंदर क्या चीज़ है जिसके कारण वह बिलीव करता है और ठीक होता है।

          मैं एक बात और कहकर अपनी बात समाप्त करूँगा। आजकल टीवी पर राशिफल आता है। हमारे यहाँ भी कई लोग हैं। मैं उनसे पूछता हूँ कि आज इस रंग की साड़ी कैसे पहनी है तो कहते हैं कि आज बृहस्पतिवार है। बृहस्पतिवार में ग्रीन या पीला  कलर होता है और शनिवार को काला कलर।

सभापति महोदय:  बृहस्पतिवार को पीला रंग होता है।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : हाँ, आपको पता है। बृहस्पतिवार को पीला कलर और शनिवार को काला रंग पहनना चाहिए। अब इसको आप क्या मानेंगे? जो मैम्बर ऑफ पार्लियामैंट भी बन गए, फिर भी वे बिलीव करते हैं। लेकिन वे बिलीव क्यों कर रहे हैं? उनको ठीक भी लगता है। वे ठीक होते भी हैं। मैं यही कहना चाह रहा हूँ कि क्या जादू-टोना है और क्या हीलिंग ट्रीटमैंट है, इसमें आपको थोड़ा फर्क करना पड़ेगा। इसका व्यापक अध्ययन करवाना होगा।  खाली यह दोष देना कि यह आदिवासियों में है, जनजातियों में है, यह कहना ठीक नहीं है। ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े लोग बिलीव करते हैं और ज्योतिषियों के पास जाते हैं, वास्तुशास्त्रियों के पास जाते हैं, बड़े-बड़े लोग अगर घर में कोई घटना घट जाती है, दो-तीन सालों में दो-तीन डैथ हो जाती है तो बड़े-बड़े लोग भैरों पूजा करते हैं, शनि पूजा भी करते हैं। इसलिए यह मत मानिये कि यह तो आदिवासी और जनजाति करते हैं, बाकी कोई नहीं करते हैं, ऐसा मत मानिये। विषय के गंभीर विश्लेषण की आवश्यकता है।

          आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

                                                                                                             

सभापति महोदय : आपकी पगड़ी में सभी कलर हैं।

 

श्री शीश राम ओला (झुंझुनू):महोदय, हमारे यहाँ जैसलमेर में पाकिस्तान के बार्डर पर एक देवी माँ का मंदिर है। पहले उसका एक इतना सा मंदिर था।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : तन्नौट  माता का मंदिर है।

श्री शीश राम ओला : मैं आपको कहने वाला था। आप भूल गए थे तो मैंने सोचा कि मैं बता देता हूँ। वहाँ तन्नौट माता का मंदिर जो पाकिस्तान बार्डर के करीब है, वहाँ पाकिस्तान के हवाई जहाज़ से बम डाले गए लेकिन वे पाँच-दस बम ब्लास्ट नहीं हुए। वे बम आज भी ब्लास्ट नहीं हुए, मंदिर में जीवित रखे हैं। उस मंदिर को देखने वहाँ बहुत सारे लोग जाते हैं। वहाँ बम भी रखे हैं और उस मंदिर की देखरेख भी बीएसएफ कर रही है, उसने मंदिर बनाया और उनके ही लोग उसके पुजारी हैं।

सभापति महोदय : श्री शैलेन्द्र कुमार।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):सभापति जी, धन्यवाद। आपने मुझे ओम प्रकाश यादव जी द्वारा प्रस्तुत जादू-टोना पर पाबंदी विधेयक 2010 पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। अभी ओमप्रकाश जी ने बहुत ही विस्तृत रूप से अपने लिखित विचार प्रस्तुत किये। इसके साथ ही साथ हमारे सभापति पीठ पर बैठे महाराज जी, आपने भी बड़ा अच्छा व्याख्यान प्रस्तुत करके वेदों और पुराणों सहित तमाम चीज़ों का उद्धरण प्रस्तुत किया।

सभापति महोदय:  धन्यवाद।

श्री शैलेन्द्र कुमार: सभापति जी, भाई मेघवाल जी ने भी बड़े विस्तार से इस बारे में बताया। जहाँ तक ओमप्रकाश जी ने मांग की कि इस पर पाबंदी लगाई जाए तो यहाँ समाज कल्याण अधिकारिता मंत्रालय के भी मंत्री बैठे हैं और महिला बाल विकास विभाग की बहिन श्रीमती कृष्णा तीरथ भी बैठी हैं। मेरे ख्याल से दोनों के मंत्रालय से मिलता-जुलता यह विधेयक है। इसे गंभीरता से लें। यह बात भी सत्य है कि हमारे देश में दवा और दुआ, अक्सर ये दोनों बातें चलती हैं।  दवा करते-करते जब व्यक्ति थक जाता है। मुझे याद है कि मेरे पिता जी जब केन्द्र में लेबर मंत्री थे और एम्स में एडमिट थे। लोगों ने कहा कि आप मंदिर जाइए मस्जिद जाइए, जो जहां बताता था, हम वहां जाते थे। विश्वास तो नहीं था लेकिन लोगों के बताने के अनुसार हम जाते थे। एक तरफ अर्जुन भाई आप कह रहे हैं कि अशिक्षित करें तो ठीक है, लेकिन पढ़े-लिखे बहुत लोग चक्कर में पड़ जाते हैं और यह करना पड़ता है कि यह मजबूरी है। हमारी पौराणिक, अध्यात्मिक तमाम ऐसी बातें हैं, जिन पर आदमी को विश्वास करना पड़ता है, मानना पड़ता है। हम तो जन्म से आर्यसमाजी हैं, हम नहीं मानते हैं, लेकिन अपने क्षेत्र में जाते हैं तो मस्जिद में भी जाते हैं, मंदिर और गुरूद्वारे में भी जाते हैं। हर जगह जाना पड़ता है और जाते भी हैं। हम धागे भी बांधते हैं, ताबीज़ भी बांधते हैं। यह तमाम तरह की बातें हैं। जहां तक पाखण्ड और आडम्बर के बारे में है, प्रचार-प्रसार तो बहुत होता है। टेलीविजन में आप देखिए बहुत चैनल हैं। सुबह आप चैनल लगाइए तो राशिफल के अनुसार आप यह दान कीजिए, यह काम कीजिए, इस रंग के कपड़े को पहनिए, तब आपको आज का दिन अच्छा रहेगा। उसको मानना पड़ता है। दूसरी तरफ हमारे नवग्रह हैं। ग्रहों के बारे में तो यह हाल है कि हम अन्य ग्रहों पर दुनिया बसाने की सोच रहे हैं।...( व्यवधान)

श्री अधीर चौधरी (बहरामपुर):चुनाव से पहले क्या करते हैं?

श्री शैलेन्द्र कुमार : पूजा-पाठ करते हैं। अभी वीर बहादुर जी नॉमीनेशन की बात कह रहे थे कि एक पंडित जी ने हमें कहा कि इस तारीख को करना, दूसरे ने बताया इस तारीख को, तो हमने दोनों तारीख को नोमीनेशन किया। यह फैक्ट है और होता है। मैं नवग्रह के बारे में कह रहा था कि मानव ग्रहों पर दुनिया बसाने की सोच रहा है, दूसरी तरफ हम नवग्रह की पूजा भी करते हैं। सभापति जी आपको अच्छी तरह से मालूम है। अभी शनि के प्रकोप की बात कर रहे हैं। कोई बात यदि बिगड़ती है तो लोग ईश्वर को याद करते हैं और अच्छा हो जाता है तो ईश्वर को बहुत कम लोग याद करते हैं, अल्लाह को कम याद करते हैं। यदि काम खराब हो जाता है तो कहते हैं कि कोई प्रकोप है। हमारे यहां इलाहाबाद में प्रतापगढ़ के बार्डर पर एक शनि मंदिर है। चार-पांच सप्ताह जाइए, काले वस्त्र पहनकर जाइए और तेल चढ़ाइए। इस तरह की धारणा है और लोग जाते भी हैं। एक हमारे साथी ने कहा कि इस समय खाली हो तो हमारे साथ चलो। उस समय हम खाली थे, हमने कहा कि चलो। हम भी चार सप्ताह गए। लेकिन कोई फर्क हमें दिखाई नहीं पड़ा। अभी मैं अपने क्षेत्र में गया तो एक मिलिट्री से रिटायर्ड सूबेदार थे। उनको काले सांप ने काट लिया, लेकिन वे बच गए। उनके लड़के को सांप ने काटा, वह भी बच गया। छप्पर गिर गया था, जिसमें दबते-दबते बचे। जिस दिन हम लोग देखने गए हमें पता लगा कि उसके एक दिन पहले उनकी पत्नी को भैंस ने सींग से मार दिया। हम लोग जब गए तो आप इसे विश्वास कहिए या अंधविश्वास, हम लोगों ने कहा कि आप अपने यहां पाठ करवाइए, चाहे रामायण का पाठ या सत्यनारायण का पाठ कराइए, क्योंकि आपके ग्रह खराब चल रहे हैं। उन्होंने वह कराया और जब हम दोबारा गए तो उन्होंने बताया कि जब से हमने पाठ कराया है, तब से शांति है। यह होता है और हम लोग करते हैं। दूसरी बात यह है कि अर्जुन भाई ज्यादातर यह धारणा है कि हमारे जो छोटे तबके के लोग हैं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग हैं, बंजारे, नट, घुमंतू हैं और कबीले में जो लोग रहते हैं, उनमें यह धारणाएं ज्यादा होती हैं और यह लोग झाड़-पूंक भी करते हैं, दवा-दारू भी देते हैं, जड़ी-बूटी भी देते हैं।

श्री अर्जुन राम मेघवाल: मैं ऐसा नहीं मानता हूं। मैं यह कह रहा हूं कि सब लोग करते हैं।

श्री शैलेन्द्र कुमार: करते तो सभी लोग हैं, लेकिन मेरा यह मानना है कि इनमें कुछ ज्यादा है, क्योंकि इनमें अशिक्षा है, इसलिए यह लोग ज्यादा मानते हैं। दूसरी बात यह है कि कभी-कभी अगर व्यक्ति बीमार होता है तो हमारे यहां बलि भी चढ़ाई जाती है। उसका निराकरण करने के लिए बकरे की या बकरी के बच्चे की बलि दीजिए। हमारे यहां तो सुअर के बच्चे की भी बलि दी जाती है।   यहां तक कि कभी-कभी मानव की बलि भी दी जाती है। तमाम ऐसे केसेज आए हैं जिसमें छोटे-छोटे बच्चों को पकड़ कर उनकी बलि दी गयी।

          सभापति महोदय, यही नहीं आपको यह भी मालूम है कि कभी-कभी लोग काली माता के सामने अपनी जीभ को काट कर बलि दे देते हैं। इस तरह की धारणाएं लोगों में हैं। ज्यादातर हमने देखा है कि चाहे यह हम में, आप में कम हो, लेकिन हमारे घरों की औरतों में ये धारणाएं ज्यादा होती हैं। चूंकि हम लोगों ने उनके साथ सात फेरे लिए हैं इसलिए चाहे कम कीजिए या ज्यादा, पर उनके अनुसार हमें करना पड़ता है।

          मन्दिरों का भी यही हाल है। यह ठीक है कि मन्दिर-मस्ज़िद लोगों की आस्था से जुड़े होते हैं। पर, वहां पर भी व्यावसायिक लोग हैं। आजकल मन्दिरों में पूजा, आराधना के ऊपर कम और पैसे-चढ़ावे के ऊपर लोगों का ज्यादा ध्यान है। यह कमाने का एक तरह से अड्डा हो गया है। जब लोग मस्ज़िद से नमाज़ पढ़ कर निकलते हैं तो मैं देखता हूं कि बाहर बहुत-सी औरतें बच्चे लेकर खड़ी रहती हैं। लोग नमाज़ पढ़ कर निकलते हैं तो बच्चों के ऊपर पूंकते चलते हैं और मंत्र पढ़ते चलते हैं। इसमें हिन्दू-मुस्लिम हर धर्म की महिलाएं खड़ी होती हैं। हमारी हिन्दू महिलाएं ज्यादा अपने बच्चों को ले कर मस्ज़िदों के बाहर खड़ी होती हैं। ओझई, वैद्यिकी, झाड़-पूंक हमारी पुरानी परंपरा है जो हमें विरासत में मिली है और लोग इसे करते चले आ रहे हैं।

          दूसरी बात तंत्र-मंत्र की है। हमारे टीवी चैनलों पर एक से एक तंत्र-मंत्र की बात की जाती है। यह एक व्यवसाय बना हुआ है। उसमें कहा जाता है कि यह खरीद लीजिए तो आपका व्यवसाय बढ़ जाएगा, आपका रूका हुआ काम पूरा हो जाएगा या किसी की शादी नहीं हो रही है तो वह भी हो जाएगी। कुछ इस तरह के ऑरनामेंट्स भी बिक रहे हैं जिसका प्रचार और प्रसार बहुत ज्यादा है। अभी अर्जुन भाई जानवरों के द्वारा रास्ता काटने की बात कह रहे थे। अब आप जा रहे हैं तो किसी जानवर ने आपका रास्ता दाएं से काटा या बाएं से, उसका बहुत बड़ा महत्व है। इसमें बिल्ली, सुअर जैसे जानवर हैं। भरी बाल्टी लेकर कोई क्रॉस हो जाए, खाली बाल्टी लेकर कोई क्रॉस हो जाए, इस तरह की तमाम धारणाएं हैं।

          अभी आपने टीवी चैनलों पर निर्मल बाबा को देखा होगा। मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं। खैर, अभी तो यह नहीं आ रहा है। मैंने इसे बहुत दिनों से नहीं देखा है। लेकिन इस तरीके की चीज़ें मौजूद हैं। इससे बहुत से लोगों को फायदा और बहुत से लोगों को नुकसान हुआ है। कभी-कभी तो तांत्रिक लोग बड़े घिनौने और अश्लील तरीके से अपनी तंत्र विद्या करते हैं। इस पर तो कम से कम रोक लगनी चाहिए। अबोध बालक-बालिकाओं की बलि देने, महिलाओं के साथ दुराचार करना इसमें शामिल है। कभी-कभी टेलीविजन पर देखता हूं कि वे गाल को फाड़ कर उसमें सरिया दे देते हैं, जीभ में सरिया डाल देते हैं। देवी के सामने खड़े होकर पूजा-पाठ करते हैं। इस तरह की तमाम चीज़ें अपने यहां प्रचलन में हैं।

          अर्जुन भाई, मैं आपकी बात से बिल्कुल इत्तफाक़ रखता हूं कि इसका छोटे लोगों के साथ-साथ बड़े लोगों में भी प्रचलन है। मैं नहीं कहता कि इसे पूरी तरह से बंद किया जाए। पर, जिससे नुकसान हो, वह बंद होना चाहिए। हम विज्ञान, कम्प्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स के युग में बहुत आगे बढ़ चुके हैं। लेकिन, हमारी बहुत-सी पुरानी परंपराएं हमें विरासत में मिली हैं। अगर उसका फायदा है तो लोग उसका पालन करें। लेकिन बहुत सारी परंपराएं हैं जिसके ऊपर हमें पाबंदी लगाने की जरूरत है।

          मैं इन्हीं शब्दों के साथ ओम प्रकाश यादव जी द्वारा प्रस्तुतजादू-टोना पर पाबंदी विधेयक, 2010 का पुरज़ोर समर्थन करते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूं।  

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): सभापति महोदय, माननीय ओम प्रकाश यादव द्वारा प्रस्तुत जादू-टोना पर पाबंदी विधेयक, 2010 पर बोलने का आपने मुझे अवसर दिया, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं सबसे पहले यह बताना चाहता हूं कि इन सब चीज़ों में एक एलीमेंट है पर्सनैलिटी जिसे फेथ कहते हैं, विश्वास कहते हैं। जब विश्वास होता है तो ये बातें और ज्यादा आने लगती हैं।       इस जादू टोना विधेयक में विश्वास के अलावा अंध विश्वास आता है और उस अंध विश्वास का मिसयूस बहुत होता है। उस मिसयूस में हर सैक्शंस ऑफ सोसायटी के बारे में याद है। मुझे याद है जब मैं बहुत छोटा था तो जब मैं इलाहाबाद पढ़ने के लिए जाता था। उस समय मेरी माता जी पंडित जी को बुला करके बकायदा उनकी पूजा करके, उनको दक्षिणा दे करके पूछती थी कि मेरा बेटा किस दिन इलाहाबाद के लिए जाएगा। ये पूर्व, उत्तर या पश्चिम है और हम लोग पंडित जी को बनाते थे, उन्हें एक्स्ट्रा खुश करते थे कि पंडित जी कहें कि अभी शायद आपके दो दिन जाने के नहीं बन रहे हैं। चाहे हम स्कूल में लेट हो जाएं, हमें दो दिन का समय मिल जाता था। उसमें पंडित जी की दुकान भी बहुत चलती थी। इस कारण से कुछ दुकानें बंद होंगी, इसका भी आपको ध्यान रखना पड़ेगा। अगर किसी विद्या में लौजिक नहीं है और उसके साइंटिफिक रीजंस नहीं हैं तो विद्या वह विद्या नहीं है, अविद्या है। इसमें ज्यादा एलोबरेट करने की बात नहीं है। जैसा मेरे मित्र बता रहे थे, मैंने करीब 36-37 साल इलाहाबाद हाई-कोर्ट में प्रेक्टिस की, सीनियर एडवोकेट भी था। लेकिन जब मैं पार्लियामेंट का नोमिनेशन फाइल करने गया तो इलाहाबाद और बनारस में बड़े ज्योतिषी, उनमें कई लोग हमारे क्लाइंट हैं। वे हमसे पूछते हैं कि ये केस जीतेगा या नहीं। हमने उनसे कहा कि आप ज्योतिष के विद्वान हो, आपको नहीं मालूम। बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में ज्योतिष विज्ञान का एक डिपार्टमेंट है और वे कुंडली देखते हैं। वे हमारे क्लाइंट हमसे पूछते हैं कि ये मुकदमा जीतेगा या नहीं। हमें दो बड़े-बड़े ज्योतिषियों ने बताया, दो अलग-अलग तारीखें दीं कि इतने बजे आप नोमिनेशन दाखिल करिए। हम बड़े धर्म संकट में पड़े कि कहीं गड़बड़ न हो जाए। आप विश्वास नहीं करेंगे, मैंने दो दिन नोमिनेशन फाइल नहीं किया। एक साहब ने ऐसा टाइम बताया कि कलेक्टर साहब को हमें सिफारिश करानी पड़ी कि वे तब तक रुके रहें। पांच बजे नोमिनेशन फाइल करना था और हमारा उन्होंने 4-40 का टाइम बताया था। अब वहां कलेक्टर साहब अकेले हमारे लिए इंतजार कर रहे हैं। उस समय ज्यादा दबादबी नहीं थी, उनके साथ जो जुलूस चलते हैं, वे लोग भी रेस्टलेस हो रहे थे, लेकिन हम उसको डिफाई नहीं कर पाए, inspite of all this, हो सकता है साइंटिफिक रीजन हो। वास्तुशास्त्र क्या है, इधर का दरवाजा खोल दीजिए, इधर-उधर दरबार खोलिए। इसमें बड़े-बड़े लोग काम्पीटेंट हैं, इसका एडवरटिजमेंट होता है, टेलीविजन में आता है।

          मैं एक और बात बताना चाहता था कि मेरिज की तारीख है, संडे को कोई मेरिज वह नहीं बता रहा। चाहे जब बता दे, रात को दो बजे बता दे। महाराज, आपसे ज्यादा इसका कोई ज्ञानी है नहीं और इससे ज्यादा लाभ भी आपको होता है, हम लोगों को नहीं होता। हमारा कहना यह है कि जो उत्तरांचल, नैनीताल और नैनी देवी को जानता है, वह महाराज को भी जानता है।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  धन्यवाद।

श्री विजय बहादुर सिंह: मैं बनारस के बारे में बताना चाहता हूं कि बनारस में ऐसे तांत्रिक हैं, जो डेड बॉडी को कहते हैं, खाना खाओ और वे खाते हैं। उनकी बहुत ज्यादा पावर है। आजकल इस विद्या को मानने वाले सबसे ज्यादा नेतागण हैं। मध्य प्रदेश में एक ज्योतिषी है, उनके यहां बड़ी भीड़ होती है, क्योंकि वे मुख्य मंत्री के ज्योतिषी हैं। वे एक ऐसे ज्योतिषी हैं, सेंट्रल के मिनिस्टर के ज्योतिषी हैं, उनकी अलग ख्याति है।            उसकी अच्छी खासी दुकान चलना तो मैं नहीं कहूंगा, लेकिन अच्छी खासी सोसायटी में रैस्पैक्ट है और वे यह काम भी करते हैं कि अगर आपको मंत्री जी से काम हो तो पहले आप एस्ट्रोलोजर को कंसल्ट कर लीजिए, वे जाकर अगर मंत्री जी के कान में कह देंगे तो मंत्री जी चीफ मिनिस्टर का कहना मना कर जायें, लेकिन अगर उनके ज्योतिषी कह देंगे तो मंत्री जी मानेंगे। क्यों साहब, ऐसी बात है न? हमारा कहना यह है कि जिस विद्या में कोई सेंस न हो, कोई लोजिक न हो तो उसका दुरुपयोग ज्यादा होता है। अब जैसे आपने सांप का बताया, यह सब हो रहा है, यह तो बाइ चांस है कि हर सांप जहरीला नहीं होता। अगर वे बच गये तो बच गये, अच्छा हुआ, नहीं तो बायां पैर चला गया। जैसा आपने उदाहरण दिया कि दाहिना पैर क्यों नहीं आगे किया।

          हमने यह देखा है कि हम लोगों में थोड़ा फ्यूडल फैमिली के होने से इसमें बड़ा विश्वास होता है। हम जब भी ट्रैवल करते थे तो वहां हमारे पुराने जो हैल्पिंग लोग थे, वे हमेशा पानी का घड़ा रख देते थे, अगर नोर्मल कोर्स में वह मिले तो बात ठीक है, लेकिन यह नहीं कि अगर आपके पोर्टिको के आगे पानी का घड़ा आपने ही अपने नल से भरकर रखवा दिया तो इसका क्या मतलब है। लेकिन अब कभी-कभी यह लगता है कि वह घड़ा न दिखाई पड़े तो लगता है कि वहां कुछ गड़बड़ हुई, वह क्यों नहीं रखा गया। इसका साइकोलोजिकल इफैक्ट पड़ता है। यह मालूम है, सही बात है कि जो फूलन देवी का बंगला है, बड़ी मुश्किल से जो हमारे मैम्बर ऑफ पार्लियामेंट हैं, मैं अग्रवाल साहब के यहां खुद गया था। 44 नम्बर, अशोका रोड में फूलन देवी जी रहती थीं, वह उनको एलाट हो गया, वे सिटिंग मैम्बर ऑफ पार्लियामेंट हैं, वे पहले यू.पी. में कैबिनेट मिनिस्टर थे, उनका जगदीश राणा साहब नाम है। मैं उनके साथ अग्रवाल साहब के यहां गया था। वे बीमार पड़ गये, 10-15 दिन बाद में उनके बड़े लड़के को बुखार आया, उसके बाद में उनकी बहू को बुखार आया तो उन्होंने कहा कि फूलन देवी का भूत आ गया तो वे इतने परेशान हुए कि उस समय रेड्डी साहब थे, उनके यहां गये। इसी सिफारिश में अग्रवाल साहब के यहां बड़ी जलेबी हम लोगों ने खाई। इनके यहां अगर सण्डे में जाओ तो ये जलेबी खिलाते हैं। पता नहीं, आपको मालूम है या नहीं, महाबल मिश्रा जी?...( व्यवधान)

श्री महाबल मिश्रा (पश्चिम दिल्ली): जलेबी के साथ समोसा भी खिलाते हैं। ...( व्यवधान)

श्री विजय बहादुर सिंह : नहीं, आप पार्टी वालों का बैटर होता है, हम लोगों को, थर्ड टियर वालों को जलेबी से निबटा देते हैं। आप पूछिये अग्रवाल साहब से, हमने शाहजहां रोड में कई चक्कर लगाये।...( व्यवधान)

श्री महाबल मिश्रा : अगर आपको बिना दूध के बच्चा पालना हो तो अग्रवाल साहब को पूछ लीजिए।...( व्यवधान)

श्री विजय बहादुर सिंह: यह फैक्ट है। जब मैंने राणा साहब से कहा कि यह आपको बंगला एलाट हो गया, दूसरा मिलेगा नहीं तो हमने उनको सैटिस्फाई करने के लिए कहा कि आप पूजा-पाठ करवाइये और हमने बनारस से पंडित लोगों को एंगेज करवाया, उनको बुलवाया और काफी विस्तृत रूप से उन्होंने पूजा-पाठ किया। अब वे कहते हैं कि वह ठीक हो गया।

          अब मैं दूसरा किस्सा बताऊं  आप गांव में जाइये, उत्तर प्रदेश में मैंने देखा कि हर गांव में कोई न कोई छोटे बाबा जी हैं या कोई न कोई छोटा पत्थर रखा है। कहते हैं कि इसकी बहुत पावर है, बिल्कुल यह भैरों बाबा हैं या बहुत से नाम हैं और वह पावर सिर्फ 2-3 किलोमीटर की है, क्योंकि, दूसरे गांव में दूसरा पत्थर रखा हुआ है। उनका टैरीटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन 2-3 किलोमीटर से ज्यादा नहीं है। ऐसा होता है कि यह भैरों बाबा फलां का लड़का ले आया। उसे बुखार आया था, वह बैठ गया, ठीक हो गया। अब आप अगर एक किलोमीटर और आगे चले जायें तो दूसरे बाबा टेक ओवर कर लेते हैं। इस तरह से ज्यूरिस्डिक्शनल बाबा हो गये। अगर यह जादू-टोने का सिस्टम न रोका गया तो इसमें बहुत ज्यादा खतरा हो सकता है। इसमें बड़े सैक्रीफाइसेज़ होते हैं, यहां तक कि लोग-बाग भावावेश में आकर बच्चों तक का सैक्रीफाइस करते हैं, उनको मारते हैं और इसका बहुत ज्यादा दुरुपयोग होता है।

सभापति महोदय :  अब आप खत्म कीजिए।

श्री विजय बहादुर सिंह: हम समाप्त करना चाहते हैं, क्योंकि, जब सत्संग होता है, हम नाम नहीं लेना चाहते हैं, जिनका नाम ले रहे थे, जो आजकल टी.वी. से चलाया हुआ था, जो कहते थे कि आपको यह है तो जाओ, खीर खा लीजिए, वे बोलते थे। उन्होंने कहा कि हमारी आजकल आमदनी नहीं हो रही है तो कहते थे कि काला पर्स खरीद लीजिए, रसगुल्ला खा लीजिए और लोग-बाग काला पर्स खरीदने लगे।  

          उन्होंने यह किया कि जो पंडित जी लोग करते थे, उन्होंने रिलीजन को सिंपलीफाई कर दिया, उन्होंने रिलीजन को यूजर फ्रैंडली कर दिया।  उन्होंने सोचा कि कितनी बढ़िया चीज है कि अगर सिर्फ दही खा जाएं या रसगुल्ला खा जाएं तो रसगुल्ला अलग मिला और भगवान अलग प्रसन्न हुए।  इस तरह वे रिलीजन को सिंपलीफाई करके करोड़पति बन गए।  

          महोदय, मैं ज्यादा समय न लेते हुए हुए अंत में कहना चाहता हूं कि इसको बिना देरी किए इनका समर्थन करते हुए कहता हूं कि इस पर बैन लगा दिया जाए और आगे चलकर ऐसी बातें न हों।  मान्यवर, आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया और आप सब लोगों ने मुझे सुना, इसके लिए धन्यवाद।  

                                                                                             

सभापति महोदय : श्री जगदंबिका पाल, अब आप अपनी बात कहिए।   

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): अधिष्ठाता महोदय, मैं आपका अत्यंत आभारी हूं कि आपने मुझे एक ऐसे विषय पर बोलने की अनुमति दी है जो इस देश में सदियों से चला आ रहा है और कहीं न कहीं आज भी गांवों में उसकी मान्यता है।  उस मान्यता के चलते हमारे साथियों ने जैसा कहा, उसके बहुत से दुष्परिणाम भी सामने आते हैं, लेकिन अब भी लोगों को जादू-टोना में विश्वास है।  मैं समझता हूं कि यह इतना गंभीर विषय है कि इस पर हम केवल यह कह दें कि इस तरीके की चीजों पर हम केवल बैन कर दें, आज के युग में अगर इस तरह की घटनाएं हो रही हैं कि किसी महिला के ऊपर कोई प्रेत आ गया या किसी की आत्मा प्रवेश कर गयी और गांव में जिस तरह से उसे रस्सी से बांधते हैं और उसकी पिटाई करते हैं, कभी-कभी दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु भी हो जाती है, इस तरह की जो घटनायें घटित हो रही हैं, वे निश्चित तौर से किसी सभ्य समाज के लिए बहुत ही दुर्भाग्यूपूर्ण हैं।  

          यह बात जो परंपरागत चली आ रही है, इस पर कोई शोध भी होना चाहिए।  आज इस तरह की बातों पर आस्ट्रेलिया में शोध हो रहा है।  आज अगर आप डिस्कवरी चैनल देंखें तो उसमें भी दी हांटेड एक प्रोग्राम आता है, जिसमें यह लगता है कि अमेरिका में यह भुतहा घर है, उसके अंदर जाइए तो वहां तरह-तरह की आवाजें आती हैं।  यह बात केवल भारत में ही नहीं है, दुनिया के अनेक मुल्कों में चाहे दुनिया में जो सबसे प्रगतिशील कहा जा रहा है, यूएसए में भी इस तरह की मान्यतायें है, अगर डिस्कवरी चैनल में आप देखें तो आपको यह पता लगेगा। अगर आप आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड की तरफ देखें तो वहां भी ऐसी मान्यतायें हैं और मैं समझता हूं कि दुनिया का कोई देश इससे अछूता नहीं है।  भारत में इसके कई कारण हैं।  लोगों में गरीबी है, शिक्षा की दूरस्थ अंचलों में कमी है।  मैं केवल यह कहूं कि केवल किसी ट्राइबल एरिया में इसका असर है, ऐसा नहीं है।  देश के सभी हिस्सों में चाहे उत्तर प्रदेश हो, बिहार हो, झारखंड हो, उड़ीसा हो, बंगाल हो, नार्थ-ईस्ट हो या साउथ हो, उनके गांवों में आज भी लोग जादू-टोना पर विश्वास करते हैं।  बहुत सी ऐसी घटनायें सामने आती हैं जिनमें लोगों को लगता है कि अगर हम इनके पास जाएंगे, इनसे भभूति ले लेंगे या इनसे झाड़पूंक करा लेंगे, तो बड़ी से बड़ी बीमारियां दूर हो जाएंगी। यह एक तरह से अंधविश्वास ही है कि जिस बीमारी का इलाज एलोपैथी से हो सकता है, जिस बीमारी का इलाज बिना सर्जरी के नहीं हो सकता है, जैसा अभी विजय बहादुर सिंह जी कह रहे थे कि बहुत से लोग इसको एक व्यवसाय सा बना रहे हैं।  गांव के स्तर पर भी ऐसा हो रहा है।  आप देख रहे हैं कि आज तो राष्ट्रीय चैनल में विज्ञापन देकर यह काम हो रहा है।  यह नहीं है कि वह चैनल इसलिए चला रहे हैं कि उस चैनल को कोई आस्था है या तमाम जो चैनल्स हैं, वे उसको मान्यता दे रहे हैं, लेकिन चैनल को विज्ञापन चाहिए, अगर उसके लिए पैसा मिल रहा है, तो स्वाभाविक है कि चाहे अखबार हो, प्रिंट मीडिया हो, इलेक्ट्रॉनिक चैनल हो, तो अगर आप उस विज्ञापन का भुगतान करते हैं, तो स्वाभाविक है कि आप जो चाहे उसमें दिखा सकते हैं।  आम आदमी को यह लगता है कि राष्ट्रीय स्तर के चैनल से फलां बाबा की यह बात आ रही है।     

इस देश में सैंकड़ों जनता को यह नहीं लगता है, गांव के आम आदमी में यह फर्क नहीं है कि यह विज्ञापन के द्वारा आ रहा है। उनको लगता है कि यह कोई चमत्कारिक बाबा होंगे, कोई अवतरित बाबा होंगे, और किसी ने अवतार लिया होगा, इनके मुंह से निकली हुई बात, देववाणी हो जाती होगी। जैसा कि उदाहरण दिया गया कि आप यह चप्पल पहन लें, इस रंग का पर्स रख लें, यह सैंडल ले लें, अपने हाथ में फूल ले लें, यह मिठाई खा लें या खीर खा लें, इसी तरह से कुछ ही दिनों में उन्होंने 213 करोड़ रूपये अर्जित कर लिए। आखिर इस तरह का कोई एक्सप्लॉयटेशन कर रहा है तो क्या वेलफेयर स्टेट में इसके बाद भी इजाजत दी जाए? बात से संज्ञान न लें कि वह साधु है, एक संत है या कोई समागम करते हैं। वह कहते हैं कि हम किसी को फोर्स नहीं करते हैं। वह कहते हैं कि जिसकी इच्छा हो, एकाउंट में दो हजार रूपया डालिए लेकिन अगर इच्छा है और वह किसी को एक्सप्लॉयट कर रहे हैं, एक्सप्लॉयट गैर-कानूनी की परिधि में आता है। यह गैर-कानूनी कार्यों की परिधि में आता है। उसका जो लॉ है, नैचुरल कोर्स में ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। देश दुनिया में आईटी, कंप्यूटर साइंस, विज्ञान, स्पेस के क्षेत्रों में तरक्की कर रहा है। आज हम दुनिया में एक शक्ति के रूप में प्रतिस्थापित हो चुके हैं वहीं दूसरी तरफ जब इस तरह की घटनाओं का उल्लेख होता है, जब इस तरह की चीजें होती हैं तो हमें यह लगता है कि हमारे देश में अभी भी वह आडम्बर है। आज भी इस तरह की मान्यताएं हैं। जैसा मैंने कहा कि इसके तमाम कारण हैं।

          मैं समझता हूं कि जब माननीय मंत्री जी जवाब देंगे तो इस बात को सुनिश्चित करेंगे। सवाल यह नहीं है कि हमारे ओमप्रकाश जी इस तरह के बिल को लाएं हैं। वह लोक सभा में चुन कर आएं हैं। वह जनता के प्रतिनिधि हैं। हम लोग संसद सदस्य हैं। हम लोग अपने क्षेत्र में जाते हैं और इस तरह की घटनाओं से जब दुखद अंत होता है, जब दुखद परिणति होती है, उस स्थिति से हम लोगों का भी हृदय द्रवित होता है और हम लोग भी समझते हैं। जबकि हम यह मानते हैं, डाक्टर भी मानता है, आप डाक्टर से बात करिए तो वह कहते हैं कि लोगों की पर्सनैलिटी में एक मेंटली डिसआर्डर होता है या एक तरह का मल्टीपल पर्सनैलिटी सिंड्रोम होता है। एक व्यक्ति कई तरह की हरकतें करता है तो यह बीमारी भी है। यह नहीं है कि किसी के ऊपर भूत या प्रेत आ गया, किसी की प्रेतात्मा उसके अंदर आ गई। अगर यह आ गई तो इस पर शोध होना चाहिए। इस बात को सत्य किया जाना चाहिए। इस बात को साबित किया जाना चाहिए कि यह कोई मल्टीपल पर्सनैलिटी सिंड्रोम नहीं है। ...( व्यवधान)यह मेंटली डिसआर्डर नहीं है बल्कि सच्चाई है। मैं समझता हूं कि इस कारण को भी जानना चाहिए कि यह क्या है और क्यों है? इस देश में तो आध्यात्मिक ज्ञान रहा है। दुनिया अपने देश के अध्यात्म की ओर बढ़ रही है जिसका प्रतिनिधित्व आप जैसे लोग करते हैं। आप पूरी दुनिया में जाते हैं आपको सम्मान मिलता है। इसलिए इस तरह का जादू-टोना या इस तरह की चीजों के बारे में लोगों को नहीं कहते।  अगर देश में कहीं लोग किसी के प्रति आस्था रखते हैं, अशिक्षा, गरीबी-गुरबत के कारण अगर वह आस्था में विश्वास रखता है, उसके आस्था और विश्वास पर एक्सप्लॉयटेशन होता है तो इसके लिए निश्चित तौर पर कानून बनना चाहिए। इससे लोगों की सुरक्षा होनी चाहिए तभी यह समाज में रूक सकता है। आज गांवों में जब इस तरह की घटनाएं होती हैं तो गांव के लोग यह मानते हैं कि यह नियति थी, उनकी यही परिणति होनी थी। इनके ऊपर प्रेत या भूत आ गया या किसी की आत्मा आ गई। कुछ दिनों तक वे लोग यही सोचते हैं कि यह जादू टोना से ठीक हो जाएगा। यह जादू-टोना से ठीक नहीं होता है और उसकी परिणति दुखद होती है।

          यह गंभीर मामला है। इस पर सरकार को विचार करना चाहिए या तो इसका कोई उपाय बताए अन्यथा इस तरह के बढ़ते हुए अपराध से जो टार्चर हो रहे हैं, डेथ्स हो रही हैं, इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, चाहे ये बच्चों, महिलाओं या लोगों के साथ हो रही हों उन पर रोक लगाई जानी चाहिए।

 

SHRI TATHAGATA SATPATHY (DHENKANAL): Thank you, Sir, for giving me this opportunity.  I am not very sure which Ministry is supposed to be handling this Bill.

MR. CHAIRMAN: It is Shrimati Krishna Tirath’s Ministry.

SHRI TATHAGATA SATPATHY: With all due respect to Shri Om Prakash Yadav ji, I have the highest regard for his initiative and all of us appreciate what he has done, I would like to bring to your notice the discrepancy that I see in the Statement of Objects and Reasons here.

          Initially it says: “That the UNO has released a comprehensive Report……generally women are branded as witch and they are harassed, tortured, insulted and even murdered in the name of witchcraft by their relatives or so-called witch-hunters in cold blood”.  This is Para 1.

          In Para 2 it comes to: “It is, therefore, necessary to enact a law to put a blanket ban on the practice of witchcraft and to provide for (Sir, mind this) stringent punishment for practising or promoting or advertising witchcraft”.

          Sir, there is a latent discrepancy here.  My point is, let us take for example what is happening in many of the Northern States especially, something called witchcraft which I am ashamed to say I share the floor with such human beings who have in the Media dared in the twenty-first century to support such a thought process, such a mindset that honour killing is perfectly okay.  People have said that and they dare to come and sit in this House. 

          Now, the question would be, suppose somebody wanted to bring about a Private Members’ Bill or the Government brought about a Bill to ban or to make honour killing illegal where would you approach?  Will you make inter-caste marriage illegal which is creating the honour killing situation or are you going to punish relatives, villagers or the Khap Panchayat who go out, search the couple – sometimes the couples run away for their dear lives – hack them to death in the middle of the night?  What do we want to address?  Do we want to address the problem of not allowing young people to marry where they wish, whom they wish or do we want to punish those who harass them? So, the second line with all due respect to Yadav ji, he is a very respected colleague and I do not mean to in anyway create a bad sense, regarding stringent punishment for practising, promoting or advertising witchcraft needs amendment.  Practising any belief for that matter should be perfectly legal, should be perfectly okay if in no manner does it abuse the freedom or the sense and sensibilities of another sane person in our community or in our country.  We should not interfere in any manner in the personal beliefs or private activities of any individual of this country.  This is a free democratic country.  If some man or woman wants to practice witchcraft so be it. 

          Witchcraft is not limited to India.  You would have heard about the Covens of England.  Can we say that the Brits took help of the Covens to rule us for 200 years? Maybe they did it.  If that be the case, then let us say that the tantriks, those who practice black magic… MR. CHAIRMAN: Jadu Tona.

SHRI TATHAGATA SATPATHY: Yes, Sir, that is the Hindi word.  I am sorry, I do not know Hindi.  Vastu, Feng-shui, Reiki, there are so many beliefs in this world.

                   

17.00 hrs From Chile to Cambodia and from Uganda to Ulan Bator, everywhere humanity over the ages, even before science developed and even before there was an inception of a logical mind that dawned on human being; mankind has been known to practise such things to create an understanding of nature which always baffled humanity.  It created disbeliefs to understand itself and to understand what is external to it which was incomprehensible to men. So, it is wrong because in this country at our sweet will, suppose the Government accepts this Bill or as we have seen in the past a Private Member’s Bill is never accepted in this House, however good it may be it is always trashed.  Sometimes the Government does come with a similar Bill six or eight months later when the whole House had forgotten that some great personality like Shri Om Prakash Yadav had brought such an eye opener of an Act.  So, here the question is that what we want to address. 

          Our hon. Minister would be able to throw more light if she would speak.  The constituency of the hon. Member who brought the Bill and the areas bordering Orissa and Andhra Pradesh also suffer from a lot of murders as also a lot of humiliation to women that is meted out to women by villagers who want to blame people for witchcraft. There are a couple of cases. 

I edit a daily newspaper in Orissa. I have tried and told my reporters to go deeper into the causes and find out what really happened.  These kinds of cases are happening there many a time. For example, a poor widow who may not be very aged but her husband has died and she is left with a lot of property. Then a group of hooligans with political help like the same kind of people who are giving support to honour killing in different States of North India – sham be on them –support those hooligans and then we blame every politician for supporting a wrong thing. They ensure that that lady branded as a witch.  They can easily brand a lady as a witch.  It is easy to do.  You can throw a bone into her house and later on a committee of the villagers will go and say that they have found a bone in her house.  They will find some other methods like ashes and flowers.  They can plant anything just like the police do in many cases. They can plant such things and they can brand, especially, a single woman who may be a widow as well as helpless as a witch and then it is very easy to slaughter them.  Once they are slaughtered, then they grab all the property and it is an easy game.  This is what is happening.  So, here are we going to punish that lady even if it is found that she is practising witchcraft or do we want to punish those who slaughter her in greed to grab her property, her gold, her land and her home?  So, that is where the Government should step in and make things very clear. You have to decide that do you want to ban Reiki or not.  Do you have the courage to do that?  Do you want to ban vasstu?  Do you want to ban Feng Shui? 

          You can go to a place like Khan Market in Delhi.  You will find two or three big bustling shops which are exclusively selling Feng Shui items.  Who buys it?  It is not common people like you and I.  They are the rich, the famous and the glamorous people who buy it because they need more money.  So, they will bring in three coins with holes to hang them up on their doors. They think that by doing so, more money will come.  Where will they take all the money?  Will they take it to heaven?  I do not know.  But if they knew and jhadoodon it, then they could probably take all that money to heaven. 

          Sir, this kind of a Bill is definitely welcomed.  It needs attention.  I would like to say that women have been blamed for being witches for a very long time, even in Europe when witches were burnt in the inquisition time on stakes.       Everybody is aware of that.  Similar situation exists not only in India but all over.  So, this belief - blind or eyes wide shut - may be considered bad or harmful but humanity needed to address problems unfortunately created by the All Mighty himself.  So, we can blame the All Mighty and we can bring about a law to restrict the activities of the All Mighty or we can become more sensible and make an effective law because this country has already got so many laws that there is a need to bring about a census of a per capita law in this country! It is very important.  We have got too many laws but we do not have the infrastructure to implement them.  So, the governance system itself is becoming a matter of joke because we just pointlessly pass laws here and they never go down to the field level. 

So, let us not make something similar to that but let the Government come up with a tangible Act whereby you can curtail the people from doing injustice to newly married couples, to widows, to helpless people and the poor just because a gang can form does not mean an individual can be subjugated.   That is the Indian mind set.  If we can become a group or a gang, then we can do anything and that example we see even in politics whether it is the NDA as a gang or the UPA as a gang, it is all a very similar thing.  So, let us rise above this gang mentality. I am sure Madam is extremely capable of that because she is not in any gang.  She is a free thinking lady and she, I hope, will take this Private Members Bill -- which obviously her Government will never accept -- seriously and bring about a law that will address the situation in all sincerity.  It needs to be addressed because this is a social ill we are all suffering from.  You address the whole plethora from honour killing to witch hunters to all those people who are doing injustice to the weak, to the widows, to women and to those who are helpless.

                                                                                                   

SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Sir, I thank you for permitting me to speak on the Ban on Witchcraft Bill moved by Shri Om Prakash Yadav.  The initiative of the hon. Member in bringing a Private Member Bill on this subject is really appreciable. 

I do not know whether the Government is going to give a serious thought to this issue but in my view, the issue deserves the attention of the Government.  Ignorance, illiteracy and a strong cultural belief in the existence of witchcraft are causing untold miseries to the people.  It is a superstition belief. 

Voltaire compared superstition to a mad daughter of a wise mother.  Between 2001 and 2008, 452 women were killed in Jharkhand due to the practice of witchcraft.  There is a law to punish those practicing witchcraft in Jharkhand but still it is widely prevalent.  Witchcraft is practiced in 12 States including West Bengal, Maharashtra and Andhra Pradesh.  Some time back Maharashtra tried to bring a law in this regard but religious groups stalled the move on the ground that it would wipe away the customs and rituals followed for a long time.  Fake Swamis, fake Babas, and fake Sadhus cheat the common people by performing the so called miracles.  Superstitions are failures in reasoning.  Education can wipe out superstitions.  A scientific outlook and temper should be inculcated in the minds of youngsters.  Ignorance is the parent of superstitions. 

Even if the Government does not come forward to enact a law in this regard, I would urge the Centre to create awareness on superstitious beliefs through appropriate programmes in the visual media.  So long as persons are open to get cheated, there will always be a group to cheat others. 

Some 15 years back, Doordarshan used to telecast a programme in Hindi on every Sunday morning to create awareness against superstitions.  But this has been discontinued.  A rational and scientific thinking must be applied on all issues.  Blindly following the commands of others is itself a dangerous course.  When, why and how should be the questions which one must ask in respect of each issue. If we begin to question on any issue like this, rationalism will emerge and ignorance will vanish. 

In school syllabus, a lesson on superstitions versus rational thinking should be introduced.  Blind belief and following the path shown by others without thinking will lead to superstition.

          I endorse the Member’s view fully and hope that the Centre, if not today at least on some other occasion or some other day, will come forward to bring a law banning witchcraft.

                                                                                                   

श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):महोदय, इस विषय पर जितने साधारण रूप से हम सोच रहे हैं, यह उनता साधारण नहीं है। इसीलिए इसे सामान्य रूप से या साधारण रूप से न सोचकर बहुत ही गम्भीर रूप से चिंतन करने की आवश्यकता है। जिसे हम जादू कहते हैं, टोना कहते हैं, तंत्र कहते हैं, मंत्र कहते हैं, क्या ये कहने वाले लोगों को तंत्र और मंत्र के शब्द का व्यापक अर्थ मालूम है? क्या भारत के पाणिनी के व्याकरण के अनुसार या संस्कृत साहित्य के अनुसार तंत्र और मंत्र के जो भौतिक अर्थ हैं और आध्यात्मिक अर्थ हैं, उन दोनों  अर्थों को वे जानते हैं? अगर शब्द के अर्थ को नहीं जानते हैं और प्रयोग करते हैं तथा उसका विश्लेषण करते हैं, तो अर्थ का अनर्थ भी हम कर सकते हैं। इसलिए अलग-अलग विषयों को रखा जाए। अभी विजय बहादुर जी बोल रहे थे, अंध विश्वास कह रहे थे। हमारे गुरु डॉ. लोहिया थे। वह राजनीति के क्षेत्र में हमें सिखाया करते थे कि अंधविश्वास जितना खतरनाक है, उतना अंधअविश्वास भी खतरनाक है। हम अगर अंधविश्वास न करें, तो किसी पर अंधअविश्वास भी न करें। अर्थात् हम अपने विवेक के अनुसार, ज्ञान के अनुसार, बुद्धि के अनुसार, तर्क के अनुसार विवेचन करके  उसे ग्रहण करें, यही हमारी निरंतर भारतीय संस्कृति की परम्परा रही है। इसीलिए तो गौतम ऋषि ने न्यायशास्त्र की रचना की थी। मैं उसी क्षेत्र से आता हूं, जहां के गौतम ऋषि थे और जहां न्यायशास्त्र की रचना हुई थी। इसलिए मेरी विनम्र प्रार्थना है कि इसे ऐसे न देखा जाए। जादू है, टोना है, लोगों के अंदर भ्रांति और भ्रम फैलाया जा रहा है, उसे एक तरफ से देखा जाए।

          मैं इस बात को कहना चाहूंगा, आप जानते हैं, कि जब हमारे चारों वेदों की रचना हुई थी, तो अथर्ववेद को प्रारम्भ में जादूटोना  कहा गया था। तीन वेद वाले उस वेद को वेद मानने के लिए तैयार नहीं थे। बाद में हमारे ऋषियों और महर्षियों ने एक लम्बा सत्संग किया, ज्ञान की चर्चा की और महर्षि वेद व्यास के नेतृत्व में धर्म सभा स्थापित करके चारों वेदों को उन्होंने मान्यता दी थी।  महाभारत के काल में राजा शांतनु जब गंभीर रोग से बीमार थे तब क्या इसी अथर्व वेद के ज्ञाता महर्षि ने उन्हें  अथर्व वेद के मंत्रों द्वारा और  औषधियों के द्वारा उनका उपचार करके उन्हें स्वस्थ  किया था। वह एक वैज्ञानिक चीज है।  जो उनके मंत्र का अर्थ होता है जिसे आज हम फार्मूला कहते हैं और उस फार्मूला को हमारे ऋषियों ने कहा कि वह मंत्र है। आज वैज्ञानिक क्षेत्र में आप किसी चीज का अविष्कार करते हैं, निर्माण करते हैं तो उसके लिए एक फार्मूला बनाते हैं । एम.सी. एक्वॉयर।

MR. CHAIRMAN: E=MC2 श्री हुक्मदेव नारायण यादव:  जी, जो आइंस्टाइन ने थ्योरी दी थी वह तो एक छोटा सा फार्मूला था लेकिन उसका विषलेक्षण अणु  से परमाणु तक गया। उसी तरह से हमारे ऋषियों ने अगर एक छोटा मंत्र दिया था कि             “ योयम विज्ञानमयः प्राणेषू हृदय अंतर-ज्योति पुरुष एकम् सदविप्रा बहुधा वदन्ति”            वह तो मंत्र है। आप उसकी व्याख्या जितनी अंतर-दृष्टि से, अपने ज्ञान और विवेक से कर सकते हैं करिये, लेकिन दुर्भाग्य है कि हिदुस्तान में ज्ञान की तरफ लोगों का आकर्षण नहीं रहा, ज्ञान की तरफ लोगों की खोज नहीं रही और हम दूर भटकते चले गये और  ज्ञान से वंचित होते गये, जिसका दुष्परिणाम हमें मिल रहा है, हम भटक रहे हैं, हम पतन की ओर जा रहे हैं। आप स्वयं शास्त्र पढ़े हुए हैं।   क्या दुर्गा शप्तसती में हम पाठ करते हैं तो हम नहीं कहते हैं “मारणं, मोहनम, वश्यम, स्तम्भन, उच्चाटनादिकम” । क्या हम इसे प्रतिबंधित कर दें कि यह अंध-विश्वास है, यह गलत है। दूर्गा जी की पूजा के समय घर-घर में पाठ होता है लेकिन इसके व्यापक अर्थ को हम समझ नहीं पाते हैं। आप जब कथा वांचते हैं तो रामचरित मानस में आया है कि                        “ महामंत्र जिमि जपहि व्यालके,                       मिटही कठिन कुअंक भाल के”    यह किस अर्थ में कहा गया, अगर उसका कोई अर्थ नहीं है, परिभाषा नहीं है, उनका कोई मतलब नहीं है तो क्या गोस्वामी तुलसीदास जी ने यूं ही लिख दिया था। अनपढ़-गवांर के जैसे आज टीवी में बोलने वाले हैं या कोई तंत्र-मंत्र करने वाले हैं, उन्हीं के जैसे उन्होंने लिख दिया था क्या? इस बात को भी हमें गहराई से समझना चाहिए।

सभापति महोदय  :  विषय-वासना का मारण करें।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव :  जी। आगे आकर हम देखते हैं कि हमारे यहां है तंत्र और मंत्र और फिर आता है यंत्र। मंत्र के अनुसार तंत्र है, तंत्र के अनुसार यंत्र है और उसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया है, विज्ञान के जरिये हम चलते हैं लेकिन हम उस विज्ञान को भूल गये क्योंकि हमारे अंदर वह वैज्ञानिक चेतना नहीं रही। हम जब रामचरित मानस में जाते हैं  तब महामुनी वशिष्ठ जी भरत जी को कहते हैं कि “ सुनहू भरत भावी प्रबलः विलख कहे मुनिनाथ                     हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, विधि हाथ” ।

         

          यह हमें कितनी ऊंचाई तक पहुंचाता है लेकिन अफसोस है कि हम अपनी उस विद्या से उस ज्ञान से, उस शिक्षा से अपनी सनातन परम्परा से दूर हट गये और हम स्वयं अंधकूप में जाकर डूबने लगे। अगर हम स्वयं अंधकूप में डूबते हैं तो क्या होगा? अगर कोई साधू है, कोई तांत्रिक है, किसी का उपचार करे, वह मर जाए तो अपराधी है लेकिन ऑल-इंडिया आयुर्विज्ञान में बड़े-बड़े डाक्टर्स के हाथों उपचार करते समय हजारों रोगी मरते हैं तो क्या वे दंडित नहीं होंगे? उनकी विद्या को क्या हम गलत कहेंगे? उनकी विद्या को क्या हम अपमानित करेंगे? जो आधुनिक यंत्र जांच करने के लिए बने हैं, जैसे  अल्ट्रासाउंड करने के लिए और उसमें अगर कोई गलती हो जाए तो क्या उसका मतलब है कि वह विज्ञान गलत है?  आज भारत में वैज्ञानिक शोध होना चाहिए, आध्यात्मिक शोध होना चाहिए। इसमें वरिष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान वाले, वैज्ञानिक ज्ञान वाले लोगों को जिन्हें भारत के प्राचीन ज्ञान और आधुनिक ज्ञान की जानकारी हो, उनके द्वारा इस विषय पर शोध करने की आवश्यकता है।

   मेरी  जादू-टोने में आस्था नहीं थी। देश को जादू-टोने में किसने फंसाया है? भगवान शंकर, जो तंत्र-मंत्र के ज्ञाता हैं, वे जब अपनी पत्नी को नहीं समझा पाएं, तो उन्होंने कहा है कि:

                    “होहहिं सोइ जो राम रचि राख। को करै तर्क बढ़ावे शाखा।।
           हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदय विचारत शंभु सुजाना।।” नारद जी के संबंध में उन्होंने कहा:
“सीम को चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू।। ”             आखिर हमारे अंदर जो धार्मिक आस्था थी, हमारे अंदर अपनी परम्पराओं के प्रति, अपने शास्त्र के प्रति, अपने ज्ञान के प्रति जो आस्था थी, जिस पर हम आगे बढ़ सकते थे, उस आस्था से देश को किसने डिगाया? जिसने डिगाया और अंधकूप की तरफ ले गया, उस शिक्षा पद्धति को आप अपराधी कहिए। जिस शिक्षा पद्धति का आप ढिंढ़ोरा पीटते हैं, तो क्यों नहीं आप लोगों को शिक्षित करते हैं।
          सभापति जी, आपके उत्तराखंड में भी मैं गया था चारों धाम धूमने के लिए। वहां दूर दराज के क्षेत्र में पहाड़ पर अगर कोई आदमी बीमार पड़ जाता है, तो इलाज करने के लिए कोई डाक्टर नहीं है। कोसों दूर तक जाना पड़ता है। इस समय बादल फटने से रास्ते बंद हैं। अगर बीमार पड़ता है, तो तात्कालिक इलाज की क्या व्यवस्था है? वहां कोई दवा देने वाला होगा, कोई जड़ी-बूटी देने वाला होगा, उसी से तात्कालिक उपचार करेगा। हम उन्हें इलाज की सुविधा नहीं दे पाए, हम उन्हें साक्षर नहीं कर पाए, गांव के पिछड़े दलित या अनुसूचित जाति के लोगों को हम कहते हैं कि वे इसमें ज्यादा फंसे हुए हैं। मैं कहना चाहता हूं कि सबसे ज्यादा लोग वे फंसे हैं जो राजनीतिक हैं, व्यावसायिक हैं, प्रशासनिक सेवा में लगे हुए हैं। मैं यह पूछना चाहता हूं कि सबसे ज्यादा चंद्रा स्वामी के पास कौन जाता है, क्या कोई गरीब जाता है या गांव का निर्धन निर्बल व्यक्ति जाता है। उनके यहां बड़े-बड़े राजनेता जाते थे। उनके चरण चुम्बन करते थे। उनके सामने नतमस्तक होते थे। आज भी बड़े बड़े आश्रम बने हैं। उन आश्रमों में कौन जाता है। कोई गरीब, कोई निर्धन, कोई आदिवासी, कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति क्या किसी आश्रम में जाता है। इन जगहों पर बड़े राजनीतिक लोग, व्यावसायिक लोग और प्रशासनिक सेवा के लोग जाते हैं। आप जब भी इस विषय पर बात करते हैं तो कहते हैं कि इसमें गरीब लोग फंसे हुए हैं, आदिवासी लोग फंसे हैं, पिछड़ी जाति के लोग फंसे हैं। वे अंधविश्वास में ज्यादा फंसे हैं। अगर वे फंसे हैं, तो उसका कारण भी है। उनको बीमारी लगती है तो क्या उनके इलाज की व्यवस्था है? इस बारे में भी हमें गंभीरता से चिंतन करना चाहिए और जो गलत है, उसे रोकना चाहिए। मैंने देखा कि हम बहस के दौरान ज्योतिष को भी अंधविश्वास में ले गए। ज्योतिष में दो चीजें हैं, एक गणित है और दूसरा फलित है। आज भी भारतवर्ष में ऐसे ज्योतिषी हैं, जो बनारस में बैठ कर पत्रा में लिख देते हैं कि फलाना दिन इतने समय पर सूर्य ग्रहण लगेगा। क्या कोई इस बात को काट सका है। हमारे यहां आज भी ज्योतिष शास्त्र में जो गणित की गणना करने वाले हैं, वे गणित के जरिए त्रिकालदर्शी बन कर ग्रह और नक्षत्रों की गणना से निकालते हैं, उनकी अलग विद्या है। हम अगर ज्योतिष शास्त्र को नहीं जानते, हमारे ज्योतिष ने इस पर आविष्कार किया है कि यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे, यथा ब्रहमांडे तथा पिंडे। हम ब्रह्मांड के अंश हैं। हम ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड हैं। अब इसे समझे बगैर जिसे इसका ज्ञान नहीं हो, जिसने इस पर चिंतन नहीं किया हो, जिसने आत्मा को नहीं पहचाना हो, वह सीधे कह दे कि साहब यह कैसे होगा। यह नव ग्रह कौन है? यह नव ग्रह मंगल है, यह शनि है, यह चन्द्रमा है जिस पर आप जा रहे हो। यह सूर्य है, जिस पर आप जाने का प्रयत्न कर रहे हो। लेकिन हमारे ज्योतिष शास्त्र में सोचा गया कि नव ग्रह जो नक्षत्र मंडल में है, उन नव ग्रहों का मनुष्य के मस्तिष्क पर क्या-क्या प्रभाव पड़ता है, उनकी गणना की गई और बताया। हम उस विद्या को अंधविश्वास कह दें, तो मैं समझता हूं कि यह हमारा अंध अविश्वास है।
          अंत में मैं कहना चाहूंगा कि पश्चिमी सभ्यता भारत में आई। हम पश्चिमी सभ्यता के पीछे दौड़े और अंध अविश्वास पैदा किया कि भारत की विद्या, भारत का ज्ञान, भारत की संस्कृति और भारत का अध्यात्म, भारत के धर्म में जो कुछ भी कहा गया है वह नादानी वाला है।  हमारे पूर्वज नादान थे, अज्ञानी थे और यूरोप वाले जो कहते हैं, वही सत्य है क्योंकि वे विज्ञान से आते हैं। अगर उन्हीं का विज्ञान सत्य है तो, मैं कहता हूं कि उनका विज्ञान शोषण का आधार है। वे रोज नये नये कम्प्यूटर बनाते हैं, पुराने कम्प्यूटर को फिकवाते हैं। वे अपना व्यवसाय करते हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं करते। इसीलिए आप इस पर चिंतन करिए। जादू हो, टोना हो, पाखंड हो, इसको एक श्रेणी में रखकर उसको रोकने के लिए कानून बनाइए। लेकिन उसके साथ साथ हमारी जो प्राचीन विद्या है, ज्योतिष है, गणित है, अध्यात्म क्षेत्र है, तंत्र हैं या मंत्र हैं, उनका अपना एक अलग क्षेत्र है जो वैदिक काल से चला आया है। इसलिए कृपा करके इस गंदी नाली में हमारी प्राचीन और परम्परागत विद्याओं को मत डालिए। गंदी नाली में जो कुछ भी है, उसको साफ जरूर करिए लेकिन अगर इसको गंदा कहिएगा तो हम इसको मानने के लिए तैयार नहीं हैं। जो अंधविश्वास है, अविद्या है, अंधकार है, उसमें लोग भटक रहे हैं। हम अपने भाइयों, बहनों और भारत माता की संतानों को उस अविद्या से निकालकर उनको ज्ञान के प्रकाश की ओर ला दें। जिस दिन उनमें ज्ञान का प्रकाश फैलेगा तो स्वयं ही वे इस अज्ञानता से मुक्त हो जाएंगे। हमें इसकी ओर प्रस्थान करना चाहिए।
          अंत में, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे समय दिया।
                                                                                             
MR. CHAIRMAN: Shri Adhir Chowdhary.
SHRI ADHIR CHOWDHURY (BAHARAMPUR): Sir, at the outset, I would like to thank you for calling me to speak on this subject.
          I must appreciate the initiative taken by our hon. colleague Shri Om Prakash Yadav for brining forward the Private Member’s Bill titled  “Ban on Witchcraft  Bill” because, I think, the practice of witchcraft is a blot on the civilized society. When we are reading in the newspapers about the landing of the Rover craft in the Planet Mars – everybody knows the name curiosity when we are boasting of India as a country which is recognized as a space-technology-savvy country in the world, then, I think it is shameful to us  when we come to know that poor women are being subjected to gruesome torture, atrocity and violence which even culminates into death. At that point of time, some sort of remedial measures have to be taken as an imperative need to address and redress this kind of an unsavory situation prevailing in our society. This legislative measure has sought to lay emphasis  on and put an end to the witchcraft-related killings.
          We should not confuse between astrology and astronomy.  We should confound ourselves between ignorance and science. We should not deviate from the tone and tenor of this very legislative document.
          For your convenience I would like to refer to two or three examples. On 22nd May, 2011, a news was published in a newspaper that in Raipur, 11 people of a village in Chhattisgarh barged into a house and severely assaulted a woman  accusing her of practising witchcraft and inserted a pair of scissors in both her eyes and then in her husband’s eyes too.  The Chhattisgarh State Assembly had passed the Witchcraft (Prevention) Act in 2005 but it has hardly made an impact in tribal areas  where most of the atrocities against women in the name of witchcraft are  still flourishing and a majority of the cases remain unreported.  Then what should be our reaction  to this kind of inhuman incident?
          Witch killings are reported in the North East area also. Witch killings are reported mostly in the monsoon season in view of the outbreak of several deadly diseases when an ailing person could not be saved despite administering herbal concoctions, the quacks and `shamans’ are branded and killed in revenge by the family members. Can we subscribe to the view of those people who have committed this kind of crime?
          Sir, another example is in Rajasthan.  In Rajasthan, a news had come out 7th August, 2011 that Narangi Devi, 33, a resident of Rani village, was branded witch and made to lie on burning embers while tantrik Usha Meena placed hot embers on  her body at Keshav Nagar of Pali district, nearly 296 kms. southwest of Jaipur. The incident took place on Friday night and even the victims husband, Chunni Lal, and other relatives looked on.
          From `Assam Tribune’ dated 16th February 2012, a report has been published that every second day we read of women in Assam being labelled  witches and killed. The latest was in Tezpur in Sonitpur district of Assam where Lakshmi Gaur was brutally killed and buried at Milanpur in Misamari area.  Sir, the examples are galore,  from where can we draw the conclusion. In the name of witchcraft, brutalities, atrocities, violence have been perpetuated in our society. Because of this, it appears that our country has been divided between India and Bharat. For, India has been glittering; on the contrary, Bharat has been languishing in the abysmal of despair, in the absence of knowledge. That is why, the need of the hour is to provide education so as to make our population literate,  to provide health at an affordable price to those people who used to live in the remotest part of our country.
          I do not know what kind of figures could be provided by the hon. Minister insofar as atrocities, witch hunting, witch killing are concerned, which have been continuing, unabated. It is reported that at least 12 States in our country are recognised as areas where witch hunting is rampant even today. While statistics regarding the magnitude of the problem are scarce, according to unofficial estimates, in the last 15 years, around 2,500 women have been killed after being branded as witches. About 500 cases occurred in Jharkhand alone in the past few years.
          Sir, when the womenfolk in our country are being deprived of the fundamental rights of living, which has been enshrined in our Constitution, when our women are being subjected to discrimination, when the poor women of the tribal villages are subjected to gruelling violence, then we can only take recourse to the legal machinery in order to address the situation. But the fact is, in spite of a plethora of laws, it is due to lack of implementation, this kind of ancient and medieval practices are still taking place in our country. Largely, the affected population, in so far as witch hunting is concerned, is the tribal cultures of our country because their life pattern is designed to save the tribal population where individuals cannot make their presence felt by expressing themselves and the tribal village is dominated by priests, by pradhan, and by janguru themselves. So, naturally they cannot go beyond their own capacity to express their feelings.
          Sir, whenever any kind of misfortune befalls in any village, immediately after that witch hunting starts and those who are responsible for identifying the witches, they take to some inarticulate incantation and abracadabra and they adopt some medieval practices to identify the witches by their own whims and once a witch is identified, her life becomes miserable. That is why, this kind of practices need to be stopped.
          Sir, witchcraft is not related to any religion; rather, I must say, it is a perversion of religion, it is a corruption of religion. The identification of witches with that of Pagan Goddess Diana is put forward by the Italian G. Tartaratti in the 15th Century on the basis of certain allusions in the medieval literature on witchcraft especially on account by Regino and it has been upheld by certain English authors also.
          So, Sir, from fairy tales such as Hansel and Gretel to Shakespeare’s Macbeth, witches have been projected as satanic and devilish women.  So, whenever we visualise a witch, we think that she is worshiper of devil, she usually drinks human blood, she can fly on broomstick, she has the power to cast spell, she has the power to tell the future, etc.            Sir, throughout the world, these practices have been reported widely, especially in the underdeveloped and undeveloped countries which are largely the victims of this kind of medieval practices.  Witch does not mean that they are to be female only. Both male and female can be regarded as witch, but because of our patriarchal society, where male dominates the society, female usually suffers a lot. 
          Sir, once  upon a time, the female used to play the role of a peacemaker, or a counsellor, but to cut down their influence in our society the male power started to innovate various kinds of ways and means to scuttle the domination of womenfolk in our society.  That is why due the patriarchal society of our country, the female are largely the victims of witchcraft.
          Sir, India is a country which we are boasting of for surging ahead to the 21st Century.  When we are boasting of a country like India which has carved out a niche for this country in the comity of nations then certainly we cannot encourage this kind of practice by any excuse whatsoever. That is why I think some sort of stringent measures need to be introduced in our legislative mechanism so as to put a ban on this kind of witchcraft, especially relating to the killing of the innocent, poor womenfolk in our country.
          With these words, I am concluding my speech.
 सभापति महोदय : अगरसभी माननीय सदस्य थोड़ा-थोड़ा बोलें तो सभी को बोलने का मौका मिल जायेगा।
       
श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण: महोदय, आपने मुझे जादू-टोना पाबंदी विधेयक, 2010 पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
          महोदय, श्री ओम प्रकाश यादव जी जिस विधेयक का प्रस्ताव लेकर आये हैं, मैं उसका स्वागत करता हूं। देश में किसी भी रूप में जादू-टोना पर पाबंदी का उपबन्ध करने वाला विधेयक, जो सामाजिक जीवन से जुड़ा हुआ है, मैं उसका स्वागत और समर्थन करता हूं।
          महोदय, यह जादू-टोना, अंधविश्वास आदि मध्यकालीन युग से चला आ रहा है। जहां-जहां अंधविश्वास होता है, अविश्वास होता है, वहां-वहां जादू-टोना चलता है और दुनिया के सभी देशों में यह आज भी थोड़े-थोड़े रूप में मौजूद है। आज हम बोलते हैं कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, यह विज्ञान की सदी है, टैक्नोलॉजी की सदी है, लेकिन फिर भी आज हम शगुन, अपशगुन, जंतर-मंतर, जादू-टोना पर ज्यादा विश्वास कर रहे हैं।
          महोदय, इस जादू-टोना के गरीब और अनपढ़ लोग ज्यादा शिकार बनते हैं। आज भी गांव में जब कोई बीमार होता है, किसी को बिच्छू या सांप काटता है तो उसे जंतर-मंतर करने वाले या जादू-टोना करने वाले के पास लेकर जाते हैं। सांप जहरीला होता है तो समय बर्बाद होने के कारण मरीज की मृत्यु भी हो जाती है।  विशेषकर महिलाएँ इसकी ज्यादा शिकार होती हैं। आज कई महिलाओं को चुड़ैल या डायन का नाम देकर उनको बहुत परेशान किया जाता है। मैं असम की बात करता हूँ तो असम में तेजपुर जिले में 12 फरवरी, 2012 को लक्ष्मी गौर नामक महिला को डायन होने के शक के आधार पर उनको मौत के घाट उतार दिया गया। आश्चर्य की बात है कि आज भी पढ़े लिखे लोग इसमें ज्यादा बिलीव कर रहे हैं जो चिन्ताजनक है। इसमें टीवी और फिल्मों द्वारा जो राशिफल प्रसारित होता है, उनके द्वारा भी उसको प्रोत्साहित किया जा रहा है और अंधविश्वास का प्रसार किया जा रहा है। आदरणीय सभापति जी, पहले एक बार ऐसी अफवाह आई थी कि गणपति जी दूध पी रहे हैं।
सभापति महोदय:  माननीय सदस्य एक मिनट विराम दें।
Hon. Members, the time allotted for the discussion is over. There are three or four more speakers to speak on this Bill.  If the House agrees, the time for the discussion may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes MR. CHAIRMAN: Okay.  Please continue.
श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण: आदरणीय सभापति जी, आपने भी सुना होगा कि एक अफवाह आई थी कि गणपति जी ने दूध पिया और उसके बारे में मैंने एक घटना पढ़ी तो मुम्बई में ऐसा हुआ कि लाईन लगी थी और सब लोग गणपति जी को दूध पिलाने के लिए लाईन में खड़े थे। एक बच्चे के हाथ में दूध का लोटा नहीं था। पीछे वाले बच्चे ने पूछा कि हम तो गणेश जी को दूध पिलाने के लिए लाए हैं, आप किसलिए लाईन में खड़े हैं? उस बच्चे ने कहा कि मेरा नाम भी गणेश है और मैं इसलिए लाईन में खड़ा हूँ कि आज आप जब गणेश जी को दूध पिला रहे हैं तो उसमें जो कुछ दूध नीचे गिरेगा तो शायद मेरे भाग्य में भी कुछ आएगा क्योंकि मैं दूध का स्वाद भूल जाऊँ उससे पहले मैं दूध पीना चाहता हूँ और आज मौका है कि शायद मुझे दूध मिले। इस प्रकार के अंधविश्वास से हमारा समाज ग्रस्त है। यादव जी ऐसे समय पर जो बिल लेकर आए हैं, वह बिल्कुल सही है। समाज को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचना चाहिए और आज जो मानव बलि या पशु बलि होती है, उसको रोकना चाहिए। जादू-टोना बंद करने के लिए कड़े कानून का जो प्रावधान लेकर आए हैं, मैं उसका समर्थन करता हूँ।
श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):माननीय सभापति जी, आपने मुझे  श्री ओमप्रकाश यादव द्वारा लाए गए जादू-टोना पाबंदी विधेयक 2010 पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।
          महोदय, यह देश समाज में बँटा है और समाज में विश्वास और अंधविश्वास दोनों हैं। एक तरफ पूजा-पाठ है और दूसरी तरफ तांत्रिक व्यवस्था सदियों से चल रही है और चलती रहेगी। इस पर टोटल पाबंदी लगाने से कहीं न कहीं कठिनाई होगी। हम किसी अस्पताल में जाते हैं, किसी सीरियस मरीज़ का आपरेशन कराना होता है तो वहाँ बड़े बड़े डाक्टर इकट्ठे होते हैं। मरीज़ सीरियस होता है। उस समय डाक्टर से जब मरीज़ का अटैन्डैन्ट पूछता है कि क्या स्थिति होगी तो डाक्टर कहते हैं कि दवा तो मेरे बस में है, आप दुआ कीजिए। यह बात सदियों से होती आ रही है और होती रहेगी। एक तरफ पूजा-पाठ है जहाँ से आदमी को आस्था और विश्वास मिलता है, उसकी इच्छाशक्ति ठीक होती है, बढ़ती है और दूसरी तरफ आडंबर है जहाँ तंत्र विद्या है, ढोंग है, जहाँ इस तरह से बलि, नरबलि और पशुबलि आदि की व्यवस्थाएँ हैं जिनको नकारा नहीं जा सकता है। ये दोनों पक्ष हैं। अभी हम अपने माननीय सदस्यों को सुन रहे थे। दोनों पक्षों को जोड़कर रखा गया। हम, आप सभी समाज में रहते हैं। घर से निकलते हैं तो हर हाथ में कोई न कोई अंगूठी, कोई न कोई ताबीज़, कोई न कोई रक्षा सूत्र बँधे हैं। ऐसा क्यों हैं? हम तो अनपढ़ नहीं हैं, हम तो पार्लियामैंट के मैम्बर हैं, हम तो समाज के सभ्य लोग हैं, हम तो बीसवीं सदी में प्रवेश करके अपनी विकास की यात्रा पर निकले हैं और हम चाँद पर तथा अन्य ग्रहों पर भी पहुँच गए हैं। लेकिन कोई भी शुभ कार्य करने से पहले हम पूजा-पाठ में विश्वास करते हैं चाहे हम किसी ग्रह-उपग्रह पर जा रहे हों या कोई मल्टीस्टोरीड बिल्डिंग बना रहे हों या कोई भी काम कर रहे हों, आस्था की तरफ हमारा झुकाव होता है। इसे रोका नहीं जा सकता। धर्म और पूजा-पाठ एक दूसरी विधा है और दूसरी तरफ आडम्बर और जादू-टोना है जिस पर पाबंदी के लिए भाई ओमप्रकाश जी जो बिल लाए हैं, मैं निश्चित रूप से उसका समर्थन करता हूँ और इस पर पाबंदी लगनी चाहिए।
          समाज में ऐसे लोग हैं, कहीं सांप, बिच्छु या जहरीले कीड़े काटते हैं तो दवा की जगह हम लोग पहले झाड़-पूंक करते हैं। अन्य भी तमाम ऐसे अंधविश्वास हैं, जहां भूत-प्रेत के चक्कर में लोग बने-बनाए घर को उजाड़ देते हैं, भूत-प्रेत के चक्कर में कहीं बलि दे दी जाती है। ऐसे तांत्रिक और ओझा जो लोगों का शोषण कर रहे हैं, जो समाज में कुरीतियां फैला रहे हैं। कुछ  इसकी जिम्मेदारी कहीं न कहीं टेलीविजन चैनल्स और दूरदर्शन की भी है। हम लोग टीवी देखते हैं, इसमें भी कहीं कुछ दिखाया जा रहा है, कहीं कुछ दिखाया जा रहा है। इसका भी समाज पर कुप्रभाव पड़ रहा है, वहां भी पाबंदी लगनी चाहिए। ऐसे लोग जो इस तरह से समाज में कुरीतियां फैला कर दुकान चला रहे हैं, ऐसे लोग  जो समाज में भ्रामक व्यवस्था पैदा करके भूत-प्रेत और टोना की व्यवस्था देकर समाज को विद्रूप कर रहे हैं। पशु बलि और नर बलि की व्यवस्थाएं दे रहे हैं। वहां पाबंदी लगनी चाहिए और दूसरी तरफ जो आस्था और विश्वास है, उसको इससे न जोड़ा जाए। यह एक अलग विधा है, यह एक अलग विधा है। मैं निश्चित रूप से जादू-टोना और अंधविश्वास का पुरजोर विरोध करता हूं। इस पर कड़े से कड़ा कानून बनना चाहिए और समाज में फैली हुई कुरीतियां और बुराइयां, जो घर कर गई हैं, उसमें केवल यह नहीं कहा जा सकता है कि केवल ट्राइबल्स, दलित, अनुसूचित या जंगल और कंदराओं में रहने वाले लोग ही इसके शिकार हैं, सभ्य लोग, जैसा कि अभी माननीय सदस्य बोल रहे थे, हम लोग भी घर से निकलते हैं, बिल्ली आगे से रास्ता काटती है तो लोग बोलते हैं कि अभी रुक जाओ, कोई दूसरा जानवर निकलता है तो कहते हैं कि अच्छा है, शुभ है। ऐसी चीजें हैं और रहेंगी भी, लेकिन जो अंधविश्वास है, जादू-टोना, पशु बलि, नर बलि है और लोगों को और बच्चे-बच्चियों को प्रताड़ना दी जाती है, जैसा कि कभी-कभी टीवी पर दिखाया जाता है, ये सब चीजें निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इन पर निश्चित रूप से पाबंदी लगनी चाहिए और समाज में फैली हुई कुरीतियों को दूर करने के लिए कड़े से कड़ा कानून बनाना चाहिए।
   
श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़):सभापति महोदय, ओम प्रकाश यादव जी द्वारा जादू-टोना पर पाबंदी लगाने का जो विधेयक लाया गया है, इसके संबंध में हमारे साथियों ने बहुत अच्छी बातें कही हैं। आज सदन में बहुत अच्छे विषय को ले कर चर्चा हो रही है। एक तरफ हम अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छू रहे हैं। चांद के बारे में कभी कहा जाता था कि वहां बूढ़ी अम्मा चरखा कात रही है, लेकिन उसी चांद पर एक परी सुनीता विलियम्स के रूप में हमारे यहां से जाती है और छः महीने तक अंतरिक्ष में रह कर आती है और सुश्री कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाती है। यह विज्ञान है। दूसरी तरफ हुक्मदेव जी ने तथा दूसरे साथियों ने कहा कि विज्ञान और धर्म, दोनों को अलग-अलग करके हमें देखना पड़ेगा। समाज में जो अंधविश्वास फैला है, उसमें हम देखते हैं कि जैसे किसी व्यक्ति को छींक आ जाती है, तो हम कहते हैं कि अभी बाहर मत निकलो। हमारी माताएं रात में आचार नहीं निकालती हैं। यह माना जाता है कि अगर रात में आचार निकाला जाएगा, तो वह खराब हो जाता है। यह कहा जाता है कि शुक्रवार को कोई नया काम प्रारम्भ करने की चर्चा नहीं करनी चाहिए। शनिवार को लोहे का सामान नहीं खरीदना चाहिए, व्हीकल नहीं खरीदना चाहिए। यह सब अंधविश्वास है।
          जब इन अंधविश्वासों के संबंध में हम चर्चा करते हैं, तो हमारे हर शहर के बाहर ऐसा कोई न कोई रास्ता या घाटी होती है, वहां से जब गाड़ियाँ जाती हैं, चाहे बस हो या ट्रक हो कहा जाता है कि वहां नारियल अवश्य फोड़ा जाता है। इन्दौर के आगे घाटी है। टीवी में उसके बारे में अकसर बताया जाता है कि वहां अगर ट्रक या बस वाले नारियल नहीं फोड़ते हैं, तो बहुत सारी दुर्घटनाएं होती हैं। ऐसी बातें हमारे देश में बहुत सारे स्थानों पर देखने को मिल जाती हैं। पांडे जी ने और हुक्मदेव जी ने भी वही बात कही है कि इन सारी चीजों को रोकने में हम समाज का नेतृत्व करते हैं और इन कुरीतियों के प्रति जागरण के संबंध में हमें ही पहल करनी पड़ेगी। पिछले दिनों दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में हमारे परिवार के एक सदस्य का इलाज हो रहा था। वहां मैंने देखा कि बहुत धनाढय़ परिवार के नौजवान का इलाज चल रहा था। डाक्टरों ने कहा कि उसके लिए बहुत ज्यादा सम्भावनाएं नहीं हैं, तो धनाढय़ परिवार ने जादू-टोना करने के लिए बाहर से व्यक्ति को बुलाया। हमारे देश में चिकित्सा सुविधा होने के बावजूद भी हमारे समाज में अंधविश्वास इतना है कि हम उसके ऊपर विश्वास करने लगते हैं। हमारे बहुत सारे मित्र चुनाव के लिए फॉर्म भरने जाते समय बहुत सारा जादू-टोना करने लगते हैं। उसके संबंध में सबसे पहले हमें निर्णय लेना पड़ेगा। मेरा स्वयं का एक प्रकरण है। जब मैं ग्यारहवीं लोक सभा चुनाव का फॉर्म डालने जाने लगा तो मेरे घर के सामने किसी ने सुबह चार बजे के आस-पास हड्डी, हल्दी और सिन्दूर वगैरह रख दिया। मैंने कहा मैं इसे नहीं मानता और उस पर पैर रखता हुआ मैं आगे बढ़ गया। मैंने लोक सभा चुनाव के लिए फॉर्म भी डाला और चुनाव भी जीता। उसके बाद लगातार चुनाव जीतता रहा। एक बात बहुत सारे मित्रों ने कही है कि जो भूत-प्रेत वाले, डरावने सीरियल और फिल्में बन रही हैं, उसके कारण बच्चों में काफी भय पैदा हो रहा है और उस भय को दूर करने के लिए माताएं जादू-टोना का सहारा ले रही हैं। ऐसे जादू-टोना वाले डरावने सीरियलों पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। ऐसी फिल्मों पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए जो तरह-तरह से समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा देती हैं।
          मैंने विज्ञान और धर्म के संबंध में जो बात कही थी कि हमें विज्ञान और धर्म दोनों को अलग-अलग देखना पड़ेगा। विज्ञान बहुत पहले भी था। रामायण के समय में भी था। उस समय पुष्पक विमान की कल्पना की गयी यानी हमारी टेक्नॉलोजी बहुत आगे थी। तब दिव्य दृष्टि से देख कर बात करने की बात कही जाती थी। आज कम्प्यूटर आया, टेलीविजन आया। लेकिन, ये सारी चीज़ें उस युग में भी थीं और हजारों किलोमीटर दूर से भी इन चीज़ों को देखा जाता था। अभी हम देखते हैं कि बहुत सारे लोग विज्ञान का सहारा लेकर पानी में पत्थर को तैरा देते हैं, पानी में आग लगा देते हैं और कहते हैं कि हमने जादू-टोना कर दिया। हमारे आदिवासी और पिछड़ी जाति के लोग कम पढ़े-लिखे होते हैं। ऐसे लोगों के बीच में इस तरह की चीज़ों को करके यह कहा जाता है कि हम जादू-टोना कर रहे हैं। वास्तव में यह विज्ञान है। हमारे घरों के आँगन में तुलसी का पौधा होता है। वह चौबीस घंटे ऑक्सीजन देता है। वह तुलसी का पौधा हमारे लिए इतनी आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है कि जिस घर के आँगन में उस तुलसी के पौधे की उपस्थिति होती है, वहां यह माना जाता है कि उस घर में किसी तरह की दुष्ट आत्माएं नहीं आ सकती हैं, कोई बुरी आत्मा उस घर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, सारी चीज़ें अपने आप दूर हो जाती हैं।
          हमें विज्ञान और धर्म दोनों को अलग-अलग दृष्टि से देखना पड़ेगा और जादू-टोना के संबंध में जो अंधविश्वास फैला हुआ है, उस अंधविश्वास के विरोध में, चूंकि हम लोग समाज का नेतृत्व करते हैं इसलिए हम सभी सांसदों को इस संबंध में पहल करनी चाहिए कि जादू-टोना खत्म होना चाहिए। जब तक हम इसके लिए अपने जीवन में पहल नहीं करेंगे तब तक यह समाप्त नहीं होगा।
          महोदय, आपने मुझे इस विषय पर बोलने का अवसर दिया, मैं आपको और ओम प्रकाश जी को धन्यवाद देता हूं कि उनके द्वारा एक बहुत अच्छा प्राईवेट मेम्बर बिल लाया गया है। सभी सांसदों ने इस विषय पर काफी रूचि के साथ अपने-अपने विचार रखा है। मैं इन बातों के साथ कि इस पर बहुत सख्ती से पालन होना चाहिए और जादू-टोना पर पाबंदी लगाने का जो बिल लाया गया है, मैं इसका समर्थन करता हूं।
 
डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी (अहमदाबाद पश्चिम): सभापति महोदय, मैं श्री ओम प्रकाश यादव द्वारा प्रस्तुत किए गए जादू-टोना पर पाबंदी विधेयक, 2010 को लाने के लिए मैं उनका विशेष रूप से अभिनंदन करता हूं। यह कहा जाता है कि जादू-टोना गरीब तबके में व्याप्त होता है, मैं इसे नहीं मानता। यह पढ़े-लिखे, पॉलिटीकल, कॉरपोरेट सेक्टर और अन्य लोगों में भी होता है और अन्य देशों में भी यह होता है। मैं समझता हूं कि जादू-टोना अज्ञानता की वजह से होता है। जहां शिक्षा कम होती है, वहीं जादू-टोना भी होता है।
          जादू-टोने के संबंध में जो कानून बनाने की बात है, उसके संबंध में मैं अपनी ओर से कुछ सुझाव देना चाहता हूं। मैं पेशे से एक डॉक्टर हूं। मैं स्वयं का एक अनुभव यहां व्यक्त करना चाहता हूं। मैं पेशे से सर्जन हूं। मेरे पास एक मरीज़ लाया गया था। वह महिला थी और बालिका थी। उसके ऊपर अलग-अलग प्रकार का जादू-टोना किया गया था। उसके परिवारजनों और गांव वालों ने उसे डाकिन माना था। वह महिला चिल्लाती थी। उसे उल्टी होती थी। वह पूरे बिस्तर पर तड़फड़ा रही थी। बाद में किसी ने कहा कि लगता है कि इसे कुछ मेडिकल प्रॉब्लम है। उसके परिवार के लोग उसे मेरे पास लाए। मैंने उनकी जांच की। जांच के बाद मुझे मालूम हुआ कि उन्हें एपेंडिसाइटिस की बीमारी थी। एपेंडिसाइटिस की बीमारी की वज़ह से वह बहुत तड़फड़ाती थी, बहुत टॉसिंग होती थी, उसे बहुत उल्टी होती थी, और वह अलग-अलग प्रकार की भाव मुद्राएं करती थीं। इसी वज़ह से परिवार वालों ने उस पर जादू-टोना किया था। वे उसे मेरे पास लाए और मैंने उसका ऑपरेशन किया।    

18.00 hrs ये जो महिला आज बड़ी हो गई है, उनके दो-तीन बच्चे भी हुए हैं। वह आज भी मेरे सम्पर्क में है। ये इनका एक उदाहरण है। मैं यह बताना चाहता हूं कि ये जादू-टोना उनकी अज्ञानता की वजह से है। ...( व्यवधान)

 

सभापति महोदय:  सोलंकी जी, समय हो गया है, आप अगली बार इसमें बोलेंगे। अब हम शून्य काल ले रहे हैं - श्री प्रेमदास जी।