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[Cites 1, Cited by 1]

Allahabad High Court

Guddu @ Shiv Shanker Jaiswal vs State Of Up on 18 December, 2020

Author: Shamim Ahmed

Bench: Shamim Ahmed

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD Court No. - 93 Case :- CRIMINAL MISC. BAIL APPLICATION No. - 47153 of 2020 Applicant :- Guddu @ Shiv Shanker Jaiswal Opposite Party :- State of U.P. Counsel for Applicant :- Anurodh Tripathi Counsel for Opposite Party :- G.A. माननीय शमीम अहमद न्यायमूर्ति वादी के अधिवक्ता द्वारा पूरक शपथ पत्र आज न्यायालय मे दाखिल किया गया, जिसे पत्रावली मे शामिल किया जाय़।

वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्ण जमानत प्रार्थना पत्र, आवेदक गुड्डू उर्फ शिव शंकर जायसवाल की ओर से मु०अ०सं० 195 सन् 2020, अन्तर्गत धारा 3(1) उत्तर प्रदेश गिरोहबंद समाज विरोधी क्रिया कलाप(निवारण) अधिनियम 1986, थाना चोपन, जनपद सोनभद्र में जमानत पर मुक्त करने हेतु प्रस्तुत किया गया है।

     आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली का परिशीलन किया।

आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि आवेदक को इस प्रकरण में रंजिशन झूठा फँसाया गया है, आवेदक आरोपित अपराध संख्या 195 वर्ष 2020, अन्तर्गत धारा 3(1) उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रिया कलाप (निवारण) अधिनियम थाना चोपन, जनपद सोनभद्र में पूर्णतया निर्दोष है, उसकी उक्त आरोपित अपराध में किसी प्रकार की सहभागिता अथवा संलिप्तता नहीं रही है, उसने आरोपित अपराध कारित नहीं किया है, उसे आरोपित अपराध में झूंठा शत्रुतावश, रंजिशन फंसाया आरोपित/नामित किया व कराया गया है। आवेदक गिरोहबंद नहीं है वह किसी गिरोह का सदस्य सरगना अथवा मुखिया भी नहीं है। आवेदक द्वारा कभी कोई संज्ञेय अथवा असंज्ञेय अपराध कारित नहीं किया गया है, उसके द्वारा गिरोहबंद के रूप में भी कभी कोई अपराध कारित नहीं किया गया है। आवेदक को दण्डित, कष्टित, प्रताडित, अपमानित, ब्लैकमेल करने के उद्देश्य से थाना चोपन, जनपद सोनभद्र में आरोपित अपराध पुलिस के द्वारा लिखवाई गई है।

आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने पुनः अपना तर्क प्रस्तुत करते हुऐ कहा। आवेदक पर आरोपित अपराध की प्राथिमिकी स्वतंत्र व सारवान आरोप एवं तथाकथित अपराध के आधार पर नहीं लिखाई गई है अपितु पुलिस अभिलेख व पूर्व में पंजीकृत आरोपित अपराध के आधार पर आधारित करते हुए लिखी/लिखाई गई है जो विधि विरूद्ध, स्वेच्छाचारी, अवैधानिक है। आवेदक पर आरोपित अपराध के गैंग चार्ट में 3 वाद दर्शित है जिसमें आवेदक की जमानत गुणागुण के आधार पर स्वीकार की जा चुकी है। आवेदक पर आरोपित अपराध के समर्थन व पुष्टि में आवेदक के विरूद्ध अभियोजन के पास कोई रंच मात्र विधिक, ग्राह्य व विश्वसनीय साक्षय उपलब्ध नहीं है। आवेदक द्वारा लोक व्यवस्था अथवा सार्वजनिक शांति व्यवस्था के प्रतिकूल कभी भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी है न तो कभी हिंसा ही की गई है। उसनें भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 16,17 एवं 22 में वर्णित दण्डनीय अपराध कारित नहीं किया है। उसने आर्थिक दुनियाबी भौतिक लाभार्थ कभी कोई अपराध नहीं किया है न तो किसी तथाकथित अपराध के माध्यम से अनुचित लाभ अथवा धनार्जन ही किया है। एवं आवेदक दिनांक 31.7.2020 से काराभिरक्षा में निरूद्ध चला आ रहा है।, इसलिए आवेदक को जमानत पर छोड़ दिया जाय, जमानत पर मुक्त होने के पश्चात आवेदक फरार नहीं होगा और न ही अभियोजन साक्षियों को प्रभावित करेगा।

     विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने आवेदक के जमानत प्रार्थना पत्र का विरोध किया। तथा समर्थन मे कहा गया कि आवेदक जमानत पर रिहा होने पर पुनः अपराधिक गतिविधियों मे लिप्त हो जाएगा। जो समाज के लिये हानिकारक सिद्ध होगा। तथा प्रथम सूचना मे कही गई बातों का समर्थन करते हुऐ कहा कि आवेदक एक शातिर किस्म का अपराधी है। जो गैंग बनाकर मारपीट आगजनी धमकी और हत्या का प्रयास आदि जैसे संगीन अपराध कारित करके आर्थिक एवं भौतिक दुनियाबी लाभ अर्जित करता है। तथा इसके गैंग मे कई सक्रिय सदस्य है, जो अपराध कारित करते रहते है।

उभय पक्षो को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। जमानत प्रार्थना पत्र को निर्णित करने से पहले जमानत की विधि क्या है इसका उल्लेख करना आवश्यक है।

विधि का सिद्धान्त है कि "जमानत नियम और जेल अपवाद है"। जमानत न तो किसी यांत्रिक आदेश से स्वीकार या अस्वीकार ही की जा सकती है, क्योंकि यह न केवल उस व्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधित है जिसके विरूद्ध आपराधिक कार्यवाही चल रही है, परन्तु यह दण्ड न्याय प्रणाली के हित से भी संबंधित है और यह भी सुनिश्चित करना है, कि अपराध करने वालों को न्याय में बाधा डालने का अवसर न दिया जाये।

जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय को कुछ कारकों को ध्यान में रखना चाहिए, जैसे कि अभियुक्त के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला का होना, आरोप की गंभीरता और प्रकृति, आरोप सिद्ध होने की स्थिति में सजा की कठोरता, अनुपूरक साक्ष्य की प्रकृति, न्यायालय की आरोप के लिये प्रथम दृष्टया संतुष्टि, आरोपी की हैसियत व पद, अभियुक्त की न्याय से भागने और अपराध को दोहराने की संभावना, साक्ष्य के साथ छेडछाड की संभावना, शिकायतकर्ता और गवाह को धमकी की आशंका और अपराधी का आपराधिक इतिहास, जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय को मामले के अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता व स्थिरता की गुण, दोष की जांच सघनता से नहीं करनी चाहिए। क्यों कि यह केवल परीक्षण के दौरान ही जांचा जा सकता है समता जमानत का एकमात्र आधार तो नही है, परन्तु यह उपरोक्त पहलुओं में से एक हो सकता है, जो अनिवार्य रूप से हैं। जमानत के आवेदन पर विचार करते समय आवश्यक है।

यह अविवादित है, कि जमानत देना या न देना, ये उस न्यायालय का विवेकाधिकार है, जो इस मामले की सुनवाई कर रहा है। हालांकि यह विवेकाधिकार निर्बाध है। परन्तु इसका उपयोग न्यायसंगत, मानवीय व सहानुभूति पूर्वक किया जाना चाहिए न कि मनमाने तरीके से। जमानत स्वीकार या अस्वीकार करने के आदेश में कारणों को प्रथम दृष्टया इंगित करना चाहिए, हालांकि गुण-दोष पर साक्ष्य की विस्तृत जांच और विस्तृत दस्तावेजीयकरण को दर्शाने की आवश्यकता नहीं है। जमानत की शर्तें इतनी भी सख्त नहीं होनी चाहिए की उसका अनुपालन करना ही अक्षम हो जाये, जिससे ज़मानत ही काल्पनिक न हो जाये।

उपरोक्त तथ्यात्मक व विधिक विवरण से यह विदित है कि आवेदक को दण्डित, कष्टित, प्रताडित, हैरान व परेशान करने के उद्देश्य से उसके विरूद्ध आरोपित अपराध मे उक्त अपराध की प्राथिमिकी लिखायी गयी है। आवेदक किसी गैंग का मुखिया अथवा सदस्य नहीं है, न तो उसका कोई गिरोह ही है। तथा आवेदक द्वारा लोक व्यवस्था अथवा सार्वजनिक शांति व्यवस्था के प्रतिकूल कभी भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी है न तो कभी हिंसा ही की गई है। उसनें भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 16,17 एवं 22 में वर्णित दण्डनीय अपराध कारित नही किया है। उसने आर्थिक दुनियाबी भौतिक लाभार्थ कभी कोई अपराध नहीं किया है न तो किसी तथाकथित अपराध के माध्यम से अनुचित लाभ अथवा धनार्जन ही किया है।

पत्रावली पर उपलब्ध सारवान तथ्यों, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 एवं Dataram Singh Vs State of U.P. and another, reported in (2018)3 SCC 22 के प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित अभ्युक्ति के दृष्टिगत, आरोपों की प्रकृति, समर्थन में सबूतों की प्रकृति, सजा की गंभीरता, आरोपित आवेदक का चरित्र, परिस्थितियों का अवलोकन मुकदमे मे अभियुक्त की उपस्थिति को सुरक्षित करने की उचित संभावना, गवाहो से छेड़छाड़ की उचित आशंका, जनता/राज्य और अन्य परिस्थितियों का बड़ा हित एवं परीक्षण मे देरी होना एवं निकट समय में इन परिस्थितियों को देखते हुए मेरा मानना है कि यह जमानत देने के लिए एक उपयुक्त मामला है।

तद्नुसार वाद के गुण दोष पर बिना कोई टिप्पणी किए हुए आवेदक गुड्डू उर्फ शिव शंकर जायसवाल को उपरोक्त वर्णित अपराध मु०अ०सं० 195 सन् 2020, अन्तर्गत धारा 3(1) उत्तर प्रदेश गिरोहबंद समाज विरोधी क्रिया कलाप(निवारण) अधिनियम 1986, थाना चोपन, जनपद सोनभद्र में संबंधित न्यायालय की सन्तुष्टि पर व्यक्तिगत बंध-पत्र एवं उसी धनराशि के दो प्रतिभू करने पर निम्नलिखित शर्तों के साथ जमानत पर छोड़ दिया जायः-

1-   आवेदक विवेचना या परीक्षण के दौरान साक्षियों को डरायेगा/धमकायेगा नहीं एवं अभियोजन साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा।

2-   आवेदक परीक्षण के दौरान बिना कोई स्थगन लिए परीक्षण में ईमानदारी से सहयोग करेगा।

3-   आवेदक जमानत पर रिहा होने के बाद किसी भी अपराधिक गतिविधि में लिप्त नहीं होगा न कोई अपराधिक कृत्य करेगा।

4-   आवेदक को यदि माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत गठित समिति के आदेश के अनुसार अल्पकालिक जमानत पर बढ़ाया गया है तो अल्पकालिक जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद उसकी जमानत प्रभावी होगी।

5-   अदालतों के सामान्य कामकाज के बहाल होने तक आवेदक को बिना किसी जमानत के निजी मुचलके पर जमानत पर बढ़ाया जाएगा। अदालत के सामान्य कामकाज बहाल होने के बाद आरोपी एक महीने के भीतर अदालत की संतुष्टि के प्रतिभुओं को प्रस्तुत करेगा।

6-   पार्टी उच्च न्यायालय इलाहाबाद की आधिकारिक वेबसाइट से डाउनलोड किए गए इस तरह के आदेश की कंप्यूटर जनित प्रतिलिपि दायर करेगी।

7-   संबंधित न्यायालय/प्राधिकरण/अधिकारी, उच्च न्यायालय इलाहाबाद की आधिकारिक वेबसाइट से आदेश की ऐसी कम्पयूटरीकृत प्रति की सत्यता की पुष्टि करेगा और लिखित रूप से इस तरह के सत्यापन की घोषणा करेगा।

      उपरोक्त शर्तों में से किसी के उल्लंघन के मामले मे, यह जमानत रद्द करने का आधार होगा।

Order Date :- 18.12.2020 SFH