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Lok Sabha Debates

Discussion On The Situation Arising Due To Drought And Hailstorms In Various ... on 26 February, 2013

> Title: Discussion on the Situation arising due to drought and hailstorms in various parts of the country.

   

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, item No. 29, Shri Shailendra Kumar.

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):माननीय उपाध्यक्ष जी, आपने मुझे नियम 193 के तहत देश में सूखे और ओलावृष्टि से उत्पन्न स्थिति पर चर्चा की शुरूआत करने का जो अवसर प्रदान किया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मैं साथ ही अपने मित्र श्री गोपीनाथ मुंडे जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने भी नोटिस देकर कम से कम इस विषय पर चिन्ता व्यक्त की। श्री भर्तृहरि मेहताब साहब ने भी इस पर नोटिस दिया है, इनको भी मैं धन्यवाद देना चाहूंगा कि ये भी, जब इनकी बारी आएगी तो अपनी बात रखेंगे।

          आज अगर देखा जाये तो देश के अन्दर किसानों की स्थिति बहुत ही खराब है। जरूरत इस बात की है कि किसान को समाधान और सम्मान चाहिए, लेकिन न तो किसानों की समस्या पर कोई समाधान हो रहा है और न ही उन्हें सम्मान मिल रहा है। आज अगर देखा जाये तो पूरे देश में, चूंकि भारतवर्ष कृषि-प्रधान देश है, पूरे देश में 75 फीसदी लोग हैं, जो किसानी-खेती करके अपना जीवन-यापन करते हैं और प्रमुख रूप से देश के विकास और अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं, लेकिन उनके समाधान और सम्मान पर कोई भी सरकार अमल नहीं करती, न उस पर ध्यान देती है। अगर पिछले आंकड़े देखे जायें तो करीब 2.5 लाख से ऊपर किसानों ने आत्महत्या की हैं और निरन्तर यह संख्या बढ़ती जा रही है। सरकार की तमाम योजनाएं लागू तो होती हैं, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से उन किसानों तक न पहुंच पाने के कारण आज किसान कर्ज में बिल्कुल डूबे हुए हैं, कर्ज के बोझ से बिल्कुल दबते चले जा रहे हैं। चूंकि महाराष्ट्र में मराठवाड़ा में सूखे की स्थिति बहुत ही भयानक है, महाराष्ट्र से हमारे गोपीनाथ मुंडे जी आते हैं, जिन्होंने नोटिस दिया है। हमारे कृषि मंत्री जी पश्चिमी महाराष्ट्र से आते हैं...( व्यवधान) मैं तो पूरा प्रदेश मानकर चलता हूं कि कृषि मंत्री जी का पूरा प्रदेश है। जब पूरा देश है तो पूरा प्रदेश भी है। मराठवाड़ा की स्थिति पर अगर गौर किया जाये तो मेरे ख्याल से बहुत ही विकराल और विकट स्थिति है। वहां पर अकाल की जैसी स्थिति हो गई है।

          उपाध्यक्ष जी, बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अभी वहां पर लोकल स्तर पर एक फंक्शन हुआ, राज्य सरकार के एक स्थानीय मंत्री ने वहां पचास हजार लोगों को भोजन देने की व्यवस्था की।  वह पूरा एरिया अकाल की स्थिति से गुजर रहा है।  माननीय कृषि मंत्री जी अपने को किसान का बेटा भी कहते हैं, मैं जानता हूं कि गन्ना और शुगर से जुड़े हुए और सहकारी आन्दोलन में आपकी अहम् भूमिका रही है।  इससे पहले भी कई बार इस सदन में चर्चा हुई है।  जहां तक तमाम अवसरों पर इस बात को प्रमुखता से रखा गया था कि रंगराजन कमेटी की प्रमुख संस्तुति को लागू किया जाये, लेकिन अभी तक सरकार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, जो सीधा गन्ना किसान और चीनी से सम्बन्धित लोगों की समस्याओं की तरफ इंगित करता है।  उसमें अन्य प्रकार से भी तमाम उपज, जो किसान करता है, उसकी विस्तृत रूप से चर्चा उसमें की गयी है, लेकिन आज तक सरकार उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दे पायी है, चाहे वह रेल बजट हो या वित्त मंत्री जी का फाइनेंस बजट हो, हमेशा निराशाजनक रहा है।  जब बजट पेश किया जाता है, खेती, कृषि और गांव वालों की मदद के नाम पर योजनाएं बजट में नजर आती हैं, जो मात्र चुनावी लाभ लेने के लिए किया जाता है, अन्यथा अगर देखा जाये तो उपाध्यक्ष जी, उन तक ऐसी किसी योजना का लाभ नहीं पहुंच पाता है, जिसके कारण आज किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर है।

          महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के किसानों ने यह तय कर लिया कि हर किसान 11 रूपये मुख्यमंत्री को मनी-आर्डर करेंगे और 30 रूपए देश के कृषि मंत्री को मनी-आर्डर करेंगे, ताकि आपके पास जब बजट और भंडार उन पैसों का हो जाए, तो उसमें कुछ मिलाकर आप मराठवाड़ा या महाराष्ट्र या अनेक तमाम ऐसे क्षेत्र हैं, जहां बे-मौसम बारिश के कारण या बारिश न होने के कारण सूखे की स्थिति है, उनके लिए आप स्पेशल पैकेज या बजट देने का प्रावधान कर सकें।  आज महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देश के अन्य भागों में, चाहे वह मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका हो या उत्तर प्रदेश में कुछ इलाके हैं, जहां बारिश नहीं हुयी, बिहार छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडीशा आदि ऐसे तमाम इलाके हैं, जहां बारिश न होने के कारण सूखे की स्थिति है। जनरल बजट पेश होने वाला है, यूपीए टू की सरकार वित्त बजट पेश करने जा रही है और किसान टकटकी लगाकर देख रहा है, जहां सूखे की स्थिति है, ओलावृष्टि की स्थिति आयी है, पूरे देश में कोहरे और पाले के कारण जो फसलें नष्ट हुयी हैं, उसका एक जनरल सर्वे कराकर आप कम से कम उनके लिए स्पेशल पैकेज की व्यवस्था करें, किसान यह आस लगाकर आने वाले उस बजट का इंतजार कर रहा है, जो इस सदन में 28 तारीख को प्रस्तुत होगा।  वित्त मंत्री जी, माननीय चिदंबरम साहब हमेशा खेती को ग्रोथ इंजन बताते हैं।  हमारा देश जब खेती, किसानी और कृषि पर निर्भर है, तो वह ग्रोथ इंजन की भाषा जब कहते हैं, तो उनको यह भी देखना चाहिए कि इंजन तभी चलता है, जब उसको बराबर ईंधन मिले, उसको बराबर तेल मिले, उसकी बराबर मरम्मत हो, तो मेरे ख्याल से वह इंजन तेजी से बढ़ेगा।  कृषि का जो ग्रोथ इंजन है, उसे चलाने के लिए आपको विशेष पैकेज देने की आवश्यकता होगी और उन किसानों की तरफ आपको ध्यान देने की आवश्यकता होगी, तभी जाकर इस देश का किसान खुशहाल होगा।  सरकार में हमेशा देखा गया है और मुझे उम्मीद है कि 28 तारीख को जब इस सदन में बजट प्रस्तुत होगा, तो आप बड़ी प्रमुखता से यह कहेंगे कि वर्ष 2005 में हमने मनरेगा को लागू किया, आप यह भी कहेंगे कि 17 हजार करोड़ रूपए हमने किसानों की कर्ज माफी की और कैश ट्रंसफर स्कीम को लाने की बात आप प्रमुखता से रखेंगे।  यह हम लोगों को पहले से ही आभास हो गया है, क्योंकि हो सकता है यह चुनावी वर्ष हो, अगले साल आप चुनाव न करा सकें, इसलिए ऐसा लुभावना बजट आप प्रस्तुत करेंगे, यह हम लोगों को उम्मीद है।     

           उपाध्यक्ष जी, दूसरी बात मैं कहना चाहूंगा कि हमेशा देखा गया है कि चुनावी लाभ के लिए बजट प्रस्तुत किए जाते हैं जो अपेक्षा के अनुरूप बजट आते हैं और प्रत्यक्ष रूप से उसका कोई फायदा किसानों को नहीं मिल पाता है। आज अगर आंकड़े देखे जाएं तो केवल एक क्षेत्र, कृषि मंत्री जी जो आप का अपना क्षेत्र है, तीन हजार करोड़ रूपये की कृषि उपज - फल और सब्जियां सूख गईं। मौसमी के जो खेत बड़े-बड़े थे, वे सूख गए हैं, उन पर कुल्हाड़े चल रहे हैं। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा का जो एरिया है, जहां पर सूखे और अकाल की स्थिति है, आप वहां का सर्वे करा लीजिए तो जमीन के अंदर केवल 14 परसेंट पानी की उपलब्धता रह पाई है। वहां पर सूखे के स्थिति व्याप्त है, कोंकण में मेरे ख्याल से हो सकता है कि 60 से 65 प्रतिशत हो, लेकिन जहां तक मराठवाड़ा की बात है, वहां पर सूखे की स्थिति जबर्दस्त है। इस पर आपको विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। देश के अंदर किसानों के लिए, सिंचाई की सुविधा के लिए जो तमाम परियोजनाएं बनती हैं, उत्तर प्रदेश से भी सिंचाई परियोजना, चाहे वह सरयू सिंचाई परियोजना हो, इस प्रकार की जो परियोजनाएं अन्य प्रदेशों से भी, जहां सूखे की स्थिति है, वहां से प्रस्ताव बन कर केन्द्र सरकार के पास लंबित हैं। आपको चाहिए कि ऐसी योजनाओं पर विशेष ध्यान दे कर, उनको बजट देने की व्यवस्था करें। अगर आपने पानी दे दिया तो मेरे ख्याल से किसान का उससे बढ़कर कुछ नहीं हो सकता, उससे देश की आर्थिक स्थिति, जिस आर्थिक मंदी से आप गुजर रहे हैं, हो सकता हे उससे आप को निजात मिल सके।

          दूसरी बात, वर्ष 1980 में उत्तर प्रदेश में एक परियोजना लागू की गई थी - सरयू नहर। जिसमें उस समय बजट का प्रावधान 400 करोड़ रुपये था। अब तक उसमें 2700 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन अभी तक वह परियोजना पूरी नहीं हो पाई है। आज के डेट में 2400 करोड़ रुपये चाहिए। मैं चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से ऐसी सिंचाई परियोजनाओं के जो प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास आए हैं उनको प्राथमिकता देते हुए आप बजट की व्यवस्था करें, तभी देश का किसान खुशहाल हो सकता है। ऐसे ही तमाम और भी प्रदेशों में सूखे की स्थिति व्याप्त है जिस पर आपको एक केन्द्रीय दल भेज कर सर्वे कराना चाहिए कि कौन-कौन सी फसलों को नुकसान हुआ है, उनमें सब्जियां भी हैं, फल भी हैं, अनाज भी हैं, इस प्रकार की आप को व्यवस्था करनी चाहिए। जहां तक हम लोगों ने देखा कि आप बजट में भी लाने वाले हैं, और भी तरीके से हम लोगों ने देखा कि सन् 2012-13 में आप ने किसान क्रेडिट कार्ड और किसान स्मार्ट कार्ड तैयार करने के लिए फैसला ले लिया और उसका इस्तेमाल करने की भी योजना आप बना रहे हैं। ऐसी स्थिति में जितने भी किसान हैं उनको आप भूमिहीन कर देंगे। वे कर्ज ले-ले कर, अपने उत्पाद का वाजिब मूल्य न पा कर अंत में अपनी जमीन को बेचने के लिए मजबूर होंगे , मेरे ख्याल से इससे किसान और भी तबाह होगा और उसको आत्महत्या के लिए प्रेरित होना पड़ेगा। जहां तक देखा गया है कि अन्य स्रोतों से, अन्य व्यवसाय से तो आय मिल जाती है लेकिन किसान जो उत्पाद करता है, वह चाहे अनाज का हो, साग-सब्जियों का हो या फलों का हो, उनको आय नहीं हो पाती है। यहां तक कि उनके पास साल भर खाने की जो व्यवस्था होती है उसकी भी वे व्यवस्था नहीं कर पाता, कभी-कभी मौसम की मार हो जाती है। यही कारण है कि मजबूर हो कर हर किसान परिवार से एक व्यक्ति कमाने प्रदेश जाता है, चाहे कलकत्ता, मुबंई, चेन्नई, बंगलोर या दिल्ली हो, तमाम बड़े-बड़े नगरों में जब कमाने के लिए वह परिवार जाता है तब जा कर अपने परिवार का वह भरण-पोषण कर पाता है। हमारी जो भी योजनाएं हैं, क्या कारण है कि उन पर किसानों को आज तक भरोसा नहीं हो पाया है। आज आप अपने जवाब में इस बात को बताएं कि किसानों को कैसे भरोसा हो, वे कैसे भरोसा करें, जो भी योजनाएं आप दे रहे हैं, किसानों को भरोसा दिलाने के लिए कोई बात जब आप कहेंगे, मेरे ख्याल से वह वाजिब होगा। आपके कैबिनेट के ही एक मंत्री कपिल सिब्बल जी ने कहा कि 65 हजार करोड़ रुपये की फल-सब्जी हमारे यहां सड़ जाती है, जिसके लिए आज तक हम व्यवस्था नहीं कर पाए हैं।   यहां विभिन्न अवसरों पर तमाम चर्चाएं हुई हैं, लेकिन हम आज तक पैकेजिंग व्यवस्था नहीं कर पाए। दूसरी तरफ आपके नेता जिन्हें भावी प्रधान मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, बनाने की आपकी योजना है, आपका स्वप्न है। राहुल जी कहते हैं कि हम एक रुपये में 99 पैसे सीधे गांवों में भेजने की व्यवस्था करेंगे। मैं कहना चाहूंगा कि आपके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी जी, जो बहुत ही एग्रैसिव लीडर थे, जिन्होंने देश के लिए कार्य किया, उन्होंने भी अपने भाषण में कहा था कि जब हम एक रुपया भेजते हैं, तो लोग 75 प्रतिशत खा जाते हैं और गांवों में केवल 25 प्रतिशत योजनाएं जाती हैं। आप इसे कैसे अमली जामा पहनाएंगे। यह आपको बताने की आवश्यकता है कि आपके पास कौन सी कार्य योजना है जिससे किसानों को प्रत्यक्ष रूप से फायदा मिलेगा।

          उत्तर प्रदेश में तमाम ऐसे इलाके हैं, दो-तीन दिन पहले हर जगह काफी वर्षा हुई, ओलावृष्टि हुई  जिससे आलू की खेती बिल्कुल चौपट हो गई। सरसों की खेती को काफी नुकसान हुआ। दलहन में अरहर, मटर तमाम खेती योग्य उपज को जबरदस्त चोट पहुंची है। मैं चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश सहित जिन इलाकों में बे-मौसमी वर्षा हुई, ओलावृष्टि हुई, आप केन्द्रीय दल भेजकर सर्वे करवाएं कि किस एरिया में कितना नुकसान हुआ है। उनके लिए स्पैशल रूप से पैकेज की व्यवस्था करें, आर्थिक मदद देने की व्यवस्था करें। कम से कम उनका लगान माफ करें। कृषि उपकरण से संबंधित जो मामले हैं, यहां हमेशा बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। कृषि उपकरण, बीज, उर्वरक, आप उर्वरक के दाम देख लीजिए, य़ूरिया, डीएपी के दाम हमेशा बढ़ते रहते हैं, तस्करी हो रही है, अन्य देशों में खाद भेजी जा रही है। इस पर रोक लगाने की आवश्यकता है। आपकी सीमाओं पर कुछ ऐसे सिपाही हों जो देख सकें कि तस्करी के रूप में क्या-क्या हो रहा है। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। आप कम से कम उत्तर प्रदेश सरकार से सीख लें। समाजवादी पार्टी, अखिलेश जी की सरकार ने नहर और नलकूप से जो सिंचाई होती है, उसे पूरी तरह माफ करने का काम किया है। दूसरी तरफ किसानों के पचास हजार रुपये तक के कर्ज माफ करने की योजना बनाई है। आप कृषि मंत्री हैं, आपसे बहुत उम्मीद है। आप कम से कम प्रदेशों से सीख लें। अगर इस योजना को देश स्तर पर लागू करेंगे, जहां सूखा, ओला वृष्टि से नुकसान हुआ है, अगर वहां इसे पहुंचाएंगे तो किसानों को डायरैक्ट लाभ मिलेगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने किसान बीमा योजना में पांच लाख रुपये की योजना रखी है। आकस्मिक दैवी आपदा में एक लाख रुपये की राशि को बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये किया गया है। अगर आप किसानों के लिए प्रोत्साहन राशि देने का काम करेंगे तो मेरे ख्याल से बहुत अच्छा होगा।

          हमने देखा है कि बजट में बड़े-बड़े वायदे किए जाते हैं जो केवल कागजों पर रहते हैं। आपको इस बात पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है कि किसान को बिजली मिले, कृषि उपकरण मिलें, समय पर डीएपी खाद मिले। उसे इतनी सब्सिडी दीजिए जिससे वह अपनी खेती कर सके, सालभर का अनाज रख सके और वाजिब मूल्य से अपना जीवन स्तर उठा सके।

          मैंने इस सदन में पहले भी मांग की थी कि रेल बजट रखा जाता है, आप फाइनैंस बजट रखते हैं जबकि हमारा देश कृषि प्रधान है। यहां के 70 फीसदी लोग खेती करते हैं। इस देश की आर्थिक अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। आप कृषि का बजट अलग से क्य़ों नहीं प्रस्तुत करते। उपाध्यक्ष जी, आज मैं जोरदार तरीके से मांग करता हूं कि कृषि का बजट अलग से रखा जाए। जिस प्रकार रेल बजट रखा जाता है, उसी प्रकार कृषि का बजट भी अलग से प्रस्तुत हो।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शान्त रहिए।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार : कृषि मंत्री जी, मैं आपसे यही कह रहा हूं कि कुछ राज्यों से सीखें। राज्यों ने पहल की है। जैसे बताया गया कि कर्नाटक में शुरू किया गया है।  उसी प्रकार से अगर इस सदन में देश स्तर पर कृषि का बजट अलग से प्रस्तुत करायेंगे, उनके लिए अलग से व्यवस्था करायेंगे तो राज्य मजबूर होगा और वह अपने यहां भी कृषि बजट अलग से प्रस्तुत करेगा। तभी किसानों को प्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा और किसान खुशहाल होगा। इससे देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी और देश विकास करेगा। जहां आप आर्थिक मंदी के लिए रोते रहते हैं, वहां आप इससे अपने राजकोषीय घाटे की भी भरपाई कर सकेंगे। इसलिए इस व्यवस्था को आपको अलग से करना पड़ेगा।

          मैं अपने प्रदेश उत्तर प्रदेश की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। हमारे यहां बहुत सी ऐसी परियोजनाएं जैसे नहर, नलकूप तथा कृषि से आधारित तमाम परियोजनाएं जो केन्द्र सरकार में लंबित पड़ी हैं, उनके लिए आप बजट नहीं देते हैं। कभी-कभी सदन में बहुत हो-हल्ला हो गया, तो आपने कुछ राज्यों को, खासकर आपके यहां जो केन्द्र शासित प्रदेश हैं, उनको आप बजट दे देते हैं। लेकिन अगर किसी दूसरी पार्टी की कहीं सरकार है, तो उसे आप न तो बजट देते हैं और न ही कोई स्पेशल पैकेज देते हैं। यह अनदेखी अब बर्दाश्त के बाहर है। आपको एक नजरिये से देखना चाहिए, क्योंकि किसान तो किसान होता है।

          कृषि मंत्री जी, अगर देश का किसान खुशहाल नहीं होगा, तो पूरा देश कभी भी खुशहाल नहीं हो सकता, इसलिए आप पक्षपात मत कीजिए। अगर आप एक नजरिये से, एक चश्मे से देखेंगे तो मेरे ख्याल से तभी इसकी भरपाई हो जायेगी। अभी पूरे देश में गेहूं का रिकार्ड तोड़ उत्पादन हुआ। उत्तर प्रदेश ने नम्बर एक पर इसका उत्पादन किया है। लेकिन हमारे धान के जो किसान हैं, उनका  धान यह कहकर रिजैक्ट किया गया कि टूटन बहुत ज्यादा है। मैं आज दावे के साथ कहता हूं, चुनौती देता हूं कि आप विभिन्न प्रदेशों के चावलों को देख लीजिए, उन सबमें से उत्तर प्रदेश का चावल नम्बर एक पर है। लेकिन पंजाब से आपने चावल लाकर उत्तर प्रदेश के एफसीआई गोदाम को भरा है। यह उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ एक बड़ी भारी साजिश है। इसे आपको गंभीरता से देखना पड़ेगा। आप जो प्रदेशों की उपेक्षा करते हैं, उस पर आपको एक नजरिये, एक चश्मे से देखना पड़ेगा। अगर आप चश्मा बदल-बदल कर देखेंगे तो यह ठीक नहीं होगा।

            ब्लाकों में किसानों को धान के हाई ब्रिड बीज दिये जाते हैं। आप गेहूं के भी हाई ब्रिड बीज उपलब्ध कराते हैं। वही किसान जब उत्पादन करता है और कांटों पर ले जाता है, तो आप मना कर देते हैं। आपकी यह कैसी व्यवस्था है? इस व्यवस्था को आपको गंभीरता से देखना पड़ेगा। कृषि मंत्री जी, आपको मालूम है कि हम कई बार उत्तर प्रदेश के किसानों की समस्याओं को लेकर आपसे मिले हैं। हमारा डेलीगेशन प्राइम मिनिस्टर से भी मिला, आपसे भी मिला। आपके खाद्य प्रसंस्करण मंत्री से भी मिले। उन्होंने आश्वासन भी दिया, लेकिन उसके बावजूद भी उत्तर प्रदेश के किसानों की खरीद नहीं हो पाई, जिसका दंश आज भी किसान झेल रहा है। मैं आपसे चाहूंगा कि आप यह भेदभाव राज्यों के साथ कम से कम न करें। खासकर आपसे यह अपेक्षा नहीं हैं, क्योंकि आप कांग्रेस में तो है, लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के हैं। आप कांग्रेस के नहीं हैं। आपसे अपेक्षा और उम्मीद बहुत ज्यादा है।

          दूसरा, हमारी सरकार ने उत्तर प्रदेश में यह भी काम किया है कि जो किसान कर्ज लेते हैं, जिन किसानों की बंधक जमीनें हैं, वे बिक नहीं पायेंगी। यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश सरकार ने की है। आज किसान का ध्यान खेती की तरफ नहीं जा रहा है।  वह जमीन बेचकर भाग रहा है। वह महानगरों में कमाने के लिए जा रहा है, क्योंकि उसे अपने उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उसे प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। पूरे देश के किसानों को आपको एक नजरिये से देखना पड़ेगा।

          तीसरा, उत्तर प्रदेश ने गेहूं, गन्ना या धान उत्पादन करने वाले किसानों को बढ़-चढ़कर मूल्य देने की बात कही गयी है। मैं चाहूंगा कि इस व्यवस्था को गंभीरता से लें और हर किसान और हर प्रदेश को एक नजरिये से देखें।

          मैं अभी एक रिपोर्ट देख रहा था। आज महंगाई बहुत चरम सीमा पर है। मैं प्याज के बारे में कहना चाहूंगा। प्याज एक ऐसा सलाद है, जिसे गरीब भी खाता है। अगर गरीब के पास खाने के लिए कुछ नहीं होता, तो वह रोटी प्याज और नमक से खाता है। लेकिन आज प्याज के मूल्य 30 से 40 रुपये केजी तक बढ़ गये हैं। प्याज के उत्पादन का रकबा घटने लगा है।

          आज पूरे देश में 20 फीसदी उसमें गिरावट आयी है। जहाँ तक सर्वे रिपोर्ट की बात है, दक्षिणी एवं पश्चिमी राज्यों में सूखा पड़ने के कारण प्याज की खेती पर बहुत बुरा असर पड़ा है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक राज्य हैं, जो सूखे की चपेट में हैं। वहाँ 20 फीसदी गिरावट की सूचना मिली है। मैं आपसे कहना चाहूँगा कि इसे भी सर्वे कराकर कम-से-कम वहां के किसानों की मूलभूत खेती की फसल प्याज पर ध्यान दिया जाए। हमारे उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके जैसे फरुखाबाद में तथा उसके अगल-बगल के इलाकों में आलू का उत्पादन ज्यादा होता है। तो ऐसे पैकेट को आप देखें, चूज़ करें। वहां पर किसानों को विशेष खेती के लिए विशेष प्रोत्साहन और आर्थिक व्यवस्था करने की बात करें। इधर ठंड भी पड़ी। कोहरे और पाला  की चपेट में, ओलावृष्टि की चपेट में बहुत सारे इलाके प्रभावित हुए हैं। जिन राज्यों के नाम मैंने पहले लिये हैं, उन राज्यों में भी उसका  ज़बरदस्त असर हुआ है। आपको तत्काल वहां पर केन्द्रीय टीम भेजनी चाहिए और सर्वे कराकर उन किसानों को आर्थिक मदद दें।

उपाध्यक्ष महोदय :  माननीय सदस्य थोड़ा संक्षेप करें। बहुत लोग बोलने वाले हैं, उनकी भी चिन्ता करनी चाहिए।

श्री शैलेन्द्र कुमार :  यदि दिसम्बर माह तक की रिपोर्ट देखी जाए, तो कृषि उत्पाद का 50 फीसदी निर्यात घटा है। आज जो किसान उत्पादन करता है, उसे तो नहीं लिया जाता है, लेकिन बाहर से अनाज और तमाम आवश्यक वस्तुओं को लाने का काम करते हैं। उससे हमारे देश की पूंजी विदेशों में जाती है और देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर हो जाती है। यह व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी। चूंकि कृषि मंत्री जी बहुत अनुभवी हैं, उनके पीछे हमारे तारिक अनवर भाई बैठे हैं, जिन्हें बहुत दिनों बाद मौका मिला है। हमारे साथ बैठकों में भी रहते हैं। ये कृषि मंत्री जी के समक्ष ही रहते हैं। मैं चाहता हूं कि आप इसे प्रोत्साहन दें। 193 के अंतर्गत यह जो समस्या उठी है। सत्र में किसानों की स्थिति पर, महंगाई पर, सूखे और बाढ़ की स्थिति पर हमलोग चर्चा करते हैं, लेकिन कोई ठोस योजना सरकार की तरफ से नहीं बनायी जाती है। इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

     

श्री अरुण यादव (खंडवा): धन्यवाद उपाध्यक्ष जी, आपने मुझे एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया है।

          महोदय, पूरे देश में ओला और पाले को लेकर हजारों किसानों की फसलें नष्ट हो गयी हैं और यह कहानी हर वर्ष होती है। हर वर्ष ओलावृष्टि होती है, हर वर्ष पाला गिरता है और लाखों किसानों की फसलें ओलावृष्टि और पाले से नष्ट हो जाती हैं। हर साल सर्वे होता है, टीमें जाती हैं, लेकिन  नतीजा सिफर है। पूरे देश में आज किसानों की माली स्थिति वैसे ही खराब है, पाले और ओलावृष्टि से उनकी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो चुकी है। केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा समय-समय पर बहुत सारे निर्णय लिए जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उनका लाभ किसान को नहीं मिल पा रहा है।

          उपाध्यक्ष जी, अभी शैलेंद्र जी ने बहुत सी बातें यहां कही हैं, मैं उनको दोहराना नहीं चाहता हूं। मैं आपका ध्यान मध्य प्रदेश की ओर ले जाना चाहता हूं जहां से मैं आता हूं और हमारी नेता, प्रतिपक्ष जो मेरे लोक सभा क्षेत्र के बगल के लोक सभा क्षेत्र से सदस्य हैं, उनका भी ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।  

15.00 hrs.           महोदय, पिछले 15 दिनों में मध्य प्रदेश में भारी ओलावृष्टि हुई और कई जिलों में भारी पाला भी गिरा। मेरे लोक सभा क्षेत्र खंडवा और नेता, प्रतिपक्ष के लोक सभा क्षेत्र विदिशा में सबसे अधिक नुकसान किसानों को हुआ है। अगर पूरे मध्य प्रदेश के आंकड़े देखें, पन्ना, रीवां, सतना, रायसेत, उमरिया, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, जबलपुर, देवास, खरगोन, राजगढ़ आदि लगभग 15-16 ऐसे जिले हैं, जहां पर ओलावृष्टि हुई और पाला गिरा है। मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूं कि जितना भी नुकसान किसानों का हुआ है, मैं खुद दौरे पर गया था। कलेक्टर, एसडीएम आदि सभी अधिकारियों से मैंने चर्चा की थी, सर्वे का काम  बहुत धीमी गति से हो रहा है। जिस गति से सर्वे होना चाहिए था, उसमें मुझे बहुत सारी कमियां दिखी। साथ ही साथ, उसमें कहीं-कहीं भेदभाव भी मुझे नजर आया। मैं आपसे निवेदन करूंगा कि आप प्रदेश सरकार को निर्देशित करें...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अन्य किसी की बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।

(Interruptions) … * श्री अरुण यादव : महोदय, मैं आपके माध्यम से प्रदेश सरकार से कहना चाहूंगा कि लगभग पूरे मध्य प्रदेश में लगभग पांच लाख किसानों का पाला और ओलावृष्टि से नुकसान हुआ है और यह नुकसान बहुत भारी तादाद में हुआ है। मैं कहना चाहता हूं कि प्रदेश सरकार जो सर्वे कर रही है, उसमें वह किसानों के शत-प्रतिशत नुकसान को दिखाए। मैंने देखा है कि जो सर्वे हो रहा है, उसमें कहीं 20 प्रतिशत दिखाया है, कहीं 30 प्रतिशत दिखाया गया है, शायद सुषमा जी की नॉलेज में यह बात होगी। जो सर्वे हो रहा है, वह शत-प्रतिशत होना चाहिए और किसानों को उनकी फसल के नुकसान का पूरा मुआवजा मिलना चाहिए। यह मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि आप राज्य सरकार को इसके लिए निर्देशित करें।

          दूसरा एक महत्वपूर्ण मुद्दा, जो हम लोग हर बार उठाते हैं - फसल बीमा। फसल बीमा साल में दो किसानों का कटता है। मैं माननीय कृषि मंत्री जी से बहुत विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि किसान का हर बार सोसाइटी स्तर पर जब कर्ज लेने जाता है, तो साल में दो बार फसल बीमे का पैसा काटा जाता है। लेकिन जब उसकी फसल खराब होती है, तो वह पैसा उसको सोसाइटी और बैंक नहीं देते हैं। इस मुद्दे पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यह चीज कई वर्षों से चली आ रही है, कोई नई बात नहीं है। हर साल किसान कर्ज लेता है, हर साल बीमे का पैसा कटता है, लेकिन जब उसकी फसल नष्ट होती है, तो उसको पैसा नहीं मिलता है। मैं माननीय कृषि मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि फसल बीमे के बारे में एक विशेष कार्यक्रम बनाकर विचार करें। अभी आम किसान की यह धारणा है कि हमारा फसल बीमा का पैसा क्यों काटा जाता है, फसल बीमे का पैसा कटना बंद हो जाए क्योंकि उसे उससे कुछ मिलता ही नहीं है। इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। चूंकि मैं मध्य प्रदेश से आता हूं, मैं इस पर दो-तीन बातें और कहना चाहता हूं। प्राकृतिक आपदा का पैसा आप पूरे देश के राज्यों को आवंटित करते हैं, लेकिन कुछ राज्यों में वह पैसा उपयोग में नहीं आता है क्योंकि वहां पर प्राकृतिक आपदा नहीं आती है। जिन प्रदेशों में प्राकृतिक आपदा नहीं आती है, उन प्रदेशों का पैसा उन प्रदेशों को देना चाहिए जहां पर प्राकृतिक आपदाएं आई हैं। बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर प्राकृतिक आपदा नहीं आई है, लेकिन केंद्र सरकार वहां पैसा देती है। अगर वह पैसा भी उन राज्यों को दिया जाए जहां पाकृतिक आपदा आई है, तो निश्चित रूप से किसानों को अधिक लाभ मिलेगा।

          मध्य प्रदेश में पिछले साल पाला पड़ा था, मैंने अभी जब अपने क्षेत्र का दौरा किया तो कुछ किसानों से चर्चा के दौरान मुझे पता चला कि उसका पैसा अभी तक उन्हें नहीं मिला है। मैं मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि उन्हें कोई सिस्टम बनाना पड़ेगा, क्योंकि सर्वे हो जाता है, सब कुछ हो जाता है, लेकिन जब भुगतान का समय आता है तो भेदभाव किया जाता है। इसलिए केन्द्रीय स्तर पर कोई मेकेनिज्म होना चाहिए कि जब इस तरह की आपदा आए तो उससे फौरन निपटा जा सके। यह बात कृषि मंत्रालय को ध्यान देने की आवश्यकता है।

          मध्य प्रदेश में जिन-जिन किसानों की फसलें नष्ट हुए हैं, उन किसानों को शत प्रतिशत मुआवजा मिलना चाहिए। प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह उन किसानों को कर्ज माफ करे और पिछले साल का बिजली का बिल भी माफ करे। प्रभावित किसानों को अधिक से अधिक लाभ देने के लिए केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार मिलकर काम करें, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार हो सके।

          उपाध्यक्ष जी, मेरे बाद कई और माननीय सदस्यों ने भी अपनी बात यहां कहनी है इसलिए मैं ज्यादा न कहकर अंतिम बात रखकर अपने भाषण को समाप्त करना चाहूंगा। मेरा यह कहना है कि सरकार किसानों के हित के लिए कई योजनाएं बनाती हैं। मुझे भी सरकार में  काम करने का अवसर मिला है इसलिए मैं जानता हूं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: सिर्फ अरुण जी की ही बात रिकार्ड में जाएगी।

...( व्यवधान)* श्री अरुण यादव : केन्द्र सरकार प्रदेश सरकार को निर्देशित करे कि वह तुंत प्रदेश के प्रभावित किसानों की मदद करे। आपने कहा कि प्रदेश सरकार से कोई भी मांग अभी तक ओलावृष्टि और पाले को लेकर नहीं आई है, तो आप प्रदेश सरकार को कहें कि वह पूरा सर्वे कराकर आपके पास फौरन रिपोर्ट भेजे कि इतने किसानों की इतनी फसल ओलावृष्टि और पाले से खराब हो गई है। उसके बाद आप उनके लिए विशेष पैकेज यहां से दें, जिससे उन्हें राहत मिल सके।

          इतना ही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा): उपाध्यक्ष जी, वैसे तो हमारी पार्टी की ओर से गोपीनाथ मुंडे जी बोलेंगे, लेकिन मैं एक बात बताना चाहती हूं। अभी अरुण भाई ने अपनी बात यहां रखी। मेरे क्षेत्र और उनके क्षेत्र के किसान ओलावृष्टि से प्रभावित हुए हैं। इसलिए हम लोग इकट्ठे वित्त मंत्री जी और कृषि मंत्री जी से बात करने चलें। जहां तक मुआवजे की बात है, मैं केवल एक बात बता दूं कि आपने अभी सर्वे की बात कही। मैं इसी शनिवार को अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा करके आई हूं। दो जगह पर मुख्य मंत्री जी मेरे साथ थे। हमने यह तय किया, जो आपने कहा कि 33 या 35 प्रतिशत सर्वे  हो रहा है। अगर 25 प्रतिशत भी नुकसान है तो 50 प्रतिशत का मुआवजा मिलेगा, अगर 50 से ऊपर चाहे 51 प्रतिशत नुकसान हुआ है तो शत-प्रतिशत का मुआवजा मिलेगा। यह मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की है।

श्री अरुण यादव : 100 प्रतिशत करेंगे तब जाकर बात बनेगी।

श्रीमती सुषमा स्वराज : मैंने यही कहा कि अगर 50 या 51 प्रतिशत भी नुकसान होता है तो 100 प्रतिशत नुकसान माना जाएगा। यह मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की है।

श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड): उपाध्यक्ष जी, श्री शैलेन्द्र कुमार ने देश के विभिन्न प्रदेशों में सूखे और ओलावृष्टि के विषय पर जो चर्चा शुरू की है, उस पर मुझे बोलने का आपने जो अवसर दिया है, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। लगभग आधा हिन्दुस्तान सूखे से पीड़ित है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में ओलावृष्टि के कारण किसानों और गांवों में रहने वाले गरीबों को भारी नुकसान हुआ है। इसी तरह महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात सूखे की चपेट में हैं। दो प्रदेश ओलावृष्टि से और चार राज्य सूखे से यानि छः प्रदेशों के किसान गम्भीर परिस्थिति से जूझ रहे हैं।

                     माननीय कृषि मंत्री जी महाराष्ट्र से आते हैं और सबसे ज्यादा सूखा उनके चुनाव क्षेत्र में है। इसलिए इस समस्या को वे अच्छी तरह से जानते हैं। पिछले साल भी और इस साल भी महाराष्ट्र में सूखा पड़ा, लेकिन इस साल का जो सूखा है वह वर्ष 1972 और वर्ष 1986 के सूखे से भी ज्यादा भयंकर है। इस प्रकार की सूखे की परिस्थिति पिछले सौ सालों में भी महाराष्ट्र में नहीं हुई। पिछले दो सालों से सूखे के कारण पीने के पानी की सबसे गंभीर समस्या उत्पन्न हो गयी है। आज महाराष्ट्र के 17 जिलों में 11,900 गावों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। महाराष्ट्र के 4,000 गावों को टैंकरों से पानी दिया जा रहा है। कुछ जिलों में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि आने वाले अप्रैल और मई महीने में 100 किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाना पड़ेगा। हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी ने कहा है कि इस साल ट्रेन से लोगों को पीने का पानी देने के लिए हमें कोशिश करनी पड़ेगी, स्थिति इतनी गंभीर है।

 15.12 hrs. (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair)           आजादी के बाद पानी के अभाव में कोई थर्मल पावर स्टेशन बंद हुआ हो, ऐसा मैंने कभी नहीं सुना, लेकिन जिस चुनाव क्षेत्र से मैं आता हूं, जहां का मैं निवासी हूं वहां 1300 मैगावाट का थर्मल पावर स्टेशन पानी के अभाव में दिसम्बर के अंत में बंद हो चुका है। स्वभावतः बिजली सप्लाई और राज्य के विकास पर भी इसका असर पड़ेगा। पानी के अभाव से थर्मल पावर स्टेशन बंद होना अपने आप में दर्शाता है कि स्थिति कितनी गंभीर हो गयी है।

          जैसे मैंने कहा कि कर्नाटक में 16 जिलों, महाराष्ट्र में 17 जिलों, आंध्र के 15 जिलों तथा गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में अकाल है। लगभग 40,000 से भी ज्यादा गांव इन पांच प्रदेशों में सूखाग्रस्त घोषित किये गये हैं। परिस्थिति कितनी कठिन है, इससे ही आप अंदाजा लगा सकते हैं। मध्य प्रदेश में ओलावृष्टि के कारण 12 जिले प्रभावित हुए और हमारी नेता माननीय सुषमा स्वराज जी के चुनाव क्षेत्र में भी बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। जैसा उन्होंने कहा कि शनिवार को उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र का दौरा भी किया है।

          मेरा कहना है कि आज परिस्थिति बहुत गंभीर है, पीने का पानी नहीं है, लोगों के पास रोजगार नहीं और जानवरों के चारे के लिए लोगों के पास पैसा नहीं है। पानी, चारा और रोजगार ये तीन समस्याएं आज किसानों के सामने हैं और इन सवालों को जिस गंभीरता से केन्द्र को लेना चाहिए, उसने उस गंभीरता से इन समस्याओं को लिया नहीं है। केन्द्र से राज्यों को जो राहत मिलनी चाहिए वह राहत बहुत कम मिलती है, जिसके कारण इन परिस्थितियों का सामना करना मुश्किल हो जाता है। महाराष्ट्र के चीफ सैक्रेट्री ने कहा है कि अगर जून तक इस अकाल का मुकाबला करना है तो लगभग 6000 करोड़ रुपये लोगों को रोजगार, पीने का पानी और जानवरों को चारा देने के लिए लगेंगे।

          महोदय, आज तक केंद्र सरकार ने केवल 670 करोड़ रुपए की राशि महाराष्ट्र सरकार को मदद दी है। मैं पूछना चाहता हूं कि क्यों केंद्र सरकार ज्यादा मदद नहीं कर पा रही है? मुझे लगता है कि मेरे कहने से कृषि मंत्री जी भी सहमत होंगे कि सूखे और ओलावृष्टि के समय केंद्र सरकार द्वारा मदद करने के जो नार्म्स हैं, वे बदलने चाहिए। इस बारे में मुख्यमंत्री जी ने भी आपको खत लिखा है। इन नार्म्स के मुताबिक जानवरों के लिए केवल 15 दिन का चारा दिया जाना है और प्रति जानवर चारा देने के जो नार्म्स हैं वह बड़े जानवर के लिए 32 रुपए और छोटे जानवर के लिए 16 रुपए हैं। लेकिन स्वयं महाराष्ट्र सरकार 80 रुपए और 40 रुपए का खर्चा करती है। ये बाबा आदम के ज़माने के नार्म्स बदलने चाहिए। पुराने नार्म्स के मुताबिक साल में केवल पन्द्रह दिन टैंकर दिए जाएंगे। मैं जानता हूं कि महाराष्ट्र में 1600 ऐसे गांव हैं, जिनकी लिस्ट मैं मंत्री जी को दे सकता हूं, जिन्हें जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर से ले कर आज तक टैंकर से पानी दिया जा रहा है। जिन गांवों को साल के दस से ग्यारह महीने टैंकर से पानी दिया जाता है, उनके लिए आप केवल पन्द्रह दिन का अनुदान दोगे, तो राज्य सरकार कैसे उनकी मदद कर सकती है। यह प्राकृतिक आपदा है। इस प्राकृतिक आपदा को मीट-आउट करने की स्थिति राज्य सरकारों की नहीं है। जबकि प्राकृतिक आपदा की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होनी चाहिए और राज्य सरकार को मदद देनी चाहिए, चाहे राज्य सरकार किसी भी पार्टी की क्यों न हो। प्राकृतिक आपदा के लिए जो नार्म्स बनाए गए हैं, वे बदलने चाहिए।

          महोदय, आज सूखा ग्रस्त गांव डिक्लेयर करने के नार्म्स भी बदलने चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि तीन-चार महीने बरसात नहीं होती और एक दिन में ही इतनी बरसात हो जाती है जो कि तीन-चार महीने में होनी चाहिए। हमारे नांदेड के एमपी साहब सदन में हैं, वे इस बात को जानते हैं। दूसरा कारण पेशेवारी। इन दो कारणों के आधार पर सूखाग्रस्त गांव घोषित होता है। ये बाबा आदम के ज़माने के नार्म्स हैं। पेशेवारी की पद्धति अंग्रेजों के ज़माने की है, हमें इसे बदलना चाहिए।

          आज जो स्थिति बनी हुई है, उसे देखते हुए मैं अपील करूंगा कि इस बारे में भी नार्म्स बदलने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को सितम्बर में कहा था कि हमारे राज्य में बहुत अकाल है, इसलिए एक सैंट्रल टीम भेज कर स्थिति का जायजा लिया जाए। सैंट्रल टीम आई लेकिन मदद नहीं मिली। आपने खरीफ की फसल के लिए सैंट्रल टीम भेजी थी, लेकिन रबी की फसल के लिए अभी तक सैंट्रल टीम महाराष्ट्र में नहीं आई है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि मदद की बात तो बाद में आएगी, लेकिन इसी वीक में सैंट्रल टीम भेजकर आप स्थिति का जायजा लीजिए कि महाराष्ट्र किस परिस्थिति से जूझ रहा है। पानी, चारा और रोजगार की समस्या बहुत कठिन है। अगर मार्च में सैंट्रल टीम भेजेंगे तो मदद कब भेजेंगे? मुझे लगता है कि इसमें देरी हो रही है और इस कारण वहां के किसानों को और भी तकलीफ झेलनी पड़ेगी।

          महोदय, हमारे राज्य में एक समभ्रम बना हुआ है, जिसके बारे में मैं संसद में कहना चाहता हूं। महाराष्ट्र के लोगों को सच्चाई समझनी चाहिए। मुख्यमंत्री कहते हैं कि हमने केंद्र को आवेदन पत्र दिया है, लेकिन केंद्र से मदद नहीं आई है। केंद्रीय कृषि मंत्री जी ने बयान दिया है कि महाराष्ट्र से मेमोरेंडम ही नहीं आया है। वास्तव में सच्चाई क्या है? इस अवस्था में लोगों की क्या गल्ती है? इसकी मुझे जानकारी नहीं है कि उन्होंने आपको आवेदन-पत्र दिया है कि नहीं दिया है। वास्तविक स्थिति का पता सदन को लगना चाहिए और यह पता चलने से महाराष्ट्र की गंभीर समस्या भी दूर होगी। हमें यह बताया जाए कि महाराष्ट्र सरकार ने क्या केन्द्र सरकार से कुछ मांग की है और उसमें से कितनी मदद उनको मिली है या अगर नहीं मिली है तो यह संवैधानिक जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती है और वे उसको नहीं निभा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार को मैंने दो पत्र लिखकर इस बारे में पूछा तो मुख्य मंत्री ने दो पत्र जो केन्द्र सरकार को भेजे, उसकी कॉपी उपलब्ध है और पहला पत्र नवम्बर में उन्होंने लिखा है और उसमें 2000 करोड़ रुपये की मदद मांगी है। अभी जो पत्र लिखा है, उसमें 3232 करोड़ रुपये की मांग की है। मैं जानना चाहता हूं कि केन्द्र सरकार इस बारे में क्या करने जा रही है? वास्तविक स्थिति क्या है, ये सारी बातें हम इस चर्चा में जानना चाहेंगे।

          पानी के बारे में वहां की परिस्थिति इतनी गंभीर है कि महाराष्ट्र में जो बड़े डैम हैं, उनमें मुम्बई कोंकण को छोड़कर एवरेज स्टोरेज वॉटर केवल 16 प्रतिशत है। जो बड़े डैम हैं और विशेषकर मराठवाड़ा के डैम में ज़ीरो वॉटर है। मैं कृषि मंत्री जी को अवगत कराऊंगा कि जायकवाड़ी नंबर 1 जो औरंगाबाद में है, बैठन में है, उसमें तीन प्रतिशत पानी है। जायकवाड़ी द्वितीय माजल गांव में ज़ीरो वॉटर लैवल है। मांजरा डैम, निम्नत्रेरणा डैम, शीमाकौले डैम, शिन्दपना डैम, निम्नदुग्धा डैम और ऊजनी जो उनके चुनावक्षेत्र के पास डैम है, उसमें भी ज़ीरो वॉटर लैवल है। महाराष्ट्र के दस डैम में अगर ज़ीरो वॉटर लैवल है तो टैंकर से भी पानी कहां से लाया जाएगा? यह सच्चाई है कि शायद ट्रेन से भी पानी देना पड़ेगा। आज महाराष्ट्र में 15 रुपये में ठंडा पानी बेचा जा रहा है। अगर अभी यह स्थिति है तो अप्रैल-मई में स्थिति क्या होगी? पीने के पानी के बारे में केन्द्र सरकार को राहत देनी चाहिए नहीं तो पीने के पानी की समस्या और गंभीर हो जाएगी।

           मैं सारी नदियों की चर्चा यहां नहीं करना चाहता। गोदावरी में पांच डैम हैं जिसमें नासिक जिला है, उसके बाद नगर जिला है, उसके बाद मराठवाड़ा आता है। इसके बारे में भी नीति बनायी जानी चाहिए कि रेनफॉल होने के कारण किसी नदी में कितना पानी रहना चाहिए। कुछ डैम सौ प्रतिशत भरे जाएंगे और कुछ डैम में पानी नहीं होगा। यह भेदभाव होगा। मैं कृषि मंत्री जी का अभिनंदन करता हूं कि उनके कहने से नासिक और नगर जिले के लोगों ने 9 टीएमसी पानी छोड़ा। इसलिए आज मराठवाड़ा को कुछ न कुछ पानी मिला है। अगर आप यह प्रयास नहीं करते तो इतना पानी भी मराठवाड़ा को नहीं मिलना था। मुझे लगता है कि पानी के बारे में किसी भी प्रदेश को किसी भी गांव या जिले के बारे में राजनीति नहीं करनी चाहिए। यह मेरी मांग है और यदि भेदभाव हो तो उसके बारे में निश्चित रूप से अपील करनी चाहिए। अब मैं आपसे अपील करना चाहता हूं कि जो महाराष्ट्र के तीन सूखे जिले हैं और उसमें जालना इत्यादि भी हैं, उनमें भेदभाव कैसे हो रहा है? केन्द्र की राहत महाराष्ट्र को नही मिल रही है और महाराष्ट्र की राहत हमको नहीं मिल रही है। जालना, बीड औऱ उस्मानाबाद इन तीन जिलों में ज्यादा अकाल है। अकाल सभी जिलों में है लेकिन 17 जिलों में ज्यादा अकाल है। सारे महाराष्ट्र में अकाल घोषित हुआ लेकिन परली तहसील में अकाल घोषित नहीं हुआ। पानी के अभाव के कारण थर्मल स्टेशन बंद है। वह अकालग्रस्त घोषित क्यों नहीं हुआ? परली तहसील को अकालग्रस्त घोषित नहीं किया गया है जिसके कारण देश-दुनिया जान रही है कि वहां पानी की कमी है।...( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :क्योंकि वह आपकी तहसील है।...( व्यवधान)

श्री गोपीनाथ मुंडे : इसीलिए ऐसा है क्योंकि वहां से मैं 6 बार चुनकर आया हूं। इसको नहीं किया गया और मैं आप पर आरोप नहीं लगा रहा हूं लेकिन आपका कारोबार चलाने वालों को आप समझाओ।

          आपने हमसे ऐसी कभी राजनीति नहीं की है जिस प्रकार से यह हो रहा है। मैं केवल आपके ध्यान में लाना चाहता हूं कि अन्याय सहन करना हमने सीख तो लिया है लेकिन हम आपसे न्याय की अपेक्षा करते हैं।

          महोदय, मैं पीने के पानी के बारे में कहना चाहता हूं कि बहुत जगह पानी नहीं है तो आगे क्या होगा। मराठवाड़ा, विदर्भ, खांडेश में सरकार ने अभी तक साढ़े चार सौ करोड़ रुपए चारे के लिए खर्च किए। इसमें से 440 करोड़ रुपए केवल वैलफेयर के लिए महाराष्ट्र में खर्च हुए जबकि खांडेश, मराठवाड़ा और विदर्भ में केवल दस करोड़ रुपए खर्च हुए जबकि ये भी इतने ही अकालग्रस्त हैं। अब यह जवाब मिलेगा कि वहां कोई संस्था आगे नहीं आ रही हैं। जब वहां संस्था आगे आने स्थिति में नहीं है तो क्या केंद्र और राज्य की जिम्मेदारी नहीं है? यह सच्चाई है। मैं पूछना चाहता हूं कि यह कौन सा न्याय है कि एक विभाग में 440 करोड़ रुपए में खर्च हों और तीन रीजन में जहां लगभग 12 जिले आते हैं, वहां दस करोड़ रुपए खर्च हों? यह कौन सा डिवीजन है? यह तो बहुत बड़ा भेदभाव है। अब तक जो हो गया सो हो गया लेकिन अब मैं यह जानना चाहता हूं कि आने वाले दिनों में इन भागों पर अन्याय नहीं होगा, क्या यह गारंटी सरकार देगी? मैं एक जिले का नाम भूल गया था तो कृषि मंत्री जी ने मुझे उसका नाम याद दिलाया। अब मैं महाराष्ट्र सरकार के अन्याय की एक बात और बताता हूं। जालना, उस्मानाबाद जिले में पीने के पानी के लिए 50-50 करोड़ रुपए दिए हैं जबकि बीड को एक रुपया भी नहीं दिया है। क्यों? मुझे खुशी है कि इनको 50 करोड़ रुपए दिए गए। मैं पूछना चाहता हूं कि बीड भी तो उतना ही इक्वल अकालग्रस्त जिला है तो उसे राहत नहीं दी गई? इस तरह से जो अन्याय हो रहा है मैं आपके ध्यान में लाना चाहता हूं।

          महोदय, अकाल के बाद अकाल आ रहा है। महाराष्ट्र में विशेषकर मराठवाड़ा, ईस्टर्न महाराष्ट्र में सांगली, सतारा, पुणे में अकाल की परिस्थिति है। क्या सरकार अकाल के लिए लांग टर्म या शार्ट टर्म प्लान बनाएगी? क्या इस समय की प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कोई योजना बनाएगी? फॉरएवर अकाल न हो, क्या इसके लिए सरकार योजना बनाएगी? माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी जब देश के प्रधानमंत्री थे, उन्होंने सहयोगी सुरेश प्रभु को इंटर लिंकिंग आफ द मेजर इंडियन रिवर टास्क फोर्स का अध्यक्ष बनाया था। अगर इस योजना को कार्यान्वित करते तो सूखे की समस्या से निपटा जा सकता था। उन्होंने जो रिपोर्ट दी उसमें 560000 करोड़ रुपए खर्च करके देश की सारी नदियों को इंटरलिंकिंग से जोड़ा जा सकता था। लेकिन आज हम क्या चित्र देख रहे हैं, असम में बाढ़ आई, बिहार में बाढ़ आई, उड़ीसा में बाढ़ आई और हजारों गांव डूब गए जबकि दूसरी तरफ पानी पीने के लिए नहीं है। आज यह देश का चित्र है कि एक जगह इतनी बारिश आ रही है कि गांव डूब रहे हैं और दूसरी तरफ पानी पीने के लिए नहीं है। अगर इस योजना को कार्यान्वित किया जाए तो निश्चित रूप से 24000 मेगावाट बिजली बनेगी, 25 मिलियन हेक्टेयर लैंड का इरीगेशन होगा, 10 मिलियन हेक्टेयर लैंड में ग्राउंड वाटर होगा। सरकारें आएंगी और जाएंगी। अटल जी जनता के लिए इतनी अच्छी योजना लाए थे, मैं पूछना चाहता हूं कि आपने क्यों उस योजना को कार्यान्वित नहीं किया?  सरकार ने कोर्ट के आदेश पर अमल करने के बजाय...( व्यवधान)

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): इसमें जजमैन्ट हो गया है।

श्री गोपीनाथ मुंडे : वही मैं कह रहा हूं। इस पर जजमैन्ट हो गया है और जजमैन्ट में कहा गया है कि इस योजना को लागू करना चाहिए, उसके बावजूद भी देश की सरकार रिविजन और पिटीशन में ही लगी है। इतनी अच्छी योजना पर अमल करना चाहिए...( व्यवधान) जैसे भागीरथ के प्रयत्न से गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी, वैसे ही अटल जी ने भागीरथ प्रयत्न करके यह योजना बनाई थी, फिर भी आप इस योजना को लागू क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर सही मायने में आपको अकाल के सवाल को हल करना है तो इस योजना को लागू करना चाहिए, यह मेरी मांग है। यह किसी पार्टी की बात नहीं है, इससे देश का किसान सुखी होगा, उसकी आमदनी दोगुनी होगी। यह रिसर्च की रिपोर्ट आई है कि इससे किसान की आमदनी दोगुनी होगी और हमारा कृषि उत्पादन 13 परसैन्ट बढ़ेगा और बढ़कर टोटल दोगुना हो जायेगा। इसके बारे में सरकार की क्या सोच है, मैं समझता हूं कि इससे स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण होगा और अकालग्रस्त स्टेट को पानी भी मिलेगा। इसके अलावा किसानों के बारे में कई अच्छी रिपोर्ट्स आई हैं। रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट आई है, स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट आई है। आप उन दोनों रिपोर्ट्स को लागू क्यों नहीं कर रहे हैं। आपके पास उनकी सिफारिशें लागू करने का समय नहीं है। अगर आप कमेटी नियुक्त करते हैं और उसका अध्ययन करते हैं तथा उसके अध्ययन के बाद उनके जो निष्कर्ष निकलते हैं, आप उन पर अमल क्यों नहीं करते हो। स्वामीनाथन कमेटी ने किसानों के बारे में अच्छी रिपोर्ट दी है। वैसे ही रंगराजन समिति ने भी गन्ना उत्पादक किसानों के बारे में शुगर फैक्टरी पालिसी के बारे में एक अच्छी रिपोर्ट दी हैं। उन्होंने कहा है कि शुगर का फ्री ट्रेड करना चाहिए। आप ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं। लेवी को खत्म करना चाहिए। हालांकि यह अकाल से संबंधित विषय नहीं है, लेकिन यह किसानों से संबंधित विषय है और आप ये सब चीजें क्यों नहीं कर रहे हैं।

          इसके अलावा मैं कहना चाहता हूं कि हमारे प्रदेश से जो शक्कर एक्सपोर्ट हुई थी, उसके पैसे दो साल से नहीं दिये जा रहे हैं, जिसके कारण शुगर फैक्ट्रीज बीमार हो गईं, वहां किसानों को उनके पैसे नहीं मिल रहे हैं। आज रोजगार का प्रश्न है, पीने के पानी का प्रश्न है। हमारा कहना है कि केन्द्र सरकार इस बारे में एक अच्छी योजना लायें। वहां लोग रोजगार के लिए स्थलांतर कर रहे हैं। लोग अपना प्रदेश और गांव छोड़कर जा रहे हैं। मराठवाड़ा से लगभग दस लाख लोग आजू-बाजू के प्रदेशों में पलायन कर गये हैं। क्योंकि उनके गांवों में रोजगार नहीं मिल रहा है। हमारी रोजागर हमी योजना अच्छी थी। अभी महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना का काम महाराष्ट्र में नहीं हो रहा है। मैं और जिले की बात नहीं कर रहा हूं, मेरे अपने जिले में 28 हजार लोग इस योजना में हैं। श्री वसंतराव नाइक 1972 में मुख्य मंत्री थे, आप भी उनके मंत्रिमंडल में रहे होंगे। उस समय उन्होंने जिस तरीके से अकाल और सूखे का सामना किया था, उस समय लगभग पचास हजार लोग...( व्यवधान)

श्री शरद पवार : पचास लाख।

श्री गोपीनाथ मुंडे : पचास लाख लोग काम करते थे। आज कितने लोग काम कर रहे हैं, क्या आप स्टेट से जानकारी लेकर बतायेंगे। यह योजना महाराष्ट्र में फेल हो चुकी है। इससे वहां रोजगार नहीं मिल रहा है। आपका नरेगा नहीं चलेगा तो हम रोजगार नहीं देंगे, यह किया नहीं जा सकता। नरेगा में किसान मरेगा। मैं मरेगा इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि आज ही श्री जाधव ने एक सवाल पूछा था, उसके जवाब में बताया गया कि देश में कितनी आत्महत्याएं हुई हैं, उसमें बताया गया कि कुल 14 हजार आत्महत्याएं हुई हैं और इन 14 हजार आत्महत्याओं में से मेरे क्षेत्र में 3600 आत्महत्याएं हुई हैं, यानी एक-तिहाई आत्महत्याएं हमारे महाराष्ट्र राज्य में हुई हैं। यह किसी भी देश या प्रदेश की सरकार के लिए अच्छी बात नहीं है कि किसान मजबूर होकर आत्महत्या करें, क्योंकि उसके पास रोजगार नहीं है। मैं समझता हूं कि इसे हमें बदलना चाहिए। लोगों को रोजगार देने की कोई भी योजना आज महाराष्ट्र में नहीं है, इसके बारे में हमें चिंता करनी चाहिए।

          तीसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि वहां जानवरों को चारा नहीं है। वहां आधा पशुधन एक साल में खत्म हुआ है। आज हमारे जानवर कत्लखाने में जा रहे हैं, क्योंकि किसान उन्हें बचा नहीं सकता। मेरी कृषि मंत्री जी से मांग है कि कत्लखाने जाने वाले जानवरों को रोकें। उनके लिए यदि कैटल कैम्प्स नहीं लगाये जाएं तो सब्सिडी देनी चाहिए। अगर किसान मजबूर होकर आत्महत्याएं करेंगे, किसान मजबूर होकर अपने जानवर को बाजार में बेचेगा या कत्लखाने में बेचेगा तो इस देश का क्या होगा। आप कृषि मंत्री हैं और इस विषय के तज्ञ हैं। इसलिए हम मांग करते हैं कि राज्यों को बड़ी राहत दीजिए, जिससे राज्य में परिवर्तन आएगा। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध प्रदेश गुजरात इन सभी राज्यों को राहत देने की आवश्यकता है। उस राहत में देरी मत कीजिए। इमिजिएटली टीम भेजिए और राज्य सरकार की जो मांग है, वह राज्य सरकार किसी की भी हो, राज्य सरकार ने पांच हज़ार करोड़ रूपये आपसे मांगे हैं। मैं उसका समर्थन करता हूँ। हमारे राजनीतिक मतभेद हैं। आज जो सूखे का सवाल है, उसको हल करने के लिए विपक्ष आपको और राज्य सरकार को पूरी तरह से मदद करेगा। पूरी तरह से राजनैतिक मदद करेगा। लेकिन एक ही अपेक्षा है। मैं मानता हूँ कि यह संकट सरकार द्वारा लाया गया नहीं है। यह तो एक नैसर्गिक आपदा है। इस नैसर्गिक संकट को दूर करने के लिए सबको मिल कर कंधे से कंधा मिला काम करना चाहिए तभी लोगों को न्याय मिलेगा। यह न्याय देने के लिए मैं तीन मांगे करता हूँ और फिर अपनी बात को खत्म करता हूँ। मेरी पहली मांग है कि सूखाग्रस्त किसानों का कर्जा माफ करो। मेरी दूसरी मांग है कि इस साल महाराष्ट्र में किसानों को इलैक्ट्रिसिटी यूज़ कर के पंप चलाने पर पूरी पाबंदी लगाई जाए। जो वाटर स्टोरेज़ है, उसको कोई यूज़ नहीं करता है। अगर बिजली का उपयोग चार महीने नहीं किया है तो किसान इस साल का बिजली का बिल क्यों देगा? सूखाग्रस्त गांवों के किसानों की बिजली माफ करो। आप टीवी पर देखते होंगे और न्यूज़पेपर में खबरें आ रही हैं कि किसानों के लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी है। उनका पूरा एक साल खराब जाएगा। अब अप्रैल-मई में परीक्षा होगी। उससे पहले मार्च में परीक्षा करो। पीने का पानी नहीं है। इसलिए किसानों के बच्चों की फ़ीस भी माफ़ करो और वे पढ़ेंगे। अगर ये तीन चीज़ें केंद्र और राज्य सरकारों ने मिल कर की तो शायद किसान को राहत मिल सकती है। ऐसे अच्छे कदम उठाने के लिए मैं आपसे फिर से प्रार्थना करता हूँ।

          अंतर्गत नदी जोड़ने का जो कार्यक्रम अटल जी ने चलाया था, शायद उस कार्यक्रम को अब राजनैतिक नज़र से न देखते हुए उसको लागू करें। देश आपको निश्चित रूप से दुआ देगा। इस कार्यक्रम को लागू करना चाहिए। आप केंद्र में हैं और उस जीओम में हैं, जो राहत का कार्य करती है।

MR. CHAIRMAN: Please wind up now.

श्री गोपीनाथ मुंडे : राज्य के इस संकट में आप पूरी तरह से मदद कीजिए, मैं यह अपेक्षा करता हूँ। राज्य और केंद्र में राजनीतिक भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह अपेक्षा करते हुए, मैं अपनी बात को विराम देता हूँ।

 

15.38 hrs. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please, no comments.

          This behavior of the Member is highly condemnable and I hope that there shall not be any reoccurrence of such incidence.

 

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: No discussions, please.

          Nothing will go on record.

(Interruptions) …*   श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): महोदय, कृपया मुझे यहां से बोलने की अनुमति दी जाये। सबसे पहले तो मैं श्री गोपीनाथ मुंडे जी और श्री शैलेन्द्र कुमार जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इन्होंने बड़ा गम्भीर विषय यहां उठाया है। मैं अपने लर्निड फ्रेंड महताब जी का भी धन्यवाद देना चाहता हूं कि इन्होंने भी इस पर काफी प्रकाश डाला।...( व्यवधान) भारत का किसान वैसा होता है, जैसे कार में डायनमो होता है, अगर डायनमो की लाल बत्ती जल जाती है तो ड्राइवर समझ जाता है कि इस कार में गड़बड़ी है। यह डायनमो की बत्ती जल रही है। प्रधानमंत्री जी ने भी कई बार इसको तस्लीम किया है कि किसान की पैदावार 1.2 परसेंट, 2.4 परसेंट पर ही रहती है। अगर 12 हजार किसानों ने आत्महत्या की, पार्लियामेंट में जो फिगर आयी हैं, ढ़ाई लाख किसान पूरे भारत में आत्महत्या कर चुके हैं और कर रहे हैं। किसान की व्यवस्था दोनों तरफ है, मैं उत्तर प्रदेश से आता हूं और खासकर बुन्देलखण्ड मेरी कांस्टीच्युंसी है, जब फरूखाबाद में आलू ज्यादा पैदा होता है तो किसान को कोल्ड स्टोरेज में रखने की जगह नहीं मिलती है और वह उसे फेंक देता है। एक रूपये किलो भी वह नहीं बिकता है और जब आलू की पैदावार कम होती है तो जो कोल्ड स्टोरेज का मालिक है, वह मालामाल हो जाता है। लेकिन अंततः यही रहता है कि किसान की हड्डियां हमेशा दिखाई पड़ती हैं और किसान से जो फायदा लेता है, वह मालामाल हो रहा है। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं। मैंने अभी सर्वे किया, मैं हमीरपुर, महोबा की बात करना चाहता हूं। औसत ट्रैक्टर पांच लाख, छह लाख रूपये का आता है, इतने पैसे का मीड़ियम, छोटा वाला ट्रैक्टर आता है। उसमें बड़े प्रलोभन होते हैं और जमीन को गिरवी रखकर ट्रैक्टर मिल जाता है। 15 परसेंट, 16 परसेंट, 18 परसेंट पर कर्ज मिलता है। अगर 16 परसेंट औसत मान लिया जाये, मेरे पास आंकड़े हैं, मैं 50 ट्रैक्टर लेने वाले लोगों से मिला हूं, जिन्होंने लोन लिया और जो लोन नहीं चुका पाये और उनकी जमीन चली गयी। अगर ट्रैक्टर का लोन 16 परसेंट पर है तो एक साल में 80 हजार रूपये उसे ब्याज देना पड़ता है। वह कितनी भी मेहनत करे, लेकिन गेहूं, चावल और खेती से 80 हजार रूपये नहीं पा सकता। अंत में उसका ट्रैक्टर बिक जाता है। उसकी पूरी जमीन चली जाती है। अभी हमीरपुर एक आत्महत्या हुई थी, तब मैं गया था, यह अभी 15 दिन पहले की बात है, उसकी पूरी जमीन कौड़ी के भाव बिक जाती है। इसका नतीजा यह है कि अब कोई भी किसान ट्रैक्टर लेने से घबराता है और अगर वह ट्रैक्टर ले लेता है तो ट्रैक्टर से खेती नहीं करता, ढुलाई करता है। कोई ईंटों की ढुलाई कर रहा है, कोई पत्थर की ढुलाई कर रहा है, लेकिन वह कृषि में ट्रैक्टर नहीं लगाता है। आज मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि हमारे उत्तर प्रदेश में खासकर बुन्देलखण्ड में 80 परसेंट किसान, जिनके पास जमीन है, वे खेती नहीं करते हैं। उन्होंने अपनी जमीन को अधिया में दिया हुआ है, बटाई पर दिया हुआ है क्योंकि उसे फायदा नहीं है। अगर ये इस व्यवस्था को नहीं देख रहे हैं तो यह कैसे होगा? मैंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में 35 साल वकालत की है। एक एक्ट आया है, सिक इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग एक्ट, माननीय पुराने लॉ मिनिस्टर साहब बैठे हुए हैं। सिक इंडस्ट्रियल अंडरटेंकिंग एक्ट में अगर किसी कंपनी का एक हजार करोड़ रूपये का लोन है, अगर वह उसे नहीं दे सकता तो वह अपना मुकद्मा सिक इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग में दे देता है और वहां का जो बोर्ड होता है, वह इन्कम टैक्स की माफी कर देता है, बिजली की वसूली माफी कर देता है, यहां तक कि मजदूरों की वेजेज को 60-70 परसेंट करके उस इंडस्ट्री को खड़ा कर देता है। तो फिर ऐसी दिक्कत इनके साथ क्यों है? अगर एक किसान 5 लाख के ट्रैक्टर का लोन नहीं दे पा रहा है, वहां का पूरा क्षेत्र और वहां के आदमी गवाह हैं, तो क्यों नहीं सिक इंडस्ट्रियल एक्ट की तरह एक प्रोटेक्शन एक्ट आये कि अगर वह लोन न चुका सके तो उसकी कर्ज माफी हो जायेगी। आप उसका कर्ज माफ कर दीजिए। इसमें दिक्कत क्या है? Even today I appear as a lawyer before the BIFR and the Appellate Authority under the Sick Industrial Undertaking Act. 80-80 परसेंट सब माफ कर देते हैं तो इंडस्ट्री खड़ी हो जाती है। अभी कानपुर में एलगिन मिल कंपनी वन, बीआईसी, जिसे लाल इमली कहते हैं, कानपुर टैक्सटाइल आदि पर करोड़ों का कर्जा है। वे कंपनी खड़ी हो रही हैं क्योंकि सिक इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग्ज़ में उसके जितने भी डय़ूज़ थे, सब वाइप आउट हो गए। यहाँ तक कि वेजेज़ को भी वाइप आउट करने की उनको पावर है। अगर आप वहाँ यह कर सकते हैं तो किसानों के लिए क्यों नहीं कर सकते?

          दूसरी बात मैं बताना चाहता हूँ। चूँकि माननीय सभापति जी गोवा से आते हैं और बहुत हाई-फाई वातावरण में हैं, अभी किसानों का मामला नहीं समझेंगे।  ...( व्यवधान) मैं आपको बताना चाहता हूँ कि दिल्ली में जितनी धनराशि में दो फ्लाई ओवर बनते हैं, इतने में हमीरपुर और महोबा में हर खेत में पानी आ सकता है। समस्या इस बात की है कि 2013 में भारत की 120 करोड़ जनता की 65 परसेंट जनता जहाँ गाँवों में रहती है, वह ज्यादा इंपॉर्टैन्ट है या अर्बन जनता इंपॉर्टैन्ट है? यह खाई क्यों बढ़ रही है कि किसान की हड्डी निकल रही है और यहाँ लोग डाइटिंग कर रहे हैं क्योंकि ओवरवेट हो रहे हैं। यह क्यों हो रहा है? इसका मतलब यह है कि किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। एक किसान बीमा चला है जिसको अंग्रेज़ी में क्रॉप इंश्योरैन्स कहते हैं। मैं उस समय नया-नया मैम्बर पार्लियामैंट बना तो बड़ा दौरा किया, रोज़ सवेरे-शाम 200 किलोमीटर दौड़ता था। 160 किलोमीटर मेरी कांस्टीटय़ूंसी है और छतरपुर तक मैं टच करता हूँ। वहाँ क्या हुआ कि 2009 में इतना सूखा था कि दाल की फसल जिन किसानों ने बोई, 80-90 परसेंट किसानों ने तो वह फसल काटी तक नहीं। जब काटी नहीं तो मैंने कलैक्टर को लिखकर दिया कि इसका आकलन कराया जाए। कलैक्टर के पास रैवैन्यू के दो डिपार्टमैंट होते हैं - एक कलैक्टर वाला होता है, एक पुलिस डिपार्टमैंट होता है। तो इनके सबसे बड़े सिपाही जिसको भारत में पटवारी बोलते हैं, हमारे यहाँ चौधरी चरण सिंह के ज़माने से लेखपाल हो गए। सब लेखपालों ने क्या रिपोर्ट दी कि 25 परसेंट और 30 परसेंट नुकसान हुआ। किसान अपनी फसल ही नहीं काटे और लेखपाल जी कुछ कहते हैं तो मैंने लेखपाल से पूछा कि तुमने इसे क्यों लिखा। उसने कहा कि अगर मैं सही लिख दूँ तो मैं मुअत्तिल हो जाऊँगा। कलैक्टर साहब कहते हैं कि यह कैसे हो गया? जैसे गाड़ी लड़ जाती है तो इंश्योरेन्स न दो वह हो रहा है। मैंने जाकर जिलाधिकारी से मुलाकात की। वे नए आई.ए.एस. अधिकारी थे। लेखपालों को बुलाया और फिर से आकलन हुआ, फिर से जनगणना हुई। तब बड़ी मुश्किल से तमाम डेढ़ साल बाद उस सरकार में जब बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी, तब साढ़े चार करोड़ रुपये महोबा के लिए आया। अब क्राप इंश्योरेन्स में मैं पूछना चाहता हूँ। मैंने बुंदेलखंड में आकलन किया है कि दस साल से वहाँ क्राप इंश्योरैन्स का पैसा ही नहीं बँटता। इस बार क्या हुआ? अभी मैं एक हफ्ते से अपने गाँव में था। पानी बरसा, ओला बरसा, सब फसल चौपट हो गई। There was 40-50 per cent wheat crop damage. लेकिन जो सरकारी मानसिकता है, वह सही डैमेज लिखने के लिए तैयार नहीं है। अगर तैयार नहीं है तो किसान कहाँ जाए? अभी मुंडे जी एक बात का ज़िक्र कर रहे थे। मैं वह बताना चाहता हूँ क्योंकि मैं इसमें थ्रूआउट एसोसियेटेड हूँ और हाउस को मैं सुनाना चाहता हूँ। सुप्रीम कोर्ट में मैंने वह पैटीशन ड्राफ्ट करवाई थी। दिन-रात हमने मेहनत की और जब मैं पोलिटिक्स में नहीं आया था, तब से मैं उस पर काम कर रहा हूँ। वह है लिंकिंग ऑफ द रिवर्स। मेरे पास जजमैंट है। इस पर 65 पन्ने का जजमैंट सुप्रीम कोर्ट की तीन जज की बैंच ने दिया। उसमें लास्ट में The mandamus or command to the Government and to the Irrigation Ministry है कि आप तुंत लिंकिंग ऑफ रिवर्स शुरू कीजिए। I was also associated as an author and as a lawyer. उसमें एक पूरा पैराग्राफ है और हमारे मध्य प्रदेश के सांसदों को मालूम होगा कि पन्ना में डायमंड माइन्स के बाद छतरपुर में एक घाटी है, वहाँ पर केन और बेतवा नदी है। उसमें 7वें पन्ने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केन और बेतवा नदी को यदि जोड़ दिया जाए तो पूरे बुंदेलखंड में बरसात में इतनी प्रचुर मात्रा में पानी हो जाएगा कि 12 महीने नहर चलेगी। फिर mandamus में प्रेयर नंबर 3 में लिखा कि -- “Hereby, we direct the Government of India and the Respondents onwards expeditiously start the process of linking of Kane and Betwa river.” यह आर्डर हो गया। मैं बड़ा खुश हुआ। मैंने तुंत सर्टिफाईड कॉपी ली। इस समय यहां माननीय रेल मंत्री नहीं हैं, वह उस समय वॉटर रिसोर्सिज़ मिनिस्टर थे। आप विश्वास मानिएगा कि मैं उनसे स्वयं मिला था। एक सचिव महोदय जो पता नहीं कौन से भारत से आते थे उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट गवर्नमेंट को प्रेशराइज़ कर रहा है। इसमें ईगो क्लैश आ गया और “This is not fair. We will go for review.”मने सचिव महोदय से कहा कि ऐसे एडवर्स एंट्री दिलवाऊंगा कि आपको परेशानी हो जाएगी। चूंकि वह सचिव थे और “खग ही जाने खग की भाषा” उन्होंने मंत्री जी को भी समझा दिया। मंत्री जी भी समझ गए। भारत सरकार ने लाखों रुपये देकर रिव्यू एप्लायी कर दिया। रिव्यू हमेशा चैम्बर में होती है। हमने भी कैविएट लगायी हुई थी। कैविएट में रिव्यू की खबर नहीं आती है। हमने वकालत छोड़ दी थी और यहां आ गए थे। हमें पता लगा तो हम भी वहां दौड़े। सुप्रीम कोर्ट ने इतना कसकर डांटा कि एडिशनल सॉलीसीटर जनरल की सिटी-पिटी गुम हो गयी। उसको उन्होंने रिजैक्ट कर दिया।...( व्यवधान) He was flabbergasted. He was nonplussed. He had no answer and he had to cut a sorry figure and say, “I am sorry”. The Supreme Court said, “It is our command. The word used is the Latin word ‘mandamus’, and if you do not follow, we will send you to jail.” We said, “No, they should be punished with ‘rigorous imprisonment and why only jail!” Since then, years have rolled on. मंत्री जी बदल गए और अब दूसरे मंत्री जी आ गए हैं।...( व्यवधान) सैक्रेटरी साहब पता नहीं कहां चले गए। हो सकता है कि उनका प्रमोशन हो गया हो। उसमें एक फायदा और हुआ। मैंने सोचा कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष बहुत होशियार हैं, क्योंकि इंग्लिश बहुत बढ़िया फॉरेन एक्सेंट से बोलते हैं। हिन्दुस्तान में जो अंग्रेजी अच्छी बोले, जो अच्छा Sheffield Cutlery को डील करे, उसे inborn intellectual समझा जाता है। अगर आप हिन्दी की कविता कोट करते हैं, जैसे शरद यादव जी कोट करते हैं तो कहते हैं कि यह तो देहाती है, लुंज-पुंज है but if you quote ‘Daffodils’, or Shakespeare, you are considered to be ‘intelligent’. खैर ऐसा है, क्योंकि लॉर्ड मैकाले के कारण ऐसा है और यह मानसिकता है। मैं उनसे मिला, उन्होंने कहा कि “I will see to it.” एक दूसरे सरदार जी को उन्होंने सौंपा, जो कि बहुत मेहनती थे, मैं उनका नाम नहीं लूंगा, उनको दिया गया। उनको अच्छा मौका मिला और उनका एक्सटेंशन हो गया।...( व्यवधान) I am not repeating anything. I am myself an agriculturist. मेरे यह मित्र भी उस समय थे। पहली बार इतिहास को बदला और हमारे मित्र ने हमें सपोर्ट किया। हमने कहा इसके बाद से बुंदेलखण्ड की योजना का पैकेज दिल्ली की डिफ्यूज़ लाइट में जहां 40 लाख रुपये सिर्फ बाथरूम बनाने पर खर्च होता है, वहां नहीं होगी, आप बुंदेलखण्ड चलिए, वहां मीटिंग होगी। झांसी में मीटिंग हुई और सभी लोग वहां गए।...( व्यवधान) आप सुनिए और समझने की कोशिश कीजिए, क्योंकि मैं इसे सिम्पलीफाई करके बोल रहा हूं। लिंकिंग ऑफ रिवर का मामला अभी भी सैक्रेटेरियट में है। हम उनको कन्टैम्प्ट का नोटिस देकर खड़खड़ाएंगे, तब उनको समझ आएगा। हमारा कहना है कि आप जो पॉलिसी बनाते हैं, उसमें आप स्टैक होल्डर्स से बात नहीं करते हैं और उनके जनप्रतिनिधियों को बेकार समझते हैं कि यह पांच साल के लिए हैं, टैम्परैरी हैं, पांच साल बाद भाग जाएंगे। आप ऐसी पॉलिसी क्यों बनाते हैं, बुंदेलखण्ड में योजना आयोग की पॉलिसी आयी। पॉलिसी में यह आया कि तालाब बड़े गड़बड़ हैं, इनका सौंदर्यीकरण किया जाएगा। उसमें यह आर्डर हुआ कि जितने छोटे-मोटे तालाब हैं उनमें पांच फीट ऊंची दीवार बना दी जाए और लोहे की फैंसिंग लगा दी जाए, जैसे कि बड़े-बड़े मंत्रियों के बंगलों में लगाई जाती है। तालाब में एक लीटर पानी नहीं है। It is only an easing ground. अब उन्होंने दीवार बना दी कि प्राईवेसी रहे।

          अब दूसरी योजना आयी पेयजल की। उस तालाब में सौ लीटर क्या दस लीटर भी पानी नहीं है और पवार साहब, उसमें दस लाख रुपया सैंक्शन हो गया। बेंच बना दिया। आप बताएं कि क्या वह कोई मैसूर, वृंदावन गार्डेन है? अब दूसरी योजना आयी। यहां के प्लानिंग कमीशन वाले अगर रूरल हाउसिंग की बात करते हैं तो जर्मनी में देखने जाते हैं कि जर्मनी में रूरल हाउसिंग की क्या व्यवस्था है और उसे यहां लाते हैं।

          मैं हमीरपुर की बात बता रहा हूं। अब इन्होंने किया कि कुएँ खोदे जाएं। अब उत्तर प्रदेश में कुआँ खोदन के लिए पांच-पांच लाख रुपया सैंक्शन हुआ। वाटर लेवल दनादन सौ फीट, डेढ़ सौ फीट नीचे जा रहा है। पांच लाख रुपया में आधा क्या, वहां तो सीलन तक नहीं आया। अब तो इतना ही रुपया सैंक्शन है। 80 परसेंट कुआँ जिसमें पांच-पांच लाख करके करोड़ों रुपया बुंदेलखण्ड में खर्च हुआ, they are not working at all.

          अब आपसे मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं जो सबसे गंभीर समस्या है।

MR. CHAIRMAN : Now, please wind up. 

श्री विजय बहादुर सिंह : महोदय, यह बहुत इम्पॉर्टेन्ट है। कृपया इसे सुन लीजिए।

MR. CHAIRMAN: Though it is important thing but please wind up.

श्री विजय बहादुर सिंह : महोदय, इसको part-heard कर लीजिए क्योंकि सपा वाले जिनके 22 एम.पी. हैं, हम भी उन्नीस-बीस हैं, हमारे पास 21 एम.पी. हैं, और इनके पास 22 एम.पी. हैं, ये लोग 20 मिनट बोले हैं और हम लोग 15 मिनट बोलेंगे? महोदय, ये * MR. CHAIRMAN: He was the Mover.

श्री विजय बहादुर सिंह : मैं सपा वाले की भी करतूत बताना चाहता हूं। हमारे यहां पेयजल है। As a Member of Parliament, I have been recommending hand pump installations. 

MR. CHAIRMAN: Nothing else will go on record.

(Interruptions) …* श्री विजय बहादुर सिंह : हम भी लिखते हैं। हमने हैंड पम्प लगाने को लिखा। पहले कलक्टर और सी.डी.ओ. हम लोगों के दबाव में लगा देते थे। अब इन्होंने एक प्रभारी मंत्री बना दिया। हमीरपुर में प्रभारी मंत्री कहां के हैं? वे देवरिया के, सहारनपुर के हैं। अब हमने तो गांवों में जाकर लोगों की तक़लीफें सुन कर लिखा कि इनके यहां एक छोटा-सा हैण्ड पम्प लगा दीजिए। प्रभारी मंत्री कह देते हैं - रिजेक्टेड। कलक्टर, सी.डी.ओ. कहता है कि हमें उत्तर प्रदेश सरकार ने आदेशित किया है कि जब तक प्रभारी मंत्री एन.ओ.सी. नहीं देंगे, तब तक हैण्ड पम्प नहीं लगेगा। Then, I put a question to myself. Which index, which power, which knowledge the Prabhari Mantri has to tell whether this is required or not? हम रिप्रेजेंटेटिव हैं। मैंने वहां निवेदन किया कि बुंदेलखण्ड पैकेज में मेम्बर्स ऑफ पार्लियामेंट के लिए जो पैसा दिया गया है, उससे लगवाया जाए।

          लास्ट में, एक बहुत बढ़िया बात सुनिए। जब बहुजन समाज पार्टी की गवर्नमेंट थी। अभी भी वह छूट चल रही है। अगर कोई किसान टय़ूब वेल बनवाता है तो उसे एक लाख रुपये की छूट मिलती है। अगर वह मीडियम टय़ूब वेल बनवाता है तो उसे पचास हजार रुपये की छूट मिलती है। मान लीजिए अगर उसका खर्च दो लाख रुपये लगता है तो एक लाख रुपये छोड़ कर एक लाख रुपये उसे जमा करना पड़ता है। छोटे वाले टय़ूब वेल में अगर सत्तर हजार रुपये लगा तो पचास हजार रुपये छोड़ कर उसे बीस हजार रुपये लगते हैं। It was very good. जो नयी गवर्नमेंट आयी तो इन्होंने कहा कि वह छूट तो चालू रहेगी क्योंकि इलेक्शन है, लेकिन अगर आपको बिजली का कनेक्शन चाहिए तो पैसा भरिए। अगर छः खंभे लगते हैं तो उसमें एक लाख रुपये, सवा लाख रुपये का खर्च होता है। छूट तो पचास हजार रुपये की है और आप इन्डायरेक्टली एक लाख रुपये, सवा लाख रुपये, डेढ़ लाख रुपये कनेक्शन का ले लेते हैं। हमने लिख कर दिया। हमने एक पेटीशन भी फाइल किया कि आप चूंकि रेंट चार्ज करेंगे, किराया चार्ज करेंगे, रीडिंग लेंगे तो उसमें इसे जोड़ कर धीरे-धीरे ले लीजिए। नतीजा हुआ कि बांदा, हमीरपुर, महोबा और कई और जगहों में कुछ नहीं हुआ।

          अन्त में, मैं एक बहुत इम्पॉर्टेन्ट बात कहना चाहता हूं।

MR. CHAIRMAN : Please conclude now.

श्री विजय बहादुर सिंह : महोदय, मैं आपके इंटेरेस्ट की बात बता रहा हूं क्योंकि आप पानी के किनारे रहते हैं, गोवा में रहते हैं। चरखारी एक जगह है। महोबा एक जगह है जहां आल्हा-उदल राज करते थे।

सभापति महोदय : मुझे छोड़ दीजिए। Please excuse me.

श्री विजय बहादुर सिंह : चरखारी और महोबा में पंद्रहवीं शताब्दी में राजाओं ने बड़े-बड़े दो-दो किलो मीटर लंबे तालाब बनाए थे।   तब वहां पानी के लिए उन लोगों ने सोचा था कि यहां एक समय आएगा कि पानी की जरूरत पड़ेगी। वे तालाब अंदर से एक-दूसरे से इंटर कनेक्टेड थे। 15 सेंचुरी, 14 सेंचुरी, अगर देखा जाए तो महोबा और बुंदेलखंड पूरा तालाबों का ही क्षेत्र था, टीकमगढ़ में 60 हजार तालाब थे। अब सरकार उस तालाब का सिल्ट निकालने तक के लिए तैयार नहीं हैं।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please wind up. I will call the next speaker.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Do not disturb him.

… (Interruptions)

SHRI VIJAY BAHADUR SINGH : I am concluding in half a minute. In water, there should be no politics. Water is a life blood. Under the Constitution of India, under Article 21 of the Constitution, you have given a mandatory right of Right to Live and Right to Live is not like an animal living but as the Supreme Court says but Right to Live a decent living. आप वाटर में क्यों राजनीति करते हो? Who is Prabhari Mantri?

      सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से यह कहना चाहता हूं कि इसको वोट पोलिटिक्स से न जोड़िए। जब इलैक्शन आ गए तो ऋण माफी, ये कर दो, ये कर दो और इलैक्शन खत्म हो जाए तो दूसरी बात करो। Do not become a mother before elections and step-mother after elections. ...( व्यवधान) आप मेरी बात सुन लीजिए, बुरा न मानिएगा, ये जो बहुत कमजोर लोग बैठे हैं, ये कहते हैं कि कितनी दिक्कत होगी। जब हम कर्जा माफी देंगे, फिर इलैक्शन जीत जाएंगे।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please conclude. There are other speakers also. I have given you a lot of extra time.

श्री विजय बहादुर सिंह : ये जितनी योजनाएं हैं,...( व्यवधान) ये कर्जा माफी का ट्रम्प कार्ड इस बार जनता में चलेगा नहीं और ये कर्जा माफी अगर करनी है तो अभी कर दो, क्यों आप 2014 के लिए तैयार हैं? पहले आरबीआई वाला और दुनिया भर की मुसीबत है। मेरा कहने का मतलब यह है कि  in water, in sookha, there should be no politics. It is the politics of the human beings. You restrict that politics.

        सभापति महोदय, आपने हमें बोलने का मौका दिया और हमारी बातों को सुना, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

                                                                                                     

श्री शरद यादव (मधेपुरा):सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि इस मामले में शैलेन्द्र जी, गोपीनाथ जी, अरूण जी और अभी विजय बहादुर जी, वकील साहब ने बहुत विस्तार से इन चीजों को रखा है। मेरा इतना कहना है कि मराठवाड़ा में विकट स्थिति है और उसका बहुत विस्तार से जिक्र हमारे मित्र गोपीनाथ मुंडे जी ने किया है। उत्तर-भारत में नहीं, बल्कि पूरे देश भर में पाला और ओला, ये भी एक बड़ी बात है, क्योंकि मौसम इतनी तेजी से बदल रहा है कि वर्षा कभी होती है तो वह एक दिन में इतनी हो जाती है, जिसका जिक्र अभी गोपीनाथ जी कर रहे थे। अब ये जो महीना चल रहा है, यह अभी फरवरी चल रहा है, मार्च आगे है। फरवरी में दिल्ली में ऐसा कभी नहीं होता था कि रोज़ कहीं न कहीं से पानी आ जाता है। मौसम भी अपनी बहुत करवट बदल रहा है और यह पाला कोई ओले से कम नहीं है। इस पाले से अकेला आलू ही नहीं गिरा, पाले से मक्के की फसल भी, कृषि मंत्री जी, बहुत प्रभावित हुई है, दलहन की भी हुई है, केला भी खराब हुआ है। कई भिन्न-भिन्न किस्म की फसलों का पाले से बहुत नुकसान हुआ है।

          यह जरूर है कि हमने बाबा आदम के जमाने से कुछ नियम बनाकर रखे हैं। जिस तरह की हालत हमारे तंत्र की है, वह तंत्र काम करता ही नहीं, सच से उसका वास्ता ही नहीं, इस हालत में हमारा देश आज है। सूखा हम लोगों के जमाने में भी 11 सूबों में पड़ा था। आज जरूर यह ऐसी स्थिति है कि पानी का संकट है, चारे का संकट है, खाने का संकट है तो यह बात पक्की हैं कि जो सवाल यहां उठा है, वह महत्वपूर्ण है। मैं भारत सरकार से विनती करना चाहता हूं कि चीजों को कैसे तेज़ किया जाये, जो लोग यहां बता रहे हैं, जैसे धान के बारे में शैलेन्द्र जी बता रहे थे, वे बुन्देलखण्ड के बारे में जिक्र कर रहे थे कि बुन्देलखण्ड में अकाल है, पैकेज दिया, लेकिन राहत वहां नहीं जाती है।

          इसी तरह से गोपीनाथ मुण्डे जी ने कहा कि राहत कैसे पहुंच रही है और सर्वे कैसे हो रहा है, सैण्ट्रल टीम जाकर क्या रिपोर्ट कर रही है तो मैं सरकार से इतना ही कहना चाहता हूं कि इस मामले में कुछ काम करे। यह हर वर्ष का चक्र है, यह बदलने वाला नहीं है और तेजी से प्रकृति करवट बदल रही है। हालत यह है कि जब सैंडी का तूफान अमेरिका में आया तो अमेरिका में जो विकास है, वह पसर गया, लेट गया और इसी तरह की हालत दुनिया भर की होने वाली है, उस पर मैं नहीं जाता। लेकिन यह ऐसा मामला है, जो लगातार आएगा और लगातार आएगा तो लगातार हमको चुस्त और दुरुस्त होकर मशीनरी को इस हालत में करना पड़ेगा कि पेपर दौड़ते रहें और काम न हो तो इससे लोगों की जान पर बनी हुई है, जानवरों की जान पर बनी हुई है और पानी के बगैर तो आदमी की जिंदगी चल ही नहीं सकती, इसलिए मेरी विनती सरकार को इतनी ही है कि यह विषय आज अच्छा उठा लिया, गोपीनाथ मुण्डे जी और शैलेन्द्र जी ने, यह अच्छा मामला है, यह आज उठ गया और इस मामले का एक निरन्तर तरीका निकलना चाहिए, वैसे भारत सरकार में तरीका है, लेकिन उसकी गति बहुत धीमी है, वह तेजी से नहीं होती है, इसलिए तेजी से उसको जमीन पर जाना चाहिए। इस काम को करना आज बहुत जरूरी है। मैं इन सब साथियों का, जो इन्होंने सवाल उठाया है, उसका मैं समर्थन करता हूं। मैं खुद गांव गया था तो वहां ओले और पाला होशंगाबाद जिले से लेकर नरसिंहपुर से लेकर हालत खराब है और बिहार में भी पाले से सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया और पूर्णिया, इस सारे इलाके पर पाले की बड़ी मुश्किल पार पड़ी है।  यानी पूरी फसल की फसल काली हो गयी है।  इन मामलों में आप तेजी लाइए और जो राहत आप दे सकते हैं, जो राहत वहां पहुंचनी है, वह समय पर पहुंच जाए, यह बड़ी बात है।  

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को यहीं समाप्त करता हूं।  

     

SK. SAIDUL HAQUE (BARDHMAN-DURGAPUR): Sir, please permit me to speak from here.

          Sir, I thank you for giving me the opportunity to speak. Our country, India is facing many natural disasters. In India, from time to time, they have caused havoc on the lives and property of the citizens as a whole.

          At this time, we are discussing about two such havocs or disasters – hailstorms and drought. No doubt, they are very important subjects. Recently, hailstorm has caused havoc in Uttarakhand and it has inundated many rivers in the North causing floods in Uttar Pradesh, Uttarakhand, Jammu & Kashmir, parts of Bihar and parts of West Bengal. At the same time, such hailstorms have made crop losses in Madhya Pradesh and Kerala. It has affected the farmers there.

What we are facing, on the other hand, is a major drought in many parts of Maharashtra, particularly the Pune region, Marathwada Region and parts of Vidarbha. The drought situation is very precarious. Hon. Minister of Agriculture also went there. These are his remarks: “The situation is grim and I have never seen such a situation, and proper help from the Central Government will be provided.” I do not know what kind of help had so far been provided to the State of Maharashtra.

          Vidarbha is the most important place because many farmers had committed suicide there in the last few years. Just 11 per cent of the total land of Vidarbha is irrigated. Why is it so? What role has been played since Independence by both the Central and the State Governments? Maharashtra is now facing severe drought situation – at least 122 taluks covering 25 districts had been declared drought-prone. The water level in Ujjain dam is now zero.

In Andhra Pradesh what do we see? In Andhra Pradesh, 34 mandals in nine districts had been drought-hit. The same situation is in Kerala – in Kottayam, in Pallakad, in Trishur, in Mallapuram, the rice cultivation has faced great damage. In Karnataka also, there was drought in the last year, due to the poor South-West monsoon. Karnataka has declared 142 taluks in 26 districts as drought-hit.

          This is the situation all over the country. We have seen famines in the past; and the way our country is moving now, we are going to face another famine, if proper action is not taken on the part of the Central Government. Who are the most sufferers? It is the farmers. They are the most affected. Already, throughout the country, the plight of the farmers is miserable. Such is the condition of the farmers that they are committing suicide, not only in Vidarbha, but also in my State of West Bengal and also in Kerala where no such incidents had happened in the past. The farmers are committing suicide there too.

          This is the impact of truant role of monsoon and also the effect of El Nino about which a reference has been made by some hon. Members. What is hit most here is the production of agriculture. It impacts the production of food-grains. This drought would affect not just this year, but next year also. Though agriculture contributes 16 per cent of GDP, we cannot forget that more than 60 per cent of our population is dependent on agriculture. We cannot forget that 22 crore agricultural labourers are dependent on agriculture. So, such extensive and intensive drought situation from East to West, would cause great damage to re-building of our country and to the development of our country, India.    Generally we say there is ‘drought’ when there is thirty per cent less rain fall. But here the rain fall is 35 per cent or 40 per cent or just less than 50 per cent.  We are facing the same kind of situation from east to west. The worst sufferers are the paddy farmers, onion farmers, potato farmers, cotton farmers and pulse farmers. Now, what role is the Government playing in this regard? The Minister should tell us about that.  There was a Programme called Drought Prone Area Programme. Now, that Programme has been dispensed with.

          In reply to a Question in 2012, the hon. Minister has stated that an Inter-Ministerial Team has been deputed to drought prone areas.  He also stated that the States are vested with the State Disaster Response Fund and that they should act through this Fund. In addition to that, when a Memorandum is received from the State, the Centre will think about the National Disaster Response Fund also.

          I think, the Centre should think about it suo motu. It should not wait for the Memorandum from the States. Such is the situation.  The Minister tells that they have introduced several schemes.  What are those schemes? I am naming some of them. They are diesel subsidy scheme, enhancement of ceiling on seed subsidy, scaling up the Central sector schemes on feed and fodder under National Mission for Protein Supplements, reducing interest on rescheduled crop loans, mitigate drought conditions, etc. The Government has introduced such schemes. But these are nothing but a kind of joke and mockery to the agriculturist i.e. the farmers.

          What are we seeing? The Government is talking about diesel subsidy. But what is actually happening? The Government is raising  the price of diesel. Who are the most affected? The farmers are the most affected. So, what result does it bring? The Government is telling that it is giving fertiliser subsidy. But what is the Government actually doing? The Government is actually raising the price of fertilizers by decontrolling the fertilizer. That again brings more pressure on the cultivators and the farmers. Not only that, seven to eight fertilizer plants have been closed down in our country including one in my constituency at Durgapur, W.B. We are importing fertilizer and the price of that fertilizer is very costly. That has caused great havoc on the farmers.

          The Government is telling that it is providing seeds.  But what we are seeing practically is that great multi national corporations, like the Monsanto are allowed to control the market of seeds all over the country.  Again, who are affected? It is the farmers who are affected the most.

          The Government is talking about MNREGA? But what is happening on the ground? The hon. Minister knows very well that there is huge corruption in MNREGA. The Government should re-look into it. The Government is talking about crop insurance.  But I do not know how many farmers are getting their crop insurance. 

The Government is talking of giving the MSP.  But why is the Government not implementing the Dr. Swaminathan Committee recommendations of giving double the production cost plus fifty per cent? Why is the Government not implementing Dr. Y.K. Alag Committee recommendations giving statutory status to the CACP?

The Government is talking of loan subsidy.  But why the marginal and small farmers are not getting loan at the rate of four per cent? Why are the marginal small farmers dependent more and more on village money lenders?  So many suicides are happening as a result of that.

The Government is talking of Food Security Mission. But what is the result of such Missions? Have you been able to increase the production of rice to the extent of 20 million tonnes by the end 11th Five Year Plan? … (Interruptions)

For cultivation, till today only 40 per cent of our land is irrigated. Why the rest 60 per cent is dependent on rain? We have built so many big dams.  Some dams were built in fifties and sixties. But no dredging has been done. So, the water capacity of these dams is not more than 10 to 15 per cent. I have the experience of my own State. In West Bengal, the DVC is there. It is Damodar Valley Corporation. But people mockingly call it Dobano Vasano Corporation. It is because that cannot take the water as needed for cultivation. So, my suggestion is that the Government should think of proper compensation, providing seed, fertilizer and other inputs free of cost to the farmers of the affected area.  The Government should announce loan waiver schemes and provide interest-free loans to the farmers of the affected area.

Government should provide free and uninterrupted supply of power and also assist the States by providing additional power from the Central Pool wherever necessary. Government should provide proper diesel subsidy particularly to the small and marginal farmers.  Government should provide crop insurance to the farmers properly so that they can get the benefit out of that. Government should implement the MSP recommendation given by Dr. Swaminathan. Government should think of more investment in agriculture and there should be greater scope of irrigation. In particular, one point has already been made that there should be a separate Budget for agriculture like the one for the Railways. Agriculture is the lifeline of the country. If Government does not come forward to this particular thing, I think the country will face such a drought and such a hailstorm will occur from time to time. So, if we do not take precaution, if we do not come forward with a planned Mission, we can never cope with such a situation. So, my earnest request to the Government is that we should make a comprehensive plan. This year, if possible, or, definitely next year, you should place a separate Plan and Budget for agriculture so that the farmers who are in a miserable condition can have some ray of hope.

          With these words, I conclude.

                                                                                         

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Sir, I am reminded of one quotation of Sardar Patel more than 60 years before perhaps, in this House. When somebody had asked him that India is so culturally   rich, “why do you not speak something of culture,” very jokingly, Sardar had said: “If you want to hear something about culture, then, talk to Pandit Jawaharlal Nehru. He is the Prime Minister of this country. But I only understand that all the culture flows from agriculture.”           Today, when we are discussing about drought and hailstorm that has affected large parts of the country, I am reminded of the notice that many of us had given last year during the month of July and the discussion had scantily taken place. Of course, in the Winter Session, we could not discuss the problems that the farmers are facing in this country. But I am delighted that the first day when we are taking up a Short Duration Discussion, the topic has been to discuss about drought and hailstorm.

          I am reminded of reading a piece of article relating to the infrequent monsoon movement in our country. I quote:

“India faces today the risk of devastating drought as monsoon rains are likely to have a shortfall of 70 per cent  in the years ahead, as climate change shakes up global weather phenomena.  The Monsoon has regularly  stumped forecasters in the first decade of this century, during which the country faced the driest June in 100 years, the worst drought in four decades, dryness in the usually rainy north-eastern region, heavy downpours in the Rajasthan desert and frequent month-long delays in monsoon withdrawal. ”   About the rains that we  had towards the end of January and the first fortnight of February, even I think a week back, we were told that these rains occur because of the turbulence in the Mediterranean Sea in the European world. But, as I have heard in my village, it goes tike this. I do not know whether my Hindi is right or not. माघ के महीने में अगर बरसात होती है तो फसल अच्छी होती है और गोधन के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। कल माघ का महीना खत्म हुआ, आज फाल्गुन का महीना शुरू हुआ है। हम आज जिस दुविधा में हैं, उसे ऐड्रैस करने की जरूरत है। दुविधा क्या है?
          Evidence suggests that the Indian economy today is the drought-resilient but not drought-proof. The distinction being that once drought proof, there is no negative impact on the economy but in a drought resilient country, there is a negative but manageable impact.
          One can take pride – I think, when the hon. Agriculture Minister replies  to this discussion, he would definitely mention about the yield that occurred in our country during the last two years – in the fact that within the last 40 years, Rabi or the winter crop output has come to be of equal significance to the Kharif or summer crop harvest. This is a new phenomenon which all of us should adhere to and understand its implications. On an earlier occasion, it was the Kharif crop which was giving us more yields where the output was better. But within the last 40 years, thanks to the impact of Green Revolution, the Rabi crop and the Kharif crop are of same significance. For the first time in 2012, the Rabi crop output has surpassed the Kharif crop output. Out of the total foodgrain production, that is 257 MT this side or that side – some say, it is 263 MT and some others say it is 257 MT – Kharif crop output has been 124 MT and Rabi crop is 133 MT. What would be the position in 2013 fiscal? We would like to understand from the Minister.
I come to our State’s problem. Due to shortage of rainfall  during June and July, 2012, agricultural operations were affected in many areas in Odisha. However, barring a few areas, there was development in the situation due to good rainfall in subsequent months. However, as per provisions of Odisha Relief Code, 314 villages were found to have sustained crop loss of over 50 per cent and above. Out of 30 districts of the State, districts like Baleswar, Bhadrak, Mayurbhanj and Nuapada, comprising 10 Blocks of 59 Gram Panchayats, 314 villages have been declared as affected by drought. I would request the Government of India to extend all possible help and support to Odisha to tide over the situation.
We all know that drought is a slow death; it is not reflected immediately. Symptoms are seen instantly as one witnesses during floods or cyclone or hailstorm. We still have a colonial system of crop cutting and the districts, the blocks, and the gram panchayats are considered as the units. The Odisha Government has identified the villages that have been affected by drought. Because of Lord Jagannath’s grace, Kharif crop has yielded good results this year. One can say a bumper crop. The problem is that the Food Corporation of India is not lifting rice as it is supposed to do month-wise. The Agriculture Minister had changed the system and that is how the farmers of Odisha are able to sell their  paddy. Very less distress sale is taking place today in our State but it would draw the attention of the Government related to farmers suicide.
In today’s Question Hour, there was Question No.38 related to suicides by farmers. The answer has been given by the Agriculture Minister. The question was put by Shri Baliram Yadav and Shri Ravindra Kumar Panday. The question very categorically was – the details of suicides by farmers reported by the National Crimes Records Bureau since 2011 in the country, State-wise, along with the reasons therefor. Out of 28 States, 14,004 farmers have committed suicide, other than the Union Territory, where it is around 23. So the   total suicide in 2011 is 14,027 in one year and the maximum is Mahrashtra where it is 3,337.  In Odisha it is 144. I am not quoting the figures, but in asterisk it is mentioned and, I think, we should deliberate on that aspect. The causes of suicide include family problems, illness, drug abuse or addiction, unemployment, property dispute, bankruptcy or sudden change in economic status, poverty, professional/career problem, love affair, barrenness or impotency, cancellation or non-settlement of marriage, dowry dispute, fall in social reputation, causes not known etc.           Sir, we all understand, as Indians, death comes by giving a reason. Here, the reason does not qualify that death or suicide has come because of crop failure. How long can we hide ourselves from reality? The reality today is, the farmers of this country are going through a tremendous hardship and that hardship is unable to bear. As enlightened citizens of this country, this House has a responsibility, the Government has a responsibility to stand along with them to give them succour, to give them support so that they can tide over the situation. I would only say that one can understand nature’s vagaries and one can sustain and also tide over the situation. अगर अपने ही अपने को दगा दे दिया, तो आगे हम बढ़े कैसे?
 
MR. CHAIRMAN: Hon. Members, I have a list of 24 more speakers to speak on this discussion under Rule 193. Those who want to lay their written speeches can do so and they will be treated as part of the proceedings.
श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़):सभापति जी, लगभग हर सत्र में हम राष्ट्रीय आपदा पर या प्राकृतिक आपदा पर इस सदन में चर्चा करते हैं। आज कहीं सूखे की स्थिति है, तो कहीं ओले के कारण किसानों का नुकसान हुआ है। मैं, आज महाराष्ट्र में जो सूखे की स्थिति है, वह आपके माध्यम से सदन के सामने यहां पर रखना चाहूंगा। वैसे कृषि मंत्री जी यहां पर उपस्थित हैं, वे स्वयं महाराष्ट्र से हैं और मुझसे  ज्यादा अच्छी तरह वे इस सूखे से अवगत हैं। अपनी ओर से इस सूखे से राहत दिलाने के लिए वे प्रयास भी कर रहे हैं, लेकिन यह सूखा केवल इस साल की स्थिति के कारण नहीं है। पूरे महाराष्ट्र में सूखा नहीं है, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र के सतारा, सांगली, शोलापुर नगर और पुणे जिले के भी कुछ क्षेत्र उसमें शामिल हैं। ये जो क्षेत्र हैं, यहां पर लगभग पिछले तीन साल से सूखे की स्थिति है। कुछ जिले ऐसे हैं, जहां पिछले तीन साल में वर्षा ही नहीं हुई है। पूरे तीन सीज़नों में बारिश ही नहीं हुई है। मराठवाड़ा में जालना, बीड़, परभणी, उस्मानाबाद ऐसे जिले हैं जहां पर सूखे की स्थिति है। विदर्भ में बुलढाना जिले का कुछ हिस्सा सूख से पीड़ित है।  जब मुंडे जी यहां बोल रहे थे, तब उन्होंने इस बात का जिक्र किया, उसे मैं दोहराना नहीं चाहूंगा। कम बारिश होने के कारण जो क्षेत्र सूखे से पीड़ित हैं, चाहे खेती के लिए पानी हो या पीने के लिए पानी हो, तालाब, डैम और नदियां सूखी हुई हैं और सूखे का असर कई दिनों तक उस क्षेत्र पर रहता है जैसे आज जो डैम सूखे हैं, यदि सही वर्षा होती है उनको भरने के लिए दो-तीन साल जाएंगे।  यदि सही वर्षा नहीं होगी, तो यह स्थिति आने वाले समय में और भी बदतर हो सकती है, ज्यादा चिंताजनक हो सकती है। राज्य सरकार अपनी ओर से सूखे से राहत दिलाने के लिए, सूखे से निपटने के लिए प्रयास कर रही है, लेकिन इसका प्रभाव इतना ज्यादा है कि आज केवल राज्य सरकार अपने बल पर इस सूखे से नहीं लड़ सकती है, न पीड़ितों को राहत देने में सफल हो सकती है। इसलिए आवश्यकता है कि भारत सरकार से सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों, लोगों को राहत दिलाने के लिए मदद दी जाए, सहयोग दिया जाए।
          सभापति जी, जो जानकारी मुझे राज्य सरकार से प्राप्त हुई है, उसके मुताबिक अलग-अलग चार प्रस्ताव भारत सरकार के पास महाराष्ट्र सरकार ने भेजे हैं। राहत के लिए जो मदद मांगी गयी है, उसका पहला प्रस्ताव 1300 करोड़ रुपये का है, दूसरा प्रस्ताव 2300 करोड़ रुपये का है, तीसरा प्रस्ताव 3200 करोड़ रुपये का है और हाल ही में जो चौथा प्रस्ताव भेजा गया है वह 1800 करोड़ रुपये का है। कुल मिलाकर 8600 करोड़ रुपये के प्रस्ताव महाराष्ट्र सरकार की ओर से भारत सरकार को मदद के लिए, राहत की मांग के लिए भेजे गए हैं।  ये जो 8600 करोड़ रुपये के प्रस्ताव हैं, यह राहत है, मदद है, उससे सारे सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों की सारी समस्याएं हल होने वाली नहीं हैं या उनकी पीड़ा पूरी तरह हल होने वाली नहीं है। यह हम सिर्फ राहत के लिए, मदद के लिए मांग रहे हैं, जरूरत इससे भी कई गुना ज्यादा धन की है। लेकिन 8600 करोड़ रुपये के अलग-अलग प्रस्ताव राज्य सरकार की ओर से भारत सरकार के पास आए हैं। मैं आज आपके माध्यम से, इस सदन के माध्यम से भारत सरकार से मांग करना चाहूंगा कि जो स्थिति आज महाराष्ट्र की है, इस सारे क्षेत्र के सूखे की स्थिति है, पिछले दो-तीन साल से वहां के किसान सूखे से जूझ रहे हैं, इसलिए इसे केवल राज्य की आपदा न मानकर, इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए। यह मैं आपके माध्यम से इस सदन में मांग कर रहा हूं कि महाराष्ट्र के सूखे को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए।
           मैं चाहूंगा कि जब मंत्री जी इस चर्चा का जवाब दें तो इस विषय पर भी अपनी बात सदन के सामने रखें। राज्य सरकार को केन्द्र सरकार ने कुछ मदद दी है, अगस्त महीने में 574 करोड़ रुपए और अक्तूबर में 778 करोड़ रुपए दिए हैं। लेकिन यह जो मदद भारत सरकार से प्रदेश सरकार को मिली है, यह विशेषकर उन किसानों को जिनका खेती का नुकसान हुआ है, उसके मुआवजे के रूप में मिली है। खेती का जो नुकसान हुआ है, रबी की फसल 50 प्रतिशत से कम उपज हुई है, जिसमें 3905 गांव प्रभावित हुए हैं। इसी तरह से खरीफ की फसल जहां 50 प्रतिशत से कम हुई है, उसमें 7896 गांव प्रभावित हुए हैं। इसलिए उन्हें जो  रिलीफ दिया गया है, वह मुआवजे के तौर पर सहायता मिली है। लेकिन आज महाराष्ट्र में काफी सूखा पड़ा है, जिसका वर्णन गोपीनाथ मुंडे जी ने अपने भाषण में भी किया था। वहां फसल हो चुकी है, न बारिश है और न पानी है। सिंचाई के लिए नहरों द्वारा पानी दिया जा रहा था, लेकिन जब डैम ही सूखे पड़े हैं तो नहरों में पानी कहां से आएगा। इस वजह से खेतों में पानी नहीं आया और परिणामस्वरूप फसल कहां से होगी। वहां फसल का नुकसान शत-प्रतिशत हुआ है। उससे भी बुरी हालत किसानों की है और उनसे भी बुरी हालत वहां के जानवरों की है। आज किसान जानवरों को सड़क पर छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं। वे उन्हें बेचने को भी मजबूर हो रहे हैं।
          सभापति जी, राज्य सरकार से जो आंकड़े मुझे मिले हैं, उनके अनुसार अहमदनगर में 210 कैटल कैम्प हैं, पुणे में एक, सतारा में 11, सांगली में 130, सोलापुर में 117, बीड में 20, जालना में पांच और उस्मानाबाद में पांच, कुल मिलाकर 488 कैटल कैम्प हैं। इनके अंदर जानवरों की संख्या 4,14,205 है। आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि इन कैटल कैम्प में जानवरों के साथ-साथ किसान भी रह रहे हैं। यह इसलिए कि उनके खेतों के लिए पानी नहीं है, वे न तो फसल ले सकते हैं और उनके खाने-पीने के लिए अनाज और पानी है। इसलिए वे जानवरों के साथ-साथ उनके कैटल कैम्प में रह रहे हैं।
          सभापति जी, मैं चाहता हूं कि इस पर हमें थोड़ा और समय दिया जाए, क्योंकि विषय बहुत गम्भीर है। मैं वास्तविकता को सदन के सामने रख रहा हूं। जो हालत ग्रामीण क्षेत्र में है, न तो पीने के लिए पानी है, न जानवरों के पानी और चारे की व्यवस्था है।  जानवर वहां पर मर रहे हैं और जानवरों को मजबूर होकर कसाइयों को बेचा जा रहा है। अगर यह पशुधन खत्म हो जाता है तो आने वाले समय में इससे भी बुरी हालत होगी।
          सभापति जी, जहां पर जानवरों की छावनियां हैं वहां पर सूखा चारा दिया जा रहा है। जीने के लिए सूखे गन्ने के पत्ते मजबूरी में जानवर खा रहे हैं। उस चारे से जानवर जिंदा तो रहेगा लेकिन यदि गाय वह चारा खाती है तो भविष्य में वह दूध नहीं दे पायेगी क्योंकि उस चारे से गाय को कैल्सियम नहीं मिल रहा है। वे जानवर बेकार हो जाएंगे और यह स्थिति पूरे महाराष्ट्र में है।
          सभापति जी, किसानों के पीने के लिए पानी नहीं है। शहरों की हालत बहुत बुरी हो चुकी है। परभणी शहर में 15 दिन में एक बार पानी आता है, जालना शहर में 23 दिन में और कभी-कभी 45 दिन में एक बार पानी आता है। यह तो शहरों की हालत हो चुकी है। वहां पर पीने के लिए पानी बिल्कुल नहीं है। यदि इस स्थिति का सामना करना है तो उसके लिए धन की आवश्यकता है और इतना धन राज्य सरकार खर्च नहीं कर पा रही है। इसमें भारत सरकार के सहयोग की आवश्यकता है। इसलिए हमने यह कहा है कि यह आपदा केवल राज्य की नहीं है वरन् पूरे राष्ट्र की है, इसलिए इसे राष्ट्र आपदा घोषित करने की आवश्यकता है। इसलिए इसे राष्ट्र आपदा घोषित करते हुए भारत सरकार को पूरी तरह से सहयोग करने की आवश्यकता है।
          वहां चाहे मराठवाड़ा हो, चाहे पश्चिम महाराष्ट्र हो, पूणे हो, विदर्भ का बुलढाना जिला हो, वहां बहुत से ऐसे तहसील हैं जहां पानी न होने की वजह किसानों का जीना बिल्कुल मुश्किल हो गया है।
          आज सही समय पर यहां चर्चा हो रही है और जितने भी सदस्य यहां बोले हैं उन्होंने कहीं पर भी राजनीति नहीं दिखाई है जोकि सराहनीय योग्य है। वहां की जो स्थिति है उसे जानने के लिए भारत सरकार की एक टीम सम्भाजी नगर औरंगाबाद में गयी है और वहां वे देख रहे हैं कि हमारा जो राष्ट्रीय आपदा कोष है उससे राहत देने के लिए हमने जो गाइड-लाइन्स बनाई हैं, आवश्यकता यह है कि उससे हमें कुछ रिलैक्सेशन मिले। उस नार्म्स से रिलैक्सेशन देने की आवश्यकता है।
          वहां का किसान आज आत्महत्या के लिए मजबूर हो गया है। जो आंकड़े यहां पर दिये गये हैं कि महाराष्ट्र में 3000 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं और भविष्य में ये आंकड़े दोगुने हो सकते हैं। इसलिए उस किसान को बचाने के लिए, उस किसान के पशुधन को बचाने के लिए मानवता के नाते सारे नार्म्स रिलैक्स करते हुए महाराष्ट्र को भारत सरकार सहायता करे।
                                                                                         
ओश्री नारनभाई काछडिया (अमरेली):   नियम 193 के अंतर्गत सूखे पर चर्चा में गुजरात की तरफ से मैं भी अपनी कुछ बातें रखना चाहता हूं । पूरे गुजरात में आज सूखा पड़ा हुआ है । गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जो दूसरे को खिलाता है, फिर बाद में खाता है । आज गुजरात में पूरे देश के पर-प्रान्ती अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और परिवार का गुजारा कर रहे हैं और आज इसी गुजरात में सूखा पड़ा है । गुजरात में सौराष्ट्र का एक हिस्सा पड़ता है और खासकर पहले से ही वहां भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार पानी की कमी रहती है और बारिश भी कम होती है और इस साल भी ऐसा ही कुछ हुआ और पूरा सौराष्ट्र सूखे की लपेट में आ गया है । सौराष्ट्र के किसानों ने तीन-तीन बार इस महंगे बीज को खरीदकर तीन-तीन बार बुआई की और साथ-साथ खाद भी डाला गया और कम बारिश होने के कारण तीन-तीन बार बीज जमीन के अंदर ही मर गया और किसानों ने बैंकों से, साहूकारों से कर्ज लिए तथा वे अपने गहने को बंधक रखकर भी कर्ज लिए और ये सब करने के बाद भी बारीश नहीं होने के कारण किसानों पर कर्ज का भारी बोझ बढ़ गया और किसान इस तरह से पूरे कर्ज में डूब गए । किसानों के पशुधन को कौड़ी के भाव में बेचना पड़ रहा है और वे अपने पशुओं को खिलाने के लिए चारा भी नहीं खरीद पा रहे हैं । किसानों ने जो कर्ज लिए हुए हैं, वह चुका नहीं पा रहे हैं । परिवार और बच्चों को आर्थिक परेशानी के कारण देखभाल करना मुश्किल हो गया है । पशुधन और अपने परिवार का गुजारा करने के लिए किसान मारा-मारा फिर रहा है और कुछ दिन बाद गर्मी का मौसम आने वाला है । ऐसे तो पहले से ही बारीश नहीं हुई है जिसके कारण पीने के पानी के अभाव का भी सामना करना पड़ रहा है ।केन्द्र सरकार से मेरी मांग है कि किसानों के सारे कर्ज को माफ किया जाए ताकि अगले साल फिर अपनी खेती-बाड़ी कर सके । नहीं तो किसान कर्ज में डूब जाएगा और खेती करने के योग्य नहीं रह पाएगा ।
           हमारा देश खेती प्रधान देश है लेकिन किसान ही नहीं बचेगा तो हमारा देश कृषि प्रधान कैसे कहलाएगा । महोदय, किसान अपना पसीना बहाकर दूसरों का पेट भरता है । तो सरकार को इसी किसान की रक्षा प्रदान करना पहली जिम्मेदारी है । आज केन्द्र की सरकार किसानों के प्रति सौतेलेपन का व्यवहार कर रही है । तो इस देश को आने वाले दिनों में बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा ।
          मैं  एक बार फिर यह मांग करता हूं कि किसानों के सारे कर्ज को माफ कर दिया जाए ।
   
* Speech was laid on the Table   श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी  मानसून की बेरूखी से अपेक्षित बारिश न होने के कारण महाराष्ट्र राज्य के करीबन 25 जिले में अकाल विकराल रूप धारण कर रहा है। राज्य में सन् 1972 की तुलना में यह सूखा ज्यादा भीषण है। पानी की भारी किल्लत पड़ी है। इसका भारी असर मवेशियों पर पड़ रहा है। मेरे संसदीय क्षेत्र अहमदनगर (दक्षिण) में 50 प्रतिशत से कम बारिश हुई तथा बुआई भी 50 प्रतिशत से कम हो गयी है वहां की जनता पानी के लिए बेहाल हो रही है। अकाल पीड़ित जनता को राहत पहुंचाने के सरकारी प्रयास तेजी से नहीं हो रहे हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अहमदनगर (दक्षिण) क्षेत्र में करीबन 203 गांव और 764 कस्बों को 4 सरकारी 18 शासन द्वारा अधिग्रहित तथा 212 निजी टैंकर द्वारा पानी सप्लाई किया जा रहा है लेकिन तथ्य यह है कि निजी टैंकरों का किराया न देने से आधे से ज्यादा टैंकर बंद हैं। मवेशियों के लिए कैंप (कैटल कैंप) तथा चारा डिपो खोले थे वो भी राज्य सरकार ने बंद कर दिये। अब लोगों की मांग के बावजूद नहीं बहकी राजनीति से प्रेरित होकर कैटल कैंप के निर्णय हो रहे हैं इसके जकीरा एक गांव में 4‑5 कैटलकैंप शुरू तथा दूसरी ओर 15‑15 गांवों में कैटल कैंप को मान्यता नहीं दी जा रही है। ऐसी स्थिति में मवेशियों का क्या हाल हो रहा है। इसका सीधा असर दूध धंधे पर पड़ रहा है। पिछले अधिवेशन में मैंने सूखे से निपटने के लिए महाराष्ट्र राज्य को 5000/‑ करोड़ तथा अहमदनगर संसदीय क्षेत्र के लिए 3000/‑ करोड़ की मांग की थी। लेकिन सरकार ने इसे दरकिनार करके राज्य के सूखे क्षेत्र को खटाई में डाल दिया है। विशेषकर अहमदनगर क्षेत्र में पानी की समस्या पर सत्ताधारी नेता उदासीन हैं। पैसे से जनता खरीदी जा सकती है मगर अपने हाईकमान को नाराज किया तो नेतागिरी खत्म हो जाएगी। इसी डर से अहमदनगर संसदीय क्षेत्र के सत्ताधारी नेता घोड़, कुकड़ी बांधों से पानी उपलब्ध कराने में हिचकते हैं। एनडीए सरकार ने जहां काफी मात्रा में बारिश होती है, वहां से उपलब्ध पानी सूखे से प्रभावित क्षेत्र में लाने के लिए नदी जोड़ परियोजना नाम का एक अच्छा प्रयोग शुरू किया था। लेकिन यूपीए सरकार ने उसे दरकिनार करके सूखे क्षेत्र को भीषण जल संकट में डाल दिया है। महाराष्ट्र के नजदीकी राज्य गुजरात ‑ आंध्र ने बड़े बांधों का निर्माण करके विकास की राह पकड़ ली है। कृष्णा खोरे क्षेत्र में आज भी 130 टीएमसी जल बाकी होने के बावजूद महाराष्ट्र सरकार ने बड़े बांधों के निर्माण के लिए उदासीन रवैया अपनाया। नतीजा जल संकट बढ़ गया। मेरा तो यह मानना है कि महाराष्ट्र में निसर्ग निर्मित जलसंकट कम परन्तु मानव निर्मित संकट ज्यादा गहरा है। अगर केन्द्र सरकार ने इच्छा शक्ति जताई तो भविष्य में राज्य का जल संकट कम हो सकता है। इसके लिए सिर्फ कृष्णा खोरे अंतर्गत उपलब्ध जल को बांध बनवाकर इकट्ठा करना है। अहमदनगर जिले के लिए वर्तमान स्थिति में कुकड़ी, घोड़ बांधों का जल बिना विलम्ब उपलब्ध कराया जाए।
        मैंने सदन में राज्य के लिए 5000 करोड़ तथा अहमदनगर संसदीय क्षेत्र के लिए 3000 करोड़ की सहायता मांगी थी उसे तुंत स्वीकार किया जाए।
        उसके साथ साथ मेरी यह मांग है कि मनरेगा के अंतर्गत जिस प्रकार आदमी को काम दिया जाना है। उसी प्रकार बैल और गधे को रोजगार उपलब्ध होने के नाते उन्हें भी मनरेगा के अंतर्गत काम दिया जाये। यह मेरी मांग है। सूखे क्षेत्र में रहने वाले ओपीएफ के सदस्यों को राशन पर गेहूं और चावल दिया जाए।    
                                       
ओश्री संजय धोत्रे (अकोला): श्री शैलेंद्र कुमार और गोपीनाथ मुंडे जी ने नियम 193 के अंतर्गत देश मे सूखा और ओले के कारण स्थिति पर चर्चा उठाई ।  देश के कई राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से सूखे से प्रभावित हैं ।  कई क्षेत्रों में पीने के लिए पानी नहीं जानवरों के लिये चारा नही रोजगार नहीं, महाराष्ट्र में खास करके विदर्भ में सूखे की स्थिति नहीं है लेकिन विदर्भ मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में मेरे चुनाव क्षेत्र पूरा अकोला जिला और वाशिम जिले के रिसोड मालेगांव तहसील में गेहूं चना मूंगफली (ग्राउंड नट) और संतरा, आम केला पपीता, फूल खेती, आम इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित हुई ।  कई जगह दो बार ओले गिरे इन किसानों का बुरी तरह नुकसान हुआ इसका ठीक ढंग से सर्वेक्षण हो ।  महाराष्ट्र सरकार मुआवजना देने के लिए सक्षम नहीं इस लिए केंद्र सरकार और कृषि मंत्री जी से करबद्ध निवेदन करता हूं कि केंद्र सरकार किसानों को पूरी तरह आर्थिक मदद करें और प्रभावित किसानों को राहत दे ।
                                              
* Speech was laid on the Table     *SHRI S. SEMMALAI (SALEM) : Drought and flood are recurring phenomenon affecting the people and crippling the rural economy.  Practically India is swinging between flood and drought with no permanent solution.  Despite technological advancement we are not able to control the devastation (damage) caused by flood and havoc due to drought.
          Flood and drought hit everywhere in the world.  The difference lies in management skills more than resources. India’s management skills on flood and drought need to be improved.
          Reliable data shows that every 22 years a major drought occurs in US affecting the mid-western states.  But in India like two sides of a coin drought and flood alternate the country.
Take for instance Tamil Nadu – failure of monsoon and Karnataka’s reluctance to release Cauvery water resulted in drought. Recently Chief Minister of Tamil Nadu, Hon’ble Leader declared all the districts except Chennai as drought hit. To tackle the situation, the Chief Minister of Tamil Nadu, my revered Leader, announced a number of relief measures including payment of compensation of Rs.15,000/- per acre to delta farmers with more than 50% crop loss.  For those with less than 50% crop loss relief has also been provided.  1.75 lakh farmers in the delta districts covering an extent of 3.61 lakh acres would be given compensation of Rs.15,000/- per acre.  This apart, land tax would be waived and co-operative loans rescheduled.  Under MGNREGS, 34 lakh agricultural workers will be provided employment for 150 days in a year with a wage rate of Rs.132 per day.
All these measures as Hon’ble Chief Minister of Tamil Nadu has taken on the expectation that Centre would be liberal in coming to the aid of the State Government. Soon the Tamil Nadu Government will submit drought memorandum to the centre after making complete assessment. National calamities and its mitigation is the responsibility of the Centre also.
With the huge resources at its command, the Centre should be more liberal and extend assistance in time and in full. I expect the Centre to live upto our expectation.
Tamil Nadu with a coastal length of over 800 kms. is vulnerable to cyclone and wind storm.   Cyclone Thane hit north coast of Tamil Nadu leaving 33 people killed and 1000 homeless.  To meet the damage caused by the cyclone, Tamil Nadu had made reasonable demand of Rs.5000 crore from the Centre.  But what was paid, was a meager 500 crore only.
CM has commented on this level of assistance as the Centre being indifferent to the State.  Normally the Centre’s response towards natural calamity is unsatisfactory and very meager.  Not only this, the assessment by the Central Team takes a long time and the relief offered does not touch the fringe of the issue.
This has been the experience of not only Tamil Nadu but also other states.
Timely assistance, adequate compensation are the two crucial aspects, where the Centre fails whenever natural calamity occurs. Drought and flood are the twin curses of nature. A permanent solution has to be found out.
Adhoc relief measures are not the answer. Inter-linking of rivers is not on a national basis at present at least on regional basis has to be worked out initially.  The needs of the southern states in times of drought and flood can be met through inter-linking of rivers. At least a beginning may be made by inter-linking southern rivers.
Water disputes between states will be resolved if an attempt is made effectively.
Unless we address this issue seriously as I have said, now we can’t escape from the calamities of drought and flood.  If there is a will, we can overcome the situation or problem.
                     
*SHRI K. SUGUMAR (POLLACHI):  Acute drought like situation prevails in many parts of the country.  Rainfall has drastically come down during the last two years leading to severe drought in many parts of the country.  In Tamil Nadu, Hon’ble Chief Minister is making every possible effort to solve the Cauvery River water issue. But the Union Government has not co-operated with the Government of Tamil Nadu in this regard.  Hon’ble Chief Minister of Tamil Nadu had sought the intervention of Hon’ble Supreme Court of India and hence provided a solution to the Cauvery river issue.  Since the Karnataka Government has refused to release water in Cauvery, the yield of crops is very much affected in the state of Tamil Nadu.  Because, the Governemnt of Tamil Nadu has ordered for giving a compensation of Rs.15,000/- per acre to each of the affected farmers. Also Hon’ble Chief Minister of Tamil Nadu has ordered to increase the work days under the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme (MGNREGA) from 100 days to 150 days in order to help the daily wagers involved in agricultural activities.  The interests of the farmers especially of the Delta region is thereby protected by the State Government.  I urge upon the Union Government to take necessary action in this regard to release necessary funds to Tamil Nadu, so as to help the Hon’ble Chief Minister of Tamil Nadu who is taking appropriate measures for protecting the lives of farmers.
               
श्री अजय कुमार (जमशेदपुर):सभापति महोदय, बहुत साल पहले मैं जब एसपी था, तब मैं अपने क्षेत्र में घूम रहा था। बैरागोड़ा वहां एक छोटा-सा ब्लाक है। वहां एक चीज स्पष्ट थी कि रोड के दाहिनी तरफ के गांवों में कहीं भी गरीबी नहीं थी और रोड के बायें तरफ के गांवों में गरीबी थी। मुझे यह बात समझ नहीं आई, तब मैंने वहां पदाधिकारी से इस बारे में पूछा। ब्लाक आफिसर ने बताया कि जिस गांव में खेती के लिए बारह महीने पानी रहता है, वहां कभी भी गरीबी नहीं रहती है। खास कर झारखंड में जहां 90 प्रतिशत उत्पाद बारिश पर निर्भर है। भारत में सत्तर प्रतिशत के आस-पास रेनफेड खेती होती है, इसके बावजूद हम हर साल सूखे के  बारे में चर्चा करते हैं। मैं यह अनुरोध जरूर करूंगा कि हम अध्ययन शुरू करें कि गांवों में जो पुराने तालाब हैं, अगर उनको सही कर दें, तो समस्या से काफी हद तक निजात पाई जा सकती है। कृषि विभाग लघु सिंचाई विभाग से बात नहीं करता है और लघु सिंचाई विभाग ग्रामीण विकास विभाग से बात नहीं करता है। जब एग्रीकल्चर के बारे में हम बात करते हैं, तो केवल रिलीफ के बारे में बात करते हैं, लेकिन कोई कप्रिहेंसिव सोल्यूशन के बारे में चर्चा नहीं करते हैं। जैसे मंत्री महोदय के क्षेत्र बारामती में भी पानी की कोई समस्या नहीं है। अगर एक अध्ययन इंटर मिनिस्ट्री हो, तो कम से कम पूरे भारत में जो पुराने तालाब हैं, उन्हें नरेगा या किसी अन्य योजना के माध्यम से ठीक कर दिया जाए, तो इससे गांवों में पानी की समस्या समाप्त हो सकती है। सूखे को हम लोग कृषि विभाग की समस्या के रूप में लेते हैं, लेकिन आकाल कृषि विभाग की समस्या नहीं है। हमें लघु सिंचाई विभाग और ग्रामीण विकास मंत्रालय के साथ मिलकर इस समस्या का समाधान करना पड़ेगा।
          दूसरी बड़ी बात यह है कि जब हम इतने सालों से चर्चा कर रहे हैं, तो हम किसानों के लिए एक बीमा योजना शुरू कर दें, जो सरकार के लिए महंगी भी नहीं पड़ेगी और किसानों के लिए हर साल जो रिलीफ आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है, तो इसकी भी जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारे सभी सदस्य इस बात से सहमत होंगे कि जहां भी मनरेगा का काम हुआ है, जहां भी डिगिंग हुई है वह नॉन साइंटीफिक रूप में हुई है। कहीं भी किसी को भी काम में लगा दिया गया है। यदि हम लोग पूरे भारत में जिला वाइस यह सुनिश्चित कर लें कि पूरे भारत में कौन-कौन से तालाब पर मनरेगा का काम होगा, तो मनरेगा का पैसा सही जगह खर्च हो सकेगा। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से अनुरोध करता हूं कि इस बारे में ध्यान दिया जाए। मेरे पूर्ववक्ताओं ने भी कहा है कि एग्रीकल्चर एक महत्वपूर्ण विभाग है, तो जैसे रेल बजट पर चर्चा होती है, उसी तरह से जब 70 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर है इसलिए कृषि विभाग के बजट की चर्चा भी अलग से होनी चाहिए। हम रेल को इतना महत्वपूर्ण दर्जा देते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि इसी तरह से बजट में कृषि को भी अलग से दर्जा देंगे, तो इसका फोकस उचित ढंग से आएगा।
 
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Now, nothing will go on record. Please sit down now.
(Interruptions) …*     *SHRI M. ANANDAN (VILUPPURAM):  I would like to express my views with regard to the drought situation, and the disastrous effects of other calamities such as flood and cyclone that are common in our country. Due to the calamities such as drought, flood and cyclone, production of foodgrains has been affected to a great extent.  As a result, farmers are severely affected.  It is a fact that the Union Government did not take proper relief measures on time even though some states are facing fiscal deficit.  I would like to request that the Union Government should take due relief measures at proper time without fear or favour to the states affected by natural calamities.  The Union Government should give up step motherly attitude towards Tamil Nadu.
          Whenever a natural calamity has struck Tamil Nadu, Hon’ble Chief Minister of Tamil Nadu Dr. Puratchithalaivi Amma demanded financial assistance from the Centre.  But the Union Government did not pay heed to her demands.  In such cases, she has taken expeditious relief measures, with the help of the financial resources of the State alone.  The Union Government adopts the step motherly attitude in providing financial assistance to the State of Tamil Nadu.  However, it is unfortunate that we have got such a Union Government as do not give any kind of assistance during the occurrence of natural calamities. Today, they mention about Rs. 3,000 crore.  Are they not aware that the supply of kerosene to Tamil Nadu is reduced.  They are also meeting the people at the time of elections.  We are also meeting the people.
          Last year, a cyclone called “Thane” affected the districts of Villupuram and Cuddalore in Tamil Nadu. People were severely affected. They expressed their grievances to us.  There was huge material loss.  Many banana plantations were destroyed.  A large number of jackfruit trees and cashew trees had fallen.  Even then, our Chief Minister visited the affected region immediately and provided relief to the victims.  She took measures on war footing because of which normalcy could be restored in the affected region within a week.  She protected the people by spending more than Rs.5,000 crore on relief measures.  She helped them with a motherly attitude by providing them food and shelter. Rs.1000 crore was allocated for building one lakh houses, each at the estimated cost of Rs. one lakh for those people who had lost their houses.  People who had lost their cashew and jackfruit trees were given hundreds of free seedlings of cashew and jack fruit to replenish them.  All these measures were done with the financial resources of the State Government only.  No relief was given by the Union Government. 
          Our Hon’ble Chief Minister Dr. Puratchithalaivi Amma has taken the following measures for mitigating the sufferings of the poor and the downtrodden.  Action has been taken to provide other employment opportunities at an estimated cost of Rs.1336 crore.  Due to such employment opportunities, agricultural labourers in Cauvery Delta Region will receive earnings to the extent of Rs.1517 crore.
          Drought has caused scarcity of cattle fodder.  To solve the problem, many schemes have been planned at an estimated cost of Rs.47 crore and 35 lakhs.  There were separate schemes for enhancing the availability of various kinds of fodders such as green fodder at an estimated cost of Rs.5 crore, dense fodder at an estimated cost of Rs.15 crore, and dry fodder at an estimated cost of Rs.15 crore. Rs.12 crore and 35 lakhs was allocated for in-water fisheries in farms. All these were done through the Department of Animal Husbandry, Dairying and Fisheries.
          Our Chief Minister has made so many efforts to solve the Cauvery issue which has not been resolved for many years.  The Centre did not come forward to solve the issue.  Our State Government had struggled.  We went upto the Supreme Court to establish our rights.  The final award of Cauvery Water Disputes Tribunal was notified.  This is a remarkable achievement of our revered Chief Minister.  She has made this effort to mitigate the sufferings of farmers.  She is appreciated as “Mother Cauvery” by all.  Now, Tamil Nadu is under a Golden Rule.
          The State Government of Karnataka has refused to provide Cauvery Water to Tamil Nadu.  Therefore, many districts of Cauvery Delta have been affected by drought.  The State Government has given Rs.15,000 per acre as compensation to the drought-hit farmers.  Our Chief Minister has made so many efforts on her own.  Others are indulging in mere rhetoric.
          Electricity from the Central Grid, sufficient kerosene for the public distribution system, proper financial assistance are the demands our Hon’ble Chief Minister had put forward. All these demands were made for the welfare of the people of Tamil Nadu.  Sir, I would like to request the Union Government through this House that the Union Government should give up its step motherly attitude towards Tamil Nadu. The Union Government should fulfill the demands raised by our Hon’ble Chief Minister of Tamil Nadu Dr. Puratchithalaivi Amma.  With these words, I conclude.
                     
ओश्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): मैं 193 के तहत ओलावृष्टि व सूखे की स्थिति पर चर्चा के बिन्दु ले करना चाहता हूं ः-
                    मेरे बीकानेर संसदीय क्षेत्र में ओलावृष्टि से फसलों को बहुत नुकसान हुआ है । राजस्थान के अन्य जिलों में भी नुकसान हुआ है । अतः केन्द्रीय टीम भेजकर नुकसान का आंकलन शीघ्रता से किया जाए ताकि नुकसान से प्रभावित किसानों को तत्काल राहत मिल सके ।
                    सीआरएफ के नॉर्म्स में भी बदलाव/संशोधन करने की आवश्यकता है । किसानों की फसल ओलावृष्टि से नुकसान होने पर सीआरएफ के तहत सहायता देने का मापदंड पुराना हो चुका है । प्रतिवर्ष इसमें संशोधन होना चाहिए व महंगाई के इंडेक्स से मापदंड को जोड़ा जाना चाहिए ।
.                   "नदी जोड़ो अभियान" को सर्वोच्च प्राथमिकता से सरकार को हाथ में लेना चाहिए ताकि सूखे व बाढ़ दोनों से देश के किसानों को राहत मिल सके ।
                    ओलावृष्टि से जो फसलों को नुकसान होता है उसकी भरपाई कृषि बीमा योजना से अविलंब करनी चाहिए । उसमें तकनीकी कमी निकालकर पत्रावली को रद्द करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कृषि मंत्रालय को राज्यों को एडवाइजरी जारी करनी चाहिए । बीमा योजना में तहसील को इकाई मानने की बजाय खेत को इकाई माना जाना चाहिए ताकि वास्तव में किसानों को ओलावृष्टि के समय लाभ प्राप्त हो सके ।
         
* Speech was laid on the Table       ओश्री हरिभाऊ जावले (रावेर): महाराष्ट्र और देश की अन्य विभागों में जो भयावह  अकाल और सुखे की  परिस्थिति निर्मित हुयी है , उसके बारे में मैं अपने विचार  रखना चाहता हूं; महाराष्ट्र में कई जगह असहनीय. परिस्थिति और दूसरी तरफ जहां थोड़े बहुत रब्बी की फसल आयी थी वहां अत्यधिक बारिस और ओले पड़ने की वजह से जलगांव जिले में केले की फसल का अंदाजा 200 करोड़ रू0 का नुकसान  हुआ है ।  केला उत्पादक किसानों के क्रॉप इंसूरेंस में 5 करोड़ का प्रीमियम भरके निभा लिया था उसमें ओले गिरने से हुआ नुकसान  किसानों में नहीं बैठ रहा है, उससे किसानों को इंसूरेंस से भी नुकसान भरपाई नही मिल रही, मैं  सरकार से मांग करता हूँ कि, क्रॉप इंस्यूरेंस के माध्यम से कोई भी नैसर्गिक आपत्ति में नुकसान भरपाई मिलना चाहिए । सब केला उत्पादक किसानों को 50000 रूपया प्रति हेक्टेयर की नुकसान भरपाई और गेहूं और अन्य फसलों को 10000/. नुकसान भरपाई सरकार के माध्यम से मिलना चाहिए ।
          जरूरीधारक कामों के लिये सुरक्षा निधि की उपलब्धता राज्य के लिये करना चाहिये, महाराष्ट्र राज्य की ओर से 8600 करोड़ रूपये का मदद का प्रस्ताव जो केंद्र सरकार को दिया है उसे तुंत मंजूर करना चाहिए और सूखे और  नुकसानग्रस्त किसानों को राहत मिलना चाहिये ।
                         
* Speech was laid on the Table   *श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): वर्तमान समय में भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्षा एक महत्वपूर्ण तत्व है । आज भी देश में सबसे अधिक हिस्सा मानसून से प्रभावित रहता है । भारत में जून से सितम्बर के चार माह में लगभग 80औ वर्षा प्राप्त होती है । लेकिन आजकल मौसम में परिवर्तन होने के कारण फरवरी माह में रिकार्ड बारिश होने के कारण पिछले 100 वर्षों का रिकार्ड टूट गया है । कृषि राज्य का विषय है । इसलिए कृषि के क्षेत्र में किसानों के सूखा एवं बाढ़ अथवा ओलावृष्टि से राज्य सरकार को राहत देने का काम करना होता है । इसके बावजूद भारत सरकार ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर मानसून की कमी से समाधान के लिए 374 जिले योजनाओं को तैयार करने का काम किया है । लेकिन इसका लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा है । जबकि राज्य के सूखा, मानसून में बिचलण, बाढ़ चक्रवात, बेमौसम वर्षा, लू चलना, शीत लहर, पाला, ओलावृष्टि के समाधान के लिए अल्प योजनाओं से फसल पद्धति में परिवर्तन करने की कोई योजना नहीं बनती है । केवल रबी की फसल में परिवर्तन संभव है । इधर अलनिनो का उद्भव विश्व के विभिन्न हिस्सों के साथ भारत और अन्य प्रदेश में मौसम बदलाव एवं परिवर्तन से मध्यवर्ती प्रशांत महासागर में समुद्री जल के असामान्य रूप से गरम होने के कारण अलनिनो के उठने से नाराज होता है । विगत दिनों उत्तर प्रदेश में भी फरवरी के मौसम में अत्यधिक बारीश एवं ओला के कारण फसल का काफी नुकसान हुआ है । भारत सरकार ने किसानों के लिए लघु तथा सीमांत की समस्या को कम करने के लिए कई स्कीम शुरू की है जैसे
          1.       डीजल राज सहायता (सूखा घोषित क्षेत्रों में संरक्षित सिंचाई उपलब्ध कराना)
          2.       बीजों पर राज सहायता में वृद्धि
          3.       आहार तथा चारा संबंधी केन्द्रीय क्षेत्र स्कीम लागू करना
          4.       आयल के आयात शुल्क में छूट
          5.       त्वरित चारा विकास कार्यक्रम (एएफडीपी) को लगा करना           उत्तर प्रदेश में किसानों के फरवरी में फसल के नुकसान की भरपाई के लिए केन्द्रीय सर्वे टीम भेजनी चाहिए और क्षति का आंकलन करके किसानों को फसल का मुआवजा दिना जाना चाहिए ।
     

श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):महोदय, मैं आपका बहुत धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया। भारत देश कच्छ से कामाख्या और कन्याकुमारी से कैलाश तक फैला हुआ है। आजकल हमारे देश की जलवायु में ग्लोबल वार्मिंग के कारण अनेक परिवर्तन आ रहे हैं। कहीं पर सूखा हो जाता है, कहीं पर ओला वृष्टि हो जाती है, कहीं पर अनावृष्टि और कहीं पर अतिवृष्टि हो जाती है। इस तरह से जलवायु में बहुत विसंगतियां पैदा हो गई हैं। इस कारण ही यहां का जनजीवन बड़ा दूभर हो गया है। मैं आपका ध्यान उत्तराखंड की ओर आकर्षित करना चाहता हूं, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर में बादल फटते रहते हैं और सूखा पड़ता रहता है। उत्तराखंड में वर्णाव्रत पर्वत में भीषण आपदा आई। उत्तर काशी में बादल फटा और अभी हाल ही में ऊखीमठ में बहुत भयंकर आपदा आई है। 13 से 16 दिसंबर, 2012 के बीच रुद्रप्रयाग जिले में ऊखीमठ व जखोली तहसील में भारी वर्षा हुई  और बादल फट जाने से बहुत तबाही मची। इसमें 70 लोगों की जानें गई हैं। पब्लिक इफ्रास्ट्रक्चर डैमेज 67 करोड़ रुपए के लगभग हुआ है इस कारण करीब 40 करोड़ रुपए की तत्काल आवश्यकता है। ऊखीमठ में जुआ, किमारा, ब्राह्मणखोली, प्रेमनगर, डंगवारी, मंगोली, चुन्नी, सलामी और दरिया गांव पूरी तरह से प्रभावित हुए हैं, जानमाल का काफी नुकसान हुआ है। लैंड स्लाइड के कारण जखोली तहसील में किरोरामल्ला, तिमली गांव में भारी नुकसान हुआ है और 70 मकान पूरी तरह से ध्वस्त हो गए हैं। रुद्रप्रयाग जिले में ऊखीमठ और जखोली में आपदा से 44 गांव प्रभावित हुए जिनमें 1022 लोगों की जनसंख्या प्रभावित हुई है। यहां 30 हेक्टेयर भूमि और लगभग 25 हेक्टेयर कृषि भूमि का नुकसान हुआ है। 57 पक्के मकान ध्वस्त हो गए हैं, 46 पक्के मकानों में 50 प्रतिशत नुकसान हुआ है, 67 पक्के मकानों में आंशिक नुकसान हुआ है। रेवेन्यु विभाग के अनुसार लगभग 2805 लाख रुपए का नुकसान हुआ है। यहां दस सड़कें टूट गई है, पैदल पुल ध्वस्त हो गए हैं। इस तरह की आपदा उत्तराखंड में आती रहती है।

          महोदय, डाई पोलर रडार से पता चल जाता है कि बादल कहां फट रहा है। इस आपदा के निराकरण के लिए सरकार को चाहिए कि इस प्रकार के एंटीना वाले रडार पहाड़ों पर लगाए जाएं ताकि जहां क्लाउड फार्मेशन हो रहा  है या बादल फटने की संभावना है, ऐसे स्थान को इंगित करके लोगों को सजग किया जा सके। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए यूनिफार्म पालिसी अपनानी होगी, रिहेबिलिटेशन का काम देखना होगा। लोगों को प्रीफ्रेब्रीकेटिड हाउसिस देने होंगे, टैंट से काम नहीं चलने वाला है। आपने देखा ही होगा कि कितनी ठंड पड़ी है। ठंड के कारण लोग टैंट में रहना पंसद नहीं करते हैं क्योंकि उनका जीवन कष्टमय हो जाता है इसलिए प्रीफेब्रीकेटिड हाउस के बारे में सोचना होगा।

          महोदय, जहां सूखा पड़ता है वहां पानी की बहुत समस्या पैदा होती है। कुछ ऐसे गांव हैं जहां सड़कें नहीं बनी हैं, वहां खच्चर से पानी पहुंचाना पड़ता है। उत्तराखंड में कई गांव ऐसे हैं जहां परिवार का एक सदस्य केवल पानी लाने में ही लगा रहता है।  इस तरह से एक बड़ी भीषण आपदा आ जाती है और वहां त्राहिमाम-त्राहिमाम मच जाता है। जहां से गंगा और यमुना का स्रोत है और पूरे देश को हम पानी पिला रहे हैं। जैसे कि कबीर ने कहा था कि पानी में मीन प्यासी, आज उत्तराखंड के लोग प्यासे तरसते रहते हैं। इसके लिए हमें टैंकर लगाने होंगे और पेयजल की एक यूनिफोर्म योजना बनानी होगी, ताकि गांव-गांव तक हम पानी पहुंचा सकें।

          इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि इसके लिए हमें राष्ट्रीय आपदा घोषित करवानी होगी, ताकि इस आपदा का निराकरण हो सके और इसके लिए यूनिफोर्म पॉलिसी बनानी होगी। ताकि गरीब से गरीब आदमी को भी फायदा पहुंचे।

          इसके साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि जो हमारे ग्वाचर, चिनियालीसोल और पिथौरागढ़ के एयरपोर्टस हैं, इनका एक्सटैंशन होना चाहिए। ताकि कभी भी आपदा के समय यदि आप वहां कोई रसद पहुंचा रहे हैं, दवाइयां पहुंचा रहे हैं, भोजन या खाद्य सामग्री ड्रॉप करवाना चाहते हैं तो फिक्स्ड प्लेन उतरने की वहां क्षमता होनी चाहिए। ये एयरपोर्ट्स बहुत छोटे हैं और यहां फिक्स्ड प्लेन्स नहीं उतर सकते हैं। इसलिए मैं यही कहना चाहूंगा कि आजकल बहुत साइंटिफिक तरीके आ गये हैं। हमें देखना होगा कि अगर सूखा पड़ता है तो क्या हम क्लाउड सीडिंग कर सकते हैं। आपने खुद देखा होगा दिल्ली में इस प्रकार का एक वातावरण रहा, बहुत ज्यादा ठंडी रही और लोग हीटर जलाते रहे। अगर यहां क्लाउड सीडिंग हो जाती तो वह वातावरण साफ हो जाता और सूरज की गर्मी चमकने लगती और इतनी बिजली हम खर्च नहीं करते। आज वह साइंटिफिक रिसर्च हो गई हैं कि आप सीवेज वाटर से एक तरफ बिजली बना सकते हैं और दूसरी तरफ ड्रिंकिंग वाटर पैदा कर सकते हैं। सीवेज के जिन प्लान्टस से आप इलैक्ट्रिसिटी और पानी बनायेंगे, यदि ये जगह-जगह लगें तो इनसे ड्रिंकिंग वाटर की प्राब्लम भी सोल्व हो सकती है। हमें आधुनिक तरीके अपनाने होंगे और इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करके पूरी-पूरी मदद करनी होगी, ताकि भारत के आदमी के जीवन की रक्षा हो सके।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस महत्वपूर्ण विषय पर आपने मुझे बोलने का मौका दिया।

 

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर (मुरैना):माननीय सभापति महोदय, आज बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही है। देश का बड़ा हिस्सा सूखे के प्रकोप से प्रभावित है और बड़ा हिस्सा ओलावृष्टि से प्रभावित है। मुझे लगता है कि आजादी के बाद जब से मैंने होश संभाला और अखबार और सार्वजनिक जीवन में आया, तब से मैं लगातार देख रहा हूं कि जब सत्र होते हैं तो एक बार प्राकृतिक आपदा पर इस सर्वोच्च सदन में चर्चा होती है, चर्चा जरूर होती है, चर्चा का उत्तर आता है, लेकिन जो सुधार होना चाहिए, जो समाधान होना चाहिए, उस समाधान की तरफ शायद हम नहीं बढ़ पा रहे हैं। इस बात की चिंता हम लोगों को करनी चाहिए। आज यहां माननीय मुंडे जी, शैलेन्द्र जी आदि सभी लोगों ने सूखे और ओलावृष्टि के मामले को बहुत विस्तारपूर्वक रखा है। महाराष्ट्र में जिस प्रकार से सूखा पड़ रहा है और महाराष्ट्र की बात यहां ज्यादा हुई है, माननीय कृषि मंत्री जी भी महाराष्ट्र के हैं। इतनी भयावह स्थिति होने के बाद भी अभी तक महाराष्ट्र में राहत नहीं पहुंच पाई है, यह निश्चित रूप से अत्यंत चिंताजनक बात है। मैं जहां तक समझता हूं कि हमारे देश में      17.08 hrs. (Shri Satpal Maharaj in the Chair) किसान का जितना महत्व है, जितनी अर्थव्यवस्था किसानी पर आधारित है, जितनी आबादी खेतों में काम करने वाली है, उसके हिसाब से सरकारों का ध्यान किसान की तरफ नहीं है और इसके कारण लगातार किसान घाटे की ओर बढ़ता जा रहा है। आज आप सब लोग महसूस करते होंगे कि जो लोग व्यापार करते हैं, वे अपने बच्चे को व्यापारी बनाना चाहते हैं, जो डाक्टर हैं, वे डाक्टर बनाना चाहते हैं, जो इंजीनियर हैं, वे इंजीनियर बनाना चाहते हैं, लेकिन हिंदुस्तान का कोई भी किसान ऐसा नहीं हैं जो अपनी औलाद को किसान बनाना चाहता हो। आज इस स्थिति की तरफ हम बढ़ रहे हैं। यह निश्चित रूप से हिंदुस्तान के लिए बहुत ही खतरनाक संकेत है, मैं ऐसा मानता हूं। आजादी के 65 वर्षों के बाद किसानी की जितनी उपेक्षा हुई है, इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और कभी नहीं हो सकती। हम प्रति वर्ष देखते हैं कि उत्तर प्रदेश, आसाम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा आदि प्रदेशों के बहुत से हिस्से बाढ़ से डूबते हैं।जब तक वे लोग बाढ़ से निवृत्त होते हैं और दोबारा पुनर्वासित हो पाते हैं, तब तक फिर बाढ़ आ जाती है। प्रति वर्ष डूबते हैं और प्रति वर्ष पुनर्वासित होते हैं, यह सिलसिला पूरे देश में चल रहा है। सूखे से देश के अनेक भाग पीड़ित हो जाते हैं। ओले का तो मालूम ही नहीं है। बेमौसम बरसात हो जाती है। ओलावृष्टि हो जाती है और ओलावृष्टि के कारण जो नुकसान आज हुआ है, वह निश्चित रूप से आम आदमी को परेशान करने वाला और चिंतित करने वाला है।

          माननीय सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूँ, वे स्वयं भी किसान हैं और महाराष्ट्र से देश के बहुत ही अनुभवी नेता हैं। किसान अगर एक बार किसी मामले में घाटा खा गया तो उसकी भरपाई किसी भी सूरत में नहीं होती है। एक व्यापारी अगर व्यापार में घाटा खा जाए, उसके कारखाने को आग लग जाए तो उसकी भरपाई बीमा से हो जाती है, वह दोबारा खड़ा हो सकता है। लेकिन एक बार किसान की फ़सल ओले की चपेट में आ गई, पाले की चपेट में आ गई, बाढ़ की चपेट में आ गई तो उसकी भरपाई, उसकी पूरी जिंदगी में नहीं होती है। जो परिस्थितियां हैं, उन परिस्थितियों में समग्र रूप से विचार करने की आवश्यकता है।        माननीय कृषि मंत्री जी यहां पर बैठे हुए हैं। आप सब इस बात के साक्षी हैं कि जब एनडीए की सरकार थी तो इन सारी विपदाओं से निपटने के लिए माननीय अटल बिहारी वाजपयी जी ने नदी जोड़ो परियोजना तैयार की थी। वह परियोजना लागू होनी थी। मुझे यह कहते हुए गर्व होता है कि उस समय मध्य प्रदेश में हमारी भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह जी मुख्य मंत्री थे। यह अनुबंध हुआ था कि केन और बेतवा दोनों को जोड़ा जाए। मामला आगे बढ़ा था। अगर केन और बेतवा जुड़ जाती तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों प्रांतों के बुंदेलखण्ड में एक तरह से कायाकल्प हो जाता। लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया। मैं कृषि मंत्री जी अनुरोध करना चाहता हूँ, हो सकता है कि नदी जोड़ो योजना आपको बहुत कठिन लगती हो, हो सकता है कि आपको लगता हो कि यह असंभव प्रोजेक्ट है लेकिन मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूँ कि यह असंभव नहीं है। मध्य प्रदेश में भी हम लोगों ने इसका प्रयोग किया है। नर्मदा को शिप्रा से जोड़ने के लिए प्रयोग किया है। माननीय आडवाणी जी उस कार्यक्रम में मौजूद थे। साल भर में हम लोग शिप्रा को नर्मदा से जोड़ देंगे। उससे सिंचाई का बहुत बड़ा रकबा बढ़ेगा। बहुत सारे गांवों को पेयजल मिलेगा। बहुत सारे लोगों के जीवन स्तर में बदलाव आएगा। खेती को फ़ायदा होगा। उत्पादन ज्यादा बढ़ेगा। लेकिन अगर इस दृष्टि से आप समग्रता से विचार नहीं करेंगे तो खेती मुनाफे में नहीं आएगी।

          मनरेगा की बात बहुत चलती है। मनरेगा के कारण लोगों को रोज़गार मिलता है। यह बात अपनी जगह सही है। लेकिन मनरेगा के कारण खेती प्रभावित हो रही है। मनरेगा में काफी खामियां हैं। उसको रिव्यू नहीं किया जा रहा है। मनरेगा को अगर आप कृषि से जोड़ दो तो मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि पूरे देश में खेती का उत्पादन बढ़ जाएगा। पूरे देश में मनरेगा के तहत लोगों को मज़दूरी मिलना सुनिश्चित हो जाएगा। इसी प्रकार से फसल बीमा योजना है। फ़सल बीमा योजना में लाभ किसको मिलता है? ओला पढ़ रहा है, पाला पढ़ रहा है, किसान परेशान है, मर रहे हैं। लेकिन फ़सल बीमा योजना का लाभ किसी को नहीं मिल रहा है। हर किसान पैसा जमा कर रहा है लेकन फ़सल बीमा योजना कहां गायब है? इसका कोई अता-पता नहीं है। मैं आप सब से अनुरोध करना चाहता हूँ कि इस अवसर पर फसल बीमा योजना को रिव्यू करना चाहिए। अगर इसमें सुधार संभव नहीं है, तो इसे समाप्त करना चाहिए। किसान की आमदनी बीमा योजना, माननीय अटल जी की सरकार में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू की गई थी और वह सफल रही थी। फसल आमदनी बीमा लागू करने का प्रयत्न होना चाहिए, तो निश्चित रूप से इस क्षेत्र में हम लोगों को कुछ फायदा होगा। ऐसा मुझे लगता है। आज जब लोग ओले से पीड़ित हैं, पाले से पीड़ित हैं और सूखे से पीड़ित हैं तो ऐसी परिस्थिति में राज्य सरकारों ने अपनी-अपनी दृष्टि से प्रयास किया है। मध्य प्रदेश में हमारे मुख्य मंत्री जी ने किसानों के ऋण की वसूली को स्थगित कर दिया है। बिजली के बिल की वसूली को स्थगित कर दिया है। उन पर जो ब्याज का भार आएगा, उस भार को मध्य प्रदेश सरकार भरेगी। राष्ट्रकृत बैंकों से जिस किसान का ऋण है, क्या उसकी वसूली स्थगित नहीं की जानी चाहिए? क्या उसका ब्याज सरकार को नहीं भरना चाहिए? जो राज्य सरकारें अपने-अपने बजट प्रावधान के अनुसार किसान को राहत राशि उपलब्ध करा रही हैं, क्या उसमें केंद्र सरकार को अपना सहकार नहीं करना चाहिए।   केंद्र सरकार के सामने यह नौबत क्यों आती है कि सूखा पड़ रहा है तो लोक सभा में लोग आवाज उठा रहे हैं, मुख्यमंत्री वहां से चलकर दिल्ली में आ रहे हैं, प्रधानमंत्री जी से अनुरोध कर रहे हैं, आंदोलन हो रहे हैं।  अगर प्राकृतिक आपदा आयी है, यह हमारे वश में भी नहीं है, आपके वश में भी नहीं है, प्राकृतिक आपदा है, तो स्वाभाविक रूप से केंद्र सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए। केंद्र सरकार को एक अध्ययन दल भेजना चाहिए।  मांग करें, क्या तभी अध्ययन दल जाएगा, मांग करें, तभी राहत मिलेगी क्या? मुझे लगता है कि इस दिशा में सुधार होना चाहिए।  

          महोदय, मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से यह भी अनुरोध करना चाहता हूं कि जो बाबा आदम के जमाने के राहत प्रदान करने के नार्म्स बने हुए हैं, अगर वे बदले नहीं जाएंगे तो आम आदमी को राहत नहीं मिल पाएगी। मैं इसका साक्षी हूं। हम लोग मध्य प्रदेश में सरकार में थे। वर्ष 2003 से पहले एक हैक्टेअर की प्राकृतिक आपदा में किसान को एक हजार रूपए राहत राशि मिलती थी। हमने इसे बढ़ाकर एक हजार से दस हजार रूपए किया। दस हजार रूपए भी देना मुश्किल होता है, लेकिन दस हजार में भी उसका गुजारा नहीं होता है। दस हजार को हम मुआवजा भी नहीं कह सकते हैं, दस हजार को हम भरपाई भी नहीं कह सकते हैं। हम इसे सिर्फ राहत राशि ही कह सकते हैं। अगर आप इन नार्म्स को नहीं बदलेंगे, तो निश्चित रूप से मुझे लगता है कि किसान का भला हम नहीं कर पाएंगे।

          महोदय, मैं एक-दो मिनट में मध्य प्रदेश की बात आपके समक्ष रखना चाहता हूं। मध्य प्रदेश की आप हालत देखें, जनवरी माह में पूरा पाला पड़ा। 20 जिले प्रभावित हुए, 66 तहसीलें प्रभावित हुयीं, 61 हजार गांव प्रभावित हुए, 1,77,582 हैक्टेअर भूमि पर जो फसल खड़ी थी, वह पाले से प्रभावित हुयी।  अनुमानित मूल्यांकन जो किया गया, वह 28,411.52 लाख का किया गया। 5,582 लाख रूपए मध्य प्रदेश की सरकार ने अपने मद से किसानों को वितरित कर दिया, लेकिन आज भी उससे किसान की माली हालत सुधरी नहीं है। यह जनवरी माह में हुआ। पूरी जनवरी बीती और फरवरी आ गयी, 4 फरवरी, 11 फरवरी, 14 फरवरी, 15 फरवरी, 16 फरवरी, 17 फरवरी और 23 फरवरी को पूरे दिन ओलवृष्टि होती रही।  मध्य प्रदेश में 50 रेवेन्यू के जिले हैं और इन 50 जिलों में से 35 जिले प्रभावित हैं। 105 तहसीलें प्रभावित हैं। 3,663 गांव प्रभावित हैं, तीन लाख चौबीस हजार आठ सौ चौवालीस हैक्टेअर भूमि में जो फसल खड़ी थी, वह पूरी तरह बर्बाद हो गयी। अनुमानित मूल्यांकन किया गया, 887 करोड़ रूपए हुआ, 106 करोड़ रूपए कि प्राथमिक किस्त जारी कर दी गयी। आज चाहे वह बुन्देलखण्ड का टीकमगढ़, छत्तरपुर, पन्ना हो, चाहे वह भोपाल के विदिशा, रायसेन, राजगढ़ और होशंगाबाद जिले हों, जबलपुर का नरसिंहापुरा, जबलपुर हो, ग्वालियर-चम्बल संभाग में मुरैना, भिंड और शिवपुर हो, पूरे मध्य प्रदेश में किसान एक तौर से तबाह हो गये हैं। फसल नष्ट हो गयी है, पशु मर गये हैं, गरीब आदमियों के जो कच्चे मकान थे, वे गिर गये हैं, जो पक्के थे, उनको भी क्षति पहुंची है। अगर इस प्रकार से हम खेती को, किसानी को और गांव के व्यक्ति को अनदेखा करेंगे तो मैं समझता हूं कि हमारे पूर्वजों ने जिस महान उद्देश्य को लेकर अपना बलिदान देकर इस भारत को आजाद कराया था, हम उनके स्वप्न को कभी पूरा नहीं कर पायेंगे।

          महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री जी से यह अनुरोध करना चाहता हूं कि वे व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर विचार करें और खेती के मामले को लेकर, किसान के मामले को लेकर एक पूरे दिन की चर्चा सदन में करायें। हर बार चर्चा करके और चर्चा का अंत कर देना, मैं समझता हूं कि यह किसान के साथ न्याय नहीं है, केन्द्र सरकार के द्वारा किया गया किसान के साथ अपमान है। इससे हर साल किसान अपमानित होता है। इस मामले में गंभीरता से केन्द्र सरकार विचार करे, मैं यही प्रार्थना करना चाहता हूं।

           

ओश्री ए.टी. नाना पाटील (जलगांव):मैं  देश के विभिन्न भागों में विशेषकर महाराष्ट्र में सूखे और ओलावृष्टि के कारण उत्पन्न स्थिति पर अपने विचार रखता हूं।

          आज देश में लगभग 5 राज्यों की जनता सूखे से ग्रस्त है, विशेषकर महाराष्ट्र की जनता । आज महाराष्ट्र के कई जिलों की जनता को पीने का पानी तक नहीं मिल पा रहा है । मैं जानना चाहता हूं कि सरकार से, कि इस गंभीर विषय को देखते हुए सरकार क्या कर रही है । आज तक केन्द्र सरकार ने इस गंभीर सूखे का निरीक्षण करने के लिए जांच दल तक नहीं भेजा है । अभी फरवरी माह चल रहा है । अभी तो गर्मी चालू ही नहीं हई है । ऐसा चला तो गंभीर गर्मी में क्या हाल होगा। आम आदमियों को पीने के पानी के लिए । जैसे कुछ कहावतों में कहा है पानी के लिए जानें भी जा सकती है । मुझे यह लगता है यह स्थिति अभी बनी है ।

          जैसे सरकार द्वारा गठित समिति ने खुलासा किया है कि महाराष्ट्र में लगभग साढ़े पांच लाख बच्चे अति कुपोषित पाए गए हैं । यही नहीं, अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में बच्चों में कुपोषण का प्रमाण सबसे ज्यादा है । देश के लगभग 60 फीसदी कुपोषित बच्चे महाराष्ट्र में है । जैसे रिपोर्ट में बताया है कि राज्य में लगभग एक लाख 25 हजार 182 बच्चों की मौत कुपोषण से हुई है अर्थात हर साल लगभग 25 हजार बच्चों की मौत कुपोषण से हो रही है । यह स्थिति आज है तो अभी इस गंभीर सूखे के बाद क्या होने वाला है । इसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते ।

          इस प्राकृतिक आपदा के बाद अब केन्द्र सरकार एक आफत खड़ा कर रही है । वर्ष 2008 के कर्ज माफ किया था किसानों का । पर अभी इस कर्ज माफी का घोटाला सामने आ गया है और सरकार इस कर्ज माफी को वसूल करने के लिए नोटिस भेज रही है । ऐसी स्थिति में क्या होगा इस आम जनता  को    यह बताएं ।

          आज की स्थिति को देखते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे 1972 में दुक्षकाल की स्थिति से आज की स्थिति भयावह है । आज राज्य सरकार कहती है कि हमने केन्द्र सरकार को सूखे से निपटने के लिए सहायता मांगी है और केन्द्र सरकार के कृषि मंत्री कहते हैं कि हमें राज्य सरकार से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है । इस राज्य-केन्द्र के चक्कर में महाराष्ट्र की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है ।

   

* Speech was laid on the Table           जनता पीने के पानी की किल्लत से मर रही है और किसान लोग अपने जानवरों को बेच रहे हैं या कतर खाने बेच रहे हैं । ऐसी नैसर्गिक आपत्ति से निपटने के लिए या आगे ऐसी स्थिति न आए इसके लिए क्या कार्य योजना बना रही है । जैसे माननीय अटल बिहारी जी के काल में जो नदी जोड़ो योजना चलाई थी उसे राजनैतिक कारण से यूपीए सरकार ने बंद कर ऐसी स्थिति से निपटने का दरवाजा भी बंद कर बैठी है । मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि सरकार नदी जोड़ो योजना को शुरू करे और अभी तत्काल महाराष्ट्र को और देश की जनता को राहत देने के लिए सहायता करे ।

           मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने देश में सूखे पर चर्चा को गोपीनाथ जी मुंडे साहब ने 193 के तहत चर्चा की अनुमति दी है ।

           महाराष्ट्र में मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र, विदर्भ और पश्चिम महाराष्ट्र में बुरी तरह से सूखा पड़ा है । जो आज तक महाराष्ट्र के 1972 का अकाल पड़ा था । वो सबसे बड़ा अकाल था । मगर उपाध्यक्ष महोदय, उससे भी बहुत ही भयावह ऐसा अकाल ये आज का अकाल है । 1972 में खाने के लिए अनाज नहीं मिलता था । उस समय सरकार ने बाहर से अनाज आयात करके राहत दिखाई थी । मगर आज खाने के लिए अनाज आज हमारे पास देश के अंदर उपलब्ध है । मगर आदमी और जानवर को जिनके लिए पानी नहीं है और पानी की आपूर्ति पूरी नहीं कर सकते हैं ।

           आज हमारे महाराष्ट्र के अंदर सूखे पर राहत देने के लिए न राज्य सरकार पूरी नहीं कर पा रही है । आज राज्य की अवस्था गंभीर है । इसके लिए मैं भारत सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि नैसर्गिक आपदा में केन्द्र सरकार पूरी तरह से राज्य सरकार के माध्यम से अभाव ग्रस्त क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा राशि देकर राहत दे ।

          आज महाराष्ट्र की जनता स्थानांतरित हो रही हैं । देहात की जनता अपने रोजगार के लिए शहर में स्थानांतरित हो रही है । मगर राज्य सकरार इनके लिए कुछ भी रोजगार की सुविधाएं उपलब्ध नहीं कर पा रही है । मैं जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूं उस क्षेत्र में आज पूरे जिले में अभाव ग्रस्त है ।

     

ओडॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी (अहमदाबाद पश्चिम):  देश के कई भाग में भीषण सूखे की स्थिति पैदा हुई है और बारिश  और अन्य कुदरती आपदा से किसानों और अन्य लोगों की स्थिति विषम हुई है ।  देश के महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी और अन्य प्रदेशों में सूखे की स्थिति बनी हुई है ।   इनमें सबसे ज्यादा किसान और गरीब लोग प्रभावित होते है ।  महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश एवं देश के कई प्रदेशों में किसानों ने आत्महत्या कि है मगर उन पर कोई ठोस कार्यवाही नही हुई है । मेरी  मांग है कि सूखा, बाढ़ और अन्य कुदरती आपदाओं के बारे में एक नीति बनानी चाहिए । किसानों के ऋण माफ करना चाहिए और उनके बच्चे की शिक्षा का खास ध्यान रखना चाहिए ।  अनूसूचित जाति एवं जनजाति के किसानों के लिए खास प्रबंधन होना चाहिए ।

          एनडीए के शासन में नदियों को जोड़ने की बात कही गई थी मगर इस सरकार ने उसको ठंडे बस्ते में रख दिया है ।  मेरी ो मांग है कि गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना की आखिरी सिंचाई बढ़ाने का जल्द ही निर्णय लेना चाहिए, ताकि किसानों को पर्याप्त पानी और बिजली मिल सके ।

          गुजरात में सूखे की स्थिति हुई जब केंद्र के अन्य मंत्री गुजरात आये थे और राज्य सरकार से सूखे से निपटने के लिए पैकेज की मांग की थी और मंत्री जी ने उसे मान्य भी रखा था, मगर गुजरात को अब तक वो राशि नहीं मिली है ।  मेरी मांग है कि इसका निर्णय त्वरित लिया जाए।

                     

* Speech was laid on the Table   श्री रमेश राठौर (आदिलाबाद):महोदय, आध्र प्रदेश में सूखा और भारी वर्षा के कारण किसानों की बहुत फसल नष्ट हुई है और नुकसान हुआ है। अभी हाल में अकाल वर्षा के कारण 17 लोग मर चुके हैं और 52 हजार एकड़ खेती प्राकृतिक आपदा से नष्ट हुई है करीमनगर, निज़ामाबाद, आदिलाबाद, मेडक, खम्मम, रंगारेड्डी, महबूबनगर, कृष्णा और वारंगल ज़िलों में तबाही हुई है। इसी तरह से आंध्र प्रदेश में एक तरफ भारी वर्षा होती है और दूसरी तरफ सूखाग्रस्त क्षेत्र होने के कारण वहां भारी नुकसान होता है। यूपीए सरकार के पिछले आठ साल के कार्यकाल में वहाँ 14 बार विपदा आई तो राज्य सरकार ने 50 हज़ार करोड़ रुपये की सहायता मांगी थी, लेकिन केन्द्र सरकार ने अभी तक 3000 करोड़ रुपये ही दिये। मतलब 6 प्रतिशत अभी तक दिया गया और  इस तरह छोटी दृष्टि दिखाई जा रही है। हूडा कमेटी की सिफारिश है कि सूखे के कारण हुए नुकसान के लिए प्रति हैक्टेयर 25 हज़ार रुपये दिए जाएँ लेकिन सिर्फ 10 हज़ार रुपये दिये जा रहे हैं। इस तरह हमारे प्रदेश में अभी तक 400 मंडलों में भारी वर्षा के कारण यह नुकसान हुआ है और 274 मंडलों में सूखे के कारण ड्राउट डिक्लेयर किया गया। अभी तक एक रुपया भी केन्द्र सरकार या राज्य सरकार से किसानों को नहीं मिला। 2009 में कृष्णा नदी में बाढ़ आने की वजह से वहाँ पर 4000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहाँ स्वयं प्रधान मंत्री ने आकर 1000 करोड़ रुपये की सहायता करने की घोषणा की लेकिन 2009 से आज तक 400 करोड़ रुपये भी केन्द्र की तरफ से नहीं आए। स्वयं प्रधान मंत्री की घोषणा के बाद भी वहाँ जो सूखे के लिए सहायता राशि आनी थी, वह नहीं आई। उसके साथ अभी देश भर में 400 जिले ड्राउट डिक्लेयर किया गया तो उसमें 1750 करोड़ रुपये का पैकेज भी केन्द्र सरकार ने दिया। लेकिन हमारे प्रदेश में एक जिला भी सूखाग्रस्त डिक्लेयर नहीं किया गया और एक रुपये भी केन्द्र से सहायता नहीं आई।

          इसके साथ हमारे यहाँ खरीफ़ और रबी में 1 करोड़ 20 लाख किसानों का बीमा होने के बाद भी 26 लाख तक ही बीमा इंप्लीमैंट हुआ है, और पूरी तरह से किसानों को वह नहीं मिल पा रहा है। 31 अक्तूबर, 2012 से नवंबर 6 तक नीलम तूफान के कारण 19 ज़िलों में 65 लोग मर चुके हैं और 14 ज़िलों में बरबादी हुई। दिसंबर अंत में केन्द्र की टीम वहाँ आई। वहाँ 3000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन अभी तक हमारे प्रदेश को एक रुपये भी केन्द्र से नहीं मिल पा रहे हैं। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ, मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहता हूँ कि खेती में जो खर्च हो रहा है, वह 300 फीसदी बढ़ गया लेकिन मदद नहीं बढ़ी। डीएपी 400 रुपये था तो 1300 रुपये हो गया, यूरिया 150 रुपये था तो 350 रुपये हो गया। इस तरह सारी चीज़ें बढ़ गईं। पैट्रोल 28 बार बढ़ गया, डीज़ल 19 बार बढ़ गया। 12 बार खाद के भाव बढ़े, लेकिन मदद प्राइस सिर्फ बीस फीसदी बढ़ा। केन्द्र सरकार किसानों के साथ किस तरह का रवैया अपना रही है, इस पर ध्यान देना चाहिए। हमारे प्रदेश में खासकर किसानों की मदद के लिए जो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लगाया, वे 100 करोड़ रुपये खा गए लेकिन किसानों को कुछ नहीं मिला। दो साल पहले हुए नुकसान का मुआवज़ा भी अभी तक नहीं मिल पा रहा है। जो बात थी कि जल एकत्रित करके खेती के लिए इर्रीगेशन की सुविधा देंगे, वह धन एकत्रित करने का साधन हो गया और 80 हज़ार करोड़ रुपये खर्च करके 80 एकड़ में भी पानी नहीं मिल पा रहा है। इस तरह दिन में करंट नहीं रहने से और केवल रात में बिजली रहने से, रात में करंट-शॉक लगने से और साँप के काटने से 4000 किसान भी मर गए।  लेकिन अभी तक उनको राहत नहीं मिली है। सूखा और बाढ़ की वजह से पिछले आठ साल में 22 हजार किसानों ने आत्महत्या की है, लेकिन अभी तक चार हजार को भी सहायता नहीं दी गयी है।

          महोदय, इसके अलावा मैं आपके सामने एक बात और लाना चाहता हूं कि सरकार ने गरीबों की हालत सुधारने के लिए नरेगा योजना चलायी है। दो-तीन बार मैंने विज़िट किया और अधिकारियों से पूछा कि नरेगा का काम कहां चल रहा है? उन्होंने कहा कि पिछले साल हमने यह गड्ढा खोदा था और इस साल इसकी मिट्टी निकाल कर इसमें डाल रहे हैं। करोड़ों रुपये इस योजना पर खर्च हो रहे हैं, लेकिन कोई काम इससे नहीं हो रहा है। खास तौर से आंध्र प्रदेश के बारे में मैं आपको बताना चाहता हूं कि नरेगा में हजारों-करोड़ रुपये सैंक्शन होते हैं, लेकिन नार्म्स चेंज करने की वजह से वह लैप्स हो जाते हैं। अब तो मिट्टी भी नहीं खोदी जा रही है। यदि नरेगा को किसानों से जोड़ दिया जाए तो इससे किसानों का उत्पादन बढ़ेगा और किसान ज्यादा कमा पाएगा।

          इसी के साथ पीने के पानी का सवाल है। सरकार ने डेढ़ सौ फीट पर बोरिंग की हुई है, लेकिन वॉटर तीन सौ फीट पर मिलता है। इसलिए लोगों को पानी नहीं मिल रहा है। सरकार ने पानी की जो ट्रंसपोर्टिंग की है, वह जून में मिलता है, तब तक किसी को पानी नहीं मिलता है। इसके अलावा बिजली न होने से भी लोगों को पानी नहीं मिल पा रहा है।

          मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि वह काश्तकारों का  पूरा कर्ज माफ़ करे। मैं मंत्री जी से निवेदन करता हूं कि वह किसानों की हालत पर ध्यान दें। मैं मंत्री जी से एक और रिक्वैस्ट करना चाहता हूं कि आप जितना प्रेम महाराष्ट्र से करते हैं, उतना ही प्रेम हमारे राज्य से करते हुए उनके दुख में उनकी सहायता करेंगे, यही मैं निवेदन करता हूं।

     

*श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़)  देश में सूखा एवं ओलावृष्टि से उत्पन्न स्थिति के बारे में चर्चा हो रही है। महाराष्ट्र, राजस्थान के अनेक भागों में जहां सूखा पड़ा है, किसान आर्थिक रूप से टूट गया है।  पीने के पानी का गंभीर संकट अभी से पैदा हो गया है। वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के कई जिलों में फरवरी माह में हुई आकस्मिक ओला वृष्टि एवं वर्षा से खेतों में खड़ी तैयार गेहू ,  चना, सरसों की फसल पूर तरह नष्ट हो गई। केवल इतना ही नहीं ओला वृष्टि इतनी गतिशीलता एवं भयानक रूप में हुई कि फसल के साथ बहुत बड़ी संख्या में वृक्ष भी उखड़कर गिर गये। कुछ वृक्षों पर एक भी पत्ता नहीं बचा तथा पेड़ों पर बैठे मिट्ठू एवं अन्य पक्षी हजारों की संख्या में ओलों की मार से गिर कर मर गये।

          मेरे संसदीय क्षेत्र के टीकमगढ़ एंव छतरपुर जिलों के 100 से ऊपर गांवों के हजारों किसान प्रभावित होकर आर्थिक रूप से टूट गये। मैं इस संबंध में मध्य प्रदेश सरकार का धन्यवाद करना चाहता हूं जहां के संवेदनशील मुख्यमंत्री जी ने ओला प्रभावित गांवों के किसानों का दर्द अनुभव करते हुए न केवल गांवों का भ्रमण कर स्थिति का जायजा लिया बल्कि सर्वे के आदेश जारी कर एक सप्ताह के अंदर ही किसानों को राहत राशि का भुगतान कराने की भी व्यवस्था कर दी। जहां प्रदेश ने तत्काल राहत राशि की व्यवस्था करना प्रारंभ किया  वहीं केन्द्र सरकार द्वारा न तो पिछले वर्ष पाला प्रभावित मध्य प्रदेश के किसानों को किसी तरह की सहायता दी गई न ही ओलावृष्टि से पीड़ित किसानों को मदद देने की इस वर्ष भी कोई पहल हुई है।

          बुंदेलखंड के टीकमगढ़ , छतरपुर, पन्ना आदि  जिले पूर्व में सूखे की स्थिति का सामना करते रहे, परेशान रहे हैं, वहीं इस वर्ष ओला वृष्टि से टूट गये हैं। बीज खरीदा, खाद खरीदा, बिजली का पैसा भरा। ट्रैक्टर चलाया, फसल खराब हो जाने से कर्ज में फंस गया है। सूखा एवं ओला वृष्टि प्राकृतिक आपदा है। अतः केन्द्र सरकार को संकट के इन क्षणों में मध्य प्रदेश राजस्थान महाराष्ट्र के किसानों की आर्थिक मदद करने, उनका बैंक ऋण माफ करवाने तथा बिजली के बिलों को माफ करवाने, राज्य सरकारों की मदद करने की तत्परता से पहल करनी चाहिए।

          मध्य प्रदेश की केन बेतवा नदियों को जोड़ने का कार्य नदियों को आपस में जोड़ने की योजना के अंतर्गत शामिल किया गया था। कोर्ट के आदेश के बाद भी केन बेतवा नदियों को जोड़ने की योजना अभी तक प्रारंभ नहीं की गई। इस संबंध में शीघ्र शुरूआत की जानी चाहिए। इससे मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ , छतरपुर , पन्ना के साथ ही उत्तर प्रदेश के कई जिले सूखे की समस्या से निजात पा सकेंगे तथा बुंदेलखंड में समृद्धि के द्वार खुलेंगे।

SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Thank you Chairman Sir. At the very outset, I must thank hon. Members Shri Virendra Kumar and Shri Gopinath Munde for raising the matter and also thank the Chair for taking this matter for discussion. Though we are taking this matter for discussion at the end of winter season and just beginning of the spring, even then this matter is very relevant and very important.

          Sir, though it is said that 60 per cent of farm land or agricultural land are mainly rainfed but in reality, 80 per cent of the farm lands depends on the monsoon rainfall. It is needless to say that the monsoon is erratic.  So large parts of agriculture farms receive deficient rainfall.

          Hon. Agriculture Minister Sharad Ji has stated earlier in this House that Maharashtra, Gujarat, Rajasthan and parts of Karnataka suffer from drought situation.  Two years back, our country has witnessed the drought situation in most of the States and due to the drought situation, this crop year has also suffered.  According to the statement made by the Minister, our agricultural production has reduced from 260 million tonnes to 250 million tonnes.  This year, we have 10 million tonnes less production.  The impact is not only in agricultural production. Several Members have mentioned its impact, mainly the farmers’ hardship and their livelihood.  This impact is visible not only in kharif season but also in Rabi season.  The ground water recedes all round the year. It is already mentioned by several Members.

          What are the causes of drought?  This is not the matter which needs to be discussed here. That can be taken up in a special discussion on another day. We are not controlling the climate. We are not dictating the climate and not dictating the monsoon.  So, the vagary of nature is there.

          Let me first come to the Meteorological Department.     

   

Every monsoon season, they are creating confusion amongst the farmers. Generally it is stated by the Meteorological Department that rainfall deficit is a matter of concern. But the situation like this does not account for creating panic. The point is that key agricultural months are July and August. It needs 70 per cent of rainfall of the total monsoon. If there is a deficit during these months, the cultivation, particularly cultivation of paddy, cultivation of wheat and other cereals and even the cultivation of oilseeds, cultivation of sugarcane gets suffered. So, monsoon requires timely rain. It does not happen. Sometimes monsoon comes later; sometimes it picks up at a later time and makes up for the deficit. That does not serve the purpose. That does not help the farmers for their cultivation in proper time. So, what would be our task? We know what the situation of the reservoir is. We know what the situation of barrage is. All these things have been said by many Members. The purpose of the reservoir has already been felt. The Government has to relook at this and all the aspects of reservoir should be restructured.

          What should be done first? This should not be addressed in a casual manner. The Government should constitute a Group of Ministers for this aspect. This is not the responsibility of the Agriculture Department only to address the situation. Other departments are also very much linked. So, the Group of Ministers should be constituted in this regard. Augmentation of the irrigation is a must. But what is the progress? The progress is not at all encouraging. What happened to the Accelerated Irrigation Development Programme (AIDP)? So, augmentation of irrigation is a must not only for providing irrigation during the Kharif season but even for the Rabi season and also for recharging the ground water.

          The second aspect is about the insurance coverage. A village should be the unit in so far as crop insurance is concerned. About the debt waiver scheme, the Government earlier announced the waiver of debt to the extent of Rs.70,000 crore. That did not check the trend of committing suicides. The hon. Minister is well aware of this matter. He is better informed about this matter particularly in his State of Maharashtra. This is not the only way of debt waiving. Fresh credit with zero per cent interest is a must. This should be particularly so for the area affected with drought.

          Another component for agriculture should be provided at cheap rate for giving the subsidies and all these things. We are talking about the Mahatama Gandhi NREGA. Emphasis should be given on water bodies. What is the situation of existing water bodies, excavation of water bodies and construction of new water bodies? It should be taken up. My point is that this is a matter of concern. While other countries are contemplating to provide irrigation in the desert area, we are talking about addressing the drought situation in the country. This is because the Government is taking this matter in a casual manner.  The Government is taking this matter in a casual manner. The Government is taking up this matter in a piecemeal manner. Casual manner and piecemeal handling cannot solve this matter. 

          I do agree with the other Members who have said that agriculture should be taken as a special subject for preparing the Budget. Not only that, another demand of mine is that a special Ministry should be formed to look after the welfare of the farmers. There is one Ministry to look after the industry. Even then there is another Minister to look after the welfare of the labour. But in the case of agriculture there is no particular Ministry to look after the welfare of the farmers. I demand not only preparation and presentation of a Budget exclusively for agriculture but I demand that a special Ministry should be set up to look after the welfare of the farmers.

          With these words I request the Minister to consider my suggestions. The Minister is a very knowledgeable person. He is very sensitive to the issues of farmers.

MR. CHAIRMAN :  Please conclude now. Nothing will go on record.

(Interruptions) …* *श्री अशोक अर्गलः   देश के विभिन्न भागों में सूखा एवं ओलावृष्टि पाला के कारण  किसान बर्बाद हो गया है जिसके कारण किसान  परेशान होकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है जिसका उदाहरण महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में देखने को मिल रहा है।

          किसान को कहने को अन्नदाता कहा जाता है जो मात्र नाम के लिए रह गया है। खेती घाटे का सौदा हो रहा है जितनी लागत किसान फसल उत्पादन, सिंचाई से लेकर बुवाई कटाई, घर लाने तक कर देता है। उतना मूल्य उसको बेचने तक नहीं मिलता है। जो बहुत ही शर्म की बात है। मंडी में किसान की फसल की कीमत ओने‑पोने दाम लगाकर ले ली जाती है। पैसा भी तत्काल उसे नहीं मिलता है।

          मेरे संसदीय क्षेत्र भिण्ड, दतिया जहां काफी हिस्से में जमीन का जल स्तर लगातार गिर रहा है। कृषि हेतु किसानों के कुएं सूख गये हैं। टयूबवेलों के सहारे खेती किसान करता है। जब किसान की फसल तैयार होती है तब प्रकृति की मार से मारा जाता है। अभी हाल में मेरे क्षेत्र के भिण्ड दतिया के गौहद, सेवढ़ा, भाण्डेर दतिया एवं मुरैना के अम्बाह में ओलावृष्टि से फसलें बर्बाद हो गई हैं।

          ओलावृष्टि से किसानों के खिले चेहरों पर दुख की छाया देखने को मिल रही है किसानों के खिले चेहरे मुरझा चुके हैं। आज वे देख रहे हैं कि सरकार शायद कोई  मदद ‑ºÉcɪÉiÉÉ करेगी।

          सरकारी सहायता जो मिलती है वह काफी कम होती है आज इस सहायता को बढ़ाने की जरूरत है। मेरा कहना है कि आज हमें नदियों पर मध्यम बांध बनाने की जरूरत है क्योंकि बरसात के समय लाखों गेलन पानी बहकर चला जाता है।  जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की संभावना बन जाती है। एनडीए की सरकार में माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने नदियों को जोड़ने की नीति बनाई थी उस पर अमल किया जाये इसके लागू होने          से किसानों एवं नागरिकों को लाभ होगा, किसानों को बिजली, पानी, कृषि संबंधी सभी सुविधायें नःशुल्क दिये जाने की आवश्यकता है इससे किसानों को काफी राहत मिलेगी। अतिवृष्टि के दौरान फसल का मुआवजा पर्याप्त दिये जाने की आवश्यकता है।

                     

श्री जगदानंद सिंह (बक्सर):सभापति महोदय, आपने मुझे सुखाड़ और ओलावृष्टि के विषय पर बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं समझता हूं कि हमारे सम्मानित कृषि मंत्री जी वाकिफ़ हैं कि यह देश सुखाड़ के दौर से गुजरा है और खेती की पैदावार दस प्रतिशत से अधिक खरीफ में घटी है। कृषि मंत्री जी ने अपने गृह प्रांत महाराष्ट्र के दौरे में माना कि इतना भयानक सुखाड़ इन्होंने कभी नहीं देखा है। इन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि हम किसी को भूखा नहीं रहने देंगे। कृषि की पैदावार अवश्य भूख से जुड़ी हुई है, लेकिन यह हमारी अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा है। यदि खेती की पैदावार घटती है तो किसानों को परेशानी होती है और किसानों की पैदावार घटने से देश की अर्थव्यवस्था भी बिगड़ती है।

          सभापति महोदय, कृषि मंत्री जी की यह मान्यता है कि दस प्रतिशत अर्थात् 119 मिलियन टन के बदले में केवल 117 मिलियन टन इस वर्ष हमारी अनाज की पैदावार खरीफ की होगी और मान्यता है कि छ::  मिलियन टन चावल, छ: मिलियन टन मोटा अनाज और एक मिलियन  टन दलहन की कमी होगी। इसका किसानों पर कितना कुप्रभाव पड़ेगा, इसका अंदाजा हम सब लोग लगाते हैं। सुखाड़ का मतलब ही यह होता है कि वर्षा का कम होना। आज भी हमारी 40 से 50 फीसदी कृषि वर्षा पर आधारित है और वर्षा आधारित खेती, जब वर्षा न हो तो सुखाड़ का सामना करना पड़ता है। लेकिन उसके साथ सरकार इंतजाम करती है, कि हमारे जलाशयों में पानी रहे, हमारे भूमिगत जल का दोहन सही ढंग से हो सके, किसानों को वक्त पर बिजली मिल सके तो सुखाड़ का सामना कर सकते हैं। लेकिन यह स्थिति जटिल है, यह इंतजाम नहीं हो पा रहा है। भारत सरकार की मान्यता है कि देश के छ:-सात प्रांतों  में भयानक सुखाड़ आया - चाहे वह तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान या आंध्र प्रदेश हो। हम सब बिहार से आते हैं, वहां लगातार तीन वर्षों से सुखाड़ की स्थिति है। सन् 2009-10 और 11 में इतने जिले सुखाड़ से प्रभावित थे। सन् 2009 में 37-38 जिलों में 26 जिले सुखाड़ से प्रभावित थे, 2010 में 32 जिले सुखाड़ से प्राभावित थे और इस वर्ष फिर 26 जिले सुखाड़ से प्रभावित हैं। लगातार तीन वर्षों से सुखाड़ की स्थिति है और वहां के किसानों की हालत बड़ी ही दयनीय है। उत्तर-बिहार वर्षों बाढ़ से पीड़ित रहता था, दक्षिण-बिहार के साथ उत्तर-बिहार भी सुखाड़ से पीड़ित है। वहां की पैदावार लगातार इस स्तर पर आती चली जा रही है कि किसानों का जीवन चलाना बहुत मुश्किल हो रहा है। थोड़ी सी व्यवस्था वहां डीजल अनुदान के माध्यम से हो पाती है, लेकिन इससे किसानों का हित नहीं होता है। हमारी परम्परागत खेती के लिए पानी के जो तालाब इत्यादि साधन थे, वे समाप्त होते चले जा रहे हैं और जो हमारी आधुनिक सिंचाई है, जिन जलाशयों का हमारे यहां निर्माण हुआ था, उन जलाशयों से वर्षा की कमी के चलते पानी किसानों को नहीं मिल पा रहा है और जो हमारी तीन बड़ी योजनाएं थीं, चाहे वह कोसी हो, लगातार आज चौथा-पांचवां साल है, जहां से पानी किसानों को नहीं मिल पा रहा है, इसलिए कि बाढ़ से ध्वस्त हुई कृषि सिंचाई प्रणाली का आज तक रैस्टोरेशन नहीं हो पाया। तीन प्रमुख योजनाओं में जो गंडक सिंचाई योजना है, उससे भी किसानों को पानी नहीं मिल पा रहा है और जो सबसे बड़ी स्थापित सिंचाई योजना सोन है, अन्तर्राज्यीय विवादों में फंसकर वहां के किसानों को भी पानी नहीं मिल पा रहा है। हम लोग स्वयं इस देश के सबसे बड़े सुखाड़ घोषित जो 6-7 जिलों का इलाका है, चाहे वह कैमूर हो, रोहताश हो, बक्सर हो, नवादा हो, गया हो, उस इलाके से आते हैं और वहां की पीड़ा हम लोग देख रहे हैं। किसान कितनी मेहनत से अपने अनाजों को बचा पा रहा है, लकिन उसमें सरकारों का सहयोग नहीं मिल पा रहा है, लेकिन उसके साथ जो सबसे बड़ी दयनीय स्थिति है कि किसान अपनी इस बुरी अवस्था में भी जो अनाज को पैदा कर रहा है, उस अनाज की कीमत भी उसको नहीं मिल पा रही है और लगातार किसानों की पूंजी टूटती चली जा रही है और किसानों की खेती इस स्तर पर आ गई है कि वर्षा पर आधारित खेती, वर्षा का न होना, सुखाड़ का सामना करना, सरकार का बहुत सहयोग न मिलना, बिजली की आपूर्ति नहीं होना, जले हुए ट्रंसफार्मरों का न बदलना, जो हमारे नलकूप हैं, वे भी सूखते चले जा रहे हैं, इसलिए कि भूजल का दोहन इतना अधिक हो रहा है कि वह भी पानी किसान अपने खेतों को नहीं दे पा रहा है। इसके साथ ही मैं कहना चाहता हूं कि राज्य सरकार ने ज्यों ही सुखाड़ से निपटने के लिए भारत सरकार से अनुदान समय-समय पर मांगा, वह अनुदान उसको नहीं मिल पा रहा है और अनुदान न मिलने के चलते स्थिति बहुत जटिल होती चली जा रही है।

          मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं, कृषि मंत्री जी यहां मौजूद हैं कि केवल पेट भरने के लिए आप सैण्ट्रल पूल से अनाज दे देंगे, इसलिए किसानों की स्थिति नहीं सुधर जाएगी। किसानों की स्थिति तब सुधरेगी, जब उनके खेतों में पैदावार होगी। मनरेगा से ही मजदूरों को काम नहीं मिलता है, जब उन्हें खेतों में काम नहीं मिलता है, तब ही मनरेगा सहायक है।  हमारी कृषि अर्थव्यवस्था है। सामान्यतः हमारे कृषक मजदूरों को खेती में काम मिलता है, रोजगार मिलता है और स्थिति यदि सुखाड़ से प्रभावित होगी तो हमारी पैदावार भी प्रभावित होगी, हमारे मजदूरों का जीवन-यापन भी चलाना मुश्किल हो जायेगा, इसलिए केवल भूख की समस्या नहीं है, जो अर्थव्यवस्था का साधन और स्रोत कृषि है, उसके आधार पर इस कृषि में जो आज सुखाड़ की स्थिति पैदा हुई है, उससे निपटने का प्रयास करना चाहिए।

          मैं एक बात कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा कि सुखाड़ के बाद भी किसान एक ऐसा जीव है कि जो अपनी खेती को बर्बाद जल्दी होने नहीं देता और किसी न किसी तरह मेहनत से कुछ न कुछ उत्पादन अपने परिवार का जीविकोपार्जन चलाने के लिए करता है। अपनी भूख के साथ-साथ इस देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देता है, इसलिए यदि वह जो कुछ भी पैदावार करता है, यदि उसको उसकी सही कीमत, जो भारत सरकार का न्यूनतम समर्थन मूल्य है, अगर वह उसको मिल जाये तो उसके पास हाथों में अगली खेती के लिए थोड़ी पूंजी होती है, अन्यथा खेती खराब, बर्बाद हो जाती है और बगैर खेती के  फिर किसान का उठ खड़ा होना मुश्किल होता है। इस संकट से निजात दिलाने के लिए हमारी वर्षा पर आधारित जो खेती है, उसे बचाने में  ए.आई.वी.पी. की भारत सरकार की योजना का सहारा लेना पड़ेगा पता नहीं जल नीति बन रही है, हमारी सिंचाई को सैण्ट्रल विषय नहीं माना जा रहा है, इसको स्टेट का विषय माना जा रहा है। भारत सरकार हर चीज़ में पूंजी का निवेश करेगी, लेकिन सिंचाई के लिए उसके पास सबसे न्यूनतम साधन होता है। मैं कहना चाहता हूं कि त्वरित सिंचाई लाभ योजना के तहत खेती को पुष्ट करने के लिए, सुखाड़ के विरुद्ध, प्रकृति के विरुद्ध लड़ने के लिए किसानों को ताकत देने के लिए और अधिक सिंचाई की योजनाओं को चलाने की इस देश में आवश्यकता है। सिंचाई की व्यवस्था जितनी हमारी पुष्ट होती जायेगी, सुखाड़ से लड़ने की भी क्षमता हमारी उतनी ही बढ़ती जायेगी और देश की अर्थव्यवस्था भी आगे सही ढंग से संचालित होगी। किसान भी भूखा नहीं रहेगा, देश की अर्थव्यवस्था भी नहीं बिगड़ेगी और जो खेती में काम करने वाला मजदूर है, वह भी बेरोजगार नहीं होगा।  इसलिए सारी चीजों को देखते हुए मैं भारत सरकार से मांग करता हूं कि सुखाड़ केवल तात्कालिक प्रभाव नहीं है।  यह एक लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव है और उससे निबटने के लिए एक दूरगामी नीति भारत सरकार की होनी चाहिए।   

      इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूं।

 

SHRI K. BAPIRAJU (NARSAPURAM): Sir, with your kind permission I would like to speak from here.

          We are happy to have a discussion on agriculture, especially on the plight of cyclone-affected farmers.  We have a pro-farmer Minister of Agriculture, Shri Sharad Pawar and we should take advantage of his stewardship.  Sir, 90 per cent of the people’s representatives, whether they are MLAs or MPs, belong to the agricultural family.  Unfortunately, we are not able to debate on issues related to agriculture to a large extent.  I made a request earlier also and would like to again request the Chair to have an exclusive Session for a week to debate on agriculture.    Otherwise, our political system is such that most of us are self-interested and opportunists and we do not open our hearts to redress the problems of agriculturists.  I earnestly request that by rising above party-line, and also regions, we should collectively fight for the farmers.  We are wasting so much of time during Sessions on petty issues.  It bleeds us but we cannot help it because our democratic system is such.  I would urge upon the Chair to implement it at least under the stewardship of our present Agriculture Minister who really loves to help the farmers.

          I belong to a coastal constituency and I have been representing the people of that area for the last three-and-a-half decades.  People of that area have suffered very badly.  I have hardly taken advantage of any Government at the Centre but today we are fortunate to have a Chief Minister who has given interest free loans to agriculturists.  Through you, Sir, I would like to urge the Agriculture Minister to extend this provision to the entire nation.  There are a handful of industrialists who take lakhs and crores of rupees as loans and if it does not pay, they become defaulters.  They then go to the BIFR and beg for exemption.  But what can a farmer do? 

I would say that farmers are wiser than our politicians.  Whenever there is a cyclone or such other climatic tragedy they do not expect the Union Government or the State Government concerned to come to their rescue.  They are happier if instead of giving monetary help the Government just shows concern for them.  They are very practical.  They know that nature is a creator as also a destroyer.  Unfortunately, we feel that we are above nature but the farmers do realise that they are a part of nature.  They know the ill-effects of cyclone and they only expect some moral support from us which we are not able to give.  For instance, what has happened to the monsoon now?  Monsoon has vanished now.  We only have cyclones now.  Some cyclones are of some advantage to us while others coming at wrong time of the season are affecting us badly.  Farmers definitely expect moral support from the entire parliamentary system. 

Once we go out of the Parliament they are so friendly but what happens when we come to the Parliament?  It pains me to say that we are not able to express what is there in our hearts.  Sir, we the 540 people represent more than 100 crore of population of this country.  With folded hands and one voice I would request the Chair that we should rise above party lines and address the farmers’ issue on high priority.

 We should rise above party line.  I do not want to make a long speech.  I have never repeated other’s speeches in my life.  I always tried to be present in the Assembly or Parliament.  Almost all the time I am sitting here.  I observe the people who talk here.  I take the advantage of listening to them.  My father told me not to be absent from Assembly. When my father was on death-bed, I had gone to the hospital to see him.  He asked me why are you here?  I told him: “You are in trouble, that is why, I have come to see you”.  He said: “You should be present in the Assembly”. He further said: “You should not insult the people who have elected you”.   He also asked me to go to Assembly and come after the sitting of the Assembly.  I have been brought up like that.  I have the patience of listening to the speeches.  I want to learn.  I have been a student all my life. 

          I do not want to take much of your time.  I would urge the House to give five days of the entire year to farmers and let us work collectively.  You should not think about money.  Whatever you give to the farmers, it is too less to compensate for the sacrifice which they are making.  If there is hot Sun during the day, I have an umbrella.  If there is heavy rain, I have an umbrella but where is the umbrella for the farmer?  He is the umbrella for the nation.  I would request all of you with folded hands to surrender your lives for the good of farmers of India who are saving the country.

                                       

श्री राजू शेट्टी (हातकंगले):मैं इस जगह से बोलने की अनुमति चाहता हूं।

सभापति महोदय :   अनुमति है।

श्री राजू शेट्टी : सभापति महोदय, पूरे देश में आज चार-पांच राज्य सूखे की स्थिति से जूझ रहे हैं। खासकर महाराष्ट्र में सोलापुर, सातारा, सांगली, नगर, औरंगाबाद, जालना, उस्मानाबाद, इन जिलों में सूखे की भयंकर स्थिति है। एक तरफ पानी नहीं मिल रहा है और दूसरी तरफ कैटल कैंप में जानवर पानी के लिए तरस रहे हैं। मैंने पूरे महाराष्ट्र में किसानों के पास जाकर उनका दुख सुना है और किसानों का यही दुख पार्लियामेंट में रखना चाहता हूं। महाराष्ट्र का किसान यही चाहता है कि जो अकाल से जूझ रहे हैं, कम से कम इस साल का अकाल उनकी जिंदगी का आखिरी अकाल हो। जो सिंचाई के अधूरे प्रोजेक्ट्स हैं उनके लिए केन्द्र और राज्य सरकार निधि आवंटित करती हैं तो बारबार किसानों को कैटल कैंप में जाने की परिस्थिति नहीं आएगी।

          सभापति महोदय, मैंने देखा है कि कई तहसील में टैंकर और कैटल कैंप के लिए तीन-चार सौ करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं और वहां के अधूरे प्रोजेक्ट्स हैं, उनमें किसी के लिए डेढ़ सौ करोड़ रुपये कम हैं तो किसी के लिए दो सौ करोड़ रुपये कम हैं। एक तरफ देश में बाढ़ की स्थिति है, बादल फट रहे हैं और ओले पड़ रहे हैं। दूसरी तरफ, अकाल पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग को मद्देनजर रखते हुए, आज हमारे देश में प्राकृति बदलाव का जो संकट आया है, उसके बारे में गंभीरता से सोचने का समय आ गया है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इसका कुछ नियोजन करने की आवश्यकता है। आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान या मध्यप्रदेश हो, राष्ट्रीय स्तर पर अगर इसका कोई नियोजन होता है, जैसे विभिन्न प्रकल्पों पर हमने विचार किया था उसी तरह से अगर प्राकृतिक बदलाव में संकट आ जाए, वह सब एक दायरे में रख कर एक राष्ट्रीय आपत्ति निवारण आयोग की स्थापना की जाए। हम मनरेगा के नाम पर हर साल 60 हजार करोड़ रुपये रोजगार निर्माण करने के लिए खर्च करते हैं। रोजगार की आवश्यकता कहां है? जहां सिंचाई है वहां रोजगार की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि मनरेगा शुरू होने के बावजूद वहां के किसानों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं और जहां सूखा है वहां रोजगार निर्माण करने की आवश्यकता होती है। हमारे पास जो नदिया हैं उनके जल का बंटवारा हो चुका है। केन्द्रीय जल आयोग ने सही ढंग से बंटवारा किया है।  लेकिन जो बंटवारा हुआ है, हरेक गांव में बंटवारे के लिए जिस प्रोजैक्ट की आवश्यकता है, निधि के अभाव के कारण वे प्रोजैक्ट अधूरे हैं। इसलिए हम बार-बार टैंकर पर खर्च कर रहे हैं, कैटल कैम्प चला रहे हैं। नरेगा का पैसा, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना आदि के सारे पैसे को एक साथ करके 5-7 साल का एक्शन प्लान बनाकर अगर कोशिश करें तो अच्छा होगा। इसमें भी प्रादेशिक अस्मिता है, क्योंकि एक जिला कहता कि वहां पैसे मत दो, दूसरा जिला कहता है कि वहां पैसे मत दो। अगर इस बारे में राष्ट्रीय स्तर पर कोई उपाय योजना बनती है तो यह हमारी जिंदगी का आखिरी अकाल हो सकता है। इसलिए प्लानिंग करने की आवश्यकता है। मंत्री महोदय महाराष्ट्र के जानकार हैं। उन्हें पूरे देश के बारे में मालूम है। मैं उनसे विनती करता हूं कि कोई उपाय योजना हो ताकि हमारे किसानों को बार-बार भीख मांगने की परिस्थिति न आए। सभापति महोदय, आज परिस्थिति यह है कि कैटल कैम्प में जो जानवर हैं, उन्हें न चारा मिल रहा है और न ही पानी मिल रहा है। सिर्फ 15 किलो चारा मिलता है। इसमें एक गाय नहीं बच सकती, भैंस नहीं बच सकती। उसका दूध कम हो रहा है। आज अच्छी नस्ल के बहुत से जानवर कत्लखाने की ओर जा रहे हैं। इसका बुरा असर यह होगा कि अगले साल पूरे देश में दूध का उत्पादन कम हो सकता है। हमने ऑपरेशन फ्लड मिल्क का सैकिंड फेज़ शुरू किया है। हमारे पास अच्छी नस्ल के जानवर नहीं हैं तो ऑपरेशन फ्लड मिल्क कैसे अमल करेंगे। इसलिए मेरी विनती है कि जो चार-पांच डिपार्टमैंट हैं, उन्हें एक करके राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन हो।

                                                                                                     

*SHRI MANICKA TAGORE (VIRUDHUNAGAR) : Tamil Nadu experience recurrent droughts due to failure of rains and Thanjavur, Nagappattinam and Cauvery delta districts in particular have been severely hit by this drought this year.  Though it gave a little respite when the Central Team recently visited these delta districts and announced financial assistance of Rs.15,000/- per acre to the drought affected farmers and the same was released through the National Agriculture Insurance Scheme and Disaster Release Fund Insurance Company.

          Similarly, in the southern districts in Tamil Nadu, viz. Madurai, Dindigul, Ramanathapuram, Virudhunagar, Tirunelveli, Thoothukudi, Kanyakumari, etc., hundreds of acres of lands have gone dry for want of water with the repeated failure of monsoons. Farmers have been compelled to borrow heavy sums of money for their living.  In view of this alarming situation, with acute shortage of even drinking water too in these districts, farmers agitated over the issue and have been demanding to release appropriate financial assistance and have been demanding to release appropriate financial assistance and have been requesting for waiver of the loans taken by them from the banks and cooperative societies, in addition to a sanction of a sum of Rs.25,000/- as compensation to them.  Not only agriculture has been affected, even the cattle and livestock also suffer because of this drought. 

          Kindly allow me to bring to the kind attention of this House to a serious situation that prevails in Tamil Nadu, particularly in the southern districts.

          Monsoon rains, which normally occur in October-November, have failed in the state, particularly in twelve southern districts, affecting the livelihood of poor farmers as the agricultural yield has gone too low.  This has been the order of the day in most of the villages in the area.  In the Pudukkottai village which falls in my Virudhunagar Parliamentary constituency, a farmer who had taken a loan of Rs.40,000/- from a private money lender, has committed suicide as he could not repay the debt in view of very meager agricultural produce. On hearing the tragic news, I had visited the bereaved widow and her three hapless children, offered my condolences and on behalf of the Congress Party, offered an ex gratia payment of Rs.50,000/- as financial assistance.  I may be allowed to emphasise that this is not an isolated incident and I am afraid many farmers would be forced to end their lives in such a drought situation.

          I would request to kindly consider deputing a special team of officers to study the extent of damage due to the drought situation that prevails in Tamil Nadu and to chalk out necessary remedial measures to those farmers in the Delta region and worst-affected areas.

          In this backdrop, I would humbly request to consider the suggestion of the Hon’ble Minister of visiting Tamil Nadu and issuing suitable instruction to the Government machinery to ensure that the Central Government in general, and the state in particular, is involved proactively in the welfare of those poor farmers.

          I am quite confident that my suggestion will receive your highest consideration and I am sure that appropriate and timely remedial action would be initiated at the earliest.

          Government of Tamil Nadu has also been approached for immediate relief measures. I urge the Government to consider declaration of these 15 southern districts of Tamil Nadu as drought-affected districts and sanction of immediate relief measures to the people of these hapless southern districts of Tamil Nadu, so that there is a respite for them at the earliest.

*SHRI SURESH ANGADI (BELGAUM) : I would like to draw the attention of the Government to the situation that has currently arisen, in view of the prevailing severe drought in the Belgaum district of Karnataka state.

          The Belgaum district comprises of ten talukas.  Owing to paucity of rainfall in the preceding year, the talukas namely, Ramdurg, Bailhongal, Saudatti, Gokak, amongst other talukas, are facing acute drinking water, and fodder shortage.  Crops have withered and the farmers are striving very hard to make the both ends meet.  Sadly, cattles are not being fed with fodder properly, since weeks.

          In this regard, on humanitarian grounds urge upon the Agriculture Ministry to send a Special team to assess the loss of agriculture crops in Belgaum district and also work out a proposal for the grant of a “Special Package” to mitigate the sufferings of the poor farmers, who are now compelled to walk out of their villages in search of their livelihood.

          Besides, I also appeal the Government of India to waive off all loans (alongwith the interest accrued) so availed by the poor farmers, during the period from nationalized banks/societies and thereby also arrange to supply the fertilizers, seeds etc. to these very farmers of the affected talukas of Belgaum district at subsidized prices, to mitigate their hardships.  Request the matter be accorded top priority.

   

 *SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT) : Respected Chairman, Sir, today we are discussing the drought situation in many parts of the country and honourable members are expressing their views here and I agree with them.  However, in this regard, I want to add a new dimension to this topic.  Through you Sir, I wish to draw the kind attention of the honourable members as well as the Government to a stark reality. I hail from West Bengal which has 2 parts viz the North Bengal and the South Bengal.  6 districts of North Bengal are dependent on agriculture.  All the rivers there have originated from China, Nepal, Bhutan and they ultimately meet the Bay of Bengal by flowing through Bangladesh.  For many years, the 6 districts of North Bengal, including Darjiling have been struggling for water of river Teesta and have got the Teesta barrage constructed.  Now water is supplied from this barrage.  Meanwhile Bangladesh has become independent.  According to international law, Bangladesh should also get a share of the water.  India appreciates this fact.  Indians had actively taken part in the liberation war of Bangladesh.  We have warm and cordial relationship with that country and I wish it improves over time.  We share the same language, same food habits, similar culture; they are our brothers.  So we have no objection if law permits them to have a share of Teesta water.  We are always with them.  But if 50% of the water is diverted to Bangladesh, then the 6 districts of Bengal will face great difficulties.  Only 1/3 of Teesta flows through their territory while 2/3 river flows through India so if 50:50 water sharing is agreed upon then more than one crore people of North Bengal will starve and will be deprived of water. This will create havoc in the area. Agricultural activities will be affected adversely.

          I know that there are other water disputes issues in Southern part of India involving Karnataka, Tamil Nadu etc. over Krishna, Cauvery rivers and these issues have not been amicably resolved.  Water is the lifeline of humanity.  Teesta river is extremely important for the people of North Bengal.  Without its water people will die.  This is not acceptable.  Sir, I will continue next time.

*SHRI N. PEETHAMBARA KURUP (KOLLAM) : The farmers in various parts of the country are on the verge of starvation and death.  Many of them are in debt trap.  A number of farmers have committed suicide due to destruction of standing crops either by way of drought or hailstorm.

          The entire Kerala is under the grip of a severe drought. A lot of standing crops have been destroyed due to unprecedented drought in Kerala. Drought has resulted in agricultural loss to the tune of Rs.5800/- crore.  Electricity Board of Kerala is facing a loss of Rs.1610/- crore due to shortage of water in various dams of the State.  Drinking water shortage is acute in various districts of Kerala. Dams have also been dried up at many places.  Therefore, a chunk of the money has to be utilized for ensuring drinking water to the parched districts of Kerala.

          I, therefore, urge upon Union Government to immediately dispatch a Central Team to Kerala to assess the damage and destruction caused by the unprecedented drought.  It is requested that a special financial package may be released immediately to tide over the drinking water shortage and drought faced by the people of Kerala.

                   

MR. CHAIRMAN  : Hon. Members, it is six o’clock.  I still have more than ten hon. Members to speak on this discussion. I would like to know the opinion of the House.  Should we continue with the discussion or should we take up ‘Zero Hour’?

18.00 hrs. SEVERAL HON. MEMBERS: We should take up the “Zero Hour” now.… (Interruptions)

SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT):   Sir, I appeal to you to give me two more minutes.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN :  Should we take up the “Zero Hour” or should we continue with the discussion?

THE MINISTER OF AGRICULTURE AND MINISTER OF FOOD PROCESSING INDUSTRIES (SHRI SHARAD PAWAR):  I think if we can keep this discussion for tomorrow or a convenient date, it would be good.  One hon. Member is speaking now. If there are five or six hon. Members, why can we not complete it?

MR. CHAIRMAN: There are 10 hon. Members who are there to speak. Shri Majumdar, you will continue next time.

Now, we are taking up the “Zero Hour.”           सभापति महोदय :   डॉ. अजय कुमार -- उपस्थित नहीं।