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Allahabad High Court

Ravindra Pratap Shahi @ Pappu Shahi vs State Of U.P on 7 June, 2021

Author: Saurabh Shyam Shamshery

Bench: Saurabh Shyam Shamshery

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD प्रकाशनार्थ स्वीकृत निर्णय सुरक्षित करने की तिथि-21 .05.2021 निर्णय सुनाने की तिथि- 07.06.2021 न्यायाधीश विश्राम कक्ष वादः आपराधिक प्रकीर्ण जमानत प्रार्थना पत्र संख्या-20591/2021 आवेदकः- रविन्द्र प्रताप शाही उर्फ पप्पू शाही विपक्षीः उत्तर प्रदेश राज्य आवेदक के अधिवक्ताः- हरिनरायण सिंह विपक्षी के अधिवक्ताः- शासकीय अधिवक्ता माननीय सौरभ श्याम शमशेरी, न्यायमूर्ति

1. वर्तमान में, कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियों के कारणवश, इस अवकाश पीठ ने अप्रत्यक्ष प्रणाली (वर्चुअल मोड) के माध्यम से, वर्तमान जमानत प्रार्थना पत्र की सुनवाई सम्पन्न करी।

अभियोजन कथानक

2. वादी श्री रामवचन (शिकायतकर्ता) ने एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (मुकदमा अपराध संख्या - 0085 वर्ष 2021), धारा 154 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत, जितेन्द्र कन्नौजिया, वर्तमान अध्यक्ष व रवीन्द्र प्रताप शाही उर्फ पप्पू शाही, वर्तमान सभासद (यहाँ आवेदक) के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के अपराध कारित होने की सूचना, थाना-महुली, जिला- संत कबीर नगर में दिनांक 15.03.2021 समय 02.28 बजे को इस आशय से पंजीकृत कराई कि "प्रार्थी रामबचन पुत्र दशरथ साकिन नगर पंचायत हरिहरपुर वार्ड नं० 06 जवाहर नगर थाना महुली का स्थायी निवासी है। प्रार्थी के नाम जगदीशपुर गौरा में भूमि आवंटन किया गया था जिसे वर्तमान अध्यक्ष जितेन्द्र कन्नौजिया व पूर्व अध्यक्ष व वर्तमान सभासद पप्पू शाही द्वारा स्थानीय अधिकारियों को अपने साजिश में लेकर पट्टा निरस्त करा दिया गया जिससे आहत होकर अन्य किसानो के साथ मेरा लड़का रघुवीर उम्र 22 वर्ष भी जनपद व तहसील पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन कर रहा था जिससे खार खाकर नगर पंचायत के रवीन्द्र प्रताप शाही उर्फ पप्पू शाही जितेन्द्र कन्नौजिया व अन्य सहयोगियों द्वारा मानसिक तनाव व यातना तरह तरह से दे रहे थे। जिससे तंग आकर मेरे लड़के रघुवीर ने जो वर्तमान समय में उन्नाव जनपद के तकीया स्टेशन गेट मैने के रूप में कार्यरत था जहर खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लिया जहर खाने से पूर्व रघुवीर ने अपना सुसाईड नोट भी लिखा है जो उन्नाव जनपद के सम्बन्धित थाने पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ जमा है। अतः आप से सादर अनुरोध है कि रवीन्द्र प्रताप शाही, जितेन्द्र कन्नौजिया व अन्य प्रताड़ना से समलिप्त के खिलाफ अभियोग पंजीकृत कर दण्डात्मक कार्यवाही करने की कृपा करे।"

प्रकरण का संक्षेप में तथ्यात्मक प्रारूप-

3. प्रकरण के तथ्यों, परिस्थितियों व पत्रावली पर प्रस्तुत दस्तावेजों के दृष्टिगत प्रकरण के तथ्यात्मक प्रारूप को वर्तमान जमानत प्रार्थना पत्र के उचित निस्तारण के लिए वर्णित करना आवश्यक है, जो संक्षेप में निम्न हैः-

(क) आवेदक, रविन्द्र प्रताप शाही उर्फ पप्पू शाही घटना के समय नगर पंचायत हरिहरपुर के राजस्व ग्राम सवापार के वार्ड नं० 7 से निर्वाचित सभासद था तथा सह अभियुक्त जितेन्द्र कन्नौजिया घटना के समय अध्यक्ष, नगर पंचायत, हरिहरपुर था।

(ख) मृतक (रघुवीर) उम्र 22 वर्ष, घटना के समय उन्नाव जनपद के तकिया रेलवे स्टेशन पर गेटमैन के रूप में कार्यरत था व अपने सरकारी आवास, रेलवे स्टेशन तकिया, जिला उन्नाव में रहता था। जहाँ उसने घटना के दिन जहर खा लिया था तथा उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गयी।

(ग) जिलाधिकारी, संतकबीर नगर ने उभयपक्ष को सुनकर एक सकारण आदेश दिनॉक 27.11.2019 के माध्यम से ग्राम जगदीशपुर गौरातप्पा माडर, परगना महुली पूरब, तहसील घनघटा, स्थित गाटा संख्या 337 मि०, 788, 433क एवं 467 के भूखण्डों पर पूर्व (वर्ष 1976 व 1993) में आवंटित कृषि पट्टों को सार्वजनिक भूमि होने के कारण व मात्र राजस्व अभिलेखों में जंगल की भूमि दर्ज होने कारण पट्टा देने के आदेश को जमीदारी विनाश अधिनियम की धारा 132 के अंतर्गत प्रारम्भ से शून्य प्रभावी होने के कारण निरस्त करने का आदेश पारित किया था। यह प्रक्रिया उच्च न्यायालय के द्वारा एक जनहित याचिका में पारित कतिपय आदेश के फलस्वरूप हुई थी, जिसमें सहअभियुक्त जितेन्द्र कन्नौजिया ने गाँव सभा की ओर से गाँव सभा को भी एक पक्षकार बनाने के लिए आवेदन दाखिल किया था।

(घ) पत्रावली से ऐसा प्रतीत होता है, पीड़ित रघुवीर, अपने गाँववासियों व अपने पिता (शिकायतकर्ता) के बहुत पुराने कृषि पट्टों के निरस्त होने के कारण गांववासियों के साथ हमदर्दी रखता था, इसलिए गाँववासियों/ किसानों के साथ इस आदेश का विरोध करता था, इसी कारण उसने जनपद व तहसील के स्तर पर गांववासियों के साथ धरना, विरोध प्रदर्शन में भागीदारी भी की थी। इन सबको यह संदेह था कि इस पट्टा निरस्तीकरण की कार्यवाही के पीछे वर्तमान आवेदक व सह अभियुक्त की ही साजिश थी। इस आदेश को अधिनियम के अंतर्गत चुनौती दी गई है या नहीं, ऐसा बहस या पत्रावली से स्पष्ट नहीं है। इसी संबध में 23.1.2021 को पीड़ित व अन्य के विरूद्ध, समाधान दिवस पर अशान्ति फैलाने व संज्ञेय अपराध की आशंका उत्पन्न होने के कारण थानाध्यक्ष महुली ने रिपोर्ट चलानी अन्तर्गत धारा 151/107/116 दं० प्र०सं० बनाई तथा उन्हें गिरफ्तार भी किया गया तथा उन्हें जमानत मुचलके पर पाबन्द किया गया।

(ड़) पत्रावली से यह भी विदित होता है कि, जब पंचायत हरिहरपुर के कर्मचारी व राजस्व विभाग के कर्मचारियों द्वारा विवादित पट्टा भूमि का कब्जा लेने की कार्यवाही हो रही थी तब गाँववासियों ने कर्मचारियों पर लाठी डण्डा लेकर हमला कर दिया तथा इस घटना पर कर्मचारियों द्वारा गांववासियों के विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट, दिनॉक 19.11.2020 को (सं० 0364 वर्ष 2020) पंजीकृत कराई गयी व अन्वेषण के उपरान्त अन्वेषण अधिकारी ने द०प्र०सं० की धारा 173 के अंतर्गत धारा 147,323,504,506,354,353 भा०दं०सं० के अंतर्गत आरोप पत्र दि० 19.11.2020 भी प्रेषित किया जा चुका है। जिसमें पीड़ित व शिकायतकर्ता (पिड़ित के पिता) भी आरोपित है।

(च) पत्रावली से सम्यक अध्ययन से यह भी विदित होता है, कि वर्तमान प्रकरण में सह अभियुक्त जितेन्द्र कन्नौजिया ने एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (सं० 0005 वर्ष 2021) दिनॉक 03/01/2021 को थाना-महुली, जिला- संतकबीर नगर में मृतक व अन्य के विरूद्ध धारा 143,323,504,506 भा०दं०सं० व धारा 3(1)4, 3(1)(घ) अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (नृशंसता निवारण) अधिनियम 1989 के अन्तर्गत अपराध घटित होने की सूचना पंजीकृत करायी कि कथित रूप से इन्होंने 29.12.2020 को सायं 6 बजे शिकायत कर्ता जितेन्द्र कन्नौजिया पर डंडो, लात मुक्कों से मार पीट करी व जाती सूचक शब्दों का इस्तेमाल करा। अन्वेषण अधिकारी नें अन्वेषण के उपरान्त इस प्रकरण में भी पीड़ित व अन्य के विरूद्ध आरोप पत्र संख्या 01 दिनांक 21.02.2021 को सक्षम न्यायालय को प्रेषित कर दिया गया, जिस पर सक्षम न्यायालय ने 08.03.21 को अपराध का प्रसंज्ञान भी ले लिया गया है। जिसमें मृतक भी एक आरोपी था।

(छ) अन्वेषण के दौरान अभियोजन ने कुछ श्रव्य अंश (आडियो किल्प) बरामद की है, जिसका उल्लेख सत्र न्यायालय ने आवेदक के जमानत प्रार्थना पत्र को निरस्त करते हुए विस्तृत रूप से किया है। इसमें कथित रूप से मृतक, आवेदक/अभियुक्त से बात करता हुआ सुना जा सकता है। जिसमे मृतक आवेदक से क्षमा याचना कर रहा है, परन्तु आवेदक धमकी भरे लहजे में बात कर रहा है। एक श्रव्य अंश (आडियो किल्प) में मृतक का कथित रूप से वर्तमान जिलाधिकारी से वार्ता का भी है। जिसमें भी मृतक याचना करता हुआ सुनाई देता है। इन कथित श्रव्य अंशों की न्यायालयिक प्रयोगशाला की कोई जाँच आख्या अभी पत्रावली पर उपलब्ध नहीं हैं।

(ज) स्टेशन अधीक्षक, उ०रे० तकिया ने 14.03.2021 को थानाध्यक्ष विहार, जिला उन्नाव को पत्र लिखकर सूचित किया कि पीड़ित जब 13.3.2021 को अपनी ड्यूटी पर नहीं आया तब उसके सरकारी आवास पर स्टाफ को करीब 7.30 सायं बजे भेजा तो जानकारी मिली कि पिड़ित घर पर था और उसने बोला कि उसने जहर खा लिया हैं, उसे अस्पताल ले चलो। पिड़ित को तुरन्त सी०एच०सी०, पाटन भेजा गया व 100 नं० पर सूचना भी दी गयी व प्राथमिक उपचार किया और जिला अस्पताल उन्नाव को रैफर किया गया, जहाँ उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गयी। अतः उचित कार्यवाही करने की प्रार्थना की गयी। तदनुसार पुलिस ने सामान्य दैनिक में 14.03.2021 को 10.26 पर इस सूचना को थाना विहार, जिला उन्नाव की रोजनामचा सं० 019 पर अभिलेखित किया ।

(झ) इसके उपरान्त पिड़ित के शव की मृत्य समीक्षा, धारा 174 दं०प्र०सं० के प्रावधानों के अंतर्गत 14/03/2020 को पंचानों (एक पंचान पिड़ित के पिता/शिकायतकर्ता व अन्य उसके रिश्तेदार थे) के उपस्थिति में किया गया। राय पंचान के अनुसार मृतक रघुवीर की मृत्यु जहर खाने से हुयी प्रतीत हुई मानी गई फिर भी सही कारण जानने के लिए शव का शव परीक्षण कराने की राय दी गयी। इस समय आत्महत्या के दुष्प्रेरण का कोई जिक्र नहीं हुआ।

(ञ) शिकायतकर्ता (पिड़ित के पिता) ने इसके उपरान्त अपने मूल निवास स्थान के थाना महुली पर 15.03.2021 को 02.08 बजे, आवेदक व सह अभियुक्त के विरूद्ध एक प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत करायी, जिसका विस्तृत उल्लेख इस आदेश के प्रस्तर 2 में किया गया है।

(ट) प्रथम सूचना रिपोर्ट मे जिस आत्महत्या पत्र (सुसाइड नोट) का जिक्र किया है और जो अभियोजन ने 16.03.2021 को मृतक के कमरे से बरामद भी किया है, उसकी प्रति लिपि आवेदन के, अनुलग्नक सं० 11 के रूप में संलग्न है, जिसको संदर्भ के लिए निम्न पुनरूत्पादित किया जा रहा हैः-

"मै रघुवीर गुप्ता पुत्र राम बचन गुप्ता आज आत्म हत्या कर रहा हूँ। क्योंकि संत कबीर नगर के नगर पंचायत हरिहरपुर के पूर्व चेयरमैन पप्पू शाही एवं वर्तमान चेयरमैन द्वारा मुझे बेवजह फंसाया गया और जिसमें तत्कालीन पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों ने पूर्ण समर्थन किया। क्योंकि हम सभी अपने जमीनों के लिए लड़ रहे थे। लेकिन कुछ दिनों बाद यह भी पता चला कि 12 नवम्बर 2020 धनतेरस के दिन जिस दिन मै ड्यूटी पर था उस दिन भी मेरे ऊपर एफ०आई०आर० दर्ज कर लिये। इन्हीं सभी चीजो की वजह से मै अत्यन्त ही मानसिक तनाव से जुझ रहा हूँ और आज अपने आपको इस जिन्दगी से मुक्त करता हूँ।
क्योंकि न तो अब मुझे बेहतर जिन्दगी और न ही मै किसी से मुंह लगाने के काबिल रहा मैने कई बार नाम हटवाने के लिए सिफारिश किया और आत्म समर्पण भी किया लेकिन कोई भी नतीजा नहीं आया।
अतः मै इस जिल्लत भरी जिन्दगी से अपने आपको मुक्त करने जा रहा हूँ।
मै अपने इस जीवन काल में जब एक बुजुर्ग माँ बाप के औलाद का सहारा मिलना चाहिए। उस वक्त मै उन्हें बेसहारा छोड़कर जा रहा हूँ एक जवान बहन जिसे भाई से कुछ उम्मीदे रहती है वह मै पूरा नहीं कर सका।
इसका मुझे अफसोस रहेगा लेकिन मै मानसिक रूप से अत्यन्त ही पीड़ित हूँ और मै इस जालिम दुनिया का सफर और नहीं तय कर सकता इसलिए मै इस दुनिया को अलविदा कहना चाहता हूँ।
मेरे रिश्तेदारो एवं परिवार वाले हर एक ने मेरा बखूबी साथ दिया इसलिए मै आप सभी से माफी चाहता हूँ क्योंकि मै आप में से किसी के भी उम्मीद पर खरा नहीं उतर सका।"

(ठ) आवेदक ने प्रथम पूरक शपथ पत्र के माध्यम से सह अभियुक्त जितेन्द्र कन्नोजिया को इस न्यायालय द्वारा दी गयी अंतरिम अग्रिम जमानत आदेश दिनांक 8.4.2021 (आपराधिक विविध अग्रिम जमानत याचिका धारा 438 दं०प्र०सं० के अंतर्गत सं- 8507/2021)की प्रति पत्रावली पर प्रस्तुत करी है। जो आदेश दिनॉक 6.5.2021 के द्वारा अगामी तिथि तक बढ़ा दी गयी है।

(ड) आवेदक/अभियुक्त जो 16.03.2021 से न्यायिक अभिरक्षा में जिला करागार बस्ती में निरूद्ध है, ने एक जमानत प्रार्थना पत्र सं० 334/2021 सत्र न्यायालय, संत कबीर नगर, के समक्ष प्रस्तुत किया, परन्तु वो एक सकारण व विस्तृत आदेश दिनांक 05.04.2021 द्वारा निरस्त कर दिया गया, जिसके उपरान्त वर्तमान प्रार्थना पत्र, इस न्यायालय के समक्ष दाखिल किया गया है।

(ढ़) पत्रावली पर आवेदक ने जमानत प्रार्थना पत्र व द्वितीय पूरक शपथ पत्र के माध्यम से अपना 6 अन्य आपराधिक मुकदमों का आपराधिक इतिहास की घोषणा की है, जिसका विवरण व वर्तमान स्थिति निम्न उल्लेखित हैः-

(i) मुकदमा अपराध संख्या 440/2004, अंतर्गत धारा 147,148, 149, 452,323,506 भा०दं०सं० थाना महुली, जिला बस्ती (अब संत कबीर नगर) जिसमें अन्वेषण अधिकारी ने 5.12.2004 को अंतिम रिपोर्ट संख्या 21/04 सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत की जा चुकी है।
(ii) मुकदमा अपराध संख्या 799/2006 अंतर्गत धारा 147,148,149,307,323, 327,395,435,436,440 भा०दं०सं०, थाना महुली, जिला संत कबीर नगर, जिसमें सक्षम न्यायालय द्वारा इस अन्वेषण अधिकारी द्वारा प्रेषित अन्तिम रिपोर्ट को आदेश दिनांक 12.06.2007 द्वारा स्वीकार किया जा चुका है।
(iii) मुकदमा अपराध संख्या 303/2012 अंतर्गत धारा 323,342,504,302 भा०दं०सं० व 3(2)5 अनुसुचित जाति/ अनुसुचित जनजाति अधिनियम थाना महुली, जिला संत कबीर नगर। जिसमें अन्तिम रिपोर्ट प्रेषित करने के बाद, प्रतिवाद याचिका दाखिल की गयी जिसको परिवाद के रूप में परिवर्तित कर लिया गया और आवेदक को सम्मन का आदेश दिनांक 16.07.2016 को पारित किया गया, जिसको आवेदक ने इस न्यायालय में चुनौती दी है, जिस पर अग्रिम कार्यवाही पर रोक लगाने का आदेश पारित किया गया है।
(iv) मुकदमा अपराध संख्या 136/2018 अंतर्गत धारा 147,392,447,427,506 भा०दं०सं०, थाना महुली , जिला संत कबीर नगर। जिसमें अन्वेषण उपरान्त अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गयी, जिसको सक्षम मजिस्ट्रेट ने आदेश दिनांक 03.07.2019 द्वारा स्वीकार कर लिया है।
(v) मुकदमा अपराध संख्या 153/2020, अंतर्गत धारा 304ए भा०दं०सं०, थाना महुली, जिला संत कबीर नगर। जिसमें अन्वेषण के उपरान्त अंतिम रिपोर्ट दाखिल करी गयी है ,जिस पर अभी कोई आदेश पारित नहीं हुआ है।
(vi) मुकदमा अपराध संख्या 64/2021, अंतर्गत धारा 147,269,506 भा०दं०सं०, दिनांक 25.02.2021 थाना महुली, जिला संत कबीर नगर। जिसमें आवेदक के अनुसार वर्तमान में अन्वेषण प्रगतिशील है।

आवेदक का पक्ष

4. न्यायालय के समक्ष आवेदक का पक्ष उसके विद्वान अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपने सहयोगी अधिवक्तागण राकेश कुमार श्रीवास्तव व मिथलेश कुमार तिवारी के साथ प्रस्तुत किया। जिसका सार निम्न है-

(i) आवेदक एक शान्तिप्रिय व विधि को मानने वाला एक जिम्मेदार नागरिक है, जो लोगों की सेवा वर्तमान में सभासद व पूर्व में अध्यक्ष, पंचायत के रूप में करता रहा है और करना चाहता है, उसका इस घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है और उसके आपराधिक इतिहास से विदित है कि पूर्व मे भी उसके विरूद्ध झूठे आपराधिक मुकदमें पंजीकृत करे गये थे जो अन्वेषण के दौरान झूठे पाये गये। वर्तमान आपराधिक प्रकरण, आवेदक को मात्र अपमानित करने व उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुचाने के उद्देश्य से पंजीकृत कराया गया है।
(ii) सार्वजनिक भूमि पर गांव वासियों (जिसमें शिकायतकर्ता भी एक था) के कृषि पट्टे न्याायिक प्रक्रिया के द्वारा विधिनुसार, जिला अधिकारी द्वारा उभय पक्ष को सुनकर, सकारण आदेश द्वारा निरस्त किये गये थे। उस आदेश में आवेदक की न तो कोई भूमिका और न ही कोई दुर्भावना ही थी। उसको इस आदेश का कोई लाभ भी नहीं था। पिड़ित, शिकायतकर्ता व ग्रामवासियो केवल संदेह के आधार पर उक्त आदेश की सारी जिम्मेदारी आवेदक व सह अभियुक्त पर डाल रहे हैं जो अनुचित है। आवेदक ने कभी भी स्थानीय प्रशासन पर उक्त आदेश हेतु कोई भी दवाब नहीं बनाया था। उक्त आदेश को न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत चुनौती भी दी जा सकती है, परन्तु जानकारी के अनुसार अभी तक ऐसा नहीं किया गया है।
(iii) आत्महत्या से पूर्व लिखा गया कथित आत्महत्या पत्र (सुसाईड नोट) में आवेदक व सहअभियुक्त के ऊपर लगाये गये, मृतक को परेशान करने के सभी आरोप पूर्ण रूप से निराधार है और मात्र इस कारण से आत्महत्या के दुषप्रेरण का आरोप प्रथमदृष्टया भी नहीं बनता है। आवेदक ने न तो कोई अत्युक्ति कारित करी है और न ही उसकी कोई आपराधिक मनोवृत्ति ही प्रकट होती है, जो इस अपराध के आधारभूत अवयव है। यह भी महत्वपूर्ण है कि इस आत्महत्या पत्र का उल्लेख शिकायतकर्ता नें प्रथम सूचना रिपोर्ट जो 15.03.2021 को पंजीकृत कराई थी में कर दिया था कि वो पत्र पुलिस थाने में जमा है, परन्तु अन्वेषण अधिकारी ने कथित आत्महत्या पत्र को 16.03.2021 को मृतक के कमरे से बरामद किया जैसा कि सामान्य दैनिक विवरण में उल्लेखित है। यह परिस्थितियां उक्त आत्महत्या पत्र को ही संदिग्ध बनाती है। अपने इन तर्को के समर्थन में, वरिष्ठ अधिवक्ता ने उच्चतम न्यायालय द्वारा अरनर्व मनोरंजन गोस्वामी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) 2 एस०सी०सी०427, गुरचरन सिंह बनाम पंजाब राज्य (2000) 10 एस०सी०सी० 200 व पश्चिम बंगाल राज्य बनाम इन्द्रजीत कुन्दु व अन्य (2019) 10एस०सी०सी०128 के मामलों में पारित निर्णयों पर इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित करवाया।
(iv) अभियोजन द्वारा अन्वेषण के उपरान्त आवेदक व सहअभियुक्त के विरूद्ध आरोप पत्र सक्षम न्यायालय में प्रेषित किया जा चुका है, अतः अब आवेदक को न्यायिक अभिरक्षा में कारागार में रखने का कोई न्याय संगत औचित्य नहीं है। आवेदक समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति है, जो न्याय प्रणाली का सम्मान करता है व उसके न्यायिक प्रक्रिया से भागने की कोई भी सम्भावना नहीं है, साथ ही साथ यह भी ध्यान रखने वाल तथ्य है कि धारा 306 भा०दं०सं० के अंतर्गत दोषी होने पर अधिकतम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है और वर्तमान में कोविड-19 महामारी के कारण और कारागार में क्षमता से अधिक अभियुक्त बन्द होने के कारण, इस महामारी के संक्रमण को रोकने के लिए परीक्षणाधीन अभियुक्तों की कुछ श्रेणियों को पेरोल भी न्यायिक आदेश से दिया जा रहा है।
(v) अभियोजन द्वारा जो श्रव्य अंश, जिसका विस्तृत उल्लेख सत्र न्यायालय ने अपने आदेश में किया है, उसकी कोई वैज्ञानिक जाँच नहीं हुई है, अतः यह नहीं माना जा सकता कि वो वार्ता कथित रूप से मृतक व आवेदक के मध्य ही हुई थी। इसके अतरिक्त वार्ता से भी यह साक्ष्य साबित नहीं होता है, कि आवेदक ने आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध कारित किया हो, क्योंकि वार्ता से न तो आवेदक की कोई आपराधिक मनोवृत्ति ही प्रकट होती है और न ही अपराध के लिए आवेदक के द्वारा कोई अत्युक्ति ही कारित होती प्रतीत होती है।
(vi) आवेदक जमानत मिलने की दशा मे किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं करेगा व न ही न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी तरह की व्यवधान डालने की कोशिश करेगा। न्यायालय से प्रार्थना है कि आवेदक का जमानत प्रार्थना पत्र स्वीकार करें।
(Vii) आवेदक के पक्ष की ओर से लिखित बहस भी दाखिल की गयी जिसमें मुख्यता मौखिक बहस को ही लिखित रूप दिया गया है।

अभियोजन व शिकायतकर्ता का पक्ष-

5. आवेदक के पक्ष का विरोध में अभियोजन का पक्ष उसके विद्वान अधिवक्ता महेश चन्द्र चतुर्वेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता व अतिरिक्त महाधिवक्ता नें अपने सहयोगी अजीत कुमार शर्मा व सतेन्द्र नाथ तिवारी, अतिरिक्त शासकिय अधिवक्ताओं के साथ तथा शिकायतकर्ता की ओर से उसके विद्वान अधिवक्ता बृजराज सिंह, ने रखा। जो संक्षेप मे निम्न हैः-

(i) आत्महत्या पत्र (सुसाइड नोट) व आवेदक व मृतक के मध्य हुई वार्ताओं के श्रव्य अंश के आधार पर यह शीशे की तरह स्पष्ट है कि, आवेदक मृतक को परेशान कर रहा था। मृतक के द्वारा क्षमायाचना माँगने के बाद भी वो एक माफिया की तरह एक मजलूम पर जुल्म ठाये जाने वाले लहजे में बात करता सुनाई देता है। आत्महत्या पत्र में भी आवेदक व सह अभियुक्त द्वारा स्पष्ट रूप से आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध पूर्ण रूप से कारित किया जाना प्रथम दृष्टवा प्रकट होता है। इस नाते अधिवक्ताओं ने न्यायालय का ध्यान सत्र न्यायालय के आदेश के आंतरिक पृष्ठ सं० 5, 6 व 7 पर करवाया व उसको न्यायालय के समक्ष पढ़ा भी गया।
(ii) शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने निवेदन किया कि आवेदक एक आपराधिक मानसिकता रखने वाला अपराधी है, जिसका एक वृहत आपराधिक इतिहास भी है और उसका पुलिस व प्रशासनिक विभागों पर प्रभाव भी है, जिसके कारण उसके विरूद्ध आरोप पत्र प्रेषित न कर आपराधिक मामलों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की जाती रही है। इस कारण अगर आवेदक को जमानत दी जाती है तो इसकी संभावना अधिक होगी कि वो न्यायिक प्रक्रिया में अड़चन डाले व गवाहों को डरा धमका कर विचारण की प्रक्रिया को प्रभावित करे।
(iii) शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने यह भी कथन किया कि आवेदक व सह अभियुक्त ने मृतक व उसके पिता व ग्राम वासियों को परेशान करने के लिए उस पर झूठे आपराधिक मुकदमें पंजीकृत कराये व अपने प्रभाव से उन मुकदमों में अतिशीघ्र अन्वेषण पूर्ण कराके सबके विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल भी करवा दिया। इसके विपरीत वर्तमान प्रकरण में अन्वेषण को रूकवाया व बहुत देर से पूर्ण होने दिया और बहुत मुश्किल उनके विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल हो पाया है। इन सबसे यह स्पष्ट है कि आवेदक बहुत रसूख वाला व्यक्ति है, जिसका पुलिस व अन्य विभाग पर अच्छा खासा प्रभाव है। प्रकरण के गवाहान को उचित सुरक्षा भी प्रदान करायी जाये, जैसा कि सत्र न्यायालय ने आदेशित किया है।
(iv) सह अभियुक्त को अभी मात्र अंतरिम अग्रिम जमानत का आदेश दिया गया है तथा उसकी याचिका पर अभी अंतिम निर्णय पारित होना शेष है, इसके अतिरिक्त समता जमानत देने का एक मात्र आधार नहीं हो सकता है।
(v) शिकायतकर्ता ने अपने संक्षिप्त लिखित नोट के माध्यम से यह तथ्य इस न्यायालय के संज्ञान में लाया गया कि आवेदक ने अपना संपूर्ण आपराधिक इतिहास इस न्यायालय के समक्ष घोषित नहीं किया है। आवेदक अपराध मुकदमा संख्या 510/2017 अंतर्गत धारा 147,148,504,506,427 भा०दं०सं० व धारा 3(1)(xiv) अनुसुचित जाति/ अनुसुचित जनजाति (नृशंसता निवारण) अधिनियम 1989, दिनॉक 28/6/2017 थाना महुली, जिला- संत कबीर नगर में भी एक अपराधी है तथा सक्षम न्यायालय के समक्ष सम्मन तलब होने के उपरान्त भी उपस्थित नहीं हो रहा है, तथा वर्तमान में उसके विरूद्ध बी डब्लू जारी हो चुका है।
(vi) अतिरिक्त महा अधिवक्ता ने उपरोक्त बहस के अतिरिक्त एक और विषय पर इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित करवाया कि सत्र न्यायालय ने आवेदक की जमानत प्रार्थना पत्र निरस्त करते हुए जिले की कानून व्यवस्था व जिला के जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक पर टिप्पणी की है, जो अनुचित व अकारण है। यह टिप्पणी आदेश के आंतरिक पृष्ठ 8 पर उल्लेखित है जो निम्न उल्लेखित हैः-
"आवेदक/अभियुक्तगण द्वारा वादी मुकदमा रामवचन गुप्ता तथा जगदीशपुर गौरा गाँव के अन्य लोगों से आवेदक/अभियुक्त रवीन्द्र प्रताप उर्फ पुप्पू शाही के बीच जमीन संबंधी विवाद चल रहा है जिसके कारण वादी मुकदमा का लड़का रघुबीर गुप्ता (मृतक) गाँव वालों के साथ जिला व तहसील पर प्रदर्शन करने के कारण अभियुक्त अपने साथियों के साथ रघुवीर गुप्ता को मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था जिसका उल्लेख मृतक द्वारा अपने सुसाइड नोट में किया गया है और जो आडियो क्लीप न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गयी है उससे भी स्पष्ट हो जाता है। यदि मृतक रघुबीर गुप्ता को जिला सन्त कबीर नगर के प्रशासन व उच्च अधिकारियों द्वारा अथवा पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों द्वारा उसके प्रार्थना पत्र पर व उसके याचना पर समय रहते नियमानुसार कार्यवाही की गयी होती तो मृतक रघुबीर गुप्ता अपना जीवन समाप्त नहीं करता। ऐसा प्रतीत होता है कि जनपद सन्तकबीर नगर में ला एण्ड आर्डर का अभाव है। यह बहुत ही दुख का विषय है। चूँकि अभियुक्त रवीन्द्र प्रताप उर्फ पप्पू शाही द्वारा जमीन के कब्जेदारी के विवाद को लेकर वादी मुकदमा के लड़के रघुबीर गुप्ता को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया तथा मोबाईल फोन से प्रताड़ित किया गया और जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक सन्तकबीर नगर को मृतक द्वारा प्रार्थना- पत्र दिये जाने पर उनके द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गयी, इस कारण वादी मुकदमा के लड़के रघुबीर गुप्ता ने आत्महत्या कर अपना जीवन समाप्त कर लिया गया। प्रशासन व पुलिस विभाग के जिन अधिकारियों द्वारा उसकी याचना पर कार्यवाही नहीं की गयी, उक्त अधिकारीगण भी परोक्ष रूप से उत्तरदायी प्रतीत होते हैं।" (रेखांकन न्यायालय द्वारा किया गया है)
(vii) अतिरिक्त महाधिवक्ता ने निवेदन किया कि उपरोक्त टिप्पणी, जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक के पक्ष को सुनवाई का अवसर न देते हुए की गई है और वो प्रकरण के तथ्यों के विपरीत भी है, पुलिस विभाग ने वर्तमान मामले में अतिशीघ्र अन्वेषण पूर्ण करा कर आवेदक व सह अभियुक्त के विरूद्ध आरोप पत्र प्रेषित भी करा जा चुका है। अतः इस अनुचित टिप्पणी को अपलोपित करने का आदेश पारित करे।
(viii) राज्य के पक्ष की ओर से लिखित बहस भी दाखिल की गई है जिसमें मौखिक बहस को लिखित रूप ही दिया गया है। शिकायतकर्ता ने भी एक लिखित नोट 31.05.25021 को दाखिल किया, जिसको भी न्यायालय ने ध्यान पूर्वक अवलोकन किया।

जमानत की विधि 6 (i) विधि का सिद्धान्त है कि "जमानत नियम और जेल अपवाद है"। जमानत न तो किसी यांत्रिक आदेश से स्वीकार या अस्वीकार ही की जा सकती है, क्योंकि यह न केवल उस व्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जिसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही चल रही है, परन्तु यह दण्ड न्याय प्रणाली के हित से भी संबंधित है और यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है, कि अपराध करने वालों को न्याय में बाधा डालने का अवसर न दिया जाये।

(ii) जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय को कुछ कारकों को ध्यान में रखना चाहिए, जैसे कि अभियुक्त के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला का होना, आरोप की गंभीरता और प्रकृति, आरोप सिद्ध होने की स्थिति में सजा की कठोरता, अनुपूरक साक्ष्य की प्रकृति, न्यायालय की आरोप के लिये प्रथम दृष्टया संतुष्टि, अभियुक्त की हैसियत व पद, अभियुक्त की न्याय से भागने और अपराध को दोहराने की संभावना, साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ की संभावना, शिकायतकर्ता और गवाह को धमकी की आशंका और अपराधी का अपराधिक इतिहास जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय को मामले के अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता व स्थिरता की स्थिति की गुण-दोष की जांच सघनता से नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यह केवल परीक्षण के दौरान ही जांचा जा सकता है। इसके अतरिक्त समता ज़मानत का एकमात्र आधार तो नहीं है, परन्तु यह उपरोक्त पहलुओं में से एक हो सकता है, जो अनिवार्य रुप से जमानत के आवेदन पर विचार करते समय विचारणीय होने चाहिए।

(iii) यह अविवादित है, कि जमानत देना या न देना, यह उस न्यायालय का विवेकाधिकार है, जो इस मामले की सुनवाई कर रहा है। हालांकि यह विवेकाधिकार निर्बाध है। परन्तु इसका उपयोग न्यायसंगत, मानवीय व सहानुभूति पूर्वक ही किया जाना चाहिए न कि मनमाने तरीके से। जमानत स्वीकार या अस्वीकार करने के आदेश में कारणों को प्रथम दृष्टया इंगित करना चाहिए, हालांकि गुण-दोष पर साक्ष्य की विस्तृत जांच और विस्तृत दस्तावेजीकरण को दर्शाने की आवश्यकता नहीं है। जमानत की शर्तें इतनी भी सख्त नहीं होनी चाहिए की उसका अनुपालन करना ही अक्षम हो जाये, जिससे जमानत ही काल्पनिक न हो जाये।

आत्म हत्या का दुष्प्रेरण की विधि-

7(i) भा० दं० सं० की धारा 306, "आत्महत्या का दुष्प्रेरण" के अपराध व सजा के प्रावधानों को वर्णित करता है, जिसके अनुसार " यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करे तो जो कोई ऐसी आत्महत्या का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोनो मे से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा" तथा किसी बात का 'दुष्प्रेरण' क्या है यह भा०दं०सं० की धारा 107 में परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार दुष्प्रेरण का अपराध तीन रूप में कारित किया जा सकता है, पहला उस बात को करने के लिए किसी व्यक्ति को उकसाकर, दूसरा उस बात को करने के लिए षड्यन्त्र करके या अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ सम्मलित होकर षड्यन्त्र करके उसके अनुसरण या उद्देश्य से कोई कार्य या अवैध लोप घटित हो जाये अथवा तीसरा उस बात के किये जाने में किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता करना।

(ii) दुष्प्रेरण में एक मानसिक प्रक्रिया शामिल होती है, जिससे किसी व्यक्ति को उकसाने या अभिप्राय पूर्वक उसके किसी कार्य को सहायता देना होता है। आत्महत्या करने के लिए उकसाने या सहायता करने के लिए अभियुक्त की ओर से कोई सकारात्मक कार्य होना चाहिये तथा इन सबके पीछे अभियुक्त का दोषपूर्ण आशय अवश्य होना चाहिये।

(iii) दुष्प्रेरण के अपराध को सिद्ध करने के लिए उक्त अपराध को कारित करने के लिए अभियुक्त की आपराधिक दोषपूर्ण मानसिक स्थिति स्पष्ट रूप से दृष्टगोचर होनी चाहिए। आशय को सिद्ध करने के लिए, ऐसा साक्ष्य पत्रावली पर उपस्थित होना चाहिये कि अभियुक्त ने अपने दोषपूर्ण मानस के अनुसरण में किसी व्यक्ति को आत्महत्या के कृत को करने के लिए उकसाने या उसका उस कृत को कारित करने के लिए जान बूझकर सहायता प्रदान करी हो। (देखेः- अरनव मनोरंजन गोस्वामी बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्यः (2021) 2 एस सी सी 427, कामन कॉज बनाम भारत सरकार (2018) 5 एस सी सी 1, राजेश बनाम हरियाणा राज्य (2020) 15 एस सी सी 359, गुरुचरन सिंह बनाम पंजाब राज्य (2020) 10 एस सी सी 200) विश्लेषण 8(i) पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों, उभय पक्ष की मौखिक व लिखित बहस से निम्न वो तथ्य है जिन पर प्रथम दृष्टवा कोई विवाद नहीं हो सकता हैः-

(a) मृतक रेलवे विभाग मे गेट मैन के पद पर कार्य करता था तथा मृत्यु के समय उसकी नियुक्ति, तकिया रेलवे स्टेशन पर थी व वो स्टेशन के पास सरकारी निवास पर रहता था तथा वही उसने जहर खाया व बाद में अस्पताल में उपचार के दौरान मृत्यु हो गयी।

(b) जिलाधिकारी ने कार्यवाही करते हुए सार्वजनिक भूमि पर कई वर्ष पूराने कृषि पट्टों को निरस्त कर दिया था, जिनसे मृतक के पिता (शिकायतकर्ता) व अन्य ग्रामवासी प्रभावित हुए थे व आदेश के विरूद्ध धरना प्रदर्शन भी हुआ था, जिसमें मृतक ने भी भागीदारी की थी।

(c) कथित रूप से सरकारी कार्य में अड़चन पहुँचाने के कारण व सहअभियुक्त पर हमला करने के कारण कुछ ग्रामवासियों के विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत हुई थी जिस पर अन्वेषण के बाद आरोप पत्र प्रेषित भी किये जा चुके है, जिनमे मृतक व शिकायतकर्ता भी शामिल है।

(d) आवेदक ने अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस अधीक्षक के पास गुहार लगाई थी व कथित रूप से आवेदक व मृतक की कई वार्ता भी हुई थी जिसमें उसने क्षमा याचना करी थी। इसी क्रम में कथित रूप से मृतक व जिलाधिकारी की भी वार्ता हुई थी जिसमें मृतक ने अपनी परेशानियाँ साझा करी थी परन्तु उसकी प्रार्थना पर कोई कार्यवाही नहीं हुई थी।

(e) आवेदक वर्तमान में सभासद है तथा समाज में उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव भी है तथा उसका आपराधिक इतिहास भी है, जो वर्ष 2004 से अब तक 6 आपराधिक मुकदमों का है जिनमें या तो अंतिम रिपोर्ट प्रेषित की जा चुकी या न्यायालय के आदेश के कारण अगामी कार्यवाही पर रोक है। आवेदक ने एक आपराधिक मुकदमे की घोषणा नहीं करी है जिसका उल्लेख इस निर्णय में प्रस्तर 5(v) में किया गया है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि उस मुकदमें में आवेदक के विरूद्ध बी० डब्लू० जारी किया गया है। न्यायालय के समक्ष समस्त जानकारी न देना एक गंभीर विषय है परन्तु वर्तमान प्रकरण में आवेदक ने अपने 6 आपराधिक मुकदमों की घोषणा की है, अतः एक अपराध का विवरण न देने की भूल दुर्भावनापूर्ण नहीं मानी जा सकती है।

(ii) अभियोजन का साक्ष्य प्रमुख्तयः आत्म हत्या पत्र व श्रव्य अंश पर आधारित है जिसमें आवेदक व सह अभियुक्त पर मृतक को परेशान करने का कथित साक्ष्य है तथा जिसके कारण मृतक ने आत्महत्या की थी, परन्तु जैसा पूर्व में उल्लेखित किया गया है कि आत्महत्या के दुष्प्रेरण के लिए अपराधी को दुष्प्रेरण का कृत किसी व्यक्ति को इस कृत का कारित करने के लिए उकसाने के लिए, आपराधिक मनोवृत्ति के साथ कि गयी कोई अत्युक्ति होनी चाहिये और इन कारणों की अनुपस्थिति की स्थिति में अपराध कारित होना नहीं माना जायेगा।

(iii) मृतक का आत्महत्या पत्र में यह लिखा गया है कि वो आवेदक व सहअभियुक्त द्वारा उसको आपराधिक मुकदमें मे कथित रूप से झूँठा फंसाने के कारण, मानसिक तनाव से ग्रस्त था। श्रव्य अंश में भी मृतक अपने आपको इस आपराधिक प्रकरण से मुक्त होने की याचना करता हुआ प्रतीत होता है। परन्तु आवेदक का लहजा सख्त रहता है तथा अभद्र भाषा का प्रयोग भी करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मृतक भूमि पट्टा के निरस्त होने के आदेश से ज्यादा अपने ऊपर लगाये गये आपराधिक मुकदमें से परेशान था जिसके कारण उसकी नौकरी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था। परन्तु वर्तमान स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता है मृतक के ऊपर लगाया गया आपराधिक मुकदमा झूठा था जबकि उसकी मृत्यु से पहले ही उसमें आरोप पत्र भी दाखिल किया जा चुका था। मृतक ने अपने जीवन काल में उपरोक्त आपराधिक मुकदमों के निदान हेतु कोई भी विधिक प्रक्रिया का उपयोग नहीं किया गया था। इसके अतिरिक्त "समाधान दिवस" पर अशांति फैलाने व संज्ञेय अपराध कारित होने की आशंका को देखते हुए मृतक व अन्य के विरूद्ध धारा 151/107/114 दं०प्र०सं० के अंतर्गत की गयी कार्यवाही को भी प्रथमदृष्टवा दुर्भावना पूर्ण या आवेदक के प्रभाव के कारण किया जाना प्रतीत नहीं होता है।

(iv) जैसा पूर्व मे उल्लेखित किया गया है, दुष्प्रेरण का अर्थ उकसाना, प्रवृत्त करना, उत्तेजित करना, भड़काना या कोई कार्य करने के लिए बढ़ावा देना है और इन सबके पीछे अभियुक्त की आपराधिक मनोवृत्ति का होना भी अनिवार्य है तब ही आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध कारित होना माना जायेगा।

(v) वर्तमान प्रकरण में प्रथम दृष्टया पट्टा निरस्तीकरण की कार्यवाही विधि की उचित प्रक्रिया के अन्तर्गत हुई है, जिसके विरूद्ध पीड़ित व्यक्ति को उचित विधि प्रक्रिया के अंतर्गत उपचार भी प्रदान किया गया है। यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि आवेदक ने मृतक के विरूद्ध कोई भी शिकायत पुलिस के समक्ष नहीं करी है। जो भी आपराधिक मुकदमा मृतक के विरूद्ध पंजीकृत हुआ है, उसका शिकायतकर्ता सह अभियुक्त जितेन्द्र कन्नौजिया (जिसको इस न्यायालय ने अंतरिम अग्रिम जमानत दे रखी है) या विभाग के कर्मचारीगण हैं, केवल इस कारण से कि आवेदक का नाम आत्महत्या पत्र मे उल्लेखित है तथा कथित श्रव्य अंश में मृतक व आवेदक के बीच वार्ता में मृतक, याचना कर रहा है व आवेदक सख्त लहजे मे बोल रहा है, प्रथम दृष्टया यह नहीं माना जा सकता कि आवेदक के ऊपर लगाया गया आत्महत्या के दुष्प्रेरण का आरोप पूर्ण रूप से सत्य है, इसके प्रतिकूल प्रथमदृष्टया पूर्व के विश्लेषण के आधार पर तथा धारा 306 भा०द०सं० के अवयवों को ध्यान में रखा जाये तो प्रथम सूचना रिपोर्ट व उपलब्ध प्रपत्रों तथा धारा 306 के अवयवों के बीच संबंध स्थापित हुआ प्रतीत नहीं होता है, बल्कि इसके विपरित वियोजित प्रतीत होता है।

(vi) उपरोक्त विश्लेषण, जमानत की विधि में वर्णित अनिवार्य कारकों को और कोविड-19 के कारण उत्पन्न विषम परिस्थियों को भी ध्यान में रखते हुए, आवेदक, जो 16.03.2021 से कारावास में है, उसकी जमानत याचिका को स्वीकार करने का मजबूत पक्ष, इस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने में सफल हो पाया है।

9. "आफ द कफ" टिप्पणी अतिरिक्त महाधिवक्ता ने इस न्यायालय का ध्यान, सत्र न्यायालय द्वारा आवेदक की जमानत प्रार्थना पत्र को निरस्त करते हुए संत कबीर नगर जिले की कानून व्यवस्था व जिले के जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक पर की गयी टिप्पणी पर भी कराया है व प्रार्थना करी कि उस टिप्पणी को अपलोपित कर दिया जाये। यह न्यायालय आवेदक की जमानत याचिका पर जमानत के समवर्ती अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत सुनवाई कर रहा है तथा उक्त आदेश न्यायालय के समक्ष आक्षेपित भी नही है, अतः यह न्यायालय वर्तमान क्षेत्राधिकार में इस प्रार्थना को स्वीकर नही कर सकता तथा उसके उपचार के लिए राज्य, उचित व विधि सम्मत निदान की प्रक्रिया अपनाने के लिए स्वतंत्र है, फिर भी यह कहना यथोचित रहेगा कि अवर न्यायालय को "आफ द कफ" (off the cuff) टिप्पणी देने से बचना चाहिये। ऐसी टिप्पणी जब तक अति आवश्यक न हो उल्लेखित करनी नहीं चाहिये, वो भी तब जब उस अधिकारी को अपने बचाव या परिस्थितियों के स्पष्ट करने का कोई मौका न दिया गया हो। यहाँ यह भी उल्लेखित करना भी प्रासंगिक रहेगा कि किसी भी जिला के जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक या और भी अन्य अधिकारी को अपना कार्य निष्ठापूर्वक व संवेदनशील होकर करना चाहिये और किसी पीड़ित की व्यथा की सुनवाई व उचित कार्यवाही अति शीध्र करने का भरकस प्रयास करना चाहिये। (देखें भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनाम एस० आर० विजया भाष्कर व अन्य (2021) एस०सी०सी ऑनलाइन एस०सी० 364)

10. त्वरित विचारण अवर न्यायालय से यह अपेक्षा रहेगी कि वो वर्तमान प्रकरण का विचारण शीघ्रता से कर मामले का निपटारा करेगी तथा विचारण के दौरान दं०प्र०सं० की धारा 309 में कार्यवाही को मुल्तवी या स्थगित करने की शक्ति के प्रावधानों का ध्यान भी रखा जायेगा। त्वरित विचारण (स्पीडी ट्रायल) जिसका तात्पर्य "उचित शीघ्रता वाला विचारण है" भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रतिष्ठापित "प्राण व दैहिक स्वतंत्रता" के मूल अधिकार का अभिन्न एवं मूलभूत अंश है। अवर न्यायालय से अपेक्षा रहेगी की वर्तमान प्रकरण में विचारण आज से अधिकतम 6 मास के भीतर सम्पन्न कर लिया जायेगा। (देखेः हुसैन आरा खातून (iv) बनाम गृह सचिव, बिहार राज्यः (1980) 1 एस सी सी 81, अब्दुल रहमान अंतुल्य बनाम आर० एस० नायकः (1992) 1एस सी सी 225, करतार सिंह बनाम पंजाव राज्यः (1994) 3 एस सी सी 569, कॉमन कॉज बनाम भारतीय संघः(1996) 4 एस सी सी 33) साक्षी सुरक्षा योजना

11. उच्चतम न्यायालय ने महेन्द्र चावला व अन्य बनाम भारत संघ (2019) 14 एस० सी० सी० 615 के मामले में पारित निर्णय दिनॉक 5.12.2018, में केन्द्रिय सरकार के द्वारा राज्यों व अन्य प्रधिकरणों से विचार विमर्श के उपरान्त निर्मित "साक्षी सुरक्षा योजना 2018" (विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम 2018) जो उक्त निर्णय में पूर्ण रूप से उल्लेखित की गयी है, को पूर्ण रूप में स्वीकार किया व, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141/142 के अंतर्गत उक्त योजना को एक विधि का दर्जा देते हुए, योजना को तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश पारित किया। साथ ही साथ हर राज्य व केन्द्र शासित राज्य को इस योजना को विधि के रूप मे साक्षर पालन करने का निर्देश भी दिया जा चुका है। उक्त योजना के अंतर्गत सक्षम प्राधिकार को साक्षी को उचित सुरक्षा प्रदान करने के लिए आदेश पारित करने के अधिकार दिये गये है। अगर उत्तर प्रदेश राज्य ने अभी तक उक्त निर्णय का साक्षर अनुपालन नहीं किया गया है तो वो महेन्द्र चावला (पूर्व में उल्लेखित) के निर्णय के अनुपालन न करने के कारण हो सकने वाले कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होंगे। शिकायतकर्ता अपनी व अन्य साक्षी की सुरक्षा के लिए राज्य या पुलिस अधीक्षक के समक्ष आवेदन देने के लिए स्वतंत्र है, जो विधिसम्मत निर्णय लेने के लिए वाध्य होंगें। इस योजना के परिच्छेद 12 के अनुसार प्रत्येक राज्य इस योजना का व्यापक प्रचार करने के लिए बाध्य हैं, अतः इसके लिये उत्तर प्रदेश राज्य ने अगर अभी तक उचित प्रक्रिया लागू नहीं करी है, तो अब अवश्य करें। राज्य के मुख्य सचिव पर इसके अनुपालन का उत्तरदायित्व है अतः वो अविलम्ब उचित अगामी कार्यवाही करे। इसी परिच्छेद के अनुसार, अन्वेषण अधिकारी भी बाध्य है कि वो इस योजना व इसकी मुख्य विशेषताएँ साक्षियों को बतायें, अगर वर्तमान प्रकरण में ऐसा न किया गया हो, तो तुरंत किया जाये। वर्तमान प्रकरण में अगर किसी भी साक्षी को किसी प्रकार के खतरे की आशंका है तो उसको ध्यान में रखते हुए यह प्रशासन का उत्तरदायित्व है कि वो उनको उचित सुरक्षा प्रदान करे। इस संबध में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देशित किया जाता है कि उक्त योजना की जानकारी अपने विभाग में प्रत्येक थाने तक पहुचाने के लिए योजनाबद्ध प्रयास करें तथा यह भी सुनिश्चित करें कि इस योजना का उचित लाभ साक्षियों को प्राप्त हो सके।

12. अतः उपरोक्त वर्णित विभिन्न पहलुओं पर विधि की स्थिति, प्रकरण के तथ्य व परिस्थितियों तथा उपरोक्त विश्लेषण को ध्यान में रखकर, यह न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वर्तमान जमानत का प्रार्थना पत्र स्वीकार किये जाने योग्य है। अतः स्वीकार किया जाता है।

13. प्रार्थी/आवेदक, रविन्द्र प्रताप शाही उर्फ पप्पू शाही जो मु०अ०सं० 0085/2021 अन्तर्गत धारा 306 भा०दं०सं० थाना महुली, जिला सन्त कबीर नगर में अभियुक्त/आरोपित है, जो उसके द्वारा वो राशि जो सक्षम न्यायालय द्वारा निर्धारित की जायेगी के व्यक्तिगत बंधपत्र एवं उसी धनराशि की दो प्रतिभूति निष्पादित/प्रस्तुत करने पर अविलम्ब जमानत पर निम्न शर्तों के अधीन रिहा किया जावेः-

(i) प्रार्थी/आवेदक इस आशय का आवश्वासन देगा कि वह सक्षम न्यायालय के सम्मुख किसी भी प्रकार से न्यायालय की कार्यवाही को स्थगित नहीं करवाएगा तथा वह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किसी भी प्रकार से गवाहान को प्रभावित नहीं करेगा तथा न्यायकरण की प्रक्रिया को अवरूध नहीं करेगा। यदि वह उपरोक्त व्यवस्था को नहीं मानेगा उस दशा में सक्षम न्यायालय प्रार्थी के जमानत आदेश पर समुचित कार्यवाही करने हेतु स्वतन्त्र होगा।

(ii) प्रार्थी/आवेदक सक्षम न्यायालय के सम्मुख प्रत्येक दशा में, जैसा कि आदेशित हो, प्रत्येक दिवस पर व्यक्तिगत रूप से अथवा अपने अविभाषक के माध्यम से उपस्थित होवेगा एवं यदि अनुपस्थिति बिना किसी समुचित आधार के पाई जावेगी उस दशा में सक्षम न्यायालय प्रार्थी/आवेदक के विरूद्ध धारा 229-अ भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत कार्यवाही के लिए स्वतन्त्र होगा।

(iii) यदि प्रार्थी/आवेदक जमानत की किसी भी स्थिति से परे कार्य करेगा एवं सक्षम न्यायालय के सम्मुख अनुपस्थित रहेगा उस दशा में सक्षम न्यायालय प्रार्थी/आवेदक के विरूद्ध धारा 82 दण्ड प्रक्रिया संहिता की कार्यवाही करने हेतु स्वतन्त्र रहेगा।

(iv) आवेदक, जब तक इस प्रकरण का विचारण संपूर्ण नहीं हो जाता है, वो शिकायतकर्ता के मौहल्ला सूर्य, नगर पंचायत हरिहरपुर, थाना महोली, जिला संत कबीर नगर में प्रवेश नहीं करेगा और अति आवश्यक हो तो प्रवेश के पूर्व थाना प्रभारी महोली को पूर्व में लिखित में सूचना देगा तथा प्रवेश का कारण बतायेगा तथा सक्षम थाना प्रभारी प्रवेश की अनुमति देने या न देने का अधिकारी होगा।

(v) आवेदक/ प्रार्थी की ओर से इस जमानत आदेश की प्रतिलिपि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकृत वेबसाइट से अधोभरण (डाउनलोड) कर के भी सक्षम न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत की जावेगी।

(vi) सक्षम न्यायालय/अधिकारी आदेश की कम्प्यूटर जनित(जनरेटेड) प्रतिलिपि का सम्यक परीक्षण इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकृत वेबसाइट से करने के उपरान्त ही लिखित रूप में आवेदक/प्रार्थी को जेल से छोड़ने का आदेश पारित करेगा।

14. उपरोक्त शर्तों का उल्लंघन करने की दशा में प्रार्थी/आवेदक की जमानत निरस्त की जा सकेगी।

15. इस आदेश में उल्लेखित कोई भी टिप्पणी विचारण की प्रक्रिया व आदेश को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेगी।

16. वर्तमान जमानत याचिका उपरोक्त आदेशानुसार स्वीकर की जाती है।

17. इस उच्च न्यायालय के महाप्रबन्धक को निर्देशित किया जाता है कि वो इस निर्णय की एक प्रति अतिशीघ्र उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक को इस आशय से प्रेषित करे की इस निर्णय के प्रस्तर 11 में "साक्षी सुरक्षा योजना 2018" को राज्य में विधि के रूप में साक्षर, अनुपालन संबधी निदेशो को अतिशीघ्र कार्यान्वित करें।

18. उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक को यह भी निर्देश दिया जाता है कि इस निर्णय के प्रस्तर 11 में दिये गये निर्देशों के परिपालन संबंधी प्रगति रिपोर्ट, व्यक्तिगत शपथ पत्र के साथ इस न्यायालय के समक्ष आज से चार सप्ताह के भीतर दाखिल करें।

19. इस जमानत याचिका को इस निर्णय के केवल प्रस्तर 11, 17 व 18 में पारित निदेशों की प्रगति के अवलोकनार्थ व अगामी उचित आदेश के लिए 5/07/2021 को इस पीठ के समक्ष नवीन वाद सूची में क्रम संख्या एक पर सूचीबद्ध किया जाये।

आदेश दिनांकः- 07.06.2021 अवधेश (सौरभ श्याम शमशेरी, न्यायमूर्ति)