Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 4, Cited by 0]

State Consumer Disputes Redressal Commission

L.I.C. Of India vs Suresh Kumar Tiwari on 19 April, 2022

  	 Cause Title/Judgement-Entry 	    	       STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP  C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010             First Appeal No. A/1377/2019  ( Date of Filing : 02 Dec 2019 )  (Arisen out of Order Dated 23/10/2019 in Case No. C/261/2013 of District Jaunpur)             1. L.I.C. Of India  Branch Office Mungra Badshahpur Distt. Jaunpur Through Secretary (Legal) Zonal Office Legal Cell 6th Floor Jeevan Bhawan Phase II Hazratganj Lucknow ...........Appellant(s)   Versus      1. Suresh Kumar Tiwari  S/O Sri RAm Murti Tiwari  R/O Village Asvan Post janghai Tehsil Machhalishahr Distt. Jaunpur ...........Respondent(s)       	    BEFORE:      HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR PRESIDENT    HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER            PRESENT:      Dated : 19 Apr 2022    	     Final Order / Judgement    

 राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ

 

 अपील संख्‍या-1377/2019

 

(सुरक्षित)

 

(जिला उपभोक्‍ता आयोग, जौनपुर द्वारा परिवाद संख्‍या 261/2013 में पारित आदेश दिनांक 23.10.2019 के विरूद्ध)

 

1.

लाइफ इंश्‍योरेंस कारपोरेशन आफ इण्डिया, ब्रांच आफिस- मुंगरा बादशाहपुर, जिला- जौनपुर, द्वारा सेक्रेटरी (लीगल), जोनल आफिस लीगल सेल, छठा तल, जीवन भवन फेज II, हजरतगंज, लखनऊ

2. लाइफ इंश्‍योरेंस कारपोरेशन आफ इण्डिया, सीनियर डिवीजनल मैनेजर, डिवी0 आफिस, जीवन प्रकाश, गौरीगंज, भेलूपुर, वाराणसी, द्वारा सेक्रेटरी (लीगल), जोनल आफिस लीगल सेल, छठा तल, जीवन भवन फेज II, हजरतगंज, लखनऊ

3. लाइफ इंश्‍योरेंस कारपोरेशन आफ इण्डिया, रीजनल आफिस, 16/98, एम0जी0 मार्ग, कानपुर द्वारा सेक्रेटरी (लीगल), जोनल आफिस लीगल सेल, छठा तल, जीवन भवन फेज II, हजरतगंज, लखनऊ                                                                  ........................अपीलार्थी/विपक्षीगण बनाम सुरेश कुमार तिवारी, पुत्र श्री राम मूर्ति तिवारी, निवासी- ग्राम-असवां, पोस्‍ट-जंघई, तहसील-मछलीशहर, जिला-जौनपुर                                ...................प्रत्‍यर्थी/परिवादी समक्ष:-

1. माननीय न्‍यायमूर्ति श्री अशोक कुमार, अध्‍यक्ष।
2. माननीय श्री विकास सक्‍सेना, सदस्‍य।

अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से उपस्थित : श्री अरविन्‍द तिलहरी,                                     विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थी/परिवादी की ओर से उपस्थित : श्री नवीन कुमार तिवारी,                                 विद्वान अधिवक्‍ता।

दिनांक: 28.04.2022 माननीय श्री विकास सक्‍सेना, सदस्‍य द्वारा उदघोषित निर्णय      प्रस्‍तुत अपील अपीलार्थी/विपक्षीगण लाइफ इंश्‍योरेंस कारपोरेशन आफ इण्डिया व दो अन्‍य द्वारा इस आयोग के सम्‍मुख जिला उपभोक्‍ता आयोग, जौनपुर द्वारा परिवाद  संख्‍या-261/2013     -2- सुरेश कुमार तिवारी बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम व दो अन्‍य में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 23.10.2019 के विरूद्ध योजित की गयी।

अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री अरविन्‍द तिलहरी एवं प्रत्‍यर्थी/परिवादी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री नवीन कुमार तिवारी उपस्थित आये हैं।

हमारे द्वारा उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्‍तागण के तर्क को सुना गया तथा प्रश्‍नगत निर्णय एवं आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।

अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से लिखित तर्क प्रस्‍तुत किया गया। हमारे द्वारा अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से प्रस्‍तुत लिखित तर्क का अवलोकन किया गया।  

प्रस्‍तुत प्रकरण संक्षेप में इस प्रकार है कि प्रत्‍यर्थी/परिवा‍दी की पत्‍नी श्रीमती आशा देवी बेसिक शिक्षा परिषद उ0प्र0 के अन्‍तर्गत शिक्षा मित्र के रूप में प्राथमिक विद्यालय असवां मुंगराबादशाहपुर जौनपुर में दिनांक 22.04.2004 से 09.02.2012 तक लगातार कार्यरत रहीं, जिनके द्वारा कभी भी आकस्मिक अवकाश नहीं लिया गया। प्रत्‍यर्थी/परिवादी की पत्‍नी की मृत्‍यु दिनांक 14.02.2012 को रात 11 बजे सीने में दर्द होने व हृदय गति रूक जाने के कारण हो गयी। प्रत्‍यर्थी/परिवादी की पत्‍नी ने अपने जीवन काल में अपीलार्थी/विपक्षी बीमा निगम से अनमोल जीवन (लाभ रहित) बीमा योजना के अन्‍तर्गत 10,00,000/-रू0 का बीमा दिनांक 24.10.2011 को प्रस्‍ताव संख्‍या 8948 द्वारा 10 वर्ष के लिए कराया था, जिसका देय प्रीमियम 4029/-रू0 था, जिसकी प्रथम अदायगी दिनांक 28.10.2011 को की गयी, जिसका बाण्‍ड श्रीमती आशा देवी के नाम निर्गत किया गया था।

प्रत्‍यर्थी/परिवादी का कथन है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी उक्‍त बीमा पालिसी में नामिनी होने के कारण उसके द्वारा बीमा क्‍लेम अपीलार्थी/विपक्षी बीमा निगम के यहॉं  प्रस्‍तुत  किया  गया,  जिसे     -3- बीमा निगम ने दिनांक 26.06.2013 को बीमाधारक की मृत्‍यु क्रानिक किडनी बीमारी होने का गलत आधार दर्शाते हुए अस्‍वीकार कर दिया, जबकि बीमाधारक आशा देवी को कोई भी बीमारी नहीं थी। अपीलार्थी/विपक्षी बीमा निगम के निर्देशानुसार उनके क्षेत्रीय कार्यालय कानपुर को पुनर्विचार प्रतिवेदन प्रस्‍तुत किया गया तथा विलम्‍ब होने पर अनुस्‍मारक भेजा गया। प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा जन सूचना अधिकार के अन्‍तर्गत सूचना मांगने पर उसे भ्रमपूर्ण सूचना दी गयी। इस प्रकार अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम द्वारा अपनी सेवाओं में गम्‍भीर त्रुटि कारित की गयी। अत: क्षुब्‍ध होकर प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम के विरूद्ध जिला उपभोक्‍ता आयोग के समक्ष परिवाद योजित करते हुए वांछित अनुतोष की मांग की गयी।

     जिला उपभोक्‍ता आयोग के समक्ष अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम द्वारा अपना संयुक्‍त जवाबदावा प्रस्‍तुत किया गया तथा परिवाद पत्र के अधिकांश तथ्‍यों का खण्‍डन करते हुए कथन किया कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी को अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम के विरूद्ध परिवाद प्रस्‍तुत करने का कोई वाद कारण उत्‍पन्‍न नहीं हुआ। परिवाद गलत तथ्‍यों के आधार पर दाखिल किया गया है। प्रत्‍यर्थी/परिवादी बीमा निगम की शाखा हडि़या में बीमा अभिकर्ता है और उसने अपनी खुद की पालिसी जिसका नम्‍बर 314727987 बीमा अनमोल 10,00,000/-रू0 की है अपनी एजेन्‍सी से ही अभिकर्ता होने की बात छिपाकर लिया था और इसी तरह अपनी एजेन्‍सी को छिपाकर कालान्‍तर में पालिसी संख्‍या 314054441 बीमा गोल्‍ड प्‍लान भी लिया है।

     अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम का कथन है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी बेहद चालाक और शातिर किस्‍म का है और उसने बीमा निगम के विरूद्ध चाल चलकर अपनी पत्‍नी का बीमा कराया, जबकि वह पूर्व से ही वृभक अकमर्णता से ग्रसित थी। बीमाधारक की मृत्‍यु के सम्‍बन्‍ध में चिकित्‍सक ने प्रमाण पत्र में  कहा  है  कि     -4- रात्रि में बीमाधारक के घर गया तो उसकी मृत्‍यु हो चुकी थी। प्रत्‍यर्थी/परिवादी ने बीमाधारक की मृत्‍यु के पूर्व चिकित्‍सक के पास न ले जाकर, चिकित्‍सा न कराकर फर्जी एवं असत्‍य मृत्‍यु प्रमाण पत्र प्राप्‍त किया है। बीमाधारक की पालिसी अल्‍पावधि पालिसी थी, जो तीन वर्ष से कम चली थी और मात्र एक किस्‍त अदा की गयी थी। ऐसी अल्‍पावधि पालिसी के मृत्‍युदावा भुगतान के संबंध में बीमा निगम द्वारा गहन जांच की आवश्‍यकता होती है। जांच की गयी और जांच अधिकारी द्वारा ग्राम प्रधान व अन्‍य गवाहों का बयान लिया गया और जिला बांदा के चिकित्‍सालय की रिपोर्ट भी है कि बीमाधारक दिनांक 19.04.2011 से दिनांक 12.05.2011 तक भर्ती रही और अन्तिम बार दिनांक 17.12.2011 को चिकित्‍सा के लिए आयी थी, बीमाधारक वृभक अकमर्णता से पीडि़त थी। नाजरेथ अस्‍पताल में भी बीमाधारक की किडनी की बीमारी का इलाज हुआ था और बीमाधारक के गॉंव के चन्‍द्रमणि तिवारी का दिनांक 25.03.2013 का पत्र जो डाक द्वारा प्राप्‍त हुआ, उसके अनुसार बीमाधारक को पिछले 10 वर्षों से किडनी की बीमारी थी। एक वर्ष से बीमाधारक की दोनों किडनी खराब हो गयी थी, उसके पति ने अवैध लाभ के लिए बीमा निगम की कार्य प्रणाली से परिचित होने के कारण गलत ढंग से बीमारी छिपाकर बीमा पालिसी लिया और बीमाधारक की डायलिसिस के दौरान ही इलाहाबाद में दिनांक 14.11.2012 को मृत्‍यु हो गयी थी। बीमाधारक द्वारा अपनी बीमारी को छिपाकर बीमा पालिसी प्राप्‍त की गयी, इस कारण बीमा निगम द्वारा बीमा क्‍लेम निरस्‍त करके सेवा में कोई कमी नहीं की गयी। अत: परिवाद निरस्‍त होने योग्‍य है।

जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा उभय पक्ष के अभिकथन एवं उपलब्‍ध साक्ष्‍यों/प्रपत्रों पर विचार करने के उपरान्‍त अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की सेवा में कमी पायी गयी और परिवाद निस्‍तारित करते हुए निम्‍न आदेश पारित किया गया:-

''हस्‍तगत उपभोक्‍ता परिवाद संख्‍या 261/2013 सुरेश  कुमार     -5- तिवारी बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम व 2 अन्‍य एतदद्वारा तद्नुसार निस्‍तारित किया जाता है। परिवादी विपक्षी सं01 ता 3 बीमा निगम से बीमित धनराशि 10,00,000रू0 एवं उस पर परिपक्‍वता तिथि से वास्‍तविक भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्‍याज भी पाने का मुस्‍तहक है।
इसके अतिरिक्‍त परिवादी विपक्षीगण बीमा निगम से शारीरिक, मानसिक कष्‍ट के रूप में 25,000रू0 एवं वादब्‍यय के रूप में 5,000 रू0 भी पाने के मुस्‍तहक होगा।
यदि एक माह के अन्‍दर विपक्षीगण बीमा निगम द्वारा उपरोक्‍त एवार्ड की समस्‍त धनराशि का भुगतान नही किया जाता है तो उपरोक्‍त कुल क्षतिपूर्ति की धनराशि मु0 30,000रू0 पर भी निर्णय की तिथि से वास्‍तविक भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्‍याज भी देय होगा।
निर्णय/आदेश की एक-एक प्रति उभय पक्षो को नियमानुसार अविलम्‍ब नि:शुल्‍क प्रदान किया जाना सुनिश्चित किया जाये।'' अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि बीमाधारक ने बीमा प्रस्‍ताव में गलत सूचना दिया है और अपनी किडनी की गम्‍भीर बीमारी को छिपाया है। अत: बीमाधारक द्वारा अपनी बीमारी को छिपाने के कारण बीमा निगम द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादी का दावा अस्‍वीकार किया गया। जिला उपभोक्‍ता आयोग ने प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा प्रस्‍तुत परिवाद स्‍वीकार कर गलती की है। अत: जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश अपास्‍त किया जाये।
अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्‍ता ने अपने तर्क के समर्थन में निम्‍नलिखित नजीरें प्रस्‍तुत की हैं:-
1. "Satwant Kaur Sandhu Vs New India Assurance Company Ltd." Legal Digest April 2010 page 1 (Supreme Court)
2. "LIC of India  Vs  Shahida  Khatoon  &  another."
    -6-

Legal Digest October 2013 page 294 (N.C.)

3. "Pushpa Chauhan Vs LIC of India" II (2011) CPJ 44 (N.C.)

4. "Paramjit Kaur Vs LIC of India & Anr." IV (2014) CPJ 132 (NC) प्रत्‍यर्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश साक्ष्‍य एवं विधि के अनुकूल है। उसमें किसी हस्‍तक्षेप की आवश्‍यकता नहीं है।

हमने उभय पक्ष के तर्क पर विचार किया है।

उल्‍लेखनीय है कि जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा उपरोक्‍त परिवाद संख्‍या-261/2013 पूर्व में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 22.08.2014 के द्वारा खारिज किया गया, जिसके विरूद्ध प्रत्‍यर्थी/परिवादी द्वारा इस आयोग में अपील संख्‍या-1888/2014 सुरेश कुमार तिवारी बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम व दो अन्‍य योजित की गयी, जिसे इस आयोग द्वारा अपने निर्णय एवं आदेश दिनांक 31.08.2017 के द्वारा स्‍वीकार करते हुए जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 22.08.2014 निरस्‍त किया गया तथा प्रस्‍तुत प्रकरण जिला उपभोक्‍ता आयोग को इस निर्देश के साथ प्रतिप्रेषित किया गया कि जिला उपभोक्‍ता आयोग दोनों पक्षों को साक्ष्‍य एवं सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान करते हुए गुणदोष के आधार पर निर्णय करना यथाशीघ्र सुनिश्चित करें। तदोपरान्‍त जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा उभय पक्ष के अभिकथन एवं उपलब्‍ध साक्ष्‍यों/प्रपत्रों पर विचार करने के उपरान्‍त उपरोक्‍त परिवाद प्रश्‍नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक 23.10.2019 के द्वारा निस्‍तारित किया गया, जिसके विरूद्ध अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम द्वारा प्रस्‍तुत अपील संख्‍या-1377/2019 लाइफ इंश्‍योरेंस कारपोरेशन आफ इण्डिया व दो अन्‍य बनाम सुरेश कुमार तिवारी योजित की गयी।

      -7-

इस आयोग द्वारा उपरोक्‍त अपील संख्‍या-1888/2014 सुरेश कुमार तिवारी बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम व दो अन्‍य में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 31.08.2017 में निम्‍न तथ्‍य अंकित किये गये हैं:-

''यह तथ्‍य निर्विवाद है कि बीमाधारक द्वारा 10 लाख रूपये का अनमोल जीवन बीमा पालिसी प्रत्‍यर्थी बीमा कंपनी से दि. 28.10.11 को ली थी और दि. 14.02.12 को 3 माह के अंदर उसकी मृत्‍यु हो गई थी। जिला मंच ने अपने निर्णय में प्रधान गांव पंचायत असवां दिव्‍य चिकित्‍सा भवन, बांदा उत्‍तर प्रदेश के प्रमाणपत्र और नाजरथ अस्‍पताल इलाहाबाद के बाह्य चिकित्‍सा कार्ड के आधार पर यह निष्‍कर्ष निकाला है कि बीमाधारक आशा देवी को बीमा को बीमा पालिसी लेने के पहले से ही किडनी की बीमारी थी, परन्‍तु प्रत्‍यर्थी ने जिला मंच के समक्ष जो साक्ष्‍य प्रस्‍तुत किए हैं उन्‍हें बिना पूर्ण रूप से सिद्ध कराए विश्‍वसनीय नहीं माना जा सकता। जिला मंच ने इस तथ्‍य पर अधिक बल दिया है कि परिवादी जो कि बीमाधारक का पति था उसने अभिकर्ता होने का तथ्‍य छिपाकर दूसरी शाखा मुंगराबादशाहपुर से अपनी पत्‍नी के नाम बीमा पालिसी ली। बीमा कंपनी ने कोई ऐसा साक्ष्‍य प्रस्‍तुत नहीं किया या नियम प्रस्‍तुत नहीं किया जिसमें यह घोषित करना आवश्‍यक था कि बीमाधारक का पति एक अभिकर्ता था। जिला मंच द्वारा केवल इस आधार पर कि उसके द्वारा अपने को अभिकर्ता होना नहीं बताया है बीमा के तथ्‍यों को छिपाने का कृत्‍य माना है। जैसाकि सर्वमान्‍य सिद्धांत है कि बीमा एक संविदा है जो सदभावना पर आधारित होती है, अत: दोनों पक्षों को स्‍वच्‍छ हाथों से परिवाद में आना चाहिए। प्रत्‍यर्थी/विपक्षी ने जो साक्ष्‍य प्रस्‍तुत किए हैं उनको सिद्ध नहीं कराया है और न ही पत्रावली पर कोई पैथालाजिकल जांच रिपोर्ट उपलब्‍ध है और न ही उपचार करने वाला डाक्‍टर का शपथपत्र ही पत्रावली पर है। अत: पीठ के मत में केस के तथ्‍य एवं परिस्थितियों को देखते हुए प्रस्‍तुत  प्रकरण  जिला  मंच  को  इस     -8- निर्देश के साथ प्रतिप्रेषित किए जाने योग्‍य है कि वे दोनो पक्षों को साक्ष्‍य एवं सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान करते हुए साक्ष्‍यों की विवेचना करते हुए गुणदोष के आधार पर निर्णय करना सुनिश्चित करें। तदनुसार अपील स्‍वीकार किए जाने योग्‍य है।''          राज्‍य उपभोक्‍ता आयोग द्वारा उपरोक्‍त अपील                    संख्‍या-1888/2014 निर्णीत होने के उपरान्‍त जिला उपभोक्‍ता आयोग को परिवाद पुन: सुनने एवं निर्णीत किये जाने हेतु प्रतिप्रेषित किया गया। उक्‍त प्रतिप्रेषण के उपरान्‍त जिला उपभोक्‍ता आयोग ने निर्णय एवं आदेश दिनांक 23.10.2019 के माध्‍यम से परिवाद संख्‍या-261/2013 सुरेश कुमार तिवारी बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम व दो अन्‍य बीमित धनराशि 10,00,000/-रू0 एवं उस पर परिपक्‍वता तिथि से वास्‍तविक भुगतान की तिथि तक 06 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्‍याज दिये जाने एवं 25,000/-रू0 शारीरिक एवं मानसिक कष्‍ट हेतु दिये जाने जाने एवं वाद व्‍यय हेतु 5,000/-रू0 दिये जाने का आदेश पारित किया, जिससे व्‍यथित होकर यह अपील प्रस्‍तुत की गयी है।
     अपील में मुख्‍य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि बीमाधारक द्वारा बीमा पालिसी संख्‍या-287690379 छलपूर्वक एक महत्‍वपूर्ण तथ्‍य को छिपाते हुए प्राप्‍त की थी कि वह गुर्दे की बीमारी से ग्रसित है और अन्तिम चरण पर गुर्दे के फेल हो जाने के कारण उसकी मृत्‍यु हो गयी थी। दिनांक 24.10.2011 को मृतक श्रीमती आशा देवी ने बीमा की पालिसी इस तथ्‍य को छिपाते हुए ली थी। श्रीमती आशा देवी की मृत्‍यु बीमा लेने के 02 महीने के अन्‍दर हो गयी। नियमानुसार बीमा निगम द्वारा जांच-पड़ताल करने पर ज्ञात हुआ कि बीमाधारक 'Chronic Renal Disease i.e. Advance Renal Failure' था और बीमाधारक द्वारा दिव्‍य चिकित्‍सा भवन, बांदा से इसका इलाज लिया जा रहा था। उक्‍त चि‍कित्‍सालय एवं नाजरेथ अस्‍पताल, इलाहाबाद का प्रमाण पत्र विवेचना रिपोर्ट के साथ प्रस्‍तुत  किया  गया  है।  विद्वान  जिला     -9- उपभोक्‍ता आयोग ने उक्‍त तथ्‍यों को नजरअंदाज करते हुए निर्णय पारित किया है, इस आधार पर अपील स्‍वीकार किये जाने एवं जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा पारित निर्णय को अपास्‍त किये जाने की प्रार्थना की गयी है।
     उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्‍तागण को सुनने एवं पत्रावली के परिशीलन के उपरान्‍त अपील में निष्‍कर्ष निम्‍न प्रकार से है:-
     अपील में मुख्‍य रूप से बीमा दावा को अस्‍वीकार किये जाने का कारण यह लिया गया है कि बीमाधारक श्रीमती आशा देवी, जिसकी आयु लगभग 38 वर्ष थी, द्वारा इस तथ्‍य को छिपाया गया कि वे गम्‍भीर गुर्दे की बीमारी से ग्रसित थी। इस तथ्‍य को सिद्ध करने के लिए बीमा निगम की ओर से एक व्‍यक्ति                      श्री चन्‍द्रमणि तिवारी, ग्राम-असवां, तहसील-मछलीशहर, जिला-जौनपुर का पत्र दिनांकित 25.03.2012 की प्रतिलिपि प्रस्‍तुत की गयी है, जिसमें अंकित है कि परिवादी सुरेश कुमार तिवारी की पत्‍नी आशा देवी की लगभग 10 वर्षों से किडनी खराब चल रही थी, जिसका इलाज इलाहाबाद एवं पी0जी0आई0 लखनऊ में चल रहा था। उक्‍त पत्र उक्‍त चन्‍द्रमणि तिवारी का दिया गया है, किन्‍तु अभिलेख से यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि इस व्‍यक्ति चन्‍द्रमणि तिवारी को किस प्रकार इस तथ्‍य की जानकारी हुई थी कि श्रीमती आशा देवी की दोनों किडनियॉं खराब चल रही थी और उक्‍त पत्र से चन्‍द्रमणि तिवारी एक साधारण ग्रामीण वासी प्रतीत होता है। उक्‍त पत्र पर ऐसा कोई उल्‍लेख नहीं है कि श्री चन्‍द्रमणि तिवारी चिकित्‍सीय विधा के जानकार हों एवं वे सुनिश्‍चित कर सकते हों कि वास्‍तव में आशा देवी किडनी अर्थात् गुर्दे की बीमारी से ग्रसित थीं, न ही उक्‍त पत्र में ऐसा कोई चिकित्‍सीय आधार लिखा गया है। अत: उक्‍त चन्‍द्रमणि तिवारी द्वारा लिखे गये पत्र के आधार पर यह सत्‍यापित एवं साबित मानने लायक उचित नहीं है कि वास्‍तव में आशा देवी किडनी अर्थात् गुर्दे की बीमारी से ग्रसित चल रही थीं और उसके द्वारा यह तथ्‍य छिपाया गया।
    -10-
     अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से संलग्‍नक-10 के रूप में दिव्‍य चिकित्‍सा भवन, पनगरा, बॉंदा (उ0प्र0) के चिकित्‍साधिकारी का प्रमाण पत्र दिनांकित 18.04.2013 प्रस्‍तुत किया गया है, जिसमें अंकित है कि - ''प्रमाणित किया जाता है कि श्रीमती आशा देवी उम्र 37 वर्ष पत्‍नी श्री सुरेश कुमार तिवारी ग्राम - असवॉं, पोस्‍ट - जंघई, तहसील - मछली शहर, जिला - जौनपुर (उत्‍तर प्रदेश) 212401 जिनका पंजीयन संख्‍या - 078/11 था जो 19.04.2011 से 12.05.2011 तक वृक्‍ककर्मणयता (RENAL DISEASE) के इलाज के लिए हमारे यहॉं भर्ती रहीं एवं अंतिम बार 17.12.2011 को इलाज के लिए आयीं।''       उक्‍त पत्र के समर्थन में कोई शपथ पत्र चिकित्‍साधिकारी महोदय द्वारा नहीं दिया गया है, न ही उनका साक्ष्‍य अभिलेख पर है, जिसमें इस प्रमाण पत्र की पुष्टि की जा रही हो। अत: चिकित्‍सक महोदय के स्‍पष्‍ट साक्ष्‍य के अभाव में यह मान लेना उचित नहीं है कि वास्‍तव में श्रीमती आशा देवी इस बीमारी से ग्रसित थी। वास्‍तव में चिकित्‍साधिकारी अथवा चिकित्‍सीय विशेषज्ञ का शपथ पत्र अथवा प्रमाण पत्र को साबित करने हेतु साक्ष्‍य अभिलेख पर होना चाहिए, जिसके आधार पर यह माना जा सकता है कि उसके द्वारा ऐसा कोई प्रमाण पत्र निर्गत किया गया है। इस सम्‍बन्‍ध में माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा पारित निर्णय Bajaj Allianz Life Insurance Company Versus Mudapaka Rama Rao III (2021) C.P.J. Page 188 (NC) प्रासंगिक है, जिसमें यह निर्णीत किया गया है कि यदि बीमा कम्‍पनी द्वारा बीमा की शर्तों का उल्‍लंघन करते हुए पूर्व की बीमारी बीमाधारक द्वारा छिपाने का आक्षेप लगाया गया है तो उस चिकित्‍साधिकारी का शपथ पत्र अथवा साक्ष्‍य अभिलेख पर होना चाहिए, जिसके द्वारा बीमारी को साबित किया जा रहा है।
     अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से                  माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा  पारित  निर्णय  सुनीता  व  अन्‍य     -11- बनाम एच0डी0एफ0सी0  स्‍टैण्‍डर्ड  लाइफ  इंश्‍योरेंस  कम्‍पनी  लि0 I(2021) सी0पी0जे0 पृष्‍ठ 287 (एन0सी0) का उल्‍लेख किया गया एवं निर्णय पर आधारित करते हुए यह तर्क दिया गया कि माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा यह अवधारित किया गया है कि यदि चिकित्‍साधिकारी का प्रमाण पत्र प्रस्‍तुत किया गया है तो बीमा कम्‍पनी को चिकित्‍साधिकारी अथवा उसका शपथ-पत्र को प्रस्‍तुत करने की आवश्‍यकता नहीं है और प्रमाण पत्र के आधार पर यह माना जा सकता है कि बीमाधारक का इलाज चल रहा था और उसने बीमारी को छिपाया है यदि इस प्रमाण पत्र को परिवादी ने विवादित नहीं किया है।
     माननीय राष्‍ट्रीय आयोग के उपरोक्‍त निर्णय का लाभ इस मामले में अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम को नहीं मिलता है। उक्‍त निर्णय में यह दिया गया है कि यदि चिकित्‍सक महोदय के प्रमाण पत्र का खण्‍डन परिवादी द्वारा नहीं किया गया है तो ऐसी दशा में चिकित्‍सक महोदय के व्‍यक्तिगत रूप से साक्ष्‍य में प्रस्‍तुत करने अथवा प्रमाण पत्र के समर्थन में शपथ आदि प्रस्‍तुत करने की आवश्‍यकता नहीं है, किन्‍तु प्रस्‍तुत मामले में परिवादी की ओर से स्‍पष्‍ट रूप से कथन किया गया है कि बीमाधारक का कोई इलाज ऐसी बीमारी के लिए कभी नहीं चला।  
क्‍लेम फार्म के अवलोकन से स्‍पष्‍ट होता है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादी ने बीमित के सम्‍बन्‍ध में यह कहा है कि कभी भी उसे कोई बीमारी नहीं थी। इसी प्रकार परिवाद पत्र के अवलोकन से स्‍पष्‍ट है कि परिवाद पत्र के प्रस्‍तर 8 और 9 में इस तथ्‍य का विशेष रूप से खण्‍डन किया गया है कि आशा देवी को कभी भी किडनी की बीमारी रही हो। अत: ऐसी दशा में बीमा निगम का उत्‍तरदायित्‍व था कि वह साक्ष्‍य के माध्‍यम से इस प्रमाण पत्र को पुष्‍ट करता अथवा चिकित्‍सक महोदय का शपथ पत्र आदि प्रस्‍तुत करके इस तथ्‍य को साबित करता, किन्‍तु ऐसा बीमा निगम की ओर से नहीं किया गया है।
    -12-
     अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से अपने तर्क के समर्थन में  माननीय  सर्वोच्‍च  न्‍यायालय  द्वारा  पारित  निर्णय Satwant Kaur Sandhu Vs New India Assurance Company Ltd प्रकाशित Legal Digest April 2010 page 1 (Supreme Court) भी प्रस्‍तुत किया गया है, जिसमें कथन किया गया है कि अस्‍पताल का प्रमाण पत्र स्‍वीकार किया जा सकता है क्‍योंकि मरीज का चिकित्‍सीय इतिहास उसके परिवार के सदस्‍यों द्वारा बताया जाता है, जो कि अस्‍पताल की साधारण रीति है। यदि अस्‍पताल द्वारा ऐसा कोई प्रमाण पत्र दिया गया है तो उसे स्‍वीकार किया जाना उचित है।
     माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय के उपरोक्‍त निर्णय के सम्‍बन्‍ध में बीमा निगम की ओर से नाजरेथ अस्‍पताल, इलाहाबाद के प्रमाण पत्र पर आधारित किया गया, जिसमें यह अंकित है कि मरीज श्रीमती आशा देवी के परिवार के सदस्‍यगण द्वारा यह बताया गया कि श्रीमती आशा देवी गुर्दे के रोग से ग्रसित थीं, किन्‍तु यह निर्णय भी प्रस्‍तुत मामले में बीमा निगम को लाभ नहीं देता है। उक्‍त कथन का प्रत्‍यर्थी/परिवादी की ओर से खण्‍डन किया गया है। नाजरेथ अस्‍पताल, इलाहाबाद का पर्चा, जिसकी प्रतिलिपि अभिलेख पर है, के अवलोकन से स्‍पष्‍ट होता है कि यह दिनांक 17.01.2012 का है एवं बीमा पालिसी दिनांक 28.10.2011 को ली गयी। अत: नाजरेथ अस्‍पताल, इलाहाबाद का यह पर्चा बीमा पालिसी लिये जाने के उपरान्‍त का है एवं इस तथ्‍य से इन्‍कार नहीं किया जा सकता है कि इस पर्चे में बीमित श्रीमती आशा देवी की गुर्दे की बीमारी से पूर्व से ग्रसित होने का तथ्‍य अन्‍दाजे के आधार पर लिखा गया है।
     अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम की ओर से                 माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा पारित एक अन्‍य निर्णय Paramjit Kaur Vs LIC of India & Anr. IV (2014) CPJ 132 (NC) भी प्रस्‍तुत किया गया है, जिसमें यह निर्णीत  किया  गया  है  कि     -13- बीमित व्‍यक्ति द्वारा बीमा पालिसी लेते समय यदि महत्‍वपूर्ण तथ्‍य को छिपाया गया है तो बीमा पालिसी का क्‍लेम रिपुडिएट किया जा सकता है।
     अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम द्वारा उपरोक्‍त निर्णय अपनी स्‍वयं की उपधारणा के आधार पर दिया गया है कि बीमित आशा देवी द्वारा अपनी बीमारी का तथ्‍य छिपाया गया था। यदि अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम इस तथ्‍य को सिद्ध करने में सफल रहता कि मृतका स्‍व0 आशा देवी ऐसी किसी बीमारी से ग्रसित थीं तो उपरोक्‍त निर्णय बीमा निगम को लाभ दे सकते थे, किन्‍तु यह तथ्‍य अभिलेख पर साबित नहीं है। अत: उपरोक्‍त निर्णयों का अपीलार्थी/विपक्षीगण बीमा निगम को लाभ नहीं मिलता है।   
     उपरोक्‍त विवेचन से यह स्‍पष्‍ट है कि बीमा निगम इस तथ्‍य को सिद्ध करने में असफल रहा है कि बीमित स्‍व0 आशा देवी गुर्दे की बीमारी से पूर्व से ग्रसित थीं एवं उनके द्वारा जानबूझकर एवं जानते बूझते इस तथ्‍य को छिपाया गया था। विद्वान जिला उपभोक्‍ता आयोग ने भी इस तथ्‍य को बीमा निगम द्वारा सा‍बित करना नहीं माना है एवं बीमा के क्‍लेम को रिपुडिएट करना गलत माना है। इन परिस्थितियों में एवं उपरोक्‍त विवेचन के आधार पर यह पीठ इस मत की है कि बीमा का क्‍लेम गलत प्रकार से रिपुडिएट किया गया है। अत: जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा पारित प्रश्‍नगत निर्णय में त्रुटि नहीं है और अपील पीठ द्वारा निर्णय में हस्‍तक्षेप की आवश्‍यकता प्रतीत नहीं होती है। अपील निरस्‍त किये जाने एवं जिला उपभोक्‍ता आयोग द्वारा पारित निर्णय पुष्‍ट होने योग्‍य है।
आदेश      अपील निरस्‍त की जाती है। जिला उपभोक्‍ता आयोग, जौनपुर द्वारा  परिवाद  संख्‍या-261/2013  सुरेश  कुमार  तिवारी  बनाम       -14- भारतीय जीवन बीमा निगम व दो अन्‍य में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 23.10.2019 पुष्‍ट किया जाता है।
धारा-15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्‍तर्गत अपीलार्थी/विपक्षीगण द्वारा जमा धनराशि 25,000/-रू0 अर्जित ब्‍याज सहित जिला उपभोक्‍ता आयोग, जौनपुर को 01 माह में विधि के अनुसार निस्‍तारण हेतु प्रेषित की जाए।
आशुलिपि‍क से अपेक्षा की जाती है कि‍ वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
   
     (न्‍यायमूर्ति अशोक कुमार)            (विकास सक्‍सेना)       

 

              अध्‍यक्ष                      सदस्‍य      

 

 

 

जितेन्‍द्र आशु0

 

कोर्ट नं0-1             [HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR]  PRESIDENT 
        [HON'BLE MR. Vikas Saxena]  JUDICIAL MEMBER