State Consumer Disputes Redressal Commission
Mahendra Agrawal vs Sahara Hospital on 20 October, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 Complaint Case No. CC/352/2018 ( Date of Filing : 10 Oct 2018 ) 1. Mahendra Agrawal Lucknow ...........Complainant(s) Versus 1. Sahara Hospital Lucknow ............Opp.Party(s) BEFORE: HON'ABLE MR. JUSTICE PRESIDENT PRESIDENT HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR JUDICIAL MEMBER HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 20 Oct 2022 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ।
(सुरक्षित) परिवाद सं0 :- 352 / 20 18 Mahendra Agarwal s/o late Sri RP Gupta r/o 326-A, Prince Complex, Hazratganj, Lucknow-226001 Versus Sahara Hospital, Viraj Khand-1, Gomti Nagar, Lucknow 226010 through its medical Superintendent. The New India Assurance Co. Ltd, Anif Chamber-1, 3rd Floor, Kapoorthala complex, Aliganj, Lucknow 226024 ................Opposite Parties समक्ष मा0 श्री सुशील कुमार, सदस्य मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य उपस्थिति:
परिवादी की ओर से- श्री महेन्द्र अग्रवाल (स्वयं) विपक्षी सं0 1 के विद्वान अधिवक्ता:- श्री ए0के0 श्रीवास्तव विपक्षी सं0 2 के विद्धान अधिक्ता:- श्री जफर अजीज दिनांक:-12.12.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय परिवादी के अनुसार वह एक वरिष्ठ नागरिक है जो दिनांक 13.01.2018 को सांस संबंधी परेशानियां हेतु इलाज के लिए सहारा हॉस्पिटल को गया था, क्योंकि उसके द्वारा सहारा हॉस्पिटल महंगा होने के बावजूद लखनऊ का सर्वोत्तम अस्पताल होना सुना गया था। सहारा हॉस्पिटल में उसे दिनांक 13.01.2018 को सांस संबंधी बीमारी के लिए भर्ती किया गया था तथा दिनांक 16.01.2018 को समय 10:47 पर डिस्चार्ज किया गया। परिवादी के अनुसार अस्पताल के चिकित्सकों एवं स्टाफ के सदस्यों द्वारा परिवादी को सर्वोत्तम इलाज होने का आश्वासन दिया गया था किन्तु इलाज में इसके विपरीत उल्टा सीधा इलाज किया गया तथा इलाज के प्रत्येक स्तर पर परिवादी से छल किया गया। परिवाद पत्र के प्रस्तर 7 में इलाज की गलतियों को बताया गया है जो निम्नलिखित प्रकार से है:-
अवांछित इलाज दिया जाना।
अवांछित मेडिकल टेस्ट करवाया जाना।
झूठे एवं गलत बिल वसूल किया जाना।
बिना इलाज या टेस्ट के बिल प्रस्तुत किया जाना परिवादी को ऐसे इलाज के लिए मजबूर किया जाना, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।
प्रस्तर 8 में परिवादी द्वारा यह कथन किया गया है कि इस गलत इलाज से परिवादी के शरीर में विपरीत प्रभाव पड़ा तथा गलत दवाओं से भी विपरीत प्रभाव पड़ा, जिससे परिवादी को मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा हुई। दिनांक 16.01.2018 को समय 10:30 बजे स्वयं परिवादी के विकल्प पर उसे अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया क्योंकि गलत इलाज हुआ था। परिवादी ने इस संबंध में अनेक नोटिस सहारा हॉस्पिटल को भेजे एवं पत्र लिखे। सहारा हॉस्पिटल द्वारा परिवादी को जाकर बैठक करने को कहा गया, किन्तु कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई न ही बैठक के कोई मिनट बनाये गये। परिवाद पत्र के प्रस्तर 15 में के.एफ.टी., Serum electrolytes test, Viral Markers, Diet Counseling गलत तौर पर हृदय संबंधी इलाज किया जाना, ग्लूकोमीटर के संबंध में अत्यधिक बिल/आक्सीजन रन्स के संबंध में गलत बिल, नेबूलाइजेशन के संबंध में अधिक बिल, ई.सी.जी. इलाज आदि के संबंध में गलत बिल दिये जाने एवं दवाओं के गलत बिल दिये जाने की शिकायत की गयी है और कुल 49,67,624/- रू0 की क्षति की मांग परिवादी द्वारा की गयी।
विपक्षी की ओर से वादोत्तर प्रस्तुत किया गया कि परिवादी ने कोई पर्याप्त वाद का कारण परिवाद पत्र में नहीं दर्शाया है। परिवाद पत्र के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि परिवाद पत्र शरारतपूर्ण है और अनावश्यक रूप से विपक्षी को मुकदमेबाजी में घसीटने के लिए किया गया है। यह अस्पताल के लिए अपमानपूर्ण भी है। परिवादी मरीज की उचित प्रकार से जांच व इलाज किया गया था जो विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा किया गया। वर्तमान परिवाद पत्र झूठे तथ्यों पर योजित किया गया है। 65 वर्षीय परिवादी को सीने में दर्द एवं सांस की तकलीफ के कारण अस्पताल में दाखिल किया गया था। मरीज कोरोनली आर्टरी बीमारी, उक्त रक्त चाप, अस्थमा आदि बीमारी से ग्रसित था, डॉक्टर वी0के0 तिवारी हृदय रोग विशेषज्ञ तथा चेस्ट फिजीशियन डॉक्टर मनोज अग्रवाल द्वारा उचित इलाज किया गया था। इलाज चिकित्सीय पद्धति के अनुसार उचित प्रकार से किया गया था। परिवाद पत्र परिकल्पना एवं मनमाने तौर पर योजित किया गया है, जिसका कोई आधार नहीं है। अत: परिवाद खारिज होने योग्य है।
परिवादी की ओर से वादोत्तर के विरूद्ध प्रति उत्तर प्रस्तुत किया गया, जिसमें प्रति वाद पत्र के तथ्यों को गलत बताते हुए एक नया तथ्य यह रखा गया कि मुख्य चिकित्साधिकारी, लखनऊ ने परिवादी की शिकायत पर बलरामपुर अस्पताल में डॉक्टरों का पैनल बनाकर जांच के निर्देश दिये, जो प्रक्रियाधीन है। इस जांच के दौरान अपर मुख्य चिकित्साधिकारी (द्वितीय) लखनऊ ने अपनी आख्या दिनांक 15.08.2018 में बिन्दु सं0 3 मे लिखा है कि जांच के लिए अलग-अलग धनराशियां ली गयी, जो संदिग्ध है, इसकी जांच सक्षम ऑडिटर से करायी जाये। इस तथ्य से स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि विपक्षी अस्पताल में मनमाने पूर्ण ढंग से इलाज किया गया और धनराशियां ली गयी एवं परिवादी के आरोप स्वत: सिद्ध हो जाते हैं।
परिवादी महेन्द्र अग्रवाल स्वयं उपस्थित हुए। विपक्षी सं0 1 की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री ए0के0 श्रीवास्तव उपस्थित हुए। विपक्षी सं0 2 की ओर से श्री जफर अजीज उपस्थित हुए,सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।
परिवादी का कथन इस मामले में यह है कि विपक्षी अस्पताल द्वारा उन बीमारियों का इलाज किया गया, जो उसे वास्तव में नहीं है, किन्तु इस संबंध में कोई चिकित्सीय विशेषज्ञ की आख्या प्रस्तुत नहीं की गयी है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उक्त बीमारियां परिवादी को नहीं थी। परिवादी के इनीशियल एसेसमेंट रिकार्ड दिनांकित 13.01.2018 के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि उसे सांस लेने में तकलीफ के साथ-साथ CADC के साथ-साथ HTN POST PTCA तथा अस्थमा आरंभ में ही डायग्नोस किया गया था। PTCA का पूर्ण फुल फार्म Percutaneous Transmulinal Coronary angioplasty है, जिससे स्पष्ट होता है कि परिवादी को पूर्व में एंजियोप्लास्टी हुई थी, जिसके उपरांत उपरोक्त परेशानी एवं अस्थमा उसे हुआ था। परिवादी ने किसी विशेषज्ञ से इस डायग्नोसिस को गलत साबित नहीं किया है।
उपरोक्त के अतिरिक्त परिवादी द्वारा गलत व बढ़ा चढ़ाकर बिल लिये जाने का आरोप लगाया है। प्रत्येक अस्पताल में चिकित्सकों की फीस एवं नर्सिंग केयर की फीस पृथक-पृथक होती है, जिसका कोई निर्धारित मापदंड नहीं है कि नर्सिंग फीस कितनी ली जाये एवं कितनी न ली जाये। परिवादी की ओर से चिकित्सीय लापरवाही और चिकित्सा में कमी होने का कोई प्रमाण नहीं दिया गया है, जो अस्पताल अथवा चिकित्सकों से क्षतिपूर्ति दिलाये जाने के लिए आवश्यक है।
इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय सी0पी0 श्रीकुमार प्रति रामानुजम प्रकाशित(2009) 7 एस.सी.सी. पृष्ठ 130 का उल्लेख करना उचित होगा, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया है कि उपभोक्ता आयोग केवल परिवादी के आक्षेपों के आधार पर चिकित्सीय लापरवाही की उपधारणा नहीं कर सकती है। उपभोक्ता आयोग यह नहीं मान सकता कि जो भी आक्षेप परिवादी ने लगाया है व अटल सत्य हैं, जबकि उक्त आरोप किसी साक्ष्य से प्रमाणित न हो। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय में निम्नलिखित प्रकार से दिया गया है:-
"37. We find from the reading of the order of the commission that it proceeded on the basis that whatever had been alleged in the complaint by the respondents was in fact the invaluable truth even though it remained unsupported by any evidence. As already observed in Jacob Mathew case [(2005) 6 SCC page 1] the onus to prove medical negligence lies largely on the claimant and that this onus can be discharged by leading cogent evidence. A mere averment in a complaint which is denied by the other side, can by no stretch of imagination, be said to be evidence by which the case of the complainant can be said to be proved. It is obligation on the part of the complainant to provide facta probantia."
इसी प्रकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय हरीश कुमार खुराना प्रति जोगिन्दर सिंह तथा अन्य प्रकाशित II (2022) CPJ पृष्ठ 43 (एस.सी.) का उल्लेख करना उचित होगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस मामले में शल्य क्रिया के तुरंत बाद मरीज हृदय गति रूक जाने से मृत हो गया। परिवादीगण की ओर से यह आक्षेप लिया गया कि शल्य क्रिया की लापरवाही के कारण मरीज की मृत्यु हुई है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया कि जब तक कि साक्ष्य से यह साबित न हो कि मरीज की मृत्यु निस्संदेह चिकित्सीय लापरवाही के कारण हुई है, जो इलाज में उपेक्षा के कारण हुई थी तब तक चिकित्सकों को मृत्यु के लिए दोषी नहीं माना जा सकता है एवं चिकित्सक क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी नहीं होगें। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णय के प्रस्तर 11 में निम्निलिखित प्रकार से अवधारित किया गया है:-
"Every death of a patient cannot on the face of it be considered as death due to medical negligence unless there is material on record to suggest to that effect. It is necessary that the hospital and the doctors are required to exercise sufficient care in treating the patient in all circumstances. However, in unfortunate cases though t death may occur and if it is alleged to be due to medical negligence and a claim in that regard is made, it is necessary that sufficient material or medical evidence should be available before the adjudicating 32 to arrive at a conclusion.
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक अन्य निर्णय INS.Malhotra (सुश्री) बनाम डॉक्टर ए0 कृपलानी व अन्य प्रकाशित (2009) 4 एस.सी. cases 705 इस निर्णय के प्रस्तर 50 में एक अन्य निर्णय जैकब मैथ्यू प्रति स्टेट ऑफ पंजाब प्रकाशित(2005)6 एस.सी.सी. पृष्ठ I पर आधारित करते हुए यह निर्णीत किया गया कि चिकित्सीय लापरवाही के मामले में यदि लापरवाही साक्ष्य से स्थापित होती है ऐसी दशा में ही चिकित्सक को चिकित्सीय उपेक्षा का दोषी माना जा सकता है यदि साक्ष्य से यह तथ्य साबित नहीं है कि ऐसी दशा में मात्र परिवादी के कथन करने से यह नहीं माना जा सकता कि इलाज मे लापरवाही हुई है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय इस मामले पर लागू होते हैं। परिवादी द्वारा परिवाद पत्र में बार-बार इस कथन को दोहराया गया है कि चिकित्सकों द्वारा विपक्षी अस्पताल में वे इलाज किये गये, जो रोग परिवादी को नहीं थे, किन्तु इस तथ्य को मात्र अभिकथनों में कहा गया है। किसी साक्ष्य अथवा विशेषज्ञ रिपोर्ट के माध्यम से यह तथ्य साबित नहीं किया गया है। मात्र परिवादी के अभिकथनों एवं सशपथ कथन के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं है कि वास्तव में परिवादी के इलाज में चिकित्सीय लापरवाही हुई थी और इस आधार पर चिकित्सकों एवं अस्पताल को चिकित्सीय लापरवाही का दोषी मानते हुए परिवादी द्वारा मांगी गयी एक बड़ी धनराशि परिवादी को क्षतिपूर्ति के रूप में दिलवाया जाना उचित नहीं है।
आदेश परिवादी का परिवाद खारिज किया जाता है।
उभय पक्ष परिवाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(विकास सक्सेना)(सुशील कुमार) संदीप आशु0कोर्ट नं0 2 [HON'ABLE MR. JUSTICE PRESIDENT] PRESIDENT [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] JUDICIAL MEMBER [HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER