State Consumer Disputes Redressal Commission
Poonam Devi vs B M Panjab National Bank on 8 December, 2021
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2013/1501 ( Date of Filing : 05 Jul 2013 ) (Arisen out of Order Dated 06/05/2013 in Case No. Complaint Case No. C/2012/79 of District Bijnor) 1. Poonam Devi - ...........Appellant(s) Versus 1. B M Panjab National Bank - ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR PRESIDING MEMBER HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 08 Dec 2021 Final Order / Judgement (मौखिक) राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ अपील सं0- 1501/2013 श्रीमती पूनम देवी पत्नी स्व0 श्री वेद प्रकाश, निवासी ग्राम सब्दलपुर पोस्ट खास तहसील धामपुर, जिला- बिजनौर। .........अपीलार्थी बनाम ब्रांच मैनेजर पंजाब नेशनल बैंक शाखा कार्यालय राजा का ताजपुर, जिला बिजनौर। ..........प्रत्यर्थी समक्ष:- माननीय श्री सुशील कुमार, सदस्य। माननीय श्री विकास सक्सेना, सदस्य। अपीलार्थी की ओर से : श्री प्रतीक सक्सेना, विद्वान अधिवक्ता। प्रत्यर्थी की ओर से : श्री एस0एम0 बाजपेयी, विद्वान अधिवक्ता। दिनांक:- 08.12.2021 माननीय श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उद्घोषित निर्णय 1.
परिवाद सं0- 79/2012 पूनम देवी बनाम शाखा प्रबंधक पंजाब नेशनल बैंक में जिला उपभोक्ता आयोग, बिजनौर द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दि0 06.05.2013 के विरुद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत राज्य आयोग के समक्ष से प्रस्तुत गई है।
2. विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए प्रत्यर्थी/विपक्षी बैंक को निर्देशित किया है कि प्रीमियम के रूप में काटी गई धनराशि 30 दिन के अन्दर अपीलार्थी/परिवादिनी को अदा करें।
3. परिवाद के तथ्य का सार यह है कि अपीलार्थी/परिवादिनी के पति वेद प्रकाश ने दि0 20.07.2010 को अंकन 35,000/-रू0 का किसान क्रेडिट कार्ड प्रत्यर्थी/विपक्षी बैंक से प्राप्त किया था जिसकी अवधि दि0 19.07.2015 तक थी। इस कार्ड पर 1,00,000/-रू0 का बीमा था। दि0 11.08.2010 को बीमा की धनराशि के प्रीमियम का भुगतान भी प्रत्यर्थी/विपक्षी द्वारा काटा गया था। दि0 28.11.2011 को गन्ने की बुग्गी भरते समय अपीलार्थी/परिवादिनी के पति की मृत्यु हो गई। अपीलार्थी/परिवादिनी द्वारा अपने पति की दुर्घटना के पश्चात बीमा क्लेम के कागजात प्रत्यर्थी/विपक्षी के अधीनस्थ शाखा कार्यालय में जमा कर दिए गए, परन्तु बीमा राशि का भुगतान नहीं किया गया।
4. प्रत्यर्थी/विपक्षी की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत नहीं किया गया। इसलिए एकतरफा साक्ष्य पर विचार करते हुए विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने यह निष्कर्ष दिया कि प्रत्यर्थी/विपक्षी बैंक प्रीमियम की धनराशि 30 दिन के अन्दर अपीलार्थी/परिवादिनी को वापस लौटाये। प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश के विरुद्ध स्वयं अपीलार्थी/परिवादिनी द्वारा इन आधारों पर अपील प्रस्तुत की गई है कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय व आदेश तथ्य एवं विधि के विपरीत है। प्रत्यर्थी/विपक्षी बीमा को प्रीमियम राशि को वापस करने के बजाय समस्त बीमित राशि अदा करने का आदेश दिया जा सकता था।
5. यह अपील देरी से प्रस्तुत की गई है और देरी माफ करने के लिए आवेदन सं0- 9 प्रस्तुत किया गया है, चूँकि अपील प्रस्तुत करने में हुई देरी मामूली अधिक है, इसलिए विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र स्वीकार किया जाता है और अपील प्रस्तुत करने में हुआ विलम्ब क्षमा किया जाता है।
6. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री प्रतीक सक्सेना और प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री एस0एम0 बाजपेयी को सुना गया। प्रश्नगत निर्णय व आदेश तथा पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों का सम्यक परिशीलन किया गया।
7. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि बैंक द्वारा समय पर प्रीमियम की अदायगी बीमा कम्पनी को नहीं की गई, इसलिए बैंक द्वारा सेवा में कमी की गई है और बैंक ही बीमित धन अदा करने के लिए उत्तरदायी है, जब कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने केवल प्रीमियम की राशि वापस करने का आदेश दिया है।
8. प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क है कि बीमे की अवधि दि0 19.07.2015 तक थी। अपीलार्थी/परिवादिनी के पति की मृत्यु दि0 28.11.2011 को हो गई। यथार्थ में बीमे की राशि की कटौती दो बार कर ली गई। बीमा प्रीमियम का भुगतान करने में कोई देरी नहीं की गई।
9. पत्रावली पर उपलब्ध दस्तावेज सं0- 17 सूचना के अधिकार के तहत दी गई सूचना है जिसमें उल्लेख है कि खाता सं0- 1070008800032793 में से दि0 11.08.2010 एवं दि0 14.12.2011 को किसान दुर्घटना बीमा योजना के अंतर्गत बीमे की राशि का प्रीमियम लिया गया है। इस प्रकार अपीलार्थी/परिवादिनी के पति के खाते से दो बार प्रीमियम ले लिया गया। प्रथम प्रीमियम के आधार पर ही अपीलार्थी/परिवादिनी बीमे की राशि प्राप्त करने के लिए अधिकृत थी। इसके लिए बीमा कम्पनी के विरुद्ध क्लेम प्रस्तुत करना चाहिए था। अत: विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने विधि सम्मत निर्णय व आदेश दिया है कि प्रीमियम की जो राशि दूसरी रसीद काटी गई है वह 30 दिन के अन्दर अपीलार्थी/परिवादिनी को वापस लौटायी जाए। ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलार्थी/परिवादिनी का बीमा क्लेम विधि सम्मत तरीके से बीमा कम्पनी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। इसलिए बीमा कम्पनी को क्लेम के निस्तारण का कोई अवसर प्राप्त नहीं हुआ और जिस विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह परिवाद प्रस्तुत किया गया सम्भवत: उन्हें उपभोक्ता विवाद के मामले की कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए इस गरीब कृषक महिला को किसान क्रेडिट कार्ड के अंतर्गत पति की मृत्यु पर बीमा क्लेम मिल सकता था, वह एक अज्ञानी व्यक्ति के कारण अपना क्लेम प्राप्त करने से वंचित रह गई। बीमा क्लेम प्राप्त करने के लिए बीमा कम्पनी को पक्षकार बनाया जाना आवश्यक था। परिवाद प्रस्तुत करने से पूर्व बीमा क्लेम कम्पनी के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक था, परन्तु परिवाद पत्र में केवल यह उल्लेख किया गया कि बैंक द्वारा दो बार बीमा राशि काट ली गई और दूसरी बार वेद प्रकाश की मृत्यु होने के पश्चात बीमा राशि काटी गई। दो बार प्रीमियम राशि काटा जाना एक चूक हो सकती है, परन्तु इस चूक के कारण दि0 19.07.2015 तक की बीमा अवधि पूर्णत: सुरक्षित थी। अत: विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णय में कोई अवैधानिकता नहीं है। तदनुसार अपील खारिज होने योग्य है।
आदेश
10. अपील खारिज की जाती है, परन्तु चूँकि अपीलार्थी/परिवादिनी द्वारा सद्भावना पूर्वक तरीके से बीमा क्लेम की याचना केवल बैंक के विरुद्ध कर दी गई जो बीमा कम्पनी के समक्ष की जानी चाहिए थी। अत: अपीलार्थी/परिवादिनी यदि चाहे तो विधि सम्मत तरीके से अपना बीमा क्लेम समुचित पक्षकारों के विरुद्ध वस्तुत: बीमा कम्पनी के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है।
उभयपक्ष अपना-अपना व्यय स्वयं वहन करेंगे।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(विकास सक्सेना) (सुशील कुमार) सदस्य सदस्य शेर सिंह, आशु0 कोर्ट नं0- 2 [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER