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Lok Sabha Debates

Shri Yogi Adityanath Called The Attention Of The Minister Of Health And Family ... on 29 December, 2011

> Title: Shri Yogi Adityanath called the attention of the Minister of Health and Family Welfare to the situation arising out of spread of Encephalities and Brain Fever in various parts of the country, particularly in Uttar Pradesh, West Bengal and Bihar and steps taken by the Government in this regard.

 

अध्यक्ष महोदया: अब हम ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ले रहे हैं। योगी आदित्यनाथ जी।

YOGI ADITYA NATH (GORAKHPUR):  Madam, I call the attention of the Minister of Health and Family Welfare to the following matter of urgent public importance and request that he may make a statement therein:

“Situation arising out of spread of Encephalitis and Brain Fever in various parts of the country, particularly in Uttar Pradesh, West Bengal and Bihar and steps taken by the Government in this regard..”   THE MINISTER OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI GHULAM NABI AZAD): Madam Speaker,  the Acute Encephalitis Syndrome (AES) including Japanese Encephalitis is a major public health challenge.… (Interruptions)
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): योगी जी, अगर आप हिन्दी में बोले होते तो मंत्री जी हिन्दी में जवाब देते। पूरा देश सही बात समझता कि सरकार और मंत्री जी क्या व्यवस्था कर रहे हैं।
श्री गुलाम नबी आज़ाद :  यह बहुत ही बड़ा तकनीकी नाम है    और इन तकनीकी नामों का अनुवाद करना थोड़ा मुश्किल है, पता नहीं किस वायरस का क्या बन जाएगा।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  मंत्री जी, आप बोलिये, आपनी बात कहिये।
...( व्यवधान)
श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा):इसका हिंदी नाम दिमागी बुखार या मस्तिष्क जवर है। इसे बोलने में कोई दिक्कत नहीं है।...( व्यवधान)
श्री गुलाम नबी आज़ाद:  बहरहाल, शुरूआत अंग्रेजी से होगी तो उत्तर भी अंग्रेजी में होगा।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : आप लोग क्यों खड़े हो गये हैं, आप बैठ जाइये।
...( व्यवधान)
श्री गुलाम नबी आज़ाद: शुरूआत ही अंग्रेजी में हुई है तो मैं कैसे हिंदी में जवाब दूं।
अध्यक्ष महोदया : माननीय मंत्री महोदय, आप बोलिये।
श्री गुलाम नबी आज़ाद:   देखिये, आप इसे विवादित मत बनाइये, इसकी ट्रंसलेशन सब भाषाओं में है और स्वास्थ से संबंधित कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो बिल्कुल ही तकनीकी हैं और उन क्षेत्रों में यह विशेष रूप से बीमारी है। Acute Encephalitis Syndrome is characterized by high fever, altered consciousness and convulsions mostly in children below 15 years. It is estimated that about 25 per cent of the affected children die and among those who survive, about 30 to 40 per cent suffer from physical and mental impairment. AES is a complex problem and there are various causative agents including JE and entero-viruses.
Brain Fever due to Japanese Encephalitis (JE) is caused by a virus and is transmitted through mosquitoes. The main reservoirs of the JE virus are pigs and water birds and in its natural cycle, virus is maintained in these animals. First major outbreak of JE was reported in 1973 from Bardhaman district of West Bengal. Later, most serious outbreaks were reported from eastern part of Uttar Pradesh, particularly in the districts of Gorakhpur and Basti Divisions in 1978. AES has now been reported from 171 districts in 19 states. During 2011, 7,813 AES cases and 1,133 deaths have been reported in the country till 27th December. The major States affected by AES are Uttar Pradesh which reported 3,474 cases and 575 deaths; followed by Assam with 1,391 cases and 250 deaths; West Bengal with 714 cases and 40 deaths; and Bihar with 821 cases and 197 deaths.
Presently, there is a vaccine only for prevention of Japanese Encephalitis. For the rest of the AES cases, there is no vaccine for prevention. JE vaccination has been introduced by Government of India in a phased manner in the affected districts since 2006. Prevalence of JE has been declining. For example, in Uttar Pradesh, the JE positivity rate in AES cases has declined from 36 per cent in 2005 to 6.4 per cent in 2011.
Another key cause of AES is entero-viruses which are transmitted primarily through use of unsafe drinking water. I personally visited Gorakhpur recently and had discussions with experts, officials and local people and it was evident to me that AES is not only a medical problem but a much broader and complex development issue and linked with various social determinants of Health including safe drinking water, basic sanitation, personal hygiene and nutrition. To effectively combat the problem, it is, therefore, essential to evolve a multi-pronged strategy encompassing prevention, case management and rehabilitation measures.
          This strategy can be successfully implemented only with the active engagement of various Ministries like Ministries of Drinking Water & Sanitation, Social Justice & Empowerment, Rural Development, Urban Development, Women & Child Development and the active cooperation and involvement of the State Governments. Appreciating this fact, hon. Prime Minister has constituted a Group of Ministers on 4th November, 2011, to develop a comprehensive multi-sectoral strategy. Three meetings of the Group of Ministers have already taken place on 21st November, 2011, 25th November, 2011 and 9th December, 2011.
श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी):अध्यक्ष महोदया, मैं इस विषय पर कुछ कहना चाहता हूं।
अध्यक्ष महोदया : अभी योगी आदित्यनाथ जी की बारी है।
श्री मुलायम सिंह यादव : अध्यक्ष जी, यह बहुत गम्भीर मामला है।
अध्यक्ष महोदया : अभी उनकी बारी है।
योगी आदित्यनाथ :  अध्यक्ष जी, माननीय मंत्री जी ने पिछली बार की तरह ही यहां पर एक लिखित वक्तव्य, जो मंत्रालय के अधिकारियों ने दिया होगा, वही पढ़कर सुना दिया है और यह लिखित वक्तव्य मैं पिछले 13 वर्षों से इस सदन में सुन रहा हूं।
          महोदया, इनसिफलाइटिस, मस्तिष्क ज्वर यानी दिमागी बुखार है, यह इस देश में 1956 में पहली बार आया था और 1978 में पहली बार पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में इसके मामले देखने को मिले थे। वर्ष 1998 से लेकर अब तक लगातार ऐसा कोई सत्र नहीं है, जो मैंने इस सदन का और सरकार का ध्यान किसी न किसी नियम के तहत इस मामले की ओर आकर्षित न किया हो। लेकिन मुझे अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि पिछले 33 वर्षों से पूर्वी उत्तर प्रदेश में बच्चों की लगातार हो रही मौतें आखिर क्या प्रदर्शित करती हैं। क्या स्वस्थ जीवन जीने की आजादी पूर्वी उत्तर प्रदेश के मासूमों को नहीं है? साल दर साल वहां हो रही मासूम बच्चों की मौतें क्या प्रदेश और केन्द्र सरकारों की उपेक्षा को प्रदर्शित नहीं करती है? जो गैर सरकारी आंकड़े हैं, उनके अनुसार पिछले 33 वर्षों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के सात जिलों में एक लाख से अधिक मौतें हुई हैं और इतने ही बच्चे शारीरिक और मानसिक रोग से अक्षम हुए हैं।
          महोदया, पिछले वर्ष भी मैंने 31 अगस्त को एक कालिंग अटैन्शन के माध्यम से इस सदन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था और माननीय आडवाणी जी ने भी उस चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए सरकार से इस संबंध में प्रभावी कार्रवाई करने के लिए कहा था। लेकिन अत्यंत दुखद है कि जो आश्वासन 31 अगस्त, 2010 को इसी सदन में माननीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री ने दिये थे, उन पर आज तक अमल नहीं हो पाया। पिछले वर्ष इसी मंत्रालय ने मुझे जो पत्र भेजा था, यदि उसके अनुसार मैं आपके सामने आंकड़े रखूं तो वर्ष 2005 में दिमागी बुखार के 6061 मरीज भर्ती हुए, जिनमें से 1500 की मौतें हुईं। वर्ष 2006 में 2320 मरीज भर्ती हुए, जिनमें से 528 की मौतें हुईं। वर्ष 2007 में 3024 मरीज भर्ती हुए, जिनमें से 995 की मौतें हुई। वर्ष 2008 में 3015 मरीज भर्ती हुई, जिनमें से 684 की मौतें हुई। वर्ष 2009 में 784 बच्चों की मौत हुई और मेरे पास पूर्वी उत्तर प्रदेश के अकेले बी.आर.डी. मैडिकल के आंकड़े हैं, जिनके अनुसार वर्ष 2010 में 3503 मरीज भर्ती हुए, जिनमें 514 की मौतें हुईं तथा इस वर्ष अब तक 3275 मरीज भर्ती हो चुके हैं और कल तक 624 बच्चों की मौतें अकेले बी.आर.डी. मैडिकल कालेज में हुई है।  मौंतों का सिलसिला अभी तक थमा नहीं है। मैं सात जिलों का आंकड़ा बता रहा हूँ कि कल तक 625 मौंतें अकेले बीआरडी मैडिकल कॉलेज, गोरखपुर में हुई हैं। ये मौंतें तब हो रही हैं जब कि पिछले 13 वर्षों से मैं लगातार इस सदन का ध्यान आकर्षित कर रहा हूँ। मैं इस बीमारी के बारे में लगातार आवाज उठाता रहा हूँ और सरकार का ध्यान आकर्षित करता रहा हूँ। इसे महामारी घोषित किया जाए और इसके उन्मूलन के लिए किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम की घोषणा की जाए। महोदय, मेरे द्वारा इस बात को सदन में उठाने के बाद एनडीए सरकार में कुछ कार्रवाई प्रारंभ हुई थी और उसका परिणाम था कि सन् 2004-05 के बाद वहां पर वैक्सिनेशन प्रारंभ हुए। वेक्सिनेशन के परिणाम सामने आए और जेई के केसेज़ कम हुए हैं। वह आज 36 प्रतिशत से घट कर 6 प्रतिशत पर आ गया है। लेकिन जहां जेई से होने वाली मौंतें कम हुई हैं वहीं एंट्रोवायरस से होने वाली मौंते लगातार बढ़ी हैं। हम लोग इस भंवर जाल में फंसे हुए हैं कि वह जेई है, वीई है या एईएस है। तीन बार लगने वाले टीकों को सरकार ने सिर्फ एक-दो बार लगाकर छोड़ दिया है। टीकारण भी मई-जून में किया गया। इस बार तो देखा जा रहा है कि इस बीमारी से पूरे साल भर मौंतें हो रही हैं। अक्सर हम लोग देखते थे कि 15 नवंबर के बाद मौंतें नहीं होती थीं लेकिन आज भी लगातार वहां मौंतें हो रही हैं। लगातार तीन-चार, तीन-चार मौंतें हो रही हैं। इससे पहले जब जेई के केसेज़ ज्यादा होते थे तो 15 नंवबर के बाद मौंतें होनी बंद हो जाती थीं और इन्सेफेलाइटिस के मरीज आने बंद हो जाते थे। जो टीकाकरण फरवरी-मार्च में होने थे, राज्य सरकार ने उन टीकाकरणों को मई-जून में कराया। बीमारी के केसेज़ 15 जून के बाद से, जुलाई प्रारंभ होने के बाद से, बरसात होने के बाद आने प्रारंभ होते हैं। टीकों को एक्टिवेट होने में तीन से चार महीनों का समय होता है। लेकिन टीकाकरण भी ईमानदारी से नहीं कराए गए हैं। जिन टीकों को तीन बार कराया जाना चाहिए था, उसको एक बार करा कर सरकार ने अपनी इतिश्री कर दी। टीके की निर्माता कंपनी स्वयं कहती है, उसके रेपर में भी लिखा गया है कि इसको कम से दो या तीन बार लगाया जाना चाहिए। क्या सरकार का यह रवैया है कि एक बार टीकाकरण करने के बाद अपनी जिम्मेदारी से मुकर जाना नहीं है ? क्या वह इस महामारी से मुंह मोड़ने जैसा नहीं है? क्या सरकार इस बीमारी का उपचार मात्र ही चाहती है? क्या बचाव और उन्मूलन सरकार की प्राथमिकता में नहीं होगा? 33 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन सरकार आज तक यह पता नहीं लगा पाई है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का मासूम किस वायरस का शिकार हो रहा है? वह जेई है, वीई है या एईएस है। अगर सरकार के पास ठोस और दीर्घकालीन राष्ट्रीय इन्सेफेलाइटिस कार्यक्रम होता तो संभवतः यह बीमारी हम सब के सम्मुख ऐसा भयावह दृश्य प्रस्तुत नहीं करती। यह सच है कि यह बीमारी तमिलनाडु में सन् 1956 में आई उसके उपरांत आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल होते हुए सन् 1978 में इसने पहली बार इसने पूर्वी उत्तर प्रदेश में पैर फैलाए थे। अगर महामारी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में रोका गया होता तो आज उत्तर प्रदेश के 35 जिले इससे प्रभावित नहीं होते। माननीय मंत्री जी ने अपने वक्तव्य में कहा है कि देश के 19 राज्य और 171 जिले इससे प्रभावित हैं, लेकिन अगर गैर सरकारी आंकड़ों को देखा जाए तो 26 राज्य इस बीमारी से कम या ज्यादा रूप में प्रभावित हैं। लगातार यह बीमारी मासूम बच्चों को निगलती जा रही है। मुझे बीआरडी मैडिकल कॉलेज में जाने का अक्सर अवसर मिलता है, उन मासूम बच्चों को देखने के लिए और इस बीमारी से पीड़ित बच्चों का हाल-चाल जानने के लिए अवसर मिलता है। जब मैं बीआरडी मैडकल कॉलेज में जाता हूँ तो मैंने देखा है कि इस बार भी और पिछली बार भी वहां पर दवा के अभाव बच्चे में मरे हैं।
          महोदय, चाहे केंद्र की सरकार हो या उत्तर प्रदेश की सरकार हो, दोनों सरकारें अपनी प्राथमिकताएं गिनाती हैं कि हम गरीबों और किसानों के लिए लड़ेंगें और दलितों की बात करेंगे लेकिन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बीमारी से मरने वाले 99 प्रतिशत बच्चे दलित, गरीब और किसान परिवार के हैं।  यह सरकार उन दलितों के बच्चों को, उन गरीबों और किसानों के बच्चों को मरने से नहीं रोक पायी है। यह इस सरकार के वास्तविक चेहरे को प्रदर्शित करता है, प्रदेश सरकार के वास्तविक चेहरे को प्रदर्शित करता है कि एक तरफ इस देश का गरीब, इस देश का दलित, इस देश का जो अन्तिम पंक्ति में बैठा हुआ व्यक्ति है, वह दवा के अभाव में मर रहा है, लगातार दम तोड़ रहा है। केंद्र सरकार के मंत्री वहां गये थे, हमें सूचना नहीं, लेकिन प्रदेश सरकार के मंत्री को तो वहां जाने की भी फुरसत नहीं हुई। मुख्यमंत्री की बात तो दूर, प्रदेश सरकार का कोई मंत्री वहां नहीं पहुंचा।
          महोदया, दवा के अभाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश का मासूम दम तोड़ रहा है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में लगभग पांच हजार करोड़ रूपये का उत्तर प्रदेश में घोटाला होता है, लेकिन एनआरएचएम के दवा का अगर एक पार्ट उस बीमारी के उपचार के लिए वहां के सीएससी, वहां के पीएससी, डिस्ट्रक हॉस्पिटल्स के जीर्णोद्धार और उनके पुनरूद्धार के लिए खर्च किया गया होता, तो दवा के अभाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश का मासूम नहीं मरता, लेकिन लगातार मौतें होती जा रही हैं।...( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Nothing else will go in record.
(Interruptions) …* योगी आदित्यनाथ  : महोदया, एक तरफ पूर्वी उत्तर प्रदेश का मासूम दवा के अभाव में लगातार दम तोड़ रहा है और दूसरी तरफ हजारों करोड़ रूपये का दवा का घोटाला, एनआरएचएम का दवा का घोटाला उत्तर प्रदेश के अंदर हुआ है। यह पूरी सरकारों की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करता है।
          महोदया, इसीलिए मुझे सरकार की नीति और उसकी नियति पर भी हंसी आती है। माननीय उच्च न्यायालय ने  वर्ष 2007 में एक रिट दाखिल हुई थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर पद्रेश सरकार को और केंद्र सरकार को आदेशित किया था कि इंसेफेलाइटिस के पूर्ण उन्मूलन के लिए, इसके बचाव और उन्मूलन के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर जे.ई. को गोरखपुर में स्थापित किया जाये। लेकिन इस सरकार ने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर जे.ई. को एसजीपीजीआई लखनऊ में स्थापित किया। सरकार का यह कृत्य ऐसा ही है, जैसे सरकार कुआं तब खोदती है, जब प्यास से लोग मरने लगते हैं और वह भी वहां नहीं जहां प्यास से लोग मर रहे हैं। जब इंसेफेलाइटिस के मरीजों के 75 से 80 प्रतिशत केसेज गोरखपुर और उससे सटे हुए पांच-सात जिलों में हैं, बिहार और नेपाल से सटे हुए जिलों में हैं तो सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर जे.ई. को लखनऊ में खोलने का औचित्य क्या था। जिन सात बिन्दुओं पर इंसेफेलाइटिस उन्मूलन के लिए कार्य होना था, वह किसी भी स्थिति में लखनऊ में संभव नहीं, क्योंकि 75 से 80 प्रतिशत रोगी तो गोरखपुर और उसके आसपास के जिलों से हैं। नेपाल और बिहार से हैं। गोरखपुर में जो वायरल रिसर्च सेंटर एनडीए सरकार की पहल के बाद वर्ष 2007 में स्थापित हो पाया, वह भी संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। वह यह बताने में अभी भी सक्षम नहीं है कि वह कौन सा वायरस है, जिससे पूर्वी उत्तर प्रदेश का मासूम असमय काल के गाल में समा रहा है। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने 27 सितम्बर 2007 को स्पष्ट निर्देश दिया था कि अंतर्राष्ट्रीय मानक का एक शोध केंद्र गोरखपुर में स्थापित किया जाये। जिसे केंद्र तथा प्रदेश सरकारें नियमित रूप से आर्थिक सहायता प्रदान करती रहें। प्रदेश और केंद्र सरकार सीधे-सीधे उच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना कर रही हैं। आज दोनों सरकारों की उपेक्षा के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस की महामारी से वहां का आम मासूम त्रस्त है, लेकिन सरकार आज भी जे.ई. वायरल इंसेफेलाइटिस या एईएस के भंवरजाल में फंसी है। मौत के आंकड़े लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं।
          महोदया, स्वाइन फ्लू और बर्ड फ्लू के मामले में सरकार ने अत्यंत सतर्कता बरती थी। इसकी रोकथाम के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने समाचार पत्रों में, टी.वी.चैनल्स में बड़े-बड़े विज्ञापन दिये, लेकिन जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक महामारी के लिए जन-जागरण अभियान क्यों नहीं? जबकि अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक को देखें तो बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू से मृत्यु दर मात्र 2 प्रतिशत है और इंसेफेलाइटिस से मृत्यु दर 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत है।  एनसिफलाइटिस से पूर्वी उत्तर प्रदेश में शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम हुए हज़ारों मासूम बच्चों के पुनर्वास के लिए स्वीकृत रीहैबिलिटेशन सैन्टर, जिनकी घोषणा 2009 में इसी सदन में माननीय मंत्री जी ने मेरे कॉलिंग अटैन्शन के जवाब में की थी, अब तक वह बीआरडी मैडिकल कालेज गोरखपुर में शुरू नहीं हुआ है। माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी ने इसी सदन में मुझे आश्वासन दिया था कि एनसिफलाइटिस के उपचार एवं उन्मूलन के लिए भारत सरकार पूरी मदद करेगी और बीआरडी मैडिकल कॉलेज में रीहैबिलिटेशन सैन्टर स्थापित करेगी। संसद में दिया गया सरकार का जो आश्वासन है, वह केवल आश्वासन मात्र बनकर रह गया है। हम लोग जिन मुद्दों को लेकर यहाँ पर वक्तव्य रखते हैं, एक विश्वास के साथ रखते हैं कि कम से कम सदन में रखे गये वक्तव्य में सरकार बिना किसी पूर्वाग्रह के अमल और कार्यवाही करेगी, लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हो पाया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि केन्द्र से जो टीमें जाती हैं, उनके लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश का मासूम एक गिनी पिग्ज़ बन गया है, प्रयोगशाला बन गया है। उनके लिए वहाँ के बच्चे प्रयोग करने के नये माध्यम बन गए हैं। कब तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के मासूम बच्चों के साथ खिलवाड़ होता रहेगा, कब तक उनके साथ यह प्रयोग होता रहेगा? 33 वर्षों से वहाँ लोग लगातार मर रहे हैं।
          महोदया, पूर्वी उत्तर की पाँच करोड़ आबादी के बीच में अकेला बीआरडी मैडिकल कॉलेज एकमात्र सरकारी मैडिकल कॉलेज है। मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूँ कि पाँच करोड़ की इस आबादी के बीच में क्या बीआरडी मैडिकल कॉलेज के उन्नयन के लिए, उसको एम्स की तर्ज पर विकसित करने के लिए क्या सरकार कोई कदम उठाएगी? वह तराई का क्षेत्र है, वहाँ पर तमाम इस प्रकार की विषाणुजनित बीमारियों से बच्चे ग्रस्त हैं। पूरी दुनिया में आपको कहीं पोलियो नहीं मिलेगा, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में पोलियो है, घेंघा है, फाइलेरिया है, मलेरिया है, डेंगू है, काला जार है। वहाँ पर तमाम तरह की विषाणुजनित बीमारियाँ हैं, लेकिन वहाँ पर कोई भी ऐसा सैन्टर नहीं है जहाँ लोग उपचार करा सकें और अकेले पाँच करोड़ की आबादी के बीच में बीआरडी मैडिकल कॉलेज एकमात्र मैडिकल कॉलेज है। अगर एम्स की तर्ज पर एक केन्द्रीय चिकित्सा संस्थान देश के अन्य भागों में खुल सकते हैं तो पाँच करोड़ की आबादी के बीच में गोरखपुर में क्यों नहीं खुल सकता? क्या सरकार इस संबंध में कदम उठाएगी? क्या यह सरकार के लिए केवल एक राजनीतिक मुद्दा मात्र है। वहाँ के मासूम बच्चों को क्या भारत सरकार अपने गणराज्य के अधीन नहीं समझती है कि उनको मरते हुए देखना चाहती है? लगातार मौत पर मौत होती जा रही है। हम लोग लगातार वहाँ के आंदोलन को झेल रहे हैं और सरकार मौन बैठी हुई है। इसलिए मैं सरकार से अनुरोध करूँगा कि सरकार एम्स की तर्ज पर बीआरडी मैडिकल कॉलेज को विकसित करने के लिए कोई घोषणा करेगी।
          मैं सरकार से अनुरोध करूँगा कि जो महामारी उत्तर प्रदेश के 35 जनपदों में है, अगर माननीय मंत्री जी के ही वक्तव्यों को मैं मानूँ तो देश के 171 जिले, उत्तर प्रदेश के 35 जिले और देश के 19 राज्यों में जो बीमारी कहर बरपा रही है, इसे मात्र राज्य का विषय आपने कैसे मान लिया? आप गोरखपुर गए थे और आपने गोरखपुर में कहा था कि यह राज्य का विषय है। मासूम मर रहे हैं और आप कहते हैं कि यह राज्य का विषय है। जो बीमारी देश के 19 राज्यों में है, आप उसे राज्य का विषय कैसे मान रहे हैं? इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूँ कि क्या सरकार एनसिफलाइटिस उन्मूलन के लिए किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम की घोषणा करेगी?
          मैं सरकार से जानना चाहता हूँ कि गोरखपुर में स्थापित वायरल रिसर्च सैन्टर को उच्चीकृत करके वायरस की पहचान के लिए सही कारक का पता लगाने, गोरखपुर समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश को इस महामारी से बचाने के लिए क्या किसी कार्य योजना की घोषणा सरकार करेगी?
          महोदया, इस बार वहाँ पर दवा के अभाव में मासूम मरे हैं। वहाँ कोई उपचार की व्यवस्था नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार उत्तर प्रदेश में थी तो एनसिफलाइटिस के लिए मुफ्त में उपचार की व्यवस्था की गई थी। लेकिन पिछले वर्ष भी और इस वर्ष भी वहाँ बच्चों को कोई दवा नहीं मिली। वहाँ मासूम और गरीब बच्चे मरते रहे। एक ओर हज़ारों करोड़ रुपये का एनआरएचएम का घोटाला और दूसरी तरफ दवा के अभाव में मासूम मर रहे हैं। इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहूँगा कि जो एनआरएचएम की राशि उत्तर प्रदेश में स्वीकृत हुई है, उसका एक हिस्सा क्या एनसिफलाइटिस के उपचार एवं उन्मूलन पर सरकार खर्च करेगी?
          सैन्टर ऑफ एक्सेलैन्स फॉर जैपनीज़ एनसिफलाइटिस गोरखपुर में स्थापित करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है? एनसिफलाइटिस से बचाव और रोकथाम के लिए व्यापक जागरण अभियान स्वाइन फ्लू और बर्ड फ्लू की तर्ज पर विज्ञापन, गोष्ठियाँ, विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम, जो लोगों को बचाव के उपाय सिखा सकें, आखिर यह जीओएम कब तक गठित करेंगे? सरकार को अगर किसी काम को नहीं करना होता है तो सरकार उसके लिए कोई कमेटी गठित कर देती है। उसे जी.ओ.एम. के नाम पर लटकाती रहती है। आज वहां मासूम मर रहे हैं, आप जी.ओ.एम. की बैठक दिसम्बर, जनवरी, फरवरी में करके क्या करेंगे? आखिर सरकार घोषणा क्यों नहीं करती है? यह सच है कि तमाम मंत्रालयों को मिल कर एक साथ कार्यक्रम चलाने पड़ेंगे। उस बीमारी को आज तक केवल स्वास्थ्य मंत्रालय तक सीमित नहीं रखा जा सकता। लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशन में वहां पर स्वच्छ पेयजल के लिए व अन्य तमाम कार्यक्रमों के लिए जी.ओ.एम. की बैठक अब तक कोई निर्णय क्यों नहीं ले पायी है? आप तो वहां अक्टूबर में गए थे। अक्टूबर से दिसम्बर तक सरकार निर्णय नहीं ले पायी है। क्या यह सरकार की उदासीनता को प्रदर्शित नहीं करता है? इसलिए मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि इन्सेफ्लाइटिस से बचाव एवं रोकथाम के लिए व्यापक जन-जागरण की दृष्टि से सरकार क्या कदम उठा रही है?
          (7) इन्सेफ्लाइटिस से प्रभावित क्षेत्रों में साफ-सफाई तथा शुद्ध पेयजल की आपूर्त्ति एवं कीटनाशकों के छिड़काव के संबंध में सरकार क्या कदम उठाने जा रही है?
          (8) इन्सेफ्लाइटिस से शारीरिक एवं मानसिक रूप से अक्षम हुए मासूम बच्चों के पुनर्वास के लिए सरकार क्या व्यवस्था करने जा रही है?
     

श्री रमेश बैस (रायपुर):अध्यक्ष महोदया, काफी लम्बे समय से चर्चा के लिए यह प्रस्ताव सदन में रखा गया था। आज बहुत खुशी की बात है कि इस गंभीर मामले पर चर्चा इस सत्र के आखिरी दिन हो रही है। माननीय सदस्य योगी जी ने कई बार इस सदन में इस बीमारी के बारे में मामला उठाया और उन्होंने काफी चिंता जाहिर की, लेकिन सरकार के द्वारा जो जवाब दिया गया, वह बहुत निराशाजनक है। वर्ष 1973 से हमारे देश में यह बीमारी आयी और 4 नवंबर, 2011 को मंत्रिमंडल बैठे। 38 सालों में नवंबर और दिसंबर में चार बैठकें हुईं। लेकिन इन 38 सालों में सरकार को कोई चिंता नहीं हुई कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस बीमारी के कारण इलाज़ के अभाव में बच्चे मर रहे हैं। बच्चों की मौत के जवाब में जो कारण बताया गया है वह है पेयजल, स्वच्छता और कुपोषण। हम लगातार नारा दे रहे हैं  " हो रहा भारत निर्माण "। हम भारत निर्माण की बात करते हैं, लेकिन आज भी हम पीने के लिए स्वच्छ पानी, और स्वच्छता की तरफ ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या अभी भी बढ़ रही है। यह बीमारी कोई छोटी-मोटी बीमारी नहीं। पहले तो यह पश्चिम बंगाल में प्रारम्भ हुआ, आज यह पूरे देश में फैल रहा है। अब यह झारखण्ड से लगा हुआ छत्तीसगढ़ का इलाका जसपूर और रायगढ़ में भी फैल गया है।

          मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि पहले हमारे देश में बीमारियों का इलाज़ आयुर्वेद के माध्यम से होता था। नाड़ी वैद्य आते थे, वे नाड़ी छूकर बताते थे कि किसको क्या बीमारी है। नाड़ी वैद्य इलाज़ करता था। लेकिन आज हम डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर हमसे पूछता है कि आपको क्या बीमारी है। अब मरीज अपनी बीमारी बताता है तब डॉक्टर इलाज़ करता है। यह जो फर्क़ हो रहा है, हमारे इलाज़ में जो कमी हो रही है, इसको गंभीरता से लेना चाहिए कि सारी बीमारी की जड़ मच्छर है। सिर्फ मस्तिष्क का बुखार नहीं, मच्छर से कई बीमारियां फैलती हैं। चाहे वह हाथीपांव की बीमारी हो, डेंगू हो, मलेरिया हो, कई बीमारियां सिर्फ मच्छर के कारण हो रही है। हम मच्छर के उन्मूलन के लिए अभियान क्यों नहीं चलाते?

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): 40 सालों से सरकार में ये लोग मच्छर नहीं मार पाए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बस हो गया। यह सब क्या हो रहा है?

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record except what Shri Ramesh Bais says.

(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया : श्री रमेश बैस जी, आप अपना प्रश्न पूछिए।

…( व्यवधान)

श्री रमेश बैस : मैं मंत्री जी से यह निवेदन है कि इसको राज्य का मामला न मानते हुए इसे राष्ट्रीय समस्या मानकर जिस-जिस प्रदेश में यह बीमारी फैल रही है, वहां इसे तुरन्त रोकने का प्रयास करें।        

अध्यक्ष महोदया : बस हो गया। यह क्या कर रहे हैं?

…( व्यवधान)

डॉ. भोला सिंह : माननीय अध्यक्षा जी, जिस आलोच्य विषय पर ध्यानाकर्षण सूचना के माध्यम से...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : कृपया शान्त हो जाइये। शान्त होइये।

डॉ. भोला सिंह : माननीय अध्यक्षा जी, जिस आलोच्य विषय दिमागी बुखार पर सदन विमर्श कर रहा है और जिस तरह का बयान देश के स्वास्थ्य मंत्री ने दिया है, वह विडम्बना से भरा हुआ है। मुझे बड़ी पीड़ा हो रही है। आप स्वयं साहित्य में अभिरुचि रखती हैं। प्रेमचन्द जी ने कफन नामक उपन्यास में जिस तरह से बुधिया का चित्र खींचा है और जिस तरह से गोबर ने और उसके बेटे और उसके पति ने काम किया है, बुधिया गर्भवती है, दर्द से छटपटा रही है, उसका पति घूरे में आलू पका रहा है, घूरे के बगल में बेटा भी बैठा है, पति भी बैठा है और बुधिया दर्द से चिल्ला रही है, पति देखने के लिए नहीं जाता है, क्योंकि, अगर वह जायेगा तो उसके आलू उसका बेटा खा जायेगा और बेटा मां को देखने के लिए नहीं जा रहा है, क्योंकि अगर वह जायेगा तो इस आलू को उसका बाप खा जायेगा। यह पीड़ा आज भी यह देश भोग रहा है।

          गरीब बिहार में एक नायाब मुख्यमंत्री हुए थे। उनके जमाने में भी यह घटना हुई कि दिमागी बुखार ने पूरे राज्य को ग्रसित कर लिया था। डॉक्टरों ने कहा कि बीमारी का पता नहीं चल रहा है। किसी ने कहा कि साहब, सूअर के चलते यह बीमारी फैल रही है। उस नायाब मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि तमाम सुअर पकड़ लिए जायें और थाने में बन्द कर दिये जायें। 18 डी.एस.पी. उस काम को करने के लिए बहाल हुए और तमाम सूअर थाने में बन्द कर दिये गये और अपराधी थाने से, कस्टडी से निकाल दिये गये। वे मार दिये गये, नतीजा हुआ, सूअर से बीमारी फैलती है तो गरीबों की जीविका मार दी गई। एक तरफ बीमारी में वही मरे, आग लगे तो वही मरे, गोली चले तो वही मरे, भूख लगे तो वही मरे, यह क्या है, मैं केन्द्र सरकार से आपके माध्यम से जानना चाहता हूं?

          क्या बोलते हुए नहीं सोचना चाहिए, लोकतंत्र लोक-लाज का तंत्र है। अगर लोकतंत्र में लोक-लाज नहीं है और अगर कोई शानदार कपड़ा भी पहनता है तो वह नंगा है। अध्यक्षा जी, लोकतंत्र में इस लोक-लाज को सरकार ने उतार फेंका है और वे कह रहे हैं कि 30-35 वर्षों से यह बीमारी चल रही है और वे कह रहे हैं कि दवा का पता नहीं चल सका है, दवा हम तैयार नहीं कर पाये हैं। क्या मैं जान सकता हूं कि यह सरकार किसकी सरकार है, क्या करना चाहती है? बिहार में इधर हाल में मुजफ्फरपुर में, गया में, सीतामढ़ी में, बिहारशरीफ में, नवादा में, सासाराम में, फगुहा में, इन सारे जिलों में बड़े पैमाने पर दिमागी बुखार से गरीबों के बच्चे परेशान हैं, मर रहे हैं और उनकी लाशें फेंकी जा रही हैं और केन्द्र का मंत्री कहता है, बीमारी का कोई इलाज अभी तक तय नहीं हुआ है, दवा तय नहीं हुई है। मैं जानना चाहता हूं कि अगर इस देश में श्री माधवराव सिंधिया जैसा मंत्री हुआ होता, अगर इस देश में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री हुए होते, इस परिस्थिति में उन्हें रिजाइन करना पड़ता, वे रिजाइन कर देते।  इस देश में डॉ. लोहिया ने एक बार कहा था कि क्या गरीब कीड़े और मकोड़े हैं कि जब चाहो उनको गोली से मार दो, जब चाहो बीमारी में मरने दो, जब चाहे आग लगे, उसमें वे जलें, झुलसें?  मैं यह जानना चाहता हूं।  यह लोक सभा जनता की इबादत है, उनकी पीड़ा की इबादत है।

          अध्यक्षा जी, विवेकानंद ने कहा कि मेरा भगवान वह है, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं।  मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि बिहार में आपने ही बिहारशरीफ नालंदा में जाकर एक आयुर्वेदिक इंस्टीटय़ूट की स्थापना की थी।  वहां मुख्यमंत्री गए थे, आप भी गए थे और उसके माध्यम से लोगों का इलाज चल रहा था।  क्या कारण है, जिसका दीप आपने जलाया, जिन हाथों ने दीप जलाए, बीमारी के अंधेरे को दूर करने के लिए, उन हाथों ने इस दीप को क्यों बुझा दिया?  आप इस सदन को क्या कहना चाहते हैं? ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब समाप्त करिए।

डॉ. भोला सिंह :       अध्यक्षा जी, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन गठित स्वायत्तशासी निकाय जवाहर लाल नेहरू भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी अनुसंधान भवन के द्वारा नालंदा में चार स्थानों पर आई विजन सेंटर की स्थापना हुयी थी। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप क्यों बोल रहे हैं, बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … * डॉ. भोला सिंह : आपके हाथों हुयी थी, बिहार के मुख्यमंत्री वहां उपस्थित थे।  आपने उसे क्यों बंद कर दिया।  क्या यह आपकी अक्षमता थी, आप चला नहीं सकते थे, इसका क्या कारण है?  अध्यक्षा जी, मैं आपके माध्यम से सरकार से जानना चाहता हूं कि आपने इसके लिए क्या पॉलिसी बनायी है?  आपने क्या अच्छा कहा, साहब, यह बीमारी गरीबी के कारण हो रही है, यह बीमारी सुरक्षित पेयजल के अभाव में हो रही है।  यह बीमारी कुपोषण से हो रही है।  आखिर यह किसकी जिम्मेदारी है?  सरकार इस मामले में फेल हुयी है।  आदरणीय आदित्य नाथ जी ने सरकार से जो प्रश्न उठाया है, मैं कहना चाहता हूं कि यह न केवल उत्तर प्रदेश का मामला है, न पूर्वी उत्तर प्रदेश का मामला है, संपूर्ण भारत का जो जीवन है, जो जीवन-पद्धति है, जो सामाजिक स्थिति है, वह परिस्थिति है, इसलिए इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति निर्धारित की जाए और संपूर्ण देश के आधार पर एक नीति तैयार करके इसके लिए व्यवस्था की जाए।  अध्यक्षा जी, हो सके तो आप एक बैठक बुलायें, माननीय मंत्री को भी उसमें बुलायें, विरोधी दल के नेताओं को भी बुलायें और बैठकर इस गंभीर स्थिति पर विचार-विमर्श करके, उसकी रोशनी में तत्काल कदम उठाए जाएं।  

          मैं इन्हीं शब्दों के साथ आपके माध्यम से अपनी बात को सदन में रखना चाहता हूं।

 

श्री सुरेश काशीनाथ तवारे (भिवन्डी):अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं धन्यवाद देता हूं।

          देश में बच्चे, नवजात बच्चे, महिलाएं, आम नागरिक दिमागी बुखार रोग से पीड़ित हो रहे हैं।   नवजात बच्चों की मृत्यु हो रही है।  महिलाएं गंभीर रोग से पीड़ित हो रही हैं।  पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे ज्यादा लोग दिमागी बुखार रोग से पीड़ित हैं और इस वायरस के शिकार हैं। 

          महोदया, अगर दिमागी बुखार पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह बीमारी जिस तरह से फैल रही है, यह पूरे देश में फैल जाएगी, जो चिंता का विषय है।  इस दिमागी बुखार वायरस से संक्रमित होने पर इस बीमारी के लक्षण पांच से दस दिन में दिखायी देते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो जाती है।  इस दिमागी बुखार को नियंत्रित किया जाना, जनहित और देशहित में अति आवश्यक है।  समुचित उपचार तक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।  एक तरफ देश में बढ़ रहे दिमागी बुखार जैसी भयानक बीमारी का खतरा चल रहा है, तो दूसरी तरफ देश के ग्रामीण इलाकों और शहरी इलाकों में सरकारी अस्पतालों में  सफाई व्यवस्था का अभाव है।  सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों एवं दवाओं की कमी है। सरकारी डाक्टर्स जो सरकारी सेवा में हैं वे निजी क्लीनिक चला रहे हैं। निजी अस्पतालों में इलाज और जांच के नाम पर मनमाना रूपये वसूल किए जा रहे हैं। इसे रोकने की आवश्यकता है। इस का सबसे ज्यादा असर गरीब आम जनता पर ही होता है क्योंकि गरीब आदमी का सहारा केवल सरकारी अस्पताल ही होता है। जिसके पास इतने पैसे नहीं होते हैं कि वे अपना और अपने परिवार का इलाज निजी अस्पतालों में करा सकें।

          माननीय मंत्री जी से आग्रह करता हूं कि इस भयानक बुखार को रोकने हेतु समुचित आवश्यक कदम उठाए जाएं और सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी दूर की जाए। सरकारी अस्पतालों में इनकी बहाली की जाए। ग्रामीण सरकारी अस्पतालों में दवाओं की पूरी आपूर्ति की जाए। अस्पताल के अंदर और बाहर सफाई की जाए।

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):  माननीय अध्यक्ष जी, आपने मुझे ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर बोलने का अवसर दिया इसके लिए मैं आभारी हूं। मैं खासकर इस बात के लिए आभारी हूं कि आज अंतिम दिन इस सदन में बहुत ही महत्वपूर्ण मामले को इस सदन और सरकार के संज्ञान में लाने का अवसर प्रदान किया है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के 64 साल बीत जाने के बाद भी आज भी गरीब लोगों को स्वास्थ की सुविधा यह सरकार मुहैया नहीं करा पाई है। ( व्यवधान) अध्यक्ष जी मंत्री यहां नहीं हैं। ...( व्यवधान) मंत्री जी उधर अधिकारियों के साथ डिस्कशन कर रहे हैं। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बोलिए। मंत्री जी वहां पर है। कृपया आप सभी शांत हो जाइए।  Do not make issue out of nothing.

शैलेन्द्र कुमार :  जहां तक आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन वर्ष 2005 में बनी जिसमें आपने नब्बे हजार पांच सौ पचपन करोड़ रूपये का प्रावधान किया लेकिन गांवों में आज तक कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं आ पाया। अध्यक्ष जी मैं आप के माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और सिद्ध, यूनानी चिकित्सा पद्धति जो हमारी प्राचीन चिकित्सा प्रणाली रही हैं उन पर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता है। इनके जो भी सरकारी अस्पताल हैं वे बंद होने के कगार पर हैं। उनकी स्थिति बहुत ही खराब है। इंडियन मेडिकल सोसायटी की सर्वे के अनुसार पचहत्तर परसेंट डाक्टर शहरों में काम करते हैं, तेईस परसेंट अल्प शहरी इलाकों में काम करते हैं और केवल दो परसेंट ग्रामीण इलाकों में काम करते हैं। यह स्थिति है। आज पूरे ग्रामीण क्षेत्रों में झोला झाप डाक्टरों की भरमार है उनकी वजह से भी काफी मौतें हो रही हैं। इस पर सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पूरे देश में आपने तीन सौ मेडिकल कॉलेज खोले हैं जिनमें से आपने 105 मेडिकल कॉलेज पांच राज्यों में खोल दिया है - कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमीलनाडु और आंध्रप्रदेश। बिहार में जहां आठ से दस करोड़ की आबादी है वहां पर केवल नौ मेडिकल कॉलेज खोले हैं जो बहुत ही दयनीय स्थिति है। आपने इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज की बात कही। स्वर्गीय मोती लाल नेहरूर जी के नाम से वह मेडिकल कॉलेज है। उनकी 50वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। कुंवर रेवती रमण सिंह जी ने भी आप को इस बारे में इंगित किया होगा, कहा होगा कि  उच्चीकृट किया जाए। वहां पर हार्ट, लिवर और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए उस पर विशेष ध्यान दें। माननीय मंत्री आर पी एन सिंह जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने इस के बारे में मुझे याद दिलाया।

          माननीय अध्यक्ष जी, इस समय 34 हजार की आबादी पर केवल एक डाक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात हैं।  कैसी हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था है? योजना की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी देश में आठ लाख डाक्टर्स और 20 लाख नर्सेज़ की आवश्यकता है। लेकिन हम अभी तक कोई व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। यहां तक कि आपके आंकड़े भी बताते हैं कि 60 प्रतिशत खर्च स्वास्थ्य क्षेत्र का दूषित पानी से पैदा होने वाली बीमारियों पर होता है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग को पानी पर खर्च होने वाले बजट पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि इसमें से काफी पैसा बेकार चला जाता है। वह पैसा स्वास्थ्य क्षेत्र में जाए तो बहुत कारगर सिद्ध होगा।

          देश में स्वास्थ्य का 80 प्रतिशत निजी क्षेत्र के हाथ में है और केवल 20 प्रतिशत सरकारी निगरानी में है। उस 20 प्रतिशत में भी 80 प्रतिशत राज्य सरकारों के अधीन है। यह भी अक्सर सुना जाता है कि राज्य केन्द्र पर जिम्मेदारी थोप देते हैं, जैसे बीएसपी के माननीय सदस्य कह रहे थे कि केन्द्र इस मामले में कुछ मदद नहीं दे रहा है। दूसरी तरफ केन्द्र कहता है कि राज्य कुछ नहीं करते। इस तरह इन दोनों के बीच में गरीब आदमी, मस्तिष्क ज्वार से पीड़ित लोग मर रहे हैं। बच्चों के मरने की जो संख्या आपने बताई, मैं कहना चाहता हूं कि वह आंकड़ा फर्जी है। हजारों की संख्या में बच्चे इस बीमारी से मरे हैं।

          मैं मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि आपने इस बात का संज्ञान लिया और आरपीएन सिंह जी के साथ गोरखपुर का दौरा किया। लेकिन योगी आदित्यनाथ जी ने कई बार इस मसले को यहां उठाया है। मैं उनका समर्थन करता हूं और उनकी मांग के साथ अपने को सम्बद्ध करता हूं। उन्होंने जो मांग की है वह अवश्य पूरी होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल से लेकर झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी ऐसी गम्भीर बीमारियों से लोग पीड़ित हैं। विगत दस वर्षों का रिकार्ड देखा जाए तो 22 तरह की नए बुखारों से लोगों को सामना करना पड़ रहा है। लेकिन अभी तक हमारी मेडिकल एजेंसी या वैज्ञानिक यह पता नहीं कर पाए कि यह कैसा बुखार है। अभी भोला सिंह जी ने कहा था कि पक्षियों से, सुअरों से और गंदगी से तथा दूषित पानी से ऐसी बीमारियां पैदा होती हैं। हम अभी तक इसके निदान के लिए कोई वैक्सीन ईजाद नहीं कर पाए है। इस सम्बन्ध में आपने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कोई प्रयास नहीं किया और न ही किसी देस से इस बारे में चर्चा की कि इस प्रकार की बीमारियों पर कैसे कंट्रोल किया जा सकता है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आपस में विचार-विमर्श मत करें। इतने गम्भीर विषय पर चर्चा हो रही है, उसे सुनिए।

श्री शैलेन्द्र कुमार : अक्तूबर 2011 की दिल्ली की रिपोर्ट है, सरकारी आंकड़ें हैं  कि  20000 से लेकर 25000 मरीज तक भर्ती रहे। इसके अलावा चार लाख मरीज मस्तिष्क ज्वार के रहे हैं। जिसमें डेंगू, चिकनगुनिया, टाइफाइड, मौसमी बुखार हैं। अकेले दिल्ली में 5000 मामले डेंगू के आए हैं। यह उस वक्त का रिकार्ड मैं बता रहा हूं। चिकनगुनिया के तो बहुत कम मामले इसमें दर्शाए हैं। ये बीमारियां, जगह-जगह पानी एकत्र होने से, मौसम की नमी और खास तौर से साफ सफाई के अभाव में पैदा होती हैं।

अध्यक्ष महोदया: अब आप अपनी बात समाप्त करें।

श्री शैलेन्द्र कुमार : आज सत्र का अंतिम दिन है इसलिए बोल लेने दीजिए। मैं अपनी बात समाप्त ही करने वाला हूं।

अध्यक्ष महोदया: इतना लम्बा थोड़ा ही बोलते हैं। इसमें सिर्फ सवाल पूछते हैं स्पष्टीकरण के लिए। लेकिन आपने तो बहुत लम्बी भूमिका बांध दी है।

श्री शैलेन्द्र कुमार : अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे मौका दिया, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त कर चुका हूं।

अध्यक्ष महोदया: ठीक है, जल्दी से सवाल पूछिए।

श्री शैलेन्द्र कुमार : जहां तक बुखार में जो पैरासिटामोल की दवा आप दे रहे हैं, पहले बुखार के निदान के लिए दवाओं में पैरासिटामोल दी जाती थी।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: कृपया शोर न करें।

श्री शैलेन्द्र कुमार : पता नहीं कैसे उसकी गुणवत्ता में कमी आ गई कि पैरासिटामोल किसी भी बुखार में कारगर नहीं हुई और उसका कोई असर नहीं होता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी 2 नवम्बर को इसे संज्ञान में लिया और सरकार को निर्देशित किया। लेकिन कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए. मेरे क्षेत्र में एक शैल कुमारी, 14 साल की लड़की हाई स्कूल की परीक्षा पास कर चुकी थी, उसकी मौत डेंगू से हुई। जब हम लोग वहां गए तो उसकी मौत पर पूरा कस्बा बंद था। इलाहाबाद में 29.9.2011 की जो सरकारी रिपोर्ट है, उसके अनुसार एंसेफेलाइटिस से पीड़ित 25 मौत बताई गई, जबकि वहां पर हजारों की संख्या में मौतें हुई हैं। आज तक उस इलाके में बच्चों की हजारों की संख्या में मौत हुई है। वहां पूरे इलाके में गंदगी का व्यापक अम्बार है, फॉगिंग मशीन की कोई व्यवस्था नहीं है, मच्छरों से बचाव के लिए कोई कारगर कदम सरकार ने नहीं उठाया है और न ही उनसे निजात दिला पाई है।

          मुझे याद आता है कि जब राजनारायण जी स्वास्थ्य मंत्री थे, उन्होंने जन स्वास्थ्य रक्षकों की नियुक्ति ग्रामीण क्षेत्रों में की थी। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में 26 लाख जन स्वास्थ्य रक्षकों की कमी है। मैं चाहूंगा कि जो जन स्वास्थ्य रक्षकों की नियुक्त पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण जी ने नियुक्ति की थी, उन्हें बहाल करें, तब ही ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति सुधर पाएगी। यहां पर 55 प्रतिशत बच्चों का समुचित इलाज नहीं हो पाता है और उनके टीकाकरण की कोई व्यवस्था नहीं है जिसके कारण करीब 9 लाख नवजात शिशु जन्म लेते ही मर जाते हैं। देश में बैक्टेरिया जनित और संक्रामक रोग 40 गुना बढ़ गये हैं लेकिन उनके निदान की कोई व्यवस्था सरकार ने नहीं की है। बिहार और उत्तर प्रदेश के जो रिकार्ड दिये गये हैं मैं उन्हें पढ़कर नहीं बताना चाहूंगा, क्योंकि माननीय अध्यक्षा जी जल्दी प्रश्न पूछने का आग्रह कर रही हैं। मुझे डा. राम मनोहर लोहिया जी का एक नारा याद आता है और अगर उसे किसी ने उत्तर प्रदेश में चरितार्थ किया है तो माननीय मुलायम सिंह जी ने किया था। उन्होंने नारा दिया था कि   “ रोटी-कपड़ा सस्ती हो, दवा पढ़ाई मुफत ही हो।”  दवा के मामले में जो भी गरीब आदमी चाहे 10 लाख तक का इलाज रहा, उत्तर प्रदेश सरकार ने उसकी उचित व्यवस्था की थी। आज जरूरत इस बात की है कि डा. राममनोहर लोहिया जी ने जो नारा दिया था, उसे केन्द्र सरकार लागू करे, तभी गरीब उसका लाभ उठा सकते हैं। आपने जो आंकड़े दिये हैं कि उत्तर प्रदेश में 3474 मामलों में 575 लोगों की मौत हुई। माननीय मंत्री जी ये फर्जी आंकड़े हैं। असम में आपने 1391 मामले बताए जिनमें 250 लोगों की मृत्यु हुई, बंगाल में 414 मामलों में 40 मौतें, बिहार में 821 मामलों में 197 लोगों की मौत हुई। ये सब फर्जी आंकड़े हैं। आप अपने नुमाइंदे भेजकर जांच करवा लीजिए।।  इंजेक्शन आप तब मुहैया करवाते हैं जब मरीज मर जाता है, बीमारी फैल जाती है। हमें पहले से व्यवस्था करनी चाहिए।   मैं माननीय मंत्री जी से आपके माध्यम से निवेदन करना चाहूंगा कि योगी आदित्यनाथ जी, भोला सिंह जी और बैस जी और हमने जो मामले उठाए हैं, उन्हें आप गंभीरता से लें। मैं जानता हूं कि मैं स्वास्थ्य सलाहकार समिति में भी हूं और आप इस बारे में बहुत चिंतित हैं, आप व्यवस्था कर रहे हैं। आपने इन सभी रोगों को कैटेगराइज किया है लेकिन आज ग्रामीण क्षेत्रों में इसके बारे में प्रचार-प्रसार की जरूरत है। इसलिए जो दिमागी बुखार से बच्चे मरे हैं, बूढ़े लोग मरे हैं उनके मुआवजे की व्यवस्था कीजिए और चाहे आपको विदेश से भी दवाइयां मंगानी पड़ें लेकिन आप रोग फैलने से पहले उसका इलाज करवाइये। लेकिन होता यह है कि जब रोग फैलता है तब सरकार उसका संज्ञान लेती है, तब तक हजारों की संख्या में मौतें हो जाती हैं। मैं इन्हीं बातों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                                         

अध्यक्ष महोदया :  आप क्यों शोर मचाने लगे हैं, आप बैठ जाइये।

...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Do not shout like this. Why are you shouting?

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग खड़े क्यों हो गये, ऐसे कैसे होगा, नाम भेजने से थोड़े ही होगा। ध्यानाकर्षण चल रहा है, पहले से नोटिस देना होता है, बैलेट में आता है, ऐसे कैसे हो जाएगा?

...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing is going on record.

(Interruptions) …* श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): अध्यक्ष महोदया, मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि आप मेरी बात सुन लीजिए।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing is going on record.

… (Interruptions) …* MADAM SPEAKER: I mean, you cannot just stand up and start speaking. You have to give a notice, and I have to permit you to speak.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइये। ऐसा है कि ध्यानाकर्षण में अधिक से अधिक पांच सदस्य बोलते हैं। क्योंकि यह बहुत संवेदनशील विषय है और आप जैसा कह रहे हैं।

...( व्यवधान)

12.00 hrs. इसलिए आपको बहुत ही विशेष परिस्थिति में मैं आपको बोलने की अनुमति दे रही हूं और आपके बाद मंत्री जी बोलेंगे।

…( व्यवधान)

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): मैडम, इस पर हम भी बोलेंगे।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आपका कोई नोटिस नहीं है। आप दोनों का कोई नोटिस नहीं है। आप बैठिये और उन्हें बोलने दीजिए। आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Why are you shouting?

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप क्यों खड़े हो गये?

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing is going on record.

(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया : आप उन्हें बोलने दीजिए, ऐसा मत कीजिए। आप क्यों खड़े हैं? आप लोग क्यों खड़े हो गये। कृपया बैठ जाइये। आप बार-बार क्यों खड़े हो रहे हैं।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइये। कृपया बैठिये। आप क्यों खड़े हैं। कृपया बैठिये। ठीक है, आप खड़े होकर अपनी बात नहीं कह सकते, बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आपने नोटिस क्यों नहीं दिया? There is no notice.

श्री जगदम्बिका पाल : हमने नोटिस दिया है।

अध्यक्ष महोदया : हां, आप बोलिये। चूंकि इनका नोटिस आया है, इसलिए हम इन्हें विशेष परिस्थिति में बुलवा रहे हैं। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर आप ऐसे खड़े होकर डिमांड नहीं कर सकते, आप बैठ जाइये और माननीय सदस्य को बोलने दीजिए।

   

श्री जगदम्बिका पाल : अध्यक्ष महोदय, मैं आपका अत्यंत आभारी हूं जो आपने विशेष परिस्थितियों में मुझे बोलने का मौका दिया और जैसा आपने कहा कि इस संबंध में मैंने सात दिसम्बर से नोटिस भी दे रखा था, लेकिन आलरेडी पांच व्यक्तियों के होते हुए आपने मुझे बोलने का अनुमति दी, इसके लिए मैं अत्यंत आभारी हूं। मैं इस बात के लिए भी आभारी हूं कि यह विषय जितना महत्वपूर्ण और संवेदनशील है और उस पर जिस तरह से योगी आदित्यनाथ जी या अन्य माननीय सदस्यों ने चर्चा की है, मैं अपने आपको केवल उनकी भावनाओं से सम्बद्ध करना चाहता हूं। जैसा यहां उल्लेख हुआ है कि इस बीमारी का सबसे ज्यादा प्रभाव गोरखपुर और बस्ती मंडल में है, जहां से हम लोग चुनकर आते हैं। ...( व्यवधान) परंतु अब यह उत्तर प्रदेश के 35 जिलों में फैल गई है। खुद माननीय मंत्री जी ने अपने वक्तव्य में स्वीकार किया है कि देश के 19 राज्यों के 171 जिलों में इसका प्रकोप बढ़ गया है। यह बात मंत्री जी ने स्वयं स्वीकार की है। अब इस बीमारी की गंभीरता और प्रभाव के संबंध में मुझे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है और न यह विषय कोई राजनीतिक है, जिस पर कोई आरोप-प्रत्यारोप किये जाएं। यह ऐसा विषय है, जिसमें माननीय मंत्री जी ने स्वीकार कर लिया है कि चाहे जापानी इंसिफलाइटिस हो, एईएस हो या बीई हो, इस बीमारी से जो बच्चे प्रभावित होते हैं, अपने भाषण के पहले पैराग्राफ में माननीय मंत्री जी ने कहा कि 25 प्रतिशत बच्चे मर जाते हैं। उन्होंने खुद स्वीकार किया कि 40 प्रतिशत बच्चे यदि बचते हैं तो वे विक्लांग हो जाते हैं, मैन्टली रिटार्डेड हो जाते हैं। इसके अलावा शायद जिस परिवार के लिए अपनी जिंदगी गरीबी के कारण एक बोझ बनी हुई है और ऊपर से उसका बच्चा जापानी इंसिफलाइटिस एईएस के प्रकोप से प्रभावित होकर विक्लांग हो जाए या मैन्टली रिटार्डेड हो जाए तो उसके बाद पूरी जिंदगी के लिए वह बच्चा उस परिवार के लिए उसकी गरीबी के साथ-साथ एक अभिशाप बन जाता है। इसलिए आज इस सदन को इस बात की चिंता करनी पड़ेगी कि यदि सौ बच्चे इस बीमारी से बीमार होते हैं तो उनमें से 25 बच्चे या तो मर जाते हैं और 40 बच्चे जीवन भर के विक्लांग हो जाते हैं। इसलिए उनके लिए कौन सा उपाय हम करें। यह सवाल केन्द्र सरकार का नहीं है, इसमें कोई दो राय नहीं है कि हैल्थ राज्य का विषय है।

          अभी एक बात उठी कि यदि एनआरएचएम का पैसा दिया जाता है।

अध्यक्ष महोदया : आप समाप्त कीजिए।

श्री जगदम्बिका पाल : मैं आपके सामने अपनी बात कहना चाहता हूं तो वह पैसा राज्य को जायेगा और पैसा खर्च करना राज्य का काम है। मैं केवल एक बात कहना चाहता हूं कि पिछले दिनों जब यह बात उठी तो निश्चित तौर से मैं स्वास्थ्य मंत्री जी को धन्यवाद दूंगा कि श्री आर.पी.एन.िंसह साहब गये और खुद मैं भी गोरखपुर और बस्ती गया और वहां जो मीटिंग हुई...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप एक प्रश्न पूछिये और समाप्त कीजिए।

श्री जगदम्बिका पाल : मैं पूछना चाहता हूं कि भारत सरकार ने जो जी-1 बनाया और 4 नवम्बर को ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स कांस्टीटय़ूट हुआ, 21 नवम्बर को उसकी पहली बैठक हुई, 25 नवम्बर को बैठक हुई, 9 दिसम्बर को बैठक हुई तो इन तीनों बैठकों का क्या निष्कर्ष निकला? यह एक राष्ट्रव्यापी समस्या है, उसको देखते हुए कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे पोलियो के उन्मूलन के संबंध में या मलेरिया के उन्मूलन संबंध में है, क्या उस प्रकार का कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम घोषित करने का निर्णय लिया गया है? यह वॉटर बॉर्न डिजीज़ है या स्वच्छ पेय जल की कमी है या पिग से वॉयरस जाता है। माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी के सामने गोरखपुर के सर्किट हाउस में बात हुई, जिसको उन्होंने वक्तव्य में स्वीकार किया है कि जापानी इन्सेफेलाइटिस जो 36 प्रतिशत था वह घट कर का 6.4 प्रतिशत हो गया। लेकिन एक महीने पहले इन्होंने अपने वक्तव्य में स्वीकार किया है इस बीमारी का ट्रेंड राइज हो रहा है। दूसरी बीमारी जो खत्म हो रही है ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए। कितने प्रश्न पूछेंगे? एक प्रश्न पूछना होता है।

…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : एईएस यानि एक्युट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम, जिसका पूरे विश्व में अभी तक कोई इलाज नहीं है, क्या भारत सरकार उसके इलाज के कोई रिसर्च कराएगी? खुद माननीय मंत्री जी कहें कि एईएस के संबंध में कोई वैक्सीन है? चाहे उसके प्रिवेंशन के लिए हो या चाहे उसके उपचार के लिए दवाओं के रूप में हो तो उस पर भी कोई रिसर्च होगा? उस रिसर्च के लिए कौन सा निर्णय लिया गया है? भारत सरकार के मंत्रालय के कोआर्डनेटिड अफर्ट उस संबंध में क्या हुए हैं? जैसा माननीय आदित्य नाथ जी ने मुद्दा उठाया कि एनआरएचम का इतना सारा पैसा जा रहा है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : इतनी लंबी बात मत कीजिए, केवल प्रश्न पूछिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग क्यों बोल रहे हैं? आपके तीन सदस्य बोल चुके हैं, अब आप शांत रहिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: All this will not go on record.

(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया : आपकी बात हो गई है, अब समाप्त करें।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : ये क्या हो रहा है? आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : अध्यक्षा जी, बहुजन समाज पार्टी के जो नेता हैं वे मेरी ससुराल के हैं। अगर वे मेरी बीमारी का ध्यान नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा? मैं धन्यवाद देता हूँ कि वे मेरी इतनी चिंता कर रहे हैं। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  सब लोग क्यों खड़े हो रहे हैं?

…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल :  मैं एक अंतिम मांग करता हूँ कि एनआरएचएम की निर्धारित राशि इस जेई, एईएस के उन्मूलन के लिए उसमें निर्धारित की जाए। इस संबंध में वैक्सिन की उपलब्धता कराने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश में या गोरखपुर सिद्धार्थ नगर में वैक्सिन की एक फैक्ट्री लगाने की बात होगी?  इम्यूनाइजेशन का काम बिल्कुल फेल रहा है, मैं उसके विस्तार में नहीं जाना चाहता हूँ। उस इम्यूनाइजेशन के लिए वैक्सिन की उपलब्धता पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी हो। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप कितना लंबा बोलेंगे? आपको केवल एक प्रश्न पूछना था। मैनें विशेष अनुमति दी तो आप इतना लंबा बोल जाएंगे?

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Now, you may please take your seat.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: You may please conclude now.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Nothing more will go on record.

(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए, बैठ जाइए खड़े क्यों हैं?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आपने नोटिस क्यों नहीं दिया है? इन्होंने नोटिस दिया है। जिन्होंने नोटिस दिया हैं, उन सब को हमने बोलने का मौका दिया है। आपने नोटिस क्यों नहीं दिया? इस तरह से मत कीजिए। बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए। अगर बैठ जाएंगे तो हम सोचेंगे भी कि आपको बुलवाना है या नहीं बुलवाना है।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: No. Nothing will go on record.

(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: I will not give you a chance, if you stand up and behave like this. Please sit down. First you may take your seat. I will not give you a chance. Nothing is going on record.

(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: First you may sit down and then, I may consider calling you.

(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया : आपको समझ नहीं आ रहा है? आप पहले बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया :  आप क्यों बोल रहे हैं? आप बैठिये।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing, except what the hon. Minister says, will go on record.

(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: Hon. Minister, you may address these issues.

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप उन्हें बोलने दीजिये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप क्यों खड़े हो गये? आप बैठिये।

…( व्यवधान)

 

श्री गुलाम नबी आज़ाद: महोदया, मैं उन तमाम साथियों का अपनी तरफ से, अपने मंत्रालय की तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण सब्जेक्ट पर, बहुत ही जरूरी विषय पर, जिससे आज देश के बहुत क्षेत्रों में, बहुत सारे डिस्ट्रिक्ट में बीमारी की वजह, दिमागी ज्वर की वजह से हमारे हजारों बच्चों की जान जाती है। मैं राजनीति से ऊपर उठकर इसके बारे में चर्चा करना चाहता हूं।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) …* श्री गुलाम नबी आज़ाद : योगी जी ने तो बहुत अच्छी शुरूआत की थी।

श्री दारा सिंह चौहान : अंग्रेजी में जवाब दीजिये।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : अंग्रेजी, हिन्दी के बारे में कुछ नहीं, हमारी सब भाषाएं हैं, हमें इस चक्कर में नहीं जाना चाहिए।

श्री शैलेन्द्र कुमार : अंग्रेजी अपनी भाषा नहीं है।...( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद : सुबह से शाम तक तो अंग्रेजी में लिखते हो, लेकिन आंकड़ों का और सालों का जिक्र करने में वे भूल गये कि किस साल में किसकी सरकार थी, उसमें जरा वे चूक कर गये।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing, except what the hon. Minister is saying, will go on record.

(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: Hon. Minister, please address the Chair.

श्री गुलाम नबी आज़ाद : मैं इस सत्र के आखिरी दिन कोई खटास पैदा नहीं करना चाहता हूं, पहले ही बहुत खटास पैदा हुई है। सिर्फ फर्क इतना है कि  "हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वे कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।"...( व्यवधान) मेरी पार्टी और मेरे एलाईज की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है- जो करते हैं उन्हें जताना नहीं आता, जो जताते हैं वे करते कुछ नहीं।...( व्यवधान) हमारी यह समस्या रही है।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing, except what the hon. Minister says, will go on record.

(Interruptions) … * श्री गुलाम नबी आज़ाद : हमने बड़े आराम से, बड़ी शांति से आपकी बात सुनी।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद : पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में जब सुनाने की हिम्मत होती है तो सुनने की भी उतनी हिम्मत होती है और जो सुनाये और न सुने तो उसे सुनाना नहीं चाहिए। अगर वह सुनाये तो उसे सुनने की हिम्मत होनी चाहिए।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing, except what the hon. Minister says, will go on record.

(Interruptions) …* श्री गुलाम नबी आज़ाद : सबसे पहले हमारे कुछ साथियों ने कहा कि सरकार ने, भोला सिंह जी ने फरमाया कि सरकार ने कुछ नहीं किया। मैं बताना चाहता हूं, यह मैं केवल उत्तर दे रहा हूं, मैं अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। जो आपने बताया, मैं उसका उत्तर दूंगा। अगर वह उत्तर दिल के आर-पार चला जाये तो मेरा कुसूर नहीं, क्योंकि जैसा सवाल था, जवाब भी वैसा ही जायेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने कुछ नहीं किया। मुझे बहुत अफसोस से कहना पड़ेगा कि मुझसे पहले जो सरकारें थीं या हमसे पहले जो सरकारें थीं...( व्यवधान) हर साल दो विजिट ऑफिस...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप सुन लीजिये। यह क्या हो रहा है?

…( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद : इसीलिए मैंने पहले कहा कि या तो सुनाना नहीं चाहिए या फिर सुनने की हिम्मत रखनी चाहिए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप इधर उन्मुख होकर बोलिये।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : महोदया, पिछले दो सालों से, जब से यूपीए-2 आई है और हम हैल्थ मिनिस्टर बने हैं, केन्द्रीय सरकार की तरफ से 35 विज़िट जैपनीज़ एनिसिफलाइटिस अफैक्टेड एरियाज़ में किये गये हैं। इसमें दो मिनिस्टर लैवल की विज़िट गोरखपुर में ही हुई हैं। इससे पहले कभी किसी मिनिस्टर की  विज़िट नहीं हुई थी। ...( व्यवधान) आपको क्यों परेशानी है, आप उधर थोड़ी हैं? ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप इधर देखकर बोलिये।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : इसीलिए सैक्रेटरी लैवल पर, डायरैक्टर जनरल आईसीएमआर लैवल पर तीन से ज्यादा विज़िट हुईं, डायरैक्टर जनरल हैल्थ सर्विसेज़ लैवल पर पाँच से छः विज़िट गोरखपुर में हुई हैं। नेशनल वैक्टर बॉर्न डिजीजेज़ के जो डायरैक्टर हैं, जो पूरे देश की बीमारियों को देखते हैं, उनकी तकरीबन आधे दर्जन से ज्यादा विज़िट हुई हैं। जो डिप्टी डायरैक्टर हैं, उनकी एक दर्जन से ज्यादा विज़िट गोरखपुर में और दूसरी जगह हुई हैं। कुल मिलाकर खाली उत्तर प्रदेश और गोरखपुर में दो सालों में 23 विज़ट मिनिस्टर से लेकर सीनियर ऑफिसर्स लैवल पर हुई हैं।  ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप इधर देखकर बोलते रहिये। हर समय रियैक्ट मत करते रहें।

…( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद : जब हम खत्म करेंगे, यदि आप संतुष्ट नहीं होंगे, तब आप हमसे पूछिये।  ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप सब शांत रहिये।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : अब हमने कहा कि सबसे पहले उत्तर प्रदेश में गोरखपुर में वैक्सीन 2006 में आई। उस समय यूपीए गवर्नमैंट का तीसरा साल था। ...( व्यवधान) वैक्सीन 2004 से बनी। उस समय एनडीए नहीं थी। आपने कहा कि एनडीए ने शुरू किया। मैंने कहा कि मैं आपको सही साल बता देता हूँ। ...( व्यवधान) आपने बताया एनडीए ने 2006 में शुरू किया। मैं कह रहा हूँ कि उस वक्त एनडीए नहीं थी, यूपीए था। ...( व्यवधान)  मैं खाली करैक्शन कर रहा हूँ। आप नहीं बोलते तो मैं नहीं बोलता। मैं सिर्फ यह बोल रहा हूँ कि आपने बताया एनडीए ने किया। मैं तो करैक्शन कर रहा हूँ कि उस वक्त यूपीए थी। आपकी जनरल नॉलेज की करैक्शन कर रहा हूँ। ...( व्यवधान) 11 जिलों में उस वक्त किया, यूपी के 28 जिलों में 2007 में किया, 22 जिलों में 2008 में किया, 30 जिलों में 2009 में किया और 20 जिलों में 2010 में किया। इस तरह से 2006 से लेकर 2010 तक उत्तर प्रदेश के 34 जिलों में जैपनीज़ एनसिफलाइटिस के  वैक्सीनेशन हुए। सात ज़िलों में जहाँ सबसे ज्यादा यह बीमारी है, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर, उनमें 2010 में दोबारा से वैक्सीन किये गये। अभी आप कहेंगे कि दोबारा से वैक्सीन क्यों किये गये, क्योंकि 2006 में इन्हीं जिलों में जब वैक्सीन किये गये थे तो वैक्सीन गवर्नमैंट ऑफ इंडिया की  तरफ से दिये जाते हैं, वैक्सीन लगाने के पैसे भी गवर्नमैंट ऑफ इंडिया की तरफ से दिये जाते हैं। मैं यहाँ यूपी की सरकार की बात नहीं करूँगा, पूरे देश में किसी पार्टी की भी सरकार हो, चाहे कोई भी वैक्सीन हो, मुझे आज अफसोस है, खेद से कहना पड़ता है कि जो आँकड़े हमें दिये जाते हैं, वे आँकड़े ज़मीन पर नहीं होते हैं, चाहे किसी की भी सरकार हो। इसलिए किसी पार्टी और पक्ष को बुरा नहीं मानना चाहिए कि उनके खिलाफ है, चाहे वह किसी किस्म की वैक्सीन हो यह नहीं कि जैपनीज़ एनसिफलाइटिस की हो। लेकिन उस वक्त 90 से ज्यादा परसेंटेज दिखाई गई कि वैक्सीन की गई। लेकिन जब दोबारा यूएनएसएफ की एजेन्सी ने सर्वे किया तो मालूम हुआ कि दुर्भाग्य से सिर्फ 50 परसेंट लोगों को ही वैक्सीन हुआ था न कि 90 प्रतिशत लोगों को, जैसा कि राज्य सरकार की तरफ से बताया गया था। इसलिए 2010 में हमने दोबारा वैक्सीन किया। मैं कह सकता हूँ कि वह 80 प्रतिशत से ज्यादा हुआ और यही उसका परिणाम हुआ जो मैंने अपने उत्तर और स्टेटमैंट में कहा था कि उसकी वजह से कम हुआ है।  …( व्यवधान)

          यहां मैं यह बताना चाहूंगा कि जो जैपनीज़ एन्सेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम है, इसमें सैंकड़ों किस्म के वायरस हैं और दुनिया में सिर्फ एक ही वायरस जैपनीज़ इन्सेफ्लाइटिस है, जिसका इलाज है, जिसके लिए दवाई का इलाज है, बाकी तो सिम्पटैमैटिकली है, बुखार हुआ, कुछ दूसरा हो गया तो उसको सैम्पटैमैटिकल कहते हैं। लेकिन जैपनीज़ इन्सेफ्लाइटिस के लिए हम वैक्सीन देते हैं और चाहे हमारे देश में नहीं भी बनता है, तो भी हम विदेश से, जापान से लाकर देते हैं। आज दुनिया बहुत छोटी हो गई है। भोला सिंह जी, आज आप कहते हैं कि कुछ नहीं किया। वर्ल्ड हेल्थ असैम्बली हर साल होती है और उसमें 193 देश हैं। 100 देशों के स्वास्थ्य मंत्री उसके मैम्बर हैं। आज दुनिया में कोई भी बीमारी या वायरस निकलता है तो वर्ल्ड हेल्थ ओर्गेनाइजेशन तुंत 193 देशों को इत्तला देती है कि यह नई बीमारी है और उसका यह इलाज है या यह वैक्सीन या टेबलेट है या यह मैनेजमेंट है। इसलिए जब इस्तीफे की बात करते हैं तो दुनिया के सभी स्वास्थ्य मंत्रियों, राष्ट्रपतियों और साइंटिस्टों को इस्तीफा देना पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने जैपनीज़ इन्सेफ्लाइटिस के अलावा कोई टेबलेट नहीं निकाली है और जब निकलेगी तो जरूर होगी।

          मैं यह भी बताना चाहता हूं कि जैपनीज़ इन्सेफ्लाइटिस का वैक्सीन हम पहले जापान से लाते थे और अभी पहली दफा बायलॉजिकल इवैंस जो एक प्राइवेट सैक्टर कंपनी है, इसको अभी लाइसेंस दिया गया है। इसने जितनी फोर्मेलेटिज़ थीं, वे तमाम मुकम्मल कीं और इस मई से यह वैक्सीन मार्किट में आ जाएगा। यह सबसे बड़ी खुशी की बात है। इसी तरह से भारत बायोटेक बनाएगा, जिसका अभी ह्यूमन ट्रायल चल रहा है। इससे पहले के ट्रायल खत्म हो गए हैं और मुझे यह कहना है, विशेषकर भोला सिंह जी से कि स्वास्थ्य मंत्रालय का नेशनल वायरल इंस्टीटय़ूट, पूना में है, यह बड़ा इंस्टीटय़ूट है, वह बनाएगा और तैयार करेगा। इस साल के आखिर तक यह भी मार्किट में आ जाएगा। यह उपलब्धि हमारी दो साल की है।...( व्यवधान) योगी आदित्यनाथ जी ने फरमाया था कि वैक्सीन एक ही देते हैं, जबकि तीन देनी चाहिए। वैक्सीन तीन किस्म की हैं। वैक्सीन किससे बनती है, कौन बनाता है, मैं इसमें नहीं जाऊंगा, नहीं तो बड़ा महाभारत शुरू हो जाएगा कि कौन किससे वैक्सीन लेगा और कौन किसको लगाएगा। मैं इसमें नहीं जाना चाहता हूं, क्योंकि यह कई अलग-अलग चीजों से बनते हैं। लेकिन एक वैक्सीन जो पहले था, जिसके बारे में आपने कहा कि तीन दफा लगाते हैं। कोई वैक्सीन ऐसी होती है, जिसकी पोटैंसी कम होती है तो उसे तीन में लगाना चाहते हैं। लेकिन हम जो वैक्सीन देते हैं, उसकी पोटैंसी ज्यादा है, यह ज्यादा शक्तिशाली है। तमाम साइंटिस्टों ने कहा है कि इसके लिए एक ही वैक्सीन की जरूरत है। लेकिन स्वयं अपने लिए...( व्यवधान)

DR. RAM CHANDRA DOME (BOLPUR):  Is it approved by WHO?

SHRI GHULAM NABI AZAD: It is approved by WHO. कोई भी वैक्सीन डब्ल्यूएचओ के एप्रूवल के बगैर नहीं होती है … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Dr. Ram Chandra Dome, please take your seat.  You address the Chair. Nothing else will go in record. 

(Interruptions) …* श्री गुलाम नबी आज़ाद : न सिर्फ योगी आदित्यनाथ जी के लिए बल्कि मेरी सैटिसफैक्शन के लिए जब मैं गोरखपुर गया था तो वहां से आने के तुंत बाद मैंने आईसीएमआर और हेल्थ रिसर्च के लोगों को यह काम दिया कि इस पर पूरे देश के साइंटिस्टों की मीटिंग बुलाएं कि क्या दूसरे डोज़ की जरूरत है या नहीं। उनकी एकाध मीटिंग अभी हुई है। फाइनल रिपोर्ट में यदि दूसरे डोज़ की जरूरत पड़ेगी तो हम देंगे। लेकिन वह हेल्थ मिनिस्टर तय नहीं करेगा, जो योग्य लोग हैं, वे तय करेंगे।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) …* SHRI GHULAM NABI AZAD: I would like to mention the steps taken by the Government of India. … (Interruptions) आप इलाज भी चाहते हैं और दवाई भी नहीं खाना चाहते हैं। Madam, the measures and initiatives taken by the Ministry of Health, Government of India, particularly in Uttar Pradesh, from 2006 to 2010, are as follows. Special JE vaccination campaign was launched in 34 districts and repeated in 7 districts in 2010. In 2007 for better coordination and management, JE sub-office of Lucknow, regional office was opened in Gorakhpur.  आपने फरमाया कि एनडीए ने खोला, लेकिन वर्ष 2007 में यूपीए सरकार थी, उसने खोला था। In 2007, Epidemiological and Entomological studies and close coordination, a vector borne disease surveillance unit was also opened in DRD medical college, Gorakhpur. In 2008, National Institute of Virology, Pune का एक यूनिट स्पैशली गोरखपुर में खोला गया और उस पर 16 करोड़ रुपए हमारे मंत्रालय ने मेडिकल कॉलेज को दिए। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ, जैसा कि मैंने पहले कहा कि हमारे पास पहले सिर्फ जेई के बारे में जानकारी थी और उस जेई के एक सौ से ज्यादा वायरसिज़ हैं तो वह फील्ड आफिस जो हमने गोरखपुर में खोला था, वह कामयाब हो गया गोरखपुर में एक और वायरस निकालने में, इन सैंकड़ों वायरसों में से और वह है एंट्रो वायरस। उस एंट्रो वायरस की दुनिया में कोई दवाई नहीं है, कोई भी इंजैक्शन नहीं है। यह वॉटर बोर्न डिसीज़ है। यह वॉटर बोर्न कैसे है कि यह इंसान के पेट में होता है और जब मल के साथ इंसान के निकलता है और जहां लैट्रिन नहीं है, आस-पास के खेतों में लोग जाते हैं, यदि वहां साफ-सफाई न हो और यदि पानी वहां दो-तीन महीने जमा रहे तो यह वायरस मल के साथ दस-पन्द्रह फीट तक नीचे चला जाता है। गोरखपुर में या देश के अन्य हिस्सों में जहां-जहां भी यह एंट्रो वायरस होगा, वहां हेण्डपम्प हैं, शेलो हेण्डपम्प हैं, गोरखपुर में आप देखिए कि लाखों की तादाद में घरों में दस-पन्द्रह फीट पर दो-दो हेण्डपम्प हैं, इससे जब ये पानी निकालते हैं, तो वह आदमी के पेट में चला जाता है, जिसके बाद वह ब्लड वैज़ल्स से ब्रेन में चला जाता है। इसीलिए उसका इलाज यही है कि हम दस फीट वाला हेण्डपम्प बंद कर दें और डीप बोरवैल 70-80 फीट खोदें तो यह बीमारी नहीं आएगी। इसलिए यह सैनीटेशन से जुड़ी हुई है, साफ-सुथरे पानी से जुड़ी हुई बीमारी है।...( व्यवधान)

In 2009, in addition to Rs. 16 crore earlier, an amount of Rs. 5,88,00,000 was released to the State Government for upgradation of JE Epidemic ward at medical college, Gorakhpur. Another amount of Rs. 2.77 crore was released to the State Government of Uttar Pradesh for laboratory facilities at 11 JE sanitation sites for regular supply of JE diagnosis kits. In 2010, the Physical Medicine Rehabilitation Centre at BRD Medical College, Gorakhpur was set up with direct financial support of Rs. 54.51 lakh In 2011-12, an amount of Rs. 47.48 lakh has been approved for implementation of Model Action Plan for control of JEs in Kushinagar district.  In 2011, an amount of Rs. 18.88 lakh have been sanctioned for 100-bedded new JE ward at BRD Medical College of Gorakhpur. Then, Rs. 99 lakh have been sanctioned for ventilator support of Neonatal Unit for JE cases in Medical College, Gorakhpur in 2011.  Then, Rs. 240 lakh have been sanctioned for additional human resource support for JE ward at BRD Medical College, Gorakhpur in 2012.

          Madam, a multi-pronged strategy, JE vaccination and other measures have resulted in the decline of JEs and AES in Uttar Pradesh from 6061 cases and 1500 deaths in 2005 to 3378 cases and 543 deaths in 2011. A large part of AES is due to the Entero-virus which I have already mentioned.  So, I would not like to repeat it.

          Now, what has happened there?  After going there, I have realised it. जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि यह बीमारी सिर्फ़ वैक्सीन से ही ठीक नहीं होगी, इसमें वाटर बोर्न डिजीजेज को कंट्रोल करना है। उसमें हमें वाटर रिसोर्स मिनिस्ट्री की जरूरत पड़ेगी। इसमें सैनिटेशन है, दूसरी मिनिस्ट्रीज की जरूरत पड़ेगी। जैसा मैंने अर्ज़ किया कि 30 बच्चे तो मर जाते हैं। लेकिन जो बच जाते हैं उनमें 30 से 40 प्रतिशत शारीरिक रूप से क्रीपल्ड हो जाते हैं। इसलिए रिहैबिलिटेशन की जरूरत है।

          मुझे बहुत खुशी है यह कहते हुए कि उधर से आने के बाद मैंने प्रधानमंत्री जी से बात की कि यह केवल स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकार के बस की बात नहीं है। इसमें एक मल्टी प्रॉन्ग्ड स्ट्रैटजी होनी चाहिए। सभी मंत्रालयों को उसमें जोड़ना चाहिए। माननीय प्रधानमंत्री ने नवंबर के महीने में मेरी अध्यक्षता में एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की कमेटी बनायी। इसमें हेल्थ मिनिस्ट्री, अर्बन डेवलप्मेंट मिनिस्ट्री, वूमेन एण्ड चाइल्ड मिनिस्ट्री, सोशल जस्टिस एण्ड एमपावरमेंट मिनिस्ट्री, रूरल डेवलप्मेंट मिनिस्ट्री, और ड्रिंकिंग वाटर एण्ड सैनिटेशन मिनिस्ट्री है। मुझे खुशी है कि इस एक-सवा महीने में हमारी तीन मीटिंगें हुई हैं और फाइनल ड्राफ्ट कैबिनेट के लिए तैयार है ताकि हम केन्द्रीय सरकार की तरफ से और राज्य सरकार मिलकर एक मल्टी प्रॉन्गड स्ट्रैटजी बनाकर, इसको न सिर्फ़ उत्तर प्रदेश के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए जो बाकी राज्यों में इसकी संख्या बढ़ती जा रही है, उनके लिए एक पॉलिसी बनाएं और अगले प्लान से, बारहवीं योजना से उसको लागू करें।  

          जहां तक हमारे सभी सदस्य चाहे योगी जी, पाल जी, और सभी साथियों ने, पूरे उत्तर प्रदेश ने कहा है कि इसको एम्स लेवल का इंस्टीच्यूट बनाया जाए। अभी पांच दिनों पहले मैंने झांसी में एलान किया है कि अगले प्लान में, जो अगले साल में शुरू होगा, प्लानिंग कमीशन से पिछले दो सालों से हम सम्पर्क में थे, और मुझे खुशी है कि प्लानिंग कमीशन ने उत्तर प्रदेश के लिए इन प्रिंसिपल एप्रूवल दिया है, वह है एक झांसी का और दूसरा है गोरखपुर का। इनको एम्स की तरह का इंस्टीच्यूट बनाया जाएगा।

 

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं एक दफा हमारे सभी साथियों की भावनाओं का बहुत कद्र करता हूं।

(Placed in Library, See No. LT 6111/15/11)