Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Flood And Drought Situation In The Country Raised By ... on 1 August, 2014
Sixteenth Loksabha an> Title: Further discussion on the flood and drought situation in the country raised by Shri Yogi Adityanath on the July 30, 2014 (Discussion not concluded).
श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर): सभापति जी,मैं आपको बहुत धन्यवाद देता हूं क्योंकि आपने मुझे सूखे जैसे महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया है। हमारे देश में हर एक राज्य में अलग-अलग परिस्थिति बारिश के समय होती है। हमारे देश की रचना ऐसी है कि कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं बाढ़ है और कहीं भारी बारिश होती है तो कहीं कम बारिश होती है। इसी वजह से देश के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। मैं ट्राईबल बैल्ट से आता हूं। जो ट्राईबल बैल्ट है,उसे हमेशा कुदरत पर निर्भर रहना पड़ता है। जब बड़े बड़े बांध बनते हैं तो उन्हीं ट्राईबल लोगों को वहां से विस्थापित होकर कहीं और जाना पड़ता है। लेकिन वे जहां जाते हैं,वहां उनको पीने के लिए भी पानी नहीं मिलता है। गुजरात में ज्यादातर जून के पहले सप्ताह में बारिश होती है। इस बार बहुत ही देर से यानी जुलाई माह के अंत में जाकर बारिश की शुरुआत हुई है। इसकी वजह से जो ट्राईबल बैल्ट है,वह पूरी सूखी रही है और जब बारिश आई तो उनको अनाज बोने के लिए जितना समय चाहिए,वह भी नहीं मिला है। इसके कारण जो हमारे किसान हैं,बारिश का जितना भी प्रतिशत कहिए,वह पूरे साल का एक वीक में ही पूरा हो जाता है और इसी वजह से सूखे का जो लाभ उनको मिलना चाहिए,वह उनको नहीं मिलता है।
मैं मानता हूं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में जो नदियों को जोड़ने की बात कही गई थी,आज देश में सूखे की समस्या से निपटने के लिए वह ही एक मार्ग बचा है क्योंकि हर वह नदी जुड़ जाए जहां बाढ़ आती है और वह पानी जहां सूखा है,वहां अगर चला जाए तो उस राज्य के किसानों को पानी मिल जाएगा और साथ में बाढ़ वाले एरिया को भी बचाया जा सकेगा। गुजरात में इस दिशा में बहुत अच्छा प्रयोग किया गया है।
जब हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री जी गुजरात के मुख्य मंत्री थे तब दर्दा डैम का जो पानी है,उसके पानी को अलग अलग नदियों में छोड़ने की वजह से और उस नदी का जो पानी है,वह अलग अलग तालाबों में छोड़ने की वजह से जो सौराष्ट्र का भाग था,वहां सूखे की समस्या का समाधान करने का यह मौका मिला और इसी वजह से वहां के किसानों को पानी भी मिलता है और वहां के पशुओं को घास,चारा भी मिलता है तथा घास चारा मिलने की वजह से उन किसानों को उन पशुओं से दूध का भी लाभ होता है। मैं मानता हूं कि जल्दी से जल्दी सरकार को नदियों को जोड़ने का काम करना चाहिए। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह सरकार जो योजना लाई है,हालांकि हमारी सरकार नदियों को जोड़ने के लिए कटिबद्ध है और ऐसा करके पूरे देश को एक तरफ सूखे से बचाया जा सकता है तथा दूसरी तरफ बाढ़ से भी बचाया जा सकता है। यह एक अच्छा प्रोजेक्ट है और सरकार को सभी माननीय सदस्यों को साथ में लेकर इस प्रोजेक्ट को आगे लेकर जाना चाहिए। आदरणीय योगी जी जो प्रस्ताव लेकर आए हैं,मैं उनका समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
* KUMARI SHOBHA KARANDLAJE (UDUPI CHIKMAGALUR): The Karnataka State is experiencing severe drought condition for the last 4 successive years. The deficit rainfall due to monsoon failure in many parts of the State severely affected agricultural activities in 125 taluks of Karnataka. The performance of monsoon in terms of spatial and temporal distribution of rainfall was not satisfactory in parts of the Karnataka State. The deficit rainfall, for the 4 consecutive year has caused adverse impact on agriculture and also on drinking water, fodder and over all socio-economy of the agriculture and other sectors of the State.
Karnataka covers an area of 1,91,976 sq. km. and comprises humid, sub-humid, semi-arid and arid climatological regions. State comprises 30 districts, 176 taluks, 747 lobbies and 5628 gram panchayats. The population of the State is 6.11 crores out of which 66per cent are rural based and are dependent on agriculture. Nearly 76per cent of the sown area is under rain fed agriculture and is vulnerable to the vagaries of the monsoon. The total area sown in the State is around 75 lakh hectares.
The total land holding in the State is 1,23,84,721, out of which the small and marginal farmers constitute 37per cent of the total land holding. 75per cent of the farmers in the State are small and marginal farmers. The drought causes untold misery and socio-economic distress to this large group of farmers with small land holdings. Early rainfall was very crucial from the point of crop condition as the crop are under grain setting. The timing and the duration of the active and break events are particularly important for the agricultural activity over the State. And also prolonged breaks can adversely effect the crop development, growth and yield.
The dry spell during the crop growth period causes agricultural drought. Agricultural drought occurs when soil moisture and rainfall are inadequate during the crop growing period causing extreme moisture stress. Agricultural drought thus arises from variable susceptibility of crops during different stages of crop development, from emergence to maturity.
The drought indicators in 125 taluks of Karnatak State says that there is severe drought in the State. Deficit rainfall during the 4 consecutive weeks of dry spell and moisture stress, deficit rainfall shows the agriculture, horticulture and sericulture in the State is in distress.
More than 70 per cent of minor irrigation tanks in the State are dry or with insignificant storages. An area of almost 4 lakh hectares fall under the command area of these tanks are deprived from irrigation due to the poor storages. The poor storages in Minor irrigation tanks along with persistent drought conditions prevailing consecutively for the 4 year has resulted in lack of ground water recharge and problem in the drinking water supply to rural and urban areas. There is fluctuation in ground water levels. In some districts, the ground water depleted severely and people are forced to drink chemical contaminated water like floride, arcenic and iron content. For many villages, we have to provide water with tankers which is not sufficient for their daily needs.
Government have to have the plan of desilting these minor irrigation tanks. At least for coming years, if there is a rainfall the minor tanks will be useful for the villagers. The storage in major reservoirs are satisfactory but most of the major reservoirs are filled with silt. The task force which is constituted by then Karnataka Government recommended the desiltation in major reservoirs which is very much needed in almost all reservoirs in Karnataka.
Late monsoon and deficit rainfall affected the food grains crops in Karnataka. Coconut plays a significant role in the agrarian economy of India. Karnataka is a major coconut growing state. Coconut is grown around five lakh hectares in Karnataka’s districts like Tumkur, Hassan, Chickmagalur, Ramnagar, Mandya, Mysore, Chitradurga, Chamarajanagar etc. Most of the coconut plantations in these districts are totally rainfed and their prospects depend largely on the occurance of satisfactory monsoon rains. The above districts received less rain in the past four years. These interior districts are characterized by soils with less water holding capacity and hence experience drought like situation more frequently. This is reflected in terms of the poor yield during last 3 years. The drying palms need immediate care for the revival to reduce the further damage to the existing palms in coming days. Presently, the coconut growers are in severe financial distress and situation urgently calls for rejuvenation of the drought affected palms. The financial requirement of the State is huge. Central Government should plan a contingency plan to protect the farmers.
Immediate attention should be given to small and marginal farmers by helping them financially by waving loans.
Contingent action plan should be prepared by the scientists of agriculture, specially Agriculture University and research centre.
Seeds and fertilizer requirement should be monitored closely (when they needs it) Steps should be taken to distribute the seeds at subsidized rates.
Micro-Macro irrigation programmes should be closely monitored for less utilization of ground water. More funds should be given to emergency supply of drinking water.
Effective implementation of flushing, deepening and hydro-fracturing works. Borewells have to drilled only during emergency.
Animals should be given quality fodder. Fodder is the immediate requirement of Karnataka State. Goshala should be opened in all affected Taluks to save the cattles.
Agriculture Department should take action immediately to save the farmers and the animals of Karnataka State.
*श्री सुनील कुमार सिंह (चतरा) : बाढ़ और सूखा की समस्या का हमें स्थायी समाधान ढूंढना होगा । यह ठीक है कि प्रकृति को बांधा नहीं जा सकता । पर मानव जाति अपने पराक्रम, बुद्धि, विवेक से सभी प्रकार की बाधाओं और चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है ।
एक ओर जहां महाराष्ट्र, गुजरात-सौराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ मानसून की कमी से सूखाग्रस्त हैं वहीं उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों पर बाढ़ का संकट गहराता जा रहा है । बिहार और झारखंड में मानसून की आंख-मिचौली का खेल चल रहा है । प्रारंभ में बिहार में जहां मानसून सक्रिय था और झारखंड में कमजोर, वहां आज स्थिति बदल गई है । बिहार के 25 जिले सूखे की चपेट में आ गए हैं । झारखंड की सरकार पूरे प्रदेश को सूखाग्रस्त घोषित करने वाली थी, परंतु अब सिर्फ पलामू प्रमंडल में सुखाड़ है । मानसून एक ही समय में कभी निष्क्रिय पड़ता है तो कभी सक्रिय हो जाता है । केन्द्रीय कृषि विभाग ने देशभर में 38 जिले ऐसे चिन्हित किए थे, जहां जून में बारिश की स्थिति चिंताजनक थी । पर आज उस स्थिति में परिवर्तन हो गया है ।
ऋतु चक्र में परिवर्तन का कारण है जलवायु पर पर्यावरण का प्रभाव । एक और जहां Global Warming का असर है वहीं दूसरी ओर "अल नीनों" का प्रभाव है । मौसम विभाग (आईएमडी) को जुलाई और अगस्त में मानसून के सक्रिय होने की उम्मीद है । आईएमडी को मानसून के पैटर्न में बदलाव की उम्मीद है ।
दूसरी ओर, शारदा, घाघरा, गंगा, रामगंगा यूपी और उत्तराखंड में बाढ़ का प्रलय मचाने को तैयार है । उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों पर भारी बारिश से जान-माल का खतरा मंडरा रहा है । 22/23 जुलाई को विदर्भ में 72 घंटों की लगातार वर्षा ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया । ओडिशा के अनेक शहरों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है । बिहार में भी कोसी का तांडव जारी है । कई गांवों में पानी ने कहर मचा रखा है । छत्तीसगढ़ के सात जिलों के 1200 गांव बाढ़ से टापू बन गए हैं । मेरे लोक सभा क्षेत्र चतरा के ही एक ब्लॉक पत्थलगड्डा और सिमरिया के कुछ भाग में ही जून महीने में एक दिन में 72 मिलीमीटर वर्षा ने पूरी खेती को नष्ट कर दिया । कृषि यंत्र भी नदी में आई अचानक बाढ़ में बह गए । प्रभावित जनजीवन आज तक मुआवजा के इंतजार में है । पर संवेदनशून्य राज्य सरकार मौन और मूक है ।
बाढ़ और सुखाड़ से खाद्यान्न की कमी और हानि के साथ-साथ जान-माल का नुकसान और बिजली का संकट होगा । हमें इस समस्या का स्थाई समाधान खोजना होगा ।
जल संकट से जहां सामाजिक विषाद और तनाव उत्पन्न हुआ है, वहीं ग्रामीण भारत में आर्थिक संकट भी उत्पन्न हुआ है । एक ही समय में देश का बहुत बड़ा भू-भाग जहां बाढ़ की भीषण त्रासदी को झेल रहा होता है वहीं दूसरी ओर जल संकट के कारण उत्पन्न सूखा मृत्यु का तांडव करता दिख पड़ता है । ईश्वर और प्रकृति ने नदियों के रूप में मानव जाति को अमूल्य निधि प्रदत्त की है । मानव जाति का कर्तव्य है कि इस निधि का उचित और बेहतर उपयोग करें ।
जल संसाधन के उचित और बेहतर उपयोग हेतु आजादी के पूर्व से ही विभिन्न योजनाओं पर चर्चा और परिचर्चा होती रही है । आजादी के पश्चात भी देश के अंदर इस प्रकार की योजनाएं बनती रही हैं । गंगा और कावेरी के मिलन का स्वप्न देखने वाले अनेक अभियंताओं यथा आथर कॉटन, विश्वेश्वैरया, सी.पी. रामास्वामी अय्यर, के.एल. राव, सी.सी. पटेल, पी.एस. वैद्यनाथन, आर.बी. चक्रवर्ती, आर.डी. वर्मा, एस.पी. नमसिवायम, पी.के. बालकृष्ण, के. भरतन, कँवरसेन, गुलाटी, एन.जी.के. मूर्ति, एम.एल. चम्पाकरण, कैप्टन दस्तूर, डी.पी. धर इत्यादि को राजनैतिक नेतृत्व और नौकरशाही से प्रोत्साहन न मिला । तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व के पास दूरदर्शिता का अभाव होने के साथ ही समयानुकूल एवं युगानुकूल निर्णय लेने की इच्छाशक्ति का भी अभाव था । "दूरदृष्टि और पक्का इरादा" का नारा लगाने वाले तत्कालीन राजनीतिज्ञ स्वार्थों की पूर्ति में मगन रहे । नतीजन अभियंताओं के स्वप्न बिखरते रहे और वर्षा और नदियों के जल के उपयोग के लिए आपसी कटुता बढ़ती गई । ग्रामीण भारत की व्यथा और दुर्दशा बढ़ती गई ।
आज जल संकट से निजात पाने हेतु अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा घोषित कार्यक्रम "नदियों को जोड़ने " के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा है । नदियों के समायोजन के माध्यम से एक लोकोन्मुखी आर्थिक संरचना खड़ी होगी । ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति में वृद्धि के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा प्राप्त होगी । सूखा, बाढ़ ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त बेरोजगारी, पलायन के कारणवश नगरीय-ग्रामीण असंतुलन, बंजर भूमि इत्यादि समस्याओं का समाधान होगा । इस योजना के अंतर्गत हिमालय की 14 एवं 16 प्रायद्वीपीय नदियों का समायोजन किया जाएगा । 54 स्थानों पर नदियों के संगम से 27 बड़े बांध एवं 56 जल भंडारण केन्द्र बनाए जाएंगे जिससे 173 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का प्रवाह बदलेगा जिसके लिए 12500 किमी. नहरों का निर्माण किया जा सकेगा । इस योजना से 35 मिलियन हैक्टेयर भूमि को अतिरिक्त सिंचाई सुविधा के साथ-साथ 34000 मेगावाट जल विद्युत का उत्पादन होगा । ग्रामीण भारत एवं महानगरों के जल संकट के साथ-साथ अंतर्राज्यीय जल विवादों का निराकरण होगा । बाढ़ और सूखा से होने वाले फसल की क्षति पर रोक लगेगी । प्राकृतिक आपदाओं में 2002 से अब तक प्रतिवर्ष 25000 करोड़ रूपये से 40000 करोड़ रूपयों की फसल नष्ट होती रही है । इस योजना से बाढ़ के विनाशकारी तांडव पर नियंत्रण पाने में सफलता मिलेगी । वर्ष 2050 में भारत की जनसंख्या 1800 मिलियन हो जाएगी जिसके लिए 500 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी । इस उत्पादन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सिंचाई क्षमता 160 मिलियन हैक्टेयर तक बढ़ानी होगी । यह लक्ष्य इस योजना से प्राप्त होगा ।
इस योजना के फलस्वरूप आर्थिक गतिविधियों में अत्यधिक क्रियाशीलता होगी जिसके कारण सकल घरेलू उत्पाद में प्रतिवर्ष 10 से 12औ की दर से वृद्धि होगी ।
"सबका साथ-सबका विकास" नारे को हम तब ही मूर्त रूप देने में सफल होंगे जब देश को बाढ़ और सूखा की समस्या से निजात दिला सकें । इसका एक ही रास्ता है - "नदियों का समायोजन" । जिसके माध्यम से हर खेत को पानी - हर हाथ को काम देना संभव होगा ।
श्री बंडारू दत्तात्रेय (सिकन्दराबाद): माननीय सभापति महोदय,आपने मुझे बोलने का मौका दिया,इसके लिए आपको धन्यवाद देना चाहता हूं। देश में एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ सूखे की स्थिति है। तेलंगाना राज्य नया बना है। इस राज्य में साधारणतया जून और जुलाई महीने में बारिश होती है और खरीफ का सीजन शुरु होता है। पिछले साल और इस साल भी मीट्रियोलाजिकल डिपार्टमेंट ने 146 मिमी. के आंकड़े दिए हैं। पिछले साल यह आंकड़ा 487 मिमी. था। इसका मतलब है कि 70 परसेंट मानसून फेल होने के कारण वर्षा इतनी कम हो गई है। तेलंगाना राज्य में निजामाबाद, नालकोंडा, हैदराबाद जिलों में काफी बुरा प्रभाव हुआ है। विशेषकर तेलंगाना राज्य में 464 मंडल हैं, इसमें से 426 मंडल में बहुत कम वर्षा हुई है। तेलंगाना राज्य सरकार 1 करोड़ 5 लाख पैडी का टार्गेट रखकर आगे जा रही है। इसलिए सिचुएशन बहुत चिंताजनक है। फूडग्रेन्स और पल्सिस 29 और 41 परसेंट है। About 89 per cent is the worst affected area. That is why, many of the cotton growing farmers committed suicide. Even in the last two to three months, approximately 28 farmers committed suicide. Particularly cotton growing farmers have committed suicide. They are digging bore wells for want of water. When they are unable to get water, they invest more and more on land. Then they are unable to pay the private money lenders. As a result, they commit suicide. Earlier also, in Andhra Pradesh, approximately 4000 farmers committed suicide.
Sir, approximately 23 lakh bore wells are there which depend on power. But maximum power cut is there. For power cut, there are some other reasons. My major demand to the Minister for Agriculture and request to the Union Government of India is that at least 1000 MW of power should be allocated to Telangana out of the unallocated power which is with the Centre.
The Government of Telangana has already declared that they want to waive off loans worth Rs. 1700 crore but still the farmers are in difficulty. They are unable to get loans. I would impress upon, through you, the hon. Minister that adjustment can be made regarding the loan scheme.
Lastly, of course, there are temporary measures to tackle the problem. But there are permanent measures which have to be taken up. Seeds and fertilisers which ought to be given should be given. Other than that, Telangana is always a drought prone area. Farmers are always committing suicide in Telangana. Therefore, I appeal to the hon. Minister, the hon. Prime Minister and the Union Government that Pranahita Chevalla Project should be treated as a national project and see that this project comes under the State of Telangana.
श्रीमती रंजीत रंजन (सुपौल) : माननीय सभापति जी,मैं आपके माध्यम से बाढ़ और सूखे के गंभीर विषय पर कुछ प्वाइंट कहना चाहती हूं। यह बहुत खुशी की बात है कि इसके मंत्री बिहार के ही हैं। मुझे उम्मीद है कि मंत्री जी वहां की कोषीय विभीषिका को बहुत अच्छी तरह समझते होंगे। सबसे महत्वपूर्ण पाइंट यह है कि हम लोग वर्षों से बाढ़ और सुखाड़ पर चर्चा कर रहे हैं,परंतु क्या हम लोग सही मायने में किसान के लिए,बाढ़ के लिए और सुखाड़ के लिए गंभीर हैं।
दूसरी बात मैं कहना चाहती हूं कि क्या बाढ़ और सुखाड़ के लिए प्राकृतिक आपदा दोषी है,ग्लोबल वार्मिंग दोषी है या हम लोग मानवीय भूल के कारण आज बाढ़ और सुखाड़ को झेल रहे हैं। मेरे ख्याल से मानवीय भूल ज्यादा है। इसका एक बहुत बड़ा एग्जामपल कुसा का बांध 2008 में टूटता है,जहां पर मेरे ख्याल से आजादी के बाद कभी बाढ़ नहीं आई,उस तरफ बांध टूटता है और कई लाख हैक्टेअर भूमि और जान-माल की क्षति होती है। एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि वह प्राकृतिक आपदा नहीं थी,बल्कि मानवीय भूल थी। स्पर पर हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया,जहां स्पर 1500 मीटर होना चाहिए था,वहां 250 मीटर पर पहुंच गया। लेकिन इसे आप अच्छी तरह से समझ रहे होंगे,खाऊ-पकाऊ और इरिगेशन विभाग का मतलब मलाई है,जिसमें हमने बांध को थोड़ी सी मिट्टी लगा दी,उस चूहे के होल को बंद कर दिया,अब हमारा बांध सुरक्षित है,यह कहकर खानापूर्ति कर दी। अगर बाढ़ आयेगी तो वहां बहुत गरीब और मजबूर लोग हैं। कल यहां बदरुद्दीन साहब यह कह रहे थे कि जो बाढ़ को झेलते हैं,उनकी स्थिति क्या है,यदि हममे से कोई भी यदि थोड़ा सा भी संवेदनशील व्यक्ति है तो हम लोगों का सिर शर्म से झुक जाता है। मैं हर साल बाढ़ में वहां जाकर लोगों से मिलती हूं। नाव से जाती हूं और मेरी देह सिहर जाती है जब मंत्री जी उनकी स्थिति बाढ़ के वक्त देखी जाती है कि वे किस हालत में रह रहे हैं। महिला होने के नाते एक प्रेगनेन्ट वूमैन को देखकर मेरी देह सिहर उठती है कि अगर उस बाढ़ के वक्त टापू बनी हुई जगह पर जब उसे बच्चा होता है तो वह यह सोचकर चल रही होती है कि या तो वे दोनों बच जायेंगे या वे दोनों मर जायेंगे। यह स्थिति है और यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है। सबसे अहम बात यह है कि हम इसके स्थाई निदान की तरफ सोच रहे हैं कि नहीं। आज कोसी में जो कुसा का बांध टूटा,उसके बाद स्वामीनाथन की रिपोर्ट आई,एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि कुसा के बांध टूटने के बाद कई लाख हैक्टेअर भूमि आज बालू हो गई,बंजर हो गई। वह बहुत उपजाऊ भूमि थी। एक तरफ कोसी को अल्हड़ कहा जाता है,विभीषिका की नदी कहा जाता है,जबकि सही मायने में आप देखें तो उस कोसी से ज्यादा उपजाऊ मिट्टी और कोई नदी नहीं देकर जाती है जो हर साल उस जमीन को उपजाऊ मिट्टी दे देती है। लेकिन हम उसे अल्हड़,विभीषिका की नदी कहते हुए दरकिनार कर देते हैं। मेरे ख्याल से चाहे कोई भी रूलिंग पार्टी हो या विपक्ष हो,जब तक हमारी मंशा यह रहेगी कि हमें बाढ़ या सुखाड़ में वोट की राजनीति करनी है। हमें यह देखकर बहुत शर्म आती है जब हम लोग जाते हैं और देखते हैं कि उन लोगों को हम 20 या 25 किलो अनाज देकर खरीद लेते हैं। हम उसके परमानैन्ट सोल्यूशन की तरफ नहीं जाते हैं। वहां की मेन प्रॉब्लम सिल्टेशन की है। मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहती हूं,हम बाढ़ और सुखाड़ की बात कर रहे हैं,लेकिन हम इम्पलिमैन्ट कितना कर पाते हैं। वहां कुसा बांध टूटने के बाद सैकड़ो नहर,हजारों खेत और सड़कों पर बालू आ गया। टीम गई,एक्सपैरिमैन्ट किया गया,रिसर्च की गई,उस बालू वाली मिट्टी को तीन ग्रेड में बांटा गया और कहा गया कि यहां ढैचा और सब्जी की खेती हो सकती है। लेकिन आज तक वह भूमि बंजर है,वहां के किसान भूखों मर रहे हैं। साढ़े सात सौ करोड़ रुपये यूपीए की सरकार की तरफ से नहरों को दोबारा से रिपेयरिंग करने के लिए दिये गये। लेकिन आज तक वहां एक भी ऐसी नहर नहीं है,जिससे पानी खेतों तक पहुंचा हो। अजीब विडम्बना है हमारे यहां कोसी की बाढ़ से सात-आठ जिले अफैक्टिड होते हैं। वहां बाढ़ भी है और सुखाड़ भी है। हमारे पास बाढ़ के माध्यम से इतना पानी आता है,लेकिन हम उससे भूमि को सिंचित नहीं कर पाते हैं,ताकि जब खेतों और किसानों को जरूरत पड़े तो वही पानी हम खेतों में दे सकें। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी को कहना चाहूंगी कि आप भी बिहार के हैं,क्यों नहीं एक बार छप्पन में बांध बंधा,दस किलोमीटर पर कोसी नदी बह रही है। क्यों नहीं पायलट बांध बनाकर आप ऊपर से देखें तो जो लोग अक्टूबर में गंगा जाते हैं,जब पूरी नदी भरी होती है,खानापूर्ति करते हैं और चले जाते हैं। जबकि हमारा कहना यह है कि जब नदी बहुत कम धार में बह रही होती है,दस किलोमीटर में नदी बह रही है,यदि आप ऊपर से हेलिकॉप्टर से देखें। अगर हम बीच में पायलट बांध बनवा कर,चार-पांच किलोमीटर के बीच में उसको दोबारा से बांध दें,दस वर्ष पहले पश्चिम में बह रही थी नदी तो पश्चिम वाले बांध में बहुत ज्यादा दबाव बना हुआ था,बाढ़ आने की शंका रहती है और बाढ़ से कई कटाव होते हैं। आपको मालूम है कि कोसी हर साल कई गांव काटती है। इस बार पूर्व में बहुत ज्यादा दबाव बना है। क्यों नहीं हम नदी को बीच में बांधते हैं ताकि अगर दोनों तरफ बांध सेफ रहेगा तो दोनों तरफ की पॉप्युलेशन को बार-बार कटाव नहीं झेलना पड़ेगा। इसके साथ ही मैं यह भी जरूर कहना चाहूंगी कि कोसी के साथ-साथ,हमने बहुत नज़दीक से देखा है,मुझे पहाड़ों से बहुत ज्यादा प्यार है। भू-स्खलन,सुखाड़ और बाढ़ आखिर पहाड़ों में आते क्यों हैं?इलैक्ट्रिक हाइड़ोपावर की बात करते हैं। मैं आपसे एक सवाल पूछूंगी कि जब हम इलैक्ट्रिक हाइड्रो पॉवर बना रहे होते हैं,तो इंवायरमेंट का क्राइटेरिया दिया होता है कि इतने पेड़ आपने काटे हैं तो इतने पेड़ लगाने हैं। लेकिन आप कौन से पेड़ लगाते है? 30 साल, 40 साल, 100 साल वाले देवदार,जो चीड़ के पेड़ होते हैं,उनकी कमी की पूर्ति आप कैसे कर पाएंगे?हमने आंखों से देखा है कि उनकी जग झाड़-फूंस लगा कर पहाड़ों में खाना-पूर्ति की जाती है। जिसके कारण जो पहाड़ों को समेट कर रखते हैं,जो पेड़ उन पहाड़ों की नमी रखते हैं,जो उन पहाड़ों की नमी और पहाड़ों को जोड़ने का काम करते हैं,उन पेड़ों को काटने से भी भू-स्खलन होता है और वे पहाड़ भी सुखाड़ की चपेट में आ जाते हैं। क्या हम सिर्फ धन कमाने की तरफ ही ध्यान देंगे?हमें बिजली चाहिए,लेकिन पहाड़ों को सुखाड़ की और भू-स्खलन की एवज में नहीं चाहिए। हरिद्वार में हम गांगा की बहुत बात करते हैं,खास कर आपकी पार्टी बहुत बात करती है। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूँगी कि कुछ साल पहले निगमानंद जी शहीद हुए। मेरे ख्याल से तीन महीने की फास्टिंग के बाद वे शहीद हो गए। हम गगां-गंगा शोर मचाते हैं। गंगा में सैंड माफिया लगे हुए हैं और अवैध खनन हो रहा है। उसको बार-बार रोकने के लिए कहा गया,क्योंकि वह बार-बार गंगा के नैचुरल वे को बहुत खराब कर रह रहा है,जिसके कारण बार-बार बाढ़ आती है। मेरे ख्याल से जिस दिन बाढ़ और सुखाड़ के लिए हमारी नीयत सही हो गई,दिन निश्चित तौर से हम उसका समाधान खोज लेंगे अन्यथा हम डिस्कशन करते रहेंगे। बाढ़,सुखाड़ और किसान के बारे में सही मायने में सोचने वाला मुझे नहीं लगता है कि आज तक इस सदन में कोई सदस्य है।
श्री शरद त्रिपाठी (संत कबीर नगर): सभापति जी, सबसे पहले तो मैं आपसे यह निवेदन करूंगा कि बाढ़ जैसी गंभीर परिचर्चा पर श्रद्धेय योगी जी द्वारा जो यह प्रस्ताव लाया गया है, उस पर समय का बांध न बनाया जाए। चूंकि यह राष्ट्रीय समस्या है और मुझे लगता है कि इस सदन में बैठे हुए सारे सदस्य सूखा एवं बाढ़ की समस्या से अपने-अपने क्षेत्रों में जवाबदेह हैं। उनकी वेदना को आज इस सदन में छलक जाने दीजिए। सब की वेदना आ जाए, तब उस पर माननीय मंत्री जी को बोलने के लिए कहिएगा। आपसे मेरा यह नम्र निवेदन है। फिर भी मैं जानता हूँ आपके समय का डंडा उठ जाएगा।
महोदय, बाढ़ का पानी और मानव की जवानी, इसकी दशा को नहीं को नहीं रोका जा सकता है। इसकी दिशा जरूर बदली जा सकती है। आजादी के बाद से अब तक हर मानसून सत्र में सूखा एवं बाढ़ जैसे गंभीर विषय पर तमाम परिचर्चा और चर्चाएं हुई हैं, लेकिन यह खेद का विषय है कि इसका निराकरण स्थाई रूप से आज तक नहीं हो पाया है। मैं चर्चा तो असम की बाढ़ से और नेपाल की तलहटी तक की नदियों में जो प्रलयकारी बाढ़ आती है, उस पर करना चाहता था, लेकिन कल हमारे उत्तर प्रदेश के एक माननीय सदस्य महोदय यहां पर चर्चा के दौरान केंद्र सरकार से अनुदान मांगने का एक पत्रक दिखा रहे थे। मैं उन्हीं की बात के आगे कहना चाहूंगा, क्योंकि उन्होंने मेरी दिशा बदल दी। राष्ट्र से प्रदेश, उत्तर प्रदेश की तरफ मैं चल रहा हूँ। मैं संत कबीर नगर लोक सभा क्षेत्र से निर्वाचित हो कर आया हूँ, जिस लोक सभा में तीन नदियां हैं, तीन जिले हैं, तीन कमिश्नरी हैं।
महोदय, वर्तमान समय में मेरे क्षेत्र में बाढ़ भी है ओर सूखा भी है। मैं कहना चाहूंगा कि 1 अगस्त, 2013 को वहां पर प्रलयकारी बाढ़ आई और रात में आठ बजे मैं भी वहां पर उपस्थित था। दंघटा विधान सभा के एमबीडी बांध पर जब बाढ़ आई तब वहां अधिकारी मुस्करा रहे थे। मैं वहां खड़ा था, दो किलोमीटर नदी पीछे थी और मैं बार-बार कह रहा था कि बंधा टूट जाएगा, एमबीडी बंधा टूट जाएगा और वहां का एक इंजिनियर एक कुटिल मुस्कान के साथ कहता है कि अरे भाई रहने दीजिए, बाढ़ नहीं आएगी तो आपदा का पैसा कैसे आएगा। किसी के मातम पर काई मौज मनाता है, यह कितनी पीड़ा की बात है। यह कितनी पीड़ा की बात है कि कुछ लोग मातम पर मौज मानाते हैं और उन्होंने अनुदान की मांग की है। महोदय,अब तक केंद्र सरकार द्वारा 27 हजार 503 करोड़ रूपया वर्ष 2011 से वर्ष 2014-15 तक दिया जा चुका है। मैं बताना चाहूंगा कि उसमें से उत्तर प्रदेश को 1,744 करोड़ रूपए मिले हैं और उसमें से हमारे संत कबीर नगर जनपद जो लोक सभा क्षेत्र भी है,उसे 57 करोड़ रूपए दिए गए हैं। उस एमबीडी बंधे की मरम्मत के लिए मैंने अपने संसदीय कार्यों का निर्वहन करते हुए वहां 20 जून को दौरा किया। मैंने जिलाधिकारी महोदय को सूचित करके कहा कि यह बहुत गंभीर विषय है,बंधा फिर टूट जाएगा और फिर बाढ़ आ जाएगी।
महोदय,मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा,वहां के सिंचाई विभाग के अवर अभियंता भी थे,वहां के सहायक अभियंता भी थे,मैंने आम जनमानस के साथ जाकर मौके का भौतिक सत्यापन किया। 13 जगह मैंने नाप करवायी,वहां पर 18 सौ मीटर स्कवैयर में जो वोल्डर डाले जाने थे,वह तीन फुट डाले जाने थे,जबकि वहां मात्र दो फुट डाले गए थे। मैंने सहायक अभियंता से उन्हीं की कलम से लिखवाया कि आप लिखिए कि तीन फुट की जगह सवा दो फुट डाला गया। 13 जगहों पर हमने भौतिक सत्यापन किया और उसे लिखवाया भी। गवाह के रूप में मैंने वहां के स्थानीय पत्रकारों को भी सम्मिलित किया।
महोदय,पीड़ा होती है कि वहां अधिशासी अभियंता ने आने की भी जहमत नहीं उठायी। चूंकि उनको वहां की सत्ता का संरक्षण प्राप्त था और बेलौली बंधे से लेकर एमबीडी बांध को आज उन्होंने अवैध तरीके से तबाह कर दिया है। मैंने उस पीड़ा को देखा है। जब उस क्षेत्र का बांध कटता है,भिखारीपुर एक गांव है,जिसका आज अस्तित्व ही नहीं है। वहां के लोग आज भिखारी बनकर बाढ़ की पीड़ा की कहानी बयां कर रहे हैं। दिनकर जी की वह कविता मुझे याद आती है,नेहरू जी के समय में जब बाढ़ की पीड़ा की त्रासदी उन्होंने देखी थी,जब बाढ़ से पीड़ित लोग वहां रोटी के टुकड़े के लिए गिड़गिड़ा रहे थे और एक पत्ता चाटते हैं। उनको अंत में कहना पड़ा-
"लपक चाटते झूठे पत्ते, जिस दिन देखा मैंने नर को, सोचा क्यों न आग लगा दूं, आज मैं इस दुनिया भर को।"
महोदय,मैं जानता था कि आप समय पूरा होने की बेल बजा देंगे,लेकिन फिर भी मैं अंतिम बात कहना चाहूंगा। मैं आदरणीय योगी जी द्वारा उठाये गए प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा हुआ हूं। मैं बधाई देना चाहूंगा कि आजादी के बाद से इस पीड़ा को अगर किसी एक प्रधानमंत्री ने समझने का प्रयास किया है तो हमारे श्रद्धेय नरेन्द्र भाई मोदी जी ने,जिन्होंने शपथ लेते ही सबसे पहले गंगा मैय्या की आरती उतारकर नदी को प्रणाम किया। हम लोगों की जो परिपाटी है,जिस पार्टी से मैं समबद्ध हूं-
"गंगा, सिन्धुस्य, कावेरी, यमुना च सरस्वती, रेवा, महानदी, गोदा, ब्रह्मपुत्र पुनात्माम्।"
हम लोगों ने मजबूत प्रयास शुरू कर दिया है क्योंकि बाढ़ का आधार पानी है और पानी का आधार नदी है और नदियों को नमन करके हमारी सरकार ने जो प्रयास शुरू किये हैं,निश्चित रूप से अब बाढ़ की समस्या का निराकरण होगा। आपने मुझे बोलने का समय दिया,इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री अजय मिश्रा टेनी (खीरी) : महोदय,हिन्दुस्तान किसानों का देश है और यहां पर 70 प्रतिशत से अधिक लोग कृषि के द्वारा ही अपनी रोटी,कपड़ा,रोजगार कमाते हैं यानी वही उनकी आमदनी का जरिया है। आज भी जो लोग खेती करते हैं,उसमें से 70 प्रतिशत लोग पारम्परिक खेती करते हैं और वे प्राकृतिक संशाधनों पर ही निर्भर करके खेती करते हैं। हमारे देश की भौगोलिक स्थिति बड़ी विरोधाभाषी है। आज सदन में ही हो रही चर्चा में कई सदस्य कह रहे हैं कि यहां सूखे की स्थिति है और कई सदस्य कह रहे थे कि कई जगहों पर बाढ़ है। निश्चित रूप से इस विविधताओं से भरे देश में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण आज ऐसी स्थितियां हैं कि कहीं सूखा है,कहीं बाढ़ है और उस पर हम सब चर्चा करने के लिए एकत्र हुए हैं। निश्चित रूप से यह एक संवेदनशील विषय है। किसान ही जिस देश की आर्थिक रीढ हो,उस देश में अगर खेती पर,कृषि पर बाढ़ और सूखे का प्रकोप होता है तो निश्चित रूप से देश कमजोर होता है। हमारा यह मानना है और हमारी पार्टी का भी यह मानना है कि इस देश में जब किसान मजबूत होगा तभी यह देश मजबूत होगा। वास्तव में जो परिस्थितियां हैं,मैं अपने क्षेत्र लखीमपुर से,जहां से बाढ़ प्रारम्भ होती है,लखीमपुर से बिहार तक का क्षेत्र,जो नेपाल की सीमा से जुड़ा हुआ है,वहां पर बाढ़ का कारण नेपाली नदियों के द्वारा छोड़ा गया पानी है। उसके साथ-साथ कुछ बांध ऐसे बने हुए हैं,जिनके कारण भी हमारे क्षेत्र में बाढ़ आती है।
महोदय,मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री जी से अनुरोध करना चाहता हूं कि एक आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। यह जो क्षेत्र बाढ़ से पीड़ित है,यह नेपाल का सीमावर्ती क्षेत्र है,यहां का धान बहुत खराब हो गया है और सरकारी क्रय नीति में डैमेज परसेंटेज आपने 3 प्रतिशत कर रखा है,जिसके कारण हमारे क्षेत्र का धान सरकारी मूल्य पर नहीं बिक पा रहा है। इसलिए मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि डैमेज का प्रतिशत कम से कम पाँच प्रतिशत करने का काम करें। ...(व्यवधान)फिर भी,यदि प्राइम मिनिस्टर को आप कहेंगे तो निश्चित रूप से होगा क्योंकि चावल की खरीद नहीं हो पा रही है। एफ.सी.आई. के लोग पॉइंट डैमेज करके उसको खत्म कर देते हैं जिससे किसानों की हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही है। मैं आपके माध्यम से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि किसान की जेब खाली हो गई है,उसकी जेब को भरने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार ही करेगी। मेरा अनुरोध है कि कृषि जो हम लोगों की जीविका का आधार है,जीने का सहारा है और वास्तव में इस देश में जो भी आर्थिक व्यवस्था है,वह किसानों पर ही आधारित है। दूसरा,बाढ़ के कारण हमारे क्षेत्र में जो एक बड़ी समस्या आई है,वह यह है कि हमारे यहाँ का पीने का जो पानी है,उसमें आर्सैनिक आ गया है और जापानी बुखार,जिसको हम जापानी एनसिफेलाइटिस कहते हैं,उसके कारण हमारे क्षेत्र के बहुत सारे लोग बीमार हो जाते हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस पर बहुत ज़रूरी ध्यान देने की आवश्यकता है कि बाढ़ से हमारे क्षेत्र को मुक्त कराया जाए। उसके लिए चाहे नेपाल सरकार से आपको बात करनी पड़े,चाहे अपने बांधों में,जैसे बनबसा का बांध है या अन्य बांध हैं,उन बांधों की ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे यह क्षेत्र बाढ़ से बच सके। मेरा अनुरोध आपसे यह भी है कि जो कृषि उत्पाद है,उन पर लाभकारी मूल्य किसानों को मिलना चाहिए और उसका निर्धारण लागत के आधार पर किया जाना चाहिए। जब तक कृषि लाभकारी धंधा नहीं बनेगा,तब तक इस देश की आर्थिक व्यवस्था मज़बूत नहीं होगी। उसके साथ-साथ बाढ़ और सूखे के समय में हम लोगों को नाममात्र का मुआवज़ा दे दिया जाता है। मेरी आपसे मांग है कि मुआवज़ा न देकर पूर्ण क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की जाए। फसलों का बीमा किया जाए और बाढ़ की वजह से जिन लोगों के खेत कट गए हैं,जिनके गाँव कट गए हैं,हमारे क्षेत्र में तो पाँच के पाँच गाँवों का नामो-निशान समाप्त हो गया है,उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए।
मैं आपके माध्यम से सरकार से एक नीतिगत अनुरोध और करना चाहता हूँ कि किसानों को जो मंडियों में जाकर गल्ला बेचना पड़ता है,उसके कारण उनका बहुत शोषण होता है। मंडी समितियाँ बहुत जगहों पर बनी हैं,लेकिन उनका सदुपयोग नहीं हो पा रहा है। मैं चाहता हूँ कि सरकार इसमें हस्तक्षेप करे और किसानों को यह कहा जाए कि मंडी समितियों में ही धान बिकेगा और जो उनकी बोली की प्रक्रिया है,उसके द्वारा उनका गल्ला बिके,उनका अनाज बिके और उनसे उनको लाभकारी मूल्य मिले। अगर नहीं मिलता है तो जो समर्थन मूल्य सरकार घोषित करे,उसका अंतर किसानों को दिया जाना चाहिए। अगर ऐसी व्यवस्था करेंगे तो निश्चित रूप से किसान मज़बूत होगा और जब किसान मज़बूत होगा तो देश भी मज़बूत होगा। भारतीय जनता पार्टी का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि इस देश में जब किसान मज़बूत होगा,तभी यह देश मज़बूत होगा।
*डॉ. स्वामी साक्षीजी महाराज (उन्नाव) ः मैं अपने मित्र योगी आदित्यनाथ सांसद द्वारा नियम 193 के अधीन लाये गये बाढ़ और सूखा नामक प्रस्ताव का हृदय की गहराई से समर्थन करता हूँ। बाढ़ और सूखे के संदर्भ में यह कहना समीचीन होगा कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया। आज़ादी के सड़सठ साल बाद भी हम इस भयावह स्थिति से उभर नहीं पाये हैं कि आये दिन किसान और गरीबों के ऊपर प्राकृतिक आपदा-विपदा तो आती ही रहती है, परंतु व्यवस्था ने भी इन बेचारे, बेसहारा गरीबों और किसानों के साथ कोई न्याय नहीं किया है। किसान अन्न का दाता है फिर भी लूटा जाता है, किसान भारत भाग्य विधाता है, परंतु इसके भाग्य की चिंता किसी को नहीं है। मेरी भारत सरकार से माँग है कि कृषि को उद्योग का दर्जा प्रदान करें।
हिन्दुस्तान की 70औ आबादी कृषि पर आधारित है, परंतु किसानों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है। आज़ाद भारत में किसान आत्म हत्या करता है। परिवार के परिवार नष्ट होते जा रहे हैं। ये सदन चिंता व्यक्त करता है, चर्चा करता है और फिर स्थिति जस की तस देखने को मिलती है। मुझे बहुत ही प्रसन्नता के साथ यह कहते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है कि 2014 में माननीय प्रधानमंत्री जी श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी के नेतृत्व में एक बहुत ही संवदेनशील किसानों, गरीबों, उपेक्षितों और शोषितों के हितों को साधने वाली सरकार आयी है। हम सब के तो अच्छे दिन आ गये। अब मुझे ये पूर्ण विश्वास हे कि किसानों के भी अब अच्छे दिन अवश्यमेव आयेंगे।
बड़ी विचित्र स्थिति है, देश की आत्मा कहीं तो सूखा से कराह रही है, तो कहीं बाढ़ का भयावह ताण्डव देखने को मिलता है। हरिद्वार से लेकर पश्चिम बंगाल तक जीवनदायिनी माँ गंगा ही जब विकराल रूप लेती है तो हज़ारों-हज़ार लोगों का जीवन ही छीन लेती है। मेरा जन्म गंगा के किनारे हुआ है। मैंने गंगा-यमुना के किनारे वाले लोक सभा क्षेत्रों का ही प्रतिनिधित्व किया है, इसलिए बाढ़ के खतरनाक ताण्डव से में भली-भॉति अच्छा-खासा परिचित हूँ।
मैं उप-काशी के नाम से सुविख्यात आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली, आज़ादी के दीवाने श्री चन्द्रशेखर आज़ाद की जन्मस्थली सर्वप्रथम तिरंगा फहराने वाले शहीद श्री गुलाब सिंह लोधी की जन्म और कार्यस्थली, ऐतिहासिक साहित्यकार और राष्ट्रीय कवि पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जन्म स्थली उन्नाव से चुनकार आता हूँ। उन्नाव एशिया की सबसे बड़ी लोक सभा है। यहाँ (22,50,000) बाईस लाख पचास हज़ार मतदाता अपने मत का प्रयोग करके बहुत आशा और विश्वास के साथ सांसद चुनते हैं, परंतु आज़ादी से लेकर आज तक यहाँ की जनता को केवल और केवल छलावा ही मिला है। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जनपद उन्नाव में विकास के नाम पर केवल और केवल दो दर्जन बूचड़खाने और दो ही दर्जन चमड़े की फैक्ट्रियाँ हैं, जिन्होंने पूरे जन जीवन को बर्बाद करके रखा है।
यूँ तो उन्नाव में हरदोई की सीमा से लेकर फतेहपुर, रायबरेली की सीमा तक पतित पावनी माँ गंगा का किनारा लगभग 200 कि.मी. लगता है, लोन नदी भी यहाँ से बहती है जो कि बूचड़खाने के मलवे से लवालव भरी रहती है। यहाँ सई नदी भी है, परंतु उसमें पानी का नाम नहीं है। लोन नदी की सफाई नहीं होने के कारण शहर उन्नाव वर्षा में तो पानी से डूब जाता है। इसके गंदे विषेले पानी के कारण गंगा प्रदूषित होती है। इन्हीं कारणों से भूगर्भ का जल बहुत ही प्रदूषित हो गया है, जिसे पीने से संतान विकलांग पैदा होने लगी है। सम्पन्न लोग तो उन्नाव छोड़कर लखनऊ या कानपुर रहने लगे है। यदि यहाँ की स्थिति को नहीं सँभाला गया तो पूरा जिला ही बर्बाद हो जायेगा।
आधा उन्नाव जिला सूखे की चपेट मे हैं तो आधा जिला बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है। ऐसी भयंकर स्थिति में कैसे, किस प्रकार ये जनपद उभरेगा कुछ समझ में नहीं आता है। मैं भारत की संवेदनशील सरकार से विनम्र निवेदन करता हँ कि हमारे जनपद उन्नाव के लिए सई और लोन नदियों को गंगा के साथ जोड़कर सिंचाई की एक अच्छी योजना और गंगा के द्वारा प्रतिवर्ष होने वाले कटान को रोकने के लिए एक बड़ा पैकेज भारत सरकार देने की कृपा करें और जनपद की जनता को स्वच्छ पवित्र व निर्मल जल पीने की भी व्यवस्था एक पैकेज देकर करें।
SHRI P. KARUNAKARAN (KASARGOD): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity to participate in the discussion under rule 193 regarding flood and drought situation in the country. It is common that flood and drought will not come together any time. But we are discussing these two together considering the seriousness of the natural calamity.
As far as India is concerned, we are facing a very serious situation. We are experiencing both drought and flood in some parts of the country. We can say that it is a natural calamity, but at the same time it is a man-made calamity to some extent. For example, exploitation of the natural resources, exploitation of the forest wealth and illegal activities of the sand quarry mafia that we see in various parts of the country are some of the reasons for this man-made calamity. But we are not able to discuss all these issues with all seriousness. I know that in the 14th , 15th and 16th Lok Sabha we have been routinely discussing some subjects like price rise and we know the results of the discussion on price rise. Natural calamity is also one of them. We have been discussing all these issues. But they are connected with many of the other policy issues. For example, on the issue of carbon emission, Western countries say that they are not ready to reduce carbon emission, but they are asking India to reduce it. We have to think whether we can take any decision on this issue.
The Government should take strong steps to prevent illegal activities of sand quarry mafia and also to stop exploitation of the forest wealth which we are losing. These are also some of the reasons that we have to discuss in detail. I am not going to discuss all that. I would like to come to my own State because of shortage of time.
At present, Kerala is facing very severe rain in northern part of the State, that is, Kasargod, Kannur, Kozhikode, Wayanad and Malappuram. It is told that in many parts of my State, we are facing very serious and adverse effects. At the same time, this is not the first time. The Government of Kerala has always been approaching the Central Government to get assistance.
As far as flood and drought situation is concerned, the Government should take a long-term plan, that is the perspective aspect, as well as the short-term plan. Perspective aspect would reduce the damage in the long term. Of course, the short-term plan is to give immediate relief to the farmers. So these two issues have to be taken into consideration. I think that the Government may give some substantial and positive reply on this.
As far as Kerala is concerned, every year the Kerala Government approached the Central Government for financial assistance. I am sorry to say that the heavy loss is not, any time, fully compensated by the Centre. For the year 2012, Kerala had requested for Rs. 143.1 crore; for the year 2013, we demanded Rs. 503.9 crore and for the year 2014, we demanded Rs. 141.7 crore. All these requests were as per the SDRF norms.
Due to heavy loss, in the year 2013, a request for a special package with regard to drought was submitted. The total estimate was Rs. 3936.61 crore. A request for a special package was also given in the year 2013 by all-party delegation. The request was for Rs. 5660 crore. I am sorry to say that the Central Government, either the earlier Government or the present Government, was not ready to give adequate compensation to the State. Even though they gave the compensation, it was not given on time.
The compensation prescribed by the Central Government or the Planning Commission for the loss of agricultural crops, cash crops has to be seriously reviewed. For example, the compensation for paddy, coconut, arecanut, rubber, and other products is really very meagre. It is not possible for the farmers to meet their loss due to this meagre amount and this also is not given on time.
As already pointed out by Shri Mullappally Ramchandran, some of the major incidents like lightening, sea erosion and landslides are not included. The Government of Kerala has been requesting the Centre to include them because there is a big loss as far as these incidents are concerned.
The Earlier Government had appointed, as you know, Dr. Swaminathan Commission to study the problems concerning agriculture. The Commission has made a number of suggestions. One among them is to give loan to the farmers at a cheaper rate and, as far as paddy is concerned, to give interest free loans. That report has already been submitted. I would like to know whether the Government is ready to accept that report and whether the Government is going to take any action.
Sir, we think about the farmers’ issues and we want to assist them. How is it possible? It is possible only by giving them cheaper credit and also interest free credit. The Government has to take these issues into consideration.
श्री राम कृपाल यादव (पाटलीपुत्र) : सभापति महोदय,आज सदन अत्यन्त ही महत्वपूर्ण और गंभीर मसले बाढ़ और सुखाड़ पर चर्चा कर रहा है।
महोदय,मानसून कमज़ोर होने से पूरे देश में सूखे की स्थिति है और खास तौर से मैं जिस प्रदेश से आता हूं बिहार,वह एक पिछड़ा और गरीब प्रदेश है,इसकी आबादी 80 से 85 प्रतिशत गांव पर निर्भर करती है,खेत और खलिहान पर निर्भर करती है। उसकी आर्थिक स्थिति खेती पर निर्भर करती है। आज से नहीं बहुत सालों से बाढ़ और सुखाड़ से बिहार के वासी प्रति वर्ष परेशान रहते हैं।
महोदय,जैसा कि कई माननीय सदस्यों ने अपनी चर्चा के दौरान बिहार के नाम का उल्लेख किया तो निश्चित तौर पर आज बिहार पुनः एक संकट के दौर से गुज़र रहा है। वहां अनुमानित बारिश से लगभग 26 प्रतिशत बारिश कम हुई है। आज स्थिति यह है कि बिहार के 27 जिलों में सुखाड़ की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। किसानों में हाहाकार मची हुई है। अगर 15 अगस्त तक बारिश नहीं हुई तो बिहार के लोग भयानक संकट की स्थिति से गुजरेंगे और बहुत दयनीय स्थिति होगी। राज्य की सरकार ने अपने स्तर से कोई विशेष सुविधा मुहैया नहीं कराया है जिससे किसानों को लाभ मिले। सारे टय़ूबवेल खराब पड़े हुए हैं। खेतों में बिजली अनुपलब्ध है। डीज़ल बहुत कीमती हो गया है। किसानों की हालत बहुत खराब है।
महोदय,कृषि मंत्री यहां बैठे हैं जो सौभाग्य से बिहार के हैं और बहुत दिनों के बाद बिहार का कोई भारत का कृषि मंत्री बना है। मैं समझता हूं कि माननीय कृषि मंत्री के संसदीय क्षेत्र का बहुत बड़ा इलाका बाढ़ और सुखाड़ दोनों से प्रभावित रहता है। इसलिए उस पीड़ा को वे अच्छी तरह जानते हैं। मुझे पता नहीं कि केन्द्र की सरकार के पास राज्य की सरकार ने सूखे की स्थिति से निपटने के लिए,उसका आकलन करने के लिए कोई टीम भेजने का अनुरोध किया है या नहीं किया है। मैं तो माननीय केन्द्रीय मंत्री से निवेदन करूंगा कि वे बिहार की दस करोड़ जनता को राज्य की सरकार के भरोसे न छोड़ें और अपनी ओर से इनिशिएटिव लेकर वहां केन्द्रीय टीम भेजें ताकि स्थिति का आकलन कर वहां के सूखे की स्थिति से निपटने के लिए और वहां के किसानों को,जो मौत के मुंह में जाने वाले हैं,उन्हें बचाने के लिए कुछ काम किया जाए।
महोदय,बाढ़ की स्थिति यह है कि हर साल उत्तर बिहार में बहुत सारे इलाके में बाढ़ आती है। इसकी चर्चा कई माननीय सदस्यों ने की है। मैं उसको रिपीट नहीं करना चाहता हूं। मगर,स्थिति यह है कि नेपाल में जब बारिश होती है और जब बारिश के बाद वहां के डैम को खोल दिया जाता है और जब वह पानी इधर आ जाता है तो पूरे उत्तर बिहार के सात-आठ जिले,जो कोसी प्रदेश कहलाता है,भयानक बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इससे लाखों-करोड़ों की जान-माल की क्षति होती है,इंफ्रास्ट्रक्चर बर्बाद हो जाता है। बिहार में तो वैसे ही पिछड़ापन है और मैं समझता हूं कि इसका अभी तक कोई सॉल्यूशन नहीं निकला है।
महोदय,नेपाल के साथ भारत की कई वर्षों से वार्ता चल रही है। कोई डैम बनाने की बात चल रही है। डैम बनाने से तो बिजली का भी उत्पादन होगा। इस से नेपाल सरकार को फायदा होगा और बिहार में जो बिजली की कमी है,उस से लोगों को निजात मिलेगी और यह देश को भी सप्लाई होगा। उसके लिए एक डीपीआर बनने की बात हुई थी। पिछली यूपीए सरकार ने उसका डीपीआर बनाने के लिए कुछ करोड़ रुपये आवंटित किए थे। नेपाल में इसका एक दफ्तर भी है। मगर,उस पर आज तक क्या कार्रवाई हुई है,इसकी जानकारी नहीं है। सौभाग्य से हमारे प्रधान मंत्री जी नेपाल के दौरे पर हैं। मैं समझता हूं कि वे इस ओर भी सकारात्मक भूमिका अदा करेंगे। वे नेपाल के साथ ट्रीटी कर के जो डैम बनाने की बात है,जिससे बिहार को बाढ़ से मुक्ति मिल जाएगी,वह करने का काम करेंगे।
महोदय,मैं एक मिनट और टाइम लूंगा। मैं बहुत ही कम बोलता हूं और एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।
महोदय,मैं आपको बताऊं कि पटना जिले के जिस इलाके से मैं आता हूं,वह पूरा इलाका सुखाड़ के संकट से गुजर रहा है। वह इलाका तीन मुख्य नदियों से घिरा हुआ है। एक,गंगा नदी है। दूसरी,पुनपुन नदी है और तीसरी,सोन नदी हैं। उस पूरे इलाके में सोन प्रणाली के नहर की जो व्यवस्था है,वह चौपट हो गयी है। वहां हर साल मध्य प्रदेश से पानी आया करता था और वह पानी नहरों के माध्यम से किसानों के खेतों में जाया करता था। पर,दुर्भाग्य यह है कि पिछले दिनों मध्य प्रदेश की सरकार ने पानी छोड़ना बंद कर दिया है। पहले कुछ प्रारंभ हुआ था,मगर पुनः पानी छोड़ना बंद हो गया। यह एग्रीमेंट वर्ष 1973 से ही लागू है। अब स्थिति यह है कि जब बारिश होती है तो मध्य प्रदेश की सरकार पानी छोड़ कर अपनी फॉरमैलिटीज पूरी कर लेती है। मगर,आज जब सुखाड़ की स्थिति है तो अब वहां से पानी नहीं आ रहा है।
महोदय,मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर लूंगा। यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है और मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा।
महोदय,वहां सुखाड़ के कारण लोग बहुत संकट में हैं। मैं आपसे बताऊं कि केन्द्र सरकार को मध्य प्रदेश सरकार से बात करनी चाहिए। राज्य सरकार कहती है कि मैंने पैसा दे दिया और मध्य प्रदेश सरकार कहती है कि उसे पैसा नहीं मिला। अब इन दोनों के बीच उस पूरे इलाके के किसान परेशान हैं। इससे जो सात-आठ जिले प्रभावित हो रहे हैं,उनमें बक्सर,भोजपुर,औरंगाबाद,अरवल,कैमूर,सासाराम,जहानाबाद और मेरा क्षेत्र पटना है। ये बुरी तरह से सूखे से ग्रसित हो रहे हैं। किसानों में हाहाकार मचा हुआ है और अभी तक पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां की जो सोन नहर की प्रणाली है,वह बिलकुल कोलैप्स कर गई है। मैं समझता हूं कि नहर में अभी काम नहीं होना चाहिए। गंगा के कटाव से बहुत बड़े पैमाने पर लोग विस्थापित हो रहे हैं। ...(व्यवधान)
सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से निवेदन करूंगा,वहां एक लाख से भी ज्यादा लोग रहते हैं,उनके जान-माल की सुरक्षा के लिए,कटाव के लिए ठोस उपाय कीजिए,विस्थापित लोगों को बसाने की व्यवस्था करने का काम कीजिए।
सभापति महोदय,मैं पुन:आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी को निवेदन करना चाहूंगा कि बिहार को सूखे के संकट से बचाने के लिए कोई ठोस उपाय करके विशेष व्यवस्था करने का काम कीजिए,...(व्यवधान)ताकि बिहार के किसानों की रक्षा हो सके।
श्रीमती कृष्णा राज (शाहजहाँपुर): सभापति महोदय,आपने मुझे 193 की बाढ़ और सूखे की चर्चा पर बोलने का अवसर दिया,इसके लिए मैं आपकी आभारी हूं। आज पूरा देश बाढ़ और सूखे से त्रस्त है। दुर्भाग्य यह है कि आजादी के बाद से आज तक इस पर किसी भी प्रकार से चिन्तन नहीं हुआ,पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा अगर चिन्तन हुआ तो शायद महज़ कागज पर रह गया,उनका क्रियान्वयन नहीं हो पाया।
सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से सदन में बताना चाहती हूं कि वर्ष 1991 में हमारा जो बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र था,वह एक करोड़ हैक्टेयर था। लगातार 1960 में यह क्षेत्रफल बढ़ कर ढाई करोड़ हैक्टेयर हो गया और 1987 में यह क्षेत्रफल बढ़ कर लगभग तीन करोड़ हैक्टेयर हो गया तथा 1980 में भी बढ़ कर यह क्षेत्रफल बाढ़ एव सूखे से जो ग्रसित था,वह लगभग तीन से चार करोड़ हो गया। लगातार इतनी योजनाएं बनती गईं,लोगों ने हर बार इस सदन में चिन्ता भी व्यक्त की। सभी की चिन्ता इसी प्रकार रही और चर्चाएं भी इसी प्रकार रही होंगी,लेकिन आज वर्तमान 2013-14 में हमारे भारत की जो सारी भूमि है,वह लगभग सात से आठ करोड़ हैक्टेयर क्षतिग्रस्त हो गई और नदियों में समाहित हो गई,जो आज एक चिन्तनीय विषय है। हम पूर्ववर्ती सरकारों को इसके लिए दोषी ठहरातें हैं। इसमें कोई गुरेज़ नहीं है कि उन्होंने कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया,अगर किया होता तो शायद आज हम लोग यहां चर्चा नहीं कर रहे होते।
सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से अपनी सरकार के माननीय मंत्री जी को बधाई देती हूं,जिन्होंने नदियों को जोड़ने का काम किया। नदियों को जोड़ने से एक तरफ जो हमारी सूखे की मार है,दूसरी तरफ हम बाढ़ से त्रस्त होते हैं,इन दोनों का संतुलन बनेगा और नदियां एक में धार बहेंगी। इन सब चीजों से हमें निज़ात मिलेगी।
सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहती हूं कि इसके लिए हमारी सरकार ने नदियों को जोड़ने के लिए सौ करोड़ रुपए का धन आबंटित किया है। निश्चित ही यह सराहनीय कदम है,इसके लिए प्रधान मंत्री जी बधाई के पात्र हैं। हमारे प्रधान मंत्री,माननीय नरेन्द्र भाई मोदी जी की जो सोच है,क्योंकि किसी भी देश का उत्थान तभी हो सकता है,जब वहां की जो 70 फीसदी आबादी है,वह खुशहाल एवं सुखी हो। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज भी हमारा किसान इतनी मेहनत करके भूमि उपजाऊ करता है,फसल उपाजाऊ होती है,लेकिन जब धन लेने का नम्बर आता है तो कभी बाढ़ की चपेट में चला जाता है,कभी सूखे की चपेट में होता है।
सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से बताना चाहती हूं कि राज्यवार देश के सभी प्रदेशों में धन का आबंटन वर्षवार किया गया है। हमारे उत्तर प्रदेश में भी इसके लिए अब तक 3,21613 करोड़ रुपए की लागत दी गई,लेकिन आज भी स्थिति जस की तस और भयावह है। आज मैं यहां पर अपने संसदीय क्षेत्र की भी पीड़ा बताने के लिए खड़ी हूं। मेरा जनपद शाहजहांपुर,उत्तर प्रदेश के अंतर्गत आता है। हमारा संसदीय क्षेत्र पांच नदियों से घिरा है -गंगा,रामगंगा,बेहगुल,गर्रा,खनौर। इन नदियों के कटान के कारण हमारे क्षेत्र में आज की जो वर्तमान स्थिति है,वह मैं बताना चाहूंगी। अब तक भू-कटान से हमारे यहां लाखों एकड़ धान की फसल नष्ट हुई। हमारे यहां जनपद शाहजहांपुर,जो मेरा संसदीय क्षेत्र है,वहां बहुत जनहानि हुई। मैं पुन:कह रही हूं,मेरे विपक्ष के साथी इस बात का बुरा न मानें,उनकी नीतियां देश के हित में नहीं थीं। बाढ़ के हित में नहीं थी और सूखे के हित में नहीं थी। 10 दिन पहले एक सूचना आती है कि हमारा देश अभी सूखे से ग्रस्त है और उसके बाद सिंचाई विभाग से एक सूचना आती है कि तमाम नदियों में गंगा,शारदा,घाघरा आदि में खतरे के निशान से पानी ऊपर बह रहा है। मैं आपको यह भी बताना चाहूंगी कि हमारे यहां सूखे के समय जो बाढ़ आती है,इसमें नेपाल,जो हमारा मित्र देश है,बिना बताये हुए तीन से चार लाख क्यूसैक्स पानी छोड़ देता है।
मेरा आपसे यह निवेदन है कि नेपाल से मित्रवत् वार्ता करके इसमें कोई उचित नीति बनाई जाये। मैं आपको यह भी बताना चाहूंगी कि मेरे कुछ सुझाव मंत्री जी को हैं कि नदियों को जोड़ने के साथ-साथ ही नदियाँ मैदानी इलाके बनती जा रही हैं,इसलिए नदियों को गहरा करने की आवश्यकता है और उन पर बन्धा और ठोकरें बनाने की जरूरत है। मेरा एक और सुझाव है कि मैदान जैसी नदियां भी जब हो जाएंगी तो उससे स्थिति और खराब होगी।
मेरा आपसे यही निवेदन है। बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का मौका दिया।
*SHRI R. GOPALAKRISHNAN (MADURAI): With the blessing of our AMMA Hon’ble Chief Minister of Tamilnadu who gave me an opportunity to be the Member of this August House, I would like to express my views.
I am to mention that the natural phenomenon flood and drought are unavoidable. But, proper schemes and by successful implementation, we can save our people from flood and drought.
Identifying the flood-prone and drought-prone areas of the country is the foremost task. A well preparedness approach towards flood and drought would reduce the effects of disastrous results of flood and drought.
Droughts can have significant environmental, agricultural, health, economic and social consequences. Drought can also reduce water quality, because lower water flows reduce dilution of pollutants and increase contamination of remaining water sources. Our Amma Hon’ ble Chief Minister of Tamilnadu announced relief package of thousands of Crores rupees to save the farmers of Cauvery Delta Region of Tamilnadu. Such a war footing measures as taken by Amma should be encouraged well by the the Union Government by providing special budgetary allocations to the State.
Channelizing and saving the flood waters would work well for drought-prone regions. Inter-linking of rivers, especially the flood-prone rivers, de-silting of waterbeds, saving the rain waters are to be given the topmost priority.
Rain Water Harvesting is one of the best methods to tackle both flood and drought. Rain Water Harvesting movement launched in 2001 was the brainchild of our Amma Hon’ble Chief Minister of Tamilnadu. It has had a tremendous excellent results within five years, and every states took it as role model.
Amendments made to Section 215 (a) of the Tamilnadu District Municipalities Act, 1920 and Building Rules 1973, have made it mandatory to provide Rain Water Harvesting (RWH) structures in all new buildings in the State to avoid ground water depletion. Our Hon’ble Chief Minister of Tamilnadu earmarked about Crores of rupees to each Town Panchayats and Municipal Corporations in the State to augment water resources there. Therefore, the Union Government should encourage such initiatives through monetary budget allocations to the State of Tamilnadu. Rain water Harvesting will improve water supply, food production, and ultimately the food security.
Therefore, I would urge upon the Union Government to device mechanism for integrated water resources development and managment. Adopt the Rain Water Harvesting model of Tamilnadu as a role model. Provide specific budgetary allocations to all the States to make the Rain Water Harvesting mandatory there.
Also I urge upon the Union Government for taking joint action by the Ministries of Agriculture, Water Resources, Urban Development and the Rural Development to tackle both flood and drought in the country.
SHRI BHEEMRAO B. PATIL (ZAHEERABAD): Mr. Chairman, Sir, I rise here to speak on the discussion under Rule 193 regarding flood and drought situation in the country.
I would confine myself to the State of Telangana. Our State has received just 146.7 mm of rainfall till 26th July, 2014 against the normal rainfall of 327.8 mm. There is a deviation of minus 55 per cent.
As regards agricultural activity, this time, due to less rain, the total area sown in my State was 23.30 lakh hectare as against the normal area of 26.76 lakh hectare.
Sir, the State of Telangana has been badly affected by the following natural calamities during the year 2013-14:
1. Heavy rains/floods due to low pressure area in Bay of Bengal from 21st October to 27th October, 2013;
2. Helen and Leher Cyclone from19th November to 28th November, 2013;
3. Drought in 2013 during South-West Monsoon from June to September, 2013;
4. Unseasonal rains/thunderbolt/hailstorms from 28th February to 10th March, 2014;
5. Unseasonal rains/hailstorms in April, 2014; and
6. Unseasonal rains/hailstorms in May, 2014.
During the current year, the following were the loss of human lives, damage to property and loss of crops, which was reported.
In the unseasonal rains/thunderbolt/hailstorms, which occurred from 28th February, 2014 to 10th March, 2014, districts of Mahabubnagar, Raga Reddy, Medak, Nizamabad, Adilabad, Karimnagar, Warangal, Khamman and Nalgonda were badly affected in which 10 people died, 1,060 houses got damaged and 61,819 hactore of crops got damaged.
Similarly, in the unseasonal rains/hailstorms, which occurred in April, 2014, districts of Mahabubnagar, Ranga Reddy, Medak, Karimnagar, Warangal, Nizamabad and Nalgonda were badly affected, in which 16,083.06 hectare of crop got damaged.
Then, in the unseasonal rains/hailstorms occurred in May, 2014, districts of Mahbubnagar, Ranga Reddy, Medak, Adilabad, Karimnagar, Warangal, Khammam and Nalgonda were badly affected, in which 4,252.08 hectare of crop got damaged.
Sir, an Inter-Ministerial Central Team (IMCT) headed by Shri Narendra Bhooshan, Joint Secretary, Ministry of Agriculture, Government of India visited Warangal and Medak districts of the State in April, 2014. The IMCT submitted its findings and reports to the Government of India but those details are not available with the State Government.
The State Government released an input subsidy of Rs. 37.55 crore to the Agriculture Department for distributing it to the farmers affected by the hailstorms during February-March, 2014.
Following the then Prime Minister’s assurance in November, 2013 of an assistance of Rs. 1,000 crore to the State, the Government of India released an amount of Rs. 700 crore from the NDRF during 2013-14 to the States towards relief necessitated by natural calamities of severe nature on account basis, pending the final assessment of requirement of funds for immediate relief, operation and approval of the HLC.
The Government of India also released an amount of Rs. 3,000 crore of Grand-in-Aid of Centre’s contribution to the State Disaster Response Fund during 2013-14 to the State Government on the basis of the recommendation of the 13th Finance Commission towards relief necessitated by natural calamities.
Drought may come in several forms. The Indian Government declares ‘meteorological drought’ when there is less than 75 per cent average rainfall in an area over a prolonged period of time.
A ‘hydrological drought’ is identified when there is a significant reduction in water bodies such as rivers, ponds, tanks and groundwater.
Finally, an ‘agricultural drought’ is identified when crops fail because there is insufficient moisture in the soil during the crucial times of harvest. In India, this occurs when there is a ‘meteorological drought’ for four consecutive weeks during the period of mid-May to mid-October or for six consecutive weeks during the rest of the year.
For many farmers, impossibly high debt is another consequence of drought. In Telangana, dependence on costly inputs such as fertilizers and pesticides has grown in recent years, and the farmers often borrow money to pay for them. A drought-stricken crop may make it impossible for a farmer to repay these loans. The situation is difficult, particularly for 87 per cent of the rural poor who do not have access to institutional sources of credit.
HON. CHAIRPERSON : Please wind up.
SHRI BHEEMRAO B. PATIL : Please give me one minute. They are forced to obtain money from private moneylenders who demand an interest rate of up to 35 per cent. These moneylenders may also be the local pesticide dealers who typically exploit farmers by charging 15-25 per cent extra for the goods obtained on credit.
Lastly, unfortunately, some farmers do not have any hope on the effectiveness of these cropping mechanisms and they choose to end their life instead. A recent study has revealed that suicides committed in rural areas often follow intensive pressure and humiliation from moneylenders.
HON. CHAIRPERSON: Please wind up. You have already taken five minutes.
SHRI BHEEMRAO B. PATIL : Please give me one minute.
In the final analysis, it seems that the key requirement for drought mitigation is the cooperation of communities, NGOs and the Government to prepare village drought contingency plans that counter the impacts of the drought such as health problems, debts, suicides and migration. It must be made clear as to who is responsible for the maintenance of water harvesting structures, and how this will be paid for.
HON. CHAIRPERSON: Please conclude.
… (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Next is Shri Ajay Tamta.
SHRI BHEEMRAO B. PATIL : While drought contingency plans may exist in some localities on paper, they are worthless unless the relevant community has ownership of it and is serious about implementing it. To do this, they need access to funds and expert advice on the most suitable water harvesting structures and dry land crops for their location.
श्री अजय टम्टा (अल्मोड़ा) : महोदय,आपने मुझे नियम 193 के तहत बोलने का सुअवसर दिया,इसके लिए मैं आपको हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं।
महोदय,बाढ़ और सूखे से सम्बन्धित विषय को लेकर सभी माननीय सदस्यों ने अपने-अपने विचारों को बड़ी गम्भीरता के साथ इस सदन में रखा। इससे यह अनुभव होता है कि पूरे देश के किसी न किसी प्रदेश में लगभग 70-80 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा रहता है कि कभी बाढ़ ज्यादा या कभी सूखा ज्यादा। इन सबके पीछे बहुत सारे कारण हैं। मैं उत्तराखंड राज्य से आता हूं और उत्तराखंड राज्य में जिस प्रकार से लगातार अतिवर्षा के कारण,खंडवृष्टि के कारण,मौसम परिवर्तन के कारण,अधिकतम वर्षा होने के कारण लगातार नुकसान हो रहा है और साथ ही साथ जो नदियां उत्तराखंड से निकलकर आगे जाती हैं,वह भी तबाही का एक बहुत बड़ा कारण बनती जा रही हैं।
महोदय,हमें उन सब विषयों में जाने की बहुत आवश्यकता है,क्योंकि पिछले वर्ष 2013 में 16-17 जून को केदारनाथ में बड़ी भीषण अतिवृष्टि के कारण वर्षा हुई,उसके पीछे बहुत सारे कारण हैं। हिमालय के साथ लगे हुए क्षेत्र,संभवतः मनुष्य उन स्थानों पर जाता भी नहीं,जो बर्फीले स्थान हैं,उन स्थानों में अधिकतम वर्षा का पानी अधिक मात्रा में इकट्ठा होने के साथ-साथ ग्लेशियर का गलना और हिमखंडों का गलना भी एक साथ हो जाता है,जिस कारण से अननेचुरल,जो नेचर के साथ-साथ ऊपर बहुत हाइट में तालाब बन जाते हैं और अचानक उनके फटने के कारण अति पानी बहने के कारण लगातार पूरी जमीनें बह जाती हैं।
महोदय, मेरा यह भी निवेदन है, आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी तक भी वह संज्ञान जायेगा, चूंकि उत्तराखंड के लोग खेती करते हैं, वहां जो सीढ़ीदार खेत हैं, जिनके पास बहुत बड़ी खेती नहीं होती है और नदी के साथ जिनका समाज या गांव जुड़ा रहता है, अगर वहां एक साथ अति पानी आता है तो उनकी खेती के साथ-साथ उनके रहने की जमीनें बह जाती हैं और वे पुनः जंगलों की तरफ आगे निकलते हैं। उनके पास कोई भी भूमि नहीं रहती है।
15.00 hrs. पिछली बार,मंदाकिनी नदी में 16-17 तारीख को जो घटना घटी थी,केदारनाथ में जो घटना घटी,गौरीकुंड में जो घटना घटी,सोनप्रयाग अगस्तमुनी,विजय नगर और रुद्रप्रयाग में भारी वर्षा के कारण,धारचुला और मुनस्यारी,जो मेरा संसदीय क्षेत्र है,इस क्षेत्र में भी गोठी,दारमा और दुमर वाले क्षेत्र में बहुत सारी घटनाएं घटीं। मैं इसे बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं। वह एक ऐतिहासिक त्रासदी थी जिसमें हजारों लोगों की जानें गईं। अभी भी 4024 लोग लापता हैं जिनकी अभी तक जानकारी नहीं मिल पाई है। वह ऐसी घटना घटी थी।
मुझे यहां पर यह बोलते हुए गर्व हो रहा है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी जो हमारे प्रधानमंत्री हैं,केदारनाथ की घटना के तत्काल बाद वहां आए और उन्होंने उत्तराखंड राज्य के निवासियों को,जो लोग तीर्थाटन पर थे,उन लोगों को भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने बड़ा सहयोग किया। उस समय हमारा तंत्र बहुत खराब हो चुका था। केदारनाथ की घटना के कारण कनेक्टीविटी कट चुकी थी। पूर्व मुख्य मंत्री आदरणीय डा. निशंक जी ने इस संबंध में पहली सूचना देश के प्रधान मंत्री को दी। प्रधान मंत्री जी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी को सूचना दी,तब हम आपदा पर काबू कर पाए। ऐसी घटनाओं का लगातार बढ़ते रहना,उत्तराखंड राज्य के लिए एक अभिशाप बनता जा रहा है।
सभापति महोदय जी से मेरा कहना है कि ग्लेशियर बेस्ट नदियों पर ध्यान देते हुए,उत्तराखंड में बहुत-सारी ऐसी नदियां हैं जो भूमिगत जल के कारण बनती हैं। अटल बिहार वाजपेयी जी ने प्रस्ताव रखा था कि नदियों को जोड़ना चाहिए। जो नदियां ग्लेशियर बेस्ड नहीं हैं,अगर उन्हें हम जोड़ेंगे,वर्तमान में हमारी सरकार ने इस प्रस्ताव को रखा भी है,उससे अति वृष्टि का जो पानी आएगा,वह भी बंटेगा। मुझे लगता है कि उससे भी हम आने वाले समय में बाढ़ पर नियंत्रण कर सकते हैं।
मेरा यह पहला भाषण है। माननीय कृषि मंत्री जी उत्तराखंड राज्य से भली-भांति परिचित हैं और बिहार से भी परिचित हैं,जहां ज्यादा बाढ़ आ रही है। मुझे लगता है कि अब एक अच्छी नीति बनने की संभावना है। मैं प्रधानमंत्री जी को भी बहुत-बहुत धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने एक अलग से अध्ययन केन्द्र भी खोला जाएगा।
15.03 hrs. (Dr. Ratna De (Nag) in the Chair) डॉ. भोला सिंह (बेगूसराय) : सभापति महोदय, “इस बस्ती में हाय कौन आंसू पोछेंगे जो मिलता है सबका दामन भीगा लगता है कितने प्यासे होगे यारों सोचो तो शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है।” सभापति महोदय, बेगम अख्तर अपने आसुओं को सहेजते हुए गा रही थी -
“अब के आएगी बरसात, बरसेगी शराब, आई बरसात, पर बरसात ने दिल तोड़ दिया।” महोदय, मैं बिहार राज्य से चुन कर आया हूं। बिहार विडम्बनाओं का राज्य है। बिहार सांस्कृतिक संभाव का राज्य है। यह देश भी विडम्बनाओं का देश है। संपूर्ण देश जिसे गंगा और यमुना पखारती है। जिसे अरब सागर, हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी, भारत मां का वसन है। गंगा-यमुना हमारी मां के दो स्तन हैं जिनसे दूध की धारा प्रवाहित हो रही है। पर जब मां के स्तन में ही अवसाद हो जाएं, वह भी समय के अंतराल में अपनी उपयोगिता खो दे। कार्लाइल ने इतिहास की व्याख्या करते हुए ठीक कहा है। उन्होंने इतिहास को तीन भागों में बांटा है। प्रथम भाग में कहा कि वह समय जब मानव प्रकृति के अधीन था। दूसरे खंड में कहा कि जब मानव प्रकृति के साथ चलने लगा। तीसरे खंड में कहा जब मानव ने प्रकृति पर कब्जा करना शुरू किया। बादलों का फटना,पहाड़ों का गिरना,समुद्र का जमीन को अपने में समा लेना जो त्रासदी है,वह हमने पैदा की है। यह बड़े दुख का विषय है कि हमारे देश में हजारों नदियां हैं,जलाशय हैं,चौड़ हैं लेकिन यह देश सुखाड़ से पीड़ित है,बाढ़ से पीड़ित है। यही नहीं,इन हजारों नदियों के साथ-साथ हमारी हजारों सांस्कृतिक नदियां,नाले,जलाशय हैं। इन असंख्य सांस्कृतिक नदियों में समन्वय से हमारा देश चलता है। नदियों का समन्वय नहीं हुआ। योगी आदित्यनाथ ने ठीक कहा कि हमारी समस्या राजनीतिक है। राजनीति यह है कि वह सामाजिक और आर्थिक प्रबंधन है। कृषि केवल प्राइवेट जमीन में खेती को नहीं कहते,कृषि एक सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक,सांस्कृतिक व्यवस्था है। जब कृषि ठीक तो बाजार ठीक,जब कृषि ठीक तो सीमा ठीक,जब कृषि ठीक तो बेटी की मांग में सिंदूर,जब कृषि ठीक तो मां के आंचल में फूल के गुच्छे। पर यह कृषि,हमारी कृषि संस्कृति,कृष्ण गाय के साथ हैं,महादेव बैल के साथ हैं। इस तरह ये सांस्कृतिक नदियां,जमीन की नदियां सबका समन्वय होना जरूरी है।
मैं आपका ज्यादा समय नहीं लेना चाहता। बिहार का प्राण नेपाल में बसा हुआ है। जितनी नदियां नेपाल,हिमालय से आती हैं,बिहार को त्रासदी देती हैं। इसीलिए हम आपके माध्यम से केन्द्र सरकार और माननीय मंत्री जी जो कृषि संस्कार और संस्कृति के हैं,राधा मोहन बाबू,पता नहीं हाथ में बांसुरी है या सुदर्शन चक्र है,मैं नहीं जानता।...(व्यवधान)लेकिन जब राधा के साथ हैं तो बांसुरी है और संस्कृति। मैं उनसे आग्रह करना चाहता हूं। बिहार सुखाड़ और बाढ़ दोनों से आतंकित है,बिहार सुखाड़ के कारण तार-तार है और नेपाल में बिहार का प्राण बसा हुआ है। हम आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से आग्रह करना चाहते हैं कि गंगा से जो बाढ़ आ रही है,कोसी से जो बाढ़ आ रही है,कृष्णा से जो बाढ़ आ रही है,इन तमाम नदियों से...(व्यवधान)मैं आधा मिनट और लूंगा। आप आई हैं,मैंने देखा नहीं,मेरी आंख बंद रहती है। मेरा नाम भोला है।...(व्यवधान)जब भोला की आंख बंद रहती है और माथे पर अगर चांद कलंकित बैठा है,गले में सांप जहर लेकर बैठा है,पत्नी भी पहाड़ की बेटी है और मित्र भी बैल है तो आप जानते हैं कि ऐसा व्यक्ति घिस गया है। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि जो बड़ी नदियां हैं,केन्द्र सरकार उनकी त्रासदी को राष्ट्रीय विपदा मानकर राज्य सरकार को इससे मुक्ति देकर इसका समायोजन करे और जल का प्रबंधन करे ताकि बिहार और यह देश जो स्वर्गित देश है,अपनी रक्षा कर सके।
श्री ताम्रध्वज साहू (दुर्ग) : सम्माननीय सभापति महोदया,मैं बाढ़ और सूखे के कारण उत्पन्न स्थिति पर चर्चा करने के लिए खड़ा हुआ हूं। पूरे देश में कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की स्थिति बनी हुई है। समय की कमी को देखते हुए मैं अपने राज्य और अपने संसदीय क्षेत्र पर ही चर्चा करना चाहूंगा। छत्तीसगढ़ में सूखे और बाढ़,दोनों ही स्थिति में किसान प्रभावित हुए हैं। मई में दो दिन पानी गिरने से किसानों ने सोचा कि मानसून आ गया,इसलिए उन्होंने खेती का काम शुरू कर दिया। वे सोयाबीन,धान आदि फसल की बुआई कर चुके थे। छुटपुट वर्षा को छोड़ दें,तो डेढ़ माह तक पानी न गिरने की वजह से फसल खराब हो गयी। अभी जुलाई में लगातार बारिश होने से वहां जबरदस्त बाढ़ की स्थिति बन गयी। हजारों लोग बेघरबार हो गये। कुछ फसल पैदा हुई थी,लेकिन वह भी खराब हो गयी। नःशुल्क धान,सोयाबीन व अन्य फसलों के बीज शासन को उपलब्ध कराने थे,लेकिन उन्होंने नहीं कराये। किसानों को हुई क्षति का सर्वे कराकर मुआवजा दिया जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में सभी नदी-नाले में एनीकट बनाये जा रहे हैं,जो जलस्तर बढ़ाने के लिए ठीक हैं,परन्तु छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा समस्त एनीकट उद्योगों के लिए बनाये जा रहे हैं। एनीकट का पानी किसानों को सिंचाई में न देकर उद्योगों को बेचा जा रहा है। बाढ़ में तट के कटाव होने के कारण नदी किनारे बसे गांवों के लिए खतरा मंडराने लगा है। बाढ़ नियंत्रण के तहत पीचिंग व फेजवाल निर्माण का कार्य होना है। छत्तीसगढ़ सरकार इसके लिए बजट का प्रावधान जरूर करती है,लेकिन काम नहीं होता। केन्द्र से राशि आने पर कार्य करने की बात कही जाती है। छत्तीसगढ़ से नदी किनारे के ऐसे सभी ग्रामों की सूची मंगाकर राशि केन्द्र से स्वीकृत की जाये। अधिक वर्षा होने पर गंगरेल व मोंगरा जैसे कई जलाशयों से पानी छोड़ दिया जाता है,जिसके कारण बाढ़ की स्थिति निर्मित होती है और जनजीवन के लिए खतरा उत्पन्न होता है। इससे अनेक गांव डूब जाते हैं,मकान बह जाते हैं,जानवर व आदमी भी बह जाते हैं। ऐसे समय में बांध से नदियां,जो पहले से ही भरी होती हैं,उनमें पानी छोड़ने के बजाय दूसरी तरफ नहर बनाकर छोड़ने से अतिरिक्त सिंचाई भी होगी और जन-धन की हानि से भी बचा जा सकेगा।
ऐसे ही धमतरी जिले में स्थित गंगरेल (रविशंकर)बांध महानदी में बना है। वर्षा अधिक होने पर पानी छोड़ा जाता है,जिससे जबरदस्त बाढ़ की स्थिति बनती है और सर्वाधिक जन-धन की हानि होती है। ऐसे समय में इसके पानी को नदी में छोड़ने की बजाय बालोद जिले में स्थित तांदुला बांध में नहर बनाकर डाला जाये,क्योंकि तांदुला बांध पूरा भर नहीं पाता। इससे बालोद,दुर्ग और बेमेतरा के किसान अधिक सिंचाई कर पायेंगे। नदियों को नदियों से जोड़ने की तर्ज पर बांध को बांध से जोड़ा जाये,ताकि बाढ़ से बचा जाये और किसानों को सिंचाई सुविधा भी प्राप्त हो,ऐसा मेरा आग्रह है। सूखे की स्थिति से किसानों की फसलों का जो नुकसान हुआ है,उसका सर्वे कराकर क्षतिपूर्ति और मुआवजा प्रदान किया जाये और जिनका बाढ़ से नुकसान हुआ है,उन्हें भी मुआवजा दिया जाये।
सभापति महोदया,आपने मुझे बोलने का समय दिया,उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
*DR. A. SAMPATH (ATTINGAL): This is the not the first time during the last 5 years that we are discussing about the situation of floods and droughts. We discuss and discuss, but the problem persists. It has become a never ending phenomena. Long back, it was heard even in this august House that “Indian agriculture is a gamble with the monsoons” and that gamble is still existing.
The Indian subcontinent is blessed with the tropical climate but suffers from natural calamities and sometimes from man made calamities thereby increasing the number of casualities like we experienced in Uttrakhand last year. For the last two-three days, my home State Kerala is experiencing high rainfalls and hence schools have been closed.
It is said that in degree of priority the next best thing to a mother’s milk to a child is the natural rain water. But do we tap and tune the most precious natural resource in the world? The answer is no. While we worship the God of rain or Godess rivers, we do not respect the water. Neither we rationally or scientifically use this scarce natural resource. The result is intermittent floods and droughts as well as depleting level of ground water. This will definitely endanger the human habitations in near future.
Drinking water is becoming a scarce commodity and this natural or free good in the words of economists has become an economic good very fast recently. Imagine one litre of drinking water costs Rs. 20/- in the street vendors shop and we still discuss about the poverty line criteria of spending Rs. 32 a day in rural and Rs. 47 in urban areas as fixed by Rangarajan Committee.
The latest Economic Survey Report claims that 82.7% of the rural households and 91.4% of urban households have access to safe drinking water. But let me say madam that most of the taps remain empty during most of the day. Access does not mean availability.
The lack of infrastructure for harvesting the rain water and the half-hearted efforts to end the water pollution aggravates the crisis of course, we may not be able to control the sudden climatic variations. But we may be able to overcome the drought situations if we have the will power and people’s participation. It has been alleged by various quarters that the incidence of floods and droughts are some of the green pastures for corruption and siphoning of the public money.
If most of the floods and droughts can be forecasted why cant we not able to take maximum preventive steps in advance and also to prepare rehabilitation measure early? Interlinking of rivers will not solve the problem. Without adequate, scientific and ecological study, if we go for the much hyped inter-linking, that may invite the sea water into the mainland and thereby the salinity of the ground water along the coastal belt may go up. This may lead to worsening of the drought situations as well as more scarcity of drinking water. This may also adversely affect the agricultural crops along the 5000 km plus long coastal belt of at least ten States. The fresh water flora and fauna may also face extinction.
The need to preserve and conserve water and the scientific, nature-friendly way of cultivations should be encouraged. More public expenditure is necessary in this field. The disaster management schemes should be given proper emphasis. It has to start from the bottom level like schools, panchayati raj institutions, women SHGs etc. We have to give more priority for this sector under MNREGA. This is a war . A war for water and soil. A war for our survival and for our future generation’s existence.
श्री राजेन गोहेन (नौगोंग) : माननीय सभापति महोदया,आज बाढ़ और सूखे पर जो चर्चा हो रही है,उसमें मैं असम के बारे में बताना चाहूंगा। असम में बहुत सी नदियां हैं,लेकिन एक नदी,वह नदी न होकर नद है। देश भर में एक ही नद है,जिसे ब्रह्मपुत्र बोला जाता है। गंगा मैया शिवजी की जटा से निकल रही है,इसलिए हम उसे बहुत प्रेम और भक्ति से देखते हैं। ठीक उसी तरह ब्रह्मा का पुत्र ब्रह्मपुत्र है। आज ब्रह्मपुत्र नदी ने जिस तरह से भयंकर रूप धारण किया है,उसे हमने पहले कभी भी नहीं देखा। उस नदी की जहां चार-पांच किलोमीटर विड्थ होनी चाहिए,वह आज बीस-पच्चीस किलोमीटर विड्थ हो गयी है। इस नदी से कम से कम बीस-पच्चीस चैनल बहते हैं। इस हिसाब से हर चैनल से लाखों-हजारों लोग बेघर और लैंडलैस हो जाते हैं। इसे रोकने के लिए हमारी सरकार ने आज तक किसी तरह का कदम नहीं उठाया।
सभापति महोदया,मैं कहना चाहता हूं कि फ्लड असम की एक परेनीअल प्रॉब्लम है। लोग महीने भर तक उससे सफ़र कर सकते हैं,लेकिन जब एक परिवार का घर चला जाता है,तो उसके लिए यह बड़े दुख की बात होती है। आज काजीरंगा नैशनल पार्क की 40 से 60 हजार हैक्टेयर लैंड ईरोजन मे चली गयी है। जिसके कारण आज वाइल्ड लाईफ का हैबिटेट एरिया बहुत कम होता जा रहा है। उस हिसाब से सारे असम में हर साल इतना इरोज़न हो रहा है,इसे रोकना चाहिए। हम नहीं रोक पाएंगे,ऐसी तो कोई बात नहीं है। आप देखें कि ब्रह्मपुत्र के तट पर एक मंदिर है,जिसका नाम उमानन्दा है। उस मंदिर को हजारों सालों से कुछ नहीं हुआ। उसका एक इंच जमीन भी इधर-उधर नहीं हुआ,वह वहीं पर खड़ा है। फिर हम क्यों इस इरोज़न को नहीं रोक पा रहे हैं?इसलिए मेरी सरकार से मांग है कि जितने भी छोटे-छोटे चैनल्स हैं,उनको डायवर्ट करके एक मेन चैनल बनाना चाहिए जिससे काफी जमीनों का रिक्लेमेशन भी हो जाएगा और उसे वाटरवेज़ के लिए भी हम लोग यूज़ कर सकते हैं। पहले भी वहाँ पर काफी जहाज चलते थे। आजकल तो ऐसा कुछ नहीं होता है। इसीलिए असम का यह जो विषय है,जो इरोज़न प्रोब्लम है,इस संबंध में माजुली गांव में तो कुछ काम हो रहा है,पर बाकी क्षेत्रों में काम नहीं हो रहा है। हम लोग देखते हैं कि जहाँ पर तट है,वहाँ पर तो नदी तीन से पाँच किलोमीटर में तो रहती है,लेकिन तट के बाद जो एरिया होता है उसमें उसकी चौड़ाई 20-25 किलोमीटर हो जाती है। इसको रोकना बहुत जरूरी है। इसलिए मैं सरकार से मांग करूँगा कि ब्रह्मपुत्र नदी को थोड़ी प्रेम और गंभीरता से ले,इस पुत्र को संभालना चाहिए,नहीं तो यह बहुत हंगामा करेगा जो सारे असम के लोगों के लिए बहुत बड़ा खतरा हो सकता है।
*श्री हरिभाई चौधरी (बनासकांठा) : नियम 193 के अधीन देश में बाढ़ और सूखे की स्थिति के बारे में मैं अपने विचार व्यक्त करता हूं ।
अपने देश में कृषि कुदरत के उपर निर्भर है । कई बार भारी बारिस कई बार सूखा , कई बार ओले पड़ता है । उस समय किसानों का बहुत नुकसान होता है ।
पिछले वर्ष मेरे संसदीय क्षेत्र में ओले के कारण किसानों का नुकसान हुआ था ।
गुजरात में आज के प्रधानमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी साहब ने नदियों को जोड़ने का काम किया और सुजलाम सुफलाम योजना बनाया , नदियों के पानी का सदुपयोग किया, मैं आज सरकार से प्रार्थना करता हूं कि नदियों को जोड़कर गुजरात की सुजलाम सुफलाम योजना बनाया जाये ताकि सब को फायदा पहुंचे ।
श्री नाना पटोले (भंडारा-गोंदिया) : माननीय सभापति महोदया, श्रद्धेय योगीनाथ जी, जिन्होंने इस सदन में बाढ़ और सूखे पर चर्चा लायी है, आज पूरे देश में जो स्थिति पैदा हुई है, इस विषय में सम्पूर्ण चर्चा होकर उसके बारे में आज निर्णय होना चाहिए। यह सदन की और इस देश की जनता की भी अपेक्षा है। आदरणीय श्री मोदी जी, जो हमारे देश के लाडले प्रधानमंत्री हैं, उनके मंत्रिमंडल में जो कृषि विभाग के मंत्री हैं श्री राधा मोहन सिंह जी, इसमें भी भगवान श्री कृष्ण का नाम है, हमारी जो जल संसाधन मंत्री हैं सुश्री उमा भारती जी, इसमें भी भगवान शंकर का नाम है। हमारी संस्कृति के ये दोनों भगवान हैं, जो हमारे देश की रक्षा के लिए और मानव जाति के कल्याण के लिए इस देश में कई आविष्कार किये हैं। आपके माध्यम से मैं महाराष्ट्र की बात रखना चाहूँगा। महाराष्ट्र के पूना में भूस्खलन हुआ और वहाँ पर कई लोग मर गये। एक तरफ महाराष्ट्र में वर्षा हो रही है और मराठवाड़ा की तरफ आएं, तो वहाँ पर बारिश नहीं है। विदर्भ के इलाकों में से कुछ में बारिश है, कुछ में नहीं है। निश्चित रूप से मौसम का जो मिजाज है, वह पूर्णतः एक समान नहीं है। देश में कहीं बारिश है, तो कहीं सूखा है, ऐसी स्थिति हम लोग देख रहे हैं। बार-बार कहा जा रहा है कि आने वाला जो महायुद्ध होगा, वह सिर्फ पानी के लिए होगा। ऐसे समय में पानी की समस्या को हल करना ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेवारी बनती है। हमारे देश में जितना भी पानी गिरता है, उस पानी को हमें रोककर हमारे किसानों तक पहुंचाना होगा। हमारे देश में पीने के पानी का संकट न आए, ऐसी व्यवस्था करने का समय आज हमारे हाथ में है। हम इसको और ज्यादा समय तक खीचेंगे, तो निश्चित रूप से आने वाले दिनों में इस देश में और दुनिया में पानी के लिए महायुद्ध होना निश्चित है।
सभापति महोदया,मैं बताना चाहूंगा कि मैं भंडारा-गोंदिया क्षेत्र से चुनकर आता हूं।...(व्यवधान)वहां पर गोसीखुर्द प्रकल्प,जिसे नेशनल प्रकल्प घोषित किया गया है,की शुरूआत वर्ष 1983 में हुई। 372 करोड़ रुपये का प्रावधान उस प्रकल्प को पूरा करने के लिए किया गया था,लेकिन आज 34 वर्ष बीत गए हैं,दो पीढ़ियां चली गयी हैं,अभी तक वह प्रकल्प पूरा नहीं हुआ है। हम जो भी प्रकल्प हाथ में लेते हैं,हमें उसकी मर्यादा डिसाइड करनी चाहिए,चाहे वह राज्य सरकार का प्रकल्प हो या केन्द्र सरकार का हो। जब तक हमने इसको डिसाइड नहीं किया,उसमें लगने वाली निधि उपलब्ध नहीं करा दी,तो वह वैसे ही चलता रहेगा और वह भ्रष्टाचार का केन्द्र बन जाता है। आज स्थिति पैदा हो गयी है कि हम वहां के लोगों का,किसानों का पुनर्वसन नहीं कर सके,वहां की सरकार ने भ्रष्टाचार के माध्यम से गोसीखुर्द को भ्रष्टाचार का केन्द्र बना लिया है। सीडब्ल्यूसी जो केन्द्र सरकार की संस्था है,उसकी एक कमेटी ने यह रिपोर्ट दी है कि केन्द्र सरकार ने उस प्रकल्प के लिए जो पैसे दिए,उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। आज भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ...(व्यवधान)मैं बताना चाहता हूं कि देश में इस तरह के जो भी प्रकल्प बनते हैं,वे पानी रोकने के लिए बनते हैं या भ्रष्टाचार के लिए बनते हैं। हम किसान के लिए उनको बनाते हैं या किसान को बर्बाद करने के लिए बनाते हैं। आज इस विषय में कोई निर्णय लेने की जरूरत है। जब तक हम लोग किसी ठोस पर नहीं पहुंचेगे,चर्चा से लाभ नहीं होगा। मैं इससे पहले कई वर्षों तक महाराष्ट्र असेम्बली में रहा हूं,वहां पर ऐसी ही चर्चा होती है। चर्चा व्यर्थ न जाए,चर्चा के माध्यम से हम देश की जनता को न्याय दे सकें,इस तरह से काम होना चाहिए।...(व्यवधान)निश्चित रूप से माननीय नरेन्द्र जी की सरकार जो आज काम कर रही है,इसे पूरा करेगी।
HON. CHAIRPERSON : Nothing will go on record.
(Interruptions) … * HON. CHAIRPERSON: Shri Prem Singh Chandumajra.
PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): Madam, I want to raise a Point of Order.
HON. CHAIRPERSON: Under what Rule?
PROF. SAUGATA ROY : Madam my Point of Order is under Rule 376 and it is with regard to Rule 25.
Madam, at 3.30 p.m. Private Members’ Business will start. The week’s business is coming to an end. It is the rule that the list of Government Business for the coming week is announced. We raise our objections to the lack of it. The Government is running in such a way that on Friday even at 3.25 p.m, there is no list of Government Business for the next week. Nobody knows that what business will be transacted next week.
HON. CHAIRPERSON: It is not mandatory for the Minister of Parliamentary Affairs to make a statement on Government Business. It is only a convention.
श्री प्रेम सिंह चन्दूमाजरा (आनंदपुर साहिब) : अध्यक्ष महोदया, बाढ़ और सूखे की स्थिति पर जो चर्चा हो रही है, शिरामणि अकाली दल की तरफ से मैं उसमें शामिल हो रहा हूं। यह चर्चा 60 वर्ष से हो रही है, उपाय भी किए जा रहे हैं, मगर सच यह कि बाढ़ से होने वाला नुकसान और सूखे से होने वाला नुकसान बढ़ता जा रहा है। इसका कारण मैं यह समझता हूं कि नुकसान को रोकने के लिए कोई परमानेन्ट स्कीम नहीं बनती है, टेम्परेरी अरेंजमेंट होते है। उसका कारण पोलिटिकल भी है, ज़ाती और ज़माती भी है। उसमें मैं नहीं जाना चाहता हूं। मैं अपने प्रदेश पंजाब की बात करना चाहता हूं। जहां देशभर में सबसे कम बारिश हुई है - 58 प्रतिशत। सूखा दो तरह का है, कई जगह बुआई नहीं हुई, कई जगह बुआई हो गयी, फसलों को नहीं संभाला जा सका। उसके जो पैरामीटर्स हैं, उनके हिसाब से मुआवजा दिया जाता है, मगर पंजाब और हरियाणा में सबसे कम बारिश हुई है, मगर सबसे अच्छी फसल है। आज देश में सबसे अच्छी फसल पंजाब में हुई है। उसका कारण यह है कि वहां के किसानों ने 1520 करोड़ रुपए की अतिरिक्त बिजली खर्च की है, 700 करोड़ रुपए का डीजल खर्च किया है और 300 करोड़ रुपए उन्होंने टय़ूबवैल्स को गहरा करने में खर्च किए हैं। इस बारे में हमारे मुख्य मंत्री जी ने केन्द्रीय मंत्री जी को रिपोर्ट दी है। लेकिन अखबार वालों ने माननीय मंत्री जी का बयान छापा कि हमारे पास कोई रिपोर्ट नहीं आई है। हमें इस बात का खेद है। हमारे राज्य के किसान सेंट्रल पूल के लिए 90 प्रतिशत पैदावार की है और खुद हमारे यहां दस प्रतिशत ही खपत होती है। जब हम देश के लिए अनाज पैदा करते हैं तो मैं निवेदन करूंगा कि पंजाब को विशेष पैकेज के रूप में 2350 करोड़ रुपए दिए जाएं। इसके अलावा वहां फसल का नुकसान होने पर 3500 रुपए प्रति एकड़ है,वह बहुत ही कम है। उस बढ़ाकर 20,000 रुपए प्रति एकड़ कम से कम किया जाए।
मैं एक बात बाढ़ की स्थिति पर भी कहना चाहूंगा। मेरा संसदीय क्षेत्र आनंदपुर साहिब है,वह पहाड़ों के नीचे है। वहां पर पहाड़ों का पानी आ जाता है और नदियों में सिल्ट आ जाती है। सिल्ट निकालने के लिए माइनिंग डिपार्टमेंट अनुमति नहीं देता। मैं माइनिंग डिपार्टमेंट और जल संसाधन मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि डीसिल्टिंग का प्रोजेक्ट वहां शुरू किया जाए। यह 288 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट है,जिसकी योजना बनाकर केन्द्र को भेजी गई है। वह पैसा हमें जल्द से जल्द दिया जाए। हिमाचल प्रदेश ने चैनलाइज कर दिया,पंजाब का हिस्सा बच गया है,जिससे पंजाब को नुकसान होता है। इसलिए उस प्रोजेक्ट के लिए हमें पैसा दिया जाए।
डॉ. सत्यपाल सिंह (बागपत) : सभापति महोदया,मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। मैं आज के विषय पर तीन-चार मुद्दे सदन के सामने रखना चाहूंगा। हजारों-लाखों सालों से हमारे पूर्वज यह कहते आए हैं- “यथा पिण्डे,तथा ब्रह्मांडे।” अर्थात् जैसा व्यक्ति के शरीर में होता है,वैसा ही दुनिया में होता है। जब शरीर का अनुशासन बिगड़ जाता है तो कभी उसमें हाई ब्लड प्रेशर होता है,कभी डिप्रेशन होता है और अलग-अलग तरह की बीमारियां होंती हैं। इस देश के अंदर जब से हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना शुरू किया,तब से कहीं बाढ़ आती है और कहीं सूखा पड़ता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि जो हमारे डवलपमेंट प्लानर्स हैं,जो विकास के काम देखते हैं,तो पहले स्कूल और कालेज के विद्यार्थियों को यह बताया जाए कि इन व्यक्तियों में,समष्ति में और सृष्टि में एक सिम्बायोटिक रिलेशनशिप यानि अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।
मैं एक मुख्य बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। पहले हमारे देश में जब आर्गेनिक खेती होती रही,जैविक खेती होती रही,तब तक पानी की आवश्यकता खेतों में बहुत कम थी। तब अगर गेहूं की खेती के लिए तीन बार पानी की जरूरत पड़ती थी,आज कम से कम पांच या छः बार जरूरत पड़ती है। अभी हमारे माननीय सदस्य पंजाब की बात कर रहे थे। हम इतना पेस्टिसाइड्स,फर्टिलाइजर यूज करते हैं कि उससे खेतों में पानी देने की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है। दूसरी बात यह हुई है कि एक तो जल स्तर बहुत नीचे चला गया और दूसरे बीमारियां काफी पैदा होने लग गई हैं। एक अमेरिकन लेडी प्रोफेसर ने किताब में लिखा है -How the other half dies. उसमें उन्होंने बताया है कि इंडियन एग्रीकल्चर की पालिसी तैयार हुई है,वह किस प्रकार से तैयार हुई है। किस प्रकार से आधे लोगों को भूखा मारा जा रहा है। हमारी एग्रीकलचर पालिसी कितनी गड़बड़ है,इस पर हमें ध्यान देना चाहिए।
यह दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के 67 साल बाद भी हमारा पेस्टिसाइड एक्ट है, 350 पेस्टिसाइड्स मोलीक्यूल बनाए गए,लेकिन आज तक एक भी इंडियन मोलीक्यूल इस देश में डवलप नहीं किया गया। इसके पीछे एक बहुत बड़ा षडय़ंत्र है। इसलिए इस पेस्टिसाइड एक्ट को सही करने की जरूरत है।
इंडियन इंस्टिटय़ूट आफ डिसास्टर मेनेजमेंट की रिपोर्ट है,जिसमें उन्होंने बुंदेलखंड के बारे में कहा है। उसमें कहा है जो डिसास्टर्स होते हैं,वे क्लाइमेटिक चेंज के कारण नहीं हैं,इसके पीछे व्यक्ति कारण है,ये मैन मेड हैं। एक बहुत अच्छी किताब आई है। Shri P. Sainath has written a book by name “Let Us Have a Good Drought.” जितना अच्छा सूखा पड़ेगा,उतना ही अच्छा है। जो ब्यूरोक्रेट्स हैं,कुछ नेता हैं,जो इस काम में लगे हुए हैं,हमें चेंज करने की जरूरत है।
मेरे बागपत संसदीय क्षेत्र में जिस प्रकार से युकिलिप्टस का प्लांटेशन किया गया है,उससे जमीन के पानी का स्तर कम से कम दस मीटर और नीचे चला गया है। हमें सोचने की जरूरत है कि किस प्रकार का प्लांटेशन किया जाए,किस प्रकार के टय़ूबवैल्स और बोरवैल्स बनाए जाएं कि पानी का जब इतना ज्यादा दोहन होता है कि वह बहुत नीचे चला गया। इससे मेरे क्षेत्र बागपत में छः ब्लाक्स में से पांच ब्लाक्स डार्क जोन हो गए हैं। अभी कोई नया कनेक्शन नहीं मिल रहा है। एक तरफ सूखा पड़ता है,दूसरी तरफ लोगों को कनेक्शन नहीं मिलता है। जिन लोगों के पास कनेक्शंस हैं,उनसे प्रदेश सरकार बागपत में कहती है...(व्यवधान)
HON. CHAIRPERSON: Please conclude. It is going to be time for the Private Members’ Business.
डॉ. सत्यपाल सिंह : मैडम मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। गीता में यह लिखा हुआ है और सब लोग इस बात से सहमत होंगे कि अच्छे बादल जो बनते हैं वे यज्ञ से बनते हैं, अच्छे बादल नहीं होंगे तो अच्छी बारिश कैसे हो सकती है? जब वातावरण शुद्ध होगा तो बीमारियां दूर होंगी,अच्छी फसलें होंगी और अच्छे बादल भी बनेंगे।
SHRI MALLIKARJUN KHARGE (GULBARGA): Madam Chairman, will the hon. Minister tell us what would be the business in the House next week? We are unable to know what would be discussed on Monday and which Bills would be considered. The Members have to prepare themselves in advance in order to be able to present their own case on the Bills or other matters that would be taken up. Neither a meeting has been called today nor are we being informed of the next week’s agenda. How should we proceed in such a situation? … (Interruptions)
If we raise a point of order under Rule 25, you say it is not mandatory, it is only a convention. You do not follow convention, you do not follow rule. Then what should be done, please tell us? … (Interruptions)
PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): The Minister of State for Parliamentary Affairs is sitting here quietly. Let him make a statement. … (Interruptions) How can the House run this way? Let him call a senior Minister. … (Interruptions)