Lok Sabha Debates
Discussion On The Demand For Grant No. 66 Under The Control Of The Ministry Of Mines ... on 16 March, 2011
> Title: Discussion on the Demand for Grant No. 66 under the control of the Ministry of Mines (Discussion not concluded).
MR. DEPUTY-SPEAKER: The House will now take up discussion and voting on Demand No. 66 relating to the Ministry of Mines.
Cut Motions to the Demand for Grant by Shri Hansraj Gangaram Ahir and Shir Sk. Saidul Haque have been circulated. Hon. Members may, if they desire to move their cut motions, send slips to the Table within 15 minutes indicating the serial numbers of the cut motions they would like to move. Only those cut motions, slips in respect of which are received at the Table within the stipulated time, will be treated as moved.
A list showing the serial numbers of cut motions treated as moved will be put up on the Notice Board shortly thereafter. In case the hon. Members find any discrepancy in the list, they may kindly bring it to the notice of the Officer at the Table immediately.
“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2012, in respect of the head of Demand entered in the second column thereof against Demand No. 66 relating to the Ministry of Mines .” Demands for Grants –Budget (General) for 2011-2012 submitted to the vote of the Lok Sabha No. Name of the Demand Amount of the Demand for Grants submitted to the vote of the House 1 2 3 Revenue (Rs.) Capital (Rs.) 31 Ministry of Mines 614,97,00,000 39,21,00,000 श्री संजय निरुपम (मुम्बई उत्तर): आदरणीय उपाध्यक्ष जी, मैं आपका बहुत अभारी हूं कि आपने मुझे बोलने की अनुमति दी। मैं आज खान मंत्रालय के मांगों की अनुदान के संदर्भ में, यहां पर समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं समर्थन इसलिए करना चाह रहा हूं क्योंकि खान मंत्रालय एक बहुत ही महत्वपूर्ण मंत्रालय है और खान मंत्रालय के माध्यम से पूरे देश में जो हमारी खनिज संपदा है उसके नियमन, उसके जतन और उसके खनन का काम जारी होता है। हमारा देश इस समय एक प्राइवेटाइज्ड इकोनॉमी के दौर से गुजर रहा है। यहां पर जो औद्योगिक विकास है, वह अलग-अलग क्षेत्रों से समर्थन प्राप्त करके, ताकत प्राप्त करके बहुत तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में खान मंत्रालय का, खनिज पदार्थों का, खनिज संपदा का बहुत बड़ा योगदान रहता है। लेकिन खनन के साथ-साथ कहीं न कहीं हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि चुनौतियां क्या हैं?
खनन के साथ साथ हमें कहीं न कहीं इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि चुनौतियाँ क्या हैं। मसलन, जब हम खानों में खुदाई करते हैं तो जंगल पर असर पड़ता है, पर्यावरण पर असर पड़ता है और जो स्थानीय निवासी होते हैं, विशेषकर जिसमें आदिवासी समाज के लोग होते हैं, उनके जीवन पर भी बुरा असर पड़ता है। उन चुनौतियों को सामने रखते हुए, उन चुनौतियों को देखते हुए खान मंत्रालय को आने वाले दिनों में अपना कामकाज जारी रखना पड़ेगा। मुझे बहुत आनन्द हो रहा है यह बताते हुए कि विशेषकर पिछले दो वर्षों में खान मंत्रालय ने बहुत गंभीरता से, बहुत ही ज़िम्मेदारीपूर्वक इस दिशा में काम प्रारंभ किया है। यही वजह है कि अगर आप 2010-11 के खान मंत्रालय की रिपोर्ट देखें तो लगभग दो लाख करोड़ रुपये का योगदान है हमारे जीडीपी को। दो लाख करोड़ रुपये के योगदान का अर्थ यह हुआ कि लगभग 2.26 प्रतिशत का जीडीपी को योगदान है जो आगे बढ़कर तीन-चार प्रतिशत भी हो सकता है। यानी देश के औद्योगिक विकास को आगे लेकर जाने के लिए खान मंत्रालय का अपना योगदान है और खान मंत्रालय के कामकाज को और गति देने की आवश्यकता है।
हमारे देश में इस वक्त लगभग 87 ऐसे मिनिरल्स हैं जिनका खनन हो रहा है। उसमें विशेषकर 60-62 के आस-पास ऐसे मिनिरल्स हैं जो खान मंत्रालय के अधीन आते हैं। कोयला अलग है, लिग्नाइट अलग है, पैट्रोलियम मिनिरल्स अलग हैं, एटॉमिक मिनिरल्स अलग हैं, लेकिन इनके हिस्से जो भी मिनिरल्स आ रहे हैं, बहुत अच्छे ढंग से उनका एक्सप्लोरेशन हो रहा है, उनका पता लगाया जा रहा है, उसके बाद उसका एक्सकैवेशन हो रहा है, एक्स्ट्रैक्शन हो रहा है। यह सब करते हुए जब खान मंत्रालय ने इस बार वित्त मंत्री महोदय से अपनी डिमांड रखी, अपना आउटले मांगा तो पिछले साल की तुलना में, जहाँ पिछले साल 1100 करोड़ रुपये के आसपास आउटले था, इस साल बढ़कर 1589 करोड़ 42 लाख रुपये हुआ। मैं इसके लिए वित्त मंत्री महोदय को बधाई देना चाहूँगा कि उन्होंने खान मंत्रालय की इस पूरी मांग को समझा और उसे आगे बढ़ाया। लेकिन खान मंत्रालय के आउटले को बढ़ाने के साथ साथ, खान मंत्रालय के अंदर की जो समस्याएँ हैं, उनको भी समझना आवश्यक है। पिछली दो-तीन स्टैन्डिंग कमेटीज़ ने खान मंत्रालय के कामकाज पर जो टिप्पणी की है, मैं चाहूंगा कि मैं उसकी चर्चा करूँ। विशेषकर नाल्को और जीएसआई के कामकाज के संबंध में जो काम चल रहा है, वह बहुत अच्छा नहीं है, बहुत ज्यादा संतोषप्रद नहीं है। दिसम्बर 2009 में स्टैन्डिंग कमेटी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा - The Committee also commented on the under-utilisation of funds allotted to NALCO and GSI, and the Committee reported that only 38 per cent of the allocated fund was utilised. मुझे लगता है कि इसको मंत्रालय को गंभीरता से लेना चाहिए। माननीय मंत्री महोदय यहाँ पर बैठे हैं। जीएसआई की समस्या यह है कि नई-नई टैक्नोलॉजी आ रही है, नई विधाएँ आ रही हैं, उसका इस्तेमाल होना चाहिए, उसका ज्यादा से ज्यादा प्रयोग होना चाहिए। यह बहुत ज्यादा चौंका देने वाली बात है कि हमारे यहाँ जीएसआई यह कहती है कि जियोलॉजिस्ट्स की बहुत कमी है। 1500 पद जीएसआई में जियोलॉजिस्ट्स के खाली पड़े हैं। उन्होंने शायद एचआरडी में बात भी की है, यूपीएससी के संपर्क में आए हैं कि ज्यादा से ज्यादा जियोलॉजिस्ट्स की नियुक्ति होनी चाहिए, एचआरडी मिनिस्ट्री को कहा गया है कि अलग-अलग युनिवर्सिटीज़ में, अलग-अलग शिक्षण संस्थानों में जियोलॉजी की पढ़ाई बढ़ायी जानी चाहिए ताकि ज्यादा प्रशिक्षित इंप्लाइज़ हमें मिल सकें। इस दिशा में काम आगे बढ़ाने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है, ऐसा मुझे लग रहा है।
नाल्को एक बहुत अच्छी और बहुत बड़ी कंपनी है, लगभग 5000 करोड़ रुपये की कंपनी है। मुझे बड़ी खुशी होती है कि नाल्को का बाल्को नहीं हुआ। जब एनडीए के ज़माने में डिसइनवैस्टमैंट का राक्षस पूरे देश में घूम रहा था, तब यह नाल्को बेचारा बच गया, लेकिन आज नाल्को बहुत अच्छे ढंग से काम कर रहा है और बहुत अच्छे ढंग से प्रॉफिट में भी है। इस नाल्को को और ताकत देने की आवश्यकता है। उनके पास जो अलग अलग बॉक्साइट के माइन्स हैं, उनको अख्तियार करने और उसमें खनन की प्रक्रिया शुरू करने, उसके अलावा उनको जो कोल माइन्स चाहिए अपना कैप्टिव पावर यूनिट बनाने के लिए, उस दिशा में काम आगे बढ़ाने के लिए उनको जो अड़चनें आ रही हैं, उन अड़चनों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। विशेषकर राज्य सरकारों से उनको जो एनओसी और अनुमति मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है जिसकी वजह से उन्हें तकलीफ़ हो रही है। यह मंत्रालय के अंदर की एक-दो छोटी-मोटी समस्याएं हैं जिन पर मैंने ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है।
मैं मंत्री महोदय के सामने एक और चिन्ता व्यक्त करना चाहता हूँ कि हमारे जो टार्गैट्स हैं खान मंत्रालय के दोनों पब्लिक सैक्टर यूनिट्स के, वह हम कहीं न कहीं अचीव नहीं कर पा रहे हैं। 2009-10 में हमारा टार्गैट यह था कि 55,80,000 मीट्रिक टन बॉक्साइट निकालना था नाल्को को। जो एक्चुअल्स आए, वह 47,87,888 मीट्रिक टन हुआ। यानी कहीं न कहीं हम अपने टार्गैट्स को अचीव नहीं कर पाए। इस साल भी हमने जो टार्गैट रखा है, 2010-11 में जो टार्गैट रखा था, वह 49,80,000 मीट्रिक टन के आसपास था। जनवरी 2011 तक हमने जो टार्गैट अचीव किया है, वह 39,31,015 मीट्रिक टन है। यही हाल एचसीएल का भी है। खान मंत्रालय के इन दोनों महत्वपूर्ण पब्लिक सैक्टर यूनिट्स के कामकाज को और चुस्त-दुरुस्त और तेज़ किया जाए, इसके लिए मैं मंत्री महोदय से निवेदन करूँगा। क्योंकि कहीं न कहीं इनकी बहुत बड़ी भूमिका बन जाती है खनन और खनिज संपदाओं का एक्सट्रैक्शन और खनन करने में, तथा पूरे देश के औद्योगिक विकास की दिशा में उनका बहुत बड़ा योगदान हो जाता है। इस दिशा में सरकार को काम करना चाहिए।
महोदय, पूरे खान मंत्रालय को रेगुलेट करने के लिए हमारे यहाँ तीन-चार लैजिस्लेशन्स हैं। मुख्य तौर पर हमारे यहाँ 1957 का एक कानून है माइन्स एंड मिनिरल्स रेगुलेशन अमैंडमैंट एक्ट। खनन के क्षेत्र में इतनी सारी गतिविधियाँ हो रही हैं, पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था के काम करने का तरीका बदल गया है, लेकिन अभी भी हम उसी कानून के तहत काम कर रहे हैं जो निश्चित तौर पर चिन्ता की बात है। मुझे ऐसा बताया गया है कि माइन्स एंड मिनिरल्स रेगुलेशन अमैंडमैंट बिल 2011 के नाम से एक नया अमैंडमैंट बिल लाने की सरकार सोच रही है और वह शायद जीओएम के पास है। मैं चाहूँगा कि वह बिल जल्दी लाया जाए और उस बिल के माध्यम से खनन क्षेत्र में जो चुनौतियाँ हैं, जो समस्याएँ हैं, उन समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने की दिशा में काम करना चाहिए।
मुख्य तौर पर देखा जाए तो खानों के आस-पास जो स्थानीय लोग रहते हैं जहाँ खनिज संपदाएँ हैं, उन लोगों का भी हक बनता है, लोगों के जीवन को सुरक्षित रखने का उनका हक बनता है। इस नये बिल में इस प्रकार का प्रावधान अवश्य होना चाहिए और यह प्रावधान रखने की दिशा में मेरे ख्याल से सरकार सोच भी रही है कि लगभग 25 से 26 प्रतिशत के आस-पास हिस्सेदारी स्थानीय लोगों की होनी चाहिए। आप स्वयं झारखंड जैसे प्रांत से हैं जहाँ प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा उपलब्ध है। ऐसे में आदिवासी समाज का समर्थन करने के लिए, आदिवासी समाज को सहयोग देने के लिए, उनको संरक्षण देने के लिए मुझे लगता है कि इस बिल में यह विशेष प्रावधान बहुत आवश्यक है। इस विशेष प्रावधान के साथ-साथ माइन्स एंड मिनिरल्स के क्षेत्र में कंपीटीटिवनैस लाने की आवश्यकता है, ट्रंसपेरेन्सी लाने की आवश्यकता है, पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। तकलीफ़ यह है कि हमारे यहाँ की तमाम जो खनिज संपदाएँ और खान हैं, हमारे देश में सैन्ट्रल गवर्नमैंट उसको रैगुलेट करती है लेकिन उसको लीज़ पर देने का जो अधिकार है, वह राज्य सरकारों के पास है। राज्य सरकार ज्यादा से ज्यादा केन्द्र सरकार से अनुमति मांगती है कि हम यह पीस ऑफ लैन्ड खनन के लिए फलां-फलां कंपनी को देना चाहते हैं। सैन्ट्रल गवर्नमैंट उसको परमीशन देती है। उसके बाद पर्यावरण मंत्रालय से एक अनुमति मांगी जाती है। पर्यावरण मंत्रालय भी अगर सब कुछ ठीक है, तो अनुमति देता है। इन दोनों एनओसीज़ के समय सरकार के दोनों मंत्रालयों को विशेष तौर पर ध्यान देना चाहिए कि ट्रंसपेरेन्सी हो, लोगों के जीवन पर बुरा असर न पड़े, इस बात का भी ख्याल रखने की आवश्यकता है। खनन क्षेत्र में तरक्की और प्रगति भी होनी चाहिए। उसको रोकने की भी आवश्यकता नहीं है। नये बिल के माध्यम से इस प्रकार का प्रयास हो रहा है। मैं इसका समर्थन करता हूँ।
हमारे यहाँ 1993 में एक नेशनल मिनिरल पॉलिसी बनाई गई थी। उसी समय अर्थव्यवस्था को खोला गया था, उसी समय यह पॉलिसी आई। उस पॉलिसी का एक मूल उद्देश्य मैंने देखा कि जो एफडीआई होता है, जो विदेशी निवेश होता है, उसके ऊपर ज्यादा ज़ोर दिया गया और बड़े पैमाने पर विदेशी कंपनियों के साथ जॉइंट वैन्चर करके हमारे देश में जो हमारी स्थानीय कंपनियाँ हैं, उन कंपनियों ने खनन के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया है। उसके बाद नेशनल मिनिरल पॉलिसी में मैं यूपीए सरकार को बधाई देना चाहूँगा कि जब यूपीए-1 आई और जब खान मंत्रालय की लगातार उपेक्षा हो रही थी तो यूपीए1 ने 2008 में एक और विस्तृत तथा कंप्रिहैन्सिव किस्म की पॉलिसी बनाई। उस पॉलिसी के माध्यम से माइन्स एंड मिनिरल्स के क्षेत्र में और भी बेहतर ढंग से कैसे काम किया जाए, उसका प्रयास किया गया। उस प्रयास के तहत राज्य सरकारों को ज्यादा ताकत दी गई। 2008 की पॉलिसी के तहत राज्य सरकारों को कहा गया कि ज्यादा ताकत आपके पास है इसको लीज़ के राइट्स देने के लिए और उसका नियमन करने के लिए। इस क्षेत्र में उस पॉलिसी के माध्यम से कुछ ज्यादा प्रयास किया गया।
लेकिन वर्ष 2008 के बाद से हमारे देश में समस्याएं पैदा हुई हैं, जो कि चिंता की बात है, वह जो चिंता है, उसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूं। वह चिंता अवैध खनन से जुड़ी हुई है। हमारे देश में जो इल्लीगल माइनिंग चल रही है, वह बहुत बड़ी चिंता की बात है। कर्नाटक, उड़ीसा और झारखण्ड में तेजी से...( व्यवधान) महाराष्ट्र भी हो सकता है।...( व्यवधान) सवाल महाराष्ट्र या कर्नाटक का नहीं है, सवाल इस देश का है। इस देश की महत्वपूर्ण खनिज संपदा के साथ खिलवाड़ हो रहा है। कुछ खनिज संपदा के ऊपर सरकारों का अपना नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रहा है। यह अपने आप में चिंता की बात है। अलग-अलग राज्यों की बात करें तो एक राज्य में यह बहुत ज्यादा हो रहा है। इस देश का नागरिक होने के नाते मैं चिंता व्यक्त करना चाहता हूं, अन्य राज्यों में क्या हो रहा है और वहां की सरकार क्या कर रही है? वह अलग बात है। लेकिन कर्नाटक में वहां के मुख्यमंत्री महोदय ने स्वयं स्वीकार किया है। विधान सभा में जब यह विषय उठा...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : इनकी बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।
...( व्यवधान)* उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : इनकी बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।
...( व्यवधान) * उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग बैठ जाइए, वे भी बैठ गए हैं।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, मैं बहुत विनम्रतापूर्वक अपनी बात रखना चाहता हूं कि यह मैं नहीं कह रहा हूं, विधान सभा में कर्नाटक के माननीय मुख्यमंत्री महोदय ने इस सवाल के ऊपर खुद बयान दिया है। इसलिए इस बयान की गंभीरता को समझना चाहिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपको भी बोलने का मौका मिलेगा।
…( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : मैं अपनी तरफ से नहीं कह रहा हूं।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप कर्नाटक का मामला छोड़कर बोलिए, उसे लास्ट में बोलिएगा।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया बैठ जाइए। आपनी बात बाद में बताइगा।
…( व्यवधान)
SHRI SANJAY NIRUPAM : The Chief Minister of Karnataka had admitted on the floor of the Karnataka Assembly that out of a total 30 million tonnes of iron ore export in 2009-10, transportation permit was issued only for 7.12 million tonnes. … (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया आप लोग बैठ जाइए।
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : निरूपम जी के अलावा किसी की बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।
...( व्यवधान) * श्री संजय निरुपम (मुम्बई उत्तर): ठीक है, जब आप बोलेंगे, तब हम सुनेंगे, लेकिन यह किसी राज्य का प्रश्न नहीं है, यह देश का प्रश्न है। देश के किसी एक हिस्से में...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।
...( व्यवधान) * THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS, MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PERSONNEL, PUBLIC GRIEVANCES AND PENSIONS AND MINISTER OF STATE IN THE PRIME MINISTER’S OFFICE (SHRI V. NARAYANASAMY): Mr. Deputy-Speaker, Sir, their Party Member is going to speak. If whatever the hon. Member has said is wrong, he can counter it. Why is he disturbing the Member when he is speaking? … (Interruptions)
He is quoting from the record. When you get your time, you reply to his point. When BJP Members are going to speak, you speak. You counter him when you speak.… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय: आपको जब बोलने का मौका मिलेगा, तब आप बोलिए। अभी आप बैठ जाइए।
SHRI SANJAY NIRUPAM : Let me give the details of illegal iron ore transported in Karnataka as reported by the hon. Chief Minister. डिटेल्स क्या हैं? यह एक दिन की बात नहीं है, माफ करिए, मैं किसी एक सरकार, एक व्यक्ति की बात नहीं कर रहा हूं। कर्नाटक में जो परमिशन दिए गए थे।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: आपको जब बोलने का मौका मिलेगा, तब आप बोलिए।
श्री संजय निरुपम : मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: माननीय सदस्य कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं, कोट कर रहे हैं।
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं, मैं अपने देश के एक माननीय मुख्य मंत्री जी के बयान को पढ़ कर सुना रहा हूं।...( व्यवधान) मुख्य मंत्री जी ने जो डिटेल दी हैं, details of iron ore exported from the State. सबसे पहले खनन करने के लिए परमिट कितने दिए गए - 4,70,43,196 टन का एक परमिशन था और एक्सपोर्ट 7,75,33,923 टन हो गया। मतलब, लगभग तीन करोड़ टन ऑयरन-ओर इस देश से दुनिया के किसी अन्य देश में चला गया, एक्सपोर्ट हो गया और ये सब कर्नाटक में हुआ। मेरे साथी, मैं अपनी तरफ से कुछ भी नहीं बोल रहा हूं, जो मुख्य मंत्री जी ने बातें कही हैं, वे सारी बातें आपके सामने रख रहा हूं। लगभग तीन करोड़ टन ऑयरन-ओर कर्नाटक से over a period of time, ये मैं नहीं बोल रहा हूं, पिछले दो साल में हुआ है।...( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: No, please sit down.
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: माननीय सदस्य ने कोट किया है, कोई आरोप नहीं लगाया है।
…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: It is not going on record.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down.
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: आपको जब बोलने का मौका मिलेगा, तब आप बोलिए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: कृपया आप बैठ जाएं, आपकी कोई बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।
...( व्यवधान) * श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, लगभग 3,4,90,727 टन ऑयरन-ओर कर्नाटक से इल्लिगली एक्सट्रेक्शन हुआ और उसके बाद वह एक्सपोर्ट हो गया। उसकी अगर हम कीमत निकालते हैं तो लगभग 11,433 करोड़ रुपए की खनिज सम्पदा इस देश से कहीं और चली गई।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय, इस बारे में बाकायदा एक सेंट्रल ऐम्पॉवर्ड कमेटी बनी। उस कमेटी ने अपनी फाइंडिंग्स दीं। कर्नाटक के जो लोकायुक्त हैं, उन्होंने अपनी रिपोर्ट दी। उन्होंने बताया कि बेल्लारी में लगभग सात ऐसी माइन्स हैं, जहां से कंटीन्यूअस अर्थात् नियमित तौर पर इल्लीगल माइनिंग चल रही है। मैंने प्रारम्भ में कहा था कि लीज देना, ...( व्यवधान) सर, यह कर्नाटक के लोकायुक्त महोदय की रिपोर्ट है। मेरी रिपोर्ट नहीं है। हो सकता है, लोकायुक्त गलत हों, मैं मान सकता हूं, लेकिन रिपोर्ट तो लोकायुक्त की है। अगर यह मेरी रिपोर्ट होती, तो मैं मान लेता और वापस भी ले लेता। यह लोकायुक्त की रिपोर्ट है, जिसमें उन्होंने कहा कि लगातार इल्लीगल माइनिंग चल रही है। इल्लीगल माइनिंग से कितना नुकसान हो रहा है, वह मैंने अभी बताया । मैंने प्रारम्भ में एक बात कही थी कि सेंट्रल गवर्नमेंट की अपनी एक बहुत ही सीमित भूमिका होती है। सेंट्रल गवर्नमेंट ज्यादा से ज्यादा एन.ओ.सी. दे सकती है, उसके बाद जो खान को एलॉट करना, खनन किस तरीके से हो रहा है, उसे देखना, उसमें इल्लीगल खनन हो रहा है या नहीं, यह देखना आदि ये सारे राज्य सरकार के काम हैं। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया टोका-टोकी न करें। श्री संजय निरूपम के अतिरिक्त किसी भी माननीय सदस्य का भाषण रिकॉर्ड में नहीं जाएगा।
…( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, अब मैं निवेदन करूंगा सुषमा जी कि जरा आप अपने साथियों को समझाएं कि वे चुप रहें और सुनने की क्षमता तथा सहनशीलता रखें। मैं भी सुनूंगा और हम सब आपको सुनेंगे। सी.सी. रिपोर्ट क्या कहती है, वह मैं आपको पढ़कर सुनाता हूं। वह रिपोर्ट कहती है कि-
“Report of a fact finding three member Committee of AP Government and DFO, Anantapur notice clearly indicate that actual on-ground excavations are not tallying with the permits issued by the Department of Mines and Geology of Andhra Pradesh and material moved out of Andhra Pradesh.” महोदय, आंध्र प्रदेश का नाम क्यों आ रहा है। यह भी समझने की जरूरत है। बेल्लारी की जो माइंस हैं, वे बॉर्डर एरिया में हैं। माइंस कर्नाटक के क्षेत्र में हैं और वहां से मिनरल्स निकाल कर आंध्र प्रदेश की तरफ भेजे जाते हैं। एक ट्रक में 15 टन आयरन ओर आ सकता है, लेकिन उसमें 30-30 टन आयरन ओर ढोया जा रहा है। माइंस से लेकर शहर तक, जिस रास्ते से ट्रक जाते हैं, उन्हें आप देख लीजिए, सब रास्ते तहस-नहस हो गए हैं। आज मुझे कुछ साथी बता रहे थे कि उन रास्तों से यदि गाड़ियों में बैठकर निकलें, तो आपकी रीढ़ की हड्डी टूट जाएगी। यह एक दिन से नहीं चल रहा है, बल्कि वर्षों से चल रहा है और पिछले दो-तीन वर्षों से बहुत बड़े पैमाने पर चल रहा है। दो-तीन वर्षों से कौन लोग कर रहे हैं, क्या कर रहे हैं, यह जानकारी आपको भी है, हमें भी है। मैं चाहूंगा कि एक मर्यादा के तहत उन बातों को सामने लाया जाए और सदन में उन पर चर्चा हो। मैं चाहूंगा कि सदन उसका संज्ञान ले, सरकार उसका संज्ञान ले और देश उसका संज्ञान ले। सी.सी. रिपोर्ट ने एक पूरी जानकारी निकाली, उसमें एक कंपनी को पाया, जिसका नाम है ओबुला पुरम माइनिंग कंपनी। यह ओबुला पुरम माइनिंग कंपनी, किस व्यक्ति की है, अगर जानकारी न हो, तो मैं बता देना चाहूंगा कि ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप कंपनी का नाम मत लीजिए।
श्री संजय निरुपम: मैं नाम नहीं ले रहा हूं, लेकिन यह जो कंपनी है, ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइए। किसी का नाम नहीं लिया है। कंपनी का नाम बताया है और कंपनी का नाम बताया जा सकता है।
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, मैंने किसी का नाम नहीं लिया है। मैंने केवल कंपनी का नाम बताया है। यह जो माइनिंग कंपनी है, उसके मालिक कर्नाटक में एक मंत्री हैं। मैं, नाम नहीं बता रहा हूं। ये मंत्री महोदय वर्ष 2001 तक एक लाख रुपए के मालिक थे। वर्ष 2003 में उन्होंने 2 लाख रुपए का इन्कम टैक्स रिटर्न भरा है और आज 3 हजार करोड़ रुपए कमा लिए हैं। इतनी जबर्दस्त विकास दर तो मुझे लगता है कि मुम्बई के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हाउसेस की भी नहीं है। मुझे यह बताने में कोई शर्म नहीं आ रही है। मुझे शर्म नहीं आ रही है, बल्कि मुझे एक चिन्ता जताना है कि आखिर इतनी तेजी से क्या वैध तरीके से, वैधानिक तरीके से धन कमाया जा सकता है? पूरी बेल्लारी में जितनी भी माइन्स हैं, उन माइन्स से अगर खनन होता है, तो बगैर इन मंत्री महोदय के इशारे या परमीशन के उसका ट्रंसपोर्टेशन नहीं हो सकता है।
हफ्ता वसूली होती है और प्रति दिन 15 से 20 करोड़ रुपए की इस कंपनी की कमाई है। अपनी माइंस और दूसरों की माइंस, सभी से कमाई हो रही है। अपनी माइंस में परमिट मान लीजिए 100 टन का है, लेकिन प्रति दिन 500 टन का खनन चल रहा है, कोई रोक-टोक नहीं है, कोई चैक नहीं है। ट्रंसपोर्ट कंपनी स्टेट गवर्नमेंट की है। रोड ट्रंसपोर्ट स्टेट गवर्नमेंट की। सारी चैक पोस्ट स्टेट गवर्नमेंट की हैं और एक पोर्ट से यह नहीं हो रहा है। मैं आप कहें, तो मैं पूरी रिपोर्ट पढ़ कर सुना देता हूं- गोआ का पोर्ट है, चेन्नई का पोर्ट है, विशाखापट्टनम का पोर्ट है। इन पोर्टों के जरिए कहां-कहां आयरन ओर भेजा जा रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि सबसे ज्यादा चायना भेजा जा रहा है।
महोदय, कल चायना के खतरे के ऊपर बहुत बताया गया कि साहब, चायना पूरे हिन्दुस्तान को निगल लेगा और उस चायना के साथ अवैध संबंध रखने वाले, उस चायना के साथ अवैध धंधा करने वाले कर्नाटक में मंत्री हैं। जब पूरे खनन के दरम्यान सिर्फ माइंस निकाल रहे हैं, ऐसा नहीं है, सिर्फ आदिवासियों के घर तबाह कर रहे हैं, ऐसा नहीं है, बल्कि 400 साल पुराना एक मंदिर तोड़ डाला। सरकार ने कहा, नहीं मंदिर नहीं तोड़ा, बकवास है। मैं नाम नहीं ले रहा हूं। Ironically, the Director of OMC has filed a sworn affidavit before the High Court of Karnataka in a related case arguing that the temple was in the leased area of OMC. आप कहेंगे कि यह बकवास है। मैं बताना चाहता हूं कि वह 400 साल पुराना मंदिर आज वहां नहीं है। ये लोग मंदिर की राजनीति करने वाले हैं। ये हिन्दुत्व की बात करने वाले लोग हैं। पूरे देश में मंदिर के नाम पर आग लगाने वाले ये लोग हैं और वहां एक मंदिर को नहीं बख्शा। ...( व्यवधान)
माननीय उपाध्यक्ष महोदय, अब ओ.एम.सी. कंपनी के जो मैन डायरैक्टर हैं, कर्नाटक के मंत्री महोदय, वे एक कंपनी में डायरैक्टर हैं, जो कि सिंगापुर में रजिस्टर्ड है। GLA Trading International Private Limited is the company to which all the illegal exports have been made. A new Director, Nayan Agarwal was appointed on 28th January, 2010 after this scam became public. The GLA Trading International Private Limited had a paid up capital of one Singapore dollar and its present paid up capital is only 201 Singapore dollars. The company is registered as an entertainment and food and beverages company. This entertainment company having a capital of 201 Singapore dollars is importing iron-ore worth US $ 15 crore. एंटरटेनमेंट कंपनी आयरन ओर एक्सपोर्ट कर रही है। ...( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, हमें तो ठीक से बोलने भी नहीं दिया गया। बीच-बीच में काफी टोका-टोकी की गई।
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त कीजिए। आपको बोलते हुए आधा घंटा हो गया।
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, एक एंटरटेनमेंट कंपनी जो सिंगापुर बेस्ड है। वह 15 करोड़ डॉलर का आयरन ओर एक्सपोर्ट कर रही है और उस कंपनी के जो डायरैक्टर हैं वे कर्नाटक के एक माननीय मंत्री महोदय हैं। उसके बारे में एक रिपोर्ट आती है कि The only shareholder of GLA Trading International Private Limited earlier besides this Minister was Inter-Link Services Group Limited, a company which is registered in British Virgin Island.
उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, आप कृपया डिमांड पर बोलिए।
श्री संजय निरुपम : ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड मतलब क्या हुआ। मैं माइंस की डिमांड पर ही बोल रहा हूं। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : उपाध्यक्ष जी, ऐसी तीन फर्जी कंपनियां, जो कि दुबई और सिंगापुर में रजिस्टर्ड हैं, उनमें कहीं न कहीं डायरैक्टर कर्नाटक के मंत्री महोदय हैं। तीन-चार दिन पहले खबर आई कि सिर्फ वर्जिन आइलैंड में ही इनके एकाउंट्स नहीं है, बल्कि आइल ऑफ मैन में भी इनके एकाउंट्स हैं। यह जो काला धन, काल धन चल रहा है, सबसे पहले तो ये अपने मंत्री को बोलें कि अपना काला धन हिन्दुस्तान में लाएं। सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा। 400 बिलियन डॉलर और 500 बिलियन डॉलर की जो कहानी आ रही है, ये यही तो सोर्सेस हैं। स्रोत कहां है। इस प्रकार देखें, तो ये माननीय मंत्री महोदय इल्लीगल माइनिंग के सरताज हैं, बेताज बादशाह हैं।
इनके खिलाफ 9 एन.बी.डब्लू. हैं, नॉन बेलेबल वारंट्स हैं।...( व्यवधान)
एक माननीय सदस्य: मंत्री पर?...( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : जी हां, मंत्री पर। There are nine Non-Bailable Warrants (NBW) against this Minister. It is stated :
“On 18 September, 2006, (Interruptions) …* Tumti Mines Company (TMC) had lodged a complaint with the Torangal, Karnataka Police that Mr. Minister alongwith an accomplice had led a team to blast the tri-junction point on the Karnataka-Andhra border and encroached upon mines belonging to TMC...” उपाध्यक्ष महोदय : नाम रिकार्ड में नहीं जायेगा।
श्री संजय निरुपम : “...The court of Sandur First Class Judicial Magistrate issued a non-bailable arrest warrant on 30 December 2009 for non-appearance before court…” उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री संजय निरुपम : आज तक 10 बार कोर्ट से ऑर्डर हुआ है कि आप कोर्ट में एप्पियर होइये। इतनी बड़ी चाल, चरित्र और चिन्तन वाली पार्टी है, लेकिन उसके मंत्री आज तक कोर्ट में एप्पियर नहीं हुए। अभी मेरे पास बहुत कुछ है, लेकिन मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा।
मैं आखिरी मुद्दे पर आता हूं। आखिरी मुद्दा यह है कि अब इन मंत्री जी का मामला क्या है। क्यों इन मंत्री जी को नहीं...( व्यवधान) इन मंत्री जी का एक बयान आता है। इन मंत्री जी का एक बयान पढ़ने को मिला है:
“My entry into politics is purely accidental. I will always be a businessman first, but it is my childhood friend (Interruptions) … *… who is the politician, he says recounting the often told story of (Interruptions) … * emotional connection with (Interruptions) … * …” उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें। बैठ जाइये।
श्री संजय निरुपम : हो सकता है कि यह बयान गलत हो...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया बैठ जाइये। आपकी बात समाप्त हो गई।
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, मुझे बात पूरी करने दीजिए। हो सकता है कि यह बयान गलत हो, लेकिन सुनी हुई बातें गलत हो सकती हैं, कहीं हुई बातें गलत हो सकती हैं...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।
श्री संजय निरुपम : लिखी हुई बातें गलत हो सकती हैं, लेकिन छपी हुई तस्वीर गलत नहीं हो सकती। मैं यह तस्वीर सदन के पटल पर रख रहा हूं, जिसमें हमारी बहन, हमारी दीदी इन दोनों मंत्रियों को उनके सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दे रही हैं।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।
श्री संजय निरुपम : सुषमा जी को कभी ये ताई बोलते हैं, कभी अम्मा बोलते हैं...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, मुझे अपनी बात खत्म करने दीजिए। ऐसा नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी के लोग मेरी हर बात का विरोध करेंगे और मुझे बैठा देंगे। मुझे अपनी बात खत्म करने दीजिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपका समय आधा घंटा था, वह समाप्त हो गया। आपने 40 मिनट अपनी बात बोली है।
श्री संजय निरुपम : जो सुबह शाम इस सदन में हर मामले में घोटाला ढूंढते हैं, यहां तक कि गरीब लोगों को 8x8 का जो खोका आबंटित किया जाता है, उसमें भी घोटाला देख लिया गया, लेकिन इन लोगों को इतना बड़ा माइनिंग का घोटाला आज तक नहीं दिखा? मुझे बहुत अच्छा लगता, अगर लीडर ऑफ अपोजीशन की तरफ से यह विषय सदन में रखा जाता और कहा जाता कि इस मामले में भी छानबीन होनी चाहिए। यह दूसरी बात है कि बी.जे.पी. ने मांग नहीं की, लेकिन उसकी छानबीन हो रही है, सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में सी.बी.आई. की इन्क्वायरी चल रही है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री संजय निरुपम : सुप्रीम कोर्ट मोनीटर कर रहा है, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जस्टिस शाह कमीशन काम कर रहा है। अब इस पूरे मामले में इसलिए चुप्पी साधी गई है...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री संजय निरुपम: उपाध्यक्ष महोदय, मैं खत्म कर रहा हूं। अब इस पूरे मामले में चुप्पी इसलिए साध कर रखी गई है, क्योंकि ये जो मंत्री महोदय हैं, जो रातों-रात, कहा जाता है कि एक लाख करोड़ के आदमी हो गये हैं, उन्होंने कहीं एक बयान दिया कि हमको अपनी ताई को प्रधानमंत्री बनाना है (Interruptions) …* SHRI D.V. SADANANDA GOWDA (UDUPI-CHIKMAGALUR): Sir, this is wrong. … (Interruptions) What is this? … (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री संजय निरुपम : अरे, अगर प्रधानमंत्री बनना है तो जनता के आशीर्वाद से बनिये, किसी लुटेरे, किसी फ्रॉड और इल्लीगल माइनिंग में शामिल लोग, जो फेरा का वायलेशन कर रहे हैं...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : श्री हंसराज अहीर। अब बन्द कीजिए। अब अपनी बात समाप्त कीजिए।
श्री संजय निरुपम : जो पूरे के पूरे पर्यावरण को बर्बाद कर रहे हैं।...( व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय, मैं दो मिनट में खत्म कर रहा हूं।
उपाध्यक्ष महोदय : जो नाम लिया गया है, वह डिलीट होगा। जितने भी नाम भाषण के दौरान लिए गए होंगे, वे डिलीट होंगे।
श्री संजय निरुपम : मेरा निवेदन यह है कि एक साथ दोगली नीति नहीं चलेगी। अगर भ्रष्टाचार है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना पड़ेगा। सिर्फ 2जी स्कैम पर नहीं लड़ना है, इल्लीगल माइनिंग के स्कैम के खिलाफ भी लड़ना पड़ेगा। अगर आपमें ताकत है, अगर आप ईमानदार हैं...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।
श्री संजय निरुपम : भ्रष्टाचार को दूर करने का संकल्प है, अगर आप ट्रंसपेरेंसी में विश्वास करती हैं तो इल्लीगल माइनिंग खत्म करने के लिए सबसे पहले अपने इस मंत्री तो तिलांजलि दो।
अपने इस मंत्री को सरकार से निकालो। आप इस मंत्री को नहीं निकाल पाए, येदुरप्पा को क्या निकाल पाए हो, वह तो खुद ही बेचारा इस मंत्री से त्रस्त है। उस कर्नाटक में ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करिए।
श्री संजय निरुपम : आज दोपहर में देवगौड़ा जी एक विषय रख रहे थे। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करिए। बहुत टाइम हो गया।
श्री संजय निरुपम : मैं जल्दी ही अपनी बात समाप्त कर रहा हूं।
उपाध्यक्ष महोदय : आपने बहुत कुछ बोला, आपकी बात हो गयी। कृपया बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : उपाध्यक्ष महोदय, मेरे पास मेरी पार्टी का दिया हुआ टाइम है। मैं निवेदन कर रहा हूं। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : वह टाइम समाप्त हो गया। क्या और लोग नहीं बोलेंगे?
…( व्यवधान)
श्री संजय निरुपम : नहीं बोलेंगे और लोग। ...( व्यवधान) मैं कमिटमेंट दे रहा हूं और कोई नहीं बोलेगा। ...( व्यवधान) कर्नाटक राज्य सरकार की अपनी एक पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइजेज है, उसका नाम मैसूर मिनरल्स लिमिटेड है। उस कंपनी ने जेएसडब्ल्यू के साथ एक ज्वाइंट वेंचर किया। यह तय हुआ कि मैसूर मिनरल्स लिमिटेड के अपने अख्तियार के जो खान हैं, उनसे आयरन ओर निकालेंगे और बाद में अपनी स्टील कंपनी के लिए इस्तेमाल करेंगे, बदले में उनको रॉयल्टी के रूप में राज्य सरकार को पेमेंट करना था। पिछले तमाम वर्षों में जेएसडब्ल्यू ने एक पैसा भी रॉयल्टी नहीं दिया। बड़ी मुश्किल से खींचतान कर 30-35 करोड़ रूपए दिया, जबकि 118 करोड़ रूपए की बकाया राशि उसके ऊपर है। उसके लिए देवगौड़ा जी के सुपुत्र जब चीफ मिनिस्टर हुआ करते थे, उन्होंने उनको नोटिस दिया। उसकी कापी मेरे पास है, उसमें है कि जितनी जल्दी हो सके, पैसा दो। लेकिन उस डिफॉल्टर कंपनी को, उस पर जो 118 करोड़ रूपए बकाया थे, उसे कर्नाटक के बीजेपी के चीफ मिनिस्टर ने माफ किया। अब चिंता की बात यह बनती है कि उसी जेएसडब्ल्यू की तरफ से कर्नाटक के चीफ मिनिस्टर के सुपुत्र के नेतृत्व में जो प्रेरणा ट्रस्ट है, उसमें 27 करोड़ रूपए बाई-चेक पेमेंट आया। ...( व्यवधान) कभी टेलीविजन के सामने सरेआम एक लाख रूपए नगद लेते हो और कभी अपनी शिक्षा के लिए बनाए ट्रस्ट में चेक से रिश्वत लेते हो। आप ईमानदारी और ट्रंसपरेंसी की बात करते हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने के लिए उपस्थित होते हो। बीजेपी की जो दोमुही नीति है, उस नीति की तरफ सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं चाहूंगा कि कर्नाटक में जो इल्लीगल माइनिंग चल रही है, उसकी एक साफ-सुथरी जांच होनी चाहिए। केंद्र सरकार ने बहुत सारे एक्शन लिए। जयराम रमेश साहब, जो पर्यावरण मंत्री हैं, उन्होंने तमाम चिट्ठियां भेजीं, एडवाइजेज भेजीं, लेकिन राज्य सरकार उसके ऊपर ध्यान नहीं दे रही है। मैं चाहूंगा कि भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपनी राज्य सरकार के ऊपर इस प्रकार का दबाव डाले कि साहब, आज आप हैं, कल आप नहीं रहेगा, कोई और होगा, लेकिन इस देश की जो खनिज संपदा है, उसकी लूट नहीं होनी चाहिए। खनिज संपदा की लूट करने वालों को रोकने के लिए जो केंद्र सरकार की तरफ से प्रयास चल रहा है, उन प्रयासों को सही रिस्पांस और उसके आलोक में सही एक्शन, सही काम-काज राज्य सरकार करे, ऐसा निर्देश भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कम से कम इल्लीगल माइनिंग रोकने के संदर्भ में दे। मुख्यमंत्री हटाने की हिम्मत तो इनमें नहीं थी, कम से कम जो गरीब लोगों का पूरा पर्यावरण बर्बाद हो रहा है, घर लूटा जा रहा है, जो आदिवासी सड़कों पर आ रहे हैं, देश के खजाने को जो नुकसान हो रहा है, उस नुकसान को रोकने के लिए, उस नुकसान पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए भारतीय जनता पार्टी अपनी तरफ से प्रयास करे। ऐसा मैं आपसे निवेदन करता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं ।
CUT MOTIONS श्री हंसराज गं. अहीर (चन्द्रपुर): माननीय उपाध्यक्ष जी, मैं खान मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। देश की खनिज संपदा के बारे में मैं बताना चाहूंगा कि देश की जो खनिज संपत्ति है, देश के विकास में, देश की प्रगति में और देश के बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए, आर्थिक विकास के लिए इसका बहुत उपयोग हो सकता है। इस ओर सरकार ने इस क्षण तक इसका पूर्ण उपयोग करने का कभी प्रयास नहीं किया। उपाध्यक्ष जी, मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि इस देश में करीब-करीब 90 प्रकार की खनिज संपत्ति है। हमने गौर से देखा तो इसमें ईंधन पर और जो मैटलिक खनिज संपदा है, गैर-मेटलिक खनिज संपदा है, परमाणु संपदा है, ऐसी कुल मिलाकर 90 प्रकार की खनिज संपदा हमारे देश में है।
16.00 hrs. हम आज तक 32 में से 22 राज्यों की खनिज सम्पत्ति के बारे में जीएसआई द्वारा सर्वेक्षण कर पाए हैं। हमारे देश ने लोहा, ताम्बा, मैंगनीज़, सोना, प्लैटिनम, कोल, लिग्नाइट, यूरेनियम, हीरे, बाक्साइड आदि अनेक प्रकार की खनिज सम्पत्ति पाई है। यह खनिज सम्पदा देश की 120 करोड़ जनता की है। सौभाग्य से हमारा देश कोयला, लिग्नाइट, बाक्साइड और मैंगनीज़ में दुनिया के अन्य देशों की तुलना में टॉप टैन में आता है। हमारे देश में लाइमस्टोन से लेकर प्लैटिनम, यूरेनियम जैसी महंगी से महंगी खनिज सम्पदा है। देश में वर्षों से कांग्रेस की सरकार रही है। देश में खनन सम्पत्ति के बारे में जो नीति बनी है, वह बहुत गलत है। खनन सम्पति में पहले आओ पहले पाओ या वहां खोजो और पाओ हो। मैं कोयले के बारे में कहना चाहूंगा कि वह कम से कम ढाई हजार रुपये टन है। आयरन ओर 4-5 हजार रुपये टन है। मैंगनीज़ ओर 6 हजार से 25 हजार रुपये टन है। यूरेनियम, प्लैटिनम, सोना आदि के बारे में खोजो और पाओ की नीति है। सरकार आरपी करती है, पीएल देती है, एमएल देती है। इसे देने के बारे में देश में जो नीति बनी हुई है, उसके चलते काफी परेशानी है। अगर हम इस देश की खनिज सम्पदा को देखें तो यह अमीर देश है। अमीर देश की खनिज सम्पदा को जिस तरह लुटाया गया, जैसे बंदर बांट की गई, यदि हम इसका कारण देखें तो पता लगता है कि इस देश के एमएमआरडीए कानून में पूरी खनिज सम्पदा बड़े-बड़े उद्योगपतियों को बांटने में लगे हुए हैं।
हम सब लोग इस देश की बेरोजगारी के बारे में अवगत हैं। यदि देश में प्रगति करनी है तो सभी क्षेत्रों में इस सम्पदा का उपयोग करने की जरूरत है। लेकिन सरकार ने इसका उपयोग बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लिए कर दिया है। मैं आपको इस बारे में उदाहरण भी दूंगा। इसके बारे में एक सर्वे आया हुआ है। लोक उद्यम के सर्वे में बताया गया है कि देश में पिछले चार वर्षों में खान मंत्रालय ने खनिज सम्पत्ति में जो कारोबार किया, वह वर्ष 2008 में 16,454 करोड़ रुपये, 2009 में 17,984 करोड़ रुपये और 2010 में 15,991 करोड़ रुपये है। इसका अर्थ है कि हमारे मंत्रालय के खनिज सम्पत्ति के कारोबार में म् पीछे जाने की कुछ वजह है और वह यह है कि हम निजी कम्पनियों को आशीर्वाद दे रहे हैं। जो कम्पनियां खनन क्षेत्र में काम करती हैं, जैसे एनएमडीसी, नाल्को आदि, उन्हें हम प्रोत्साहित नहीं करते। देश की सबसे बड़ी कम्पनी जीएसआई, जो खनन क्षेत्र में काम करती है, उसे 503 करोड़ रुपये दिए गए हैं, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स को 58 करोड़ रुपये, एमईसीएल को 9 करोड़ रुपये, सिक्किम में खनन करने के लिए 16 करोड़ रुपये दिए गए हैं। निधि का प्रावधान काफी बेकार तरीके से किया गया है। हमने देश के 22 राज्यों में खनन सामग्री पाई है। और भी कई राज्यों में खनन सामग्री की खोज करनी है।
इतने कम प्रावधान में हम खान क्षेत्र को न्याय नहीं दे सकते। इसलिए इस बजट को बढ़ाने की आवश्यकता थी, लेकिन सरकार ने इस ओर ध्यान नही दिया। मैं सरकार का ध्यान इस तरफ भी दिलाना चाहूंगा कि देश की एमएमआरडीए, यानी जो माइनिंग पालिसी है, उसमें कोयला, लिग्नाइट से लेकर बाक्साइट और आयरन ओर आदि सभी के लिए सरकार ने जो नीति बनायी है, उसने देश की लूट कर दी है। मैं यूपीए सरकार और उनके मंत्रियों को कहना चाहूंगा कि अंग्रेजों ने देश को जितना लूटा, उससे ज्यादा इस यूपीए सरकार और कांग्रेस गवर्नमैंट ने देश को लुटाया है। ...( व्यवधान)
16.05 hrs. (Dr. Girija Vyas in the Chair) सभापति महोदया, मैं बिना आधार के नहीं कह रहा। कोयला मंत्री जी भी सौभाग्य से सदन में बैठे हैं। खान मंत्री जी को इस मंत्रालय में आये हुए एक-दो महीने ही हुए हैं इसलिए उनको पूरी जानकारी नहीं मिली होगी। लेकिन वे बहुत सज्जन मंत्री हैं। वे गुजरात से आते हैं, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल का राज्य है। वे देश के सबसे सर्वोच्च स्थान पर बैठे हैं, जिसकी दुनिया भर के लोग तारीफ करते हैं, फौजी अधिकारी भी तारीफ करते हैं। मंत्री जी, नरेन्द्र मोदी जी के राज्य के हैं, इसलिए निश्चित ही एक सज्जन व्यक्ति होंगे। मैं उनको बताना चाहता हूं कि जिस मंत्रालय में आप बैठकर काम कर रहे हैं, वह एक अमीर मंत्रालय है। दुर्भाग्य से भारत सरकार ने, इस देश में आज तक कांग्रेस की जितनी भी सरकारें बनी हैं, उन्होंने कभी भी इस मंत्रालय को महत्व नहीं दिया। आपके पास अरबों-खरबों रुपये की प्रापर्टी है। आप एक अमीर मंत्री के रूप में बैठे हैं, लेकिन सरकार ने आपको काम करने के लिए केवल 1500 करोड़ रुपये ही दिये हैं। अगर वह 15000 करोड़ रुपये भी देते, तो वह भी कम होते, यानी इतनी सम्पदा देश में है। भारत भूमि को देव भूमि कहा जाता है, पवित्र भूमि कहा जाता है। दुनिया में इतनी खनिज सम्पत्ति किसी और देश में नहीं होगी जितनी यहां है। देश में इतनी विविध प्रकार की सम्पत्ति होते हुए भी हम गरीब हैं। इसकी वजह सरकार की गलत नीतियां हैं।
सभापति महोदया, मैं कोयला मंत्रालय के बारे में भी कहना चाहूंगा। कोयला मंत्री जी सदन में बैठे हैं। इनको आज तक यह नहीं मालूम कि कोयला क्या है? इन्होंने आज सुबह एक प्रश्न के जवाब मे कहा है कि हमने निजी क्षेत्र में कोल ब्लॉक का आबंटन किया है। इन्होंने 208 कोल ब्लॉक बांटे हैं। यह जवाब इन्होंने आज सुबह ही दिया है। अब आप इनकी ईमानदारी देखिये, इन्होंने हमें लिखित जवाब भी दिया है। इन 208 कोल ब्लॉक्स में 50 बिलियन मीट्रिक टन कोल है। इसमें से इन्होंने 22 बिलियन मीट्रिक टन कोल प्राइवेट सैक्टर को दिया है और 28 बिलियन मीट्रिक टन सरकारी उपक्रमों को दिया है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि मंत्री जी सुबह गला फाड़-फाड़ कर कह रहे थे कि जिस कम्पनी ने निजी क्षेत्र में काम नहीं किया, उन्हें हम कैंसिल करेंगे। जिस तरीके से कोयला क्षेत्र में काम किया जा रहा है, कोयला क्षेत्र भारत देश की सम्पत्ति है। मैं इसे दोहराना चाहूंगा कि देश की 120 करोड़ रुपये की सम्पदा को आपने 120 लोगों को बांटा है। जब आपसे उसे कैंसिल करने के लिए कहा जाता है, तो आप उनकी वकालत करते हैं और कहते हैं कि फॉरेस्ट एक्ट आड़े आ रहा है। आप उनकी वकालत करने वाले कौन हैं? आपने 184 प्राइवेट कम्पनियों को कोल ब्लॉक दिये हैं। आपने 22 बिलियन मीट्रिक टन कोयले के ब्लॉक बांटे हैं। वर्ष 1993 से लेकर वर्ष 2010 तक ब्लॉक बांटते समय यह कंडीशन नहीं थी कि 36 माह के अंदर ब्लॉक ओपन करने चाहिए। ...( व्यवधान)
खान मंत्रालय के राज्य मंत्री (श्री दिनशा पटेल): सभापति महोदया, यह खनिज विभाग का मामला है। कोल मंत्रालय तो अलग है। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : अहीर जी, आपने विषय देख लिया होगा।
...( व्यवधान)
सभापति महोदया : अहीर जी, आज डिसकशन किस मंत्रालय पर है?
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : आज माइनिंग पर डिसकशन है।...( व्यवधान) सभापति महोदया : आज माइन्स पर डिसकशन है। …( व्यवधान) श्री हंसराज गं. अहीर : मुझे उस पर भी बोलना है। जब यहां स्टेट का मामला आ सकता है, तो कोयला मंत्री हिन्दुस्तान के ही हैं, पाकिस्तान के नहीं हैं। मैं उनके बारे में बोलूंगा। ...( व्यवधान) आपने कर्नाटक के बारे में सुना होगा। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : अहीर जी, बहुत इम्पोर्टेंट सब्जैक्ट है, इसलिए आप विषय पर आयें, तो अच्छा होगा।
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : इनको कैंसिल करने के लिए जब हम बार-बार कहते हैं, इनको फॉरेस्ट मंत्री रोकते हैं, नो-गो एरिया घोषित किया गया है, इनको मदद करते हैं। मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि आपने वर्ष 2001, 2004, 2005 और 2006 में जितने ब्लॉक्स बांटे हैं, इनकी अवधि समाप्त हो गयी है। आप इनकी वकालत न करें। आपने मुझे जो जानकारी दी है, उसके अनुसार वर्ष 2005 में 13 ब्लॉक्स, वर्ष 2006 में 51 ब्लॉक्स दिए हैं, वर्ष 2007 में 19 ब्लॉक्स दिए हैं। इनकी अवधि समाप्त हो गयी है। उससे पहले भी आपने वर्ष 1996 में चार ब्लॉक्स दिए हैं। इनमें से एक भी ब्लॉक ओपन नहीं हुआ है। इन सभी को कैंसिल करें और देश एवं अपने मंत्रालय के प्रति प्रामाणिकता बताएं।...( व्यवधान)
कोयला मंत्री (श्री श्रीप्रकाश जायसवाल): सभापति महोदया, अगर माननीय सदस्य राजनीतिक स्पीच दे रहे हैं, तो दें, लेकिन इसमें मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। जहां तक कोल ब्लॉक्स देने और कैंसिल करने की बात है, मैंने कभी भी किसी भी ब्लॉक वकालत नहीं की है। मैंने सुबह भी एश्योर किया था और फिर एश्योर करना चाहता हूं कि आवश्यक खानापूरी होने के बाद एक-एक ब्लॉक जिन लोगों ने बेवजह ले लिए हैं, उनको कैंसिल किया जाएगा। मैंने कभी भी कोई पैरवी नहीं की है।...( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : महोदया, मैं भी यही कह रहा हूं। आप कैंसिल कीजिए, ये कम से कम 90 ब्लॉक्स हैं, इनको कैंसिल कीजिए। मैंने इस सम्पत्ति की, 22 बिलियन मीट्रिक टन कोल की, जो निजी कंपनियों को बांटा गया है, की आज मार्केट में कीमत 53 लाख करोड़ रुपये निकलती है। अगर माइनिंग में हमने इसका आधा भी खर्च निकाल दिया, तब भी लगभग 26 लाख करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी इन्होंने निजी क्षेत्र को मुफ्त में बांटी है। हम नदी के घाट पर रेत की नीलामी करते हैं, हम मुरूम म्नीलाम करते हैं, लेकिन यहां पर कोयले जैसी कीमती चीज हम मुफ्त दे रहे हैं। यह कौन सी नीति है? इस देश को लूटा जा रहा है।...( व्यवधान) फ्री में ब्लॉक्स पर ही नहीं रूके हैं। मैं कोयले की बात इसलिए कह रहा था कि जिस तरह से यूपीए सरकार और कांग्रेस की सरकारों ने देश को लूटा है, आज आप देखिए बाक्साइट, आयरन ओर के ब्लॉक्स भी हम लोग पहले आओ पहले पाओ के आधार पर दे रहे हैं। यह कौन सी नीति है? मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि यह कौन सी नीति है?...( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: सभापति महोदया, माननीय सदस्य जो नीति बता रहे हैं, यह नीति राजग शासन के दौरान ही शुरू की गयी। आप पहले यह बताइए कि राजग सरकार ने कितने कोल ब्लॉक्स बांटे थे? उसके बाद आप यूपीए सरकार की बात कीजिए।...( व्यवधान) इसकी शुरूआत आपने की, फिर भी नीति हमसे पूछ रहे हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : कोई दूसरा विषय रिकॉर्ड में नहीं आएगा, केवल माइनिंग की ही बात जाएगी।
...( व्यवधान)* श्री हंसराज गं. अहीर : महोदया, हम जिस देश में हैं, सारी दुनिया जानती है कि आप किस पार्टी के हैं - इंदिरा गांधी के नाम से चलने वाली इंदिरा कांग्रेस के हैं। हम स्वर्गीय इंदिरा जी का आदर करते हैं। मैं याद दिलाना चाहूंगा कि वर्ष 1973 में इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए देश में प्राइवेट सेक्टर की जितनी भी माइन्स थीं, उनका राष्ट्रीयकरण किया था। इसका सम्मान सभी ने किया, हमारी पार्टी के लोगों ने, सत्तादल कांग्रेस पार्टी एवं देश की अन्य सभी पार्टियों के लोगों ने इसका सम्मान किया, स्वागत किया। आज आप इंदिरा जी के नाम से वोट मांगने जाते हैं। मैंने इनके मंत्रालय में जाकर पूछा कि आप इंदिरा जी के पॉलिसी का विरोध क्यों कर रहे हैं?
क्यों प्राइवेट लोगों को ब्लॉक्स दे रहे हैं, क्या इंदिरा जी गलत थीं, क्या इंदिरा जी की पॉलिसी गलत थी, जबकि हम आज भी उस पॉलिसी का सम्मान करते हैं और चाहते हैं कि एक मीट्रिक टन कोयला प्राइवेट सेक्टर को नहीं देना चाहिए, इसी में प्रामाणिकता है। आप क्यों देते हैं, यह बताएं...( व्यवधान) कोयले पर भी बोलेंगे, लाइमस्टोन पर भी बोलेंगे, आइरन ओर पर भी बोलेंगे, ये भी माइनिंग में आते हैं। हमारी पार्टी की जब सरकार थी, तो हमने आपकी नीति यानि इंदिरा जी की नीति का ही पालन किया था इसलिए यह नीति बीजेपी ने नहीं बनाई है। एमएमआरडी विधेयक बीजेपी की सरकार के रहते हुए ही लोक सभा में पेश हुआ था। उसके बाद यह बिल 2006 में आया और आपने 2010 में पास किया। मैं बताना चाहता हूं कि 2006 से 2010 के बीच कितने ब्लॉक्स बांटे गए। इन चार सालों में आपने क्यों ब्लॉक्स बांटे, क्यों नहीं 2006 में ही बिल पास किया, यह इसलिए नहीं किया कि आप अपनी मर्जी के लोगों को ब्लॉक्स देना चाहते थे। इसमें कितना भ्रष्टाचार हुआ है, यह तो मैं साबित नहीं कर सकता, लेकिन दुनिया समझती है कि 2006 का बिल 2010 में क्यों पास किया गया। ...( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: इस तरीके का आरोप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह इस बात को क्यों नहीं बताते कि राजग के शासन में कितने ब्लॉक्स को बांटा गया। हमारी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, अपनी सरकार का ब्यौरा क्यों नहीं दे रहे हैं...( व्यवधान)
सभापति महोदया : मैंने कहा है कि खान मंत्रालय पर चर्चा करें।
श्री हंसराज गं. अहीर : जो भी ब्लॉक्स बांटे गए, उनमें से 2006 में 85 ब्लॉक्स, 2007 में 60 ब्लॉक्स और 2008 में 45 ब्लॉक्स बांट गए।
सभापति महोदया: आप डिमांड्स पर बोलिए।
श्री हंसराज गं. अहीर : मैं उसी पर अपनी बात कह रहा हूं। कोयला मंत्रालय भी भारत सरकार का है।...( व्यवधान)
संसदीय कार्य मंत्री, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल): सदन में खान मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर चर्चा चल रही है।
सभापति महोदया: अहीर साहब, आपकी पार्टी का ही समय जा रहा है इसलिए आप विषय पर बोलें। संसदीय कार्य मंत्री जी यही बता रहे थे कि खान मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर चर्चा चल रही है। यह बताना उनका धर्म है।
श्री हंसराज गं. अहीर : ये जो ब्लॉक्स बांटे गए, उस वक्त देश के पंथ प्रधान डॉ. मनमोहन सिंह जी थे। उस समय खान मंत्रालय का कोई केबिनेट मिनिस्टर नहीं था इसलिए यह मंत्रालय उनके अधीन था। राज्य मंत्री थे, उनके पास पूरा चार्ज नहीं था। इसलिए डॉ. मनमोहन सिंह जी के प्रधान मंत्री रहते हुए इतना ब्लॉक्स बांटे गए। सन् 2009 में लोक सभा के चुनाव थे इसलिए 2007 और 2008 में ब्लॉक्स बांटे गए। इसलिए सरकार को जवाब देना चाहिए कि ये जो इतने सारे ब्लॉक्स बांटे गए, इसकी क्या वजह रही और इतनी तेजी से क्यों बांटे गए?...( व्यवधान)
चौधरी लाल सिंह (उधमपुर): माइनिंग पर आप अपनी बात कहें...( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : हम माइनिंग के बारे में ही बता रहे हैं। सभापति महोदया, मैं कोयले के बारे में नहीं कहना चाहता था, लेकिन जब कर्नाटक का मामला आ सकता है, तो कोयले का मामला क्यों नहीं आ सकता।
मैं आपसे कह रहा था कि देश के 22 राज्यों में हमारी खनिज सम्पत्ति है और इसका उपयोग देश में बेरोजगारी कम करने के लिए होना चाहिए। जहां आयरन-ओर है, बॉक्साइट है, इसका उपयोग देश के विकास में हो सकता है। देश का रॉ-मैटीरियल निर्यात किया जा रहा है, बाहर के देशों में भेजा जा रहा है। यहां पर बार-बार कहा जाता है कि देश से रॉ-मैटीरियल निर्यात न करें। इसका फिनिशिंग वर्क और प्रोसेसिंग अपने देश में होना चाहिए। यहां इतनी सारी कंपनियां हैं जो प्रोसेसिंग करने की ताकत रखती हैं। हमारे यहां पर सेल है, एमएमडीसी के माध्यम से माइनिंग हो सकती है। यहां पर मोइल है, यहां पर नाल्को है और भी बहुत सारी कंपनियां हैं जहां पर प्रोसेसिंग के प्रावधान हैं। हम अपने देश का कच्चा माल फिर बाहर क्यों भेजते हैं, माननीय मंत्री इसका जवाब दें?
यहां पर छोटे-छोटे सोइल एंड प्लांट मैटीरियल के कारखाने हैं जिनमें बड़ी मात्रा में रोजगार मिलता है। ये सारे प्लांट आयरन-ओर की मांग करते हैं। हमारी सरकारी कंपनी एमएमटीसी उसमें से अधिकांश माल का निर्यात करती है, देश के प्लांट्स को देती नहीं है, इसकी क्या वजह है? सेल कंपनी प्रोफिट में है, नाल्को है जो बॉक्साइट और आयरन-ओर के ब्लॉक्स मांगते हैं। ...( व्यवधान) देश में हमारी सरकारी कंपनियां हैं जो सरकार के द्वारा चलाई जाती हैं। इन लोगों ने जो ब्लॉक्स मांगे हैं, इन्हें न देते हुए आप क्या करते हैं, यह मैं बताना चाहता हूं। इन्होंने भी अपनी कंपनियां जमा की हुई है।
कर्नाटक के बारे में, हमारे मंत्रियों के बारे में कह रहे थे, लेकिन अभी इन्होंने क्या किया कि जो इनके आयरन-ओर के ब्लॉक्स हैं, वह इन्होंने आर्सिनल और मित्तल को दिये हैं, ये जीएमआर को देते हैं, रिलाइंस को देते हैं, जिंदल ग्रुप को ब्लॉक्स देते हैं, सेल को क्यों नहीं देते हैं, राष्ट्रीय इस्पात निगम को क्यों नहीं देते हैं? इन्होंने प्राइवेट लोगों को ब्लॉक्स देने का जो सिस्टम बनाकर रखा है और वह भी फ्री ऑफ कोस्ट, तो मैं यहां पर यह बताना चाहूंगा सभापति महोदया कि जो आयरन-ओर है उसमें एक टन के लिए चार से पांच हजार रुपया देना पड़ता है और ये ब्लॉक्स बांट देते हैं।* मेरे यहां सुरजागढ़ ब्लॉक है जिसमें 130 मिलियन टन का रिजर्व है और उसमें लौहे का परसेंटेज 66 प्लस है। इस अच्छे प्रकार के लौहे-अयस्क को हमने एक प्राइवेट कंपनी लाइट मैटल को दिया है। उसकी मैंने एक एक्सपर्ट कंपनी से कोस्ट निकलवाई है। आज के 4000 रुपये के मार्किट रेट से भी देखें तो 50 हजार करोड़ रुपये का वह ब्लॉक बैठता है। उस ब्लॉक को एक छोटी सी कंपनी लाइट मैटल को दिया गया है। वर्ष 2007 से लेकर आज तक उस कंपनी ने माइनिंग की है। यह तो एक उदाहरण है, ऐसे कितने ही ब्लॉक्स इन्होंने बांटे हैं। हमारे देश में 17 हजार मिलियन टन का डिपोजिट आइडेंटिफाई हुआ है। अगर 130 मिलियन टन की इतनी कोस्ट निकलती है तो 17 हजार मिलियन टन का जो रिजर्व है उसकी कितनी कीमत निकलेगी? इस तरह से हम सभी डिपोजिट्स का बंटवारा कर रहे हैं। बॉक्साइट के बारे में मैं कहूंगा। यहां अभी हमारे कोल्हापुर के सांसद महोदय बैठे थे, अभी गये हैं। कोल्हापुर जो महाराष्ट्र का एक जिला है वहां पर बॉक्साइट्स की माइन्स हैं। रत्नागिरी में इतना ज्यादा बॉक्साइट था वह सारे के सारे ब्लॉक्स पीएल और एमएल के नाम से पूरे के पूरे * बंटवा दिये।
मैं बड़ी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि बॉक्साइट्स के ब्लॉक्स रत्नागिरी, कोल्हापुर में और गड़चिरोली के आयरन-ओर के ब्लॉक्स और नागपुर में जो मेगनीज के ब्लॉक्स हैं ये 191 ब्लॉक्स के बारे में मैंने माननीय मंत्री जी को चिट्ठी दी थी, मैं चिट्ठी साथ लाया हूं और उसका जवाब भी लाया हूं। माननीय मंत्री जी ने जवाब बहुत अच्छा दिया हुआ है। मैंने उनसे कहा था कि * उनके करेक्टर के ऊपर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। उन्होंने जितने भी ब्लॉक्स आपको रैफर किये हैं वे फेयर नहीं हैं। उनके बारे में आप विचार करो।
सभापति महोदया : जो व्यक्ति हाउस में मौजूद नहीं है, उसका नाम डिलीट कीजिएगा।
श्री हंसराज गं. अहीर : जिन नामों की उन्होंने यहां पर सिफारिश की है उन नामों पर आप दुबारा विचार करो...( व्यवधान) मैं माननीय मंत्री जी का जवाब दिखाता हूं। मुझे खान मंत्री जी ने जवाब दिया है कि जो महाराष्ट्र के ब्लॉक्स की सिफारिश * की गयी है, उस पर पुनर्विचार करने का उन्होंने जवाब दिया है।
एक ब्लॉक की कीमत 50 हजार करोड़ रुपये मैंने आपको बता दी है लेकिन इतने ज्यादा 191 ब्लॉक्स महाराष्ट्र के हैं, पूरे देश में न जाने कितने ब्लॉक्स होंगे, जिन्हें मंजूरी के लिए यहां भेजा गया है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि यह देश की सम्पत्ति है जो बहुत कीमती है, जिससे देश में बहुत बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किया जा सकता है। देश में बेरोजगारी बहुत बड़े पैमाने पर है।
हमारा देश 120 करोड़ की आबादी वाला देश है। हमारे देश में पीएल करने के लिए, आरपी करने के लिए,एमएल करने के लिए अगर प्राइवेट कंपनियों को हम देने लगेंगे तो देश में इतने सारे इंजीनियरिंग कॉलेज किस लिए बने हैं? देश में 504 विश्वविद्यालय हैं, देश में 2388 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, देश में 1659 पॉलिटेक्नीक कॉलेज हैं। यहां पर 15 दुनिया के माने हुए आईआईटी कॉलेज हैं, जिसमें लड़के माइनिंग इंजीनियर बनते हैं, इन्हें हम काम देंगे या प्राइवेट कंपनियों को काम देंगे।
महोदया, हम इनवेस्टमेंट की बात करते हैं, दुनिया के उद्योगपतियों को बुला कर ब्लाक देने की बात करते हैं। हमारे देश की यूनिवर्सिटीज़ ने क्या किया है, जो लड़के पढ़ लिख कर तैयार हो रहे हैं, वे क्या करेंगे?
सभापति महोदया : आप अपनी बात समाप्त कीजिए, आपकी पार्टी के दो सदस्यों ने अभी और बोलना है।
श्री हंसराज गं. अहीर : हमारे देश के मिनरल्स का उपयोग देश के नौजवानों को रोजगार देने के लिए होना चाहिए। इससे रोजगार निर्मित हो सकते हैं। देश को मुनाफा हो सकता है और देश की गरीबी दूर हो सकती है, लेकिन सरकार ने सारा मिनरल मुफ्त में बांटने का काम किया है, वह गलत है। मैं मंत्री जी को कहना चाहता हूं कि आपकी सरकार ने वर्ष 2006 से एमएमडीआर अमेंडमेंट बिल रखा है, मैंने अखबार में पढ़ा था कि इस बार सैशन में इसमें अमेंडमेंट लाने जा रहे हैं। मैं विनती करता हूं कि इसमें अमेंडमेंट लाइए और जो फ्री आफ कास्ट ब्लाक्स बांटने का जो सिस्टम है, उसे बंद कर दीजिए। आपको जो भी ब्लाक देने हैं, उनकी बोली लगाइए। जिन्हें ब्लाक लेने हैं, वे बोली के माध्यम से लें। मैं कहना चाहता हूं कि देश में जितनी भी विभिन्न प्रकार की सम्पत्ति है, इसका उपयोग देश के रोजगार निर्माण में होना चाहिए। मैं बताना चाहता हूं कि हमने खनिज सम्पत्ति की कद्र गोबर से भी कम की है। हमारे खेत में काम करने वाला किसान जानवरों का गोबर का सही उपयोग करता है, लेकिन आपने देश के मिनरल्स का सही उपयोग नहीं किया है। आपको देश के मिनरल्स फ्री आफ कास्ट बांटने का क्या अधिकार है? आपको उसे बेचना चाहिए, नीलाम करना चाहिए। मैं जो कह रहा हूं, आप ऐसा न समझें कि विपक्ष का एमपी बोल रहा है। मैं देश के हित की बात कह रहा हूं। आपने पाप किया है और आप देश से गद्दारी कर रहे हैं। मैं उल्लेख करूंगा कि इसे नीलाम करने की नीति बननी चाहिए और देश के मिनरल्स का दोहन देश के हित में होना चाहिए, इसलिए अमेंडमेंट बिल इसी सत्र में लाने का प्रयास कीजिए। मैंने मंत्री जी को पहले भी कहा था कि आप ईमानदार राज्य के मंत्री हैं, आप ईमानदारी से बिल को इसी सत्र में लाइए, इसे पास कराइए और पहले आओ तथा पहले पाओ, खोजो और पाओ की नीति को बदलने की मांग मैं करता हूं। आप मिनरल्स को खोजने की गति बढ़ाइए। इस देश में बहुत प्रकार की सम्पत्ति है।
मैं एक बात की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। हमारे देश में बहुत बड़े-बड़े उद्योगपति बने हैं। हमारा देश तो गरीब है। देश में बीपीएल की संख्या तीस प्रतिशत से ज्यादा है, फिर भी देश के उद्योगपति दुनिया के माने हुए उद्योगपतियों में से हैं। हमारे यहां रिलायंस ग्रुप है, जिन्दल ग्रुप है, मित्तल ग्रुप है। ये ग्रुप्स दुनिया में बिलगेट से फाइट करते हैं। इनकी पात्रता नहीं है, योग्यता नहीं है और इन्होंने इतना अच्छा काम भी नहीं किया है, ये सभी मुफ्त में ब्लाक्स लेते हैं और अपनी प्रापर्टी बढ़ा कर दिखाते हैं कि हमारे पास इतनी प्रापर्टी है। हमने रिलायंस ग्रुप को देश के गैस और तेल के भंडार दिए हैं, वे भंडार इन्हें क्यों दिए हैं, वे कौन लगते हैं। सदन में हमारे एमपी ...( व्यवधान) * हैं, आज सदन में उपस्थित नहीं हैं। उन्हें कोयले के ब्लाक दिए, आयरन ओर के ब्लाक दिए।...( व्यवधान) वे सदन के सदस्य हैं।
सभापति महोदया : माननीय सदस्य ने जिन मेम्बर का नाम लिया है, कृपया उसे सदन की प्रोसीडिंग्स से हटा दिया जाए।
...( व्यवधान) * श्री हंसराज गं. अहीर : वे सदन के सदस्य हैं।…( व्यवधान)
सभापति महोदया : मैंने माननीय सदस्य का नाम हटाने के लिए कह दिया है, आप बैठ जाएं।
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : ये आपका कौन लगता है, आपने इसे क्यों दिया है?...( व्यवधान)
सभापति महोदया : मैं दोनों तरफ के सदस्यों से कहना चाहती हूं कि आप बैठ जाएं।
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : महोदया, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि इतने बड़े-बड़े ब्लाक्स इन्हें मुफ्त में क्यों दिए जाते हैं?...( व्यवधान)
सभापति महोदया : सभी असंसदीय शब्द प्रोसीडिंग्स से हटा दिए जाएं और जो माननीय सदस्य सदन में मौजूद नहीं हैं, उनके नाम सदन की कार्यवाही से हटा दिए जाएं।
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : महोदया, मैंने सदन का सदस्य होने के नाते उनका नाम लिया है। इनके नाम से ब्लाक लिए गए हैं। अगर प्रधानमंत्री जी और सोनिया जी समझें कि अपनी पार्टी के हैं, अपना बेटा है, इस बात को मैं मान लेता हूं, लेकिन ...( व्यवधान)* क्या सरकार का दामाद लगता है।...( व्यवधान) वह सरकार का कौन लगता है? उन्हें मुफ्त में ब्लाक क्यों देते हैं?...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप शब्दों का प्रयोग सोच-समझ कर कीजिए और सदन की गरिमा बनाए रखें।
…( व्यवधान)
श्री वी.नारायणसामी:सभापति महोदया, यह रिकार्ड में नहीं जाना चाहिए।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : शैलेन्द्र कुमार जी के भाषण के अलावा कुछ भी रिकार्ड में नहीं जाएगा।
...( व्यवधान) * सभापति महोदया: सिर्फ शैलेन्द्र कुमार जी की बात रिकॉर्ड में जाएगी।
...( व्यवधान) * श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): आपका माइक बंद हो गया है।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आज बहुत लंबी लिस्ट है जो माननीय सदस्य स्पीच सभापटल पर रखना चाहते है वे रख दें। अहीर जी, प्लीज आप एक मिनट में वाइंड अप कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : मैं आपको अवैध खनन के बारे में बताना चाहता हूं। यहां अवैध खनन के बारे में कांग्रेस पार्टी के सांसद ने कुछ कहा है, ठीक है सबको अवैध खनन का विरोध करना चाहिए। मैं कहना चाहता हूं कि देश में अवैध खनन सिर्फ कर्नाटक में ही नहीं हो रहा है, यह देश के सभी राज्यों में चल रहा है। मैं समर्थन नहीं करूंगा, चोरियां हो रही हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : कृपया आप शांत रहें। वे वाइंड अप कर रहे हैं। कृपया दोनों तरफ से शांत रहें। आप एक मिनट में वाइंड अप करें।
…( व्यवधान)
श्री हंसराज गं. अहीर : महोदया, अवैध खनन को रोकने के लिए कानून में कुछ न कुछ सुधार करना चाहिए। जहां मिनरल, कोयला, लिग्नाइट आदि की चोरी होती है, अवैध खनन होता है, हमारे देश में ईसी एक्ट कोयले से हटाया गया है, मिनरल से हटाया गया है, इसे लगाने की जरूरत है। इसके बारे में सोचा जाना चाहिए। फारेस्ट में लकड़ी चोरी होती है तो जिस व्हीकल में लकड़ी ले जाया जाता है उस व्हीकल को फारेस्ट डिपार्टमेंट नीलाम कर देता है इसी तरह से जिस जगह इल्लीगल माइनिंग होती है, उसकी ढुलाई के लिए जिस वाहन का उपयोग होता है, उसे नीलाम करने के लिए मंत्री महोदय को सोचना चाहिए।
सभापति महोदया : अब आपकी बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।
श्री शैलेन्द्र कुमार।
...( व्यवधान)* श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: महोदया, माननीय सदस्य हमारे ऊपर स्पीच दे गए जबकि माइन मिनिस्ट्री की चर्चा हो रही है। मुझे समझ में नहीं आता है कि ये किसे टार्गेट कर रहे हैं, क्या कर रहे है?
सभापति महोदया : उनके पास विषय नहीं होगा, कोई बात नहीं।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: मुझे ताज्जुब होता है कि यहां माननीय आडवाणी जी बैठे हैं, कम से कम उन्हें बताना चाहिए कि माइन मिनिस्ट्री पर चर्चा हो रही है, कोल मिनिस्ट्री पर नहीं हो रही है।
सभापति महोदया : अब रिकॉर्ड में नहीं जा रहा है। शैलेन्द्र जी, आप बोलिए।
...( व्यवधान)* ओश्री सतपाल महाराज (गढ़वाल) ः हमारे देश में आज भी अवैध खनन से करोड़ों अरबों रूपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। महोदया, मैं उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूं । उत्तराखंड राज्य प्रकृति की गोद में बसा हुआ है, जिसका भरपूर लाभ और प्यार उत्तराखंड की जनता और वहां आने वाले पर्यटकों एवं तीर्थ यात्रियों को मिलता है । शुद्ध हवा, पानी, जंगल, जड़ी-बूटी आदि के रूप में प्रकृति वहां सब पर प्यार लुटाती है । लेकिन इसी के साथ उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थिति मध्य हिमालय में अवस्थित होने के कारण कई बार वहां के निवासियों को दैवीय आपदाओं से भी दो-चार होना पड़ता है । उत्तराखंड राज्य ने वर्ष 2010 में भीषण आपदा का दंश झेला है । भारी भूस्खलन, बारिश, बादल आदि फटने की घटनाओं से वहां का सड़क मार्ग बुरी तरह प्रभावित हो क्षति ग्रस्त हो गया है ।
आपदा का दंश झेल चुके राज्य उत्तराखंड में विनिर्माण एवं औद्योगिकीकरण आवश्यक है । राज्य में आज खनन नहीं खुलने के कारण अवैध खनन माफिया पनप गया है । जिसके चलते सरकार को करोड़ों रूपये राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है साथ ही राज्य में रोजगार के अवसर भी लंबित पड़े हैं ।
नैनीताल जिले के रामनगर में कोसी-दाबका में अवैध खनन तेजी के साथ किया जा रहा है जो अत्यंत चिंता का विषय है । यहां वहां खनन खोल दिया जाए तो सरकार को करोड़ो रूपये राजस्व के रूप में प्राप्त होंगे ।
खनन खुलने के अभाव में वहां के निवासियों के लिए मकान बनाना भी एक स्वप्न बन कर रह गया है । यदि रेत, बजरी उपलब्ध नहीं होगी तो किस प्रकार सिर झुपाने के लिए लोगों को छत मिलेगी । ब्लैक मार्किटिंग से लेकर बनाना काफी महंगा पड़ता है । अभी कुछ ही समय पहले अवैध खनन के डंपर ने वहां एक बालक अमित बोड़ाई की जान ले ली न जाने ऐसी कितनी ही घटनाएं राज्य में अवैध खनन से हो रही हैं ।
______________________________________ * Speech was laid on the Table उत्तराखंड राज्य में कॉपर, फास्फेट और माईका की अपार संभावनाएं हैं जिन्हें चिन्हित कर यदि सरकार वहां इसका खनन खोल दे तो राजस्व के साथ-साथ राज्य के बेरोजगार युवकों को वहीं रोजगार के अवसर उपलब्ध हो जाएंगे । जब राज्य में ही रोजगार होगा तो व्यक्ति बाहर रोजगार की तलाश में क्यों जाएगा ।
कर्नाटक के जंगलों में अवैध खनन के चलते 1114.8 हैक्टेयर जंगल पर अवैध अतिक्रमण हो गया है । राज्य द्वारा अवैध खनन पर नियंत्रण के अभाव में बड़े पैमाने पर वन भूमि एवं गैर वन भूमि पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । कर्नाटक के बेलारी जिले और आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में अवैध खनन के मामले समाचार पत्रों में भी प्रमुखता से छपे जिन पर ध्यान देकर सरकार को आवश्यक कदम उठाने चाहिए ।
कर्नाटक में लौह अयस्क के अवैध खनन एवं घाटालों से देश को लगभग 60 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है । मा0 मुख्यमंत्री कर्नाटक श्री युदुरप्पा ने भी यह स्वीकार किया था कि 3 हजार करोड़ लौह अयस्क के अवैध खनन से 12 हजार करोड़ रूपया अवैध तरीके से राज्य के बाहर गया।
अवैध खनन के कारण पर्यावरण भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रहा है जिससे जल स्रोतों जैसे नदियां और झरनों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । अवैध खनन से वन क्षेत्र घटता जा रहा है तथा मिट्टी उर्वरकता एवं उत्पादकता में भी कमी आ रही है ।
इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।
ओश्री कौशलेन्द्र कुमार (नालंदा) ः सबसे पहले मैं, अवैध खनन की ओर इस सदन का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं । महाराष्ट्र में अवैध खनन माफियाओं ने इसका विरोध करने वाले कार्यकताओं को ट्रक के नीचे कुचल कर मार डाला । महाराष्ट्र में बालू का अवैध खनन हो रहा है । कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं के द्वारा अवैध खनन हो रहा है और ये लोग इतना पावरफुल है कि ये कर्नाटक की राज्य सरकार को हिलाकर रख देते हैं । गोवा में रेत माफियाओं के द्वारा सारा अवैध खनन होता है । महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के द्वारा मिट्टी के अवैध खनन होने से पर्यावरण को बहुत खतरा हो गया है ।
मैं सरकार से यह मांग करता हूं कि तत्काल अवैध खनन पर रोक लगाई जाए एवं अवैध खनन माफियाओं पर सख्त से सख्त कानून बनाए ताकि उनको सख्त से सख्त सजा मिल सके ।
मैं इस सदन के माध्यम से सरकार से यह भी मांग करता हूं कि देश में अवैध खनन, जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही है को रोकने के लिए विशेष कार्य योजना बनाए जाने की आवश्यकता है एवं अवैध खनन में लिप्त व्यक्तियों को कठोर दण्ड दिए जाने की आवश्यकता है।
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को और अधिक निधियां आवंटित करके तथा उसकी जनशक्ति बढ़ाकर मजबूत किए जाने की आवश्यकता है । पिछले दिनों मेरे संसदीय क्षेत्र नालंदा के बेन प्रखंड के बड़की ऑट में भपूरत में दरार पड़ने से लगभग साठ मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे जोकि अधिकांश गरीब, पिछड़ों एवं अनुसूचित जाति के व्यक्तियों के थे यहां पर जांच करने के लिए जी.एस. आई की टीम गयी थी और रिपोर्ट से भारत सरकार को अवगत कराया गया था, लेकिन अभी तक उन आदमियों को क्षतिग्रस्त मकानों का मुआवजा नहीं मिला है । मैंने यह मांग इस सदन में विशेष उल्लेख नियम 377 के तहत उठाया था लेकिन अभी तक सरकार ने मेरी मांग को नहीं माना है ।
एक बार फिर मैं इससदन के माध्यम से यह मांग करता हूं कि उन पीड़ित व्यक्तियों को सरकार मुआवजा दे ताकि गरीब आदमी फिर से अपना मकान बना सकें । इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।
_______________________________________ * Speech was laid on the Table श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): सभापति महोदया, आपने मुझे खनन मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदानों की चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। हमें चर्चा को सुनकर बहुत दुख होता है कि जब किसी महत्वपूर्ण विभाग की चर्चा होती है तो डिस्ट्रक्टिव चर्चा ज्यादा होती है और कन्सट्रक्टिव चर्चा नहीं हो पाती है। मैं कोयला मंत्री जी से कहूंगा कि अगर पूरा भाषण उसी पर हुआ है और एनडीए में ब्लाक नहीं मिला तो एक ब्लाक आपने बांटा और एक उधर भी दे दीजिए।
खनन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2496 अवैध खदानों से मुख्य खनिज और 2855 अवैध खदानों से लघु खनिज निकाले गए हैं। देश भर में देखा जाए तो लगभग 30,000 के करीब अवैध खनन है। पिछले सत्र में हमने अवैध खनन के बारे में बड़े विस्तार से चर्चा की थी जिसमें 12000 मामले अवैध खनन के आए थे। हमारे कहने का मतलब है कि सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर खनन नीति बनानी चाहिए। देश में जो अवैध खनन हो रहा है इससे राजस्व का बहुत नुकसान हो रहा है और कुछ इने-गिने लोगों के पास ही धन जा रहा है। मैं चाहता हूं कि खनन मंत्रालय इसरो से बात करके सैटेलाइट की ऐसी व्यवस्था करे जिससे देखा जा सके कि कहां-कहां प्राकृतिक संपदा है, कहां-कहां अवैध खनन हो रहा है। मंत्री जी को इस बारे में सोचना चाहिए। अभी सुझाव आए हैं, यह बात सत्य है कि यह कोई मामूली कार्य नहीं है। सरकार उद्योग जगत के साथ मिलकर प्राकृतिक संपदा के लिए अच्छी कार्य प्रणाली बनाए जो खनन नीति पर आधारित हो, रोजगार परक हो। इसमें वनों का भी संरक्षण होना चाहिए। समाचार पत्रों में भी देखा गया है, राहुल गांधी जी ने उड़ीसा का दौरा किया था, कालाहांडी में नियमगिरी पहाड़ियों में वेदांता और पोसको लौह अयस्क परियोजना थी, उस पर गुप्ता समिति ने भी विभाजित फैसला दिया और रोक लगाई गई। अभी हमारे मित्र कह रहे थे कि कुछ परियोजनाएं केंद्र सरकार में चार साल से लंबित पड़ी हैं, उसे भी मंजूरी देने की आवश्यकता है। आपने महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट में 46 लाइसेंस जारी किए और पर्यावरण मंत्रालय ने इस पर आपत्ति जताई है, गहरी चिंता व्यक्त की है। आपने अवैध खनन को रोकने के लिए कार्य योजना बनाई है, खास तौर से 10 प्रदेशों में जिनमें आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड है। यह बहुत अच्छी बात है लेकिन जहां खनन हो रहे हैं वहां जो परमिट दे रहे हैं उसकी भी निगरानी होनी चाहिए। इसके साथ ढुलाई पर भी विशेष निगरानी की आवश्यकता है इससे ही अवैध खनन को रोका जा सकता है। खनन के इलाकों में झारखंड और छत्तीसगढ़ कुछ इलाके ऐसे हैं जहां नक्सलवाद और स्थानीय लोगों के विरोध के कारण बहुत परियोजनाएं रुकी हैं, चाहे पोसको की बात हो, वेदांतां की बात हो, अरसलर की बात हो, मित्तल जैसी बड़ी कंपनियां हैं जिसकी वजह से वहां खनन नहीं हो पाया है। आपको इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्कता है। आपने 26 प्रसिद्ध स्थानीय लोगों के साथ बात की और कुछ कंपनियों ने इसका विरोध भी किया है, आपको कंपनी और स्थानीय लोगों के साथ वार्ता करके कोई रास्ता निकालना चाहिए जिससे वहां कुछ कार्य हो सके। महोदया, उत्तर प्रदेश में सहारनपुर से लेकर हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली तक सैंकड़ो स्टोन क्रशर लगे हुए हैं। कुछ नदियों के सीने को चीरकर जेबीसी मशीन लगाकर खनन हो रहा है। मेरे ख्याल से उन नदियों में 50 फीट के करीब गड्ढा हो गया है। मैं चाहता हूं कि इसका मूल्यांकन होना चाहिए। वहां उत्तर प्रदेश उप खनिज परिहार नियमावली 1963 के नियम 69 के तहत ठेकेदार काम कर रहे हैं।
यह 1963 का बहुत पुराना कानून है। लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि जो हमारी नियमावली बनी है, उसमें कहीं खामियां तो नहीं हैं, इसके भी मूल्यांकन की आवश्यकता है। मैं चाहूंगा कि माननीय मंत्री जी इसे भी गंभीरता से लें। चूंकि मैं थोड़ा बहुत कोयला खनन के बारे में बोलना चाहता था, लेकिन उस पर चर्चा नहीं हो रही है, इसलिए नहीं बोलूंगा। लेकिन हिंदुस्तान में जो यूरेनियम, कोयला, एल्युमीनियम, लौह, मैंगनीज, लौह अयस्क, सोना, डायमंड तमाम ऐसी हमारी प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए और विस्तार से देखना चाहिए कि इनके तमाम स्रोत कहां हैं, जिनका हम उपयोग और विकास कर सकते हैं।
महोदया, हमारे क्षेत्र में एक गांव शमसाबाद है, वह करीब 10-15 मील के अंदर पड़ता है। वहां की मिट्टी में पता नहीं क्या खासियत है कि वहां की मिट्टी से लोग तांबे और पीतल के बर्तन बनाते हैं। आज भी लोग बनाते हैं। मुझे याद है, जब मेरे पिता जी केन्द्र में लेबर मिनिस्टर थे तो वहां उन्होंने बर्तन बनाने वाले लोगों के लिए एक कार्यशाला बनवाई थी। आज आवश्यकता इस बात की है कि जहां की मिट्टी में इस प्रकार की खूबियां हैं, ज्यादातर खनिज हम मिट्टी से ही निकालते हैं, चाहे सोना हो या चांदी हो या तमाम तरह के खनिज हों। मैं चाहूंगा कि एक दल के द्वारा आप हमारे क्षेत्र जनपद कौशाम्बी, उत्तर प्रदेश गांव का नाम शमसाबाद है, वहां की मिट्टी का आप परीक्षण करा लें, यदि वहां की मिट्टी उपयोगी है तो तत्काल उसे अधिग्रहीत करने की आवश्यकता है। चूंकि बाहर के बहुत से लोग वहां आते हैं और वहां की मिट्टी को बोरों में भरकर ट्रकों में डालकर ले जाते हैं। इसका मतलब है कि वहां अच्छा स्रोत है, रोजगार की अच्छी संभावनाएं हैं।
मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं कि ज्योलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की जो निधियां और शक्तियां हैं, उन्हें भी बढ़ाने और मजबूत करने की आवश्यकता है। आजकल तमाम ऐसे निर्यात हम कर रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हम नई खनन नीति की समीक्षा करें और तब तक निर्यात पर थोड़ी रोक लगाकर हमें नई खनन नीति बनानी चाहिए, ताकि हमारा सामान बाहर जा सके और हमें विदेशी मुद्रा की प्राप्ति हो सके, जिससे राजस्व में बढ़ोतरी हो सके।
हमारे कुछ सम्मानित सदस्यों ने बड़े अच्छे सुझाव दिये हैं कि जहां अवैध खनन होता है या लौह अयस्क के स्रोत हैं, उनका राष्ट्रीयकरण करने की आवश्यकता है। अगर उनका राष्ट्रीयकरण होगा तो वहां अवैध खनन रुकेगा, सरकार को फायदा होगा और रोजगार का भी सृजन होगा। आज खनन पट्टा और सरकारी क्षेत्रीय कंपनियों को हमें प्राथमिकता देनी पड़ेगी, जिसमें आपने आरक्षण की फिफ्टी-फिफ्टी की व्यवस्था की है, जो बहुत अच्छी बात है।
मंत्री जी मैं एक सुझाव देना चाहूंगा कि जिस प्रकार से खनन ब्लाकों से लोग कमाते हैं, उस पर आप रॉयल्टी लगाते हैं, हम चाहते हैं कि आपको उसकी टोटल इंकम पर टैक्स भी लगाना चाहिए, जिससे राजस्व में बढ़ोतरी हो सके। इसके अलावा हमारे जंगलों में जनजातीय समुदाय ज्यादा रहता है। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि उनके इंटरैस्ट के रोजगार वहां लगाकर उन्हें रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता है। इसमें जनजातीय मंत्रालय और आपके मंत्रालय ने कुछ पहल भी की है, उस पर मैं विस्तार में जाना नहीं चाहूंगा। लेकिन जहां खनिजों के भंडार हैं, वहां पर हमें विपणन नीति बनानी पड़ेगी और उस व्यवस्था को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
इसके अलावा स्वर्ण धातु से बने जो हमारे बहुमूल्य सामान होते हैं, उनका भी उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है और हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम उसे बढ़ावा दें। इसके अलावा खानों के आबंटन में आपने 50-50 के आरक्षण की व्यवस्था की है, जिसमें जो बेरोजगार नवयुवक हैं, अभियंता हैं, सेना के शहीद आश्रितों, शेडय़ूल्ड कास्ट्स, शेडय़ूल्ड ट्राइब्स, ओबीसी और विशेषकर जो पिछड़े वर्ग के लोग और अल्पसंख्यक हैं, उनके लिए आपने व्यवस्था की है।
हमारे देश में खनन खासकर जंगलों में होता है, वहां पर हमारी कोशिश होनी चाहिए कि जो सरिस्का, रणथंभौर आदि जगह हैं, वहां अधिसूचित वन्य जीव अभयारण्य, जो हमारे राष्ट्रीय पार्क हैं, खनन की मंजूरी देने से पहले हम इसका मूल्यांकन करें कि इससे ये प्रभावित तो नहीं हो रहे हैं, हमें इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा। खासकर जहां खनन होता है, खनन से जो जमीनें बिग़ड़ जाती हैं, कुछ पेड़ों के अवैध कटान हो जाते हैं, वहां पर वनरोपण की व्यवस्था होनी चाहिए, वहां वृक्षारोपण का अभियान चलाया जाए तो बहुत अच्छा होगा। जिससे वहां पहले जैसे जंगल बन जाएं। इसके अलावा जो लोग अवैध खनन में लिप्त पाये जाएं, उन्हें कठोर दंड देने की आवश्यकता है, उनके लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए, इसके लिए चाहे आप अलग से कोई व्यवस्था करें।
अंतिम बात मैं कहना चाहूंगा, यह हमारे उत्तर प्रदेश से जुड़ा हुआ सवाल है। मिर्जापुर से लेकर बुंलेदखंड और सोनभद्र तक बहुत सी छोटी-छोटी पहाड़ियां थीं, उन पर छोटे-छोटे पेड़ थे और खासकर बरसात में वे बहुत अच्छे लगते थे। लेकिन इस बीच देखा गया है कि वे पहाड़ बिल्कुल साफ हो गये हैं, वे दिखाई नहीं पड़ते हैं। वहां तमाम माफिया लोगों ने सरकार से मिलकर उन पहाड़ों को बिल्कुल तोड़ दिया है, जिससे वहां के पर्यावरण को बहुत बड़ा खतरा पैदा हो गया है। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आपका टर्न आ रहा है। आपकी बारी आने वाली है। शैलेन्द्र जी, आप वाइंड अप करें।
श्री शैलेन्द्र कुमार : यह उजागर है कि उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा लखनऊ या नौएडा में पत्थरों से ही काम हुआ है, इसलिए सरकार को पत्थरों से ज्यादा प्यार हुआ है। मैं चाहूंगा कि जहां पर इस प्रकार के पत्थर के ज्यादा निर्माण हो रहे हैं, वहां पर्यावरण और वन विभाग को देखना चाहिए कि वहां वृक्षारोपण हो, ताकि वहां पर्यावरण शुद्ध हो सके।
इन्हीं बातों के साथ मैं कहना चाहूंगा कि इस प्रकार के जो भी अवैध खनन हो रहे हैं, जहां पहाड़ों को नष्ट किया जा रहा है, वहां केन्द्र सरकार पहल करके इसे कड़ाई से रोके। इसी के साथ महोदया आपने मुझे इस अनुदान की मांगों पर चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
ओश्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी) ः मैं माननीय मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि जब से इन्होंने इस मंत्रालय का कार्यभार ग्रहण किया है, मंत्रालय के काम में पारदर्शिता, दक्षता एवं तीव्रता आ गई है । मंत्रालय से लेकर छोटी-छोटी खान ईकाईयों तक श्रेष्ठ कार्यवाही का असर दिखाई दे रहा है ।
खान मंत्रालय राष्ट्रीय संपत्ति का रखवाला है । हर प्रकार की खनिज संपदा जो भूमि के नीचे छुपी हुई है, उसका किस प्रकार कार्य-कुशलता के साथ प्रबंध किया जाए ताकि इसका अधिकतम लाभ राष्ट्र को मिल सके । हम सब इस बात से अवगत है कि विभिन्न खनिजों से हमारी अर्थव्यवस्था चलती है । बिना खनिजों की उपलब्धता के आधुनिक सभ्यता और संस्कृति अपने चरम पर नहीं दिखाई दे सकती है । चाहे बिजली के उत्पादन से संबंधित तापीय विद्युत घरों के निर्माण की बात हो, चाहे सीमेंट के उत्पादन की बात हो या फिर इस्पात या स्टील के बड़े-बड़े प्लांट लगाने की बात हो । ये सभी खनिज मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले खनिजों पर ही तो निर्भर है । हमें इस बात का भी अहसास है कि विभिन्न खनिज जो हमारी राष्ट्रीय संपदा है को असीमित नहीं है । उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उनका दोहन वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहिए । खनन करने के बाद संबंधित उद्योगों को खनिज उपलब्ध हो, देश का विकास हो, देश की विकास दर में इन उद्योगों की अपनी भूमिका हो, ये सब मंत्रालय द्वारा आज सुनिश्चित किया जा रहा है, लेकिन खनन की प्रक्रिया में कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखा जा रहा है कि खनन वैज्ञानिक ढंग से हो चाहे ओपन कास्ट हो या अण्डर ग्राउण्ड हो । तथा उतनी ही मांत्रा में खनन किया जाना जितनी आवश्यकता हो। खनन ईकाईयां जो अधिकांश जंगल तथा आदिवासी लोगों की आबादी में स्थित है का भी विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है कि पर्यावरण को कोई क्षति ना पहुंचे और यदि हमारी वन संपदा को खनन प्रक्रिया में क्षति पहुंचती है, तो नियमानुसार उसके स्थान पर दोगुना वृक्षारोपण का काम सुनिश्चित किया जाए । खनन क्षेत्रों से हमारे गरीब किसान आदिवासी भाईयों को विस्थापित किया जाना आवश्यक है, तो उनके पुनर्वास की सुविधा होनी चाहिए, उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था के अतिरिक्त विस्थापित होने के बदले मुआवजा की राशि, चिकित्सा, शिक्षा, स्वच्छ पेयजल तथा सड़क आदि की मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चत की जानी चाहिए ।
_______________________________________ * Speech was laid on the Table मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि आपके मंत्रालय के अंतर्गत सार्वजनिक उद्योगों के शुद्ध लाभ का 1 प्रतिशत भाग सी.एस.आर.(Corporate Social Responsibility) के अंतर्गत योजनाओं पर किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत प्रभावित खनन क्षेत्रों में आम जनता को आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है ।
मैं यह चाहूंगा कि यह सुनिश्चित करें कि सी.एस.आर. के अंतर्गत है कि कम से कम 70 प्रतिशत धनराशि अनुसूचित जाति/जनजाति के क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा इस वर्ग के लोगों को आर्थिक दृष्टि से उन्नत बनाने वाली योजनाओं पर खर्च हो ।
मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि खनन मंत्रालय के अंतर्गत खनिजों के उत्पादन में वृद्धि की जा रही है । आवश्यकतानुसार सभी उद्योगों को खनिज उपलब्ध कराया जा रहा है । राज्य सरकारों के अनुरोध पर उन्हें किसी भेद-भाव के उनके राज्यों में स्थापित बिजली उत्पादन केन्द्र, सीमेंट प्लांट, इस्पात आदि की पूर्ति की जाती है और यदि किसी उद्योगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विदेशों से खनिज आयात करने के लिए ओ.जी.एल. के अंतर्गत अनुमति भी प्रदान की जा रही है । जहां एक तरफ अधिकतम खनिजों की उत्पादन मात्रा में वृद्धि हुई वहीं एक तरफ अवैध खनन पर अंकुश लगाने का सराहनीय कदम उठाए है ।
मैं माननीय मंत्री जी को बधाई इसलिए भी देना चाहता हूं कि निष्पक्षता और पारदर्शिता से मंत्रालय तथा उससे संबंधित खनन का कार्य संपादित किया जा रहा है जो देश के विकास में अपनी अहम भूमि अदा की जा रही है । इसी के साथ खान मंत्रालय के लिए प्रस्तुत मांगों का मैं समर्थन करता हूं ।
ओश्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा) ः देश में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक साधन प्रकृति ने हमें दिए हैं जो एक बार ही निकाले जा सकते हैं । इसके लिए हमें उनका उत्खनन कार्य संयोजित ढंग से करना चाहिए और उत्खनन कार्य ऐसे ढंग से करने की आवश्यकता भी है कि जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल असर न पड़े और इस उत्खनन कार्य से आस-पास के रहने वाले गांव के लोगों पर प्रतिकूल असर न पड़े परंतु सरकार ने जो खनिज नीति बनाई है उसमें इन उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो रही है । प्राकृतिक साधनों का दोहन मनमाने ढंग से हो रहा है जिससे पर्यावरण को खतरा एवं प्रदूषण बुरी तरह से फैल रहा है और खानों के पास रहने वाले गरीब एवं पिछड़े आदिवासी लोगों का शोषण हो रहा है ।
खानों की सुरक्षा के लिए कई दिशा निर्देश दिए हैं परंतु उन पर कोई पर नियमों के अनुसार कार्यवाही नहीं हो पाती है । 2010 में खान सुरक्षा संबंधी नियमों की 140 घटनाएं हुई और 119 गंभीर दुर्घटनाएं हुई जिसमें 175 व्यक्ति प्रभावित हुए और कई मारे गए । देखा गया है कि सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा तो सुरक्षा नियमों के कानूनों का पालन किया जाता है परंतु जो निजी क्षेत्र की खाने में या अवैध खाने चल रही होती है उन पर खान दुर्घटनाएं अधिक हुई है । 2009 में खान सुरक्षा नियमों के संबंध में 33,199 कारण बताओ जारी किए गए इतनी बड़ी संख्या में नियमों की अवहेलना हो खान सुरक्षा नियमों का कोई मायना नहीं रह जाता है । सदन के माध्यम से सरकार से पूछना चाहता हूं कि गत तीन वर्षों के दौरान खान सुरक्षा नियमों की अवहेलना किए जाने पर कितने लोगों को सजा दी गई । सरकार केवल एक आदेश देकर दोषियों को छोड़ देती है ।
भारतीय ब्यूरो आफ माईन्स की जिम्मेदारी है कि खानों का सर्वेक्षण करे, एवं इस बात को सुनिश्चित करे कि पर्यावरण संबधी नियमों का पालन हो, एग्रीमेंट से अधिक क्षेत्र में दोहन तो नहीं हो रहा है। आईबीएम ने अपने निरीक्षण कार्य में यह लक्ष्य रखा कि वे 2010 में 2000 माईन्स का निरीक्षण करेगी परंतु मात्र उसने 903 निरीक्षण कार्य किया और जिसमें 288 मामले उल्लंघन के नोटिस किए । आईबीएम अपने निरीक्षण कार्य के लक्ष्य में असफल रहा । 903 में केवल 82 खानों पर कार्यवाही की जिसमें केवल 3 का लाईसेंस रद्द किया है और 64 को कारण बताओ नोटिस दिया । इससे लापरवाही की घटनाएं बढ़ती है।
_______________________________________ * Speech was laid on the Table खानों को लीज पर दिए जाने के मामले में काफी भ्रष्टाचार देखा गया है । कुछ फर्मे माफिया के बदोलत ऐन केन प्रकेरण खानों को लीज पर ले लेती है जिसे बाद में सब लीज पर दे देती है । सब लीज पर लेना वाल खानों पर न तो नियमों की मुताबिक काम करता है और आस पास रहने वाले आदिवासियों का शोषण भी बुरी तरह से करता है । इसके लिए आंदोलन भी होते हैं और आदिवासियों में आक्रोश की भावना बढ़ रही है । 2009-10 में आईबीएम ने 2240 खानों को प्राइवेट को दिया, 221 खाने पब्लिक सेक्टर को दिया । आईबीएम द्वारा फर्मे लीज पर दी जाती है उन पर जो एग्रीमेंट किया जाता है वह प्राईवेट फर्मों के हित में ज्यादा रहता है अपेक्षाकृत देश के हित के । खनिज रियायतों का खेल भी भ्रष्टाचार से दूर नहीं है । खनिज रियायतों पर सरकार ज्यादा चिंता करती है अपेक्षाकृत आदिवासी कल्याण के ।
हर साल खनिज नीति पर तरह तरह के सवाल उठते रहे हैं पहिले की खनिज नीतियों में खान के पास रहने वाले एवं खान उल्खन की प्रक्रिया से विस्थापित होने वाले आदिवासी की उपेक्षा की जाती है और खान सुरक्षा पर केवल दिखावे के लिए नियम बना दिए जाते हैं परंतु आदिवासी के बढ़ते आंदोलन एवं आधुनिक युग की कई तकनीकी के विकसित होने से खनिज नीति में बार परिवर्तन होते रहे हैं परंतु अभी खान नीति जो 2008 में पारित की गई उस पर समुचित ढंग से कार्य नहीं हो रहा है । खान एवं खनिज । विकास एवं नियमन । एक्ट के 1957 में एक 1095 दर्ज किए गए हैं 2010 में 248 मामले अभी तक लंबित हैं इससे यह साफ होता है कि हम अवैध खानों के खिलाफ सशक्त कार्यवाही नहीं कर पा रहे हैं ।
खनिज क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर आसपास के आदिवासी लोग ही रहते हैं जिनको यथोचित मजदूरी नहीं दी जाती है उनको समुचित उपकरण उपलब्ध ही नहीं कराए जाते हैं । यह भी देखा गया है अवैध खानों में काम करने वाले मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पा रही है और काम करने के घंटे भी ज्यादा है जबकि इन खतरनाक कार्यों में कुशल मजदूर का होना आवश्यक है। खान मंत्रालय को खनिज क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों के कल्याण एवं हित की तरफ देखना चाहिए । एवं राज्यों में मजदूरों के संबंध में एवं खान संबंधी अलग-अलग कानून है जिसमें समरूपता होना चाहिए हालांकि सरकार इस पर विचार कर रही है परंतु सरकार को विचार करते हुए बहुत दिन हो गए हैं ।
खान एवं खनिज कानून 1957 में संशोधन करने की बात चल रही है परंतु इस पर अभी तक एक राय नहीं हुई है । इस कार्य में कई लाबियां जो अपने प्रभाव से इस संशोधन करने के कार्य में देरी करवा रही है जो ठीक नहीं है । विधेयक में देश हित में प्रमुखता देनी होगी और इस प्राकृतिक सांधनों की बंदरबाट रोकने के लिए अच्छे प्रभावशाली विधेयक को लाना होगा । खान एवं खनिज क्षेत्र में काम करने वाले सभी अपने हित की स्वार्थ पूर्ति के लिए लगे हैं परंतु सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि देश हित, पर्यावरण एवं आदिवासी के कल्याण को भी इस विधेयक में स्थान देना चाहिए ।
खान एवं खनिज नीति एवं इस संबंध में बने कानूनों में आदिवासी एवं खनिज उल्खन कार्यों के उपरांत पर्यावरण को बनाए रखने के लिए बाग, जंगल बनाए जाने के कार्य किए जाए जो भारत में नहीं हो रहे हैं । विदेशों में खान एवं खनिज उल्खन कार्य के उपरांत अच्छे बाग, जंगल एवं कई अन्य कार्य किए जाते हैं जिनसे पर्यावरण को बनाए रखने में मदद मिलती है परंतु भारत में खान एवं खनिज निकालने के बाद फर्म रफा दफा हो जाती है । भारत में खान उत्खनन के बाद पर्यावरण बनाए रखने के लिए प्राथमिकता देनी होगी ।
खान एवं खनिज के संबंध में रॉयल्टी की दर को बढ़ाया जाए क्योंकि महंगाई के कारण एवं खान एवं खनिज पदार्थों के मूल्य में वृद्धि हुई है उसके अनुरूप रॉयल्टी की दर को बढ़ाना चाहिए । खान एवं खनिज क्षेत्रों के पास जो आदिवासी लोग हैं जिनकी जमीन चली जाती है उनके मुआवजा पुरानी दरों पर दिया जा रहा है इसके लिए खान एवं खनिज कार्यों के लाभांश में हिस्सेदारी देनी चाहिए ।
मैं इन प्रस्तावित अनुदानों की मांग का विरोध करता हूं क्योंकि यह अनुदान देश में प्राकृतिक साधनों का समुचित ढंग से दोहन नहीं कर पाएगी और पर्यावरण संबंधी बढ़ रही समस्या को रोकने में असफल रहेगी ।
ओश्रीमती जयश्रीबेन पटेल (महेसाणा) ः खान मंत्रालय देश के विकास और उन्नति के लिए जो कुछ मंत्रालय है इसमें महत्वपूर्ण मंत्रालय है । उनके तहत 6 विभागों में उत्तरदायित्व का विभाजन किया है । जिसमें कोयला, खनिज, एल्युमिनियम, जस्ता, तांबा, सोना, हीरा, शीशा और निकल मुख्य है ।
इस मंत्रालय के कार्यान्वयन के लिए 2009-10 में 948, 2010-11 में 1763, 2011-12 में 1589 करोड़ रू. का बजट आबंटित किया गया है । वो उनके कार्यान्वयन को देखते हुए बहुत कम है ।
खनिज संपदा पूरे देश की संपदा है इस पर केन्द्र और राज्यों का बराबरी का हिस्सा है । कइ राज्यों के साथ केन्द्र का रवैया खनन के बारे में ठीक नहीं है । कहीं किसी को ज्यादा रियायतें मिलती है तो कहीं किसी को कम ।
गुजरात आज औद्योगिक विकास में भारत का अग्रसर राज्य बन गया है । उसके विकास के अंतर्गत कोयला और अन्य खनिज की गुजरात को आपूर्ति की जाए वो बहुत जरूरी है ।
गुजरात सरकार की मांग है कि CRZ विस्तारों में खनन प्रक्रिया पर केन्द्र सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से लादे गए बंधनों में छूट देनी चाहिए तब ही गुजरात विकास के पद पर और आगे बढ़ेगा ।
CRZ अधिनियम 1991 के मुताबिक CRZ विस्तार में खनिज - (न्यूनतम वृद्धि रेखा), (लो टाइड लाइन) और अधिकतम वृद्धि रेखा (हाई टाइड लाइन) के बीच और अधिकतम वृद्धि रेखा से जमीन की ओर 500 मीटर तक के पट्टे के विस्तार में खनिज की खनन प्रवृतियों पर रोक है ।
गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ विस्तार की समुद्री पट्टी में लाइम स्टोन का विपुल मात्रा में जत्था संग्रहित है । उसको लेने में भारी दिक्कत पड़ती है क्योंकि CRZ विस्तारों में खनन प्रक्रिया पर केन्द्र सरकार ने जो प्रतिबंध किया है उसके कारण खनिज को नहीं निकाल सकते ।
CRZ अधिनियम अस्तित्व के पहले सौराष्ट्र के कई हिस्सों में सीमेंट उद्योग स्थापित थे । जिसके लिए रॉ मैटीरियल वाले लाइम स्टॉन की खानें CRZ विस्तार में ही आती है । ऐसे ज्यादातर स्थानिक रोजगार उपलब्ध कराने वाला यह सीमेंट उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच चुका है ।
_______________________________________ * Speech was laid on the Table इसके तहत बेरोजगारी तो बढ़ेगी ही और कई समस्याएं उठ खड़ी होंगी । यह सीमेंट उद्योग केन्द्र सरकार के निषेधाग्या के कारण चपेट में आ गया है । सारी फैक्टरियां बद पड़ी है ।
गुजरात सरकार द्वारा इसी CRZ विस्तार में लाइम स्टोन की खनन प्रक्रिया को मंजूर करने के बारे में है । क्लीनिकल अभ्यास (सर्वे) हाथ में लिया है और इस अभ्यास के आधार पर इस तरह की प्रक्रिया को मंजूरी दिलाने के बारे में भारत सरकार के साथ संपर्क किया है और कई दिनों से यह प्रश्न भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास लंबित पड़ा है ।
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री की ओर से 8.8.2009 को एक पत्र माननीय मुख्यमंत्री गुजरात सरकार को लिखा है कि प्रोफेसर स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों के आधार पर CRZ अधिनियम में सुधार की प्रक्रिया चल रही है और इसके अंतर्गत राज्य सरकार की ओर से कोई सिफारश और सुझाव हो तो केन्द्र सरकार को भेजने का निर्देश किया है जिससेCRZ अधिनिमय 1991 के सूचित सुधार में उनका समावेश किया जाए ।
इसके तहत CRZ विस्तार में खनन प्रक्रिया करने की छूट दी जाए इसके लिए गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा 29.1.2010 के पत्र द्वारा माननीय प्रधान मंत्री को ब्यौरे वार संपर्क किया है।
इस पत्र के अनुसंधान में भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय माननीय मंत्री जी द्वारा 24.2.2010 के पत्र के अनुसंधान द्वारा जानकारी दी गई है कि हाल के प्रवर्तमान CRZ के नोटिफिकेशन में सुधार लाने की कार्यवाही हाथ में ली है । इसके तहत आपकी मांगों पर योग्य विचार किया जाएगा ।
गुजरात सरकार ने बार-बार केन्द्र सरकार के साथ पत्राचार किया है लेकिन परिणाम शून्य है।
फिर से CRZ के नोटिफिकेशन में सुधार लाने के लिए पक्षकारों के साथ सोच-विचार करने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव द्वारा 6.7.2010 को रखी गई बैठक में इस मुद्दे के अंतगत गुजरात के वन और पर्यावरण विभाग द्वारा पेश किया गया है ।
मेरा सुझाव है कि गुजरात सरकार की यह मांग जायज है और डा. स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाए । केन्द्र सरकार की निषेधात्मिकता 1991 लागू नहीं होनी चाहिए तथा इसका खुलासा करके गुजरात के सीमेंट उद्योगों को बचाया जाए ।
सुझाव ः
1. सीमित भण्डारों को देखते हुए देश में नई खनन पट्टियों की पहचान की जानी चाहिए ।
2. खनन क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना चाहिए तथा खनन क्षेत्र में अधिक विदेशी निवेश आकर्षित किए जाने की आवश्यकता है ।
3. नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन तथा अन्य कंपनियों द्वारा खनिजों के मूल्य में अंतर को हटाया जाए ।
4. देश में हो रहे अवैध खनन को रोकना चाहिए तथा अवैध खनन में लिप्त व्यक्तियों को दंड दिया जाना चाहिए ।
5. खनिजों के खनन तथा उत्पादन को बढ़ाने के लिए नई तकनीक अपनाई जानी चाहिए ।
6. खनन के निजी मालिकों द्वारा कमाए लाभ पर रॉयल्टी के साथ कर लगाया जाना चाहिए ।
7. सोना, हीरा तथा अन्य बहुमूल्य धातुओं के आयात पर भारी खर्च को देखते हुए उनका उत्पादन बढ़ाया जाए ।
8. लौह अयस्क की बढ़ती कीमतों को देखते हुए लौह अयस्क के निर्यात पर रोक लगानी चाहिए ।
9. खनिज के खनन के लिए कई भूस्तर शास्त्रियों की जरूरत पड़ती है तो उसके लिए गुजरात में डिप्लोमा/िडग्री कॉलेजों में सीटों का बढ़ावा किया जाए और रिसर्च सेंटर दिया जाए और हो सके तो एक खनिज शिक्षा यूनिवर्सिटी की व्यवस्था की जाए ।
10. खनिज खनन के बारे में कई समस्याएं हैं उसको साथ बैठ के सुलझाया जाए और हो सके तो एक कमेटी बिठाई जाए जिससे कोई ठोस नीति तय हो सके ।
ओडॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी (अहमदाबाद पश्चिम) ः हम खुशनसीब हैं कि हमारे देश भारत में विपुल मात्रा में खनिज संपदा भरी हुई है । हमारे कई राज्यों में विविध प्रकार की खनिज संपदा के भंडार भरे हैं । समग्र विश्व में हमारा ही एक मात्र भारत वर्ष है कि जिसकी जमीन में अलग-अलग प्रकार की विविध खनिज संपदा उपलब्ध है । समग्र दुनिया के किसी भी देश की तुलना में हम इन बात पर खुशनसीब है और कुदरत का पूर्ण आशीर्वाद भी है ।
इतनी सारी खनिज संपदा होते हुए भी हम उनका ठीक तरह से उपयोग कर सके नहीं है । ये बहुत ही दुखद और कमनसीब बात है । इतनी सारी प्राकृतिक संपदा होते हुए भी आजादी के 63 वर्ष बाद भी उनका ठीक तरह से उपयोग नहीं हो पाया है ।
योजना आयोग ने वर्ष 2005 में राष्ट्रीय खनिज नीति अधिनियम 1957 में सिफारिशें के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित की थी । ये समिति की रिपोर्ट पर मार्च 2008 में राष्ट्रीय खनिज नीति अधिसूचित की गई । इस खनन नीति में कई खामियां हैं ।
केन्द्र सरकार के दबाव में आकर पर्यावरण मंत्रालय ने 344 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर 380 हजार हेक्टेयर कर दिया है । 36 हजार हेक्टेयर घने जंगलों का विनाश हो जाएगा ।
हमारे पास उपयुक्त कोयले का भंडार केवल 160 वर्षों के लिए ही पर्याप्त है । इसे निकालने की सारी तकनीक फिलहाल अभी उपलब्ध नहीं है । अगर हम कोयले का खनन दुगुना करेंगे तो कुछ ही वर्षों में ये समाप्त हो जाएगा ।
बिजली उत्पादन के दुप्रभाव गरीब पर पड़ते हैं । उनके खेत अधिग्रहित होते हैं, उनका पशुपालन का व्यवसाय हाथ से निकल जाता है, जंगल कटने से भूमि का तापमान बढ़ता है । बिजली के माध्यम से देश के संसाधनों को गरीबों से छीनकर अमीरों को हस्तांतरीत किया जा रहा है, जो अनुचित है ।
_______________________________________ * Speech was laid on the Table · सरकार की जंगल को "गो" तथा "वो गो" क्षेत्र में विभाजित करने की नीति गलत है। · ओवरलोडिंग और अवैध खनन को वैध बनाना चाहिए । खनन में स्वामित्व और रॉयल्टी की सरकारी देनदारियों के सापेक्ष ठेकेदार 15-20 गुना तक मुनाफा बटोर लेते हैं । · खनन कंपनियों के मुनाफे में हिस्सेदारी होनी चाहिए, ताकि गरीब को लाभ पहुंचाया जा सके । जनभागीदारी होनी चाहिए । · अवैध खनन रोकने के लिए सेटेलाईट तस्वीरों के इस्तेमाल पर जोर देना चाहिए । · राज्यों में ट्रंसपोर्ट परमिट पर निगरानी रखनी चाहिए । · खनन आबंटन में आरक्षण होना चाहिए । जनजाति क्षेत्र में नए पट्टे खनन से होने वाले लाभ का 30 प्रतिशत पैसा स्थानीय विकास पर खर्च होना चाहिए । · वन सीमा के क्षेत्र से 25 मीटर के दायरे में आवंटन नहीं होना चाहिए । · खान आवंटन में आरक्षण बेरोजगार युवकों को, सेना के शहीदों के आश्रितों, अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, विशेष पिछड़ा वर्ग को मिलना चाहिए । · खनन पट्टों के बीच में गए क्षेत्र के निर्धारण के लिए अलग प्रक्रिया बननी चाहिए ।
मेरा आपसे अनुरोध है कि सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर नई खनन नीति बनानी चाहिए । सरकार और उद्योग जगत को मिलकर दुनिया की उत्कृष्ट कार्यप्रणालियों पर आधारित खनन नीति तैयार करनी चाहिए ।
ओश्री नारनभाई कछाड़िया (अमरेली): हम लोग अच्छी तरह से जानते हैं, कि हमारा देश खनिजों से भरा पूरा है, और अभी भी हमारा देश सोने की चिड़िया है लेकिन हमारा देश सोने की चिड़ियां होते हुए भी विकसित नहीं है क्योंकि हमारे यू.पी. में सरकार हमारे देश की खनिज संपदा को सुरक्षित नहीं रख पा रही है हमारे देश के चारों ओर खनिज संपदा से भरा हुआ है जैसे- झारखंड, उड़ीसा, असाम, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, कर्नाटका, महाराष्ट्रा इत्यादि राज्यों में खनिज संपदा से भरा हुआ है, लेकिन यह सभी राज्य इतनी खनिज संपदा होते हुए भारत के सबसे गरीब राज्यों के रूप में गिना जाता है, और इन्हीं राज्यों के कारण हमारा देश भी गरीब है, और इसी गरीबी का असर पूरे देश पर पड़ता है ।
हमारे देश माईनींग पॉलीसी इतनी गंदी है कि जिस स्टेट में माईन्स का भंडार है वहीं के लोग भूखे मर रहे हैं । नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और यदि उन्हें किसी कॉन्ट्रेक्ट के माध्यम से उन्हें नौकरी पर रख भी लिया जाता है तो उसके साथ् खुलेआम लेबर एक्ट का विरोध किया जाता है, 8 घंटे के जगह 12 घंटे काम लिया जाता है, और उनकी पूरी मजदूरी दर भी नहीं मिल पाता है, और उन्हें इस प्रकार से शोषण किया जाता है ।
अभी हमारे माईनींग पॉलिसी में संसोधन करने की जरूरत है, अभी देश में खनिज संपदा का अंधाधुंध खनन की जा रही है । और जिस राज्य में खनिज संपदा है, वहां नक्सलियों का वर्चस्व है, सरकार इसे सुरक्षित रखने में पूरी फेल हो रही है, मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय जी से यह आग्रह करना चाहूँगा कि जिस राज्य में माईनिंग या खनिज संपदा का भंडार है, वहां उसे इस संपदा का लाभ मिलना चाहिए ताकि उस क्षेत्र का विकास हो सके । और ऐसे पी.एस. यू. कंपनी को जहां वह स्थित है, उस क्षेत्र के विकास का जिम्मेदारी दे देना चाहिए ।
* Spech was laid on the Table श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): सभापति जी, मेरा डिवीजन नम्बर 295 है, कृपया मुझे यहां से बोलने की इजाजत देने की कृपा करें। मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इस विषय पर बोलने का अवसर दिया। मैं अपनी कुछ बातें इससे हटकर कहना चाहता हूं। डैवलपमैन्ट ऑफ लॉ में देखिये, जो एक्ट बना है, उस एक्ट का नामMines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 है। इस एक्ट से यह रेगुलेट हो रहा है। लेकिन इस एक्ट का पालन बिल्कुल नहीं हो रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि हर साल बजट एलोकेशन होता है और इनकी एक ही कंपनी है, जिसका नाम नेल्को है, उसे हर साल यह एवार्ड देते हैं। लेकिन इन बजटरी ग्रांट के पेपर्स में जो मैंने देखा, उदाहरण के लिए आप देखें कि इन्हें 2009-10 में 8404 करोड़ रुपये अलाट हुए थे और इन्होंने सिर्फ 640 करोड़ रुपये खर्च किये, सिर्फ 38 परसैन्ट खर्च किया, बाकी खर्च नहीं कर पाये, जो लैप्स हो गया।
उसी तरह से दूसरे प्लान में इन्होंने सिर्फ 37 परसैन्ट खर्च किया और एक ही कम्पनी काम करती है, जिसका नाम नेल्को है और उस नेल्को के काम को मैं बैड मैनेजमैन्ट कहूंगा, लेकिन उसे 2008 में नवरत्न कंपनी का एवार्ड दिया गया। यह विरोधाभास देखिये, यह मोनोपोली कंपनी है। पूरे भारतवर्ष में, पूरे माइन्स में नेशनल एल्युमीनियम कंपनी लि. काम करती है और यदि आप इजाजत दें तो मैं गवर्नमैन्ट के पेपर्स से पढ़ दूं -
“NALCO is in the process of expanding its capacity with an annual production target. The production of the Unit has been slow but it has been accorded the Navratna status by Government of India in April, 2008. ” 38 परसैन्ट यूटिलाइजेशन है, मैं सजैस्ट करूंगा कि अब की मर्तबा इनके मैनेजिंग डायरेक्टर को भारत रत्न अवार्ड दे दिया जाए। ...( व्यवधान) They are strong but their case is bad. आप इसे गंभीरता से लीजिए।
अब आजकल जो इंडस्ट्रियलाइजेशन का रिवाज और फैशन चल रहा है, लेकिन उससे आप वर्ल्ड में कम्पीट नहीं कर सकते।
हम तो बीच में, कभी आपने राज किया और कभी इन्होंने किया लेकिन खमियाज़ा हम लोग भोग रहे हैं...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप विषय पर आइये।
श्री विजय बहादुर सिंह : सभापति महोदया, मैं विषय पर रहा हूं। मैं बड़ी गम्भीर बात कर रहा हूं कि एक ही एक यूनिट है जिस पर कोई डिस्प्यूट नहीं है और नेशनल वैल्थ को गम्भीरता से देखें तो मैं एक बात कहना चाहता था कि आप इंडस्ट्रियलाइजेशन और प्रोडक्शन की बात कर रहे हैं लेकिन आप कभी कार बनाने में फैक्ट्री बनाने में , पुर्जा बनाने में जापान की होंडा कम्पनी से कम्पीट नही कर सकते हैं। हमारी नेशनल वैल्थ बहुत ही इम्पार्टैंट वैल्थ है। आप देखिये कि इनकी एक ही एजैंसी है - ज्योलौजिकल सर्वे ऑफ इंडिया । यह देश की नेशनल वैल्थ और माइन्स का सर्वे करती है। पिछले दिनों जब मैं सुप्रीम कोर्ट गया तो देखा कि इनके नक्शे 1932 के बने हुये हैं जो 2010-11 के डेवलेपमेंट का काम करती है तो उसके लिये भगवान ही मालिक है। जी.एस.आई को स्टैंडिंग कमेटी ने इंजैक्ट किया कि इनको माडर्नाइजेशन के लिये फंड्स दिये गए लेकिन वर्ष 2007-08, 2008-09 और 2009-10 में उस फंड का यूटिलाइजेशन ही नहीं हुआ। इसमें दिक्कत क्या है? इनका कहना है कि हम सैंसिंग इंस्ट्रूमेंट्स प्रोक्योर नहीं कर पा रहे हैं। आज ग्लोबलाईजेशन इतना स्ट्रंग है कि पता लगा सकते हैं कि ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स कहां मिलते हैं, उनको इक्विप करिये और कम से कम अपनी नेशनल वैल्थ का आक्कलन तो कर लीजिये।
सभापति महोदया, मैं दूसरी बात यह बताना चाहता हूं कि माइनिंग फील्ड में प्रोडक्शन से ज्यादा इल्लीगल माइनिंग है। भारत सरकार राज्य सरकारों पर दोषारोपण करती है और राज्य सरकार कहती है कि उन्हें बताया नहीं जाता है कि नेशनल वैल्थ का इतना वेस्टेज हो रहा है। यह सरकारी आंकड़ों से पता चला है कि अभी दो साल के अंदर एक लाख 57 हजार केसेज़ इल्लीगल माइनिंग के पकड़े गये हैं. लेकिन उनमें से कितने प्रोसीक्यूट हुये, कितनों पर मुकदमा हुआ, यह बिलकुल क्लोज़ली गार्डेड सीक्रेट है, पता नहीं चला । मैं निवेदन करना चाहता हूं कि इसमें कोई बड़ी भारी बात नहीं है। आजकल छोटे-छोटे प्लेन - सर्वेलेंस प्लेन आ गये हैं । पहले जी.एस.आई. से पूरा आक्कलन कर ले और अगर यह पब्लिक सैक्टर कम्पनी फेल कर रही है तो आप प्राईवेट सैक्टर को एनकरेज करिये। उनको पब्लिक सैक्टर से प्राइवेट सैक्टर से कम्पीटीटिव बिड करें। इस डेवलेपमेंट के साथ जितनी इसकी सम्पदा है, जो भी क्षेत्र है जहां माइनिंग हो रही है, वहां काम करिये। हमारे बुंदेलखंड में महोबा में बहुत ज्यादा माइनिंग हो रही है। मेरा सजैशन है कि वैल्फेयर एक्टिविटीज को भी स्टेटुटरी बनाना पड़ेगा। वे माइन्स खत्म हो गई, उजाड़ हो गया। वहां हैल्थ केअर, इस्टेब्लिशमेंट और माइन्स में जितनी आमदनी हो, कम से कम 25 परसेंट उन गांव वालों पर खर्चा किया जाये। अभी वेदान्त का उदाहरण दिया गया। अगर वैदान्त कहीं से 10 करोड़ रुपये आमदनी कर रही है तो उसका 30 परसेंट उस क्षेत्र में जहां की माइनिंग से उसकी आमदनी है, उस पर इनवैस्टमेंट किया जाये और वहां पर हैल्थ केअर की जाये। मैं जब एम.पी. की हैसियत से वहां गया तो मैंने विज्ञापन दिया कि जितने बुंदेलखंड में एन.जी.ओज़. हैं, मेरे पास आयें, मैं उन्हें काम दूंगा तो कोई नहीं आया लेकिन दो एनजीओज मुश्किल से आये तो उन्होंने कहा कि हम तो नहीं करते हैं। सिर्फ सी.ए, को बुलाकर जोर बाग के पोश आफिस में बैठकर नक्शा बनाते हैं और कहते हैं कि हम बुंदेलखंड में एन.जी.ओ. चला रहे हैं. मैं चाहता हूं कि यह माइन्स का मैटर है, इस पर वर्ल्ड को बीट कर सकते हैं । हो सकता है कि इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में हमारी परेशानी हो।
मैं ज्यादा समय न लेकर अपनी बात बताना चाहता हूं।
17.00 hrs. (Shri Satpal Maharaj in the Chair) महोदय, सरकार के कागजों में आया है कि नाल्को स्टार परफार्मर है और 38 परसेंट फंड का यूटीलाइजेशन है। मैं जल्दी से अपने सुझाव दे रहा हूं। जूलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जिस शॉर्ट में जी.एस.आई. कहते हैं, इन्हें साइंटीफिक सर्वे एक्टीविटी में इम्पॉर्टेंस दी जाए, इनकी एप्रोच प्रोफेशनल हो, ट्रेंड पर्सनल स्टॉफ हो। कागज में यह भी आया है कि 1500 आदमियों का रिक्रूटमेंट वर्ष 2005 से पैंडिंग है, यह वर्ष 2011 है। भारत सरकार में या भारत देश में हम यह नहीं सुन सकते कि यहां पर टैक्निकल स्टॉफ नहीं है। दूसरा, इल्लीगल माइनिंग का इफैक्टिव मैकेनिज्म बनाया जाये, चाहे एयर सर्विलेंस हो, चाहे बीएसएफ की तरह इसका एक अलग डिपार्टमेंट हो, जैसे रेलवे प्रोटक्शन फोर्स है और वह कॉर्डिनेट करे।
सभापति महोदय : आप अपना भाषण संक्षिप्त कीजिए।
श्री विजय बहादुर सिंह : महोदय, बस मैं संक्षेप में मात्र दस सेकेंड में अपनी बात समाप्त करने वाला हूं। दूसरा, चूंकि यह लंबा काम है, इसलिए इसकी प्लानिंग शॉर्ट टर्म न करके लांग टर्म प्लानिंग करें। यह ग्लोबल इश्यू है, इंटरनेशनल मार्केटिंग की स्ट्रैटजी गवर्नमेंट को न करनी पड़े। यह जो माइनिंग लीज मिल रही है, इसमें बड़ा करप्शन है, दस-दस साल की माइनिंग लीज में कोई 100 करोड़ या 500 करोड़ का सैक्टर नहीं है, इस लीज का पीरियड़ कम से कम 20 साल या इससे अधिक किया जाये। इसे 20 साल से ज्यादा किया जाये। स्टेट गवर्नमेंट्स को पूरी तरह से ठीक से इन्वॉल्व किया जाये, आपस में एकाउंटबिल्टी रखी जाये। अगर ऐसा करते हैं तो अच्छा होगा। गवर्नमेंट का फंड देने में मैं सपोर्ट करता हूं, लेकिन मेरे पास वर्ष 2003 तक की फिगर है, हमेशा इन्होंने 38 परसेंट से ज्यादा यूटिलाइजेशन ही नहीं किया है। न इन्होंने रिक्रूटमेंट प्रोसेस कम्पलीट किया, न इन्होंने जी.एस.आई. को साइन्टिफिक इंस्ट्रूमेंट में इप्रूव किया और इनके 1 लाख 57 हजार केसेज़ रिपोर्टेड हैं, इन्होंने उनमें कुछ एक्शन नहीं किया है। इनकी हालत बहुत खराब है।
सभापति महोदय : आप समाप्त कीजिए।
श्री विजय बहादुर सिंह : मैं इनका समर्थन करता हूं कि इनकी जो ग्रांट है, 8, 404 करोड़, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उसका यूटिलाईजेशन हो।
श्री महेश्वर हज़ारी (समस्तीपुर): महोदय, मैं वर्ष 2011-12 के केन्द्रीय बजट के अन्तर्गत खान मंत्रालय की अनुदान मांगों के आलोक में कुछ प्रमुख बिन्दुओं की ओर सदन एवं सरकार का ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं।
महोदय, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स, खान मंत्रालय की एक सशक्त संस्था है। वर्ष 2010-11 के योजना मद में 24.66 करोड़ रूपये के बजट की व्यवस्था थी पर वर्तमान वित्त वर्ष 2011-12 में इसे घटाकर 19.14 करोड़ रूपया कर दिया गया है। जोकि बहुत ही हैरानी की बात है। जबकि गैर योजना मद में खर्च को बढ़ा दिया गया है। मैं सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि भारत सरकार के वार्षिक प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2009-10 में राष्ट्रीय परिदृश्य में खनन उत्पादों की सहभागिता झारखंड एवं छत्तीसगढ़ की क्रमशः 8.79 एवं 9.18 प्रतिशत अर्थात 17.97 प्रतिशत रही, जबकि उन्हें रॉयल्टी काफी कम प्राप्त हुई है।
महोदय, एक अंग्रेजी राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में 12-02-2011 को प्रकाशित समाचार के हवाले से मैं भारत सरकार के संज्ञान में लाना चाहता हूं कि सीबीआई ने अवैध खनन एवं कर चोरी के आरोप में 65 माइनिंग कम्पनियों को नोटिस जारी किया है। मैं चाहूंगा कि मंत्री जी इसकी प्रगति से सदन को अवगत करायें एवं इस पर कार्रवाई भी करायें।
महोदय, बिहार के गया जिले में एक विशाल रामशिला पहाड़ था, जो न केवल ऐतिहासिक था, बल्कि पर्यटन एवं लोगों की धार्मिक आस्था भी उससे जुड़ी हुई थी। विगत कुछ वर्षों में उस पहाड़ का ऐसा खनन किया गया कि आज उस पहाड़ का अवशेष भी नहीं बचा है।
अतः मैं सरकार से मांग करता हूं कि जहां भी खनन की व्यवस्था है, वहां कम से कम जो बदली होती है या चोरी करके उसे बेचा जाता है, उस पर रोक लगायी जाये। इसी प्रकार बिहार के जहानाबाद जिले में "बरावर पहाड़" स्थित है। जहां अशोक कालीन गुफाओं की बहुतायत है, जिसे रात में तोड़ा जाता है और चोरी छिपे इससे खनन किया जा रहा है। क्या मंत्री जी इस मामले में पूरी बात से सदन को अवगत कराने की कृपा करेंगे?
महोदय, पायोनियर अखबार में 17 जनवरी 2011 को प्रकाशित एक समाचार की ओर हम आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं। जिसमें इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि भारत सरकार के पर्यावरण मंत्री, खान मंत्री एवं परिवहन मंत्री के बीच रस्साकसी चलती रहती है। यह समस्या मात्र स्पष्ट नीति के अभाव के कारण है। हम चाहते हैं कि मंत्री जी इस पर सदन में स्पष्टीकरण देने की कृपा करें।
महोदय, हमारे देश में खान एवं खनन का विस्तृत क्षेत्र है। खनन के साथ हमारे यहाँ उससे जुड़ी पर्यावरण से संबंधित बातों को नज़रअंदाज कर दिया जाता है। जब से बिहार बंटा है, तब से बिहार में एक भी खनन क्षेत्र नहीं रह गया है, सभी के सभी झारखंड में चले गये हैं। हमारे आदरणीय मुख्यमंत्री नितिश कुमार जी ने भारत सरकार से आग्रह किया था कि कोल लिंकेज दिया जाए, लेकिन अभी तक भारत सरकार ने इस पर अपना कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया है, कोई भी वक्तव्य नहीं दिया है।
मैं भारत सरकार से मांग करता हूं कि बिहार में कोल लिंकेज दिया जाये। जहां पर खनन किया जाता है, खनन के कारण विस्थापितों के पुर्नवास को भी उचित महत्व नहीं दिया जाता। मेरा अनुरोध है कि सरकार खनन से जुड़ी पर्यावरण, निदान एवं पुर्नस्थापन को मजबूत बनाए जाने के लिए कारगर कदम उठाए।
महोदय, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं समाज के कमजोर तबके के लिए भारत सरकार ने 01 मार्च, 1988 को डी.ए.आर.एंड. पी.जी. (प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग) की स्थापना की, परन्तु मेरे संज्ञान में आया है कि इन वर्गों के कल्याण के लिए खान मंत्रालय की ओर से कोई विशेष उपाय नहीं किए गए हैं। वर्ष 2010 के खनन में खान मंत्रालय से जुड़ी संस्थाओं जी.एस.आई.आई.बी.एम., एम.ई.सी.एम., नाल्को आदि से संबंधित 150 शिकायतें डी.ए.आर.एंड.डी. के पास आयीं, जिनमें से मात्र 51 मामले ही निपटाए गए।
महोदय, मैं भारत सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि इसमें हस्तक्षेप करके इसे शीघ्र देखा जाये। मेरी जानकारी में आया है कि इतने बड़े मंत्रालय को संचालित करने के लिए राजपत्रित और अराजपत्रित अधिकारियों की काफी कमी है। इन्हें स्पेशल वैकेंसीज़ निकालकर भरा जाये, जिससे कि कार्य की ठीक तरह से देखभाल हो सके। इसमें अधिकारियों की जो संख्या है, वह इसके कुशल संचालन एवं समस्याओं के प्रभावी निष्पादन के लिए नाकाफी हैं। हम चाहते हैं कि सरकार इनकी संख्या में वृद्धि करे।
महोदय, एम.एम.डी.आर. एक्ट 1957 के सेक्शन 9(3) के अन्तर्गत रॉयल्टी के लिए जो नियम निर्धारित किया गया है, वह झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े राज्य के लिए न्याय संगत नहीं हैं। मेरा अनुरोध है कि रॉयल्टी के मामले में प्रदेश की वित्तीय, सामाजिक स्थिति पर भी गौर किया जाना चाहिए। खान श्रमिकों की देख-भाल के लिए राष्ट्रीय खनन स्वास्थ्य संस्थान की स्थापना की गई है। एस.एंड. डी. परियोजना के लिए मात्र 22 लाख रूपए आवंटित किये गये हैं, जो काफी कम है। मैं सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि इसमें और फंड की व्यवस्था की जाये।
महोदय, भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग की स्थापना वर्ष 1851 में रेलवे के लिए कोयला खनन के लिए की गई थी। इतने वर्षों के बाद इसकी कार्य सीमा एवं उद्देश्यों में आवश्यकतानुसार वृद्धि की जरूरत है।
महोदय, रॉयल्टी के निर्धारण के लिए दिनांक 24/8/2006 को अध्ययन दल की स्थापना की गई थी। अध्ययन दल ने खनन उत्पादकों की एक खास अवधि में उसकी बिक्री न होने पर सवाल उठाए थे। सरकार को अध्ययन दल के लिए रिपोर्ट के मद्देनजर उठाए गए बिन्दुओं पर विशेष रूप से अमल करना चाहिए।
महोदय, खनन श्रमिक खान मंत्रालय के आधार हैं, परंतु उनकी ही अनदेखी की जाती है। खनन के दौरान उनकी मृत्यु अथवा अपंगता की स्थिति में इनके परिजनों को पर्याप्त अनुग्रह सहायता नहीं दी जाती है। अनुग्रह सहायता मिलने की प्रक्रिया काफी जटिल है। इसे सरल बनाया जाना चाहिए।
महोदय, खनन श्रमिक हमारी अर्थव्यवस्था के मेरूदंड है, जो कि जोखिम भरी अवस्था में अपने कामों को अन्जाम देते हैं। प्रतिकूल परिस्थितयों में अपने स्वास्थ्य की चिंता किए बिना अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। वर्तमान समय में इनके स्वास्थ्य देख-भाल की जो व्यवस्था है वह अपर्याप्त है। हमारी मांग है कि एक उच्चस्तरीय बोर्ड बनाया जाना चाहिए जो इनके स्वास्थ्य कार्यक्रम के संचालन की निगरानी रख सके तथा दिशा-निर्देश दे सके। खान मंत्रालय से संबंधित सभी 14 प्रदेश एंव 2 संघ शासित क्षेत्र में इसका प्रादेशिक मुख्यालय हो।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समप्त करता हँ।
MR. CHAIRMAN: Shri R. Thamaraiselvan – Not present.
SK. SAIDUL HAQUE (BARDHMAN-DURGAPUR): Thank you, Sir, for giving me this opportunity. We are discussing about the Demands for Grants for the Ministry of Mines. We all know that mineral sector plays an important role in the development of the country and our country is endowed with vast mineral resources. India produces as many as 86 minerals which include 4 fuels, 10 metallic, 46 non-metallic, 3 atomic and 23 minor minerals.
Given such importance of the mining sector, this year the Ministry has to be handled slightly minimised Budget. The Ministry is responsible for survey and exploration of the mines and minerals except coal, natural gas and petroleum. But it is seen that out of the outlay of Rs. 8,404 crore, approved by the Eleventh Five Year Plan, during the last three years of the Plan Period, the Ministry has been able just to utilise 45 per cent of the allotted fund, this is undesirable.
My next point is that the Ministry needs to strengthen the Geological Survey of India by providing requisite additional funds in order to expedite its modernisation programme and also to fill up the vacancies to cope with the shortage of manpower in scientific and technical streams.
The Ministry also needs to strengthen the functioning of India Bureau of Mines and make a mid-term appraisal of the plans and programmes of IBM.
The Ministry needs to prepare a comprehensive action plan for NALCO (National Aluminium Company Limited) so that the physical and financial targets set for it by the Planning can be achieved. We have to see that any move for the disinvestment of NALCO must not be encouraged. Rather, second phase of expansion of NALCO must be completed by April, 2011.
Ministry needs to assess the on-going schemes and projects of the public sectors undertakings like Hindustan Copper Limited, which is the only copper producing industry of the nation from indigenous resources and also the Mineral Exploration Corporation Limited, so that the sufficient funds can be allotted. Our country has huge mineral potential but all are not realised. The Ministry needs to accelerate exploration activities like copper, zinc, lead, nickel, gold and diamond, for converting the resources into reserves.
Now, I would like to raise some issues relating to mining sector which are posing a great challenge to the country. First issue is related to ‘illegal mining’. Illegal mining is going on in our country for the last two decades and it is now increasing enormously. We have the Mining National Mineral Policies, 1993 and 2008.
Now in 1991, Government has taken the new liberalisation policy. In line with that Government recognised encouraging the private investment and also the direct foreign investment. In 1996, there was 50 per cent FDI. In 2006, there was 100 per cent FDI. As a result of this new National Mineral Policy, multinational companies and private companies are looting our national resources. We have to take care of them.
Due to demands in the international markets and because of the China boom, the spurt in prices of iron-ore in the international market has led to the problem of illegal mining to an alarming proportion in our country. Now, such cases of illegal mining have gone upto 58,294 out of which 7,306 cases filed in courts and 5,759 cases have been decided. It shows an abysmal rate of action against this illegal mining.
Illegal mining occurs if corporate interests are able to arm twist the State. Further, there is a thin dividing line between the legal and illegal mines. Those corporate houses that have legal mines also do illegal operations. For example in case of Obulapuram Mining Company of Reddy brothers of Karnataka, it has 187 hectares of legal mines and 647 hectares of illegal mines. We have to see that. What is of day’s concern is the nexus between the mining mafia and a section of politicians and developments in Andhra and Karnataka, particularly of Bellary case, has to be seen in that light.
This is of great concern, and the Government should take firm action against this mining mafia, who are getting political mileage.
The main reason behind such increasing number of illegal mining is the Central Government Policy which encourages export of iron ore. Private entrepreneurs and multi-nationals play a crucial role here. In 2003-04, we were exporting just 12 million tonnes. Now, we are producing 217 million tonnes, and we are exporting 128 million tonnes. So, it is shameful for us. Is it not shameful that we are exporting the best quality of iron ore from Bailadilla to Japan and import processed machineries from them from the safe stuff? We can do it in our country by using full capacity of our steel plant. The expenditure incurred by us for import of steel is more than double the amount that we earn out of exporting iron ore.
Because of 100 per cent FDI in mining we see international corporate firms like De Beers and Broken Hill Properties have acquired huge prospecting rights in Orissa and Madhya Pradesh. Rio Tinto has diamond and gold prospecting rights in Madhya Pradesh. All these mining giants have no good track record and are violating human rights and environmental laws in South Africa and Papua New Guinea. The Central Government cannot shirk its responsibility because the Central Government has given approval for such projects and allowed these mining corporates to loot our national resources. This must be stopped.
Hence, I demand that the Central Government should nationalize the whole iron ore mining and other mining industry including the illegal ones, and also announce ban on iron ore exports till a review is conducted on the present Mining and Mineral Policy.
We see that in the Union Budget, the Government has enhanced the export duty rate for all types of iron ore but it is not going to affect the exporters very much as international price is much high. The National Mineral Regulatory Authority must be created to see that domestic need does not hamper and regional imbalances can be addressed.
Now, I come to the question regarding the safety of mines. Due to lack of proper planning and also lack of necessary technology and safety equipments, many accidents happen which cause much casualty and endanger not only the workers but also the people living in and around the mining area.
Next is the important issue of the Rehabilitation and Resettlement of evicted people and environmental damage. India’s major mineral resources are mostly located in forest areas that have been home to the country’s tribal population for millennia. Tribals are worst affected because of these mining projects. A large-scale of cutting trees and unscientific and indiscriminate mining even in areas where mining has been prohibited cause environmental damage and displacement of thousands of people. Mining activity is covered under the provisions of Environment (Protection) Ac but that is flouted by the mining mafia.
In India, approximately 10 million people have been displaced by mining projects. Almost 70 per cent of the people displaced have not received proper rehabilitation or any form of compensation. Most of these people are tribals. The living conditions of such displaced people, particularly the women, have serious negative impacts reducing them into helpless situation – hitting hard their private and cultural spaces, infrastructure facilities, protection from social customs, etc. The tribal women are exposed to exploitation, physical and sexual, of mine owners, contractors and other men. So, the Government has to take care of that. Proper relief and rehabilitation should be given. Also afforestation should be done for checking environmental damage.
At the same time, we should remember that the National Mineral Policy, 2008 talks for sustainable framework development. We know that the Maoists are making capital out of these illegal mining. On the one hand they are using these displaced people as mass support base and on the other hand they are extorting money from such illegal mining. The Hoda Committee, which was constituted by the Planning Commission, talks of reviewing the National Mineral Policy on two things. One is that the mining activity can and should enrich rather than deplete biodiversity as a corollary to their intervention in the ecology of the area of activity; and the second one is that mining can and should contribute to the economic, social and cultural well being of indigenous host population and local communities.
The Government is now contemplating to compensate tribals with a part of profits of mining companies (say, ensuring 26 per cent profit share for locals), in additional to other measures. But profit can be uncertain and comes only after mining has commenced whereas displacement occurs in the beginning.
Profits can also be diminished by accounting legerdemain. It would be better if compensation is tied up as a percentage of the investment on the mining project. The Mining Ministry may examine the possibility of such displaced persons for equity ownership of the project as a part of the deal for giving up their land and also engage them in projects. What is needed for the Ministry now, is to get a holistic approach to the whole issue so that scientific method of mining takes place with modern technology and safety measures; and relief and rehabilitation is given to the displaced persons; and ecological balance is also maintained by making the mining environment-friendly.
With these words, I oppose these Demands and I conclude my speech.
SHRI R. THAMARAISELVAN (DHARMAPURI): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for allowing me to speak on the Demands for Grants pertaining to the Ministry of Mines for 2011-12. At the outset, I support these Demands for Grants.
India is a country, which has got large deposits of all sorts of mines and minerals across the country. The Geological Survey of India had conducted and are conducting many Geochemical Mappings (GCMs), Geophysical Mappings(GPMs), Aero geophysical Survey, Marine Survey, Mineral Resources Assessments etc., to tap the natural resources for the country’s development. There are large deposits of gold, diamond, platinum, base metal, etc. Many of the findings have resulted into production of many minerals in huge quantities, meeting the requirement of the country as well as to export.
India has a large number of economically useful minerals. Minerals such as magnetite iron ore, bauxite, gypsum, etc. have been found in many parts of our State of Tamil Nadu. Similarly, Karnataka have important goldmines. Likewise in Madhya Pradesh, Panna diamond belt is the only diamond producing area in the country.
Sir, researchers have found micro diamond in our State of Tamil Nadu’s Nagapattinam and Vedaranniyam beaches, which were ravaged by the devastating tsunami about six years back. The findings enhance the prospects of diamond exploration in the coastal zones along with the country’s east cost.
Beach samples of Nagapattinam and Vedaranniyam also indicate indirect evidence of Kimberlite indicating the presence of minerals like Uvarovite. There is a possibility of some of the micro diamonds being meteoritic in origin, which cannot be ruled out as they may be released from primitive meteorites.
India’s Geological Survey has found two platinum prospects in Sittampundi of Namakkal district and Mettupalaylam in our State of Tamil Nadu. Describing them as good discoveries, the scientific stage, where there is an evidence of substantial deposits of platinum, needs to be explored further to understand the exact location and quantities. The mining of platinum group of minerals present in the Mettupalayalam and Namakkal areas of our State, needs to be undertaken quickly by the Geological Survey of India and to be converted into commercial activities. Therefore, I would request the hon. Minister to explore the findings of mines and minerals discovered by the Geological Survey of India, which will not only help the country to gain revenue but also will generate employment to the rural masses.
Sir, I would like to bring it to the notice of the Government that there is an urgent need to strengthen the Geological Survey of India further. It is an organization, which is having expertise more than a century.
I would also like to invite the kind attention of the hon. Minister that there are many areas in the country, which are yet to be tapped for exploration of mines and minerals. So, the Government may give attention to it. I have noticed that many mines of different varies have been closed down like the one in Kolar in Karnataka, which has gold reserves, on the plea of viability. Therefore, I would like to request the Government to adopt new technology and technique for the purpose of cost cutting and revive the closed mining.
Sir, the Geological Survey of India made important contributions to seismology by its meticulous investigations, studies and detailed reports on numerous Indian earthquakes of the 19th and early 20th century. I stress that the Government should entrust more responsibilities on the Geological Survey of India to conduct seismology tests to find out the possible earthquake in any parts of the country, as we have been, rather the entire universe has been experiencing frequent earthquakes.
Mineral sector is going through a period of transformation. Several foreign companies have begun to show interest especially in minerals in India by pooling their resources for exploration and exploitation of iron ore, bauxite, base metals, heavy mineral sands, gold and diamond etc. In order to fulfil the demand and supply gap, the deep-seated mineral deposits are to be properly exploited. Since the mineral investigation is capital intensive, the existing mineral industries in public and private sectors must come forward to invest in prospecting and reconnaissance operation and may also try for joint venture with foreign companies where there is synergy.
The GSI has developed the largest and most comprehensive earth-science data base in India. Therefore, the GSI should share their data and offer advanced short-term training to the member organizations for adoption of innovative techniques and concept oriented projects. Similarly, the GSI should also come forward to sponsor joint exploration and exploitation of the mines and minerals with State Governments.
We have also come across certain instances of illegal mining activities in different parts of the country. It seems that the Government is failing in its duty to check illegal mining activities. I would strongly urge the Ministry to take the issue of illegal mining activities as the persons indulged in this type of activities are swindling the national resources. They should be made accountable. They should be put behind bars. They should not be allowed to take the help of the law to prolong the cases pending against them in the courts.
Survey of mining activities should be done at regular intervals. This would help the Government to know whether illegal mining is taking place or not and whether the guidelines for mining activities are being floated or not.
As there are controversies in regard to rate of royalty, sale of non-core assets, quantity of mineral reserves, captive mineral reserves, mining of sponge iron, manganese deposits, mining of asbestos, would the Government consider nationalisation of mines across the country? I think this would put at rest all the issues involving mining in the country.
Another important factor, which is to be pursued by the Government with all its command, is the peripheral development in the mining areas. Often, we could see that very little development takes place in and around the mining areas. This is a serious matter to be attended to by the Government.
Yet another thing which I would like to point out here is that large deposits of Molybdenum have been discovered in my Parliamentary constituency, Dharmapuri. The Government should make all efforts to exploit this discovery for converting it into commercial activity, for revenue earning and also for providing employment opportunity together with turning this backward district into a prospering district in Tamil Nadu.
With these words, I conclude my speech.
SHRI KALIKESH NARAYAN SINGH DEO (BOLANGIR): Mr. Chairman, Sir, I rise to speak on the debate on the Demand for Grant of the Ministry of Mines.
Mineral wealth of a country can be very effectively used to alleviate poverty, increase the quality of human life and create wealth for redistribution in the country. However, I fear to say that the Ministry of Mines of the Government of India has not been able to do that. The simple mandate of the Ministry of Mines is to survey, do the exploration of mineral wealth in the country, make legislation for mines regulation, increase the efficiency and ensure that scientific methods of mining are utilized for sustainable and environment friendly mining through its agencies of GSI, IBM, NEC and the other agencies that you have.
The simple fact that the contribution of the mining sector to the GDP in India has been a mere 2.2 per cent as against 16 per cent in Zambia, 19 per cent in Norway and even 5.6 per cent in Australia tells us that we have not been able to utilize and maximize the benefits from the mineral wealth of our country. The Government has taken some proactive steps. We have been fighting for not only the environment and R&R issues that have plagued the mining sector but we have also been fighting for a law, an archaic law which is more than 50 or 60 years old. I am happy to note that this Government has taken some positive steps to create a new National Mineral Policy and also to amend the MMRDA Act to try and develop the mining sector in the country.
However, the devil lies in the details and the file prints. We have to examine the proposed draft of the MMDRA Act to ensure that it is a progressive one and not a regressive one. Let me take the first clause that the current Government of India has so categorically professed to be a positive one, which has also been found place in the Address of the President to the Parliament.
The Government intends to bring about a legislation which will effect a 26 per cent profit sharing of mining companies with stakeholders. In this case we find that the description of profit with mining companies is an absolutely grey area. The amount of depreciation, because of huge heavy earth moving equipment which is used by mining companies, is tremendous. We have seen consistently that companies have tended to not disclose their full profits. So, when you go off a percentage of the profit sharing, how will you actually ensure that a fair amount of money goes down to the stakeholders?
I believe that the Planning Commission has also asked the Government to redraft the legislation offering the affected people 26 per cent royalty as compensation and not the profit. In this matter, may I state that the Government of Orissa – not only Government of Orissa, but all mineral bearing State Governments – have been requesting for increase in the ad valorem royalty. You have increased it to 10 per cent. But let us be clear. In 2009 the price of iron ore was nine dollars when it was used to plug holes in roads. Today it stands at anywhere between 900 dollars and 2000 dollars. The windfall gain of the mining companies is tremendous. The cost of mining more or less remains the same. We should consider, at least in the interim, an increase in the ad valorem royalty to at least 20 per cent and ensure that a part of that money goes to the stakeholders who are tribals or other communities directly affected by the mining activities.
The efficiency of the Mining Department can be judged by the efficiency of its institutions. Let me first look at IBM, Indian Bureau of Mines. I understand that as per the Mineral Conservation Development Rule of 1988 the IBM is absolutely and wholly responsible for the mining plan of a mine and monitoring mining activities thereafter. If that is true, is not the IBM, and therefore the Government of India, absolutely responsible for the illegal mining activities which have been demonstrated by the Members of the House? Why blame one State Government or another State Government? It is a matter which transcends all mineral States. We have to take a holistic view on it. IBM currently has no interaction with any State Government. There is no way any State Government can actually influence the IBM or impact the working of the IBM. You would of course reply saying that under the MMRDA Act, Clause 4, there is also an element of responsibility of the State Government. I would suggest to have a working committee of the Central Government and State Governments to look into this matter. This matter is not about inefficiency of one political party or another; it is a matter of the loot of our national resources, resources which can eventually be used to better the life of our countrymen.
The other reason why the mining activities have failed to really take off in our country, and this is the evidence, is that the poorest States of our country are richest in mineral. Another reason why we have failed to take off is the fact that there is no infrastructure created to ensure that scientific mining actually takes place. I would suggest that let the Mines Ministry take the initiative and work with the Ministries of Railways and Surface Transport (National Highways) to ensure that proper infrastructure takes place and mining activities do not hinder the lives of existing villagers in and around that area.
Now let me come to the most important point, that is, the manner in which mines should be allotted. The old MMRDA Act envisions first-come-first-served basis for allotment of mines. Let me also state that first-come-first-served basis is the same principle applied by the Telecom Ministry when they gave out Spectrum. I understand in some cases where reconnaissance is required, where investment is required to unearth new mineral bearing areas that this may be the condition laid out. I absolutely agree. There should be in those cases where R&P is given out that huge capital investment is done to discover new mineral wealth that first-come-first-served basis should be applied and there should be a single transition from RP to PL to ultimately a mining licence. These are not the 1800s or 1900s that we are talking about; we are in the 21st century.
Most people know where the iron-ore is. A large part of the work has actually been done by the GSI and other institutions and we know even by word of mouth in which forest and in which village what mineral is being found. Here, I would suggest that you take up the principle of competitive bidding, something which, I believe, the hon. Finance Minister also made a mention of in his Budget Speech on 28th February 2011 by saying that he wants to develop a competitive system for exploiting natural resources. I would suggest and reiterate that here we take up the competitive bidding with a clause that value addition must come first. Let us be very clear that in a State or an area which is poor, if a company decides to put up a plant and give jobs to thousands and thousands of people, that act must be given priority over somebody who wants to just exploit the natural resources and make windfall profits for himself.
I do want to ask the hon. Minister one question. The normal response of the Ministry is that we are short of staff and we are short of trained personnel and therefore, mining activity is unscientific and unregulated because of which there is so much exploitation both of the nature and of human capital. If we are so short of staff, then why is it that we have only one branch of Indian School of Mines? The CII themselves have said that there is a shortage of over 10,000 people in the industry and there is projected shortage of about 8,500 mining engineers. Then, why is it that we cannot create more branches of the Indian School of Mines? I propose that the hon. Minister may consider putting one branch of it in every mineral-bearing State of the country.
Lastly, the GSI has, amongst the 42 studies that it has done, has done two very crucial studies on glaciers. It is mentioned by the Ministry in the Outcome Budget. One is the Detailed Glaciological Study on Hamta Glacier in Chandra and the other was inducted in the Arctic Expedition of National Centre for Antarctic and Ocean Research, NCAOR. These are studies which are very crucial for the climate change effect on the country. I was wondering whether there have been any follow up actions on these studies. These are 42 studies which have been done by the GSI. I would like to know from the hon. Minister whether they have just passed them on to the relevant Ministries and whether there have been Action Taken Reports at all. I hope, the hon. Minister would clear it.
*श्री गणेश सिंह (सतना):मैं खान मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर अपनी बात रख रहा हूं। हमारे देश में बड़ी मात्रा में बेशकीमती खनिज का भंडार है। खनिज का भंडारण निजी एवं सरकारी सेवा दोनों जगहों पर मौजूद है, लेकिन खनिज का जो दोहन हो रहा है, उसमें काफी सुधार की जरूरत है। जो खनन के मानदंड निर्धारित हैं, क्या उनका पालन किया जा रहा है? इस तरफ जैसी निगरानी होनी चाहिए, वह नहीं होती है। आज जहां खनन हो रहा है, वहां का पर्यावरण खराब हुआ है, वहां के जल स्रोत सूख गये हैं, वहां का जल स्तर अत्यंत नीचे जा रहा है। जंगल काटे जा रहे हैं, हैवी ब्लास्टिंग से पड़ोस के गांवों के मकान फट रहे हैं तथा गिर रहे हैं। लगातार भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा खदान मालिकों को हर साल दिल्ली में बुलाकर प्रमाण-पत्र अच्छा कार्य करने का दिया जाता है। कई स्थानों में तो यह स्थिति है कि गहरी खदानों से भूकम्प जैसी स्थिति बन गयी है। मैं मंत्रालय से कहना चाहता हूं कि खदानों की स्वीकृति देते समय अन्य सभी दुष्परिणामों के बारे में भी गहराई से विचार करें।
निजी क्षेत्रों में जो मिनरल है, देखा जाता है कि जबरन या अधिग्रहण का डर पैदा करके सस्ते दामों पर किसानों से जमीन हथिया ली जाती है। यह जो कानून बना हुआ है, उसमें संशोधन करते हुए जमीन के पट्टेदार को पर-टन कुछ न कुछ देने के लिए प्रावधान होना चाहिए। उसके साथ जब मिनरल निकल जाये तो उसे जमीन की फिलिंग करके सम्बन्धित किसान को जमीन लौटा दी जाये।
अक्सर देखा गया है कि जो भारत सरकार के उपक्रम हैं, जिनके द्वारा मिनरल उत्खनन का कार्य किया गया है, वे सब घाटे में चल रहे हैं। वहीं निजी कंपनियों द्वारा भारी लाभ कमाया जा रहा है। इसका कारण क्या है? इस पर मंत्रालय को गहराई से विचार करने की जरूरत है। देश भर में बड़ी मात्रा में अवैध उत्खनन हो रहा है। माफिया पूरी तरह से सक्रिय हैं और उन पर रोक नहीं लग पा रही है। इससे सरकार को राजस्व की अधिक हानि हो रही है। मंत्रालय सिर्फ खदानों का आबंटन कर रहा है, लेकिन सुरक्षा जैसे मुद्दों की लगातार अनदेखी की जा रही है।
जो बजट आबंटन होता है, उसे किन-किन मदों में खर्च किया जाता है, इसमे पारदर्शिता की जरूरत है। कई जगह बेशकीमती खनिज रिजर्व फारेस्ट के कारण भूगर्भ में हैं। कुछ जगहों में तो रिकॉर्ड में वन लिखा है, परन्तु पेड़ नहीं हैं। ऐसी जगहों को चिन्हित कर वहां का मिनरल निकालने की अनुमति मिलनी चाहिए।
* Speech was laid on the Table कच्चा माल विदेशों में भेजने पर प्रतिबंध लगना चाहिए। मैं जिस क्षेत्र से आता हूं, वह क्षेत्र लाइम स्टोन के विशाल भंडारण का है। हैवी ब्लास्टिंग से जमीन में कंपन आ जाता है, मकान फट रहे हैं, जंगलों के बीचों-बीच खदानें चल रही हैं। ऐसी अनेकों नयी-नयी समस्याएं मौजूद हैं, जल स्रोत नीचे जा चुके हैं।
खदानों में काम करने वाले श्रमिकों एवं विस्थापित परिवारों के जीवन स्तर में सुधार हेतु और विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उनके परिवारों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि की भी पर्याप्त व्यवस्था की जानी आवश्यक है। इस क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक असंगठित हैं, उन्हें संगठित करने की जरूरत है।
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हीरे की खदान है। उसके बगल में रिजर्व फॉरेस्ट है। जिस विस्तार रूप में कार्य खदान का होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। भारत सरकार के खान मंत्रालय का मैं ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि इतने बेशकीमती धातु के उत्खनन के लिए और अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है।
SHRI GANESHRAO NAGORAO DUDHGAONKAR (PARBHANI): Mr. Chairman, Sir, thank you for giving me an opportunity to speak on this important subject. According to the study of trends, mining industry has contributed approximately 2.5 per cent to three per cent to the GDP over the last few years and the same is expected to increase to about five per cent of the GDP over the next few years. Mining is a money-making business. Not only do mining companies prosper, but the Governments also make money from revenues. Workers also receive income and benefits.
The Government should plan alternative solutions such as the deeper level mining of available mineral resources, conservation and alternative locations for optimum utilisation of potential mineral belts, with modern and revised techno-economic viewpoints. The Government should emphasise that the concept of cluster-mining be worked out and new mineral areas involving combination of modern technology for mining be evolved with due consideration for Sustainable Development Framework, both for the existing as well as the future mining centres in India.
Sir, there is an acute shortage of trained personnel and skilled manpower as per the current scenario as well as the growth projections in the mining and mineral sector. The existing ITIs are not suitably equipped for skill development in this sector. This issue needs to be addressed preferably in the Public-Private Partnership model through the National Skill Development Board. The Government should revive the proper study methods according to the current modern technique and environment issues for the skills development for the mining industry in the context of requirement of skilled geoscientists and mining engineers, mates, surveyors and technicians. The Government should evolve a strategy for involving GSI Training Institute network of RTIs and FTCs across the country for imparting specialised short-term training courses in collaboration with identified mining sectors for fields like surveying, underground geological mapping for mining etc. and finalize issuing diploma and degrees certificates in association with Universities.
The nature of mining processes creates a potentially negative impact on the environment both during the mining operations and years after the mine is closed. This impact has led to most of the nations of the world adopting regulations to moderate the negative effects of mining operations. Safety has long been a concern as well, but modern practices have improved safety in mines significantly.
They develop skin rashes, headaches, vomiting, diarrhea, etc. In fact, the symptoms of mercury poisoning are very similar to the symptoms of malaria. Many people who can not afford to go to a doctor or who live in a village where a doctor is not accessible, they often are not treated for their illnesses. If the water is contaminated, the people can not use it for bathing, cooking, or washing their clothes.
There is a serious concern over ongoing unscientific and haphazard mining activities in some parts of the States in India.
Sir, I am speaking for the first time in this House.
MR. CHAIRMAN: Yes, please carry on.
SHRI GANESHRAO NAGORAO DUDHGAONKAR : Such mine operators do not generally take due cognizance of the geo-environmental factors essential for sustainable regional development and protection of interests of the local communities, particularly, in the tribal areas.
It is a very serious matter and the Government should look into the negative impact of mining operations. The Government should make a long-term policy and rules for the mine companies to follow stringent environmental and rehabilitation codes in order to minimize environmental impact and avoid having any impact on the human health in the country.
There is greater need of improvement in surveying by using scientific and innovative methods in the mining industry. I hope and trust that the Government will consider my views and take appropriate steps to boost the mining industry and protect the environment and human health of this country.
*DR. PRASANTA KUMAR PATASANI (BHUBANESWAR) :India has a long history of commercial coal mining covering nearly 220 years starting from 1774 by M/s Sumner and Heatly of East India Company in the Raniganj Coafield along the Western bank of river Damodar. However, for about a century the growth of Indian coal mining remained sluggish for want of demand but the introduction of steam locomotives in 1853 gave a fillip to it. Within a short span, production rose to an annual average of 1 million tonne (mt) and India could produce 6.12 mts. per year by 1900 and 18 mts per year by 1920. The production got a sudden boost from the First World War but went through a slump in the early thirties. The production reached a levelof 29 mts. by 1942 and 30 mts. by 1946 With the advent of Independence, the country embarked upon the 5 year development plans. At the beginning of the 1st Plan, annual production went upto 33 mts. During the 1st Plan Period itself, the need for increasing coal production efficiently by systematic and scientific development of the coal industry was being felt. Setting up of the National Coal Development Corporation (NCDC), a Government of India Undertaking in 1956 with the collieries owned by the railways as its nucleus was the first major step towards planned development of Indian Coal Industry. Along with the Singareni Collieries Company Ltd. (SCCL) which was already in operation since 1945 and which became a Government company under the control of Government of Andhra Pradesh in 1956, India thus had two Government coal companies in the fifties. SCCL is now a joint undertaking of Government of Andhra Pradesh and Government of India sharing its equity in 51:49 ratio. I request Hon. Minister for enhancement of Nalco.
Nationalisation of Coal Mines Right from its genesis, the commercial coal mining in modern times in India has been dictated by the needs of the domestic consumption. On account of the growing needs of the steel industry, a thrust had to be given on systematic exploitation of coking coal reserves in Jharia Coalfield. Adequate capital investment to meet the burgeoning energy needs of the country was not forthcoming from the private coal mine owners. Unscientific mining practices adopted by some of them and poor working conditions of labour in some of the private coal mines became matters of concern for the Government. On account of these reasons, the Central Government took a decision to nationalize the private coal mines. The nationalization was done in two phases, the first with the coking coal mines in 1971-72 and then with the non-coking coal mines in 1973. In October, 1971, the Coking Coal Mines (Emergency Provisions) Act, 1971 provided for taking over in public interest of the management of coking coal mines and coke oven plants pending nationalization. This was followed by the Coking Coal Mines(Nationalisation)Act, 1972 under which the coking coal mines and the coke oven plants other than those with the Tata Iron & Steel Company Limited and Indian Iron & Steel Company Limited were nationalized on 1.5.1972 and brought under the Bharat Coking Coal Limited (BCCL), a new Central Government Undertaking. Another enactment, namely the Coal Mines (Taking Over of Management) Act, 1973, extended the right of the Government of India to take over the management of the coking and non-coking coal mines in seven States including the coking coal mines taken over in 1971. This was followed by the nationalization of all these mines on 1.5.1973 with the enactment of the Coal Mines (Nationalization) Act, 1973 which now is the piece of Central Legislation determining the eligibility of coal mining in India.
ओश्रीमती ज्योति धुर्वे (बेतूल): आज अवैध उत्खनन में बढ़ोत्तरी हुई है। निश्चित तौर से देखा जाये तो देश के साथ एक असंवैधानिक रूप से बहुत बड़ा अनिती कार्य है, जिसे सरकार के द्वारा रोका जाना अति आवश्यक है।
आज देश में प्रचुर मात्रा में हमारे पास चाहे सोना, चांदी, तांबा, लोहा, हीरा, अभ्रक, कोयला अन्य भिन्न-भिन्न तमाम सारी अमूल्यवान चीजें धरती के अंदर समाहित हैं, परंतु आज इसका प्रचुर मात्रा में दोहन हो रहा है और इसे रोकने के लिए विशेष कठोर नीति एवं दंडात्मक प्रक्रिया की आवश्यकता है, जिससे हम इस अमूल्य चीजों के अवैध उत्खनन को रोकने में समर्थ सिद्ध हो सकते हैं।
आज जितनी प्रचुर मात्रा में ये अमूल्य चीजें हैं, वहां उसके जैसा मूल्यवान हमारा वन एवं उससे जुड़ा पर्यावरण हमारे लिए और हमारे जनजीवन के लिए हमारे देश की समूची व्यवस्था एवं संतुलन को बनाये रखता है। क्या हमें इसे बचाने की आवश्यकता नहीं है?
नेल्को को यदि अनुमति दी गई है, वह विशेष उपाधी के द्वारा नवाजा गया है। क्या यह सही है। इसका सीधा स्पष्ट उद्देश्य है कि प्रतिस्पर्धात्मक कार्य होने चाहिए। (निविदा) को पहले निकाला जाये और निकाला जाना आवश्यक किया जाये। 1932 के सर्वे को यदि 2010-11 में इसे क्रियान्वयन करना है।
इतनी बड़ी सम्पदा में आज बड़ी मात्रा में अवैध उत्खनन हो रहा है, जिसमें सरकारी रूप से खनन का उपयोग बहुत कम है। मेरा मानना है यदि हम यहां आज गैर सरकारी संगठन का यदि सहारा लेते हैं तो मुझे लगता है कि हम इस अमूल्य सम्पदा को बचाने का नहीं खुले रूप से डाका डालने का काम करेंगे क्योंकि आज जहां भी गैर सरकारी संगठन कार्य कर रही है, वहां अच्छे प्रतीकात्मक स्वरूप नजर नहीं है। यहां हम उनके हाथ में खुले रूप से उन्हें एक प्रकार की संवैधानिक ताकत देकर उन्हें और अधिक अवैध उत्खनन को बढ़ावा देंगे।
अर्थात अवैध उत्खनन को रोकने के लिए व्यापार-उद्योग देश की समृद्धि को बढ़ाने में हमें यह अमूल्य सम्पदा का उपयोग होना चाहिए। आज भी हमारे देश में विभत्र प्रदेश में खनिज सम्पदा प्रचुर मात्रा में है अथवा इसे रोजगार एवं देश की औद्योगिक इकाइयों को डाला जाये एवं इन क्षेत्रों में सर्वाधिक बेरोजगारों को रोजगार देकर इन्हें भी समाज एवं देश के प्रति सदृढ़ कार्य करने को सहभागी बनायें, ऐसा करके सरकार एक महत्वपूर्ण विशेष भूमिका निभाती है।
हमें देश एवं भारत के निर्माण में इस बहुमूल्य सम्पदा को बचाने के लिए विशेष अधिनियम बनाने की आवश्यकता है। लगातार देश की अमूल्य सम्पदा खनिज तत्व मैगनीज, अभ्रक, हीरा, कोयला आज भी * Speech was laid on the Table भारत सरकार का खनन मंत्रालय ठीक ढंग से काम नहीं कर सकता है।
कई जगह देखा जाये तो जी.डी.पी का उपयोग अन्य देशों में विभिन्न प्रतिशतों में है लेकिन भारत में जीडीपी 5.6 है। इससे प्रगति की ओर जाना चाहिए जैसा कि अन्य देशों में भी यह प्रगति के लिए इसको उपयोग में लाया जाता है।
26औ शेयर होल्डरों का (नियम) लाना चाहिए, जिसके द्वारा हम 26औ रायल्टी दें अपितु लाभ भी स्पष्ट होना चाहिए जो 900 डॉलर के लगभग है। यह लाभ अच्छा है और इसका लाभ अनुसूचित जनजाति के पास जाना चाहिए।
आज भी राज्य सरकार को सही रूप से सम्मिलित नहीं किया गया है और न ही राज्य सरकारों को लिया गया है। शायद यह भी कारण है कि खनिज को खनन से रोकने एवं सम्मिलित रूप से कार्य नीति भी नहीं बनाई गई है। अधिक से अधिक शाखायें खोली जानी चाहिए। आज भी इसमें अत्यधिक कमियां हैं।
आज यदि गहराई से देखा जाये तो अति गंभीर विषय है और इस पर कार्य करने की आवश्यकता है। आज यदि 50 वर्षों की लीज प्राप्त पूरा का पूरा तहसील को ध्यान दे तो वहां की पूरी सम्पदा पर गैर सरकारी संगठन जहरीले सांप की तरह कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। क्या कारण है कि यहां भी भ्रष्टाचार एवं ऊंची पहुंच काम आती है और इस प्रचुर सम्पदा में गरीब बंधुआ मजदूर बनकर कार्य करता है। आज स्वतंत्र भारत एवं भारत के निर्माण वाले शब्द पर यह करारा तमांचा है।
आज भी सरकारी संगठन भी अवैध उत्खनन को बढ़ावा दे रहा है और उसका शिकार गरीब वहां रहने वाले आदिवासी उसके शिकार होते हैं और बदले में उनके परिवार को कुछ नहीं मिलता है। क्या कारण है कि यहां सरकार उदासीन है या सरकार इस क्षेत्र में जाकर सही जानकारी एवं वहां की सच्चाई को सामने लाने काप्रयास नहीं कर रही है। क्या सरकार उन आदिवासी गरीबों को न्याय देना नहीं चाहती। आज देश की पूरी आबादी में आदिवासी वर्ग को एक सही न्याय की दरकरार है क्योंकि वह भी इस देश का नागरिक है। उसने अपना सब कुछ खोया है। जल, जंगल, जमीन बदले में क्या मिला शायद यह एक प्रश्नचिन्ह बनकर रह गया है। क्या यह प्रश्नचिन्ह देश के लिए एक काला इतिहास सिद्ध न हो और मेरी यही एक मांग होगी। इन्हें रोजगार में इन्हें विशेष प्राथमिकता रूप से भागीदारी मिले एवं इनके जीवन की रक्षा एवं सुधार में सरकार की विशेष भूमिका हो तभी हम इस अमूल्य सम्पदा एवं वन पर्यावरण को बचाने एवं एक विकसित देश की कल्पना और विशेष भारत निर्माण को सदृढ़ करने में हम सफल सिद्ध होंगे।
*SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI): The wide availability of the minerals in the form of abundant rich resources made it very conducive for the growth and development of mining sector in India. India produces as many as 86 minerals which include 4 Fuels, 10 metallic, 46 non-metallic, 3 atomic and 23 minor minerals.
The total value of mineral production during 2009-10 is estimated at Rs.127921-42 crores which shows an increase about 4.61% over that of the previous year.
The contribution of mining and quarrying sector to GDP in 2009-10 at Rs.31808/- crores indicated an increase of 8.7% over that in the preceding period.
India continued to wholly or largely self sufficient in minerals which construct primary minerals raw materials to industries such as thermal power, iron and steel, ferro-alloys, aluminium, cement, various types of refractors, chuna, clay based ceramics, glass, chemicals like caustic soda, soda ash, calcium etc. Metallic Minerals The value of metallic minerals in 2008-09 at Rs.31533.97 crores increased by about 7.49% over the previous year. Among the principal metallic minerals, iron ore contributed Rs.25,151 crores or 79.76%.
The value of production of non-metallic minerals at Rs.3527.62 crores during 2008-09 increased by 2.89% as compared to the previous year. Lime stone is in leading position by contributing 70-92% of the total value of non-metallic minerals in 2008-09. The value of production of minor minerals was estimated at Rs.16694.9 crores in 2008-09. The stock of minor minerals in the value of minerals production was estimated at 13.67% for 2008-09.
* Speech was laid on the Table Coal Mining:
Coal is an important mining in India. It is widely for power generation and other purpose. Geological survey work should be made continuously to find out new coal mines.
In Tamil Nadu Nevalees Lignite Coal Mines are under production. Further survey must be conducted to augment the coal mining field.
Illegal Sandminig Illegal sand mining is leading to diminish the increase of the government. Moreover, the sand mining in river is affecting the drinking water facilities to the rural population. We need a restricted policy for river sand mining.
Hardship to minor minerals Road metals and building stores are coming under minor minerals. Most probably it is doing by the rural small entrepreneurs. It is giving more employment opportunities to the rural workers.
The mining department and local officials are giving more trouble and more restrictions to this small business. The road metal producing crushers and blue metal producing miners are gradually deteriorated. They are earning only a meagre amount of profit. Due to the MGNREGA work opportunity in village, the workers are not ready to come forward to work in Blue Metal stone mines. Lack of workers are hampering this building stone mining works substantially.
The valuable sand mines, the valuable minerals sand exporters and mines are not restricted much by the mining departments. They are not abide the rules and regulations of the mines. But the poor black stone vendors are miners are restricted minerals. They are suffering lot in rural areas.
It is essential to protect these poor small industrialists who are doing road work metals and building stone mines in rural areas by law.
In order to encourage this poor who are doing blue metal mining, the charging of `seniarge” can be removed. It will be a welcome able decision to help the rural small businessman and also to encourage the employment opportunity to the village landless workers.
डॉ. संजीव गणेश नाईक (ठाणे): माननीय सभापति जी, मैं मंत्री जी का धन्यवाद करूंगा कि उन्होंने देश की प्रगति के लिए, देश को आगे लाने के लिए आज यह जो प्रस्ताव रखा है, एन.सी.पी. पार्टी की तरफ से इसका समर्थन करने के लिए मैं यहां खड़ा हूं।
मैं जरूर चाहूंगा कि पिछले कई सालों से जो हमारा यह डिपार्टमेंट है, यह काम कर रहा है। इतना ही नहीं, पिछले 10 सालों में और भी अच्छी तरह से उन्होंने प्रगति की है और आगे बढ़े हैं। हमारी टैक्नोलॉजी आगे-आगे जा रही है। हमारे बहुत से सदस्यों ने ज्योलोजिकल सर्वे की जो बात कही है, सही मायने में हमारी टैक्नोलॉजी इतनी आगे आई है कि जिसका फायदा हमें लेना चाहिए।
हिन्दुस्तान इतना बड़ा देश है कि जिस देश की इतनी आबादी को हम अच्छी तरह से रख सकते हैं, इतना अनाज जैसे पैदा करते हैं, वैसे ही मिनरल्स के बारे में यहां जो हमारी सम्पत्ति है, उसको भी अच्छी तरह से हम लोग बाहर लाकर उसका व्यापार भी कर सकते हैं और हमारे देश के लिए भी उसका उपयोग कर सकते हैं। एक बात मेरे ध्यान में नहीं आ रही है कि कुछ लोग ऐसा कह रहे हैं कि इसे अभी अन्दर रख दीजिए और जब जरूरत पड़ेगी, तब निकाल लेंगे। लेकिन मैं चाहता हूं कि जब जरूरत पड़े, तब निकालेंगे, तब तक हमें इम्पोर्ट करना पड़ रहा है, ज्यादा बाहर से मंगाना पड़ रहा है, इसमें हमारा बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। यह होते वक्त सरकार की जिस तरीके से अलग-अलग नीतियां बन रही हैं, मुझे पता है कि 2-3 साल पहले कुछ ऐसी सदन में बात हुई थी कि इस बारे में अच्छा संशोधन लाया जायेगा, लेकिन वह संशोधन किस वजह से रोका गया है, मुझे पता नहीं है। मैं मंत्री जी से विनती करूंगा कि वह संशोधन जल्दी से जल्दी लाया जाये, उस पर बहस हो जाये तो वह हमारे देश के लिए अच्छी उन्नति की बात हो सकती है।
यह सब अलग-अलग राज्यों में हो रहा है। मैंने देखा कि दोनों तरफ से टोलमटाली चल रही थी, यहां से आप बाल रहे थे, वहां से आप बोल रहे थे, सब जगह से लोग बोल रहे हैं, लेकिन हम देख रहे थे कि क्या हो रहा है? इस सदन में इस पर चर्चा हो रही है। मैं मंत्री जी से विनती करूंगा कि जब सदन में इस बारे में बात होती है, तो उसमें पर्यावरण की बात बहुत महत्वपूर्ण है। माइनिंग जितनी जरूरी है, पर्यावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मैं जरूर इस बात को रखना चाहूंगा, हालांकि सरकार इस बात पर ध्यान दे रही है, लेकिन कुछ ऐसी बात होनी चाहिए, क्योंकि राज्य बोलता है, केंद्र के पास जाइए और केंद्र बोलता है कि राज्य के पास जाइए। मुझे समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि कुछ ऐसे कानून है, जिसकी वजह से दोनों एक-दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। मैं कहना चाहूंगा कि मंत्री जी सभी राज्यों के खनिज मंत्रियों को बुलायें और सही मायने में इसकी पहल की जाए कि इसके लिए क्या करना चाहिए? मैं आपको एक उदाहरण दूंगा। महाराष्ट्र माइनिंग का इतना बड़ा जोन नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र में जो छोटी-छोटी माइनिंग होती हैं, पर्यावरण की जो भी चीजें कानून के दायरे में आती हैं, उसको ठीक तरीके से नहीं रखा जाता है, इसलिए महाराष्ट्र को गोवा माइनिंग जोनल डिवीजन कंट्रोल करता है। इस बारे में कई बार मीटिंग्स हो चुकी हैं। कुछ हद तक फायदा हुआ है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। वहां खासकर माइनिंग इलाके जो लोग काम करते हैं, उनके जो बच्चे होते हैं, जो घर वाले होते हैं, उनके लिए सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। वहां काम करने वालों के बच्चे गरीब होते हैं, लेकिन उन बच्चों की शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं होता है। उनकी बच्चों की माताओं की हेल्थ के बारे में कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकार की ओर से कोई ऐसा खास प्रावधान किया जाए और हर राज्य को कहा जाए कि इतना खर्च आपको करना ही पड़ेगा या इन चीजों को आपको ध्यान में रखना ही पड़ेगा। ऐसी स्थिति बहुत से राज्यों में है। आपको माइनिंग से बहुत पैसा मिलता है, लेकिन उसका कितना पर्सेंट हम उनके ऊपर खर्च करते हैं? वह कुछ भी नहीं है। मेरी सरकार से यह विनती है कि हर राज्य सरकार को इस बारे में कंपल्शन किया जाए, जैसे शिक्षा के बारे में कंपल्शन किया गया है, उसी प्रकार से उनके लिए भी कुछ किया जाए। माइनिंग जोन इलाके में रहने वाले लोगों को शुद्ध पीने का पानी नहीं मिल रहा है। उनके रहने की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। मैं समझता हूं कि वहां रहने वाले लोग बहुत गरीब होते हैं। खानों से हम लोग बहुत पैसा कमा रहे हैं, लेकिन जिनके माध्यम से यह पैसा आ रहा है, उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
मैं सरकार से विनती करूंगा कि ऐसा कुछ ऐक्ट बनाया जाए, ऐसा कुछ प्रावधान किया जाए, जिससे उन लोगों के बारे में हम ध्यान दे सकें। अभी कहा गया कि अलग-अलग राज्यों के लिए कुछ जगह पर आबंटन किया गया है कि इस-इस इलाके में, महाराष्ट्र के लिए इतना है, गुजरात के लिए इतना है, आदि, लेकिन बहुत सी जगह पर उनको अभी तक परमीशन नहीं दी गयी है। वह क्यों नहीं दी गयी, किस वजह से रूकी है? आम-आदमी को इसके बारे में कुछ पता नहीं है। इसमें राशि का भी नुकसान हो रहा है। इससे हम ज्यादा लोगों को रोजगार भी दे सकते हैं। मैं सरकार से दरख्वास्त करूंगा कि इस बारे में आप जरूर सोचें। मैं मंत्री जी को धन्यवाद करूंगा कि उन्होंने सदन में यह बात रखी। इसके ऊपर बोलने के लिए बहुत सी बातें हैं और उसके लिए समय कम पड़ेगा, लेकिन मैं सरकार से कहना चाहूंगा कि अगले साल जब इसे सदन में रखेंगे, तो और अच्छी बातें रखकर कि हमारे देश को अधिक से अधिक उन्नति की ओर कैसे लेकर जाएंगे, इसकी ओर ध्यान रखेंगे। आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूं।
*SHRI BHAUSAHEB RAJARAM WAKCHAURE (SHIRDI) : India has a long history of abusing of mineral resources. Mining industry kept in focus in all the Five Year plans of the country and it could not be perceived as anything but development in demanding people’s forfeiture of their lands for national prosperity.
Mining in India depends on over 3100 mines, out of which over 550 are fuel mines; over 560 are miens for metals, and over 1970 are mines for extraction of non-metals. About 600 coals mines, 35 oil projects and 6000 metalliferous mines of different sizes employing quite a large number of persons. Both open cast mining and underground mining operations are carried out and drilling/pumping is undertaken for extracting liquid or gaseous fuels. The country produces and works with roughly 100 minerals, which are an important source for earning foreign exchange as well as satisfying domestic needs. India also exports iron ore, titanium, manganese, bauxite, granite, and imports cobalt, mercury, graphite etc. But what concern me the most is that most minerals and mining operations are in the forest regions inhabited by tribal people. In our country, people displaced by various projects, is estimated to about 5 crores and out of these, approximately 1 crore people have been displaced by mining projects alone. People displaced by mining lost the rights to cultivate their traditional crops and forests being cut down for mining, they are unable to collect forest produce for consumption or for sale.
Seventy five percent of people displaced due to mining activities in different parts of the country have not yet received any form of compensation or rehabilitation. The country as on date does not have any specific relief and rehabilitation policy as a constitutional safeguard for these affected people. Especially, in the case of women the issues related to displacement primarily affects their control over land and other resources. One can easily surmise the condition of women displaced and affected by mining in different sectors and problem of people in abandoned/closed mines. Starting from rat hole mining, small legal and illegal mining to large-scale mining mostly by the public sector since the 90’s by the private sector’s participation, there are a wide range of problems and conflicts in relation to mining. Especially, the problems of local communities, displaced or affected by mining have had far reached consequences. Displaced tribal communities, who never received any form of compensation or rehabilitation, have to migrate to bordering states in search of land and forests. An example is the migration of tribals from Orissa to the neighbouring state of Andhra Pradesh due to encroaching upon their land for mining purpose.
While India has been steadily attracting foreign investment into its booming mining sector, the fact that the best prospects lie in tribal-dominated and heavily forested areas is cause for concern. Workers affected by lung diseases- Silicosis, a lung disease caused by breathing in silica dust is another grim reality in the mining area. Despite an official order to provide compensation to the silicosis victims, nothing has been done so far. The workers also get affected by deadly diseases like tuberculosis and asbestosis. I would, therefore, request the Hon’ble Minister to look into these important issues and take remedial measures so that all the displaced and disease affected persons of mining activities can be rehabilitated properly with medical facilities, especially women who are most sufferers.
It is a dangerous trend that illegal mining is wide spreading in various ore-rich states or our country and has also generated controversy, which spans encroachment of forest areas, underpayment of government royalties and conflict with tribal people regarding land-rights. The Ministry of Mines and the Ministry of Environment and Forests have received over 20,000 cases of illegal mining during last few months. If we do the calculation, illegal iron ore mining and exports could be Rs.50,000 crore to Rs.60,000 crore. The spill-over of the effects of illegal mining into problems such as Naxalism and the distortion of Indian democracy by mixed political and mining interests has also gained international attention. This also led to a nexus between criminal and anti-national elements, especially in Naxal-affected areas in various parts of our country.
Illegal mining activity has been reported in the Aravali Range. Bauxite mining by Vedanta Resources in tribal areas of Orissa have led to conflicts in land right. Due to the personal intervention of our Environment Minister the 8,000 strong Dongria Kondh tribes who believe the remote hills are the home of their God, Niyam Raja and rely on the land for their crops and livelihood has been saved from the onslaught of a Multi National Company. Had this mining project been cleared by the Government, these tribal group would have been rendered homeless? Niyamgiri is the source of two major rivers, the Vansdhara and Nagvalli that provide water for irrigation in the plans below. It is a storehouse of rare flora and fauna, the four-horned antelope and the golden gecko being among them. The hills provide food for the tribals. Fruits that grow there are sold in village markets. In short, the Niyamgiri Hills, the home of Niyam Raja, are at the center of Dongria Kondh culture. All these greenery would vanish if this mining project would have been set up.
Coal mining has also run into trouble as well in Angul district, Orissa over land issues. There have been severe ecological changes due to all these illegal mining. Certain species of animals, like the sloth bear, have disappeared in some region where illegal mining activity is going on. Medicinal plants from the area do not grow anymore. The entire system of rain has changed. It is reported that the entire area surrounding the mining area is denuded of greenery and has no agricultural activity. So, Government has to formulate a mechanism so that illegal mining is totally banned and before issuing any mining licence Government should consider all these environmental issues, and also see survival of tribal communities from the onslaught of Multi-nationals and in addition clearance from Ministry of Environment & Forests should be made mandatory before giving clearance to any mining project to save our environment as well as primitive communities.
ओश्री श्रीपाद येसो नाईक (उत्तर गोवा) ः गोवा में आयरन ओर का खनन अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा होता है । उसका निर्यात हम चीन और जापान को करते हैं । आज गोवा की परिस्थिति यह है कि यहां पर कानूनी रूप से जितना खनन होना चाहिए उससे कई गुना ज्यादा गैर कानूनी रूप से खनन होता है । इसलिए यह गैर कानूनी खनन हो रहा है उसके ऊपर केन्द्र सरकार ने कोई उपाय योजना बनानी चाहिए और जो राजस्व की हानि हो रही उसको रोकना चाहिए । जो गैर कानूनी खनन वहां पर हो रहा है इसके कारण वहां का ट्रंसपोर्ट सिस्टम लड़खड़ा गया है । पूरे गांवों में धूल ही धूल रहती है जिसका प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है । जिससे वे कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं । गोवा जो हरियाली के प्रसिद्ध है वह सारी हरियाली, खेती वहां की नष्ट हो रही है । खनन के बाद जो मिट्टी फेंकते देते हैं वह खेतों में डाल दी जाती है जिससे खेती भी प्रभावित हो रही है और जनता के इस नुकसान की भरपाई होने की कोई व्यवस्था नहीं है । निर्यात से करोड़ों रूपयों की जो विदेशी मुद्रा केन्द्र सरकार को मिलती है उसका थोड़ा अंश भी गोवा के लोगों को दिया जाए तो उनको बहुत राहत मिल सकती है । अतः यह केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गोवा के लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए योजना बनाए । गोवा की आधी जनसंख्या खनन पर ही निर्भर है ।
2011-12 के बजट में जो निर्यात करते हैं उन पर एक्साईज डय़ूटी बढ़ाई है । गोवा का जो आयरन ओर होता है इसका फेराज का कन्टेंट 52 से 58 प्रतिशत, गोवा निचले स्तर का आयरन ओर एक्सपोर्ट करता है भारत में इसका उपयोग नहीं होता । पहले ही आयरन ओर का मूल्य पूरी दुनिया में कम हो गया है इसलिए इतनी अधिक डय़ूटी बढ़ाने से एक्सपोर्ट करना मुश्किल होगा । इसलिए एक्सपोर्टरों ने जो पहले आर्डर भी लिए उनको कैंसिल करना शुरू कर दिया है । कर्नाटक सरकार द्वारा आयरन ओर के निर्यात पर रोक लगाने के कारण पहले से ही 15 प्रतिशत निर्यात कम हो गया है । निर्यात डय़ूटी बढ़ने से यह और कम होने की संभावना है । इसलिए जो छोटे-मोटे ट्रंसपोर्टर, छोटी शिप इंडस्ट्री है उन पर निर्यात कम होने का कुप्रभाव पड़ेगा । छोटी शिप इंडस्ट्री तो _______________________________________ * Speech was laid on the Table बंद होने के कगार पर है । पहले से लगभग 1200 छोटे शिप काम कर रहे हैं लगभग 25-30 नए शिप खरीदने के लिए आर्डर दिए हैं जिसके लिए बैंक ने लोन दिया है । ये सब लगभग 150 करोड़ के हैं । निर्यात कम होने से यह सब बंद हो जाएंगे । इस छोटे शिप उद्योग में कम से कम 7000 वर्कर सीधे जुड़ गए हैं और 15 हजार वर्कर अन्य तरीकों से इससे जुड़े हैं । यदि आयरन ओर का एक्सपोर्ट बंद हो गया तो उक्त हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे और इनके जीवन यापन का सहारा समाप्त हो जाएगा । छोटे शिप इंडस्ट्री एसोसियेशन ने इसलिए इस बजट में सरकार ने एक्सपोर्ट डय़ूटी जो 5 प्रतिशत से 20 प्रतिशत की है उसको कम करके पुनः 5 प्रतिशत करने की अपील वित्त मंत्री जी से की है ।
मेरी मांग है कि उक्त एक्सपोर्ट डय़ूटी को फिर से 5 प्रतिशत तक लाया जाए ।
कुमारी मीनाक्षी नटराजन (मंदसौर):महोदय, मैं सबसे पहले आपका धन्यवाद करती हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। खनिज मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत की गयी अनुदान मांगों का समर्थन करने के लिए मैं खड़ी हुई हूं। अपनी बात की शुरूआत करते समय मैं एक बात जरूर जोड़ना चाहती हूं। हम यहां पर खनिज मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत अनुदान मांगों की चर्चा करने के लिए खड़े हुए हैं, लेकिन यह मामला केवल एकपक्षीय सोच का मामला नहीं है।
जब तक हम इस मसले पर समग्रता के साथ चिंतन करते हुए नीति निर्धारण नहीं करेंगे, तब तक इस विषय के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। सदन में उपस्थित पक्ष, विपक्ष के सभी सदस्य यह बात जानते हैं और मानते हैं कि जब सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ और औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत हुई, तो खनिजों, खान, खदानों और उनके उत्खनन के बिना औद्योगिक क्रान्ति और विकास का कोई मतलब नहीं था। लेकिन आज जबकि हम लोग 21वीं सदी में खड़े हैं, इस सदन में बैठकर इस पर बहस कर रहे हैं, तब भी कहीं रायगुड़ा, काशीपुर, नियामगिरी के आसपास, झारखंड, मध्य प्रदेश में कोई गोंड, बैगा, औरांव अपनी-अपनी बस्ती से निकाला जा रहा होगा, बेदखल किया जा रहा होगा।
संजीदगी के साथ बात करने की जरूरत है कि आज जब हम यहां बहस करने के लिए खड़े हुए हैं, तब भी छत्तीसगढ़ में बहने वाली बेलाडिला की पर्वत श्रृंखलाओं से निकलने वाली शंखिनी और डंकिनी नदियां कुछ और अधिक मटमैली होकर बह रही होंगी। आज जब हम खनिज के बारे में बात करेंगे, तो उसके साथ जुड़े हुए जो दूसरे विषय हैं, मसलन खनिजों का पर्यावरण पर जो प्रभाव पड़ता है, उसकी वजह से जो विस्थापन उपजता है, उसके बारे में बात किए बगैर खनिजों के बारे में चर्चा करना मेरे ख्याल में पूरी बात नहीं होगी। जरूरत है कि हम उसके बारे में यहां बात करें। देश की आबादी के आठ फीसदी लोग आदिवासी वर्ग के हैं। सभापति महोदय, पिछले इतने वर्षों में, आजादी के बाद से लेकर अब तक, जब से विकास की अवधारणा पैदा हुई और हम आगे बढ़े, अगर पूरे देश के कुल विस्थापन को देखें, तो चालीस फीसदी विस्थापन आदिवासी वर्ग के लोगों का हुआ।
मैं आपके सामने कुछ आंकड़े रखना चाहती हूं। वर्ष 1991 में 769 हेक्टेयर फॉरैस्ट लैंड उद्योग हेतु होती थी, 1993-94 में आते-आते वह फॉरैस्ट लैंड, जिस पर माइनिंग और उसके अलावा उद्योग और अन्य चीजों के लिए गतिविधियां शुरू हुईं, उसमें 43 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जिसमें से तकरीबन एक-तिहाई माइनिंग के लिए होने लगा। मैं कहना चाहती हूं कि हम जब भी माइनिंग के बारे में बात करते हैं तब विस्थापन के बारे में बात किए बगैर बात पूरी नहीं हो सकती। विस्थापन के बारे में अगर किसी ने ऐतिहासिक कदम उठाया, मैं कहना चाहती हूं कि समता वर्सेस स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश के मामले में 1997 के जुलाई महीने में माननीय उच्चतम अदालत ने एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक फैसला दिया। हम अपने संविधान में पांचवी अनुसूची की बात करते हैं। पांचवी अनुसूची में आदिवासी वर्ग को यह सुरक्षा, संरक्षण है कि आदिवासी और अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी तरह लैंड का ट्रंसफर किसी गैर आदिवासी को नहीं किया जा सकता। लेकिन आंध्र प्रदेश के विशाखापटनम जिले में उस समय, जब बिरला और उसके साथ-साथ 17 दूसरी कम्पनियों को पट्टे जारी किए गए थे, तब माननीय उच्चतम अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए उन सारे पट्टों को निरस्त किया और उसके साथ-साथ यह जोड़ा कि आगे इस तरह से पट्टे लीज़ पर नहीं दिए जा सकते। एक तरफ उच्चतम अदालत ने यह फैसला दिया, दूसरी तरफ हमारी पार्लियामैंट, तत्कालीन सरकारों ने मिलकर ‘पेसा’ कानून बनाया, आदिवासी वर्ग को विस्थापन से बचाने के लिए पांचवी अनुसूची में प्रावधान किया। मैं कहना चाहती हूं और आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान इस ओर ध्यान दिलाना चाहती हूं कि अगर पेसा कानून भी बात करता है तो मात्र गौण खनिजों की बात करता है, प्रमुख खनिजों की बात वह भी नहीं करता। जब तक आदिवासी वर्ग के विस्थापन के मामले में हम कोई ऐतिहासिक फैसला नहीं करते तब तक बेदखली के मामले इसी तरह सामने आते रहेंगे।
नियामगिरी पर्वत में डोंगरिया कोंध समाज के लोग जिस पर्वत की देवता की तरह पूजा करते हैं, जिस पर्वत पर उनकी आस्थाएं टिकी हुई हैं, वहां पर वेदांता कम्पनी द्वारा उन लोगों को खदेड़े जाने की बात सामने आयी।
सभापति महोदय, मैं यूपीए की चेयरपर्सन माननीय श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधान मंत्री डॉ.
मनमोहन सिंह जी को बधाई देना चाहूंगी, जिन्होंने केन्द्र सरकार के माध्यम से उस पर रोक लगायी। यहां पर बात एक नियामगिरी की नहीं है, एक नियामगिरी को इस तरह के इंटरवेंशन से बचाया जा सकता है। लेकिन बात यह है कि अगर एक नियामगिरी समाप्त होगा, तो जगह-जगह पर छत्तीसगढ़, झारखंड आदि अन्य सभी जगहों पर नियामगिरी में जिस तरह की घटनाएं हुईं, उसी तरह अन्य जगहों पर भी घटनाएं होती रहतीं।
सभापति महोदय, ग्लोबलाइजेशन का दौर है और ग्लोबलाइजेशन के बाद, वर्ष 1993 के बाद फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमैंट हमारे देश में आने लगा। वर्ष 2006 मे करीब-करीब सौ फीसदी एफडीआई को मान्य किया गया और लगातार आदिवासी संरक्षित क्षेत्रो में, अनुसूचित क्षेत्रों में इन कम्पनियों के माध्यम से काम होना शुरू हुआ।
मैं महामहिम राष्ट्रपति जी का स्वागत करती हूं और धन्यवाद देती हूं, जिन्होंने बजट सत्र के शुरू होने के समय दिये गये अपने अभिभाषण में इसकी जोरदार ढंग से पैरवी की कि आने वाले समय में नयी माइनिंग नीति, नयी खनिज नीति लायी जायेगी। मुझे विश्वास है कि उस विचारधारा से जुड़ी हुई केन्द्र सरकार, जिसने आजादी से पहले जंगल सत्याग्रह की पैरवी की थी, जिसने आजादी के बाद ऐतिहासिक आदिवासियों के साथ न्याय करते हुए वनाधिकार कानून और पेसा कानून को प्रावधान दिया, ट्राइबल पंचशील और सब प्लान की बात की, वही विस्थापन नीति में भी मानवता के दृष्टिकोण के साथ काम निश्चित करेगी। जो नयी खनिज नीति आयेगी, उसमें यहां पर उपस्थित मेरे अन्य साथियों ने कहा। माइन्स का मामला डेप्रिसियेशन का है। वेल्यू लगातार घटती है। उसमें अगर आप किसी को मुनाफे में हिस्सेदारी देंगे, तो वह काफी नहीं है। मैं कहना चाहती हूं कि उन्हें बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। आदिवासी वर्ग के लोग अगर अपने क्षेत्र से हटाये जाते हैं और वे लगातार जल, जंगल और जमीन के लिए संघर्ष करते हैं, तो वह उनका नैतिक अधिकार है। उस अधिकार से हम उन्हें वंचित नहीं कर सकते। हमारा और इस सदन का कर्तव्य है कि जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ाई लड़ने वाले भूमिपुत्र आदिवासियों को इन सारी खदानों में बराबरी की हिस्सेदारी और मालिकाना हक मिलना चाहिए, इसकी मैं यहां पर बात करना चाहती हूं।
सभापति महोदय, इसके साथ-साथ मैं दूसरी बात पर आती हूं। उत्खनन से पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है? पूरी लैंड की टोपोग्राफी बदल जाती है। लगातार जो मैटल सल्फाइड्स होते हैं, वे जब आक्सीजन के प्रभाव में आते हैं, उनका जब ऑक्सीडेशन होता है और वे आयरन सल्फाइड्स बनते हैं, तब लगातार वे पर्यावरण के लिए खतरा पैदा करते हैं। जब केलिफोर्निया में गोल्ड रश हुआ, उसके ट्रीटमैंट के लिए साइनाइट का इस्तेमाल किया जाता था तब भी यही स्थिति वहां पर भी बनी थी। मैं कहना चाहती हूं कि जितने लोग भी उत्खनन का काम करते हैं, उसके साथ-साथ जो एबंडन करके माइन्स को चले जाते हैं, यानी जो परित्यक्त खदानें हैं, इस बात को मैं जिम्मेदारी के साथ कहना चाहती हूं कि हमारे देश में ऐसी कोई इन्वेंटरी नहीं है, जहां पर परित्यक्त खदानों का एक डाटा बनाया जाये। मैं आपसे अनुरोध करना चाहती हूं कि जो कम्पनियां यह काम करती है, उनसे एक क्लीन-अप कॉस्ट लिया जाना चाहिए और पॉल्यूटर्स पे की नीति की तर्ज पर जो पर्यावरणीय हानि हुई है, उसका खामियाजा वे भरे, उसे न्यून से न्यूनतम करते हुए काम करने की जिम्मेदारी आईबीएम और जीएसआई की है।
सभापति महोदय, आज यहां शुरू में कोयले के बारे में भी बात हुई। कोयले का इस मंत्रालय की बहस से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन पहले आओ, पहले पाओ की जो नीति है, वह नीति यूपीए ने कंटीन्यू की। उस नीति की शुरुआत एनडीए के समय से हुई। मैं यहां पर किसी तरह से प्वाइंट्स स्कोर करने के लिए यह बात नहीं कह रही हूं। मैं केवल इतना कहना चाहती हूं कि जिस तरह से विकसित देशों ने वहां पर कानून बनाये हैं, मै आपको उदाहरण देना चाहती हूं -- कप्रीहैन्सिव इन्वायरमेंटल रिस्पांस कम्पैनसेशन एंड लॉयबिलिटी एक्ट, क्लीनर्स एक्ट और क्लीन-अप कॉस्ट। जब तक इस बारे में बात नहीं होगी, तब तक खनिज मामलों में बात पूरी नहीं होगी। मैं कहना चाहती हूं कि अगर हम चाहते हैं कि आने वाले समय में उसका कम से कम पर्यावरणीय नुकसान हो और जो परित्यक्त खदानें हैं, जिसका कभी डाटा नहीं होता, जिसके बारे में कोई ट्रीटमैंट नहीं किया जाता, जिसकी कॉस्ट केवल और केवल सरकारों के जिम्मे आ जाती है, पर्यावरण पर आ जाती है, लोगों पर आ जाती है, उसकी कॉस्ट उनको लेना चाहिए।
18.00 hrs. उसकी कॉस्ट उनको देनी चाहिए। ...( व्यवधान) मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगी।
ग्रीनलैण्ड में कई वर्षों पूर्व नॉर्वे से माइग्रेट होकर नॉर्स जाति के लोग वहां पर पहुंचे। उन्हें अपने ऊपर बहुत घमण्ड था, जैसे हमारे बहुत सारे शहरी लोगों को भी होता है कि वे सबसे ज्यादा सभ्य हैं, जैसे कि हमारी कुछ कंपनियों को भी होगा, लेकिन जब वे वहां पहुंचे, जाहिल और गंवार समझे जाने वाले इनुआइट लोग वर्षों से, सदियों से, हजारों वर्षों से वहां रह रहे थे, लेकिन ये नॉर्स जाति के लोग केवल 450 साल में अपने द्वारा किए गए, अपनी लाइफस्टाइल के द्वारा किए गए पर्यावरणीय नुकसान की वजह से समाप्त हो गए। आज हमारे लिए वह एक मिसाल है और हमें इस बात के लिए देखना है कि हम किस तरह से पर्यावरणीय नुकसान को खत्म करते हुए, इसमें पारदर्शिता ला सकें।
अंत में, मैं कहना चाहूंगी की जीएसआई और आईबीएम का सशक्तीकरण होना चाहिए। हमारे पास अन्य देशों में बनाए कानूनों की भरमार है, इंडस्ट्री टैक्स के माध्यम से यह काम हो सकता है, क्लीन-अप कॉस्ट के माध्यम से हो सकता है, एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट कॉस्ट के माध्यम से हो सकता है। इस तरह से हम अपने खनन को बरकरार रखते हुए, पर्यावरण का कम से कम नुकसान करेंगे और विस्थापितों की रक्षा करेंगे।
बार-बार यह बात होती है कि भारत सरकार की जिम्मेदारी है, भारत सरकार क्या कर रही है? फेडरल व्यवस्था में भारत सरकार और प्रदेश की सरकारें सीमावर्ती दो राष्ट्रों की तरह नहीं हैं, दोनों की मिलकर सामूहिक जिम्मेदारी है और दोनों का मिलकर यह लक्ष्य होता है कि लोगों के ज्यादा से ज्यादा हित के लिए काम करें। मैं कहना चाहती हूं कि अगर कुछ लोग बार-बार यह कहते हैं कि यह भारत सरकार की जिम्मेदारी है, तो एक तरह से वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि प्रदेश सरकारें अपनी जिम्मेदारी का वहन करने में नाकामयाब हैं। मैं चाहती हूं कि यह बात यहां पर नहीं हो, सभी मिलकर अपनी सामूहिक जिम्मेदारी का वहन करें। मैं उम्मीद करती हूं कि नई खनिज नीति इन सारे अनसुलझे सवालों का जवाब देगी।
ओश्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर) ः खनन विभाग के अनुदान मांगों पर चर्चा में सम्मिलित करने हेतु निम्नांकित सुझाव प्रस्तुत कर रहा हूं ः-
वर्ष 2011-12 में खनन विभाग के बजट में मात्र 400 करोड़ राशि की बढ़ोत्तरी की गई है जो पूरे देश की खनिज संपदा को देखते हुए अत्यंत ही कम है । अतः इस राशि को बढ़ाया जाना चाहिए जिससे खनन दोहन की नीति का विस्तार हो सकें और विभाग को आधारभूत ढांचा विकसित करने के लिए अधिक राशि प्राप्त हो सके ।
मैं राजस्थान से आता हूं । मेरे बीकानेर संसदीय क्षेत्र में जिप्सम के अवैध खनन की शिकायतें प्राप्त होती रहती है । किसानों के खेतों में जिप्सम है, लेकिन जिप्सम की खुदाई सरकार के नियंत्रण में होने के कारण किसान अपने खेत का जिप्सम अवैध रूप से खोदते है और प्लास्टर ऑफ पैरिस की ईकाइयों को बेचते हैं । किसानों द्वारा निकाले गए जिप्सम को अवैध बताया जाता है और इस अवैध जिप्सम को वैध करने के लिए सभी स्तरों पर भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है । यदि किसानों को जिप्सम निकालने की अनुमति प्रदान कर दी जावें या ऐसी औद्योगिक ईकाइयां जो जिप्सम का उपयोग कच्चे माल के रूप में करती है उनको जिप्सम निकालने की अनुमति प्रदान कर दी जावे तो इससे एक ओर सरकार का राजस्व बढ़ेगा और दूसरी ओर अवैध खनन के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा । यद्धपि यह विषय राज्य सरकारों के अंतर्गत आता है लकिन भारत सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए और सभी राज्यों में इस तरह के प्रकरणों को इकजाई करके एक उच्च स्तरीय समिति बनाकर इसका निर्णय कराया जाना चाहिए जिससे अवैध खनन की समस्याओं का निस्तारण हो सकें ।
_______________________________________ * Speech was laid on the Table देश में लगभग 90 प्रकार का खनिज संसाधन उपलब्ध है और इस खनिज संसाधन को माईनर मिनरल एवं मैजर मिनरल के नाम से विभक्त किया गया है । माईनर मिनरल एवं मैजर मिनरल की नीतियां भी अलग-अलग है । उदारीकरण के इस युग में खनिज संसाधन के वर्गीकरण की समीक्षा करने की आवश्यकता है और वर्तमान मांग व आपूर्ति के अनुसार इनका वर्गीकरण किया जाना चाहिए जिससे सरकार को ज्यादा राजस्व प्राप्त हो सके एवं अवैध खनन की शिकायतों में भी कमी आ सकें ।
राजस्थान में कुछ ऐसे खनिज संसाधन है जिसमें राजस्थान देश का अग्रणी राज्य है लेकिन जितनी रॉयल्टी राजस्थान के खनिज संसाधनों से भारत सरकार को प्राप्त होती है उसके अनुपात में भारत सरकार राजस्थान के खनिज संसाधनों के विकास में कम खर्च करती है । इससे संविधान में उल्लेखित संघीय ढांचे के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती है । अन्य राज्यों की भी ऐसी शिकायत है अतः भारत सरकार के स्तर से ऐसी नीति बननी चाहिए जिससे खनिज संसाधन वाले राज्यों को रॉयल्टी की राशि ज्यादा प्राप्त हो सकें एवं राज्य का खनिज संसाधन सर्वांगीण रूप में विकसित हो सके ।
अवैध खनन के प्रकरण में केवल एक राज्य तक सीमित होने की व्यवस्था के विपरीत संपूर्ण देश को ध्यान में रखते हुए योजना बनानी चाहिए और जांच एजेंसी को सक्रिय किया जाना चाहिए । सभी राज्यों के लिए एक जैसी व्यवस्था किए जाने की जरूरत है । पार्टी विवाद से ऊपर उठने की जरूरत है ।
अवैध खनन के स्थानों पर पुलिस की अतिरिक्त व्यवस्था पेट्रोलिंग के रूप में की जानी चाहिए । भारत सरकार के पैरा-मिल्ट्री फोर्सज को भी इस उपयोग में आवश्यकता पड़ने पर लिया जाना चाहिए ।
देश के खनिज संसाधनों को पहले आओ - पहले पाओ, पहले खनिज खोजो फिर खनिज की खान प्राप्त करो जैसी नीतियों को वर्तमान युग में तिलांजलि देने की जरूरत है । वर्तमान युग प्रतिस्पर्धा का युग है इसमें यदि खनिज संसाधनों का नीलामी के माध्यम से बिक्री होगी तो सरकार को ज्यादा राजस्व प्राप्त हो सकता है । नीलामी की व्यवस्था में ऐसी व्यवस्था की जा सकती है कि जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग को कुछ प्रतिशत निर्धारित कर खान आवंटन में आरक्षण किया जा सकता है जिससे सरकार की कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना भी साकार हो सकती है ।
खान आवंटन के समय पर्यावरणविदों की सहायता ली जानी चाहिए तथा छोटे-छोटे उद्योगों की स्थापना में पर्यावरण विभाग की एनओसी देने की जटिल प्रक्रिया को सरलीकृत बनाकर परेशानी के निस्तारण की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
रेलवे को ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जैसे ही रेलवे को यह शिकायत प्राप्त हो कि किसी विशेष क्षेत्र में अवैध खनन होता है तो ऐसे स्थानों से माल की ढुलाई यदि रेलवे द्वारा रोक दी जाती है तो उससे भी अवैध खनन को रोकने में असर पड़ेगा और भविष्य में जब नीति बनाई जाएगी तो खनन विभाग को ज्यादा आय प्राप्त हो सकती है ।
खनिज संसाधनों के दोहन के रूप में मशीनों के साथ-साथ मजदूरों द्वारा भी खनन का कार्य किया जाता है और यह सभी मजदूर असंगठित क्षेत्र के होते हैं अतः ऐसे मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए बीमा योजना बनाई जानी चाहिए जिसमें शिक्षा स्वास्थ्य एवं पेंशन आदि की सभी सुविधाएं सम्मिलित होनी चाहिए ।
खनन के कारण ज्यादातर आदिवासी व कमजोर वर्ग के लोग विस्थापित होते हैं । विस्थापितों को पुनर्वास के लिए 33औ राशि आरक्षित की जानी चाहिए ।
माइनिंग के सर्वेक्षण के कार्य को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना चाहिए और उसे सुदृढ़ किया जाना चाहिए ।
ओश्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): मैं खानमंत्री द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2011-12 के खान मंत्रालय के बजट का समर्थन करता हूँ। आज देश में भारत की विकास दर में खान मंत्रालय का महत्वपूर्ण योगदान है । इसीलिए योजना आयोग ने वर्ष 2005 में राष्ट्रीय खनिज नीति और विषय पर विधान नामतः खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 1957 के संबंध में सिफारिशे करने के लिए उच्च स्तरीय समिति (होदा समिति) गठित की थी । समिति की रिपोर्ट के आधार पर मार्च 2008 में राष्ट्रीय खनिज नीति अधिसूचित की गयी । और उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों को लेने और राष्ट्रीय खनिज नीति विधायी ढांचे में लाने के लिए कार्य शुरू किया गया है । हमारी सरकार ने प्रमुख खनिजों के रायल्टी के निर्धारण और वसूली को सरल बनाया जा सके उसके लिए रायल्टी प्रणाली को युक्तियुक्त् बनाया गया है । भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) का गहराई से अध्ययन करके 31 मार्च, 2009 को रिपोर्ट प्रस्तुत किया जा चुका है तथा उस रिपोर्ट को स्वीकार भी किया जा चुका है । उसी के आधार पर जी एस आई को सुदृढ़ बनाना शुरू कर दिया है क्योंकि खनिज बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है जो सीमित एवं अनवीकरणीय है । ये उनके आधारभूत उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चे पदार्थ जुटाते हैं तथा विकास के प्रमुख संसाधन है । भारत में खनिज उत्खनन का इतिहास हड़प्पा सभ्यता जितना पुराना है । प्रचुर भंडार के रूप में खनिजों की विस्तृत उपलब्धता ने भारत में खनिज क्षेत्र की वृद्धि और विकास को सुसाध्य बना दिया है । खनन क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है । आजादी के बाद से मात्रा और मूल्य दोनों के संदर्भ में, खनिज उत्पादन में अत्यंत वृद्धि हुयी है । भारत 86 खनिजों का उत्पादन करता है । जिनमें 4 ईधन, 10 धात्विक, 46 गैर धात्विक, 3 परमाणु एवं 23 गौण, खनिज (इमारती एवं अन्य पदार्थ सहित) शामिल हैं । वर्ष 2009-10 के दौरान खनिज उत्पादन का कुल मूल्य (परमाणु खनिजों को छोड़कर) 127921.42 करोड़ रूपये अनुमानित है । जो पूर्व वर्ष की तुलना में करीब 4.61 औ की बढ़ोतरी दर्शाता है खनिज के मामले में भारत पूरी तरह अथवा अधिकांशतः आत्मनिर्भर रहा है । आज देश की आजादी में आदिवासी का 8 औ है लेकिन विसथापन के मामले में 40 औ है जो काफी चिन्तनीय है । हमें आदिवासियों की चिन्ता करके उनके हितों के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है । क्योंकि ये खनिज तापीय ऊर्जा उत्पादन, लौह और इस्पात, लौह मिश्र धातु, एल्यूमिनियम, सफेद पिगमेंट इत्यादि जैसे उद्योगों के आवयक घटक हैं । भारत खनिज ईंधनों में कोयला स्टील संयंत्र के लिए आवश्यक निम्नतर एश कोकिंग कोल को * Speech was laid on the Table छोड़कर एवं लिग्नाईट/धात्विक खनिजों में बॉक्साईट क्रोमाइट, लौह एवं मैगजीन अयस्क, इल्मेनाईट तथा रूटाईल और क्राइसोआईल, एसेस्टस, बौरेक्स, लूआरोइट, कायनाईट, पोटाश, राक फास्फेट एवं मूल सल्फर को छोड़कर प्रायः सभी औद्योगिक खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर है । केन्द्र सरकार देश भर में खनिज प्रसाधन में बुनियादी एक समानता को सुनिश्चित करने के लिए एन एम पी को प्रभाव देने के लिए आवश्यक विधायी उपाय तेयार करने के कार्य मे लगी है । राष्ट्रीय नीति के लक्ष्यों के अनुरूप सभी राज्यों को मॉडल राज्य खनिज नीति परिचालित किया गया है । माडल ढाँचे का उद्देश्य राज्य सरकारों को अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपने राज्यों के लिए राष्ट्रीय खनिज नीति के दायरे में उपयुक्त खनिज नीतियां विकसित करने के लिए सहायता के रूप में कार्य करना है । आज देश में अवैध खनन कई राज्यों में हो रहा है । उत्तर प्रदेश, कर्नाटका, उड़ीसा, झारखंड में अवैध खनन अभिशाप हो गया है । जिससे राजस्व की काफी नुकसान हो रहा है । यद्यपि खनिज राज्य सरकार की संपत्ति है और संपूर्ण रायल्टी राज्य सरकारों को प्राप्त होती है । इसको रोकने के लिए खान खनिज (विकास और विनियमन अधिनियम 1957) के तहत राज्यों को शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन राज्य अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं कर रही है । आज विकास दर में करीब 5 औ खान मंत्रालय का योगदान है । इसी के साथ मैं प्रस्तुत बजट का समर्थन करता हूँ ।
*श्री ए.टी. नाना पाटील (जलगांव):माननीय अध्यक्ष जी, मैं खान मंत्रालय की अनुदान की मांग 2011-12 पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। महोदया, सरकार ने बजट पेश करने के पहले आर्थिक सर्वेक्षण प्रकाशित किया है। उसमें मुद्रास्फीति पर चर्चा करते हुए कहा गया है कि देश में धातु और खनिजों के दामों में हो रही महंगाई का भी मुद्रास्फीति बढ़ने पर असर हुआ है। इसका मतलब है कि खनिज और धातुओं का भी हमारे ऊपर प्रभाव पडता है। खनिज देश के विकास में मुख्य भूमिका निभाते हैं लेकिन मुझे खेद से कहना पड़ता है कि सरकार का ध्यान इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर नहीं है। देश की विकास दर बढ़ रही है लकिन खनिज क्षेत्र में इस तरह की बढ़ौत्तरी दर्ज नहीं हो पा रही, हम खनिज के कारोबार में लगातार पिछडते जा रहे हैं। लोक उद्यम सर्वेक्षण के ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2009-10 से पूर्व देश में 2962 खानों की संख्या थी लेकिन 2009-10 में अब यह 2729 है। खानों की संख्या में हो रही कमी का क्या कारण है। सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। लोक उद्यम के खंड 1 के अनुसार अन्य खनिज एवं धातू का कुल कारोबार 2008 में 16454.29 करोड़, 2009 में यह 17984.60 करोड़ और 2010 में यह 15991.61 करोड़ रूपये दिखाया गया है। इसका मतलब खनन क्षेत्र के कारोबार में कमी हो रही है। इसमें खनिज क्षेत्र की कुछ प्रमुख कंपनियों के उत्पादन के आंकड़े दिये गये हैं1 उसमें हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड ने 2008-09 में 30036 एम.टी कथोड और 51777 एम.टी. वायर रॉडस का उत्पादन किया है तो 2009-10 के दौरान 17516 एम.टी. कथोड और 41999 एम.टी. वायर राडस का उत्पादन किया और एक कंपनी इंडिया रेयर अर्थ लि0 ने 2008-09 में 356340-13856 और 19392 एम.टी. स्टाईल और जिरकॉन का उत्पादन किया तो 2009-10 में 355105 एम.टी. और 13138 एम.टी. स्टाइल और 18553, जिरकॉन का उत्पादन किया। ऑयरन ओवर क्षेत्र की के.आई.ओ.सी. एल. लि. ने 2008-09 में 1376 एम.टी. आयरन और पेलेट तथा 0.118 एम.टी. आयरन का उत्पादन किया और 2009-10 में 1273 एम.टी. आयरन और पेलेट्स श्और 0.062 एम.टी. वीग आयरन का उत्पादन दिया। मैं आंकड़ों के फेर में जाना नहीं चाहता। मेरे पास जो जानकारी है, उसके अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की खनिज कंपनियां अपने क्षमता के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रही। हम खनिज क्षेत्र में विकास की बात कर रहे है तो सार्वजनिक क्षेत्र की खनिज उत्पादन कंपनियों के उत्पादन में पिछड़ने को हमें गंभीरता से लेना होगा। इतना ही नहीं तो खनिज क्षेत्र की कुछ मुख्य आयरन ओवर कंपनी और जे एंड के खनिज विकास कंपनियां घाटे की कंपनियों के सूची में शामिल हैं।
आज देश को खनिज के आधार पर विकास की जरूरत है। हमारे औद्योगिक क्षेत्र में हमें विकास करना है तो हमें खनिज संसाधनों का राष्ट्र हित में दोहन करना होगा लेकिन खनिज क्षेत्र का जो परिदृष्य * Speech was laid on the Table हमारे सामने उभर कर आ रहा है, उससे विकास की कोई बात सामने नहीं आ रही है। 2006 में अनवारूल हुडा समिति ने देश में खनिज उत्पादन बढाने और इसके विकास के लिए अपनी रिपोर्ट पेश की और इसी रिपोर्ट के आधार पर 2008 में हमारी खनन नीति तैयार की गई, पर इसके बाद 31 मार्च 2009 को योजना आयोग द्वारा समिति, भारती भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अध्ययन के लिए समिति, भारतीय खान ब्यूरो के कामकाज के लिए समिति हाल ही में नो.गो. के लिए मंत्री समुद्र की समिति इन समिति के फेर में हमारी खनन निति उलझकर रह गई है। अगर 2008 में बनी खनन निति से फायदा नहीं हो रहा तो यह जल्दबाजी में क्यों बनाई गई, इसका जवाब मंत्री महोदय को देना होगा। खनन क्षेत्र के द्वारा खनिज उद्योग का विकास होगा, वहां रोजगार उपलब्ध होगा लेकिन यह नहीं हो रहा है। इसके कारणों को हमें तलाशना होगा। हमारे खनन क्षेत्र अधिकतर संविधान के पांचवी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्र है, वहां के आदिवासी क्षेत्र में नक्सल समस्या उभर रही है। वहां रोजगार और विकास के कोई साधन उपलब्ध नहीं है। इसका हमें विचार करना होगा। इन क्षेत्रों को हमें विकास की मुख्यधारा में लाना होगा तो हमें वहां के खनन के आधार पर उद्योग, प्रसंस्करण संयंत्र का निर्माण करना होगा। लेकिन खेद से कहना पड़ता है कि सरकार इस पर ध्यान नहीं केन्द्रित कर रही है।
खनिज से हमारे जनजातीय क्षेत्र में विकास सुनिश्चित हो सकता है लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। सरकार को देश में खनिजों के आयात पर हो रहे राजस्तव खर्च को देखते देश में खनिजों को चिन्हित करने और इसके राष्ट्रहित में उत्खनन और प्रसंस्करण करने की निती बनाने की आवश्यकता है। मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय को इन सुझावों पर अमल करने का आग्रह करता हूं। खनिज हमारे देश के लोगों की संपत्ति है, इसका ध्यान रखकर इसका दोहन करना चाहिए। इसके साथ मैं अपने भाषण को विराम देता हूं।
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, it is 6 o’ clock. We shall continue this discussion tomorrow.
Now, we will take up `Zero Hour’ matters and the time of the house is extended till the completion of `Zero Hour’.