State Consumer Disputes Redressal Commission
Smt. Gayatri Singh vs Sri Ram General Insurance Co. Ltd on 20 March, 2023
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 Complaint Case No. CC/315/2018 ( Date of Filing : 10 Sep 2018 ) 1. Smt. Gayatri Singh W/O Sri Subedar Singh R/O Vill. Munshiganj Near HAL Corva P.S. Munshiganj Distt. Amethi ...........Complainant(s) Versus 1. Sri Ram General Insurance Co. Ltd Regd Office E-8 Epip Riico Industral Area Sitapura Jaipur 302022 (Rajsthan) Through its G.M./Director ............Opp.Party(s) BEFORE: HON'BLE MR. Rajendra Singh PRESIDING MEMBER HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 20 Mar 2023 Final Order / Judgement राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उत्तर प्रदेश , लखनऊ। सुरक्षित परिवाद सं0-315/2018 श्रीमती गायत्री सिंह पत्नी श्री सूबेदार सिंह निवासी ग्राम मुंशीगंज, निकट एचएएल कोरवा, थाना मुंशीगंज, जिला अमेठी। ........... परिवादिनी। बनाम श्री राम जनरल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड, रजिस्टर्ड आफिस ई-8, ईपीआईपी आरआईआईसीओ इण्डस्ट्रियल ऐरिया, सीतापुर, जयपुर-302022 (राजस्थान) द्वारा जनरल मैनेजर/डायरेक्टर। ................. विपक्षी। समक्ष:- 1.
मा0 श्री राजेन्द्र सिंह, सदस्य।
2. मा0 श्री सुशील कुमार , सदस्य।
परिवादिनी की ओर से उपस्थित: श्री संजय जायसवाल विद्वान अधिवक्ता।
विपक्षी की ओर से उपस्थित : श्री दिनेश कुमार विद्वान अधिवक्ता।
दिनांक :- 10-04-2023.
मा0 श्री राजेन्द्र सिंह , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय संक्षेप में परिवादिनी का कथन है कि उसने एक मिल्क टैंकर पंजीयन सं0-यू0पी0 44 टी 4116 अपने जीविकोपार्जन के लिए खरीदा। उसने वाहन का बीमा विपक्षी कम्पनी से करया जो दिनांक 01-12-2015 से 30-11-2016 तक प्रभावी था। बाद में परिवादिनी ने अपने वाहन से सम्बन्धित नेशनल परमिट, फिटनेस सर्टिफिकेट, ऑथराइजेशन सर्टिफिकेट आदि लेने के लिए समस्त औपचारिकताओं को पूरा किया। बीमा कवर नोट के अनुसार वाहन का मूल्य 17,10,000/- रू0 था। इस मिल्क टैंकर को वाहन चालक ने परिवादिनी के मकान के सामने दिनांक 27-03-2016 को खड़ा किया और चाभी सायं 6.00 बजे उसे देकर चला गया। होली का समय था, अत: परिवादिनी परिवार के साथ अपने गॉंव गई। जब वह दिनांक 28-03-2016 को सुबह लौटी तो पाया कि मिल्क टैंकर की चोरी हो चुकी है। उसने इसकी पुलिस स्टेशन पर लिखाई किन्तु पुलिस अधिकारी ने उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी। उसने उसी दिन विपक्षी को भी चोरी के सम्बन्ध में पंजीकृत डाक से पत्र -2- भेजा किन्तु विपक्षी ने कोई निर्णय नहीं लिया।
पुलिस स्टेशन मुंशीगंज जिला अमेठी द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर उसने एस0पी0 अमेठी को दिनांक 23-04-2016 को पत्र भेजा जिस पर यह बताया गया कि वह जांच कर रिपोर्ट लिखेंगे। जब उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई तब उसने धारा-156(3) सी0आर0पी0सी0 के अन्तर्गत न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया। तत्पश्चात् उसका केस सं0-216/2016 पंजीकृत हुआ।
वाहन का मूल्य 24.00 लाख रू0 था किन्तु गलती से धारा-156(3) सी0आर0पी0सी0 के प्रार्थना पत्र में इसका मूल्य 10.00 लाख रू0 लिख गया। ए0सी0जे0एम0 का आदेश होने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की और उसने पुन: ए0सी0जे0एम0 के यहॉं प्रार्थना पत्र दिया तब उसकी एफ0आई0आर0 अन्तर्गत धारा-379 आई0पी0सी0 दिनांक 16-05-2017 को अंकित हुई।
परिवादिनी द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 156(3) सीआर.पी.सी. में संशोधन नहीं किया जा सका। पुलिस थाना मुंशीगंज, जिला अमेठी ने मामले की विवेचना की और दिनांक 12-08-2017 को अन्तिम आख्या न्यायालय ए0सी0जे0एम0 द्वितीय, कोर्ट नं0-18, सुलतानपुर में प्रेषित की, जिस पर अन्तिम रिपोर्ट वाद सं0-124/2017 पंजीकृत हुई और यह दिनांक 22-04-2018 को स्वीकृत हुई। इसके पश्चात् परिवादिनी ने पुन: एक पत्र दिनांकित 04-07-2018 विपक्षी को भेजा कि वह मिल्क टैंकर के बीमा का भुगतान कर दे। इसके पश्चात् भी विपक्षी ने कोई कार्यवाही नहीं की और न ही बीमा की धनराशि को अदा किया जिससे परिवादिनी अत्यन्त आर्थिक संकट में आ गई और वह लिए गए ऋण का भुगतान करने में समर्थ नहीं हो पा रही। अत: परिवादिनी ने वर्तमान परिवाद निम्नलिखित अनुतोष दिलाए जाने के लिए प्रस्तुत किया :-
1. विपक्षी को आदेश दिया जाए कि वह वाहन की बीमित धनराशि 17,10,000/- रू0 अदा करे।
2. विपक्षी को आदेश दिया जाए कि वह इस धनराशि पर वाहन चोरी के 03 -3- माह के पश्चात् से 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से परिवादिनी को ब्याज अदा करे।
3. विपक्षी को आदेश दिया जाए कि वह आर्थिक क्षति के रूप में परिवादिनी को 05.00 लाख रू0 अदा करे और 05.00 लाख रू0 मानसिक यन्त्रणा, अवसाद आदि के मद में भी अदा करे।
4. विपक्षी को आदेश दिया जाए कि वह परिवादिनी को वाद व्यय के रूप में 25,000/- रू0 अदा करे।
5. इसके अतिरिक्त अन्य अनुतोष जो यह माननीय राज्य उपभोक्ता आयोग उचित समझे उसे विपक्षी से परिवादिनी को दिलाया जाए।
विपक्षी बीमा कम्पनी की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत किया गया जिसमें कहा है कि बीमा पालिसी के अनुसार यह वाहन बैंक आफ बड़ौदा के यहॉं पर बन्धक था। यह वाहन दिनांक 23-07-2016 को चोरी हो गया किन्तु परिवाद 24 माह बाद प्रस्तुत किया गया। बीमा कम्पनी के अभिलेखों के अनुसार परिवादिनी ने न तो बीमा कम्पनी को सूचना दी और न ही कोई दावा पंजीकृत कराया। वर्तमान परिवाद बनावटी है और कहे गए तथ्यों का विरोध किया जाता है। धारा-156(3) सीआर0पी0सी0 का प्रार्थना पत्र दिनांक 23-07-2016 को प्रस्तुत किया गया। पुलिस कप्तान को दिनांक 23-04-2016 को पंजीकृत डाक से पत्र भेजना लिखा है किन्तु कोई रसीद इस सम्बन्ध में प्रस्तुत नहीं की गई है।
परिवादिनी ने कोई सूचना बीमा कम्पनी को नहीं दी है और मिल्क टैंकर का उपयोग वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था न कि आजीविका के लिए। अत: वतर्मान परिवाद खारिज होने योग्य है।
हमने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण की विस्तार से बहस सुनी तथा पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिकथनों/अभिलेखों एवं साक्ष्यों का भलीभांति अवलोकन किया।
वर्तमान मामले में यह स्पष्ट है कि 17,10,000/- रू0 के लिए प्रश्नगत -4- वाहन बीमित किया गया था जैसा कि बीमा अभिलेख से सिद्ध होता है। परिवादिनी के अनुसार उसके वाहन चालक ने इस मिल्क टैंकर को दिनांक 27-03-2016 को उसके घर के सामने सायं 6.00 बजे खड़ा किया और चाभी उसे देकर चला गया। होली का समय था, अत: परिवादिनी अपने गॉंव चली गई। जब वह दिनांक 28-03-2016 को सुबह लौटी तो पाया कि मिल्क टैंकर चोरी हो चुका है। तब उसने धारा-156 (3) सीआर.पी.सी. के अन्तर्गत प्रार्थना पत्र देकर प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत कराई।
परिवादिनी का कथन है कि उसे बीमित धनराशि मिलनी चाहिए जबकि विपक्षी की ओर से कहा गया कि इस मामले में विलम्ब से सूचना दी गई तथा लापरवाही की गई, अत: परिवादिनी का दावा निरस्त होने योग्य है।
मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने ओम प्रकाश बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस व अन्य, IV(2017) CPJ 10 (SC) के मामले में कहा कि बीमा कम्पनी द्वारा किसी भी दावे को निरस्त करने के लिए विधिक आधार होना चाहिए। मात्र तकनीकी आधार पर दावा निरस्त करना आम जनता का बीमा उद्योग से विश्वास उठने के समकक्ष होगा।
प्रस्तुत मामले में जब परिवादिनी की रिपोर्ट थाने पर नहीं लिखी गई तब उसने इसके लिए प्रयास किया और अन्तत: धारा-156 (3) सीआर.पी.सी. के अन्तर्गत इसकी एफ0आई0आर0 अंकित की गई।
गुरशिन्दर सिंह बनाम श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कं0लि0 व अन्य, I (2020) CPJ 5l7 (SC) के मामले में मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि जहॉं पर वाहन चोरी हो गया हो और बीमा कम्पनी को सूचना देने में विलम्ब हुआ हो और इसी आधार पर दावा निरस्त कर दिया गया। प्रथम सूचना रिपोर्ट घटना वाले दिन ही अंकित करा दी गई थी और विधि को स्थापित करने वाली एजेन्सी को इस सम्बन्ध में सूचित कर दिया गया था तब यह नहीं कहा जा सकता कि बीमित द्वारा बीमा कम्पनी के साथ असहयोग किया गया हो। मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने -5- कहा कि चोरी हुई यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण था। विपक्षी को सूचना देने में हुए मात्र विलम्ब के कारण दावा निरस्तीकरण का कोई आधार नहीं बनेगा।
वर्तमान मामले में इन तथ्यों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट नियमानुसार अंकित कराई गई है और उसमें किसी प्रकार का विलम्ब नहीं किया गया है। मात्र तकनीकी आधार पर दावा खारिज करने का कोई आधार नहीं है।
नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम नितिन खण्डेलवाल, (2008) 11 सुप्रीम कोर्ट केसेज 259 में प्रस्तर सं0-12 लगायत 15 में मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है :-
''12. In the case in hand, the vehicle has been snatched or stolen. In the case of theft of vehicle breach of condition is not germane. The appellant Insurance Company is liable to indemnify the owner of the vehicle when the insurer has obtained comprehensive policy for the loss caused to the insurer. The respondent submitted that even assuming that there was a breach of condition of the insurance policy, the appellant Insurance Company ought to have settled the claim on non-standard basis. The Insurance Company cannot repudiate the claim in toto in case of loss of vehicle due to theft.
13. In the instant case, the State Commission allowed the claim only on non-standard basis, which has been upheld by the National Commission. On consideration of the totality of the facts and circumstance in the case, the law seems to be well settled that in case of theft of vehicle, nature of use of the vehicle cannot be looked into and the Insurance Company cannot repudiate the claim on that basis.
14. In the facts and circumstances of the case, the real question is whether, according to the contract between the respondent and the appellant, the respondent is required to be indemnified by the appellant. On the basis of the settled legal position, the view taken by the State Commission cannot be faulted and the National Commission has -6- correctly upheld the said order of the State Commission.
15. The State Commission has allowed only 75% claim of the respondent on non-standard basis. We are not deciding whether the State Commission was justified in allowing the claim of the respondent on non-standard basis because the respondent has not filed any appeal against the said order. The said order of the State Commission was upheld by the National Commission.'' अत: इन परिस्थितियों में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परिवादिनी उपरोक्त न्यायिक दृष्टान्तों के परिप्रेक्ष्य में चोरी गए वाहन की बीमित धनराशि की 75 प्रतिशत धनराशि पाने की अधिकारिणी होगी। साथ ही इस निर्णय के दिनांक से 60 दिन के अन्दर भुगतान करने की दशा में इस धनराशि पर वह दिनांक 28-03-2016 से 12 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी पाने की अधिकारिणी होगी। इसके अतिरिक्त परिवादिनी विपक्षी से आर्थिक क्षति के रूप में 03.00 लाख रू0 पाने की अधिकारी होगी और वाद व्यय के रूप में 25,000/- रू0 पाने की अधिकारी होगी। इन धनराशियों का भुगतान यदि इस परिवाद के निर्णय के 60 दिन के अन्दर नहीं किया जाता है तब सम्पूर्ण धनराशि पर दिनांक 28-02-2016 से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 15 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज विपक्षी द्वारा परिवादिनी को देय होगा।
तदनुसार परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार किए जाने योग्य है।
आदेश प्रस्तुत परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है। विपक्षी बीमा कम्पनी को आदेश दिया जाता है कि वह चोरी गए वाहन की बीमित धनराशि 17,10,000/- रू0 की 75 प्रतिशत धनराशि अर्थात् 12,82,500/- रू0 इस निर्णय के 60 दिन के अन्दर परिवादिनी को भुगतान करे। साथ ही साथ इस निर्णय के दिनांक से 60 दिन के अन्दर भुगतान करने की दशा में इस धनराशि पर वह -7- दिनांक 28-03-2016 से 12 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी पाने की अधिकारिणी होगी। इसके अतिरिक्त परिवादिनी विपक्षी से आर्थिक क्षति के रूप में 03.00 लाख रू0 पाने की अधिकारी होगी और वाद व्यय के रूप में 25,000/- रू0 पाने की अधिकारी होगी। इन धनराशियों का भुगतान यदि इस परिवाद के निर्णय के 60 दिन के अन्दर नहीं किया जाता है तब सम्पूर्ण धनराशि पर दिनांक 28-02-2016 से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 15 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज विपक्षी द्वारा परिवादिनी को देय होगा।
उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्ध करायी जाय।
वैयक्तिक सहायक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(सुशील कुमार) (राजेन्द्र सिंह) सदस्य सदस्य
निर्णय आज खुले न्यायालय में हस्ताक्षरित, दिनांकित होकर उद्घोषित किया गया।
(सुशील कुमार) (राजेन्द्र सिंह) सदस्य सदस्य प्रमोद कुमार वैय0सहा0ग्रेड-1, कोर्ट नं.-2. [HON'BLE MR. Rajendra Singh] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] JUDICIAL MEMBER