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Lok Sabha Debates

Situation Arising Out Of Drought And Floods In Various Parts Of The Country on 28 July, 2009

an> 12.20 hrs.   Title: Situation arising out of drought and floods in various parts of the country   MADAM SPEAKER: The House shall now take up Discussion Under Rule 193.

श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (मुंगेर): अध्यक्ष महोदया, हम आपके आभारी हैं कि आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर बहस की शुरूआत करने का अवसर मुझे दिया है। आज हम जिस मुद्दे पर चर्चा करने जा रहे हैं, वह मुद्दा मुख्यतः मानवता के साथ जुड़ा हुआ मानवीय मुद्दा है।

      यह ऐसा मानवीय मुद्दा है कि इस देश की लगभग 75 प्रतिशत आबादी इस मुद्दे के साथ जुड़ी हुई है। चाहे बाढ़ हो, सुखाड़ हो या कोई और समस्या हो, हमारे देश की अधिकांश आबादी इससे प्रभावित होती है। इस देश की नीयति है कि प्रति वर्ष हम बाड़ और सुखाड़ पर चर्चा करते हैं। कभी बाढ़ पर चर्चा करते हैं, कभी सुखाड़ पर चर्चा करते हैं। हम चर्चा करते हैं, बहस होती है, सरकार का जवाब भी होता है, सरकार कई तरह की लुभावनी घोषणाएं भी करती है, मेज़ थपथपाई जाती है और उसके बाद हम अगले वर्ष फिर उसी बहस पर आकर खड़े हो जाते हैं। इसका मतलब यह सारी व्यवस्था ढाक के तीन पात वाली स्थिति है कि हम बहस करते रहें, हमारी समस्याएं प्रति वर्ष मुंह बाय हमारे साथ खड़ी रहें और हम आजादी के इतने वर्षों बाद भी उसका कोई निराकरण नहीं कर पाएं, जबकि हमारा देश पूरे तौर पर कृषि पर आधारित है। चाहे बाढ़ हो या सुखाड़, इन दोनों परिस्थितयों में अगर सबसे ज्यादा प्रभाव किसी पर पड़ता है तो वह कृषि पर पड़ता है और कृषि हमारे देश की मूल अर्थव्यवस्था का आधार है। अगर हमारी पैदावार सही नहीं होगी तो हम लाख प्रयास करें, औद्योगिक उत्पादन, एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट हर चीज करें, लेकिन अपनी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण नहीं पा सकते। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि हम इस समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में कोई कार्यवाही करें। हमें चाहिए कि पहले हम अपने संसाधनों को विकसित करें। हम विकास की हर बार कल्पना करते हैं। हम विकास की चर्चा हर साल करते हैं। हम कहते हैं कि हमारा देश लगातार विकास की ओर बढ़ रहा है, हम विकसित राष्ट्र की तरफ बढ़ रहे हैं, हम अगले 15-20 वर्षों में विकसित राष्ट्र का दर्जा पा लेंगे। लेकिन हम संसाधन कहां जुटा पा रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का जो मूल आधार है, उसके लिए जो संसाधन हैं, उन्हें हम एकत्रित नहीं कर पा रहे हैं, संगठित नहीं कर पा रहे हैं। आज इतने दिनों बाद भी सबसे दुखद स्थिति यह है कि बाढ़ और सुखाड़ से प्रभावित होकरहमारे देश के किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इससे ज्यादा शर्मनाक बात शायद हम लोगों के लिए और कोई नहीं हो सकती है। इसलिए हमें चाहिए कि हम संसाधन विकसित करें और उसके बाद विकास की चर्चा करें। आज हम संसाधन विकसित नहीं कर पा रहे हैं और विकास की चर्चा कर रहे हैं। हमारे यहां हर साल प्राकृतिक आपदा आती है।

      आज खाद्य सुरक्षा का सवाल है और हम उसके लिए चिंतित हैं, पूरा विश्व भी चिंतित है। लेकिन हमें खाद्य सुरक्षा को कानून बनाकर गारंटी करने की जरूरत पड़ रही है। ऐसी अवस्था क्यों आ रही है? ऐसी परिस्थिति क्यों पैदा हो रही है कि हम कानून बनाकर उस पर निर्भर हो रहे हैं। हमें आज खाद्यान्न पर आत्मनिर्भर होना चाहिए। हम बताना चाहते हैं कि सिंचाई और वर्षा से सिंचित भूमि की उपज दर में भारी अंतर है। चावल सिंचित भूमि में 1,880 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर पैदा होता है जबकि वर्षा सिंचित भूमि में 1,220 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर पैदा होती है। यह अंतर है। इसी प्रकार गेहूं 2,068 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर सिंचित भूमि से और वर्षा सिंचित भूमि से 1,100 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हम पैदा कर पा रहे हैं। हम कहां जा रहे हैं?

      जल प्रबंधन का सवाल है। हम बाड़ और सुखाड़ से तब तक निजात नहीं पा सकते जब तक उचित जल प्रबंधन की ओर ध्यान नहीं देंगे। ऐसा नहीं है कि हमारे पास जल की कमी है। आज एक तरफ कई राज्यों में सुखाड़ है और अगर आप दक्षिण के राज्यों में चले जाएं तो वहां बाड़ की स्थिति पैदा हो गई है।

      हमारे यहां प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध है, लेकिन आज हम उस जल का उचित प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं। अगर जल का उचित प्रबंधन करते, तो एक तरफ हम बाढ़ से निजात पा सकते थे, तो दूसरी तरफ हम सुखाड़ से भी निजात पा सकते थे। वर्षा ऋतु के दौरान यानी जून से लेकर सितम्बर तक 79 परसेंट जल संग्रह होता है, जबकि बाकी साल30 परसेंट जल संग्रह होता है। आज हम उस जल को संगठित नहीं कर पा रहे हैं, संचित नहीं कर पा रहे हैं। आज सबसे बड़ी जरूरत जल संचय करने की है।

      अध्यक्ष महोदया, नेपाल से जो नदियां हमारे देश में आती हैं, उनका क्या हाल है? देश में हमारे यहां जल की जो स्थिति है, उस बारे में, मैं आपको बताना चाहता हूं। देश की 19 नदियों के बेसिन में वार्षिक प्राप्त होने वाला जल औसतन 1,869 बिलियन क्यूबिक मीटर है, जबकि इसमें से कुल भंडारण, जिसे हम जमा कर पाते हैं, मात्र 225 बिलियन क्यूबिक मीटर ही कर पाते हैं। गंगा नदी बेसिन में 525 बिलियन क्यूबिक मीटर जल प्रवाह होता है, जबकि इसमें भंडारण क्षमता केवल 42 बिलियन क्यूबिक मीटर ही है। इसमें इतना बड़ा अंतर है।525 बिलियन क्यूबिक मीटर कहां और 42 बिलियन क्यूबिक मीटर कहां?  अगर हम उसके जल प्रबंधन और भंडारण की व्यवस्था करें, तो आज हम सुखाड़ से निजात पा सकते हैं। इससे एक तरफ हमें सुखाड़ से मुक्ति मिल सकती है, तो दूसरी तरफ हमें बाढ़ से भी मुक्ति मिल सकती है।         

      अध्यक्ष महोदया, नेपाल से आने वाली नदियां, जो विशेष तौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश में आती हैं, उनमें 200 बिलियन क्यूबिक मीटर जल आता है। हर वर्ष चर्चा होती है कि नेपाल से वार्ता करके यदि वहां हाई डैम बना दिया जाये, तो उसके माध्यमसे हम पूरे बिहार और उत्तर प्रदेश की बाढ़ को नियंत्रित कर सकते हैं। उससे हम बिजली का उत्पादन कर सकते हैं। हाईडल प्रौजेक्ट के माध्यम से हम बिजली में आत्मनिर्भर हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त हम सुखाड़ से भी निजात पा सकते हैं।

      वर्ष 2000 में भारत और नेपाल के साथ वार्ता करने के लिए एक कमेटी बनी। आज वर्ष 2009 चल रहा है, यानी इन नौ वर्षों मेंउस कमेटी की मात्र तीन बैठकें हुई हैं। अगर इन नौ वर्षों में तीन ही बैठकें हुई हैं, तो यह सरकार इस सवाल पर कितनी गंभीर है, यह आप खुद देख लीजिए। हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि आप इस मामले में क्या करना चाहते हैं?

            महोदया, मुझे याद है कि इसी सदन में माननीय चिदम्बरम साहब ने वर्ष 2004-005का वित्त बजट पेश किया था। उनके बजट भाषण के पैरा37 को हम यहां कोट करना चाहते हैं। उसमें उन्होंने कहा था कि “ देश के जल निकायों की मरम्मत, उनके विस्तार और उनकी क्षमता को बनाये रखने के लिए नैशनल वाटर रिसोर्सेज डेवलपमैंट प्रौजेक्ट बनाया गया और इस पायलट योजना पर एक सौ करोड़ रुपये व्यय करने के साथ-साथ ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं के लिए राशि आवंटित की गयी।” उन्होंने उस समय अपने बजट भाषण में यह भी कहा था कि देश के गांवों में जो छोटे-छोटे टूटे-फूटे तालाब हैं, उनमें जल संग्रह, जल भंडारण करने के लिए हम खुदाई करेंगे, तैयार करेंगे। वर्ष 2004 के बजट भाषण के बाद आज हम वर्ष 2009 में खड़े हैं। हम सरकार से जानना चाहते हैं कि आपने इस पायलट प्रौजेक्ट, जिसके लिए मेजें थपथपाकर आपका स्वागत किया गया, देश में वाह-वाही लूटी और इस बात की चर्चा भी की कि हम जल भंडारण करना चाहते हैं, तो इन पांच सालों के बाद आपकी वह योजना कहां गयी? आपने उसकी कितनी उपलब्धि इस सरजमीं पर, धरती पर उतारने का काम किया?

      मैं आपको यह कहना चाहता हूं कि जब तक आप जल भंडारण और जल प्रबंधन की व्यवस्था नहीं करेंगे तब तक आप देश को बाढ़ और सुखाड़ से निजात नहीं दिला सकते।

      महोदया, माननीय कृषि मंत्री जी यहां उपस्थित हैं, मैं आपके माध्यम से सरकार को सलाह देना चाहता हूं कि आज सड़क, बिजली आदि को इंफ्रास्ट्रक्चर में माना जाता है। किसी भी राज्य, किसी भी देश के विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत जरूरी है। आज सिंचाई इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में सिंचाई की जो व्यवस्था है, उसे आधारभूत संरचना का भाग बनाया जाए ताकि उसके माध्यम से हम पूरे देश की सिंचाई व्यवस्था पर ध्यान केन्द्रित कर सकें, जल भण्डारण और जल प्रबंधन पर ध्यान केन्द्रित कर सकें। आज आवश्यकता है कि आज सिंचाई को इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल करें।

      नदियों को जोड़ने की बात हम बहुत दिनों से सुन रहे हैं। जब एनडीए की सरकार थी, वाजपेयी जी जब प्रधानमंत्री थे, उन्होंने नदियों को जोड़ने के बारे में एक कमेटी बनाई थी। उस कमेटी की रिपोर्ट आई, लेकिन आज तक उसकी रिपोर्ट पर इस सदन में चर्चा नहीं हो सकी, उसके कार्यान्वयन की बात छोड़ दीजिए। सारी नदियों के पानी के बहाव को खुला छोड़ दिया गया है, इसके कारण जगह-जगह बाढ़ आती है, पूरे इलाके के इलाके बाढ़ से प्रभावित हो जाते हैं और जहां वह पानी नहीं पहुंच पाता है, वह इलाका सुखाड़ से प्रभावित हो जाता है। इसलिए आज नदियों को जोड़ने की आवश्यकता है। हमारे प्रदेश की सरकार ने कहा कि आप राष्ट्रीय स्तर पर नदियों को जोड़ने की योजना को कार्यान्वित करें या नहीं, लेकिन हमारे प्रदेश की नदियों को जोड़ने के लिए हमें अनुमति दीजिए और इसके लिए हमें साधन मुहैया कराइए। लगभग डेढ़-दो साल का समय हो गया, लेकिन आज तक केन्द्र सरकार ने उस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। यह जल प्रबंधन की आपकी व्यवस्था है, यह जल प्रबंधन के प्रति सरकार की जिम्मेदारी है। नदियों को जोड़ने के बारे में मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं। वर्ष2009-2010 के बजट भाषण में भारत निर्माण जैसी सरकार की महत्वपूर्ण योजना के लिए 40,900 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं, जिसे ग्रामीण सड़क, टेलीफोन, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, आवास, विद्युतीकरण पर व्यय होना है। अगर इस राशि को इन सारे विभागों के बीच बांटा जाए, तो एक विभाग के हिस्से लगभग 6,000 करोड़ रूपए आता है, लेकिन जल मंत्रालय के वार्षिक व्यय की सूची के लिए वर्ष2009-2010 के बजट में मात्र600 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। आपने कहा कि 40,000 करोड़ रूपए से भारत निर्माण करेंगे और इसके लिए 40,000 रूपए का आवंटन किया है, लेकिन सिंचाई के लिए केवल 600 करोड़ रूपए दिए हैं। यह आवंटन देश की75 प्रतिशत आबादी के प्रति आपकी गंभीरता को दर्शाता है।

      पीने के पानी के बारे में मैं कहना चाहता हूं कि देश में पीने के पानी की समस्या है। सिंचाई और कृषि की बात छोड़ दीजिए, आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम गांव के 100 प्रतिशत लोगों के लिए शुद्ध पीने के पानी की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। इससे ज्यादा शर्मनाक बात हमारे लिए और क्या हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर पेयजल योजना वर्ष 2005 में लागू हुई, उसके तहत आकलन किया गया कि 6,03,639 बस्तियों में से 3,31,604 बस्तियों में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता कम पाई गयी। आज यह स्थिति है कि हम आजादी के इतने वर्षो बाद भी लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। इसी 2,16,968 बस्तियों के जल में लवणता, लौह, नाइट्रेट, फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे तत्व पाए जा रहे हैं जिनसे अनेक बीमारियां फैलती हैं।

      महोदया, इससे आप भी अवगत हैं कि हमारे प्रदेश में कई इलाकों के लोग आज भी कुओं का और चापाकल का पानी पीते हैं, जिसके कारण उन्हें बीमारियां भी हो जाती हैं। आजादी के इतने साल बाद भी देश के लोगों को अगर शुद्ध पीने का पानी न मिल पाए तो यह सरकार के लिए बहुत गम्भीर बात है।

      महोदया, मैं जिस इलाके से आता हूं यानि बिहार से, वहां सूखाड़ की वजह से कई जगहों पर भूजल स्तर नीचे जा रहा है। इसके कारण आने वाले समय में पेयजल की समस्या विकराल रूप धारण करने वाली है। पहाड़ी इलाकों में भी पीने के पानी की समस्या काफी होती है, क्योंकि वहां बोरिंग करना मुश्किल होता है। महोदया, आपको भी मालूम है कि आपके इलाके में भी कई जगह बोरिंग सफल नहीं हो पा रहा है, क्योंकि जल स्तर बहुत नीचे जा रहा है। हमें लोगों के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था करनी चाहिए थी, जो हम नहीं कर पाए।

      हम जिस प्रदेश से आते हैं, बिहार से, वहां सूखे की भीषण स्थिति है। इसी सदन में जब कृषि और खाद्य मंत्रालय की अनुदान मांगों पर बहस हो रही थी, उस वक्त मंत्री जी ने स्वीकार किया था कि बिहार भी देश के कई राज्यों के साथ सूखे की चपेट में है। इस पर उन्होंने मदद देने का आश्वासन भी दिया था। आज आवश्यकता इस बात की केन्द्र सरकार इस मामले में पहल करे। राज्य आपके पास मदद लेने के लिए आपके दरवाजे पर खड़ी हो, केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह आगे बढ़ कर राज्य सरकारों की मदद करे। इसलिए केन्द्र सरकार को तुरंत राज्य सरकारों के साथ कोआर्डिनेशन करने की जरूरत है। वह उनके साथ बैठे और देखे कि उनके राज्य में क्या समस्या है। इस तरह की सोच रखने की आवश्यकता है।

      बिहार में अभी तक कई प्रमंडलों में, डिवीजनों में 50 प्रतिशत और कइयों में 60 प्रतिशत बारिश हुई है। औसतन 50 से 55 प्रतिशत बारिश वहां हुई है। उसका परिणाम यह है कि जहां 35 लाख हेक्टेयर जमीन पर धान की पैदावार होती थी, वहां मात्र 6 लाख हेक्टेयर पर ही धान की बुवाई हुई है। इसका मतलब यह है कि केवल 17 प्रतिशत ही बुवाई हुई है। अगर यह परिस्थिति बनी रही तो आगे चलकर काफी दिक्कत होगी। वैसे मॉनसून विभाग ने कहा है कि 25 जुलाई के बाद वर्षा होने की सम्भावना है। अगर ऐसा हो जाए तो बहुत अच्छी बात होगी। हम समझेंगे कि इंद्र भगवान की कृपा सरकार पर हुई। लेकिन हालात देखने से ऐसा लगता नहीं है।...( व्यवधान) इसलिए वर्षा हो जाए तो अलग बात है, लेकिन आने वाले समय में भी यही स्थिति बनी रही तो वह और भयंकर साबित हो सकती है।

      राज्यों में सिंचाई के लिए बिजली महत्वपूर्ण माध्यम है। हमारी प्रदेश सरकार ने सिंचाई में प्रयोग होने वाले पम्पिंग सेट्स के लिए डीजल और बिजली की व्यवस्था करने का प्रयास किया है। हम कृषि मंत्री जी का इस बात के लिए आभार व्यक्त करना चाहते हैं कि जब इस सदन में कृषि मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर बहस हो रही थी, तब बिहार सरकार ने डीजल पर सब्सिडी देने का जो फैसला किया था, तब मंत्री जी ने कहा था कि हमने समाचार पत्रों में इस खबर को पढ़ा है और हम उस आधार पर प्रदेश सरकार की मदद करें। अभी तक बिहार सरकार ने तीन फसलों के लिए डीजल पर सब्सिडी दी है, सम्भव है कि आगे भी बारिश न हो तो इसे बढ़ाया जा सकता है। शायद राज्य सरकार ने इस आशय का आपको पत्र भी लिखा है। हम चाहते हैं कि उस आधार पर आप हमारी मदद करें। हम तो यह मानकर चलते हैं कि इसमें स्वतः आप मदद करने के लिए आगे आएंगे। राज्य सरकार डीजल पर सब्सिडी दे रही है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत वहां बिजली की है, जिससे पम्पिगं सेट्स चलाए जा सकें और सिंचाई हो सके। राज्य सरकार ने फैसला किया है कि हम ग्रामीण इलाकों में बिना बाधा के एक समय सीमा निर्धारित करके सात घंटे बिजली उपलब्ध कराएंगे, जिससे किसानों के खेतों में सिंचाई की व्यवस्था हो सके। लेकिन बिहार में बिजली की स्थिति संतोषजनक नहीं है। हमारे प्रदेश के लोगों को बिजली के लिए सेंट्रल ग्रिड पर निर्भर करना पड़ता है इसलिए केन्द्र से जो अलाटमेंट होती है, उस पर निर्भर करते हैं। बिहार में लम्बे समय तक जिस दल का शासन रहा, उसने बिजली के उत्पादन को शून्य कर दिया था।

      जब बिजली का उत्पादन प्रदेश में शून्य था, तो हम लोग क्या करते? हम लोगों को जो विरासत में मिला, उसके आधार पर, बरौनी और कांटी जो दो थर्मल थे, इन दोनों थर्मलों को हमने जीवित करने का काम किया और आज सवा सौ मेगावाट के करीब बिजली का उत्पादन हम कर पा रहे हैं। ऐसे कई मामले हैं। हमने ऊर्जा विभाग की अनुदान मांग पर चर्चा के दौरान, ऊर्जा मंत्री से कहा था कि आप कोयला मंत्रालय के साथ समन्वय कीजिए। हमारी कई योजनाएं कोल-लिंक्स के लिए, कोयला मंत्रालय में लम्बित हैं। आज हम उस पर चर्चा करना नहीं चाहते हैं। हम आपसे अनुरोध करना चाहते हैं कि सूखे से निपटने के लिए आप ऊर्जा मंत्रालय के साथ समन्वय स्थापित कीजिए। ऊर्जा के साथ, सिंचाई के साथ, एक स्थाई कोआर्डिनेशन प्रदेश और राष्ट्र स्तर पर कीजिए, जिसकी आज बहुत जरूरत है।

      बिहार में 1500 मेगावाट बिजली हमें आवंटित है लेकिन केवल900-950 मेगावाट बिजली ही ड्रा करने दी जाती है। आप 1500 मेगावाट बिजली जो हमें आवंटित है, उसकी अनुमति दिलाइये, पूरी 1500 मेगावाट बिजली राज्य ड्रा करे और अपने किसानों को, पंपिग-सेट के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था के लिए उपलब्ध कराए। इसके अतिरिक्त भी अगर बिजली की जरूरत हो, तो उसे भी मुहैया कराने का प्रयास कीजिए, यह हम आपसे आग्रह करते हैं।

      हम आपसे यह भी आग्रह करते हैं कि आने वाले सूखे की स्थिति से निपटने के लिए भी, जो राज्य सरकार ने योजना बनाई है कि अगर पूरे प्रदेश को सूखाग्रस्त घोषित करना पड़ा तो कृषि इनपुट के लिए भी 2000 करोड़ रुपया जीआर मद में दें। कई तरह की योजनाएं हैं जिसमें कम से कम आठ से नौ हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता राज्य को सूखे से निपटने के लिए पड़ेगी, आप उसमें मदद के लिए तैयार रहिये। हालांकि हम लोग इंद्र भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि आने वाले समय में वर्षा हो जाए तो कम से कम वहां के लोगों को राहत मिल सके। अगर वह नहीं भी होती है तो हम माननीय कृषि मंत्री जी आपसे आग्रह करेंगे कि आने वाले समय में राज्य सरकार की मदद लिए आप तैयार रहिये। आज अगर सूखे की स्थिति होती है तो सबसे ज्यादा किसानों को मदद करने की जरूरत है।

      किसानों को मदद आप खाद के माध्यम से कर सकते हैं। माननीय कृषि मंत्री जी, आपने उस दिन अपने जवाब में कहा कि हम किसानों को खाद में सब्सिडी देते हैं। सब्सिडी को भी आपने कृषि बजट के अनुरूप शामिल कर लिया। माफ करियेगा कृषि मंत्री महोदय, आप एक किसान नेता रहे हैं, हम आपसे यह कहने की गुस्ताखी नहीं कर सकते हैं लेकिन हम आपको सच्चाई जरूर बताना चाहते हैं कि आज आप किसानों को खाद के माध्यम से जो सब्सिडी दे रहे हैं, वह सब्सिडी किसानों को नहीं मिल रही है, बल्कि खाद कंपनियों को वह सब्सिडी मिल रही है। ऐसा इसलिए कि जो खाद कंपनी सरकार को लिखकर देती है कि हमने इतनी खाद बेची, उसके आधार पर उसे सब्सिडी मिल जाती है। हमारे प्रदेश में बड़ा भारी घोटाला हुआ है, हमने कुछ दिन पहले अखबार में देखा कि सीबीआई उसकी जांच कर रही है। सब्सिडी के लिए अगर सीबीआई जांच शुरू हो गयी तो आप समझ लीजिए कि आप जो सब्सिडी दे रहे हैं वह कहां जा रही है, वह किसको मिल रही है? इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि खाद के कारखानों को जो आप सब्सिडी दे रहे हैं, उस सब्सिडी को बंद करके, किसानों तक वह सब्सिडी सीधे कैसे पहुंचे, इसके लिए कोई रास्ता ढूंढने का काम कीजिए, ताकि उसका लाभ खाद कंपनियों को नहीं, बल्कि किसानों को मिले। आज किसानों को सस्ते दर पर खाद उपलब्ध कराने की जरूरत है, सस्ता बीज राज्य सरकारों तक पहुंचाने की जरूरत है। आप यह भी देखें कि उसकी दर ज्यादा न हो, ताकि किसान उसे खरीद सकें।

अध्यक्ष महोदया : आप अपनी बात समाप्त कीजिए। आपका भाषण काफी लम्बा हो गया है।

श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह : महोदया, मैं दो-तीन मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा। मैंने पटवन के बारे में कहा है। कृषि मंत्री जी, आज जरूरत है कि सारी व्यवस्था को छोड़ कर आप ऊर्जा मंत्रालय से बात कीजिए और बिजली की ज्यादा-से-ज्यादा उपलब्धता देश के ग्रामीण इलाकों को कराइए, ताकि पटवन की समस्या का समाधान हो सके। इसके अतिरिक्त गांव के जो किसान हैं, उन्हें आर्थिक पैकेज की भी जरूरत है। देश में मंदी आई और आपने बहुत बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया। आज इस देश में जो बाढ़ और सूखे की स्थिति है, उसके कारण किसानों की हालत सबसे बदतर है। आप किसानों के लिए भी कुछ कीजिए, कुछ भंडार खोलिए, कुछ खजाना खोलिए और किसानों को भी आर्थिक पैकेज दीजिए।

     पेयजल की समस्या से जूझने में जो कठिनाई आएगी, उससे जूझने के लिए आप कौन सी तैयारी कर रहे हैं? टास्क फोर्स गठित करके आपको पहले से तैयार रहना पड़ेगा, क्योंकि भोज के टाइम में कोहड़ा नहीं रोपा जाता है। कोहड़ा पहले रोपा जाता है और भोज बाद में होता है। इसलिए जब भोज होने वाला हो, उस दिन इसकी तैयारी मत प्रारम्भ कीजिए।

अध्यक्ष महोदया : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह : मैं अपनी बात समाप्त करने जा रहा हूं। आज ग्रामीण इलाकों में जानवरों के चारे की समस्या भी पैदा हो गई है। चारे की कमी से जो पशु मरेंगे, उसके लिए आपने क्या व्यवस्था की है? गांव में जो गरीब लोग हैं, उनके लिए रोजगार हो, क्योंकि खेती नहीं होगी और उनको रोजगार भी नहीं मिलेंगे, तो वे अपनी जीविका कैसे चला सकेंगे। आप फूड फार वर्क जैसा कोई कार्यक्रम गांवों में शुरू कीजिए, जिसके माध्यम से लोगों को रोजगार मिल सके, लोगों को मजदूरी मिल सके और वे काम करके अपनी गुजर-बसर कर सकें। सिंचाई, कृषि और ऊर्जा मंत्रालय में समन्वय स्थापित कीजिए, तभी आने वाले समय में बाढ़ और सूखे की स्थिति से निपटने के लिए आप सक्षम हो सकते हैं। आपको इन प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की तैयारी राष्ट्रीय स्तर पर करनी चाहिए। हम यही अनुरोध आपसे करना चाहते हैं।

     इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय (श्रावस्ती): अध्यक्ष महोदया, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे सूखे जैसे अतिमहत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती क्षेत्र से मैं आता हूं। अभी हमारे विद्वान सदस्य बिहार राज्य के बारे में बोल रहे थे। आज अवर्षण के कारण सूखे को लेकर बड़ी ही भयावह दृष्टि उत्पन्न हो रही है कि आने वाला समय बहुत ही चिंतनीय और दयनीय स्थिति में जा रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र हो या बिहार का क्षेत्र हो, विशेष रूप से जो अधपिछड़ा है, जहां की प्रति व्यक्ति आय सामान्य से भी कम है, वहां की स्थिति की अगर हम कल्पना करें, तो बहुत ही गंभीर चित्रण उत्पन्न होता है। निश्चित रूप से हमारे तमाम साथियों ने समय-समय पर सदन में सूखे को लेकर चिंता व्यक्त की है, वह आने वाली परिस्थितियों के लिए हमें तैयार करने के लिए एक संदेश देता है। मैं आपके माध्यम से इस सर्वोच्च सदन में कहना चाहूंगा कि वर्ष 2007-08 में हमारी कृषि वृद्धि दर चार प्रतिशत से बढ़कर लगभग पांच प्रतिशत तक पहुंच गई थी। किन्हीं परिस्थितियों में वर्ष 2008-09 में1.6 प्रतिशत तक घट गई। यद्यपि खाद्यान्न उत्पादनों में जो उत्पादन हुआ, उसमें बहुत ज्यादा अंतर नहीं आया, परन्तु वर्ष2009-10 का सूखा हमें इशारा करता है कि हमें खाद्यान्न के विषय में, कृषि के विषय में, आने वाले समय के विषय में गंभीर चिंतन करना पड़ेगा।

      महोदया मैं इस सदन के माध्यम से कहना चाहूंगा कि सूखा राहत का जो पैकेज दिया जाता है, उसमें कुछ विसंगतियां और विषमताएं हैं। उत्तर प्रदेश जहां1000 रु. में गरीब किसान जो आज सूखे की चपेट से भी संकटग्रस्त है, 1000 रु. में उसका एकाउंट खुलता है, और सूखे के राहत के रूप में जो उसे 100 रु. और 50 रु. का चैक मिलता है, वह उसमें जमा नहीं करता। तमाम छोटे किसान ऐसे हैं जो रोज अपने खेतों में जब काम करते हैं तो जब वे मजदूरी का वाजिब हिस्सा भी नहीं पाते हैं, तो वे कहां से अपना एकाउंट खोलेंगे और कैसे100 रु. और 50 रु. का चैक उसमें जमा करके वे क्या पाएंगे? होता यह है कि उसकी कहीं न कहीं बंदरबांट हो जाती है। मैं सहमत हूं, अभी हमारे विद्वान साथी ने जो इस सदन में कहा। मैं इस बात से सहमत हूं कि कृषि मंत्रालय को आज यह चिंता करने की आवश्यकता है और माननीय कृषि मंत्री जी हमारे बीच में बैठे हुए हैं कि सब्सिडी ही नहीं जो बोनस गेहूं और धान की खरीद के लिए दिया जाता है और यहीं नहीं, जो भी सेन्टर से घोषणाएं करते हैं या जो भी हम योजनाएं बनाते हैं चाहे वे बीज की हों या जो भी सुविधाएं हम देते हैं, क्या वास्तव में वे किसानों तक पहुंचती हैं? निश्चित रूप से हम केन्द्र से योजनाएं बनाते हैं, हम केन्द्र से धन देते हैं लेकिन राज्य सरकारों का जो इम्पलीमेंटेशन का काम फैडरल सिस्टम में है और राज्य सरकारें जब विभिन्न विचारधाराओं की हैं तथा वैचारिक तालमेल जब केन्द्र से सही नहीं बैठ पाता है, तो कहीं न कहीं उसका दुरुपयोग भी होता है। इस विषय में भी गंभीरता से आज हम सब को विचार करने की आवश्यकता है।

      मैं आपके माध्यम से ज्यादा समय न लेते हुए यहां कुछ ऐसी विसंगतियों का जिक्र करना चाहूंगा जिनके बारे में बहुत ही गंभीर चिंतन करते हुए कहीं ऐसा तो नहीं है कि सदन में चर्चा करने की आवश्यकता हर सदस्य को आ गई है और कहीं ऐसा तो नहीं है कि अब किसानों को जोत के आधार पर एक किसान स्मार्ट कार्ड बनाकर जिसमें उनका एकाउंट हो और खाद पर जो सब्सिडी दी जा रही हो, या उनके पैदावार पर या उनके उत्पादनों पर हम जो भी बोनस देते हों, या जो भी राहत का पैकेज देते हैं, वह हम सीधे उनके एकाउंट में उनके जोत के आधार पर क्यों न डाल दें जिससे सीधा लाभ हमारे गरीब किसानों को मिल सके…( व्यवधान)

श्री तूफ़ानी सरोज (मछलीशहर): इसमें प्रदेश सरकार का कुछ शेयर होगा।…( व्यवधान)

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय: प्रदेश सरकार का तो शेयर उसमें रहता ही है। प्रदेश सरकार कितना शेयर देंगी, आप बगल ही में बैठे हैं।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप इधर संबोधित करके अपनी बात कहिए।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय : जी। अभी माननीय सदस्य ने बहुत अच्छी बातें कहीं। लेकिन मैं प्रदेश सरकार के बारे में कुछ कहूं, उसके पहले मैं कुछ और बातें करना चाहूंगा। आज ऊर्जा को लेकर गंभीर चिंतन हुआ कि विद्युत की व्यवस्था सही नहीं है। निश्चित रूप से ग्लोबल वार्मिंग को लेकर मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री जी का ध्यान इस बात की तरफ आकर्षित करना चाहूंगा कि ग्लोबल वार्मिंग को लेकर विकसित देश और विकासशील देशों की जो लड़ाई आज कार्बन उत्सर्जन को लेकर चल रही है और कार्बन क्रैडिट को देखते हुए जहां भारत सबसे बड़ी मंडी है, वहां क्या हम कहीं कार्बन क्रैडिट को लेकर किसानों को मुफ्त सिंचाई के संसाधन उपलब्ध करा सकते हैं? क्या हम सरकार की योजनाओं में जो सब्सिडी केन्द्र सरकार या राज्य सरकार देती है और कार्बन क्रैडिट का जो पैसा है, उसके माध्यम से हम सिंचाई के संसाधन क्या अपने किसानों को पहुंचा सकते हैं?

      वे साधन जिनमें कम से कम ऊर्जा की खपत हो और जो परमानेंट व्यवस्था के रूप में लग सके जैसे पशुओं से चलने वाले तमाम नलकूप हैं, इनको फिर से इजाद करके मुहैया करा सकते हैं। नलकूप ही नहीं इसके अलावा और जो संसाधन हैं, उनका भी प्रबंधन इसके माध्यम से कर सकते हैं। किसानों तक पहुंचाने का काम योजना बनाकर किया जा सकता है।21वीं सदी में पूरे विश्व में क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म की धूम मची है। क्या इसकी विशेषताओं से कृषि क्षेत्र को आच्छादित कर सकते हैं? क्या इससे किसानों को सुविधाएं मुहैया कराई जा सकती हैं? इस पर भी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता आ गई है। सूखे की स्थिति को देखते हुए क्या निश्चित रूप से किसानों के कृषि ऋण और देय को नियमानुसार सूखा घोषित करने के बाद स्थगित करने की योजना के अतिरिक्त सब्सिडी दे सकते हैं? इस पर भी विचार किया जाना परम आवश्यक है। मैं इसके साथ यह भी कहना चाहता हूं कि बागवानी को भी बढ़ावा देना चाहिए।

      महोदया, मैं इस सदन में एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि कहीं न कहीं केमिकल फर्टिलाइजर, केमिकल इन्सेक्टिसाइड और पेस्टीसाइड का यूज़ धर्रा की उर्वरता को क्षीण बना रहा है, कमजोर कर रहा है। हमें इस पर जरूर विचार करना होगा। चूंकि मैं भी किसान हूं और उनकी समस्याओं से मुझे रोज दो-चार होना पड़ता है। हमें पुनः आज इस बात को सोचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों के लिए हमें एक बार फिर लौटकर आना पड़ेगा। गांव के लोगों की मानसिकता धीरे-धीरे इस ओर बन भी रही है। हमें इस तरफ विचार करते हुए तेजी से इस प्रक्रिया को लागू करना होगा जिससे केमिकल फर्टिलाइजर्स ही नहीं रासायनिक उर्वरकों और दवाइयों पर किसानों की निर्भरता कम हो सके। अभी हमारे पूर्वक्ता ने कहा कि निश्चित रूप से कृषि प्रबंधन और बाढ़ जैसी समस्याएं हैं। हम तो नेपाल के बॉर्डर पर हैं, तराई में बसे हुए हैं। जब हमारे यहां सूखा रहता है तो खेती चौपट हो जाती है लेकिन जब नेपाल में बारिश होती है या जब नेपाल में बांध खोले जाते हैं और उसके बाद जल प्लावन की जो स्थिति आती है, वह हमारे गांव के लिए बहुत दुखदायी होती है, यह सर्वस्व समाप्त कर जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश ही नहीं बिहार भी इन झंझावातों को झेलता हैं। हमें आज कहीं न कहीं इसके प्रबंधन की योजना गंभीरता से बनानी पड़ेगी। नेपाल सरकार से बात करके हाइड्रो इलैक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स लगाए जा सकते हैं।

अध्यक्ष महोदया : आप अपनी बात दो मिनट में समाप्त कीजिए।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय :महोदया, मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले 20 सूखा जिले घोषित किए थे और फिर 47 जिलों को सूखा घोषित किया गया। मैं सर्वोच्च सदन में आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि उन्नाव, कानपुर, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, गोण्डा, बाराबंकी, महाराजगंज, कुशीनगर तमाम जनपद सूखे से दो-चार हो रहे हैं। पिछले दो महीने में उत्तर प्रदेश में 40 मिली मीटर से भी कम वर्षा रिकॉर्ड की गई। जहां 325-350 मिली मीटर वर्षा हो जानी चाहिए वहां मात्र100-120मिली मीटर वर्षा ही हो पाई है। ऐसी स्थिति में पूरी फसल चौपट हो गई है। वहां किसानों की स्थिति बहुत दयनीय है।

   

13.00 hrs लेकिन फिर भी उत्तर प्रदेश सरकार ने उन जनपदों को सूखा घोषित नहीं किया है। मैं आपके माध्यम से वहां की गंभीर चिंताजनक परिस्थिति का चित्रण करने के लिए सदन में उपस्थित हुआ हूं।

अध्यक्ष महोदया : कृपया समाप्त कीजिए।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय :महोदया, मैं आपके माध्यम से इस सर्वोच्च सदन को यह अवगत कराना चाहता हूं कि केवल इन जनपदों में ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की स्थिति बड़ी गम्भीर है। इसलिए इसे सूखाग्रस्त घोषित करते हुए वहां के किसानों, मजदूरों, पशुओं और खेती के विशेष प्रबंधन की आवश्यकता आज आन पड़ी है। इसके अतिरिक्त भविष्य में धीरे-धीरे जो वर्षा कम हो रही है, हमारे इलैक्ट्रो-मैग्नेटिक फील्ड में अब जो बदलाव आ रहा है, वह सिग्निफिकेन्ट हो रहा है, जिसकी वजह से वर्षा कम रिकार्ड की जा रही है।

अध्यक्ष महोदया : कृपया अब समाप्त कीजिए।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय :इसलिए आने वाले दिनों में अवर्षण की स्थिति और उत्पन्न हो सकती है। उसे देखते हुए वाटर शैड मैनेजमैन्ट,जल प्रबंधन की स्थिति हमें वहां परमानैन्ट करनी होगी।

      महोदया, हमें बागवानी के माध्यम से और बॉयो-टैक्नोलोजी की तरफ जाते हुए कैमिकल फर्टिलाइजर और कैमिकल्स का कम से कम उपयोग करते हुए अपनी भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाते हुए जल संचयन करते हुए कृषि को विशेष महत्व देना होगा, क्योंकि कृषि में कहीं अगर कहीं कुछ लोचा आया तो उससे पूरे हिंदुस्तान की रीढ़ निश्चित रुप से चरमरायेगी। इसलिए हमें अपने अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए और हिंदुस्तान की मजबूती और बहबूदी के लिए विशेष रूप से किसानों और कृषि क्षेत्र पर ध्यान देना होगा।

      महोदया, मैं आपके माध्यम से एक बार पुनः आपका आभार व्यक्त करते हुए अपने पूर्व वक्ता श्री राजीव रंजन सिंह जी ने जो कहा है, उनसे यह जरूर कहना चाहूंगा कि आज राज्य सरकारों को भी अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए।

अध्यक्ष महोदया : कृपया अब आप समाप्त कीजिए।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय :क्योंकि स्थिति यह है माननीय कृषि मंत्री जी ने उत्तर प्रदेश सरकार से तीन बार मांगा, लेकिन उत्तर प्रदेश की सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी और उसने आज तक यहां प्रोजैक्ट नहीं भेजी। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : कृपया आप बैठ जाइये।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय:इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                 

MADAM SPEAKER: The House stands adjourned to meet again at 2 p.m.   13.03 hrs The Lok Sabha then adjourned for Lunch till Fourteen of the Clock.  

   

14.04 hrs.  (The Lok Sabha  re-assembled at Four Minutes past Fourteen of the Clock)   (Mr. Deputy Speaker in the Chair)   DISCUSSION UNDER RULE 193   Situation arising out of drought and floods in various parts of the country – Contd.

श्री रेवती रमन सिंह (इलाहाबाद): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि सूखे एवं बाढ़ जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आपने मुझे बोलने का अवसर प्रदान किया।

      उपाध्यक्ष महोदय, गत 62 साल से चाहे यह सदन हो या प्रदेश की विधानसभाओं के सदन हों, बाढ़ और सुखाड़ पर रूटीन में चर्चा होती रहती है। श्री शरद पवार पिछले छ: साल से कृषि मंत्री हैं। वे किसान परिवार से आते हैं। सूखा और बाढ़ हमारे देश के किसानों को बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है। वर्ष 1900 से वर्ष 1952 के बीच देश में देश में केवल छह बार सूखा पड़ा, लेकिन वर्ष 1952 से वर्ष 2009 में अब तक, इन पचास सालों में देश में 12 बार से ज्यादा सूखा पड़ चुका है। इसका कारण जलवायु में बहुत तेजी से परिवर्तन होना है, वृक्ष कटते जा रहे हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड गैस इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही हैं कि उनका सीधा असर हमारी जलवायु पर पड़ रहा है। उसी का कारण है कि इतनी जल्दी-जल्दी सूखा पड़ रहा है और यह हमारे देश के लिए बहुत चिंता का विषय है।

      महोदय, हमारा देश कृषि प्रधान देश है और आज भी खेती 60 फीसदी लोगों को रोजगार देती है। इतना रोजगार देने पर भी और हमारे जीडीपी में खेती का बहुत बड़ा योगदान है। पिछले तीन सालों में 8 फीसदी और 9 फीसदी जीडीपी हमारे देश में रही है और इसमें खेती का योगदान कम महत्वपूर्ण नहीं रहा है। इस साल भी आपने जीडीपी में 4 प्रतिशत खेती का योगदान रखा है। मुझे ताज्जुब है कि आपने उसे बदला नहीं है। यह इस सदी का, अगर हम कहें कि उत्तर भारत में इससे बड़ा सूखा अभी तक नहीं पड़ा था। माननीय कृषि मंत्री जी ने इस सदन में और इस सदन के बाहर भी कहा था कि पानी करीब-करीब सामान्य स्तर तक जून और जुलाई में बरस जाएगा, लेकिन अगर आप आंकड़ों को देखें तो आज तीन चौथाई से ज्यादा जमीन पर, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं धान की रोपाई नहीं हो पाई है। जहां धान की रोपाई हो भी गयी है, वहां पौधे समाप्त हो गये हैं। मोटे अनाज जैसे, ज्वार और बाजरा आदि की भी बुआई नहीं हुई है, जहां लोगों ने बुआई कर दी थी, वह सब पौध सूख गयी है।

      महोदय, इस बार उत्पादन में इतना बड़ा शॉर्ट-फॉल होने वाला है कि आपने मजबूरी में जो खाद्यान्न यहां सिंचित करके रखा है, उसके बावजूद आपको आयात करना पड़ेगा। भारत जब बाजार में अनाज खरीदने जाता है तो चाहे अमेरिका हो या आस्ट्रेलिया हो या मैक्सिको हो या और कोई देश हो, सब जगह से उसे मंहगे दाम पर अनाज मिलता है।

      महोदय, मैं एक बात कहना चाहूंगा कि हमने 62 सालों में ऐसी कोई दूरगामी और शॉर्ट-टर्म योजना क्यों नहीं बनायी, जिससे इस समस्या का स्थायी निदान हो सके। जब बाढ़ और सूखा पड़ता है तो लोक सभा और विधान सभाओं में एक रूटीन चर्चा हो जाती है। समय बीतने के बाद उसे भुला दिया जाता है और फाइल बंद करके रख दी जाती है। आज तक इन दोनों समस्याओं को कोई भी निदान सरकार ने नहीं खोजा है। यह वास्तविकता है कि इन 62 वर्षों में से 45 या46 साल एक लंबी अवधि तक देश में कांग्रेस पार्टी की हुकुमत रही है। इसके बावजूद यह समस्या जस की तस बनी हुई है।

      हमें ताज्जुब तब होता है जब जून और जुलाई में पानी इतना कम बरसा, फिर भी सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई आप नहीं कर पाए। आज तक किसानों के लिए सरकार की तरफ से कोई ऐसा काम नहीं किया गया जिससे सूखे में किसानों को कोई मदद मिल सके। हमने पिछले साल यहाँ ज़ीरो आवर के माध्यम से यह सवाल उठाया था।तब मैंने बुंदेलखंड और इलाहाबाद की बात की थी। आपने स्वीकार किया था कि दोनों बुंदेलखंड में - मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में, और इलाहाबाद के जमुना पार की चार तहसीलों - मेजा, करचना, बारा और सोराँव में सूखा है, लेकिनआप असहाय थे कि उत्तर प्रदेश सरकार ने आपके पास कोई प्रस्ताव नहीं भेजा। हमें ताज्जुब है कि अभी इतने दिन बीतने के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले 22 जिले और बाकी मिलाकर कुल 47 जिलों को ही सूखाग्रस्त घोषित किया है। पता नहीं उन्होंने आपको पत्र लिखा भी या नहीं, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया है। जब वह आपको पत्र लिखेंगे तो यहाँ से आप टीम भेजेंगे। केन्द्रीय सरकार की टीम जाएगी और उसका असैसमैंट करेगी। फिर वह आपको रिपोर्ट देगी। मान्यवर, जुलाई बीत गया, पशुओं के लिए चारा नहीं है, पशु भूखों मरने लगेंगे। जब तक आप यह व्यवस्था करने लगेंगे, तब तक इतना समय निकल जाएगा कि जो तमाम लोग आपके बीपीएल कार्ड पर आधारित हैं, उनको कहाँ से अन्न मिलेगा? कृषि मंत्री जी को मैंने उस दिन एक आंकड़ा दिया था कि सुप्रीम कोर्ट ने एक सर्वे करवाया एन.सी.सक्सेना, पूर्व कमिश्नर की अध्यक्षता में, जिसमें उन्होंने रिपोर्ट दी है कि 28 फीसदी के बजाय 50 फीसदी लोग बीपीएल की श्रेणी में आते हैं। कृपया उसमें सुधार भी करवा लीजिए और यह स्वीकार कर लीजिए कि 50 फीसदी लोग आज बीपीएल के अंतर्गत आ रहे हैं।

      मान्यवर,मैं यह मानता हूँ कि प्रकृति पर किसी का ज़ोर नहीं है। लेकिन नेचर एकाएक ऐसा क्यों हो गया? मैंने आपको बताया कि 1900 से लेकर 1952 तक केवल छः बार सूखा पड़ा और 1952 से लेकर आज तक 12 बार से ज्यादा सूखा पड़ चुका है और करीब-करीब एक रूटीन हो गया है कि हर चार साल के बाद हमारे देश में एक सूखा पड़ता है। ऐसा सूखा पड़ता है कि जिसका निदान हम नहीं कर पाते हैं। मुझे याद है कि चिदम्बरम साहब ने पिछली बार सिंचाई के लिए बहुत पैसा देने की बात कही थी। लेकिन हकीकत में आप देखिये कि कितने तालाब खने गए? बहुत से ऐसे तालाब खने गए हैं, जो ऊँचाई पर तालाब खन दिये गये हैं। ...( व्यवधान) मान्यवर, अभी तो सात मिनट हुए हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : आपके दल के चार सदस्य और बोलने वाले हैं।

श्री रेवती रमन सिंह :अगर आप कह देंगे तो मैं बैठ जाऊँगा।

उपाध्यक्ष महोदय : नहीं, आप बोलिये।

श्री रेवती रमन सिंह :जो तथ्य हैं, वह तो रख दें। मान्यवर, इस बहस को देर तक चलाइए। यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। सभी मैम्बर्स चाहे इधर के हों या उधर के हों, इस पर बोलना चाहते हैं। आज संयोग से कोई बजट भी नहीं है। इसलिए इसमें इतनी जल्दबाजी न कीजिए कि दो-तीन मिनट बुलवा दीजिए।

      मान्यवर, चीन में ह्वांग हो नदी और मिस्र में नील नदी से बाढ़ का प्रकोप होता था, लेकिन उन लोगों ने उन नदियों की सफाई करके, उसको बाँधकर उसके पानी का जो सदुपयोग किया है, उससे आज चीन हमसे तीन गुना ज्यादा अन्न पैदा कर रहा है। हम ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

      कृषि के लिए खाद एवं अन्य चीजों से ज्यादा जरूरत पानी की होती है। पानी सबसे मूलभूत समस्या है। यदि आप पानी की व्यवस्था कर दें तो दो गुना ज्यादा अन्न का उत्पादन हो सकता है। लेकिन आजादी के 62 साल बाद भी हम 38 प्रतिशत खेतों को सिंचित कर पा रहे हैं। इससे तो यही लगता है कि 21वीं सदी खत्म होते-होते हम पूरी जमीन सिंचित कर पाएंगे।

      महोदय, इस समय पंजाब, हरियाणा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार के सभी जिलों में सूखा पड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से से प्रभावित हैं। गुजरात और महाराष्ट्र बाढ़ से प्रभावित हैं। पानी ही जीवन है, बिना पानी के कुछ नहीं हो सकता है। सूखा केवल खेती को ही प्रभावित नहीं करता है, उससे पेयजल की भी समस्या हो जाती है। उत्तर भारत और खास तौर से बुंदेलखण्ड, इलाहाबाद के बारे में अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि हेण्डपम्प और टयूबवैल से भी पानी नहीं निकल रहा है। इस पर भी सरकार को विचार करना चाहिए।

      महोदय, लोग गांवों से पलायन कर रहे हैं। पशुओं के लिए चारा नहीं है। माननीय मंत्री जी ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन जिस तरह से आबादी बढ़ी है, उस अनुपात में दलहन और तिलहन का उत्पादन नहीं बढ़ा है। इसके लिए आपको अलग से योजना बनानी होगी।

      महोदय, किसानों ने हरित क्रान्ति के द्वारा अन्न का भण्डार पैदा किया है। पहले हम अमरीका से पीएल-480 के तहत खाद्यान्न अमरीका से मंगाते थे, वहां से लाल गेहूं मंगाया करते थे। लेकिन अब हमें नहीं मंगाना पड़ता है। अब हम स्वावलंबी हो गए हैं। आपने खाद्यान्न का भण्डारण कर लिया है। आपने इसी सदन में कहा है कि अन्न का उत्पादन इतना हुआ है कि सभी स्टोरेज भर गए हैं। लेकिन वह कितने दिन तक चलेगा? हमें दो तरह के इंतजाम करने चाहिए, एक, दीर्घकालिक और दूसरा, तात्कालिक। जिससे लोगों को काम मिल सके और भुखमरी से लोगों को निजात दिलायी जा सके।

      महोदय, काम के बदले अनाज की योजना को लागू किया जाना चाहिए। इस योजना के तहत नये तालाबों की खुदाई करवायी जानी चाहिए और पुराने तालाबों का जीर्णोंद्धार करना। इससे गरीब और बेरोजगार इससे काम पाएंगे और उस काम के बदले में उन्हें अनाज भी मिलेगा।

      महोदय, यदि हम छोटी-छोटी नदियों और नालों पर चैकडेम बनाकर पानी को रोका जाए तो इससे जल स्तर ऊपर होगा और हम सिंचाई भी कर सकेंगे। इसी तरह वनों की कटायी को रोकने के लिए हमारे देश में बहुत से कानून हैं, लेकिन उन्हें हकीकत में नहीं उतारा जाता है। नोएडा में लाखों पेड़ काट दिए गए। सरकार भी केवल लिखा-पढ़ी और पूछताछ कर रही है। इसका पर्यावरण पर सीधा असर पड़ता है और यह पानी न बरसने का बहुत कारण है।

            उपाध्यक्ष महोदय, जिस तरह जलस्तर नीचे जा रहा है, आने वाले दिनों में एक बड़ी गंभीर समस्या हमारे किसानों और पूरे देश को भुगतनी पड़ेगी। मैं कहना चाहूंगा कि सिंचाई और बिजली ऐसी दो चीजें हैं, जो कि आपके इफ्रास्ट्रक्चर में सबसे जरूरी हैं। अगर आप बजट का 60 फीसदी पैसा सिंचाई और बिजली पर खर्च कर दें, बाकी परियोजनाओं में थोड़ा धन कम कर दें तो आने वाले पांच साल में देश की पूरी अर्थव्यवस्था बदल सकती है।

      उपाध्यक्ष महोदय, मैं एक बात कह कर अपनी बात समाप्त करूंगा। इसी तरह पशुधन भी बहुत महत्वपूर्ण है। आज हमारे देश में दूध का उत्पादन बहुत होता है, अगर हम गेहूं, धान और गन्ना तीनों को जोड़ लें, ये जितना पैदा होता है, अकेले दूध हमें सबसे ज्यादा आमदनी देता है। आज पूरी अर्थव्यवस्था गांव और शहरों में भी दूध पर टिकी हुई है, लेकिन जब पशुओं को चारा ही नहीं मिलेगा तो वे हमें दूध कैसे ठीक देंगे। क्या यह संभव नहीं है कि आप इन योजनाओं को तत्काल ऐसे लागू करें कि किसानों को राहत मिल सके। आप यहां से पैकेज देंगे, लेकिन वह पैकेज वहां तक नहीं जाएगा। आप यहां से सब्सिडी के रूप में खाद पर पैसा देते हैं, लेकिन वह किसानों को नहीं मिलता है।

      उपाध्यक्ष महोदय, पिछले साल चिदम्बरम जी ने कहा था कि हम किसानों को सीधे सब्सिडी देने का काम करेंगे। इस साल फिर वित्त मंत्री जी ने कहा है, लेकिन किसान को कहीं नहीं मिल रहा है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और तत्काल सूखे एवं बाढ़ के लिए ऐसी कार्य-योजना बनानी चाहिए कि जिससे इस समस्या का परमानेंट हल निकल सके।

      उपाध्यक्ष महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।

श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड):उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। आज देश में हम जिस समस्या का सामना कर रहे हैं, ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर सदन में आज चर्चा हो रही है। सारे देश में सूखाग्रस्त होने की संभावना हुई है। यह मैं नहीं कह रहा हूं, इस साल ऐसा अंदाज व्यक्त किया गया था कि इस साल सबसे अच्छा मानसून होगा, लेकिन वह अंदाज गलत साबित हुआ है। ऐसा माना जाता है कि मानसून ही भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है। अगर देश में मानसून अच्छा होगा तो गांव के आम आदमी, गरीब किसान और खेत मजदूर की जिन्दगी ठीक होगी। लेकिन इस साल मानसून की कमी होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक संकट पैदा हुआ है। इस साल जून और जुलाई के महीने में ऑल इंडिया रेन फॉल19 परसैंट एवरेज है। जिनती वर्षा होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई। केवन 19 परसैंट रेन फॉल हुआ है।

      उपाध्यक्ष महोदय, हम आशा कर रहे हैं कि अगस्त में वर्षा अच्छी होगी और उसके आधार पर देश में मानसून की स्थिति अच्छी होगी तो परिस्थिति में परिवर्तन आएगा। देश में 64 परसैंट ऐसे जिले हैं, जहां35 परसैंट से नीचे वर्षा हुई है। केवल 13 जिले ही ऐसे हैं, जहां वर्षा ज्यादा हुई है।22 ऐसे जिले हैं, जहां वर्षा नहीं के बराबर हुई है। देश के लगभग 80 प्रतिशत जिले ऐसे हैं, जहां 50 परसैंट से भी नीचे वर्षा हुई है। मुझे सबसे ज्यादा संकट एवं समस्या पीने के पानी की लगती है। हमारे जितने भी डेम और नहरें हैं, वहां आज दस से बीस परसैंट पानी ही स्टॉक हुआ है, उससे ज्यादा वहां पानी नहीं है। इसलिए अगर सूखा हुआ, अगस्त में पानी नहीं बरसा तो इस देश में सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की होगी।

उपाध्यक्ष महोदय, पिछले 25 साल में इस देश ने इतनी सूखे की स्थिति का अनुभव नहीं किया है जितना अब हो रहा है। मैं मानता हूं कि इतना बड़ा देश होने के कारण कहीं किसी प्रदेश में अकाल होता है, तो किसी प्रदेश में बाढ़ आती है। इस प्रकार दोनों विचित्र परिस्थितियां हमें एक साथ जून और जुलाई महीने में देखने को मिलती हैं। पश्चिम बंगाल में कुछ समय पहले आए चक्रवात के कारण लोगों को बहुत नुकसान हुआ। उसके लिए केन्द्र सरकार की ओर से प्रदेश सरकार को राहत नहीं मिली। ज्यादा या कम बारिश हो, तो दोनों ही परिस्थितियों में नुकसान होता है। एक-दो प्रदेशों को छोड़कर, कम बारिश के कारण पूरे देश में सूखे की परिस्थिति निर्मित हुई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, झारखंड, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट के सभी राज्यों में आज अकाल की स्थिति है। देश के उक्त प्रदेशों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आज सूखे की चपेट में हैं। यह प्राकृतिक आपदा है। इसका सामना सबको मिलकर करना होगा। मैं ऐसा नहीं मानता कि इसमें सरकार की गलती है। मैं मानता हूं कि यह प्राकृतिक और राष्ट्रीय आपदा है। केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकारें अब राह देख रही हैं कि अगस्त महीने में बारिश अच्छी होगी और स्थिति सुधरेगी। ऐसा नहीं सोचना चाहिए और जो सूखे की परिस्थिति देश के सामने है, उसका हमारी केन्द्र सरकार और प्रदेशों की सरकारों को मिलकार मुकाबला करना चाहिए।

महोदय, हमारे देश में स्थिति यह है कि देश में किसी और दल की सरकार है, तो कई प्रदेशों में किन्हीं और दलों की सरकारें हैं। जिन दलों की सरकारें प्रदेशों में हैं, उनकी सरकार केन्द्र में नहीं है। जिस दल की सरकार केन्द्र में है, उसकी सभी राज्यों में सरकार नहीं है। इसलिए इसे राष्ट्रीय संकट मानकर और पार्टी से ऊपर उठकर मुकाबला करना चाहिए। यह सारे देश का संकट है। यह सारे समाज का संकट है। हमारे देश का कोई भी राज्य इतने बड़े अकाल का सामना, अपने स्वयं के संसाधनों से नहीं कर सकता है। माननीय शरद पवार साहब महाराष्ट्र से हैं, उन्हें मालूम है कि 1970 में देश में सबसे ज्यादा अकाल की स्थिति थी, उसमें भी सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की स्थिति खराब थी। जैसा उस समय था, वैसे ही सूखे का अनुभव हम इस बार कर रहे हैं। अगस्त में बारिश आएगी, यह सोचकर हम बैठे रहें, यह ठीक नहीं है। इसलिए मैं मांग करता हूं कि प्रधान मंत्री महोदय को सभी मुख्य मंत्रियों और देश के सभी कृषि मंत्रियों को बुलाकर मीटिंग करनी चाहिए और देश की सूखाग्रस्त स्थिति का सामना करने के लिए एक आपात् प्रबन्धन व्यवस्था करनी चाहिए, जिसमें केन्द्र को सबसे ज्यादा जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय, सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकनौमी (सी.एम.आई.ई.) की जो रिपोर्ट आई है, उसमें भी बताया गया है कि4.7 परसेंट कृषि उत्पादन में कमी होगी। जुलाई में बारिश नहीं हुई और अगर अगस्त में भी बारिश नहीं हो, तो कृषि उत्पादन कितना घट सकता है, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। जब सूखा और अकाल पड़ता है, तो उसके परिणाम भी होते हैं। इसका पहला परिणाम पीने के पानी के संकट के रूप में सामने आता है। इंडस्ट्री के लिए पानी लगता है और सभी चीजों के लिए पानी की जरूरत होती है। एग्रीकल्चर की इर्रीगेशन में भी पानी लगता है। मैं मांग करता हूं कि जितना भी पानी बांधों में उपलब्ध है, उसे पीने के लिए आरक्षित कर देना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह हालत होने की संभावना है कि देश में एक ग्लास पानी 50 रुपए में बेचा जाएगा। मैं सरकार से सवाल करना चाहता हूं कि एन.डी.ए. सरकार के समय जो गंगा-कावेरी नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी, उसमें यह संकल्पना थी कि इंटरस्टेट, यानी एक देश की नदी दूसरे प्रदेश की नदी से जोड़ी जाए, ताकि जब बरसात के समय जब बाढ़ आए, तो उस पानी को सूखे एरिया की तरफ डायवर्ट किया जा सके। वह योजना बहुत अच्छी थी, लेकिन उसे क्रियान्वित नहीं किया गया। अगर वह योजना कार्यान्वित होती, तो हम देश के 80 प्रतिशत किसानों को बाढ़ और सूखे के नुकसान से बचा सकते थे और उन्हें आश्वस्त कर सकते थे कि अब इनकी वजह से उन्हें उजड़ना नहीं पड़ेगा। मैं कहता हूं कि उस योजना के ऊपर तो सरकार को काम करना ही चाहिए था। उस समय इस योजना को बनाने के लिए हमने कदम उठाया था और 10 हजार करोड़ रुपए की राशि भी रखी थी। आपने उस योजना को बाजू कर दिया। आज अकाल की स्थिति है। यदि आगे आने वाले समय में अकाल और सूखे की स्थिति का मुकाबला करना है, तो गंगा और कावेरी को जोड़ना ही होगा। इसलिए मेरी आपसे विनती है कि उस योजना को एन.डी.ए. की योजना समझकर मत फेंक दीजिए। मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं कि जैसे इंटरस्टेट नदियों की योजना है, वैसे ही विद इन स्टेट नदियों की भी योजना है। उन्हें भी जोड़ने का कार्यक्रम बनाना चाहिए और सेंटर तथा स्टेट गवर्नमेंट्स, दोनों को मिलकर उसकी जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

      हिन्दुस्तान में खरीफ और रबी, ये दो सीजन होते हैं। आज बरसात गिरने से भी खरीफ की फसल को कोई लाभ होने वाला नहीं है। अगर अभी बरसात होगी तो केवल रबी की फसल को लाभ होगा तो हमारा एक सीजन तो चला गया है और उसका इफैक्ट जो होगा तो वह किसानों को होगा। आज सूखाग्रस्त किसानों की जो स्थिति है, उसमें उनकी कमर टूट गई है। आज सारे सदन में सदस्य भी इसको जानते हैं कि किसान आज जावनरों को संभाल नहीं सकते, महंगा चारा नहीं खिला सकते। पशुधन हमारी राष्ट्रीय सम्पत्ति है और इस साल अगर पशु के चारे पर सब्सिडी सरकार नहीं देगी तो उनके बचने की उम्मीद नहीं है। किसान उनको कत्लखाने में भेज रहा है, पहले इसको रोकना चाहिए। अगर नहीं रोकते हैं तो फिर एक और बड़ी समस्या का सामना हमको निश्चित रूप से करना पड़ेगा।

      यह केवल किसान का सवाल नहीं है। गांवों में 50 परसेंट लोगों के पास खेती है, लेकिन जिनके पास नहीं है, वे लोग भी कृषि पर निर्भर हैं। उनका क्या होगा, इसके बारे में गम्भीरता से सोचना होगा? नरेगा योजना अच्छी है, जो महाराष्ट्र में ई.डी.एस. है, जिसमें गरीब आदमियों को काम मिलता है और नरेगा में भी 80 से 100 रुपये उनको प्रतिदिन मिलते हैं, लेकिन यह योजना कुछ जिलों,300-350 जिलों के लिए लागू की गई है। क्या इस योजना को आप एक्सैप्शन मानकर सूखाग्रस्त होने के कारण सारे प्रदेशों में लागू नहीं कर सकते? इसे सभी जिलों में लागू करना चाहिए, लेकिन इसके लिए पैसा नहीं मिल रहा है।...( व्यवधान) मैं वही कह रहा हूं। काम के बदले अनाज और नरेगा का पैसा स्टेट्स को 4-4 महीने नहीं मिलता। मुझे लगता है कि आज जब उत्पादन का कोई साधन किसान के पास नहीं है, मजदूर के पास नहीं है तो इसका वीकली पेमेण्ट होना चाहिए, नहीं तो 15 दिन में होना चाहिए। केन्द्र सरकार अगर 4-4 महीने पैसा नहीं देगी तो राज्य सरकार अपने पैसों से नरेगा का पेमेण्ट नहीं कर सकतीं। एम.पीज़. से मैं कहना चाहूंगा कि आप बताइये कि 3-3, 4-4 महीने नरेगा का पेमेण्ट नहीं हो रहा है। इसलिए उसको पैसे जल्दी देने के लिए भी आप निश्चित रूप से काम करिये।

      हर गांव में आज रोजगार के लिए स्थानान्तरण हो रहा है और गरीब किसान और खेत मजदूर गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहा है और यह जायेगा तो फिर वहीं बस्ती करता है और सारी समस्या शहरों के लिए बढ़ती है। अगर इस समस्या से भी बचना है और किसानों और गांवों में रोजगार देना है तो खेत मजदूरों को तो हर गांव में काम शुरू करने की और वह काम अगले आने वाले जून तक उनको काम मिले, इसकी निश्चित रूप से जरूरत है। मैंने मांग भी की कि आप मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाइये और जिन जिलों में ऐसी परिस्थिति है, उस परिस्थिति के लिए हर गांव में सड़क का काम हो सकता है, वाटर स्टोरेज का हो सकता है, इसलिए उसके बारे में भी आप सोचें। आज सबसे बड़ी समस्या है, सारा सदन जानता है और स्वयं कृषि मंत्री भी किसान हैं, वे जानते हैं कि गत साल ऋण माफी हो गई, लेकिन नया कर्ज नहीं मिला। इस साल नया कर्ज मिला, लेकिन उन्होंने जो बुवाई की थी, वह खत्म हो चुकी। नया बीज और नया फर्टीलाइजर उनको देना चाहिए और नया सीड लेने के लिए उनको सब्सीडाइज़ करना चाहिए, लेकिन जो कर्जा लेकर उन्होंने इस समय खरीफ की बुवाई की थी, वह खत्म हो चुकी है तो वह कर्जा वापस नहीं कर सकते, इसलिए इस सदन में मेरी मांग है कि एक तो इस साल का भी किसानों का कर्जा माफ करो और नहीं माफ कर सकते तो उसको स्टे दे दो। इस साल अगर बरसात ही नहीं होगी तो किसान कर्जा कैसे वापस कर सकेगा। उनको नया लोन भी देना चाहिए और पुराने लोन को स्टे दे देना चाहिए। मैं एक मांग करता हूं कि किसान को अगर सही राहत आप देना चाहते हैं और सूखाग्रस्त समय में उनकी मदद करना चाहते हैं तो आगे चलकर किसानों को आप 6 परसेंट ब्याज पर कर्ज दें। कई प्रदेशों में 13 परसेंट इंटरैस्ट पर लोन मिलता है तो मेरी यह मांग है कि नया टर्म लोन 2-3 साल के लिए दें और उसके लिए चार परसेंट इंटरैस्ट पर किसानों को लोन दें तो किसानों को निश्चित रूप से बहुत बड़ी राहत होगा।

      महोदय, इतनी गंभीर समस्या होते हुए भी राज्य सरकार उतनी गंभीर नहीं है और केंद्र सरकार भी गंभीर नहीं है। चिदंबरम जी, आपके पास अभी फाइनैंस विभाग नहीं है, इसलिए आपको जानकारी नहीं है, आप गृह मंत्री हैं। मैं कहना चाहता हूं कि आपको प्रदेशों की मदद करनी चाहिए। अभी तक आपने कोई प्रदेश में टीम नहीं भेजी, जबकि प्रदेशों ने मदद मांगी है।वर्ष 2007-08 और 2008-09 में आपने मदद की, लेकिन वर्ष 2009-10 में किसी भी प्रदेश को केंद्र सरकार ने अभी तक मदद नहीं की। दुर्भाग्यवश मुझे कहना पड़ता है कि सबसे ज्यादा अगर सूखे की परिस्थिति कहीं है, तो वह महाराष्ट्र में है। महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में, जैसे विदर्भ, मराठवाड़ा, खानदेश आदि में तो 25 प्रतिशत से कम बारिश हुयी है और वहां 78 प्रतिशत बुआई नहीं हुयी है।ऐसी स्थिति में दुर्भाग्य है कि वहां आपकी सरकार है, लेकिन अभी तक केंद्र सरकार को उन्होंने कोई प्रपोजल भी नहीं भेजा है, कोई मदद भी नहीं मांगी है, न राज्य सरकार सूखाग्रस्त परिस्थिति से निपटने के लिए कोई प्रयास कर रही है, न कोई योजना ला रही है। चुनाव को देखकर पैकेज लाए जा रहे हैं। पवार साहब भी इसकी जानकारी लें, उन्होंने कोंकण में मीटिंग ली और कोंकण को350 करोड़ रूपए का पैकेज दिया।इसी सप्ताह नासिक में मीटिंग ली, वहां विभाग के लिए पैकेज दिया गया कि नयी रोड बनाएंगे, कुछ नयी चीजें करेंगे, लेकिन आज किसान भूखा मर रहा है, अकाल की स्थिति का सामना कर रहा है। मुझे लगता है कि पैकेज उस चीज को देना चाहिए, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने इस गंभीर स्थिति को नजरंदाज किया है। अकाल का सामना करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।

      महोदय, इस महीने में दो मीटिंग्स हुयी हैं, एक कोंकण में और दूसरी नासिक में। उस समय80 प्रतिशत सूखाग्रस्त महाराष्ट्र होने पर भी राज्य सरकार ने इस परिस्थिति पर विचार भी नहीं किया। इसलिए मैं मांग करता हूं कि महाराष्ट्र की राज्य सरकार प्रपोजल भेजे या न भेजे, लेकिन आप महाराष्ट्र से आते हैं, महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो आप महाराष्ट्र सरकार से यह मांग लें कि महाराष्ट्र की वास्तविक स्थिति क्या है? अगर आप यह करेंगे, तो मुझे लगता है कि राज्य के लिए निश्चित रूप से राहत होगी।राज्य की सरकार अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रही है, यह बात मैं इस सदन में दावे के साथ कहना चाहता हूं। अगर आपके पास प्रपोजल आता है, तो आप निश्चित रूप से जवाब देते समय इस बात को बतायें।

      महोदय, सूखे का एक परिणाम होता है, जब मानसून कम होता है, तो देश की आर्थिक स्थिति गंभीर होती है और महंगाई बढ़ती है। वह महंगाई कितनी बढ़े, इसमें दो चीजें होती हैं, एक महंगाई बढ़ती है और दूसरा अनाज की कमी है।आप कह रहे हैं कि अनाज के भंडार भरे हुए हैं। अगर वे भरे होंगे, तो बहुत अच्छा होगा, लेकिन वे नहीं भरे हैं, तो क्या स्थिति होगी? हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि जब-जब अकाल होता है, हर चार साल के बाद अकाल होता है, तो तीन-चार प्रतिशत महंगाई बढ़ती है। अभी लगभग4.6 प्रतिशत बजट में डेफिसिट है, अगर इस स्थिति से निपटने के लिए हमें खर्च करना पड़ेगा, तो और भी महंगाई को निमंत्रण देंगे। आज कितनी महंगाई है, क्या आप नहीं जानते हैं? आज100 रूपए किलो दाल का भाव हो गया है। गांवों में किसान क्या खाता है, रोटी और दाल। उसके सिवाय और कुछ नहीं, उसके पास न चीनी है, न ऑयल है। इन चीजों के दाम इतने बढ़ गए, 100 रूपए किलो दाल हो गयी, ऐसी स्थिति में किसान कैसे जिएगा? अकाल है और उसके पास उत्पादन नहीं है, तब वह कैसे जिएगा? क्या यह महंगाई नहीं है? हिंदुस्तान में कभी ऐसा नहीं हुआ कि 100 रूपए किलो दाल हो गयी हो? 100 रूपए ऑयल का दाम, वह कैसे जिएगा? मैं नहीं जानता कि गेहूं का कितना भंडार है, मैं नहीं जानता कि चावल का कितना भंडार है, मुझे मालूम नहीं उसमें किसकी गलती है, लेकिन गतवर्ष बासमती चावल छोड़कर सभी पर पाबंदी लगायी गयी। इसी सरकार ने वर्ष 2007 में पाबंदी लगायी, वर्ष 2008 में भी पाबंदी लगायी और अप्रैल 2008 में ऐसा नोटिफिकेशन निकाला कि 11 सौ डालर प्रति टन रेट आएंगे, तो ही एक्सपोर्ट किया जाएगा, लेकिन ह्यूमिनिटी ग्राउंड पर इन्होंने बीस देशों को चावल एक्सपोर्ट किया।उसमें कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी मुझे मालूम नहीं है, लेकिन इसकी जांच होनी चाहिए।जहां इस देश में अनाज नहीं है, दाल नहीं है, चावल नहीं है, उस समय हमने 11 लाख मीट्रिक टन चावल एक्सपोर्ट किया, 460 डालर के भाव से, यह क्यों फैसला बदला गया? इसका क्या कारण था? घाना में तो वहां के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर अरेस्ट हुए, क्योंकि जो चावल भेजा गया था, वह घाना गया ही नहीं, वह कहां गया? अगर हमारे देश में किसान भूखा मर रहा है, खेत मजदूर को खाने के लिए नहीं है, तो एक्सपोर्ट में ह्यूमिनिटी नहीं, बल्कि अपने देश के किसानों के लिए पहले ह्यूमिनिटी करिए, फिर विदेश के लोगों के बारे में आप सोचिए।

      हमारे देश का किसान मर रहा है, आज वह सौ रुपये किलो की दाल खा रहा है और चावल भी महंगा हो गया है। जब हम एक्सपोर्ट करते हैं, तो चावल महंगा होगा। मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि इस साल शक्कर, दाल और आयलसीड्स की शार्टेज है। शक्कर की शार्टेज तो दीवाली में होगी, क्योंकि 27 रुपये किलो तो वह अभी ही है। दाल सौ रुपये किलो हो गयी है। आप इसका सामना कैसे करेंगे?  मुझे लगता है कि आपको एक बात सोचनी होगी कि हमारी एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट पालिसी का आधार क्या है, उसका केन्द्र बिन्दु क्या है। उस बारे में हम क्या सोचते हैं? जब हिन्दुस्तान के किसान की उपज के दाम बढ़ते हैं, तो हम इम्पोर्ट करते हैं और जब दाम गिरते हैं, तो हम एक्सपोर्ट करते हैं। आप इस नीति को बदलिये। अगर एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट नीति सही होगी, तो किसान मारा नहीं जायेगा। इसलिए आप किसान की विरोधी नीति मत अपनाइये। इसलिए एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे हमारे देश के किसानों को और आम आदमी को राहत मिले। आप हर तीन महीने में पालिसी बदलते हैं। अभी आपने फैसला किया था कि हम कोई भी चावल एक्सपोर्ट नहीं करेंगे। अगर आप हर तीन महीने में इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पालिसी बदलेंगे, तो कैसे चलेगा। एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट में एक लांग टर्म और एक शार्ट टर्म पालिसी होनी चाहिए। इससे किसान भी बचेगा और कन्ज्यूमर्स को भी सामान महंगा नहीं लेना पड़ेगा। आपको इसके बारे में सोचना पड़ेगा।आज जो दाल सौ रुपये किलो है, वह कल सवा सौ रुपये किलो भी हो सकती है, क्योंकि जब देश में अकाल होगा तो दाल कहां से पैदा होगी।आप पांच लाख मीट्रिक टनमंगाइये, हम उसे आयात करेंगे। किसानों को सब्सिडाइज्ड रेट में दाल देनी पड़ेगी। मेरी एक मांग है, लेकिन मुझे मालूम नहीं है कि वह कितनी सही है। हमारे यहां दाल और ऑय़लसीड्स की हमेशा कमी रही है। हम किसानों को ऑयलसीड्स और दाल का उत्पादन करने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते? आप उनके लिए प्रोत्साहन की योजना क्यों नहीं लागू करते? हमारे कृषि विद्यापीठ क्या कर रहे हैं? हम सौ रुपये का भाव होने तक क्यों चुप बैठे हैं? मुझे लगता है कि हमें क्रॉप प्लानिंग करनी चाहिए। हमारे यहां क्रॉप प्लानिंग नहीं है। हमारे यहां जिन चीजों की कमी है, उनका उत्पादन करने के लिए किसानों को प्रेरित करना चाहिए और उन चीजों को सब्सिडाइज्ड करना चाहिए। इसके अलावा क्रॉप पैटर्न बदलना चाहिए। सारी दुनिया जानती है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम बदलता जा रहा है, सीजन बदलते जा रहे हैं। इसी कारण वर्षा भी अनिश्चित हो गई है। जिसके कारण सारे सीजन बदल गये हैं ...( व्यवधान) एक दिन में चार-चार इंच बारिश हो रही है।यह ग्लोबल वार्मिंग का ही परिणाम है। अगर अगला मानसून भी ऐसा ही आने वाला है, तो हमारे मौसम विभाग और उपग्रहों का माडर्नाइजेशन करना चाहिए, नयी जानकारी लेनी चाहिए, नयी टेक्नोलॉजी लानी चाहिए, जिससे कि हमें मानसून की एक्यूरेट जानकारी प्राप्त हो सके। मैं इस बात को ज्यादा लंबा नहीं करना चाहता हूं, लेकिन कहना चाहता हूं कि हमें इस प्रकार के क्रॉप भी लाने चाहिए, जिन्हें किसान ऐसे मानसून में भी पैदा कर सकें। हम पारंपरिक खेती पर आधारित हैं। अगर ग्लोबल वार्मिंग के कारण किसान को हर साल सूखे का सामना करना पड़ेगा, तो मुझे लगता है कि हमें क्रॉप पैटर्न को भी बदलना होगा।

      हमारा एक सुझाव और है कि हम आर्टिफिशियल वर्षा, जिसे कृत्रिम पाउस कहते हैं, के बारे में भी सोचें। कृत्रिम पाउस मराठी शब्द है। मैंने जानबूझकर इस शब्द को यहां बोला है। इसका प्रयोग महाराष्ट्र, कर्नाटक में हुआ। अगर अगस्त महीने में भी इतनी बारिश न आयी, तो क्या सारे देश में हम उसका प्रयोग कर सकते हैं? मुझे मालूम नहीं कि वह प्रयोग सफल होगा या नहीं, लेकिन प्रयास करने में क्या दिक्कत है। इसलिए आर्टिफिशियल बारिश के बारे में भी निश्चित रूप से सोचना चाहिए। हमारे देश में120 करोड़ की पापुलेशन है, लेकिन 50 करोड़ कैटल्स भी हैं। उनके बारे में भी निश्चित रूप से हमें सोचना चाहिए। आज एक समस्या और है कि पैडी का उत्पादन बहुत कम हो रहा है, वैसे सोयाबीन का उत्पादन भी बहुत कम हो रहा है। दाल, चावल, सोयाबीन और ऑलसीड्स का काफी डेफीसिट होगा और उस डेफिसिट के लिए हमें निश्चित रूप से सोचना होगा। मैं कहना चाहता हूं कि महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा अकाल है। वहां राज्य सरकार ध्यान नहीं दे रही है, कोई उपाय नहीं कर रही है। केन्द्र सरकार को वहां राहत देनी चाहिए। मैं महाराष्ट्र की ओर से मांग करता हूं और आशा करता हूं कि कृषि मंत्री जी प्रधान मंत्री जी से प्रार्थना करेंगे और इसी सप्ताह मुख्य मंत्रियों की बैठक बुलायेंगे। पिछले25 सालों में इतने बड़े सूखे का संकट नहीं आया था, उतने बड़े संकट का सामना करने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और सारा देश इसका मुकाबला करने के लिए इस संकट को अवसर मानकर मिलजुलकर प्रयास करना चाहिए। इसी के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं।

                                                           

SHRI T.R. BAALU (SRIPERUMBUDUR):Mr. Deputy-Speaker, Sir, before entering into the very serious subject matter of ‘situation arising out of drought and flood in India’, I would like to proudly call myself, a member of the low profile community, the low profile society, the society of farming community, the society of agriculturist, who serve food for all, without any discrimination of caste, creed, religion, place of birth, gender and so on.

            Flood can be controlled; whenever flood comes, it can be regulated, controlled and sent to the place where there is no proper rainfall. At the same time, rain could not be created. It is more important to see that the flood is controlled properly and wherever flood arises, wherever necessity of water is not there, it has to be regulated and sent to the places where they are in need of water. It is more important.

            The Governments, from 1996 onwards – the successive Governments came and gone – are not giving proper attention to the interlinking of rivers.

            Coming back to the subject matter, in the millennium year, 2000 – the new Millennium Year was celebrated the world over – the UN General Assembly has adopted a resolution, giving top priority to alleviation of poverty. In 2002, WSSD meeting took place in Johannesburg. I had the privilege of leading the members of the Government of India to that particular WSSD, World Summit on Sustainable Development meeting at Johannesburg. The countries of the world took note of the MDGs – they said that poverty should be alleviated at any cost. How to alleviate poverty? But for the development of agriculture, poverty could not be alleviated. That was the most important subject that has been discussed and the WSSD gave thrust to agriculture.

            But to our dismay, from 1947 onwards, the growth of agriculturists is dwindling. The country, we proudly say, belongs to farming community and we say that our country has more than 70 per cent farmers; the farmers are casting their votes in favour of the Government, whichever Government comes and goes. Because of the farming community’s vote bank, the successive Governments are coming and going. But are we giving proper attention to the development of agriculture and the farming community? Definitely, to a certain extent, the UPA Government has given a lot of sops to the farming community like low-cost credit, loan waiver and so on. I am not disowning all this, but at the same time, from 1947, the contribution to the GDP is dwindling. For instance, in 1990 the contribution of the agriculture was of the level of 30 per cent.  In 2008, it was of the order of 17 per cent.  It has to be checked.  We have to put our heads together to find out how to develop agriculture in spite of all these ordeals. 

            The agriculture sector is extending employment opportunities to the tune of 58.2 per cent of the total work force.  Its share of export is to the tune of 12.2 per cent.  The Government must understand that if anything goes wrong with agriculture, the entire economy would be adversely affected.  It is a bad signal.  For instance, on 14.7.2009, in this very House, my friend, Mr. Rajamohan Reddy had asked a question.  The question was: ‘What is the level of rainfall in the country?’  The Minister’s answer:

“Up to 8.7.2009, the country has received 151 MM only against the normal rainfall of 235 MM.”               So, the deficit is of the level of minus 36 per cent.  Out of 36 Meteorology Stations,  27 have recorded deficit rainfall and nine have recorded normal rainfall. 
            As far as States of Maharashtra including Vidharbha, Madhya Pradesh, Rajasthan, Andhra Pradesh, Karnataka and Gujarat are concerned all cash crops like cotton, soyabean, groundnut and sugarcane are badly in need of even first shower.  Uttar Pradesh is the leader in sugarcane production.  What has happened in Uttar Pradesh?  It has received less 57 per cent rainfall.  In Haryana, Delhi and Chhattisgarh the rainfall is minus 83 per cent which is below normal.  The paddy growing States of West Bengal, Andhra Pradesh, Punjab, Orissa, Tamil Nadu and Chhattisgarh have received very minimal rainfall. West Bengal has received 49 per cent; Andhra Pradesh – 55 per cent, Punjab – 68 per cent; Orissa – 15 per cent; Tamil Nadu – 28 per cent and Chhattisgarh – 93 per cent below normal rainfall.  It is because of the failure of South-West monsoon.  But things have not been properly taken into consideration.  The Government should come forward to give proper solace to the farmers.
            The storage level of the biggest reservoirs is also low.  In 81 reservoirs which are holding water for our farmers, the level has dropped very seriously.  According to the Central Water Commission, the storage level on June 11, was 16.5 billion cubic metre only against 151.76 billion cubic metre.  It is just 11 per cent of the full capacity.  But the Meteorology Station used to say that there will be rain, there will be normal rain and whenever the Meteorology Department predicted that there will be a normal rain, the normal rain would not occur.
They failed miserably in their predictions in 1991. The Department again failed miserably in their predictions in the years 1999, 2002 and 2004. In the year 2002 there was a drought like situation all over the country. The adverse impact of bad weather was allowed to be continued. It has been observed that in a span of two to three years there ought to have been a famine like situation in some districts of some States. The Government should be watchful about the fallout of this. The fallout of it is very serious. It would not be a stand alone fall out for a particular place or region, but it would affect the entire economic growth. The prices of foodgrains will increase. Food will not be available. There would be acute shortage of water, not only for irrigation but also drinking water. It is good that because of the better management of administration owing to his administrative skills, Shri Pawar is sitting pretty over the buffer stock of wheat and rice. I appreciate that. But the question is, for how many years would he be able to sustain this status of the buffer stock? Buffer stock is there because of good production; good harvest and good rainfall. I do appreciate the fact that because of his administrative skills the hon. Minister, Shri Pawar, for the last two years, have been able to maintain a proper buffer stock. I also appreciate the UPA Government for this.
            But when one looks at the global scenario one would find that the International Grain Council has stated that the availability of foodgrains in the year 2008-09 was of the order of 1781 million tonnes, but this is expected to be 1715 million tonnes only in 2009-10.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please wind up now.
SHRI T.R. BAALU : Sir, it would not be possible for me to wind up right now. I will need another two to three minutes.
            What is the scenario in respect of global wheat production?  Global wheat production in the year 2008-09 was of the order of 1287 MT whereas in the year 2009-10 the production is expected to be 652 MT. So, global production of wheat has registered a deficit. My point is that the problems of the farmers should be addressed properly and on time.
            What are the inputs required for good production and good harvest? A farmer needs credit at low interest rates, good fertilizer, pesticides, power and so on. What is happening in the State of Tamil Nadu? Farmers are provided with credit at low interest rates. In the year 2006-07, the interest rate on credit was reduced from 9 per cent to 7 per cent. My leader Kalaignar Karunanidhi reduced this rate of interest from 9 per dent to 7 per cent. In 2007-08 this rate was reduced to 5 per cent and in 2008-09 the rate of interest on credit to farmers has been reduced to 4 per cent. Further, the State Government under our leader Kalaignar Karunanidhi has declared zero per cent interest for those who pay their instalments on time.  If the State Governments are coming forward to give credit on reduced rates of interest, from 9 per cent to 4 per cent and even at zero per cent interest, why can the Central Government not do this? I would like to suggest the Government that they extend subsidy and also provide credit to farmers at low interest rates. The Central Government can at least provide a matching grant.
            Sir, power is provided totally free of cost in States like Tamil Nadu, Andhra Pradesh, Punjab and some other States. These States should be helped in a proper manner. What is happening in the State of Tamil Nadu? I would like to bring to the notice of the House that by June 12, water from the Mettur reservoir was supposed to be released which would have helped the areas of Thirucherapalli, Thanjavur, Tiruvarur, Nagapattinam and such other places. But it has not happened due to lower level of water. Today our leader Kalaignar Karunanidhi has order to release order from this dam at the risk of maintaining its level.

15.00 hrs. What has not happened?  It is because of the non supply of water in the delta area.  The farmers have lost their first crop, the kharif crop, in more than 2.8 lakh acres of land. That means 2.8 lakh acres of land could have produced 8.4 lakh tonnes of rice.  That means it is a loss of Rs. 840 crore by the farmers. They have lost the entire crop. Why is it so?  The Central could have intervened at the proper time, at the time of construction of Harangi, Kabini, Hemavathi, etc. They should have intervened at that time but they did not intervene. What is happening today? Andhra Pradesh is digging canals in the Palar River.  Our friend, Shri Y.S.R. Reddy is doing it.   I do not know what has gone wrong there?  It is being done across Palar River.   Palar is an inter-State river.  It flows through Karnataka, Andhra Pradesh and Tamil Nadu.   Across the Palar river, if an upper riparian State tries to construct or dig any structure, it has to be approved by the lower riparian State. But without any consultation with the lower riparian State, dams constructed across Cauvery and the Cauvery issue is still lingering on. Without consultation with the lower riparian State, structures are being constructed across Palar River also.

            The Chief Minister has gone on record sometime back saying, I quote: “Tt is really surprising and shocking because, on the one hand, Andhra Pradesh is saying that it is waiting for the Report of the Committee and, on the other hand, it is going ahead with the construction work”. He has also said and I quote: “Instead of remaining a mute spectator, the Centre should play an active role to resolve our problem”.   He has requested the Central Government to come forward and settle the issue amicably.  

The matter is before the Supreme Court.  The Supreme Court has directed the Central Water Commission to intervene and advise the Government of Andhra Pradesh not to do anything till such time the matter is settled.  But then things went wrong. 

Finally, before I conclude, I only request the Central Government to look into the funding of intra-linking rivers.  You are not going in for interlinking of rivers.  You have 30 programmes in this regard out of which 14 programmes are for rivers flowing from the Himalayas and 16 for peninsular rivers.  Thirty programmes are there on paper.  What is happening to them?  Unless and until you go for interlinking of rivers.

Sir, interlinking of rivers is the most important issue which has to be taken up immediately.  It is lingering on just like the Bill on women reservation.  

Our leader, Dr. Kalaignar, has sent three proposals so that they can be accommodated in the Accelerated Irrigation Benefit Programme.  The first proposal is to divert the flood surplus of Cauvery by constructing Kattalai Barrage across Cauvery and connecting Agniyar, Koraiyar, Pamban, Vaigai and Kundar at the cost of only Rs. 189 crore.  The second proposal is, surplus water from Kannadiyan channel of Thambirabarani Basin could be linked to Karumeniyar and Nambiyar to serve the drought prone areas of Radhapuram, Nanguneri and Sattangulam at the cost of Rs. 369 crore.  The third proposal is Pennaiyar surplus water could be diverted to Cheyyar and Palar so that those drought prone areas can be benefited and the cost of project is 174 crore.

            So, my point of view is that you cannot avoid deficit in the rainfall.  It is not possible.  He is not God.  Even God could not bring rain, if at all God is there.  But you can divert the surplus water to the areas which are needy. 

            So, it is more important to see that all the thirty schemes that have been planned, but put in the cold-storage, should be taken out and implemented.  Inter-linking of rivers is the most important subject matter.  But even before that, what is important is intra-linking of rivers, which has been planned by my State, should be encouraged and proper funding should be given under the AIBP.

SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA): Mr. Deputy-Speaker, Sir, when there is a flood, the farmers or the peasants face problems.  That problem is for the time-being only.  When the water gets receded, the farmers can start cultivation. But when there is a drought, its impact on the production of food grains is felt not only in the current year, when there is a drought, but also in the next year.  It continues to impact the production of food grains in the next year also. 

            Although agriculture’s contribution to the GDP is declining, it is still contributing to the extent of 17 per cent.  Ten or eight years back, it was contributing 25 per cent of the GDP.  Still sixty per cent of our population is dependent on agriculture.  There are 22 crores of agricultural labourer who are dependent on agriculture.  When there is a delayed monsoon, when there is a shortage in the rainfall, when the sowing, transplantation and cultivation do not start in proper time, then they have their impact on the production of food grains. 

            What is the position of sowing in different States? In Andhra Pradesh it is 75 per cent. Andhra Pradesh’s position is better in comparison to other States.  In Madhya Pradesh, it is 30 per cent and in Rajasthan it is 40 per cent.  In almost all the States the sowing is less than fifty per cent so far.  Already one or one-and-a-half month have passed. 

I was in my constituency, which consists of two districts.  One district is drought-prone.  In earlier times, there was a Programme called Drought Prone Area Programme, the DPAP.  But that Programme has been dispensed with.  In my constituency, I have seen no land where the sowing is more than ten per cent.  Such is the situation in a number of States!  In the past we have seen drought in one or two States or within a State one or two districts.

 

But this year, drought is so extensive and intensive that it extends from Eastern part of our country.  This year Orissa is, to some extent, fortunate to have rains or floods in some districts.  But starting from West Bengal to Punjab, from East to West and in the North Western region, which is known as the food bowl, the rainfall is less than 50 per cent. When there is less than 30 per cent of rainfall, then it is called drought.  It has its impact on our acreage cultivation also. 

            Sir, since 60 per cent of food grains are produced during monsoon, and, if there is a delayed monsoon -- less monsoon and less rain -- it will definitely have its impact not only on the paddy but also on other food grains like pulses, bajra, soyabean, etc. As bajra is reported to be covered in 34.67 lakh hectares as compared to last year area of 46.01 hectare, and if there is less rainfall, then it will have its effect on the production also. When there is a delayed sowing and delayed cultivation, then there will be less production.   The area coverage under maize and jowar is reported to be 46.48 lakh tonnes.   Not only in case of paddy where area coverage has come down to just 50 per cent; in case of other food grains like pulses, the area coverage has also come down.

            Sir, we have been facing this drought situation every year, but this year it is intensive and extensive. But what is required to be done by the Central Government has not been done.   The Food Security Mission was announced and created. What was the aim or object of this Mission?  The aim was to increase the production of rice to the extent of 20 million tonnes by the end of the 11th Five Year Plan. 

            Sir, according to the Economic Survey of 2008-09, except for a marginal increase in case of rice, all other food grains have been declining in production vis-à-vis target of 2008-09.  When there is a deceleration in the production, there has been marginal increase in case of rice, but in case of other food grains, there has been deceleration and there has been decline.  The National Food Security Mission was created to increase the food production.  But how by the end of the 11th Five Year Plan it can be achieved? 

            Now, we have a number of big dams. Some of the dams were constructed in the 50s.  Today, the water level is just ten per cent of its capacity.

After construction of the dam, after many years, say 50 or 60 years, dredging has not been done. There has been siltation because check dams have not been created to prevent the siltation in the dam, in the reservoir.  I can cite the example of three such reservoirs created in the 1950s under the Damodar Valley Corporation. The DVC was created in 1948 by an Act of Parliament for facilitating irrigation in four or five districts in West Bengal and, prevention and control of floods as there was a flood in the 1940s. These dams were constructed in the 1950s like Maithon, Panchet in my district and the Durgapur Barrage. After the construction, dredging has not yet been done. As a result of this, the capacity of the reservoirs has been reduced to a great extent. What is required today is that dredging of these reservoirs should be done in a massive way. For that, investment is required.

            Sir, you have seen the allocation for irrigation for this year. The capital formation in agriculture was declining in the past. As a result of that, you will be surprised to know that for the last five to six years, there has not been extension of irrigation capacity, the irrigated area. Today, after 62 years of Independence, we have only 40 per cent of irrigated land and  60 per cent of the land has to depend on rain, on monsoon. The point is that 60 per cent of our food production has to depend on rains. So, there is a need for massive investment in agriculture, irrigation, extending the irrigation facilities. The dams which were constructed 50 years back need dredging. There is need for dredging of these reservoirs so that the capacity - which was created at that  point of time, which capacity has been reduced to a great extent – can be increased.

            We have been raising the question in regard to prices. We are asking for the remunerative prices. Two Committees – the Dr. Swaminathan Committee and the Dr. Y.K. Alagh Committee – were set up and both the  Committees recommended certain things. The Dr. Swaminathan Committee recommended that the formula in regard to determining the Minimum Support Price or remunerative price should be C2 Plus 50 per cent. The Dr. Y.K. Alagh Committee recommended giving statutory status to the CACP. None of these recommendations has been accepted by the Government.  What is now required  to tackle the situation is long-term as well as short-term measures.

            The short term measure is to release relief to the farmers. Most of the farmers are small and marginal farmers who are poor and the seeds which are sown already have been damaged now. So, the Government should supply seeds free of cost to the farmers in the affected areas.

            A Central initiative should be taken up immediately to identify the intensity of the problem and take specific measures to provide relief to the affected areas. The Government should also send Central Teams to various States to assess the damage that has been caused because of delayed monsoon, as cultivation has not yet started in many States.

            Then, the high level Committee on National Calamity Contingency Fund should be empowered and made the final authority on matters of drought relief and for State-specific relaxation of norms for dealing with reduced acreage as well as productivity due to deficient rainfall.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, I am concluding. You have given me only five minutes. How can I conclude my speech in five minutes on such a vast subject?

MR. DEPUTY-SPEAKER: No; you have taken more than 15 minutes.

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, the Government should declare the regions that have received deficient rainfall leading to cancellation of sowing operation as ‘drought-hit’ and provide compensation to the farmers who have been affected.

            The Government should provide seeds, fertilizers and other inputs free of cost to the farmers in the affected areas.

            The Government should announce loan waiver scheme and provide interest-free loans to the farmers in the affected areas.

            The Government should also provide free and uninterrupted supply of power and assist States by providing additional power from the Central Pool which is necessary.

            Then, the price of diesel has been increased recently by Rs. 2 per litre. This should be withdrawn in view of the drought situation prevailing in most States of our country. … (Interruptions) The Government of West Bengal has decided yesterday to reduce the power tariff applicable to the agricultural sector because out of 18 districts, at least 15 districts are worst affected by drought and my constituency of Bankura is also affected by drought. Purulia is known as a drought-prone district in West Bengal where paddy sowing is less than 10 per cent.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, this is my last point.

            The Government should announce the Minimum Support Price for the Khariff Season immediately.

            Then, in Durgapur Barrage, Panchet, Maiton, Kansabati and Tilpara dams, storage capacity has been reduced to a great extent. So, immediate investment should be made and enough funds should be provided to the State Government for dredging and desilting of all the reservoirs so that the storage capacity of these dams can be enhanced and rain water harvesting can be taken up in a massive way.

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): उपाध्यक्ष जी, आज पूरा देश बाढ़ और सूखे से जूझ रहा है। माननीय मंत्री जी सदन में मौजूद हैं। इनके बयान इनकी चिन्ता के गवाह हैं कि आज पूरा देश बाढ़ और सूखे की चपेट में है, खासकर उत्तर भारत जिस पर आज चर्चा हो रही है। मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि वह काफी समय से सरकारों में शामिल रहे हैं और महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं लेकिन क्या कारण है कि आजादी से लेकर आज तक जब-जब देश में समय समय पर बाढ़ और सूखे का प्रकोप रहता है, उस समस्या का स्थायी हल ढूंढने का प्रयास किया जाना चाहिये था, मैं समझता हूं कि अब तक की सरकारों ने कभी कोई सार्थक पहल नहीं की है। माननीय मंत्री जी एक जिम्मेदार और विद्वान मंत्री हैं। उन्होंने दोनों सदनों में, खासकर उत्तर भारत के लिये चिन्ता जाहिर की है, इस विषय में इनको पहल करनी चाहिये क्योंकि इन्हें किसानों के हितैषी के रूप में देखा जाता है।

      उपाध्यक्ष जी, उत्तर भारत में सूखे का प्रकोप है जिसमें उड़ीसा, बिहार और झारखंड भी हैं। कई स्टेट्स ऐसे हैं जो बाढ़ से काफी प्रभावित हैं। जब हम आज सुखाड़ पर चर्चा कर रहे हैं तो उन लोगों को बड़ा अजीब लगता होगा। मैं उत्तर प्रदेश से आता हूं जहां पूरा प्रदेश आज सूखे की चपेट में है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने सब से पहले और सब से ज्यादा जिलों को सूखा पीड़ित घोषित किया है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जहां47 जिलों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है। माननीय मंत्री जी ने दूसरे सदन में पूरे उत्तर भारत को सूखे की चपेट में होने का जिक्र किया। मैं मंत्री जी के संज्ञान में लाना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश की सरकार चिन्तित रही है। देश का सब से बड़ा प्रदेश होने के नाते वहां किसानों और मजदूरों की संख्या भी ज्यादा है। इसलिये प्रदेश की मुख्यमंत्री ने यह जिम्मेदारी ली है और सब से ज्यादा चिन्ता भी ज़ाहिर की है। इस वर्ष25 जून को देश के प्रदेशों के कृषि मंत्रियों की केन्द्र सरकार से बातचीत हुई थी। उस समय उत्तर प्रदेश के कृषि सचिव द्वारा इस बात की चिन्ता जाहिर की गई थी कि देश में मॉनसून की स्थिति को देखते हुय़े, जहां कम बरसात होती है, वहां धान की रोपाई खत्म होने के कगार पर है, तो दलहन और तिलहन की खेती कर सकते हैं, ऐसी डिमांड की गई थी लेकिन केन्द्र सरकार ने इस ओर कोई पहल नहीं की। मैं समझता हूं कि माननीय कृषि मंत्री जी को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये। माननीय मंत्री जी ने माना है कि60 प्रतिशत किसान इस देश के विकास की रीढ़ की हड्डी हैं लेकिन अब तक की सरकारों ने किसानों की तरफ ध्यान न देकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स की तरफ देखा है।

      मैं समझता हूं कि अगर सरकारें किसानों की समस्याओं की तरफ, उनकी बेहतरी के लिए, उनके भविष्य के लिए चिंतित होतीं तो आज जो राष्ट्रीय आपदा पूरे देश में हैं, उसकी नौबत नहीं आती।

      महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश जो देश का सबसे बड़ा प्रदेश है, वहां के किसानों के लिए और देश के सभी हिस्सों में जो किसान सूखे से परेशान हैं, उनके लिए एक राष्ट्रीय आपदा नीति बननी चाहिए और आपने यह नीति बनायी भी है। उन किसानों को जो सब्सिडी मिलती है, मैं समझता हूं कि आजादी के इतने दिन बाद भी किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य देने की बात पर बार-बार हाउस में चर्चा होती है, उस पर कोई चिंता जाहिर नहीं की गयी है। आज किसान के खेतों में 25 से 30 फीसदी ऐसे मजदूर काम करते हैं, जिनके घरों में किसानों के खेत में काम करने के बाद शाम को चूल्हा जलता है और उन्हें खाना मिलता है। अगर वे मजदूरी न करें तो शायद उन्हें पेट भरने के लिए रोटी नहीं मिल सकती है। इसके लिए कृषि मंत्री जी ने कोई चिंता जाहिर नहीं की है। मैं समझता हूं कि मंत्री जी को इसकी चिंता होनी चाहिए। देश और प्रदेश की जो नीतियां बनती हैं, उनमें जिनके पास खेत-खलियान हैं, उनके नुकसान की भरपाई तो हम कर देते हैं, लेकिन वह मजदूर जो खेतों में काम करता है, जिनके पास कोई जमीन नहीं है, उनके लिए हम क्या करने जा रहे हैं, यह माननीय मंत्री जी को हाउस में जरूर बताना चाहिए। उत्तर प्रदेश की सरकार ने 47 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। इसके पहले भी विभिन्न सरकारें प्रदेश में रही हैं और वे अपने को किसानों का सबसे ज्यादा हितैषी बताती रही हैं, लेकिन कभी इतना पहले, कभी ऐसी स्थिति में, ऐसी दैवीय आपदा की स्थिति में प्रदेश की सरकारों ने पहल नहीं की। आज उत्तर प्रदेश की सरकार ने यह पहल की है।

      महोदय, पहले सितम्बर महीने में नुकसान की भरपाई के लिए असैस्मेंट होता था और इसके बाद आपदा का काम शुरू होता था, लेकिन यहां 30 जून तक जो मानसून की स्थिति थी, उसे ध्यान में रखते हुए 47 जिलों को उत्तर प्रदेश में सूखाग्रस्त घोषित करने का काम किया गया है। मैं माननीय मंत्री जी के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश की सरकार, उत्तर प्रदेश में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए ईमानदारी और जिम्मेदारी से काम कर रही है।25 जून को उत्तर प्रदेश सरकार के सचिव और भारत सरकार के सचिव स्तर की वार्ता हुई थी कि हम बरसात में कब दलहन की खेती कर सकते हैं, वह जो डिमांड आयी थी, आपने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया है। इसके बाद 2 जुलाई2009 को वहां के कृषि निदेशक ने जो बात रखी थी, उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया है। 22 जुलाई को वहां के किसानों के लिए भारत सरकार से अनुरोध किया गया कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत सूखा राहत में किसानों को बीज का पैकेट दे सकते हैं, उस पर भारत सरकार के कृषि विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया है।

      महोदय, मैं चाहता हूं कि माननीय मंत्री जी को इस पर चिंता जाहिर करनी चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव ने23 तारीख को सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि पूरे प्रदेश में सूखे से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाएं और स्थानीय समाचार-पत्रों में उन्हें राहत देने के बारे में विज्ञापित कर दिया गया। वहां पर ऐसे किसान मजदूर हैं, जिनकी मैं चर्चा कर रहा था जो खेतों में काम करते हैं, लेकिन खेती में काम न मिलने के कारण आज बहुत परेशान हैं। आपने जो ड्रीम प्रोजेक्ट “नरेगा” चलाया है, उसमें भी उन्हें काम देने के लिए हमारी सरकार ने व्यवस्था की है। उनके स्वास्थ्य के लिए, वहां हैंडपंप के लिए भी व्यवस्था की गयी है। वहां सूखे से बीमारी की जो संभावना है, उससे निपटने के लिए भी डॉक्टरों की टीम गठित की गयी है।

      इसलिए माननीय मंत्री जी के ध्यान में मैं उत्तर प्रदेश की बात ज़रूर रखना चाहता हूँ। आज उत्तर प्रदेश में या पूरे देश में जो नदियाँ सूख रही हैं, उसको रोकने के लिए आपने नदियों को जोड़ने की कोई व्यवस्था नहीं की जिसकी बार-बार चर्चा हुई। सही जल-प्रबंधन की व्यवस्था होती तो आज बाढ़ से हम निपट सकते थे और लोगों को इर्रीगेशन के लिए पानी भी मिल सकता था। अगर नेपाल की सरकार से हमने जिम्मेदारी से बात की होती तो शायद हमें पनबिजली परियोजनाओं के माध्यम से ज्यादा बिजली भी मिलती। आज सूखे के कारण पनबिजली परियोजनाओं से कम बिजली का उत्पादन होने के कारण पूरे देश में बिजली का संकट है। उत्तर प्रदेश में जहां 1400 मैगावाट से ज्यादा बिजली की ज़रूरत है, वहाँ उसको 300 मैगावाट से कुछ ज्यादा जो बिजली देने का काम किया गया है। इसके लिए आप ऊर्जा विभाग से संवाद स्थापित करके उत्तर प्रदेश के किसानों को राहत देने के लिए ज्यादा से ज्यादा बिजली देने का काम करें।

      आज सूखे से पूरे देश में लोग परेशान हैं। माननीय कृषि मंत्री जी से मैं कहना चाहता हूँ कि जो पीडीएस सिस्टम है, जिसमें आपने गेहूँ और चावल देने की बात की है, मैं आपके ध्यान में लाना चाहता हूँ कि पीडीएस में दलहन को भी शामिल करने का काम करें। क्योंकि जो किसान है, जो बीपीएल से नीचे है, वह बेचारा केवल गेहूँ और चावल से कैसे पेट भर सकता है? उसे भी सब्ज़ी और दाल चाहिए। इसलिए उस सिस्टम में हमें दलहन को भी शामिल करने की ज़रूरत है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं सभापति महोदय का अभार प्रकट करते हुए कृषि मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहता हूँ कि उत्तर प्रदेश जो सूखे से जूझ रहा है, उसे ज्यादा से ज्यादा राहत प्रदान करने का काम करें।

SHRI ARJUN CHARAN SETHI (BHADRAK): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I am very much thankful to you for having given me an opportunity to speak a few words on this important discussion on drought and floods in various parts of the country.

            Sir, flood and drought are not new to the country or to any Government that is in power at the Centre as well as in different States. It is estimated that around 40 million hectares of the land in our country are flood-prone; similarly about 60 per cent of the land in the country is drought prone.  This has been known to all of us and also to the Government in power.

            It is also known that the flood problem cannot be solved, and it can only be managed to some extent.  Similarly, drought that has affected different areas can be managed. The people especially at the lower level, those who own only two acres of land or even less than two acres of land and also the landless people are the most sufferers.  How can the Government solve that problem?  That is a question before us.

            It is also known that unless the Centre provides money to the States and also the States have coordination with the Centre, whatever projects or schemes that are being provided cannot be implemented to the satisfaction of the farmers or the people at large.

            Sir, as I have stated earlier, the flood-prone area of the country is not confined to certain States only.  It is already known over the years that these are the States or these are the areas of the country, which are repeatedly being affected by floods.  Therefore, I would request the hon. Minister, who is a very learned and competent Minister, to provide sufficient money. There should be a proper coordination also between the Centre and the States; there should be a will to provide funds and there should be will to utilise funds. Otherwise, it would not serve any purpose.  Money is being provided.  But whatever project proposals are being sent by different States to the Centre are not being looked after or are not being examined by the Central Government on time.  There should be some kind of mechanism created in this regard to ensure these projects are looked after well and properly addressed in time.

            Similarly, Sir, I hail from the State of Orissa, which is not only being affected by droughts but also by floods every year. Fortunately, this time, in this month of July, we have had excess of rainfall.  But prior to that, the hon. Minister had visited my State of Orissa and got the first hand information about the problems of the State.  Unfortunately, the people of Orissa were very much worried about the monsoon because it did not rain at the proper time. But now, it has rained, which has created more problems.  That is the problem of my State.

            As has also been stated, more than 100 per cent rainfall has occurred in the month of July itself in Orissa.  The State Government of Orissa has informed the Central Government.  I have been told that they have also written to the hon. Union Minister of Agriculture to come to the rescue of our State, especially the western parts of Orissa including KBK districts.  It is known to all that KBK are the most backward districts of the country.  Not only this Government knows but also all the previous Governments knew about the problems of the KBK; they are the worst affected areas especially by droughts. Fortunately, we have  Indravati project now, which provides water for cultivation. This particular project has already been completed. My submission is that there are some projects, the proposals of which have already been sent by the State Government of Orissa but they are still lying with the Ministry of Water Resources.  I would, therefore, request the hon. Minister to use his good office to get it sanctioned and implemented.

            Sir, I must also make a mention about a project, which has been languishing for years together.  It is Subernarekha project of 1978.  The hon. Deputy-Speaker also knows about it. This Subernarekha project was first sanctioned in the year 1978 and now, we are in the year 2009.

            Still the project has not yet been completed. On the other hand, the cost overrun of the project has gone so high that it is very difficult on the part of any Government to provide funds for its completion. So, I would request the hon. Minister to provide adequate funds. Fortunately, our Minister of Home Affairs is also present here. It traverses in the Naxalite affected areas. So, for providing development to the area, this project should be provided with adequate funds. Now the Government is declaring some projects as national projects. If this project can be included in the list of national projects, it will certainly do a good thing not only for the State of Jharkhand but also for the State of Orissa as well the as neighbouring State of West Bengal.

            Similarly, the State Government of Orissa has submitted a Comprehensive Plan for Protection of Mahanadi delta areas. The plan of about Rs.1200 crore has been submitted to the Government at the Centre, and the Central Water Commission is still examining this project, though it was submitted to the CWC more than two years ago.

            Unless we provide money or unless we bring more areas under irrigation, the problem of drought cannot be managed and the sufferings of the people, especially small farmers and also downtrodden people living there cannot be solved.

            There is one thing that I would again request to the hon. Ministers—both the Ministers are present here—is about the money. Last time when our Home Minister, Shri Shivraj Patil Ji visited the State during the flood of 2007-08, realising the gravity and severity of the flood problem there, especially in Mahanadi and Subarnarekha, he had announced an assistance of Rs.500 crore. Later on, a Central Team visited. Finally, they had recommended Rs.89.89 crore. Accordingly, getting the assurance from the Central Government, the State Government incurred the expenditure for having restoration of different roads and different utilities. But, subsequently, I am sorry to say—I do not know how far it is reasonable to say this—that they have asked the State to return back the money. If that is not true, I am subject to amend myself.

THE MINISTER OF HOME AFFAIRS (SHRI P. CHIDAMBARAM): That is not correct. As the Finance Minister explained, that is only a technical accounting requirement because this is a cumulative account. The Finance Minister also said there is no question of recovery of any money given in advance. That is a technical accounting statement which has been sent. The Finance Minister has already said there is no recovery. In fact, in UPA-I, there were three cases where we had given money, and the technical note was sent that it will be adjusted/recovered. Eventually, the Cabinet took a decision that we will not recover the money. So, these cases will also be considered.

SHRI ARJUN CHARAN SETHI : Thank you. I am obliged that you are giving the right answer. But at the same time, the letter has been sent. That is the difficulty. The letter has been sent not only to Orissa but also even to the State of Bihar. They have raised it.

SHRI P. CHIDAMBARAM: That is the technical accounting letter.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI ARJUN CHARAN SETHI : All right, hon. Minister, I am obliged that you have clarified the position.

            But, at the same time, I request one thing of the Government. Many senior Ministers are present here. I request you. Once a hon. Minister has declared the assistance, later on how can it be made as nil? How can it be made nil? That is the problem. The amount of assistance the then hon. Minister of Home Affairs declared was Rs. 500 crore. Subsequently, the account became nil. This is something astonishing and this should not be repeated.

            Sir, I thank you once again for giving me the time.

श्री आनंदराव अडसूल (अमरावती) : उपाध्यक्ष महोदय, सूखे जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आपने मुझे चर्चा में भाग लेने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं और आपके प्रति आभार प्रकट करता हूं। पूरे देश का अधिकांश हिस्सा आज सूखे की चपेट में है। इसीलिए इस विषय पर आज सदन में चर्चा हो रही है। मैं महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके से आता हूं। देश और प्रदेशों में यदि किसान आत्महत्या करते हैं, तो कहां करते हैं, वे विदर्भ में करते हैं। अच्छी-अच्छी बातों के लिए बाकी इलाके प्रसिद्ध हैं, लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे किसान भाई, हर रोज, दो या चार की संख्या में आत्महत्या करते हैं। यदि हम पेपर पढ़ें, तो हमें यही पढ़ने को मिलेगा कि आज फलां किसान ने आत्महत्या कर ली। इस बारे में हम फेमस हैं। इसका कारण यह है हमारे विदर्भ और मराठवाड़ा की खेती पूरी तरह से मानसून के ऊपर निर्भर है। अगर मानसून सही समय पर आ जाता है, तो किसान को सही फसल मिलती है। चूंकि वहां की खेती पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है, इसलिए किसानों को कर्जदार बनाती है। पूरे साल में एक ही फसल आती है। दिन प्रति दिन परिवार बढ़ते जा रहे हैं, इसलिए खेती के ऊपर वे अपना परिवार नहीं चला पा रहे हैं। घर में बीमारी, बच्चों की शिक्षा या लड़कियों की शादी आदि में किसान को कर्जा लेना पड़ता है। हमारे यहां यह सिलसिला विगत 10 वर्षों से चल रहा है। महाराष्ट्र की यू.पी.ए. की गवर्नमेंट विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों की आत्महत्याएं रोकने में नाकाम साबित हो चुकी है।

      महोदय, लगभग दो साल पहले, केन्द्र सरकार ने निर्णय लिया कि किसान का जो भी कर्जा है वह माफ किया जाएगा। हमारी मांग भी किसानों के पूरे कर्जे माफ करने की थी, लेकिन सरकार ने केवल पांच एकड़ तक भूमि रखने वाले किसानों का पूरा कर्जा माफ करने का निर्णय लिया। बजटरी प्रावधान केवल 10 हजार करोड़ रुपए का था। किसान बैंक में जाता है, तो उसे कहा जाता है कि जब गवर्नमेंट से पैसा आएगा तब आपको राहत मिलेगी। विदर्भ हो, मराठवाड़ा हो या महाराष्ट्र के और इलाके हों, वहां के किसानों को हमेशा सूखे का सामना करना पड़ता है। एक तो वहां की खेती पूरी तरह से मानसून के ऊपर निर्भर होती है। मानसून सही समय पर नहीं आता है, तो उसे कर्जा लेना पड़ता है। मैं आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूं कि प्रति एकड़3,200 रुपए क्रॉप लोन के रूप में कर्ज मिलता है। जब विदर्भ के पांच एकड़ भूमि रखने वाले किसानों के कर्जे माफ हुए, तब मुश्किल से उनके 15 या16 हजार रुपए माफ हुए। खाली क्रॉप लोन से उनका काम नहीं चलता है। अन्य प्रकार के लोन भी उन्हें लेने पड़ते हैं। बाहर से, साहूकारों से भी कर्जा लेना पड़ता है। तभी अपना परिवार चलाने में वह कामयाब होता है, लेकिन यह सिलसिला सालों-साल से चल रहा है और इसलिए जो भी राहत कर्ज माफी के माध्यम से मिली, वह बहुत कम मिली। आज भी उसी तरीके से दिन में दो या चार किसान भाई आत्महत्या कर ही लेते हैं। मुझे याद है कि जुलाई, 2006 में हमने प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी से विनती की थी तो वे खुद वहां गये थे, उन्होंने वहां विजिट की थी, परिस्थिति देखी और 3750 करोड़ रुपये का एक पैकेज6 जिलों (अमरावती, अकोला, यवतमाल, बुलढाना, वासिम और वर्धा) के लिए डिक्लेयर किया, जहां आत्महत्याएं ज्यादा होती हैं। लेकिन उसका अमल जिस तरीके से होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। हम उसके साक्षी हैं, हम उस इलाके से आते हैं। उस इलाके के लोक-प्रतिनिधि होने के नाते जब हम देखते हैं तो उसमें वहां बहुत सा गैर-व्यवहार हुआ है। जो बैकलॉग सिंचन के लिए 2177 करोड़ रुपये दिये गये थे, उसका अमल भी मुझे कहीं दिखाई नहीं दिया। सरकार जुलाई, 2006 में एक पैकेज डिक्लेयर कर चुकी थी, प्रधानमंत्री जी ने वह किया था, लेकिन उस पर जो अमल होना चाहिए था, दुर्भाग्य से गये महीने में हर तहसील के लिए एक हजार कुंए खोदने के लिए एलान किया और फर्स्ट इंस्टालमेंट10 हजार रुपये का कब दिया, जून के पहले हफ्ते में। जब इस सरकार को पता है कि जून में बारिश शुरू होती है, अगर दस हजार रुपये हम उनको दे देंगे तो वह कुंआ नहीं खोदेगा। अगर खोदेगा तो बारिश में वह फिर बुझ जाएगा और फिर दूसरा इंस्टालमेंट मांगेगा तो हम नहीं देंगे, क्योंकि पहला दस हजार उसके काम में नहीं आया है। अगर वह बैंक में रखेगा और बारिश के बाद कुंआ खोदने का विचार करेगा तो क्या होगा, घर में तो हर दिन जरूरत होती है तो बैंक से वह पैसा निकालेगा, खर्च करेगा, फिर सरकार बोलेगी कि आपने खर्चा नहीं किया है, पहले वह खर्चा करो, फिर दूसरी इंस्टालमेंट मिलेगी।

      अगर मैं ऐसा बोलूं कि यह सरकार आने वाले असेम्बली के चुनाव सामने रखकर हमारे किसान भाईयों के साथ खिलवाड़ कर रही है तो गलत नहीं होगा। आपने दो साल तक पैसा क्यों नहीं दिया, प्रधानमंत्री पैकेज से पैसा मिला था तो यह जो कुंआ खोदने के लिए हर साल पैसा देना चाहिए था तो दो साल तक क्यों नहीं दिया? अभी एकदम दिया, इसलिए कि असेम्बली के अक्टूबर में चुनाव आने वाले हैं। किसान भाईयों को लगना भी चाहिए कि हमें 10 हजार रुपये सरकार ने दिये, बाकी पैसा भी मिलेगा। यह चुनाव के टाइम में बता भी देंगे कि हमने आपको दस हजार रुपये दिये हें, बाकी अगर 90 हजार चाहिए तो हमें चुनकर भेज दो।

      लोड शेडिंग की बात भी है। इसके कारण अगर किसी के खेत में कुंआ भी है तो वह बिजली नहीं होने के कारण खेती को पानी नहीं दे सकता है, फसल नहीं ले सकता है। यानि हर तरीके से मुसीबत है और इस साल तो डेढ़ महीने मानसून का पीरियड हो चुका था, बाद में थोड़ी बारिश आई तो आज किसान भाईयों ने अपने खेत में बोया तो है, फसल थोड़ी-थोड़ी आई भी है, लेकिन फिर कोई संभावना बारिश की नहीं लग रही है कि बारिश आएगी या नहीं आएगी। इसलिए विदर्भ का प्रतिनिधि होने के नाते मैं कहना चाहता हूं कि यह हमारा सौभाग्य है कि कृषि मंत्री जी हमारे महाराष्ट्र के ही नहीं, हमारे होम डिस्ट्रिक्ट सतारा के हैं। हम पांच लोग सतारा के हैं। इस बारे में सतारा बहुत एग्रेसिव है, उसका नाम हिस्ट्री में आता है। मतलब यह है कि कोई विदर्भ की ओर अगर कृपा-दृष्टि रखे तो काम चल सकता है। मुझे उम्मीद है कि हमारे कृषि मंत्री माननीय शरद पवार जी ही कृपा-दृष्टि रख सकते हैं। विदर्भ के लिए और भी अलग पैकेज की बात हो सकती है। जो पैकेज दिया था, उस पर भी अमल नहीं हुआ, उसमें भी संशोधन करना जरूरी है, ऐसा मुझे लग रहा है।

16.00 hrs वे3,750 करोड़ रूपए कहां गए? उनमें से 2,177 करोड़ रूपए जो सिंचन व्यवस्था के लिए दिए, उस पर इतनी देरी से अमल क्यों शुरू हुआ? अगर हमारे किसान भाइयों की आत्महत्या रोकनी है, तो उनको खेती के लिए 12 महीने पानी मिलना चाहिए।वहां छोटे-बड़े, जो भी डैम होने जरूरी हों, वे बनने चाहिए। कुएं के लिए पैसे का केवल ऐलान किया गया है, वह पैसा उनको मिलना चाहिए। हर खेत में कुंआ खोदा जाएगा, तो खेती के ऊपर उसका जो पूरा परिवार निर्भर है, वह सुखी हो जाएगा।जो कर्ज हमेशा उसके ऊपर होता है, वह कम होने के कारण, आत्महत्या करने को प्रवृत्त नहीं होगा।

      महोदय, यह मेरी आपसे दरख्वास्त है और मुझे उम्मीद है कि हमारे कृषि मंत्री जरूर इस बारे में सोचेंगे और कोई नया पैकेज विदर्भ के लिए ऐलान करने का प्रयास करेंगे।

DR. M. THAMBIDURAI (KARUR): Respected Deputy-Speaker, Sir, on behalf of AIADMK, I am thankful to you for giving me this opportunity to participate in the discussion on the situation arising out of drought and floods in various parts of the country.

16.02 hrs                     (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair)             This is an issue of critical National importance as this concerns crores of people of our country. We find that some States like Maharashtra, Gujarat, Kerala and Orissa are flooded with water, and some other States like Tamil Nadu, Andhra Pradesh, Puducherry and some Northern States are facing drought.

            We find that majority of the population depends on agriculture. At the same time, agriculture also depends on monsoon, and when monsoon fails, the agriculture also fails in India. Nearly, 70 per cent of the cultivable area depends on monsoon. Therefore, when monsoon fails, the whole agriculture also gets affected. The farmers in most parts of India, especially, in Tamil Nadu start the agricultural operations anticipating good rain and monsoon. They spend a lot of money in sowing and other cultivation-activities, but what is happening now? India is facing a monsoon failure, and as a result of this the farmers are facing a lot of problems. It is because they have lost their investment.

            The hon. Agriculture Minister -- while replying to the debate on the Demand for Grants for the Ministry of Agriculture -- had admitted that the monsoon situation is very grave and serious. He had also announced that the interest on farm loans would be reduced to six per cent if the farmers repay the loans on time. This is not enough. The Government should have a very well thought-out backup plan in case the monsoon fails, and the Government need not wait till the situation becomes worse. It should have a contingency plan to counter the situation and meet the challenges.

            Today, the farmers are in a state of total frustration, and they are waiting for some succor from the Government. The farmers need a uniform crop insurance policy. Some crops are insured at premium-level, and some other crops are insured at some other premium-level. This will affect the farmers, and they are not in favour of this. Hence, we have to give protection to the farmers by giving a farmers insurance and security package. The previous AIADMK Government in Tamil Nadu -- under Dr. Puratchi Thalaivi J. Jayalalitha -- had implemented such a package known as Uzhavar Paathukappu Thittam. The same should be introduced at the National-level. Further, they also need to give quality seeds free at their doorsteps; free fertilizers should be distributed to them; and there is an urgent need for interest-free loans to save them so that they can save us and save the country also.

            Lack of drinking water is a very important problem in Tamil Nadu and also in other parts of our country.  Lack of drinking water has become a major problem not only in the villages of Tamil Nadu, but also in urban areas and towns. Drinking water is being supplied to the people only once in 15 days or 20 days in most parts of Tamil Nadu, which too is not hygienic. Whatever rivers we have are all polluted not only by industries, but also by poor drainage system. So, we do not have water either for irrigation or drinking purpose. The problem needs to be addressed forthwith by giving it top priority.

            Today, we have seen in the newspaper wherein it has been reported that the Meteorological Department has monitored seven rice-producing States of India and found that there is scanty or deficient rainfall in those States. This would severely hit the prospects of Kharif production. Those seven States account for 50 per cent of the country’s rice production. Due to the drought condition, there is a shortage of production of food grains. This shortage leads to an increase in prices.

            Yesterday, while replying to the debate on the Finance Bill, the hon. Finance Minister said that he would give a stimulus package to agriculture sector. But without production of food grains, pumping money into agriculture sector will not serve the purpose.

The country does not have sufficient infrastructure to save rainwater. There is an urgent need to take water conservation measures. Very little effort is put for conserving water. Whenever there is excess rain, it floods a particular area, pours into a river and then into the ocean. Water table in the country should be raised systematically and substantially through rainwater harvesting, and proper channelizing of flood waters. Rainwater Harvesting Project introduced by hon. Amma Jayalalithaa in Tamil Nadu was a resounding success, and that model should be replicated nationally.

Another point that is gaining ground in the last three years is about interlinking of rivers. This would solve the problem of recurrence of floods and drought in our country. There should be a time-bound action plan for interlinking all inter-State rivers and also intra-linking of rivers within States. In this connection, I would say that dredging and deepening of all rivers, water bodies should be taken up first, before attempting to interlink the rivers. This would ensure optimal retention of water in the water bodies and artificial floods will not cause havoc.

            I find that for the Cauvery-Vaigai Link Project in the Peninsular Rivers Development Component, the feasibility report had been completed. I will request that this may be taken up on priority and completed early so that the whole of Tamil Nadu benefits from this.

            There are large-scale disputes concerning sharing of river waters. I would like to say that these disputes can be solved by negotiations and also by implementing the direction of the Supreme Court. I will like to draw the attention of the Government to the agony of the people of Tamil Nadu where most of the lakes and small reservoirs have dried up. There is acute shortage of water; people do not have water for drinking purpose, needless to talk about water for irrigation.

            Tamil Nadu is dependent on the waters of Cauvery River. However, Karnataka releases the water only when all their reservoirs are full to the brim and when there is imminent danger to the lives and properties of the people of Karnataka. Therefore, I will request the Central Government to direct the Karnataka Government to release waters of Kabini and Krishna Raja Sagar regularly which will help the people of Tamil Nadu.

            We are having another problem relating to drinking water. Hogenakkal Project is still pending because of Karnataka Government’s interference, and the State Government of Tamil Nadu is not in a position to implement it. Therefore, I will request the Central Government to direct the Karnataka Government not to interfere in implementing the Hogenakkal Project because it helps the people in districts like Krishnagiri, Dharmapuri and Vellore.

            Concerning Andhra Pradesh, one hon. Member has already mentioned that they are constructing a dam on Palar River. This causes drinking water problem in our State. Therefore, I will request the Central Government to direct the Andhra Pradesh Government not to construct a dam on the Palar River.

            Finally, I want to say that when we are spending crores of rupees on flood relief and drought relief, if we spend that money somewhat early to prevent these kinds of things, definitely, our country will prosper.

Therefore, I would request the Central Government to take precautionary measures to avoid this kind of drought and flood condition.  That will help prosperity of our country.

*At the very outset, I would like to thank you for giving me an opportunity participate in a very important discussion on drought in some parts of the country and floods in some other parts. This is an issue of critical national importance. This concerns crores of people of our country.

            Some parts of the country are submerged in water and some other parts are crying out for water. We find that States like Maharashtra, Gujarat and Orissa are now flooded with water, while many other States like Tamil Nadu, Puducherry are facing drought situation.

 

*……….* This part of the speech was laid on the Table.

 

            Majority of our population depends on agriculture; with slight stress on agriculture, the well-being of our people is impacted disproportionately. The performance of Indian agriculture largely depends on the mercy of the ‘Rain God’. Lack of rain leaves thousands of hectares of land ‘barren’. 70% India’s cultivable land is rain-fed, and hence, I would say that agriculture has always been a ‘gamble with monsoon’. At the same time, a substantial portion of our cultivable land depends on irrigation, which is again dependent on river waters.

            Anticipating good rains and a fiar monsoon, in Tamil Nadu especially, the farmers started the agricultural operations like sowing seeds, etc. but due to failure of monsoon, the farmers suffered heavy loss of their investment. It is because of this uncertainty of future, that the farmers commit suicide in large numbers. Farmers’ suicides are primarily the by-product of a losing economy.

            While replying to the debate on the Demands for Grants of the Ministry of Agriculture, Hon’ble Minister has admitted that the interest on farm loans would be reduced to 6%, if the farmers repay loans on time. It is not enough. The Govt. should have a very-well-thought-out back-up plan, if monsoon fails. The Govt. need not wait till the situation becomes worse and it should have a contingency plan to counter the situation and to meet the challenges.

            The farmers are today in total frustration and are waiting for some succor from the Govt. The farmers need a ‘uniform crop insurance policy’. Some crops are insured at some premium while some other crops are insured at some other premium. If farmers have a uniform rate of crop insurance, it would benefit them.

            Farmers’ insurance and security package, known as Uzhavar Paathukappu Tittam, implemented by the previous AIADMK Govt. in Tamil Nadu under Dr. Puratchi Thalaivi Hon’ble Amma J Jayalalithaa should be introduced at the national level. They also need to be given quality seeds free at their doorsteps, free fertilizer should be distributed to them and there is an urgent need for interest-free loans, to save them so that they save us and save the country.

            Drinking water is a very important problem and Tamil Nadu is no exception to this. When there is no rain, there is no question of water for irrigation purposes, leave alone for drinking purposes. Drinking water is becoming a major problem not only in the villages of Tamil Nadu, but also in urban areas and towns. Drinking water is being supplied to people only once in 15-20 days in most parts of Tamil Nadu, and that is also not hygienic waster. Whatever rivers we have, are polluted by not only industries, but also by the poor drainage system. So, we do not have water either for irrigation or for drinking purposes. This problem needs to be given priority and addressed forthwith.

            Due to the drought conditions, there is shortage of production of crops and food grains. This shortage leads to increase in prices. Yesterday while passing the Finance Bill, Hon’ble Finance Minister said that he would give stimulus package for agriculture. But without production of food grains, pumping money into agriculture sector will not serve the purpose. On the one hand, there is already an unprecedented fiscal deficit this year; and on the other hand, we have the problem of counterfeit, fake currencies that are being pumped into our economy by anti-social elements. Fake currencies are being smuggled into our country and are in circulation in large numbers. This will lead to further deficit; and this problem needs the urgent attention of the Govt.

            The country does not have sufficient infrastructure to save rain water. There is an urgent need to take water conservation measures. Very little effort is put for conserving water. Whenever there is excess rain, it floods a particular area; mixes with river water and joins the ocean. It does not help in raising the water table in the country. Water table in the country should be raised systematically and substantially through rain-water harvesting and proper chanellising of flood waters. Rainwater Harvesting Project introduced by Hon’ble Amma J Jayalalithaa in Tamil Nadu is a resounding success; and that model should be replicated nationally.

            Another point that is gaining ground over the last few years is the inter-linking of rivers. This would solve the problems of recurrence of floods and droughts in our country. There should be a time-bound action plan for interlinking of all inter-State rivers and also intra-linking of rivers within States. In this connection, I would say that dredging and deepening of all rivers, water-bodies should be taken up first, before attempting to inter-link rivers. This would ensure optimum retention of water in the water-bodies and will not cause havoc by artificial floods. I find that for the Cauvery – Vaigai Link Project, on the Peninsular River Component, the Feasibility Report is completed. I request that this may be taken up on priority and completed early so that the whole of Tamil Nadu benefits from this.

            There are large scale disputes regarding sharing of waters of rivers. I would like to say that the disputes regarding water-sharing should be solved by initiating mutual dialogue and by ensuring the directives of the Supreme Court in this regard.

            Here, I would like to draw the attention of the Govt. to the agony of the people of Tamil Nadu. Most of the lakes and small reservoirs in Tamil Nadu had dried up. There is acute shortage of water. People do not have ‘water for drinking purposes’, needless to talk about ‘waster for irrigation purposes’. Tamil Nadu is dependent on the wasters of Cauvery River. Karnataka releases water only when all its reservoirs are full to the brim and when there is imminent danger to the lives and properties of people of Karnataka. This situation needs to be corrected immediately. The Govt. of India should direct the Govt. of Karnataka to release water from Kabini and Krishna Raja Sahar Reservoirs into Cauvery River so that water flows into Tamil Nadu. This alone would cater to the needs of the people for drinking and irrigational purposes.

            Like rubbing salt to the injury, now we have a situation whereby the Govt. of Andhra Pradesh illegally started constructing a dam on Palar River. This will adversely affect the drinking-water-needs of the people of Tamil Nadu. The Central Govt. should immediately direct the Govt. of Andhra Pradesh to stop construction of the dam.

            We are living in an electronic era and we have technologies for prediction. Though we cannot anticipate everything, we can use technology at least for predicting floods or droughts. There should be a scientific approach towards the natural calamities and we have to make use of technology and tackle the situation on the ground. I would say that India should use technology for monsoon prediction at the district level so that the farmers are helped and benefited.

            Finally, if one sees the amount of money spent by the Govt. of India every year, on ‘drought relief and flood relief measures’, it would be a phenomenal amount. If we divert this amount of money at least once, for taking precautionary measures, that would be great opportunity for us. If we do something concrete on this, I am sure, the country would move forward, without the perennial problem of floods and droughts. In the process of doing it, we can probably help create new opportunities on irrigation and new opportunities on power generation, which is the need of the hour.

            I hope that the Govt. would address these problems with all seriousness and come out with some concrete action plan to deal with the situation.

श्री निशिकांत दुबे (गोड्डा): सभापति महोदय, मैं झारखंड का सांसद होने के नाते सूखे के बारे में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। जब बिहार से झारखंड अलग हुआ, तो पूरे देश ने आदिवासी के नाम पर एकजुटता दिखाई और कहा कि झारखंड में विकास नहीं हो रहा है। यह बहुत अच्छा लगा कि कम से कम यह देश आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों की बात कर रहा है।झारखंड के बंटवारे के बाद वहां सन् 2000 से 2009 तक जितने भी चीफ मिनिस्टर हुए, वे सब आदिवासी थे। इसका मतलब यह था कि सारी पोलीटिकल पार्टीज़ में एक यूनिटी थी, एकजुटता थी कि यदि एक राज्य आदिवासी के नाम पर बना है तो मुख्य मंत्री भी आदिवासी ही बनना चाहिए और सारी पोलीटिकल पार्टीज़ ने उस बात को पूरा किया।आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सन् 2000 से 2009 तक, माननीय गृह मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं, वहां पंचायत का चुनाव नहीं हुआ है। पंचायत का चुनाव इसलिए नहीं हुआ कि वह भी आदिवासी के नाम पर है कि रिजर्वेशन कितने प्रतिशत दिया जाए। उसमें जनरल सीट कितनी होगी, आदिवासी की सीट कितनी होगी। चूंकि पंचायत का चुनाव नहीं हुआ है, तो यह भी अच्छा लग रहा है कि कम से कम आदिवासियों के अधिकार के लिए लड़ाई हो रही है। देश भर के जो सांसद चुनकर आए हैं, वे सब डीलिमिटेशन के कारण चुनकर आए हैं। सब जगह डीलिमिटेशन हो गया है, लेकिन झारखंड में डीलिमिटेशन नहीं हुआ है। उसका कारण भी एक आदिवासी है, क्योंकि आदिवासियों की सीट कम हो रही थी, इसलिए पूरे देश ने एकजुटता दिखाई, पूरे देश में डीलिमिटेशन हो गया, केवल झारखंड में डीलिमिटेशन नहीं हुआ। उसके साथ जम्मू कश्मीरऔर नार्थ ईस्ट के कुछ प्रदेश बचे हुए हैं।

      महोदय, जब मैं बाहर बैठता था,तो कांग्रेस पार्टी के महासचिव दलित की बस्ती में जाते थे। हमें यह देखकर अच्छा लगता था। नरेगा में वे मजदूरी करते हुए नजर आते थे, अच्छा लगता था।...( व्यवधान)

श्री जे.एम.आरुन रशीद (थेनी):  आप सब्जैक्ट पर बोलिये।...( व्यवधान)

श्री निशिकांत दुबे : आप सुनिये। मैं सब्जैक्ट पर ही बात कर रहा हूं। ...( व्यवधान) मैं आपसे पूछकर बात नहीं करूंगा। आप मुझे बोलने दीजिए। ...( व्यवधान) गरीबी हटाओ और आम आदमीका नारा कांग्रेस पार्टी का था। जब मैं सांसद बना, तो मेरे यहां ड्रिंकिंग वाटर का एक ही मुद्दा था। मैंने 2 जून को सबसे पहली चिट्ठी प्रधान मंत्री को लिखी। मैं संथाल परगना से जीतकर आता हूं। यदि मेरे यहां...( व्यवधान) यह ड्राउट से जुड़ा हुआ मुद्दा है। ...( व्यवधान) यदि ड्रिंकिंग वाटर हमारे क्षेत्र में नहीं दिया गया, तो आगे आने वाले पांच साल में हमारे क्षेत्र के लोग, संथाल परगना और छोटा नागपुर के लोग पीने के पानी के बिना मर जायेंगे। मैंने यह चिट्ठी 2 जून को लिखी थी। प्रधान मंत्री का एक रटा-रटाया जवाब आया कि आपकापत्र आया है। इसके बाद यह ड्राउट पड़ा है। जब मैंने2 जून को मैंने यह चिट्ठी लिखी थी, तो उस वक्त यह मतलब नहीं था कि ड्राउट पड़ेगा, लेकिन आज ड्राउट पड़ा है। मेरे क्षेत्र की क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। आपके यहां मैंने एक प्रश्न पूछा, तो एक्सीलेरेटेड वाटर इरीगेशन प्रौजेक्ट में से उस पत्र का जवाब आया। कुछ मेजर्स प्रौजेक्ट झारखंड में भी चल रहे हैं। वे प्रौजेक्ट सुबर्ण रेखा, अजय बराज, पुनासीऔर बटेश्वर स्थान के हैं। ये बड़े प्रौजेक्ट हैं। कुछ छोटे प्रोजैक्ट सुन्दर जलाशय, त्रिवेणी और त्रिगुट पहाड़ के हैं। ये सारे प्रौजेक्ट पिछले 25 साल से चल रहे हैं, जो आज तक पूरे नहीं हुए।मैं ड्रिंकिंग वाटर की बात करता हूं, तो ड्रिंकिंग वाटर नहीं है। मैं वाटर मैनेजमैंट की बात करता हूं, तो वाटर मैनेजमैंट नहीं है। मेरे क्षेत्र की स्थिति क्या होगी, इसका केवल एक बानगी मैं बता रहा हूं। मेरे पास सरकार की एक रिपोर्ट है। यहां पर माननीय गृह मंत्री जी बैठे हुए हैं। झारखंड में राष्ट्रपति शासन है। वह रिपोर्ट कहती है कि पांच लाख हैक्टैयर क्षेत्र में जो खेती होने वाली थी, वह इस बार केवल दस हजार हैक्टेयर क्षेत्र में ही खेती हो सकती है।यह सरकारी रिपोर्ट है, जिसके पेपर्स मेरे पास है। वही रिपोर्ट आगे कह रही है कि बारिश न होने के कारण दैनिक तापमान उच्च हो रहा है, धूप अत्यंत प्रबल है। इस कारण न सिर्फ फसल, स्थानीय वनस्पति एवं आम जन-जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है।

      उन्होंने तुलना की है कि चावल जो पहले 1100 रूपए प्रति क्विंटल मिल रहा था, अब 1400 रूपए प्रति क्विंटल पर मिल रहा है, गेहूं जो पहले 900 रूपए प्रति क्विंटल मिल रहा था, अब 1100 रूपए प्रति क्विंटल पर मिल रहा है, अरहर की दाल पहले 5000 रूपए प्रति क्विंटल मिल रही थी, अब 8000 रूपए प्रति क्विंटल पर मिल रही है, खेसाड़ी दाल जो पहले 1400 रूपए प्रति क्विंटल मिल रही थी, अब 1800 रूपए प्रति क्विंटल पर मिल रही है, आलू जो पहले 10 रूपए प्रति किलोग्राम मिल रहा था, अब 18 रूपए प्रति किलोग्राम मिल रहा है और गुड़ जो पहले 2000 रूपए प्रति क्विंटल मिल रहा था, अब 3500 रूपए प्रति क्विंटल पर मिल रहा है। इससे आप समझ सकते हैं कि आम लोगों की क्या स्थिति होगी। जिसके पास पीने का पानी नहीं है, भोजन के लिए पैसे नहीं हैं, जो काम नहीं कर पा रहे हैं, उनकी हालत आप समझ सकते हैं। यह सरकारी रिपोर्ट है, यह मेरी रिपोर्ट नहीं है। यह जिलाधिकारी ने, एग्रीकल्चर के डायरेक्टर ने राज्यपाल को रिपोर्ट भेजी है, उसको सूखाग्रस्त घोषित करने के लिए, यह उनकी रिपोर्ट है। इसमें वह कह रहे हैं कि ऐसी भौगोलिक स्थिति होने के कारण, झारखण्ड की स्थिति यह है कि हमने नरेगा के तहत तालाब खुदवाए हैं, जलकुण्ड बनवाएं हैं, लेकिन वर्षा एवं जल संचयन का उपयोग नहीं करने के कारण वहां कुएं, तालाब, जलकुण्ड एवं अन्य जल-स्रोतों के जलस्तर में तीव्र गिरावट आ रही है। इससे कृषि एवं दैनिक कार्यों के लिए जल की कमी के साथ-साथ पेयजल की भी समस्या उत्पन्न हो रही है। माननीय वित्त मंत्री जी को यह पता था कि ड्राउट होने वाला है, लेकिन इसके लिए एक भी पैसा उन्होंने नहीं कहा है कि झारखण्ड को दिया जाएगा। झारखण्ड बहुत बुरी स्थिति में है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि 22 नवंबर,1983 को, जब-जब वह वित्त मंत्री बनते हैं, पता नहीं क्या भाग्य में है उस साल सूखा पड़ता है, 1982 में भी सूखा पड़ा और1983 में भी सूखा पड़ा, ड्राउट की ही चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था, जिसे मैं यहां कोट करता हूं:

 “Drought did not have effect only on farmers and agricultural commodities. As I mentioned on an earlier occasion, the major industrial States depend totally on the hydel sources of electricity. When there is no adequate rain, it affects not only our agricultural production; it creates a problem for manufacturing activities also.”   इसका मतलब यह है कि ड्राउट केवल झारखण्ड के गरीबों, किसानों, दलितों, पिछड़ों को ही नहीं खत्म कर रही है, यह इंडस्ट्री को खत्म कर रही है, इलेक्ट्रिसिटी खत्म हो रही है। इसलिए जब तक सरकार इसको राष्ट्रीय आपदा नहीं घोषित करती है, झारखण्ड का भला नहीं होने वाला है, इस देश का भला नहीं होने वाला है। कांग्रेस पार्टी की ओर से माननीय सदस्या ने कहा सांसदों को अपने-अपने क्षेत्र में चले जाना चाहिए। हममें से दो-चार सांसद होंगे जो मैनेज कर लेंगे, गरीबों के बारे में देख लेंगे, लेकिन मैक्सिमम जो सांसद यहां चुनकर आए हैं, वे गरीबों, पिछड़ों की बात करने आए हैं, उनकी पॉकेट में इतना पैसा नहीं है कि वे गरीबों को पैसा दे सकें। यहां पैसे की आवश्यकता है, उनको खाना देना है, भूखे-नंगे लोगों को कपड़े देने का सवाल है, इसीलिए मेरा इतना ही कहना है कि यहां आदरणीय कृषि मंत्री जी है, आदरणीय गृह मंत्री जी बैठे हैं और भारत सरकार के अन्य मंत्रीगण बैठे हुए हैं, झारखण्ड में इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कीजिए, झारखण्ड में पैसा दीजिए। यदि आप गरीबों और आदिवासियों के कल्याण की बात करते हैं तो गरीबों और आदिवासियों के कल्याण की सचमुच बात कीजिए और सिंचाई के जितने भी प्रोजेक्ट्स पच्चीस-पच्चीस साल से रूके पड़े हैं, उनको पूरा करने की बात कीजिए। खासकर मैंने जो पत्र प्रधानमंत्री जी को लिखा है कि मेरे क्षेत्र में पेयजल की सुविधा नहीं है, गरीब मर रहे हैं, आदिवासी मर रहे हैं, उनके जनकल्याण के लिए प्रयास कीजिए।
      इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
   
डॉ. चरण दास महन्त(कोरबा): सभापति महोदय, देश के विभिन्न भागों में सूखे की स्थिति है, इस पर चर्चा करने के लिए आपने मुझे जो समय दिया है, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं।
      महोदय, इस देश में चाहे सूखे पड़े या अतिवृष्टि हो, मैं मानता हूं कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसका नुकसान सिर्फ किसान को उठाना पड़ता है। उसका परिणाम यह होता है कि किसान की फसल नष्ट हो जाती है, उसकी व्यक्तिगत आय भी खत्म हो जाती है और उसे नुकसान होता है। इसलिए मैं कृषि मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि सूखे या अतिवृष्टि के बाद जितनी भी राहत योजनाएं आप बनाते हैं, समाज को, गांव को और क्षेत्र को देख कर बनाते हैं। लेकिन व्यक्तिगत किसान को जो नुकसान होता है या किसानों की आय में जो कमी होती है, उसे सब्सिडाइज करने के लिए हम कोई योजना नहीं बना पाए हैं। इसलिए जहां भी सूखा हो या अतिवृष्टि हो, पानी ज्यादा बरसे तो किसान की व्यक्तिगत आय को भी ध्यान में रख कर योजना बनानी चाहिए, जिससे उसकी आय सुरक्षित हो सके। मैं उम्मीद करता हूं कि कृषि मंत्री जी इस पर विचार करेंगे।
      आज सूखे के आकलन के लिए दो-तीन व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें बदलने की जरूरत है। एक तो यह होता है कि लगातार खरीफ के मौसम में यह देखा जाता है कि अगर50 प्रतिशत वर्षा नहीं हुई तो उस स्थान को सूखा मान लिया जाता है। जहां मेटिरियोलॉजीकल सब-डिवीजन है, वहां पर यदि25 प्रतिशत वर्षा आंकी जाती है तो उस जगह को सूखाग्रस्त मान लिया जाता है, चाहे मशीन खराब हो या अच्छी हो। तीसरी व्यवस्था राजस्व विभाग की यह है कि जब फसल खेत में खड़ी हो जाती है, तो वहां आनावारी रिपोर्ट लेने के लिए पटवारी जाता है और खड़ी फसल को देखकर तय किया जाता है कि यहां सूखा पड़ा है या नहीं। इसलिए मैं निवेदन करूंगा कि ये व्यवस्थाएं बहुत पुरानी हो गई हैं, इनसे किसान को लाभ नहीं मिल रहा है, कोई नई सोच मंत्री जी को अपनानी चाहिए।
      देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के असफल होने के कारण जहां-जहां भी धान की फसल होती है, वहां आज लगभग सूखे की स्थिति है। मैं अपने राज्य छत्तीसगढ़ की बात करना चाहता हूं। हमारे यहां हजारों किस्म के धान बोए जाते हैं और उनके पकने का समय भी अलग-अलग है। किसी का 85 से 90 दिन है, किसी का 90 से 100 दिन है तो किसी का 100 से 115 दिन है। इन्हें लगातार हर हफ्ते पानी चाहिए। जिस हफ्ते पानी नहीं मिलता, तो इन्हें नुकसान होता है। आजकल फसलों के नुकसान का जो निर्धारण किया जाता है, वह जिले को या तहसील को केन्द्र मानकर किया जाता है, जिस वजह से किसान को पूरा मुआवजा नहीं मिल पाता है। फसल या सूखे का आकलन प्रत्येक पंचायतवार किया जाना चाहिए, तभी हम किसानों को लाभ दे पाएंगे, ऐसा मेरा कृषि मंत्री जी से सुझाव है।
      हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में रायगढ़, कोरीया, दंतेवाड़ा, जसपुर, कोरबा, सरगुजा, सूखे से प्रभावित इलाके हैं और आज भी सूखे से ग्रसित हैं। कोरिया जिले में मात्र 15 प्रतिशत की बुवाई हुई है। अगर आज पानी बरस भी जाता है तो 20 प्रतिशत से ज्यादा बुवाई नहीं होगी। वहां पर भूजल स्तर नीचे जा रहा है और उसकी कमी भी हो रही है, जिस कारण हैंड पम्प भी पर्याप्त रूप से काम नहीं कर पा रहे हैं। मेरा सुझाव है कि देश में ऐसे जितने भी जिले हैं, वहां प्रत्येक ब्लाक में तत्काल हैंडपम्प्स लगाने चाहिए।
      इसके अलावा मैं एक बात और कहना चाहता हूं। आज पीडीएस में जो कालाबाजारी है, उसे रोकने और खाद्य की माकूल व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को निर्देश दिए जाएं। केन्द्र सरकार द्वारा नरेगा योजना शुरू की गई है, यह एक प्रकार से गरीब लोगों के लिए जीवनदायिनी है। उसका पूरा उपयोग किसानों की जमीन को सिंचित करने की दिशा में भी होना चाहिए। चाहे आप एनीकट्स बनाएं या छोटे-छोटे तालाब इस योजना के तहत बनवा सकते हैं। सरकार को चाहिए कि वह किसानों को ज्यादा से ज्यादा सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराए, जिससे किसान वर्षा पर निर्भर न होकर आने वाले दिनों में इनसे अपने खेतों में सिंचाई कर सकें। आज लगभग80 प्रतिशत किसान मार्जिनल या छोटे वर्ग के हैं। अगर उन्हें हम उचित व्यवस्था नहीं देंगे तो उनका भला नहीं हो पाएगा। उनके साथ एक मजबूरी यह भी है कि वे कहीं बाहर कमाने के लिए भी नहीं जा सकते। वे लोग वहीं पर जीते हैं और वहीं पर मरते हैं। ऐसे किसानों के लिए आप कोई न कोई उचित व्यवस्था करेंगे, ऐसा मैं मानता हूं।
            मैं इस बात के लिए माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने 9 राज्यों के सचिवों की बैठक की और 1200 करोड़ रुपये उन्हें कार्य आरम्भ करने के लिए सौंपे हैं। मेरा आग्रह है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के लिए जो 8 हजार करोड़ रुपये दिये गये, उसका समुचित लाभ किसानों को मिले, ऐसा वह निर्देशित करें। मैं चाहूंगा कि देश के गरीब किसानों का उत्पादन बढ़े और उसे सम्मान से जीने का अवसर मिले। इसी के साथ मैं कहना चाहता हूं कि पर्यावरण में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उसके लिए आप और हम सभी दो­ााळ हैं। हम सभी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि फसल तो नष्ट हो रही है लेकिन जो जमीन है, उसमें पौधे हैं, वहां जीने वाले पशु-पक्षी हैं, उनकी रक्षा हम किसी तरह से कर सकें, तो यह इस देश के लिए अच्छा कदम होगा।
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, many more speakers are there.  I request all of you to kindly restrict your speech to five minutes.
*m13 श्री बृजभूषण शरण सिंह (कैसरगंज): हमारे लिए पांच मिनट्स ही बहुत हैं। माननीय अध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने के लिए मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। इस सत्र के आखिरी समय में हम सूखे पर चर्चा कर रहे हैं। इस चर्चा से देश के किसानों को कितना लाभ होगा, यह तो हम नहीं कह सकते, लेकिन गोस्वामी तुलसी दास जी ने एक चौपाई लिखी थी कि “ समय चूक पुनि का पछताने, का बरखा जब कृषि सुखाने” । आज ठीक उसी परम्परा का हम भी निर्वाह कर रहे हैं। हमारे यहां आग लगने के बाद कुआं खोदने की परम्परा है। आज हम उसी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं। यही कारण है कि 62 वर्षों के बाद भी देश का 60 प्रतिशत किसान मानसून पर निर्भर है। हम आप पर आरोप लगाना नहीं चाहते हैं और न ही किसी और पर आरोप लगाना चाहते हैं। लेकिन इस विषय पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना ध्यान नहीं दिया गया।
      मान्यवर, यह सूखा नहीं है, यह प्रकृति की चेतावनी है, प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है। नदियों को जोड़ने की योजना का क्या हुआ? हमारे यहां जल की कमी नहीं है, नदी-नालों से हमारा देश पटा हुआ है। हमारा यही कहना है कि जल-प्रबंधन पर हमें विशे­ष ध्यान देना चाहिए क्योंकि हमारा बहुत सा पानी बर्बाद होकर समुद्र में चला जाता है।
      मान्यवर, यह जो प्रकृति के साथ हमने छेड़छाड़ की है, उससे जो हमारा पर्यावरण असंतुलित हुआ है, वह भी एक बड़ा कारण है। अभी पेड़ों की कटाई की बात हो रही थी। हमारे उत्तर प्रदेश के अंदर कानून है कि अगर एक हैक्टेयर खेत के अंदर 50 पेड़ लगे हों, तो उसे वन-क्षेत्र घो­िात कर दिया जाता है। मान्यवर, जो सरकारी जंगल है या वन-विभाग है, उसके अलावा बहुत से पेड़-पौधे ऐसे हैं जो किसानों के हैं। एक बहुत बड़ी भागीदारी किसानों की है। आज किसान का पेड़ लगाने से मोहभंग हो गया है, क्योंकि एक पेड़ अगर किसान कटाना चाहता है और उस पेड़ की कीमत अगर 10 हजार रुपये है तो 2 हजार रुपये ही किसान को मिलते हैं।हमारे उत्तर प्रदेश के अंदर, कमीशन के रूप में, 40 प्रतिशत पैसा पुलिस लेती है। किसान सोचता है कि हम पेड़ क्यों लगाएं? हमारी बेटी की शादी हो, हमें पलंग बनवाना है।हमें कुर्सी बनवानी है, हमें शादी में देने के लिए कुछ सामान बनवाना है, अगर किसान पेड़ कटवा लेता है, तो उसे जेल जाना पड़ता है, इसलिए आज जो किसान व्यक्तिगत पेड़ लगाते थे, वे अब कहते हैं कि हमें पेड़ लगाकर जेल नहीं जाना है। एक किसान जब अपनी जरूरत के लिए पेड़ काटता है, तो उसे जेल जाना पड़ता है, अपमानित होना पड़ता है, लेकिन बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग, सरकार में बैठे लोग, अपनी निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए लखनऊ जैसे शहर में 10 हजार पेड़ कटवा देते हैं, नोएडा में छह हजार पेड़ कटवा देते हैं, तो उनके लिए क्या कानून है? देश में, राज्य में दो प्रकार का कानून नहीं चलना चाहिए। एक गरीब अपना पेड़ अपनी बेटी की शादी के लिए कटवाना चाहता है, तो उसे जेल जाना पड़ता है और 6-6 हजार पेड़, 10-10 हजार पेड़, लाखों पेड़ जब कटवा दिए जाते हैं, तो कोई कार्रवाई नहीं होती है। इसे रोकने के लिए भी कोई कानून होना चाहिए।
      मैं एक विषय की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। मंत्री जी ने किसानों को सब्सिडी देने की बात कही है। यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आप ऐसी योजना बनाइए, जिससे कि उसका लाभ सीधे किसान को मिले। हमारे उत्तर प्रदेश के अंदर खाद का जो तय भाव है, उससे दुगुने रेट से कम पर किसी किसान को खाद नहीं मिलती है। हमारे नेता श्री मुलायम सिंह जी बैठे हैं, इसलिए मैं चर्चा कर रहा हूं। नेपाल बार्डर से हम आते हैं। आप सब्सीडी हमें देते हैं, खाद हमें देते हैं, लेकिन वह खाद नेपाल चली जाती है। हमारे महाराज जी बैठे हैं। ये सीमा पर रहने वाले हैं। जिस खाद पर सब्सीडी देते हैं, वह नेपाल चली जाती है। इसी खाद की ब्लैक मार्केटिंग के बारे में समाजवादी पार्टी के नेता श्री पाटनदीन सिंह ने आवाज उठाई, उत्तर प्रदेश की पुलिस ने लाठी मार-मार कर पूरे परिवार को जेल में डाल दिया और गुंडा एक्ट लगा दिया। आप अधिकारियों के भरोसे मत रहिए, किसी राज्य सरकार के भरोसे मत रहिए। अगर आप किसान को लाभ देना चाहते हैं, तो सीधे किसानों को दीजिए।
      इन्हीं शब्दों के साथ अंत में मैं कहना चाहता हूं कि हमारी जो परियोजनाएं लम्बित हैं, उन्हें आप पूरा कीजिए।
श्री रमेश राठौर(आदिलाबाद): सभापति महोदय, मैं आंध्रप्रदेश से तेलगुदेशम पार्टी की तरफ से इस महत्वपूर्ण विषय पर हो रही चर्चा में भाग लेने के लिए खड़ा हुआ हूं। आज सूखे पर हम चर्चा कर रहे हैं, इस विषय से संबंधित कृषि मंत्री श्री शरद पवार हैं। ये काश्तकार के बेटे हैं और स्वयं भी काश्तकार हैं। मैं आंध्रप्रदेश की स्थिति के बारे में उन्हें बताना चाहता हूं। भारतवर्ष में किसान को अन्नदाता कहते हैं और हमारे राज्य में किसान की मजदूर बनने की परिस्थिति हो रही है। हमारे राज्य में गोदावरी के ऊपर प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1968 में एसआरएसपी प्रोजेक्ट प्रारम्भ किया था। आज दुःख होता है कि सोनिया गांधी जी के नेतृत्व में यूपीए सरकार के समय में आंध्र में सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। मैं इसलिए यह बात कहना चाहता हूं क्योंकि महाराष्ट्र में बाबली की वजह से 14 प्रोजेक्ट्स का काम शुरू है। राष्ट्र में कांग्रेस सरकार है और हमारे राज्य में भी कांग्रेस सरकार है। बाबली प्रोजेक्ट में...( व्यवधान) आपको मालूम नहीं है, आप लोग पांच साल सो गए। केंद्र की गुलामी में बात नहीं कहनी चाहिए। काश्ताकारों की परिस्थिति रोड पर आने की हो गई है।
      मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि बाबली में 14 सैक्टर बिठा दिये गये और सीडब्लयूसी क्लिअरेंस नहीं लेने के बाद केन्द्र सरकार ने आज तक उसे रोका नहीं है। हमने चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में यहां पर प्रधान मंत्री जी के यहां, राष्ट्रपति जी के यहां आकर धरना दिया, हैदराबाद में धरना दिया, हर जगह धरना दिया, मुख्य मंत्री को बताया लेकिन आज तक उसका कोई समाधान नहीं निकला। हाल में परसों सुप्रीम कोर्ट में जब केस आया तो वहां पर बाबली प्रोजेक्ट का जब काम हो गया, वैसे 14 प्रोजेक्टका काम चालू है तो सुप्रीम कोर्ट में हमारी राज्य सरकार ने4 सैक्टर बताए तो तेलगुदेशम के एडवोकेट वहां पर फोटो के साथ आए थे, उन्होंने पूरे 14 सैक्टर बताए। परसों नासिक में बड़ी बरसात होने के बाद वहां एसआरएसयू प्रोजेक्ट आने वाला था लेकिन आज तक एक बूंद पानी नहीं आया। अगर ऐसी ही वहां सूखाग्रस्त परिस्थिति रही तो वहां 20 लाख एकड़, 6 जिलों के काश्तकारों के पेट पर मार पड़ेगी और इसी तरह से कृष्णा नदी के ऊपर भी कर्नाटक में फिर प्रोजेक्ट का काम चालू है। इस तरह मैं माननीय मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहता हूं कि हमारे आध्र प्रदेश के किसानों को बचाओ और यह काम तुरंत बंद किया जाए और वहां के काश्तकार हमेशा सूखा न देखे, इसके लिए प्रबन्ध किया जाए। इसी के साथ इस वर्ष साधारण बारिश आपने देखी है, अभी तक 293 मिलीमीटर की बजाए 171 मिलीमीटर ही बरसात गिरी है। मैं मंत्री जी के ध्यान में यह बात भी लाना चाहता हूं कि वर्ष2006 में स्वामीनाथन कमीशन की रिकमेंडेशंस के हिसाब से अभी तक काश्तकारों को अपनी फसल का भाव भी नहीं मिल पा रहा है। उदाहरण के तौर पर आपने देखा है कि गत वर्ष जो ग्राउंडनट आध्र प्रदेश में 2008 में हुई, उसका इंश्योरेंस 730 करोड़ का अभी तक पेमेंट नहीं आया है। इस बारे में मंत्री जी क्या निर्णय ले रहे हैं? गत वर्ष का अभी तक नहीं आया तो सूखाग्रस्त का हाल क्या होगा?...( व्यवधान) उदाहरण के तौर पर...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Kindly wind up.
… (Interruptions)
श्री रमेश राठौर: सभापति जी, एक मिनट में मैं अपनी बात कहूंगा। मैं एक गिरिजन हूं। मैं आदिलाबाद जिला से आया हूं और आदिलाबाद जिला में गत वर्ष 2000 लोग मर चुके हैं, वर्ष2007 में2000 लोग मर चुके हैं और2008 में2000 लोग मरे और इस वर्ष150 लोग पीने के पानी की वजह से मरे। स्वयं यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी जी1998 में नारनौर गिरिजन प्रान्त में आकर देखा जब 3000 लोग मर चुके थे।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record later.
श्री रमेश राठौर: सभापति जी, मैं जानना चाहता हूं कि क्या इस देश में गिरिजनों को जीने का अधिकार नहीं है?...( व्यवधान) 62 साल आजादी को हो गये, क्या गिरिजनों को पीने का पानी तक नहीं मिल सकता है?...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: Hon. Members, no cross talk please. Nothing is going on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: Please sit down. Nothing is going on record.
(Interruptions) …*             Shri P. Lingam.
       
* Not recorded.
   
SHRI P. LINGAM* (TENKASI): Mr. Chairman, the House is now discussing the situation arising out of floods and drought in the country. On behalf of the Communist Party of India, I would like to put forth my views.
            At a time when we are anxious about the South-West Monsoon, this House has taken up this discussion. Though floods and drought are diametrically opposite, they are affecting us in cycles, one after the other. Every time we are forced to discuss either about floods or about drought. This is because we have not found out a long term solution to our irrigation needs in a country like ours which is dependent on monsoon. South-West Monsoon is like a panacea to our country which converts our tropical country to a fertile one, if it arrives on time without delay. This year we find the commencement of this monsoon a bit delayed. So naturally, we have the anxiety whether we would be able to irrigate effectively and successfully complete our crop cultivation. Even after 62 years of Independence, we have not evolved effective water management strategy. We have failed on that front. I do not know whether we have solved any of the river water disputes amicably in this country. There are long-pending vexing issues of river water sharing disputes. Inter-State river water disputes are still on the increase.
The river water from the upper reaches is not flowing as naturally to the lower riparian regions as it should be. Check dams and diversion of water creating new cultivation areas come in the way of natural water supply not only for irrigation but also for a basic need of meeting the drinking water requirements. That is why, an impending danger of drought is staring at our face today. No river in Tamil Nadu is originating within the State. Almost all the rivers in Tamil Nadu         * English translation of the speech originally delivered in Tamil.
 
are the lower part of the river systems in the Southern part of the country. But the water table even in the river beds of Tamil Nadu are depleting because we are not getting water even for our basic needs from other States. At a time when we apprehend a big drought situation in the country, certain States like Kerala, Orissa, Gujarat and Karnataka have got huge to considerable rainfall. But the due share of Cauvery water has not been given to Tamil Nadu as yet. That is why, the Mettur Dam which was to be opened on 12th of June is yet to be opened. The paddy cultivation in the Cauvery Delta has been greatly affected. In the past, such situations have created great havoc giving rise to huge fall in paddy growth and food production.
Similarly, Mullaiperiyar Dam controversy has given rise to a great tension between the two States of Kerala and Tamil Nadu. The Centre has failed to intervene in an appropriate way to sort out this problem which is prolonging as a vexing issue. In the same way, the Government of Andhra Pradesh has also taken up the basic work for constructing a dam across the river Palar even without taking Central clearance. This is also a cause for great concern in the minds of farmers of Tamil Nadu. Just because we have failed to evolve a right kind of strategy to share river waters, we find drought in the country often. At the same time, we also find several rivers flooded during monsoons are flowing wastefully into our seas and oceans in the absence of well planned barrages and check dams. This is the cause for floods on one side and droughts on the other. At least, in the near future, we must ensure that we are not caught between the vagaries of weather and the artificial scarcities resulting in man-made disasters competing with natural disasters. Drinking water and irrigation needs are basic and vital. These days we are talking about climate change. The worst hit are the farmers and the poor common people.  These people who have not seen any comfort in their life could not get any comforting solution and are left high and dry in the problems caused by natural disasters like floods and droughts.
In my constituency, the river Shenbagavalli is not the same as it used to be because of the destruction caused to its check dam due to heavy rains. Many years have passed and no solution is in sight. Rebuilding that check dam can help the farmers and poor people of both the States of Kerala and Tamil Nadu. But it is being left unattended as though it is an inter-State problem which, in fact, is not. Even in repairing a check dam we notice problem. In the year 2007, due to cyclone, a severe damage was caused in many of my constituency like Rajapalayam, Puliangudi and Srivilliputhur. It was announced that rehabilitation measures will be taken up through the Prime Minister’s Relief Fund, but no action has been taken so far. Such people must get relief and rehabilitation immediately after such devastations caused by floods.  People who have been already affected are again hit hard by the neglect and betrayal of the Government. In the future, we must ensure that the needy poor masses are not only swayed by natural disasters but also by man-made disasters.
With these words, I conclude.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Please sit down. Nothing should go on record.
(Interruptions) …* MR. CHAIRMAN: Please sit down. Nothing is going on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN:  Please sit down.  Nothing should go on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: Hon. Member, you can speak when you get your turn.  Please sit down.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please sit down. I will give you time.
… (Interruptions)
* Not recorded डॉ. भोला सिंह(नवादा): सभापति महोदय, यह सॉवरेन सदन देश में सुखाड़ और बाढ़ से उत्पन्न समस्या पर विचार कर रहा है और मैं आपके माध्यम से बिहार की सुखाड़ की स्थिति पर विचार व्यक्त करना चाहता हूं। मैंने एक बार बचपन में बेगम अख्तर का एक गाना सुना था - “अब के आयेगी बरसात बरसेगी शराब, आई बरसात पर बरसात ने दिल तोड़ दिया। ” वर्षा ऋतु आई पर वर्षा नहीं हुई और इससे बिहार एक भयानक स्थिति में पहुंच गया है।
      महोदय, बिहार विडम्बनाओं का राज्य है। मैं विडम्बना इसलिए कहता हूं कि बिहार में सैंकड़ों नदियां हैं, झीलें हैं, चौर हैं और वे नदियां भी हैं जो हिमालय से निकलती हैं। परंतु बिहार में जो व्यवस्था होती रही, उस व्यवस्था ने नदियों को बांधा, लेकिन नदियों से नहरें नहीं निकाली। नदियों के पानी को कहा तू समन्दर में जाओ, खेतों में मत जाओ और बांध के बाहर का जो पानी था, उसे कहा तुम खेत में ही रहो, नदी में मत जाओ। बिहार विडम्बनाओं का राज्य है। पानी रहते हुए भी बिहार सिंचाई की सम्पूर्ण व्यवस्था नहीं कर सका। यही कारण है कि हम पिछले वर्ष कुसहा बांध के टूट जाने के कारण कोसी और उसके आसपास के इलाकों के लगभग 35 लाख लोग आज भी बेपनाह हैं। स्वयं प्रधान मंत्री जी ने कहा था कि यह राष्ट्रीय विपदा है। वहां की सरकार ने उनके पुनर्वास के लिए, व्यवस्था के लिए, खेतों में जो बालू भरा है, उसे निकालने के लिए केन्द्र सरकार से 14 हजार करोड़ रुपये देने का आग्रह किया था और कहा कि बिहार को बचाइये। लेकिन आज तक बिहार के मामले में केन्द्र सरकार की संवेदना दिखाई नहीं पड़ती है। बिहार ने वर्ष2005, 2007 और 2008 में बाढ़ का प्रकोप झेला और वर्ष 2002, 2004 में बिहार ने सुखाड़ का प्रकोप झेला। लेकिन 2009 में बिहार अप्रत्याशित सुखाड़ से तबाह है।
      सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि बिहार की वर्तमान सरकार जिन परिस्थितियों से जूझ रही है, जिन समस्याओं का मुकाबला कर रही है और उसके सामने जो विपत्ति आई हुई है, उसे देखते हुए उस सरकार ने तब भी प्रयास किया है। वहां की सरकार ने तीन सिंचाई के लिए प्रत्येक दस लीटर पर 15 रुपये लीटर अनुदान देने की व्यवस्था की है। इसके साथ ही उसने छः हजार नलकूल गाड़ने के लिए जो व्यवस्था करने का प्रयास किया, उसमें 45 प्रतिशत सरकारी अनुदान,45 प्रतिशत बैंकों से ऋण और दस प्रतिशत किसानों को अपना खर्चा करना पड़ेगा।
            बिहार सरकार ने कदम उठाया है। जो इस देश के कृषि मंत्री हैं, वह कृषि की कोख से आये हैं, उनके दर्द में छटपटाहट है और किसानों के लिये आंसू हैं। इसलिये मैं किसानों की पीड़ा उनके सामने रखना चाहता हूं।
      सभापति महोदय, बिहार में प्रतिवर्ष खरीफ की फसल 50 लाख टन होती है जिसमें35 लाख टन धान, 3 लाख टन मक्का और एक लाख 25 हजार टन दालों की फसल होती है। आज जो परिस्थितियां हैं, उनमें दस लाख टन खरीफ की फसल नहीं हो पायेगी, चावल की फसल नहीं हो पायेगी। पिछले साल जहां बिहार में500 मि.मी. वर्षा हुई थी , आज वहां केवल 64 मि.मी. वर्षा हुई है । मैं बिहार के नवादा क्षेत्र से आता हूं। वह डाँट प्रोन ऐरिया है जहां धरती सूखी और आत्मा प्यासी है। नदियां सूखी पड़ी हुई हैं। उन नदियों में बरसात का पानी जाता है लेकिन वह पानी समुद्र में चला जाता है...( व्यवधान) सभापति जी, आपने घंटी बजा दी है। मैं जानता हूं कि आप अनुशासनप्रिय हैं। मैं आसन की ओर देखकर डरने लगता हूं और सोचता हूं कि हे ईश्वर, कि आपने ऐसे आदमी को आसन पर बैठा रखा है जो तुरंत घंटी बजा देता है। मेरी उम्र72 साल की है और मैं डरता हूं। मेरी प्रार्थना है कि मुझे दो मिनट का समय और दीजिये...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : You should be scarred of the Bell, not the man who is sitting here. Now, please sit down. Shri Paban Singh Ghatowar to speak now.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN:  I am giving you just one minute. Please conclude.
डा. भोला सिंह: सभापति जी, मेरी केन्द्र सरकार से प्रार्थना है कि वह बिहार के मामले में नकारात्मक रवैया छोड़कर सकारात्मक उपाय करे। बिहार का बिजली का कोटा1500 मेगावाट है ,उसका आवंटन उसे दिया जाये। बिहार को 470 करोड़ रुपया डीजल के अनुदान के लिये मुहैया करें। बिहार सरकार ने सूखे से निजात पाने के लिये 9000 करोड़ रुपये का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा है, उसे कृपया पूरा किया जाये। बैंकों द्वारा वसूली कार्य पर रोक लगायी जाये और बिहार को सूखाग्रस्त राज्य घोषित किया जाये।
      इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
*m17   SHRI PABAN SINGH GHATOWAR (DIBRUGARH):  Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity to participate in this discussion.
            Sir, the drought and flood situation in the country this year is really very serious and it becomes more serious because more than 60 per cent of the population of our country depends on agriculture. They are directly affected by the drought and  flood situation.
            Many hon. Members of this House have highlighted the problems of the country, particularly their respective States. I definitely want to highlight some of the steps taken by the Central Government to address the problems of our country because it is always there.
            Primarily, in our country, agriculture depends on monsoon. The Meteorological Department is one of the major Departments.  I personally feel that we wait up to the last stage to have the Report and take  necessary steps. Still, our Government has taken some of the major steps in the agricultural sector. As you see, in the recent Budget presented by the hon. Finance Minister, the agriculture credit flow has increased from Rs.2,87,000 crore to Rs.3,25,000 crore to help the agriculturists of the country.
            He has reduced the rate of interest from 7 per cent to 6 per cent to those farmers who are regular in repaying their loans.
            Sir, the National Rural Employment Guarantee Programme is a major flagship programme of this Government. About 99 per cent of the people who are working under NREGP are from villages and from agricultural background. I think there should be more schemes for rain water harvesting under NREGP. As exploitation of water in our country is becoming reckless, proper information about the economic usage of water must be given to farmers and that should percolate down to the ground level. So, I would request the Government to see that the NREGP is directed towards that scheme.
            The Government has taken up the National Food Security Mission to provide 25 kilograms of wheat or rice per month at Rs. 3 per kilogram to crores of BPL families in our country. That depends on the food production in our country. At this juncture, I would like to congratulate the UPA Government because they have announced a record increase in the MSP for various agricultural produce in our country which will definitely encourage the farmers in this country.
            The Government has taken up irrigation schemes to provide irrigation facilities to the farmers of our country. For this purpose, the Government has provided a lot of money and in the period between 2007 and 2012, the Government has targeted another 6 million hectare of land to be brought under small and medium irrigation schemes. These schemes are implemented through State Governments. I do not know what mechanism the Central Government has to review the implementation of these schemes at the ground level and what degree of support they are getting from State Governments.
            The Government has identified 312 districts in our country for producing paddy or wheat under the National Food Security Mission. This scheme is also implemented through State Governments and so their proactive support is very much required for successful implementation of the National Food Security Mission. I think, all these schemes have to be properly reviewed and implemented. So, the Central Government should take some special measures to see that these schemes are properly implemented at the ground level.
            Sir, I come from the North Eastern Region and I hail from Assam. Everybody thinks that Assam is a flood-affected State, but I am sorry to state that this year, about 22 districts of Assam are affected by drought. The shortage of rainfall varies from 10 per cent to 50 per cent in many districts and the Government has declared almost 25 districts as drought-affected districts in Assam. Then, in the middle of June, flood has occurred because all the rivers that are flowing in Assam come from neighbouring countries. Some are coming from Tibet and some are coming from Bhutan. Due to heavy rain in the hills, flood has occurred in the plains of Assam.
            Then, soil erosion is one of the major problems in Assam. In the last one decade alone, we have lost more than one lakh hectare of fertile cultivable land due to soil erosion. The Government of India should look into this problem because those farmers who live beside these rivers have lost everything. They have lost their cultivable land, they have lost their homes and they have lost all their properties, but there is no scheme to help them or for rehabilitation.
 

17.00 hrs.  Lakhs of cultivators in the North-Eastern region, especially, in Assam, are affected by flood erosion and drought.

            There is one National Institute of Disaster Management for Drought and they have prepared a national manual for drought management.  I would like to know from the hon. Minister of Agriculture the status of that drought management project.   I think the hon. Minister of Agriculture will look into that so that the work relating to this is expedited.

            As far as allocation of funds to Assam with regard to national calamity is concerned, it is very meagre.  The Central Government has provided only a sum of Rs.150 crore.  That is not sufficient to address the problem of drought and flood in Assam.  So, I would request the Central Government to come forward with more and more help to the Assam Government and declare the flood problem as a national problem.  With this meagre amount, it will be very difficult to control the flood problem in Assam.

            At the same time, deforestation is one of the major causes for all these climatic changes.  There has to be more fund for mass afforestation programme from the Central Government’s side; otherwise the climatic change will affect the rains. Cherapunji used to be the highest rainfall area in the world.  Now, we have very less rainfall in Cherapunji, which used to be the highest rainfall area in the world.  The Government has to think about that. 

            There has to be a coordinated effort from all the Ministries concerned with that.  The Agricultural Ministry alone cannot address this problem.  There has to be coordination with the Ministry of Water Resources, Ministry of Environment and Forests and other Ministries so that the problem of flood and drought can be effectively addressed to. There has also to be massive infuse of funds to address this problem because we depend on agriculture.

            With these words, I conclude. 

17.02 hrs                     (Dr. M. Thambidurai in the chair) *m18 श्री महेश्वर हज़ारी (समस्तीपुर): सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

      महोदय, मैं बिहार से आता हूं। वहां के लोग हमेशा कभी बाढ़ से और कभी सूखाढ़ से प्रभावित रहते हैं। कोसी, बागमती, करेह, कमला और बलान नदियों से बिहार घिरा हुआ है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि सभी नदियां सूखी हुई हैं और किसान त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। वहां किसान फसल नहीं लगा पा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने जो बिचड़ा लगाया था, वह सूख गया है। इसलिए मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि वह प्राकृतिक आपदा निधि से जो पैसा प्रदेश की सरकार को देते हैं, उसको बढ़ाने का काम करेंगे।

      महोदय, हमारे नेता आदरणीय नितीश कुमार जी सर्वगुण सम्पन्न हैं और वह बहुत अच्छे से बिहार को चला रहे हैं। बिहार में जो सूखा पड़ा है, उसके लिए उन्होंने बहुत सारी कोशिशें की हैं। उन्होंने डीजल पर 15 रूपये प्रति लीटर देने का काम किया है। पिछली बार जब बाढ़ आयी थी, उस समय एक-एक क्वींटल अनाज गरीबों के बीच वितरित करने का काम किया था। सभी के लिए खाने की व्यवस्था की थी। हालांकि वहां बाढ़ के कारण बहुत से लोग मरे भी थे।

      महोदय, मैं भारत सरकार से आग्रह करना चाहता हूं, चूंकि बिहार एक गरीब राज्य है, इसलिए वहां के लिए एक विशेष पैकेज देने का काम करेंगे, जिससे बिहार राज्य अन्य राज्यों के समान स्थिति में खड़ा हो सके।

      महोदय, मैं आपसे आग्रह करूंगा कि वहां की नदियों को जोड़ने का काम किया जाए ताकि वहां के किसानों को खेती करने में सुविधा हो सके। वहां के किसानों के लिए कोई सुविधा नहीं है। भारत सरकार हमेशा कहती है कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है, लेकिन किसानों के लिए कोई भी मूलभूत सुविधाएं भारत सरकार द्वारा नहीं दी गयी हैं। मैं भारत सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि वहां के किसानों के लिए सिंचाई की व्यवस्था की जानी चाहिए। वहां की नदियां सूख चुकी हैं, यहां तक मवेशियों के लिए पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं है। इसीलिए मैं आग्रह करना चाहता हूं कि किसानों को नलकूप के लिए सब्सिडी दी जाए। मैं भारत सरकार से आग्रह करता हूं कि वह किसानों के कृषि कर्ज को माफ करने की कृपा करें।

      सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि नरेगा के माध्यम से जो कार्य चलते हैं, उसका 80 परसैंट कार्य ऊपर ही रह जाता है, केवल 20 परसैंट ही जमीन पर जा पाता है। नरेगा के कार्य की समीक्षा करनी चाहिए। उसके नियम में बदलाव करना चाहिए, जिससे नरेगा का सारा पैसा जमीन पर जा सके। नरेगा का जो 110 परसैंट बढ़ाया गया है, वह बहुत ही योग्य है। मैं कृषि मंत्री जी को बधाई देता हूं, उन्होंने जो नरेगा के लिए पैसा बढ़ाया है। नरेगा का पैसा जमीन पर किस तरह उतरे, उसके लिए कानून एवं नियम में संशोधन करना चाहिए। वह पैसा डायरेक्ट जमीन पर जाना चाहिए।

      सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से कहना चाहता हूं कि किसानों को खाद के लिए जो सब्सिडी दी जाती है, यह डायरेक्ट किसान के पास पहुंचे, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि किसान को जो सब्सिडी दी जाती है उसे बड़े लोग और व्यवसायी वर्ग ही रास्ते में खा जाते हैं, किसानों को नहीं मिल पाती है। इसलिए किसानों को डायरेक्ट पैसा जाना चाहिए।

      सभापति महोदय, इन्हीं चंद शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

MR. CHAIRMAN : I would request all the hon. Members to strictly speak within five minutes because 35 Members are yet to speak and the Minister has to reply thereafter. Therefore, I request the hon. Member, who is next to speak, to be brief.  

श्री जगदानंद सिंह (बक्सर):सभापति महोदय, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद। यहां हमारे माननीय कृषि मंत्री जी बैठे हैं, देश के लिए फूड सिक्योरिटी का जो सबसे बड़ा कार्य है, यह इन्हीं की जिम्मेदारी पर है। इस साल सुखाड़ के चलते लगता है कि फूड सिक्योरिटी पर देश में खतरा होने वाला है। यद्यपि उन्हें भरौसा है कि पांच से छ: करोड़ टन चावल और गेहूं उनके गोदामों में भरा पड़ा है, लेकिन जब सुखाड़ की स्थिति पैदा होगी, उत्पादन कम होगा तो मात्र इतने चावल और गेहूं से इस देश के सभी लोगों की आवश्यकता शायद पूरी नहीं हो पाएगी।

      सभापति महोदय, मैं बिहार से आता हूं। बिहार आदरणीय लालू प्रसाद जी और श्रीमती राबड़ी देवी जी के मुख्य मंत्री काल में अनाज के उत्पादन में सरप्लस राज्य हुआ था। लोग कभी-कभी चर्चा करते हैं कि उस रिज़ीम की उपलब्धियां क्या हैं। राष्ट्र पर बोझ न बन कर बिहार अपने पैरों पर खड़ा हुआ है। उसने न केवल अपने उत्पादन से लोगों का पेट भरने का काम किया, बल्कि देश के अन्य राज्यों में वहां का कृषि उत्पादन निर्यात होने लगा। मैं देख रहा हूं कि इस साल उपलब्धि सुखाड़ के चलते खतरे में है। यह कुछ तो प्रकृति के चलते खतरे में है और उससे अधिक वहां की सरकार की उदासीनता के चलते है।

      सभापति महोदय, बिहार में तीन बड़ी सिंचाई की योजनाएं हैं- कोसी, गंडक और सोन। सोन देश की प्राचीनतम नहर प्रणाली है। मैं कृषि मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आज उसकी उत्पादकता इस देश के किसी क्षेत्र से भी ऊपर है। हमारे वैज्ञानिकों ने तय कर रखा है, धान की उत्पादकता का और उससे भी आगे जाकर वहा के किसान80 से 90 क्विंटल प्रति हैक्टेयर धान उत्पादन अपने खेतों में कर रहा है। लेकिन सोन नहर प्रणाली को बाण सागर और रिहंद से पानी आना है, वह पानी हमें नहीं मिल पा रहा है। उदासीनता के चलते सरकार अपने हिस्से का पानी वहां नहीं ले पा रही है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का सहयोग नहीं मिल पा रहा है। मैं उसी इलाके से आता हूं, जहां मेरा पार्लियामेंट का क्षेत्र बक्सर, कैमूर और रोहतास जिला में है। वहां पानी की कोई कमी नहीं होती, यद्यपि बरसात की कमी है, लेकिन सुनिश्चित नहर की प्रणाली के चलते वहां पानी की कमी होने की कहीं से कोई गुंजाइश नहीं थी। सोन के बाद कोसी नहर प्रणाली, पिछले साल पूरे देश ने देखा कि किस तरह से वहां हमारा कोसी का तटबंध टूटा था और 35 लाख आबादी नदी के पेट में चली थी तथासिंचाई प्रणाली ध्वस्त हो गई थी ।

      सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि वह बाढ़ के बचाव का ढांचा नहीं था, वह हमारी सिंचाई योजना का हिस्सा था। उसका एफ्लैक्स बांध टूटा। एफ्लैक्स बांध हमेशा, बैराज और सिंचाई प्रणाली का हिस्सा होता है। इसका नतीजा हुआ कि जहां पहले हम 15 हजार क्यूसेक्स पानी का प्रयोग करते थे, वहां आज हमें केवल 3 हजार क्यूसेक्स पानी सिंचाई के लिए मिल रहा है। पैरेनियल नदी में, हिमालयन क्षेत्र से आया पानी, जो बाढ़ का कारण बनता है और उसी से हमारे खेतों को 15 हजार क्यूसेक्स पानी सिंचाई के लिए मिलता था, उसकी जगह हम केवल 15 सौ क्यूसेक्स पानी का प्रयोग कर पा रहे हैं।

      महोदय, गंडक नहर प्रणाली, जिससे8 लाख हैक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई होती, उसके लिए केन्द्र सरकार ने 400 करोड़ रुपए पिछले चार सालों से दे रखे हैं, लेकिन हमारी नहर की प्रणाली नहीं सुधर रही है। इसका नतीजा है कि 15 हजार क्यूसेक्स की जगह हम केवल 3 हजार क्यूसेक्स पानी का प्रयोग कर रहे हैं। क्या यह प्राकृतिक आपदा है, क्या यह सुखाड़ प्रकृति की दी हुई आपदा है या मानव निर्मित है?  गत चार वर्षों में कोसी, गंडक और सोन की नहर प्रणालियों को ध्वस्त करने का काम किया गया है।

      महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि बिहार में पुराने5 हजार नलकूप लगे थे। उनमें से 4500 नलकूप बन्द हैं। नाबार्ड के द्वारा 4 हजार नलकूप लगाए गए हैं, लेकिन पिछले चार सालों से एक भी नलकूप को चालू नहीं किया गया है। करोड़ों और अरबों रुपए की धनराशि खर्च करने के बाद भी और सुनिश्चित सिंचाई प्रणाली होने के बाद भी, यदि हमारे खेत सूखे हैं, तो इसमें कहीं न कहीं हमारी सरकार दोषी है। इसलिए मैं कृषि मंत्री महोदय से कहना चाहता हूं कि आप केवल कृषि मंत्रालय के द्वारा फूड सिक्योरिटी नहीं दे पाएंगे। यदि आपका सामान्य ढंग से और लगातार विचार-विमर्श ऊर्जा विभाग और जल संसाधन विभाग से नहीं होता रहा, तो इस चुनौती को झेलने में शायद यह राष्ट्र सफल नहीं हो पाएगा।

      महोदय, मैं कृषि मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि हमारे जो जल संसाधन विभाग और बिजली विभाग को संभालने वाले लोग हैं, उनसे विचार-विमर्श किया जाए और यदि हमारे किसानों को यह सुनिश्चित कर दिया जाए कि उनके खेतों के लिए देश में उत्पादित50 प्रतिशत बिजली मिलेगी, तो निश्चित रूप से किसान इतना उत्पादन कर के देगा कि एफ सी आई के गोदाम फिर उसी तरीके से भर जाएंगे, जैसे आज भरे हुए हैं और देश की फूड सिक्योरिटी हो जाएगी अन्यथा यदि यह सुखाड़ की स्थिति बनी रही, तो 5-6 करोड़ टन अनाज देश की भूख की स्थिति को झेलने में कामयाब नहीं होगा।

      महोदय, मैं केवल एक-दो सुझाव देकर अपनी बात समाप्त करूंगा। मैं कहना चाहता हूं कि मौजूदा धान की फसल को हर हालत में बचाया जाए, जो कम बारिश के बाद भी खेतों में लगाई जा चुकी है। दूसरी बात कहना चाहता हूं कि वाटर रिसोर्सेस मंत्रालय के साथ बैठक हो और तीसरी तथा महत्वपूर्ण बात जो हमारे पनबिजली घर हैं, उनके केवल बिजली के उत्पादन को न देखा जाए, बल्कि सिंचाई से जुड़ा हुआ जो पानी है, उसे खेतों में जाने दिया जाए। इससे बिजली भी पैदा होगी, अनाज भी पैदा होगा और जो प्राकृतिक आपदा हमारे देश के सामने इस समय मौजूद है उसे देश झेल पाएगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए, अपनी बात समाप्त करता हूं।                                 

*m20 योगी आदित्यनाथ(गोरखपुर) : सभापति महोदय, आज हम सब देश की सूखा और बाढ़ से संबंधित समस्या पर चर्चा करने के लिए यहां उपस्थित हुए हैं। कमोबेश प्रति वर्ष ही सदन में इन विषयों पर चर्चा होती है। बड़ी अजीब विडम्बना है कि एक ही समय यह देश दोनों परिस्थितियों से जूझ रहा है। उत्तर भारत में फिर चाहे वह बिहार हो, उत्तर प्रदेश हो, राजस्थान हो या हरियाणा आदि राज्य जहां सूखे की चपेट में हैं, वहीं असम और महाराष्ट्र आदि कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं, जहां के लोग बाढ़ की भीषण त्रासदी से जूझ रहे हैं। इन दोनों समस्याओं से निपटने में कहीं न कहीं व्यवस्था और नियोजन की कमी है। बाढ़ और सूखा ऐसी प्राकृतिक त्रासदी नहीं हैं जिनका सामना न किया जा सके या जिनका पूर्वानुमान न लगाया जा सके। यह भूकम्प जैसी त्रासदी नहीं है, यह कोई साइक्लोन नहीं है जिसका कि पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके, लेकिन इच्छा शक्ति की कमी, आज इन सब समस्याओं की जड़ है, जिसकी चपेट में अन्ततः आम नागरिक आता है।

      जिसकी चपेट में अन्ततः आम नागरिक आता है। मैं इस देश के सबसे घनी आबादी के उस क्षेत्र से आता हूं, जो उत्तर प्रदेश का पूर्वी अंचल है और जिस क्षेत्र में नेपाल से आने वाली छोटी-बड़ी नदियों का एक बहुत बड़ा संजाल सा फैला हुआ है। प्रतिवर्ष या तो वह क्षेत्र बाढ़ की त्रासदी का शिकार होता है और अगर बरसात नहीं होती है तो फिर सूखे की चपेट में आता है।

      बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि अभी कुछ ही दिन पूर्व माननीय कृषि मंत्री का एक बयान आया था कि उत्तर प्रदेश सरकार उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त जिले घोषित करने के सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं ले पा रही है। उसके अगले दिन ही उत्तर प्रदेश सरकार ने15 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया। दो दिन के बाद पुनः 27 जिले सूखाग्रस्त घोषित हुए, लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि गोरखपुर के पूर्व के जिले सूखाग्रस्त घोषित हुए, गोरखपुर के दक्षिण के जिले सूखाग्रस्त घोषित हुए, गोरखपुर के पश्चिमी जिले सूखाग्रस्त घोषित हुए लेकिन गोरखपुर जनपद को, कुशीनगर जनपद को और महाराजगंज जनपद को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया गया। यह राजनैतिक पूर्वाग्रह है, इसलिए मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री से अनुरोध करना चाहूंगा कि वे इस पर विशेष ध्यान दें कि राजनैतिक विद्वेष और प्रताड़ना की भावना से जो निर्णय लिए जा रहे हैं, अन्ततः इसकी चपेट में आम जनमानस आएगा और इसलिए इस प्रकार के निर्णयों से किसानों को, गांवों को और आम नागरिकों को अलग रखा जाना चाहिए और एक समान निर्णय पूरे प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में वहां की जनता के व्यापक हित में लिए जाने चाहिए।

      आजादी के तत्काल बाद नेपाल के साथ मिलकर जिन जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में नेपाल के साथ बातचीत प्रारम्भ हुई थी, अगर उन्हें अब तक पूरा किया गया होता तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ से या जब बरसात नहीं होती है तो सूखे की चपेट में वहां का आम नागरिक नहीं आता। मैंने1998 की बाढ़ देखी है और इसी सदन में हम लोगों ने तब 1998 में भी गुहार लगाई थी। 2001 में भी उस क्षेत्र में भयंकर प्रलंयकारी बाढ़ आई थी, तब भी हम लोगों ने इस सदन में आवाज उठाई थी कि इस से बचाया जाये, नेपाल के साथ वार्ता की जाये और अगर नेपाल के अन्दर से आने वाली उन नदियों को, चाहे करनाली है, पंचेश्वर है, भालू है, चाहे नेपाल से आने वाली सरयू, राप्ती, नारायणी, गंडकी आदि नदियों पर जिन परियोजनाओं को बनना था, मैं मानता हूं कि न केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश को बाढ़ की त्रासदी से हम बचा सकते थे, अपितु वहां पर पहली बरसात कल हुई है, लेकिन इस बरसात का कोई मतलब नहीं क्योंकि फसल का समय समाप्त हो चुका है। इस बरसात का किसानों के लिए कोई लाभ नहीं है, लेकिन जब किसानों को पानी की आवश्यकता थी, उस समय पानी नहीं मिल पाया, क्योंकि वहां पर नहरों का जाल उस रूप में नहीं बिछाया गया था कि लोग उसका उपयोग कर सकते या फिर नदियों में पानी पर्याप्त नहीं था। अगर नेपाल के अन्दर इन परियोजनाओं को पूरा कर लिया गया होता तो सम्भवतः सूखे के समय में उस जल का उपयोग सिंचाई के साधन के लिए भी किया जा सकता था। जो बात नलकूप लगाने के लिए यहां आ रही है, हम यह जानना चाहते हैं कि नलकूप बिजली से ही तो चलेंगे और जब बिजली ही नहीं रहेगी, क्योंकि लोगों को जलाने के लिए बिजली नहीं मिल पा रही है तो किसानों को नलकूप चलाने के लिए कैसे मिल पाएगी, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है।

      मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री से अनुरोध करना चाहूंगा कि जब हम सूखे और बाढ़ की समस्या पर विचार कर रहे हैं तो सूखे और बाढ़ की समस्या के समाधान के लिए एन.डी.ए. सरकार के समय नदियों को जोड़ने की जो परियोजना प्रारम्भ हुई थी, कृषि मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय मिलकर अगर इस योजना को अमली जामा पहना सकें तो देश की बाढ़ और सूखे की समस्या का समाधान हो सकता है। दूसरे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की बाढ़ और सूखे की समस्या का समाधान करने के लिए नेपाल के साथ बातचीत होनी चाहिए। जलकुंडी परियोजना को लागू किया जाना चाहिए। इससे उस क्षेत्र में न केवल बाढ़ की समस्या का समाधान होगा, अपितु सूखे के समय में पर्याप्त जल सिंचाई के साधन के लिए मिल सकेगा।

      इसके साथ ही जल विद्युत परियोजनाओं को पूरा किया जाए।इस बारे में एक सार्थक पहल इस सदन के माध्यम से अवश्य हो, यही अनुरोध करने के लिए मैं आज यहां उपस्थित हुआ हूं।मैं एक बार पुनः आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया।

 

MR. CHAIRMAN : Shri Adhir Chowdhury, I am giving only five minutes for you also.

SHRI ADHIR CHOWDHURY (BAHARAMPUR): Sir, you were also earlier speaker.

MR. CHAIRMAN: Yes, I know. What to do?

SHRI ADHIR CHOWDHURY : Sir, due to the drought of time in Parliament, I shall be constrained to be brief in my deliberations.

MR. CHAIRMAN: Otherwise, flood will come. Therefore, we have to be brief.

SHRI ADHIR CHOWDHURY : Sir, India is such a country which is bestowed upon with all possible natural endowments. In spite of all, we are very much familiar with the nemesis of drought and flood which used to occur in our country in a regular interval. It is true that in the background of the global financial meltdown, we are lustily waiting to see the profuse rainfall in order to plough back our economy to the moderate growth trajectory. But it is distressing to note that the Centre for Monitoring Indian Economy has predicted that the crop production will fall by 4.7 per cent during the year after recording a marginal increase of 0.3 per cent in 2008-09 and in 2009-10, the CMIE expects GDP from agricultural and allied activities to decline by two per cent compared to 16 per cent increase in 2008-09.

            Every year in this country, 50 million people are affected by drought. But the disastrous consequences arising out of drought and flood are not adequately recognized. The Minister must admit that in the wake of all disasters, we simply resort to short-term mechanism such as relief, recovery, etc. But what we need to have is a comprehensive mechanism to deal with the situation. It is the primary responsibility of the State Government to look after any natural disaster, including drought. Therefore, the Calamity Relief Fund has been constituted. The Central Government used to supplement financial and logistical support to the State Government. If the Calamity Relief Fund is not adequate, then the Government will supplement more funds from the National Contingency Calamity Fund.

      ललन जी ने बहुत सारे आरोप यूनियन सरकार के खिलाफ लगाए। मैं उन्हें चेतावनी देना चाहता हूं कि जिस कोसी नदी की बाढ़ से सारा बिहार पिछले साल तहस-नहस हो गया था, उसके बारे में मैं बिहार और उत्तर प्रदेश के सारे सांसदों को चेतावनी के तौर पर बोलना चाहता हूं।

It is because of heavy rain in the catchment areas of Nepal, the water discharge level, which had plummeted to 88,240 cusecs on Saturday and remained more or less the same all through the previous week, suddenly went up to 1,18,000 cusecs on Sunday. The upward trend continued on Monday sending a wake up call to all concerned. The level at Barah Kshetra from where Kosi originates was recorded at 1.89 lakh cusecs on Monday. So, there may be further inundation to occur in the bank of Kosi also.

            Drought is categorized into three phases. One is called meteorological drought, second one is hydrological drought and the third one is agricultural drought.

            I would suggest to the hon. Minister to restructure the Rainfed Area Authority so that the climate monitoring centres could be set up under the guidance of this Rainfed Area Authority. I would also like to know from the hon. Minister as to what is the present status of the extended range forecasting system for climate risk management in agriculture. The truth is that if we are able to propagate, to disseminate and to generate the possibilities of drought and other disasters, then at least we will help the common people in mitigating the intensity of drought and flood.

            With these words, I am concluding.

MR. CHAIRMAN : Those hon. Members who want to lay their written speech, can give it at the Table of the House. Those who are interested to give a written speech, they can lay it on the Table of the House. That will be recorded.

            Shri Prasanta Kumar Majumdar to speak now.

SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR* (BALURGHAT) : Hon. Chairman Sir, 62 years have passed since independence of our country.  We all know that unless agriculture develops, the country cannot progress. We also know that drought and flood are the two enemies of agriculture.  I am a new member of this august House representing North Bengal - a question troubles me a lot and that is, to control flood or drought, why don't the Central Government and the State Governments rise above party politics to chalk out any long term programme.  If they have not done so, then what is the reason for that ?  Thus, through you Sir I would like to draw the kind attention of Hon. Minister and the Government to the fact  that if flood and drought are our main obstacles and when agriculture is the mainstay of our country's economy, then why don't we try to mitigate these problems and have a permanent solution.

            Secondly, weather and nature change rapidly.  Sometimes we have delayed monsoon, inadequate rainfall, sometimes we have excessive rain.  On one hand we find that the water table is going down gradually as a result of which there is dearth of drinking water; on the other hand we have excess rain to trouble us.  We can see that in most parts of the country there is scorching sun, minimal rainfall. My humble submission to you is that there are numerous rivers, lakes, canals and other water bodies in India. So when incessant rain occurs, when there is flood - like situation, we should make an attempt to preserve the water, store the excess water effectively and channelise that through the canals and rivers.  If done in this fashion, we will be able to properly utilise the water and keep it for future use.  We never knew that water would have to be purchased one day.  Price of 1 litre of milk is Rs.12/- and that of a litre of water is Rs.14/. 

   

* English translation of the speech originally delivered in Bengali.

So you can well imagine the worth of water.  Therefore, the natural water should be used in the agricultural fields and can be effectively utilised for cultivation.

            Thirdly to control drought, we need to increase productivity in agriculture, and to do that subsidy for fertiliser and seeds should continue.

            We sow seeds, we cultivate crops but productivity is not upto the mark.  Now-a-days seeds are imported from foreign countries.  Earlier paddy, wheat or mustard used to be dried  in the sun in order to prepare indigenous seeds. Today, seeds are imported and these have no guarantee.  The quality of the seeds are also questionable.  For this reason we should resort to rain water harvesting.

             So I'd like to say that when there is drought, only one crop year is not lost, more than two years are lost.  When there is bumper crop, it creates problem too.  In my state West Bengal, the land is favourable for paddy cultivation.  But if production is more, then it becomes difficult to store the crops due to lack of proper storage facility or warehouse. Thus my humble request to Hon. Minister would to provide storage facility or granaries to the farmers, so that they can store and in turn market their produce and also get the remunerative price from the Government for paddy, wheat, sugarcane etc.  This will help the distressed farmers a lot.  With these words, I thank you for allowing me to speak and conclude my speech.

                 

*m23 श्री राधा मोहन सिंह* (पूर्वी चम्पारण): बिहार राज्य में प्राकृतक आपदा नियति बन गयी है । पिछले सात वर्षों में2005ए 2007-2008 में राज्य बाढ़ का प्रकोप झेला एवं 2002 एवं 2004 में सुखाड़ का सामना करना पड़ा इस वर्ष का सुखाड़ अप्रत्याशित दिखता है । बारिश कम होने से राज्य में भयावह की स्थिति पैदा हो गयी है, पहली जून से 20 जुलाई तक बिहार में सामान्य वर्षा से 60 प्रतिशत कम हुई है, खरीफ का मौसम का समय है । बिहार में खरीफ के फसल में धान, मक्का, अरहर की खेती होती है । बिहार में धान की रोपनी जुलाई माह तक समाप्त हो जाता है । बिहार में सुदुर इलाके से मिली सूचना के अनुसार धान के रोपनी बहुतायत गाँवों में शुरू हो नहीं सकी हे कुछ क्षेत्रों में अधिक से अधिक25 प्रतिशत धान की रोपनी शुरू हुई है कुछ जिले जैसे बेतिया, मोतिहारी और गोपालगंज जिले में 50 प्रतिशत धान की रोपनी हो पायी है क्योंकि इन क्षेत्रों में कुछ वर्षा एवं नेपाल के पानी के कारण राहत मिला है । इस सुखे के कारण धान का विचरा खत्म होने लगा है । बिहार में50 लाख हेक्टेयर में खरीफ की खेती होती है जिसमें धान 35 लाख हेक्टेयर, मक्का 3 लाख हेक्टेयर, दलहन 1 लाख 50 हजार हेक्टेयर एवं अन्य फसल होती है लेकिन अभी तक जो सुचनाएं प्राप्त हुए हैं । उसमें धान 6 लाख हेक्टेयर मक्का 1.25 लाख हेक्टेयर, दलहन 45 हजार हेक्टेयर में हुई है जो धान की बुआई वर्तमान लक्ष्य की अपेक्षा17 प्रतिशत है जो बहुत कम है । वह भी जिस खेत में बुआई है उस फसल को बचाना मुश्किल साबित हो रही है क्योंकि अगर वर्तमान में मौसम इसी स्थिति में रहा, तो पानी की आवश्यकता व्यापक होगी जो पम्प से चलाकर सिंचाई करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन काम है । जहां इस सूखे से प्रभावित रहने के कारण बिहार को खाद्यान्न संकट के साथ पशुओं के लिए चारे के संकट का भी सामना करना पड़ेगा । चावल का उत्पादन प्रतिवर्ष45 लाख से50 लाख टन होता है वहीं मक्का का उत्पादन 14 से 16 लाख टन के बीच होता है । इस सुखे के मौसम में धान का उत्पादन10 लाख टन का भी उपज होना मुश्किल हो जाएगा । बिहार खाद्यान्न के उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है ।

      महोदय, बिहार को इस संकट से बचाने के लिए केंद्र सरकार को सहयोगात्मक रवैया अपनाना होगा लेकिन केंद्र सरकार के द्वारा जिस तरह सोन नहर में पानी समय पर नहीं छोड़ने के कारण भी फसल की बर्बादी हुई है बाण सागर समझौते के अनुसार जून महीने में 10 हजार एकड़ फीट पानी प्रति दिन बिहार को मिलना था जो नहीं मिला उस समय पानी 2 से 3 हजार एकड़ फीट पानी कुछ दिन छोड़ा गया जिसके कारण धान का विचरा का नुकसान हुआ और धान की रोपाई कम हुई है । इस सूखे से किसानों के * Speech was laid on the Table.

   

साथ - साथ खेतिहर मजदूर जो कृषि पर आधारित है उन पर भी असर पड़ने वाला है क्योंकि धान की रोपाई नहीं होगी तो इनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा होगी । इसके अलावा पशुओं पर व्यापक प्रभाव पड़ने वाला है ।

      हमारे यहां सिंचाई की जो व्यवस्था है उसके अनुसार सिंचाई कर हम धान का उत्पादन उतना नहीं कर सकते है । हमारे यहां जितने भी तालाब एवं आहारनहर है जिसमें वर्षा का पानी जमा रहता था वह भी अब अतिक्रमित हो गया है वर्षों से बंद पडे नलकूप जिसको चालू करने में सरकार को मुश्किल पैदा हो रहा है, निजी नलकूप से सिंचाई कर फसल उत्पादन करना मुश्किल काम है, सिंचाई में बिजली और डीजल बड़ कारण है क्योंकि डीजल से सिंचाई करना आज की परिस्थिति में मुश्किल काम है क्योंकि इससे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और बिजली सिंचाई के लिए उपलब्ध ही कम रहता है ।

      जहां राज्य सरकार के द्वारा भी कई घोषनाएं किसानहित में सूखे से निपटने के लिए किए गए हैं । जिसमें धान की तीन सिंचाई के लिए प्रति सिंचाई10 लीटर पर15 रू. लीटर अनुदान, निजी क्षेत्र में 6.25 हजार नलकूप गाड़ने जिसमें45 प्रतिशत सरकारी अनुदान45 प्रतिशत बैंकों द्वारा कर्ज एवं 10 प्रतिशत किसानों द्वारा स्वयं वहन करना । इसके अलावा कई अन्य योजना शामिल है । बिजली के अभाव में हम सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि राज्य विभाजन केबाद राज्य में अपना बिजली उत्पादन नगन्य है हम पूरी तरह सेंट्रल सेक्टर पर निर्भर हैं राज्य में अभी2500मेगावाट बिजली चाहिए लेकिन केंद्र द्वारा1500मेगावाट बिजली आवंटन है । लेकिन राज्य को बिजली 800 से 900 मेगावाट के आसपास मिलता है । केंद्र सरकार को सूखे की स्थिति को देखते हुए बिहार को 1500 मेगावाट आवंटित बिजली ही आपूर्ति करना चाहिए । इसके साथ-साथ केंद्र सरकार को अपने नकारात्मक रवैये में परिवर्तन लाना होगा क्योंकि लोक सभा के चुनाव के परिणाम को देखकर और बिहार के साथ भेद-भाव करेंगे तो इस संकट की घड़ी में ठीक नहीं होगा, क्योंकि बिहार में अभी तक केंद्र सरकार का कोई टीम नहीं आना, मदद की कोई पहल नहीं करना भारत केंद्र सरकार को तत्कालिक 470 करोड़ रू. डीजल अनुदान पीने के पानी एवं अन्य कार्य के लिए तत्काल देना चाहिए अगर यही स्थिति बरकार रही तो इस सूखे से निपटने के लिए 9000 करोड़ की आवश्यकता पड़ेगी उसे केंद्र सरकार को देना चाहिए इसके साथ-साथ बैंक के ऋण की वसूली पर रोक लगे और जरूरत पड़ी तो इसको सूखा क्षेत्र घोषित करें ताकि बिहार को इस संकट की घड़ी से उबारा जा सके । वहीं राज्य सरकार को चाहिए कि कृषि वैज्ञानिक विश्वविद्यालय के छात्र, कृषि, सहकारिता, पशुपालन विभाग के पदाधिकारियों को गाँव में, बीज के साथ भेजने की जरूरत है ताकि किसानों को विषम परिस्थितियों में खेती करने के लिए सलाह दें जिससे राज्य सरकार को सुखाड़ का सामना करने में सहुलियत हो ।

      महोदय, केंद्र सरकार से मेरी मांग है कि आवंटित 1500 मेगा वाट बिजली के अलावा300 मेगा वाट बिजली दिया जाए, केंद्र द्वारा सुखा प्रभावित क्षेत्रों में टीम भेजा जाय, बैंक ऋण की वसूली पर रोक लगाया जाए एवं राज्य सरकार के द्वारा जो राशि मांगी गयी है उसे अबिलंब निर्गत करे ।

                                                 

*m24 श्री हुक्मदेव नारायण यादव* (मधुबनी): बिहार में हर साल चार-पांच जिला में आंशिक तौर पर सुखाड़ की छाया रहती है । चार-पांच जिला में बाढ से परेशानी रहती है । उसी तरह देश के लगभग 200 जिला में निरंतर सुखाड़ रहता है । हर पांच साल पर छोटा दस साल पर मंझोला और बीस साल पर बड़ा अकाल आता है । अकालचक्र का इतिहास नहीं लिखा गया है । मौसम विज्ञानी तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिक मिलकर अकाल पर शोध करें और उसके कालचक्र का इतिहास तैयार करें । हर सौ साल पर भयंकर अकाल आता है । बिहार में ओर देश के अन्य हिस्से में 1914-15 में अकाल आया था । अब 2014 -2015 में अकाल का भयंकर प्रकोप आने वाला है। 2009 में फसल मारी जाएगी इसका प्रभाव 2010 में पड़ेगा । जब अकाल का इतिहास बन जाएगा तब उसके कारण और निदान की खोज की जाएगी। कारण का पता लगाए बिना निदान नहीं खोजा जा सकता है । वैज्ञानिक अपने विज्ञान पर अहंकार करते है और अवैज्ञानिकता को विज्ञान मान लेते हैं । किसान अनपढ़ होता है परंतु उसके पास अनुभव गम्य ज्ञान होता है । उस अनुभव और जानकारी का लाभ उठाने का उपाय किया जाए । अंध आधुनिकता के कारण हमने प्राचीनता और प्रचलित व्यवहारिक अनुभव गम्य ज्ञान को अंधविश्वास मान लिया है । अंधविश्वास से अंध अविश्वास ज्यादा खतरनाक होता है । स्थायी निदान खोजा जाए । अलग-अलग क्षेत्र में भौगोलिक बनावट के अनुसार उपाए किए जाए । दीर्घकालीन योजनाएं बनायी जाए । अन्न का भंडारण विकेंद्रित व्यवस्था से की जाए । प्रत्येक पंचायत में अन्न का भंडार बनाया जाए । ग्रामीण गोदाम बनाने के लिए अनुदान दिया जाए । किसान भंडारण के अभाव के कारण फसल के समय अनाज बेच लेते हैं । एफसीआई के यातायात और परिवहन व्यय काफी होता है । उसमें छीजन भी होता है। वह भी बचेगा और किसान के भंडार में अनाज भी रहेगा ।

      सभी परंपरागत सिचाई स्रोतों जेसे नहर, नाला, आहर, पैन, पोखरा, तालाब, जोहर और बड़े-बड़े जलाश्यों की खुदाई करवायी जाए । अतिक्रमण से मुक्त करवाया जाए । ग्रामीण रोजगार योजना एवं विधायक तथा सांसद कोष से इस काम को प्राथमिकता के तोर पर की जाए । इससे बाढ़ के समय पानी रुकेगा और बाढ़ में भयंकरता नहीं आएगी । सभी बरसाती एवं छोटी छोटी नदियों में सर्वेक्षण करवाकर पानी रोकने के लिए सुलीसगेट, पकका बांध या पानी रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था की जाए । बड़ी सिंचाई योजनाओं के बनिस्पत इससे ज्यादा लाभ होगा । मानव श्रम एवं छोटे मशीन के द्वारा बारह महीना सिंचाई के साधन उपलब्ध रहेंगे । मवेशी को नहलाने-धोने के लिए पानी मिलेगा । मछली मिलेगी । मनुष्य को नहाने *Speech was laid on the Table.

 

के लिए पानी मिलेगा । जमीन के अंदर जलस्तर उपर आएगा जिससे बोरिंग के द्वारा सिंचाई की जाएगी । सभी मृत नदियों की खुदाई की जाए और उसमें पांच-दस किलोमीटर पर पानी को रोककर रखने की व्यवस्था की जाए । अकाल के वरदान में बदलने का प्रयत्न किया जाए । तत्काल इससे रोजगार मिलेगा । मजदूरी में अनाज दिया जाए । सिंचाई के लिए डीजल पर अनुदान दिया जाए तथा बिजली सिंचाई के लिए हो ऐसी प्राथमिकता निर्धारित की जाए । किसानों के द्वारा किसानों के लिए और किसानों का ही कार्यक्रम बनाया जाए । सुखाड़ और अकाल के समय नौकरशाही लूअने में लग जाता है । व्यवस्था तंत्र पर ही साठ प्रतिशत खर्च हो जाता है । एक विशेष सत्र दस दिनों के लिए बुलाकर कृषि के समग्र विकास पर संसद में चर्चा की जाए ।

                                       

SHRI NARAHARI MAHATO (PURULIA): Mr. Chairman, Sir, I am grateful to you that you have given me a chance to participate in this discussion on the situation arising out of drought and floods in various parts of the country. Today many hon. Members of Parliament have participated in this discussion on drought and floods. On behalf of my party, I am participating in this discussion on drought and floods.

            Now-a-days drought is a burning problem in our country. I have been elected from the Purulia constituency of West Bengal where most of the people depend on agriculture and agriculture depends on rainfall. The crop is grown there only one time a year. Till today, the rainfall has not taken place. So, the farmers are crying bitterly. Normally, the farmers take loan from the co-operative banks for purchase of cattle, buffalo, bullocks etc. to take care of their agricultural needs. So, they do not know what to do now. The seeds which were to grow into plants have died for want of water. In some parts of the land, the farmers had sown the seeds which have also dried out. The farmers are unable to collect the seeds and again sow them into the fields. The farmers are unable to decide what they have to do now.

            In this regard, I would like to submit that the people are facing drought in various parts of the country for want of rainfall. The drought has happened and the rains did not come due to change of weather and climate, due to excess of carbon dioxide and due to pollution of different types. 

            On the other side, Aila Cyclone had come in West Bengal and three or four districts were flooded due to which all types of moveable and immoveable properties – houses and cattle – were destroyed there. Even after 62 years of Independence and several Five Year Plans, we have not been able to put in place a long-term strategy to resist the drought and floods in the country. It should be looked into. Mr. Chairman, my humble submission to the hon. Minister, through you,  is that short-term and long-term strategies should be adopted to resist the floods and droughts. If the short-term and long-term strategies or policies for agriculture are adopted, farmers will be able to pass through such periods and they will be able to cultivate their land and resist drought.

My humble submission to the hon. Minister, through you, is that rain water should be preserved by constructing dams; irrigation projects should be there; and the Master-plan should be prepared. Further, the long-term strategy and short-term strategy for irrigation, proper development of agriculture, etc. should be adopted. I am saying this because it has not been done even after 62 years of our Independence. Therefore, my humble submission, through you, is that it should be adopted.

MR. CHAIRMAN : The next speaker is Shri Dushyant Singh. Hon. Member, please be brief while making your speech.

SHRI DUSHYANT SINGH (JHALAWAR):     Sir, it is my first speech in the 15th Lok Sabha. I would at least need five minutes to speak.

MR. CHAIRMAN: No, I would not be able to give you more than a maximum of five minutes.

 

SHRI DUSHYANT SINGH : Mr. Chairman, Sir, I would like to thank you for giving me a chance to speak on a very important topic regarding drought and flood in India. It is a calamity, which happens round the year, and on some days some States have drought while some other States have flood.

            The Indian ‘aam aadmi’ depends primarily on agriculture. … (Interruptions)

श्री लालू प्रसाद(सारण) :महोदय, मैं आपसे जानना चाहता हूं कि आप पार्टीवाइज कितने आदमियों को बुलवाएंगे? हमारे दल से एक माननीय सदस्य बोले हैं, हम तीन आदमी और हैं। क्या कोई सीमा है या नहीं?

MR. CHAIRMAN: No, it is not like that. It is not possible. The time is over. The Minister is going to reply within 10 minutes or so.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: He is going to reply around 6 o’clock.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Most of the Parties have availed their time. Hence, there is no time at all left with the Parties. More or less, all the Parties have availed their time.

… (Interruptions)

श्री लालू प्रसाद: क्या आप और लोगों को इजाजत देंगे?

MR. CHAIRMAN: No. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Hon. Member, you can continue your speech.

… (Interruptions)

श्री आर.के.सिंह पटेल (बांदा):महोदय, यह बहुत महत्वपूर्ण चर्चा है। इस विषय पर आठ बजे तक चर्चा होनी चाहिए। ...( व्यवधान)

SHRI DUSHYANT SINGH :           The Indian economy primarily depends on agricultural production. … (Interruptions)

            Our GDP has been reduced from 21.7 per cent in 2003-2004 to 17.8 per cent in 2007-2008. As regards employment opportunities, it has also been reduced due to this decline. The raw material production has also been affected with drought, rain and flood. The average growth has also been reduced from 4.9 per cent in 2005-2006 to 4 per cent in 2007-2008.

            I would just like to say that there has been lack of production of rice due to lack of rain. In today’s paper in the Express it has been stated that rice production has been reduced, and they have been talking about top dressing rice fields. If we give them more urea or more fertilizers, then this will help in increasing the production of rice. Likewise, sugarcane production has also come down.

            In the State of Rajasthan, from where I come, we produce soyabean, and soyabean production has also been reduced by around 35 per cent. It has been stated in the Financial Express that :

“…soyabean, the largest oil seed grown in India during the Kharif plantation largely in Madhya Pradesh, Maharashtra, Rajasthan and Chhattisgarh, will badly suffer due to lack of monsoon…”               I would just like to say that we, in India, depend primarily on rain, and on the South-West monsoon, which comes from the month of May till the month of September.
             We should think about inter-linking of rivers; we should think about better strategies of remote sensing; we should think about information and communication technologies; and GIS technology. Thereafter, we should link it to our Krishi Vigyan Kendras to improve production of our crops.
            Sir, all our States depend on irrigation projects. I come from Rajasthan. In my State of Rajasthan, we have 10.4 per cent of kshetraphal of which, in only 1.16 per cent area, we have water sources. Jalawar and Baran in the State of Rajasthan where I come from, it is the Cherrapunji of Rajasthan, we have the Kalisindh Project which is yet to begin. We have another famous project called Parwan Lift Irrigation Scheme which costs Rs. 1,114 crore. With the implementation of this Scheme, the water level in Jalawar-Baran region will go up.
            I would like to ask you about funding of these irrigation projects. We have a Five-Year Plan, and these Five-Year Plans keep on shifting the projects to the next Five-Year Plans. As I went through the questions answered on 22.07.2009 relating to the Water Resources Ministry, I learnt that in the State of Rajasthan, under the CWC, there were numerous projects, like Pipalda Lift Irrigation Project, Hatiadeh Irrigation Project, Parwan Irrigation Project, Andheri Irrigation Project, Rajgarh Irrigation Project, Manohar Thana Irrigation Project. I would urge the Government to help the State Governments to provide proper irrigation facilities to our people, and this will help the growth during bad monsoon period and also help in the production of soya bean and other crops.
            I would like to end by saying what should be done for having adequate food supplies. The Public Distribution System should be proper, otherwise this will affect all the States of India. Secondly, as there is no power in the States, the farmers have to depend on diesel. As diesel is costly, it affects the grocery bill of the aam admi. If the grocery bill goes up, the aam admi has to pay a huge amount for his daily grocery bills. The number of Indian bread basket States has been reduced. The States of Punjab and Haryana have shortage of rainfall and because of that, the production of rice and others crops has come down. Power crisis is looming in every State. Irrigation projects are not working.
            In the last 30 years, I just want to let you know that in the North Eastern States, like in Nagaland, there is 67 per cent less rain; in Assam, there is 34 per cent less rain; in Arunachal Pradesh, there is 29 per cent less rain; and in Cherrapunji, there is 55 per cent less rain which is due to global warming. When the Prime Minister has intervened, they have created State Monitoring Agencies. I would urge the Government to take measures by which these things can take place.
            Sir, due to less rainfall, the Planning Commission’s target of four per cent will not take place, National Food Mission will be affected, and the import of food grains will cost our foreign exchange. Therefore, we should think about roof water harvesting. We should change the CRF norms and the NCCF norms. We should think about handicraft clusters in Rajasthan, and in this manner help the aam admi to earn revenue.
श्री गणेशराव नागोराव दूधगांवकर*(परभणी): महोदय, आपने मुझे संसद में अपनी बात रखने का अवसर दिया,उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। सूखे के बारे में मैं आपके माध्यम से कुछ सुझाव रखना चाहता हूं।
      किसानों की हालत सुधारने के लिए यह शासन गंभीर रूप से इच्छुक है। केन्द्र सरकार ने एनआरईजी एक्टशुरू किया है। इसके बारे में मैं निम्नलिखित बातें आपके सामने रखना चाहता हूं: नरेगा के माध्यम से पूरे हिन्दुस्तान में खेती को आगे ले जाने के लिए रास्ता बनाना चाहिए। मराठवाड़ा विभाग में कई इरिगेशन प्रोजेक्ट्स अधूरे हैं जैसे लोअर दुधना, जायकवाड़ी का राइट बैंक कैनाल पूरा करना होगा। भविष्य में सूखे का मुकाबला करने के लिए नदियों के पानी का उपयोग करना ही होगा। किसान, कामगार और गांव में नरेगा से जुड़ी योजनाओं को पूरा करना होगा। मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय के लिए रकम मांगी है। उन्हें संसाधन करने के लिए, कम पानी (रेन फाल) से फसल लेने के लिए हिन्दुस्तान के कृषि विश्वविद्यालय को बढ़ाना चाहिए। लैण्ड डेवलपमेंट प्रोग्राम सरकार को हाथ में लेना होगा। पीने का पानी, जानवर का चारा, लोगों के लिए खाना, दाल, चावल, रोटी, खेतों के लिए पानी, खाद, बीज मिलना चाहिए। खेती, किसान, कामगार और जमीन से मिलकर होती है। दाल, कॉटन, गन्ना, ज्वार, मेज़ आदि की खेती के लिए project में पानी नहीं है। लैब टू लैण्ड एक्सपेरिमेंट, कृषि विश्वविद्यालयों को सक्षम बनाना होगा। कृषि संस्थानों को सरकार को सक्षम करना होगा। एग्रो processing industries का डेवलपमेंट करना होगा। किसान रहेगा तो देश रहेगा। भारत को कृषि प्रधान देश कहते हैं। प्रधान को काम करने के लिए सब सुविधाएं देनी चाहिए। जो देश के 110 करोड़ लोगों को अनाज देता है, उसका सम्मान करना होगा वरना कुछ नहीं रहेगा। बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर इन एग्रीकल्चर जैसे जमीन, पानी, बिजली, जरूरी रूपया, खाद सस्ता व समय पर देना होगा।
 
* Speech was laid on the Table.
  धान का मूल्य जो होता है और एक हेक्टेअर खेत में उत्पादन के लिए खर्चा लिखा जाता है। किसान के घर का पूरे साल भर का खर्चा, बच्चों की शिक्षा, लड़की की शादी जैसे खर्च होते हैं। पार्टनर की पूरी पगार जमा होगी। 20 प्रतिशत मार्जिन एड (जमा) होना है। इस प्रकार से भाव किसान को मिलना जरूरी है।
इसके अलावा मैं कुछ अन्य बिन्दु आपके सामने रखना चाहता हूं: पीने का पानी, अनाज, जानवरों को चारा-पानी, कामगारों को काम, एग्रीकल्चर के लिए ड्राई लैण्ड का डेवलपमेंट होना चाहिए। बायो-टेक्नोलॉजी, एनआरईजीए (नरेगा) में सुधार करना होगा । लोअर दुधना project should be implemented in time, Agro-university Research Project should be approved. Insurance should be given to all farmers.
     
श्रीमती अन्नू टण्डन (उन्नाव) :सभापति महोदय, मैं आपका शुक्रिया करती हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं बहुत कम समय में अपनी बात कहने की कोशिश करुंगी। सबसे पहले मैं माननीय प्रधान मंत्री जी और माननीय कृषि मंत्री जी को धन्यवाद देने के साथ-साथ उनकी सोच और समझ पर पूरा भरोसा जताना चाहती हूं, पूरा भरोसा जाहिर करना चाहती हूं। यहां पर बाढ़ और सूखे पर बहुत चर्चा हुई है और कोई भी सांसद ऐसा नहीं है जिसे हमारे देश के हालात के बारे में पता न हो। मुझे अपनी सरकार पर पूरा भरोसा है और इस भरोसे का सरकार ने पूरा परिचय दिया, जब उन्होंने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए, हमारे किसानों का 72 हजार करोड़ रुपये का ऋण माफ किया था। अभी जो स्थिति आई है, उस पर भी इनके निर्णय सही होंगे, इस पर मुझे पूरा भरोसा है। अपनी उदारता का एक और परिचय इन्होंने दिया, जब स्वाइन-फ्लू का मसला आया था। स्वाइन-फ्लू का मसला जब आया तो हमारे देश में आने के पहले ही, सिर्फ पता लगने पर हमने इसे जिस तरह से कंटेन करके मैनेज किया, यह भी उनकी सजगता का एक उदाहरण है।
SHRI RAJIV RANJAN SINGH ALIAS LALAN SINGH (MUNGER): Swine flu has become an epidemic.… (Interruptions)  मैडम स्वाइन-फ्लू के बारे में बता रही हैं।
श्रीमती अन्नू टण्डन :हम स्वाइन-फ्लू के बारे में नहीं बता रहे हैं, आप शायद...( व्यवधान) एनालॉजी का मतलब नहीं समझते जो उदाहरण के लिए दिया जाता है।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Let us listen to what she says.
… (Interruptions)
SHRI RAJIV RANJAN SINGH ALIAS LALAN SINGH : She should have read the newspaper today.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please sit down.
श्रीमती अन्नू टण्डन :नैचुरल डिजास्टर की बात हो रही थी और इससे पहले भी जब हम बोलने खड़े हुए थे तो हमारे कुछ सदस्य मेरी बात को समझ नहीं पाये। मैं उन्नाव की हूं और मैं भी गांव में रही हूं, ऐसा नहीं है कि मैं शहर से टपक कर यहां आ गयी हूं। उनके दिल और दर्द को समझती हूं। मैं चाहती थी कि मैं वहां जाऊं और पूरे देश में अगर इसे नेशनल कैलेमिटी घोषित करना है तो यहां सुझाव देने से पहले, मैं अपने घर के हालात को देखना चाहती थी। बस मैं उतना ही कहना चाह रही थी, उन्होंने उसका गलत मतलब लगाया कि मैं यहां चर्चा करना नहीं चाहती। बिना चर्चा, बिना बातचीत और समझ के, मेरे ख्याल से कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सकता, इसलिए मुझे चुनकर यहां लाया गया है।
      इस चीज को हम सब जानते हैं कि जून से सितम्बर के बीच में 75 प्रतिशत जो वर्षा होती है, वही मुख्य वर्षा होती है, मेन वर्षा होती है, जिसके ऊपर किसान की सिंचाई और फसल निर्भर करती है। एक बात और हम जानते हैं कि 16 प्रतिशत हमारे देश की जमीन सूखाग्रस्त रहती है, ड्रॉट-प्रोन रहती है। हमारे एक माननीय सदस्य ने बताया था कि प्रतिवर्ष 5 करोड़ लोग सूखे से प्रभावित होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि10 साल में कम से कम चार साल ऐसे होते हैं जिसमें एवरेज सूखा पड़ता है। इस बात को हम सभी मानते हैं। इन सब चीजों को जानने के बाद मैं यहां पर संक्षेप में दो चीजें कहना चाहती हूं। एक होता है शॉर्ट-टर्म और एक होता है लाँग-टर्म। शॉर्ट-टर्म पर हर व्यक्ति अपन देश से,ो प्रदेश से और सरकार से पैकेज मांगता है। मैं अपने क्षेत्र के किसानों के पास गयी थी और उन्नाव में जो उन्होंने कहा, उनके दुःख-दर्द को मैं यहां माननीय कृषि मंत्री जी तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हूं।मैं माननीय कृषि मंत्री जी से कहना चाहती हूं कि यह मामला सिर्फ आपका नहीं है, यह मामला वाटर-रिसोर्सेज, एनवायरनमेंट और रुरल डिवेलपमेंट मिनिस्ट्रीज का भी है और इन सारी मिनिस्ट्रीज को मिलजुलकर, इसके बारे में सोचना होगा। यह सिर्फ एक कृषि मंत्रालय के हाथ की बात नहीं है। यह मामला प्राकृतिक है और भगवान की मर्जी पर निर्भर करता है। मेरे एक किसान भाई ने मुझसे कहा कि दीदी अगर दस से 12 अगस्त तक भी भगवान ने वर्ष दे दी तो हम इस प्रकोप से अपने को निकाल कर ले जाएंगे, आप फिक्र मत कीजिए।...( व्यवधान) अगर 10 से 12 अगस्त तक वर्षा हो जाती है, ...( व्यवधान) हालात तो खराब हैं लेकिन उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है।...( व्यवधान) वह किसान जो मुझे आश्वासन दे रहा था, उसकी बात बता रही हूं। ...( व्यवधान) एक गरीब किसान के दर्द को सुनने की कोशिश कीजिए। वह भी जानता है कि उसे प्रदेश सरकार से कितना मिलेगा।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please wind up.
श्रीमती अन्नू टण्डन :उनका यह भी कहना है कि अगर आप कोई पैकेज देते हैं तो माननीय कृषि मंत्री जी से मेरा अनुरोध है कि जो मापदंड आपने ऋण-माफी में गरीब किसानों के लिए अपनाया था, जिनके शायद पांच एकड़ या तीन एकड़ से कम जमीन वाले जो लोग हैं, उनकी फसल अगर बर्बाद हो गयी है तो उनके लिए जितना उनका उत्पादन है, उसका कम से कम एक-तिहाई भाग उन्हें सब्सिडी में मिलना चाहिए। इससे वे भूखे नहीं रहेगे।
      जिनके पास जमीन नहीं है, अगर हो सके तो बिना किसी पैसे के अनाज वितरण हो, तो बहुत अच्छा होगा। जिन किसानों के पास पांच एकड़ से ज्यादा जमीन है, उन्हें अगर कुछ नहीं दिया जाता है, तो कम से कम किसान क्रेडिट सुविधा के तहत अधिक मात्रा में ऋण देने की सुविधा दीजिए, खास कर सब्सिडाइज्ड़ इंटरेस्ट पर इरिगेशन से रिलेटिड इम्प्लिमेंट्स होते हैं, अगले साल की तैयारी करने के लिए ऋण दिया जाए। किसान बीमा योजना पर जरूर नज़र रखी जाए, क्योंकि इसकी राशि का कभी-कभी सही ढंग से वितरण नहीं हो पाता है। लॉग टर्म बेसिस पर मैं सभी माननीय सदस्यों से आपके द्वारा कहना चाहती हूं कि हमें कुछ सोचना है, तो वाटर कंजर्वेशन की बात, वाटर रिजर्व्स को डवलप करने की बात, इन्हें हम सब समझते हैं, लेकिन इसमें हम लोगों की भागीदारी बहुत जरूरी है। खास कर किसानों की भागीदारी जरूरी है, क्योंकि चाहे केंद्र की सरकार हो या प्रदेश की सरकार हो, हर चीज परोस कर नहीं दे सकती है। पकाने और खाने का काम हमें ही करना पड़ेगा। किसानों को समझाना, उनकी सहायता करना, उन्हें सब्सिडी देना बहुत जरूरी है।
MR. CHAIRMAN : You can lay your remaining speech on the Table.
श्रीमती अन्नू टण्डन :अंत में मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि इतना सब भुगतने के बाद कृषि मंत्री जी हम लोगों की, किसानों की ऐसी मदद करें कि एक क्रांति ले कर आएं, जिससे कि अगर अगले साल मानसून न आए, तो हमें यह दुर्दशा न देखनी पड़े।
MR. CHAIRMAN: Shri Ramashankar Rajbhar, you are the last speaker.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Only Shri Rajbhar’s speech will go on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: Please take your seats. If you want to make a point, put it in writing and lay it on the Table. They will be taken into consideration.
       
* Not recorded   श्री रमाशंकर राजभर (सलेमपुर): महोदय, आपने मुझे एक महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया है, उसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूं। बाढ़ और सूखे के बारे में पूरा देश चिंतित है और आजादी के 62 साल बाद भी चिंतित है। जो चीज धरती पर आ जाती है, उस पर मानव दिमाग ने, हमारी तकनीक ने काफी हद तक कब्जा कर लिया है। सरकारें बारिश तो नहीं करवा सकती हैं, लेकिन यदि बारिश हो गई और वह पानी हजारों किलोमीटर दूर गांवों को बहाकर समुद्र में मिल जाता है, तो इस पानी के संरक्षण का हमें प्रबंध करना चाहिए। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम इस पवित्र सदन में बाढ़ और सूखाढ़ पर चर्चा करते हैं, तो वह अमूल्य और अमृत पानी जो समुद्र में जा कर मिल जाता है, आज तक उस पानी का संरक्षण करने के लिए हमारी तकनीक कहां है, हमारा दिमाग कहां है, हमारे प्रयोग कहां है? एक क्षेत्र बाढ़ से डूब जाए और एक क्षेत्र में पानी न होने के कारण सूखा पड़ जाए, इस विडम्बना को दूर किया जाए, तो निश्चित रूप से एक के साधे सब सधे, हमारी भोजपुरी में कहा जाता है। हम अपने पानी को बचाकर उसे रोककर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचा दें, तो सूखे और बाढ़ से इस देश को निजात मिल सकती है। उदाहरण के तौर पर हम कहना चाहते हैं कि जहां थोड़ी बहुत नहरें हम बना पाए हैं, वहां निश्चित तौर पर सूखे का असर कम हुआ है। मैं जिस संसदीय क्षेत्र से आता हूं, वह जनपद देवरिया और बलिया को मिला कर बनता है। आपको जानकर ताज्जुब होगा, बहुत भयंकर सूखा पड़ा कि 17 जुलाई तक जिलाधिकारी बलिया और देवरिया से हमारी बात होती है। 17 जुलाई तक वर्ष 2008 में बारिश600 मिलिमीटर होती है और 17 जुलाई को देवरिया में केवल 100 और बलिया में केवल 32 मिलिमीटर होती है। आप इस स्थिति से सूखे का आभास कर सकते हैं। हम किसान के प्रति बहुत चिंतित हैं, लेकिन हमारे संसदीय क्षेत्र में एशिया के चार बड़े पावर हाउसेस में से एक पावर हाउस स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के गांव इब्राहिम पट्टी में लगा।
      हजारों एकड़ फसल, हजारों एकड़ जमीन किसानों की लेकर लगाई गई और एक-एक कठ्ठे में एक-एक पिलर लगे हुए हैं, वहां से पूरे देश को बिजली जा रही है। लेकिन बलिया के लोगों ने, जिन किसानों ने खेत दिया, कम से कम 1200 करोड़ की वह योजना है, उसकी तीन इतनी बड़ी-बड़ी मशीनें हैं जिनकी कल्पना भी मैंने अब तक के राजनीतिक जीवन में नहीं की थी। लेकिन उस पॉवर हाउस से बलिया का किसान भी बिजली नहीं पा सकता है।
      मैं अंत में एक ही बात कहना चाहता हूं और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं कि अभी अखबारों में सूखा क्षेत्र घोषित हो, यह बात छपना शुरु हुआ, उसके पहले ही वहां की मुख्य मंत्री जी ने पहले 20 जनपद और फिर 27 जनपद को मिलाकर 47 जनपद को सूखाक्षेत्र घोषित कर दिया और केवल इतना ही नहीं, वहां पर जैसे-जैसे रिपोर्ट आती जा रही है, 500 करोड़ रुपये का पैकेज मुख्य मंत्री जी ने केन्द्र से मांगा है और केन्द्र सरकार संवेदनशील होकर जो उस प्रदेश के लिए पैकेज की मांग की गई है, उसे देने का काम करेगी।
I also lay my rest of the speech on the Table.
     *सबसे पहले आजादी के लिए आहूति देने वाले दीवानों को नमन करता हूं । आजाद भारत के उस महामानव डा. अम्बेडकर को नमन करता हूं जिन्होंने आजाद भारत के नर-नारी और गरीबों को वोट देने का अधिकार दिलवाया । जिसके व्यक्त चुनाव लड़ने का अधिकार पाया । हमारे संसदीय क्षेत्र सलेमपुर की जनता ने हमें चुनाव में जिताकर यहां भेजा ।
      सभापति जी, बाढ़ और सुखाड़ हमारे लिए चुनौती है । नदियां हजारों किलोमीटर तबाही मचाती हुई अमूल्य जल को समुद्र में गिराती है। पिछले62 वर्षों से हम लोग इस जल को रोक कर सुखाड़ से लड़ने लायक नहीं बना सके । जहां पानी रोक कर नहरें निकाली, यहां निश्चित रूप से सूखा से लड़ा जा सकता है । मैं केंद्र सरकार से प्रकृति से बारिश करने के लिए नहीं कहता लेकिन बारिश के पानी को रोक कर किसानो की कृषि को बचाया जा सकता है ।
      हमारे संसदीय क्षेत्र देवरिया में 17 जुलाई तक पिछले साल की600 मि.मी. वर्षा की तुलना में 122 मि. मी. वर्षा हुई है । इसी तरह जनपद बलिया में पिछले वर्ष 450 मि. मी. वर्षा हुई लेकिन इस वर्ष केवल 32 मि. मी. वर्षा हुई है । इस कारण देवरिया और बलिया जिले में सूखा भयावह रूप से जान सकते हैं । प्रदेश सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है और 47 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है । सरकार ने 10 घंटा बिजली मुफ्त बीज, बीपीएल के साथ एपीएल को लाभान्वित कर अनाज देने, नःशुल्क दवा शिविर, अशक्त लोगों के लिए सामूहिक रसोई, पशुचारा, पानी, इलाज, देय वसूली स्थगित करके जनवेदना को समझकर माननीया मुख्यमंत्री जी ने तुरंत कार्यवाही की है ।
      प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 230 करोड़ रूपया का प्रस्ताव राज्य सरकार ने स्वीकृत कर केंद्र सरकार को भेजा है जो यहां लंबित है । इन प्रस्तावों में टयूबवैलों को उर्जीकरण के लिए 100 करोड़ रू. की योजना, नए टयूबवेलों के बोरिंग, चैक डैम के लिए251 करोड़ रू. का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है । ये बातें अखबारों में छपी है । मेरे मांग है कि 502 करोड़ रू. का पैकेज जो कृषि मंत्रालय का है, इसे अविलंब सरकार को भेजना चाहिए ।*   *…..* This part of the speech was laid on the Table.
   
SHRIMATI JAYAPRADA* (RAMPUR): Madam Speaker,   I rise to participate in the discussion on drought and floods in the country.   Monsoon has failed us this year also and there is drought almost through out the country and it is prevalent in all districts of Uttar Pradesh. All sections of the people and specifically farmers have already been hard hit by economic recession.   The prices of essential goods i.e. fruits and vegetables, grains, pulses have already sky rocketed and with the failure of monsoon the poor people will be ruined. Almost all parts of our country depend on monsoon for agricultural activities and since the monsoon has failed the poor farmers keep  their fingers crossed   as to what to do next.     With no support \from either Central Government or the State Government the farmers in Uttar Pradesh and other regions also are facing severe hardship. In view of severe drought conditions I demand that the whole of Uttar Pradesh should be declared as a drought affected State and all loans of farmers should be waived with immediate effect.  They may be given consumption loan at subsidized rates.
            Madam Speaker, all the states of our country AP, UP, Maharashtra, MP, Bihar, Tamil Nadu, Orissa, Rajasthan are affected with drought this year. The farmers are in severe crisis and have suffered due to the extreme climates. 
            I am from Andhra Pradesh but my Karam Bhoomi is Rampur, that is UP, which has received 25% less rainfall. All the dams are dry and no water for the agriculture particularly in UP. Budhelkhand water project is still pending. There is no time bound. That is why people in crisis without water. Agriculture in our country is 70% . Rampur is more of cane growers, wheat and rice producers. They are completely in financial crisis. They should get the benefit of loan waiver completely and special packages should be given to UP farmers and advance financial support from the Banks.
_________________________________________________________________ * Speech was laid on the Table.
            The National Calamity Management should give information to alert in time of drought and rain water harvesting should be introduced. Forest trees should be protected and Swaminathan Committee report should be implemented. And subsidy should be followed like in Haryana and Punjab. Total drought package for UP farmers should be given. As far as floods are concerned, linking of major rivers in  the country is required. Till today no steps has been taken in this regard. With this measure, some parts will be relieved from drought situation.
                                         
श्री मदन लाल शर्मा (जम्मू):सभापति जी, मैं पांच मिनट के बजाए तीन मिनट में ही अपनी स्पीच समाप्त करूंगा लेकिन बीच में कोई इंटरप्ट न करे। महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे ललन जी के द्वारा शुरु की गई बहस पर बोलने का मौका दिया जो बहुत ही अहम और महत्वपूर्ण है और बहुत सारे मैम्बर्स इस पर अपने ख्यालात व्यक्त करना चाहते हैं। सामान्य तौर पर सारे देश के ऊपर जो एक बहुत बड़ी आफत आई है और अपने-अपने स्टेट और अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र के मसलों पर अपने सुझाव देना चाहते हैं कि इनसे निपटने के लिए केन्द्रीय सरकार को, रियासती सरकार को न सिर्फ एग्रीकल्चर मिनिस्ट्री को ही लेकिन इसके साथ और भी जो दो-चार पांच मिनिस्ट्रीज हैं, उनको मिलकर एमर्जेंसी मीटिंग करके कहां-कहां यह सूखे की मुसीबत आई है, रियासतें भी आइडेंटिफाइ हुई, उन रियासतों के अंदर बहुत सारे जिलों को भी आइडेंटिफाइ कर लिया गया है, लेकिन मैं दो-तीन बातें कहूंगा, बदकिस्मती की बात यह है कि कहीं फ्लड आ रहा है और कहीं बारिश नहीं हो रही है। मैं कहूंगा कि इस सूखे को कुदरती आफत की लिस्ट में शामिल कर देना चाहिए क्योंकि यह हर साल देश के किसी न किसी कोने में आता है, किसी न किसी रियासत में होता है। इसलिए मैं समझता हूं कि यह नहीं कि जब सारे देश में सूखा आए, उसी वक्त ही हमें चिंता करनी चाहिए और उसी वक्त ही हमें सारे इंतजामात करने चाहिए लेकिन इसके लिए हमें हमेशा तैयार रहना है। यह तो एक बात हुई।
      दूसरे, यहां फ्लड की बात की गई। मैं जम्मू-कश्मीर से आता हूं। वहां बहुत नदी-नाले हैं, बहुत बड़े दरिया हैं। हालांकि सूखा है लेकिन उसके बावजूद भी इस मौसम में अगर एक ही फ्लड कहीं आ जाएगा, एक दिन ही बारिश आ जाएगी तो सैकड़ों एकड़ जमीन बह जाती है। बहुत सारी इरीगेशन दरिया के दोनों किनारों पर होती है। बाढ़ आ जाती है तो उसके कारण एक तो हमारी जमीन गिरती है और दूसरे किसानों की परेशानी बढ़ती है और बेरोजगारी भी ज्यादा बढ़ती है।
17.59 hrs.                (Shri P.C. Chacko in the Chair)       इसलिए मैं कहूंगा कि उसके लिए एक ऐसा अमलीजामा बनाना चाहिए जिसके अन्तर्गत हमारे दरिया को आइडेंटिफाइ कर लेना चाहिए और जो फ्लड से ज्यादा प्रभावित होते हैं जिनमें फ्लड से ज्यादा नुकसान होता है, इसलिए उन दरिया को आइडेंटिफाइ कर लेना चाहिए ताकि एक तो जमीन रैस्टोर हो और दूसरे लोगों को रोजगार भी मिले। तीसरी बात है कि एग्रीकल्चर मिनिस्टर साहब यहां तशरीफ रखे हुए हैं, मैं उनसे रिक्वेस्ट करूंगा कि जैसे इरीगेशन वॉटर रिसोर्सेज मिनिस्ट्री के पिछले साल भी उन्होंने बहुत सारे प्रोजेक्ट्स माइनर इरीगेशन के सैंक्शन किए, उनके ऊपर काम भी चल रहा है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि बहुत ज्यादा पानी जो हमारे मुल्क से पाकिस्तान में जाता है, उसमें बाकायदा तौर पर जैसे मेरे क्षेत्र के अंदर पुंछ में है, रजौरी में है व दरिया चनाव है, मनावर तवी है, उसके साथ जम्मू तवी है, वसन्तर है, उनके ऊपर डैम बनाये जा सकते हैं और जब कभी इस किस्म की यह खुश्कसाली आए तो उन डैम्स का पानी लिफ्ट करके किसानों को दिया जा सकता है।
18.00 hrs       इससे अनाज की पैदावार ज्यादा होगी और इस परेशानी, इस चुनौती के साथ निपटा जा सकेगा। दूसरे चेयरमैन साहब आ गए हैं, अब मैं किसी दूसरे मैम्बर का समय नहीं लेना चाहता हूं। इस सदन में मेरे साथियों ने जो अपने ख्यालात का इज़हार किया है, मैं अपने आपको उनके ख्यालातों के साथ जोड़ता हूं। मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने समय दिया और मुझे अपने क्षेत्र और रियासत की नुमाइंदगी करने का मौका मिला ।
 

श्री गणेश सिंह (सतना): महोदय, मध्य प्रदेश का विषय नहीं आ पाया है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, I have to make an announcement.

… (Interruptions)

श्री गणेश सिंह: महोदय, मध्य प्रदेश की बात नहीं आ पाई है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय:   आप बैठिए।

…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat. I have to make an announcement. Hon. Members, we have allotted four hours for the discussion on this topic.  We have taken more than five hours.  Now, there are many more Members to speak but I am sorry the Chair cannot allow all the Members to participate in the discussion.  Therefore, with the consent of the House, I am winding up the discussion.  I invite the hon. Minister to reply.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please speak one at a time.  Let me hear the hon. Member.  Please take your seat.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat. I am on my legs.

… (Interruptions)

श्री आर.के.सिंह पटेल (बांदा):हम सदन में आए हैं। हमें बोलने के लिए कम से कम दो मिनट तो मिलने चाहिए। ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Hon. Minister, please wait for a minute.  Hon. Members, why are you not listening to the Chair?

… (Interruptions)

श्री आर.के.सिंह पटेल: हम किसान हैं। आप किसान की जुबान बंद नहीं कर पाएंगे।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: I am on my legs. You please take your seat.

… (Interruptions)

श्री आर.के.सिंह पटेल: हम आपका संरक्षण चाहते हैं।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: I am allowing him.

… (Interruptions)

श्री आर.के.सिंह पटेल: मैं आज यहां से नहीं जाऊंगा, रात को भी यहीं रहूंगा।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.

(Interruptions) …* MR. CHAIRMAN:  Why are you behaving like this?  Why do you not cooperate with the Chair?

… (Interruptions)

श्री गणेश सिंह: महोदय, हमारे सीनियर मैम्बर नरेंद्र सिंह जी मध्य प्रदेश की तरफ से बोलेंगे।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN:  I am allowing him and you are disturbing others also. I will allow some hon. Members for three minutes each.

… (Interruptions)

     

* Not recorded.

श्री गणेश सिंह*(सतना): देश में लगातार प्राकृतिक आपदा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। देश में कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ रहती है, इसके अलावा भी भूकम्प, सुनामी, चक्रवात जेसी अन्य प्राकृतिक आपदाओं से पिछले तीन वर्षो से एक लाख से अधिक लोग मारे गये। कई लाख पशु मारे गये, अरबों की फसलें नष्ट हो गई।

      जिस देश की 65 प्रतिशत खेती मानसून पर आधारित हो उस देश में यदि मानसून अनुकूल नहीं होगा तो देश तबाही की ओर जायेगा ही। देश की कुल आबादी का 70 प्रतिशत आदमी खेती पर निर्भर है। 42 प्रतिशत किसान देश के मात्र 2 एकड़ में खेती करके परिवार पाल रहे हैं।

      देश में तीन वर्षो में कई राज्य सूखे एवं बाढ़ से प्रभावितहुए हैं। मेरे पास पूरे आंकड़े हैं। आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, तमिलनाडु, मणिपुर, छत्तीसगढ़ सूखे से प्रभावित हैं।

      मध्य प्रदेश में 2007-08 में 10 जिले, 008-09 में 39 जिले और अब 41 जिलों के 152 तहसीलों में सूखा है।

      मेरे निर्वाचन क्षेत्र सतना में अब तक266.2 मिली लीटर बारिश हुई है। रीवा में256.8 मि.लीटर। सीधी में 270 प्रतिशत मि.लीटर, जो औसत वर्षा से कम है। प्रदेश का रीवा, शहडोल, चम्बल, सागर एवं ग्वालियर संभाग में सूखे का व्यापक असर है।

      60 प्रतिशत किसानों ने बोनी नहीं किया। 40 प्रतिशत किसानों ने बोनी तो की लेकिन अब फसल सूख रही है। प्रदेश विगत चार सालों से सूखे की मार झेल रहा है। केन्द्रीय अध्ययन दल अप्रैल मई में गया था। सूखे से निपटने के लिए मदद की सिफारिश भी की थी।

      खरीफ की फसल की बुवाई हो नहीं पाई। साथ ही जो बुवाई हो भी गई है वह अब सूख रही है। राजस्थान में 22 जिले 2006-07, 12 जिले 2007-08 में तथा2008 एवं 2009 में 12 जिले। उत्तराखंड में2007-08में9 तथा 2008-2009 में 11 जिले। उत्तर प्रदेश 2007-08 में 9 जिले, 2009-10 में 47 जिले सूखे से प्रभावित हैं।

     

* Speech was laid on the Table.

      सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि समूचा उत्तर भारत सूखे की चपेट में है। सूखे के कारण बिजली उत्पादन कम, कृषि उत्पादन कम। भुखमरी है, पेयजल संकट है, पशुओं के लिए चारे और जल का संकट है।

      विगत वर्ष देश में 28 प्रतिशत जिलों में औसत वर्षा अधिक थी।48 प्रतिशत जिलों में सामान्य वर्षा से 23 प्रतिशत से भी कम वर्षा। देश में 81 बड़े जलाशय हैं, जिनमें 151-77 बिलियन घन मीटर बीसीएम भंडारण रहता है, परन्तु 141.62 बी सी एम का भंडारण हो पाया था। क्या इस विषय को सी एम सी जो जल बोर्ड आयोग है उसे गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए। इसी तरह बाढ़, चक्रवात, तूफान, भूस्खलन के कारण जो क्षति हुई। 26 राज्यों में वर्ष 2006-07 से 2009-10 तक में लाखों लोग मारे गये। लाखों घर गिर गये, लाखों पशुओं की जान चली गई।

      2005 में आपदा प्रबंधन बनाया गया जो राज्यों के साथ मिलकर आपदा प्रबंधन की योजना बनाने का काम दिया गया। लेकिन अभी तक कोई कारगार उपाय नहीं किये गये। इसके पहले 1976 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग का गठन हुआ। 1972 में गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग बनाया गया जिसमें 23 नदियों को शामिल किया गया। बाढ़ प्रबंधन बोर्ड की स्थापना। लेकिन सार्थक परिणाम कुछ नहीं निकले ।

      2002 में राष्ट्रीय जल नीति का सरलीकरण किया गया। असम बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्व उत्तर प्रदेश में बाढ़ नियंत्रण के लिए2004में एक कार्यदल का गठन किया गया।

      2007 में केन्द्र सरकार ने 8000 करोड रूपये का एक फंड बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के लिए तैयार किया था कि नियंत्रण होगा लेकिन कुछ नहीं हुआ। आखिरकार इन तमाम कोशिशों का क्या हुआ। केन्द्र सरकार आज तक कोई ठोस एवं कारगर उपाय देश को नहीं बता पाई है।

      एनडीए के शासन काल में नदियों को जोडने की जो बात कही गई थी, जिसमें 10 हजार करोड रू. का प्रावधान भी था उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, नहीं तो आज देश की स्थिति कुछ और होती।

      पुरानी पद्वतियों को विकसित करना होगा जिससे प्रकृति को समझा जा सकता है। जो प्रकृति ने हमें दिया था, जिनके लक्षणों का पता लगाना होगा। सुनामी में अंडमान के अंदर एक जनजाति को पहले पता हो गया था। बाढ़ आने पर गाय का रंभाना, अनेकों पशु पक्षियों के माध्यम से प्रकृति ईशारा करती है।

      मेरी मांग है कि पुरानी पद्वतियों पर रिसर्च किया जाये तथा उसे विकसित करते हुए प्रकृति के संतुलन को बनाये रखने हेतु कारगर उपाय किये जायें।

 

श्रीमती जयश्रीबेन पटेल* (महेसाणा): अभी हाल ही में गुजरात में भारी बारिश की वजह से जो बाढ़ आयी है उसके बारे में मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ ।      15 से 25 जुलाई तक मौसम की कुल बारिश का 51 प्रतिशत बारिश अब तक बरस चुकी है । यह बारिश खासकर के समुद्री तटवर्ती इलाके के सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के इलाकों में ज्यादातर हुई । भारी बारिश की वजह से और टाइड के कारण गुजरात के जूनागढ़, पोरबंदर जिले में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गयी । सौराष्ट्र के सभी डैम ओवरफ्लो हो गये । इसी कारण डैमो में भारी मात्रा में पानी छोड़ने की नौबत आयी । इसके कारणवश जूनागढ़ जिले के वेरावल, मोंगरोल तालुके में और पोरबन्दर जिले के गाँवों में पानी अंदर तक पहुंच गया था और असाधारण सी स्थिति पैदा हो गयी थी । सभी गांवों का सम्पर्क टूट गया था । गुजरात सरकार ने एन.डी.आर.एफ. और एस.आर.पी. की विशेष टीमें सहायता के लिए भेजी थी । सौराष्ट्र के प्रदेश में और खासकर के जूनागढ़, पोरबंदर और जामनगर जिले में और बोये हुए फसलों को बहुत भारी नुकसान हुआ है ।

      राज्य के अन्य क्षेत्रों में रोड़, रस्ते, जलाश्यों, नालें भर गये थे । बिजली का इफ्रास्ट्रक्चर और मकानों में भी ज्यादातर नुकसान तकरीबन 300 करोड़ रुपयों का हुआ है ।

      जूनागढ़ जिले में 10 हजार लोग और पोरबन्दर में15 सौ बस्तियों को स्थानांतरण करना पड़ा । सहायता राहत और बचाव कार्यवाही तंत्र ने अच्छी तरह निभायी थी । हेलीकॉप्टर से63 हजार फूड पैकेट पोरबंदर जिले के 37 गांवों में भेजने का प्रबंध किया था । बाढ़ से प्रभावित इन इलाकों में पूर्ववत परिस्थिति की पुनःस्थापना के लिए कड़ी मेहनत दिखायी थी ।

      तारीख25 जुलाई तक इस भारी बारिश के कारण 72 लोगों की मौत हो गयी इसमें55 लाख रुपयों की मृत्यु सहायता-धनराशि दे दी गयी है । 450 जानवरों की मौत हुई है इसमें233 केस में7 लाख रुपयों की सहायता धनराशि दे दी गयी है ।

      गुजरात के भिन्न-भिन्न जिलों में कुल10 हजार मानवों का स्थानांतरण किया गया है इसमें से 6 हजार को 3 लाख रुपयों की कैसडोल की भरपाई कर दी गयी है । घर के सामान के रूप में गृहस्थ परिवारों में से 3 हजार परिवारों को कुल 32 लाख रुपयों की सहायता धनराशि का प्रावधान किया गया।

 

*Speech was laid on the Table.

 

      इस मानसून के बीच गुजरात राज्य के भिन्न-भिन्न जिलों में खासकर के दक्षिण गुजरात में भारी बारिश की वजह से और भारी आँधी के कारण खेती की बुवाई में बड़ा नुकसान किसानों को भुगतना पड़ा है। इन सभी का सहारा भी पानी में बह गया । दक्षिण गुजरात के भरूच, बड़ौदा जैसे जिलों में गन्ने की खेती करने वाले किसानों जिनमें ज्यादातर अनुसूचित जनजाति के किसान भी हैं, उनको करीबन 100 करोड़ रुपयों का नुसान झेलना पड़ा है ।

      इसी बाढ़ में केन्द्र सरकार ने अपना कर्त्तव्य निभायें और सहायता का प्रावधान करें जिस तरह वेस्ट बंगाल में केन्द्र सरकार ने जो धनराशि मुहैया करायी उसी तरह गुजरात में भी उचित सहायता धनराशि मुहैया करायी जाय ।

      महोदय, आपके माध्यम से मैं केन्द्र सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ कि गुजरात की इस बाढ़ को देश की "राष्ट्रीय आपदा " घोषित की जाय और गुजरात सरकार को उचित धनराशि सहायता का प्रावधान किया जाय ।

                   

श्री अर्जुन राम मेघवाल* (बीकानेर):राजस्थान में प्रायः पिछले60 वर्षों में 40 बार से अधिक सूखा पड़ा है।

इस सूखे के कारण सबसे प्रभावित पश्चिमी हिस्सा होता है, जिसे थार का रेगिस्तान कहा जाता है ।

      मैं राजस्थान के संसदीय क्षेत्र बीकानेर से आता हूँ, उसके आस-पास के 11जिले मुख्यता सूखे से ज्यादा प्रभावित होते हैं । सूखे से निदान के लिए सरकारें अपने स्तर पर प्रयास करती हैं, लेकिन ये प्रयास पर्याप्त नहीं होते हैं । अतः सूखे के स्थाई समाधान के लिए सेवण घास/पशुपालन जलकुण्ड आदी के बारे में सुझाव देना चाहता हूँ ।

      बीकानेर सम्भाग के हनुमानगढ़ से बाड़मेर तक के क्षेत्र में सेवण घास, भूरट, डचाभ, गढिया, पाला एवं मोठ, बाजरा, तिल, मूँग, ग्वार इत्यादि की खेती मुख्य रूप से की जाती है एवं यहां के लोगों का पशुपालन जीवन का अभिन्न अंग था और आज भी है । परन्तु स्थाई घास का पूरी तरह से पतन कर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप पशुओं का भी सफाया होना शुरू हो गया है । सारी स्थिति का गहराई से अध्ययन करने के पश्चात् स्पष्ट हो चुका है कि संबंधित क्षेत्र में प्राकृतिक घास उगाकर पशुपालन करना ही सर्वश्रेष्ठ रहेगा ।

      इन्दिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में नहर का पानी आने से खाने योग्य अनाज तो पैदा होने लगा है, लेकिन अभी भी किसानों के जीवन का आधार पशुपालन ही है । नहरी क्षेत्र में पानी की चोरी करने वाले कास्तकार अधिक खेत पकाते हैं और पशुओं पर ध्यान नहीं देते शेष सभी किसान गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंटगाडी इत्यादी से अपना भरण पोषण करते हैं । इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना दो चरणों में विभाजित है । प्रथम चरण में पशुओं की संख्या कम है और इस क्षेत्र में कृषि पशुपालक भैंस रखने में ज्यादा रूचि रखता है तथा गायें भी काफी संख्या में हैं परन्तु द्वितीय चरण में पशुओं की संख्या ज्यादा है।

      बीकानेर जिला दुग्ध उत्पादक संघ के विशेषज्ञों ने उत्तरी पश्चिमी राजस्थान का पूरा सर्वेक्षण् करके इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि प्राकृतिक वनस्पति जिसमें घास एवं पारम्परिक खेती के साथ पशुपालक कृषकों का उत्थान होगा और इससे रोजगार के नये स्रोत खुलेंगे, जिससे आम नागरिक को फायदा होगा ।

      उत्तरी पश्चिमी राजस्थान का जीवन-आधार पशुपालन एवं पारम्परिक खेती के साथ घस उत्पादन किया जाना था । स्वतंत्रता के पश्चात् नई तकनीकी अपना कर सेवण घस, भूरट डचाभ गडिया, पाला इत्यादि को पूर्णतया नष्ट कर दिया गया है और पारंपरिक खेती नाममात्र की रह गई है   *Speech was laid on the Table.

 

जो बरानी बरसात होने पर की जाती है । इस क्षेत्र के किसानों का पशुओं के लिए उत्तम घास सेवण, भूरट, पाला, डचाभ इत्यादि उगाकर पशुपालन करने से किसान को अधिक लाभ होगा इसके साथ पारंपरिक खेती करने से अच्छी गुणवत्ता वाला अनाज पैदा होगा ।

      इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना क्षेत्र में सेवण घास उगाकर पशुपालन किया जाने पर प्रति मुरबे की आय में10 गुणा तक बढ़ोत्तरी होना निश्चित है । मुंगफली, गेहू, नरमा उगाने के अनुपात में सेवण घास उगाने पर खर्चा आधे से भी कम होगा एवं पच्चीस बीघे में तीस गाय एवं 100 भेड़ बकरियों का चारा उत्पादित होगा । इसके साथ ही पारंपरिक खेती का लाभ भी वर्तमान खेती से कम नहीं होगा और तीस गायों का दुग्ध रोज 300 ली. उत्पादित होगा जिसका मूल्य4500रूपए प्रतिदिन होगा साथ ही 450 किलो गोबर प्रतिदिन प्राप्त होगा, जिसकी 2250 रु. प्रतिदिन आय है । इसके अतिरिक्त भेड़ बकरियों की आय 100 रू. प्रतिदिन होगी । इन पशुओं के लिए चारा खेत से ही उगाकर दिया जायेगा एवं पानी की व्यवस्था सिंचित क्षेत्र में उपलब्ध है मात्र चाटा एवं रख-रखाव का पैसा ही व्यय होगा । पारंपरिक खेती की आय खरीफ व रबी दोनों फसलों को मिलाकर 10,000 रु. प्रति बीघा निश्चित है । सेवण घास एवं पारम्परिक खेती के लिए सिंचाई पानी मात्र 2 क्युसिक प्रति हैक्टेयर लगाकर उत्तम खेती प्राप्त की जा सकती है ।

      सेवण घास के लिए सिंचित एवं असिंचित कोई प्रश्न ही नहीं उठता है क्योंकि सेवण भूरट डचाभ, फोग, पाला इत्यादि टिब्बों का `ाृंगार है और फववारा सिंचाई से केवल सिलन मात्र से ही उत्तम उत्पादन लिया जा सकता है ।

      उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में लाखों हेक्टेयर भूमि को नकारा करार दिया जाकर छोड़ रखा है जो थोड़े से ही सोना उगलेगी और लगभग2 करोड़ गायें एवं 20 करोड़ भेड़-बकरियों को आसानी से चारा उपलब्ध करवाया जा सकता है । 2 करोड़ गायों का दुग्ध20 करोड़ लीटर प्रतिदिन होना निश्चित है, जिसकी आय 300 करोड़ रुपये प्रतिदिन होगी । साथ ही 3 लाख टन गोबर प्रतिदिन मिलेगा । जिसकी आय 300 करोड़ रुपये प्रतिदिन होगी । जिसमें बकरियों का दुग्ध, भेड़ों की ऊन व खाद के रूप में मिंगणियों को मिलाकर अनुपात निकाला गया है । इसके अतिरिक्त इनकी बढ़ोत्तरी भी प्रतिवर्ष तीन गुणा होती है । क्योंकि भेड़ बकरी साल में दो बार ब्याहती है और इन पर खर्चा मात्र देखरेख एवं रखवाली का ही होता है ।

      इस क्षेत्र में बरसाती पानी को एकत्रित करने का पिछले साठ वर्षों से कोई प्रयास नहीं किया गया है, जिसके फलस्वरूप इन्दिरा गांधी नहर एवं कुओं के पानी पर ही निर्भर रहना महंगा साबित हो रहा है । मेरा इस संबंध में सुझाव है कि राजस्थान राज्य की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक किसान के लिए एक लाख लीटर क्षमता वाला वाटर टैंक बनाने की अनुमति किसान के स्वयं के खेत में दी जावें, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में पानी की उपलब्धता के लिए बेहतर आधारभूत ढाँचा विकसित हो सके एवं किसान अपने स्वयं के खेत में खेती के साथ-साथ बागवानी के लिए भी अग्रसर हो सके एवं आय के अतिरिक्त स्रोत भी विकसित हो सके । प्रथमतः राजस्थान के सभी 11 मरूस्थली जिलों में सभी5 लाख लघु एवं सीमान्त कृषकों को इस कार्यक्रम में सम्मिलित किया जावें । इसके लिए तकनीकी दृष्टि से 15 फुट व्यास एवं20 फुट गहरा टांका बनाना आवश्यक है, जिसके चारों ओर प्रत्येक जिले की औसत वर्षा के आधार पर कम से कम60 से 80 फुट व्यास का जलग्रहण क्षेत्र(आगौर) बनाया जाए । इस योजना के क्रियान्वयन मे हमारा यह भी सुझाव है कि जलग्रहण क्षेत्र स्थानीय मुरड़ या अन्य सामग्री से कुटाई कर पक्का बनाया जाए जिससे एक ही अच्छी वर्षा से टांका पूरा भर जाए । इस माप के टांके एवं आगौर के निर्मागण पर तकनीकी आंकलन के आधार पर लगभग 80,000/- का खर्चा आएगा । जिसमें लगभग 50 प्रतिशत श्रम पेटे एवं 50 प्रतिशत राशि सामग्री पेटे आवश्यक होगी । टांको का निर्माण सभी की सहभागिता से कृषकों द्वारा स्वयं ही अपने-अपने खेत में किया जाएगा । जिससे उसके परिवार के सदस्य एवं गांव में उपलब्ध भूमिहीन श्रमिक एवं अन्य बेरोजगार श्रमिकों को भारी संख्या में श्रम रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा।

      सेवण घास पर्याप्त मात्रा में होने से उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में मतीरा भी खूब उगाया जा सकता है एवं इसके साथ-साथ अति भयंकर खुशबू वाला फल काकडिया भी उगाया जा सकता है । इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में मेडिस्नल वेल्यू के पौधे जैसे तूम्बा, फोग, आकड़ा इत्यादि भी खूब विकसित किये जा सकते हैं, जिससे किसानों की आय में बढ़ोत्तरी हो सकती है ।

      इन्दिरा गाँधी नहर क्षेत्र के बीच आने वाले टिब्बों पर सेवण घास उगाने के लिए इन्दिरा गांधी नहर परियोजना से ही पानी उपलब्ध कराया जा सकता है । चालु व्यवस्था में परिवर्तन किया जाकर जल वितरण मात्रा घटाई जाकर बचत की जा सकती है क्योंकि अधिकांश पशुपालक कृषक संघ से जुड़कर पशुपालन एवं घास उगाने में अपनी रूचि दिखायेंगे जिससे स्वतः ही जन बचत संभव है ।

      पूरे पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्र में पशुपालन को बढ़ावा देकर प्रत्येक किसान को किसान की रूचि के अनुसार कम से कम पाँच पशु उपलब्ध करवाकर किसानों के बीच ए.पी.एल./बी.पी.एल का भेद मिटाकर प्रत्येक किसान के खेत में 1 लाख लीटर क्षमता का कुण्ड बनवाकर खेती के साथ-साथ पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय, मेडिसनल प्लान्ट, होर्टिकल्चर आदि को बढ़ावा देकर कृषि का समग्र विकास किया जा सकता है एवं किसानों की माली हालत को सुधारा जा सकता है ।

      इससे सुखे व आकाल के बावजूद भी किसान अपनी जीने लायक आजीविका पैदा करने में सक्षम हो सकेगा एवं सूखे/आकाल की मार से बचाव भी कर सकेगा ।

      संसदीय क्षेत्र बीकानेर में सूखे व आकाल के कारण पैदा होने वाली गंभीर समस्याओं पर मैं आपके माध्यम से भारत सरकार का ध्यान आकर्षण एवं सूखे एवं आकाल की स्थिति में भारत सरकार द्वारा सी.आर.एफ./एन.सी.सी.एफ. के तहत जो राहत उपलब्ध कराने की घोषणा की जाती है । उन सी.आर.एफ./एन.सी.सी.एफ. के वर्तमान के नियमों में संशोधन के सुझाव मैं आपके माध्यम से प्रस्तुत करना चाहता हूँ ।

शीत के कारण फसलों के नष्ट हो जाने पर मुआवजा       राजस्थान में अधिकांशतः गर्मी रहती है, लेकिन जब शीत ऋतु आती है तो राजस्थान के रेगिस्तान ईलाकों में कठिनाईयों का पहाड़ टूट पड़ता है, जिसमें फसल भी नष्ट हो सकती है । यदि पूरे क्षेत्र में फसल प्रभावित हुई है तो राज्य सरकार विशेष पैकेज के माध्यम से मुआवजा देती है । लकिन किसी विशेष क्षेत्र में शीत के कारण नष्ट फसल के नष्ट हो जाने पर केन्द्र अथवा राज्य सरकार द्वारा किसी प्रकार का मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है । जंगली जानवर द्वारा पालतू जानवर को मार देने पर मुआवजा       राजस्थान में कृषि के साथ-साथ जानवरों को पालना भी आजीविका कमाने का प्रमुख साधन है । अधिकांश परिवारों की आय का मुख्य स्रोत तो जानवरों को पालना ही है, ऐसी स्थिति में यदि उनके जानवरों को जंगली जानवर द्वारा मार दिया जाता है, तो उस परिवार के लिए जीवन-यापन करना कठिन हो जाता है । पालतू जानवर को जंगली जानवर द्वारा मार दिये जाने पर किसी प्रकार के मुआवजे का प्रावधान नहीं है । विद्युत करंट लगने से पालतू जानवर या इंसान की मृत्यु होने पर मुआवजा       राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तेज आंधी तूफान आते रहते हैं, जिससे बिजली के खम्भे व तार टूट कर गिर जाते हैं । भूलवश इंसान द्वारा या जानवर द्वारा तारों के नजदीक जाने या छू जाने से इंसान की मृत्यु होने पर मुआवजा विद्युत विभाग द्वारा बहुत ही कम दिया जाता है, इसे बढ़ाने की आवश्यकता है ।

प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान के लिए मुआवजा       राजस्थान में प्राकृतिक आपदा के कारण अधिकांशतः कच्चे मकान ढह जाते हैं और राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चे मिट्टी के मकान ही होते हैं । प्राकृतिक आपदा से आर्थिक नुकसान में केवल आंशिक सहायता देने का प्रावधान किया है । इसे भी बढ़ाने की आवश्यकता है ।

बरसात का पानी इकट्ठा करने के लिए बनाए ड्रेनेज के टूट जाने पर       राजस्थान में वर्षा कम होती है, अतः वर्षा का पानी इक्कठा रखना आवश्यक है । इस हेतु बनाए गए ड्रेनेज के ढह जाने पर आस-पास के क्षेत्र में हुए नुकसान की भरपाई का प्रावधान नहीं है । यदि ऐसा रहा तो वर्षा का पानी इक्कठा करने के लिए लोग अपने आस-पास के क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को चालू नहीं होने देंगे । अतः इस संबंध में मुआवजे का प्रावधान होना चाहिए ।

                           

श्री विश्व मोहन कुमार* (सुपौल): महोदय, मैं आपका आभारी हूँ कि आपने इतने ज्वलंत विषय पर विचार व्यक्त करने का मौका दिया।आज पूरे विश्व में एक ऐसा देश है जहां छः छः ऋतु होती हैं, जो किसी भी देश में नहीं हैं। ऐसा मौसम कहीं नहीं है, ऐसा माना जाता है।

      लेकिन विगत कुछ वर्षो से पर्यावरण का दोहन अधिक होने के चलते प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। समय पर प्रकृति धोखा दे जाती है, जिससे भारत में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। हम लोग बचपन से पढ़ते आ रहे हैं, यहां का 70-75 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है और वही देश की आर्थिक सम्पन्नता का पैमाना है।

      आज मानसून के विमुख हो जाने के कारण कभी अतिवृष्टि और कभी अनावृष्टि की चपेट में हम लोग पड़ जाते हैं। प्रकृति का जितना दोहन होगा उतना पृथ्वी पर उल्टा असर पड़ेगा। जैसा कि अभी सूखे से पड़ रहा है। औसत से बहुत ही कम वर्षा इस बार हुई है। बिहार में 246.5 वर्षा होनी चाहिए लेकिन अभी तक मात्र 118.21 वर्षा ही रिकार्ड की गई है। मेरे यहां सुपौल में जहां पर 280.2 प्रतिशत वर्षा अनुमानित थी लेकिन मात्र178.6 प्रतिशत ही वर्षा हुई है। इसमें 38.39 प्रतिशत का हृस हुआ है। बारिश नहीं होने से जहां 36 लाख धान की खेती निर्धारित थी वह 25-30 लाख पर ही संभव हो सकता है। दलहन, मक्का का भी यही हाल है। हतना ही नहीं इसका प्रतिकूल प्रभाव रबी की फसल पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ेगा। खेत में नमी की कमी रहने के कारण उसका उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। इससे राज्य तथा देश की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ेगा।

      सूखे का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से बिजली पर भी पड़ रहा है। हाइडल पॉवर जो पानी से चलती हैं पानी नहीं रहने से बिजली उत्पादन पूर्ण नहीं हो पायेगा और किसानों को परवन के लिए बिजली नहीं मिलेगी। हमारे यहां बिहार में जबकि हाइडेल पॉवर प्रोजेक्ट नहीं है किसी तरह थर्मल पॉवर से किसानों को बिजली दी जाती है जो मंहगा पड़ता है। डीजल जो पहले से कम रेट था यूपीए सरकार आते आते किसानों को दो रूपयों का इजाफा करके तोहफा दिया जो किसानों के जख्म पर नमक छिड़कने का काम किया। परवन से अगर धान रोपाई करता है तो वह बहुत मंहगा पड़ता है। महोदय, किसान अगर सभी चीजों को जोड़कर देखें तो उसे खेती में कोई लाभ नहीं है। नो प्रोफिट नो लॉस पर काम करता है।

     

* Speech was laid on the Table.

      हम लोगों का इलाका भी सूखे से प्रभावित है। सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया, पूर्णियां, कटिहार, दरभंगा, मधुबनी और भी जिले हैं। यहां पर वैकल्पिक व्यवस्था नहर प्रणाली से सिंचाई होती थी, लेकिन पिछले वर्ष कुसहा तटबंध के टूटने से सारी नहर प्रणाली भी ध्वस्त हो गई, जिससे सिंचाई पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। क्योंकि 60 प्रतिशत खेती मानसून पर ही निर्भर रहता है लेकिन इस बार मानसून दगा दे गया। जमीन में पानी का स्तर भी घट गया जिससे वाटर लेबल भी नीचे चला गया। पीने के पानी एवं नलकूप जिससे सिंचाई व्यवस्था भी होती, दगा दे गया। मैं सरकार से मांग करता हूं कि बिहार के सभी जिलों को सुखाड़ क्षेत्र घोषित करें तथा किसानों के लिए एक ऐसा पैकेज की व्यवस्था करें जिससे उन्हें खाद, बीज, पानी की व्यवस्था सरलता से मुहैया हो सके। माननीय मंत्री जी राज्य सरकार ने भी माना है कि पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश, बिहार में स्थिति वाकई खराब है।

      लेकिन दुख होता है परसों-तरसों जब सूखा क्षेत्र की लिस्ट जारी हुई थी उसमें बिहार का नाम नहीं था पता नहीं बिहार के साथ केन्द्र की सरकार क्यों सौतेला व्यवहार कर रहा है। कोसी में भयंकर बाढ़ के समय से मदद करने से हाथ खींच लिया और सुखाड़ में भी बिहार के साथ वही व्यवहार है। देश के सभी राज्य एक समान हैं चाहे वह कांग्रेस हो अथवा नॉन कांग्रेसी।

         

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर (मुरैना): महोदय, मध्य प्रदेश में छह जिलों में 20 प्रतिशत से अधिक वर्षा हुई है और बाकी जिले अवर्षा के शिकार हैं इस कारण वहां से पलायन हो रहा है। लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच रहे हैं। हमें इस बात की शंका आज भी है क्योंकि पिछले वर्ष 2008 में मध्य प्रदेश के37 जिले और 157 तहसील सूखे से पीड़ित थे। हमारे राज्य के मुख्यमंत्री ने बार-बार प्रधानमंत्री जी और कृषि मंत्री जी से आग्रह किया और मध्य प्रदेश में केंद्र अध्ययन दल आया। अध्ययन दल ने अपनी रिकमेंडेशन की और राज्य शासन1548 करोड़ रुपए का प्रस्ताव केंद्र सरकार को प्रस्तुत किया लेकिन केंद्र सरकार ने राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर एक रुपया भी मध्य प्रदेश को नहीं दिया।

     महोदय,मैं आपके माध्यम से केंद्र सरकार से मांग करना चाहता हूं कि समय रहते मध्य प्रदेश का आकलन कराएं और सहायता उपलब्ध कराएं। अगर मध्य प्रदेश में अवर्षा के कारण, सूखे से पीड़ित होकर कोई घटना होगी तो इसके लिए केंद्र सरकार जवाबदार होगी।

   

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Sir, kindly allow our Members also… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN:  Hon. Minister, please bear with the Chair.

… (Interruptions)

 MR. CHAIRMAN:  Why do you not take your seat?  How many times should I say this?

… (Interruptions)

श्री आर.के.सिंह पटेल(बांदा) :हम किसान हैं। हम अपनी बात कहेंगे। मुझे बोलने के लिए समय चाहिए।

...( व्यवधान)

सभापति महोदय:  आपको टाइम देंगे।

…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN:  Mr. R.K. Singh Patel, I will give you time.  Do not behave like this.  It is very unfortunate.

… (Interruptions)

 

 SHRI V. NARAYANASAMY: Sir, I would like to say something. Hon. Members from Rajasthan want to participate in the discussion as there is a total drought situation prevailing there.  They would like to make their submissions.  So, please give them two minutes each. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : I understand.  Four hon. Members also will speak and after that hon. Minister will give a reply.

… (Interruptions)

डॉ. अरविन्द कुमार शर्मा (करनाल): सर, मैं पांच मिनट में अपनी बात समाप्त कर दूंगा। तीन मिनट में बात नहीं कही जायेगी। मैं बहुत महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं।

MR. CHAIRMAN: Dr. Arvind Kumar Sharma, please conclude within three minutes.

… (Interruptions)

डॉ. अरविन्द कुमार शर्मा : सभापति जी, सबसे जरूरी बात यह है कि हमारे प्रधान मंत्री जी, हमारी चेयरपर्सन, श्रीमती सोनिया गांधी जी और हमारे कृषि मंत्री जी की बहुत पैनी नजर सूखे और बाढ़ पर लगी हुई है। इसमें कोई शक नहीं है। मैं दो मिनट में अपनी बात रखूंगा। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें गहराई से इस बात में जाना पड़ेगा कि सूखा और बाढ़ क्यों आते हैं? इसका सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है। ये सारी समस्याएं ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हैं। मैं समझता हूं कि हमें ग्लोबल वार्मिंग पर भी चर्चा करनी चाहिए।

      दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि किसान खेती में कितनी मेहनत करता है, लेकिन कभी भी वह खुशहाल नहीं रहता, वह कभी भी चिंतामुक्त नहीं रहता है। आप देखें कि इतनी मेहनत करने के बावजूद भी उसकी पैदावार का भाव उसे नहीं मिलता है। आज मैं एक फसल लूंगा, खरीफ में बहुत सारी फसलें आती हैं जैसे - दालें, चावल, ज्वार, बाजरा, तिलहन और सूरजमुखै। लेकिन मैं पैडी के बारे में बताता हूं कि पैडी के लिए करीबन एक एकड़ में 15 से18 हजार रुपये का खर्चा आता है। बिजाई से लेकर ढुलाई तक, यानी मार्केट जाने तक 15 से 18 हजार रुपये खर्चा आता है। लेकिन जब नेचुरल कैलामिटी आती है तो किसान को क्या मिलता है, उसे कुछ नहीं मिलता है। मुआवजे के तौर पर कोई सरकार हजार रुपये और कोई सरकार पंद्रह सौ रुपये दे देती हैं। लेकिन हमारी हरियाणा की सरकार ने माननीय मुख्यमंत्री, चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में पिछली बार जब ओले पड़े थे तो मुआवजे के तौर पर तीन हजार से चार हजार रुपये प्रति एकड़ दिया था। मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं कि इसमें हमें कोई सॉलिड योजना रखनी चाहिए।

MR. CHAIRMAN: Please conclude within one minute.

… (Interruptions)

डॉ. अरविन्द कुमार शर्मा : वह योजना फसल बीमा योजना है। हमें फसल बीमा योजना को बड़ी गहराई से देखना है, क्योंकि आज इसका कोई इफैक्ट नहीं है। मैं समझता हूं कि मंत्री जी इसे देखें और इसके लिए कोई विजिलैन्स कमेटी लगायें, कोई एम.पीज. की कमेटी बनायें। मैं कहना चाहता हूं कि फसल बीमा योजना जब तक इफैक्टिव नहीं होगी, तब तक काम चलने वाला नहीं है। फसल बीमा योजना कैसे इफैक्टिव होगी। अभी आपने इसे ब्लॉक लैवल पर रखा है। मैं कहना चाहता हूं कि जिस तरह से अन्य बीमा होते हैं, जैसे हैल्थ का बीमा होता है। ऐसे ही जब तक फसल का बीमा नहीं होगा, बात बनने वाली है। फसल का बीमा करने के लिए सरकार इसमें योगदान दे, राज्य सरकारें योगदान दें और किसान को उसकी मेहनत का पैसा फसल बीमा योजना के तहत मिलना चाहिए। मेरा मंत्री जी से आग्रह है कि इस योजना को बहुत गहराई से समझने की जरूरत है। जब तक फसल बीमा योजना ठीक ढंग से लागू नहीं होगी, तब तक कोई बात बनने वाली नहीं है। फसल बीमा योजना से मेरा मतलब है कि किसान को कम से कम 20 से25 हजार रुपये इस योजना के तहत पैडी, गेहूं या अन्य मेजर फसलों का मिलना चाहिए। तब कहीं किसान खुशहाल होगा। आज किसान यदि अपने एक बेटे की शादी कर ले...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please conclude.

… (Interruptions)

डॉ. अरविन्द कुमार शर्मा : लड़की की शादी कर ले, मकान बना ले, किसी बच्चे को पढ़ाने के लिए भेज दे तो किसान के पास क्या रह जाता है। वह दस साल तक कर्ज में ऐसा डूब जाता है कि उससे उबर नहीं पाता है। मेरी दर्खास्त है कि मंत्री जी फसल बीमा योजना को बहुत प्रभावी ढंग से लागू करें। इस मुद्दे पर बहुत गहराई से सोचने की जरूरत है। इस पर भी चर्चा कराई जाए कि फसल बीमा योजना में हम क्या कर सकते हैं।

MR. CHAIRMAN: Dr. Arvind Kumar Sharma, thank you very much.  Please take your seat.

… (Interruptions)

डॉ. अरविन्द कुमार शर्मा : मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। जो बड़ी-बड़ी कंपनियां जैसे लाइफ इंश्योरेंस कारपोरेशन है। ये क्या करते हैं कि करोड़ों रुपये के शेयर्स खरीद लेते हैं। लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूं कि उन पैसों क किसानों के लिए इस्तेमाल किया जाए। यदि उस पैसे का इस्तेमाल किसानों के लिए होगा तो आप देखेंगे कि थोड़े समय में ही किसान कितना खुशहाल होगा। ये कोई छोटी-छोटी बातें नहीं हैं। मेरा अनुरोध है कि आप इन सब बातों पर जरूर ध्यान दें।

      I also lay a part of my speech on the Table.

         

      * मैं उन सभी सदस्यों एवं बुद्धिजीवियों का अति आभारी हूं जिन्होंने इस संसद सत्र के दौरान केन्द्र सरकार का मानसून के देरी से आने के लिए और वर्षानुपात कम होने की वजह से देश के कई राज्यों में खरीफ की फसलों के प्रभावित होने से तथा किसानों की दयनीय दशा के साथ बिजली, पानी, ऊर्जा, खाद्य सामग्री एवं जीवन यापन वस्तुओं पर होने वाले प्रभाव, कुछ राज्यों में सूखे जैसी स्थिति एवं कुछ राज्यों में बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर चिंता व्यक्त करके दोनों सदनों में केन्द्र सरकार का ध्यान आकर्षित किया है तथा ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए सरकार के साथ हर प्रकार से देशहित में सहयोग देने के लिए मैं आपका पुनः आभारी हूं।

      मैं, माननीय प्रधान मंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह जी का एवं यूपीए सरकार की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी जी का आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने राज्य सरकारों के अनुरोध पर सूखे एवं बाढ़ प्रभावित सभी राज्यों में केन्द्रीय टीम के सर्वेक्षण के बाद, इंटर मिनीस्ट्रियल ग्रुप (आई एम जी) की सिफारिशें के तहत, हाई लेवल कमेटी, नेशनल कलामटी कांटिजेंसी फंड(एम सी सी पी) (राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा निधि कोष) से सभी प्रभावित राज्यों को ज्यादा से ज्यादा वित्तीय एवं अथ सहायता बिना भेदभाव के प्रदान करेगी। मौसम विभाग के मुताबिक पिछले वर्षो की तुलना में इस वर्ष वर्षानुपात में भारी कमी आई है और पूरे देश में वर्षा का अनुपात151 एम एम, नार्मल रेनफाल 234.7 एम एम की अपेक्षा में रिकार्ड किया गया है जो कि 36 प्रतिशत वर्षानुपात को कम दिखा रहा है, जिसका ज्यादा असर नार्थ ईस्ट राज्यों आसाम, मणिपुर मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा एवं अन्य तथा उत्तरी भारत राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली तथा उत्तरी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड एवं अन्य राज्यों में सीधा दिखाई पड़ा है।

      केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने पिछले जून माह में मानसून में होने वाली देरी एवं इससे प्रभावित सभी राज्यों में खरीफ की फसलों चावल, ज्वार, बाजरा, तिल-तिलहन, उड़द, मूंग एवं अन्य दालें, मुंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, गन्ना तथा अन्य सभी फसलों को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए महाराष्ट्र, आंध्रा प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू एवं काश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आसाम एवं बिहार के सभी कृषि सचिवों की बैठक बुलाकर किसानों को हर प्रकार से सहायता एवं राहत प्रदान करने का आश्वासन दिया है ताकि वे समय से पहले होने वाली समस्याओं का समाधान कर सके। भारत सरकार दिन प्रतिदिन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए है तथा यथासंभव सहायता के लिए तैयार है *…..* This part of the speech was laid on the Table.

   

      केन्द्रीय सरकार ने किसानों की भलाई के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना National food security mission एवं State Agriculture University के माध्यम से सभी कारगर कदम उठाने का भरोसा दिलाया है। यह सभी एजेंसी समय समय पर दूरदर्शन, आल इंडिया रेडियो एवं अन्य चैनल के द्वारा किसानों को समय समय पर कृषि संबंधी जानकारियां देती रहेंगी। बीजों एवं सिंचाई संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए भारत सरकार किसानों के लिए वचनबद्ध है। राज्यों को इस स्थिति से उभारने के लिए केन्द्र सरकार ने हर राज्य के लिए एक कलामटी रिलीफ फंड की स्थापना की हुई जिसके अंदर भारत सरकार का75 प्रतिशत तथा राज्यों सरकारों का 25 प्रतिशत हिस्सा रखा गया है। सन2005-06से2008-09तक केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने इस निधि के तहत 16,729.02 करोड़ रूपये सृजित किया है।

      केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदाओं से प्रभावित सभी राज्यों के लिए एक नेशनल डिस्साटर मैनेजमेंट अथॉरिटी(NDMA)बनाई हुई है जो कि राज्यों की बाढ़, भूकम्प, ज्वारभाटा एवं अन्य विनाशकारी गतिविधियों से बचाने के लिए कार्य करती है एवं वित्तीय सहायता प्रदान करती है। केन्द्र सरकार ने बाढ़ की स्थिति पर काबू पाने के लिए एक राष्ट्रीय बाढ़ आयोग का 1976 में गठन किया हुआ है जो कि तुरंत प्रभाव से बाढ़ प्रभावित राज्यों की मदद करता है। समय-समय पर केन्द्र सरकार ने राज्यों को बाढ़ की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ganga flood control commission in 1972, ब्रहमपुत्र बोर्ड National water policy 2002 तथाTask force-2004 का गठन किया है।

       22 जुलाई,2009मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरी भारत दिल्ली, चंडीगढ़ एवं हरियाणा, पंजाब को वर्षानुपात163.5 एम एम नार्मल की अपेक्षा 58.1 एम एम हुआ है जो कि पिछले वर्षो की तुलना में 65 प्रतिशत डेफिसिट(कम अनुपात है) जो अभी दो दिनों से उत्तरी भारत में 62 प्रतिशत के आसपास है जिससे हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तरप्रदेश एवं बिहार व झारखंड के राज्यों के किसान एवं खेतिहर मजदूर बहुत प्रभावित हुए हैं। तकरीबन इन राज्यों में खरीफ की फसलों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।  

      इसके साथ साथ फसलों की बीमा योजनाओं के तहत हरियाणा प्रदेश में जिला स्तर एवं ब्लाक लेवल पर किसानों की फसलों का बीमा किया जाता है जिन्होंने अपना प्रति एकड़ के हिसाब से बीमा प्रीमियम भर रखा हो तथा उन किसानों ने जिन्होंने या तो को-ऑपरेटिव बैंक्स से लोन ले रखा है उन्हीं किसानों को इस योजना के तहत फसलों के नुकसान पर मुआवजा दिया जाता है। इस योजना के तहत सभी फसलों के न होकर मुख्य-मुख्य फसलों का बीमा कराया जाता है तथा विलेज लेवल पर न होकर ब्लाक लेवल पर एवरेज के मुताबिक फसलों के नुकसान पर मुआवजा निर्धारित होता है। किसानों की मांग है कि यह विलेज लेवल/यूनिट पर निर्धारित होना चाहिए क्योंकि कई बार एक जिले के अंदर ब्लाक लेवल पर केवल 5 से 7 गांवों में ओलावृष्टि होकर फसलों का नुकसान हो जाता है तो किसानों को कोई भी उचित मुआवजा नहीं मिल पाता है। अतः मेरी प्रार्थना है कि फसलों का बीमा विलेज लेवल/यूनिट पर होना चाहिए ताकि सभी गांवों के किसानों को पर एकड़ उचित मुआवजा मिल सके और इसके साथ साथ खेतिहर मजदूरों के लिए भी एक कमेटी गठित होनी चाहिए ताकि किसान पर मार पड़ने के बाद उस पर खेती करने वाले मजदूरों को भी उचित मुआवजा मिल सके। मुख्य फसलों के साथ सभी फसलों को बीमा योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए।

      केन्द्र सरकार ने सूखे एवं बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकारों को सस्ते दरों पर लोन, बीज, खाद एवं कृषि यंत्रों पर छूट देनी चाहिए तथा सिंचाई के लिए कम दर पर बिजली एवं टयूबवैल के लिए कम रेट पर पाईप तथा बिजली की मोटरें उपलब्ध करवानी चाहिए। फसलों की सिंचाई के लिए सरकार की तरफ से वाटर पम्प प्रोवाइड करवाने चाहिए। वर्षा के पानी को संचित करने के लिए डैम और तालाब बनवाने चाहिए। बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए जिला स्तर पर सभी नदियों, गहरें नालों एवं केनाल की वर्षा होने से पहले सफाई करवानी चाहिए तथा किश्तियों एवं नावों का विशेष प्रबंध करवाना चाहिए। भूमि कटाव को रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा सरकारी एवं गैर सरकारी भूमि पर वृक्षारोपण करवाना चाहिए।

      हरियाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में छोटे किसानों की संख्या बढती जा रही है ज्यादातर किसान दो तीन एकड से लेकर5-7 एकड़ तक ही सीमित रह गये हैं और इन छोटे किसानों के पास खेत जोतने के लिए न तो हल और न ही ट्रैक्टरों की सुविधा है। उन्हें एक एकड पर खेती करने पर भी आपका बहुत ज्यादा हिस्सा खर्च करना पड़ता है तथा बिजाई करने और मण्डी में ढुलाई तक फसलों के नुकसान होने का जोखिम उठाना पडता है। हरियाणा प्रदेश भारत वर्ष का पंजाब के बाद दूसरा राज्य है जो कि सबसे ज्यादा चावल एवं गेहूं का उत्पादन करता है और राष्ट्रीय आय में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है। एक एकड में जोतने पर किसानों को बिजाई से पहले खेत को जोतना, पानी देना, बिजाई करना, नलाई एवं खुदाई करवाना, खाद डालना, पानी देना, कटाई, दवाई करवाना, कढ़ाई करवाना तथा अंत में घर व मंडी तक फसल को बिना किसी जोखिम के ले जाने तक लगभग प्रति एकड़ 20 हजार रूपये खर्च हो जाते हैं और प्राकृतिक आपदा के दौरान किसानों को 2500 रूपये से लेकर4000रूपये तक ही बीमा योजना के तहत मुआवजा मिलता है और जिस किसान ने फसल बीमा न करवा रखा हो तो उसको कुछ भी हासिल नहीं होता है। न ही सरकार की कोई ऐसी स्कीम है, जिस पर खेतिहर मजदूरों, जो कि किसानों के खेत में मजदूरी करते हैं, प्राकृतिक आपदा होने पर उनको कोई मुआवजा मिल सके।

      कई बार देश में एक ही स्थान पर वर्षा हो जाती है और उसके साथ लगती दूसरी जगह पर वर्षा नहीं हो पाती है तो ऐसे में छोटे किसानों की मुआवजे के लिए बहुत ही कम सुनवाई होती है। किसानों द्वारा बढ़िया किस्म की खेती करने के लिए बहुत ही कम आपके साधन हैं क्योंकि वे बढ़िया किस्म के बीज, आधुनिक कृषि यंत्र, मंहगी खाद एवं उवर्रक नहीं खरीद पाते हैं और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम पैदावार हो पाती है। राज्यों द्वारा प्रत्येक किसान की भूमि का फसल बीमा आवश्यक होना चाहिए तथा यूनिट के आधार पर न होकर व्यक्तिगत के आधार पर फसल बीमा होना चाहिए चाहे किसी भी किसान की एक एकड़ भी भूमि क्यों न हो। राज्य सरकारों द्वारा हरियाणा सरकार की तरह किसी भी किसान को लोन न देने पर प्राकृतिक आपदा के दौरान, समय पर न भरने पर कोई भी गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। किसानों को ऋण भरने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए और समय की छूट देनी चाहिए। हरियाणा सरकार ने किसानों के ऋण माफी, किसान क्रेडिट कार्ड सस्ती दरों पर लोन उपलबध करना तथा समय पर सब्सिडी प्रदान करना, किसानों के हित में एक सराहनीय कदम है। उनके लिए33 साल तक भूमि मुआवजों के रूप में किश्त देना एक महत्वपूर्ण कदम है। किसानों को कम दर पर बिजली पानी देना तथा सिंचाई के लिए फ्लेट रेट घोषित करना किसानों के लिए अति लाभकारी है। किसानों को एक एकड़ की रजिस्ट्री पर ट्रेक्टर लोन देना बहुत कारगार साबित हुआ है। हरियाणा सरकार को सेंट्रल पूल से बिजली की व्यवस्था करे ज्यादा से ज्यादा। *         Dr. THOKCHOM MEINYA (INNER MANIPUR):  Sir, I rise to participate in the discussion under 'Rule 193' on situation arising out of drought and floods in various parts of the country as raised by Hon'ble Members Shri Rajiv Ranjan and Shri Mahabal Mishra.

            It is a well-known fact that today many states are facing a drought like situation whereas few states are reeling under floods.  In both the situations crops are ruined, resulting in shortage of foodgrain in the country.

            Sir, we are facing this problem because of our over-dependence on monsoon.  We need to study the monsoon more seriously.  Superficial understanding of monsoon will not help us.  A profound knowledge of monsoon is indispensible in order to save our economy particularly our agricultural economy.  Whether the monsoon is arriving early or late, whether it brings less or more rain, we need to learn more about it, so that we can plan our crops and decide the crops accordingly.  We have to see whether crop rotation is helpful.  It is a serious matter for Research and Development.

            We also need to understand the El Neno phenomenon in the Pacific Ocean so as to have in depth knowledge of monsoon.  Sir, I therefore urge upon the Government to analyse the monsoon behaviour more systematically and scientifically.

            Sir, inter-linking of our big rivers can be a solution to our chronic problem of flood and drought.  In China, they have linked two big rivers and they are immensely benefited from it. In India we also need to go ahead in this direction and link our big rivers.  We have started inter-linking small rivers and now Rajasthan and Madhya Pradesh are going to get the benefits.

 

__________________________________________________________________ *English translation of the speech originally laid on the Table in Manipuri.

     

            Sir, I would like to draw the kind attention of the Hon'ble Minister that is Israel, sea water is used for firming and agricultural purposes. We have to examine whether this technology is cost effective and can be applied in our country.  A through study may be conducted at the earliest.  We may also seek the co-operation of the Israel Government in this regard. 

            Fortunately, in the last few days we have received some rain. Yesterday, just after passing the Finance Bill there was heavy down-pour.  Perhaps it was waiting for the Finance Bill to pass.  Listening to Shri Jaswant Singh's story of whishy bottle and Hon'ble Finance Ministers' abstinence from pipe smoking the Rain God is showering rain to us. It seems if the Budget and Finance Bill were passed early this year the monsoon could have arrived bit earlier.  Confusion is all around including the rain as this session is a mixture of Budget and Monsoon session.  Now, the spell of drought is almost over and it is time to talk about flood.    

            Sir, keeping in view the drought situation we must give importance to water conservation and rain water harvesting. Sir, the significance of rain water harvesting can't be ignored.  For this we have to deepen our rivers, lakes, tanks etc. to retain more water. Cleaning and dredging of lakes, rivers, canals and pools is must for this. For instance, the Loktak Lake, the fresh water lake of Manipur, is shallowing and shrinking -- a well chalked out programme is necessary to save this lake. 

            Since our agriculture is dependent on monsoon, states are facing a lot of problems.  In the Northeast, Assam is now on the brink of flood after experiencing a drought like situation.  In Manipur we are passing through a dry spell.  This season the amount of rain received in Manipur is very less. Almost all the paddy fields in Manipur are still dry.  Existing irrigation facilities are inadequate.  Farmers are really worried.  Recent showers are not enough.  It only cleans the roads.

            Sir, Manipur Government had declared drought in the state, in the month of June.  With some reluctance now the Agriculture Minister acknowledges that there is a drought like situation in the 11 districts of Manipur.  Sir, I would like to clearify that Manipur has only 9 districts. I request the Hon'ble Agriculture Minister that the drought relief package asked by the Government of Manipur should be given in time.  During NDA regime, Manipur asked for drought relief - the relief package reached Manipur when it was devastated by flood.  Sir, my point is that there should not be any delay in extending assistance whether is drought or flood.  It happens quite often in my state, Manipur, that under a drought situation people grow crops with great difficulty but these crops are again destroyed by flood which came late.  Hence Sir, I request the Hon'ble Agriculture Minister to provide drought relief to my state at the earliest.

            Finally Sir, I would like to urge upon the Union Government for adequate and timely assistance to the drought affected areas as well as to the flood affected parts in the country.

                                                     

MR. CHAIRMAN: Shri R. K. Singh Patel, I would like to say one thing.  Your behaviour is unbecoming. It cannot be tolerated.  I am giving you a warning. You can speak now, but please do not behave like this.  Please conclude your speech within three minutes.

… (Interruptions)

*m39 श्री आर.के.सिंह पटेल :माननीय सभापति जी, मैं किसान हूं और कल ही अपने खेत की जुताई ट्रैक्टर चलाकर कर के आया हूं। सूखा सरकार की आपदा नहीं है, यह दैवी आपदा है। चाहे जिस पार्टी की सरकार हो, यह आपदा आती रहती है। सूखा न केवल उत्तर भारत बल्कि पूरे देश में है। सूखे से निपटने के लिये सरकार को कोई कार्य योजना बनानी चाहिये। भारत के निचले हिस्से से एक कॉरिडोर बनाकर हम उत्तर भारत तक गैस पाईप लाईन, डीजल की पाईपलाईन ला सकते हैं, हम तमाम कॉरिडोर बना सकते हैं। लेकिनकिसान जो भारत की रीढ़ है, उसके खेतों की सिंचाई के लिय़े क्या हम प्रबंध नहीं कर सकते हैं? हमारेदेश के तीन ओर समुद्र है जिसमें पानी है। उस पानी से सिंचाई के लिये वृहद् कॉरिडोर बनाकर देश के विभिन्न कोनों पर पाईपलाईन के जरिये पानी पहुंचाने की योजना बनाई जा सकती है। मेरी मांग है कि समुद्र से किसान के खेतों की सिंचाई के लिये कॉरिडोर दिया जाना चाहिये।

      सभापति महोदय, सरकार नदियों को जोड़ने की बात कर रही है। अगर बरसात होगी, तभी नदियों में पानी आयेगा। आज ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं, हमारी नदियो से पानी नीचे बहकर समुद्र में जा रहा है। उस पानी से एक कॉरिडोर बनाकर सिंचाई के लिये पानी लाया जा सकता है। आज किसान परेशान है क्योंकि उसे उसकी फसल का लागत मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उसके उत्पाद में समानुपातिक वृद्धि होनी चाहिये, यह मेरी मांग है। एक तरफ उद्योगपति छोटी सी चीज से बड़ी चीज हवाई जहाज तक बनाता है, उसके जो दामआज से 15 साल पहले थे, उसमें आज 25 गुना की वृद्धि हुई है लेकिन जो माल किसान पैदा करता है, उसमें मात्र तीन गुना वृद्धि हो पायी है। सरकार को सोचना चाहिये कि किसान के उत्पाद का मूल्य15 साल पहले एक रुपया था, उसे उसी अनुपात में बढ़ाना चाहिये था। जिस माल की कीमत 15 साल पहले फैक्टरी में एक रुपया थी, वह आज 20-25-30 रुपये में मिलती है।इसी तरह जहां गेहूं की कीमत15 साल पहले250-300रुपये क्विंटल थी, वह आज 1080 रुपये क्विंटल सरकार ने फिक्स की है। फैक्टरी का माल 30 रुपये में था, वह बढ़कर50 रुपये हो गया है। जो साईकिल पहले 400 रुपये में थी, उसका दामबढ़कर 3200 रुपये हो गया है, सीमेट का दाम 30 रुपये से 250 रुपये हो गया है। किन्तु आप चावल, दाल की महंगाई देखते हैं कहते हैं कि आसमान छू रही है। किंतु फैक्टरी में बनने वाले सामान की कीमत बीस गुना और किसान द्वारा उत्पादित वस्तुओं का दाम केवल तीन गुना बढ़ा है। इसलिये मेरी मांग है कि फैक्टरी के माल और किसान के उत्पाद में बराबर की महंगाई घटाई-बढ़ाई जाये, तभी किसान खुशहाल हो सकता है। मैं आपके माध्यम से सरकार से मांग करता हूं कि यह अंतर घटाने पर ही किसान उन्नतशील हो सकता है।

*m40 श्री हरीश चौधरी(बाड़मेर): सभापति महोदय, मैं जिस लोक सभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूं, वहां पिछले 50-60 साल से सूखा और अकाल है। पानी का क्या महत्व है, वह शायद ही इस देश में कोई जानता होगा? राजस्थान के अंदर 60 प्रतिशत रेगिस्तान है। मेरा लोक सभा क्षेत्र बाड़मेर 58 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। मैं यह आंकड़ा इसलिये दे रहा हूं ताकि उससे अंदाजा लग सके कि मेरे क्षेत्र की पापुलेशन डेंसिटी कितनी कम है। हम लोगों का जीवन-यापन केवल कृषि और पशु-पालन से हो रहा है। सदन इस बात की कल्पना कर सकता है कि कृषि बिना पानी के कैसे हो सकती है? हमारे क्षेत्र में पशु-पालन की क्या स्थिति है, वह मैं बताना चाहता हूं।वर्ष 1961 में बाड़मेर जिले की जनसंख्या6 लाख 77 हजार थी, जो वर्ष 2001 में बढ़कर 19 लाख38 हजार हो गई। पशुओं की संख्या6 लाख 34 हजार थी।

      दुर्भाग्य से पशु संख्या सिर्फ साढ़े तीन लाख थी। हम लोगों की क्या स्थिति हुई है? हम लोगों का जीवन-यापन सिर्फ पशुओं पर था। पशु हमसे नहीं पलते थे बल्कि हम पशुओं से पलते थे। दुर्भाग्य से पहले हजारों साल तक हम अपने पशुओं को हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश के मालवा में जाकर पालते थे। पिछले काफी समय से यह चीज मुमकिन नहीं हो पायी है। आप हम लोगों की पीड़ा समझिए। हमारे यहां पीने के पानी के लिए कोई सोर्स नहीं है, कोई भी सरफेस सोर्स नहीं है। हम लोग ज्यादातर पीने के पानी के लिए टाका के रूप के अंदर, टाका एक तरह का पक्का पोंड है, जिसके अंदर करीब 30 हजार लीटर पानी इकट्ठा हो जाता है और उस पानी को हम पूरे एक साल तक पीने के लिए, दूसरे कामों के लिए, पशुओं के लिए इस्तेमाल करते हैं। एक साल ही नहीं, हमारे यहां कई-कई साल तक बरसात नहीं होती है तो उसी पानी को हम दूसरे और तीसरे साल तक काम में लेते हैं। हम लोगों के यहां खेजड़ी के रूप में एक वृक्ष है, उसे हम पूजते हैं। उस वृक्ष की पत्तियों से हम पशुओं को पालते हैं और उसकी फलियों से हम खुद पलते हैं। उसकी छाल को हम ईंधन के रूप में काम में लेते हैं और उसकी लकड़ी से हम हल बनाते हैं। उस वृक्ष की महत्ता का अंदाज आप इससे लगा सकते हो कि ढाई सौ साल पहले उस वृक्ष को काटने के लिए जब राजा ने हुक्म किया था तो खेजड़ी के उस वृक्ष को बचाने के लिए 363 लोग शहीद हुए थे। उस वृक्ष की हम लोगों के यहां बहुत महत्ता है और उसका अनुसरण पूरे देश को करना चाहिए।

      महोदय, हम लोगों के यहां जितना थोड़ा-बहुत अनाज होता है उसे हम एक कढ़ाई के अंदर, देसी तौर-तरीके से सिर्फ नीम और राख डालकर एअरटाइट करके 10-10 साल तक उपयोग में लेते हैं।

सभापति महोदय:  आप समाप्त कीजिए।

श्री हरीश चौधरी: महोदय, हम चारे का किस प्रकार 10-10 साल तक इस्तेमाल करते हैं। मेरा निवेदन है कि जो वर्ष 2002-03 में अकाल राहत का प्रबंधन राजस्थान सरकार ने, जिसके मुखिया अशोक गहलौत जी थे, ने किया। उसे एक मॉडल के तौर पर पूरे हिन्दुस्तान के अंदर लागू करना चाहिए। आज के समय में फैमिंग कोड बहुत पुराना हो चुका है और आज के समय में यह धरातल से बिल्कुल अलग है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की सबसे प्रिय पशु बकरी हुआ करती थी। दुर्भाग्य से फैमिंग के अंदर उसे भी नहीं लिया जाता है। बकरी और भेड़ को उसके अंदर नहीं लिया जाता है।

सभापति महोदय : आप समाप्त कीजिए। यह विषय महत्वपूर्ण है, लेकिन आपका समय समाप्त हो चुका है।

श्री हरीश चौधरी: महोदय, यह मेरे जीवन का पहला मौका है। मैं समाप्त कर रहा हूं। सीआरएफ के अंदर बड़े पशुओं और छोटे पशुओं के मुआवजे के लिए दो पशु दिए हैं, लेकिन उसका पैमाना बढ़ाना चाहिए। लघु व सीमांत किसानों का एक पैमाना है। हमारे यहां हजारों बीघा जमीन में लैंड होल्डिंग बहुत ज्यादा है, पर उसमें कृषि होती ही नहीं है, उसमें पैदावार नहीं होती है इसलिए आपको वह पैमाना भी बदलना चाहिए। फसल बीमा के अंदर पैमाना तहसील स्तर का रखा गया है। मेरे बाड़मेर जिले में शिव तहसील15 हजार स्क्वायर किलोमीटर की है। उस तहसील के अंदर एक तरफ बारिश हो जाती है तो दूसरी तरफ...( व्यवधान) फसल बीमा योजना की इकाई तहसील न होकर पटवार, सर्किल होना चाहिए क्योंकि हम लोगों के यहां तहसीलें बहुत बड़ी-बड़ी हैं। नरेगा के अंदर जो टाके दिये जा रहे हैं, वाटर हारवेस्टिंग का अगर कोई सबसे बेहतरीन तरीका हम लोगों के यहां है तो वह हम लोगों के टाके हैं। मेरा निवेदन है कि इस टाके के अंदर एपीएल के लोगों को लिया जाना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान को पिछड़ा हुआ राज्य घोषित करना चाहिए।

श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय*(गिरिडीह): आज देश का अधिकांश राज्य सूखे की स्थिति से जल रहा है। देश में 40 प्रतिशत क्षेत्र को सिंचाई सुविधा उपलब्ध है । कई राज्यों ने केन्द्र सरकार से सूखे से निपटने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की है । सूखे से निपटने के लिए सरकार द्वारा समितियाँ भी गठित की गई हैं । समितियाँ या राज्य सरकार जो सुझाव केन्द्र सरकार को देती है उस पर अमल नहीं होता । एक उदाहरण देना चाहेंगे। वर्ष 2007-08 में मध्य प्रदेश सरकार ने सूखे से निपटने के लिए 1883 करोड़ रु. सहायता की मांग की मिला 42 करोड़ रुपये । इसी प्रकार2006-07में आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक सरकार ने क्रमशः 823.23 करोड़ रु. और 1439.81 करोड़ रु. की मांग की अनुमोदित सहायता क्रमशः76.27 करोड़ रु. एवं78.96 करोड़ रुपये थे । इस कार्य के लिए एन सी सी एफ राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता कोष एवं एच सी एल (हाई लेवल कमिटी) गठित है, लेकिन इससे निपटने के लिए हमारे पास वास्तविक विजन नहीं है ।

      जल प्रबंधन, सिंचाई प्रबंधन, जल संचयन नदियों को जोड़ने की नीति में हम विफल हैं । आज देश कही सूखाड़ से ग्रसित है और कहीं हम बाढ़ से व्यथित हैं । इसका कारण सरकार की प्रबंधन नीति की विफलता । अभी हम देखेंगे जल प्रबंधन एवं सिंचाई के लिए2006-07में झारखण्ड को कुल382 करोड़ रु. एवं 2007-08 में 529 करोड़ रु. अनुमोदित परिव्यय निर्धारित किया गया जबकि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि को1000करोड़ रु. से अधिक राशि संशोधित अनुमोदित परिव्यय रखा गया।

      आज झारखण्ड के 4 जिला पलामू, गढ़वा, लातेहार एवं चतरा को सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया है, जबकि झारखण्ड के अधिकांश जिला बोकारो, गिरिडीह एवं धनबाद सूखे से जल रहा है । यद्यपि राज्य सरकार भी सूखे की स्थिति का सही जायजा देने में विवश है क्योंकि राज्य का पूरा बजट इससे खराब हो जाता है, लेकिन ऐसी स्थिति से मुंह मोड़ने के लिए सच्चाई से क्यों परहेज करेंगे?

      आज हम लाख दावा करें कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ है लेकिन जब एनडीए की सरकार आई तो किसानों के लिए1998-99में किसान क्रेडिट कार्ड केसीसी की योजना की शुरूआत हुई । यूपीए सरकार में 2007-08 के दौरान कुल88,264 करोड़ की सीमा वाले 84.7 लाख केसीसी जारी किये गये । 2008-09 के दौरान यह सीमा घटकर कुल26,828 करोड़ रुपये की सीमा वाले 47.26 लाख केसीसी जारी किये गये । ऐसा क्यों हम देश के हर किसान को केसीसी जारी करे । प्रत्येक मजदूर को 365 दिन काम उपलब्ध कराये । महंगाई को काबू में रखें । किसानों को उनका समर्थन मूल्य मिले । लेकिन जब किसानों का फसल तैयार होता है तो उनके उत्पादखरीदने के लिए सरकारी एजेंसी नहीं जाती ।

*Speech was laid on the Table.

      बाजार कालाबाजारियों एवं व्यवसायियों के चंगुल में है । अभी हजारों टन मिलावटी दाल बरामद हुई हैं जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से काफी खतरनाक थे । आजादी के 62 वर्षों के बाद कृषि विकास दर 2 प्रतिशत से अधिक हासिल न किया गया है ।

      नदियों को जोड़ने का कार्य माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में एनडीए शासन काल में शुरू हुई लेकिन आज तक यूपीए सरकार में इस दिशा में सार्थक परिणाम नहीं मिले ।

      वित्तीय समवेशन समिति की रिपोर्ट 2008 के अनुसार73 प्रतिशत से अधिक किसान परिवारों को ऋण के औपचारिक स्रोतों तक पहुंच नहीं है । कृषि मंच कई चुनौतियों का सामना कर रहा है । आम जनता महंगाई के ज्वाला में धधक रहा है । 31.3.07 तक विभिन्न राज्यों में 14 विदेशी सहायता प्राप्त सिंचाई परियोजनाएं चल रही थी लेकिन ऐसी परियोजना से झारखण्ड अलग थी ।

      अतः सरकार को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लक्ष्य को छोड़कर गरीबों, मजदूरों और देश के आम जनता के दर्द को समझना होगा इसलिए पानी का बेहतर प्रबंध हो, सूखे के हिसाब से खेती की तैयारी, स्मार्ट सब्सिडी योजना के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों के तंत्रों को कार्यशील होना पङेगा।

      पर्यावरण के दुप्रभाव से बचने के लिए विस्तृत कार्य योजना तैयार करना होगा । जल संचयन कार्यक्रम और लम्बित सिंचाई परियोजनाओं को जमीन पर लागू करने के लिए सरकारी तंत्र को ईमानदारी से प्रभावी बनाना होगा । कृषि विकास दर को कैसे हासिल करें इसके लिए सरकार को एक चुनौती के रूप में सरकारी तंत्रों को विकसित करना होगा और इसकी विफलता पर जिम्मेवारी तय करना होगा । बाढ़ एवं सूखाड़ दोनों स्थितियों पर काबू पाने के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करना होगा तभी हम देश के किसानों, गरीबों और विकास की धारा से भटके देशवासियों के दर्द की दवा उपलब्ध कराने में कामयाब हो सकते हैं ।

 

SHRI BADRUDDIN AJMAL* (DHUBRI): Sir, thank you very much for providing me the opportunity to express my views and concerns on the issues of flood and drought which have become one and the same with my state of Assam.

            I hope the august House will agree that linking our economy’s prospects on pouring of rains/mercy of Almighty is the biggest weakness in public policy so far.

            Is it not a pity that every year Indians pray for rain and then for shelter when there is some excess rain?

            Are we destined to doom? It seems everything is so pre-destined! It seems that we have virtually stopped believing that there are solutions! Coming back to my state of Assam, I wish to reiterate that flood is a recurrent phenomenon while drought is also not uncommon to us.

            The year 2009 is not an exception. Assam has witnessed floods affecting lakhs of people at the same time Government of Assam has extended its July 15 announcement of drought from 14 districts to all districts of Assam in its July 22 announcement.

            It is reported that so far in 2009 drought has affected 18 lakh hectares of cropped land affecting 22 lakh cultivators.

            Flood in Assam occurs in an irregular cycle and the frequency of occurrence of flood increased over the decades since 1950’s earthquake. Floods of severe intensity occurred in 1954, 1962, 1966, 1972, 1977, 1984, 2002, 2004 and 2007 though the floods of less magnitude occurs every year including the current year.

            The extent of food problem in Brahmaputra valley is much greater than any other flood prone valleys in India. Analysis of flood damage figures for Assam since 1953 reveals that annually an average of 4.75 lakh hectares of the State gets affected by floods whereas in 2007 nearly 15.04 lakh hectares was under flood disaster.

*Speech was laid on the Table.

            The most damaging impact of the flood in Assam is the erosion of land. On an average 2500 hectares of land is being eroded by the river every year. Since 1954, as per most conservative Government estimates 3.86 lakhs hectares i.e. 7% of the total area of Assam has been eroded. 2534 villages have been eroded affecting 90700 families.

            The irony is that relief and rehabilitation for such a huge loss of national properties do not fall in any of the current national relief and rehabilitation policies. I wish Hon’ble Members of the House will agree that A disaster preparedness plan essentiallycontain measures to be taken before, during and after disaster strikes. But is seems that there is little preparedness before and after disaster, there are only forced announcements during the disaster.

 

I would also like to draw the attention of the House of the most recent incident of flood in Assam which has happened not as a result of excess rain but as a result of breaching of embankment due to corruption in construction of embankment.

            On 1st July 2009, in Lakhimpur district of Assam, a 100-metre stretch of the first ever Hi-Tech “geo-fabric” and “geo-tubes” embankment, constructed by a Malaysian company ‘Emaskira’ at a cost of Rs. 142 crore could not withstand the first flood and was breached. Over 300 villages have been affected so far, displacing or affecting about 2.50 lakh population. (UNI News).

            The breach has also put in danger the northern part of Majuli, the heritage island in the middle of the Brahmaputra.

            I wish to further bring to the Notice of the House that the Government of Assam in its report to the 13th Finance Commission has mentioned that:

  So far only short term measures have been implemented and that too partially. Medium and long term measures remain unimplemented for last 54 years. Out of the total length of embankment of 4500 kms in the state 4176 kms (95%) embankment length is almost 40 years old and they have completely outlived their strength and normal likfe. Breaches of these embankments are a regular feature even in a low intensity flood.
 
This is perhaps the prime reason of the breach of 290 embankments in last three years repaired for Rs. 33.47 crores.
            Coming about drought, I wish to inform the august House that: Currently, out of 35 lakh hectares of agricultural land 18 lakh hectares are severely affected by the drought impacting the lives of 22 lakh of cultivators, The irony is that out of drought affected areas less than 10% have irrigation facilities. Thus government subsidy in terms seeds and disel will reach to only 10% of the affected people leving aside 90% of the people at the mercy of Almighty!   I may please be permitted to quote the comments of the Hon’ble Minister of Revenue, Government of Assam regarding the state of affairs in Assam.
  “I personally know the situation. This draught is unprecedented. Mere continuation for another 10%15 days will left no hope for rich cultivators of the state. But directly I can help none. It is the department like Agriculture and the Deputy Commissioners who only can produce the proposals in this regard on which my department will have to care about.
It is due to bureaucratic diplomacy in the department of Disaster Management for which no money could be released from the CRF fund till today.”             I hope Hon’ble Minister is misquoted. But if this reported statement of Hon’ble Minister is true than it can be treated more dangerous disaster than flood and drought.
Through you I wish to draw the attention of the Government the immediate indirect impact of flood and drought in Assam. The price of essential food item has been increased by manifold. Illegal hoarding of food stock has been reported to be taking place. I wish the Government of India to take note of such incidences and initiate steps to curb such illegal activities which put people in greater hardships.
Considering the gravity and recurrent occurrences of floods in Assam, my party AUDF demands:
·        Declaration of Flood in Assam as National Disaster.   

·        Immediate declaration of a special package for the flood and drought hit people of Assam.   

·        All the flood and draught hit families should be provided one year ration eligible for BPL families as there is no possibility of recropping due to non-availability of irrigation facilities and also due to the elapse of crops growing season.   

·        All the drought and flood hit families should be provided interest free advance loan as they will be not in a position to cultivate in next season.    

·        Constitute a Joint Parliamentary Committee to prove the recent breach of Matmora embankment as so called experts and high officials have cleared the project and there is no benefit of a high level departmental enquiry as have been ordered by the Government of Assam.   

·        Review the basis on which flood in Assam has not been considered as National Calamity despite repeated appeals and assurance of Hon’ble Prime Minister.   

·        To initiate talks with neighbouring states of Assam whose release of water from dams has also been identified as flood in even without rain.   

·        Establish a strategy and platform that could help change the common perceptions and management approach to drought.   

            At the end I wish to express my dilemma over increased spree of spending on calamity control. I wonder should we stop spending on calamity control measures as 10% increase in spending in calamity control results in 20% increase in calamity damages especially in Assam. If we repair 10 embankments we see breach of 20 embankments in Assam. This is really a matter worth further research.
                             
SHRI P.K. BIJU (ALATHUR): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me the opportunity to participate in this very important and serious discussion about drought and flood situation in our country.
            Sir, in our country we have diversity not only in culture and language but also in different climatic conditions . That is why we are discussing about drought and flood situation together in this House. I am not going to speak about the drought situation in detail here because many hon. Members have already spoken about it in this House.
            Sir, I come from the State of Kerala, one of the severely affected States in our country due to floods.  A total loss of Rs. 648.32 crore is estimated in the flood. I am not going to explain the details of that loss.  The loss is there in the health sector, in the electricity sector.  About 101 persons have died in these floods from 15th to 25th of this month.   Around 1,115 persons have been injured.
            But I am happy to inform the House that this time the NCCF and CRF have included the landslides in the list of national calamities.  In my State, around 35 incidents of landslides have happened.  Hon. Minister of State for Home, Shri Mullapally Ramachandran, was there at that time.  He visited a lot of places there. 
            Sir, I would like to raise one issue relating to the norms and criteria for allocating the relief fund.  Sir, under the CRF and NCCF very little is allocated to various sectors.  I would like to give some examples in relations to agricultural sector.
MR. CHAIRMAN : Only make the points and do not give examples.  We have no time.
SHRI P.K. BIJU : Sir, I am going to conclude. 
            In the case of crop loss, only a sum of Rs. 2,000 per hectare is being given and in the case of plantation loss, only a sum of Rs.4000 per hectare is being given.  It is a very less amount.  It is very difficult for a farmer to survive in such a situation.  I would request the hon. Minister of Agriculture that it should be increased.  In the case of fishermen, only a sum of Rs.2,500 is being given for repairing the boats and nets.  It is an insufficient amount.  A sum of Rs.7,500 is being provided to buy a new fishing boat which costs around Rs.45,000 to Rs.65,000.  With this much amount you get the things which are immediately required from a stationery shop and not good shipping boats or nets.
            Sir, one more thing is missing in the NCCF and CRF list,  It is death due to lightening and thunder. It is not included in the list.  I would request the hon. Minister to include that also in this list.  I would also humbly request the hon. Minister to change the norms of allocating funds for relief and the assistance should be increased not only on the basis of the calamity but it should be modified State-wise and given to the actually affected persons in a proper manner.
            Sir, I also lay a part of my speech on the Table of the House.
*Sir, the diversity is in our country not only in culture and language but also the climate that is why we would discuss the drought situation and flood situation together in this House. I am not going to discuss much about in drought situation because Hon. Members already spoken in detail in this regard. I am coming from Kerala, one of the severely flood affected state in the country 648.32 crores rupees loss were estimated in Kerala from 15th July to 25th July due to the heavily down pouring followed by landslide and other mode of natural calamities. I am happy with the inclusion of landslide in the revision of item and norms of Assistance from the Calamity Relief Fund and the National Calamity Contingencyfund. Sir, in this flood 101 people death and 1115 were seriously injured in Kerala. In my constituency, Nelyampathi Panchayat one of the tourist place in Kerala was isolated from the nearest town due to the landslide. In our state 916 houses were totally damaged and 16381 were partially damaged. Bridges and roads also affected in this flood 8186.7 lakhs rupees lost were estimated only in bridges and roads.
*……..* This part of the speech was laid on the Table.
 
            Loss in the agricultural sector and animal husbandry was 281 crore rupees and 4.61 crore rupees respectively. Drinking water supply, electricity and health section also affected. I am not explaining everything in the House because our Hon’ble Minister of State of Home Mr. Mullappally Ramachandra also visited there. Sir, I am raising the issue related with the compensation from CRF and NCCF in the affected persons. I hope Govt. should take this in a serious manner. The revised amount of relief fund in CRF and NCCF are not adequate and the norms not at all helping the victims. In the revised items and norms in 32/34/2007NPM-1 dated 27th June, 2007 was not adequate. I quote one example in Agriculture Relief Fund (1) for agriculture crops, horticulture crops and plantation crops Rs. 2000 per hectare and  Rs. 4000  per hectare  and  perennial crops Rs. 6000 per hectare which is not sufficient and not to help poor farmers in the country. It should be increased substantially. Small and marginal farmers get only Rs. 2000 and Rs. 2500. And also fishermen get only Rs. 2500 for the repair and replacement of boats, nets and damaged or lost Rs. 2500 and Rs. 7500. How can one purchase a boat from this amount? The market value of boat is 35 to 45 lakhs rupees and market value of net is Rs. 50,000 to 75,000. Sir fully damaged houses due to the flood get only Rs. 25000/- and partially damaged houses get only Rs. 1500/-. What is this? And CRF and NCCF have not covered many of the areas. The death due to lightning and thunder not included in the CRF and NCCF items and norms. This should also be included. Our nation having 77,000 kms. Coastal areas out of which 1/7 are in my state. So the number of affected person is much higher as compared to other states. Thousands of fishermen living in coastal areas. In this flood number of fishermen who were out in the sea were reported missing. Their properties, dwelling houses, country boats fishing boats and nets were lost. But Sir, these thousands of victims are not in the purview of CRF and NCCF. People living in hilly area or in plateau or in coastal area the difference in calamity Relief Fund should be avoided and given assistance uniformly to these poor people. The present CRF and NCCF items and norms must be changed. Introducing and incorporating new norms and items to support all the victims and the amount should be increased substantially. With these words, I conclude my speech.* DR. PRASANNA KUMAR PATASANI* (BHUBANESWAR): Sir, Orissa is a land of flood drought and cyclone. This year there is heavy flood in the State. According to the Constitution, the Central Government should pay proper attention in allotting sufficient grants to protect the life of poor people. In the last flood Bihar was allotted more than 1000 crores, but 100 crores is allotted to our State despite of heavy flood. This year also the same flood is repeated and most of the fertile lands are totally packed with heavy water and the same time continuous raining also damage the livelihood of common people. Presently, my parliamentary constituency Jayadev constituency is totally damaged with heavy flood. The poor farmers are looking to the heaven because of the drought conditions also they need sufficient nourishment. It happen every year because of the irrigation the lands are fruitful bearing the high paddy and vegetation and that is totally drowned beneath the water because of the breakage of the embankments and also the same flood affected nearby paddy fields around the city Bhubaneswar, capital of Orissa.
            May I draw the special attention of the Central Govt. that Chilka is the biggest lake of Asia quite adjacent to the lake, the paddy fields are always drowned with salty water. Under Khurda block, the Naraingarh; Soraigarh; Harpada; paddy fields are always drowned the poor farmers having no alternative to maintain their livelihood goes without earning. There must be a permanent solution in allotting sufficient money from the Centre to protect from Shradhapur to Naraiangarh via Harpada immediate strong embankments should be constructed and protected under Tangi Block of Khurda, my assembly segment is always         *Speech laid on the Table.
suffering with refugees from Bangladesh from those days sheltered and recognized as a local citizen suffering always with water and without water. There are about thousands acres of lands, full of flood water. They do not go for either vegetation nor for any types of crops. Fishermen those who are depending on Chilka, their family members are starving and always submitting their grievances before the Government from Bhushundupur, Balipatpur, Sunderpur upto Tangi is totally damaged with flood water and also salty Chilka water. Thousands and thousands baren acre should be protected allocating sufficient grants by the Central Government so that no more flood water would be affected in rainy season, and in other season also the lands should be properly utilized in summer and other season the drought is creating havoc and the people are also debarred of getting water and there are thousands to thousands acres of land is packed with sands after the flood is over. To save this, Govt. should have concentrate a great stone wall not to enter the Chilka water and more embankment should have been constructed. Presently during my tenure there in the State as a Member of Legislative Assembly whatever the allotment be made by the State Govt. is totally damaged and merged in sand Chilka. Therefore, I request the Central Govt. for immediate allocation through the proper utilization by enforcing State Govt. to execute the works properly and immediately. It is not the case of today, it happen since the Independence, and I pray more money to be allotted to Bolgarah and Begunia Assembly Segment always suffering because of drought. I draw the attention of the Central Govt. to depute one central team for immediate survey and submit the report to the Government.
           
THE MINISTER OF AGRICULTURE AND MINISTER OF CONSUMER AFFAIRS, FOOD AND PUBLIC DISTRIBUTION (SHRI SHARAD PAWAR): Mr. Chairman Sir, I am grateful to the hon. Members who have participated in this discussion and given a detailed picture of the drought and the overall situation of the agricultural front in a particular way in their respective areas.
            I would like to apprise the hon. Members of this august House the status of the South-West Monsoon because there was a lot of discussion about the monsoon. Firstly, the South-West Monsoon 2009 set over Kerala on 23rd of May 2009, a week earlier than the normal date.  That covered part of Karnataka, Andhra Pradesh, West Bengal and North-Eastern States by the first week of June.
But the progress of the monsoon slowed down thereafter causing a delay between one week and three weeks.  It was in Telangana, Maharashtra, east Madhya Pradesh, Chhattisgarh, Orissa, Jharkhand, Bihar and East Uttar Pradesh.  The deficiency of the rainfall in this country, which was  minus 39 per cent as on 10th of June, increased to minus 54 per cent on 24th of June, 2009.  Most of the States in North East and West Region, and some States in North East Region received scanty rain as on 24th of June. The situation is changing and the changes will be for better.  The situation improved after 24th of June in the Central India, Southern Peninsula, and North Eastern States.  The rainfall situation in the country as a whole improved from minus 54 per cent on 24th of June, 2009 to minus 46 per cent on 1st of July, 2009.  During July, the Southern Peninsula, Central India, Gangetic West Bengal and some North Eastern States continued to get rainfall, and the situation has further improved to minus 36 as on 8th of July, 2009 and further to minus 27 on 15th of July.  As on 22nd of July, the rainfall in the country as a whole is minus 19. So we have practically come from minus 65 to minus 19.
            One of the important issues was raised by some hon. Members regarding the reservoirs’ position.  It is true that in the initial stage, the reservoirs’ position was quite serious.  The live capacity in the major 81 reservoirs declined from 12 per cent on 4th of June, 2009 to 9 per cent in the week ending 2nd July, 2009. But, it has improved thereafter to 23 per cent as on 23rd of July, 2009.  Some States have taken the initiative.  They have assessed the situation; they have collected the information from District Collectors and others; and they have taken decision for declaration of draught. 
            Some of the hon. Members have suggested here as to why the Government of India should not take decision to announce drought in a particular State.  In fact, this is a practice and responsibility of the State Government to assess the situation in every block in the State and come to a conclusion. If they feel that the situation is such that they should declare drought, they do declare.  And, along with the declaration they give instructions to the State machineries particularly to the District machinery and the block-level machinery.  The States of Manipur, Jharkhand, Assam and Uttar Pradesh have so declared drought or drought-like situation.   In Manipur, all the nine districts of Manipur have been declared as drought-affected. In Jharkhand, the Government of Jharkhand has declared drought in four districts.  In Assam, drought has been declared in all the 27 districts.  In Uttar Pradesh, in 47 districts, they have declared drought situation. 
श्री लालू प्रसाद(सारण): बिहार में?
SHRI SHARAD PAWAR: They have not yet declared.  They have communicated us to send a team.  उन्होंने इसके साथ साथ कुछ डिमांड की है, मगर अभी तक डिक्लेयर नहीं किया है। मैं उस पर भी आऊँगा । इन चार राज्यों को छोड़कर किसी भी राज्य ने सूखा घोषित करने का डिसीज़न अभी तक नहीं लिया है लेकिन भारत सरकार को उन्होंने कुछ सुझाव दिये हैं।
I tried to collect information from the various States as to what is the State-wise sowing status of the kharif corp.
      हम लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने देश में बड़े पैमाने पर खरीफ का उत्पादन होता है। इसके बाद रबी में भी होगा। इसके अलावा जहां पर फण्ड की स्थिति अच्छी है, वहां समर क्राप भी इस देश में लेते हैं। तीनों फसलों में यदि स्थिति खराब होती है तभी, पूरे देश में सीरियस सिचुएशन पैदा हो सकती है। आज हम खरीफ के ऊपर ध्यान दे रहे हैं। सभी राज्य सरकारों के एग्रीकल्चर मिनिस्टर और एग्रीकल्चर कमिश्नर से जो एन्फोर्मेशन प्राप्त हुई है, उन्होंने जो भेजी है, उसके आधार पर मैं यह स्टेटमेन्ट दे रहा हूं।
            Andhra Pradesh State has reported total kharif crop to the tune of 13.34 lakh hectares sowing compared to the figure of 13.34 lakh hectares last year.  Practically the figures are the same.  That indicates the normal progress in respect of sowing in the State. 
            As far as Bihar is concerned, the normal kharif crop in Bihar is 38 lakh hectares; in the current kharif season, sowing has been completed in 11.89 lakh hectares as compared to 23.95 lakh hectares on the same day last year. It shows that the major shortfall is mainly in respect of rice, it is 11.26 lakh hectares less area when compared to last year.
            As far as Chattisgarh is concerned, 26.18 lakh hectares area has been sown this year as compared to 32.5 lakh hectares last year.  Here also, there is slightly a less area of coverage, that is, minus 5.46 lakh hectares, it is again in respect of rice. 
            Gujarat State has reported the area coverage of 70.28 lakh hectares as compared to the figure of 63.55 lakh hectares . वहां स्थिति अच्छी है।
            Haryana State has reported the area coverage of 22.28 lakh hectares as compared to last year’s figure of 24.89 lakh hectares. That means, 2 लाख 60 हजार तीसरे साल से कम है।
            As far as Himachal Pradesh is concerned, the sowing of the kharif crop of Himachal Pradesh is 3.77 lakh hectares as compared to last year’s figure of 3.93 lakh hectares. सिर्फ 15-20 हजार का फर्क है।
            As far as Jharkhand is concerned, the total kharif area is 19 lakh hectares; so far 4.23 lakh hectares area has been planted as compared to the figure of the same day last year of 10 lakh hectares. यानी 6 लाख इस तारीख तक वहां धान का प्लांटिंग कम हुआ है।
            Karnataka State has reported 43.28 lakh hectares area of sowing of kharif compared to the figure of the last year of 28.26 lakh hectares. The sowing area has gone up from 28 lakh hectares to 43 lakh hectares. वहां सुधार है और बारिश की स्थिति भी अच्छी थी।
            Kerala and Pondicherry States have reported normal area coverage during the current kharif season.
            Maharashtra State has reported area coverage 99.42 lakh hectares as compared to the figure of 83.69 lakh hectares last year. यहां भी सुधार है।
            As far as Madhya Pradesh is concerned, normal sowing has been reported in respect of all crops in Madhya Pradesh.  This year, area coverage in respect of all crops is 91 lakh hectares as compared to the figure of 86.86 lakh hectares last year.
            The total kharif area of Madhya Pradesh is 1.2 lakh hectare.  Higher area coverage is reported in rice, Tur, Arhar, Urad, Mung and Soyabean.  It is expected that the entire area would be planted without any need of Contingency Plan. So far, 89  per cent area of the kharif crop has been sown.
            About Orissa, sowing of all crops is progressing well in Orissa. The sowing has been completed in about 38 lakh hectare which is comparable at last year’s area coverage of 33.83 lakh hectare.  There is a gap of 3.87 lakh hectare as compared to last year.
            About Punjab, the total crop sowing in Punjab is 33.78 lakh hectare this year as compared to last year’s area coverage of 34.88 lakh hectare, which is almost normal.
            About Rajasthan, the State has reported kharif area coverage as 90.15 lakh hectare compared to last year’s area coverage of 108 lakh hectare.  So, there is a gap of about  18 lakh hectare.  Bajra sowing is behind this year in Rajasthan. A little less area is also reported under the pulses.  The total kharif area in the State is 139 lakh hectare. So far,  as on yesterday, 64 per cent area of kharif crop has already been sown.
            About Uttar Pradesh, the total area coverage under kharif in Uttar Pradesh is about 92 lakh hectare.  The sowing of kharif crop has been completed in 49 lakh hectare. As compared to last year on the same day, it was 80 lakh hectare.  So, there is a substantial drop  in Uttar Pradesh. The area coverage in all other crops is lower than last year except Bajra, about which higher area is reported in the State of Uttar Pradesh. About rice, the area coverage is 29.80 lakh hectare this year as compared to last year’s area coverage of 55.25 lakh hectare.  Here, there is a substantial drop.
            About Uttarakhand,  the kharif area in Uttarakhand is 5.6 lakh hectare and sowing has been completed in 4.62 lakh hectare. If your compare it last year, last year on the same day, it was 2.86 lakh hectare, which is practically double this year.
            About West Bengal, in the current season, the total area coverage is 16.4 lakh hectare as compared to last year’s area coverage of 30.66 lakh hectare. Here also, there is a drop of about 50 per cent.
            About Tamil Nadu, the total area coverage in Tamil Nadu is 4.77 lakh hectare, which is very well compared to last year’s area coverage of 4.17 lakh hectare.  So, higher area coverage is reported in Tamil Nadu as compared to last year.
            About the North-Eastern States, in Assam, the total area sown is 9.22 lakh hectare as compared to last year’s total area coverage of 10.1 lakh hectare, which shows normal sowing in Assam.
            Now, let me give the figures about the other States, namely, Arunachal Pradesh, Manipur, Meghalaya, Mizoram, Nagland and Tripura.  In the State of Arunachal Pradesh and Meghalaya, sowing is reported as normal. However, in the States of Manipur, Mizoram and Nagaland, the Government has been reported lower area coverage under kharif crop.
            As regards the overall impact, the main kharif is paddy. In kharif, mainly we take Dhan.  So, about paddy, last year, it was 216.49 lakh hectare; and on the same date, this year it is 155.67 lakh hectare. That means, there is a decrease of 60.82  lakh hectare this year. 60 लाख हैक्टेयर धान का फसल...( व्यवधान)
श्री शरद यादव (मधेपुरा): 60 लाख हैक्टेयर बहुत ज्यादा है।...( व्यवधान)
 श्री शरद पवार : सभापति महोदय, 60 लाख हैक्टेयर कम है। आज तक की सबसे सीरियस सिचुएशन यही है। जहां तक ज्वार की फसल का संबंध है, ज्वार पिछले साल के मुकाबले इस साल 1 लाख10 हजार हैक्टेयर ज्यादा क्षेत्र में है। बाजरा पिछले साल 56 लाख हैक्टेयर में बोया गया था और इस साल 52 लाख हैक्टेयर में बोया गया है। मक्का पिछले साल53 लाख हैक्टेयर में बोई गई थी। इस साल 55 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बोई गई है। टोटल कोर सीरियल पिछले साल 139 लाख हैक्टेयर में बोए गए थे। इस साल 136 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बोए गए हैं। कॉटन पिछली साल72 लाख हैक्टेयर और इस व­ाऩ 82 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में है। पिछले व­ाऩ से इस व­ाऩ 10 लाख हैक्टेयर ज्यादा क्षेत्र में बोई गई है। शुगर केन लास्ट ईयर 43.79 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बोया गया था। इस साल 42.50 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बोया गया है। इस साल 1 लाख29 हजार हैक्टेयर कम क्षेत्र में बोया गया है। जूट का जहां तक संबंध है, वह लास्ट ईयर7.6 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बोया गया और इस साल 6.89 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बोया गया है, यानी 0.17 लाख हैक्टेयर कम क्षेत्र में बोया गया है। अभी तक देश की ओवर आल स्थिति देखने के बाद यह बात सामने आती है कि धान की फसल पर बुरा असर हुआ है। इस बारे में देखना होगा कि किस तरह से हम आगे जा सकते हैं।
      महोदय, सदन के सामने बात लाई गई कि अल्टीमेटली इस व­ाऩ देश में अनाज की क्या स्थिति रहेगी। मैंने इससे पहले भी सदन में कहा था कि इस साल अभी तक के पिछले सालों के मुकाबले हम लोग सबसे ज्यादा प्रक्योरमेंट करने में कामयाब हुए हैं। इस साल गेहूं का, कल तक जो प्रक्योरमेंट किया गया, वह 252 लाख टन हुआ है। आजादी के बाद से आज तक पहली बार हम देश में इतना गेहूं प्रक्योर करने में कामयाब हुए हैं। अभी तक इतना प्रक्योरमेंट देश में नहीं हुआ था। यह पहली बार हुआ है। इसके लिए मैं देश के किसानों को धन्यवाद देना चाहता हूं। विशे­ा रूप से मैं पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश के किसानों का इसमें योगदान ज्यादा है। जहां तक देश की रिक्वायरमेंट है, उसके अनुसार यदि देखें तो हमारे पास 13 महीने आगे तक का स्टॉक भंडारों में उपलब्ध है।
      महोदय, जहां तक चावल का संबंध है, मैं बताना चाहता हूं कि इस साल का जो धान का प्रक्योरमेंट कल तक हुआ है, उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था। इस व­ाऩ 319 लाख टन धान का प्रक्योरमेंट हुआ है। इस हिसाब से यदि हम देखें तो देश की 13 महीने आगे की जितनी जरूरत है, उसके मुताबिक हमारे पास भंडारों में चावल भरा है। इसलिए चावल और गेहूं के बारे में हम बिलकुल निश्चिन्त हैं और हमारा टोटल परफॉर्मेंस अच्छा हुआ है। मगर इस व­ाऩ 60 लाख हैक्टेयर कम क्षेत्र में धान की फसल बोई गई है, इसका असर कुछ हो सकता है। दूसरी बात यह है कि देश में जो बाकी धान की फसल ली गई है, समझो पंजाब या बिहार जैसे राज्यों में जहां पानी की कमी रही, उसके कारण इसकी प्रोडक्टिविटी पर असर पड़ेगा। क्षेत्र वाइज थोड़ा फर्क पड़ेगा, लेकिन हर बार एक क्षेत्र में जो प्रति एकड़ या प्रति हैक्टेयर में जितनी पैदावार होती है, इस साल इसमें कमी आने की सम्भावना है। आज की स्थिति देखने के बाद यह बात कही जा सकती है।
      महोदय, जहां तक मानसून का संबंध है, आई.एम.डी. ने हमें मानसून के बारे में जो टोटल ब्रीफिंग की थी, उसके मुताबिक साफ बताया गया था कि जुलाई महीने में 83 परसेंट मानसून आएगा, जिसमें9 परसेंट की कमी या बढ़ोत्तरी हो सकती है, यानी कम आएगा, इसकी सूचना हमें दी गई थी। मगर अगस्त महीने के बारे में आई.एम.डी. ने जो अभी तक हमें अनुमान बताया है, उसके अनुसार हर साल जितना मानसून अगस्त महीने में आता है उससे 101 परसेंट अच्छा मानसून आएगा। इसमें प्लस और माइनस4 परसेंट है। इस प्रकार की सलाह हमें दी गई है।
योगी आदित्यनाथ(गोरखपुर): मंत्री जी, जिनकी फसल चली गई, उनके लिए मानसून का कोई मतलब थोड़े ही है। उन्होंने जो फसल लगाई है और सूख गई है, उसमें इसका कोई मतलब नहीं है। लोग भूखों मरेंगे, आपके गोदाम में कितना अनाज है, इसका उनके लिए कोई मतलब नहीं है। आज लोगों के सामने भूखों मरने की स्थिति है।...( व्यवधान)
श्री शरद पवार: एक बार अपने स्टाक की पोजीशन अच्छी होने के बाद एक जो समस्या है, यह थोड़ी बहुत कम करने के लिए यह स्टाक मदद करेगा। मगर मैं यह कहना चाहता था कि अगस्त महीने में अच्छी तरह से बारिश आएगी, यह जो सलाह मिली है...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद: पहले भी शॉर्ट बताया और सब फेल हुआ। आप उस पर आश्रित मत रहिये।
श्री शरद पवार: उनका एक फेल हुआ, लेकिन चार में से बाकी तीन बराबर आये। एक फेल हो गया, यह बात सच है।...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद: वे जो बोलते हैं, समझिये कि उसका उल्टा होगा। अच्छा है कि अगस्त महीने में बारिश होगी तो रबी की फसल अच्छी होगी। अगली फसल अच्छी होगी, खरीफ की फसल तो चली गई।...( व्यवधान)
श्री शरद पवार: पूरी चली गई, ऐसा नहीं है। इसीलिए मैंने जो आपके सामने फीगर्स दिये...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : After the speech of the hon. Minister I will allow clarificatory questions. Please do not interfere now.
… (Interruptions)
श्री शरद पवार:  मैंने जो फीगर्स आपके सामने, देश के सामने रखे...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : बाद में पूछिये। Please take your seat. I will allow you after this.
… (Interruptions)
योगी आदित्यनाथ: गोरखपुर के पूरब और पश्चिम के दोनों जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है, लेकिन गोरखपुर, महाराजगंज और कुशीनगर जिलों को घोषित ही नहीं किया गया है। मैं माननीय मंत्री जी से अनुरोध करना चाहूंगा...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN :You will be given time. The hon. Minister is on his legs. Please take your seat.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : You are delaying a chance for yourself to ask a clarificatory question.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Please do not interfere now.
… (Interruptions)
श्री शरद पवार: मैंने शुरू में ही सदन के सामने यह बात कही कि सूखा घोषित करने का अधिकार और जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। वहां की लोकल स्थिति देखने के बाद राज्य सरकार इस नतीजे पर आती है कि कौन से ब्लाक या कौन से जिले में वहां सूखा एनाउंस करना है। उत्तर प्रदेश की बात जो यहां कही गई, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बारे में जो एनाउंसमेंट की है, वह हमें इन्फोर्म की है, इसमें जिस जिले का यहां जिक्र किया गया, इस जिले का नाम इसमें नहीं है। आप जो कहते हैं, वह सच है। जो लिस्ट हमारे पास आई है, इसमें आपने जो कहा, गोरखपुर जिले का नाम नहीं है। यह डिसीजन उत्तर प्रदेश सरकार ने वहां की स्थिति देखने के बाद इस तरह का संदेशा हमें भेजा है। आप जो हमें कहते हैं, मैं जरूर उत्तर प्रदेश सरकार को लिखूंगा कि ऐसी-ऐसी शिकायत हमारे पास इस जिले के बारे में सांसद के माध्यम से आई है, इस पर आप ध्यान दीजिए।...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद: उसमें इनका नाम जरूर मेंशन करिये।...( व्यवधान)
श्री शरद पवार:  इसमें कुछ कदम उठाने की आवश्यकता थी। मैंने कहा कि हमने हर स्टेट के लिए कंटिंजेंसी प्लान बनाये थे। कंटिंजेंसी प्लान बनाने के बाद राज्य सरकार के साथ हम लोगों ने 25 जून को जो मीटिंग ली थी, उनको उसमें सलाह दी गई थी कि कंटिंजेंसी प्लान किस तरह से करना है और कंटिंजेंसी प्लान करने के साथ-साथ जैसे कल परिस्थिति अगर खराब हो जायेगी तो जिसकी खास तौर से आवश्यकता पड़ेगी, हमें दूसरी बार सोइंग करनी पड़ेगी तो ज्यादा सीड की आवश्यकता थी और इसलिए 15 लाख क्विंटल सीड पब्लिक सैक्टर के माध्यम से ऑल्टरनेटिव क्रॉप लेने के लिए एवेलेबल कराये गये। राज्य सरकार को यह बताया गया कि इतना-इतना सीड इनके लिए हमने नोर्मल सीड डिस्ट्रीब्यूशन करने के बाद स्पेयर, इतना ज्यादा रखा है। समस्या कुछ राज्यों के सामने आ गई कि इसके लिए पैसा कहां से लाएंगे तो राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के माध्यम से हर राज्य को पैसा दिया गया था। इसमें फ्लैक्सीबिलिटी रखी गई। राज्य सरकार कोअगर ज्यादा सीड की आवश्यकता हो तो इसके लिए पैसा जो उनको आबंटित किया है, इसमें से वे ले सकते हैं और यह जो नेशनल सीड कारपोरेशन और बाकी संगठन हैं, वहां दे सकते हैं। यह बात उनको इन्फोर्म की गई है और इसलिए यह समस्या नहीं आई। यह बात सच है कि यहां उत्तर प्रदेश के सदस्य ने सीड के बारे में केन्द्र सरकार को एक शिकायत की है।
      उन्होंने शिकायत की कि उत्तर प्रदेश सरकार की जो डिमांड थी, वह पूरी नहीं की गयी।इस तरह की उनकी शिकायत आयी थी। ...( व्यवधान) यह बात सच है। यह बात दारा सिंह जी ने कही। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की डिमांड केंद्र सरकार ने पूरी नहीं की।मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जब देश में कहीं भी ऐसी समस्या आती है, तब हमारे मन में कभी यह बात नहीं आएगी कि वहां किसकी हुकूमत है।इस देश के किसान और इस देश के हिस्से की पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार लेती है। मैं सदन के सामने कहना चाहता हूं कि आज नहीं, पिछले पांच-छः साल का मेरा अनुभव है कि जब-जब स्टेट्स से, जिन राज्यों में यूपीए को छोड़कर दूसरी सरकार की हुकूमत है, उसकी समस्या आयी, मैंने खुद प्रधानमंत्री जी से इस बारे में बात की, तो उन्होंने हम लोगों को सलाह दी थी कि हमको पूरे देश को मद्देनजर रखते हुए अपना काम करना चाहिए और इसी रास्ते से आपको जाना चाहिए।वहां किसकी हुकूमत है, इस पर नहीं जाना चाहिए। ...( व्यवधान)
श्री गणेश सिंह(सतना): पिछले साल से लगातार यही हो रहा है, बात आयी, लेकिन एक पैसा भी मध्य प्रदेश को नहीं मिला। ...( व्यवधान)
श्री शरद पवार : डिमांड बराबर नहीं थी। ...( व्यवधान)
श्री सज्जन वर्मा (देवास): जो धन दिया, वह खर्च नहीं कर पाए। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please take your seat. You can have your chance after he finishes his speech.
श्री शरद पवार: उत्तर प्रदेश की यहां बात कही गयी। मैंने उत्तर प्रदेश का सारा करेस्पांडेंस देखा। उत्तर प्रदेश सरकार के पास सीड की स्थिति कम हो, ऐसी बात नहीं थी।In fact, Government of India took stock of the seed position of the Kharif-2009 vis-à-vis all the States. Let me tell you the overall seed availability indicated by Uttar Pradesh. Uttar Pradesh indicated the overall availability of 9,42,146 quintal of seeds against their requirement of 8,45,100 quintal of seeds. That means Uttar Pradesh was having 97,046 quintal surplus seeds with them.
They have also communicated the crop-wise position. There was a marginal shortfall in maize and jowar of 651 quintals and 435 quintals respectively. The shortfall in til was of 201 quintals. 
In fact, we have requested the State Government that they should give their demand. They have not indicated their demand. In fact, this particular subject was discussed with them, but at that time, they had not placed any demand to the National Seed Corporation of India. 
      उन्होंने बाद में हमें एक खत लिखा। यह बात सच है। उस खत में उन्होंने लिखा कि हमें ट्रुथफुल सीड चाहिए। सीड के दो प्रकार होते हैं। एक सर्टिफाइड सीड होता है, जिसके बारे में एक सर्टीफिकेशन होता है कि यह बिल्कुल ठीक या सही सीड है और ट्रुथफुल सीड वह होता है, जिसमें कुछ व्यापारी या सीड बनाने वाले लोग, जो सर्टीफिकेट नहीं लेते हैं, इसमें लगाते हैं कि यह ट्रुथफुल है, लेकिन इसको भारत सरकार इनकरेज नहीं करती है और कई राज्य सरकारें भी इनकरेज नहीं करती हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से हमें रिक्वैस्ट की गयी कि हमें ट्रुथफुल सीड खरीदने की इजाजत दीजिए।हम इसके पक्ष में नहीं थे। हम कहते थे कि आप सर्टीफाइड सीड खरीदिए। इसलिए उन्होंने शिकायत की कि भारत सरकार हमें सहयोग देने के लिए तैयार नहीं है। ...( व्यवधान) मैं किसी के खिलाफ कोई एलीगेशन नहीं करना चाहता हूं। ...( व्यवधान)
श्री रामकिशुन(चन्दौली): उन्होंने एक चीज और कही थी।हम केंद्र सरकार से बिजली मांगते हैं। आप इसके बारे में बता दें। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please take your seats.
… (Interruptions)
श्री रामकिशुन: ...( व्यवधान) लेकिन आपने कहा कि उन्होंने कोई डिमांड नहीं की, इसे आप अपने उत्तर में स्पष्ट करें। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: This will not go on record. Nothing will go on record other than what the Minister is speaking.
(Interruptions) …* MR. CHAIRMAN: Please take your seats.
… (Interruptions)   
MR. CHAIRMAN : Please take your seat.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Nothing is going on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: All that you are speaking is not going on record. Why are you wasting your time? Nothing is going on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: The hon. Minister is on his legs. Please sit down.
… (Interruptions)
श्री शरद पवार:   उत्तर प्रदेश सरकार ने ट्रूथफुल सीड्स की डिमांड की। अल्टीमेटली हम ट्रूथफुल सीड्स को सपोर्ट करने के पक्ष में नहीं थे, नहीं हैं। मगर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह डिमांड की, इसलिए ट्रूथफुल सीड्स खरीदने के लिए हमने उनको इजाजत दी कि आप चाहते हैं, तो यह लीजिए। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: No, this will not be allowed.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: You are going on talking like this without the consent of the Chair.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: I am saying this to hon. Members on both sides of the House.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please do not talk like this.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Why do not you keep quiet?
… (Interruptions)
* Not recorded.
   
श्री शरद पवार: मैं इस सदन के माध्यम से उत्तर प्रदेश के किसानों और सरकार को आश्वस्त करना चाहता हूं कि उनकी लेजिटिमेटिव जितनी डिमांड्स हैं, क्योंकि मुझे वहां की स्थिति ठीक नहीं दिख रही, इसलिए जो लेजिटिमेटिव डिमांड्स है, उन्हें पूरा करने के लिए हमारा योगदान, सहयोग उनके पाले में रहेगा। इनफैक्ट सदन में जब इससे पहले यह बात आयी, तो मैंने कहाकि अभी तक मेरे पास उत्तर प्रदेश से कोई सुझाव नहीं आया है। मैंअपेक्षा करता था कि कोई लिखेगा।
            In fact, I made this particular statement on 24th of this month, and on the same day I had written to the hon. Chief Minister कि ऐसी-ऐसी स्थिति सदन के सामने हमारे कई सदस्यों ने उत्तर प्रदेश के बारे में बतायी है। इसमें हमें और कुछ करने की आवश्यकता है, तो आप हमें इसकी रिपोर्ट दीजिए। अभी तक मेरे पास कोई ऐक्नॉलेजमैंटनहीं आयी है।
THE MINISTER OF HOME AFFAIRS (SHRI P. CHIDAMBARAM): Even the acknowledgement of the same has not come to him. … (Interruptions)
श्री शरद पवार: मगर मैंने एक बात देखी कि मेरी स्टेटमैंट के बाद वहां के चीफ सैक्रेट्री ने प्रैस कांफ्रेस करके कहा : “He is terming the statement by Sharad Pawar as a blatant lie.” … (Interruptions) It is the Chief Secretary who is saying that : “It is a blatant lie, namely, the statement made by the Union Agriculture Minister on the floor of the House.” … (Interruptions)
SHRI P. CHIDAMBARAM : It is very shameful. It is a privilege issue. … (Interruptions)
SHRI SHARAD PAWAR : He has also said that : “The Centre was dillydallying in considering the demand of the State for allowing import of the truthful seed in …” In fact, the Chief Secretary has said that we were dillydallying, and that we have not allowed them to import truthful seed. I cannot understand that when the certified seed is available in the country … (Interruptions)
SHRI P. CHIDAMBARAM : You should move a Privilege Motion against him. … (Interruptions)
SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): Sir, it is a privilege issue. … (Interruptions)
SHRI SHARAD PAWAR : I do not want to go to that level. But I would just like to bring to the notice of the august House that there was no problem from our side not only for Uttar Pradesh, but for any Government. Still, we will cooperate and we will help because we know the situation in Uttar Pradesh, which is a serious situation and we had to pay more attention about this.
      यहां एक सवाल उठाया गया कि आज जो सिस्टम है, उस सिस्टम के तहत ड्राउट में मदद करने के लिए बहुत ज्यादा समय लेने वाली है। मैं एक बात सदन को कहना चाहता हूं कि जहां-जहां प्रदेश सरकारों ने ड्राउट एनाउंस किया, उन्होंने हमें अभी तक मेमोरेंडम नहीं दिया है। एक मेमोरेंडम देने का सिस्टम होता है कि जब वहां टीम भेजनी हो, तो वहां टीम को जाकर क्या करना चाहिए, उन्हें कौन से जिले में जाना चाहिए, कौन से ब्लाक में जाना चाहिए, क्या देखना चाहिए आदि? इसके लिए राज्य सरकार हमेशा एक मेमोरेंडम भेजती है। अभी मेरे हाथ में एक मेमोरेंडम है। It is a Memorandum, which has been sent by the Government of Karnataka. This is a Drought Memorandum presented to the Government of India seeking Central Assistance for the drought-relief measures in Karnataka. They have prepared a detailed memorandum, and they have sent it to us. This is the practice, and all the State Governments are also sending it.
 
19.00 hrs. अभी तक मेरे पास बाकी राज्य सरकारों जिन्होंने सूखा एनाउंस किया है, उन्होंने मेमोरेंडम भेजा नहीं है, लेकिन मैं एक विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मेमोरेंडम जिस दिन आएगा, इस हफ्ते में हम टीम कांस्टीटय़ूट करके भेजेंगे जो हर डिस्ट्रिक्ट की स्टडी करेगी और उसकी रिपोर्ट आने के बाद यहां उस पर अंतिम डिसीजन लेने की जो प्रोशेस है, उसके माध्यम से हम डिसीजन लेकर, जहां मदद करने की आवश्यकता है, वहां मदद करेंगे।

श्री लालू प्रसाद: मंत्री जी, बिहार से तो मेमोरेंडम आया है, उसकी चर्चा आपने नहीं की है, आप सिर्फ यूपी की ही चर्चा करते रह गए।...( व्यवधान)

श्री शरद पवार: Till today, as I said, I have not received a single memorandum from any State. However, I have received a letter from the hon. Chief Minister of Bihar. बिहार के चीफ मिनिस्टर साहब के लेटर में उन्होंने दो-तीन बातें कही हैं। एक, हम यहां पर पैडी की फसल को बचाने के लिए 15 रूपए प्रति लीटर डीजल पर सब्सिडी दी है। अभी तक इस पर उन्होंने कोई 29 से 30 करोड़ रूपए खर्च किए हैं और शायद यह एमाउण्ट 230 करोड़ रूपए तक जाने की संभावना है। उन्होंने कहा है कि इसमें भारत सरकार को मदद करनी चाहिए। उन्होंने दूसरी बात यह लिखी है कि ड्रिंकिंग वाटर के बारे में कुछ मदद करने की आवश्यकता है। इस तरह से दो-तीन आइटम उन्होंने लिखे हैं। This is not a regular memorandum. उन्होंने यह भी लिखा है कि आप टीम भेजिए। उनके पास से डिटेल्स आने के बाद जैसा मैंने पहले कहा है, मैं बिहार में भी टीम भेजूंगा और उसकी रिपोर्ट आने के बाद वहां के लिए जो कुछ कदम उठाने की जरूरत होगी, वह कदम जल्दी से जल्दी लिया जाएगा। लेकिन तब तक आज की परिस्थिति का सामना करने के लिए हर राज्य को सीआरएफ से पैसे दिए गए हैं। इसकी फर्स्ट इंस्टालमेंट दी गयी है। इनमें चार राज्य ऐसे थे जिनको पिछले साल सीआरएफ से पैसे दिए गए थे, जिसके बारे में उन्होंने अभी तक एकाउण्ट्स नहीं दिए हैं। यहां पर प्रैक्टिस यह है कि जब तक पिछले साल के एकाउण्ट्स नहीं आते हैं, तब तक नई इंस्टालमेंट नहीं देते हैं। मगर वहां की आज की परिस्थितियों को देखते हुए भारत सरकार ने, फाइनेंस मिनिस्ट्री ने, जिन राज्यों का इंस्टालमेंट रहा था for want of some detailed information which they have not submitted, इनफार्मेशन नहीं मिली तो वह इनफार्मेशन कलेक्ट करेंगे और अभी उनके लिए पैसा रिलीज करने का बंदोबस्त कर दिया गया है। असम के लिए 81 करोड़ रूपए, बिहार के लिए 62 करोड़ रूपए, मणिपुर के लिए 2.34 करोड़ रूपए, उत्तर प्रदेश के लिए 124.77 करोड़ रूपए, कुल 271 करोड़ रूपए पहली इंस्टालमेंट के रूप में आज देने का बंदोबस्त किया गया है। उनको आज की परिस्थिति का सामना करने में अगर कुछ राशि की कमी महसूस होगी, तो वे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं और एनसीसीएफ से जो मदद उनको चाहिए, उसके लिए प्रस्ताव देने का उनको अधिकार है। इस पर जरूर ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ-साथ जो डिजीज की बात कही गयी थी, हमने इस बारे में थोड़ा संशोधन किया है।बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और भी कोई भी राज्य हो, उसकी तरफ से भी यह डिमांड आएगी, तो कम से कम फसल बचाने के लिए अगर राज्य सरकार कुछ कोशिश करती है तो हमने तय किया है कि राज्य सरकार ने 15 रूपए प्रति लीटर डीजल पर जो सब्सिडी दी है, उसका 50 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार पे करेगी। इस काम के लिए, इन चार-पांच राज्यों के लिए लगभग एक हजार करोड़ रूपए की राशि लगेगी, वह राशि देने की जिम्मेदारी भारत सरकार लेगी और राज्य सरकार उसकी फसल बचाने की कोशिश में सहयोग देगा।

 

श्री शरद यादव : डीजल कीतो बात ठीक है, लेकिन जो बिजली का मामला है, उसमें भी कोई सब्सिडी वगैरह देने का उपाय खोजना चाहिए।

SHRI SHARAD PAWAR: Regarding power, as I have already said in the House, 100 megawatt additional power from the Central Grid has been allotted to Punjab and Haryana. When I got a request letter from the hon. Chief Minister of Bihar day before yesterday इसमें उन्होंने भी बिजली की मांग की है। साथ-साथ उत्तर प्रदेश से भी बिजली की मांग आई है। इन दोनों राज्यों की जो मांग है, वह मैंने पावर मिनिस्टरी के पास भेज दी है। विद्युत मंत्री शिंदे जी इसमें कुछ न कुछ रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ राज्यों की बिजली कम करके, कैसे उन्हें दें, इस पर भी विचार हो रहा है। इन दोनों राज्यों की डिमांड पूरी करने के लिए हमारा सहयोग रहेगा।

श्री शरद यादव : पंजाब और हरियाणा में तो आपने इंतजाम कर दिया, लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश के बारे में कुछ नहीं किया।

श्री शरद पवार: पंजाब और हरियाणा की रिक्वेस्ट दस दिन पहले आई थी, वह पूरी कर दी है। बाकी इन दोनों राज्यों की रिक्वेस्ट तीन दिन पहले आई है, हम यहां भी सहयोग देने के लिए तैयार रहेंगे।

श्री गणेश सिंह : जिन राज्यों की पहले से ही बिजली काट ली है, उनका क्या होगा? मध्य प्रदेश की 350 मेगावाट बिजली काट ली गई है।...( व्यवधान) मेरे पास रिकार्ड है कि वर्ष 2006-2007 से लेकर आज तक मध्य प्रदेश को एनसीसीएफ से एक पैसा भी नहीं मिला।

श्री शरद पवार: एक सुझाव दिया गया था राजीव रंजन जी की तरफ से कि हमें देश में जल प्रबंधन के लिए ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है, यह बात सच है। इस पर ज्यादा ध्यान तो देना ही होगा। लेकिन एक बात जनरली कही गई कि देश में पानी बहुत है, यह बात सच नहीं है। इस देश में 4.2 per cent of the world’s water is available in India; 2.3 per cent of world’s land is available in India; and 17 per cent world’s population is available in India. So, with the limited resources of 4.2 per cent of world’s water and 2.3 per cent of world’s land, we have to protect the interests of 17 per cent of the world’s population. It is not that simple. That is why, I entirely agree that we have to give more attention for water conservation programme. In fact, the Government of India has recently taken some of the programmes. Now, take the case of NREGA. This year, the provision for NREGA has been Rs.39,100 crore. In fact, under NREGA, weightage has been  given to water conservation programme, watershed development programme, small, minor, irrigation tanks and percolation tanks. One can definitely take up these types of works under NREGA and substantial budgetary provision has been made here. There are a number of other aspects also, if we have to conserve and preserve water very carefully. That is the reason that a number of schemes has been introduced by the Government of India like the AIBP, irrigation projects etc. The thinking behind the AIBP is that we are not in a position to support each and every project of every State. मगर जो प्रोजेक्ट्स हैं, थोड़ी मदद करने के बाद जल्दी पूरा हो सकते हैं, वहां खेती के लिए पानी अवेलेबल हो सकता है, ऐसे प्रोजेक्ट्स में मदद करने के लिए एआईबीपी में दिया है और इस साल के बजट में इसके लिए 9,700 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसके साथ-साथ राज्य सरकारें भी इस पर ध्यान देती हैं। In fact, irrigation works are essentially the responsibility of the State Governments, whether it is minor irrigation, whether it is medium irrigation and whether it is major irrigation. I think, the time has come when the State Government should pay more attention for the water conservation programme. It is not only the water conservation programme and the construction of dams, but even how to use the water. In fact, I do not want to say something about my own area. But once upon a time, I was representing a constituency where the average rainfall is eight inches. This is drought-prone area.

In that particular area, there are more than 18 sugar mills; substantial area is under sugarcane; substantial area is under grapes and a number of other horticultural crops. That was because we succeeded in preserving each and every drop of water and providing that water to the crops through drip irrigation systems.  मेरी पर्सनल खेती है, मेरी खेती की हर फसल ड्रिप सिस्टम पर निर्भर करती है। ड्रिप सिस्टम का फायदा इतना ही होता है कि फ्लो-वाटर देने के बाद, एक एकड़ के लिए जितना फ्लो-वाटर, पैरीनियल क्रॉप के लिए लगेगा, इसी फ्लो-वाटर में तीन एकड़ दूसरी फसल ड्रिप सिस्टम से हो सकती है। इतनी सैविंग आज ड्रिप-सिस्टम से हम कर सकते हैं। ऐसी सभी बातों पर हमें, राज्य सरकारों को और भारत सरकार को ध्यान देना पड़ेगा। यह बात बिल्कुल सच है कि अगर हम जल प्रबंधन के बारे में ध्यान नहीं देंगे तो बढ़ती हुई आबादी और बढ़ती हुई अनाज की डिमांड को पूरा करने के लिए हमें मुश्किल आयेगी। हमारी जो जमीन है, उसे हम नॉन-एग्रीकल्चर परपज के लिए इस्तेमाल किये जाने की स्थिति हम देश में देख रहे हैं। अर्बनाइजेशन एंड नम्बर ऑफ अदर इश्यूज के बारे में हम स्थिति देश में देख रहे हैं। ऐसी स्थिति में हम सिंचाई को बढ़ाएंगे, तभी देश की खेती में सुधार होगा और तभी हम फूड की समस्या को हल करने में कामयाब होंगे। इसलिए मैं सभी राज्य सरकारों से अपील करना चाहता हूं कि आप सबसे ज्यादा ध्यान जल-प्रबंधन के क्षेत्र में दीजिए। भारत सरकार इसमें पूरी तरह से सहयोग देगी। नरेगा में खासतौर से ऐसी स्कीम है कि अगर राज्य सरकारों ने इस पर अमल किया, इस पर ज्यादा ध्यान दिया और इसकी सब प्रॉविजन वाटर-कंसरवेशन के लिए ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कीं, ऐसी परिस्थिति पैदा की, तो मुझे लगता है कि सूखे की समस्या से हमें कुछ न कुछ छुटकारा मिलने में मदद मिलेगी।

      कई सदस्यों ने यहां कहा कि पिछले 50 सालों से हम यहां सूखे पर डिस्कस करते हैं, यह स्थिति अच्छी नहीं है। इस परिस्थिति में बदलाव लाना है तो हम सभी लोगों को राजनैतिक मतभेद छोड़कर एक होना पड़ेगा और इस काम पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा, यह मैं सदन के सामने कहना चाहता हूं।

      माननीय गोपीनाथ मुंडे जी ने कहा कि चीफ-मिनिस्टर्स की मीटिंग बुलाने की आवश्यकता है। मैंने शुरू में भी कहा कि सूखे के बारे में इतनी जल्दबाजी में डिसीजन लेना ठीक नहीं है। अगस्त तक हम सारी स्थिति को देखेंगे और आवश्यकता पड़ी तो माननीय प्रधान मंत्री जो कहकर चीफ-मिनिस्टर्स और एग्रीकल्चर मिनिस्टर की मीटिंग बुलाने में मुझे कोई समस्या नहीं आयेगी, ऐसा मुझे लगता है। इस पर हम जरूर ध्यान देने के लिए तैयार हैं।

      उन्होंने यह भी बताया कि नरेगा का पैसा राज्य में जाने के लिए तीन-चार महीने लगते हैं। मैंने इस बारे में इंफोर्मेशन ली, लेकिन ऐसी स्थिति नहीं है। वास्तव में कई राज्यों में पिछले साल का नरेगा का पैसा बाकी है, वह लैप्स होता नहीं है। हम यह बात नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं कि फाइनेंस बिल कल ही यहां मंजूर हुआ है, आज शायद राज्य सभा में फाइनल हो जाएगा। राज्य सरकारों को और ज्यादा पैसा रिलीज करने की आवश्यकता है, उसे हम जल्दी से जल्दी रिलीज करने की कोशिश करेंगे, जिससे इस तरह की शिकायत दुबारा सामने न आने पाए।

      तीसरा सुझाव उन्होंने दिया कि जब सूखे की परिस्थिति पैदा होती है, तब राज्य सरकारों को बहुत कदम उठाने पड़ते हैं। एक कदम यह भी उठाना पड़ता है कि तरह-तरह के जो लोन्स किसानों ने लिये हैं, उनकी रिकवरी सस्पेंड करना और इंट्रेस्ट में कुछ राहत दे सकते हैं तो राहत देना। यह तो राज्य सरकारें करती हैं, मगर इसमें बैंकों को भी कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। पूरी स्थिति जब देश के सामने आयेगी तो राज्य सरकारें इस बारे में जो सुझाव देंगी, उनको मद्देनजर रखते हुए, इस पर जो भी कदम उठाने की आवश्यकता होगी, उन पर ध्यान दिया जाएगा। लेकिन अभी इसमें समय है और अगस्त महीने के खत्म होने के बाद इस बारे में हमें कोई समस्या नहीं आयेगी।

            महोदय, एक माननीय सदस्य ने ग्लोबल वार्मिंग के विषय में कहा है कि इस बारे में ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत सरकार ने इस पर ध्यान दिया है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक समिति गठित की है, जिसमें एक्सपर्ट्स हैं तथा कई मंत्रालयों के प्रतिनिधि भी हैं और सबकमेटीज़ भी हैं। जहां तक कृषि मंत्रालय की बात है, हमारे यहां इंडियन काउंसिल फार एग्रिकल्चर रिसर्च, जो रिसर्च में सबसे महत्वपूर्ण काम करने वाली संस्था है, जहां छह हजार से ज्यादा वैज्ञानिक काम करते हैं। इन वैज्ञानिकों को संदेश दिया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग का जो इम्पेक्ट हो रहा है, उसकी जबरदस्त कीमत हमारे देश के शायद कुछ राज्यों को देने की नौबत आएगी। उसका ध्यान रखते हुए हमारा टोटल रिसर्च बदलना चाहिए। जहां तक हमारे वैज्ञानिकों का असेसमेंट है, ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर हिंदुस्तान में दो-तीन राज्यों पंजाब, हरियाणा, वेस्टर्न यूपी, बिहार के कुछ हिस्से और हिमालय पर होगा। ये सारे हिस्से हमारे देश में अनाज का भंडार हैं, इस कारण गेहूं की फसल पर असर होगा, ऐसी रिपोर्ट एक्सपर्ट्स ने दी है। इसी कारण गेहूं की वेराइटी डवलप करने में रिसर्च का अप्रोच बदला है। हम इस तरह की वेराइटी डवलप करने में लगे हैं, जिसमें रेजिस्टेंस कैपेसिटी बिल्टअप होगी कि ग्लोबल वार्मिंग का जो बुरा असर होगा, उसका सामना करने की ताकत उस फसल में होगी, ऐसी रेजिस्टेंस वेराइटी गेहूं की तैयार करने में हमारे वैज्ञानिक लगे हुए हैं। मुझे सदन के सामने कहने में खुशी हो रही है कि कम से कम आठ से नो वेराइटीज ढूंढने में हमारे वैज्ञानिक कामयाब हुए हैं। दो-तीन साल और अनुसंधान किया जाएगा तथा बाद में ग्लोबल वार्मिंग का असर हमारे देश की फसल पर नहीं होगा। भारत सरकार के अन्य विभागों के माध्यम से भी ग्लोबल वार्मिंग के बुरे प्रभाव को खत्म करने के लिए जो कदम उठाने की आवश्यकता है, वे उठाए जा रहे हैं। इसके लिए स्पेशल सैक्शन खोलकर प्रधानमंत्री के दफ्तर के माध्यम से इस तरफ ध्यान देने का काम शुरू किया है। हम इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहते हैं और मुझे विश्वास है कि इससे एक अच्छा रास्ता देश के सामने आएगा और इस समस्या को हल करने में हम कामयाब होंगे।

      जहां तक सूखे की परिस्थिति का सवाल है, मैंने शुरू में कहा है कि एक महीने पहले की स्थिति और आज की स्थिति में बहुत सुधार आया है। हर राज्य की हर हफ्ते की सूचना प्राप्त करके हमारा ध्यान उस राज्य पर रहेगा। राज्य सरकार और किसानों की मदद करने की आवश्यकता है, उस पर हमारा ध्यान रहेगा और इस संकट से देश के किसानों तथा देशवासियों को उबारने के लिए जो कुछ करना पड़ेगा, पूरी ताकत से, लगन से करने का प्रयास भारत सरकार के माध्यम से, यूपीए सरकार के माध्यम से किया जाएगा। यही विश्वास मैं सदन को दिलाना चाहता हूं।

श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (मुंगेर): सभापति महोदय, मैं मंत्री जी से दो स्पष्टीकरण चाहता हूं। माननीय मंत्री जी ने सूखे से निपटने के लिए जो तैयारी की है, उसकी विस्तार से सदन में चर्चा की है और साथ-साथ बिहार सरकार ने डीजल की सब्सिडी देने का जो फैसला किया है, उसमें भी 50 प्रतिशत का वे योगदान देंगे, ऐसा उन्होंने कहा, इसके लिए मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं। मैं दो बातें जानना चाहता हूं। हमने मंत्री जी को एक सुझाव दिया था और मंत्री जी ने उसे स्वीकार किया है कि आगे की कार्य योजना के लिए जल प्रबंधन बहुत आवश्यक है और जल प्रबंधन के माध्यम से आप बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवा सकते हैं। मैंने एक सुझाव दिया था कि आज सड़क, टेलीफोन, एनर्जी ये इनफ्रास्ट्रक्चर विभागों के रूप में जाने जाते हैं, इसलिए फोकस्ड होते हैं।

      सरकार सिंचाई को इंफ्रास्ट्रक्चर आधारभूत संरचना के रूप में क्यों नहीं केन्द्रित करना चाहती है ताकि उस पर ध्यान केन्द्रित हो सके? मेरा दूसरा क्लेरिफिकेशन है कि बिहार सरकार ने जो बिजली के बारे में आपको पत्र लिखा, आपने कहा कि आप एनर्जी मिनिस्ट्री से अतिरिक्त आबंटन के लिए ले रहे हैं, हम आपके ध्यान में एक बात लाना चाहते हैं कि आज बिहार को सेन्ट्रल ग्रिड से 1500 मेगावॉट का एलॉटमेंट है, उसके अगेन्स्ट हमें सिर्फ 900, 950 मेगावॉट ड्रॉ करने की छूट दी जाती है, हम आपसे यह भी आग्रह करेंगे कि बिहार की जो परिस्थिति है, उसे देखते हुए आप एनर्जी डिपार्टमेंट से समन्वय स्थापित करके हमारा जितना पूरा एलॉटमेंट है, उसे ड्रॉ करने की भी अनुमति आप दिलाने की कृपा करें। हमारा आपसे यही आग्रह है।

SHRI DUSHYANT SINGH (JHALAWAR): Sir, I come from the State of Rajasthan.  Out of 33 districts of Rajasthan, has the Government of Rajasthan declared any district as drought-prone?  Has the Government of India received any memorandum from the Government of Rajasthan?

श्री शैलेन्द्र कुमार(कौशाम्बी) : सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से यह कहना चाहताहूं कि सभी सम्मानित सदस्यों ने अपने विचार, सुझाव और मांग इत्यादि सब यहां रखे हैं। इसमें जैसा आदित्य योगीनाथ जी ने पूछा कि उत्तर प्रदेश में खासकर राजनीतिक विद्वेष की भावना से जो जनपद चयनित किये जा रहे हैं, सूखा घोषित किये जा रहे हैं, पूरे पूर्वान्चल और खासकर बुंदेलखंड में सूखे की स्थिति बहुत भयंकर है। योजना आयोग की सामरा समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पूर्वान्चल और बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके हैं। यहां पर बारिश भी कम हुई है तो इसके लिए क्या आप केन्द्रीय दल भेजकर, अध्ययन करवाकर, वहां के लिए विशेष पैकेज दिलवाकर क्या वहां पर सूखा राहत के सभी कार्य पूरे कराएंगे- जैसे लगान माफ कराएं, तमाम तरह के पशु-पक्षियों को उनको चारा इत्यादिउपलब्ध कराने की व्यवस्था क्या आप अपने माध्यम से करेंगे क्योंकि अभी मुलायम सिंह जी ने भी यह मुद्दा उठाया था कि इटावा को छोड़ दिया गया, अगल-बगल के जिले को लिया गया। हमारा जनपद कौशाम्बी प्रतापगढ़ है, उसे छोड़ दिया गया, अगल-बगल के जिले को लिया गया। इसलिए ऐसे जिलों को क्या आप सम्मिलित करने पर विशेष ध्यान देंगे?

चौधरी लाल सिंह(उधमपुर): सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से यह जानना चाहूंगा कि मेरे राज्य जम्मू-कश्मीर का माननीय मंत्री जी ने कहीं उसका जिक्र ही नहीं किया कि वहां फसल कितनी हुई है, घाटा कितना रहा। यहां तक कि कुछ भी नही कहा गया कि वहां सूखा है और उसके लिए क्या इंतजाम किये गये हैं। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि इन चीजों का क्या कारण है? मेरी मंत्री जी से विनती है कि जम्मू-कश्मीर के बारे में जो मैं जानता हूं कि मेरे वहां मेजोरिटी में मक्की लगती है और थोड़ा सा धान लगता है और मक्की आप जानते हैं कि हमारे राज्य से उसका सीजन ही खत्म हो गया। अब जो बाद में लगाई गई है, अभी जो पिछले हफ्ते बारिश हुई है, उसकी फसल बिल्कुल न होने के बराबर होगी। मैं माननीय मंत्री जी से यह पूछना चाहता हूं कि आप उस किसान के लिए क्या करेंगे? उसकी मुश्किलें कैसे दूर करेंगे औऱ साथ में जो फसल का बीमा है, जो इंडिविजुअल फसल बीमा है, क्या वह करवाने जाएंगे?

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): My question is related to the relief that is being provided to the farmers when crops are destroyed. When there is more than 50 per cent croploss relief is provided through Calamity Relief Fund.  It is being distributed according to the recommendation of the Finance Commission. You are providing CRF per hectare.

It is around Rs. 4,000 per hectare for areas under assured irrigation and Rs. 2,000 per hectare for non-irrigated areas.  Shri Biju, our hon. colleague, has already raised this question in this House. Of course, he mentioned about Kerala only, but it needs a holistic approach for the whole country. 

            So, I would like to submit through you, to the hon. Minister that this amount is too meagre. I would like to know whether the Government is considering enhancing the assistance that is being provided to CRF or not.

 

श्री नामा नागेश्वर राव (खम्माम): महोदय, माननीय मंत्री जी ने आंध्र प्रदेश के बारे में बोलते हुए एक बात कही थी कि वहां से जो रिपोर्ट आई है, इसे पिछले साल से कम्पेयर करें तो इसे नॉर्मल सिटी कहा गया है। मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि तेलंगाना जिले में पीने के लिए भी पानी नहीं है तो यह रिपोर्ट कैसे आई? इस बारे में टीम भेजकर तुरंत इंक्वायरी की जाए क्योंकि वहां भी कांग्रेस की सरकार है और यहां यूपीए सरकार है, हो सकता है इस वजह यह बात छिपाना चाहती है। हमारी मांग है कि तुरंत टीम भेजकर इंक्वायरी करनी चाहिए। हमारे डिस्ट्रिक्ट खम्माम में आज की तारीख में पीने का पानी नहीं है, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से यहां टीम भेजने का अनुरोध करता हूं।

श्री लालू प्रसाद: महोदय, मैं माननीय मंत्री जी के प्रयास की सराहना करता हूं। बिहार में सोन इलाके के गांव में आठ महीने पहले गेहूं और धान की पैदावार हुई है जबकि यह आज भी ऐसे ही पड़ा हुआ है। एफसीआई ने बार-बार कहने के बाद भी खरीदा नहीं है। एक तरफ कहा जाता है कि अन्न संकट होने वाला है, शार्टेज होने वाली है और दूसरी तरफ किसान के पास पैसे नहीं हैं। क्या सरकार समय सीमा के अंदर गेहूं और धान को तत्काल खरीदकर रखना चाहती है?

     महोदय, मैंने आपसे पहले भी आग्रह किया था कि एफसीआई अधिकारियों और पदाधिकारियों में इतना भ्रष्टाचार है जिसके कारण किसान मारे-मारे फिर रहे हैं। आपको तुरंत अन्न खरीदकर अन्न भंडार को भरना चाहिए और किसानों की आमदनी बढ़ानी चाहिए। आप स्पष्ट बताइए कि इस बारे में क्या करना चाहते हैं?

SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA): Sir, as there was a devastating cyclone -Aila - in the State of West Bengal in the coastal area, whatever fund which was available under the NCCF, was utilized for rehabilitation and reconstruction work in the Aila affected area.    Almost 80 per cent of the area in the State of West Bengal is affected because of drought and because of delayed monsoon. 

            So, may I know from the hon. Minister as the fund available with the State Government has been exhausted, whether the Central Government will consider providing funds under the NCCF to West Bengal to tackle the problem of drought?

श्री बदरुद्दीन अजमल (धुबरी): महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि जिस तरह से बताया गया है यह अच्छी बात है कि 13 महीने के लिए बहुत अनाज मौजूद है। लेकिन आप टीवी देखिए या अखबार उठाइए, आप देखेंगे कि हाहाकार मची हुई है, गरीब कोई चीज नहीं खरीद पा रहे हैं। मीडियम क्लास के लोग भी नहीं खरीद पा रहे हैं क्योंकि हर चीज की कीमतें आसमान छू रही हैं। क्या सरकार इसे रोकने के लिए कुछ करेगी? लोगों में एक भय पैदा किया जा रहा है कि अनाज नहीं है। यह आम आदमी के लिए बहुत चिंता का विषय है।

      मेरा दूसरा प्रश्न बहुत इम्पार्टेन्ट है। मिनिस्टर साहब ने यह कहा कि असम में सी.आर.एफ. में80 करोड़ रुपये उन्होंने भेजे, यह बड़ी खुशी की बात है। लेकिन मेरे पास गवर्नमैन्ट ऑफ असम की रिपोर्ट है -

It is due to the bureaucratic diplomacy in the Department of Disaster Management for which no money could be released from the CRF till today.मैं जानना चाहता हूं कि क्या मंत्री जी इसकी खबर लेंगे? यही जानकारी मैं मंत्री जी से हासिल करना चाहता हूं।

MR. CHAIRMAN :    Please conclude. Take your seat now.

श्री बदरुद्दीन अजमल :  मैं मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि जिन किसानों ने इस साल लोन लेकर खेती की है, उनकी फसल बर्बाद हो गई है। क्या सरकार उन किसानों का लोन माफ करेगी?

MR. CHAIRMAN: You have been given enough time. Please put the question.

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): सभापति महोदय, जैसा माननीय सदस्य ने बताया कि उत्तर प्रदेश में जो जिले सूखे घोषित हुए हैं, उसमें राजनीति से प्रेरित कुछ भी नहीं है। केन्द्र सरकार ने जो गाइडलाइंस तय की हैं, उस आधार पर उत्तर प्रदेश में जिले सूखे घोषित किये गये हैं। मैं माननीय मंत्री जी के संज्ञान में लाना चाहता हूं कि तमाम सम्माननीय सदस्यों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। चूंकि उत्तर प्रदेश बड़ा प्रदेश है। हमारे कृषि मंत्री जी ने केन्द्रीय कृषि मंत्री जी से मिलने का समय मांगा है। इसलिए माननीय मंत्री जी से मैं जानना चाहता हूं...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Aaron Rashid, please take your seat. Please do not interrupt now.

श्री दारा सिंह चौहान : चूंकि आप संवेदनशील हैं, आप बड़े किसान भी रहे हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश जो सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित है, मैं मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जो बिजली की कमी है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Dara Singh Chauhan, please conclude now.

श्री दारा सिंह चौहान : क्या माननीय मंत्री जी ऊर्जा मंत्रालय से सम्पर्क स्थापित करके संवाद करके वहां के विकास के लिए ज्यादा ऊर्जा का जो पैकेज मांगा गया है, वह वहां के किसानों को ज्यादा से ज्यादा राहत देने की बात करें।

MR. CHAIRMAN: Shri Ganesh Rao Dudhgaonkar, in one minute put only one question.

श्री गणेशराव नागोराव दूधगांवकर(परभणी): मंत्री जी, नरेगा में जो60-40 एक्सपेंडीचर बुकिंग होता है, उसमें ...( व्यवधान)

CHAIRMAN: You have already taken the time of the House. Why do you disturb the House? Shri Ganesh Rao, please continue.

श्री गणेशराव नागोराव दूधगांवकर: नरेगा में 60-40 एक्सपेंडीचर बुकिंग होता है, उसी में मंत्री जी को रिलैक्सेशन देना होगा, तब कहीं ड्राउट का काम होगा।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: All of you cannot ask questions.

श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह): महोदय, जो हमारे वक्ता थे...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: There is no package in the House to allow this much of questions.

श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय: हमारा आपसे आग्रह है कि हमारे झारखंड में राष्ट्रपति शासन है। वहां भी सुखाड़ की स्थिति है। हमारा मंत्री महोदय से आग्रह है कि राज्यपाल महोदय को आग्रह करें कि झारखंड को सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित करें।

श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड): महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से जानना चाहूंगा कि 15 रुपये डीजल पर आधी सब्सिडी केन्द्र सरकार देगी। क्या यह बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लिए लागू होगा या सारे सूखा प्रभावित राज्यों में लागू होगा? उन्होंने यह क्लियर नहीं किया है। क्या महाराष्ट्र को भी वह राहत मिलेगी?

            दूसरी बात मैं जानना चाहता हूं कि क्या महाराष्ट्र सरकार ने मेमोरेंडम भेजा है? यदि मेमोरेंडम भेजा है तो उसमें उन्होंने कितनी राहत मांगी है?

      तीसरी बात मैं जानना चाहता हूं कि कुछ प्रदेशों में अगस्त में बारिश होने से फायदा हो सकता है। लेकिन कुछ प्रदेशों में अगस्त में बारिश होने से कुछ फायदा नहीं होगा। ऐसे प्रदेशों में अकाल राहत देने की योजना लागू करने में क्या समस्या है? इसके लिए सरकार कब तक राह देखेगी? अगर 15 अगस्त तक बारिश नहीं आई तो क्या प्रधान मंत्री सब प्रदेशों की मीटिंग बुलायेंगे?

MR. CHAIRMAN: Shri Mahesh Joshi.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: No more questions will be allowed. Shri Mahesh Joshi, please come to the question straight.

श्री महेश जोशी(जयपुर):  महोदय, राजस्थान अकाल से सबसे ज्यादा त्रस्त रहा है। मैं प्रश्न ही पूछ रहा हूं, लेकिन उसके लिए भूमिका बतानी पड़ेगी। राजस्थान में साठ परसैन्ट रेगिस्तान है। वहां साठ सालों में अधिकांश समय अकाल रहा है। वहां पांच साल तक भाजपा की सरकार रही, लेकिन उसने एक मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं किया। वहां पानी लगातार नीचे जा रहा है। वह राज्य डार्क जोन बनता जा रहा है। ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: If you want to put a question to the hon. Minister, please do it. Otherwise, take your seat.

श्री महेश जोशी: मैं मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि क्या वह राजस्थान के किसानों को कोई विशेष आर्थिक सहायता या विशेष पैकेज देने की मंशा रखते हैं? ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: It will not go on record.

(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please take your seat. You are not allowed. I allowed to you put a question on the Discussion under Rule 193.

श्री महेश जोशी: क्या माननीय मंत्री महोदय राजस्थान के अकाल के लिए कोई विशेष सहायता देने जा रहे हैं? यही मेरा प्रश्न है।

SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): Mr. Chairman, Sir, I would like to ask a very important question pertaining to agriculturists and particularly about cardamom growers. There is an existing package of Rs. 1,711 crore which has been given by the Commission headed by Prof. M.S. Swaminathan, but so far it has not been implemented.

            Then, I thank the Government for reducing the rate of interest from 7 per cent to 6 per cent to those farmers who are prompt in paying back their loans. The Nationalised Banks are extending this benefit to farmers, but the Scheduled Banks, other than Nationalised Banks, are not giving this benefit to farmers. So, will the Government consider issuing suitable instructions to Scheduled Banks also to reduce the rate of interest to farmers?

* Not recroded.

   

MR. CHAIRMAN : Now the hon. Minister may briefly respond to thequeries.

SHRI SHARAD PAWAR: Mr. Chairman, Sir, as far as Uttar Pradesh is concerned, the Government of Uttar Pradesh has communicated, as I said, firstly 20 districts, namely Mainpuri, Kanpur, Bareilly, Farukkabad, Jaunpur, Ghazipur, Rae Bareili etc. इसमें क्राइटीरिया था कि जिस जिले में 40 फीसदी से कम वर्षा हुई और 75 फीसदी से कम बुवाई हुई, उस जिले को ले लिया गया। बाद में दूसरे क्राइटीरिया में40 फीसदी से कम वर्षा और 50 फीसदी से कम बुवाई वाले ऐसे कुछ जिले उन्होंने लिये। इनमें बांदा, मथुरा, इलाहाबाद, औरैया, कानपुर नगर, वाराणसी, जालौन जिलों का क्राइटीरिया लगाकर जिलों का सिलैक्शन किया गया है। ऐसी रिपोर्ट मेरे पास आ गई है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : This will not go on record.

(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN : No more question now. Please don’t interrupt.

SHRI SHARAD PAWAR: Sir, this is the basic right of the State Government. Definitely I can write to the State Government....( व्यवधान) यह मेरे अधिकार में नहीं है, यह राज्य सरकार का अधिकार है। कुछ जिलों के बारे में यहां खास बात कही गई कि गोरखपुर या दूसरे जिलों का या आसपास के जिन जिलों में सूखा है, मगर यहां नहीं है, इस तरह की बात कही गई। मैं लिखकर उनके ध्यान में लाऊंगा।इस मामले में अंतिम निर्णय उनका होगा।

      चौ. लाल सिंह ने जम्मू कश्मीर के बारे में पूछा है। जहां तक जम्मू कश्मीर में पैडी की बुवाई का ट्रांसप्लांटेशन का जो कार्यक्रम इस साल हुआ है, वह दो लाख 2 हजार हैक्टेयर में हुआ है जबकि पिछले साल यह तीन लाख39 हजार हैक्टरमें हुआ था। जहां तक मक्का का सवाल है, यह एक लाख 24 हजार हैक्टेयर इस साल हुआ है जबकि पिछले साल एक लाख60 हजार हैक्टेयरमें हुआ था।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Shailendra Kumarji, please don’t interrupt.

*Not recorded.

 

SHRI SHARAD PAWAR: Shri Aaron Rashid mentioned about Prof. Swaminathan Commission’s Report. We are discussing about drought situation here and Prof. Swaminathan Commission’s Report is about some other areas. That is altogether a different subject. I do not think we should discuss about it here now.जहां तक श्री लालू प्रसाद ने सवाल किया कि बिहार के क्षेत्रों में धान की खरीद आज भी नहीं हो रही है। यह शिकायत आयी थी और हमने इंस्ट्रक्शन्स लिखकर दी हैं मगर आज की स्थिति में जितना धान मिल सकता है, उतना लेना अच्छा रहेगा क्योंकि धान की कमी है। इसलिये हम इसी हफ्ते यहां से टीम भेज देंगे और वहां पर लोगों को बैठायेंगे। इस संबंध में एक शिकायत यह आई है कि राईस मिल वालों से लेना है, इस तरह की बात लोगों ने की है। हम वहां देखेंगे कि किसानों के पास पैसा जाता है और हमारे स्टॉक में इप्रूवमेंट होने में मदद मिलती है। हम इस संबंध में सहयोग देंगे और हम ने इस प्रकार की इंस्ट्रक्शन्स दी हैं.।

            Shri Mahtab asked about the norms pertaining to release of money under CRF. About two years back a decision was taken to review these norms, but it looks like that there is scope to look into the matter again. In fact, we are meeting immediately after this Session. So we will see as to how to make improvements in CRF norms.

      मुंडे जी ने डीजल सब्सिडी की बात की है कि जहां फसल बचाने का काम राज्य सरकार ने हाथ में लिया है। जहां बारिश कम है, जो ऐसे जिले हैं, आज बिहार की बात सरकार की तरफ से आयी कि वहां पानी कम है और फसल बचाने के लिए वे डीजल की सब्सिडी देते हैं। वैसी ही बात हमारे सामने पंजाब और हरियाणा से भी आयी है। जिन भी राज्यों से यह बात आएगी, उन सभी राज्यों को हम यह एप्लीकेबल करेंगे। दूधगांवकर जी ने कहा कि नरेगा में 60-40 का रेश्यो बदलेगा, तो यह बदलने की बात आज तो हमारे सामने नहीं है, मगर जहां सूखे की स्थिति है वहां नरेगा का सौ दिन का जो कार्यक्रम है, उसे 50 दिन से और एक्सटेंड करने की बात हमारे सामने है और उस तरह का डिसीजन वहां जरूर लिया जाएगा। जहां तक बदरूद्दीन अजमल जी ने अनाज के प्राइसेस के बारे में कहा। यह बात सच है कि प्राइसेस के बारे में कल डिस्कशन है। मुझे खुशी है कि जब बासुदेव आचार्य जी ने अपने विचार सदन के सामने रखे, तब उन्होंने सी टू प्लस 50 पर्सेंट प्राइस किसानों को देने की अच्छी मांग की, मगर इससे अल्टीमेटली अनाज की कीमत भी बढ़ती है। मुझे लगता है कि जो डिमांड उन्होंने की है, हम उस रास्ते से जाने की तैयारी कर रहे हैं। अनाज की कीमत ज्यादा बढ़ रही है कल वे ऐसी शिकायत नहीं करेंगे।

श्री बसुदेव आचार्य : आप उन्हें सब्सिडी दीजिए।

श्री शरद पवार: हम कहां से सब्सिडी दें, सब जगह सबको कैसे सब्सिडी दें? यह सिम्पल बात है...( व्यवधान) पटेल जी ने यह कहा कि बाकी सब कीमतें ऊपर जाती हैं, मगर किसानों को उनकी उपज की कीमत ज्यादा देनी चाहिए और यहां इस पर बहुत बहस होती है। मैं साफ कहना चाहता हूं कि अगर इस देश की फूड सिक्योरिटी की समस्या हल करनी है तो किसानों को अच्छी कीमत देनी पड़ेगी और वह अच्छी कीमत देशवासियों को स्वीकार करनी पड़ेगी।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : No interruptions please.  Take your seats.

… (Interruptions)

श्री शरद पवार: मैं यहां कीमत तय करने के लिए खड़ा नहीं हुआ हूं। यह तो अल्टीमेटली सीएसीबी तय करेगी। एक शिकायत की गयी कि आध्र प्रदेश की कोई रिपोर्ट ठीक न हो, ऐसी बात नहीं है। आध्र प्रदेश सरकार की छिपाने की कोई भावना नहीं है। वहां जो स्थिति है, उसके बारे में उन्होंने इन्फार्म किया है और हमारे मन में कोई आशंका नहीं है। सीआरएफ के बारे में अजमल जी ने एक बात और कही कि इस साल जिन किसानों ने लोन लिया है, उनका लोन माफ किया जाए। जब राज्य सरकार इस बारे में कोई कदम उठाती हैं, वह उठाने के बाद हम इसमें किस तरह से सहयोग दे सकते हैं, इस पर हम ध्यान देंगे और उनको मदद करने के लिए कहेंगे। एक बात यहां इरीगेशन के प्रोजेक्ट के बारे में कही गयी कि उन्हें इफ्रास्ट्रक्चर का क्राइटेरिया लगाना चाहिए। एक बात है कि इफ्रास्ट्रक्चर के क्राइटेरिया का फायदा इनवेस्टर को होता है। इस बजट में कोल्ड-चेन के बारे में, इससे पहले इफ्रास्ट्रक्चर का स्टेट्स उन्हें दिया नहीं था, वह दिया गया है। इससे कोल्ड-चेन के क्षेत्र में ज्यादा इन्वेस्टमेंट आएगी, यह बात सरकार ने सामने रखी थी। जहां तक इरीगेशन प्रोजेक्ट है, माइनर इरीगेशन प्रोजेक्ट है, मीडियम प्रोजेक्ट है, यहां प्राइवेट सेक्टर की इन्वेस्टमेंट नहीं आती है। यहां100 प्रतिशत इन्वेस्टमेंट गवर्नमेंट की आती है। इसलिए मुझे मालूम नहीं है कि इफ्रास्ट्रक्चर के स्टेट्स का बेनीफिट क्या होगा? मैं आपसे बात करूंगा और आपसे समझूंगा, अगर इससे लाभ होता है, इससे ज्यादा एरिया बढ़ने में मदद होती है तो फाइनेंस मिनिस्ट्री से इस बारे में बात करने के लिए मेरी तैयारी रहेगी। दुष्यंत सिंह जी ने पूछा कि have you received any proposal from the Rajasthan Government; and whether they have announced any DPAP districts?  In fact, DPAP districts have already been announced in the entire country.  There are some districts, but I may not be able to tell exactly which districts in Rajasthan.  But as on today, we have not received any proposal from the Rajasthan Government for sending any observer or any team or anything.

      महोदय,एक बात कही गयी कि सीआरएफ में पैसे नहीं है, अजमल जी ने असम की बात कही। सीआरएफ के पैसे की समस्या असम, बिहार, मणिपुर और उत्तर प्रदेश इन चार राज्यों की थी। मैंने सदन के सामने यह बात कही कि आज ही इसके आर्डर निकालकर उन्हें पैसे रिलीज करने का काम किया गया है।

श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह: बिहार की बिजली के संबंध में कहा था कोआर्डिनेट करने के लिए। ...( व्यवधान)

श्री शरद पवार: वह तो लिखना होगा। Ultimately, as I said, I have to discuss it with the Power Minister.  I will take it up with the Power Minister.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Please take your seat.

श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय :हमारे झारखंड में जहाँ प्रॉबलम है ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिये प्लीज़।

…( व्यवधान)

श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय : अरे कैसे बैठ जाएँ? ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat.  You have already raised the issue.  Let him reply.  Would you not listen to his reply? Listen to the reply, please.

… (Interruptions)

SHRI SHARAD PAWAR: Practically, to most of the points that have been raised here, I think I have tried to reply.