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State Consumer Disputes Redressal Commission

L.I.C. Of India vs Smt. Richa Agarwal on 3 January, 2018

  	 Cause Title/Judgement-Entry 	    	       STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP  C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010             First Appeal No. A/1288/2017  (Arisen out of Order Dated 08/06/2017 in Case No. C/141/2014 of District Ghaziabad)             1. L.I.C. Of India  Lucknow ...........Appellant(s)   Versus      1. Smt. Richa Agarwal  Ghaziabad ...........Respondent(s)       	    BEFORE:      HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN PRESIDENT          For the Appellant:  For the Respondent:    Dated : 03 Jan 2018    	     Final Order / Judgement    

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखन ऊ अपील संख्‍या-1288/2017 (सुरक्षित) (जिला उपभोक्‍ता फोरम, गाजियाबाद द्वारा परिवाद संख्‍या 141/2014 में पारित आदेश दिनांक 08.06.2017 के विरूद्ध) Life Insurance Corporation of India, through the Assistant Secretary, Z.O. Legal Cell, Life Insurance Corporation of India Hazratganj, Lucknow.

                                  .................अपीलार्थी/विपक्षी बनाम Smt. Richa Agarwal W/o Late Shri Rishi Agarwal r/o 11/180, Raj Nagar, Ghaziabad.                                                  

                                 .................प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी समक्ष:-

माननीय न्‍यायमूर्ति श्री अख्‍तर हुसैन खान, अध्‍यक्ष।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री वी0एस0 बिसारिया,                                            विद्वान अधिवक्‍ता।
प्रत्‍यर्थी की ओर से उपस्थित : श्री प्रतुल श्रीवास्‍तव,                          विद्वान अधिवक्‍ता।
दिनांक: 13.02.2018 मा0 न्‍यायमूर्ति श्री अख्‍तर हुसैन खान, अध्‍यक्ष द्वारा उदघोषित निर्णय परिवाद संख्‍या-141/2014 श्रीमती रिचा अग्रवाल बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम में जिला उपभोक्‍ता विवाद                प्रतितोष फोरम, गाजियाबाद द्वारा पारित निर्णय और आदेश                          दिनांक 08.06.2017 के विरूद्ध यह अपील धारा-15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्‍तर्गत राज्‍य आयोग के समक्ष प्रस्‍तुत की गयी है।
आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा जिला फोरम  ने परिवाद स्‍वीकार करते हुए निम्‍न आदेश पारित किया                 है:-
  -2-
''परिवादिनी का परिवाद स्‍वीकार किया जाता है। विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह परिवादिनी को 11,50,000/-रूपये 09 प्रतिशत ब्‍याज सहित प्रथम क्‍लेम के निरस्‍तीकरण की दिनांक से अदायगी की दिनांक तक 60 दिन के अन्‍दर अदा करे। विपक्षी हर्जे के रूप में 20,000/-रूपये तथा वाद व्‍यय 5000/-रूपये भी परिवादिनी को 60 दिन के अन्‍दर अदा करे।'' जिला फोरम के निर्णय से क्षुब्‍ध होकर परिवाद के विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम ने यह अपील प्रस्‍तुत की है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री वी0एस0 बिसारिया और प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री प्रतुल श्रीवास्‍तव उपस्थित आए हैं। 
मैंने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्‍तागण के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय व आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्‍त सुसंगत तथ्‍य इस प्रकार हैं कि प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी ने परिवाद जिला फोरम के समक्ष इस कथन के साथ प्रस्‍तुत किया है कि उसके पति श्री रिषी अग्रवाल ने पॉंच पॉलिसियां अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम से ली थी। दिनांक 09.07.2010 को उनकी दुर्घटना मृत्‍यु हो गयी। अत: दुर्घटना हित लाभ के लिए प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी ने बीमा दावा प्रस्‍तुत किया। तब अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के मण्‍डल कार्यालय ने पंचनामा और पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट की मांग की।  
    -3-
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी का कथन है कि उसके पति की मृत्‍यु की सूचना उसके ससुर ने रात में थाना कविनगर में दी थी, परन्‍तु थाना पुलिस ने न तो पंचनामा तैयार कराया और न ही पोस्‍टमार्टम कराया। अत: अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के मण्‍डल कार्यालय ने भारतीय जीवन बीमा निगम गाजियाबाद के शाखा प्रबन्‍धक श्री कुन्‍तल कुमार को जांच अधिकारी नियुक्‍त किया, जिन्‍होंने जांच के उपरान्‍त रिपोर्ट दाखिल की और प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी को क्‍लेम देने की संस्‍तुति दी। फिर भी जांच अधिकारी की बात अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के उच्‍च अधिकारियों ने नहीं मानी और प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी का क्‍लेम निरस्‍त कर दिया। तब प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी ने अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के क्षेत्रीय कार्यालय में अपील की। अपील भी निरस्‍त कर दी गयी। तब उसने बीमा लोकपाल के यहॉं प्रत्‍यावेदन दिया, जो निरस्‍त कर दिया गया।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी का कथन है कि उसके पति की मृत्‍यु कूलर के करेंट से दिनांक 09.07.2010 को हुई थी, जिसकी सूचना पुलिस को दी गयी थी। अत: अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम ने प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी का दावा निरस्‍त कर त्रुटि की है। अत: उसने परिवाद जिला फोरम के समक्ष प्रस्‍तुत किया है।  
अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम  की  ओर  से     -4- जिला फोरम के समक्ष लिखित कथन प्रस्‍तुत किया गया है, जिसमें कहा गया है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी का क्‍लेम उचित आधार पर अस्‍वीकार किया गया है। उसकी अपील उच्‍च अधिकारियों ने भी अस्‍वीकार की है और बीमा लोकपाल ने भी उसका प्रत्‍यावेदन निरस्‍त किया है।
लिखित कथन में अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम की ओर से कहा गया है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति का  पोस्‍टमार्टम न होने की वजह से उसे क्‍लेम नहीं दिया जा सकता है। बीमा निगम ने उसका दावा निरस्‍त करने का जो आधार बताया है, वह उचित है।
जिला फोरम ने उभय पक्ष के अभिकथन पर विचार करने के उपरान्‍त माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा अजमेरी खातून बनाम नेशनल इंश्‍योरेंस कम्‍पनी । (2015) सी0पी0जे0-501 (एन0सी0) के वाद में दिए गए निर्णय में प्रतिपादित सिद्धान्‍त पर विश्‍वास किया है, जिसमें माननीय राष्‍ट्रीय आयोग ने यह माना है कि यदि उपलब्‍ध साक्ष्‍यों से दुर्घटना मृत्‍यु साबित होती है तो मात्र पंचनामा या पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट प्रस्‍तुत न करने से यह नहीं कहा जा सकता है कि दुर्घटना मृत्‍यु नहीं हुई है। जिला फोरम ने अपने निर्णय में उल्‍लेख किया है कि अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम की गाजियाबाद के ब्रांच मैनेजर की जांच में प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु की प्रकृति इलैक्‍ट्रोक्‍यूटस दर्शायी गयी है, जिससे यह स्‍पष्‍ट है कि बिजली के शॉक लगने के कारण उनकी मृत्‍यु हुई  है।
    -5-
अत: जिला फोरम ने पंचनामा व पोस्‍टमार्टम आख्‍या न होते हुए भी यह माना है कि पत्रावली पर उपलब्‍ध साक्ष्‍यों से प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की दुर्घटना मृत्‍यु होना प्रमाणित है। अत: जिला फोरम ने परिवाद स्‍वीकार करते हुए उपरोक्‍त प्रकार से आदेश पारित किया है।
अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश साक्ष्‍य और विधि के विरूद्ध है। अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के विद्वान अधिवक्‍ता ने              माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा Manju Sharma @ Mamta Bhardwaj & Ors. Vs. L.I.C. of India 2012 (4) CPJ 631 (NC) के वाद में दिया गया निर्णय सन्‍दर्भित किया है, जिसका संगत अंश नीचे उद्धरित है:-
"Deceased died due to electrocution is a mere allegation, which is not supported by any cogent, convincing and conclusive evidence. Autopsy not conducted on dead body-Presumption rebutted- Repudiation justified."
अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के विद्वान अधिवक्‍ता ने माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा Oriental Insurance Co. Ltd. Vs. Tara 2015 (2) CPJ 661 (NC) में दिया गया निर्णय भी सन्‍दर्भित किया है, जिसमें  माननीय  राष्‍ट्रीय     -6- आयोग ने निम्‍न मत व्‍यक्‍त किया है:-
"Complainant was under obligation to prove that cause of death of insured was the injury sustained in unfortunate accident-Post mortem report which could have proved the cause of death has not been produced."
अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा  प्रतिपादित सिद्धान्‍त को दृष्टिगत रखते हुए पंचनामा और पोस्‍टमार्टम आख्‍या के अभाव में प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की दुर्घटना मृत्‍यु प्रमाणित नहीं होती है। अत: जिला फोरम का निर्णय त्रुटिपूर्ण है और निरस्‍त होने योग्‍य है।
प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के विद्वान अधिवक्‍ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश साक्ष्‍य और विधि के अनुकूल है। स्‍वयं अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के अधिकारी ने जांच में यह पाया है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु विद्युत शॉक लगने से दुर्घटनावश हुई है। अत: जिला फोरम ने अपने निर्णय में माननीय राष्‍ट्रीय आयोग के सन्‍दर्भित निर्णय के आधार पर जो प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की दुर्घटना मृत्‍यु के सम्‍बन्‍ध में निष्‍कर्ष निकाला है, वह उचित और विधिसम्‍मत है। इसमें किसी हस्‍तक्षेप की आवश्‍यकता नहीं है।
मैंने उभय पक्ष के तर्क पर विचार किया है।
    -7-
यह तथ्‍य निर्विवाद है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति का पंचनामा पुलिस ने तैयार नहीं किया है और न उसके शव का पोस्‍टमार्टम कराया गया है।
जिला फोरम ने अपने आक्षेपित निर्णय में माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा अजमेरी खातून बनाम नेशनल इंश्‍योरेंस कम्‍पनी                   । (2015) सी0पी0जे0-501 (एन0सी0) में दिए गए निर्णय का उल्‍लेख किया है, जिसमें माननीय राष्‍ट्रीय आयोग ने यह माना है कि यदि दुर्घटना मृत्‍यु उपलब्‍ध साक्ष्‍यों से साबित है तो मात्र पंचनामा और पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट न होने के आधार पर इसे अस्‍वीकार नहीं किया जा सकता है। अत: माननीय राष्‍ट्रीय आयोग के इस निर्णय में प्रतिपादित सिद्धान्‍त के आधार पर देखना यह है कि क्‍या प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की दुर्घटना मृत्‍यु उपलब्‍ध साक्ष्‍यों से साबित है।
परिवाद पत्र की धारा-2 के अनुसार पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट और पंचनामा न होने के कारण अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के मण्‍डल कार्यालय द्वारा अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम की शाखा गाजियाबाद के प्रबन्‍धक श्री कुन्‍तल कुमार को जांच अधिकारी नियुक्‍त किया गया था, जिन्‍होंने सभी तथ्‍यों की गहराई से जांच करने पर दावा को उचित पाया और मण्‍डल कार्यालय को केस प्रोसेस करने की संस्‍तुति की। अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम की ओर से जिला फोरम के समक्ष प्रस्‍तुत   लिखित   कथन   में   परिवाद   पत्र   की    धारा-2   -8- के उपरोक्‍त कथन को स्‍वीकार नहीं किया गया है और कहा गया है कि भारतीय जीवन बीमा निगम के शाखा प्रबन्‍धक ने प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के क्‍लेम के सम्‍बन्‍ध में केवल कार्यवाही करने की अनुशंसा की थी। जिला फोरम ने अपने निर्णय में भारतीय जीवन बीमा निगम के शाखा प्रबन्‍धक की उक्‍त आख्‍या का उल्‍लेख किया है, जो प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी की ओर से परिवाद पत्र के संलग्‍नक-10 के रूप में जिला फोरम के समक्ष प्रस्‍तुत की गयी           है। जिला फोरम ने अपने निर्णय में उल्‍लेख किया है कि इस आख्‍या में अंकित है कि मृतक की मृत्‍यु बिजली के शॉक लगने के कारण हुई है और उभय पक्ष के अभिकथन से यह स्‍पष्‍ट है कि शाखा प्रबन्‍धक ने इस जांच आख्‍या में प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के क्‍लेम के सम्‍बन्‍ध में आगे कार्यवाही करने हेतु अनुशंसा की है। अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के शाखा प्रबन्‍धक ने अपनी जांच आख्‍या में आत्‍महत्‍या की ओर इशारा नहीं किया है और न ही ऐसा कोई सन्‍देह व्‍यक्‍त किया है। अत: प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु कथित परिस्थितियों में इलैक्‍ट्रोक्‍यूशन से होना दुर्घटना ही साबित होती है। अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के शाखा प्रबन्‍धक ने जो मौके पर जाकर जांच की है, उसमें प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी द्वारा कथित ढंग से उसके पति की मृत्‍यु होने पर कोई सन्‍देह व्‍यक्‍त नहीं किया गया है और न ही अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम ने प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु को आत्‍महत्‍या कहा है। अत: उभय  पक्ष  के  अभिकथन  एवं  सम्‍पूर्ण  तथ्‍यों,   साक्ष्‍यों   एवं -9- परिस्थितियों पर विचार करने के उपरान्‍त मैं इस मत का हूँ कि जिला फोरम ने जो प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु को दुर्घटना मृत्‍यु माना है, उसे अस्‍वीकार करने हेतु उचित और युक्‍तसंगत आधार अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम दर्शित नहीं कर सकी है।
उपरोक्‍त  विवरण से यह स्‍पष्‍ट है कि प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु इलैक्ट्रिक शॉक से होना विश्‍वसनीय है और अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम ने उनकी मृत्‍यु को आत्‍महत्‍या का केस अभिकथित नहीं किया है। ऐसी स्थिति में पंचनामा और पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट प्रस्‍तुत न किए जाने मात्र से माननीय राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा अजमेरी खातून बनाम नेशनल इंश्‍योरेंस कम्‍पनी के उपरोक्‍त वाद में प्रतिपादित सिद्धान्‍त के आधार पर प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के विरूद्ध कोई प्रतिकूल अवधारणा बनाया जाना उचित नहीं है। अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के शाखा प्रबन्‍धक ने जांच रिपोर्ट में प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की इलैक्‍ट्रोक्‍यूशन से मृत्‍यु होना स्‍वीकार किया है और अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु को आत्‍महत्‍या नहीं बताया गया है। ऐसी स्थिति में प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की दुर्घटना मृत्‍यु उपलब्‍ध साक्ष्‍यों से पूर्णतया साबित है और इस सन्‍दर्भ में प्रतिकूल अवधारणा बनाने हेतु कोई उचित और युक्‍तसंगत आधार बीमा निगम दर्शित नहीं कर सकी है। अत: अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम के     -10- विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा सन्‍दर्भित माननीय राष्‍ट्रीय आयोग के उपरोक्‍त दोनों निर्णय वर्तमान वाद के तथ्‍यों व साक्ष्‍यों पर लागू नहीं होते हैं।
सम्‍पूर्ण विवेचना के आधार पर मैं इस मत का हूँ कि जिला फोरम ने जो प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी के पति की मृत्‍यु को दुर्घटना मृत्‍यु माना है, वह विधि के विरूद्ध और आधार रहित नहीं कहा जा सकता है। अत: जिला फोरम के निर्णय में हस्‍तक्षेप हेतु उचित आधार नहीं है। अत: ऐसी स्थिति में जिला फोरम ने जो यह निष्‍कर्ष निकाला है कि अपीलार्थी/विपक्षी भारतीय जीवन बीमा निगम ने प्रत्‍यर्थी/परिवादिनी का बीमा दावा अस्‍वीकार कर गलती की है और सेवा में कमी की है, वह उचित और युक्‍त संगत है।
उपरोक्‍त सम्‍पूर्ण विवेचना के आधार पर मैं इस मत का हूँ कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश में किसी हस्‍तक्षेप की आवश्‍यकता नहीं है। अत: अपील बल रहित है और निरस्‍त की जाती है।
     अपील में उभय पक्ष अपना-अपना वाद व्‍यय स्‍वयं वहन करेंगे।
धारा-15 उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्‍तर्गत अपीलार्थी द्वारा जमा धनराशि अर्जित ब्‍याज सहित जिला फोरम को निस्‍तारण हेतु प्रेषित की जाएगी।

 

 

 

   

 

 (न्‍यायमूर्ति अख्‍तर हुसैन खान)

 

                          अध्‍यक्ष

 

जितेन्‍द्र आशु0                        

 

कोर्ट नं0-1                         [HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN]  PRESIDENT