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Lok Sabha Debates

Need To Take Time-Bound Action Against The Persons Responsible For Bad ... on 10 June, 2014

an> Title: Need to take time-bound action against the persons responsible for bad construction of roads under Banda Parliamentary Constituency of Uttar Pradesh.

श्री भैरों प्रसाद मिश्र (बांदा) : अध्यक्ष महोदया,मैं आपके माध्यम से सदन में बोलना चाहता हूं कि मैं जिस संसदीय क्षेत्र से चुन कर आता हूं,वहां पर देश का प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल चित्रकूट आता है। जहां पर प्रतिदिन हजारों तीर्थ यात्री एवं पर्यटक आते हैं। हर माह जो अमावस्या आती है,उसमें यात्रियों की संख्या लाखों में हो जाती हैं।...(व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष:जब मैंने रूलिंग दी है,अब उसके बाद क्या बचा है?

…( व्यवधान)

श्री भैरों प्रसाद मिश्र : कुछ महीनों में ये संख्या बीस लाख तक हो जाती है। ...(व्यवधान)

          मेरे संसदीय क्षेत्र में सड़कों की हालत बहुत ही खराब है। वहां पर सड़कों में जगह-जगह गड्ढें हैं,जिससे वहां पर दुर्घटनाएं हो रही हैं,उन दुर्घटनाओं में अभी तक सैंकड़ों लोगों की मौतें हो चुकी हैं। ...(व्यवधान)वैसे तो वहां सूखा पड़ा है,लेकिन जहां वर्षा हुई है,वहां पानी गड्ढों में भरे होने के कारण यह स्थिति है कि वहां धान तक लगाया जा सकता है।...(व्यवधान)वहा पर मरम्मत के लिए कुछ इंतजाम नहीं किया जा रहा है।...(व्यवधान)चाहे नेशनल हाईवे की सड़कें हों,राज्य की सड़कें हों या प्रधानमंत्री सड़क योजना की सड़कें हों,वहां पर उसके लिए कहा जा रहा है कि धन नहीं है। ...(व्यवधान)

          अध्यक्ष महोदया,मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से मांग करता हूं कि उन गड्ढों की मरम्मत कराई जाए। बहुत-बहुत धन्यवाद।

माननीय अध्यक्ष : ज्योतिरादित्य जी,प्लीज़ बैठिये। खड़गे जी,एक मिनट। डैमोक्रेसी क्या है,यह आप भी जानते हैं। आप भी कृपा करके सुनिये। No, I am sorry.

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : नहीं होता है। I am sorry. आप रूल चेंज कर दीजिए,फिर बोलिये।

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: I am sorry, खड़गे जी। आप समझदार व्यक्ति हैं।

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: आप बैठिये। आप सब लोग क्यों खड़े हो?खड़गे जी...

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: आप बैठिये न। आप भी बैठिये। खड़गे जी,एक मिनट,पहले आप मेरी बात समझिये। जब यह रूल...

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: प्लीज़। आप क्यों बोल रहे हो?मैंने आपको रूल पढ़कर सुनाया। स्टेटमेंट के बाद यहां कोई भी क्लैरीफिकेशन नहीं होता है। अगर आप उसी विषय पर कोई चर्चा करना चाहेंगे,आप किसी भी नियम के अन्तर्गत नोटिस दे दो,अगर वह फिट बैठेगा तो इस पर पूरी की पूरी चर्चा हो सकती है,लेकिन नियम में यह नहीं है। दूसरी जगह कहीं हो सकता है,लेकिन यहां नहीं है। यहां लोक सभा में नहीं है,मैंने रूल आपको पढ़कर सुनाया है। अगर आप शून्यकाल में कुछ बोलना चाहें तो I will allow you. मगर उस स्टेटमेंट पर क्लैरीफिकेशन की बात नहीं हो सकती। अगर आप शून्यकाल में उठाना चाहें तो मैं आपको एलाऊ कर रही हूं, but no clarification on the statement, I am sorry.

       

*14 Title: Issue regarding compensations and rehabilitation programmes in National Calamities.

श्री मल्लिकार्जुन खड़गे  :वैसे कई बार इस सदन में पहले भी ऐसा हुआ है। आप भी जब इधर थे,उस वक्त भी क्लैरीफिकेशंस पूछे गये हैं। यह नयी बात नहीं है,इसलिए मैं आपसे अपील कर रहा था। यह एक रिहैबिलिटेशन का प्रोग्राम है। एक बहुत बड़ी दुर्घटना हुई है,नैचुरल कैलेमिटी है तो हम यही पूछना चाहते थे कि रिहैबिलिटेशन कैसा किया गया है,कितना पैसा सैण्ट्रल गवर्नमेंट से दिया गया है,स्टेट गवर्नमेंट का कंट्रीब्यूशन कितना है तो ये सब क्लैरीफिकेशंस,जो फर्स्ट हैंड इन्फोर्मेशन उनके पास थी,क्योंकि,वे खुद उस स्थल पर गये थे और उन्होंने वहां सब देखा है तो इसीलिए I just wanted to know as to what compensation is given and what the rehabilitation programmes are. That is what I wanted to ask; nothing else. और वे चले भी गये। अगर आप एक मिनट का समय दे देतीं तो इतना हाउस का समय बर्बाद नहीं होता और इस पर कोई चर्चा करने की आवश्यकता ही नहीं थी। आप जानती हैं कि नेशनल कैलेमिटी फंड में पैसा सैण्ट्रल गवर्नमेंट देती है। ...(व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : इसमें नहीं होता है। वे पैसा देंगे न। मैं चर्चा के लिए मना नहीं कर रही हूं।

…( व्यवधान)

श्री मल्लिकार्जुन खड़गे  :और वह पूछना हमारा हक है।...(व्यवधान)

HON. SPEAKER: No clarification on it. I cannot allow it.

… (Interruptions)

माननीय अध्यक्ष : आप तो कृपा करके बैठिये,समझिये। जरा सभा को समझिये,प्लीज़ बैठिये।

…( व्यवधान)

श्री मल्लिकार्जुन खड़गे  :वह कमेटी जब बनी है तो उस कमेटी की रिपोर्ट यहां आनी चाहिए।

श्री ज्योतिरादित्य  माधवराव सिंधिया (गुना) : अध्यक्षा जी,मैं एक निवेदन करना चाहता हूं...(व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: नहीं,हर एक का निवेदन नहीं होता है। वे बोल रहे हैं। Do you want to have a discussion on it.

… (Interruptions)

HON. SPEAKER: He is not giving any clarification.

… (Interruptions)

शहरी विकास मंत्री, आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्री तथा संसदीय कार्य मंत्री (श्री एम. वैंकैय्या नायडू) : यह मेरा हक नहीं है, यह चेयर को डिसाइड करना है न।..(व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: क्लैरीफिकेशन कुछ नहीं दे रहे। जब मैंने रूलिंग दी है तो ऐसा नहीं होता है।

…( व्यवधान)

*m02 SHRI M. VENKAIAH NAIDU: I am not commenting anything on the ruling or advice given by the Speaker.

          I would like to humbly submit to the House that this Government is sensitive. The moment we came to know of the incident, I discussed the matter with the hon. Prime Minister. The Prime Minister directed the Home Minister to go and visit the place. He has visited the place and come back. We had a discussion on it. The hon. Home Minister told me that he wanted to make a Statement about his visit and about what happened there. He made a Statement in the House. Some hon. Members have some doubts in this regard. I would like to say that there is no such practice as far as Lok Sabha is concerned or there is no such rule by the Chair. My suggestion would be that the Minister has not gone away because of any disrespect to the Opposition Members. He is making a Statement about this incident in the other House, which is slated at 12:30 pm. We had said in the other House that as soon as the Statement is over in the Lok Sabha, he would come back to the Rajya Sabha. So, he has gone there.

          I request the leader of the Congress Party or other friends, who want to discuss this issue – I do agree that this is a very serious issue and we should discuss it – to give us a notice and let the Chair admit it. We will discus it definitely. I will convey it to the Home Minister. … (Interruptions)

श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : अध्यक्ष महोदया,मैं एक निवेदन करना चाहता हूं।

माननीय अध्यक्ष : नहीं, अब यह विषय यहीं समाप्त हो गया। ज्योतिरादित्य जी, ऐसा नहीं होता है।

 आपकी पार्टी के लीडर बोल चुके हैं।

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : हर समय आप मुझे सजेशन देना चाहें,तो दूसरा स्पीकर चुन लीजिए और आ जाइए यहां पर।  This is not the way.  I am sorry.

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : कोई नहीं बोलेगा।

…( व्यवधान)

HON. SPEAKER: I am sorry. No. … (Interruptions)

SHRI N.K. PREMACHANDRAN (KOLLAM): Madam, I have given a notice. I am on a point of clarification. I would like to know … (Interruptions)

माननीय अध्यक्ष : श्री रामेश्वर तेली।

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : जो भी जीरो ऑवर की नोटिसेज आयी हैं, उन्हीं को ले रही हूं।

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष :  जिनकी नोटिस हैं,उनको बोलने का समय दे रही हूं।

…( व्यवधान)

       

*t15 Title: Regarding alleged theft of coal from open mines in Margherita and Joypore of North East Coal Fields.

श्री रामेश्वर तेली (डिब्रूगढ़) : अध्यक्ष महोदया,मैं असम के डिब्रूगढ़ क्षेत्र से आता हूं। ...(व्यवधान) मेरे क्षेत्र में मार्घेरिटा और लीदू जो नार्थ-ईस्ट कोल फील्ड है,इस नार्थ-ईस्ट कोल फील्ड में जो माइनिंग होती है, ...(व्यवधान)वहां मजदूरों को आठ घंटा काम करना चाहिए,लेकिन उनसे बारह घंटे काम कराते हैं। ...(व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : इनके बाद आपकी बात सुनती हूं।  बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री रामेश्वर तेली : महोदया,उनकी जो मजदूरी है,किसी खदान में किसी को 150 रूपये मिलते हैं,किसी खदान में 200 रूपये मिलते हैं,कहीं 250 रूपये मिलते हैं। इस तरह से वहां भेदभाव की स्थिति है।

          मैं इस सदन का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहता हूं कि खदान में जो मजदूर काम करते हैं,उनसे आठ घंटा काम लिया जाना चाहिए। नॉर्थ ईस्ट कोल फील्ड जो लीदू और मार्घेरिटा खदान हैं,वहां प्रतिदिन करीब एक लाख टन कोयला चोरी होता है। वहां सिक्योरिटी की कोई व्यवस्था नहीं है।

          मैं इस सदन के माध्यम से कोयला मंत्री जी से रिक्वेस्ट करता हूं कि नॉर्थ ईस्ट कोल फील्ड लीदू और मार्घेरिटा से जो कोयला चोरी होता है,उसे रोकने की व्यवस्था की जाए। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जो नॉर्थ ईस्ट कोल फील्ड में जैपुर नाम की एक जगह है,वहां कुछ दिन से माइनिंग बंद हो गयी है,उसे खोलने की व्यवस्था की जाये। मैं मंत्री महोदय से यह अनुरोध करता हूं। 

माननीय अध्यक्ष : कौन से रूल में आपने कौन सी नोटिस दी है? आपने किस बात की नोटिस दी है?  Just tell me.

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष : मैं आपकी बात नहीं कर रही हूं,इनसे पूछ रही हूं। आप बताइये।  किस बात की नोटिस, क्या आपने जीरो ऑवर में नोटिस दी है?

SHRI N.K. PREMACHANDRAN : Madam, I am on a point of clarification.

माननीय अध्यक्ष : जीरो ऑवर में प्वाइंट ऑफ ऑर्डर नहीं होता है।

SHRI N.K. PREMACHANDRAN : I am on a point of order.

माननीय अध्यक्ष : प्वाइंट ऑफ ऑर्डर जीरो ऑवर में नहीं होता है।  आप बाद में मुझे बताइये कि कौन से रूल में क्या नोटिस आपने दिया है?  We will think about it. 

SHRI N.K. PREMACHANDRAN : It is under Rule 288.

… (Interruptions)

HON. SPEAKER: There is no point of order in ‘Zero Hour’. You know better than I do.    

… (Interruptions)

SHRI N.K. PREMACHANDRAN : As a Member of this House, I would like to know from the Government … (Interruptions)

HON. SPEAKER: Shri Tamradhwaj Sahu.

… (Interruptions)

माननीय अध्यक्ष :  ऐसे कभी भी कुछ भी नहीं उठता है।  कृपया, आप बैठ जाइये।  ऐसा नहीं होता है।

…( व्यवधान)

HON. SPEAKER: No, I am sorry.

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष :  आप समझदार व्यक्ति हो, आप ऐसा क्यों कर रहे हो?  प्लीज बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

HON. SPEAKER: Yes, Shri Tamradhwaj Sahu.

… (Interruptions)

HON. SPEAKER: In ‘Zero Hour’, there is no rule and nothing is followed. यह शून्य काल है। आप बैठ जाइए।

… (Interruptions)

             

*t16 Title: Need to formulate policy to address the problems of weavers in the country.

श्री ताम्रध्वज साहू (दुर्ग) : महोदया, मेरा शून्यकाल का विषय इस प्रकार है।  मैं एक अत्यंत महत्व का विषय आपके माध्यम से सरकार के समक्ष रख रहा हूं। इससे देश भर के करोड़ों बुनकर सीधे-सीधे लाभान्वित होंगे।  वर्तमान में ग्रामीण बुनकरों के पास अपने व्यवसाय को लाभदायी बनाये रखने के लिए कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।  सबसे पहले जमीन की उपलब्धता नहीं होती, इसके लिए पंचायतों, राजस्व विभाग का अड़ंगा सामने आता है।  अगर जमीन मिल जाये या कुछ पैसे जोड़कर खरीद लें तो वर्क शेड बनाने के लिए राशि नहीं होती है, मशीन खरीदने के लिए राशि नहीं होती है।  इसके लिए कोई केन्द्रीय योजना नहीं है।  जिस तरह खेती में खाद, बीज से लेकर समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए सरकार की तरफ से सहायता उपलब्ध होती है, उसी तरह बुनकरों के लिए राज्य, केन्द्र की सहायता योजनायें होनी चाहिए।  साथ ही उनके द्वारा उत्पादित कपड़ों की बेहतर मार्केटिंग राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने के लिए भी सरकार का सहयोग अपेक्षित है।

          मैं आशा करता हूं कि भारत सरकार इस पर अवश्य ध्यान देगी।  अध्यक्ष जी, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए धन्यवाद।   

*t17 Title: Need to prevent wild animal menace inSindhudurg Parliamentary Constituency of Maharashtra.

श्री विनायक भाऊराव राऊत (रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग) : अध्यक्ष महोदया जी, धन्यवाद। महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के कुडाल तहसील में कई रिहायशी गांव हैं - मानगांव और अन्य रिहायशी गांव हैं, उन गांवों में हाथियों द्वारा बहुत ज्यादा उपद्रव किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष इन हाथियों ने उन इलाकों के लगभग 8 व्यक्तियों की हत्या की है और कई जनों को जख्मी किए हैं। इन हाथियों के उपद्रव के कारण वहां के किसानों ने खेती करना बंद कर दिया है। जो छात्र स्कूल जाते हैं, वे स्कूल नहीं जा सकते हैं। सिर्फ रिहायशी गांवों में ही नहीं बल्कि उनके नजदीक के जो शहरी इलाके हैं, उन इलाकों में भी इन हाथियों के उपद्रव बढ़ते जा रहे हैं।

          अध्यक्ष महोदया,पिछले कई वर्षों से वहां के रिहायशी गांवों के लोग उन हाथियों को पकड़ कर अन्य जगह पर छोड़ने की मांग कर रहे हैं,लेकिन दुर्भाग्य से आज तक उस पर सही तरीके से इलाज नहीं हो सका है।

          अध्यक्ष महोदया,मैंने सुना है कि रिहायशी बस्तियों में जो आदमखोर जानवर होते हैं,उनकी वजह से जो आतंक बढ़ रहा है,उनके लिए पूरी तरह से बदोबस्त करने के लिए शासन के पास योजना है। आपके माध्यम से शासन से मेरी विनंती है कि सिंधुदुर्ग जिले के कुडाल तहसील के जिन गांवों में ऐसे जंगली हाथियों एवं अन्य जानवरों के द्वारा जो उपद्रव हो रहे हैं,उन्हें रोकने के लिए शासन के द्वारा कड़ी उपाय-योजना होनी चाहिए। वहां के रिहायशी गांव के लिए सुरक्षा होनी चाहिए।

 

*t18 Title : Regarding Israeli attack on Gaza.

PROF. SUGATA BOSE (JADAVPUR): Madam Speaker, the war in Gaza has turned … (Interruptions)

माननीय अध्यक्ष :   वैसे तो यह मामला पहले उठ चुका है।

…( व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष :  वैसे तो यह विषय सदन में पहले हो चुका है।

…( व्यवधान)

PROF. SUGATA BOSE : Madam Speaker, it is an ongoing crisis, and that is why … (Interruptions)

SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY (KOLKATA UTTAR): Madam, please allow him to raise this very important issue. … (Interruptions)

HON. SPEAKER: Yes, I am allowing him.

… (Interruptions)

PROF. SUGATA BOSE :  It has taken a further tragic turn, namely, a school was attacked and women and children who were sleeping there were killed. The United Nations has termed this attack by Israel as a clear violation of international law. We cannot afford to sit on the fence when there is disproportionate and excessive use of force. Therefore, I would urge the Government to take a clear stand on the side of morality and law. Thank you very much. … (Interruptions)

HON. SPEAKER: Hon. Members   *m02 Shrimati Sonia Gandhi,   *m03 Shri Mallikarjun Kharge,   *m04 Shri Jyotiraditya M. Scindia,   *m05 Shri Rahul Gandhi,   *m06 Shri K. C. Venugopal,   *m07 Dr. Shashi Tharoor,   *m08 Shri Gaurav Gogoi,   *m09 Shri Rajeev Satav,   *m10 Kumari Sushmita Dev,   *m11 Shri Rajesh Ranjan,   *m12 Shri M. B. Rajesh,   *m13 Shrimati P. K. Shreemathi Teacher,   *m14 Shri Md. Badaruddoza Khan and   *m15 Dr. Ratna De (Nag) are allowed to associate with the issue raised by Prof. Sugata Bose.

   

*t19 Title: Regarding bad condition of National Highway No. 161 passing through Hingoli, Maharashtra.

 

श्री राजीव सातव (हिंगोली) :  अध्यक्ष जी, आपने मेरे संसदीय क्षेत्र हिंगोली की सबसे महत्वपूर्ण समस्या सरकार के सामने रखने का मौका दिया, इसके लिए धन्यवाद। अगर, पूरे महाराष्ट्र में सबसे खराब रोड कहीं हैं तो वह मेरे क्षेत्र में है। 161 नम्बर राष्ट्रीय महामार्ग पर हर रोज 50,000 से ज्यादा गाडियां चलती हैं। वह इतना खराब है कि अभी तक कम से कम दो-तीन हजार महिलाएं और चार-पांच सौ बच्चे मोटरसाइकल से गिर कर हॉस्पिटल में भरती हो गए हैं।

          मैं आपके माध्यम से सरकार से मेरी रिक्वेस्ट है कि इस राष्ट्रीय महामार्ग की मरम्मत करने के लिए सरकार राशि का आवंटन करे।

       

*t20 Title: Regarding alleged discriminatory policy towards OBC community.

श्री राजेन गोहेन (नौगोंग) :  अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से सरकार और इस सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि देश में जो आरक्षण व्यवस्था है उस आरक्षण व्यवस्था के हिसाब से 27 प्रतिशत ओबीसी, 7.5 प्रतिशत एसटी और 15 प्रतिशत एससी, टोटल 49.5 प्रतिशत आरक्षण है। अभी देश की जो आबादी है उसमें से एमओबीसी, ओबीसी, एसटी और एससी को ले कर कम से कम 80 प्रतिशत देश की आबादी इन कम्युनिटियों की हैं। इस हिसाब से इंजस्टिस है। फिर भी मैं एक बात बताना चाहता हूं कि ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत का आरक्षण है उसमें क्रिमी लेयर और नॉन-क्रिमी लेयर दो हिस्सों में इन्हें बांटा गया है। किस आधार पर इनको बांटा गया है और किसलिए बांटा गया है? आज हम सांसद बन गए हैं। कल तक हम आम आदमी थे। सांसद बनने के बाद हम क्रिमी लेयर में आ गए होंगे। हमारे बच्चे की कंपेटिटिव इफीएंशी तो बढ़ी नहीं है। उस हिसाब से हमारे बच्चे को वंचित किया जा रहा है। यह बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है। ओबीसी के साथ क्रिमी लेयर और नॉन-क्रिमी लेयर लगाया है, तो बाकी एससी और एसटी के साथ भी यह लगाया जाना चाहिए, उनमें भी काफी क्रिमी लेयर के लोग होते हैं। यह अन्याय खत्म होना चाहिए। जो ओबीसी हैं, सबको ओबीसी कैटेगरी में लाना चाहिए।

माननीय अध्यक्ष : श्री राजेन गोहेन द्वारा शून्य काल में उठाए गए विषय के साथ श्री धर्मेन्द्र यादव अपने-आपको संबद्ध करते हैं।

…( व्यवधान)

*t21 Title: Need for Central Government intervention against improper implementation of OBC reservation in Maharashtra.

श्री हंसराज गंगाराम अहीर (चन्द्रपुर): अध्यक्ष महोदया, मैं ओबीसी के संबंध में बोलना चाहता हूं। देश में मंडल आयोग की सिफारिशों को पूरा मानकर ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। महाराष्ट्र में भी इस नीति को माना गया है। कुछ राज्यों में ओबीसी के लिए आरक्षण कुछ कम है। महाराष्ट्र ने 27 प्रतिशत आरक्षण माना है, उसके बावजूद यवतमाल, चंद्रपुर, गड़चिरौली और अन्य जिलों में ओबीसी का आरक्षण कुछ कम किया गया है। इतना ही नहीं बल्कि ओबीसी पर काफी अन्याय किया जा रहा है। क्रिमिलेयर की साढ़े चार लाख की जो मर्यादा थी, पिछले वर्ष से उसे बढ़ाकर छ: लाख किया गया है। लेकिन राज्य सरकार ने उसे साढ़े चार लाख ही रखा है। इस वजह से पिछले वर्ष जिन छात्रों ने स्कूलों या कॉलेजों में प्रवेश लिया था,जब उन्हें अधिक फी भरने की नौबत आई तो कई छात्रों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। सैंट्रल गवर्नमैंट की क्रिमिलेयर की छ:लाख की मर्यादा की जो पॉलिसी है,उसे लागू करने के लिए भी राज्य सरकार आगे-पीछे कर रही है।

          पूरे देश में ओबीसी छात्रों को मैट्रिक के बाद स्कॉलरशिप दी जाती है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार कई वर्षों से उन छात्रों को स्कॉलरशिप नहीं दे रही है। मैं आपके माध्यम से सरकार से विनती करता हूं कि ओबीसी छात्रों के साथ जो अन्याय हो रहा है,उसके लिए वहां की सरकार से पूछा जाए और संबंधित मंत्रालय के प्रधान सचिव या मुख्य सचिव को यहां बुलाकर इस संबंध में निर्देश दिए जाएं कि ओबीसी समाज पर अन्याय न किया जाए।

माननीय अध्यक्ष :

 
*m02 श्री प्रहलाद सिंह पटेल,   *m03 श्री नाना पटोले,   *m04 श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी,   *m05 श्री रामदास सी. तडस और   *m06 श्री अनिल शिरोले अपने आपको श्री हंसराज गंगाराम अहीर के विषय के साथ सम्बद्ध करते हैं।
*t22 Title : Need to sanction a special financial package for construction of embankments on rivers in Harpalpur division in Hardoi Parliamentary Constituency of Uttar Pradesh.
डॉ. अंशुल वर्मा (हरदोई) : अध्यक्ष महोदया,मैं आपके माध्यम से अपने संसदीय क्षेत्र हरदोई की गंभीर समस्याओं पर वित्त मंत्री जी का ध्यान आकर्षित कराते हुए अनुरोध करता हूं कि मेरे संसदीय क्षेत्र की विधान सभा सवायजपुर,गोपामऊ में वर्षा ऋतुकाल में जल भराव एवं कटान की भीषण समस्याओं से किसानों को जूझना पड़ता है जिससे हर वर्ष लाखों हेक्टेयर भूमि की फसल नष्ट हो जाती है।
          मेरे विकास खंड साण्डी की पांच नदियों -नीलम गंगा,राम गंगा. गम्भीरी कुण्डा,गर्रा और गोपामऊ साण्डी विधान सभा क्षेत्र में भैंसटा नदी,सई नदी से होने वाले वार्षिक कटान व जल भराव के कारण होने वाले नुकसान को रोकने के लिए जनहित में विशेष आर्थिक पैकेज की अति आवश्यकता है। मैं आपके माध्यम से इसकी मांग करता हूं।...(व्यवधान)
          बाढ़ से होने वाली क्षतिग्रस्त फसल को रोकने के लिए लगभग 25 किलोमीटर निम्नांकित नदियों के किनारे बन्धा बनाने की आवश्यकता है। ग्राम श्यामपुर व अर्जुनपुर से देहलिया के आगे तक बाढ़ रोकने के लिए बन्धा बनाया जाना एवं विकास खंड साण्डी में गर्रा नदी के किनारे ग्राम मोहद्दीपुर के पास कटान रोकने हेतु कटस्टोन लगाकर कटान रोकने के लिए बन्धा बनाना अति आवश्यक है।
 
*t23 Title: Need to provide adequate power supply in Sonbhadra district in Robertsganj Parliamentary Constituency of Uttar Pradesh.
श्री छोटेलाल (राबर्ट्सगंज) : अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे शून्य काल में एक अत्यंत गंभीर मामले पर बोलने का अवसर दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मेरे संसदीय क्षेत्र राबर्ट्सगंज, जिला सोनभद्र, उत्तर प्रदेश में एनटीपीसी विद्युत उत्पादन करता है। वहां स्थानीय निवासियों को प्रतिदिन तीन से चार घंटे तक विद्युत की आपूर्ति नहीं हो पा रही, जिसके कारण उन्हें भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है जबकि भारत सरकार, गृह मंत्रालय के अनुसार सोनभद्र विशेष वामपंथ उग्रवाद प्रभावित जिला है। वह माननीय गृह मंत्री जी का भी घर है।
          अतः मैं भारत सरकार से मांग करता हूं कि मेरे संसदीय क्षेत्र राबर्ट्सगंज, जनपद सोनभद्र एवं चंदोली जिला के चकिया विधान सभा में प्रतिदिन कम से कम 22 घंटे विद्युत आपूर्ति कराये जाने की व्यवस्था की जाये।
माननीय अध्यक्ष :   ज्यादातर मैम्बर्स स्टेट मैटर उठा रहे हैं। वह एलाऊ तो हो रहे हैं,लेकिन मेरा सबसे निवेदन है कि अगर आप केन्द्र से संदर्भित मैटर उठायें,तो ज्यादा अच्छा होगा।
…( व्यवधान)
*t24 Title: Need to allow sale and purchase of camel milk in Rajasthan.
श्री चाँद नाथ (अलवर):  माननीय अध्यक्ष महोदया,मैं सदन का ध्यान ऊंटों की घटती हुई संख्या के बारे में आकर्षित करना चाहता हूं। ऊंटों को पालने में बहुत खर्च होता है,जबकि ये अब यातायात के लिए बहुत कम काम में लिये जाते हैं। ऊंटनी के दूध को बेचने की भी मनाही है। असलियत में यह दूध मिठाई आदि बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। बीकानेर में स्थित नैशनल रिसर्च एंड केमिकल,फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया को दूध बेचने के लिए वैध करार देने के बारे में लिखा है,परन्तु इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया गया। ऊंटनी का दूध विटामिन सी,जिंक तथा इन्सुलिन से भरपूर होता है। दुबई और अमेरिका में यह दूध पैकेटों में मिलता है।
           मेरा सरकार से अनुरोध है कि इस दूध को क्रय व विक्रय के लिए वैध करार दिया जाये,ताकि राजस्थान का जहाज कहे जाने वाले ऊंटों की नस्ल खत्म होने से बचायी जा सके। आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया,उसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार।
माननीय अध्यक्ष :   
 
*m02 सुश्री पी.पी.चौधरी,   *m03 अर्जुन राम मेघवाल और   *m04 डॉ रामशंकर कठेरिया जी अपने आपको श्री चाँदनाथ जी के विषय के साथ सम्बद्ध करते हैं।
 
*t25 Title: Need to allow repair of houses in the vicinity of Dr. Rajendra Prasad National Monument, in Jiradei village in Siwan Parliamentary Constituency of Bihar.
श्री ओम प्रकाश यादव (सीवान) : अध्यक्ष महोदया, मेरे संसदीय क्षेत्र सीवान, बिहार देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जन्म भूमि है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने उनके पैतृक आवास को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया है, जो स्वागत योग्य है। इसके तहत एक अधिसूचना जारी की गयी है, जिसके अनुसार इस राष्ट्रीय धरोहर के आस-पास रहने वाले लोगों को न तो अपने वर्तमान मकान पर नये रूम बनाने का अधिकार है और न ही खाली जमीन पर नये निर्माण कराने का अधिकार है। इस तरह वहां के स्थानीय लोगों के समक्ष काफी विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है, क्योंकि जनसंख्या बढ़ने से वे अपने एक तला मकान को दो या तीन तला मकान नहीं बना नहीं पा रहे हैं। अगर वे बनाने की कोशिश भी करते हैं, तो पुलिस उन्हें तुरंत अरैस्ट कर लेती है। अगर आज डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी होते, तो उनकी सादगी और उनका व्यवहार देखने से हमें लगता कि वे इस कानून को स्वतः ही  समाप्त कर देते।
          माननीय अध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि उस नियम में शिथिलता बरती जाये, ताकि वहां के स्थानीय लोगों को सहायता मिल सके।
         
*t26 Title: Regarding celeberation of ‘Sanskrit week’ in CBSE schoolds in Tamil Nadu.
*SHRI P.R.SUNDARAM (NAMAKKAL) : Hon. Madam Speaker. The Union Government had sent a circular to all CBSE schools in the country to celebrate Sanskrit week from 7th to 14th August, 2014 in order to encourage students to learn Sanskrit.  Hon. Chief Minister of Tamil Nadu Puratchithalaivi Amma has written a letter to Hon. Prime Minister objecting the move of the Union Government.  Tamil is a classical language.  Tamil Nadu has an ancient culture and Tamil is an ancient language.  Hon. Amma has been striving hard to uphold Tamil language and social justice.  Hon. Amma is highly regarded as the champion of social justice.  Hon. Amma had successfully organized the World Tamil Conference in Thanjavur.  In this context, contradicting the policy of Pandit Jawaharlal Nehru, the present Union Government had sent this circular to celebrate Sanskrit week throughout the country.  India is a nation having so many languages.  Celebrations should be organized only with regard to the language of the State concerned.  Hon. Amma, in a letter written to Hon. Prime Minister Shri Narendra Modi has stressed the need for organizing language week celebrations only on the basis of the language that is being spoken in the State concerned.  Hon. Amma also wanted to withdraw Sanskrit week celebrations which is aimed to uphold Sanskrit as the mother of all languages.  During the first week of Tamil month Chithirai (i.e. from 14th April to 21st April) Tamil week celebrations should be organized.  I do not know whether Hon. Prime Minister is aware of this circular being sent by the Ministry of Human Resources Development.
 I urge the Hon. Prime Minister,  through this House, to look into this matter and stop the Sanskrit week celebrations.  As there is paucity of time, Hon. Prime Minister should intervene at the earliest.
       
*t27 Title: Need to reduce toll tax on National Highway No. 46 between Walajahpet and Krishnagiri in Tamil Nadu.
SHRI B. SENGUTTUVAN (VELLORE): Madam Speaker, the National Highways Authority of India (Fee Collection and Determination) Rules prescribe that the distance between two toll booths must at least be 60 kilometres and the fee collected should be in accordance with the norms laid down in the rules.
          It appears that the L&T Krishnagiri-Walajahpet Toll Way Limited which is operating two toll booths on National Highway 45 is situated within a distance of 50 kilometres and is collecting exorbitant fee from the road users. The Tamil Nadu Transport Corporation buses which ply across the road are particularly charged much more. Earlier, the monthly passes that were issued at Rs.8,230 per month for any number of crossings, have been limited to just fifty, which is used by the Transport Corporation Department in a matter of four days. For the entire month, it costs around Rs.82,000  and odd. Therefore, it is placing a very huge financial strain on the Tamil Nadu State Transport Corporation.
 I would request the Ministry concerned to look into the matter because there appears to be a collusion or connivance between the NHAI and the concessionaire who is operating the toll booths. 
       
*t28 Title: Need to initiate action for repatriation of Bru (Reang) people, a minority ethnic tribe of Mizoram taken refuge in Tripura.
SHRI JITENDRA CHAUDHURY (TRIPURA EAST): Madam, I would like to raise one very important humanitarian issue. There are more than 35,000 Reang people who are the residents of the Mamit district of Mizoram. Following an incident there, they had to desert their place and they have been sheltering now in the North Tripura District for the last 17 years. I hope the common people of Mizoram are also very apathetic that these people, their own people should go back to their own home. In the previous years, there have been a number of attempts from the Government of India, the Government of Mizoram and the Government of Tripura in this regard.
          My request is that the Government of India should take a concrete initiative so that these people are repatriated and rehabilitated properly. Before that, some initiative should be taken to have a meeting between the community leaders of Mizoram and the displaced people so that they could stay there in their home in Mizoram and settle there. The children of those displaced persons who were born in 1997-98 have grown to 17 to 18 years. Their names are also to be enrolled in the electoral rolls and they are also to be enrolled in the panchayat register. They should be provided with all facilities till such date that they can live up with their livelihood. This is my earnest request.
HON. SPEAKER:
 
*m02 Shri M.B. Rajesh,   *m03 Shrimati P.K. Shreemathi Teacher,   *m04 Dr. A. Sampath,   *m05 Shri P. Karunakaran and   *m06 Md. Badaruddoza Khan are allowed to associate with the matter raised by Shri Jitendra Chaudhury.
 
*t29 Title: Need to set up cold storage and perfume factory in Tenkasi, tamil Nadu.
*SHRIMATI. M.VASANTHI (TENKASI) : Hon. Madam Speaker, I thank Hon. Chief Minister of Tamil Nadu Puratchithalaivi Amma for giving me this opportunity to speak in this august House.
HON. SPEAKER : Cold storage and factory. Asking together. Please continue.
SHRIMATI M.VASANTHI : Courtallam waterfalls in my constituency has a salubrious climate.  Tourists in large numbers from Tamil Nadu and different parts of the country visit these waterfalls.  Hon. Amma had directed the government officials to take measures for protection of nature, environment and forests.  Under the able leadership of Hon. Amma a Commission has been set up to protect the natural beauty and serene atmosphere of this area.  Constructive measures are being undertaken by that Commission. Courtallam waterfalls should be prominently included in the tourist map of India and World as a most sought- after destination and adequate funds should be allocated for improving the infrastructure and basic amenities in Courtallam so as to attract inland and foreign tourists.  Jasmine, Lemon, Mangoes and Grapes are grown in large scale in my Tenkasi constituency. Farmers and agricultural labourers could be much benefitted if their produce are stored, processed and imported to foreign countries.               This will also create enough employment opportunities. Courtallam, Tenkasi, Puliyangudi, Sankarankovil, Kadayanallur, Rajapalayam and Srivilliputhur Assembly constituencies can be covered if the Union Government sets up a cold storage facility  in Vathirayiruppu in my Tenkasi parliamentary constituency.  I urge that adequate funds should be allocated to set up a perfume manufacturing factory in my Tenkasi constituency. This will improve the living conditions of the people of my Tenkasi constituency.  
       
*t30 Title: Need to construct by-pass from Sukhi Sewania Railway Station near Bhopal to Abdullah Ganj Industrial Area.
 
श्री आलोक संजर (भोपाल) :  अध्यक्ष महोदया, आज मुझे पहली बार जीरो आवर में भोपाल के हितार्थ विषय रखने का अवसर मिला है। सर्वप्रथम मैं आपके से भोपाल संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं, जैसा मैं हमेशा कहता हूं - मतदाता मेरा भगवान है, को हृदय की गहराइयों से से धन्यवाद ज्ञापित करता हूं कि उन्होंने मुझ पर भरपूर विश्वास व्यक्त किया और मुझे लोकतंत्र के इस सर्वोच्च मंदिर में आज बोलने का अवसर प्रदान किया।
          अध्यक्ष महोदया, भोपाल, जो राजा भोज की नगरी और झीलों के शहर के नाम से जाना जाता है, में पुराने भोपाल स्थित जुम्मेराती हनुमानगंज का दाल-चावल किराना मार्केट भोपाल की 20 लाख से ज्यादा आबादी को और साथ आस-पास के क्षेत्रों, शहर और कस्बों को राशन उपलब्ध कराता है। पिछले कई वर्षों से शहर का घनत्व बढ़ रहा है। आज भोपाल की आबादी लगभग 20 लाख से अधिक हो चुकी है। साथ ही आने वाले दस वर्ष आबादी बढ़कर लगभग 40 लाख हो जाएगी। आबादी और क्षेत्र का घनत्व बढ़ने के कारण वहां पर ट्रकों के माध्यम से जो माल की ढुलाई होती है, उससे आवागमन बाधित होता है और दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं। भोपाल के निकटवर्ती क्षेत्र मुबारकपुर से मिश्रौत वाले नए बाईपास मार्ग पर आधुनिक सुविधाओं-युक्त थोक बाजार प्रस्तावित है, जिसके लिए हमारे प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय शिवराज जी से मैंने चर्चा की है। भविष्य में यदि सूखी सेवनिया से मंडीदीप, अब्दुल्लागंज के लिए रेलवे गुड्स ट्रैफिक का बाईपास प्रस्तावित होता है, तो उसका लाभ थोक व्यापार केन्द्र को मिलेगा ही, साथ ही भोपाल से जा रही गुड्स ट्रेन, यदि सीधे सूखी सेवनिया से अब्दुल्लागंज जाती है, तो रास्ते की दूरी लगभग 15-20 किलोमीटर कम हो जाएगी।  भोपाल में स्टॉपेज न देने से लगभग एक से दो घण्टे का रनिंग टाइम भी बचेगा। करोड़ों रुपये का माल ढोकर ले जानी वाली ट्रेन्स का समय अगर बचता है, तो उससे रेलवे की कार्यक्षमता भी बढ़ेगी। अतः अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से माननीय रेल मंत्री जी से अनुरोध करता हूं कि मेरे इस सुझाव को स्वीकार करेंगे और इसका सर्वे कराकर भोपाल की जनता के हितार्थ मेरे इस सुझाव को मान्यता देंगे।
       
*t31 Title: Need to set up a National Fund for Welfare of artists of rural areas in the country.
श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी (अहमदनगर) : अध्यक्ष महोदया,आपके माध्यम से मैं एक बहुत महत्वपूर्ण विषय की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। अपने देश की हजारों वर्षों की संस्कृति है। इस संस्कृति को आबाद रखने का काम अलग-अलग कलाकारों ने किया। इसके कारण देश में हमने भारत रत्न पुरस्कार दिए,पद्म श्री,पद्म भूषण आदि पुरस्कार दिए। अलग-अलग पुरस्कार देकर अपनी संस्कृति को आबाद रखने का काम किया। लेकिन संस्कृति मंत्रालय के अध्ययन से वृद्ध कलाकारों को पेंशन देने की योजना शुरू की गई और इन्हें 3,000 रुपए से लेकर 14,000 रुपए तक पेंशन दी जाती है। गत साल बहुत कम बजट इसके लिए रखा गया था,जिस कारण मेरे अहमदनगर जिले से केवल दो लोगों को ही पेंशन मिली। जबकि मैंने पिछले साल अपने क्षेत्र से 100 लोगों का प्रपोजल दिया था और इस साल 200 लोगों का प्रपोजल दिया है। मेरा आग्रह है कि इस संस्कृति आबादी को जीवित रखने के लिए जिन-जिन लोगों ने योगदान दिया है,उन्हें पूरा हक दिया जाए। जिससे उन्हें भी लगे कि सरकार ने मुझे नवाज़ा है,मेरी कला की सराहना की है। अगर ऐसा होगा तो यह संस्कृति जीवित रहेगी और आगे भी चलेगी। जिस तरह से वित्त मंत्री जी ने इस साल के बजट में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को 1,000 रुपए पेंशन देने की योजना शुरू की है,उसी तरह इन कलाकारों के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान पेंशन के रूप में देने का काम किया जाए। इसलिए मैं वित्त मंत्री जी और संस्कृति मंत्री जी से आग्रह करता हूं कि बजट में ज्यादा एलोकेशन करके ज्यादा से ज्यादा लोगों को पेंशन देने का प्रावधान किया जाए।
माननीय अध्यक्ष:*m02श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत दिलीप गांधी द्वारा उठाए गए विषय से अपने आपको सम्बद्ध करते हैं।
       
*t32 Title: Regarding reported death of farmers caused by lightning in Jalun Parliamentary Constituency of Uttar Pradesh.
श्री भानु प्रताप सिंह वर्मा (जालौन) : अध्यक्ष महोदया,मैं आपके संज्ञान में एक हृदय विदारक घटना लाना चाहता हूं। बुंदेलखंड क्षेत्र में मेरे संसदीय क्षेत्र जालौन में घरोठा,भुवनीपुर,वहां झांसी जिले में घरोठा तहसील में 28 तारीख की शाम को आकाशीय बिजली गिरने से वहां करीब चार किसानों की मृत्यु हो गई और आधा दर्जन लोग घायल हुए। घरोठा तहसील में राम दयाल सुपुत्र राम भरोसे,जिसकी उम्र 55 साल थी,वह अपने परिवार के साथ खेत पर काम कर रहा था। पूरा का पूरा परिवार झोंपड़ी में बैठा था। उस वक्त वहां आकाशीय बिजली गिरी। इसमें यह हुआ कि सौभाग्य से उसकी पत्नी अपने बकरी को लाने के लिए झोंपड़ी से बाहर चली गई इसलिए सिर्फ वह बच गई,बाकी सारा परिवार बिजली गिरने से खत्म हो गया। इसी तरह रोहित यादव सुपुत्र देव सिंह जो 11 साल का था,वह उन्हें खाना देने गया था। वह भी उस दुर्घटना में मौत का शिकार हो गया। साथ में उस गांव के लोग जो आसपास खेतों में काम कर रहे थे,बिजली गिरने से घायल हो गए। इनमें लाल सिंह सुपुत्र चन्द्रभान जो नेपाल के रहने वाले हैं,बल्लू पुष्करण सिंह,भोले मंटोले घायल हो गए। इनके कपड़े जल गए और नाक तथा मुंह से खून आने लगा। मैं केन्द्र सरकार से मांग करता हूं कि मेरे क्षेत्र में आकाशीय बिजली गिरने से हुई इस दुर्घटना में जो लोग मारे गए,उनके आश्रितों को पांच-पांच लाख रुपए और जो घायल हुए हैं,उन्हें दो-दो लाख रुपए इलाज इत्यादि के लिए दिए जाएं।
माननीय अध्यक्ष:श्री हरिनारायण राजभर    -        उपस्थित नहीं।  

   

   

   

*t33  

Title: Need to give Scheduled Castes status to many backward castes in the state of Bihar.
श्री राम कृपाल यादव (पाटलीपुत्र) :  अध्यक्ष महोदया,मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूं। बिहार में मल्लाह,कानू,नाई,प्रजापति,लुहार,कहार,बेलदार,बिन्द,ताप्ती,तत्वा,गनौत,बढ़ई,नुनिया,तुड़ा,राजभर,मालाकार सहित कई जातियां अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग लम्बे अर्से से कर रही हैं। इनका आर्थिक और सामाजिक स्तर अनुसूचित जाति के समकक्ष है या कमतर है। इनकी स्थिति ठीक नहीं रहने के कारण इनमें से कई जातियों को देश के कई राज्यों में अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया है,परंतु बिहार में अभी तक इन्हें यह दर्जा नहीं दिया गया है। इनमें से करीब 11 जातियों की एंथोग्राफिक रिपोर्ट राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार को भेजी है,जिसमें इन जातियों को अनुसूचित जाति में अधिसूचित करने की अनुशंसा की है। लेकिन मामला अभी तक केन्द्रीय स्तर पर अटका हुआ है। मैं आपके माध्यम से केन्द्रीय सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहना चाहूंगा कि यह मांग बहुत बरसों से चल रही है और बहुत महत्वपूर्ण मांग है इसलिए जिन जातियों की एंथोग्राफिक रिपोर्ट आ गई है,उन्हें तुरंत अनुसूचित जाति में अधिसूचित किया जाए। इसके अलावा जिन जातियों की एंथोग्राफिक रिपोर्ट नहीं आई है,उनके बारे में बिहार सरकार से रिपोर्ट मंगाकर अनुसूचित जाति में अधिसूचित करने की कृपा की जाए।
 
*t34 Title: Need to close meat factories in Aligarh Parliamentary Constituency.
श्री सतीश कुमार गौतम (अलीगढ़) : अध्यक्ष महोदया,मैं आपको सबसे पहले धन्यवाद दूंगा कि आपने मुझे शून्य काल में बोलने का अवसर प्रदान किया। मैं अपने संसदीय क्षेत्र अलीगढ़,जो उत्तर प्रदेश में है,की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। वहां से मांस निर्यात हेतु पशुओं के बढ़ते कटान के कारण रोजाना किसानों की हत्या हो रही है। जब पशु को खोलने और ले जाने के लिए आते हैं,तो वे किसान की हत्या करने में भी परहेज नहीं करते।
13.00 hrs. उत्तर प्रदेश में यदुवंशियों की सरकार है और जब हम कोई शुभ काम करने के लिए जाते हैं तो अपने मां-बाप के पैर छूते हैं साथ ही गौ-माता के भी पैर छू कर जाते हैं तो वह कार्य सफल होता है। लेकिन अध्यक्ष महोदय,जो गायों का कटान हो रहा है उसमें भारत देश प्रथम है। मेरा आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से निवेदन है कि संसदीय क्षेत्र अलीगढ़ में जो मीट की फैक्ट्रियां चल रही हैं उन्हें तत्काल प्रभाव से बंद कराया जाए और कोई भी नयी फैक्ट्री खोलने का लाइसेंस नहीं दिया जाए।

माननीय अध्यक्ष :  पप्पू यादव जी, पहली बात तो यह है कि आपका काम केवल क्षमा से नहीं चलेगा, आपका व्यवहार बहुत ही खराब रहा, ये दुबारा नहीं होना चाहिए। मन से क्षमा मांगिये, दुबारा ऐसा नहीं होना चाहिए।

SHRIMATI RANJEET RANJAN (SUPAUL): Madam, please allow me to speak.… (Interruptions)

 

*t35 Title: Need to withdraw C-SAT examination.

श्री राजेश रंजन (मधेपुरा) :  मैं व्यक्तिगत तौर पर आपसे क्षमा मांगता हूं। आप मेरे लिए मां की तरह हैं। अध्यक्ष महोदय, मैं आग्रह करुंगा कि मुझे देश की जनता के हित में बात रखने के लिए थोड़ा मर्यादा लांघनी पड़ती है जिसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। अध्यक्ष महोदय, प्रत्येक दिन एक ही सवाल को उठाना मुझे भी अच्छा नहीं लगता है। मैं आपसे आग्रह करना चाहूंगा कि मैं भी पांच बार सांसद और एक बार एमएलए रहा हूं और निर्दलीय चार बार रहा हूं, मैं किसी कृपा पर नहीं जीतता हूं, निर्दलीय सांसद रहा  हूं। इसलिए किसी के सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है, मैं आपका सम्मान करता हूं।

माननीय अध्यक्ष :  कोई सर्टिफिकेट नहीं दे रहा है। आप अपनी बात रखिये।

श्री राजेश रंजन  : अध्यक्षा जी,  मैंने अखबार दिखाया कि कल दिल्ली की आम पब्लिक किस तरह से परेशान हुई है, सब्जी नहीं ले सकी, लाठियां चली। आप दैनिक जागरण समाचार पत्र में पढ़ लीजिए, 38 विद्यार्थी गायब हैं और यूपीएससी की रिपोर्ट भी सरकार के पास आ गयी है। सरकार ने कहा था कि जब रिपोर्ट आ जाएगी, तब हम स्टेटमेंट देंगे। क्या रिपोर्ट आई, गृह मंत्री जी आये थे, मैं स्टेटमेंट देने के लिए ही उनसे कह रहा था। दूसरा, मैं आपके माध्यम से सरकार से आग्रह करुंगा कि छात्रों के साथ-साथ नौजवानों के ऊपर आप जिस तरह से गोलियां और लाठी चला रहे हो, वह आप बंद करें और सीसैट को वापस करके, उसका निराकरण निकालकर, देश के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न करें। यही मेरा आग्रह है।

माननीय अध्यक्ष

 
*m02 श्री धर्मेंद्र यादव व   *m03 श्रीमती रंजीत रंजन को श्री राजेश रंजन के विषय के साथ संबद्ध किया जाता है।
...(व्यवधान)
 
HON. SPEAKER: The House stands adjourned to meet again at 2.00 p.m.   13.03 hrs The Lok Sabha then adjourned for Lunch till Fourteen of the Clock.
 
14.03 hrs. The Lok Sabha re-assembled after Lunch at Three Minutes  past Fourteen of the Clock                                         (Dr. M. Thambidurai in the Chair)   … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: Dr. Venugopal, what do you want?

… (Interruptions)

       

*t36 Title: Issue regarding article published on official website of Sri Lankan Defence Ministry.

DR. P. VENUGOPAL (TIRUVALLUR): Sir, I want to raise an important issue regarding an article published in the website of Sri Lankan Defence Ministry.

The hon. Chief Minister of Tamil Nadu has been writing letters to the Prime Minister on the repeated attacks on our fishermen by the Sri Lankan Navy.  She has been urging that retrieval of Katchatheevu is the lasting solution.

          A private individual in Sri Lanka has written an article which is derogatory to our hon. Chief Minister.  What is worse is that this article has been posted on the official website of Sri Lankan Defence Ministry.  We strongly condemn this and urge the Government of India to take immediate action on this as this infringes upon the sovereignty of our country.

   

*t37 Title: Further discussion on the flood and drought situation in the country raised by Shri Yogi Adityanath on the July 30, 2014 (Discussion not concluded).

श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर): सभापति जी,मैं आपको बहुत धन्यवाद देता हूं क्योंकि आपने मुझे सूखे जैसे महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया है। हमारे देश में हर एक राज्य में अलग-अलग परिस्थिति बारिश के समय होती है। हमारे देश की रचना ऐसी है कि कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं बाढ़ है और कहीं भारी बारिश होती है तो कहीं कम बारिश होती है। इसी वजह से देश के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। मैं ट्राईबल बैल्ट से आता हूं। जो ट्राईबल बैल्ट है,उसे हमेशा कुदरत पर निर्भर रहना पड़ता है। जब बड़े बड़े बांध बनते हैं तो उन्हीं ट्राईबल लोगों को वहां से विस्थापित होकर कहीं और जाना पड़ता है। लेकिन वे जहां जाते हैं,वहां उनको पीने के लिए भी पानी नहीं मिलता है। गुजरात में ज्यादातर जून के पहले सप्ताह में बारिश होती है। इस बार बहुत ही देर से यानी जुलाई माह के अंत में जाकर बारिश की शुरुआत हुई है। इसकी वजह से जो ट्राईबल बैल्ट है,वह पूरी सूखी रही है और जब बारिश आई तो उनको अनाज बोने के लिए जितना समय चाहिए,वह भी नहीं मिला है। इसके कारण जो हमारे किसान हैं,बारिश का जितना भी प्रतिशत कहिए,वह पूरे साल का एक वीक में ही पूरा हो जाता है और इसी वजह से सूखे का जो लाभ उनको मिलना चाहिए,वह उनको नहीं मिलता है।

           मैं मानता हूं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में जो नदियों को जोड़ने की बात कही गई थी,आज देश में सूखे की समस्या से निपटने के लिए वह ही एक मार्ग बचा है क्योंकि हर वह नदी जुड़ जाए जहां बाढ़ आती है और वह पानी जहां सूखा है,वहां अगर चला जाए तो उस राज्य के किसानों को पानी मिल जाएगा और साथ में बाढ़ वाले एरिया को भी बचाया जा सकेगा। गुजरात में इस दिशा में बहुत अच्छा प्रयोग किया गया है।

           जब हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री जी गुजरात के मुख्य मंत्री थे तब दर्दा डैम का जो पानी है,उसके पानी को अलग अलग नदियों में छोड़ने की वजह से और उस नदी का जो पानी है,वह अलग अलग तालाबों में छोड़ने की वजह से जो सौराष्ट्र का भाग था,वहां सूखे की समस्या का समाधान करने का यह मौका मिला और इसी वजह से वहां के किसानों को पानी भी मिलता है और वहां के पशुओं को घास,चारा भी मिलता है तथा घास चारा मिलने की वजह से उन किसानों को उन पशुओं से दूध का भी लाभ होता है। मैं मानता हूं कि जल्दी से जल्दी सरकार को नदियों को जोड़ने का काम करना चाहिए। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह सरकार जो योजना लाई है,हालांकि हमारी सरकार नदियों को जोड़ने के लिए कटिबद्ध है और ऐसा करके पूरे देश को एक तरफ सूखे से बचाया जा सकता है तथा दूसरी तरफ बाढ़ से भी बचाया जा सकता है। यह एक अच्छा प्रोजेक्ट है और सरकार को सभी माननीय सदस्यों को साथ में लेकर इस प्रोजेक्ट को आगे लेकर जाना चाहिए। आदरणीय योगी जी जो प्रस्ताव लेकर आए हैं,मैं उनका समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                                                   

**m02 KUMARI SHOBHA KARANDLAJE (UDUPI CHIKMAGALUR): The Karnataka State is experiencing severe drought condition for the last 4 successive years.  The deficit rainfall due to monsoon failure in many parts of the State severely affected agricultural activities in 125 taluks of Karnataka.  The performance of monsoon in terms of spatial and temporal distribution  of rainfall was not satisfactory in parts of the Karnataka State.  The deficit rainfall, for the 4 consecutive year has caused adverse impact on agriculture and also on drinking water, fodder and over all socio-economy of the agriculture and other sectors of the State.

          Karnataka covers an area of 1,91,976 sq. km. and comprises humid, sub-humid, semi-arid and arid climatological regions.  State comprises 30 districts, 176 taluks, 747 lobbies and 5628 gram panchayats.  The population of the State is 6.11 crores out of which 66per cent are rural based and are dependent on agriculture.  Nearly 76per cent of the sown area is under rain fed agriculture and is vulnerable to the vagaries of the monsoon.  The total area sown in the State is around 75 lakh hectares.

          The total land holding in the State is 1,23,84,721, out of which the small and marginal farmers constitute 37per cent of the total land holding.  75per cent of the farmers in the State are small and marginal farmers.  The drought causes untold misery and socio-economic distress to this large group of farmers with small land holdings.  Early rainfall was very crucial from the point of crop condition as the crop are under grain setting.  The timing and the duration of the active and break events are particularly important for the agricultural activity over the State.  And also prolonged breaks can adversely effect the crop development, growth and yield.

 

The dry spell during the crop growth period causes agricultural drought.  Agricultural drought occurs when soil moisture and rainfall are inadequate during the crop growing period causing extreme moisture stress.  Agricultural drought thus arises from variable susceptibility of crops during different stages of crop development, from emergence to maturity.

          The drought indicators in 125 taluks of Karnatak State says that there is severe drought in the State.  Deficit rainfall during the 4 consecutive weeks of dry spell and moisture stress, deficit rainfall shows the agriculture, horticulture and sericulture in the State is in distress.

          More than 70 per cent of minor irrigation tanks in the State are dry or with insignificant storages.  An area of almost 4 lakh hectares fall under the command area of these tanks are deprived from irrigation due to the poor storages.  The poor storages in Minor irrigation tanks along with persistent drought conditions prevailing consecutively for the 4 year has resulted in lack of ground water recharge and problem in the drinking water supply to rural and urban areas.  There is fluctuation in ground water levels. In some districts, the ground water depleted severely and people are forced to drink chemical contaminated water like floride, arcenic and iron content.  For many villages, we have to provide water with tankers which is not sufficient for their daily needs.

          Government have to have the plan of desilting these minor irrigation tanks.  At least for coming years, if there is a rainfall the minor tanks will be useful for the villagers.  The storage in major reservoirs are satisfactory but most of the major reservoirs are filled with silt.  The task force which is constituted by then Karnataka Government recommended the desiltation in major reservoirs which is very much needed in almost all reservoirs in Karnataka.

          Late monsoon and deficit rainfall affected the food grains crops in Karnataka.  Coconut plays a significant role in the agrarian economy of India.  Karnataka is a major coconut growing state.  Coconut is grown around five lakh hectares in Karnataka’s districts like Tumkur, Hassan, Chickmagalur, Ramnagar, Mandya, Mysore, Chitradurga, Chamarajanagar  etc.  Most of the coconut plantations in these districts are totally rainfed and their prospects depend largely on the occurance of satisfactory monsoon rains.  The above districts received less rain in the past four years.  These interior districts are characterized by soils with less water holding capacity and hence experience drought like situation more frequently.  This is reflected in terms of the poor yield during last 3 years.  The drying palms need immediate care for the revival to reduce the further damage to the existing palms in coming days.  Presently, the coconut growers are in severe financial distress and situation urgently calls for rejuvenation of the drought affected palms.  The financial requirement of the State is huge.  Central Government should plan a contingency plan to protect the farmers.

          Immediate attention should be given to small and marginal farmers by helping them financially by waving loans.

          Contingent action plan should be prepared by the scientists of agriculture, specially Agriculture University and research centre.

          Seeds and fertilizer requirement should be monitored closely (when they needs it)           Steps should be taken to distribute the seeds at subsidized rates.

          Micro-Macro irrigation programmes should be closely monitored for less utilization of ground water.         More funds should be given to emergency supply of drinking water.

          Effective implementation of flushing, deepening and hydro-fracturing works.    Borewells have to drilled only during emergency.

          Animals should be given quality fodder.  Fodder is the immediate requirement of Karnataka State. Goshala should be opened in all affected Taluks to save the cattles.

          Agriculture Department should take action immediately to save the farmers and the animals of Karnataka State.

 

*m03 *श्री सुनील कुमार सिंह (चतरा) :         बाढ़ और सूखा की समस्या का हमें स्थायी समाधान ढूंढना होगा । यह ठीक है कि प्रकृति को बांधा नहीं जा सकता । पर मानव जाति अपने पराक्रम, बुद्धि, विवेक से सभी प्रकार की बाधाओं और चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है ।

          एक ओर जहां महाराष्ट्र, गुजरात-सौराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ मानसून की कमी से सूखाग्रस्त हैं वहीं उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों पर बाढ़ का संकट गहराता जा रहा है । बिहार और झारखंड में मानसून की आंख-मिचौली का खेल चल रहा है । प्रारंभ में बिहार में जहां मानसून सक्रिय था और झारखंड में कमजोर, वहां आज स्थिति बदल गई है । बिहार के 25 जिले सूखे की चपेट में आ गए हैं । झारखंड की सरकार पूरे प्रदेश को सूखाग्रस्त घोषित करने वाली थी, परंतु अब सिर्फ पलामू प्रमंडल में सुखाड़ है । मानसून एक ही समय में कभी निष्क्रिय पड़ता है तो कभी सक्रिय हो जाता है । केन्द्रीय कृषि विभाग ने देशभर में 38 जिले ऐसे चिन्हित किए थे, जहां जून में बारिश की स्थिति चिंताजनक थी । पर आज उस स्थिति में परिवर्तन हो गया है ।

          ऋतु चक्र में परिवर्तन का कारण है जलवायु पर पर्यावरण का प्रभाव । एक और जहां Global Warming का असर है वहीं दूसरी ओर "अल नीनों" का प्रभाव है । मौसम विभाग (आईएमडी) को जुलाई और अगस्त में मानसून के सक्रिय होने की उम्मीद है । आईएमडी को मानसून के पैटर्न में बदलाव की उम्मीद है ।

          दूसरी ओर, शारदा, घाघरा, गंगा, रामगंगा यूपी और उत्तराखंड में बाढ़ का प्रलय मचाने को तैयार है । उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों पर भारी बारिश से जान-माल का खतरा मंडरा रहा है । 22/23 जुलाई को विदर्भ में 72 घंटों की लगातार वर्षा ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया । ओडिशा के अनेक शहरों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है । बिहार में भी कोसी का तांडव जारी है । कई गांवों में पानी ने कहर मचा रखा है । छत्तीसगढ़ के सात जिलों के 1200 गांव बाढ़ से टापू बन गए हैं । मेरे लोक सभा क्षेत्र चतरा के ही एक ब्लॉक पत्थलगड्डा और सिमरिया के कुछ भाग में ही जून महीने में एक दिन में 72 मिलीमीटर वर्षा ने पूरी खेती को नष्ट कर दिया । कृषि यंत्र भी नदी में आई अचानक बाढ़ में बह गए । प्रभावित जनजीवन आज तक मुआवजा के इंतजार में है । पर संवेदनशून्य राज्य सरकार मौन और मूक है ।

          बाढ़ और सुखाड़ से खाद्यान्न की कमी और हानि के साथ-साथ जान-माल का नुकसान और बिजली का संकट होगा । हमें इस समस्या का स्थाई समाधान खोजना होगा ।

          जल संकट से जहां सामाजिक विषाद और तनाव उत्पन्न हुआ है, वहीं ग्रामीण भारत में आर्थिक संकट भी उत्पन्न हुआ है । एक ही समय में देश का बहुत बड़ा भू-भाग जहां बाढ़ की भीषण त्रासदी को झेल रहा होता है वहीं दूसरी ओर जल संकट के कारण उत्पन्न सूखा मृत्यु का तांडव करता दिख पड़ता है । ईश्वर और प्रकृति ने नदियों के रूप में मानव जाति को अमूल्य निधि प्रदत्त की है । मानव जाति का कर्तव्य है कि इस निधि का उचित और बेहतर उपयोग करें ।

          जल संसाधन के उचित और बेहतर उपयोग हेतु आजादी के पूर्व से ही विभिन्न योजनाओं पर चर्चा और परिचर्चा होती रही है । आजादी के पश्चात भी देश के अंदर इस प्रकार की योजनाएं बनती रही हैं । गंगा और कावेरी के मिलन का स्वप्न देखने वाले अनेक अभियंताओं यथा आथर  कॉटन, विश्वेश्वैरया, सी.पी. रामास्वामी अय्यर, के.एल. राव, सी.सी. पटेल, पी.एस. वैद्यनाथन, आर.बी. चक्रवर्ती, आर.डी. वर्मा, एस.पी. नमसिवायम, पी.के. बालकृष्ण, के. भरतन, कँवरसेन, गुलाटी, एन.जी.के. मूर्ति, एम.एल. चम्पाकरण, कैप्टन दस्तूर, डी.पी. धर इत्यादि को राजनैतिक नेतृत्व और नौकरशाही से प्रोत्साहन न मिला । तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व के पास दूरदर्शिता का अभाव होने के साथ ही समयानुकूल एवं युगानुकूल निर्णय लेने की इच्छाशक्ति का भी अभाव था । "दूरदृष्टि और पक्का इरादा" का नारा लगाने वाले तत्कालीन राजनीतिज्ञ स्वार्थों की पूर्ति में मगन रहे । नतीजन अभियंताओं के स्वप्न बिखरते रहे और वर्षा और नदियों के जल के उपयोग के लिए आपसी कटुता बढ़ती गई । ग्रामीण भारत की व्यथा और दुर्दशा बढ़ती गई ।

          आज जल संकट से निजात पाने हेतु अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा घोषित कार्यक्रम   "नदियों को जोड़ने " के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा है । नदियों के समायोजन के माध्यम से एक लोकोन्मुखी आर्थिक संरचना खड़ी होगी । ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति में वृद्धि के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा प्राप्त होगी । सूखा, बाढ़ ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त बेरोजगारी, पलायन के कारणवश नगरीय-ग्रामीण असंतुलन, बंजर भूमि इत्यादि समस्याओं का समाधान होगा । इस योजना के अंतर्गत हिमालय की 14 एवं 16 प्रायद्वीपीय नदियों का समायोजन किया जाएगा । 54 स्थानों पर नदियों के संगम से 27 बड़े बांध एवं 56 जल भंडारण केन्द्र बनाए जाएंगे जिससे 173 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का प्रवाह बदलेगा जिसके लिए 12500 किमी. नहरों का निर्माण किया जा सकेगा । इस योजना से 35 मिलियन हैक्टेयर भूमि को अतिरिक्त सिंचाई सुविधा के साथ-साथ 34000 मेगावाट जल विद्युत का उत्पादन होगा । ग्रामीण भारत एवं महानगरों के जल संकट के साथ-साथ अंतर्राज्यीय जल विवादों का निराकरण होगा । बाढ़ और सूखा से होने वाले फसल की क्षति पर रोक लगेगी । प्राकृतिक आपदाओं में 2002 से अब तक प्रतिवर्ष 25000 करोड़ रूपये से 40000 करोड़ रूपयों की फसल नष्ट होती रही है । इस योजना से बाढ़ के विनाशकारी तांडव पर नियंत्रण पाने में सफलता मिलेगी । वर्ष 2050 में भारत की जनसंख्या 1800 मिलियन हो जाएगी जिसके लिए 500 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी । इस उत्पादन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सिंचाई क्षमता 160 मिलियन हैक्टेयर तक बढ़ानी होगी । यह लक्ष्य इस योजना से प्राप्त होगा ।

          इस योजना के फलस्वरूप आर्थिक गतिविधियों में अत्यधिक क्रियाशीलता होगी जिसके कारण सकल घरेलू उत्पाद में प्रतिवर्ष 10 से 12औ की दर से वृद्धि होगी ।

          "सबका साथ-सबका विकास" नारे को हम तब ही मूर्त रूप देने में सफल होंगे जब देश को बाढ़ और सूखा की समस्या से निजात दिला सकें । इसका एक ही रास्ता है - "नदियों का समायोजन" । जिसके माध्यम से हर खेत को पानी - हर हाथ को काम देना संभव होगा ।
             
*m04 श्री बंडारू दत्तात्रेय (सिकन्दराबाद): माननीय सभापति महोदय,आपने मुझे बोलने का मौका दिया,इसके लिए आपको धन्यवाद देना चाहता हूं। देश में एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ सूखे की स्थिति है। तेलंगाना राज्य नया बना है। इस राज्य में साधारणतया जून और जुलाई महीने में बारिश होती है और खरीफ का सीजन शुरु होता है। पिछले साल और इस साल भी मीट्रियोलाजिकल डिपार्टमेंट ने 146 मिमी. के आंकड़े दिए हैं। पिछले साल यह आंकड़ा 487 मिमी. था।  इसका मतलब है कि 70 परसेंट मानसून फेल होने के कारण वर्षा इतनी कम हो गई है। तेलंगाना राज्य में निजामाबाद, नालकोंडा, हैदराबाद जिलों में काफी बुरा प्रभाव हुआ है। विशेषकर तेलंगाना राज्य में 464 मंडल हैं, इसमें से 426 मंडल में बहुत कम वर्षा हुई है। तेलंगाना राज्य सरकार 1 करोड़ 5 लाख पैडी का टार्गेट रखकर आगे जा रही है। इसलिए सिचुएशन बहुत चिंताजनक है। फूडग्रेन्स और पल्सिस 29 और 41 परसेंट है।  About 89 per cent is the worst affected area.  That is why, many of the cotton growing farmers committed suicide.  Even in the last two to three months, approximately 28 farmers committed suicide.  Particularly cotton growing farmers have committed suicide. They are digging  bore wells for want of water.  When they are unable to get water, they invest more and more on land.  Then they are unable to pay the private money lenders.  As a result, they commit suicide.  Earlier also, in Andhra Pradesh, approximately 4000 farmers committed suicide.
Sir, approximately 23 lakh bore wells are there which depend on power. But maximum power cut is there.  For power cut, there are some other reasons.  My major demand to the Minister for Agriculture and request to the Union Government of India is that at least 1000 MW of power should be allocated to Telangana out of the unallocated power which is with the Centre.
          The Government of Telangana has already declared that they want to waive off loans worth Rs. 1700 crore but still the farmers are in difficulty.  They are unable to get loans.  I would impress upon, through you, the hon. Minister that adjustment can be made regarding the loan scheme.
          Lastly, of course, there are temporary measures to tackle the problem.  But there are permanent measures which have to be taken up. Seeds and fertilisers which ought to be given should be given. Other than that, Telangana is always a drought prone area. Farmers are always committing suicide in Telangana. Therefore, I appeal to the hon. Minister, the hon. Prime Minister and the Union Government that Pranahita Chevalla Project should be treated as a national project and see that this project comes under the State of Telangana.
                                                                                               
*m05 श्रीमती रंजीत रंजन (सुपौल) : माननीय सभापति जी,मैं आपके माध्यम से बाढ़ और सूखे के गंभीर विषय पर कुछ प्वाइंट कहना चाहती हूं। यह बहुत खुशी की बात है कि इसके मंत्री बिहार के ही हैं। मुझे उम्मीद है कि मंत्री जी वहां की कोषीय विभीषिका को बहुत अच्छी तरह समझते होंगे। सबसे महत्वपूर्ण पाइंट यह है कि हम लोग वर्षों से बाढ़ और सुखाड़ पर चर्चा कर रहे हैं,परंतु क्या हम लोग सही मायने में किसान के लिए,बाढ़ के लिए और सुखाड़ के लिए गंभीर हैं।
          दूसरी बात मैं कहना चाहती हूं कि क्या बाढ़ और सुखाड़ के लिए प्राकृतिक आपदा दोषी है,ग्लोबल वार्मिंग दोषी है या हम लोग मानवीय भूल के कारण आज बाढ़ और सुखाड़ को झेल रहे हैं। मेरे ख्याल से मानवीय भूल ज्यादा है। इसका एक बहुत बड़ा एग्जामपल कुसा का बांध 2008 में टूटता है,जहां पर मेरे ख्याल से आजादी के बाद कभी बाढ़ नहीं आई,उस तरफ बांध टूटता है और कई लाख हैक्टेअर भूमि और जान-माल की क्षति होती है। एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि वह प्राकृतिक आपदा नहीं थी,बल्कि मानवीय भूल थी। स्पर पर हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया,जहां स्पर 1500 मीटर होना चाहिए था,वहां 250 मीटर पर पहुंच गया। लेकिन इसे आप अच्छी तरह से समझ रहे होंगे,खाऊ-पकाऊ और इरिगेशन विभाग का मतलब मलाई है,जिसमें हमने बांध को थोड़ी सी मिट्टी लगा दी,उस चूहे के होल को बंद कर दिया,अब हमारा बांध सुरक्षित है,यह कहकर खानापूर्ति कर दी। अगर बाढ़ आयेगी तो वहां बहुत गरीब और मजबूर लोग हैं। कल यहां बदरुद्दीन साहब यह कह रहे थे कि जो बाढ़ को झेलते हैं,उनकी स्थिति क्या है,यदि हममे से कोई भी यदि थोड़ा सा भी संवेदनशील व्यक्ति है तो हम लोगों का सिर शर्म से झुक जाता है। मैं हर साल बाढ़ में वहां जाकर लोगों से मिलती हूं। नाव से जाती हूं और मेरी देह सिहर जाती है जब मंत्री जी उनकी स्थिति बाढ़ के वक्त देखी जाती है कि वे किस हालत में रह रहे हैं। महिला होने के नाते एक प्रेगनेन्ट वूमैन को देखकर मेरी देह सिहर उठती है कि अगर उस बाढ़ के वक्त टापू बनी हुई जगह पर जब उसे बच्चा होता है तो वह यह सोचकर चल रही होती है कि या तो वे दोनों बच जायेंगे या वे दोनों मर जायेंगे। यह स्थिति है और यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है। सबसे अहम बात यह है कि हम इसके स्थाई निदान की तरफ सोच रहे हैं कि नहीं। आज कोसी में जो कुसा का बांध टूटा,उसके बाद स्वामीनाथन की रिपोर्ट आई,एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि कुसा के बांध टूटने के बाद कई लाख हैक्टेअर भूमि आज बालू हो गई,बंजर हो गई। वह बहुत उपजाऊ भूमि थी। एक तरफ कोसी को अल्हड़ कहा जाता है,विभीषिका की नदी कहा जाता है,जबकि सही मायने में आप देखें तो उस कोसी से ज्यादा उपजाऊ मिट्टी और कोई नदी नहीं देकर जाती है जो हर साल उस जमीन को उपजाऊ मिट्टी दे देती है। लेकिन हम उसे अल्हड़,विभीषिका की नदी कहते हुए दरकिनार कर देते हैं। मेरे ख्याल से चाहे कोई भी रूलिंग पार्टी हो या विपक्ष हो,जब तक हमारी मंशा यह रहेगी कि हमें बाढ़ या सुखाड़ में वोट की राजनीति करनी है। हमें यह देखकर बहुत शर्म आती है जब हम लोग जाते हैं और देखते हैं कि उन लोगों को हम 20 या 25 किलो अनाज देकर खरीद लेते हैं। हम उसके परमानैन्ट सोल्यूशन की तरफ नहीं जाते हैं। वहां की मेन प्रॉब्लम सिल्टेशन की है। मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहती हूं,हम बाढ़ और सुखाड़ की बात कर रहे हैं,लेकिन हम इम्पलिमैन्ट कितना कर पाते हैं। वहां कुसा बांध टूटने के बाद सैकड़ो नहर,हजारों खेत और सड़कों पर बालू आ गया। टीम गई,एक्सपैरिमैन्ट किया गया,रिसर्च की गई,उस बालू वाली मिट्टी को तीन ग्रेड में बांटा गया और कहा गया कि यहां ढैचा और सब्जी की खेती हो सकती है। लेकिन आज तक वह भूमि बंजर है,वहां के किसान भूखों मर रहे हैं। साढ़े सात सौ करोड़ रुपये यूपीए की सरकार की तरफ से नहरों को दोबारा से रिपेयरिंग करने के लिए दिये गये। लेकिन आज तक वहां एक भी ऐसी नहर नहीं है,जिससे पानी खेतों तक पहुंचा हो। अजीब विडम्बना है हमारे यहां कोसी की बाढ़ से सात-आठ जिले अफैक्टिड होते हैं। वहां बाढ़ भी है और सुखाड़ भी है। हमारे पास बाढ़ के माध्यम से इतना पानी आता है,लेकिन हम उससे भूमि को सिंचित नहीं कर पाते हैं,ताकि जब खेतों और किसानों को जरूरत पड़े तो वही पानी हम खेतों में दे सकें। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी को कहना चाहूंगी कि आप भी बिहार के हैं,क्यों नहीं एक बार छप्पन में बांध बंधा,दस किलोमीटर पर कोसी नदी बह रही है। क्यों नहीं पायलट बांध बनाकर आप ऊपर से देखें तो जो लोग अक्टूबर में गंगा जाते हैं,जब पूरी नदी भरी होती है,खानापूर्ति करते हैं और चले जाते हैं। जबकि हमारा कहना यह है कि जब नदी बहुत कम धार में बह रही होती है,दस किलोमीटर में नदी बह रही है,यदि आप ऊपर से हेलिकॉप्टर से देखें। अगर हम बीच में पायलट बांध बनवा कर,चार-पांच किलोमीटर के बीच में उसको दोबारा से बांध दें,दस वर्ष पहले पश्चिम में बह रही थी नदी तो पश्चिम वाले बांध में बहुत ज्यादा दबाव बना हुआ था,बाढ़ आने की शंका रहती है और बाढ़ से कई कटाव होते हैं। आपको मालूम है कि कोसी हर साल कई गांव काटती है। इस बार पूर्व में बहुत ज्यादा दबाव बना है। क्यों नहीं हम नदी को बीच में बांधते हैं ताकि अगर दोनों तरफ बांध सेफ रहेगा तो दोनों तरफ की पॉप्युलेशन को बार-बार कटाव नहीं झेलना पड़ेगा। इसके साथ ही मैं यह भी जरूर कहना चाहूंगी कि कोसी के साथ-साथ,हमने बहुत नज़दीक से देखा है,मुझे पहाड़ों से बहुत ज्यादा प्यार है। भू-स्खलन,सुखाड़ और बाढ़ आखिर पहाड़ों में आते क्यों हैं?इलैक्ट्रिक हाइड़ोपावर की बात करते हैं। मैं आपसे एक सवाल पूछूंगी कि जब हम इलैक्ट्रिक हाइड्रो पॉवर बना रहे होते हैं,तो इंवायरमेंट का क्राइटेरिया दिया होता है कि इतने पेड़ आपने काटे हैं तो इतने पेड़ लगाने हैं। लेकिन आप कौन से पेड़ लगाते है? 30 साल, 40 साल, 100 साल वाले देवदार,जो चीड़ के पेड़ होते हैं,उनकी कमी की पूर्ति आप कैसे कर पाएंगे?हमने आंखों से देखा है कि उनकी जग झाड़-फूंस लगा कर पहाड़ों में खाना-पूर्ति की जाती है। जिसके कारण जो पहाड़ों को समेट कर रखते हैं,जो पेड़ उन पहाड़ों की नमी रखते हैं,जो उन पहाड़ों की नमी और पहाड़ों को जोड़ने का काम करते हैं,उन पेड़ों को काटने से भी भू-स्खलन होता है और वे पहाड़ भी सुखाड़ की चपेट में आ जाते हैं। क्या हम सिर्फ धन कमाने की तरफ ही ध्यान देंगे?हमें बिजली चाहिए,लेकिन पहाड़ों को सुखाड़ की और भू-स्खलन की एवज में नहीं चाहिए। हरिद्वार में हम गांगा की बहुत बात करते हैं,खास कर आपकी पार्टी बहुत बात करती है। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूँगी कि कुछ साल पहले निगमानंद जी शहीद हुए। मेरे ख्याल से तीन महीने की फास्टिंग के बाद वे शहीद हो गए। हम गगां-गंगा शोर मचाते हैं। गंगा में सैंड माफिया लगे हुए हैं और अवैध खनन हो रहा है। उसको बार-बार रोकने के लिए कहा गया,क्योंकि वह बार-बार गंगा के नैचुरल वे को बहुत खराब कर रह रहा है,जिसके कारण बार-बार बाढ़ आती है। मेरे ख्याल से जिस दिन बाढ़ और सुखाड़ के लिए हमारी नीयत सही हो गई,दिन निश्चित तौर से हम उसका समाधान खोज लेंगे अन्यथा हम डिस्कशन करते रहेंगे। बाढ़,सुखाड़ और किसान के बारे में सही मायने में सोचने वाला मुझे नहीं लगता है कि आज तक इस सदन में कोई सदस्य है।
   
*m06 श्री शरद त्रिपाठी (संत कबीर नगर):  सभापति जी, सबसे पहले तो मैं आपसे यह निवेदन करूंगा कि बाढ़ जैसी गंभीर परिचर्चा पर श्रद्धेय योगी जी द्वारा जो यह प्रस्ताव लाया गया है, उस पर समय का बांध न बनाया जाए। चूंकि यह राष्ट्रीय समस्या है और मुझे लगता है कि इस सदन में बैठे हुए सारे सदस्य सूखा एवं बाढ़ की समस्या से अपने-अपने क्षेत्रों में जवाबदेह हैं। उनकी वेदना को आज इस सदन में छलक जाने दीजिए। सब की वेदना आ जाए, तब उस पर माननीय मंत्री जी को बोलने के लिए कहिएगा। आपसे मेरा यह नम्र निवेदन है। फिर भी मैं जानता हूँ आपके समय का डंडा उठ जाएगा।
          महोदय, बाढ़ का पानी और मानव की जवानी, इसकी दशा को नहीं को नहीं रोका जा सकता है। इसकी दिशा जरूर बदली जा सकती है। आजादी के बाद से अब तक हर मानसून सत्र में सूखा एवं बाढ़ जैसे गंभीर विषय पर तमाम परिचर्चा और चर्चाएं हुई हैं, लेकिन यह खेद का विषय है कि इसका निराकरण स्थाई रूप से आज तक नहीं हो पाया है। मैं चर्चा तो असम की बाढ़ से और नेपाल की तलहटी तक की नदियों में जो प्रलयकारी बाढ़ आती है, उस पर करना चाहता था, लेकिन कल हमारे उत्तर प्रदेश के एक माननीय सदस्य महोदय यहां पर चर्चा के दौरान केंद्र सरकार से अनुदान मांगने का एक पत्रक दिखा रहे थे। मैं उन्हीं की बात के आगे कहना चाहूंगा, क्योंकि उन्होंने मेरी दिशा बदल दी। राष्ट्र से प्रदेश, उत्तर प्रदेश की तरफ मैं चल रहा हूँ। मैं संत कबीर नगर लोक सभा क्षेत्र से निर्वाचित हो कर आया हूँ, जिस लोक सभा में तीन नदियां हैं, तीन जिले हैं, तीन कमिश्नरी हैं।
          महोदय, वर्तमान समय में मेरे क्षेत्र में बाढ़ भी है ओर सूखा भी है। मैं कहना चाहूंगा कि 1 अगस्त, 2013 को वहां पर प्रलयकारी बाढ़ आई और रात में आठ बजे मैं भी वहां पर उपस्थित था। दंघटा विधान सभा के एमबीडी बांध पर जब बाढ़ आई तब वहां अधिकारी मुस्करा रहे थे। मैं वहां खड़ा था, दो किलोमीटर नदी पीछे थी और मैं बार-बार कह रहा था कि बंधा टूट जाएगा, एमबीडी बंधा टूट जाएगा और वहां का एक इंजिनियर एक कुटिल मुस्कान के साथ कहता है कि अरे भाई रहने दीजिए, बाढ़ नहीं आएगी तो आपदा का पैसा कैसे आएगा। किसी के मातम पर काई मौज मनाता है, यह कितनी पीड़ा की बात है। यह कितनी पीड़ा की बात है कि कुछ लोग मातम पर मौज मानाते हैं और उन्होंने अनुदान की मांग की है।  महोदय,अब तक केंद्र सरकार द्वारा 27 हजार 503 करोड़ रूपया वर्ष 2011 से वर्ष 2014-15 तक दिया जा चुका है। मैं बताना चाहूंगा कि उसमें से उत्तर प्रदेश को 1,744 करोड़ रूपए मिले हैं और उसमें से हमारे संत कबीर नगर जनपद जो लोक सभा क्षेत्र भी है,उसे 57 करोड़ रूपए दिए गए हैं। उस एमबीडी बंधे की मरम्मत के लिए मैंने अपने संसदीय कार्यों का निर्वहन करते हुए वहां 20 जून को दौरा किया। मैंने जिलाधिकारी महोदय को सूचित करके कहा कि यह बहुत गंभीर विषय है,बंधा फिर टूट जाएगा और फिर बाढ़ आ जाएगी। 
          महोदय,मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा,वहां के सिंचाई विभाग के अवर अभियंता भी थे,वहां के सहायक अभियंता भी थे,मैंने आम जनमानस के साथ जाकर मौके का भौतिक सत्यापन किया। 13 जगह मैंने नाप करवायी,वहां पर 18 सौ मीटर स्कवैयर में जो वोल्डर डाले जाने थे,वह तीन फुट डाले जाने थे,जबकि वहां मात्र दो फुट डाले गए थे। मैंने सहायक अभियंता से उन्हीं की कलम से लिखवाया कि आप लिखिए कि तीन फुट की जगह सवा दो फुट डाला गया। 13 जगहों पर हमने भौतिक सत्यापन किया और उसे लिखवाया भी। गवाह के रूप में मैंने वहां के स्थानीय पत्रकारों को भी सम्मिलित किया। 
          महोदय,पीड़ा होती है कि वहां अधिशासी अभियंता ने आने की भी जहमत नहीं उठायी। चूंकि उनको वहां की सत्ता का संरक्षण प्राप्त था और बेलौली बंधे से लेकर एमबीडी बांध को आज उन्होंने अवैध तरीके से तबाह कर दिया है। मैंने उस पीड़ा को देखा है। जब उस क्षेत्र का बांध कटता है,भिखारीपुर एक गांव है,जिसका आज अस्तित्व ही नहीं है। वहां के लोग आज भिखारी बनकर बाढ़ की पीड़ा की कहानी बयां कर रहे हैं। दिनकर जी की वह कविता मुझे याद आती है,नेहरू जी के समय में जब बाढ़ की पीड़ा की त्रासदी उन्होंने देखी थी,जब बाढ़ से पीड़ित लोग वहां रोटी के टुकड़े के लिए गिड़गिड़ा रहे थे और एक पत्ता चाटते हैं। उनको अंत में कहना पड़ा-
"लपक चाटते झूठे पत्ते, जिस दिन देखा मैंने नर को, सोचा क्यों न आग लगा दूं, आज मैं इस दुनिया भर को।"
         

          महोदय,मैं जानता था कि आप समय पूरा होने की बेल बजा देंगे,लेकिन फिर भी मैं अंतिम बात कहना चाहूंगा। मैं आदरणीय योगी जी द्वारा उठाये गए प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा हुआ हूं। मैं बधाई देना चाहूंगा कि आजादी के बाद से इस पीड़ा को अगर किसी एक प्रधानमंत्री ने समझने का प्रयास किया है तो हमारे श्रद्धेय नरेन्द्र भाई मोदी जी ने,जिन्होंने शपथ लेते ही सबसे पहले गंगा मैय्या की आरती उतारकर नदी को प्रणाम किया। हम लोगों की जो परिपाटी है,जिस पार्टी से मैं समबद्ध हूं-

"गंगा, सिन्धुस्य, कावेरी, यमुना च सरस्वती, रेवा, महानदी, गोदा, ब्रह्मपुत्र पुनात्माम्।"
         

           हम लोगों ने मजबूत प्रयास शुरू कर दिया है क्योंकि बाढ़ का आधार पानी है और पानी का आधार नदी है और नदियों को नमन करके हमारी सरकार ने जो प्रयास शुरू किये हैं,निश्चित रूप से अब बाढ़ की समस्या का निराकरण होगा। आपने मुझे बोलने का समय दिया,इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।                                                              

 

*m07 श्री अजय मिश्रा टेनी (खीरी) : महोदय,हिन्दुस्तान किसानों का देश है और यहां पर 70 प्रतिशत से अधिक लोग कृषि के द्वारा ही अपनी रोटी,कपड़ा,रोजगार कमाते हैं यानी वही उनकी आमदनी का जरिया है। आज भी जो लोग खेती करते हैं,उसमें से 70 प्रतिशत लोग पारम्परिक खेती करते हैं और वे प्राकृतिक संशाधनों पर ही निर्भर करके खेती करते हैं। हमारे देश की भौगोलिक स्थिति बड़ी विरोधाभाषी है। आज सदन में ही हो रही चर्चा में कई सदस्य कह रहे हैं कि यहां सूखे की स्थिति है और कई सदस्य कह रहे थे कि कई जगहों पर बाढ़ है। निश्चित रूप से इस विविधताओं से भरे देश में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण आज ऐसी स्थितियां हैं कि कहीं सूखा है,कहीं बाढ़ है और उस पर हम सब चर्चा करने के लिए एकत्र हुए हैं। निश्चित रूप से यह एक संवेदनशील विषय है। किसान ही जिस देश की आर्थिक रीढ हो,उस देश में अगर खेती पर,कृषि पर बाढ़ और सूखे का प्रकोप होता है तो निश्चित रूप से देश कमजोर होता है। हमारा यह मानना है और हमारी पार्टी का भी यह मानना है कि इस देश में जब किसान मजबूत होगा तभी यह देश मजबूत होगा। वास्तव में जो परिस्थितियां हैं,मैं अपने क्षेत्र लखीमपुर से,जहां से बाढ़ प्रारम्भ होती है,लखीमपुर से बिहार तक का क्षेत्र,जो नेपाल की सीमा से जुड़ा हुआ है,वहां पर बाढ़ का कारण नेपाली नदियों के द्वारा छोड़ा गया पानी है। उसके साथ-साथ कुछ बांध ऐसे बने हुए हैं,जिनके कारण भी हमारे क्षेत्र में बाढ़ आती है।

          महोदय,मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री जी से अनुरोध करना चाहता हूं कि एक आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। यह जो क्षेत्र बाढ़ से पीड़ित है,यह नेपाल का सीमावर्ती क्षेत्र है,यहां का धान बहुत खराब हो गया है और सरकारी क्रय नीति में डैमेज परसेंटेज आपने 3 प्रतिशत कर रखा है,जिसके कारण हमारे क्षेत्र का धान सरकारी मूल्य पर नहीं बिक पा रहा है। इसलिए मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि डैमेज का प्रतिशत कम से कम पाँच प्रतिशत करने का काम करें। ...(व्यवधान)फिर भी,यदि प्राइम मिनिस्टर को आप कहेंगे तो निश्चित रूप से होगा क्योंकि चावल की खरीद नहीं हो पा रही है। एफ.सी.आई. के लोग पॉइंट डैमेज करके उसको खत्म कर देते हैं जिससे किसानों की हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही है। मैं आपके माध्यम से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि किसान की जेब खाली हो गई है,उसकी जेब को भरने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार ही करेगी। मेरा अनुरोध है कि कृषि जो हम लोगों की जीविका का आधार है,जीने का सहारा है और वास्तव में इस देश में जो भी आर्थिक व्यवस्था है,वह किसानों पर ही आधारित है। दूसरा,बाढ़ के कारण हमारे क्षेत्र में जो एक बड़ी समस्या आई है,वह यह है कि हमारे यहाँ का पीने का जो पानी है,उसमें आर्सैनिक आ गया है और जापानी बुखार,जिसको हम जापानी एनसिफेलाइटिस कहते हैं,उसके कारण हमारे क्षेत्र के बहुत सारे लोग बीमार हो जाते हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस पर बहुत ज़रूरी ध्यान देने की आवश्यकता है कि बाढ़ से हमारे क्षेत्र को मुक्त कराया जाए। उसके लिए चाहे नेपाल सरकार से आपको बात करनी पड़े,चाहे अपने बांधों में,जैसे बनबसा का बांध है या अन्य बांध हैं,उन बांधों की ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे यह क्षेत्र बाढ़ से बच सके। मेरा अनुरोध आपसे यह भी है कि जो कृषि उत्पाद है,उन पर लाभकारी मूल्य किसानों को मिलना चाहिए और उसका निर्धारण लागत के आधार पर किया जाना चाहिए। जब तक कृषि लाभकारी धंधा नहीं बनेगा,तब तक इस देश की आर्थिक व्यवस्था मज़बूत नहीं होगी। उसके साथ-साथ बाढ़ और सूखे के समय में हम लोगों को नाममात्र का मुआवज़ा दे दिया जाता है। मेरी आपसे मांग है कि मुआवज़ा न देकर पूर्ण क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की जाए। फसलों का बीमा किया जाए और बाढ़ की वजह से जिन लोगों के खेत कट गए हैं,जिनके गाँव कट गए हैं,हमारे क्षेत्र में तो पाँच के पाँच गाँवों का नामो-निशान समाप्त हो गया है,उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए।

          मैं आपके माध्यम से सरकार से एक नीतिगत अनुरोध और करना चाहता हूँ कि किसानों को जो मंडियों में जाकर गल्ला बेचना पड़ता है,उसके कारण उनका बहुत शोषण होता है। मंडी समितियाँ बहुत जगहों पर बनी हैं,लेकिन उनका सदुपयोग नहीं हो पा रहा है। मैं चाहता हूँ कि सरकार इसमें हस्तक्षेप करे और किसानों को यह कहा जाए कि मंडी समितियों में ही धान बिकेगा और जो उनकी बोली की प्रक्रिया है,उसके द्वारा उनका गल्ला बिके,उनका अनाज बिके और उनसे उनको लाभकारी मूल्य मिले। अगर नहीं मिलता है तो जो समर्थन मूल्य सरकार घोषित करे,उसका अंतर किसानों को दिया जाना चाहिए। अगर ऐसी व्यवस्था करेंगे तो निश्चित रूप से किसान मज़बूत होगा और जब किसान मज़बूत होगा तो देश भी मज़बूत होगा। भारतीय जनता पार्टी का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि इस देश में जब किसान मज़बूत होगा,तभी यह देश मज़बूत होगा।

                                                                                                         

*m08 *डॉ. स्वामी साक्षीजी महाराज (उन्नाव) ः  मैं अपने मित्र योगी आदित्यनाथ सांसद द्वारा नियम 193 के अधीन लाये गये बाढ़ और सूखा नामक प्रस्ताव का हृदय की गहराई से समर्थन करता हूँ। बाढ़ और सूखे के संदर्भ में यह कहना समीचीन होगा कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया। आज़ादी के सड़सठ साल बाद भी हम इस भयावह स्थिति से उभर नहीं पाये हैं कि आये दिन किसान और गरीबों के ऊपर प्राकृतिक आपदा-विपदा तो आती ही रहती है, परंतु व्यवस्था ने भी इन बेचारे, बेसहारा गरीबों और किसानों के साथ कोई न्याय नहीं किया है। किसान अन्न का दाता है फिर भी लूटा जाता है, किसान भारत भाग्य विधाता है, परंतु इसके भाग्य की चिंता किसी को नहीं है। मेरी भारत सरकार से माँग है कि कृषि को उद्योग का दर्जा प्रदान करें।

        हिन्दुस्तान की 70औ आबादी कृषि पर आधारित है, परंतु किसानों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है। आज़ाद भारत में किसान आत्म हत्या करता है। परिवार के परिवार नष्ट होते जा रहे हैं। ये सदन चिंता व्यक्त करता है, चर्चा करता है और फिर स्थिति जस की तस देखने को मिलती है। मुझे बहुत ही प्रसन्नता के साथ यह कहते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है कि 2014 में माननीय प्रधानमंत्री जी श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी के नेतृत्व में एक बहुत ही संवदेनशील किसानों, गरीबों, उपेक्षितों और शोषितों के हितों को साधने वाली सरकार आयी है। हम सब के तो अच्छे दिन आ गये। अब मुझे ये पूर्ण विश्वास हे कि किसानों के भी अब अच्छे दिन अवश्यमेव आयेंगे।

        बड़ी विचित्र स्थिति है, देश की आत्मा कहीं तो सूखा से कराह रही है, तो कहीं बाढ़ का भयावह ताण्डव देखने को मिलता है। हरिद्वार से लेकर पश्चिम बंगाल तक जीवनदायिनी माँ गंगा ही जब विकराल रूप लेती है तो हज़ारों-हज़ार लोगों का जीवन ही छीन लेती है। मेरा जन्म गंगा के किनारे हुआ है। मैंने गंगा-यमुना के किनारे वाले लोक सभा क्षेत्रों का ही प्रतिनिधित्व किया है, इसलिए बाढ़ के खतरनाक ताण्डव से में भली-भॉति अच्छा-खासा परिचित हूँ।

        मैं उप-काशी के नाम से सुविख्यात आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली, आज़ादी के दीवाने श्री चन्द्रशेखर आज़ाद की जन्मस्थली सर्वप्रथम तिरंगा फहराने वाले शहीद श्री गुलाब सिंह लोधी की जन्म और कार्यस्थली, ऐतिहासिक साहित्यकार और राष्ट्रीय कवि पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जन्म स्थली उन्नाव से चुनकार आता हूँ। उन्नाव एशिया की सबसे बड़ी लोक सभा है। यहाँ (22,50,000) बाईस लाख पचास हज़ार मतदाता अपने मत का प्रयोग करके बहुत आशा और विश्वास के साथ सांसद चुनते हैं, परंतु आज़ादी से लेकर आज तक यहाँ की जनता को केवल और केवल छलावा ही मिला है। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जनपद उन्नाव में विकास के नाम पर केवल और केवल दो दर्जन बूचड़खाने और दो ही दर्जन चमड़े की फैक्ट्रियाँ हैं, जिन्होंने पूरे जन जीवन को बर्बाद करके रखा है।

        यूँ तो उन्नाव में हरदोई की सीमा से लेकर फतेहपुर, रायबरेली की सीमा तक पतित पावनी माँ गंगा का किनारा लगभग 200 कि.मी. लगता है, लोन नदी भी यहाँ से बहती है जो कि बूचड़खाने के मलवे से लवालव भरी रहती है। यहाँ सई नदी भी है, परंतु उसमें पानी का नाम नहीं है। लोन नदी की सफाई नहीं होने के कारण शहर उन्नाव वर्षा में तो पानी से डूब जाता है। इसके गंदे विषेले पानी के कारण गंगा प्रदूषित होती है। इन्हीं कारणों से भूगर्भ का जल बहुत ही प्रदूषित हो गया है, जिसे पीने से संतान विकलांग पैदा होने लगी है। सम्पन्न लोग तो उन्नाव छोड़कर लखनऊ या कानपुर रहने लगे है। यदि यहाँ की स्थिति को नहीं सँभाला गया तो पूरा जिला ही बर्बाद हो जायेगा।

        आधा उन्नाव जिला सूखे की चपेट मे हैं तो आधा जिला बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है। ऐसी भयंकर स्थिति में कैसे, किस प्रकार ये जनपद उभरेगा कुछ समझ में नहीं आता है। मैं भारत की संवेदनशील सरकार से विनम्र निवेदन करता हँ कि हमारे जनपद उन्नाव के लिए सई और लोन नदियों को गंगा के साथ जोड़कर सिंचाई की एक अच्छी योजना और गंगा के द्वारा प्रतिवर्ष होने वाले कटान को रोकने के लिए एक बड़ा पैकेज भारत सरकार देने की कृपा करें और जनपद की जनता को स्वच्छ पवित्र व निर्मल जल पीने की भी व्यवस्था एक पैकेज देकर करें।

           

*m09 SHRI P. KARUNAKARAN (KASARGOD): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity to participate in the discussion under rule 193 regarding flood and drought situation in the country. It is common that flood and drought will not come together any time. But we are discussing these two together considering the seriousness of the natural calamity.

          As far as India is concerned, we are facing a very serious situation. We are experiencing both drought and flood in some parts of the country. We can say that it is a natural calamity, but at the same time it is a man-made calamity to some extent. For example, exploitation of the natural resources, exploitation of the forest wealth and illegal activities of the sand quarry mafia that we see in various parts of the country are some of the reasons for this man-made calamity. But we are not able to discuss all these issues with all seriousness. I know that in the 14th , 15th and 16th Lok Sabha we have been routinely discussing some subjects like price rise and we know the results of the discussion on price rise. Natural calamity is also one of them. We have been discussing all these issues. But they are connected with many of the other policy issues. For example, on the issue of carbon emission, Western countries say that they are not ready to reduce carbon emission, but they are asking India to reduce it. We have to think whether we can take any decision on this issue.

          The Government should take strong steps to prevent illegal activities of sand quarry mafia and also to stop exploitation of the forest wealth which we are losing. These are also some of the reasons that we have to discuss in detail.  I am not going to discuss all that.  I would like to come to my own State because of shortage of time.

          At present, Kerala is facing very severe rain in northern part of the State, that is, Kasargod, Kannur, Kozhikode, Wayanad and Malappuram.  It is told that in many parts of my State, we are facing very serious and adverse effects.  At the same time, this is not the first time.  The Government of Kerala has always been approaching the Central Government to get assistance. 

          As far as flood and drought situation is concerned, the Government should take a long-term plan, that is the perspective aspect, as well as the short-term plan.  Perspective aspect would reduce the damage in the long term.  Of course, the short-term plan is to give immediate relief to the farmers.  So these two issues have to be taken into consideration. I think that the Government may give some substantial and positive reply on this.

          As far as Kerala is concerned, every year the Kerala Government approached the Central Government for financial assistance.  I am sorry to say that the heavy loss is not, any time, fully compensated by the Centre.  For the year 2012, Kerala had requested for Rs. 143.1 crore; for the year 2013, we demanded Rs. 503.9 crore and for the year 2014, we demanded Rs. 141.7 crore.  All these requests were as per the SDRF norms.

          Due to heavy loss, in the year 2013, a request for a special package with regard to drought was submitted.  The total estimate was Rs. 3936.61 crore.  A request for a special package was also given in the year 2013 by all-party delegation.  The request was for Rs. 5660 crore.  I am sorry to say that the Central Government, either the earlier Government or the present Government, was not ready to give adequate compensation to the State.  Even though they gave the compensation, it was not given on time. 

          The compensation prescribed by the Central Government or the Planning Commission for the loss of agricultural crops, cash crops has to be seriously reviewed.  For example, the compensation for paddy, coconut, arecanut, rubber, and other products is really very meagre. It is not possible for the farmers to meet their loss due to this meagre amount and this also is not given on time. 

          As already pointed out by Shri Mullappally Ramchandran, some of the major incidents like lightening, sea erosion and landslides are not included.  The Government of Kerala has been requesting the Centre to include them because there is a big loss as far as these incidents are concerned. 

          The Earlier Government had appointed, as you know, Dr. Swaminathan Commission to study the problems concerning agriculture.  The Commission has made a number of suggestions.  One among them is to give loan to the farmers at a cheaper rate and, as far as paddy is concerned, to give interest free loans.  That report has already been submitted.  I would like to know whether the Government is ready to accept that report and whether the Government is going to take any action.

          Sir, we think about the farmers’ issues and we want to assist them.  How is it possible?  It is possible only by giving them cheaper credit and also interest free credit.  The Government has to take these issues into consideration.

*m10 श्री राम कृपाल यादव (पाटलीपुत्र) : सभापति महोदय,आज सदन अत्यन्त ही महत्वपूर्ण और गंभीर मसले बाढ़ और सुखाड़ पर चर्चा कर रहा है।

       महोदय,मानसून कमज़ोर होने से पूरे देश में सूखे की स्थिति है और खास तौर से मैं जिस प्रदेश से आता हूं बिहार,वह एक पिछड़ा और गरीब प्रदेश है,इसकी आबादी 80 से 85 प्रतिशत गांव पर निर्भर करती है,खेत और खलिहान पर निर्भर करती है। उसकी आर्थिक स्थिति खेती पर निर्भर करती है। आज से नहीं बहुत सालों से बाढ़ और सुखाड़ से बिहार के वासी प्रति वर्ष परेशान रहते हैं।

          महोदय,जैसा कि कई माननीय सदस्यों ने अपनी चर्चा के दौरान बिहार के नाम का उल्लेख किया तो निश्चित तौर पर आज बिहार पुनः एक संकट के दौर से गुज़र रहा है। वहां अनुमानित बारिश से लगभग 26 प्रतिशत बारिश कम हुई है। आज स्थिति यह है कि बिहार के 27 जिलों में सुखाड़ की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। किसानों में हाहाकार मची हुई है। अगर 15 अगस्त तक बारिश नहीं हुई तो बिहार के लोग भयानक संकट की स्थिति से गुजरेंगे और बहुत दयनीय स्थिति होगी। राज्य की सरकार ने अपने स्तर से कोई विशेष सुविधा मुहैया नहीं कराया है जिससे किसानों को लाभ मिले। सारे टय़ूबवेल खराब पड़े हुए हैं। खेतों में बिजली अनुपलब्ध है। डीज़ल बहुत कीमती हो गया है। किसानों की हालत बहुत खराब है।

          महोदय,कृषि मंत्री यहां बैठे हैं जो सौभाग्य से बिहार के हैं और बहुत दिनों के बाद बिहार का कोई भारत का कृषि मंत्री बना है। मैं समझता हूं कि माननीय कृषि मंत्री के संसदीय क्षेत्र का बहुत बड़ा इलाका बाढ़ और सुखाड़ दोनों से प्रभावित रहता है। इसलिए उस पीड़ा को वे अच्छी तरह जानते हैं। मुझे पता नहीं कि केन्द्र की सरकार के पास राज्य की सरकार ने सूखे की स्थिति से निपटने के लिए,उसका आकलन करने के लिए कोई टीम भेजने का अनुरोध किया है या नहीं किया है। मैं तो माननीय केन्द्रीय मंत्री से निवेदन करूंगा कि वे बिहार की दस करोड़ जनता को राज्य की सरकार के भरोसे न छोड़ें और अपनी ओर से इनिशिएटिव लेकर वहां केन्द्रीय टीम भेजें ताकि स्थिति का आकलन कर वहां के सूखे की स्थिति से निपटने के लिए और वहां के किसानों को,जो मौत के मुंह में जाने वाले हैं,उन्हें बचाने के लिए कुछ काम किया जाए।      

          महोदय,बाढ़ की स्थिति यह है कि हर साल उत्तर बिहार में बहुत सारे इलाके में बाढ़ आती है। इसकी चर्चा कई माननीय सदस्यों ने की है। मैं उसको रिपीट नहीं करना चाहता हूं। मगर,स्थिति यह है कि नेपाल में जब बारिश होती है और जब बारिश के बाद वहां के डैम को खोल दिया जाता है और जब वह पानी इधर आ जाता है तो पूरे उत्तर बिहार के सात-आठ जिले,जो कोसी प्रदेश कहलाता है,भयानक बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इससे लाखों-करोड़ों की जान-माल की क्षति होती है,इंफ्रास्ट्रक्चर बर्बाद हो जाता है। बिहार में तो वैसे ही पिछड़ापन है और मैं समझता हूं कि इसका अभी तक कोई सॉल्यूशन नहीं निकला है।

          महोदय,नेपाल के साथ भारत की कई वर्षों से वार्ता चल रही है। कोई डैम बनाने की बात चल रही है। डैम बनाने से तो बिजली का भी उत्पादन होगा। इस से नेपाल सरकार को फायदा होगा और बिहार में जो बिजली की कमी है,उस से लोगों को निजात मिलेगी और यह देश को भी सप्लाई होगा। उसके लिए एक डीपीआर बनने की बात हुई थी। पिछली यूपीए सरकार ने उसका डीपीआर बनाने के लिए कुछ करोड़ रुपये आवंटित किए थे। नेपाल में इसका एक दफ्तर भी है। मगर,उस पर आज तक क्या कार्रवाई हुई है,इसकी जानकारी नहीं है। सौभाग्य से हमारे प्रधान मंत्री जी नेपाल के दौरे पर हैं। मैं समझता हूं कि वे इस ओर भी सकारात्मक भूमिका अदा करेंगे। वे नेपाल के साथ ट्रीटी कर के जो डैम बनाने की बात है,जिससे बिहार को बाढ़ से मुक्ति मिल जाएगी,वह करने का काम करेंगे।

          महोदय,मैं एक मिनट और टाइम लूंगा। मैं बहुत ही कम बोलता हूं और एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।

          महोदय,मैं आपको बताऊं कि पटना जिले के जिस इलाके से मैं आता हूं,वह पूरा इलाका सुखाड़ के संकट से गुजर रहा है। वह इलाका तीन मुख्य नदियों से घिरा हुआ है। एक,गंगा नदी है। दूसरी,पुनपुन नदी है और तीसरी,सोन नदी हैं। उस पूरे इलाके में सोन प्रणाली के नहर की जो व्यवस्था है,वह चौपट हो गयी है। वहां हर साल मध्य प्रदेश से पानी आया करता था और वह पानी नहरों के माध्यम से किसानों के खेतों में जाया करता था। पर,दुर्भाग्य यह है कि पिछले दिनों मध्य प्रदेश की सरकार ने पानी छोड़ना बंद कर दिया है। पहले कुछ प्रारंभ हुआ था,मगर पुनः पानी छोड़ना बंद हो गया। यह एग्रीमेंट वर्ष 1973 से ही लागू है। अब स्थिति यह है कि जब बारिश होती है तो मध्य प्रदेश की सरकार पानी छोड़ कर अपनी फॉरमैलिटीज पूरी कर लेती है। मगर,आज जब सुखाड़ की स्थिति है तो अब वहां से पानी नहीं आ रहा है।

          महोदय,मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर लूंगा। यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है और मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा।

          महोदय,वहां सुखाड़ के कारण लोग बहुत संकट में हैं। मैं आपसे बताऊं कि केन्द्र सरकार को मध्य प्रदेश सरकार से बात करनी चाहिए। राज्य सरकार कहती है कि मैंने पैसा दे दिया और मध्य प्रदेश सरकार कहती है कि उसे पैसा नहीं मिला। अब इन दोनों के बीच उस पूरे इलाके के किसान परेशान हैं। इससे जो सात-आठ जिले प्रभावित हो रहे हैं,उनमें बक्सर,भोजपुर,औरंगाबाद,अरवल,कैमूर,सासाराम,जहानाबाद और मेरा क्षेत्र पटना है। ये बुरी तरह से सूखे से ग्रसित हो रहे हैं। किसानों में हाहाकार मचा हुआ है और अभी तक पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां की जो सोन नहर की प्रणाली है,वह बिलकुल कोलैप्स कर गई है। मैं समझता हूं कि नहर में अभी काम नहीं होना चाहिए। गंगा के कटाव से बहुत बड़े पैमाने पर लोग विस्थापित हो रहे हैं। ...(व्यवधान)

          सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से निवेदन करूंगा,वहां एक लाख से भी ज्यादा लोग रहते हैं,उनके जान-माल की सुरक्षा के लिए,कटाव के लिए ठोस उपाय कीजिए,विस्थापित लोगों को बसाने की व्यवस्था करने का काम कीजिए।

          सभापति महोदय,मैं पुन:आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी को निवेदन करना चाहूंगा कि बिहार को सूखे के संकट से बचाने के लिए कोई ठोस उपाय करके विशेष व्यवस्था करने का काम कीजिए,...(व्यवधान)ताकि बिहार के किसानों की रक्षा हो सके।

                                                                                               

*m11 श्रीमती कृष्णा राज (शाहजहाँपुर): सभापति महोदय,आपने मुझे 193 की बाढ़ और सूखे की चर्चा पर बोलने का अवसर दिया,इसके लिए मैं आपकी आभारी हूं। आज पूरा देश बाढ़ और सूखे से त्रस्त है। दुर्भाग्य यह है कि आजादी के बाद से आज तक इस पर किसी भी प्रकार से चिन्तन नहीं हुआ,पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा अगर चिन्तन हुआ तो शायद महज़ कागज पर रह गया,उनका क्रियान्वयन नहीं हो पाया।

          सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से सदन में बताना चाहती हूं कि वर्ष 1991 में हमारा जो बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र था,वह एक करोड़ हैक्टेयर था। लगातार 1960 में यह क्षेत्रफल बढ़ कर ढाई करोड़ हैक्टेयर हो गया और 1987 में यह क्षेत्रफल बढ़ कर लगभग तीन करोड़ हैक्टेयर हो गया तथा 1980 में भी बढ़ कर यह क्षेत्रफल बाढ़ एव सूखे से जो ग्रसित था,वह लगभग तीन से चार करोड़ हो गया। लगातार इतनी योजनाएं बनती गईं,लोगों ने हर बार इस सदन में चिन्ता भी व्यक्त की। सभी की चिन्ता इसी प्रकार रही और चर्चाएं भी इसी प्रकार रही होंगी,लेकिन आज वर्तमान 2013-14 में हमारे भारत की जो सारी भूमि है,वह लगभग सात से आठ करोड़ हैक्टेयर क्षतिग्रस्त हो गई और नदियों में समाहित हो गई,जो आज एक चिन्तनीय विषय है। हम पूर्ववर्ती सरकारों को इसके लिए दोषी ठहरातें हैं। इसमें कोई गुरेज़ नहीं है कि उन्होंने कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया,अगर किया होता तो शायद आज हम लोग यहां चर्चा नहीं कर रहे होते।

          सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से अपनी सरकार के माननीय मंत्री जी को बधाई देती हूं,जिन्होंने नदियों को जोड़ने का काम किया। नदियों को जोड़ने से एक तरफ जो हमारी सूखे की मार है,दूसरी तरफ हम बाढ़ से त्रस्त होते हैं,इन दोनों का संतुलन बनेगा और नदियां एक में धार बहेंगी। इन सब चीजों से हमें निज़ात मिलेगी।

          सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहती हूं कि इसके लिए हमारी सरकार ने नदियों को जोड़ने के लिए सौ करोड़ रुपए का धन आबंटित किया है। निश्चित ही यह सराहनीय कदम है,इसके लिए प्रधान मंत्री जी बधाई के पात्र हैं। हमारे प्रधान मंत्री,माननीय नरेन्द्र भाई मोदी जी की जो सोच है,क्योंकि किसी भी देश का उत्थान तभी हो सकता है,जब वहां की जो 70 फीसदी आबादी है,वह खुशहाल एवं सुखी हो। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज भी हमारा किसान इतनी मेहनत करके भूमि उपजाऊ करता है,फसल उपाजाऊ होती है,लेकिन जब धन लेने का नम्बर आता है तो कभी बाढ़ की चपेट में चला जाता है,कभी सूखे की चपेट में होता है।

          सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से बताना चाहती हूं कि राज्यवार देश के सभी प्रदेशों में धन का आबंटन वर्षवार किया गया है। हमारे उत्तर प्रदेश में भी इसके लिए अब तक 3,21613 करोड़ रुपए की लागत दी गई,लेकिन आज भी स्थिति जस की तस और भयावह है। आज मैं यहां पर अपने संसदीय क्षेत्र की भी पीड़ा बताने के लिए खड़ी हूं। मेरा जनपद शाहजहांपुर,उत्तर प्रदेश के अंतर्गत आता है। हमारा संसदीय क्षेत्र पांच नदियों से घिरा है -गंगा,रामगंगा,बेहगुल,गर्रा,खनौर। इन नदियों के कटान के कारण हमारे क्षेत्र में आज की जो वर्तमान स्थिति है,वह मैं बताना चाहूंगी। अब तक भू-कटान से हमारे यहां लाखों एकड़ धान की फसल नष्ट हुई। हमारे यहां जनपद शाहजहांपुर,जो मेरा संसदीय क्षेत्र है,वहां बहुत जनहानि हुई। मैं पुन:कह रही हूं,मेरे विपक्ष के साथी इस बात का बुरा न मानें,उनकी नीतियां देश के हित में नहीं थीं। बाढ़ के हित में नहीं थी और सूखे के हित में नहीं थी। 10 दिन पहले एक सूचना आती है कि हमारा देश अभी सूखे से ग्रस्त है और उसके बाद सिंचाई विभाग से एक सूचना आती है कि तमाम नदियों में गंगा,शारदा,घाघरा आदि में खतरे के निशान से पानी ऊपर बह रहा है। मैं आपको यह भी बताना चाहूंगी कि हमारे यहां सूखे के समय जो बाढ़ आती है,इसमें नेपाल,जो हमारा मित्र देश है,बिना बताये हुए तीन से चार लाख क्यूसैक्स पानी छोड़ देता है।

          मेरा आपसे यह निवेदन है कि नेपाल से मित्रवत् वार्ता करके इसमें कोई उचित नीति बनाई जाये। मैं आपको यह भी बताना चाहूंगी कि मेरे कुछ सुझाव मंत्री जी को हैं कि नदियों को जोड़ने के साथ-साथ ही नदियाँ मैदानी इलाके बनती जा रही हैं,इसलिए नदियों को गहरा करने की आवश्यकता है और उन पर बन्धा और ठोकरें बनाने की जरूरत है। मेरा एक और सुझाव है कि मैदान जैसी नदियां भी जब हो जाएंगी तो उससे स्थिति और खराब होगी।

          मेरा आपसे यही निवेदन है। बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का मौका दिया। 

                                                                                                         

*m12 *SHRI R. GOPALAKRISHNAN (MADURAI): With the blessing of our AMMA Hon’ble Chief Minister of Tamilnadu who gave me an opportunity to be the Member of this August House, I would like to express my views.

          I am to mention that the natural phenomenon flood and drought are unavoidable. But, proper schemes and by successful implementation, we can save our people from flood and drought.

 Identifying the flood-prone and drought-prone areas of the country is the foremost task. A well preparedness approach towards flood and drought would reduce the effects of disastrous results of flood and drought.

Droughts can have significant environmental, agricultural, health, economic and social consequences. Drought can also reduce water quality, because lower water flows reduce dilution of pollutants and increase contamination of remaining water sources. Our Amma Hon’ ble Chief Minister of Tamilnadu announced relief package of thousands of Crores rupees to save the farmers of Cauvery Delta Region of Tamilnadu. Such a war footing measures as taken by Amma should be encouraged well by the the Union Government by providing special budgetary allocations to the State.

          Channelizing and saving the flood waters would work well for drought-prone regions. Inter-linking of rivers, especially the flood-prone rivers, de-silting of waterbeds, saving the rain waters are to be given the topmost priority.

Rain Water Harvesting is one of the best methods to tackle both flood and drought. Rain Water Harvesting movement launched in 2001 was the brainchild of our Amma Hon’ble Chief Minister of Tamilnadu. It has had a tremendous excellent results within five years, and every states took it as role model.

          Amendments made to Section 215 (a) of the Tamilnadu District Municipalities Act, 1920 and Building Rules 1973, have made it mandatory to provide Rain Water Harvesting (RWH) structures in all new buildings in the State to avoid ground water depletion. Our Hon’ble Chief Minister of Tamilnadu earmarked about Crores of rupees to each Town Panchayats and Municipal Corporations in the State to augment water resources there. Therefore, the Union Government should encourage such initiatives through monetary budget allocations to the State of Tamilnadu. Rain water Harvesting will improve water supply, food production, and ultimately the food security.

          Therefore, I would urge upon the Union Government to device mechanism for integrated water resources development and managment. Adopt the Rain Water Harvesting model of Tamilnadu as a role model. Provide specific budgetary allocations to all the States to make the Rain Water Harvesting mandatory there.

          Also I urge upon the Union Government for taking joint action by the Ministries of Agriculture, Water Resources, Urban Development and the Rural Development to tackle both flood and drought in the country.

*m13 SHRI BHEEMRAO B. PATIL (ZAHEERABAD): Mr. Chairman, Sir,  I rise here to speak on the discussion under Rule 193 regarding flood and drought situation in the country.

          I would confine myself to the State of Telangana.  Our State has received just 146.7 mm of rainfall till 26th July, 2014 against the normal rainfall of 327.8 mm. There is a deviation of   minus 55 per cent.

          As regards agricultural activity, this time, due to less rain, the total area sown in my State   was 23.30 lakh hectare   as against the normal area of 26.76 lakh hectare.

          Sir, the State of Telangana has been badly affected by the following natural calamities during the year 2013-14:

1.           Heavy rains/floods due to low pressure area in Bay of Bengal from 21st October  to 27th October, 2013;
2.           Helen and Leher Cyclone from19th November to 28th November, 2013;
3.           Drought in 2013 during South-West Monsoon from June to September, 2013;
4.           Unseasonal rains/thunderbolt/hailstorms from 28th February to 10th March, 2014;
5.           Unseasonal rains/hailstorms in April, 2014; and
6.           Unseasonal rains/hailstorms in May, 2014.
 

          During the current year, the following were the loss of human lives, damage to property and loss of crops, which was reported.

          In the unseasonal rains/thunderbolt/hailstorms, which occurred from 28th February, 2014 to 10th March, 2014, districts of Mahabubnagar, Raga Reddy, Medak, Nizamabad, Adilabad, Karimnagar, Warangal, Khamman and Nalgonda were badly affected in which 10 people died, 1,060 houses got damaged and 61,819 hactore of crops got damaged.

          Similarly, in the unseasonal rains/hailstorms, which occurred in April, 2014, districts of Mahabubnagar, Ranga Reddy, Medak, Karimnagar, Warangal, Nizamabad and Nalgonda were badly affected, in which  16,083.06 hectare of crop got damaged.

          Then, in the unseasonal rains/hailstorms occurred in May, 2014, districts of Mahbubnagar, Ranga Reddy, Medak, Adilabad, Karimnagar, Warangal, Khammam and Nalgonda were badly affected, in which 4,252.08 hectare of crop got damaged.

          Sir, an Inter-Ministerial Central Team (IMCT) headed by Shri Narendra Bhooshan, Joint Secretary, Ministry of Agriculture, Government of India visited Warangal and Medak districts of the State in April, 2014. The IMCT submitted its findings and reports to the Government of India but those details are not available with the State Government.

          The State Government   released an input subsidy of Rs. 37.55 crore to the Agriculture Department for distributing it to the farmers affected by the hailstorms during February-March, 2014.

          Following the then Prime Minister’s assurance in November, 2013 of an assistance of Rs. 1,000 crore to the State, the Government of India released   an amount of Rs. 700 crore from the NDRF during 2013-14 to the States towards relief necessitated by natural calamities of severe nature on account basis, pending the final assessment of requirement of funds for immediate relief, operation and approval of the HLC.

          The Government of India also released an amount of Rs. 3,000 crore of Grand-in-Aid of Centre’s contribution to the State Disaster Response Fund during 2013-14 to the State Government on the basis of the recommendation of the 13th Finance Commission towards relief necessitated by natural calamities.

          Drought may come in several forms. The Indian Government declares ‘meteorological drought’ when there is less than 75 per cent average rainfall in an area over a prolonged period of time.

          A ‘hydrological drought’ is identified when there is a significant reduction in water bodies such as rivers, ponds, tanks and groundwater.

          Finally, an ‘agricultural drought’ is identified when crops fail because there is insufficient moisture in the soil during the crucial times of harvest. In India, this occurs when there is a ‘meteorological drought’ for four consecutive weeks during the period of mid-May to mid-October or for six consecutive weeks during the rest of the year.

          For many farmers, impossibly high debt is another consequence of drought. In Telangana, dependence on costly inputs such as fertilizers and pesticides has grown in recent years, and the farmers often borrow money to pay for them. A drought-stricken crop may make it impossible for a farmer to repay these loans. The situation is difficult, particularly for 87 per cent of the rural poor who do not have access to institutional sources of credit.

HON. CHAIRPERSON : Please wind up.

SHRI BHEEMRAO B. PATIL : Please give me one minute. They are forced to obtain money from private moneylenders who demand an interest rate of up to 35 per cent. These moneylenders may also be the local pesticide dealers who typically exploit farmers by charging 15-25 per cent extra for the goods obtained on credit.

          Lastly, unfortunately, some farmers do not have any hope on the effectiveness of these cropping mechanisms and they choose to end their life instead. A recent study has revealed that suicides committed in rural areas often follow intensive pressure and humiliation from moneylenders.

HON. CHAIRPERSON: Please wind up. You have already taken five minutes.

SHRI BHEEMRAO B. PATIL : Please give me one minute.

          In the final analysis, it seems that the key requirement for drought mitigation is the cooperation of communities, NGOs and the Government to prepare village drought contingency plans that counter the impacts of the drought such as health problems, debts, suicides and migration. It must be made clear as to who is responsible for the maintenance of water harvesting structures, and how this will be paid for.

HON. CHAIRPERSON: Please conclude.

… (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: Next is Shri Ajay Tamta.

SHRI BHEEMRAO B. PATIL : While drought contingency plans may exist in some localities on paper, they are worthless unless the relevant community has ownership of it and is serious about implementing it. To do this, they need access to funds and expert advice on the most suitable water harvesting structures and dry land crops for their location.

                                                                                               

*m14 श्री अजय टम्टा (अल्मोड़ा) : महोदय,आपने मुझे नियम 193 के तहत बोलने का सुअवसर दिया,इसके लिए मैं आपको हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं।

          महोदय,बाढ़ और सूखे से सम्बन्धित विषय को लेकर सभी माननीय सदस्यों ने अपने-अपने विचारों को बड़ी गम्भीरता के साथ इस सदन में रखा। इससे यह अनुभव होता है कि पूरे देश के किसी न किसी प्रदेश में लगभग 70-80 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा रहता है कि कभी बाढ़ ज्यादा या कभी सूखा ज्यादा। इन सबके पीछे बहुत सारे कारण हैं। मैं उत्तराखंड राज्य से आता हूं और उत्तराखंड राज्य में जिस प्रकार से लगातार अतिवर्षा के कारण,खंडवृष्टि के कारण,मौसम परिवर्तन के कारण,अधिकतम वर्षा होने के कारण लगातार नुकसान हो रहा है और साथ ही साथ जो नदियां उत्तराखंड से निकलकर आगे जाती हैं,वह भी तबाही का एक बहुत बड़ा कारण बनती जा रही हैं।

          महोदय,हमें उन सब विषयों में जाने की बहुत आवश्यकता है,क्योंकि पिछले वर्ष 2013 में 16-17 जून को केदारनाथ में बड़ी भीषण अतिवृष्टि के कारण वर्षा हुई,उसके पीछे बहुत सारे कारण हैं। हिमालय के साथ लगे हुए क्षेत्र,संभवतः मनुष्य उन स्थानों पर जाता भी नहीं,जो बर्फीले स्थान हैं,उन स्थानों में अधिकतम वर्षा का पानी अधिक मात्रा में इकट्ठा होने के साथ-साथ ग्लेशियर का गलना और हिमखंडों का गलना भी एक साथ हो जाता है,जिस कारण से अननेचुरल,जो नेचर के साथ-साथ ऊपर बहुत हाइट में तालाब बन जाते हैं और अचानक उनके फटने के कारण अति पानी बहने के कारण लगातार पूरी जमीनें बह जाती हैं।

          महोदय, मेरा यह भी निवेदन है, आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी तक भी वह संज्ञान जायेगा, चूंकि उत्तराखंड के लोग खेती करते हैं, वहां जो सीढ़ीदार खेत हैं, जिनके पास बहुत बड़ी खेती नहीं होती है और नदी के साथ जिनका समाज या गांव जुड़ा रहता है, अगर वहां एक साथ अति पानी आता है तो उनकी खेती के साथ-साथ उनके रहने की जमीनें बह जाती हैं और वे पुनः जंगलों की तरफ आगे निकलते हैं।  उनके पास कोई भी भूमि नहीं रहती है।   

15.00 hrs.  पिछली बार,मंदाकिनी नदी में 16-17 तारीख को जो घटना घटी थी,केदारनाथ में जो घटना घटी,गौरीकुंड में जो घटना घटी,सोनप्रयाग अगस्तमुनी,विजय नगर और रुद्रप्रयाग में भारी वर्षा के कारण,धारचुला और मुनस्यारी,जो मेरा संसदीय क्षेत्र है,इस क्षेत्र में भी गोठी,दारमा और दुमर वाले क्षेत्र में बहुत सारी घटनाएं घटीं। मैं इसे बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं। वह एक ऐतिहासिक त्रासदी थी जिसमें हजारों लोगों की जानें गईं। अभी भी 4024 लोग लापता हैं जिनकी अभी तक जानकारी नहीं मिल पाई है। वह ऐसी घटना घटी थी।

          मुझे यहां पर यह बोलते हुए गर्व हो रहा है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी जो हमारे प्रधानमंत्री हैं,केदारनाथ की घटना के तत्काल बाद वहां आए और उन्होंने उत्तराखंड राज्य के निवासियों को,जो लोग तीर्थाटन पर थे,उन लोगों को भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने बड़ा सहयोग किया। उस समय हमारा तंत्र बहुत खराब हो चुका था। केदारनाथ की घटना के कारण कनेक्टीविटी कट चुकी थी। पूर्व मुख्य मंत्री आदरणीय डा. निशंक जी ने इस संबंध में पहली सूचना देश के प्रधान मंत्री को दी। प्रधान मंत्री जी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी को सूचना दी,तब हम आपदा पर काबू कर पाए। ऐसी घटनाओं का लगातार बढ़ते रहना,उत्तराखंड राज्य के लिए एक अभिशाप बनता जा रहा है।

          सभापति महोदय जी से मेरा कहना है कि ग्लेशियर बेस्ट नदियों पर ध्यान देते हुए,उत्तराखंड में बहुत-सारी ऐसी नदियां हैं जो भूमिगत जल के कारण बनती हैं। अटल बिहार वाजपेयी जी ने प्रस्ताव रखा था कि नदियों को जोड़ना चाहिए। जो नदियां ग्लेशियर बेस्ड नहीं हैं,अगर उन्हें हम जोड़ेंगे,वर्तमान में हमारी सरकार ने इस प्रस्ताव को रखा भी है,उससे अति वृष्टि का जो पानी आएगा,वह भी बंटेगा। मुझे लगता है कि उससे भी हम आने वाले समय में बाढ़ पर नियंत्रण कर सकते हैं।

          मेरा यह पहला भाषण है। माननीय कृषि मंत्री जी उत्तराखंड राज्य से भली-भांति परिचित हैं और बिहार से भी परिचित हैं,जहां ज्यादा बाढ़ आ रही है। मुझे लगता है कि अब एक अच्छी नीति बनने की संभावना है। मैं प्रधानमंत्री जी को भी बहुत-बहुत धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने एक अलग से अध्ययन केन्द्र भी खोला जाएगा।

    15.03 hrs. (Dr. Ratna De (Nag) in the Chair)   *m15 डॉ. भोला सिंह (बेगूसराय) :  सभापति महोदय, “इस बस्ती में हाय कौन आंसू पोछेंगे जो मिलता है सबका दामन भीगा लगता है कितने प्यासे होगे यारों सोचो तो शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है।”    सभापति महोदय, बेगम अख्तर अपने आसुओं को सहेजते हुए गा रही थी -

“अब के आएगी बरसात, बरसेगी शराब, आई बरसात, पर बरसात ने दिल तोड़ दिया।”             महोदय, मैं बिहार राज्य से चुन कर आया हूं। बिहार विडम्बनाओं का राज्य है। बिहार सांस्कृतिक संभाव का राज्य है। यह देश भी विडम्बनाओं का देश है। संपूर्ण देश जिसे गंगा और यमुना पखारती है। जिसे अरब सागर, हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी, भारत मां का वसन है। गंगा-यमुना हमारी मां के दो स्तन हैं जिनसे दूध की धारा प्रवाहित हो रही है। पर जब मां के स्तन में ही अवसाद हो जाएं, वह भी समय के अंतराल में अपनी उपयोगिता खो दे। कार्लाइल ने इतिहास की व्याख्या करते हुए ठीक कहा है। उन्होंने इतिहास को तीन भागों में बांटा है। प्रथम भाग में कहा कि वह समय जब मानव प्रकृति के अधीन था।  दूसरे खंड में कहा कि जब मानव प्रकृति के साथ चलने लगा। तीसरे खंड में कहा जब मानव ने प्रकृति पर कब्जा करना शुरू किया। बादलों का फटना,पहाड़ों का गिरना,समुद्र का जमीन को अपने में समा लेना जो त्रासदी है,वह हमने पैदा की है। यह बड़े दुख का विषय है कि हमारे देश में हजारों नदियां हैं,जलाशय हैं,चौड़ हैं लेकिन यह देश सुखाड़ से पीड़ित है,बाढ़ से पीड़ित है। यही नहीं,इन हजारों नदियों के साथ-साथ हमारी हजारों सांस्कृतिक नदियां,नाले,जलाशय हैं। इन असंख्य सांस्कृतिक नदियों में समन्वय से हमारा देश चलता है। नदियों का समन्वय नहीं हुआ। योगी आदित्यनाथ ने ठीक कहा कि हमारी समस्या राजनीतिक है। राजनीति यह है कि वह सामाजिक और आर्थिक प्रबंधन है। कृषि केवल प्राइवेट जमीन में खेती को नहीं कहते,कृषि एक सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक,सांस्कृतिक व्यवस्था है। जब कृषि ठीक तो बाजार ठीक,जब कृषि ठीक तो सीमा ठीक,जब कृषि ठीक तो बेटी की मांग में सिंदूर,जब कृषि ठीक तो मां के आंचल में फूल के गुच्छे। पर यह कृषि,हमारी कृषि संस्कृति,कृष्ण गाय के साथ हैं,महादेव बैल के साथ हैं। इस तरह ये सांस्कृतिक नदियां,जमीन की नदियां सबका समन्वय होना जरूरी है।

          मैं आपका ज्यादा समय नहीं लेना चाहता। बिहार का प्राण नेपाल में बसा हुआ है। जितनी नदियां नेपाल,हिमालय से आती हैं,बिहार को त्रासदी देती हैं। इसीलिए हम आपके माध्यम से केन्द्र सरकार और माननीय मंत्री जी जो कृषि संस्कार और संस्कृति के हैं,राधा मोहन बाबू,पता नहीं हाथ में बांसुरी है या सुदर्शन चक्र है,मैं नहीं जानता।...(व्यवधान)लेकिन जब राधा के साथ हैं तो बांसुरी है और संस्कृति। मैं उनसे आग्रह करना चाहता हूं। बिहार सुखाड़ और बाढ़ दोनों से आतंकित है,बिहार सुखाड़ के कारण तार-तार है और नेपाल में बिहार का प्राण बसा हुआ है। हम आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से आग्रह करना चाहते हैं कि गंगा से जो बाढ़ आ रही है,कोसी से जो बाढ़ आ रही है,कृष्णा से जो बाढ़ आ रही है,इन तमाम नदियों से...(व्यवधान)मैं आधा मिनट और लूंगा। आप आई हैं,मैंने देखा नहीं,मेरी आंख बंद रहती है। मेरा नाम भोला है।...(व्यवधान)जब भोला की आंख बंद रहती है और माथे पर अगर चांद कलंकित बैठा है,गले में सांप जहर लेकर बैठा है,पत्नी भी पहाड़ की बेटी है और मित्र भी बैल है तो आप जानते हैं कि ऐसा व्यक्ति घिस गया है। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि जो बड़ी नदियां हैं,केन्द्र सरकार उनकी त्रासदी को राष्ट्रीय विपदा मानकर राज्य सरकार को इससे मुक्ति देकर इसका समायोजन करे और जल का प्रबंधन करे ताकि बिहार और यह देश जो स्वर्गित देश है,अपनी रक्षा कर सके।

                                                                                     

*m16 श्री ताम्रध्वज साहू (दुर्ग) :   सम्माननीय सभापति महोदया,मैं बाढ़ और सूखे के कारण उत्पन्न स्थिति पर चर्चा करने के लिए खड़ा हुआ हूं। पूरे देश में कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की स्थिति बनी हुई है। समय की कमी को देखते हुए मैं अपने राज्य और अपने संसदीय क्षेत्र पर ही चर्चा करना चाहूंगा। छत्तीसगढ़ में सूखे और बाढ़,दोनों ही स्थिति में किसान प्रभावित हुए हैं। मई में दो दिन पानी गिरने से किसानों ने सोचा कि मानसून आ गया,इसलिए उन्होंने खेती का काम शुरू कर दिया। वे सोयाबीन,धान आदि फसल की बुआई कर चुके थे। छुटपुट वर्षा को छोड़ दें,तो डेढ़ माह तक पानी न गिरने की वजह से फसल खराब हो गयी। अभी जुलाई में लगातार बारिश होने से वहां जबरदस्त बाढ़ की स्थिति बन गयी। हजारों लोग बेघरबार हो गये। कुछ फसल पैदा हुई थी,लेकिन वह भी खराब हो गयी। नःशुल्क धान,सोयाबीन व अन्य फसलों के बीज शासन को उपलब्ध कराने थे,लेकिन उन्होंने नहीं कराये। किसानों को हुई क्षति का सर्वे कराकर मुआवजा दिया जाना चाहिए।

          छत्तीसगढ़ में सभी नदी-नाले में एनीकट बनाये जा रहे हैं,जो जलस्तर बढ़ाने के लिए ठीक हैं,परन्तु छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा समस्त एनीकट उद्योगों के लिए बनाये जा रहे हैं। एनीकट का पानी किसानों को सिंचाई में न देकर उद्योगों को बेचा जा रहा है। बाढ़ में तट के कटाव होने के कारण नदी किनारे बसे गांवों के लिए खतरा मंडराने लगा है। बाढ़ नियंत्रण के तहत पीचिंग व फेजवाल निर्माण का कार्य होना है। छत्तीसगढ़ सरकार इसके लिए बजट का प्रावधान जरूर करती है,लेकिन काम नहीं होता। केन्द्र से राशि आने पर कार्य करने की बात कही जाती है। छत्तीसगढ़ से नदी किनारे के ऐसे सभी ग्रामों की सूची मंगाकर राशि केन्द्र से स्वीकृत की जाये। अधिक वर्षा होने पर गंगरेल व मोंगरा जैसे कई जलाशयों से पानी छोड़ दिया जाता है,जिसके कारण बाढ़ की स्थिति निर्मित होती है और जनजीवन के लिए खतरा उत्पन्न होता है। इससे अनेक गांव डूब जाते हैं,मकान बह जाते हैं,जानवर व आदमी भी बह जाते हैं। ऐसे समय में बांध से नदियां,जो पहले से ही भरी होती हैं,उनमें पानी छोड़ने के बजाय दूसरी तरफ नहर बनाकर छोड़ने से अतिरिक्त सिंचाई भी होगी और जन-धन की हानि से भी बचा जा सकेगा।

          ऐसे ही धमतरी जिले में स्थित गंगरेल (रविशंकर)बांध महानदी में बना है। वर्षा अधिक होने पर पानी छोड़ा जाता है,जिससे जबरदस्त बाढ़ की स्थिति बनती है और सर्वाधिक जन-धन की हानि होती है। ऐसे समय में इसके पानी को नदी में छोड़ने की बजाय बालोद जिले में स्थित तांदुला बांध में नहर बनाकर डाला जाये,क्योंकि तांदुला बांध पूरा भर नहीं पाता। इससे बालोद,दुर्ग और बेमेतरा के किसान अधिक सिंचाई कर पायेंगे। नदियों को नदियों से जोड़ने की तर्ज पर बांध को बांध से जोड़ा जाये,ताकि बाढ़ से बचा जाये और किसानों को सिंचाई सुविधा भी प्राप्त हो,ऐसा मेरा आग्रह है। सूखे की स्थिति से किसानों की फसलों का जो नुकसान हुआ है,उसका सर्वे कराकर क्षतिपूर्ति और मुआवजा प्रदान किया जाये और जिनका बाढ़ से नुकसान हुआ है,उन्हें भी मुआवजा दिया जाये।

          सभापति महोदया,आपने मुझे बोलने का समय दिया,उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                                                                     

*m17 *DR. A. SAMPATH (ATTINGAL): This is the not the first time during the last 5 years that we are discussing about the situation of floods and droughts.  We discuss and discuss, but the problem persists.  It has become a never ending phenomena.  Long back, it was heard even in this august House that “Indian agriculture is a gamble with the monsoons” and that gamble is still existing.

          The Indian subcontinent is blessed with the tropical climate but suffers from natural calamities and sometimes from man made calamities thereby increasing the number of casualities like we experienced in Uttrakhand last year.  For the last two-three days, my home State Kerala is experiencing high rainfalls and hence schools have been closed.

          It is said that in degree of priority the next best thing to a mother’s milk to a child is the natural rain water.  But do we tap and tune the most precious natural resource in the world?  The answer is no.  While we worship the God of rain or Godess rivers, we do not respect the water.  Neither we rationally or scientifically use this scarce natural resource.  The result is intermittent floods and droughts as well as depleting level of ground water.  This will definitely endanger the human habitations in near future.

          Drinking water is becoming a scarce commodity and this natural or free good in the words of economists has become an economic good very fast recently.  Imagine one litre of drinking water costs Rs. 20/- in the street vendors shop and we still discuss about the poverty line criteria of spending Rs. 32 a day in rural and Rs. 47 in urban areas as fixed by Rangarajan Committee.

          The latest Economic Survey Report claims that 82.7% of the rural households and 91.4% of urban households have access to safe drinking water.  But let me say madam that most of the taps remain empty during most of the day.  Access does not mean availability.

 

          The lack of infrastructure for harvesting the rain water and the half-hearted efforts to end the water pollution aggravates  the crisis of course, we may not be able to control the sudden climatic variations.  But we may be able to overcome the drought situations if we have the will power and people’s participation.  It has been alleged by various quarters that the incidence of floods and droughts are some of the green pastures for corruption and siphoning of the public money.

          If most of the floods and droughts can be forecasted why cant we not able to take maximum preventive steps in advance and also to prepare rehabilitation measure early?  Interlinking of rivers will not solve the problem.  Without adequate, scientific and ecological study, if we go for the much hyped inter-linking, that may invite the sea water into the mainland and thereby the salinity of the ground water along the coastal belt may go up.  This may lead to worsening of the drought situations as well as more scarcity of drinking water.  This may also adversely affect the agricultural crops along the 5000 km plus long coastal belt of at least ten States.  The fresh water flora and fauna may also face extinction.

          The need to preserve and conserve water and the scientific, nature-friendly way of cultivations should be encouraged.  More public expenditure is necessary in this field.  The disaster management schemes should be given proper emphasis.  It has to start from the bottom level like schools, panchayati raj institutions, women SHGs etc.  We have to give more priority for this sector under MNREGA.  This is a war .  A war for water and soil.  A war for our survival and for our future generation’s existence.

   

*m18 श्री राजेन गोहेन (नौगोंग) :  माननीय सभापति महोदया,आज बाढ़ और सूखे पर जो चर्चा हो रही है,उसमें मैं असम के बारे में बताना चाहूंगा। असम में बहुत सी नदियां हैं,लेकिन एक नदी,वह नदी न होकर नद है। देश भर में एक ही नद है,जिसे ब्रह्मपुत्र बोला जाता है। गंगा मैया शिवजी की जटा से निकल रही है,इसलिए हम उसे बहुत प्रेम और भक्ति से देखते हैं। ठीक उसी तरह ब्रह्मा का पुत्र ब्रह्मपुत्र है। आज ब्रह्मपुत्र नदी ने जिस तरह से भयंकर रूप धारण किया है,उसे हमने पहले कभी भी नहीं देखा। उस नदी की जहां चार-पांच किलोमीटर विड्थ होनी चाहिए,वह आज बीस-पच्चीस किलोमीटर विड्थ हो गयी है। इस नदी से कम से कम बीस-पच्चीस चैनल बहते हैं। इस हिसाब से हर चैनल से लाखों-हजारों लोग बेघर और लैंडलैस हो जाते हैं। इसे रोकने के लिए हमारी सरकार ने आज तक किसी तरह का कदम नहीं उठाया।

          सभापति महोदया,मैं कहना चाहता हूं कि फ्लड असम की एक परेनीअल प्रॉब्लम है। लोग  महीने भर तक उससे सफ़र कर सकते हैं,लेकिन जब एक परिवार का घर चला जाता है,तो उसके लिए यह बड़े दुख की बात होती है। आज काजीरंगा नैशनल पार्क की 40 से 60 हजार हैक्टेयर लैंड ईरोजन मे चली गयी है।  जिसके कारण आज वाइल्ड लाईफ का हैबिटेट एरिया बहुत कम होता जा रहा है। उस हिसाब से सारे असम में हर साल इतना इरोज़न हो रहा है,इसे रोकना चाहिए। हम नहीं रोक पाएंगे,ऐसी तो कोई बात नहीं है। आप देखें कि ब्रह्मपुत्र के तट पर एक मंदिर है,जिसका नाम उमानन्दा है। उस मंदिर को हजारों सालों से कुछ नहीं हुआ। उसका एक इंच जमीन भी इधर-उधर नहीं हुआ,वह वहीं पर खड़ा है। फिर हम क्यों इस इरोज़न को नहीं रोक पा रहे हैं?इसलिए मेरी सरकार से मांग है कि जितने भी छोटे-छोटे चैनल्स हैं,उनको डायवर्ट करके एक मेन चैनल बनाना चाहिए जिससे काफी जमीनों का रिक्लेमेशन भी हो जाएगा और उसे वाटरवेज़ के लिए भी हम लोग यूज़ कर सकते हैं। पहले भी वहाँ पर काफी जहाज चलते थे। आजकल तो ऐसा कुछ नहीं होता है। इसीलिए असम का यह जो विषय है,जो इरोज़न प्रोब्लम है,इस संबंध में माजुली गांव में तो कुछ काम हो रहा है,पर बाकी क्षेत्रों में काम नहीं हो रहा है। हम लोग देखते हैं कि जहाँ पर तट है,वहाँ पर तो नदी तीन से पाँच किलोमीटर में तो रहती है,लेकिन तट के बाद जो एरिया होता है उसमें उसकी चौड़ाई 20-25 किलोमीटर हो जाती है। इसको रोकना बहुत जरूरी है। इसलिए मैं सरकार से मांग करूँगा कि ब्रह्मपुत्र नदी को थोड़ी प्रेम और गंभीरता से ले,इस पुत्र को संभालना चाहिए,नहीं तो यह बहुत हंगामा करेगा जो सारे असम के लोगों के लिए बहुत बड़ा खतरा हो सकता है।

     

*m19 *श्री हरिभाई चौधरी (बनासकांठा) :  नियम 193 के अधीन देश में बाढ़ और सूखे की स्थिति के बारे में मैं अपने विचार व्यक्त करता हूं ।

          अपने देश में कृषि कुदरत के उपर निर्भर है ।  कई बार  भारी बारिस कई बार सूखा , कई बार ओले पड़ता है ।  उस समय किसानों का बहुत नुकसान होता है ।

          पिछले वर्ष मेरे संसदीय क्षेत्र में ओले के कारण किसानों का नुकसान हुआ था ।

          गुजरात में आज के प्रधानमंत्री और  पूर्व मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी साहब ने नदियों को जोड़ने का काम किया और सुजलाम सुफलाम योजना बनाया , नदियों के पानी का सदुपयोग किया, मैं आज सरकार से प्रार्थना करता हूं कि नदियों को जोड़कर गुजरात की  सुजलाम सुफलाम योजना बनाया जाये  ताकि सब को फायदा पहुंचे ।

     

*m20 श्री नाना पटोले (भंडारा-गोंदिया) : माननीय सभापति महोदया, श्रद्धेय योगीनाथ जी, जिन्होंने इस सदन में बाढ़ और सूखे पर चर्चा लायी है, आज पूरे देश में जो स्थिति पैदा हुई है, इस विषय में सम्पूर्ण चर्चा होकर उसके बारे में आज निर्णय होना चाहिए। यह सदन की और इस देश की जनता की भी अपेक्षा है। आदरणीय श्री मोदी जी, जो हमारे देश के लाडले प्रधानमंत्री हैं, उनके मंत्रिमंडल में जो कृषि विभाग के मंत्री हैं श्री राधा मोहन सिंह जी, इसमें भी भगवान श्री कृष्ण का नाम है, हमारी जो जल संसाधन मंत्री हैं सुश्री उमा भारती जी, इसमें भी भगवान शंकर का नाम है। हमारी संस्कृति के ये दोनों भगवान हैं, जो हमारे देश की रक्षा के लिए और मानव जाति के कल्याण के लिए इस देश में कई आविष्कार किये हैं। आपके माध्यम से मैं महाराष्ट्र की बात रखना चाहूँगा। महाराष्ट्र के पूना में भूस्खलन हुआ और वहाँ पर कई लोग मर गये। एक तरफ महाराष्ट्र में वर्षा हो रही है और मराठवाड़ा की तरफ आएं, तो वहाँ पर बारिश नहीं है। विदर्भ के इलाकों में से कुछ में बारिश है, कुछ में नहीं है। निश्चित रूप से मौसम का जो मिजाज है, वह पूर्णतः एक समान नहीं है। देश में कहीं बारिश है, तो कहीं सूखा है, ऐसी स्थिति हम लोग देख रहे हैं। बार-बार कहा जा रहा है कि आने वाला जो महायुद्ध होगा, वह सिर्फ पानी के लिए होगा। ऐसे समय में पानी की समस्या को हल करना ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेवारी बनती है। हमारे देश में जितना भी पानी गिरता है, उस पानी को हमें रोककर हमारे किसानों तक पहुंचाना होगा। हमारे देश में पीने के पानी का संकट न आए, ऐसी व्यवस्था करने का समय आज हमारे हाथ में है। हम इसको और ज्यादा समय तक खीचेंगे, तो निश्चित रूप से आने वाले दिनों में इस देश में और दुनिया में पानी के लिए महायुद्ध होना निश्चित है।

          सभापति महोदया,मैं बताना चाहूंगा कि मैं भंडारा-गोंदिया क्षेत्र से चुनकर आता हूं।...(व्यवधान)वहां पर गोसीखुर्द प्रकल्प,जिसे नेशनल प्रकल्प घोषित किया गया है,की शुरूआत वर्ष 1983 में हुई। 372 करोड़ रुपये का प्रावधान उस प्रकल्प को पूरा करने के लिए किया गया था,लेकिन आज 34 वर्ष बीत गए हैं,दो पीढ़ियां चली गयी हैं,अभी तक वह प्रकल्प पूरा नहीं हुआ है। हम जो भी प्रकल्प हाथ में लेते हैं,हमें उसकी मर्यादा डिसाइड करनी चाहिए,चाहे वह राज्य सरकार का प्रकल्प हो या केन्द्र सरकार का हो। जब तक हमने इसको डिसाइड नहीं किया,उसमें लगने वाली निधि उपलब्ध नहीं करा दी,तो वह वैसे ही चलता रहेगा और वह भ्रष्टाचार का केन्द्र बन जाता है। आज स्थिति पैदा हो गयी है कि हम वहां के लोगों का,किसानों का पुनर्वसन नहीं कर सके,वहां की सरकार ने भ्रष्टाचार के माध्यम से गोसीखुर्द को भ्रष्टाचार का केन्द्र बना लिया है। सीडब्ल्यूसी जो केन्द्र सरकार की संस्था है,उसकी एक कमेटी ने यह रिपोर्ट दी है कि केन्द्र सरकार ने उस प्रकल्प के लिए जो पैसे दिए,उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। आज भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ...(व्यवधान)मैं बताना चाहता हूं कि देश में इस तरह के जो भी प्रकल्प बनते हैं,वे पानी रोकने के लिए बनते हैं या भ्रष्टाचार के लिए बनते हैं। हम किसान के लिए उनको बनाते हैं या किसान को बर्बाद करने के लिए बनाते हैं। आज इस विषय में कोई निर्णय लेने की जरूरत है। जब तक हम लोग किसी ठोस पर नहीं पहुंचेगे,चर्चा से लाभ नहीं होगा। मैं इससे पहले कई वर्षों तक महाराष्ट्र असेम्बली में रहा हूं,वहां पर ऐसी ही चर्चा होती है। चर्चा व्यर्थ न जाए,चर्चा के माध्यम से हम देश की जनता को न्याय दे सकें,इस तरह से काम होना चाहिए।...(व्यवधान)निश्चित रूप से माननीय नरेन्द्र जी की सरकार जो आज काम कर रही है,इसे पूरा करेगी।

HON. CHAIRPERSON : Nothing will go on record.

(Interruptions) … * HON. CHAIRPERSON: Shri Prem Singh Chandumajra.

PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): Madam, I want to raise a Point of Order. 

HON. CHAIRPERSON: Under what Rule?

PROF. SAUGATA ROY : Madam my Point of Order is under Rule 376 and it is with regard to Rule 25.

          Madam, at 3.30 p.m. Private Members’ Business will start.  The week’s business is coming to an end.  It is the rule that the list of Government Business for the coming week is announced. We raise our objections to the lack of it. The Government is running in such a way that on Friday even at 3.25 p.m, there is no list of Government Business for the next week.  Nobody knows that what business will be transacted next week. 

HON. CHAIRPERSON: It is not mandatory for the Minister of Parliamentary Affairs to make a statement on Government Business.  It is only a convention. 

           

*m21 श्री प्रेम सिंह चन्दूमाजरा (आनंदपुर साहिब) : अध्यक्ष महोदया, बाढ़ और सूखे की स्थिति पर जो चर्चा हो रही है, शिरामणि अकाली दल की तरफ से मैं उसमें शामिल हो रहा हूं। यह चर्चा 60 वर्ष से हो रही है, उपाय भी किए जा रहे हैं, मगर सच यह कि बाढ़ से होने वाला नुकसान और सूखे से होने वाला नुकसान बढ़ता जा रहा है। इसका कारण मैं यह समझता हूं कि नुकसान को रोकने के लिए कोई परमानेन्ट स्कीम नहीं बनती है, टेम्परेरी अरेंजमेंट होते है। उसका कारण पोलिटिकल भी है, ज़ाती और ज़माती भी है। उसमें मैं नहीं जाना चाहता हूं। मैं अपने प्रदेश पंजाब की बात करना चाहता हूं। जहां देशभर में सबसे कम बारिश हुई है - 58 प्रतिशत। सूखा दो तरह का है, कई जगह बुआई नहीं हुई, कई जगह बुआई हो गयी, फसलों को नहीं संभाला जा सका। उसके जो पैरामीटर्स हैं, उनके हिसाब से मुआवजा दिया जाता है, मगर पंजाब और हरियाणा में सबसे कम बारिश हुई है, मगर सबसे अच्छी फसल है। आज देश में सबसे अच्छी फसल पंजाब में हुई है। उसका कारण यह है कि वहां के किसानों ने 1520 करोड़ रुपए की अतिरिक्त बिजली खर्च की है, 700 करोड़ रुपए का डीजल खर्च किया है और 300 करोड़ रुपए उन्होंने टय़ूबवैल्स को गहरा करने में खर्च किए हैं। इस बारे में हमारे मुख्य मंत्री जी ने केन्द्रीय मंत्री जी को रिपोर्ट दी है। लेकिन अखबार वालों ने माननीय मंत्री जी का बयान छापा कि हमारे पास कोई रिपोर्ट नहीं आई है। हमें इस बात का खेद है। हमारे राज्य के किसान सेंट्रल पूल के लिए 90 प्रतिशत पैदावार की है और खुद हमारे यहां दस प्रतिशत ही खपत होती है। जब हम देश के लिए अनाज पैदा करते हैं तो मैं निवेदन करूंगा कि पंजाब को विशेष पैकेज के रूप में 2350 करोड़ रुपए दिए जाएं। इसके अलावा वहां फसल का नुकसान होने पर 3500 रुपए प्रति एकड़ है,वह बहुत ही कम है। उस बढ़ाकर 20,000 रुपए प्रति एकड़ कम से कम किया जाए।

          मैं एक बात बाढ़ की स्थिति पर भी कहना चाहूंगा। मेरा संसदीय क्षेत्र आनंदपुर साहिब है,वह पहाड़ों के नीचे है। वहां पर पहाड़ों का पानी आ जाता है और नदियों में सिल्ट आ जाती है। सिल्ट निकालने के लिए माइनिंग डिपार्टमेंट अनुमति नहीं देता। मैं माइनिंग डिपार्टमेंट और जल संसाधन मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि डीसिल्टिंग का प्रोजेक्ट वहां शुरू किया जाए। यह 288 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट है,जिसकी योजना बनाकर केन्द्र को भेजी गई है। वह पैसा हमें जल्द से जल्द दिया जाए। हिमाचल प्रदेश ने चैनलाइज कर दिया,पंजाब का हिस्सा बच गया है,जिससे पंजाब को नुकसान होता है। इसलिए उस प्रोजेक्ट के लिए हमें पैसा दिया जाए।

 

*m22 डॉ. सत्यपाल सिंह (बागपत) : सभापति महोदया,मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। मैं आज के विषय पर तीन-चार मुद्दे सदन के सामने रखना चाहूंगा। हजारों-लाखों सालों से हमारे पूर्वज यह कहते आए हैं- “यथा पिण्डे,तथा ब्रह्मांडे।” अर्थात् जैसा व्यक्ति के शरीर में होता है,वैसा ही दुनिया में होता है। जब शरीर का अनुशासन बिगड़ जाता है तो कभी उसमें हाई ब्लड प्रेशर होता है,कभी डिप्रेशन होता है और अलग-अलग तरह की बीमारियां होंती हैं। इस देश के अंदर जब से हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना शुरू किया,तब से कहीं बाढ़ आती है और कहीं सूखा पड़ता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि जो हमारे डवलपमेंट प्लानर्स हैं,जो विकास के काम देखते हैं,तो पहले स्कूल और कालेज के विद्यार्थियों को यह बताया जाए कि इन व्यक्तियों में,समष्ति में और सृष्टि में एक सिम्बायोटिक रिलेशनशिप यानि अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।

          मैं एक मुख्य बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। पहले हमारे देश में जब आर्गेनिक खेती होती रही,जैविक खेती होती रही,तब तक पानी की आवश्यकता खेतों में बहुत कम थी। तब अगर गेहूं की खेती के लिए तीन बार पानी की जरूरत पड़ती थी,आज कम से कम पांच या छः बार जरूरत पड़ती है। अभी हमारे माननीय सदस्य पंजाब की बात कर रहे थे। हम इतना पेस्टिसाइड्स,फर्टिलाइजर यूज करते हैं कि उससे खेतों में पानी देने की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है। दूसरी बात यह हुई है कि एक तो जल स्तर बहुत नीचे चला गया और दूसरे बीमारियां काफी पैदा होने लग गई हैं। एक अमेरिकन लेडी प्रोफेसर ने किताब में लिखा है -How the other half dies. उसमें उन्होंने बताया है कि इंडियन एग्रीकल्चर की पालिसी तैयार हुई है,वह किस प्रकार से तैयार हुई है। किस प्रकार से आधे लोगों को भूखा मारा जा रहा है। हमारी एग्रीकलचर पालिसी कितनी गड़बड़ है,इस पर हमें ध्यान देना चाहिए।

          यह दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के 67 साल बाद भी हमारा पेस्टिसाइड एक्ट है, 350 पेस्टिसाइड्स मोलीक्यूल बनाए गए,लेकिन आज तक एक भी इंडियन मोलीक्यूल इस देश में डवलप नहीं किया गया। इसके पीछे एक बहुत बड़ा षडय़ंत्र है। इसलिए इस पेस्टिसाइड एक्ट को सही करने की जरूरत है।

          इंडियन इंस्टिटय़ूट आफ डिसास्टर मेनेजमेंट की रिपोर्ट है,जिसमें उन्होंने बुंदेलखंड के बारे में कहा है। उसमें कहा है जो डिसास्टर्स होते हैं,वे क्लाइमेटिक चेंज के कारण नहीं हैं,इसके पीछे व्यक्ति कारण है,ये मैन मेड हैं। एक बहुत अच्छी किताब आई है। Shri P. Sainath has written a book by name “Let Us Have a Good Drought.” जितना अच्छा सूखा पड़ेगा,उतना ही अच्छा है। जो ब्यूरोक्रेट्स हैं,कुछ नेता हैं,जो इस काम में लगे हुए हैं,हमें चेंज करने की जरूरत है।

          मेरे बागपत संसदीय क्षेत्र में जिस प्रकार से युकिलिप्टस का प्लांटेशन किया गया है,उससे जमीन के पानी का स्तर कम से कम दस मीटर और नीचे चला गया है। हमें सोचने की जरूरत है कि किस प्रकार का प्लांटेशन किया जाए,किस प्रकार के टय़ूबवैल्स और बोरवैल्स बनाए जाएं कि पानी का जब इतना ज्यादा दोहन होता है कि वह बहुत नीचे चला गया। इससे मेरे क्षेत्र बागपत में छः ब्लाक्स में से पांच ब्लाक्स डार्क जोन हो गए हैं। अभी कोई नया कनेक्शन नहीं मिल रहा है। एक तरफ सूखा पड़ता है,दूसरी तरफ लोगों को कनेक्शन नहीं मिलता है। जिन लोगों के पास कनेक्शंस हैं,उनसे प्रदेश सरकार बागपत में कहती है...(व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: Please conclude. It is going to be time for the Private Members’ Business. 

 डॉ. सत्यपाल सिंह : मैडम मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। गीता में यह लिखा हुआ है और सब लोग इस बात से सहमत होंगे कि अच्छे बादल जो बनते हैं वे यज्ञ से बनते हैं, अच्छे बादल नहीं होंगे तो अच्छी बारिश कैसे हो सकती है? जब वातावरण शुद्ध होगा तो बीमारियां दूर होंगी,अच्छी फसलें होंगी और अच्छे बादल भी बनेंगे।

                                                                                               

SHRI MALLIKARJUN KHARGE (GULBARGA): Madam Chairman, will the hon. Minister tell us what would be the business in the House next week? We are unable to know what would be discussed on Monday and which Bills would be considered. The Members have to prepare themselves in advance in order to be able to present their own case on the Bills or other matters that would be taken up. Neither a meeting has been called today nor are we being informed of the next week’s agenda. How should we proceed in such a situation? … (Interruptions)

If we raise a point of order under Rule 25, you say it is not mandatory, it is only a convention. You do not follow convention, you do not follow rule. Then what should be done, please tell us? … (Interruptions)

PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): The Minister of State for Parliamentary Affairs is sitting here quietly. Let him make a statement. … (Interruptions) How can the House run this way? Let him call a senior Minister. … (Interruptions)

*t38 Title: Further discussion on resolution regarding implementation of recommendations of National Commission on Farmers moved by Shri Raju Sheeti on 18.07.2014 (Discussion not concluded).

   

HON. CHAIRPERSON : Now, let us take up Private Members’ Resolutions.  Shri Raju Shetti to continue.

श्री राजू शेट्टी (हातकणंगले) : सभापति महोदया, मैं डॉ. स्वामीनाथन कमीशन की जो सिफारिश है, उस पर अमल करने के बारे में एक गैर-सरकारी प्रस्ताव पर बोल रहा हूं। मुझे पूरे देश के किसानों की बात सदन में रखनी है, इसलिए मैं आपका संरक्षण चाहता हूं।

          सभापति महोदया, इस देश में किसानों द्वारा आत्महत्याएं आज भी हो रही हैं। उसका कारण है कि किसानों को लागत मूल्य से भी कम दाम मिल रहे हैं, उनकी खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है, इसलिए किसानों की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। वर्ष 2008 में किसानों के लिए सरकार ने 73,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी की घोषणा की। लेकिन इस ऋण माफी का फायदा घोटालेबाजों ने ही ज्यादा उठाया। जो किसान ईमानदारी से खेती करता था, इस ऋण माफी का फायदा उस तक नहीं पहुंचा।   यूपीए सरकार ने 73,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी का ढोल तो खूब पिटवाया, लेकिन पिछले हफ्ते जब मैंने वित्त मंत्री जी से एक सवाल पूछा था कि देश के किसानों के लिए असल में ऋण माफी कितनी हुई है तो उन्होंने जवाब दिया कि इस देश के किसानों को सिर्फ 52,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी हो चुकी है। इसका मतबल यह है कि उसमें भी 20,000 करोड़ रुपये का फर्क है। पिछले 8 सालों से पिछली सरकार कह रही थी कि हमने किसानों को बहुत मदद की है।

          सभापति महोदया, 13 दिसम्बर 2013 में सदन में एक अतारांकित प्रश्न पूछा गया और उसका मंत्री महोदय ने जवाब दिया कि वर्ष 2008 में ऋण माफी होने के बावजूद 2008 से 2012 तक इस देश में, पांच सालों में ही 77499 किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसका मतलब यह हुआ कि ऋण माफी के बाद भी किसानों की आत्महत्याएं कम नहीं हुई हैं।

          सभापति महोदया, पिछले दिनों विदर्भ के 90 किसान दिल्ली आये थे। उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति जी को अर्जी लिखी कि हमें इच्छा मरण की परमिशन दीजिए क्योंकि हमारी खेती घाटे में जा रही है। हमें मार्केट प्राइज नहीं मिलता है। जब भी कहीं अनाज के दाम बढ़ते हैं तो सरकार हस्तक्षेप करके रेट कम करवाती है और जब उत्पादन बढ़ता है और सप्लाई ज्यादा हो जाती है तथा रेट कम हो जाते हैं तब सरकार किसानों की मदद के लिए आगे नहीं आती है। इस देश के किसानों को लागत मूल्य से कम मिलता है,इसका कारण उन्हें न बुनियादी साधन मिल रहे हैं और न ही भंडारण क्षमता है,न कोल्ड स्टोरेज है। हमारे देश में प्री हार्वेस्टिंग और पोस्ट हार्वेस्टिंग में जो नुकसान होता है वह हर साल 44 हजार करोड़ रुपयों का होता है क्योंकि हमें जो तकनीकी सहायता किसानों को देनी चाहिए थी,वह नहीं दी है इसलिए किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हमारे किसानों ने पिछले दस साल में उत्पादन में काफी वृद्धि की है लेकिन जीडीपी में हमारे कृषि क्षेत्र का जो हिस्सा था,वह बीस प्रतिशत से 17 प्रतिशत पिछड़ गया है। इसका मतलब कि हम उत्पादन बढ़ा रहे हैं लेकिन उसका सही हिस्सा किसानों को नहीं मिल रहा है और इसी कारण किसान घाटे में जा रहा है। किसानों की लागत मूल्य दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके कारण किसान मार्केट से जो उर्वरक खरीदता है,उनकी कीमतें उनके हाथ में नहीं है। यह देश की नीति तय करती है कि उर्वरकों की कीमतें क्या होंगी। किसान को बाजार मूल्य से उर्वरक खरीदने पड़ते हैं। डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। बिजली की कीमतें बढ़ रही हैं। कीटनाशकों की कीमतें बढ़ रही हैं। बीज भी महंगे मिलते हैं और साथ ही साथ मजदूरी भी बढ़ रही है। इस हिसाब से अगर पिछले दस सालों में किसानों ने अनाज का जो उत्पादन किया है,उस अनाज का दाम इस अनुपात से नहीं बढ़ा है। इसी कारण आज खेती घाटे में जा रही है।

          महोदया,सैंट्रल इंस्टीटय़ूट आफ पोस्ट हार्वेस्टिंग इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी ने सरकार को वर्ष 2015-16 के लिए सुझाव दिया है कि देश के किसानों को अगर कोल्ड स्टोरेज की सुविधा देनी है तो कम से कम 55 हजार करोड़ रुपयों की आवश्यकता होगी क्योंकि आज इस देश में सिर्फ चार राज्यों में कोल्ड स्टोरेज की सुविधा मिलती है और 24 राज्यों में किसानों को कोल्ड स्टोरेज की सुविधा न मिलने के कारण उनका बहुत बड़ा नुकसान होता है। इसका मतलब यह है कि किसान मेहनत करता है और जो उत्पादन करता है वह उत्पादन मार्केट तक सुरक्षित तरीके से नहीं पहुंचता है। उसमें बहुत नुकसान होता है। किसान के पास भंडारण क्षमता नहीं है और इस कारण जब सभी किसान एक-साथ मार्केट में जाते हैं तो बाजार का भी एक नियम है कि जब एक साथ सप्लाई डिमांड से ज्यादा होती है तो कीमतें गिरती हैं। जब मार्केट में तेजी आती है तो सरकार हस्तक्षेप करती है और किसानों को मार्केट मूल्य नहीं मिलने देती है। आज की तिथि में आलू हो या प्याज हो,इसका निर्यात मूल्य बढ़ाया,इसके ऊपर सरकार ने कंट्रोल किया,लेकिन सरकार यह नहीं सोचती है कि आलू और प्याज महंगा क्यों हुआ है।

          दो महीने पहले तक इस देश में जो बारिश हुई थी और जो ओले गिरे थे,उसके कारण किसानों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ था और बेचने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा। इसलिए डिमांड -सप्लाई नियम के तहत आज तेजी आ गई है। जो किसानों का नुकसान हुआ था,उसका मुआवजा किसानों को नहीं मिला। किसान जो सोचते थे कि मुझे ज्यादा पैसा मिलने वाला है,वह पैसा देने के लिए सरकार तैयार नहीं है। कीमतें जब गिरती हैं तो किसानों को नसीब के हवाले करके सरकार देखती रहती है क्योंकि इसी सदन में मैंने एक मुद्दा उठाया था कि जब किसान आलू और प्याज सड़क पर फेंक रहे थे,उस वक्त सरकार ने कोई मदद नहीं की थी।

          इसी तरह से जब दूध के मामले में समस्या आ रही थी तो देश का किसान दूध का क्या करें,क्योंकि सरकार ने कुछ मदद नहीं की लेकिन जब मिल्क पाउडर के रेट बढ़ गये तो एक्सपोर्ट करना शुरु कर दिया। जब चीनी महंगी होती है,जब अन्तर्राष्ट्रीय मार्केट में चीनी के दाम बढ़ते हैं तो सरकार एक्सपोर्ट को बैन कर देती है। लेकिन जब दाम गिरते हैं तो किसानों की कोई मदद नहीं करता और यही कारण है कि आज किसानों की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि आज किसान महामहिम राष्ट्रपति जी से कह रहा है कि हमें इच्छामरण की इजाजत दे दीजिए। यह बहुत ही गंभीर मामला है। इस देश में अगर बुनियादी ढांचा बनाना है तो इस देश में कृषि के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

          हमारे प्रधान मंत्री जी जब चुनाव रैली में महाराष्ट्र और पंजाब में गये थे तो उन्होंने आश्वासन दिया था कि अगर हमारी सरकार सत्ता में आती है तो इस देश के किसानों को हम मरने नहीं देंगे,हम आत्महत्या नहीं करने देंगे। हम इस देश के किसानों को लागत मूल्य का पचास प्रतिशत मुनाफा देंगे। इस तरह का ऐलान मोदी जी ने महाराष्ट्र और पंजाब में किया था। इसीलिए मैं आज यहां प्रस्ताव रख रहा हूं कि मोदी जी ने जो किसानों को जो आश्वासन दिया था,वह आश्वासन पूरे करने का आज वक्त आ गया है। लेकिन बड़े दुख से इस सदन में मैं बताना चाहता हूं कि एक तरफ हमारे प्रधान मंत्री जी ने कहा कि इस देश के किसानों को हम लागत मूल्य का पचास प्रतिशत मुनाफा दे देंगे और दूसरी तरफ हमारे कृषि मंत्री जी ने जो समर्थन मूल्य की पिछले महीने घोषणा की,वह  1360 रुपये कर दिया जो पिछले साल की तुलना में केवल 50 रुपये ज्यादा था। ज्वार 1530 रुपये कर दिया जो पिछले साल की तुलना में 30 रुपये ज्यादा है। बाजरा में कुछ भी नहीं बढ़ाया। 1530 रुपये रखा। सोयाबीन में कुछ भी नहीं बढ़ाया। मेज़ 1310 रुपये रखा। अरहर 4350 रुपये किया लेकिन 50 रुपये ही बढ़ाया । उड़द 4350 किया। कपास 3750 कर दिया। सिर्फ 50 रुपये ही बढ़ाया। मूंगफली का दाम 4000 रुपये ही रखा। गेहूं 1400 रुपये कर दिया। सिर्फ 50 रुपये ही बढ़ाया। अगर यह प्रतिशत में निकाला जाए तो यह सिर्फ एक या दो प्रतिशत बढ़ोतरी है। कहां पचास प्रतिशत बढ़ोतरी करने की बात प्रधान मंत्री जी ने कही थी और कहां कृषि मंत्री जी ने केवल समर्थन मूल्य बढ़ाया है। इसका मतलब इस देश के किसानों को ऐसा लग रहा था कि अगर देश में सत्ता परिवर्तन हो गया है तो इसका मतलब यह है कि किसानों के लिए अच्छे दिन आएंगे। लेकिन इस तरह से एक या दो प्रतिशत समर्थन मूल्य बढ़ाने से कोई अच्छे दिन नहीं आएंगे। बल्कि आत्महत्या करने वालों की संख्या और बढ़ने लगी है।

          मैं माननीय मंत्री जी से एक सवाल पूछना चाहता हूं कि यह जो एक और दो प्रतिशत समर्थन मूल्य इन्होंने बढ़ाया,इसके पीछे क्या ईक्वेशन है?  किस तरह से इसका अध्ययन किया गया?अगर डीजल की कीमतें बढ़ गईं,अगर उर्वरकों की कीमतें बढ़ गईं,अगर मजदूरी बढ़ गई तो एक प्रतिशत समर्थन मूल्य हमारा किस तरह से बढ़ता है? सरकार रेल चलाती है,रेल का किराया 15 परसेंट बढ़ जाता है,एमएसपी कैसे एक परसेंट बढ़ जाता है?इसका जवाब मंत्री महोदय को देना होगा। मैं मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि लागत मूल्य निकालने का तरीका क्या है?मैं किसान नेता होने के नाते कहना चाहता हूं कि सरकार पहले जवाब ढूंढती है और उसके बाद इक्वेशन करती है। सरकार पहले यह तय करती है कि किसानों को कितना देना है और उसके बाद इक्वेशन करती है। सी वन,सी टू कितना है,इसके बारे में किसी को पता नहीं है। इस देश के 62 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर है। देश में उपज का समर्थन मूल्य फिक्स करने वाले लागत एवं मूल्य आयोग में केवल 35 लोग हैं। यही 35 लोग तय करते हैं कि इस देश के किसानों का भविष्य क्या होगा और उपज का समर्थन मूल्य क्या होगा?इनके पास कोई डाटा नहीं है। धान का समर्थन मूल्य 1307 रुपए है। राज्य और केंद्र सरकार के बहुत से इंस्टीटय़ूशन्स हैं,सोशल संस्थाएं हैं। मैं मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि क्या किसी भी इंस्टीटय़ूट में इस तरह का पेपर है?क्या इन लोगों ने धान उगाया या बोया है जो लागत मूल्य का हिसाब लगा लेते हैं। अगर है तो मुझे एक पेपर अध्ययन करने के लिए दीजिए ताकि मैं अपने राज्य के किसानों से कह सकूं कि इस तरह से खेती कीजिए,यह फायदे की खेती है,भारत सरकार में सरकारी बाबू जो बहुत सैलेरी लेते हैं,अगर वे इस तरह से कम पैसे में खेती कर सकते हैं तो किसान भी कर सकते हैं। इसकी टेक्नोलॉजी क्या है?क्या तरीका है?उन्होंने किस तरह के बीज बोए?किस तरह की जमीन थी?इसका भी हम अध्ययन करेंगे। लेकिन किसी भी जगह इनका डेमोंस्ट्रेशन प्लॉट नहीं है। क्यों नहीं है?सरकार के पास जमीन है। सरकार के पास कृषि विश्वविद्यालय है तो फिर क्यों इस तरह का कोई एक्सपेरिमेंट नहीं होता?क्यों इस तरह का डेमोंस्ट्रेशन प्लॉट नहीं होता?यह होना चाहिए ताकि किसान आकर देख सकें कि किस तरह से खेती की जाए कि लागत मूल्य कम हो जाए। इसे करने के लिए सरकार के पास वक्त नहीं है। सरकार खेती के नाम पर राजनीति कर रही है।

       महोदया,मैं इस सदन में दूसरी बार आया हूं। पिछले पांच साल से मैं सदन में बार-बार पूछता रहा हूं कि फूड कारपोरेशन आफ इंडिया में अनाज इकट्ठा होता है,उसका हिसाब कहां है?इसका एकाउंट कैसे देखते हैं?इसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिला है। कितना अनाज इकट्ठा होता है?कितना सड़ जाता है?कितने चूहे खा जाते हैं?कितना अनाज सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के जरिए गरीब लोगों तक पहुंचता है?हम इसका हिसाब मांगते हैं। किसान कम दाम में सरकार को अनाज देते हैं लेकिन वह अनाज भी गरीबों तक नहीं पहुंचता है। जब हम सवाल पूछते हैं तो जवाब मिलता है कि चूहों ने बहुत अनाज का नुकसान कर दिया। मैं सवाल पूछना चाहता हूं कि चूहे कौन से हैं,सफेद चूहे हैं या काले चूहे हैं?मुझे मालूम है ये सब सफेद चूहे हैं और किस तरह से किसानों का अनाज खा रहे हैं,शोषण कर रहे हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसान फसल उगाता है,अनाज की कीमतें कंट्रोल करने की बात होती है। इस सदन में महंगाई पर चर्चा होती है। मैंने कभी सुना नहीं कि टूथपेस्ट महंगी हो गई इसलिए किसी ने मोर्चा निकाला। मैंने अखबार में पढ़ा नहीं है कि पेट्रोल,डीजल की कीमतों के विरोध में किसी ने मोर्चा निकाला। मैंने कभी पढ़ा नहीं कि छात्रों की फीस बढ़ गई इसलिए किसी ने मोर्चा निकाला। लेकिन अगर गेहूं एक रुपये भी महंगा होता है तो मोर्चा निकल जाता है। अगर चीनी एक रुपये महंगी होती है तो मोर्चा निकल जाता है। अगर टमाटर एक रुपया महंगा होता है तो मोर्चा निकलता है। हमारे देश की एक परम्परा है,अगर देवताओं को खुश करना है तो किसी न किसी की बलि देनी पड़ती है। इसलिए सरकार क्या करती है कि महंगाई के खिलाफ बोलने वालों को खुश करने के लिए,उन्हें शांत करने के लिए किसानों की बलि चढ़ा दी जाती है,क्योंकि किसान बेचारा कोई प्रतिकार नहीं कर सकता। हमारी परम्परा है,देवताओं को मुर्गे या बकरे की बलि दी जाती है। शेर की बलि कभी किसी ने दी है,यह मैंने कभी सुना नहीं। क्योंकि शेर खुद आक्रमण करता है,इसलिए शेर की बलि कोई नहीं देता। अगर नरबलि दी जाती है तो छोटे बच्चों या महिलाओं की बलि दी जाती है,किसी वस्ताद की नरबलि कभी नहीं दी जाती है। इसी तरह से इस देश में जब-जब महंगाई पर चर्चा होती है,उस वक्त सिर्फ किसानों की बलि दी जाती है,लेकिन किसान किस हालत में जी रहा है,इसके बारे में कोई कुछ नहीं सोचता है। किसानों के उर्वरकों की कीमतें बढ़ रही हैं और किसान किस तरह से खेती करेगा,इस बारे में कोई नहीं सोचता है। अगर किसानों का लागत मूल्य कम करना है तो उन्हें बुनियादी सुविधा देनी चाहिए। आज पूरे देश के किसानों के पास जो खेती है,उस खेती के आधार पर यदि हम देखें तो यूरिया सबसे सस्ता मिलता है,इसीलिए किसान सबसे ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करता है,जबकि सुपर फास्फेट,पोटाश महंगा पड़ता है और इस तरह से कुछ विकृतियां पैदा हो गई हैं,जिसके कारण फसलों का उत्पादन कम होता है। लेकिन इसके बारे में हम किसानों को कुछ कहने के लिए तैयार नहीं हैं। आज मैं मोदी जी का अभिनंदन करता हूं कि उन्होंने पहली बार किसान हैल्थ कार्ड की बात की है,क्योंकि किसानों को भी पता चलना चाहिए कि मेरी जमीन में किस चीज की आवश्यकता है,मुझे कौन सा उर्वरक देना चाहिए और मिट्टी में आर्गेनिक खाद कम है,अगर उर्वरकों का खर्चा कम करना है तो किसानों के लिए गोबर और उनके घरों में पशु होने की आवश्यकता है। लेकिन किसान पशु पाल नहीं सकता,क्योंकि आज पशु पालना इतना आसान नहीं है। पशुओं का जो खर्चा है,दूध का जो लागत मूल्य है,वह निरंतर बढ़ता जा रहा है। इसलिए दूध का उत्पादन नहीं मिलता और पशु न होने के कारण जो आर्गेनिक मैटिरियल मिट्टी में जाना चाहिए,वह नहीं जा रहा है। इसलिए उर्वरकों की डिमांड बढ़ रही है। इसलिए इन सब बातों पर विचार करके हमें कुछ नीति बनाने की जरूरत है,लेकिन यह नहीं हो रहा है। दुर्भाग्यवश खेती के बारे में ऐसे लोग बातें करते हैं,जिन्हें खेती से कुछ लेना-देना नहीं है। इस क्षेत्र में कुछ ऐसे लोग हैं,जिन्हें किसानों के खेत खरीदने हैं और किसानों के खेत खरीदकर वहां बड़े-बड़े टावर खड़े करने हैं। लेकिन किसानों को मदद करने के बारे में आज कोई बात नहीं कर रहा है।

          महोदय,इसलिए मैं इस सदन से मांग करता हूं कि डा.स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को हमें तुरंत लागू करना चाहिए। क्योंकि हम इसी सदन में इस देश के गरीब लोगों के लिए अन्न सुरक्षा का बिल पास कर चुके हैं। अगर उन्हें अनाज देना है तो किसानों को खेती करनी चाहिए। अगर इस देश का किसान खेती करना छोड़ देगा तो 121 करोड़ जनता को खाने के लिए विश्व का कोई भी मार्केट इतना अनाज नहीं दे सकता। इसलिए गांवों में खेती करने वाले जो किसान हैं,उन्हें गांवों में खेती करनी चाहिए और उसके लिए उनकी मदद करनी चाहिए।

          इसके अलावा मैं आपको एक बात और कहना चाहता हूं कि पिछले हफ्ते मेरे पास एक किसान आया था। उसने कहा कि मेरे दो बच्चों की कालेज की फीस देनी है,लेकिन मेरें पास पैसा नहीं है। उसके बाजू में एक डिप्टी कलक्टर रहता है,उसकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी थी और वह किडनी के लिए डोनर ढूंढ रहा था। उस किसान ने मुझे कहा कि मुझे किडनी डोनेट करने के लिए परमीशन दिलवा दीजिए,ताकि जो डिप्टी कलक्टर है,वह उसके बदले में मेरे दोनों बच्चों के कालेज की फीस देने के लिए तैयार है।

          सभापति महोदया,इस देश के किसानों को अपने बच्चों की पढ़ाने के लिए अगर किडनी बेचने की परिस्थिति निर्माण होती है,तो गंभीरता से सोचना चाहिए कि हम कहां जा रहे हैं। जब हम खेती के ऊपर निर्भर थे,तब विश्व में हमारी बड़ी अर्थव्यवस्था थी। आज जीडीपी में हमारा हिस्सा 17 प्रतिशत तक गिर चुका है। 62 प्रतिशत लोग खेती पर आज भी निर्भर हैं। गांव से एक-एक बंदा आज शहर की तरफ आ रहा है। शहर की गंदी नाली में रहने लगा है। इसलिए हमें सोचना चाहिए कि खेत में काम करने वाला जो किसान है,उसके पीछे सरकार को और इस सदन को रहने की आवश्यकता है। अगर पिछले पांच साल में 77 हज़ार किसान आत्महत्या करते हैं,सभापति महोदय,मैंने भी थोड़ी बहुत हिस्ट्री पढ़ी है। विश्व में कहीं भी इतनी बड़ी तादात में आत्महत्याएं नहीं हुई हैं। अकेले किसान एक-एक कर के आत्महत्या कर रहे हैं,इसलिए इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। अगर एकसाथ इतने लोग मारे जाते तो उसके ऊपर पूरे विश्व में चर्चा हो रही होती।

          सभापति महोदय,जब कोई बंग्लादेश से निर्वासित हो कर आता है तो हम चर्चा करते हैं,कोई तिब्बत से निर्वासित हो कर आता है तो हम उसकी चर्चा करते हैं। उन निर्वासितों को मदद करने के लिए चर्चा होती है। जब खेती से पेट नहीं भरता,इसलिए खेती छोड़ कर शहर की तरफ आने वाले जो निर्वासित हैं,गांव के लोग हैं,जो शहर की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने लगे हैं,उनके बारे में हम कब सोचेंगे। आज देश का दो गुटों में विभाजन हो चुका है,एक तरफ है इंडिया,दूसरी तरफ है भारत। आज भारत से विस्थापित हो कर लोग अपने पेट भरने के लिए,अपने बच्चों के भविष्य के लिए इंडिया में आने लगे हैं। अगर इस तरह से भारत से एक-एक कर के लोग इंडिया में आते रहेंगे तो भारत पूरा बंजर हो जाएगा।

          सभापति महोदय,उस वक्त हम विश्व के किस बाज़ार में जा कर अनाज खरीदेंगे,इसके बारे में सोचना चाहिए क्योंकि हमने इतनी तरक्की की-इतनी तरक्की की लेकिन मुझे यह पता नहीं चलता,मैं मंत्री महोदय से प्रश्न पूछना चाहता हूँ,क्योंकि मैंने थोड़ा अध्ययन किया है,हरेक देश अपने किसानों को हर हफ्ते कुछ न कुछ डाटा देता रहता है। लेकिन हमारे किसानों को यह कभी मालूम ही नहीं होता कि हमारे देश की नीति क्या रहेगी,आयात-निर्यात की नीति क्या रहेगी। क्या हम निर्यात पर पाबंदी लगाने वाले हैं,निर्यात बैन करने वाले हैं या बाहर से अनाज खरीदने वाले हैं। इसके बारे में किसानों को कुछ मालूम नहीं होता है। किसानों पर आरोप लगता है कि भेड़चाल में अगर कोई एक किसान धान बोता है तो सभी किसान धान बोते हैं। कोई एक गन्ना बोता है तो सभी गन्ना बोते हैं।

          सभापति महोदय,अगर सैटेलाइट के जरिए सर्वे होता है,हरेक हफ्ते में हमारे कृषि मंत्री जी हमारे किसानों को कुछ डाटा देते कि इस साल गेहूं की घरेलू खपत इतनी है,अरहड़ की इतनी है,चीनी की इतनी है,अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में इस तरह से रेट चलने वाले हैं,अगर सोयाबीन की फसल करोगे तो हम एक्सपोर्ट कर के बाहर से पैसा ला सकते हैं। इस तरह से अगर कोई डाटा हमारे कृषि मंत्री देते तो अच्छा होता। किसान होशियार होता है,उसको अंदाजा होता है कि फसल कितनी आएगी। लेकिन उसको घरेलू बाज़ार का कोई डाटा उपलब्ध नहीं होता है,न ही अंतर्राष्ट्रीय मार्केट का कोई डाटा होता है। अगर सैटेलाइट सर्वे कर के हर आठ दिन में,हर पंद्रह दिन में हम डाटा दें कि आज गेहूं में इतनी बुवाई हो चुकी है,बाजरे में इतनी बुवाई हो चुकी है,ज्वार में इतनी बुवाई हो चुकी है तो हम किसानों को सलाह दे सकते हैं कि अब गन्ना बोना बंद करो,अब मेज़ की आवश्यकता है,क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में मेज़ के रेट बढ़ चुके हैं। हम इस तरह से डाटा दे सकते हैं। सरकार की ट्रेज़री से पैसा देने की आवश्यकता नहीं है,लेकिन यह जो जानकारी देनी चाहिए,यह जानकारी किसानों को नहीं मिलती है और जूए की तरह किसान खेती करता जा रहा है। उसको ऐसा लगता है कि आज चीनी का दाम अच्छा है,चलो हम गन्ने का उत्पादन कर लेते हैं। 

 

उसको ऐसा लगता है कि गेहूं का अच्छा दाम मिल रहा है तो गेहूं की फसल लेते हैं। उसको ऐसा लगता है कि आज प्याज का अच्छा दाम मिल रहा है तो प्याज की फसल लेते हैं।

          महोदया,हमारे देश का किसान बड़ा होशियार है। पिछले तीन महीने से मैं देख रहा हूं कि प्याज की कीमतें बढ़ रही हैं,अगर हमारे कृषि मंत्री जी,हमारे फूड एंड सिविल सप्लाई मिनिस्टर जून के महीने में ही कहते कि इस देश में प्याज की शॉर्टेज है,इस देश में आलू की शॉर्टेज है,विपरीत परिस्थितियों में भी हमारा किसान,यदि उसे ठीक पैसा मिलता है तो वह प्याज बोने के लिए तैयार है,आलू बोने के लिए तैयार है।

          महोदया,हमारे महाराष्ट्र में मैं एक ऐसे किसान को जानता हूं जो साल के 12 महीने आम का फल लेता है, 12 महीने अंगूर का फल लेता है,वह तकनीक उसके पास है,लेकिन हम किसानों को कुछ भी डाटा देते ही नहीं हैं। हम किसानों को विश्वास में लेते ही नहीं हैं। हम किसानों को कोई सलाह नहीं देते हैं। जब मार्केट में फसल आती है,तब चर्चा होती है कि इसमें क्या करना चाहिए?मैं आपको एक सीधी सी बात बताता हूं। वर्ष 2005 में ऑयल सीड इम्पोर्ट करने के लिए हमने 8,961 करोड़ रूपये खर्च किए और वर्ष 2011-12 में, यानी पांच साल में उसमें इतनी बढ़ोत्तरी हो गयी कि 45,940 करोड़ रूपये ऑयल सीड इम्पोर्ट करने में हमारी सरकार के खर्च हो गये।

          महोदया,इसका मतलब सोयाबीन,मूंगफली,सूर्यफूल आदि तरह के जो ऑयल सीड्स हैं,अगर हम उनका एमएसपी बढ़ाते,उनका समर्थन मूल्य बढ़ाते और अपने देश के किसानों से कहते कि हमें इस देश को ऑयल सीड के मामले में आत्मनिर्भर करना है। आप इनकी जितनी फसल उगाना चाहते हो उतनी फसल उगाओ,यह सरकार उसे खरीदने के लिए तैयार है तो ये जो हम विदेशी डॉलर इन्हें इम्पोर्ट करने में खर्च कर रहे हैं,वह पैसा हमारी सरकार का बचता।

          महोदया,हमारे यहां अनाज रखने की जगह नहीं है,यहां चीनी रखने की जगह नहीं है और दूसरी तरफ हम बाहर से दालें और ऑयल सीड इम्पोर्ट कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि किसानों को कुछ मालूम ही नहीं है कि किस तरह की खेती करनी चाहिए?

          महोदया,मैं जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि अगर इस देश के किसानों को इस तरह से सरकार मदद करती है तो इथेनॉल के मामले में हम देश को आत्मनिर्भर करेंगे। इस देश को हम दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनायेंगे,ऑयल सीड के मामले में आत्मनिर्भर बनायेंगे। जब ऐसा हो जायेगा तो जो डॉलर आज 60 रूपये पर गया है,वह डॉलर 40 रूपये से भी नीचे जा सकता है। ऑयल सीड,दलहन और पेट्रोल के इम्पोर्ट में हमारी सरकार का बहुत पैसा खर्च होता है। इन सब चीजों में बचत करने की क्षमता हमारे किसानों में है।

          महोदया,मैं कहना चाहता हूं कि यह करने के लिए सरकार की जो मानसिकता होनी चाहिए,वह मानसिकता आज नहीं है और इसीलिए यह सब हो रहा है। इस देश के किसानों को जिस तरह से लाल बहादुर शास्त्री जी ने विश्वास में लिया था,जिस तरह से उन्होंने किसानों के ऊपर भरोसा दिखाया था,उसी तरह से अगर सरकार किसानों पर भरोसा दिखाती है तो ये किसान फिर से इस देश को महाशक्ति बना सकते हैं।

          महोदया,मैं सदन से और मंत्री जी से एक विनती करता हूं कि आज किसानों के लिए फसल का लागत मूल्य का हिसाब करने की जो नीति है,वह बदलनी चाहिए। पूर्व लागत एवं मूल्य निर्धारण आयोग के अध्यक्ष डॉ0टी. हक ने सरकार को एक सुझाव दिया था,उन्होंने कहा था कि इस मेथोडोलॉजी में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। वर्ष 2008 में उन्होंने यह सुझाव दिया था। उस पर अमल करने की आवश्यकता है क्योंकि अगर वह होता है तो किसानों को सही मायने में समर्थन मूल्य मिलेगा,उसकी लागत मूल्य का हिसाब दिया जाएगा। इसलिए मैं मंत्री महोदय से विनती करता हूँ कि जिस समर्थन मूल्य का कृषि मंत्री जी ने ऐलान किया है,उसको वापस कर फिर से सप्लीमैंट्री देकर हमें गेहूँ,कपास,सोयाबीन,मूंगदाल,का समर्थन मूल्य नए ढंग से डिक्लेयर करना चाहिए। यह करने के लिए मैं डिमांड करता हूँ और कहना चाहता हूँ कि तुरंत एक कमेटी बनाकर यह जो गड़बड़ी हो रही है,खासकर फर्ज़ी लागत मूल्य निकालने का जो प्रयास कृषि लागत मूल्य आयोग में बैठे हुए बाबू लोग कर रहे हैं,इस पर कुछ नियंत्रण करने की आवश्यकता है और कुछ आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

16.05 hrs. (Shri Hukmdeo Narayan Yadav in the Chair) इसके बारे में मंत्री महोदय कुछ न कुछ निर्णय लें। मैं सरकार से विनती करता हूँ और सदन से भी विनती करता हूँ कि इस देश के प्रधान मंत्री ने इस देश के किसानों को एक वचन दिया है। उन्होंने कहा है कि हम समर्थन आयोग पर अमल करेंगे। इसलिए मैं मंत्री जी से विनती करता हूँ कि वे इस सदन में कहें कि हम तुरंत डॉ. स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल कर रहे हैं।

माननीय सभापति :   प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ :

“यह सभा सरकार से आग्रह करती है कि वह कृषि क्षेत्र में संकट को दूर करने के लिए राष्ठ्रीय कृषक आयोग, जिसे   ' स्वामीनाथन आयोग'  के नाम से भी जाना जाता है, की सिफारिशों को लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाए। ” *m02 SHRI ADHIR RANJAN CHOWDHURY (BAHARAMPUR):  Mr. Chairman, Sir, I would appreciate Shri Raju Shetty who has brought forward this Resolution with regard to the implementation of the recommendations of the National Commission of Farmers.
          As we all know, the Commission was led by Dr. Swaminathan and it is recognized as the  Swaminathan Commission. The Father of the Nation, Mahatma Gandhi, who led the farmers of Champaran towards the freedom struggle, was quoted as having said:  “India begins and ends in villages.” Pandit Jawaharlal Nehru exhorted: “everything else can wait but agriculture.” Sardar Vallabhai Patel exhorted “ I believe in one culture, that is, agriculture.” So, naturally, India is very much an agricultural country. Even in Kautilya’s Arthashastra, it is found that  there is a recitation for the Lord:
“Salutation to Lord Prajapathi Kashyapa.
Let the crops flourish always.
Let the Goddess reside in the grain and seed.” So, this is India where since time immemorial we have to rely upon agriculture and the farmers are the founders of our civilization and prosperity.
          The Swaminathan Commission was constituted by enshrining the terms of reference:
“To work out a comprehensive medium-term strategy for food and nutrition security in the country in order to move towards the goal of universal food security over time;
 
Propose methods of enhancing productivity, profitability and sustainability of the major farming systems of the country; suggest policy reforms to substantial increase flow of rural credit to all farmers; formulate special programmes for dry land farming for farmers in the arid and semi-arid regions, as well as for farmers for hilly and coastal areas; suggest measures for enhancing the quality of cost competitiveness of farm commodities so as to make them globally competitive; protecting farmers from imports when international prices  fall sharply; empowering elected local bodies to collect effectively; and conserve and improve the ecological foundation for sustainable agriculture.
The then UPA Government has approved the recommendations of the Dr. Swaminathan Commission and adopted various initiatives in order to implement the recommendations to the extent of the financial capacity of the country. Here, Rajiv Shetty ji was pleading for more subsidy to the farmers of our country but this Government has been caught in a great quandary.
आज सुबह प्रश्न काल में वित्त मंत्री जी ने कहा कि वह सब्सिडी घटाने की कोशिश कर रहे हैं। फ्यूल,फूड और फर्टिलाइज़र हमारा सबसे बड़ा मुद्दा subsidyका  है। बजट में यह घोषणा की गयी है कि सब्सिडी में दो परसेंट से ज्यादा की कटौती की जाएगी। दूसरी तरफ वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन,जिसका भारत भी एक सदस्य है,उनका ट्रेड फेसलीटेशन एग्रीमेंट में विकसित देश कह रहे हैं कि आप जो सब्सिडी दे रहे हैं,उसे घटाना पड़ेगा। यह डाइकोटामी है। एक तरफ सरकार कहती है कि सब्सिडी घटाएंगे,दूसरी तरफ डब्ल्यू.टी.ओ. कंट्रीज़ को कहती है कि हम सब्सिडी नहीं घटाएंगे। इस बारे में सच्चाई क्या है?हमें यह पता होना चाहिए। सरकार का इस बारे में क्या रवैया है?
Developed countries have been insisting upon the developing countries to curtail the subsidy component. So, the Government should come out with a clear objective of what is to be done by this Government. ...(व्यवधान)हां,हमने किया था। आपकी जब सरकार थी तो अरुण जेटली साहब कानकुन में जाकर बहुत ज़ोर से लड़े भी थे।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप लोग आपस में बातचीत न करें। आप अपनी बात कहें।
श्री अधीर रंजन चौधरी (बहरामपुर) : हम इसलिए कह रहे हैं कि आप बिगाड़ रहे हैं।...(व्यवधान)आप यह कीजिए,क्योंकि आप उधर यह करने के लिए ही बैठे हैं।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : माननीय सदस्य,आप अपना भाषण कीजिए।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : महोदय,आज दिन भर इरिगेशन और ड्रॉट के बारे में चर्चा हो रही थी।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : माननीय सदस्य आपस में बातचीत न करें।
श्री अधीर रंजन चौधरी : कृषि के साथ इरिगेशन का बहुत ताल्लुक है। शेट्टी साहब जहां से आते हैं, वह भी काफी सुखाड़ का इलाका है।
       महोदय, मैं एक ब्योरा देना चाहता हूं, जिससे आप समझ जाएंगे कि अभी हमारे देश में बहुत कुछ करना बाकी है। क्योंकि हमारे पास जो स्टोरेज कैपेसिटी है, जिससे इरिगेशन का काम होगा, यह पर-केपिटा बहुत कम है।  महोदय,जहां नॉर्थ अमेरिका में पर कैपिटा स्टोरेज कैपेसिटी 6,150 क्यूबिक मीटर है,वहीं रूस में 6,013 क्यूबिक मीटर,ऑस्ट्रेलिया में 4,729 क्यूबिक मीटर,चीन में 2,886 क्यूबिक मीटर और भारत में यह 262 क्यूबिक मीटर है। सोचिए हम लोग किस स्थिति से गुजर रहे हैं।
          महोदय,हमें वाटर इफिसिएंसी और वाटर प्रोडक्टिविटी पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। हमारे हिन्दुस्तान में जितने डैम हैं,उन सभी डैम को मिलाकर हमारे पास 174 क्यूबिक किलोमीटर स्टोरेज कैपेसिटी है।सर,जाम्बिया नाम का एक छोटा-सा देश है जहां करीबा नाम का एक डैम है। इस डैम की स्टोरेज कैपेसिटी 180 क्यूबिक किलोमीटर है और हिन्दुस्तान में जहां हमारे पास 2784 के आस-पास डैम हैं,वहां हमारी स्टोरेज कैपेसिटी मात्र 174 क्यूबिक किलोमीटर है। आसवान डैम के बारे में आप लोगों ने सुना होगा। आसवान डैम की स्टोरेज कैपेसिटी हमारी स्टोरेज कैपेसिटी से 12 क्यूबिक किलोमीटर ज्यादा है।
          सर,मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि एक तरफ सूखे की बात होती है तो दूसरी तरफ बाढ़ की बात होती है। हमारा 40 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र फ्लड प्रोन है। उसमें 3.5 मिलियन हेक्टेयर की क्रॉप एरिया अफेक्टेड होती है। जहां तक ड्राउट का सवाल है तो हमारे हिन्दुस्तान की 26औ आबादी ड्राउट के इलाके में बसी हुई है। हमारे देश का एक-तिहाई ज्योग्राफिकल एरिया ड्राउट से अफेक्टेड होता है। इसलिए हमें ड्राउट के साथ इर्रीगेशन की बैलेंसिंग करनी चाहिए। यह रिकमेंडेशन स्वामीनाथन जी ने भी किया है।
          सर,मैं आपके ध्यान में एक बात लाना चाहता हूं कि सबसे पहले कृषि को कन्करेन्ट लिस्ट में लाया जाए। कृषि अभी भी स्टेट लिस्ट में है। इसलिए कृषि को कन्करेन्ट लिस्ट में लाया जाए जिस से कि हम एक कॉप्रिहैन्सिव प्लान बना सके। वर्ष 2004-05 से हिन्दुस्तान में कृषि के क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। जब हम आज़ाद हुए थे तो आज़ादी के समय हिन्दुस्तान का फूड ग्रेन प्रोडक्शन 51 मिलियन टन था और आज हमारा फूड ग्रेन प्रोडक्शन 264 मिलियन टन है। स्वामीनाथन कमीशन ने एक रिकमेंडेशन किया था कि हमारी एग्रीकल्चर ग्रोथ 4औ होनी चाहिए। वह अभी हो रही है। दूसरी बात,स्वामीनाथन कमीशन ने किसानों को बैंकों से ऋण मुहैया कराने की पुरज़ोर रिकमेंडेशन की थी। आज देखिए कि इस बजट में आठ लाख करोड़ से ज्यादा रुपये कृषि क्रेडिट में दिए जा रहे हैं। यूपीए के जमाने में यह 7,35,000 करोड़ रुपये तक दिया गया था।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : अब अपना भाषण समाप्त करें।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : सर,मुझे बोलने दीजिए।
माननीय सभापति : अभी बहुत-से माननीय सदस्यों को बोलना है। यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इस पर अभी 20-25 मेम्बर बोलने वाले हैं।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : सर,अभी ज्यादा मेम्बर नहीं हैं। मुझे आराम से बोलने दीजिए।
माननीय सभापति : हमारे पास जितने सदस्यों के नाम हैं,हम उसी हिसाब से उन्हें बोलने का समय देते हैं।
श्री अधीर रंजन चौधरी  : सर,वर्ष 2004-05 एक टर्निंग प्वायंट है। The Mid-Term Appraisal of the 10th Five Year Plan reviewed, for the first time, the depressing trend in agriculture and proposed multi-pronged steps to address the malaise. How was it done? A substantial correction began to be made in 2004-05 with increased allocation for various departments concerned with the development of agriculture, animal husbandry and agricultural research and education. During 2005-06, a National Horticulture Mission became operational and it extended the programme beyond fruits and vegetables and embraced medicinal plants and spices. A centrally-sponsored scheme called the Support to State Extension Programmes for Extension Reforms was launched in 2005-06. In 2005-06, a National Fund for Basic, Strategic and Frontier Application Research in Agriculture and a National Agricultural Innovation Project were launched.  It was, at that time, as per the recommendations of the Swaminathan Committee that agricultural trade was opened up by the government under the World Trade Organisation. These were also attempts to reform domestic agricultural marketing through the formulation of a model Agricultural Produce Marketing Committee (APMC) Act in 2003.  You know that model APMC Act was conceived by the former Government. लास्ट मुद्दा बता रहा हूं। Total gross capital formation as a percentage of agricultural GDP averaged 12.9 per cent during the five-year period ending 2003-04.  अनुराग जी को बता रहा हूं। But thereafter it steadily increased from 13.5 per cent in 2004-05 to 17 per cent in 2012-13. Increases in public investment in agriculture, though moderate, aided significant increases in private investment. Private investment to agricultural GDP ratios, which had hovered around 10 per cent to 11 per cent for quite some years, shot up to over 14 per cent in 2008-09 and remained at that level thereafter. अभी यह हो रहा है कि जहां हमारा हाई प्रोडक्टिविटी स्टेट था,जैसे कि पंजाब,हरियाणा,वेस्ट उत्तर प्रदेश,वहां हमारी प्रोडक्टिविटी नहीं बढ़ रही है। जहां हमारा लो-प्रोडक्टिविटी स्टेट था,वहां हमारी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है। यह देख कर हमें अच्छा लगता है कि जहां छत्तीसगढ़ से लेकर          M.P., Odisha झारखंड तक लो-प्रोडक्टिविटी थी,वहां बढ़ रही है,लेकिन जहां हमारी हाई प्रोडक्टिविटी थी,वहां नहीं बढ़ रही है। इसका मतलब यह है कि पिछली सरकार ने स्वामी नाथन कमिशन का रिकोमेंडेशन मान कर चलने की कोशिश की है। हिन्दुस्तान में आजादी के समय हमारा फूड ग्रेन प्रोडक्शन 51 मिलियन टन था,जो आज 264 मिलियन टन हो रहा है।
                                                                                               
माननीय सभापति : आपस की बातचीत को रिकॉर्ड में न लिया जाए।
...( व्यवधान)*     *m03 श्री ओम बिरला (कोटा) : सभापति महोदय,आज जिस विषय पर चर्चा हो रही है,वह देश के लिए सबसे गंभीर विषय है। जिसके लिए आजादी के बाद लगातार हर सरकार यह वायदा करती आई कि हमारी सरकार किसानों की सरकार है,किसानों की जिन्दगी को बदलने वाली सरकार है। उस किसान की जिन्दगी को बदलने के लिए एक राष्ट्रीय किसान आयोग बनाया गया,जिसकी रिपोर्ट 19 दिसम्बर, 2004, 11 अगस्त, 2005, 29 दिसम्बर, 2005 को प्रस्तुत की गई। तीसरी अंतिम रिपोर्ट 13 अप्रैल, 2006 को प्रस्तुत की।
          सभापति महोदय,आप विद्वान हैं। आपने हमेशा देश के अंदर शोषित,पीड़ित किसान का नेतृत्व किया है। आज सब को खुशी है कि जिस सभापति के रूप में आप बैठे हैं,आप किसान के दर्द और पीड़ा को जानते हैं। आज सारा सदन इस बात के लिए चिन्तित है कि किस तरीके से किसानों की बदहाली स्थिति को ठीक किया जाए। इस रिपोर्ट में जिन 3-4 बिन्दुओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया,उसमें सबसे बड़ा बिन्दु भूमि सुधार का था। भूमि सुधार के बाद पानी की समस्या तो हमारे देश में सब को पता है कि अंडरग्राउण्ड पानी हमारा समाप्त होता जा रहा है और सतही जल की स्थिति पूरे देश में ठीक नहीं है।
          पानी की समस्या पर,इस रिपोर्ट पर गम्भीरता से चर्चा और सिफारिश की गई। ऋण की समस्या पर भी इस कमेटी में सिफारिश की गई। मार्केटिंग लिंकेज कैसे हो,उसके बारे में भी इसमें सिफारिश की गई। नई तकनीकों के द्वारा किसानों को अधिक उत्पादन करने के बारे में भी इस रिपोर्ट में समीक्षा की गई। इस देश के अन्दर जलवायु परिवर्तन भी एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है,जिसके बारे में भी इस रिपोर्ट पर अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट पेश की गई है। हालांकि मैं सम्पूर्ण रिपोर्ट से सहमत नहीं हूं,लेकिन इस रिपोर्ट के बाद देश में बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। वह परिवर्तन इस बात के लिए भी हुआ है कि धीरे-धीरे जिस तरीके से कृषि भूमि गैर-कृषि कार्य के लिए काम में आने लगी है,उससे देश के अन्दर कृषि भूमि का रकबा कम होता चला गया। इतना ही नहीं कि सिर्फ रकबा कम होता चला गया,बल्कि परिवार बड़ा होता चला गया और जो किसान के पास रकबा बड़ा था,वह छोटी-छोटी खेती में परिवर्तित होता चला गया।   किसी जमाने में जब खेत पर किसान जाता था तो उसको कोई ऋण नहीं मिलता था,कोई मृदा परीक्षण की प्रयोगशालाएं नहीं थीं,कोई तकनीक नहीं थी,लेकिन उसके बाद भी किसान जाता था तो उसके चेहरे पर खुशहाली रहती थी। हमने हिन्दुस्तान में नहीं सुना था कि किसी किसान ने आत्महत्या की है,लेकिन आज इस देश के अन्दर रोज़ हम यह सुन रहे हैं कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वे आज ऋण के बोझ से डूब रहे हैं और जैसे हमारे मूल प्रस्ताव रखने वाले माननीय सदस्य ने बात बताई कि किस तरीके से कृषि उत्पादन को सड़कों पर सस्ती दर पर भी बेचा जाता है और फेंका भी जाता है। कई बार तो हमने यह भी देखा है कि किसान को उस फसल को या उस सब्जी को काटने का पैसा ज्यादा लगता है और उसको अगर काटने का पैसा दे और बाजार में बेचने जाये तो उसको उसके उत्पादन की कटाई की लागत भी नहीं मिलती।
          पंडित दीनदयाल जी ने एक बात बहुत पहले कही थी कि इस धरती पर अभी हालात क्या हैं,उन्होंने कहा था कि ‘अधेय मातृका कृषि’यानि इन्द्रावलम्बी नहीं,वरन् स्वावलम्बी कृषि का संयोजन आवश्यक है। आज जिस तरीके से जलवायु परिवर्तन हो रहा है और जिस तरीके से सतही जल कम होता जा रहा है,उसमें इस देश को पंडित दीनदयाल जी के बताये गये रास्ते पर चलने की आवश्यकता है। आज इसकी इसलिए आवश्यकता है कि हमारे गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री बनने वाले नरेन्द्र मोदी जी ने गुजरात में पानी की एक-एक बूंद का उपयोग कैसे हो और उस पानी के उपयोग के माध्यम से किसान का परिवार भी पले,समाज भी पले,उसके लिए गुजरात की धरती पर 14 साल तक मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने देश को एक दिशा दी है। आज भी हमारे देश के अन्दर इतने वाटर सोर्सेज़ हैं,कुएं हैं,पुरानी बावड़ियां हैं,उन सब का अगर पुनरुद्धार किया जाये तो हम शायद उस अंडरग्राउंड और सतही जल को,इस देश के अन्दर एक-एक बूंद पानी को रोक कर उसको सिंचाई और पीने के काम में ले सकते हैं। 
           माननीय सभापति महोदय,स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट में बहुत अच्छी बातें कही गई थी। उसमें किसानों के ऋणों को कम करने की भी बात कही गई थी। इसके बाद भी उन्होंने कई सिफारिशें लागू की। जब हमारे देश के प्रधान मंत्री जी ने देश की संसद को पहली बार संबोधित किया तो उन्होंने कहा कि गुजरात में कैसे परिवर्तन हुआ?उन्होने मृदा परीक्षण के लिए कौन सी खेती किस जमीन पर होनी चाहिए,उस जमीन में उर्वरक की मात्रा क्या होनी चाहिए,इन सारी परीक्षण प्रयोगशाला के लिए,देश को एक दिशा दी।
          माननीय सभापति महोदय,सैटेलाइट के द्वारा कहां-कहां एनिकैट बनना चाहिए?एनिकैट्स बने या नहीं बने पर,किस जमीन पर कैसी खेती होनी चाहिए,किन-किन फसलों का कितना उत्पादन होगा,उसके लिए भी सैटेलाइट,एक नई टेक्नोलॉजी के द्वारा,इस क्षेत्र में देश को एक नई दिशा देने की कोशिश की गई है।
          इस देश के अंदर कभी कोई खाद्यान्न बहुत ज्यादा पैदा हो जाता है तो उसकी कीमत कम हो जाती है। कोई खाद्यान्न कम पैदा हो तो उसकी कीमत भी बढ़ जाती है। कभी कोई सब्जी बहुत ज्यादा हो जाती है तो उसे फेकना पड़ता है। कभी कोई फल बहुत ज्यादा हो जाता है तो बाजार में उसकी कीमत कम हो जाती है। इसीलिए प्रधानमंत्री जी ने देश को एक दिशा दी है। आने वाले समय में यह देश देखेगा कि हम कृषि उत्पादन के आधार पर परिवर्तन की बात कर रहे थे,किसान को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे थे,उसकी इस देश के अंदर एक दिशा दिखेगी। मिट्टी परीक्षण के द्वारा कौन-सी खेती कहां होनी चाहिए,फसल कितनी होनी चाहिए। फसल कितनी पैदा हो रही है और भविष्य में कितनी पैदा होगी?क्या मार्केट होगा?आज हम समर्थन मूल्य की बात कर रहे थे। यह बात सही है कि इस देश में जब सरकार समर्थन मूल्य निश्चित करती है तो ऐसा लगता है कि किसानों के साथ न्याय नहीं करती है। कई बार हमें लगता है कि डी.ए.पी. का रेट,यूरिया का रेट,डीजल का रेट,बीज की कीमत ठीक नहीं है। किसान के लिए बिजली नहीं है,जहां बिजली नहीं है,वहां भगवान के भरोसे बैठा किसान है। आज हम देखते हैं कि किसान की माली हालत नहीं सुधरी है। आज भी किसानों के पैर में चप्पल नहीं है और तन पर कपड़ा नहीं है। जब वे दो रोटी खाने का इंतजाम करते हैं तो कभी बाढ़ आ जाती है,कभी तूफान आ जाता है,कभी उनकी फसल में कीड़े लग जाते हैं,कभी ओला वृष्टि हो जाती है और कभी अकाल पड़ जाता है। किसान फिर से कर्ज में डूब जाते हैं।
          सभापति महोदय,आप देखते होंगे कि किसान फिर खेत में आते हैं और मुस्कुराते हुए खेती करते हैं। जब हम गांव में जाते हैं तो देख कर सोचते हैं कि सोयाबीन की विराट फसल होगी। ऐसा लगता था कि सोयाबीन की बम्पर क्रॉप होगी। पर,जब 15 दिन के बाद वहां जाते हैं तो पता चलता है कि सोयाबीन की फसल में कीड़ा लग गया और किसान की फसल चौपट हो गई। जब हम उसकी पीड़ा को देखते हैं तो हमें देखते हैं कि वह करोड़ों रुपए के कर्ज में डूब गया है।
          माननीय सभापति महोदय,मैंने आपका भाषण सुना है। इस दुनिया के अंदर किसान अपनी कीमत तय नहीं करते हैं लेकिन एक सेठ,जो फैक्ट्री में पेन का उत्पादन करता है,वह उस पेन की कीमत खुद तय करता है। लेकिन,इस देश के अंदर किसान अपनी फसल की कीमत तय नहीं कर सकते हैं। अगर किसान अपनी फसल की कीमन तय नहीं कर सकते तो कम से कम सरकार तो किसान की फसल की मूल्य ऐसा तय करे,जिससे किसान की उत्पादन लागत और उस पर लाभ मिलने के बाद वह सुरक्षित रह सके।
          माननीय सभापति महोदय,इस देश में सबसे पहले किसान को सुरक्षित रखना है। किसान को सुरक्षित रखने के लिए यह जरूरी है कि उनकी फसल का मूल्य ठीक मिले। फसल बीमा पॉलिसी को व्यावहारिक बनना चाहिए। यह तहसील स्तर पर नहीं बनना चाहिए। यह गांव के स्तर पर बनना चाहिए। कहीं ओले पड़ते हैं,अलग-अलग जलवायु परिवर्तन है। कभी बाढ़ आती है,कहीं ओले पड़ते हैं कहीं नहीं पड़ते। इसलिए फसल बीमा ऐसी बननी चाहिए कि किसान को कम से कम उसकी उपज का लागत मूल्य फसल बीमा के आधार पर मिले। अगर हम इस देश में किसानों को सुरक्षित कर देंगे तो चाहे बाढ़ आए,चाहे तूफान आए,चाहे ओलावृष्टि हो,चाहे कीड़े लगें,किसान को उपज की लागत मूल्य के आधार पर बीमा मिले और लागत मूल्य का पैसा हमेशा बीमा के आधार पर कवर हो। अगर इस देश का किसान सुरक्षित हो गया तो हम एक नए परिवर्तन की ओर बढ़ेंगे।
          यह विषय गंभीर है। इसलिए मैं आपसे थोड़ा समय चाहता हूं।...(व्यवधान)हमारे साथी सांसद दुष्यंत सिंह जी बैठे हैं।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप संक्षिप्त में अपनी बात कहें क्योंकि अभी बहुत से सदस्य बोलने वाले हैं।
…( व्यवधान)
श्री ओम बिरला (कोटा) : जब लहसुन दो-तीन रुपये किलो बिकने लगा था,किसान सड़कों पर लहसुन फेंक रहा था। उसे कम लागत मिल रही थी। लहसुन बाजार में कम बिक रहा था। हम दिल्ली के दरवाजे पर आए। हमने कहा बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत लहसुन को खरीदना चाहिए। जहां समर्थन मूल्य हो वहां बाजार हस्तक्षेप योजना जो लागू है,उसका व्यावहारिक स्वरूप बनाना चाहिए ताकि हम किसानों को तीन तरह से सुरक्षित रख सकें। पहला,फसल बीमा के आधार पर उसको उत्पादन लागत हमेशा मिले। दूसरा,उसका समर्थन मूल्य इस तरह का तय हो कि उत्पादन लागत का लाभ हो। तीसरा,बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत जब कभी बाजार में कोई सब्जी या ऐसी वस्तु जो समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जा सकती,वह बाजार हस्तक्षेप योजना को व्यावहारिक बनाकर खरीदी जाए तो शायद देश के किसानों को सुरक्षित कर सकते हैं।...(व्यवधान)
          मेरा इतना ही निवेदन है कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की कई सिफारिशें अच्छी हैं।...(व्यवधान)किसान को सुरक्षित रखते हुए उसके उत्पादन की लागत ठीक मिले। भंडारण से लेकर तमाम चीजें जो हमारे प्रधान मंत्री जी की सोच,विचार है,हमारे साथी देखेंगे कि देश में आने वाले समय में किसान सुरक्षित होगा,उसे मार्किट मिलेगी,उसका जीवन बेहतर होगा। गांव तक फसल के साथ अन्य उत्पादन,जैसे हम कहते हैं गाय से लेकर तमाम चीजें,कृषि के सभी जुड़े हुए पहलुओं पर,आप गुजरात में चले जाइए,दो-तीन किलो दूध बेचकर भी व्यक्ति अपना पेट भर लेता है। गांव-गांव में इसी तरह का एक नेटवर्किंग सिस्टम जमेगा जिसके आधार पर कृषि के साथ कृषि से संबंधित अन्य पशुपालन,उद्योग की सामयिक योजना से किसान अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा। ...(व्यवधान)इसके लिए हमारी सरकार सामूहिक प्रयास करेगी।
                                                                                     
*m04 SHRI K. PARASURAMAN (THANJAVUR): Hon. Chairman, Sir, Thanjavur constituency in the State of Tamil Nadu needs to be provided sufficient funds for various agriculture and animal husbandry schemes. Thanjavur is the granary of South India, where most of the people are dependent on agriculture. On behalf of the hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Puratchi Thalaivi Amma, I thank the Government for the allocation of adequate funds for agriculture, animal husbandry, rural development and several other welfare schemes.
          An amount of Rs.1,000 crore has been allocated for agricultural farmers and irrigation under the Prime Minister’s Irrigation Scheme. Shyama Prasad Mukherjee Rurban Mission aims to provide road facilities to rural areas. Deendayal Upadhyaya Rural Jyoti Scheme aims to provide electricity facility to villages. In order to make the people of Tamil Nadu benefited by these schemes, necessary funds should be allocated to the State. The Union Government has proposed to set up agricultural research institutions in Assam and Jharkhand at a cost of Rs.100 crore. I request that such an institution be set up in Tamil Nadu, particularly in Thanjavur.
          An amount of Rs.50 crore has been allocated for inland fishing and cattle breeding. Hon. Amma provide milch cows, goats to the people below poverty line in Tamil Nadu in order to uplift them. The Union Government should also  allocate adequate and requisite funds for Tamil Nadu for implementing schemes relating to agriculture and animal husbandry. 
          I wish to bring to your kind notice the importance of conservation of historical moat of Thanjavur Big Temple, rainwater harvesting and revival of water bodies in my Thanjavur constituency.  Thanjavur district stands unique from time immemorial for its agricultural activities and is rightly acclaimed as the granary of South India. It lies in the deltaic region of famous river Cauvery and criss-crossed by lengthy network of irrigation canals, green paddy fields, mango gardens and other vegetation.
          Brahadeeswarar Temple, which is called the Big Temple is on the UNESCO World Heritage Site. It is also known as the Great Living Chola Temples. This is one of the largest temples in India which is 1000 years old. The temple complex sits on the banks of a river that was channelled to a moat formed 1500 years ago. At present, this moat is filled with debris and vegetation. It is the need of the hour to renovate this moat so as to attract large number of tourists to this temple in Thanjavur. Desilting and underground water connectivity at the moat is the need of the hour. Existing moat can be rejuvenated at a cost of Rs.200 crores.
          In order to make Thanjavur regain its traditional admires, I urge the hon. Minister of Environment and Forests to sanction adequately to the project of rejuvenation of moat of Thanjavur Big Temple.
          Sir, an amount of Rs.7060 crore has been allocated for creating 100 Smart Cities throughout the country. Many cities of Tamil Nadu, particularly Thanjavur should be included in the list of Smart Cities. Thanjavur has thousand years of history and tradition. Thousand years old Brahadeeswarar Temple is in Thanjavur. UNESCO has declared Darasuram Iravadeswarar temple and Jayankondam Gangaikonda Cholapuram Temple as the Great Living Chola Temples. This area should be declared as Siva Circuit and necessary provisions should be made for tourism development in my constituency.
          Tamil Nadu should be brought under National Mission on Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual Augmentation Drive and National Heritage City Development and Augmentation Yojana.
          Thanjavur is famous for Thiruvaiyaru music festival, Bharatanatyam, Thanjavur arts, veena - a musical string instrument - folk arts, heritage temples, etc. All the nine planets (Navagraha) have separate temples in my constituency. The adjoining temple in Kumbakonam where Mahamaham is performed should be declared as a heritage place and a pilgrim centre of excellence.
          Adequate funds have to be allocated for enhancing the infrastructure and rail, road and air connectivity in Thanjavur. I, therefore, urge that Thanjavur should be declared as heritage centre.
          Sir, the following are the immediate requirements of Thanjavur railway station. All departmental offices may be constructed in the area from booking office to signal cabin. For the benefit of public, a separate reservation counter office may be constructed in the place of the existing railway store. A separate ticket counter office may be constructed nearer to the subway. A two-wheeler parking may be constructed as a multi-storeyed parking as it is in Trichy. The existing subway may be extended up to platform numbers four and five. For the convenience of the public, toilet facilities may be provided in the middle of the platforms. All the departmental offices located on platform numbers two and three were built during the metre gauge period. So, they may be remodelled.
          In the Budget,  a proposal has been approved for having a double line and electrification between Trichy and Thanjavur, but no fund has been allocated till now.
माननीय सभापति :  माननीय सदस्य, कृपया विषय पर बोलें। यह चर्चा रेल बजट पर नहीं है।
SHRI K. PARASURAMAN : Please give me one minute.
          A scheme has already been approved for a railway line between Thanjavur and Pattukottai, but no fund has been allocated for it till now. There is a long pending demand of the people for a new broad gauge line from Thanjavur to Ariyalur. As a result, the travelling distance will be reduced by 100 kilometres and on the economic side, a large quantity of diesel may be saved. 
                                                                                                         
*m05 PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): Sir, I must thank Shri Raju Shetty for bringing this Resolution on farmers, highlighting their cause. He is from Ichalkaranji in Kolhapur district of western Maharashtra. He is a prosperous sugarcane farmer himself. He understands the problem of farmers. He has won his election, without support from either the UPA or the NDA, on his own strength. He had also won the last time. So, he must be having a lot of credibility among the farmers. It is good that he has brought this Resolution.
मैं यहाँ पर यह बोलने के लिए खड़ा नहीं हुआ हूँ कि आज़ादी के बाद देश में खेती में कुछ नहीं हुआ है। मैंने बचपन में देखा था कि अमेरिका से पीएल-480 गेहूँ आता था, तो हमारे राशन के दूकान चलते थे।  Today India is self-sufficient in food grains. हम हर प्रकार की चीजें बाहर एक्सपोर्ट भी करते हैं। लेकिन इतना कुछ करने के बावजूद आज भी किसानों की हालत खराब है। यहाँ पर मेरे कहने का मतलब यह है कि क्या हुआ है, उसके साथ हम अभी भी क्या कर सकते हैं और भविष्य में क्या करने की जरूरत है?
          सभापति महोदय, यह बात सब लोग बोल चुके हैं कि डॉ. स्वामीनाथन कमिशन नवम्बर, 2004 में गठित हुआ, जिसने चार रिपोर्टें दिसम्बर, 2004 में, अगस्त, 2005 में, दिसम्बर, 2005 में और अप्रैल, 2006 में दी। उसके बाद तत्कालीन सरकार, यूपीए-वन की सरकार द्वारा नेशनल पॉलिसी ऑन फार्मर्स 23 नवम्बर, 2007 में लाया गया। फिर for preparing the course of action, एक इंटरमिनिस्ट्रियल कमेटी बनी। अभी एग्रीकल्चर में भारत सरकार के कई मिशन काम कर रहे हैं। श्री संजीव कुमार बालियान हैं...(व्यवधान)
इनका तो मुज़फ्फरनगर में बहुत नाम है।  उनका एक बयान आया है। वे बोलते हैं कि पांच मिशन्स काम कर रहे हैं -नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन,मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर,मिशन ऑन ऑयल सीड्स एंड ऑयल पाम,मिशन ऑन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन एंड टेक्नोलॉजी,मिशन ऑन इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टीकल्चर। इनके अलावा भी एक नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस प्रोग्राम है,इंटिग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चरल कोआपरेशन है,इंटिग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चरल मार्केटिंग है,एग्रीकल्चरल सेंसस पर एक स्कीम है और इकोनोमिक सर्विस के लिए एक स्कीम है। स्टेट लेवल पर राष्ट्रीय कृषि विकास योजना है,जो यूपीए सरकार की योजना है,उसे दोहराया गया है। पार्लियामेंट में एक प्रश्न के जवाब में ही बालियान साहब ने बताया है,मैं उसी को कोट कर रहा हूं। अभी तक नया कुछ नहीं हुआ है। मैं यह बताना चाहता हूं कि इसके बाद,दस साल के बाद अभी भी फार्मर्स की हालत खराब है। हमारी एग्रीकल्चरल ग्रोथ चार प्रतिशत हुई है। अभी हमारे पास रिकॉर्ड फूडग्रेन्स स्टॉक है,अगर एक साल सूखा भी पड़ेगा,तो हम लोगों को खिला सकते हैं,लेकिन किसान की हालत क्या है?अभी भी फूड्स एंड वेजिटेबल्स की स्पवॉयलेज,जो खराब हो जाता है,तीस प्रतिशत है। किसानों के लिए कोई हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है। केवल 14 प्रतिशत फार्मर्स क्रॉप इंश्योरेंस से कवर्ड हैं। अभी तक क्रेडिट उन तक नहीं पहुंचा है। वर्ष 2008 में सरकार एक डेट-वेवर स्कीम लाई थी,लेकिन उसके बाद छः साल बीत गए हैं,फिर अब एक बार डेट-वेवर स्कीम की जरूरत है किसानों को बचाने के लिए,नहीं तो हम लोग किसान को सुसाइड से नहीं बचा सकते हैं। इस बारे में यूपीए और एनडीए,दोनों सरकारों का रिकॉर्ड बहुत खराब है क्योंकि किसानों की सुसाइड चलती रहती है। आपको सुनकर अचरज होगा कि कितने लोगों ने सुसाइड किया। एनडीए के समय में उनकी संख्या ज्यादा थी,यूपीए के समय में संख्या थोड़ी घटी थी। वर्ष 1999 में 16082 किसानों ने सुसाइड की,वर्ष 2000 लगभग 16603 किसान,वर्ष 2001 में 16415 किसान,वर्ष 2002 में 17971 किसान,वर्ष 2003 में 17160 किसानों ने सुसाइड की,जो एनडीए रिजीम में सबसे अधिक थी। यूपीए रिजीम के पहले साल में सुसाइड की संख्या हाई थी - 17368, उसके बाद फार्मर्स सुसाइड थोड़ी घटी। वर्ष 2010 में यह संख्या 15964 थी, वर्ष 2011 में 14027 और वर्ष 2012 में 13750 किसानों ने सुसाइड की। There was a declining trend in suicide, but that is no re-assurance. इसका मुख्य कारण क्या है? It is because farming is becoming less and less remunerative, and more and more capital-intensive. किसान फार्मिंग करने के लिए उधार लेता है और डेट में फंस जाता है,इसीलिए फार्मर सुसाइड करता है। इसी तरह से एक पॉलिसी होती है,जैसे विदर्भ के कॉटन फार्मर्स क्यों सुसाइड करते हैं,क्योंकि अचानक हम लोग कॉटन इम्पोर्ट करते हैं,कॉटन का प्राइस घट जाता है। इस तरह से पॉलिसी की वजह से भी लोग सुसाइड करते हैं। सबसे खराब हालत है पंजाब के किसानों की। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने एक सर्वे किया,उसकी रिपोर्ट आई। पंजाब की तीन यूनिवर्सिटीज ने एक सर्वे किया है,उसकी रिपोर्ट आई है। It states that : “…6,926 farmers committed suicide during 2000-2010. The situation is very bad in a State, which is known for high productivity of its farmers.” This is the maximum in the Sangrur District of Punjab. वहां पर ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। अब सवाल क्या है,बड़ा सवाल यह है कि हमारे किसान को जितना इनपुट चाहिए,वह उसे देना पड़ेगा। इनपुट में क्या चाहिए,उसे क्वालिटी सीड्स चाहिए,इरीगेशन के लिए पानी चाहिए,फर्टिलाइजर चाहिए और एग्रीकल्चरल क्रेडिट चाहिए। दुख की बात यह है कि आज़ादी के 67 साल भी हमारी कृषि में forty per cent of our agriculture is still rainfed. अब भी हम मानसून पर निर्भर हैं,अल नीनो आता है या नहीं,यह देखते हैं कि sixty per cent of gross cropped area and 45 per cent of total agricultural input. हम केवल आसमान की ओर देखते हैं कि अल नीनो आ रहा है,कितना शार्टफाल होगा मानसून में,फिर हम इरीगेशन में कवर नहीं कर पाते। हमने अभी तक कोई सॉलिड मैथेड नहीं बनाया है कि कैसे किसान को अच्छे दाम पर इनपुट दिया जाएगा और कैसे किसान को उसके उत्पादन का ठीक दाम मिलेगा। यह सही है कि हमने एमएसपी बढ़ाया है,लेकिन स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया है that the Minimum Support Price should be 50 per cent higher than the weighted cost of farming. एक क्रॉप प्रोडय़ूस करने के लिए जितनी लागत आती है,उससे 50 प्रतिशत ज्यादा देना चाहिए,तब कोई केपिटल फार्मेशन होगा। लेकिन आज तक यह हमारे मुल्क में नहीं हुआ है।
          अभी भी हमारी प्रोडक्टिविटी कम है। स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट में बताया है, how far behind we are in productivity of crops. दुनिया में पैडी प्रति हेक्टेयर किलोग्राम अगर लेते हैं तो भारत में 2929, चीन में 6321, जापान में 6414, यूएसए में 6622, मतलब we are almost one-third of the productivity of USA, China or Japan in matters of paddy. In matters of wheat, भारत में प्रति हेक्टेयर किलोग्राम अगर देखें तो वह है 2583, चीन में 3969, यूएसए में 2872 यानि गेहूं में भारत की प्रोडक्टिविटी अच्छी है। एक समय कहा जाता था कि पंजाब का किसान टैक्सास के किसान के समान प्रोडक्टिविटी देता है।
          सभापति जी,आप शूगर केन में देखें। यहां राजू शेट्टी जी बैठे हैं। इसमें हमारी उत्पादन क्षमता प्रति हेक्टेयर 68012, चीन में 85294 और यूएसए में 80786 इसका मतलब यह है कि हमारे यहां उत्पादन क्षमता और बढ़ाई जा सकती है।
          सभापति जी,मैं कुछ सुझाव देना चाहूंगा,क्योंकि मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता। मैं यह कहना चाहता हूं कि स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट आज की तारीख में आउटडेटेड हो गई है,क्योंकि वह रिपोर्ट आए आठ साल हो गए हैं,इस बीच एग्रीकल्चर में बहुत सारे बदलाव आए हैं। इसलिए सरकार को चाहिए  कि वह नया कृ­िा आयोग गठित करे। सरकार को एक फ्रेश एग्रीकल्चर पालिसी भी बनानी चाहिए और लागू करनी चाहिए। इसी तरह फ्रेश डेट वेवर की भी व्यवस्था करें,जैसा चिदम्बरम जी ने 2008 में किया था। जेटली जी को भी एक डेट वेवर की व्यवस्था करनी है, cover more farmers under crop insurance and convert micro-finance into livelihood finance. इस हाउस में चर्चा हुई इनटू लाइवलीहुड फाइनेंस। केवल खेती के लिए पैसा देने से ही कुछ नहीं होगा,उसे बचाने के लिए भी पैसा देना चाहिए।

17.00 hrs.  किसान को फैमिली हैल्थ इंश्योरेंस देना जरुरी है क्योंकि उन्हें कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं है। आप इंश्योरेंस में विदेशी पैसा लाना चाहते हैं लेकिन उसके पहले हमारा अपना हैल्थ इंश्योरेंस किसान को देने का प्रयास करें।

          हमारे बंगाल में नया ग्रीन रैवोल्यूशन हो रहा है। ईस्टर्न इंडिया में पैडी का पैदावार बहुत ज्यादा बड़ रहा है,इसे सस्टेन करना है क्योंकि पंजाब में वह शिखर पर पहुंच गया है। हमारे ईस्टर्न साइड में पैडी की पैदावार में बहुत बढ़ोत्तरी हो सकती है। मैं माननीय राजू शेट्टी को फिर धन्यवाद देना चाहता हूं कि वह सदन के माध्यम से किसान की हालत को देश के ध्यान में लाया। मेरे ख्याल में केवल स्वामीनाथन कमीशन नहीं बल्कि आज की किसान की हालत को देखते हुए एक नया कमीशन होना चाहिए और सरकार की तरफ से एक नेशनल पॉलिसी ऑफ फार्मर्स आनी चाहिए।

                                                                                                           

*m06 SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): I stand here today to participate in the discussion that has been moved by our colleague Shri Raju Shetty on a specific Resolution which has two parts.  One is the operative part and the other is the result which he intends to get.  The operative part is that the Government should take effective steps to implement the recommendations of the National Commission on Farmers, also known as Swaminathan Commission.  In his speech, Shri Shetty has elaborated as to what are the steps which need to be taken.  I am of the opinion that certain steps have already been taken when the Prime Minister spoke on Vote of Thanks given to the hon. President of India.  Subsequently, in the Budget, certain other declarations have also been made.  But he wants to convey that if the Government wants to implement the recommendations in toto, we can overcome the crisis in agriculture sector.

17.03 hrs                           (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair)           I was trying to understand how far he has identified the crisis in Indian agriculture.  He has, of course, with his experience mentioned certain crises that the Indian agriculture is facing but that is not all.  We have different types of farmers in our country.  There was a time about which my previous speaker Prof. Saugata Ray mentioned.  At one point of time, eastern India was the granary of the whole undivided India i.e. including Myanmar, Bangladesh, Pakistan and even to a great extent Afghanistan.  Eastern India was providing foodgrains to all parts of the country.   It had very little irrigation facility and it was totally dependent on rain.  Subsequently, we started Green Revolution.  Then, embankments were created, large dams were constructed and the flow of irrigation started and western Uttar Pradesh and Punjab were shown the way.  Subsequently Hirakud, Damodar valley and all other projects were started.  The focus slowly shifted towards western India, and eastern India was totally neglected.  It was only during the previous UPA-II Government the then Finance Minister who is the present hon. President of India, made a course correction. Only Rs.100 crore was provided during his second or third Budget. He said: “Let us focus and bring in a second Green Revolution and Eastern India should become the laboratory of how we can increase our productivity.” It was not his idea alone. It was Dr. M.S. Swaminathan who was propagating this idea to have the Eastern India, which was the granary of 18th or 19th or even early part of 20th century of this sub-continent, to be the focus. Why not develop our agricultural produce in that area because the Western part of the country has been saturated? I was trying to find this out. It has five volumes. Prof. Roy mentioned about four volumes. The last volume listed a number of suggestions, which came in 2006.

          I would say here that we have to remember two specific dates. I want to confine my deliberations today on that. One is the year of 2004, the period in which these five reports were compiled and then the period of October 2006. It was during these two years in 2004 – I would like the Members to recollect – that the Eastern coast of our country faced severe tsunami including large areas of Tamil Nadu Coast and even Andhra Pradesh. The total livelihood of fishermen was shattered. When we talk of farmers, it is not only the cultivators; fishermen also come under that category. In that respect, I would say that it started in 2004. In 2006, the Kashmir Valley witnessed the earthquake. There were large areas of our country which also witnessed severe flood. So, in October 2006, there was severe earthquake in Kashmir, flood in Tamil Nadu and other parts of the country witnessed severe floods, acute shortfall of rain and drought-like situation was there in these years.

          It is common knowledge that institutional support to small farmers today is very weak. The same is true of post harvest infrastructure. Do we not see paddy being spread on the roads for drying in many places when we travel in our constituency? What does that signify? That signifies the poverty of our cultivators, of our farmers. Hardly ten per cent of farmers are covered by crop insurance. Farm families are also not covered by health insurance. There is no Agriculture Risk Fund. Both risk mitigation and price stabilization are receiving inadequate policy support. Shri Shetty is a very progressive farmer of our country. He is having one of the most progressive Shetkari Sangathan, the farmers’ union of our country which is very vocal to protect the interest of the farmers. … (Interruptions)

 

SHRI MD. BADARUDDOZA KHAN (MURSHIDABAD): Sir, I am on a point of order. There is no quorum in the House. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON : The bell is being rung- Hon. Members, there is no quorum in the House.

          The House stands adjourned to meet again on 4th August, 2014 at 11.00 a.m.   17.20 hrs The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, August 4, 2014/Shravana 13, 1936 (Saka).      

                                                                                             

*ण्ड्ढ म्श्र्द अ र्ठ्ठद्धत्ड्ढड्ड ठ्ठडदृध्ड्ढ ण्ड्ढ दठ्ठर्ड्ढ दृढ ठ्ठ ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्ध त्दड्डत्हठ्ठय्ड्ढद्म् ण्ठ्ठद्य् ण्ड्ढ र्द्वड्ढद्य्त्दृद र्ठ्ठद्म् ठ्ठहय्द्वठ्ठथ्न्र् ठ्ठत्ड्ढड्ड दृद ण्ड्ढ ढथ्दृदृद्ध दृढ ण्ड्ढ Hदृद्वम्ड्ढ डन्र् ण्ठ्ठद्य् ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्ध.

*Eदर्थ्त्द्म्ण् य्द्धठ्ठदथ्ठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ म्द्रड्ढड्ढहण् दृद्धश्र्त्दठ्ठथ्न्र् ड्डड्ढथ्त्ध्ड्ढद्धड्ढड्ड त्द र्ठ्ठर्त्थ्.

 

*Eदर्थ्त्द्म्ण् य्द्धठ्ठदथ्ठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ म्द्रड्ढड्ढहण् दृद्धश्र्त्दठ्ठथ्न्र् ड्डड्ढथ्त्ध्ड्ढद्धड्ढड्ड त्द र्ठ्ठर्त्थ्.

 

*च्द्रड्ढड्ढहण् र्ठ्ठद्म् थ्ठ्ठत्ड्ड दृद ण्ड्ढ र्ठ्ठडथ्ड्ढ   *च्द्रड्ढड्ढहण् र्ठ्ठद्म् थ्ठ्ठत्ड्ड दृद ण्ड्ढ र्ठ्ठडथ्ड्ढ   *च्द्रड्ढड्ढहण् र्ठ्ठद्म् थ्ठ्ठत्ड्ड दृद ण्ड्ढ र्ठ्ठडथ्ड्ढ *च्द्रड्ढड्ढहण् र्ठ्ठद्म् थ्ठ्ठत्ड्ड दृद ण्ड्ढ य्ठ्ठडथ्ड्ढ.

*च्द्रड्ढड्ढहण् र्ठ्ठद्म् थ्ठ्ठत्ड्ड दृद ण्ड्ढ र्ठ्ठडथ्ड्ढ   *च्द्रड्ढड्ढहण् र्ठ्ठद्म् थ्ठ्ठत्ड्ड दृद ण्ड्ढ र्ठ्ठडथ्ड्ढ   *ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.

*ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.