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Lok Sabha Debates

Further Discussion On Demands For Grants Nos. 46 To 49 Under The Control Of ... on 27 April, 2012

> Title: Further discussion on Demands for Grants nos. 46 to 49 under the control of Ministry of Health and Family Welfare (Discussion concluded).

*श्री हंसराज गं. अहीर (चन्द्रपुर):    सरकार ने सामान्य बजट 2012‑13 के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अनुदान मांगों को सदन में विचार करने और पारित करने के लिए रखा है। देश में स्वास्थ्य सुविधा की सरकार द्वारा उपेक्षा करने से आम आदमी पीड़ित है। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी नीति में बदलाव और स्वास्थ्य  पर अधिक खर्च करने के लिए बजटीय आवंटन बढ़ाने की आवश्यकता है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा के अंतर्गत डाक्टर, नर्स और विशेषज्ञों की कमी है। ग्रामीण क्षेत्र में प्रशिक्षित डाक्टर सेवा के लिए जाना पसंद नहीं करते। सरकार  द्वारा एमबीबीएस के प्रशिक्षण पश्चात एक वर्ष के लिए ग्रामीण क्षेत्र में सेवारत रहने की अनिवार्यता से बुरा असर पड़ा है। इसके लिए आर्थिक दंड भर कर वे छुटकारा पाकर शहरों में सेवा देना अधिक पसंद करते हैं। इसके कारण ग्रामीण स्वास्थ्य  सेवा में डाक्टरों की कमी होकर वह चरमरा गई है। सरकार ने जो मेडिकल कालेज खोले और निजी क्षेत्रों को अनुमति दी, वह अधिकतर बड़े शहरों में है। इसलिए डाक्टर ग्रामीण क्षेत्र में नहीं जाते। इसलिए मैं सरकार से मांग करता हूं कि ग्रामीण क्षेत्रों, जनजाति आदिवासी क्षेत्रों में मेडिकल कालेज और अस्पताल खोले जाने चाहिए। इससे डाक्टरों में ग्रामीण क्षेत्र में सेवा की भावना पैदा हो सकती है।

          पिछले दिनों हंगामा सर्वेक्षण  ने देश के 42 फीसदी बच्चे कुपोषित होने की बात कही, साथ ही महिलाओं में रक्ताल्पता की बात उजागर की। हमारे प्रधानमंत्री इसे राष्ट्रीय शर्म की बात कह कर मामले की गंभीरता को टाल गये। यह राष्ट्रीय शर्म की नहीं सरकार के कर्म की बात है। लेकिन सरकार की इस संबंध में टिप्पणी घोर निराशा पैदा करती है।  देश का बचपन कुपोषित होगा तो हम स्वस्थ देश का निर्माण कैसे कर सकते हैं? इसका भी सरकार को विचार करना चाहिए। देश के बच्चों में व्याप्त कुपोषण और महिलाओं में रक्ताल्पता को दूर करने के लिए विशेष कार्यक्रम, अभियान चलाने की आवश्यकता है। महंगाई के कारण पोषक आहार की कमी को भी दूर करना पड़ेगा। सरकार को इस पर विशेष ध्यान देने का अनुरोध करता हूं।

          महाराष्ट्र सरकार ने अपने राज्य में चार मेडिकल कालेज के प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास भेजे हैं। चन्द्रपुर का नाम उसमें नहीं है। लेकिन चन्द्रपुर औद्योगिक क्षेत्र के साथ जनजातीय और नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहां पर स्वास्थ्य सुविधा की अपेक्षाकृत अधिक आवश्यकता है। इसलिए चन्द्रपुर में मेडिकल कालेज बने, इसके लिए सरकार तत्काल कदम उठाये। इसी तरह दुर्गम, बीहड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा की पहुंच बढ़ाने के लिए सभी सरकारी अस्पतालों का उन्नयन कर वहां मेडिकल कालेज बनाने के लिए सरकार कदम उठाये। निजी क्षेत्रों पर स्वास्थ्य सुविधा की निर्भरता खत्म करने के लिए सरकार  से इस पर अधिक निवेश करने का आह्वान करता हूं।

          सरकार ने अब हर जिला अस्पताल तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में स्वास्थ्य सेवा के लिए शुल्क लगाया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब लोगों को तकलीफ होती है। बाहर से महंगी दवाइयां खरीदना उसके बूते से बाहर है। इसलिए मैं सरकार से मांग करता हूं कि प्रत्येक जिला अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, स्वास्थ्य उपकेन्द्रों में सरकार के द्वारा मेडिकल स्टोर चलाकर उचित मूल्यों पर वहां दवाइयां उपलब्ध करा दे। सरकार से मेरा आग्रह है कि इस प्रस्ताव का अनुपालन करवाने के लिए कदम उठाये। इससे नकली दवाइयों के व्यापार और दवाइयों की मुनाफाखोरी पर नकेल कस सकते हैं और गरीब लोगों को उचित मूल्य पर दवाइयां उपलब्ध हो सकती हैं। सरकार की देश की धरोहर  "आयुर्वेद " की ओर उपेक्षा दिखाई दे रही है। आज आयुर्वेद के क्षेत्र में चीन हमसे आगे निकलता दिखाई दे रहा है। चीन ने आयुर्वेद को निर्यातक्षम व्यापार बनाया, लेकिन हम संभावना होते हुए भी पिछड़ गये हैं। हमारे यहां पारम्परिक तरीके से आयुर्वेद औषधियों के द्वारा उपचार होता है, यह कारगर भी है, लेकिन उसकी वैज्ञानिक उपयोगिता को चिन्हित करके इसका उपयोग बढ़ाने के लिए सरकार को ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। इसी तरह मध्य भारत के सिकलेसेल बीमारी की भी उपेक्षा हो रही है । सिकलेसेल के निर्मूलन और रोकथाम के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए। इसके उपचार की सर्वांगिक व्यवस्था और मुफ्त औषधियां, रक्त उपलब्ध कराने के साथ इसके अत्याधुनिक उपचार के लिए संशोधित परियोजना भी चलानी चाहिए। मति मंद के कारणा विकलांगता आती है। इससे परिवार में त्रासदी निर्माण होती है। मति मंदों को शिक्षा, आजीविका उपलब्ध कराने में कठिनाइयों को देखते हुए मति मंदो के उपचार को जिला स्तर पर उपलब्ध कराने तथा इसके अत्याधुनिक उपचार पद्धतियों को सर्वांगिक करने के लिए संशोधन परियोजना शुरू करने की आवश्यकता है।

          सरकार ने एम्स के कार्यकलापों को सुव्यवस्थित करने के लिए डा0वेलीनाथन समिति गठित की थी, उसकी सिफारशों को स्वीकार कर सरकार को कारवाई करनी चाहिए। एम्स में आज सभी रोगों के साथ अतिविशिष्ठ रोगों का उपचार होता है। इसलिए एम्स हमारे स्वास्थ्य सेवा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। डा0 वेलीनाथन समिति ने एम्स का महत्व बढ़ाने के लिए वहां पर रिसर्च डीन के अतिरिक्त पद के निर्माण की सिफारश की थी। यह महत्वपूर्ण सिफारश है। सरकार  एम्स के माध्यम से स्वास्थ्य के क्षेत्र में संशोधन कराने के लिए रिसर्च डीन की नियुक्ति करे। स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार को बहुत कुछ करना है। मैं अपने उक्त सुझावों पर अमल करने का अनुरोध करता हूं।

                                 

*SHRI R. THAMARAISELVAN (DHARMAPURI): At the outset, I would like to state that India has been spending less than 2% of GDP on health and whereas nations much smaller in all terms spend  more than what we do.  There has been a long pending demand to increase the spending on health at least 2.5% of GDP.  Therefore, the allocation provided in the budget is not in that direction and shattered the hope of the people.

          The country has been witnessing vector borne diseases in many forms.  Every year and in every season, the country loses its citizens due to the above diseases.  We are not taking a permanent step to prevent these possible diseases.

          Our hospitals are ill equipped and have shortage of adequate life saving drugs. In remote rural area the story is entirely different.  The people have to walk or drive hours to reach a doctor or hospital.  By the time he or she gets into the clinic or hospital, the condition deteriorate.  While healthcare as an industry is being termed as a sunrise sector, public health is still a neglected area in both urban and rural areas.  The allopathic doctor –population ratio at present stands at 1:1,722 according to the Medical Council of India.  This is quite alarming.  I do agree that the Governments in power had taken many measures to enforce doctors to conduct practice in rural areas.  But I don’t see any much progress in it.  The doctors are still unwilling to go to rural areas depriving the poorer section of our society the much needed medical care. Therefore, there is an urgent need to look into it afresh with more incentives offer and working environment to the doctors who are willing to go to rural areas.

          Another thing which I would like to mention here is pertaining to diseases like cancers of all forms, diabetics, heart ailments, etc. As per a report appeared in all the national newspapers there were more than 5.6 lakh deaths in 2010 due to cancer.  Cancer is a disease which can be cured at the initial stage and one can avoid it also by changing his or her lifestyle.  What we need right now is to pass on to the general public through a wide mass awareness campaign about cancer and its symptoms of growth, since early diagnosis will help to have a lease of life.  Moreover, for the treatment of cancer, it involves a lot of money which poorer people cannot afford.  Therefore, the government should make facilities for cancer treatment at all government run hospitals both under State as well as Central Government. Similarly, heart ailment has become a great risk in our society.  We cannot measure the longevity of person with whom we interact or share.  Such is the risk involved.  Again in this case also treatment costs heavy which poorer section cannot afford.  Now, the Hon’ble Prime Minister’s National Relief Fund is the only solace for the poor family to go in for various medical treatments and this scheme is also quite popular in all parts of the country.  But what the people have been complaining is that the fund released under this scheme, is quite insufficient to bear the expenditure.  Therefore, there is a need to enhance the allocation of fund for various treatments under the Hon’ble Prime Minister’s National Relief Fund.  I knew that this is not a subject to be raised here, but it is very much connected with the subject which I am talking here.

          As stated earlier, we need to create mass awareness among the masses about all life-risk diseases through print as well as electronic media.  For the information of all assembled here, I would like to say that if the country is proud of having produced a record production of foodgrains, it is because of the mass awareness created through the print and electronic media for the farming community.  Therefore, to protect the precious life of our citizens we should adopt the same method of mass communications.

          Another thing which I would like to mention here is that there is an urgent need to modernize all the government hospitals in the country and should be equipped with modern equipments and devices and the hospitals should be made more hygienic and a special drive should be initiated.  One more thing which I would like to mention over here is that today health sector has become a prospective business avenue for even persons not related to health sector.  Many corporate houses have joined in the lead.  Today, we can see many more private hospitals in all major cities and towns across the country and you will not find anything in rural areas. So, their motives are to make money. It has been reported that the casualty ratio as compared to government hospitals, is quite high in private hospitals. Nobody knows why?  But the reality is that these private hospitals, mostly run by corporate houses to make their balance sheet much stronger make the in patients weaker by delaying the treatment and ultimately making a victim of this malpractice.  This is the reason why I said  the casualty ratio is quite higher in corporate run private hospitals.  They charge exorbitant rate from the patients and whereas they employ part-time inexperienced doctors who are already on the panel of several hospitals. The other paramedical staff of these private hospitals lack experience.  What I accept about the private hospital is their top class building and cleanliness, nothing else.  Here, I would like to say about one case.  One patient in Fortis Hospital, Vasant Kunj died on 06.09.2009 on the bed in the presence of several doctors and the reason stated for his death was cardiac arrest.  This itself shows how capable are they. Even they could not save a life of person even in their hospital.  The reason for mentioning all these here is to impress upon the government to make a regulatory body to vouch the functioning of the private hospitals and to make them accountable.  I had raised the same issue earlier as well and again I stress here to pay little attention to create a regulatory body to regulate the functioning of private hospitals as we cannot allow the private hospitals to become money minting place and a killing spot.

               

MADAM CHAIRMAN : Now, the House will take up Item no. 17.  Shri Ghulam Nabi Azad.

   

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री (श्री गुलाम नबी आज़ाद): माननीय अध्यक्ष महोदया, मेरी जानकारी के मुताबिक स्वास्थ्य मंत्रालय की डिमांड्स फार ग्रांट पर तकरीबन 27-28 वर्ष बाद सदन में चर्चा हो रही है। शायद इससे पहले अप्रैल 1985 में जब स्वर्गीय राजीव गांधी जी प्रधानमंत्री थे, स्वास्थ्य मंत्रालय की डिमांड्स फार ग्रांट पर चर्चा हुई थी। पिछले 26-27 सालों में स्वास्थ्य मंत्रालय में क्या हुआ और कहां पहुंचा, यह कहना तो संभव है लेकिन विशेष रूप से पिछले सात सालों में यूपीए-1 और यूपीए-2 में क्या हुआ, मैं इसके बारे में कुछ संक्षेप में जिक्र करना चाहता हूं। मैं सबसे पहले सभी सदस्यों का, चाहे इधर के हों, विपक्ष के हों या रूलिंग पार्टी के हों, बहुत धन्यवाद करता हूं। तकरीबन 30 संसद सदस्यों ने अपने विचार प्रकट किए और अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा करके सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

     सभापति महोदया, मैं सबसे पहले नेशनल रूरल हैल्थ मिशन से अपनी बात शुरु करता हूं। मैं इसके लिए देश के माननीय प्रधानमंत्री, यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी, यूपीए के सभी साथियों और घटकों को बधाई देना चाहता हूं। वर्ष 2005 में नेशनल रूरल हैल्थ मिशन शुरु हुआ। हम सब जानते हैं कि स्वास्थ्य स्टेट सब्जेक्ट है लेकिन केंद्र सरकार, यूपीए सरकार ने महसूस किया कि 60 वर्षों में राज्यों में जितने डिस्ट्रिक्ट, सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पताल, प्राइमरी हैल्थ सैंटर और सब-सैंटर बनने चाहिए थे, जिन्हें बनाने में राज्य सरकार को दिक्कतें आई थी और नहीं बना पाए थे, जितनी दवाइयां देनी चाहिए थी शायद नहीं दे पाए। यूपीए सरकार ने इसलिए स्टेट सब्जेक्ट होने के बाद भी निर्णय लिया कि केंद्र की तरफ से राज्य सरकार को मदद दी जाए। वित्त मंत्री श्री प्रणब जी यहां मौजूद हैं। मैं प्लानिंग कमीशन और वित्त मंत्री जी को बहुत बधाई देना चाहता हूं। कुछ वर्षों में शुरु में जितना पैसा दिया गया उसे इस्तेमाल करने में दिक्कत आई थी। मुझे खुशी है कि पिछले तीन साल यानी 2008-09, 2009-10, 2010-2011 से अब राज्य सरकारें पैसे का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं। 2008-09 में एक्सपेंडिचर 110 प्रतिशत हुआ, 2009-10 में 115 प्रतिशत और 2010-11 में 125 प्रतिशत हुआ। अब राज्य सरकारों ने सीख लिया है कि किस प्रकार पैसे का इस्तेमाल किया जाए।

          महोदया, जहां तक इफ्रास्ट्रक्चर की बात है। जैसा मैंने शुरु में कहा कि राज्य सरकारों के पास इतने साधन नहीं थे कि वे डिस्ट्रिक्ट, सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पताल, प्राइमरी हैल्थ और सब-सैंटर्स बनाते। अब इस पैसे के तकरीबन डिस्ट्रिक्ट अस्पताल लैवल से लेकर प्राइमरी हैल्थ सैंटर तक बनाए गए हैं। नेशनल रूरल हैल्थ मिशन की मदद से 20250 अस्पताल बने। जिनको रेनोवेट किया गया या कमरों की संख्या बढ़ाई गई, जिसे अपग्रेडेशन कहते हैं, इनकी 18883 संख्या हुई। इसी तरह प्राइमरी हैल्थ सैंटर जो 24 घंटे खुले रहते हैं केंद्र सरकार की मदद से 8250 बनाए गए।  इन तमाम चीजों की निचले स्तर से लेकर ऊपर तक, गांव से लेकर ऊपर तक किस तरह से एक लड़ी जोड़ी जाए, एक गांव से लेकर केन्द्रीय सरकार तक जोड़ा जाए। केन्द्रीय सरकार ने एक नई स्कीम सोची कि किस तरह से हर गांव के बच्चे तक पहुंचा जाए और हर गांव की जो गर्भवती महिला है या शादी के बाद गर्भवती होने वाली है, उस तक कैसे पहुंचा जाए। आशा, जो एक महिला है, वह वहां बैठाई जाए। मुझे खुशी है कि हमारे पूरे देश में आज 8 लाख 61 हजार आशा वर्कर्स हैं। इनमें से सात लाख से ज्यादा को ट्रेनिंग दी गई है और 7 लाख 82 हजार को मुख्तलिफ बीमारियों के टैस्ट करने के लिए किट दिये गये हैं और उन्हें ट्रेनिंग भी दी गई है। ऐसा नहीं है कि उन्हें खाली बैठाया गया है। हर चीज का काम करने के लिए उन्हें तनख्वाह तो नहीं दी जाती है, लेकिन जो भी वे काम करेंगी, उसके लिए उन्हें पैसा दिया जाता है।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):आप उनका मानदेय फिक्स कराइये।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : यदि मानदेय फिक्स करेंगे तो दूसरी यूनियंस बनेंगी, यूनियनबाजी होगी और काम नहीं होगा।

श्री शैलेन्द्र कुमार : उन्हें रेट बहुत कम मिलता है, उनकी माली हालत ठीक नहीं है।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : आप जानते हैं कि उस गांव के लैवल पर बहुत सारे हमारे काम करने वाले लोग हैं। वे काम करते हैं या नहीं करते हैं, उनका पता नहीं चलता है। लेकिन यदि इस तरह से काम करना है  और यदि हम उन्हें इनसैन्टिव देंगे तो वे काम करेंगे, यदि तनख्वाह मिलेगी तो आप जानते हैं कि सरकारी दफ्तरों में तनख्वाह लेने के लिए सब बैठते हैं, यदि यहां भी पूरे देश में हम सबको लेकर इंसैन्टिवाइज होता तो जिस दिन काम करते, उस दिन हमें भत्ता मिलता और जिस दिन काम नहीं करते, उस दिन हमें कुछ नहीं मिलता तो वहां से लेकर सदन तक सब ठीक हो जाता। मेरे ख्याल में इनसैन्टिव बढ़ाये जाने की बात कर सकते हैं, लेकिन जिस दिन आपने फिक्स किया उस दिन से कोई काम नहीं होगा। वे कहेंगे कि अब तो महीने के बाद तनख्वाह मिलनी है, इसलिए अब काम करने की जरूरत क्या है।

श्री रेवती रमण सिंह : आप उनका इनसैन्टिव बढ़ा दीजिए।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : आप उसे फिक्स मत बोलिये, बल्कि इनसैन्टिव बढ़ाने की बात कीजिए। आपकी वह बात मैं मानता हूं।

          इसी तरह से तकरीबन 30,420 रोगी कल्याण समितियों की स्थापना हुई और डिस्ट्रिक्ट हास्पीटल के लिए एक अनटाइड फंड दिया गया है। डिस्ट्रिक्ट हास्पीटल के लिए बहुत सारी चीजों की जरूरत थी वहां दवाईयां चाहिए, परदे नहीं हैं, कुर्सी नहीं हैं, इंजैक्शंस नहीं हैं और भी अन्य चीजें भी नहीं हैं। उसके लिए यहां से हर जिला अस्पताल को पांच लाख रुपये दिये जाते हैं, सीएचसी को एक लाख रुपये दिये जाते हैं और प्राइमरी हैल्थ सैन्टर को एक लाख रुपये दिये जाते हैं और इस तरह से ये कई सौ करोड़ रुपये हो जाते हैं। इसी तरह से विलेज हैल्थ सैनिटेशन एंड न्यूट्रीशन कमेटी बनाई गई हैं, इनकी तकरीबन पांच लाख की स्थापना हुई है और उसे भी दस हजार रुपये सालाना दिये जाते हैं।

श्री रेवती रमण सिंह : कमेटियां कहां बनती हैं?

श्री गुलाम नबी आज़ाद : इन्होंने बहुत ही अच्छा सवाल पूछा है। जितना भी केन्द्रीय सरकार से पैसा जाता है, वह खाली इस स्कीम के अंदर नहीं जाता है, बल्कि जो इस तरह की बहुत सारी स्कीमें हैं, उनमें भी जाता है। इसके लिए केन्द्रीय सरकार के पास इतनी मशीनरी नहीं है, इसके लिए हजारों, लाखों लोग चाहिए। मेरे ख्याल में अगले पांच साल में मैंने प्लानिंग कमीशन से भी जिक्र किया था कि इस स्कीम के लिए और अगली स्कीम के लिए जब तक कि एक मानीटरिंग सिस्टम डिस्ट्रिक्ट तहसील लैवल पर नहीं होगा तो हम सदन में बोलते रहेगें, अखबारों में बोलते रहेंगे, लेकिन निचले स्तर पर लोग उन स्कीमों से वंचित रहेंगे। लेकिन मैं गुजारिश करूंगा कि हमारे मैम्बर पार्लियामैन्ट साहेबान, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, ये तमाम डिटेल्स हम उन्हें देने के लिए तैयार हैं। उनके लिए हर गांव में जाना असंभव होगा, चूंकि कई हजार गांव हैं। लेकिन कम से कम वे अपने वर्कर्स की जिम्मेदारी तय कर सकते हैं। अपने एमएलएज़ की जिम्मेदारी लगा सकते हैं कि इस तरह की जो कमेटियां हैं, क्या ये कमेटियां, चाहे वह रोगी कल्याण कमेटियां हों, जिनका मैंने उल्लेख किया कि वे तीस हजार से ज्यादा हैं या विलेज सैनीटेशन और न्यूट्रीशियन कमेटियां हैं, जिनकी संख्या पांच लाख है, चल रही हैं और जो उनको पैसा मिलता है, उसका उपयोग हो रहा है या दुरूपयोग हो रहा है या उसका कोई उपयोग ही नहीं हो रहा है।

श्री रेवती रमण सिंह : माननीय मंत्री जी, मेरा एक सुझाव था कि जो एमपी विजिलेंस कमेटी है, जैसे बहुत से सेंट्रल कार्यों की वहां मानीटरिंग होती है, अगर इसको उसके अंडर में कर दें, तो इसकी मानीटरिंग की व्यवस्था भी हो जाएगी।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : हम सभी को उसमें डालने के लिए तैयार हैं, लेकिन एमपी साहिबान को उसके लिए समय निकालना पड़ेगा। ...( व्यवधान)

श्री रेवती रमण सिंह : हम उसके लिए तैयार हैं।

अनेक माननीय सदस्य : हम समय निकालने के लिए तैयार हैं।...( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद : हम करने के लिए तैयार हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदया :  कृपया पहले मंत्री जी का रिप्लाई पूरा होने दीजिए।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : इसी तरह से मोबाइल यूनिट्स हैं, मोबाइल यूनिट्स भी गाड़ियों के दिए हैं।  तकरीबन 442 डिस्ट्रिक्तट्स को 1,952 गाड़ियां दी गयी हैं और यह एक यूनिट एक से तीन गाड़ियों का है।  ये गांवों में जाकर लोगों का इलाज करने के लिए हैं। एक बड़ी गाड़ी है, जो आधुनिक है, उसी गाड़ी में डायग्नोसिस हो सकता है, टेस्ट उसी गाड़ी में हो सकता है, छोटा-मोटा ट्रीटमेंट उसी में हो सकता है। ये गाड़ियां गांव में चली जाती हैं। एक गाड़ी में डाक्टर और बाकी चीजें होती है, उसमें सारे डायग्नोसिस के इंस्ट्रूमेंट्स लगे होते हैं और दूसरी गाड़ी में बड़े इक्विपमेंट्स और दवाइयां होती हैं और तीसरी गाड़ी में स्टाफ होता है। ये उन जगहों के लिए हैं जो दूर-दराज के इलाके हैं और गाड़ी जाकर उन्हीं गांवों में एक दिन एक गांव के लोगों का और दूसरे दिन दूसरे गांव में इलाज किया। लेकिन इसे भी देखने की जरूरत है कि ये कागजों में ही हैं या ये गाड़ियां वहां जाती हैं और इलाज करती हैं या नहीं करती हैं। इसी तरह से दो और किस्म की गाड़ियां नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में स्टेट्स को दी जाती हैं। एक है एडवांस इमरजेंसी एंबुलेंस और दूसरी एक साधारण एंबुलेंस सिस्टम है। ये दोनों मिलाकर 21 राज्यों में 14,500 इस तरह की एडवांस इमरजेंसी और बेसिक इमरजेंसी की एंबुलेंसेज राज्य सरकारों को दी गयी हैं।

          महोदया, जहां तक मैटरनल हेल्थ का, मातृ मृत्यु दर का सवाल है, यह हमारे देश के लिए बहुत चिंता का विषय है। बहुत से माननीय सदस्यों ने प्रश्न उठाया था कि हमारे देश में मातृ मृत्यु दर बहुत ज्यादा है, लेकिन जब से एनआरएचएम प्रोग्राम शुरू हो गया है, तब से उसमें कुछ फर्क आने लगा है। वर्ष 2002, वर्ष 2004 और वर्ष 2006 में यह संख्या 254 थी, यह घटकर अब वर्ष 2007-09 में 212 आ गयी है और हम आशा करते हैं कि अगले साल जो वर्ष 2010-2013 की रिपोर्ट आयेगी, उसमें यह संख्या 150 के आसपास होनी चाहिए। हमारा टारगेट 106 का है, डब्ल्यूएचओ का जो हमें वर्ष 2015 तक पूरा करना है। लेकिन किस तरह से यह मातृ मृत्यु दर कम हो जाये, उसके लिए पिछले सात साल में या पिछले दो साल में सरकार ने क्या प्रयास किया है? एक जननी सुरक्षा योजना वर्ष 2005 में सरकार ने शुरू की कि यदि अगर कोई गर्भवती महिला सरकार अस्पताल में बच्चे को जन्म देने के लिए जाये, जब वह अस्पताल में आयेगी, अगर वह गर्भवती महिला गांव की होगी तो बच्चे को जन्म देने के बाद अस्पताल से घर वापस जाते समय उसे 1,500 रूपये दिये जायेंगे। अगर वह गर्भवती महिला शहर की होगी तो उसे 1,000 रूपये दिये जायेंगे क्योंकि उसे नजदीक से आना है। इसके लिए आशा को, 600 रूपये गांव वाली को और शहर वाली को 200 रूपये दिये जाते हैं। इससे बहुत बड़ा फायदा हुआ। पहले ही साल में तकरीबन साढ़े सात लाख गर्भवती महिलायें सरकारी अस्पताल में बच्चों को जन्म देने के लिए पहुंची। पिछले साल जब हमने इसकी समीक्षा की तो वर्ष 2010 और वर्ष 2011 में यह संख्या पांच साल में साढ़े सात लाख से बढ़कर पिछले साल एक करोड़ तेरह लाख तक पहुंच गयी।   अब 1 करोड़ 13 लाख गर्भवती महिलाएँ प्रति वर्ष सरकारी अस्पतालों में अपने बच्चों को जन्म देने के लिए आती हैं। उससे यह फायदा होता है कि अस्पताल में जब जन्म देती हैं तो कोई भी कंप्लीकेशन हो तो दोनों माँ-बच्चों की ज़िन्दगी बचाई जाती है जो कि घर में असंभव है।

          महोदय, हमने देखा कि इस कार्यक्रम का बहुत अच्छा असर पड़ा, इसलिए हमने 2011 में एक नयी स्कीम बनाई जिसका नाम है जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, क्योंकि पहले स्कीम खाली गर्भवती महिलाओं के लिए थी, बच्चों के लिए नहीं थी। अब हमने जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम बनाया और इसको श्रीमती सोनिया गाँधी ने पिछले साल हरियाणा में मेवात से शुरू किया था। इसमें और सुविधाएँ दीं कि जो भी गर्भवती महिला सरकारी अस्पताल में आएगी, उसको वह 1500 रुपये और 1000 रुपये तो मिलते ही रहेंगे, लेकिन उसके अलावा अगर वह आएगी तो उसके आने और जाने का ट्रंसपोर्ट सरकार की तरफ से होगा। जब वह अस्पताल में आएगी तो उसके जितने भी टैस्ट और डाइग्नोसिज़ होंगे, वह मुफ्त होंगे, दवाएँ मुफ्त होंगी, खाना मुफ्त होगा और अगर सिज़ेरियन की ज़रूरत होगी तो सिज़ेरियन भी मुफ्त होगा। अगर खून देने की या ब्लड ट्रंसफ्यूज़न की ज़रूरत होगी तो वह भी मुफ्त होगा। अगर बच्चा बीमार पैदा हुआ तो उस बीमार बच्चे को ये तमाम खाना-पीना, खून देना एक महीने के लिए मुफ्त होगा और वापस जाते वक्त उसको फिर ट्रंसपोर्ट मिलेगा। इन तमाम चीज़ों के लिए पहले ही साल हमने राज्य सरकारों को सिर्फ इसी काम के लिए एडवांस में 1437 करोड़ रुपये दिये ताकि राज्य सरकार का कोई अस्पताल यह न कहे कि मेरे पास प्रावधान नहीं है, मुझे राज्य सरकार देगी या नहीं, मुझे सीएमओ देगा या नहीं, इसलिए हमने पिछले साल अप्रैल के महीने में पैसा लिया और उसके तीन महीने के बाद स्कीम लॉन्च की ताकि पैसा हर अस्पताल तक पहुँच जाए। मेरा सभी माननीय सदस्यों से, देशवासियों से तथा उन गर्भवती महिलाओं से निवेदन है कि वे सरकारी अस्पतालों में जाएँ और इन सुविधाओं का उपयोग कर इनसे फायदा उठाएँ।

डॉ. मिर्ज़ा महबूब बेग(अनंतनाग):ब्लड ट्रंसफ्यूज़न कैसे फ्री है? ...( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद : ब्लड ट्रंस्फ्यूज़न भी फ्री होगा। ब्लड डोनेशन के पैसे नहीं लेंगे। क्योंकि बहुत सारे अस्पतालों में उसके लिए पैसे लेते हैं।

          इसी तरह से एक नयी स्कीम थी माँ और बच्चे, दोनों को बचाने के लिए। एक स्कीम तो पहले से ही थी ‘आशा’ के ज़रिये, जो गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला की तीन बार जाँच करती थी और बच्चे की भी एक बार जाँच करती थी। लेकिन यह वास्तव में होता है या नहीं, जैसे हमारे सीनियर सदस्य ने बताया कि हमने यहाँ तो लिखकर दे दिया कि गर्भवती महिलाओ को ‘आशा’ तीन बार देखेगी, पहले गर्भवती होने के तीन महीने के बाद, फिर छः महीने बाद और फिर नौ महीने के बाद। फिर बच्चे का जन्म होने के बाद उसको देखेगी। लेकिन यह वास्तव में होता है या नहीं, यह जानकारी हमारे पास नहीं थी और गलत रिपोर्टिंग आती थी। इसी तरह से यहाँ केन्द्रीय सरकार से हम लाखों-करोड़ों बच्चों के लिए अलग-अलग बीमारियों से बचने के लिए वैक्सीन देते थे। वे वैक्सीन भी लगते हैं या नहीं, सिर्फ राज्य सरकारों से आँकड़े आते थे कि 80 प्रतिशत हुआ, 90 प्रतिशत हुआ, लेकिन किसी का कोई नाम पता नहीं था। हमने दो सालों में महसूस किया कि अगर 80 और 90 प्रतिशत टीका लगता तो इतने बच्चों की मरने की संख्या नहीं होनी चाहिए। इसलिए हमने अभी डेढ़ साल से एक नया सिस्टम किया है - मदर एंड चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम। उसका मतलब है कि हर गर्भवती महिला, जिसकी आशा कार्यकर्ता द्वारा तीन दफा जांच करनी होती है, उसका एड्रेस, टेलीफोन और उसका नाम हमें भेजा जाना चाहिए। जिस बच्चे को यह टीका लगना होता है, उस बच्चे के माता-पिता का नाम, उनका एड्रेस, टेलीफोन नंबर और अगर टेलीफोन या मोबाइल उनके घर में नहीं होगा तो हमसाये का होगा। यदि हमसाया का नहीं होगा तो दूसरे किसी नज़दीकी का होगा। आज देश में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां घर में न हो या हमसाये के पास भी न हो। पहले राज्य सरकार नहीं चाहती थी। लेकिन हमने कहा कि हम इसके बगैर स्वीकार नहीं करेंगे, कोई वैक्सीन नहीं देंगे और मुझे खुशी है कि पिछले छः महीने से, बीच में एकदम गिर गया था, लेकिन अब जो आंकड़े आते हैं, वह बिलकुल ठीक देने पड़ते हैं और हमने अपनी मिनीस्टरी में बीपीओ सैटअप किया है, जिसमें बीस लड़के और लड़कियां काम करती हैं। देश भर से हमारे पास हर रोज़ टेलीफोन आते हैं कि आज इतनी गर्भवती महिलाओं का टेस्ट हुआ या इतने बच्चों को टीका लगा। उस बीपीओ से हमारे लड़के और लड़कियां उनको टेलीफोन करते हैं।  इससे पता चलता है कि कहां से गलत आया और कहां  से ठीक आ रहा है। अभी भी बहुत गलत आ रहे हैं। लेकिन एक साल पहले जितने गलत आंकड़े एक साल पहले आ रहे थे, उनमें आहिस्ता-आहिस्ता छः महीने में सुधार हुआ है और अब बहुत हद तक सुधार हुआ है और मुझे आशा है कि आने वाले एक साल में यह स्ट्रीम लाइन हो जाएगा। इससे हमारे देश में नवजात शिशु मृत्यु दर कम हो जाएगी।

          महोदया, नवजात शिशु मृत्यु दर के मामले में हमारे देश का रिकार्ड बहुत खराब रहा है। कल हमारे साथियों ने बताया था कि किस तरह से हम अपने हमसाया देशों से भी पीछे हैं और यह हमारे देश के लिए शर्म की बात है। आज भी तकरीबन 2 करोड़ 60 लाख महिलाएं हर साल गर्भवती होती हैं। लेकिन पैदा होने के एक हफ्ते में उनमें से 6 लाख 70 हजार बच्चे मर जाते हैं। 26 दिन में 8 लाख 80 हजार बच्चों की मौत हो जाती है। एक साल में 12 लाख 50 हजार बच्चों की मौत हो जाती है।  पांच साल के अंदर 15 लाख 80 हजार बच्चों की मौत हो जाती है। यह हमारे लिए बड़ी शर्म की बात है। इसीलिए हमने इतने कदम उठाए हैं ताकि बच्चों को हर टीका लग सके और उसकी मां अस्पताल में आ जाए, क्योंकि घर में मां भी मर सकती है और बच्चा भी मर सकता है। सरकारी अस्पताल में मां और बच्चे को बचाया जा सकता है। इन कार्यक्रमों को शुरू करने से शिशु मृत्यु दर में कमी आयी है। वर्ष 2005 में शिशु मृत्यु दर 58 थी, जो वर्ष 2010 में कम होकर 47 पर पहुंच गई। इसमें 11 नंबर का फर्क पड़ा है। जैसा कि मैंने कहा कि हमने पिछले साल जो स्कीम शुरू की है, जिसमें महिला को अस्पताल में सुविधा दी जाएगी, अगर उसका ईमानदारी से सभी लोग इस्तेमाल करेंगे तो मुझे उम्मीद है कि अगले दो साल में बहुत फर्क पड़ जाएगा। शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए हमने दो साल में और भी नये क़दम उठाए हैं। नवजात शिशुओं के लिए आईसीयू अलग बनाए गए हैं, जिन्हें डिस्ट्रिक्ट हॉस्पीटल्स में सैटअप किया गया है। इस वक्त 374 डिस्ट्रिक्ट हॉस्पीटल्स में नवजात शिशुओं के सैंटर्स स्थापित किए गए हैं। इसी तरह से, नवज़ात शिशुओं के लिए तक़रीबन 1638 यूनिट्स सी.एच.सीज में बनाए गए हैं। जहां बच्चे पैदा होते हैं, उसी में तक़रीबन 11432 न्यू बॉर्न कॉर्नर्स बनाए गए हैं क्योंकि बहुत से बच्चे ठंढ़ से और ऑक्सीजन की वज़ह से मर जाते हैं। इसलिए जो बच्चा जन्म लेगा, वहीं उनके लिए एक छोटा कॉर्नर बना दिया जाएगा। वहां एक यूनिट सेट-अप होगा। ये सब केन्द्रीय सरकार की तरफ से होगा।

श्री रेवती रमण सिंह : क्या यह आई.सी.यू. में होगा?

श्री गुलाम नबी आज़ाद : नहीं, यह तो जहां भी बच्चा जन्म लेगा, वहीं पर होगा। यह एक तरह का बक्सा है। बच्चे को गर्म रखने की व्यवस्था भी उसी में है। इसमें ऑक्सीजन देने के लिए भी है। वह उसी हेल्थ यूनिट में एक छोटे-से बक्से जैसा होगा।

सभापति महोदया :  माननीय सदस्य, आप बाद में बोलेंगे। आपकी सभी बातों का जवाब आएगा। मंत्री महोदय, कृपया आसन को संबोधित कीजिए।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : महोदया, इसी तरह से नवज़ात शिशु सुरक्षा कार्यक्रम चलाया गया है। नवज़ात शिशुओं की सुरक्षा किस तरह से की जाए और नवज़ात शिशु को कब ऑक्सीजन की जरूरत है, यह बहुत-से डॉक्टरों को मालूम नहीं है। इसके लिए दो साल पहले एक नया प्रोग्राम शुरू किया गया था। इस प्रोग्राम के अंतर्गत अभी दो सालों में 66,981 डॉक्टरों और हेल्थ वर्करों को ट्रेनिंग दी गयी है।

          कुपोषण के बारे में यहां चर्चा हुई। यह भी शर्म की बात है कि आज इक्कीसवीं शताब्दी में बच्चे कुपोषण की वज़ह से मरते हैं। कुपोषण की वज़ह से बीमार होने वालों के लिए एक सब-डिस्ट्रिक्ट हॉस्पीटल और डिस्ट्रिक्ट हॉस्पीटल पर 657 यूनिट्स तैयार किए जाते हैं जहां बच्चों का मुफ्त इलाज़ होता है और उनको एक स्पेशल खुराक़ दी जाती है जिसमें प्रोटीन होता है। लेकिन, हमारे मंत्रालय का काम है प्रोग्राम बनाना और पैसे देना और राज्यों का काम है इसे लागू करना। सांसदों और विधायकों का काम है जागते रहना व केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार और पब्लिक को सोने न देना। मीडिया का काम है सांसदों को भी सोने न देना और यह देखना कि क्या वे अपनी-अपनी कंस्टीटय़ून्सीज में इन तमाम चीज़ों की जांच-पड़ताल करते हैं या नहीं। ये तमाम चीज़ें वास्तव में तब लागू हो जाएंगी जब हर स्तर पर जनता भी जागती रहेगी। जिला परिषद्, पंचायत समिति से लेकर संसद के जो चुने हुए प्रतिनिधि हैं, और जो मीडिया है, अगर हम सभी जागते रहेंगे तब इन स्कीमों का, इन पैसों का लाभ हो सकता है। मैं यहां बैठ कर यह नहीं कह सकता कि केन्द्रीय सरकार की तरफ से हमने पैसे दिए, सुविधाएं प्राप्त कराई, ट्रेनिंग दिए, अस्पताल बने तो सब कुछ हो गया। जैसे बाकी दुनिया के देश इस बारे में जागरूक रहते हैं वैसे ही हमारे देश को भी जागरूक रहना होगा।

          बहुत सारी बीमारियां हैं जिनका मैंने ज़िक्र किया कि जिनकी वज़ह से हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु हो रही हैं। इसमें पोलियो एक बड़ी बीमारी है। मैं आज पूरे सदन को और सदन के द्वारा पूरे देश को बधाई देना चाहता हूं कि पहली दफा आज पिछले पन्द्रह सालों से हमारे देश में एक भी नया पोलियो का केस नहीं आया है। यह देश के लिए बड़ी गौरव की बात है। लेकिन, इसके साथ-साथ हमें चौकन्ना रहने की भी जरूरत है क्योंकि अगर तीन साल तक लगातार एक भी केस नहीं आया तब सरकारी तौर पर हम इस बीमारी से मुक्त हो जाएंगे। वर्ष 1978 में हमारे देश में पोलियो केसेज दो लाख थे। वर्ष 2009 में जब यूपीए-टू बनी और मैं हेल्थ मिनिस्टर बना, उस वक्त इनकी संख्या 741 थी। सन् 2010 में यह संख्या 42, सन् 2011 में एक और सन् 2000 में शून्य तक पहुंच गई। अभी तक यह संख्या शून्य ही चल रही है, हम आशा करेंगे कि आगे भी शून्य ही रहेगी।

          सभापति महोदया, मुझे यह बात कहते हुए बहुत खुशी होती है कि 24 फरवरी, 2012 को वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन ने भारत को दुनिया की उस सूची से निकाल दिया, जिन देशों में पोलियो होता था। कल ही युनाइटेड नेशन के सैक्रेट्री जनरल हमारे मंत्रालय में चर्चा करने के लिए आए हुए थे। उन्होंने भी सभी देशवासियों को बधाई दी है और मंत्रालय को भी बधाई दी है। रूटीन इम्युनाइजेशन के बारे में एक बहुत बड़ा कदम उठा है, पहले बहुत सारे वेक्सीन दिए जाते थे, लेकिन एक बड़ा कदम पिछले साल उठा, जो कि बाकी देशों में था - पेंटावेलेंट वेक्सीन। इसमें यह है कि पांच वेक्सिनों को मिला कर सिर्फ एक शॉट देना। अमुमन बच्चे की जो माता होती है, वह छोटे बच्चे को इंजेक्शन नहीं लगाने देती। वह कहती है कि मेरा छोटा बच्चा है, इसे इंजेक्शन मत लगाइए। अगर वह इंजेक्शन लगवाती भी है तो बहुत सारे मिस होते हैं। पहले नौ शॉट देने पड़ते थे, लेकिन पिछले साल से ट्रॉयल के तौर पर दो राज्यों में हमने इसे शुरू किया - पेंटावेलेंट वेक्सीन, इसमें अब नौ टीकों की बजाए तीन ही टीकें लगेंगे, यह बहुत आसान काम है। पिछले साल दो राज्यों में यह काम किया और इस साल हम छ: और राज्यों में इसे इंट्रोडय़ूस करना चाहते हैं। जहां तक जापानी इन्सेफ्लाइटिस का सवाल है, 112 जिलों में 15 राज्यों में ये वेक्सीन दिए जाते थे, इस साल हम 62 और नये जिले दिल्ली, पंजाब, झारखंड और मेघालय के इसमें इन्क्लुड कर रहे हैं। फैमिली प्लानिंग, ये तमाम चीजें जितनी हम बताते हैं। इनके कार्यक्रम किसी काम के नहीं हैं, जब तक हमारी आबादी नियंत्रण में नहीं रहेगी, चाहे प्लानिंग कमीशन या फाइनेंस मिनिस्टर कितना भी बजट दे दें, स्वास्थ्य मंत्रालय कितनी ही स्कीम्स बनाएं या हम कितनी ही सड़कें, योजनाएं, बिजली एवं पन-प्रोजेक्ट बनाएं, उनका कोई लाभ नहीं होगा, जब तक आबादी कंट्रोल में नहीं रहेगी। इसके लिए हमें देखना होगा कि हमारे हिस्से में विश्व की सिर्फ ढाई प्रतिशत जमीन आई है, लेकिन हमारे हिस्से में विश्व की साढ़े 17प्रतिशत आबादी आई है। इसका मतलब है कि जो घर ढाई लोगों के लिए बनाया गया था, उसमें साढ़े 17 लोग बस रहे हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितना प्रेशर जमीन, पानी, अनाज एवं खेतों पर है। इसके लिए केवल स्वास्थ्य मंत्रालय को नहीं, बल्कि पूरे देश को यह कॉल लेना होगा और इसके लिए बगैर किसी मज़हब, धर्म, जाति और प्रांत के सब लोगों को मिल कर काम करना होगा।

          मुझे खुशी है कि दस सालों में इसमें कुछ फर्क पड़ा है। सन् 1991 के मुकाबले में सन् 2001 और सन् 2011 में बहुत फर्क पड़ गया है, आबादी कम हो गई है। हम चाहते हैं कि यह काम इसी तरह से आगे बढ़े। इसके लिए हमने बाकी चीजों के अलावा एक नयी स्कीम शुरू की है और वह यह है कि जो कंट्रासेप्टीज़ है, वह धर-घर, गांव-गांव में पहुंच जाएं। हम कोई कानून के जरिए, जोर-जबरदस्ती से कुछ करना नहीं चाहते, लेकिन आज की 21वीं शताब्दी में पुरुषों और औरतों के इस्तेमाल की वे तमाम चीजें हैं, जिससे बच्चा देर से पैदा हो सकता है और कम बच्चे पैदा हो सकते हैं। ये तमाम सुविधाएं प्राप्त हैं, लेकिन ये चीजें लोगों तक पहुंच नहीं पातीं। इन चीजों को किस तरह से लोगों तक पहुंचाएं। हमने 235 ऐसे जिले चुन लिए हैं, जहां सबसे ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं।या जहां ज्यादा पोपुलेशन है, थिकली पोपुलेटिड एरिया है, उसमें हमने औरतों और मर्दों के लिए जो काउंटरसैप्टिव्ज़ हैं, जो रोकथाम की चीजें हैं, वे आशा के जरिये भेजीं और यहां से हमने गांवों तक पहुंचाईं।  उनके जरिये वह इस्तेमाल करनी होंगी। आशा को भी इसके लिए हमने इंसेंटिव दिया है। मैं अपने एम.पी. साहेबान से भी गुजारिश करूंगा कि यदि अपनी कांस्टीट्वेंसी में जायें और सभाएं करें तो इसका उल्लेख करें कि आज आपको घर-घर में आशा के द्वारा वे तमाम चीजें मुफ्त सुविधा के रूप में प्रदान की जाती हैं, उनका इस्तेमाल करें।

          मैडम, बहुत सारी बीमारियां हैं।...( व्यवधान) अभी 3.30 बजे तक खत्म करना है? मैं सोचता हूं कि 27 साल के बाद आप चर्चा कर रहे हो तो एक-एक लाइन में एक-एक चीज़ बताऊंगा...( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : जरा इंसेफ्लाइटिस पर आपने जो किया, उसमें कुछ बता दीजिए।...( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद: ठीक है, अभी बताता हूं। इंसेफ्लाइटिस की समस्या बहुत है। विशेष रूप से गोरखपुर, हमारे एम.पी. साहेबान के एरिया में और पूरे पूर्वांचल में यह समस्या है और वहां इससे सभी पीड़ित हैं। मुझे खुद वहां जाने का अवसर मिला था, जो हमारे पहले हैल्थ के मिनिस्टर ऑफ स्टेट थे, वे भी गये थे, आफिसर्स को हमने कई दर्जनों दफा भेजा, लेकिन हम इस नतीजे पर पहुंचे, मैं उन तमाम चीजों का उल्लेख नहीं करना चाहता हूं, लेकिन मेरी विजिट के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि राज्य सरकार अकेले अगर इससे जूझना चाहेगी तो शायद यह सम्भव नहीं होगा, इसलिए हमने प्रधानमंत्री जी से निवेदन किया था कि इसमें हमारी केन्द्रीय सरकार के इण्टरफियरेंस की जरूरत है। मैं माननीय प्रधानमंत्री जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर बनाया और उस जी.ओएम. की तकरीबन 5-6 मीटिंग हुईं। उसके बाद हमने रिपोर्ट पेश की है और वह रिपोर्ट किसी वक्त भी कैबिनेट में आएगी और मुझे उम्मीद है कि हमारे यहां फाइनेंस मिनिस्टर साहब हैं, उसमें जो हमने सिफारिशात की हैं, उसको काबू करने में वे हमारी मदद करेंगे।...( व्यवधान)

सभापति महोदया :  कृपया बीच में क्वश्चंस नहीं पूछें, अभी जीरो ऑवर भी है।

श्री गुलाम नबी आज़ाद: मैं यह नहीं चाहता कि जब तक यह कैबिनेट से एप्रूव नहीं होती है, क्या-क्या सुविधाएं हैं, वह यहां कहना मेरे लिए उचित नहीं होगा कि उसमें कितना पैसा होगा और क्या-क्या होगा। उसमें बहुत एडवांस तक हमने चीजों को लिया है। मैं आप सब का बहुत आभार प्रकट करता हूं कि आपने बहुत जोर से इसे उठाया।

          अभी बहुत सारी बीमारियां हैं, जिनको पहले, प्री एन.आर.एच.एम. अलग-अलग देखा जाता था, लेकिन अब एन.आर.एच.एम. में उनको सबस्यूम किया गया है, उनको जोड़ दिया है और उन बीमारियों का भी अब इलाज होता है। जहां तक मलेरिया का सवाल है, यह हमारे लिए अभी भी बड़ी चिन्ता का विषय है।

सभापति महोदया: पाल साहब, प्लीज़ बैठ जायें।

श्री जगदम्बिका पाल : उसके लिए तो हम बधाई देते हैं, आपने उत्तर प्रदेश में एन.आर.एच.एम. में 7,645 करोड़ रुपया दिया, लेकिन उसमें से पांच हजार करोड़ रुपये की लूट हो गई।...( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद: वह क्वश्चन ऑवर में उठायें। स्पेसिफिक इंडीविजुअल केसेज़ क्वश्चन ऑवर में उठायें। मैं आज उस क्वश्चन के लिए तैयार था, आज वह मेरी सप्लीमेंटरी लिस्ट में था, लेकिन आप लोगों ने उसे नहीं उठाया। वह क्वश्चन आया भी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं।

          इसमें हमने क्या इनीशिएटिव्ज़ लिये हैं, बहुत नया जो दो साल पहले हुआ है, पहले से दो किस्म की हमारे देश में मलेरिया की बीमारियां हैं, डिसीज़ हैं, प्लाज़मोडियम फैल्सीफोरम और प्लाज़मोडियम वाइवैक्स। प्लाज़मोडियम फैल्सीफोरम की वजह से 50 फीसदी जो बीमारियां फैलती हैं, वायरस फैलता है, उसके लिए पहले लैबोरेट्री में जाना पड़ता था, कहीं डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल्स में या प्राइमरी हैल्थ सैण्टर में जाना पड़ता था, लेकिन 2009 में एक नया किट शुरू किया गया, जो किट आशाओं को दिया गया। 7.5 लाख आशाओं को, जिनको किट दिया गया है, उनके पास यह किट भी है, वे वहीं टैस्ट करती हैं और वहीं घर में ही दवाई देती हैं, अब किसी को मलेरिया का टैस्ट कराने के लिए प्लाज़मोडियम फैल्सीफोरम, जो 50 फीसदी मर्ज की दवाई है, उसको घर से बाहर नहीं आना पड़ता है। केंद्रीय सरकार की तरफ से दवाई भी मुफ्त है और किट भी मुफ्त है।  दूसरा अलबत्ता एक और प्लाज्मोडियम वाईवैक्स है, उसके लिए डिस्पेंसरी में या जहां भी स्लाइड आशा बनाती है, लेकिन लेबोरेट्री में भेजना पड़ता है या जहां भी मशीन है, जो इसको टेस्ट करती है।  आपको यह जानकार खुशी होगी कि हम बाईवैलेंट टेस्टिंग किट इस साल खरीदेंगे, जिसमें दोनों वायरसेज का प्लाज्मोडियम वाईवैक्स का भी और प्लाज्मोडियम फैल्सिपैरम का भी आशा ही वहीं टेस्ट करेगी और वहीं दवाई देगी।  यह एक नयी स्कीम है। मैं आपके ध्यान में इसे लाना चाहता हूं।

          इसी तरह से जहां तक मच्छरदानियों का सवाल है, वह पहले से डिस्ट्रीब्यूट होती थीं, लेकिन तीन साल पहले बाहर की मदद से, एक्स्टर्नल एजेंसीज की मदद से हमको एक नयी इमदाद मिल रही है, जिसमें नयी मच्छरदानियां बनी हैं।  यह सिर्फ प्रोटेक्शन ही नहीं करती है, अगर मच्छर मच्छरदानियों को छू ले, तो वह मर जाते हैं।  इस तरह की मच्छरदानियां दो साल से हमने, जहां सबसे ज्यादा मच्छर वाले राज्य और डिस्ट्रिक्ट्स हैं, वहां हमने इसे शुरू किया है।  इसमें तकरीबन 1 करोड़ 13 लाख मच्छरदानियां पहले दी गयी हैं और इस दफा दस लाख उसमें और हम ऐड करेंगे।  

14.47 hrs. (Shri Inder Singh Namdhari in the Chair)             इसी तरह से कालाजार है, पिछले तीन साल में आशा को कालाजार का टेस्ट करने के लिए किट दिया  गया है, जो वहीं टेस्ट करके वहीं दवाई देती है। टेस्ट करने के लिए भी और दवाई के लिए भी केंद्रीय सरकार की तरफ से पैसा दिया जाता है और न सिर्फ केंद्रीय सरकार की तरफ से पैसा दिया जाता है, बल्कि जो मरीज सरकारी अस्पताल में कालाजार के इलाज के लिए जाएगा, उसको फ्री खाना भी दिया जाता है और उसको पचास रूपए भी दिए जाते हैं।  अगर कोई मजदूरी करने वाला है, काम करने वाला है, उसे वेजेज भी दिए जाते हैं।  इसी तरह से डेंगू के लिए जो सर्विलेंस मेंटीनेंस, सर्विलेंस हास्पिटल्स थे, उनकी संख्या पिछले दो-तीन सालों में 110 से बढ़ाकर 311 कर दी गयी है।  चिकनगुनिया के लिए भी इसी तरह से सर्विलेंस हास्पिटल्स की संख्या 110 से बढ़ाकर 311 पिछले दो सालों में की गयी है।  

          टय़ूबरकुलोसिस में बहुत अच्छा सराहनीय काम हुआ है।  यूनाइटेड नेशंस ने कुछ बीमारियों के लिए एक टार्गेट निर्धारित किया है।  वर्ष 2015 तक हमारा जो टार्गेट था टय़ूबरकुलोसिस के टेस्ट करने का कि कितने प्रतिशत टय़ूबरकुलोसिस टेस्ट करते हैं, हमें 85 प्रतिशत टेस्ट करने का टार्गेट दिया गया।  हमें खुशी है कि हमने कई साल पहले 85 से बढ़ाकर 88 परसेंट टार्गेट आलरेडी एचीव कर लिया है, तकरीबन छः साल पहले ही इसे एचीव कर लिया। इसी तरह से क्योर रेट है, जिनका इलाज करना है, उसका टार्गेट सत्तर प्रतिशत था, वह हमने पहले ही सत्तर प्रतिशत के बजाय बहत्तर परसेंट करके टार्गेट पूरा कर लिया है।  यह टार्गेट एचीव करना कोई आसान काम नहीं था।

          टय़ूबरकुलोसिस के साथ एक जो नयी बीमारी आयी है, मल्टी ड्रग रजिस्टेंट टय़ूबरकुलोसिस, जिसके बारे में यहां शायद किसी ने चर्चा नहीं की, लेकिन बाहर पेपर्स में, मैगजींस में, टेलीविजन में चर्चा होती है।  इसके लिए हमने पिछले एक-दो साल में बहत काम किया है, ताकि मल्टी ड्रग रजिस्टेंट न हो।  28 लैब्स बनायी हैं पब्लिक सेक्टर में ओर नौ प्राइवेट सेक्टर में और एक साल के अंदर 15 और नयी लैब्स बनानी हैं।  43 नयी लैब्स एक्रॉस दी कंट्री दो साल के अंदर, जैसा मैंने कहा कि 28 और 9 तो आलरेडी बन गयी हैं, 15 और नयी बनानी हैं, जहां ये मल्टी ड्रग रजिस्टेंट टीबी का टेस्ट हो जाए।  इसी तरह से अभी सात हजार मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी केसेज इन्शिएट किए हैं और उनका ट्रीटमेंट शुरू कर दिया है। हमारे एमपी साहब ने कहा कि कई राज्यों में एनआरएचम में बहुत गड़बड़ हो रहा है। उत्तर प्रदेश में तो साइज के हिसाब से गड़बड़ हुआ है लेकिन कई राज्यों में अपने-अपने साइज के हिसाब से गड़बड़ हो रहा है। आगे इसमें गड़बड़ न हो क्योंकि केन्द्र सरकार ने पहले सिर्फ एलेवेन्थ फाइव इयर प्लान में एनआरएचएम शुरू किया था लेकिन यूपीए की लीडरशीप को मैं बधाई देता हूं कि कल ही कैबिनेट ने इसे पांच साल और आगे बढ़ाने के लिए मंजूर किया है। आगे जो पांच साल होगा वह पिछले सात साल की तरह नहीं होगा। अब हम बहुत बेल्ट कसेंगे, बहुत टाइट करेंगे और हर एक पैसे का जवाब हर एक राज्य सरकार और हर एक व्यक्ति को देना होगा। उसके लिए सीएजी ऑडिट रिपोर्ट होगी। मिनिस्ट्री ने सीएजी से रिक्वेस्ट की थी कि वह ऑडिट शुरू करे। सीएजी ने हमारी रिक्वेस्ट को मंजूर किया है। आने वाले समय में आप देखेंगे, संभव हो तो सीएजी पिछला भी ऑडिट करें और आगे भी ऑडिट करे। इसी तरह से स्टैचुटोरी ऑडिट भी हो जाए। यह दो साल से शुरू किया है। कन्करन्ट ऑडिट भी दो साल से शुरू हुआ है। मॉडल एकाउंटिंग हैंड बुक्स पिछले साल से शुरू हो गई है। रिटेल ऑपरेशनल गाइड लाइन्स पिछले साल से शुरू हो गई है। ई-ट्रेनिंग मॉडय़ूल्स, ई-बैंकिंग, गाइडलाइन्स एण्ड एडवाइजरिज पिछले साल से शुरू हो गए हैं। जब मैं पिछले साल कहता हूं तो कुछ दिसम्बर में है और कुछ नवम्बर में है। इस का मतलब है कि कोई तीन महीने, चार महीने या कोई पांच महीने पुरानी स्कीम है। इसमें अभी और समय लगेगा।

          मेडिकल एजुकैशन, इसके बारे में यहां चर्चा हुई। हमें डाक्टरों की बहुत कमी है। इसके लिए हमने पिछले तीन साल में बहुत कदम उठाए हैं। हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं। ...( व्यवधान) अगर मैं विस्तार से बोलूंगा तो बहुत समय लगेगा। मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि पहले कभी भी सिर्फ इतने थोड़े समय में चालीस मेडिकल कॉलेज दो साल के अंदर में नहीं बने हैं। पहले कभी भी तीन साल के अंदर आठ हजार एक सौ सरसठ एमबीबीएस सीटें नहीं बढ़ी हैं। पिछले बासठ सालों में सिर्फ तेरह हजार पीजी की सीटें बढ़ी थीं लेकिन तीन साल में नौ हजार नौ सौ इक्कावन सीटें बढ़ गईं। तीन साल में तकरीबन पचासी प्रतिशत इन्क्रिज हुआ है। इसके लिए हमने कई कदम उठाए। हमनें फैकल्टी की उम्र बढ़ा ली उसको 58 साल से 70 साल कर ली। उसके लिए मेडिकल कॉलेज सेट अप करने थे। हमने उनकी जमीन में परिवर्तन लाया। वह कम कर दी। शहरों में दस एकड़ कर दी। बैकवर्ड एरियाज में बीस एकड़ की और वह बीस एकड़ भी एक जगह की बजाय दो जगह की। बहुत सारी पीजी की सीटे इसलिए बढ़ी की हमारे देश में एक प्रोफेसर सिर्फ एक पीजी स्टूडेन्ट को पढ़ाता था। विदेश में एक प्रोफेसर या एसोशिएट प्रोफेसर दो या तीन पीजी वालों को पढ़ाता था। हमने दो साल पहले यहां भी लागू किया कि एक प्रोफेसर और एसोशिएट प्रोफेसर दो पीजी स्टूडेंट्स को पढ़ाएगा तो उनकी संख्या एकदम बढ़ गई।

          इस साल हमने महसूस किया कि कैंसर जिस तरह से देश में फैल रहा है उसमें डाक्टरों की कमी है उसमें हमने वन ईच टू थ्री किया। एक प्रोफेसर और एक एसोशिएट प्रोफेसर तीन पीजी वालों को पढ़ाएगा जो कैंसर से जुड़ी पीजी सीट्स हैं। इन सब की वजह से ये तमाम चीजें आईं।  नर्सिंग स्कूल, हमारे पास नर्सेज़ की बहुत कमी है। उसमें पैसा कैसे पूरा किया जाए, उसके लिए हम रिफार्म्स लाए। जितनी जमीन की जरूरत थी, उसे कम कर दिया। फैकल्टी की कमी थी, उसे कम किया। फैकल्टी की नर्सों की एज 70 साल बढ़ा दी। इसके साथ ही तमाम बैकवर्ड एरियाज़ जैसे सैंट्रल इंडिया, यूपी, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल, ओड़िशा, झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ आदि हैं। साउथ इंडिया और वैस्टर्न इंडिया में डाक्टरों और नर्सों की कोई कमी नहीं है, क्योंकि 80 प्रतिशत से ज्यादा मेडिकल कालेज, नर्सिंग और पैरा-मैडिक्स सदर्न इंडिया और वैस्टर्न इंडिया में हैं। लेकिन सिर्फ प्राइवेट सैक्टर में 15 से 20 प्रतिशत, दो-तिहाई देश में इनकी संख्या है। इसलिए हमने शायद पहली बार सरकारी सैक्टर में स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से 269 नर्सिंग स्कूल और एएनएम स्कूल इन बैकवर्ड एरियाज़ को अपने खर्चे से दिए, लेकिन मुझे अफसोस है कि दो साल में राज्य सरकारों को जितना काम करना चाहिए उतना नहीं हुआ।

          कैंसर के बारे में यहां बहुत चर्चा हुई। हमारे यहां तकरीबन 11 लाख नए केसेज़ हर साल आते हैं, तकरीबन 5 लाख मौतें हर साल कैंसर से होती हैं। यह रजिस्टर्ड है, लेकिन हकीकत यह है कि गांवों में ऐसे कितने लोग होंगे...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  मंत्री जी को पहले कनक्लूड करने दीजिए।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : तीन नई बीमारियों के लिए वर्ल्ड हैल्थ असैम्बली में वर्ष 2009 में यह महसूस किया गया कि नान-कम्युनिकेबल डिज़ीजेस जैसे डायबिटिज़, हाइपर्टैंशन, कैंसर, दिल की बीमारियां (कार्डियो वसकुलर डिजीजेस) और स्ट्रोक, पूरे विश्व में तकरीबन 55 से 60 प्रतिशत लोग इन्हीं नान-कम्युनिकेबल डिजीजेस की वजह से मरते हैं। इसलिए उन्होंने पूरी दुनिया को बताया कि आप इसकी तैयारी कीजिए। भारत को बताया गया कि नान-कम्युनिकेबल डिजीजेस का सबसे ज्यादा असर भारत पर लाइफ स्टाइल, खाने के तरीके और लोक संख्या की वजह से पड़ने वाला है। इसका ध्यान युनाइटेड नेशंस की तरफ ध्यान आकर्षित कराया गया। यही वजह है कि पिछले साल सितम्बर के महीने में युनाइटेड नेशंस ने दो दिन का स्पेशल सैशन बुलाया, जिसमें विश्व के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और स्वास्थ्य मंत्रियों को बुलाया। उन्हें बताया गया कि हाइपर्टैंशन, कैंसर और दिल की बीमारियों के बारे में यह स्थिति है। इसलिए अपने-अपने देशों में जाकर आप इसकी तैयारी अभी से कर लीजिए, वर्ना वर्ष 2020 और 2030 के बीच कैंसर, डायबिटिज और हार्ट अटैक की हालत इतनी भयंकर होने वाली होगी कि इससे जूझना बहुत मुश्किल होगा।  मुझे यह कहते हुए खुशी होती है कि शायद विश्व में हम पहले देश थे जिसने युनाइटेड नेशंस में जाने से पहले ही अपनी स्कीम लॉच की, बनाई, उसमें पैसा रखा और हमने एक सौ जिले पॉयलट प्रोजैक्ट के तौर पर लिए। इन एक सौ जिलों में हमें तीस साल से ऊपर के लोगों और गर्भवती महिलाओं के लिए तकरीबन 15 करोड़ लोगों का डायबिटिज टैस्ट करना है। उन्हें ग्लूकोमीटर के लिए कहीं नहीं जाना होगा, वहीं पास में ही ग्लूकोमीटर, सुई होगी। राज्य सरकारों को पिछले साल स्ट्रिप खरीदकर दे दी गई हैं। इसी तरह हर डिस्ट्रिक्ट अस्पताल में कैंसर के टैस्ट, इक्विपमैंट और ह्यूमन रिसोर्स, डाक्टर्स, टैक्नीशियन्स के लिए हमने स्वास्थ्य मंत्रालय से न सिर्फ टैस्टिंग के लिए बल्कि कीमोथैरेपी के लिए पैसा दिया है।

15.00 hrs. एक-एक अस्पताल में सौ-सौ मरीजों के लिए पर पैशेंट एक लाख रुपया हमने कीमोथैरेपी के लिए भी दिया। उसका मतलब है कि सौ डिस्ट्रिक्ट्स में दस लाख लोगों को एक लाख रुपये के रेट के हिसाब से सौ करोड़ रुपया भी दिया गया है। इसी तरह से डिस्ट्रिक्ट अस्पताल में कार्डियक सैंटर और मेडिसन के लिए भी पैसा दिया गया है। अभी मैं एमपी साहिबान और राज्य सरकारों से निवेदन करूंगा कि यह जो कार्डियक सैंटर डिस्ट्रिक्ट अस्पताल या अर्ली स्क्रिनिंग, टैस्टिंग, कीमोथैरेपी और ह्यूमन रिसोर्स के लिए हमने मदद दी है, उसमें वे रूचि लें, क्योंकि हम चाहते हैं कि अगले पांच साल में सिर्फ यह सौ डिस्ट्रिक्ट्स में ही नहीं, बल्कि देश के साढ़े छः सौ    डिस्ट्रिक्ट्स में कैंसर की स्क्रिनिंग और टैस्ट करें। हम कार्डियो वसकुलर स्कीम का टैस्ट करें और उनका इलाज प्राप्त करें। हम पूरे देश के लोगों की डायबिटीज और हाइपर्टैंशन का ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :   माननीय मंत्री जी, आपने अभी कहा कि सांसद लोग इसमें रूचि लें। रूचि वन वे ट्रैफिक होगी या उधर से लोग माननीय सांसदों को बुलायेंगे कि आप आइये।

श्री गुलाम नबी आज़ाद :   नहीं, रूचि इसलिए होगी कि एमपीज जिस तरह नरेगा में मीटिंग ले सकते हैं, उसी तरह से यह जिम्मेदारी लें कि वे हर डिस्ट्रिक्ट में स्वास्थ्य के बारे में मीटिंग बुलायें।...( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल :  आप एक कमेटी बनायें। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप कमेटी कब गठित करेंगे?

…( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद :  कमेटी एमपी की अध्यक्षता में बनायें और वह कमेटी ही हमारी रिप्रैजेंटेटिव होगी।...( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : जो केन्द्रीय सहायता होगी, उसकी क्या कहीं मौनीटरिंग होगी? ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  पाल जी, मैंने चेयर से इसलिए इंटरवीन किया, क्योंकि माननीय मंत्री जी ने कहा कि  ग्रामीण विकास की तरह हो। ग्रामीण विकास की समिति तो मुख्यालय से यानी यहां से गठित होती है। आप कमेटियां बनायेंगे, तो फिर सांसद  उसमें रूचि लेंगे।

श्री गुलाम नबी आज़ाद : इसके साथ-साथ मैं यह भी निवेदन करूंगा कि ये इन...( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार :  मंत्री जी, सभापति महोदय कुछ कह रहे हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :   आपने ग्रामीण विकास का उदाहरण दिया, तो ग्रामीण विकास की कमेटी यहां से यानी विभाग की तरफ से गठित होती है। यदि आपका विभाग कमेटी गठित करेगा, तभी तो एमपी उसे प्रिसाइड कर पायेगा।

श्री गुलाम नबी आज़ाद :  हम ही करेंगे, केन्द्रीय सरकार से होगी। इसी तरह मैं सबसे निवेदन करूंगा कि इन तमाम बीमारियों जैसे एनसीडीज, कैंसर, डायबिटीज और हार्ट आदि के लिए जो तीन-चार चीजें हैं जैसे सिगरेट, शराब और हम जो फिजिकल एक्टीविटी हम नहीं करते, इनका भी प्रचार करें। इन तमाम चीजों की वजह से उन बीमारियों में और इजाफा होता है। मैं यह नहीं कहता कि इनकी वजह से सब कुछ होता है, लेकिन इनकी कारण से इजाफा डायबिटीज में होता है, कैंसर में होता है और हार्ट अटैक भी होता है। इसका प्रचार भी हमें अपनी अपनी सभाओं आदि में करना चाहिए। मैं जब से स्वास्थ्य मंत्री बना हूं, तब से जहां भी इलैक्शन में जाता हूं तो आधा पोलिटिकल भाषण करता हूं और आधा स्वास्थ्य पर करता हूं। मैं चाहूंगा कि अगर हमारे सभी 800 एमपीज साल में लाखों पब्लिक मीटिंग्स करते हैं, उनमें वे अगर ये चीजें भी जनता को बतायेंगे, अगर हम इलैक्शन के दौरान एक महीने में नॉन वोटर को वोटर में कन्वर्ट कर सकते हैं, तो पांच साल में हम सब मिलकर इसे कन्वर्ट क्यों नहीं कर सकते। ...( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल :  अगर इस पैसे की जानकारी जनता को देंगे, तो लोग कहेंगे कि डॉक्टर कहां है। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : माननीय मंत्री जी, आसन यह जानना चाहता है कि आप कितना समय और लेंगे।

श्री गुलाम नबी आज़ाद :  मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं, क्योंकि मैंने किसी चीज का सिर पकड़ा और किसी की दुम पकड़ी और बीच में छोड़ दिया, क्योंकि बहुत समय लग जाता।

          आखिर में मैं इतना ही बताना चाहता हूं। ...( व्यवधान)

श्री शरीफ़ुद्दीन शारिक (बारामुला):  आपने आयुष के बारे में नहीं बताया। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  शारिक साहब, आप पहले माननीय मंत्री जी को अपनी बात कन्कलूड करने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद :   मैं आयुष के बारे में बताता हूं। आपने बहुत अच्छा कहा। मुझसे दो-तीन डिपार्टमेंट छूट गए थे। आयुष विभाग के लिए मैं संक्षेप में बताता हूं। एक, जहां हमको हेल्थ फैसिलिटीज की कोलोकेशन करनी थी, एक चीज यह भी थी कि इस एनआरएचएम में, जहां एलोपैथिक है, उसी बिल्डिंग के अंदर आयुर्वेद को भी लेना है। मुझे खुशी है यह कहते हुए कि इसमें तकरीबन 15500 जगहों पर कोलोकेशन हो गयी है। अगली स्कीम में, इस साल के अंदर हमने तय किया है कि जहां भी कोलेकशन होगा, वहां पैसे एनआरएचएम की तरफ से एलोपैथिक को भी जाएंगे और आयुर्वेद को भी जाएंगे, लेकिन उसके अलावा जो सुविधाएं आयुर्वेद के अंदर डिस्पेंसरीज-हॉस्पिटल्स में रहेंगी, उनको दवाइयां आयुष से जाएंगी। यह एक बहुत बड़ा फैसला है।  

Then, permission has been granted for establishing 14 new colleges and 31,077 hectares of land has been earmarked for medical plants for conservation in the forest areas. Sir, 819 nurseries have been set up and 86,752 hectares of land has been cultivated by farmers under National Mission of Medicinal Plants since 2009. The establishment of All India Institute of Ayurveda is taken up.  A separate research council for Siddha has been set up. Indian System of Medicine has been expanded to include Sowa-Rigpa. Pharmacopoeia Commission has been set up for Indian medicines having autonomous status since 2010. Centre for Research in Indian Medicine was set up with the University of Mississippi, USA in 2010.

          Now, I come to the MoUs. An MoU has been signed between India and Malaysia to promote AYUSH in Malaysia in 2010, India and South Africa for Unani Chair and Ayurveda Chair set up in 2011, India and West Indies              for setting up Ayurveda Chair and AYUSH Information Cell in Port of Spain in 2012.

          इसके बाद एक चीज कहूंगा। किसी माननीय सदस्य ने कहा कि आयुर्वेद में जितना पैसा था, वह यूटिलाइज नहीं हुआ है।  मैं आपसे रिक्वेस्ट करना चाहूंगा कि हमारी तरफ से उसमें कमी नहीं है। जितनी भी सेंट्रली स्पांशर्ड स्कीम्स हैं, उनमे जब यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट आता है, तब पैसा रिलीज होता है। जो पैसा इस्तेमाल नहीं हुआ है, वह यूसी न होने की वजह से इस्तेमाल नहीं हो पाया क्योंकि जिन राज्यों ने पैसा लिया, उनको पैसे की दूसरी या तीसरी ट्रेंच लेनी थी, लेकिन चूंकि उन्होंने युटिलाइजेशन सर्टिफिकेट नहीं दिया, इसलिए वह पैसा इस्तेमाल नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि पैसे की कोई कमी थी।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  माननीय मंत्री जी को समाप्त करने दीजिए, उसके बाद अपनी बात कहिए।

…( व्यवधान)

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय (श्रावस्ती):महोदय, यह राष्ट्रीय हित का महत्वपूर्ण विषय है। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : ठीक है, आप संक्षेप में बोलिए कि क्या कहना चाहते हैं।

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय : महोदय, हम पूरे हिन्दुस्तान को एक लेबोरेटरी के रूप में कन्वर्ट न होने दें। फॉरेन इंस्टीटय़ूशन्स बिल आने के बाद, जो फॉरेन इंस्टीटय़ूशन्स मेडिकल एजुकेशन में आ रहे हैं, उस संबंध में जानकारी दें?...( व्यवधान) फॉरेन इंस्टीटय़ूशन्स बिल के तहत मेडिकल कॉलेजेज की स्थापना होगी।  आयुर्वेद और सिद्धा में भी वे एजुकेशन में जाएंगे, ऐसे मेडिकल कॉलेज लेबोरेटरी की तरह यूज किए जाएंगे और हमारी आयुर्वेद और सिद्धा की जो बेसिक चीजें हैं, उनको पेटेन्ट कराते जाएंगे, उसको हम नहीं रोक पाएंगे।...( व्यवधान)

श्री गुलाम नबी आज़ाद: महोदय, ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। अगर यह आपकी सोच है, तो यह गलत है। जहां एक नया डिपार्टमेंट बना है हेल्थ रिसर्च का, उसके बारे में मैं ज्यादा लम्बा-चौड़ा नहीं कहना चाहता हूं।

यह पहले आईसीएमआऱ थी, अब यह फुल-फ्लैज डिपार्टमेंट बन गया है, जिसमें सेक्रेटरी हैड करते हैं। बहुत सारी रिसर्च इसके द्वारा होती हैं और सैंकड़ों की तादाद में यह युनिवर्सिटीज को, मेडिकल कालेजज़ को और जो प्राइवेट फार्मास्यूटिकल्स कम्पनीज हैं, मदद करती है।

          मैं इस बारे में सिर्फ एक उदाहरण देना चाहता हूं। दो साल पहले जब हमारे देश में एच वन और एन वन जिसे हम स्वाइन फ्लू कहते हैं, उसके इलाज के लिए हमारे पास टेबलेट नहीं थी, न ही वैक्सीन था और न ही रेजेंट मौजूद था। लेकिन दो साल में, हमें गौरव है इस बात पर कि स्वाइन फ्लू का वैक्सीन भी बन गया, रेजेंट था, जिससे टैस्ट करते हैं, वह भी बन गया। ये तमाम चीजें इस नए रिसर्च विभाग की तरफ से बन रही हैं। इसके अलावा बहुत सारी बीमारियों को किस तरह से मैनेज किया जाए, उसके लिए हैल्थ रिसर्च विभाग ने जितना काम पिछले तीन साल में किया है, मैं उसके लिए विभाग को और उसके डीजी को बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं। नैको में जो एचआईवी/एड्स है, उसमें हमें 95 प्रतिशत बाहरी डोनर्स से मदद मिलती थी। लेकिन आजकल जिस तरह से दुनिया की आर्थिक स्थिति है, उसके चलते इन डोनर्स ने हाथ खड़े कर दिए। हमने इस साल यह निर्णय लिया कि हम अपने घरेलू संसाधनों से एचआईवी के काम को तेजी से चलाएंगे और हम यह कर भी रहे हैं। इसकी सराहना युनाइटेड नेशंस ने भी की है और इसके लिए हमें बधाई भी दी है। जब यहां युनाइटेड नेशंस के सेक्रेटरी जनरल आए तो उन्होंने फिर इस बात को दोहराया कि हिन्दुस्तान ने इस बारे में बहुत अच्छा काम किया है। विश्व में साउथ अफ्रीका, अमेरिका और चीन ऐसे तीन देश हैं, जिन्होंने पिछले दस साल में एड्स के इंफेक्शन में 50 प्रतिशत तक कमी की है, जबकि हमने 56 प्रतिशत तक कमी की है। हम चाहते हैं कि इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाएं और आने वाले दस साल में इसके केसेज़ की संख्या सिर्फ पांच या दस प्रतिशत तक रहे।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपने विभाग के सभी साथियों को बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं। वे लोग तकरीबन 20 घंटे दिन में काम करते हैं, इन कार्यक्रमों को चलाने के लिए। इसके साथ ही मैं सब माननीय सदस्यों का भी आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने इस बहस में हिस्सा लिया। मैं अपने कुलीग मंत्रियों को भी धन्यवाद देता हूं। इसके अलावा मैं सबसे ज्यादा धन्यवाद यानि डबल धन्यवाद रेवती रमन जी को देता हूं। वह किसी एक पार्टी के नेता हैं, एक वरिष्ठ नेता भी हैं और हम सब उनका आदर करते हैं। इन्होंने अपने भाषण में एक मांग इलाहाबाद में मेडिकल इंस्टीटय़ूट की की थी. मैं इन्हें बताना चाहता हूं कि एम्स जैसे बड़े इंस्टीटय़ूट की स्थापना के लिए सिर्फ मंत्रालय की ही मंजूरी नहीं होती, योजना आयोग इसे करता है। लेकिन मेरा वादा है कि इस साल या अगले साल इलाहाबाद में हम इसे करने का प्रयास करेंगे।

श्री रेवती रमण सिंह (इलाहाबाद):गोरखपुर की तो आपने घोषणा कर दी है।

श्री गुलाम नबी आज़ाद: गोरखपुर में तो दे चुके हैं।

सभापति महोदय :  रेवती रमन जी, आप पहले ही अपनी बात कह चुके हैं, इसके बाद फिर कहना।Hon. Members, a number of cut motions have been moved by Members to the Demands for Grants relating to the Ministry of Health and Family Welfare.

Shall I put all the cut motions to the vote of the House together or does any hon. Member want any particular cut motion to be moved separately?

… (Interruptions)

श्री रेवती रमण सिंह : सभापति जी, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। मैं मंत्री जी से यह कहना चाहता हूं कि यहां सदस्यों के कहने पर आपने कृपा की और हमारा नाम भी लिया। मैंने कटमोशन मूव किया था। मैं आपको बताना चाहता हूं कि आपकी पार्टी के नेता नारायण दत्त तिवारी जी और प्रणब दादा आदि सब लोग जानते हैं और नाम लेते हैं। आपने कहा कि जितने सदस्यों ने अपनी बात कही, कम से कम आपको यह कष्ट तो करना ही चाहिए था कि आप हमसे बात कर लेते, भले ही न बुलाते, कल रात को टेलीफोन पर ही बात करके पूछ लेते कि आपकी एक-दो मांगें क्या हैं, मैं उनके बारे में घोषणा कर दूंगा। हमने आपकी चेयर पर्सन से कहलाया। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद मेडिकल कालेज को अपग्रेड किया जाए। तब आपने कहा कि इस साल या अगले साल करेंगे। दो साल बाद करेंगे, तब तक तो आपकी टर्म ही खत्म हो जाएगी, फिर क्या करेंगे। मैं आग्रह करना चाहता हूं कि आप योजना आयोग से बात करके इसी साल करवा दें। मोती लाल नेहरू के नाम से वह है, जो कि कांग्रेस पार्टी के स्टालवर्ट नेता रहे हैं और कांग्रेस पार्टी के जन्मदाताओं में एक थे।

सभापति महोदय :  ऐसे तो रेवती रमन जी यह डिबेट चलती ही रहेगी और मेरे लिए काफी दिक्कत हो जाएगी। अब आप बैठ जाएं। It will be very difficult for me to run the House.

… (Interruptions)

SHRI T.K.S. ELANGOVAN : Sir, the Minister has not answered my question.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please sit down. I shall now put all the cut motions together to the vote of the House.

          cut motions were put and negatived.

… (Interruptions)

SHRI T.K.S. ELANGOVAN : Sir, I just want to seek one clarification.… (Interruptions)

सभापति महोदय: शैलेन्द्र जी, आपको भी मालूम है कि पिछले सत्र में बहुत दिनों तक पीएमबी नहीं हुआ था। आज प्राइवेट मेम्बर्स बिजनेस साढ़े तीन बजे लिस्टेड है।

SHRI T.K.S. ELANGOVAN : Sir, I will take only one minute. … (Interruptions)

सभापति महोदय: आप क्या कहना चाहते हैं, क्योंकि अगर हम ऐसे ही चलाएंगे तो फिर डिमांड को कैसे पुट करेंगे। मेरी मजबूरी है। कभी-कभी आसन से सहयोग करना पड़ता है इसलिए शैलेन्द्र जी आसन से सहयोग करें। Do you want that the Private Members’ Bills should not be taken up?

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please sit down.

… (Interruptions)

SHRI T.K.S. ELANGOVAN : I want to seek a small clarification. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: If I give time to one hon. Member, how can I refuse it to others?

… (Interruptions)

SHRI T.R. BAALU (SRIPERUMBUDUR): He only wants a clarification. … (Interruptions)

SHRI T.K.S. ELANGOVAN : My point is that some of the State Governments have expressed the fear that the National Commission for Human Resource for Health will take away their powers. … (Interruptions)

सभापति महोदय: मंत्री जी ने काफी डिटेल में अपना जवाब दिया है, मैं नहीं समझता कि अब किसी सप्लीमेंटरी की जरूरत है।

SHRI T.K.S. ELANGOVAN: He has not spoken about that. … (Interruptions)

SHRI T.R. BAALU :He is only asking a clarification. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I shall now put the Demands for Grants relating to the Ministry of Health and Family Welfare to the vote of the House.

           

The question is:

 “That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the fourth column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2013, in respect of the heads of Demands entered in the Second column thereof against Demand Nos. 46 to 49 relating to the Ministry of Health and Family Welfare.”   The motion was adopted.
 
MR. CHAIRMAN : Now we shall take up Special Mentions.