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Lok Sabha Debates

Regarding The Situation Arising Out Of The Recent Violence In Kashmir Valley ... on 20 July, 2016

Sixteenth Loksabha an> Title : Regarding the situation arising out of the recent violence in Kashmir valley resulting in threat to peace and security of people of the State (Discussion not concluded).

THE MINISTER OF CHEMICALS AND FERTILIZERS AND MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI ANANTHKUMAR):  Sir, we may now take up discussion under Rule 193; and after that, we will proceed to the National Institute of Technology, Science Education and Research (Amendment) Bill.

HON. DEPUTY-SPEAKER:  If the House agrees, we may now take up discussion under Rule 193.

SOME HON. MEMBERS: Yes, Sir.

HON. DEPUTY-SPEAKER: Okay. Now, we will take up the discussion under rule 193.

          Hon. Members, discussion on the situation arising out of recent violence in Kashmir Valley resulting in threat to peace and security of people of the State has been admitted in the names of  Shri Mallikarjun Kharge and Shri  Bhartruhari Mahtab.  Shri Kharge has since requested the hon. Speaker to allow Shri Jyotiraditya Scindia to raise the discussion on his behalf, the hon. Speaker has acceded to his request.

          Now, Shri Jyotiraditya Scindia.

 

श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया (गुना) :   उपाध्यक्ष महोदय, आज आपने इस संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा करने की अनुमति दी, इसके लिए मैं आपको अपनी तरफ से, सदन की तरफ से और देश की जनता की तरफ से धन्यवाद अर्पित करना चाहता हूँ।

          आज जब हम इस सदन में बैठे हैं तो सरकार के रूप में नहीं, विपक्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक हिन्दुस्तानी होने के नाते एक-दूसरे से मुख़ातिब हो रहे हैं। उस हिन्दुस्तानी के रूप में, जिनका कलेजा, जिन सैनिकों ने अपने जान की कुर्बानी दी हो, नौज़वानों, मासूम महिलाओं और बुज़ुर्गों की जान गयी हो, उनके लिए हमारा दिल भर आता है। चाहे पम्पोर का विषय रहा हो, चाहे आतंकवादियों के खात्मे के बाद घाटी में घटनाएँ घटीं हों, देश की एकता और अखंडता के विषय में इस सदन का हर एक व्यक्ति ही नहीं, बल्कि मैं मानता हूँ कि देश का हर एक व्यक्ति एक ही स्वर में बोलता है- "जय हिन्द और सत्यमेव जयते। "

          पिछले दो सालों में, कश्मीर राज्य में हम जो हालत बिगड़ती हुई देख रहे हैं, वह केवल निराशाजनक ही नहीं, बल्कि आश्चर्यजनक हो चुकी है। भारत की प्रभुता की पहचान अंतर्राष्ट्रीय जगत में आंतरिक सुरक्षा के आधार पर होती थी, लेकिन आज वही पहचान विश्व स्तर पर खतरे में है। जो वातावरण आज देश में निर्मित हुआ है, चाहे हम असहिष्णुता का वातावरण देखें तो दादरी जैसे मुद्दे पर हो, चाहे आज जो गुजरात का मामला उठा, चाहे यूनिवर्सिटी और कॉलेज के मुद्दे हों।        एक साप्रदायिकता और ध्रुवीकरण का माहौल है। उस गांधी के देश में हम चर्चा कर रहे हैं, जहां अहिंसा ही हमारा मूल मंत्र है। साप्रदायिक सद्भाव की जगह आज साप्रदायिकता का माहौल पूरे देश में उपलब्ध हो चुका है। सत्ताधारी दल के विधायक, सांसद और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य देते हैं और कोई एक्शन नहीं लिया जाता है। स्कूल-कॉलेजों में घटनाएं हो रही हैं। परसों ही बरकतुल्लाह युनिवर्सिटी में कश्मीर के पम्पोर के एक नौजवान की बेरहमी से पिटाई की गयी, लेकिन उसके बारे में एक शब्द नहीं कहा गया। हम पाकिस्तान को जरूर कसूरवार मानें और पाकिस्तान बिलकुल कसूरवार है। लेकिन हमें अपने गिरेबां में भी झांकना होगा कि आंतरिक सुरक्षा में क्या कमियां रही हैं?
          उपाध्यक्ष महोदय, अभी हमारे प्रधानमंत्री जी अफ्रीका के दौरे पर गए थे। जिस ट्रेन में गांधी जी ने सफर किया था और उसमें जो घटना घटी थी, उसी ट्रेन में हमारे प्रधानमंत्री जी ने सफर किया था। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि हमारे देश में उन उसूलों और मूल्यों की रक्षा के लिए दृढ़ता से अपनी बात रखनी होगी। यह आज समय की मांग है। उस दौरे से वापस आने पर मीडिया चैनल्स से चर्चा में उन्होंने कहा कि आप इन लोगों को हीरो क्यों बनाते हो? क्या यह बात स्वयं में काफी है? पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अनेक धर्मों और जातियों के खिलाफ आग उगलने की बातें आयी हैं, लेकिन इस विषय पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। यह प्रश्न हमारे मन में उठता है कि क्या सरकार का कहीं ध्रुवीकरण का अजेंडा तो नहीं है?
          महोदय, जहां तक कश्मीर की बात है तो कश्मीर हर भारतीय के दिल का एक असीम भाग है। लेकिन आज उस मुकुट के साथ तौहीन हो रही है, जो मैं समझता हूं कि गैर जिम्मेदाराना है। यूपीए सरकार ने बड़ी मेहनत-मशक्कत के साथ सभी लोगों को साथ लेकर, बातचीत करके उस राज्य में अमन-चैन का वातावरण तैयार किया था, विकास और प्रगति के रास्ते पर वह राज्य चल रहा था। उसी के आधार पर अगर हम इकोनॉमिक सर्वे के आंकड़े देखें तो पिछले कई सालों में एवरेज घरेलू उत्पाद की दर में वृद्धि 5.63 प्रतिशत थी।  लेकिन जब से इस सरकार का वहां गठन हुआ है, पिछले एक वर्ष में कश्मीर के घरेलू उत्पाद की दर नेगेटिव में 1.47 प्रतिशत हो चुकी है। मतलब सात प्रतिशत की गिरावट हो चुकी है। कटरा की रेल लाइन यूपीए सरकार की देन है। उरी का पावर प्रोजेक्ट यूपीए सरकार की देन है। वहां पर्यटन और व्यापार फल-फूल रहा था, अर्थव्यवस्था पनप रही थी। वार्ता का आदान-प्रदान, विचारों का आदान-प्रदान घाटी में हो रहा था। लेकिन पिछले दो साल में उस दस साल की मेहनत पर इस सरकार ने पूरी तरह से पानी फेर दिया है। ...(व्यवधान) मैं उस पर भी आऊंगा।
          महोदय, कठिनाई यह है कि यह सरकार सदैव रियर व्यू मिरर में देखती है। इस सरकार को भविष्य बनाने का दायित्व सौंपा गया था, लेकिन इस सरकार के द्वारा केवल रियर व्यू मिरर की बात की जाती है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है। वहां की पीडीपी-बीजेपी की सरकार सारे उसूलों को त्याग चुकी है। शासन खण्ड-खण्ड में बंट चुका है और जिस सरकार को नागरिकों का सहारा बनना चाहिए, वही नागरिकों पर हथियार उठा रही है। आज कश्मीर की जरूरत है कि संवाद और चर्चा होनी चाहिए, जो वहां जख्म लगे हैं, उन जख्मों को जंजीरों की कड़ाई से नहीं, बल्कि इंसानियत से हमें भरना होगा। एक अमन-चैन का वातावरण बनाना होगा, विकास और प्रगति का वातावरण बनाना होगा, उनके द्वार हमें खोलने होंगे, तभी वह चमन हमारे देश में खिल पायेगा।   उपाध्यक्ष महोदय, यह वास्तविकता है और मैं कोट करना चाहता हूं कि बीजेपी सदैव कहती है कि देश हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। यह नारा हर बैनर, हर पोस्टर पर लिखा जाता है, लेकिन अगर हम लोग नजदीकी से मूल्यांकन करें तो हकीकत कुछ और ही दास्तां बयां करती है। पिछले दो सालों में घुसपैठ में 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और हमारे सेना बल के लोगों की 47 प्रतिशत अधिक मौतें हुई हैं। पिछले वर्ष हमारे 31 नौजवान आतंकवादी दलों के साथ मिले थे और इस वर्ष 67 लोग आतंकवादी दलों के साथ मिले हैं, यानी कि इसमें दो गुना इजाफा हो चुका है और केन्द्र सरकार मूकदर्शक के रूप में बैठी हुई है। विदेशी आतंकी ताकतों के विरुद्ध अमन-चैन कायम रखने में यह सरकार पूरी तरह से विफल हो चुकी है।
          महोदय, पंपोर की घटना 25 जून को हुई, जहां सी.आर.पी.एफ. के हमारे आठ जवान शहीद हुए। जम्मू-कश्मीर में यह तीसरी घटना थी और यह वास्तविकता है कि यह अपर्याप्त सुरक्षा का वातावरण और प्रशासनिक मशीनरी का फेल्योर स्पष्ट रूप से दर्शाता है। जम्मू-श्रीनगर का वह हाइवे, जो 35 किलोमीटर का है, जो बहुत संवेदनशील है, वहां ज्यादा सेना को डिप्लॉय क्यों नहीं किया गया? आज यह प्रश्न देश की जनता करना चाहती है। पिछली बार हमने पठानकोट के मुद्दे पर चर्चा की। मैंने कई मुद्दे उठाए थे। उसमें स्वयं रक्षा मंत्री जी ने स्वीकारा कि हां, स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर हमने फॉलो नहीं किया। आज पंपोर की घटना के बाद भी यही कहा जा रहा है कि एस.ओ.पी. का निर्वाह नहीं किया गया, मैं प्रश्न करना चाहता हूं - क्यों? हमारे जो 38 जवान वैन में चल रहे थे, उस वैन के आगे एस्कोर्ट व्हिकल क्यों नहीं चल रहा था? जहां एक तरफ आतंकवादी घटनाएं होती हैं और दूसरी तरफ 8 जुलाई को जब हिजबुल मजाहिदीन के आतंकवादी का सफाया हुआ तो उसके बाद घाटी में एक भय का वातावरण और तनाव का माहौल बना। उस माहौल में जो मुठभेड़ें हुई, उनमें हमारे 44  नागरिकों की जानें गई हैं और 3140 लोग, जिनमें 1500 सेना बल के लोग हैं, आज घायल हो चुके हैं। इस पूरे घटनाक्रम की सारी की सारी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर छोड़ी गई, केन्द्र के द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया। मैं कहना चाहता हूं कि यह सरकार समझती है कि कश्मीर एक जागीर है, जबकि ये समझ नहीं पा रहे हैं कि यू.पी.ए. सरकार ने वहां अमन-चैन कायम करने के लिए और अच्छा वातावरण निर्मित करने के लिए कितने कदम उठाये, जिसमें प्रगति और विकास होगा। वहां जो दंगे-फसाद हुए, उसमें पुलिस चौकी पर अटैक हुआ, हथियार छीने गये और यहां तक हुआ कि एक पुलिस अफसर को उसकी जीप के साथ झेलम नदी में फेंककर मौत के घाट उतारा गया। हमारे 23 हजार अमरनाथ यात्री जम्मू-श्रीनगर हाइवे ब्लाक होने की वजह से अटक चुके हैं। मैं प्रश्न पूछना चाहता हूं कि और कितनी मौतें होंगी और कितनी घटनाएं होंगी, तब यह सरकार अपनी नींद से उठ पायेगी? प्रश्न यह है कि बाहरी ताकतों के विरुद्ध और विकास के प्रति इस सरकार का रुझान बिल्कुल नहीं है। सेना बल के लोग जानते थे कि अनंतनाग के उप-चुनाव के बाद इस आतंकवादी को समाप्त किया जायेगा तो क्या उसकी प्रतिक्रिया में वातावरण की विचारधारा इस सरकार के पास नहीं थी, यह प्रश्न हम पूछना चाहते हैं? इनकी विफलताओं के आधार पर कश्मीर की जनता और देश की जनता को गुरुदासपुर, पंपोर, पठानकोट जैसी घटनाओं का पूरा-पूरा बोझ उठाना पड़ रहा है और नागरिकों के विरुद्ध  टियर गैस, पैलेट गन्स, ए.के.-47, पैलेट ग्रेनेड्स आदि का अधिक प्रयोग किया जा रहा है।
 
          मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या दोष है, उस सोहेल भट्ट का, 16 वर्ष का वह नौजवान लड़का, जिसका सपना था कि मैं एक दिन डॉक्टर बन कर जनसेवा में उतरूंगा। आज वह दोनों आँखों से नेत्रहीन हो चुका है। उसके सारे सपने चूर-चूर हो गए हैं। एक बच्ची जो चौदह साल की है, जिसका नाम इंशा मुश्ताक है, जो बाहर अपने प्रांगण में खेल रही थी, ए.के. 47 की फायर सुनते हुए वह अपने घर के अंदर गई, घर के अंदर एक पैलेट ग्रेनेट लॉब्ड किया गया, उसके मस्तिष्क के अंदर सौ छर्रे चले गए हैं और दोनों आँखों से वह नेत्रहीन हो गई है। क्या जवाब यह सरकार उन परिवारजनों को देना चाहेगी, यह प्रश्न हम इस सरकार से करना चाहते हैं। आज भी यह सरकार कहती है कि पैलेट गन्स नॉन-लीथल हैं। स्वयं वर्तमान की मुख्य मंत्री महबूबा मुफ्ती जी ने सन् 2014 में कहा था और मैं उनको कोट करना चाहता हूँ कि -
“Instead of their promised honey and milk, what they gave the people of Kashmir are  pellet guns, arrests, disabilities and police cases.”             यकीनन  राज्य सरकार ने जो मैक्सिमम रिस्ट्रेंट की सोच है, अधिकतम संयम की सोच है, इसका पूरी तरह से त्याग कर दिया है। क्या यह सरकार आतंकवादी और आम आदमी को एक ही निगाह से देखेगी? क्या वही प्रतिक्रिया, वही ग्रेनेड्स और वही पैलेट गन्स आम नागरिकों के विरूद्ध हम चलाएंगे, यह प्रश्न हम पूछना चाहते हैं? वास्तविकता यह है कि इनका हीलिंग टच पूरी तरह से समाप्त हो चुका है और राजनैतिक अपरिपक्वता आज दर्शाने लगी है। हमारे प्रधान मंत्री इस पूरे घटनाक्रम में विदेश के दौरे पर थे, बहुत देशों का उन्होंने दौरा किया है, परंतु इस दौरे के दरम्यान उन्होंने अपने एक सहभागी मंत्री, जो आज इस सदन में मौजूद हैं, उनको अपनी सालगिरह में अपनी तरफ से साधुवाद और बधाई दी थी। उस दौरे में जब फ्रांस और टर्की में आतंकवादी हमले हुए थे, उन हमलों के विरूद्ध भर्त्सना व्यक्त की थी, लेकिन कश्मीर पर एक शब्द भी नहीं कहा। क्या प्रधान मंत्री जी अपने करीब के दोस्त, प्रेसिडेंट बराक ओबामा से प्रेरणा नहीं लेना चाहते, क्योंकि जब डलास की शूटआउट हुई थी, तब प्रेसिडेंट ओबामा ने अपने विदेशी दौरे को समाप्त किया था और वे वापस डलास चले गए थे। आज हमारे देश का एक राज्य आग की चपेट में है और हमारे प्रधान मंत्री विदेश में बैठ कर ड्रम बजा रहे हैं।
          वापस आने के बाद एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित हुई, जिसमें गृह मंत्री जी और रक्षा मंत्री जी शामिल थे, लेकिन उस उच्चस्तरीय बैठक के बाद भी, कश्मीर की जम्हुरियत और कश्मीर के लोगों के साथ एक शब्द का वार्तालाप नहीं हुआ। मैं पूछना चाहता हूँ कि कहां गई, वह मन की बात, इसका जवाब प्रधान मंत्री जी को देश की जनता को देना पड़ेगा?
          पिछले नवंबर में, जब प्रधान मंत्री जी श्रीनगर गए थे, उन्होंने कहा था और मैं कोट करूंगा कि “कश्मीर के लिए मुझे किसी सलाह की जरूरत नहीं है, किसी के विश्लेषण की जरूरत नहीं है। ”             क्या यही कारण है कि उस उच्च-स्तरीय बैठक में जम्मू कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री को शामिल नहीं किया गया? कोऑपरेटिव फेड्रलिज्म की बात की जाती है। शायद वे स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए जम्मू कश्मीर में व्यस्त थीं, तो क्या वीडियो कॉफ्रेंस का उपयोग नहीं किया जा सकता था? हम लोग डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, मेक इन इंडिया की बात करते हैं। इस प्रश्न का जवाब देना होगा कि जो सहभागी नेतृत्व की बात की जाती है, यह केवल खोखले वक्तव्य हैं या इसके पीछे कोई ठोस सबूत है।
          जहां तक हम राज्य की सरकार की बात करते हैं, वहां तो मुख्य मंत्री जी भी गायब हैं और पूरी सरकार और शासन गायब है। मुख्य मंत्री जी ने आदेश दिए थे कि हर मंत्री और विधायक अपने-अपने क्षेत्र में जाएं, स्थिति का जायज़ा लें और नियंत्रण करें। लेकिन एक संतरी, तंत्री, मंत्री, एक व्यक्ति भी किसी भी अस्पताल में नहीं गया और किसी से कुछ नहीं पूछा। ...(व्यवधान) महोदय, मैं तो आश्चर्यचकित हूँ।
गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री किरेन रिजीजू) : आप एक मिनट रूकिए।...(व्यवधान)
SHRI JYOTIRADITYA M. SCINDIA: Kiren Ji, I am not yielding.… (Interruptions) मैं विनम्रतापूर्वक कह रहा हूँ।...(व्यवधान)
SHRI KIREN RIJIJU : You please show some courtesy. I am not contradicting. What I am saying is that he is making a good speech. आप अच्छा बोल रहे हैं, लेकिन जो प्वाइंट आप बोल रहे हैं, वे मिसलीडिंग मिस्लीडिंग हैं, फैक्चुअली करेक्ट नहीं हैं।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: अगर ऐसा है तो आप अपने जवाब में उनका उल्लेख कीजिए। आप जरूर अपने जवाब में उल्लेख कीजिए।
श्री किरेन रिजीजू : फैक्चुअली आप मिसलीड न करें, यही मेरा कहना है।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:अगर मेरी गलतफहमी है तो उसको आप अपने जवाब में ठीक कीजिए। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। जैसे राजनाथ सिंह जी ने आज सुबह कहा कि उनके बोलने के बाद जरूर वे सुनने के लिए तैयार हैं। मेरे बोलने के बाद मैं आपकी बात सुनने के लिए तैयार हूँ।...(व्यवधान)
HON. DEPUTY SPEAKER: Please address the Chair.
…( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया : महोदय, मैं चर्चा कर रहा था कि जहाँ तक राज्य सरकार की बात है, आश्चर्यजनक बात यह है कि वहाँ तो पूरा मीडिया पर बैन लग चुका है। प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ का गला घोंटने का काम चल रहा है। 12वें दिन कर्फ्यू चल रहा है। आम नागरिक के लिए वहाँ राशन नहीं मिल रहा है, खानपान की वस्तुएं नहीं मिल रही हैं, दवाईयाँ नहीं मिल रही हैं। जहाँ तक केन्द्र सरकार की बात है, मैं कहना चाहता हूँ कि हमारे गृह मंत्री अकेले मंत्री हैं, जिन्होंने नियंत्रण करने की कोशिश की, विपक्ष को विश्वास में लिया, लेकिन क्या कारण है कि केन्द्र सरकार का कोई भी एक नुमाइन्दा, कोई भी एक मंत्री आज तक जम्मू-कश्मीर में जायजा लेने के लिए नहीं गया? इस प्रश्न का जवाब देना होगा। घुसपैठ की घटनाएं चल रही हैं, हमारे रक्षा मंत्री गोवा में हैं, एलईडी बल्ब का वितरण कर रहे हैं। अगर यह आश्चर्यजनक नहीं है तो क्या है? सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक तो यह है कि इस सरकार की पाकिस्तान की नीति तो बिल्कुल एक तमाशा बन चुकी है। चाहे पम्पोर की घटना हो, अनेक घटनाएं हैं, जब आप इधर बैठे थे तब तो आप बड़े गरम थे, अब आप उधर बैठे हो तो आप बड़े नरम हो चुके हो। जब आप इधर बैठे थे तो वक्तव्य दिए जाते थे कि एक सिर के बदले में दस सिर हमें लेने होंगे। आज हमारे गृह मंत्री वक्तव्य देते हैं और मैं कोट करना चाहूँगा कि  "पड़ोसी देश का रवैया जैसा होना चाहिए वह ठीक नहीं है।" क्या यह है, आपका मुँहतोड़ जवाब?
          महोदय, प्रधान मंत्री जी ने चुनाव के पहले कहा था कि हम पाकिस्तान को लाल आँख बताएंगे और आज एक मीडिया चैनल के इंटरव्यू में कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ लक्ष्मण रेखा का फैसला किसके साथ करें। अगर हमारे देश के प्रधान मंत्री न जानें कि किसके साथ करें तो इससे ज्यादा विवशता का सबूत क्या हो सकता है। उस तरफ पाकिस्तान के प्रधान मंत्री उस आतंकवादी को कहते हैं कि वह शहीद है, स्वतंत्रता का संग्रामी है। पाकिस्तान कैबिनेट की मीटिंग बुलाई जाती है, 19 जुलाई को काला दिन मनाने की घोषणा की जाती है और जवाब में हमारे विदेश मंत्रालय के सचिव यहाँ से कहते हैं, मैं कोट करता हूँ:
 “We are dismayed at the continued attempts by Pakistan to interfere in our internal matters.”   डिस्मेड यानी निराश, एक दूसरा देश हमारी आन्तरिक सुरक्षा के मुद्दे पर हस्तक्षेप कर रहा है और आप हाथ जोड़कर उनसे कह रहे हैं कि भइया, ऐसी टिप्पणी मत करो।...(व्यवधान) इससे ज्यादा दुर्भाग्यस्थित क्या विषय हो सकता है? वास्तविकता है कि यह एक मेरिज ऑफ कन्वीन्येंस है, जम्मू एंड कश्मीर में, वहाँ मतलब की शादी है और वास्तविकता यह भी है, इनके मार्गदर्शक मंडल के एक सदस्य ने कहा, आदरणीय यशवंत सिन्हा जी ने कहा कि इनकी विदेश नीति पूर्णतयाः विफल हो चुकी है। 
          वास्तविकता यह है कि आज उस प्रदेश में राज्य सरकार में एक आइडैंटिटी क्राइसेज़ चल रहा है। पीडीपी के नेता मुजफ्फ़र बेग साहब ने स्वयं पिछले वर्ष कहा है और मैं क्वोट करूँगा -  “This alliance is creating mistrust, alienation and cynicism” और इस वक्तव्य में जो विरोधाभास है, जो असलियत है, वह देश की जनता के सामने उजागर होती है। हमने दस साल बहुत कोशिश की एक विस्तृत प्रगतिशील कश्मीर बनाने के लिए, बहुत मेहनत मशक्कत की। लेकिन आज जो घोषणाएँ की जाती हैं सरकार के द्वारा बहुचर्चित परियोजनाओं के बारे में धरातल पर कुछ नहीं दिख रहा है। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि राजनीतिक उथल-पुथल और आतंकवाद जम्मू-कश्मीर में पनप रहा है। वास्तविकता यह भी है कि जम्मू-कश्मीर की 60 प्रतिशत जनता 30 साल से कम आयु की है, नौजवान है। अगर हम रोज़गार के अवसर उत्पन्न न कर पाएँ, उनको विकास और प्रगति का रास्ता न दिखा पाएँ तो हम उनको आतंकवाद की तरफ धकेल रहे हैं। यह ज़िम्मेदारी हम लोगों की है, इस सरकार की है। एक व्यक्ति ने कहा था कि अगर सरकार अपनी पुलिस की रक्षा नहीं कर सकती तो वह अपने आम नागरिकों को कैसे सुरक्षित रखेगी? यह वाक्य मेरा नहीं है, यह वाक्य भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह जी का है। आज वास्तविकता यह है कि आज कश्मीर में केन्द्र सरकार अपनी जनता की सुरक्षा करने में पूरी तरह से विफल हो चुकी है। जिस वीर जवान ने उस आतंकवादी का खात्मा किया, दो गोलियाँ उसने लीं, वह अभी अस्पताल में है, आज वह भी अपने परिवारजनों की सुरक्षा के लिए चिन्तित है। क्या यह न्याय है, उस व्यक्ति के साथ? यह स्पष्ट हो चुका है कि पाँच मुद्दों पर यह सरकार विफल हो चुकी है। बाहरी ताकतों और आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ने में, अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में, अपराधियों को निर्णायक सज़ा देने में, शून्य विकास और जो कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत की कहावत है, वह केवल कहावत ही रह चुकी है।
          उपाध्यक्ष महोदय, मैं तो गृह मंत्री जी से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि एक सर्वदलयीय समिति बनाइए और कश्मीर भेजिए। हम इसके लिए तैयार हैं। आप कदम लीजिए, हम आपके साथ हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि आज दुनिया में एक साप्रदायिकता और अराजकता का माहौल है, आतंकवाद का माहौल है। भारत सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, हमारी आध्यात्मिक शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है, अनेकता में एकता की प्रभुता भारत की है। उसे हमें बचाए रखना होगा। यह आपका दायित्व है, हमारा दायित्व है, हम सबका दायित्व है। मैं आप सबसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि अगर आप देशहित में काम करेंगे तो हम आपकी हिमायत करेंगे, लेकिन अगर आप विफलताओं के प्रतीक बनेंगे तो एतराज़ भी हम करेंगे। हमारी नेत्री श्रीमती सोनिया गांधी जी ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं हो सकता। इस मामले पर पूरा भारत एक है, सदन का हर व्यक्ति एक है, हम एक ही स्वर में बोलेंगे। लेकिन मैं इस सरकार से निवेदन करना चाहता हूँ कि Secure our borders, secure our people before it is too late. We are with you. But act, act with a plan. अंत में मैं दो पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ :
          ‘हमें मंज़िलों पर क्या पहुँचाएँगे जिनकी चाल अंजानी है, आसरा क्या देंगे बेबसों को, विवश रहने की जिन्होंने ठानी है।’                                                                                       15.00 hours श्री अनुराग सिंह ठाकुर (हमीरपुर):उपाध्यक्ष जी, धन्यवाद। यह एक बहुत ही गंभीर विषय है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और जम्मू-कश्मीर राज्य की सुरक्षा के साथ भी जुड़ा हुआ है। जितना गंभीर यह विषय है, उसकी गंभीरता सदन के आज के माहौल से पता चलता है। इसलिए सत्ता पक्ष की ओर से, एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में मैं अपनी बात रखना चाहूंगा।

          महोदय, आरोप लगाना बहुत आसान है। आरोपों में जब तथ्यों की भारी कमी हो, तब तो आप विपक्ष में रहकर बड़ी आसानी के साथ झूठे आरोप भी लगा सकते हैं। लेकिन, सच्चाई यह है कि आज़ादी के समय से ही जम्मू-कश्मीर राज्य का विषय और जम्मू-कश्मीर राज्य की परिस्थितियां गंभीर और विशेष हैं। ये विशेष परिस्थितियां किनके कारण हैं, आज जो विपक्षी दल हैं, वे ज़रा अंदर झांक कर देखें। अगर किसी को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है तो मुझे लगता है कि इनके लिए यह बहुत जरूरी है कि किसके निर्णय, किस समय का निर्णय, उस समय के नेताओं के रहे, जिसके कारण आज भी ये परिस्थितियां बनी हुई हैं, जिसको आप स्पेशल स्टेटस का दर्ज़ा कहते हैं, जिसके कारण ये परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। शायद यही कारण है कि धरती और मंगल तक की दूरी तो हमने पार कर ली, लेकिन शायद दिल्ली और कश्मीर के बीच के दिलों की दूरी को हम कम नहीं कर पाएं। क्या कारण रहा, आज हम सब को यह अपने आप से पूछने की आवश्यकता है।

          आज हमारे मित्र ने यहां से भाषण देते हुए कहा। वे वरिष्ठ सदस्य हैं। मुझे अभी तक समझने में, शायद मेरी कमी होगी, कि आखिरकार इन्होंने किस के ऊपर आरोप लगाए या क्या यह जानना चाहते थे कि ये परिस्थितियां कैसे पैदा हुईं? क्या ये इनकाउंटर के खिलाफ थे या बी.जे.पी. या पी.डी.पी. के गठबंधन के खिलाफ थे या पाक़ के हस्तक्षेप के खिलाफ थे या जो वहां पर सुरक्षा बलों के द्वारा, कंट्रोल करने के लिए पेलेट गन्स वगैरह का इस्तेमाल किया गया, क्या ये उसके खिलाफ थे? आखिर ये परिस्थितियां क्यों पैदा हुईं?

          आखिर दिनांक 08 जुलाई को जो व्यक्ति मारा गया, वह कौन था? इसमें तो कोई दो राय नहीं होगी कि बुरहान वानी एक आतंकवादी थे। लम्बे समय से उनको पकड़ने की बात चल रही थी। जिस व्यक्ति से भारत की सुरक्षा को खतरा हो और सुरक्षा बलों ने अगर उसे मार गिराया हो तो सुरक्षा बलों को उसके लिए बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने देश की सुरक्षा के लिए काम किया है। लेकिन, उसके बाद जो परिस्थितियां खड़ी हुईं, वह कई और प्रश्न खड़ा करता है। दुःख के साथ यह कहना पड़ता है, क्योंकि जो तथ्य और आंकड़े मेरे पास हैं, उसके अनुसार आरोपों में शायद कुछ कमी थी।

          मैं माननीय गृह मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि वर्ष 2005 में आतंकी हिंसा के 1990 मामले थे और वर्ष 2014 तक कम होकर वह 214 तक रह गए। कुल मौत वर्ष 2005 में 1663 लोगों की हुई तो वह वर्ष 2014 में कम हो कर 185 की हो गयी। इसलिए यह बढ़ा नहीं, बल्कि कम हुआ है। जहां तक इंफिल्ट्रेशन की बात है, तो वर्ष वर्ष 2005 में 597 ऐसे मामले सामने आए, जो वर्ष 2014 में कम होकर 222 रह गए। कृपया होम मिनिस्टर साहब यह बताएं कि आख़िरकार यह जो कमी आई है, इसके लिए मैं आपकी सरकार को और पूर्व की सरकार को भी बधाई देना चाहता हूं। विशेष तौर पर, सुरक्षा बलों को मैं बधाई देना चाहता हूं, जिन्होंने लगातार ऐसे मामलों में कमी लेकर आए हैं। हमें सुरक्षा बलों को बधाई देनी चाहिए, जो अपना घर-परिवार छोड़ कर वर्षों-वर्षों तक अपने परिवारों से दूर रहते हैं। अपने परिवारों की सुरक्षा नहीं, बल्कि 125 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा करने के लिए अगर कोई अपना बलिदान देता है, तो वह भारत का सैनिक देता है, जिस पर हमें गर्व होना चाहिए। लेकिन, उसके खिलाफ़ हथियार उठाए जाते हैं, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई जाती है, पथराव किए जाते हैं। आज मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे शायद पथराव की घटनाएं पहली बार हुई हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल तीन बार सांसद बना हूं। लेकिन, मैं सन् 2010 की जुलाई महीने की घटना को याद दिलाता हूं। यही सदन था। हम उस ओर बैठे थे और वे लोग इस ओर बैठे थे। तीन महीने तक पथराव की घटनाएं रहीं। उसके पीछे क्या कारण था? उस समय की सरकार कौन थी? उसकी क्या भूमिका रही? मैं तो उस समय नया सांसद था। तब भी मैंने सभी सांसदों के पास जा कर कागज़ पर साइन करा कर कश्मीर के युवाओं से एक अनुरोध किया था कि हिंसा से कुछ नहीं मिलेगा, हमें यहां पर वातावरण ठीक करना होगा, उन तक पहुंचना होगा।

          महोदय, मैं तो भारतीय जनता पार्टी का सदस्य हूं, जिसके डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो कोलकाता से आते थे, लेकिन अगर किसी ने कश्मीर के लिए अपना बलिदान दिया तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिया। अटल जी ने कश्मीरियत, ज़म्हूरियत और इंसानियत के दायरे में रह कर सारी बात करने की बात कही। अगर सही मायने में कश्मीर में कभी कोई संभावना देखी गयी कि हालात सुधर सकते हैं, इन दिलों की दूरियों में कमी हो सकती है, तो यह जो दो हिस्सों में अलग-अलग दिखाने का प्रयास किया जाता है, यह भारत का ही एक हिस्सा है और अटल जी के समय वह देखने को मिला था। उस समय बहुत प्रयास किए गए थे। लेकिन, जुलाई, 2010 में हुई पथराव की घटनाओं में क्या पेलेट गन्स नहीं चली थीं? क्या उस समय पेलेट गन्स का प्रयोग नहीं किया गया था, यह मैं गृह मंत्री जी से जानना चाहता हूं। किसके समय में वह खरीदी गयी, किसने उसका इस्तेमाल किया, किसके ऊपर उसका इस्तेमाल किया गया? मेरे कश्मीर के नौजवान भाई, चाहे किसी की सरकार के समय उनकी जान गयी हो, वहां के मेरे भाई-बहन, चाहे वह पन्द्रह साल का हो या पचास वर्ष का हो, एक-एक कश्मीरी हमारा भाई और हमारी बहन है। उनकी जान हमें प्यारी है और उनकी जान की सुरक्षा हमें करनी चाहिए, चाहे वह प्रदेश की सरकार हो या केन्द्र की सरकार हो।

          प्रधान मंत्री जी के बारे में कहा गया। मैं सदन के सामने यह कहना चाहता हूं। मैं आज आंकड़े नहीं देना चाहता था। लेकिन, मज़बूरी में अब कहना पड़ेगा। कश्मीर में बाढ़ आई। हमने असम की घटनाएं भी देखीं, जहां से आपके प्रधान मंत्री जी आते थे। वहां पर फौज नहीं पहुंचती थी और प्रधान मंत्री भी नहीं जाते थे। लेकिन, कश्मीर की बाढ़ के समय एक दिन के अंदर हमारे प्रधान मंत्री जी वहां गए और 80,000 करोड़ रुपए का पैकेज अगर किसी ने जम्मू-कश्मीर को दिया और यू.पी.ए. की सरकार से तीन गुना ज्यादा किसी ने दिया तो वह एन.डी.ए. की सरकार ने, नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने दिया। यही नहीं, वहां पर पावर प्रोजेक्ट्स बंद थे। उनको शुरू करने का काम किया। वहां पर नए स्टेडियम्स बनाने का काम किया। अगर मणिपुर और कश्मीर को स्पेशल यूनिवर्सिटीज़ दी गयी तो वह हमारी सरकार ने दी है। तीन मेडिकल कॉलेज़, दो एम्स, आई.आई.टी., आई.आई.एम., सात पॉलिटेक्नीक कॉलेज, 40,000 करोड़ रुपए की सड़कें दी। माननीय नितिन गडकरी जी वहां जाकर 9,000 करोड़ रुपए की टनल की भी नींव रखी। कश्मीर में यह कब हुआ था?

          उपाध्यक्ष जी, अगर आंकड़े देने हो तो आप जितने आंकड़े कहेंगे, मैं सुबह से शाम तक आंकड़े दे सकता हूं। पैकेज की बात की जाए तो यू.पी.ए. की सरकार से तीन गुना ज्यादा पैकेज हमने दिया है। यही नहीं, केवल पैसे की बात नहीं, विकास की बात नहीं, अगर दिलों की दूरियों को पूरा करने का किसी ने काम किया तो नरेन्द्र मोदी जी ने अपने घर में दीपावली नहीं मनाई, बल्कि कश्मीरी भाइयों और बहनों के बीच में दीवाली मनाई।...(व्यवधान)

          मित्रो, अभी दो वर्ष ही हुए हैं। लोगों को पीड़ा इस बात की होती है कि वहां पर पी.डी.पी. और बी.जे.पी. की सरकार बन कैसे पाई? न इसे आपने बनाई, न इसे मैंने बनाई, इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों ने बनाई है। छः सालों तक पूरा विकास करके जम्मू-कश्मीर को आगे लेकर आएंगे। जो पिछले साठ वर्षों में नहीं हुआ, उसे अगर इन छः वर्षों में करेगी तो एन.डी.ए. की सरकार और वहां पर बी.जे.पी.-पी.डी.पी. की सरकार करके देगी।...(व्यवधान)

          आखिरकार, वहां पर आर्मी की, अर्द्धसैनिक बलों की, जम्मू-कश्मीर पुलिस की भूमिका क्या रहती है? एक तरफ, आतंकवादियों के साथ बॉर्डर पर लड़ना और आतंकवादी घुसपैठ को रोकने की उनकी जिम्मेदारी है।          जम्मू-कश्मीर में कोई आतंकी घटना न हो, उसकी जिम्मेदारी उनकी, पथराव की घटना हो तो उसको रोकने की जिम्मेदारी सैनिक बलों की, किस तरह का प्रेशर उनके ऊपर होता होगा, शायद आपने इसका अंदाजा नहीं लगाया। इनके ऊपर लगातार आरोप लगते हैं। जहां आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल प्रोटेक्शन एक्ट में बदलाव करने की बात आपकी सरकार करती थी और जम्मू-कश्मीर में उस समय की सरकार के खिलाफ थी। वहां पर माहौल को शांत करने के लिए और आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल प्रोटेक्शन एक्ट में बदलाव न हो, तो जनवरी, 2011 में अगर किसी ने साढ़े चार हजार किलोमीटर की यात्रा की तो मैंने एक सांसद और भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष के नाते की थी। हजारों युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तारी दी थी। आपने तो मुझे मेरे ही देश में तिरंगा झंडा फहराने से रोक लिया। आपने उस समय के नेता प्रतिपक्ष, राज्य सभा और लोक सभा को झंडा फहराने तक नहीं दिया था। क्या हालात आपने उस समय पैदा कर दिए थे? जो हमारे कार्यकर्ता कश्मीर गए, उनके हाथ पैर तोड़कर वापस भेज दिया गया था। ...(व्यवधान) परिस्थितियां उससे कई गुना अच्छी हैं। वहां की सरकार और यहां की सरकार ने काम करके दिखाया है।

          जहां तक सैनिक बलों की, आर्मी की बात है, तो जब फ्लड आया तो उस समय किश्तियां लेकर 28 लाख से ज्यादा लोगों की जान बचायी तो भारतीय सेना ने लाखों लोगों की जान बचायी थी। अगर राहत के समय खाने की सामग्री, मेडिकल ट्रीटमेंट, फर्स्ट ऐड किसी ने दी, तो आर्मी ने वहां पर दी थी। यही नहीं, पिछले कई वर्षों से आतंकवाद और पाकिस्तान से लड़ते-लड़ते और स्थानीय कुछ वर्ग की आलोचना सहने के बावजूद हमारा फौजी भाई पूरे मान-सम्मान, पूरी ईमानदारी के साथ हर कश्मीरी की सुरक्षा करने के लिए, हर भारतीय की सुरक्षा करने के लिए वहां पर अपने प्राण त्यागता है। हमें इस बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। जब यह कहा जाता है कि पैलेट गन उठाई जाती है, किसके खिलाफ? हम भी नहीं चाहते कि पैलट गन उठे, हम भी नहीं चाहते कि लाठी उठाई जाए।

          उपाध्यक्ष जी, मैं मंत्री से आपके माध्यम से पूछना चाहूंगा कि जब आपकी पुलिस चौकी पर आकर कोई आपके हथियार छीने, आपके सुरक्षा बलों पर लगातार पथराव करे, आपकी गाड़ियों से आपको उतारकर फेंका जाए, पेट्रोल बम आपके ऊपर फेंके जाएं, आपके ऊपर लगातार हमले किए जाएं, तो आपके सुरक्षा बल क्या करेंगे? ...(व्यवधान) कम से कम अपनी सुरक्षा तो करेंगे। अगर विपक्षी मित्रों के पास, क्योंकि हमें तो सत्ता में आए कम वर्ष हुए हैं, इन्होंने इतने वर्षों तक राज किया है, इनके पास कोई समाधान है तो कृपया करके वे उसका उल्लेख जरूर करें।

          मुझे दुःख इस बात का होता है कि राज्य सभा में कांग्रेस के जो पूर्व मुख्यमंत्री है, वहां के सदस्य भी हैं, वरिष्ठ नेता हैं, उन्होंने कहा कि चालीस जहाज अब एक दिन में कश्मीर में आते हैं, टूरिज्म को बढ़ावा मिल रहा है, लाखों लोगों को रोजगार मिल रहा है, लेकिन हमारे यहां के एक सदस्य ने कहा कि जीडीपी की ग्रोथ रेट बहुत नीचे आ गई। इन दोनों में बहुत विरोधाभास है। पार्टी में ही मुझे लगता है कि कहीं न कहीं आंकड़ों की कमी है, उसे देखना चाहिए।

          जहां तक सरकार और सुरक्षा बलों की भूमिका है, वह बहुत अच्छी रही है। लेकिन पाकिस्तान की भूमिका क्या रही? पाकिस्तान जो आग लगाने का काम कर रहा है, सोनिया जी, हमें यह जरूर देखना पड़ेगा कि कहीं तेल डालने का काम हमारी ओर से किसी के द्वारा तो नहीं हो रहा है। आग तो पाकिस्तान लगा रहा है, तेल डालने का काम हमारे यहां से तो किसी की ओर से नहीं हो रहा है। अगर हम सब राजनीतिक दल जम्मू-कश्मीर के लोगों की सुरक्षा की बात करते हैं, उनको सुरक्षित देखना चाहते हैं, सब एक स्वर में बात करते हैं तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो हमें रोक पाए। जम्मू-कश्मीर हमारा है, सदा भारत का ही हिस्सा रहेगा।

          पाकिस्तान ने तीन युद्ध भारत के साथ लड़ लिए और तीनों युद्धों में पाकिस्तान को धूल किसने चटाई तो भारतीय सेना ने चटाई है, हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए। उनका सपना सदा यह रह जाएगा। मुझे नहीं पता कि कांग्रेस के कितने नेता सीमा पर लड़ने गए थे, लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि जब कारगिल का युद्ध हुआ था तो हिमाचल प्रदेश के उस समय के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल जी और उस समय में हमारे प्रभारी नरेन्द्र भाई मोदी जी, कारगिल के सीमा पर सैनिकों का मनोबल बढ़ाने वाले कोई नेता गए थे, तो हमारे नेता गए थे। ...(व्यवधान) मैं कहना नहीं चाहता था, लेकिन आप लोगों ने बुलवाया है। ...(व्यवधान)    इसलिए मैं आपको याद करवा रहा हूं। अब मैं यह नहीं कहूंगा कि 90 हजार सैनिक किसने छोड़े।...(व्यवधान) आपको पता होना चाहिए कि जम्मू कश्मीर की समस्या आपके किस नेता की कमी के कारण है। मैं आज उस पर नहीं जाना चाहता। यह आपको पता है। अगर नहीं पता होगा तो इतिहासकारों के पास जाकर समझ लीजिए। जो अफजल को अफजल गुरू कहते हों, जो उसे शहीद बताते हों, मैं उनसे बहस नहीं करना चाहता, वैसे तो अफजल जी भी कहते हैं।

          पाक की भूमिका क्या रही। पाक हमसे सीधे युद्ध में कभी नहीं जीत पाया और न ही कभी जीत पाएगा। पाक का कश्मीर को अपना करने का जो सपना था, न कभी वह पहले पूरा हो पाया है और न कभी भविष्य में पूरा हो पाएगा, यह बात हम कह देना चाहते हैं। जब वे लड़कर नहीं ले पाए तो आतंकवाद को बढ़ावा देने का प्रयास किया। पिछले 3-4 दशकों से लगातार हमारी सेना वहां लड़ रही है। आदरणीय जनरल वी.के. सिंह जी यहां बैठे हैं। इन्होंने वहां पर परिस्थितियां देखी हैं। जब आतंकवाद के माध्यम से भी वे नहीं कर पाए, अलगाववादी नेताओं के माध्यम से भी नहीं कर पाए, तो पैसे के माध्यम से वहां के युवाओं को भटकाने का प्रयास किया गया। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है। मैं माननीय मंत्री जी से यह भी जानना चाहूंगा कि क्या इस समय पैसे का भी इस्तेमाल हो रहा है? क्या पाकिस्तान की इसमें भी भूमिका आ रही है? पाकिस्तान ने बुरहान वानी को शहीद घोषित किया और काला दिवस मनाने की बात कही जिसका हमने विरोध किया, आलोचना भी की। मैं अपने विपक्षी मित्रों से कहना चाहता हूं कि जब आलोचना करने का समय हो तो हम आलोचना करते हैं और जब गिरेबान पकड़ने का समय होगा, जब गोली से जवाब होगा तो हम उसमें भी हिम्मत रखते हैं कि दूसरे देश के अंदर जाकर गोली चलाकर अगर किसी सरकार ने बदला लिया तो नरेन्द्र मोदी जी की सरकार के समय लिया गया।...(व्यवधान)

          स्टोन पैल्टिंग का जो विषय बार-बार आया है, क्या स्टोन-पैल्टिंग अभी-अभी शुरू हुई है। सरकारें गिराने का काम कांग्रेस कई वर्षों तक करती रही। जब 80 के दशक में एनसी की सरकार गिराई गई थी, उस समय भी स्टोन-पैल्टिंग बहुत हुई थी। उस समय इसकी शुरुआत हुई थी। वहां अगर लाइट चली जाए तब भी ट्रांसफार्मर पर पथराव करते हैं। वहां प्रोपेगंडा चलता है, यह मुझसे ज्यादा मेरे वरिष्ठ नेता खड़गे जी जैसे लोग जानते हैं। वहां प्रोपेगंडा बहुत चलता है कि यह हो गया, दिल्ली से यह कर दिया गया, दिल्ली से वह कर दिया गया। क्या हमारी भूमिका उस प्रोपेगंडा को और बड़ा करने की होनी चाहिए या उसे रोकने की होनी चाहिए?

          आज सोशल मीडिया की भूमिका क्या है। सोशल मीडिया में दुनियाभर में देखा गया, चाहे अरब प्रिंग की बात की जाए, आईएसआईएस की बात की जाए, दुनियाभर में तख्ता पलट करने के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग किया गया। जो समाज को जोड़ने का काम होना चाहिए आज समाज को तोड़ने और हिंसा फैलाने का काम सोशल मीडिया के माध्यम से भी हो रहा है। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार हम सबको है और होना चाहिए। आपने लगाम लगाने की कोशिश की, हमने वह भी नहीं किया। हम उसमें विश्वास रखते हैं। जो मीडिया के चौथे स्तम्भ की बात करते थे, मेरे मीडिया के मित्र जो लिखें, खुलकर लिखिए। मोदी जी की जितनी आलोचना आपको करनी है, आप कर सकते हैं। आपको मोदी सरकार की जितनी आलोचना करनी है आप कर सकते हैं। आपको नीतियों, कार्यक्रमों की आलोचना करनी है आप कर सकते हैं। लेकिन एक आतंकवादी को पहले पन्ने पर शहीद, बड़ा हीरो या उसे ग्लोरीफाई करने का काम मत कीजिए। इससे देश को नुकसान हो रहा है, आप अपनी भूमिका समझिए। चाहे अफजल की बात हो, चाहे याकूब मेनन की बात हो, मैंने पहले भी इसी सदन में खुलकर कहा था कि मीडिया के कुछ वर्ग को यह समझना होगा कि जिन लोगों को बड़ा नेता या शहीद बताने का प्रयास किया जाता है, कभी न कभी वह हमें ही काटने आएगा, कभी न कभी उनके बम धमाकों से हमारे परिवार या रिश्तेदारों को कोई व्यक्ति जाएगा, कभी न कभी हमारे किसी प्रिय की हत्या होगी, हमारा ही कोई भारतीय भाई और बहन मरेगा। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम सबको इकट्ठा होना चाहिए।

इस सदन का पूर्व में उदाहरण रहा है, जब-जब पाकिस्तान को संदेश देना हो, चाहे हमारे आपस में कितने ही वैचारिक मतभेद क्यों न हों लेकिन देश की एकता और अखंडता के लिए हमारे सारे राजनीतिक दल पहले भी साथ आए हैं और मेरा विश्वास है कि आज भी कोई संदेश पाकिस्तान को देना चाहिए जिससे पाकिस्तान द्वारा 19 जुलाई को काला दिवस मनाना और बुरहान वानी को शहीद घोषित करने के खिलाफ पूरी दुनिया में और विशेष रूप से पाकिस्तान को जाना चाहिए। इससे हमारी एकजुटता नजर आएगी, इसमें केवल सरकार की भूमिका नहीं है इसमें हर भारतीय की भूमिका है। हमारे विपक्षी दल के नेता कह रहे थे। यदि हम आतंकवादियों को इसी तरह ग्लोरिफाई करते रहेंगे, उनके महिमा का गुणगाण करते रहेंगे और उसे आकर्षक रूप में पेश करते रहेंगे तो इससे देश को नुकसान होगा।

          मैं आदरणीय गृह मंत्री जी से पूछना चाहूंगा कि बुरहान वानी अगर सोशल मीडिया पर एक्टिव था तो हमारी सुरक्षा एजेंजी आईबी ने उस पर रोक क्यों नहीं लगाई? आखिरकार उसका कद इतना बड़ा कैसे होता चला गया? लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी रहनी चाहिए लेकिन आतंकवादी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करें और हमारी सुरक्षा एजेंसियां चुप बैठी रहें ऐसा क्यों हुआ और भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए हम क्या प्रयास करने वाले हैं? कश्मीर में लगातार प्रोपेगंडा चलता है, क्या हम सब इसके लिए मिलकर इकट्ठा काम कर सकते हैं?

          उपाध्यक्ष जी, मुझे यह कहते हुए दुःख होता है जब सदन में कई बार चर्चा की जाती है तो कुछ वर्ग तक सीमित रहकर कर दी जाती है, उसको सेक्युलरिज्म का रूप देकर बातचीत करने का प्रयास किया जाता है। सच्चाई यह है कि हिंसा से कश्मीर का फायदा नहीं हो रहा है। उस दिहाड़ी कश्मीरी का क्या, गरीब कश्मीरी का क्या, होटल में काम करने वाले या छोटे व्यापारी का क्या, उस कश्मीरी का क्या, जिसे दस दिनों में एक दिन भी कमाई करने का अवसर नहीं मिला। वह अपने परिवार को कैसे पालेगा, जो होटल लगातार चलते रहता था उनकी पूरी कैंसिलेशन हो गई, हजारों-लाखों लोग अमरनाथ यात्रा में रिकार्ड भीड़ जाने वाली थी उसमें भी कमी आई, उससे किसको नुकसान होगा? उससे कश्मीरी लोगों को नुकसान होगा। हम सभी का प्रयास रहना चाहिए कि वहां पर शांति बनी रहे, संवाद तभी हो सकता जब वहां शांति होगी।

          मैं आदरणीय मंत्री जी से शांति बहाल करने के लिए पूछना चाहता हूं,, मेरा मीडिया के मित्रों से भी सवाल है, आखिर इस अनरेस्ट के पीछे कौन है? क्या हुर्रियत है या पाकिस्तान है, हम संवादा किसके साथ करेंगे? Who is leading this agitation? Is it Hurriyat? Is it Pakistan? आपका डॉयलाग किसके साथ होने वाला है? आप किसके साथ बातचीत करने वाले हैं? अगर यह हुर्रियत के हाथ में है तो उनसे बोलिए कि इसे रोकिए, यदि यह पाकिस्तान के हाथ में है तो उसे हमें किस तरह से जवाब देना है इस बारे में सोचिए।

               उपाध्यक्ष जी, आज दुनिया भर में सुरक्षा एक बहुत बड़ा विषय बनता चला जा रहा है। देश की एकता पर नया प्रहार हुआ है, यह केवल भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी की लड़ाई नहीं है, यह हर भारतीय की, हर सांसद की लड़ाई है। हर राजनीतिक दल को एकजुट होकर देशविरोधी ताकतों को कड़ा संदेश देना चाहिए। प्रधानमंत्री जी और सरकार ने कश्मीर के लोगों तक पहुंचने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री जी दीवाली के दिन भी कश्मीर के भाई-बहनों के बीच रहे हों, जो फ्लड के समय भी उनके बीच में रहे हों, जो दिन-रात उनकी चिंता करता हो। हमारे गृह मंत्री जी दिन में तीन बार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री से बातचीत करके हर कश्मीरी भाई-बहन की सुरक्षा की बात करता हो। मैं ऐसी सरकार को बधाई देना चाहता हूं जो कश्मीर के बारे में इतनी चिंतित है और आगे उसके विकास के लिए बात करेगी।   उपाध्यक्ष महोदय, हम लगातार यह प्रयास भी कर रहे हैं और दुनियाभर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के नेता और देश के लोकप्रिय प्रधान मंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पूरी दुनिया में आतंकवाद के विषय पर भारत की बात रखी है और आज भारत एक नई ताकत के रूप में उभर रहा है। इसलिए देश के अंदर यह जो परिस्थिति पैदा हुई है, इसे कैसे रोका जाए, यह प्रयास किया जा रहा है। मेरे हर कश्मीरी भाई-बहन को किस तरह से सुरक्षित रखा जाए, कैसे हमें पहले बंदूक न चलानी पड़े, कैसे हम पहले लाठी न उठाएं, कैसे हम पथराव को रोक पाएं, कैसे हम दोनों तरफ से रिस्ट्रेन कर पाएं और हमारे किसी भी भाई-बहन को अस्पताल न जाना पड़े और न हमारे किसी सुरक्षाकर्मी को घायल होने की स्थिति में खड़ा होना पड़े, ऐसी हमारी कोशिश है।

          महोदय, हम कैसे अपने कश्मीरी भाई-बहनों को सुरक्षित रख सकते हैं, हम कैसे उनके लिए नया रोजगार उत्पन्न कर सकते हैं, इन सब बातों को हम कर रहे हैं। माननीय प्रधान मंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है कि हम वहां लाखों की संख्या में रोजगार उपलब्ध कराएंगे, लेकिन वातावरण तो पैदा हो, जिससे रोजगार उपलब्ध कराए जा सकें। सरकार काम करने के लिए तैयार है। हजारों करोड़ रुपए के काम वहां हो रहे हैं। वहां के लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही साथ वातावरण बनाना, हर राजनीतिक दल का प्रयास होना चाहिए। इसकी यह कह कर आलोचना न करें कि बीजेपी और पीडीपी की सरकार बनी, तो यह हुआ, नहीं, ऐसा नहीं है। यह सरकार, जम्मू-कश्मीर के लोगों ने बनाई है। यह मत कहिए कि देश में भाजपा की सरकार है, इसलिए ऐसा हो रहा है।

श्री मुलायम सिंह यादव (आज़मगढ़) : उपाध्यक्ष महोदय, इस विषय पर लम्बी-चौड़ी बहस की जरूरत नहीं है। हम लोग, जो देशभर से यहां आए हैं, उन्हें टू दी पाइंट बात करनी पड़ेगी और हम सब को एक होना पड़ेगा। यदि कोई सुझाव देना हो या संक्षेप में कोई बात कहनी हो, तो कही जा सकती है, लेकिन क्या इस मुद्दे पर इस प्रकार से लम्बे-चौड़े भाषण हेंगे। यह इतनी गम्भीर समस्या है और इसके पीछे कौन है, क्या आपको अता-पता है?  यहां लम्बे-चौड़े भाषण हो रहे हैं? यदि कोई राय देनी है, तो दो-चार मिनट में दे दीजिए, लेकिन इतने लम्बे-चौड़े भाषणों की जरूरत नहीं है। इस संबंध में सारा सदन एक है।

श्री अनुराग सिंह ठाकुर: उपाध्यक्ष महोदय, सचाई यह है कि पाकिस्तान के अंदर जो प्रधान मंत्री हैं, उनके देश के अंदर हाल ही में उनकी भूमिका बहुत कम हो गई थी। जब पनामा पेपर्स लीक हुए और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री का नाम उनमें आया, तो पाकिस्तान में एक संकट खड़ा हो गया कि वे पाकिस्तान के प्रधान मंत्री रह पाएंगे या नहीं। वहां पर कश्मीर के मुद्दे को लेकर कई वर्षों से राजनीति हो रही है। यह भी सचाई है कि कश्मीर को लेकर आज तक पाकिस्तान को कुछ नहीं मिला और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री, केवल अपनी कुर्सी बचाने के लिए, इसे एक राजनीतिक रूप दे रहे हैं। वे न पहले कभी सफल हुए और न भविष्य में कभी सफल हो पाएंगे। मैं तो यही कहना चाहता हूं कि इसमें पाकिस्तान की भूमिका है और इसका संदेश हम दुनियाभर में देंगे। हम उन्हें कभी इसमें सफल नहीं होने देंगे। हमारी लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ है, हमारी लड़ाई पाकिस्तान समर्थकों के खिलाफ है, हमारी लड़ाई कश्मीरियों के खिलाफ नहीं है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। मैं माननीय गृह मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि कश्मीर के मेरे हर भाई-बहन की सुरक्षा कैसे हो और वे इस बारे में वे क्या उपाय कर रहे हैं?  

                                                                                               

SHRI A. ANWHAR RAAJHAA (RAMANATHAPURAM): Hon. Deputy Speaker Sir, I wish to express my sincere thanks and gratitude to our beloved leader Puratchi Thalaivi Amma for giving me the opportunity to speak on this very important issue.  I would like to record here the anguish of the former Chief Minister of Jammu and Kashmir Dr. Omar Abdullah about the nature of life in Kashmir: “In Kashmir, everyone has own house and no one sleeps in streets like Delhi or any other city.  There are no poor people in Kashmir; there are no slums in Kashmir.  Everyone has wealth but there is no peace and happiness.  This is because of terrorism and extremism.”  Why do we find such a situation in Kashmir now?  People are not happy.  There is no peace.  Everyday there is clash between the people and the armed forces.   Almost all the people who have died have been killed by our armed forces.         In fact, our Armed Forces are there to save our borders and to attack our enemies but unfortunately our own people are killed. Why is this happening? We must go into the root cause of the problem. We must also observe the pattern of rights agitations in Kashmir.

          Right from Independence, we have noticed that agitations and violence are not there all the time; only when there is distress, trouble starts; only when there is a political mishandling, agitation comes up; and when the ultra nationalists make noises, it echoes in Jammu and Kashmir. During the previous NDA regime, there was peace in Jammu and Kashmir. That was because the then approach was conciliatory. Why we cannot maintain the same approach to maintain peace and harmony is the key question now.

          No doubt our Armed Forces must have special powers but it is also important that the special powers so given are used only sparingly. That must be aimed at troubles fomented by our enemies. It is clear that it should not be used against our own people. The Government must be alert with its intelligence agencies. The Government should not lead itself to the brink of using arms against its own people in which innocent people also die. The Government must be able to differentiate between terrorist attack and street agitation. I am afraid our Armed Forces are trying to attack and treat our citizens also as enemies.

          Even after 70 years of Independence, why do some sections of the society feel insecure?  Why is there a pattern of ebb and flow in agitation that comes and goes in Kashmir? Unless the entire nation comes with an approach based on consensus to deal with the Kashmir issue, there cannot be a lasting solution. Our political approaches have also been of one-upmanship. I am not blaming anyone in particular but still we can read through the lines. Wrong political approaches drive some vexed people to extremism. Terrorism becomes a tool in the hands of extremist forces.

          Ours is a federal body polity. A federal spirit for wider consultation in handling issues is crucial and essential in a border State like Jammu and Kashmir. The Centre must hold dialogue with all stakeholders whether in power or not, whether they are in politics or not. All the people concerned must be taken into confidence. Whether such confidence-building measures have been uniformly taken is another important question.

          I am afraid, there is a ‘blow hot, blow cold’ approach. There is change in approach every now and then. There lies the problem. That is why extremism and terrorism brings up its ugly head every now and then.

          What is happening in Jammu and Kashmir is a matter of grave concern for Indian democracy and sovereignty. For national security, terrorism should be curbed. Kashmir is a part and parcel of our great nation India.  Now, sovereignty of India has been questioned due to certain elements creating law and order problems in the State.   The State has now been plunged into curfew.  It is the primary duty of the State Government to maintain law and order.  Also, the Government at the Centre should come forward and take it as a priority measure to bring out special development packages for such terrorists stricken States, especially Kashmir, and bring out special employment openings for all the young minds. 

First, convince them, give them proper employment and transform their minds so that they become the law abiding citizens.  For that we have to educate them.  Educating the youth and providing them proper employment should be the first priority. 

          There should be a strong bilateral move to discourage Pakistan from interfering in the Kashmir issue.  Just because of militant activities, innocent people are affected.  There have been 47 deaths in the last 12 days.

          Time and again the Central Government talks a lot about the federal structure but the situation is not so healthy.  Many Chief Ministers, including the hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. Puratchi Thalaivi Amma has strongly objected to diluting the federal structure.  They have raised serious concerns especially regarding decentralisation of power. 

In the 11th meeting of the Inter-State Council, the hon. Chief Minister of Tamil Nadu Puratchi Thalaivi Amma has raised serious concerns over the Centre-State relationship.  Although the political, administrative and economic role of the State has grown significantly and the federal policy has become more intense, changes in the Centre-State relationship have clearly not kept pace.  Many efforts of over-centralisation through transfer of subjects from the State List to the Concurrent List, uniform central legislation on subjects in the State List, capture of growing tax base by the Centre, encroaching upon the executive jurisdiction of the States, most notably, in the maintenance of public order have not been reversed.  So, you have lost the confidence of the local people.  You are not able to meet the regional aspirations.

THE MINISTER OF STATE OF THE MINISTRY OF PLANNING,  MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF URBAN DEVELOPMENT AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HOUSING AND URBAN POVERTY ALLEVIATION (RAO INDERJIT SINGH): Sir, he can lay his speech on the Table of the House.

HON. DEPUTY SPEAKER: Without the permission of the Chair nobody can lay the speech.  You cannot dictate from there.  Please do not do it.

… (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: Please take your seat.

RAO INDERJIT SINGH: I am not dictating, Sir.… (Interruptions)   I have a point of order.

HON. DEPUTY SPEAKER: There is no point of order.

RAO INDERJIT SINGH: I want your ruling.

HON. DEPUTY SPEAKER: I have already given the ruling.  Please take your seat.

RAO INDERJIT SINGH: I have not yet raised my point of order. I am on a point of order, Sir.… (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: You may quote the rule and then speak.

RAO INDERJIT SINGH: I would like to know whether it is allowed to read out a speech in this Parliament.

HON. DEPUTY SPEAKER: There is no point of order.

… (Interruptions)

RAO INDERJIT SINGH: Is it allowed?… (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: It is left to the Chair.  It is not with you.

… (Interruptions)

RAO INDERJIT SINGH: I am not casting aspersions on the Chair.… (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: Please do not waste the time of the House.  Please take your seat.

SHRI A. ANWHAR RAAJHAA: Though it is not directly related to Kashmir issue, I would like to bring in here the problems faced by our fishermen in Tamil Nadu.  Wrong-handling of external affairs policy is the main reason for the suffering of our Tamil fishermen.  Hundreds of them have lost their lives and livelihood.  Unfortunately that issue is being ignored both by the Union Government and this Parliament in which the ruling Party has the majority. The State Governments at the border like Tamil Nadu must have been involved in the formulation of external affairs policy with regard to neighbouring country, Sri Lanka.  Katchatheevu is one such example.  I am not going into it now.  There is a discontent among the fishermen of Rameswaram who are the worst hit at the hands of Sri Lankan Navy.  The fishermen of Rameswaram announced an indefinite strike from 22nd of this month.  This must be viewed as a national problem.  But the centre does not think so.  It is unfortunate.  I urge upon the Union Government  to find immediately a last solution for this problem which is being faced by our fishermen in Tamil Nadu.

          There are also occasions wherein the State Governments are rendered helpless.  There should not be any encroachment into States’ domain.  The State Governments should not be prevented from enforcing the law and order, especially for maintenance of public order. 

          I express solidarity with the State of Kashmir, especially innocent people of Kashmir who are affected by the recent terrorist attacks.  I express my concern over Kashmir issue.  In future, there should be great unanimity in curbing terrorism and in bringing youth into the mainstream by giving them proper education and employment.  They should also be provided with the best development infrastructure as a special package for Kashmir to restore peace.

                                                                                     

SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Sir, today we are discussing the situation arising out of recent violence in Kashmir valley resulting in threat to peace and security of the people of the State.

          Kashmir is the integral part of our country and everyone of our country is concerned about Kashmir.  Everyone of our country loves Kashmir.  They have all sympathies for the civil citizens of the Kashmir itself.  In an unequivocal terms, everyone of this  country criticizes  protests whenever there is any attack on Kashmir by the other country or the terrorists. 

          Kashmir has witnessed a large number of terrorist activities for decades together.  It is the failure on the part of the successive Governments including the present one to prevent such terrorist activities.  The present NDA Government led by Modiji will blame UPA Government or the Congress Government or the earlier UPA Government which is now in opposition will blame the present Government but not a single Government has taken effective steps to prevent terrorism in the Kashmir itself. 

          Recent incidents which have occurred in Kashmir are due to sheer mishandling of the situation by the Central Government.  We all the time appreciate whenever the Central Government through their Armed Forces take steps against any terrorist activities either in Kashmir or in any other State.  But we do not appreciate when such Armed Forces of the Central Government take away the life of the genuine peaceful citizens of Kashmir who have no connection with terrorist activities.

We have full sympathy for those who have been killed or injured in firing by Security Forces, including those who have lost their sight due to pellet injuries. By reason of the overt action of the Armed Forces deployed by the Central Government recently, a large number of ordinary citizens of Kashmir, more than, 40 have lost their lives. The Central Government must extend help to all these affected families who are ordinary citizens of Kashmir. We would like to hear today from the hon. Home Minister about what help the Central Government is going to extend to these affected families. It should not be a debate for the sake of a debate. We are having a great respect for the hon. Home Minister. Members from our Party also have great respect for him. We want to hear from him as to what effective steps should be taken. We do not want to hear his speech.

          Sir, it is a great failure on the part of the Central Government to keep intelligence information which resulted in the spurt of recent terrorist activities in Kashmir, including the fallout of death in an encounter of the Hizbul leader Burhan Wani. By making any high sounding speech by any of the hon. Ministers of the present Central Government will not solve the problem of Kashmir, but steps should be taken to prevent all terrorist activities in Kashmir in a more intelligent way, at the same time it has to be ensured that not a single life of ordinary citizen of Kashmir is lost by any action of the Armed Forces deployed by the Central Government. We want this assurance from the hon. Home Minister in the House.

          Sir, since I have got this chance to speak on the debate and I had already spoken to the hon. Minister of State for Parliamentary Affairs yesterday and today, I would like to extend the scope of the debate and express our views in connection with this issue. State of West Bengal has an international border with three countries. Recent incidents in Dhaka where 20 people were killed in terrorist activities have created an alarming situation in the international border areas of West Bengal, Assam and Meghalaya. Strategically, Bangladesh is being made as a terrorist hub that not only aids Jihad but also serve as a safe haven for Afghanistani and Pakistani terrorists because of the geographical location of Bangladesh. A large of number of infiltrators are entering India through the border areas of West Bengal, Assam and Meghalaya. The Border Security Forces have become the champion showing their inefficiency to prevent such infiltrators from entering our country.

THE MINISTER OF CHEMICALS AND FERTILIZERS    AND MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI ANANTHKUMAR): Sir, I would like to request the hon. Member to yield for a while. He is a dear friend of mine. I would like to remind him that if he looks at the notice of the Motion then it is clearly mentioned that the discussion is related to Jammu and Kashmir.

SHRI KALYAN BANERJEE: I know the scope of the debate. You can please ask the hon. Minister of State for Parliamentary Affairs about this. I rang him up yesterday.

          Mr. Deputy-Speaker, Sir, in your presence it was decided that the language would be framed in such a way so that we also have an opportunity to express our views in respect of the Bangladesh border issue. It was assured to us that this issue can be raised. You were also present there but incidentally the Motion has been framed in such a way that we cannot raise our problems here. Since I have got the chance I am raising this issue. I have taken the permission of the hon. Minister of Parliamentary Affairs yesterday night itself. I rang him up at 11 P.M. and I told him and he agreed.  Sir, they are Ministers; I have to give respect to them.

SHRI MALLIKARJUN KHARGE (GULBARGA):  Do not make friendship with them.  They will ditch you like this.

SHRI KALYAN BANERJEE :   I am not saying that they are ditching me now at this stage. I am not suggesting it at all. I am saying that I am taking advantage of the presence of the hon.  Home Minister and the debate itself.

          Border Security Force has become a champion showing their inefficiency to prevent such infiltrators to enter into our country.  One of the important reasons behind is that a large number of areas of the North-Eastern Region including West Bengal are fenceless despite assurances given by the successive Central Governments including the present one.  To complete the fencing process of the Indo-Bangladesh border area, effective steps have not yet been taken as a result of which thousands and thousands of infiltrators and also terrorists are entering into our country through this border area.  When it was the main responsibility of the Central Government to stop such infiltration and when indeed there is a great failure to stop such infiltration by the Central Government, a few dignitaries of the Central Government are blaming the States for not preventing such infiltration.

          West Bengal shares 2216.7 kilometres of border with Bangladesh.  Of this, 915 kilometers are in South Bengal spanning an area from Sunderbans to Malda.  Nearly 317 kilometers of these 915 kilometres are unfenced.  I am talking about only the land area and not the water area. The vast stretches of Sundarbans remained unguarded as thrust has been given only on the densely populated areas of North 24 Parganas, Nadia and Murshidabad.  Despite the presence of the Border Security Force in the fencing areas of North 24 Parganas, Nadia and Murshidabad, everyday, a large number of infiltrators are entering into India and cattle from India are being smuggled to Bangladesh through racket.  And BSF is failing to stop such cattle smuggling from India to Bangladesh. 

          Our hon. Chief Minister, Kumari Mamata Banerjee repeatedly reminded the Central Government to prevent such cattle smuggling form India to Bangladesh and entering of infiltrators from Bangladesh to India.  But, unfortunately, not a single hon. Minister of the Central Government paid any heed to such requests.  Our Chief Minister, Mamata Banerjee said that the terror struck in the neighbouring country was a matter of concern and the Government has to intensify vigil in the border districts. 

          Cattle smuggling in the border is rampant.  It is the responsibility of the Central Government to prevent or prohibit such infiltration and cattle smuggling.  Our State is ready to render all assistance to the Central Government for such purposes. 

After the blast in Burdwan’s Khagragarh in 2014,  the West Bengal Police arrested the offenders.  It had emerged that Bangladeshi militants were sneaking into Bengal for such blasting.

          Recently, the hon. Prime Minister constituted a Committee of seven States for making an in-depth study in connection with the Border States problem. But, unfortunately, West Bengal, which is having a large number of international border problems and terrorists are entering through Indo-Bangladesh border, has not been included in the Committee itself           Cooperative federalism, which my friend was mentioning just now, demands extensive interaction between the Centre and the States so that all issues are sorted out in the best interest of the country including the States.

          In view of the recent incidents in Bangladesh, the hon. Chief Minister of West Bengal held a very high level review meeting with senior officials and given directions for enhanced intelligence coverage and prompt action wherever necessary.

The point is, the States are working efficiently but pride is taken only by the Central Government.        The hon. Prime Minister is taking the credit. The work is being done by the State Governments. Chief Ministers are all working.  Everyone is working. But credit is being demanded only  by  the hon. Prime Minister by way of advertisement. Sometimes I feel whether they are running the Government or some advertisement agency. Sometimes I really feel it as to what is being done.

          The State of West Bengal welcomes coordination with neighbouring States of Bihar, Odisha, and Jharkhand for combating left wing extremism. Joint meetings have already been held with the officials of the neighbouring States with the officials of West Bengal. All the State Governments are doing work.  We all are working.

          I am taking advantage of the presence of the hon. Home Minister here in the House where we are expressing our views. We are really concerned about the problems in the Indo-Bangladesh border. Kindly take steps in respect of the issues that I have mentioned like non-fencing and smuggling.

         

          Let me end by saying that we heartily want – I think everyone who is present here in the Parliament and also those who are outside of it – want that peace should be restored in Kashmir and the civil citizens of Kashmir should be able to live like any other citizen of this country.

          Thank you.

 

SHRI TATHAGATA SATPATHY (DHENKANAL): Sir Namaskar. Most humbly I would like to start by saying, when I went out to the Central Hall somebody smiled and said, ‘Have you been listening to the wail of the willows?” I was stuck for a second. I said, ‘Sorry, I could not understand what you are saying’.  He said there were two people and both involved in the business of cricket – please underline the word ‘business’ – and both gave long speeches in this House, completely hollow and giving no message to the country or to the youth. So, I said, ‘what are willows?’ Willows, it seems, are the huge trees, which grow exclusively in Kashmir, from which you make cricket bats. It then slowly, as I am from a backward district and an uneducated person, dawned on me that it was a pun on two of our shining bright stars on both sides of the spectrum. 

          The international terror scene is getting more and more grim. We cannot talk about India, Kashmir or Bangladesh border with Bengal or any such fragmented area of the globe any more. At a certain time we thought Ayatollah Khomeini in Iran who brought about a revolution. Then it spread. Then the Americans created as much confusion as they could in the world because of their greed for oil or whatever. Then, international politics got murkier and murkier. Then nations like Iraq, Saudi Arabia, etc. got pulled in. Today, every country across the globe has become a victim of terror. The politics of terror is a very rich politics. It involves millions and billions of dollars. It is all a business and it is nothing but that. Just like Maoists poach animals, cut trees and sell timber, this is on a larger scale.

          Let me remember my humble base and remember that we are here to talk about Kashmir and about India.  When I read the newspapers I wonder that when a young Kashmiri girl or boy wakes up in the morning, opens the door or window and looks out, what does she or he see? What is the permanent fixture? One ex-Chief Minister said that there are no slums, there is no poverty, etc.     16.00 hours           There is no poverty. This is like Gujarat model or something like that. Giving a kind of false image is very easy but everybody knows – whether it is Tamil Nadu or Odisha or West Bengal or Gujarat or Kashmir or anywhere – poverty is intense in this country. Let us not close our eyes to that. So, what does this young Kashmiri see when he opens the door? He sees damaged roads that have not been repaired for years; there are not even motorcycle-friendly roads because I know people. In Jagannathpuri, there are a few Kashmiri young boys who have shops there. I talk to them. They tell me about Kashmir.

There is a boy called Farhan who say that there are no roads, Sir. I say to them that you do not have a major problem; you have drinking water. They said, that is completely wrong information. We do not have clean drinking water in our villages. We do not have roads; our kids have not seen electricity for decades. Who is blaming whom? What were they doing? What are you doing? Blame game is easy. But reality is completely different from your politics. What does the youth see outside? They see armed to the teeth Indian CRPF or BSF or Army jawans. That is all. That is India; and that is the beginning of the day for that youth. So, imagine like we normally get text messages – good morning, good afternoon, good evening – they get text messages saying, I have five soldiers in front of my house today; I have this man with different weapons that I cannot recognise. The other guy says, take a picture immediately. This is the situation in Kashmir.        

          There is an old English adage – everyone loves trouble. Have we been – barring none – relishing the trouble in Kashmir? Is not war a great fun thing for all those who are involved in a war to make money out of it by selling arms? Arms dealers in Delhi; all the arms dealers across the country and the world; they love such situations. Unfortunately in India, everyone who is a tax payer is the one who suffers because all of it gets spent in Kashmir or North East for the Armed Forces. I suffer daily because the money I pay as tax to the Government, and I am not saying it is the Government of the ADMK, or BJD or Congress or BJP; I am talking about the Government of India – GOI. No matter which political party is there; we are aware of that. They are temporary; these people are temporary; they have gone; how long will we continue this? When can we cut the umbilical cord and say that listen, we have done enough? Now, let us mend the country.   

          They talk of azadi. Azadi from what? Have we ever tried to find out? It is not azadi from the Union of India, maybe – `maybe’ I am adding. Maybe it is azadi from poverty; maybe it is azadi from the threat to the very existence of my mother, of my sister, of my child; maybe it is azadi from this horrible police State that all of us, whether it is Congress or whether it is BJP, all of us have been subjecting them to.

 Let us not underestimate the Kashmiri youths. They are not idiots; they are smart young boys and girls. They know very well, Sir, that if India withdraws, and they have to join perforce with Pakistan, they will have a miserable existence. They do not wish to leave India. They all want to be with India. It is only these misguided few youngsters whom you have been incapable of over decades to handle, to educate; they are making the trouble because they don’t see any future. This crisis in Kashmir is not a 10 day, 12 day problem. It did  not happen with the death of one individual who was popular on the social media.

It has been brewing there for a very long time. In the last two-three days, I was reading The Indian Express. It says in bold letters, Government says, ‘we will talk to the Kashmiris.’ Whom will you talk to in Kashmir? Who are those Kashmiris? Can you draw the 18-20 year old stone-pelter to a table? Can you make him sit and discuss with you? Are you even capable of it? Do you have the means to approach him? You do not. What do you do instead? You create a leader, like some leader of the past created a leader amongst the Sikhs who holed up in the Golden Temple and then we had to fight a war in Punjab.

Similarly, all the successive Governments have been creating leaders in Kashmir. Today you become the leader, I want to talk to you; tomorrow you become the leader, I want to talk to you. So, they are not leaders and they have no people behind them. It is because you are helpless, you do not find anybody to discuss with, you are creating leaders. They are not leaders of the people. The leader of the people is that 18-20 year old youth on the street with a stone in his hand. Have you ever tried like these North Indian people talk? The Hindi speaking people say ‘Beta, idhar aao’. Have you tried to give him solace, take the stone out of his hand, give him a screw driver, give him a wrench, give him a stethoscope?

We are talking about a 16-year old boy who died who had dream of becoming doctor? Where would he go to get educated? How many education loans have you given in Kashmir in these two years? Can you give us figures of that? Forget the evil past, forget the dark past, the people of India have forgotten them, the Congress, and are still trying to forget them. You do not have to make this country mukht of anybody. In a democracy, a country cannot be mukht of anybody. Look after your own interest, look after the interest of the country. In these two years, how many education loans have you given in Kashmir? How many micro, small and medium industries have you funded in Kashmir? How many have you set up there? How many youths have you approached by saying that we will not fire at you? Instead, what do you deal with them? You deal with them with the power of the Armed Forces (Special Powers) Act which is draconian and one sided. I am an Indian. I love my country. I am not speaking against my Armed Forces. But I also wish to state that just like in the Northeast, similarly in Kashmir, the outrage that has been created by the Indian Armed Forces cannot be ignored.

HON. DEPUTY SPEAKER: Please conclude. There are many other Members who want to speak.

SHRI TATHAGATA SATPATHY: Sir, I am also reading. Somebody objected to Members reading. Where is the law that one cannot read? Where is it written? Who are these people to challenge? This attitude must be curbed. Sir, you have to curb it.

          Sir, Burhan Wani is a terrorist in our eyes. I agree. He was somebody who was against the State of India, the very existence of India. But did he know what India was? He became an icon of the youth. Why? It is because he did not know this country. You have been in the Government for the past two years. Could you not get 5,000 youth trained in ITIs across the country and employed across the country. As Central Government, with the help of your own party in power in the State Government, you could not give employment to mere 5,000 youth. I have a newspaper in Odisha. I am willing to take five youths from Kashmir. This is a commitment I am making at a personal level. Can we not do that much? Instead what do we do? We stop their newspapers, we stop their media and we ban everything. There are Ministers who call the media bad names like presstitutes. I am ashamed to be in a democracy, in a country like India where Ministers of dignity call the media such words.

          So, when Burhan Wani was buried, I was not surprised to hear that he had more than two lakh people.  Nobody had organised it.  It was not a political rally. At some 30 to 40 other places simultaneously, there were prayers being held for him.  So, we have to understand the depth he could go to because he had become an icon.

Have you tried to create an icon in Kashmir?  Have you or have these people the courage to put your hand on your heart and say: “In the last 10 years, we have given so many people from Kashmir, the Padma Awards?”  Is not there a single man in Kashmir, not a single artist, not a single singer, not a single dancer in Kashmir, who can get the Padma Award?  Have you tried to bring them into the mainstream of this country?… (Interruptions)  You have kept them away. You have shown hatred.  Only speaking here: “Mere Kashmiri bhaiyos and behnos” is  not enough. ‘I have to put it into action’.  Have we done it in action?  Prove it… (Interruptions)

          They have no other icon but a person like Wani.  You cannot blame the youth for that, Sir.  If you do not give them an alternative, a positive view to life… (Interruptions)

HON. DEPUTY-SPEAKER:  Please conclude, now.

SHRI TATHAGATA SATPATHY: I am not supporting it.  I am saying, as a Government   when we fail to create an icon, which will be positive in their mindset; when their mind sees a positive icon, they will follow that icon.  If that icon can be an Indian, can be a Kashmiri, they will follow that.  Kashmir is such a rich State with culture, music, everything. Can we not make small industries there?  Can these youths not be employed?

          Sir, you would have seen as a politician, who comes through. What happens with employment?  In one village, if one boy is given employment, there is social pressure. Even those who oppose us politically, they tell their children: “Aray go, talk to the MP, be friendly, you may get an employment.”  So, you have to create social pressure in Kashmir that one youth getting a job, will create a social pressure amongst other youths… (Interruptions)

HON. DEPUTY-SPEAKER: Now, please conclude.

… (Interruptions)

SHRI KIREN RIJIJU: Thatagataji, one minute… (Interruptions)

SHRI TATHAGATA SATPATHY: Sir, everybody has been talking negative.    I demand time.  The Government has come up with a plethora of schemes… (Interruptions)

SHRI KIREN RIJIJU: Thatagataji…  SHRI TATHAGATA SATPATHY: Your Jan Dhan Yojana, your Sit India, Crawl India, Walk India, Standup India, so many Indias… (Interruptions)

SHRI KIREN RIJIJU: Thatagataji, just a minute… SHRI TATHAGATA SATPATHY : How many schemes have you implemented in Kashmir?… (Interruptions)

          I am not yielding.  When the Chair says, I will sit down… (Interruptions)

HON. DEPUTY-SPEAKER: You please conclude, now.

… (Interruptions)

SHRI TATHAGATA SATPATHY: Sir, from the Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana to Skill India, to all these schemes, can we make a concerted effort to ensure that these schemes are properly, duly implemented in Kashmir?  If yes, tell us the outcome because you are in power there.  The Manmohan Singh Government, for 10 years, was a weak-kneed, powerless Government. But they had thought of a plan, of a policy.  He had four schemes, e.g.,  how to demilitarise  the populated areas, how to allow people to cross over the LoC without hindrance.  He had come up with a policy. Good or bad, is for history to decide.  I am not praising Manmohan Singh.  But their Government   had come up with a policy. Today that policy is not there.  What is your policy? 

          Sir, I will wind up with only one last paragraph. Let us not treat every Kashmiri as a separatist/terrorist.  The mindset that creates a feeling of separatism, which in turn, creates militancy, stems from deep-rooted frustration with a non-responsive system. The Central Government’s agenda should be to create jobs, to create industries, to create more opportunities and to find a way to bring true democracy and long lasting peace to the State of Jammu and Kashmir.

          I would urge the Government to give priority to economic empowerment and not military entrenchment.

          Thank you. Jai Hind.

                                                                                               

16.15 hours                       (Shri K.H. Muniyappa in the Chair)   SHRI KIREN RIJIJU: Sir, I had requested for one clarification. I am not contradicting the points made by Tathagata Satpathy ji. He was a little uncourteous of not yielding.  I just wanted to inform something because hon. Home Minister will reply in detail. … (Interruptions) I wanted to make the record straight because the discussion is based on an issue which is very very serious, emotional and contentious.  It is in the interest of the nation that nobody misleads the nation. … (Interruptions)

SHRI MOHAMMAD SALIM (RAIGANJ): Chairman, Sir, it is a wrong precedent.… (Interruptions)

SHRI KIREN RIJIJU: You have no right to object.  Chair has to decide it. … (Interruptions)  You have no right to make a comment here.  It is the Chair, who has to decide it. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: Hon. Member, let him clarify.

… (Interruptions)

SHRI KIREN RIJIJU: One important point Tathagata Satpathy ji made was that the Government of India has not taken any step to employ the youths of Kashmir.… (Interruptions)  You quoted 5,000.  You said: “Why should the Government of India employ only 5,000 youths?”  Actually, the Scheme that we have launched is for 5,000 youths and out of that 5,000, over the years, all the Kashmiri youths will be under a special scholarship programme. … (Interruptions) They are going to be admitted in all institutes of the country. … (Interruptions) Sir, here I want to make it clear that there is a provision and convention in the House that a Minister can make a corrective statement when there is some mention about the Government which is factually not correct. … (Interruptions)

श्री मुलायम सिंह यादव (आज़मगढ़) :सभापति महोदय, मैं सदन में एक बात जरूर कहना चाहता हूं कि मैं पहली बार संक्षेप में लिखित भाषण दे रहा हूं। मैंने लिखित भाषण कभी नहीं दिया। यह मैं इसलिए दे रहा हूं कि कोई इस कश्मीर के मामले को गम्भीर समझे या न समझे, लेकिन हम इसे गम्भीर समझते हैं और हमारी गम्भीरता आपको इस तीन-चार मिनट के लिखित भाषण में पता चल जायेगी।

          कश्मीर का मामला बेहद गम्भीर होता जा रहा है। आज 12वां दिन है और 12 दिन बाद भी वहां सब कुछ ठप है। पाकिस्तान के विरोध के पीछे चीन का हाथ है, यह कोई नहीं बोलेगा। यह बात साफ हो गई है और पूरी दुनिया को यह पता चल गया है कि कश्मीर में आतंकवादी कहां से भेजे जाते हैं और अलगाववादियों को पैसा और हथियार देने का काम पाकिस्तानी एजेन्सी आई.एस.आई. ही कर रही है, लेकिन उसे फंडिंग कौन करता है। घाटी की हालत बिगाड़ने में शामिल हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकी बुरहान वानी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया है। लेकिन क्या कारण है कि हम इस बात को कश्मीर घाटी के नौजवानों को बताने में विफल हो गए हैं कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी की मिली-जुली सरकार है। महबूबा मुफ्ती इसकी मुख्य मंत्री हैं, लेकिन उनकी ओर से कोई ठोस पहल बातचीत की नहीं की जा रही है। कश्मीर घाटी में विपक्ष को भी विश्वास में ले कर बातचीत नहीं हुई है। सरकार क्यों चुप है? पाकिस्तान के आतंकवादी और अलगाववादी सुरक्षाबलों को निशाना बना रहे हैं। सरकार को कश्मीर के नौजवानों से बातचीत करने की पहल करनी चाहिए।

          कश्मीर घाटी में पाकिस्तान समर्थक तत्वों और अलगाववादियों की सांठ-गांठ पुरानी है। इस बार हमने राजनीतिक स्तर पर पहल न कर के सब कुछ सुरक्षाबलों पर छोड़ दिया है, जिसका नतीजा पूरे प्रदेश को भुगतना पड़ रहा है। 41 से ज्यादा जानें चली गई हैं। कई सौ सुरक्षाकर्मी घायल हो कर अस्पतालों में भर्ती हैं। स्कूल कॉलेज बंद हैं। जब तक आतंकवादियों और अलगाववादियों को किनारे नहीं लगाया जाता, उनकी आधार भूमि खत्म नहीं होती, तब तक शांति नहीं हो सकती है। इस काम में पूरा देश एक है। केवल सुरक्षाबलों के प्रयोग से शांति नहीं हो सकती है। जब तक राजनीतिक हल नहीं निकाला जाता है, तब तक स्थायी शांति नहीं हो सकती है। इसके लिए नई पहल की जरूरत है। इस पहल का काम केंद्र सरकार के साथ जम्मू-कश्मीर सरकार को आगे बढ़ कर करना होगा।

          मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि मेरा अनुभव है। हमारे समय में सारे कश्मीर के ब्राह्मणों को हमने नोएडा में बसाया। कश्मीर के लोगों ने ब्राह्मणों के घरों पर कब्ज़ा नहीं किया, उनके मकान, ज्यों के त्यों हैं। बाद में चल कर हमने बातचीत की। हम कश्मीर में छह दिन रहे। जितने ग्रुप थे, उनसे मैंने बातचीत की है। उनकी सही बातें थीं कि न नौकरी थी और न सड़क थी, न रेल थी, न आने-जाने का कोई साधन था। कश्मीर को कोई सुविधा नहीं थी तो मजबूर हो कर नौजवानों ने यह आंदोलन किया था। उनसे मैंने बात की और पता लगाइए कि हमने वहां क्या-क्या सुविधा दी है। उनकी कम से कम दो तिहाई सुविधाएं मान लीं। उसमें विशेष योगदान श्री फ़ारूख अब्दुल्ला का था, जिन्होंने मेरा सहयोग किया और आज भी हम कह रहे हैं कि फ़ारूख अब्दुल्ला ही असली राय आपको देंगे। आप फ़ारूख अब्दुल्ला को विश्वास में लीजिए। कुछ और भी लोग हैं, वह तो मुफ़्ती साहब सही थे, मैंने मुफ़्ती साहब का सहयोग लिया और फ़ारूख अब्दुल्ला का सहयोग लिया। अलग-अलग सहयोग ले कर मैंने समस्या छह दिन के अंदर खत्म कर दी। हम वहां पर छह दिन एक झोंपड़ी में ठहरे थे और झोपड़ी में ठहर कर सारे लोगों से मैंने मुलाकात की, चाहे नौजवान हो, चाहे महिलाएं हों, चाहे कोई भी हो, उनकी बात सुन कर वहीं राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर दी। फिर छह-सात दिन रहे और समस्या का हल हो गया और कुछ भी नहीं हुआ। लेकिन गृह मंत्री जी मुझे खुशी है कि आपने मुझे पूछा तो सही कि कैसे समस्या का समाधान होगा। इस समस्या का समाधान हो सकता है, अगर वह चीन के हाथ में चला गया तो आपके सामने गंभीर संकट होगा। मैं यहां सबके सामने कहना चाहता हूँ कि चीन पूरी तरह से कश्मीर को अपने हाथ में लेना चाहता है, इससे सावधान रहिए। पूरा सदन एक है। इस मामले में सदन में कोई किसी तरह का भेदभाव नहीं है। हम सब लोग देश के साथ हैं। आप इस पर पहल कीजिए और जरूरत पड़े तो हम नेताओं को बुला लीजिए।

श्री अरविंद सावंत (मुम्बई दक्षिण) : महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

          कश्मीर के विषय पर इस सदन में बहुत गम्भीर चर्चा शुरू है। मैं इसे कश्मीर का विषय नहीं समझता, मैं इसे देश का विषय समझता हूँ। भारत की आजादी के बाद थोड़ी राजनीतिक बातें होती रहीं, लेकिन दुर्भाग्यवश जिस तरह से कश्मीर का पुनरोत्थापन किया गया, उसकी वजह से एक दीवार खड़ी रही है। उस दीवार का ढ़ाँचा और मजबूत होता गया और जब हम देखते हैं, आज 12 दिन हो गए हैं, वहाँ कर्फ्यू लगा हुआ है। कौन बुरहान वानी, एक पोस्टर बॉय, लेकिन उसकी पॉपुलेरिटी इतनी कैसे बढ़ी, क्या राज्य की सरकार का उसके ऊपर ध्यान नहीं था? जब यह पता था कि वह हिजबुल के लोगों के साथ में जुड़ा हुआ है और जुड़ने के बाद भी लोगों के दिलों में बसा जा रहा है, वहाँ भी जुड़ा हुआ है और यहाँ भी लोगों के दिल में बसा हुआ है और उसकी पॉपुलेरिटी बढ़ती गई। हम जब इसकी तरफ देखते हैं तो बहुत दर्द होता है। आज बहुत सारी चर्चा हुई, लेकिन उसकी नींव पर कोई नहीं जा रहा है। हम ऊपरी-ऊपरी बातें कर रहे हैं।

          तथागत सत्पथी जी ने कुछ अच्छे सुझाव दिए, लेकिन पहले बीमारी के बारे में तो सोचो कि बीमारी क्या है। हाल ही में हमारे मुम्बई से दो महीने के लिए एक लड़का वहाँ कुछ ट्रेनिंग के लिए, क्लाइम्बिंग आदि के लिए गया था। वह किसी होटल में रूका था। जब वह टीवी देखता था तो सारे इश्तेहार लाहौर की दुकानों के आते थे कि कहाँ क्या मिल रहा है, कहाँ क्या मिल रहा है। खासकर के दो जिले अनंतनाग और बारामुला का नाम तो हम बीस-पच्चीस साल से सुन रहे हैं, अब तो पूरी घाटी, अनंतनाग के लिए हमने सुना कि वे आपस में उसे इस्लामाबाद कहते हैं। अब यह सच है या नहीं आप यह बताइए, मैं माननीय गृह मंत्री जी से इसकी अपेक्षा करता हूँ। जो लोग ये सारे सुझाव दे रहे हैं, यह जहर कौन फैला रहा है, क्या सरकार फैला रही है? इल्जाम लगाना आसान है, हम भी लगा सकते हैं, कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन उसका सुझाव क्या है? पहले बीमारी को जान लीजिए, इतनी गहरी चीज उनके दिल में गई हुई है कि वहाँ का अनंतनाग नाम उन्हें हिन्दुस्तानी नाम लगता है। उसका नाम बदलने की कोशिश हो रही है। वह लड़का डर गया, वह बोलता है कि मैं जाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मैंने छोड़ दिया और मैं होटल से बाहर नहीं निकला। वहाँ के लोग कौन सा चैनल देखते हैं। अभी तो 12 दिन के कर्फ्यू में सब बन्द हुआ होगा। जब हम छोटी-छोटी सोशल मीडिया पर क्लिपिंग देखते हैं तो बहुत दर्द होता है, जवान भाग रहे हैं, छोटे-छोटे बच्चे पत्थर मार रहे हैं। एक तरफ यह बात करते हो तो दूसरी तरफ इस पर भी ध्यान देना है। हमारे जवानों पर पत्थर मारेंगे, पिछले हफ्ते ही ब्रिज के ऊपर हमारे जवानों की गाड़ी पर हमला हुआ, पम्पोर में हमला हुआ, वहाँ तो बहुत जवान शहीद हुए। उसके बाद में फिर दोबारा हमला हुआ, तीन-चार जवान तो गायब हैं, वे आज तक मिले या नहीं, इस बारे में पता नहीं है, पुलिस मिली या नहीं, यह पता नहीं है तो क्या चाहते हो, क्या नमस्कार करके बैठें?

           मुझे कभी-कभी मन में आशंका होती है, मैं सोचता रहता हूँ कि आजादी को 60 वर्ष हो चुके हैं, लोग कहते रहते हैं कि चर्चा करो, चर्चा करो और शान्ति बरकरार करो। हाँ, ठीक है भइया, कौन लड़ाई चाहता है, शान्ति बरकरार करो, चर्चा करो, लेकिन 60 वर्ष में समस्या का निराकरण क्यों नहीं हुआ? कोई एक तो आकर खड़ा हो जाए, बुजुर्ग लोग यहाँ पर हैं, वे बताएं कि हमने शान्ति बरकरार कर दी थी। मुलायम सिंह साहब ने कह दिया, मैं उनका बहुत आदर करता हूँ, लेकिन वह शान्ति बनी क्यों नहीं रही, वह बाद में बिगड़ क्यों गई? बनी हुई शान्ति किसने बिगाड़ी, वे लोग कौन हैं, आपने इतना अच्छा प्रयास करके वहाँ शान्ति बरकरार की, उस शान्ति को भंग किसने किया? उसको भी ढूँढ़ना चाहिए। कल 19 तारीख को काला दिन मना रहे हैं, मुझे तो पाकिस्तान का कमाल ही लगता है, उनके प्रधान मंत्री नवाज शरीफ जी आते हैं, वे जाकर स्टेटमेंट देते हैं। वहाँ तो अभी दूसरा माहौल चल रहा है, पाकिस्तान में चुनाव हैं। वहाँ पाकिस्तान में राहील शरीफ नाम से कोई आ रहा है, उससे नवाज़ शरीफ डर रहे हैं कि उससे चुनाव हार जाऊँगा तो अभी हिन्दुस्तान के खिलाफ बातें करनी हैं। वहाँ तो और भी एक चीज है। उनकी मिलिट्री और सरकार में भी कोई अच्छा रिश्ता नहीं है। वे एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं और उसमें इमरान खान तीसरी तरफ देख रहे हैं। वे सारे जुमले वहाँ चल रहे हैं, वहाँ अंतरिम लड़ाई चल रही है, लेकिन मुझे पाकिस्तान से इस सदन के द्वारा पूछना है कि क्या आपको लज्जा नहीं आती? जिस दिन वे मासूम बच्चे मारे गए, यह हिन्दुस्तान था कि इसी सदन में हम रोए थे, हमारी आँखों में आँसू आए थे। हमने नहीं सोचा कि पाकिस्तान के बच्चे मरे। यह हमारी संस्कृति है। आपने बच्चों को मारा। आप काला दिन रखते हैं तो 365 दिन रखो, जितने बच्चे मरे, उतने दिन काला दिन रखो।

महात्मा गांधी जी कहते थे कि खुद को ही शिक्षा देनी है, शासन करना है। कर लो शासन, लेकिन हमारे देश के खिलाफ शासन करने वाले तुम कौन हो? कश्मीर हमारा है, कश्मीर हमारा था और हमारा ही रहेगा। उसमें तुम कुछ नहीं हो, हमारे सामने बोलने वाले। बुरा लगता है कि हमारे ही लोग कुछ कहते हैं। मैं हाथ जोड़कर सबसे प्रार्थना करता हूँ, खासकर विपक्ष को, कि ऐसी चीज़ों पर तो राजनीति न खेलें। भगवान की दया है कि आज हो सकता है कि उसका प्रसारण वहाँ नहीं हुआ होगा।

          मैं गृह मंत्री जी का खास अभिनन्दन करता हूँ। मुझे पहली बार इतना अच्छा लगा कि गृह मंत्री जी ने डटकर कहा कि मैं खड़ा रहूँगा, जब तक मैं तुम्हारी समस्या की बात नहीं करता, मैं बैठूँगा नहीं। मुझे बहुत अच्छा लगा। हर बात पर जाति-पाति का, धर्म का आधार लेकर लड़ते हैं। आज सुबह आपने जो समस्या उठाई, मैं थोड़ा सा बाजू हटकर बोलता हूँ। महाराष्ट्र में भी एक लड़की पर अत्याचार हुआ है। आपको नहीं पता चला कि इसको करने वाले कौन थे? वहाँ भी इस विषय में मन में जाति आई। इस विषय को छोड़ दें, मुझे नहीं जाना है, इस राजनीति में। मैं कश्मीर के विषय पर बोलना चाहता हूँ। कौन हाफिज़ सईद, कौन अफ़ज़ल? मुझे तो कभी-कभी लगता है कि गृह मंत्री जी आप यह काम करें, जैसे इज़राइल वाला मोसाद करता है, कि घुसकर मारो, इस हाफिज़ सईद को। हाफिज़ को घुसकर मारना चाहिए। अमेरिका की सरकार ने क्या पूछा था लादेन के लिए? क्या यू.एन. में गई, नहीं गई, चिन्ता नहीं की। उसने कहा कि हमारे देश पर हमला करते हो तो हम घुसकर तुम्हें मारेंगे। हाफिज सईद को बोलो कि हमारे देश की तरफ अगर बुरी तरह से देखोगे तो हम तुम्हें अंदर घुसकर मारेंगे। आपने अभी मिलिट्री को इजाज़त दी है कि थोड़े आदमी बंद कर दो, बोला जाकर आ जाओ। क्या आपको पता है कि समस्या की जड़ कहाँ है? जड़ यहाँ है - दो चीज़ें हैं। एक अंदरूनी मामले हैं। जैसे हमारे मित्र बनर्जी साहब ने कहा कि माओवाद की समस्या है। ...(व्यवधान) मैं दो तीन मिनट में अपनी बात खत्म करूँगा।

          माओवाद की समस्या है, पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद की समस्या है। जम्मू-कश्मीर में सीमा पार का आतंकवाद है और देश के भीतर भी आतंकवाद है। हमारे यहाँ एक ज़ाकिर नाईक है। जो पकड़े गए हैं, वे कहते हैं कि ज़ाकिर नाईक के भाषण की वजह से, उसके मार्गदर्शन पर हम आतंकवादी बने। अरे वाह! हमारे यहाँ के उसके भाषण सुनकर आतंकवादी बनकर हमें ही मारोगे? बच्चे इस युग में जा रहे हैं। केरल से जो 15 गए, उनमें तीन लड़कियाँ हैं। कितनी शर्मनाक बात है, कितनी दर्दनाक बात है, कितनी गंभीर बात है! केरल जो एंड ऑफ द कंट्री है, वहाँ से उधर गए, हमें पता नहीं चल रहा है। कितनी हिम्मत है इनमें! मैं माननीय गृह मंत्री जी से कहूँगा कि इसकी जड़ में एक अंदरूनी मामला है, एक सीमा वाला मामला है। घुसपैठ पहले बंद करो। एक मुद्दा बनर्जी साहब का मुझे अच्छा लगा कि हमारे बार्डर पर फैंसिंग नहीं है। नॉर्थ ईस्ट में भी वही बात है, असम में भी वही बात है, वहाँ भी वही चिन्ता है, यहाँ भी वही है। पहली बात है कि घुसपैठ बंद होनी चाहिए। हमने जो समझौता एक्सप्रैस वाला समझौता किया, उसकी ज़रा वापसी की चिन्ता करो कि क्या समझौता हो रहा है, हमारे यहाँ से कौन लाहौर में जा रहा है, वहाँ से कौन आ रहा है। हमारी दुकान वहाँ जा रही है, वहाँ से माल हमारे पास आ रहा है, ये सब बंद करो। ये ज़हर फैला रहे हैं, हमारे पास आकर और हम उस ज़हर का स्वागत कर रहे हैं कि आ जाओ भैया! कुछ बम लेकर आ जाओ, कुछ तलवारें लेकर आ जाओ। तलवारें तो अभी चलती नहीं हैं, कैनन चलती है। छोटी-छोटी बातों पर दंगा होता है। हम भी जानते हैं कि पहले वार छड़ी से करो, फिर वाटर कैनन, फिर पैलैट और फिर बुलेट।

 

          जो बच्चे रास्ते पर आ रहे हैं, क्या उनके मां-बाप को नहीं लगता कि अपने बच्चे वहां नहीं जाने चाहिए? मैं आपसे विनती करता हूं कि आप आज जो भी भाषण दें, चाहे वे कुछ भी करें, पर कश्मीर के हर घर में वह सुनी जाए। हमारी सरकार की, हमारे देश की, हमारी एकता की गूंज कश्मीर में जाने दें और लोगों को समझने दें कि कश्मीर के साथ पूरा देश खड़ा हुआ है। कृतज्ञता का भाव कश्मीर के लोगों में भी होना चाहिए।

          वहां जब इतनी बड़ी बाढ़ आई तो यही प्रधान मंत्री थे, यही सरकार थी। उन्होंने इतनी मदद की, क्या उसे भूल गए? हमने कोई उपकार नहीं किया, हमने कर्तव्य निभाया है। मैं एक ही बात कह कर अपनी बात खत्म करता हूं।

          महोदय, मुझे बहुत कुछ बोलना था। मुझे बहुत गुस्सा आता है, सच बताता हूं। लेकिन, एक ही बात कहता हूं कि यह जो धारा-370 है, इसे एक बार ज़रा बंद कीजिए। यह अलगाववाद वहां से पैदा होता है। क्या हम अलग हैं?

          सर, कश्मीर में दो झंडे हैं। मुख्य मंत्री की गाड़ी पर दो झंडे होते हैं। उनकी विधान सभा में दो झंडे होते हैं। इस देश का एक ही तिरंगा है। वही कश्मीर में फहराना चाहिए। 14 अगस्त को जब कश्मीर में पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते हैं तो क्या हमें बुरा नहीं लगता? हमारी विपक्ष से मेरी प्रार्थना है कि ज़रा उसके ऊपर भी छक कर बात करें, करारी बात करें, कड़वी बात करें।

          इस देश की एकता के लिए मैं इस सरकार को और खास कर गृह मंत्री जी से प्रार्थना करता हूं कि धारा-370 हटाइए और पाक़िस्तान के इन सारे इरादों के साथ, आप जिस ढंग से जाना चाहते हैं, एकता के साथ उसे करना चाहिए। हमें गुरदासपुर में हुई घटना को भूलना नहीं चाहिए। गर्दनें काटीं, उसे हम नहीं भूलते और कभी भूलेंगे भी नहीं। ऐसे कदम उठाइए, करारे कदम उठाइए, मोसाद जैसे कदम उठाइए कि पाक़िस्तान भी सोचे कि आगे चल कर कश्मीर की तरफ कभी भी नहीं देखेंगे। जय हिन्द।                            

SHRI THOTA NARASIMHAM (KAKINADA): Thank you for giving me this opportunity to participate on the discussion under Rule 193 on the situation arising out of recent violence in Kashmir Valley resulting in threat to peace and security of people of the State.

          Sir, India is a big country in terms of size and scope of security arena with 3.2 million square kilometre of area, 7,500 kilometre of coast line and another 6,000 kilometre of land border. The scale of the internal security challenges is truly massive. It has been throwing challenges to our national integration. This is the time to stand united cutting across party lines.

          Apart from strengthening our internal and external security system, we have to plug in loopholes of our system. I hope and trust that all the parties should come on one stand and support the Centre for the cause of national integration.

          India is trying to emerge as a strong regional power. But we have been facing formidable security challenges which are obstacles in our progress. We waged a restless fight against internal and external terrorism - the transnational and home grown. The recent happenings in Jammu & Kashmir are establishing this fact again and again. We cannot forget Khalistan agitation, Bombay blasts and attack on Indian Parliament.

          India is the country which progresses and practices secularism in its true spirit. In can say it that no country in the world has this type of a secular set up. But, what is happening now in Jammu & Kashmir? Our secular spirit has become an advantage for the so-called terrorist leaders. They have been staying in India, mingling hands with terrorist organisations and throwing threat to the sovereignty of India. We should not allow this to continue.      

          The primary focus of Pakistan-based terrorist organisations like Harkat-ul-Mujahideen and Lashkar-e-Taiba was militant operations in Kashmir Valley. But their goal has now extended to destinations in other parts of India. Al-Qaeda has announced the formation of AQIS –Al Qaeda in the Indian Subcontinent. ISIS is also increasingly interested in India.  The present security situation in Bangladesh has been leading to terrorist operations and insurgency activities in West Bengal and the North-East.

On the other front, Left-wing extremism in the naxalite corridor, extending to five or six States of Jharkhand, Bihar, Odisha, Andhra Pradesh, Telangana and Maharashtra, poses a serious threat. Hon. Prime Minister expressed his concern on this issue in the recently held Inter State Council meeting and urged mutual cooperation between the Centre and the States in this regard.

The internal security of the country cannot be strengthened until we focus on intelligence sharing, ensure greater coordination among agencies and equip our police with modern approach and technology. We need to continuously increase our efficiency and capacity. We must constantly remain alert and updated. Expanding police reforms, plugging manpower shortages, enhancing rapid response capabilities and equipment modernization should be essential facets of our strategy to cope up with these threats. A multi-pronged approach is needed to sustain and accelerate improvements in the security environment.

The public-police ratio in India is 180 police personnel for one lakh public which is substantially lower than the developed countries’ figure of 225. Several security units have their own training centres, some of which are truly best in class. There is a need to further invest in training. Training and skill improvement are beneficial to improve effectiveness and enhance moral and community pride.

Technology is one area where the need for training is imperative. The two new frontiers – cyber and space – have been posing new challenges. There is a need to understand, assimilate, modify and adopt technologies, existing and emerging, to combat the new threats. The recent developments in communication, surveillance, cyber and space technologies have taken far beyond traditional physical security parameters best in class. Training needs to be encouraged and institutionalized.

Information sharing, rapid and frequent communication and collaborative planning assume importance in the present scenario. The challenge lies in operating in a unified coordinated manner. Specifically, the sharing of actionable intelligence in real time would make a quantum difference to even outcomes.

Sir, encouraging the presence of private players, both in India and with foreign partnership, in the high-tech area of Defence research and production is the need of the hour. Though slow, this is an important step in allowing infusion of private innovation, investment and technology for the betterment of the segment.

Sir, I would urge that sitting here in the august House, we should not be flexible on issues which cause a threat to our national integration and sovereignty of our country. I personally feel that this is the time to revisit Article 370. This august House may consider this aspect also.

Sir, I thank you for giving me the opportunity.

                                                                                     

DR. BOORA NARSAIAH GOUD (BHONGIR): Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on this issue. I will try to speak in Hindi. सब लोग थोड़ा सब्र करिए। 

          जो कश्मीर इश्यू है, इसमें तीन चीजें हैं। एक कश्मीर के लोग, दूसरा कश्मीर में रहते हुए जो आतंकवादी आंतकवाद फैला रहे हैं और तीसरा हमारा नेबर, जिसे हम चेंज नहीं कर सकते हैं। मेरी सभी पॉलिटिकल पार्टीज से विनती है, जो भी पॉवर में है, अभी एनडीए है, पहले यूपीए था, बाद में कौन आएगा, पता नहीं। भारत और कश्मीर हमेशा एक ही रहेगा, यह चीज सबको समझ लेनी चाहिए। मेरा सोचना है और मेरी विनती भी है कि इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनना चाहिए।     अगर सब इस बात पर कायम रहें तो कोई भी ताकत कश्मीर को मुद्दा नहीं बना सकती, कश्मीर को भारत से अलग करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। हम देश में ही राजनीतिक तौर पर लड़ते रहेंगे तो दूसरे लोग इसे इश्यू बनाएंगे।

          कश्मीरी भारत के लोग हैं, हिन्दुस्तानी हैं। जैसे तेलुगू कहने से तेलुगू होते हैं, वैसे ही कश्मीर के लोग कश्मीरी होते हैं। उन्हें भी अपने कश्मीरी होने पर गर्व है। यह भी एक इश्यू रहता है। ज्यादातर कश्मीरी शान्तिप्रिय होते हैं। इलैक्शन में जो हुआ, अगर सब कश्मीरी उग्रवादी हों या जो हों तो इतने लोग उसमें पार्टिसिपेट नहीं करते और बीजेपी, पीडीपी या दूसरी पार्टी को वोट नहीं पड़ते। डैमोक्रेसी है इसलिए 75 प्रतिशत के करीब लोगों ने इलैक्शन में पार्टिसिपेट किया। इससे यही लगता है कि वे लोग भारत में रहना चाहते हैं, डैमोक्रेसी में पार्टिसिपेट करना चाहते हैं। कश्मीर के आतंकवादी हों या बाहर के हों, वे लोग माइनॉरिटी में हैं। मेरी सरकार से विनती है कि जो लोग अपने देश के हैं, उनके बारे में सोचिए। आतंकवादी घर के भी होते हैं, कुछ यूथ इमोशनल होते हैं, जैसे लैफ्ट विंग टैरेरिज़्म, उनसे दिल से काम लेना चाहिए और जो बाहर के लोग हैं, उनके साथ डंडे से काम लेना चाहिए। There should be no compromise at all on the outside elements whether they are in Kashmir or Hyderabad or anywhere in India. We should not engage them in any manner. अपने लोगों के साथ प्यार से बात करनी चाहिए। बच्चों और यंग लोगों को दूसरे लोग भड़काते हैं।

          मेरी सब पार्टियों से रिक्वैस्ट है कि कश्मीर में सब मजहब के लोग रहते हैं। मैंने देखा है कि कुछ लोग मजहब का मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं। मजहब को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। जैसे तेलंगाना में लोगों का जितना हक है वैसे ही कश्मीर में भी है, क्योंकि सब भारतवासी हैं, हिन्दुस्तानी हैं। कश्मीर सब मजहबों का मुद्दा है। वहां मुसलमान, हिन्दू, क्रिश्चियन, सिख आदि सब रहते हैं। यह सबका देश है। कभी-कभी कुछ लोगों को लगता है कि बच्चों के साथ क्या कर रहे हैं, पूरा मीडिया बंद कर रहे हैं, लेकिन सरकार को हमारे बच्चों का हमसे ज्यादा ख्याल रहता है। मेरी सरकार से रिक्वैस्ट है कि फार्मल या इन्फार्मल तरीके से चैनल्स ओपन करने की कोशिश करेंगे तो बहुत अच्छा होगा।...(व्यवधान)

          आजकल प्रैस, मीडिया ऐसा ईश्यू बना देते हैं कि वहां सोशल नेटवर्क बंद कर दिया गया, सैल फोन बंद कर दिया गया। परसों गुजरात में भी एक ईशू हुआ। बंद कर दिया गया। आजकल सोशल मीडिया आईएसआईएस के लिए मेन वैपन हो गया है। Social media like Youtube, Facebook, Twitter and Google have become the main weapon of spreading terrorism, but sometimes we have to use it. But the only thing is that I would request the media to understand this.

                   पाकिस्तान को कितना भी प्यार करें, कितनी भी बिरयानी खिला दें, कितना गले लगाएं, लेकिन वहां जब भी पोलिटिकल पावर आती है तो वे यहां इश्यू बनाने की कोशिश करते हैं। आजकल मैं देखता हूं कि जनरल के लिए पोस्टर बना दिए, मार्शल रूल के पाकिस्तान में पोस्टर लगे हैं, ऐसा मैंने सुना है। वह इश्यू को डाइवर्ट करने के लिए कोशिश करते हैं। मेरी रिक्वेस्ट है कि सभी पोलिटीकल पार्टीज मिलकर एक मैसेज देना चाहिए कि भारत से कश्मीर को कभी अलग नहीं कर सकते, यह मैसेज हर पॉलिटीकल पार्टी की तरफ से देना चाहिए। अभी पाकिस्तान को सख्त मैसेज देने की जरूरत है। I will conclude my speech with this.  कश्मीर भी हमारा है,  कश्मीरीयत भी हमारी है और कश्मीरी लोग भी हमारे हैं और उनकी देखभाल करना भी हमारा फर्ज है और बाकी लोगों को इसमें इंटरफियर करने की जरूरत नहीं है।

श्री मोहम्मद सलीम (रायगंज) : सभापति महोदय, आज का मुद्दा जो चर्चा के लिए तय किया गया है, काफी भटक गया है, यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है। कश्मीर घाटी में हाल में हुई हिंसा के विषय पर चर्चा है, हिंसा का एक साइकिल चल रहा है, ब्लेमगेम में हम आंकड़ा देकर कह सकते हैं कि कितना क्या हुआ? लेकिन मुद्दा हाल की हिंसा का है। राज्य में लोगों के लिए शांति और सुरक्षा के लिए उत्पन्न खतरा और लोगों की शांति और सुरक्षा के साथ-साथ देश की सुरक्षा और अखंडता के ऊपर भी सवाल पैदा हो रहा है, उसके ऊपर भी सरकार का ध्यान बहस के दौरान आकर्षित करना पड़ेगा। पिछले बारह दिनों से जो कुछ हो रहा है यह अनहोनी नहीं है, यह होनी ही थी, जो लोग कश्मीर के बारे में खबर रखते हैं, कश्मीर के बारे में लिखते हैं, कश्मीर के बारे में जानकारी रखते हैं। वे पिछले कुछ दिनों से ऐसा अंदेशा बता रहे थे, यह एक दिन में नहीं हुआ बेशक ट्रिगर हुआ, जो सेल्फ प्रोक्लेम्ड सोशल मीडिया में पब्लिसाइज्ड हुआ है या आइकन की बात कर रहे हैं, न्यू एज मिलिटेंट का इनकाऊंटर में उसके और उसके दो साथियों की मौत के बाद ट्रिगर हुआ, ऐसा नहीं है कि अगर वह नहीं होता तो सब कुछ ठीक था। आज की स्थिति पनप रही थी, पिछले ढ़ाई-तीन दशक से कई सरकारें रहीं, राष्ट्रपति शासन भी रहा, इसमें हमारे सुरक्षाबलों के जवानों की जानें गईं, सरकार की तरफ से एक के बाद एक बहुत सारी कोशिशें हुईं।

          अगर इस वर्ष की होम मिनिस्ट्री की एनुअल रिपोर्ट देखेंगे तो आप कहते हैं कि इनफिल्ट्रेशन कम हो रही है, वारदात कम हो रही हैं, मौतें कम हुई हैं। जब सवाल पूछे गए तो कहा गया कि मिलिटेंट कम हो रहे हैं। आखिर अंदर में कुछ चल रहा था। अगर हम कश्मीर जैसी स्थिति के ऊपर नजर रखते हैं तो गहराई से क्यों नहीं देखते? आज जब हम चर्चा कर रहे हैं, जो गंभीर स्थिति उत्पन्न हुई है, उसको अगर हम गहराई से नहीं देखेंगे या  इसे अगर सीरियस लॉ एंड आर्डर सिच्यूएशन की तरह देखेंगे और फोर्स और बल का इस्तेमाल करके उसे रोकने का प्रयास करेंगे तो यह गलत होगा। आज पूरे विश्व में हिंसा का वातावरण पैदा हो रहा है, हम रोजाना दहशदगर्दों के हमले देख रहे हैं, पेरिस से लेकर ढाका तक हमले हो रहे हैं, वेस्ट एशिया में जो कुछ हो रहा है उसे आप पशमंजर में रखें। जियो पॉलिटिकल सिच्यूएशन के लिए कश्मीर एक महत्वपूर्ण बिन्दु है, किसी के ऊपर ब्लेमगेम से मामला हल नहीं होगा। 

           सभापति महोदय, यह मामला न तो वेल के इस पार से उस पार हल होगा और न सरहद के इस पार या उस पार के ब्लेम गेम से हल होगा। पाकिस्तान की नीयत कश्मीर के बारे में शुरू से ही गलत रही है। हम सब इसे मानते हैं, लेकिन आज हम यदि कश्मीर की स्थिति को सिर्फ पाकिस्तान की नीयत पर छोड़ देंगे तो सवाल आएगा कि हमारी नीति क्या है। अगर पाकिस्तान की नीयत गलत है, तो हमें भी अपनी नीति को दुरुस्त करना पड़ेगा कि हम उससे अन्दरूनी और बाहरी तौर पर किस तरह से निपट सकते हैं।

          महोदय, दूसरी बात है कि हम एक विशियस सर्कल में हैं। वहां मास प्रोटेस्ट हो रहे हैं। नौजवान इसमें उतर रहे हैं। यह मिलिटेंसी का एक नया फेज है। पहले जो मिलिटेंट्स थे, उनसे कश्मीर के आम लोग भी परेशान होते थे। आम लोग सुरक्षाबलों और मिलिटेंट से भी परेशान होते थे, क्योंकि वे रात में उनके घरों में घुस जाते थे। घर में रहते थे, दबाव डालते थे, खाना-पीना लेते थे। अगर आप पिछले कई सालों के वाकयात को देखेंगे तो मिलिटेंट ऑपरेशन में, चालाकी से हो, टैक्टिक्स से हो, तब्दीली की और आम लोगों के साथ मिलिटेंट्स का जो रू-ब-रू आमना-सामना होता था, वह कम हो गया। हम तो खुश हो गए कि चलो ज्यादा वाकयात नहीं हो रहे हैं। फिर उन्होंने अपने नए चेहरे को, नई शक्लो-सूरत को, नए तरीके से प्रमोट किया। विश्व में ऐसा सभी जगह होता है, जहां भी इस तरह के स्ट्राइफ-प्रोन जोन हैं, मिलिटिराइज्ड एरियाज़ हैं, जहां पर इस तरह के वारदात होती रहती हैं। वहां पर मिलिटेंट्स इस तरह से अपनी टैक्टिक्स चेंज करते हैं।

          महोदय, आज के जो ये बदले हुए हालात हैं, उन्हें यदि आप अपने ट्रेडीशनल और कन्वेंशनल नजरिए से ही देखेंगे, तो हम आज की चुनौती को रीड नहीं कर पाएंगे। यह हमारे लिए और हमारे देश के लिए एक बड़ी चुनौती है। उस चुनौती से निपटने के लिए हम आपसे हाथ जोड़कर कहेंगे कि सुरक्षाबल तैनात कर के गोली से या पैलेट गन से वहां के नौजवानों को छलनी तो कर सकते हैं, लेकिन यह ऐसा साइकल है, जितने वहां पर ऑप्रेसिव मैजर्स लिए जाएंगे, उतने ज्यादा प्रोटेस्ट में ये नए नौजवान जुड़ते रहेंगे। इस प्रकार जिन नौजवानों को हमें उन से आइसोलेट करने की जरूरत थी, वे मिलिटेंट उसी जनता को शील्ड कर के, उन्हीं नौजवानों को सामने रखकर अपने काम को आगे बढ़ा रहे हैं। हम पैलेट गन से नौजवानों के चेहरे में जो छेद देख रहे हैं, that perforation is not only on the face of the Kashmiri youth but perforation is taking place in the relationship.

           सभापति महोदय, कृपया आप घंटी न बजाएं, मुझे अपनी बात कहने दीजिए। इतनी देर से यह चर्चा चल रही है। यहां इश्यू से बाहर भी बातें हुई हैं, लेकिन मैं अपनी बात कहना चाहता हूं।

          महोदय, पैलेट गन से सिर्फ उस कश्मीरी नौजवान के चेहरे पर परफोरेशन नहीं हो रहा है, बल्कि शेष भारत के साथ, जो हमारा कश्मीर का हिस्सा है, उसके साथ जो संबंध है, उसमें भी परफोरेशन हो रहा है। जैसे पेपर को फाड़ने के लिए छेद किया जाता है, उसके बाद फाड़ना आसान हो जाता है। उसी प्रकार चाहे फिर वे सरहद के उस पार हों या सरहद के इस पार हों, जो कश्मीर को हमसे अलग करना चाह रहे हैं, उनके लिए वह बहुत फायदेमंद हो रहा है कि चलो वह परफोरेटेड हो रहा है, इसलिए मैं इस सदन के माध्यम से माननीय गृह मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि इस गंभीर मामले को हम ब्रूटल डिसप्रपोर्शनेट फोर्स से अपने काम को अंजाम न दें। उससे किसी की राजनीतिक मंशा तो पूरी हो सकती है, लेकिन देश का स्वार्थ कभी पूरा नहीं होगा, इस बात को ध्यान में रखना पड़ेगा।

          महोदय, मैं दूसरी बात यह कहना चाहता हूं कि जहां भी गलती हुई, चूंकि समय कम है, इसलिए मैं डिटेल्स में इसलिए नहीं जाऊंगा, चाहे इंटेलीजेंस फेल्योर हो, आपको खबर नहीं मिल रही थी, चाहे ऑपरेशन के बाद क्या हो सकता है, उसके बारे में हमारी जानकारी नहीं हो और अगर जानकारी हो भी, तो उन इंटेलीजेंस इनपुट्स को लेकर हमारा कंटिन्जेंसी प्लान या एक्शन प्लान क्या था, हमारा स्टेंडर्ड ऑपरेशन प्रॉसीजर क्या था, जिसके कारण वहां इतने नौजवान मारे गए, उनके परिवारों को और पूरी घाटी के लोगों को आप किस तरह से आश्वस्त करेंगे, जब तक आप इसका बंदोबस्त नहीं करेंगे कि जो गलती की है, हम इंसाफ देंगे। 

17.00 hours           आप बंदोबस्त नहीं करेंगे कि जो गलती की हैं, हम इंसाफ देंगे क्योंकि हिंदुस्तान का चेहरा पूरे विश्व में और कश्मीर में भी एक जस्ट, सैक्युलर, डेमोक्रेटिक, फैडरल कंट्री की हैसियत से पहचाना जाता है। अगर हम जस्ट सोसाइटी नहीं होंगे तो जो आजादी का नारा लेकर कश्मीर घाटी में फिर रहे हैं, हमें विलेन से हीरो बना रहे हैं। हमारा मुसतैर का तहजीब है, कम्पोजिट कल्चर है, आइडिया आफ इंडिया को जितना नुकसान पहुंचाएंगे, हमारी अखंडता, इंटेग्रिटी को उतना ज्यादा नुकसान पहुंचेगा। यह प्रपोशनेटली रिलेटिड है।         

       आज जो प्वाइंट नहीं आया, मैं उसके बारे में बताऊंगा। एक सवाल ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने उठाया है। बर्कातुल्लाह युनिवर्सिटी भोपाल में, द्वारका में, अखबार में आप देखेंगे। एक तरफ सत्पथी जी ने सही कहा कि सरकार ने उड़ान योजना ली कि किस तरह से नौजवानों को ट्रेनिंग देकर देश के अन्य भागों में आजीविका के साथ जोड़ा जाए ताकि हमारे संबंध मजबूत हों। लेकिन इस तरह की घटना के बाद अगर आप कश्मीर में जाने वाले ट्रकर्स, जो ट्रक चलाकर जा रहे हैं, उनको रास्ते में रोककर बोलें कि तुम पहले बोलो - भारत माता की जय और इसके बाद ही तुम्हें जाने देंगे। वह एक-एक वार्ता लेकर चला जाएगा, पाकिस्तान से जो बात लेकर मिलिटेंट आ रहा है, वह हमारे देश से ऐसी बात लेकर जाएगा, इससे हमारा संपर्क और नाता टूट जाएगा। हम इस तरह से देश प्रेम नहीं जगा सकते हैं। अगर यहां कश्मीरी नौजवान, जो अलग-अलग कैम्पस में पढ़ रहे हैं, संख्या में कम हैं लेकिन उनके साथ कई जगह पर घटनाएं हो रही हैं। हैदराबाद में, भोपाल में, दिल्ली में, पंजाब में और भी कई जगह हैं, मैं नाम नहीं बोल रहा हूं, वहां आप राज्य सरकार को हिदायत दें कि सख्ती से निपटें, ऐसा कुछ नहीं करें कि नाता टूट जाए क्योंकि बात बहुत सही नहीं जा रही है। हो सकता है हम देश प्रेम का डंका उसके ऊपर हमला करके बजा देंगे, लेकिन वह कश्मीर के साथ हमारी गलत बात हो जाएगी।

          मैं समझता हूं कि सरकार को पोलिटिकल इनीशिएटिव लेना चाहिए, बेशक आप वहां कानून व्यवस्था को सही करें, आप जिस तरह से राज्य सरकार को मशवरा देना चाहते हैं, मदद करना चाहते हैं, करें। माननीय प्रधानमंत्री जी, आप भाषण में कहते थे कि अगर देश में और राज्य में एक ही दल की सरकार होगी तो समस्या का समाधान करना आसान होगा। कोआर्डिनेशन अच्छा हो सकता है। हम उन महान आत्माओं से पूछ रहे हैं, जो पोलिटिकल इंटरक्युलेटर्स थे, पीडीपी और बीजेपी को एक साथ जोड़ने के लिए जो एजेंडा आफ एडमिनिस्ट्रेशन के लिए बनाया था, आज वह सब हवा में उड़ गया। क्या वह सिर्फ सरकार को बनाने के लिए था? आज जब कश्मीर को सबसे ज्यादा जरूरत पोलिटिकल लीडरशिप की है, उन महानुभावों को जाना चाहिए। वहां जाकर राजनीतिक पहल शुरु करने के लिए सरकार को प्रांत सरकार को राजनीतिक दिशा दिखाने के लिए मदद की जरूरत है। हम तैयार हैं, आप ऑल पार्टी मीटिंग बुलाएं।

       Sir, please allow me to conclude. I am giving concrete suggestions on how to move ahead. I am not going back to what happened two decades or three decades ago. What is the way forward now? There should be an all-party meeting from where we can give a message. जहां सब वार्ता कर सकते हैं। पहले जैसा नहीं हो, क्योंकि लोगों का ऐतबार खत्म हो रहा है, आटोनोमी का कमीशन बनाया गया था, जिसकी रिपोर्ट पर कोई चर्चा नहीं हुई। सक्सेसिव गवर्नमेंट ने इन्टरक्युलेटर्स एपाइंट किए, जिसकी रिपोर्ट पर चर्चा नहीं हुई। पिछली बार पेलेट्स 2010 में हो रहा था, तब मैं पार्लियामेंट मैम्बर नहीं था, उस समय मैं और प्रकाश करात, पार्टी जनरल सैक्रेट्री पहले पहुंचे थे। तब सोशल मीडिया में कितनी गालियां दी गई थी, हमें कश्मीर का एजेंट बना दिया था, पाकिस्तान का एजेंट बना दिया था। जब नौजवानों को मारा जा रहा था, उस समय की सरकार द्वारा गलत संदेश दिया जा रहा था कि 200 रुपए नौजवानों को देकर पत्थर फेंकने का काम कराया जा रहा है। इस तरह से गलत संदेश नहीं जाना चाहिए। इसका हमें जो दुख हुआ है, इस पर आप मरहम लगाएं और राजनीतिक पहल शुरु करें। अगर 12 दिन कर्फ्यू रहता है तो आम जनता को जरूरत की चीजों के लिए, चाहे ईंधन का सवाल हो, खुराक का सवाल हो, रोज़ी का सवाल हो, कितनी परेशानी होती है, आप समझ सकते हैं। सब जरूरी चीजों की सप्लाई जारी रहनी चाहिए। आप कोशिश कीजिए। आप फिर से संदेश दें कि गलती कोई भी करे, चाहे वह सुरक्षा आला पुलिस अफसर कश्मीर के ही हों, जिनकी गलती से यह हुआ है, उनको सजा दिलाकर आप उनको नजदीक खींच सकेंगे।

SHRI VARAPRASAD RAO VELAGAPALLI (TIRUPATI): Mr. Chairman, I thank you and my party leader for giving me this opportunity.     

          With a heavy heart I say that the Government of India do not have a proper policy as far as Kashmir is concerned. Whatever little policy is there is extremely ad hocism. There is no concrete plan to develop the confidence in the minds of the people and to bridge the gap between Kashmir and other parts of the country.  So, it is extremely high time that the Government of India came out with a flawless and proper policy. 

All said and done, we should not forget the past.  What happened at the time of the Independence?  We have promised so many things to Kashmir and its people but we have not honoured any of the commitments that we have made to the people of Kashmir, whether it is a plebiscite or a referendum.  We are not giving any reason why we are not able to do all those things to the people of Kashmir.  So, it is extremely unfortunate that the way we treat Kashmir is resulting in this kind of unrest.  

The recent unrest is not in isolation like in other parts of the country.  The emotions of the people of Kashmir have added up.   There is a reason behind it.  People feel extremely insecure, they feel loneliness. They are sandwiched between India and Pakistan and another side is China.  Therefore, in the interest of our own country, it is very high time that we have a nice policy to infuse confidence in the people of Kashmir.  Where is the genuine dialogue?  At least as an educated person, I don’t see any proper, genuine and responsible dialogue with the people of Kashmir or with the leaders of Kashmir.  Suddenly you say something at the Secretary level or Joint Secretary level or at the higher officer level.  Suddenly, one separatist comes and we abandon the entire talks.  What is wrong if you talk to a separatist?  They call themselves as separatists.  They have a right to say that.  Why do the Government of India not listen to those people?  They call themselves as freedom fighters?  Therefore, it is very appropriate to have a proper dialogue with the people of Kashmir. 

One of the main reasons to have so much of unrest is putting so much of security forces.  I had the occasion very recently to visit Kashmir and I was able to see all the important parts of Kashmir.  It is such an unfortunate situation.  Every tourist place you go, you have umpteen number of security people.  You can’t talk freely; you can’t interact with the local people.  Therefore, perhaps the present situation could be the creation of the deployment of security forces.  Personally, I earnestly submit to the hon. Home Minister that he is trying with the forces with so many decades in Kashmir.  Can you try one year without security forces in civilian areas?  We don’t mind if you support the border areas and the line of control.  But for heaven’s sake, kindly remove security forces from the civilian areas so that there is a feeling among the people that they are also living like any other people with a lot of freedom and independence.  Now, a lot of people lost their eye sight, nearly 50 people died and more than 700 people got injured in the recent unrest. I do not see any reaction by the Government or India or by the Minister or by any official that they are going to resettle the people who are badly affected, or the families who have lost their kith and kin, or the families where they have been severely injured. I have not seen even one word from those responsible about these losses.

          We see a lot of vacancies in Government Departments, particularly in Kashmir. There is a lot of unrest because of various reasons. If you see the posts of teachers, there are a lot of vacancies. Each and every Department has a lot of vacancies but the Government is not taking any effective step. No doubt it is a State subject but if adequate funds are not given to the State Government it is extremely difficult for the State Government to cope with such a situation. Therefore, the Government of India should treat Kashmir as a special baby and give financial support and moral support to the people of Kashmir.

          The infrastructure is extremely inadequate there. Thanks to the Government, recently they have announced a national railway and a rail connection but it is extremely inadequate. For the last 70 years it has suffered; no proper attention has been given to Kashmir. Therefore, to cover for all the entire seven decades, the Government of India should give a special package so that infrastructure is developed, industries are developed, and the local cottage industries are developed. Tourism in Kashmir has a great potential. It can be compared with Switzerland or any other wonderful country in the world. Why do we not exploit that so that the people there could be happy? The people from mainland can also visit Kashmir and it can enable the people of Kashmir to come to the mainstream.

          I do not think we are handling the issue with the sensitivity it deserves. There is no responsibility, as I see it. No doubt, you react here; if the Opposition says something, the Government answers. But as a responsible and educated citizen, I do not see the Government acting with any sensitivity to solve the issue on a permanent basis.  Where is the dialogue with the people of Kashmir? These are all major issues which repeatedly result in unrest in Kashmir. If we continue to neglect Kashmir, we are going to have another 1962-type humiliating defeat. The reason for this is that China is taking advantage. This is my personal view.

          China is undertaking a lot of infrastructure projects in occupied Aksai Chin area. It has come out with highways and putting up a lot of infrastructure. It is strengthening its military and supporting Pakistan to get a lot of weapons. The weapons Pakistan is getting are not out of its own money. All of us know that. It has a limited budget but most of the aid is coming from China. Therefore, it is high time we realised that we may have a repetition of the humiliating defeat of 1962. If we do not act in a strong manner, those two countries will align with each other. There is a possibility for such kind of a scenario.

          The hon. Minister of Home Affairs is here. He is a great statesman. Why can there not be a separate Ministry and Minister? Although we have a separate section, there is no separate Ministry, which it deserves. Therefore, a separate Ministry could be created with a Minister who can interact on a day to day basis with the people of Kashmir. I feel it is extremely important. Just as we have for the North-East it is high time we had one for Kashmir also.

          There is unrest among the youths for the simple reason that unemployment is rampant and development is much less. As hon. Members who spoke earlier have mentioned, there is no special package for any of the industries for providing employment for the youths. Therefore, I do not think anyone of us would disagree if a special consideration like some reservation is given for States like Kashmir and the North-East. It would definitely bring the people from there to other parts of the country as well as from mainland to Kashmir. Tourism has a lot of potential.  It is high time that we exploit it, Sir.

HON. DEPUTY SPEAKER: You have already mentioned it.

SHRI VARAPRASAD RAO VELAGAPALLI: With the permission of the Chair, I would like to raise one or two points.

          It is not advisable for the Government to dig the past.  I saw in the newspapers.  They are trying to resettle some of the kashmiri pandits.  So, it is rubbing on the wound.  I do not advise that kind of actions of digging the past.  Therefore, whatever is there, let it continue and the people should be treated with responsibility and sensitivity.

          A special resettlement package is very much required for those who are badly affected; 50 people died, nearly as much as 30 young people lost their eyesight and nearly 600-700 people got injured.  If a resettlement package is quickly implemented, it would give a lot of confidence and faith in the minds of the Kashmiris about the Government of India.

          Thank you, Sir.

                                                                                                   

श्री तारिक अनवर (कटिहार):  माननीय उपाध्यक्ष जी, आज सदन में बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय पर चर्चा हो रही है। यह विषय हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा और उसके साथ साथ देश की एकता और अखंडता से जुड़ा हुआ है। कुछ ही दिन पहले कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के आंतकी बुरहान वानी की एक मुठभेड़ में हत्या हो जाने के बाद जो लगातार वहां हिंसा हुई और वहां के हालात बिगड़ते चले गये, उससे पूरे देश में एक चिंता का वातावरण बना है। फिर से एक बार यह आशंका पैदा होने लगी कि कश्मीर एक बार फिर से अराजकता और अनिश्चितता के भंवर में कहीं फंस न जाए।

           राज्य में पी.डी.पी. और बी.जे.पी गठबंधन की सरकार बनाने के पीछे लगभग 15 महीने पहले यह दलील दी गई थी कि यह सरकार एक मजबूत और स्थायी सरकार होगी और इस सरकार के बनने के बाद कश्मीर के हालात में सुधार होगा, आतंकवादी गतिविधियों में सुधार होगा और कश्मीर को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में यह सरकार सफल होगी क्योंकि बी.जे.पी जम्मू का प्रतिनिधित्व कर रही थी और पी.डी.पी. कश्मीर वैली का प्रतिनिधित्व कर रही थी। इसलिए इस बात का अनुमान उस समय लगाया गया था कि दोनों मिलकर कश्मीर को आगे बढ़ाने का काम करेगे, कश्मीर को एक मजबूत और स्थायी सरकार देने का काम करेंगे जबकि एक तरफ पी.डी.पी. पार्टी धारा 370 के पक्ष में थी, उसकी वकालत कर रही थी और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी धारा 370 की मुखालफ़त कर रही थी। दोनों ने एक जगह बैठकर सरकार बनाने का फैसला लिया।

          सरकार बनने के बाद कश्मीर की जनता के साथ जो संवाद बनना चाहिए था, वह संवाद नहीं हो पाया। लोगों के अंदर जो भरोसा और इत्मीनान पैदा करने की बात थी, वह नहीं हो पाई और कश्मीर के लोगों के दिलों को जीतने के लिए क्योंकि हम कश्मीर को अपने साथ अगर जोड़कर रखना चाहते हैं तो उसके लिए सबसे जरूरी है कि उनके दिलों को जीता जाए, खास तौर पर जो कश्मीरी नौजवान हैं, उनको देश की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।

           उपाध्यक्ष महोदय, आपको यह जानकार ताज्जुब होगा कि बी.जे.पी. और पी.डी.पी. की सरकार को बने हुए लगभग 15 महीने हो चुके हैं। इन 15 महीनों में कोई भी ऐसी पहल नहीं की गई, जो स्टेक होल्डर्स थे, कश्मीर की समस्या का समाधान करने में, जिनकी एक भूमिका थी, उनके साथ कोई बातचीत होती, उनके साथ कोई वार्तालाप होता, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जबकि, उस गठबंधन की सरकार को यह चाहिए था कि एक रोड-मैप बना कर, किस तरह से कश्मीर की समस्याओं का समाधान करे, किस तरह से कश्मीर को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़े, इस के लिए उस पर एक रोड मैप बना कर आगे बढ़ने की जरूरत थी, लेकिन उस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।

          उपाध्यक्ष महोदय, आज सारी दुनिया को आश्चर्य हो रहा है कि एक आतंकवादी नौजवान से जनता की इतनी सहानुभूति क्यों है? इस बात को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और इसका विश्लेषण करना चाहिए, संजिदगी से सोचना चाहिए कि एक आतंकवादी की हत्या के बाद जिस प्रकार से उसके समर्थन में जो नौजवान और कश्मीर के लोग बाहर निकल कर आये, यह हम सब के लिए चिंता का विषय है। कश्मीरी नौजवानों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए हमने क्या उपाय किये, अभी उस पर लोगों ने सुझाव भी दिये, क्या वे पर्याप्त हैं, इस पर गृहमंत्री जी और केन्द्र सरकार को विचार करना चाहिए। हमारी पहल कश्मीरियों के भीतर इस आशंका को बार-बार और मजबूत करती है, बल देती है कि शायद ताकत के बल पर हम कश्मीर को अपने साथ रखना चाहते हैं। यह जो एक मिज़ाज बन रहा है या कश्मीरियों की सोच बन रही है, आने वाले दिनों के लिए यह बहुत ही खतरनाक है।

          उपाध्यक्ष महोदय, पिछले तीस वर्षों में दो ही बार राजनीति पहल हुई है। एक बार वर्ष 1990 में जॉर्ज फर्नांडीज के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल वहां गया और वहां के जो प्रमुख लोग थे या जिनसे बातचीत करनी चाहिए थी, उनसे बातचीत की गई।  दूसरी पहल वर्ष 2010 में हुई थी, जब पी. चिदम्बरम के नेतृत्व में एक संसदीय समिति द्वारा राज्य का दौरा किया गया था। आज के माहौल में शांति स्थापना के लिए उनसे कहीं ज्यादा आगे बढ़ कर एक नई राजनैतिक पहल की जरूरत है।

          उपाध्यक्ष महोदय, मीडिया के माध्यम से हमें यह जानकारी मिली है कि जम्मू-कश्मीर के बिगड़े हालात की समीक्षा करने के बाद गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी, जो यहां मौजूद हैं, ने ज़मीनी स्थिति का आकलन कर के सुरक्षा बलों को जरूरत के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। साथ ही साथ, सुरक्षा बलों को हिदायत दी गई है कि हिंसा में निर्दोष लोग न मारे जायें, मैं इसका स्वागत करता हूं। अमरनाथ यात्रियों और कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा पर भी मंत्री जी ने ध्यान देने के लिए कहा है। सारा देश उनके इस निर्देश का स्वागत करता है। लेकिन, यह बात भी हमारी जानकारी के लिए जरूरी है और चिंताजनक है, क्योंकि वर्ष 2016 में आतंकवादी घटनायें लगभग 47 प्रतिशत बढ़ी हैं और उसी तरह से वर्ष 2016 की शुरुआत में आतंकवादी घुसपैठ में लगभग 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

       उपाध्यक्ष महोदय, पाकिस्तान कश्मीर की घटना का लाभ उठाने की पूरी कोशिश कर रहा है और इसकी संभावना भी थी। शायद पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बुरहान वानी जो आतंकवादी थे, उनकी मौत पर दुःख प्रकट करते हुए भारत के खिलाफ कड़ा बयान दिया है। यह सामान्य बात नहीं है। इसका अर्थ यह होता है कि पाकिस्तान इस स्थिति का पूरा लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। इससे यह बात भी पुख्ता होती है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का समर्थन करने से बाज़ नहीं आ रहा है। 

          उपाध्यक्ष महोदय, यहां तक कि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी अपने दूत द्वारा कश्मीर की घटना को मानवाधिकार का मुद्दा बनाने की कोशिश की है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी भारत को बदनाम करने के मौके की तालाश में पाकिस्तान हमेशा रहता है। संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारे जो प्रतिनिधि हैं, उन्होंने बहुत जोरदार शब्दों में पाकिस्तान को जवाब दिया है। इसके बावजूद भी मैं कहना चाहता हूं कि एक मजबूत कदम उठाने की जरूरत थी। कश्मीरी जवानों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए मैं समझता हूं कि ऑल इंडिया सर्विसेज में खास तौर पर रेलवे, पब्लिक अंडरटेकिंग और प्राइवेट सैक्टर में भी देश के अलग-अलग राज्यों में बहाल किया जाना चाहिए, ताकि वे देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें।

          अंत में, मैं सरकार को सुझाव देना चाहूंगा कि हमारी राजनीतिक इच्छा होनी चाहिए कि हम सही मायने में कश्मीर की समस्या का समाधान करना चाहते हैं और कश्मीर को भारत के साथ जोड़ना चाहते हैं तथा उनसे बातचीत करके इस समस्या का हल निकालना चाहते हैं। सत्पथी जी ने सदन में सुझाव दिया है कि अफस्पा को समाप्त किया जाए। मैं समझता हूं कि इस बारे में सोचना चाहिए क्योंकि यह कश्मीर की बहुत पुरानी मांग है। पालिटिकल प्रिज़नर्स को रिहा किया जाना चाहिए और एक्सट्रा ज्यूडिशियल किलिंग को रोकने का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। अगर हम नागा इनसर्जन्स के साथ शांति वार्ता कर सकते हैं तो कश्मीरियों के साथ भी बातचीत करके रास्ता निकालने की कोशिश करनी चाहिए।

          इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करते हुए यह उम्मीद करता हूं कि हमारे गृह मंत्री जी और भारत सरकार कश्मीर के हालात को देखते हुए सही क़दम उठाने का काम करेंगे और कश्मीर में दोबारा शांति व्यवस्था कायम करने का प्रयास करेंगे।

श्री प्रेम सिंह चन्दूमाजरा (आनंदपुर साहिब) : उपाध्यक्ष जी, कश्मीर में जो हिंसा हुई है उसकी मैं निंदा करता हूं और यह बहुत चिंता की बात भी है। मैं सबसे पहले उन शहीदों को प्रणाम करता हूं जो हाल ही में एक गाड़ी में जा रहे थे और उन पर हमला करके उन्हें शहीद कर दिया गया। मुझे इस बात का गौरव है कि उनमें से ज्यादातर शहीद मेरे संसदीय क्षेत्र श्री आनंदपुर साहिब के थे। कुछ लोग रोपड़ के, बलाचौर, और चमकौर साहब के थे। यह भी बहुत भावनात्मक बात है कि एक हफ्ते पहले स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग के लिए हम श्रीनगर गए थे और इनमें दो लोग मुझे मिले थे। वे लोग बहुत जोखिम लेकर वहां काम कर रहे हैं। हम सभी को वहां काम करने वालों के साथ सहानुभूति होनी चाहिए कि हमारी बी.एस.एफ., हमारी सी.आर.पी.एफ., हमारी डिफेंस फोर्सिस जोखिम उठाकर देश की सुरक्षा कर रहे हैं और देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर रहे हैं। हम सभी को उन लोगों को प्रणाम करना चाहिए।

          महोदय, मेरा मानना है कि कश्मीर का मामला लॉ एंड आर्डर का मामला नहीं है बल्कि यह एक राजनीतिक मामला है। हमें इस बात पर चर्चा करनी चाहिए कि इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है। जब हम समाधान ढूंढ़ेंगे तो इसके कारण भी जान जाएंगे कि यह समस्या क्यों पैदा हुई है। मुझे सदन में पिछले समय की भी कुछ बातें करनी पड़ेंगी क्योंकि खड़गे जी कह देते हैं कि हम पुरानी बातें करने लग जाते हैं। अगर हमारा भूतकाल गंदा होगा तो बदबू आएगी और अगर हमारा भूतकाल अच्छा होगा तो खुशबू आएगी। मैं सदन में दो-तीन बातें कहना चाहता हूं। मैं जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि हमारे दल के नेता, अकाली दल के प्रेजीडेंट मास्टर तारा सिंह की बात मान ली गई होती कि छह महीने के लिए आजादी का दिन आगे कर देते तो पाकिस्तान नहीं बनता।

          दूसरी बात, मास्टर तारा सिंह जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू जी को यह सुझाव दिया था कि जो पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर है, सियालकोट और कश्मीर के लोग, जो वहाँ से उजड़कर आये हैं, को जम्मू-कश्मीर में जमीनें अलॉट की जाएं। मैं जिम्मेदारी से कहता हूँ कि यदि वह सलाह मान ली जाती तो आज कश्मीर नहीं जलता।

          तीसरी बात, आज़ाद भारत में वर्ष 1952 में जब शेख अब्दुल्ला जी वहाँ के प्राइम मिनिस्टर थे, यदि उनको गलत तरीके से न उतारा गया होता, तो आज कश्मीर नहीं जलता। गुलाम खाँ, जो फारूख जी के बहनोई थे, यदि उनको अन-डेमोक्रेटिक तरीके से न बिठाया जाता, तो आज कश्मीर नहीं जलता।

          इसलिए मैं आज की सरकार से यह जरूर कहना चाहूँगा कि उस समय की पिछली सरकारों ने जो गलतियाँ की हैं, आज वे न दुहराई जाएं। इसके लिए हमें कोई पोलिटिकल सोल्युशन ढूंढने होंगे।

          मैं हाल की कुछ बातें कहना चाहता हूँ। चित्तिसिंगपुरा में 36 सिख मार दिये गये। वहाँ कमिटमेंट की गयी कि उस गांव में सबको आर्म लाइसेंस दिये जाएंगे। लोगों ने मांगे, लेकिन नहीं दिये गये। यह कहा गया कि वहाँ हर परिवार को नौकरी दी जाएगी, लेकिन नहीं दी गयी। मैं इसलिए कहना चाहता हूँ, वहाँ अमृतसर के सरहदी क्षेत्र में होम कमेटी गयी, वहाँ किसान इकट्ठे होकर बॉर्डर पर आए। आज भगवंत मान जी ने जो बॉर्डर की बात कही थी, हम उसका सपोर्ट करते हैं। वहाँ लोगों को मुआवजा मिलना चाहिए। यह बात सोचने वाली है। वे कहने लगे कि हमें आर्म लाइसेंस दे दो, जो लोग फेंस से बाहर रहते हैं, बॉर्डर पर रहते हैं, जिनकी जमीनें उधर हैं। हमने और अन्य लोगों ने पूछा कि आर्म लाइसेंस किसलिए चाहिए? वे कहने लगे कि हम हथियार नहीं चाहते, परमात्मा न करें कभी लड़ाई हो, लेकिन जब कभी लड़ाई होगी, तो फौज को पीछे हटा देना और लड़ाई हम लड़ेगें। लोगों की यह जो कमिटमेंट है, इसके लिए हमें वहाँ कश्मीर के लोगों को तैयार करना होगा। मैं खुद बॉर्डर के लास्ट गांव में जाकर आया हूँ। वहाँ सड़कें टूटी हुई हैं। गृह मंत्री जी अभी सदन से चले गये हैं। यह सोचने की बात है। यह पंजाब का मेरा अपना तज़ुर्बा है। जब पंजाब में मिलिटेंसी थी, तो सबसे ज्यादा करप्शन एडमिनिस्ट्रेशन में था। आज ईस्टर्न स्टेट या जम्मू-कश्मीर की एक निष्पक्ष जाँच कर लें, बहुत ज्यादा करप्श्न है। सेन्टर की जो स्कीम्स हैं, उनका पैसा वहाँ नहीं जाता है। इसकी जाँच करने की जरूरत है। सरकार को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। वहाँ सड़कें टूटी हुई है। उनको खाने के लिए रोटी नहीं मिलती है। पीने के लिए पानी नहीं है।

          इसलिए मेरा कहने का यह भाव है कि वहाँ के लोगों की प्रोब्लम्स क्या हैं, इसे जानने के लिए एक कमेटी बननी चाहिए। इसके अलावा कई अन्य सुझाव भी आये हैं। पहले तो माननीय गृह मंत्री जी को ऑल पार्टी मीटिंग बुलाकर, इंटेलेक्चुअल्स को बुलाकर सुझाव लेने चाहिए कि इस समस्या का पॉलिटिकल अल्टरनेटिव समाधान क्या हो सकता है।

          हमारे देश में बहुत बड़ी शक्ति है। हमारे देश में बहुत अच्छे-अच्छे इंटेलेक्चुअल्स हैं। अगर प्रचारक संस्थाओं के प्रचार से किसी व्यक्ति को अपना धर्म बदलने के लिए तैयार किया जा सकता है, तो क्या कश्मीर के लोगों को देश के लिए नहीं तैयार किया जा सकता है? किसी ने सही कहा था कि वहाँ कुछ जाता है, तो वे कहते हैं कि ये वस्तु इंडिया से आयी है। यदि उनको प्यार से और उनकी समस्याओं को सॉल्व किया जाए, जब वहाँ बाढ़ आयी तो हमारी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने वहाँ बहुत राशन भेजा। आज आप बीएसएफ के कमांडरों से पूछें, सीआरपीएफ के कमांडरों से पूछें, वहाँ के गांव के लोगों से पूछें, वे यहाँ तक कहते हैं कि फलाँ गुरुद्वारे का राशन कितना अच्छा था, बिस्कुल अच्छा था, चाय पत्ती अच्छी थी। यदि हम प्यार से उन लोगों के पास सामान भेजें, जिनकी उनको जरूरत है, तो मुझे इस बात का विश्वास है, वे "जय भारत-जय इंडिया " कहेंगे। यदि कुछ नहीं मिलेगा, तो कुदरती तौर पर जो गलत लोग हैं, वे उनको गुमराह करेंगे। आज स्टोन पेल्टिंग की बात है।  

          जहां स्टोन पेल्टिंग की बात है। हमने बहुत सारे लोगों से पूछा कि यह क्यों बढ़ती जा रही है? उन्होंने बताया कि कुछ लोग पैसे कुछ लोगों को दे जाते हैं और वहां से चले जाते हैं। ऐसे ही वॉयलेंस की बात है। डिफेंस फोर्सिस को रिएक्ट करने से पहले यह आइडेंटिफाई करना चाहिए कि किसने वॉयलेंस की है। जब गुस्से में आम लोगों पर रिप्रैशन होता है तब उसका रिएक्शन लोगों के द्वारा होता है। हमें जम्मू-कश्मीर के लिए एक अलग स्टैटजी बनानी होगी। मैं माननीय गृह मंत्री जी को इस बात की बधाई देता हूं कि उन्होंने सभी पार्टी के लोगों को बुलाया। लेकिन मैं अपने तजुर्बे से कह सकता हूं क्योंकि जम्मू-कश्मीर हमारे पड़ोस में है, जितनी रिसपैक्ट, जितनी नेशनलिटी, जितना काम वहां फारूख अब्दुल्ला जी का परिवार कर सकता है, उतना शायद कोई और न कर पाए, इसलिए उनको इनवाल्व करना चाहिए।

           दूसरी बात यह है कि देश में जम्मू-कश्मीर के बारे में जो नफरत फैलायी जा रही है, उसको रोका जाना चाहिए। हैदराबाद में मेरे अपने गांव का एक सिक्ख लड़का वहां पढ़ता था, जिसको मारा-पीटा गया। उसको इसलिए मारा पीटा गया, क्योंकि उन्होंने सोचा कि वह कश्मीरी है। जब इस तरह की भावना देश में बनेगी तो उसका नुकसान होगा। इसको सख्ती से रोका जाना चाहिए।

          महोदय, मैं अंत में कहना चाहता हूं कि कश्मीर का जो मामला है, यह पॉलिटिकल है, इसका सॉल्युशन भी पॉलिटिकली ढूंढ़ना चाहिए। पिछले समय में जो गलतियां हुई हैं, वह नहीं होनी चाहिए। वहां 77 हजार से ज्यादा सिक्ख वहां रहते हैं, लेकिन उनको माइनोरिटी का स्टेट्स अभी तक उनको नहीं मिला है। वह गृह मंत्री जी से मिल चुके हैं। उनके बच्चों को न तो सरकारी नौकरियों में कंसीडर किया जाता है, न उनको माइनोरिटी में कंसीडर किया जाता है। वहां के गांवों में रहने वालों की तो कम से कम सरकार प्रोटेक्शन दे, उनको तो मजबूत किया जाना चाहिए और उनको इंसेंटिव भी दिया जाना चाहिए ताकि कश्मीर के लोगों को विन-ओवर कर पाएं।

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF EXTERNAL AFFAIRS (SHRI M.J. AKBAR): Thank you, Mr. Deputy-Speaker, Sir, for the honour and privilege of addressing this august House.

          आज दोपहर से हम सभी इस डिबेट में शामिल हैं और सभी की बातों से, चाहे जिसकी जो भी राय हो, एक चीज तो जाहिर है कि सभी इस बात को गंभीर मानते हैं। लेकिन कितना गंभीर है, इसका अहसास मुझे लगता है कि थोड़ा सा इतिहास जब तक नहीं जानेंगे, तब तक इसकी पूरी गम्भीरता हम शायद नहीं समझेंगे। क्योंकि लोग अपनी-अपनी पार्टी की तरफ से बोल रहे हैं और कोई दो साल की बात कर रहा है, कोई पांच साल की बात कर रहा है। There is no text without context and the context of the present violence lies in the roots of nation formation. हम एक चीज को भूल रहे हैं कि अब लगभग 70 साल हो चुके हैं और यह जो लड़ाई चल रही है, यह दुनिया के इतिहास में शायद सबसे लम्बी लड़ाई है। There has been no war which has been longer than this. जैसे ऑर्डनरी हिस्ट्री की किताबों में लिखा जाता है, There was an Anglo-French war for hundred years, but that is a very notional time frame. My friend, Prof. Sugata Bose will confirm that. क्योंकि उस वॉर में बड़े गैप्स थे। contiguous, continuous, continual war का 70 साल से होना, यह इतिहास में कभी नहीं हुआ है। इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि हम समझते हैं कि यह जो लड़ाई है, यह सिर्फ ज्योग्राफिया के ऊपर है। यह ज्योग्राफी की लड़ाई नहीं है, यह आइडियोलॉजी की लड़ाई है। क्योंकि यह आइडियोलॉजी की लड़ाई है, इसीलिए यह लड़ाई इतनी गम्भीर proportion लिए जाती है। मैं इसको existential लड़ाई कहता हूं। लड़ाई किस बात की है? लड़ाई है कि हम इस subcontinent में one nation theory पर अपना मुल्क बनाएंगे या two nation theory पर बनाएंगे। उसको अगर और भी सीधा समझना है तो क्या हम धर्म के नाम पर अपने लोगों को जोड़ेंगे, एक करेंगे या धर्म के नाम पर अपने लोगों को बांटेंगे, दो करेंगे, पार्टीशन करेंगे, अलगाव करेंगे, यह है लड़ाई।

          अभी जिनकी वजह से यह डिबेट हो रही है, उनके बारे में भी मैंने सुना है। उनका नाम वानी है। कुछ लोगों की राय में मैं थोड़ी बहुत झलक भी देख रहा था, सुन रहा था। उसकी सचाई जानना जरूरी है, उसकी सच्चाई यह है कि यह मर्डर के चार्ज में फंसा है, इसके खिलाफ 15 इल्जाम हैं और इसके इल्जाम में मर्डर है, इसके इल्जाम में हमारी डिफैंस फोर्सेंज के मर्डर्स हैं, जो वहां के civilion लोग हैं, सरपंच हैं, उनके मर्डर हैं। आप बुरा न माने, मीडिया के साथ मेरी सारी जिंदगी गुजरी है, लेकिन जो मीडिया इन्हें romanticise कर रहे हैं, उन्हें मैं इतना कह दूं कि इसने मीडिया के खिलाफ भी वार किया है, इसने केबल कंपनियों को बर्बाद किया है। इनके जो दादा थे, वह किस इदारे से थे, मैं उस इदारे का नाम नहीं लूंगा। लेकिन मैं इतना जरूर बता दूं कि वह जो इदारा था, वह हमारे देश की unity के खिलाफ था, वह अलगावपसंद था, वह मजहब के नाम पर इस देश को बांट रहा था।

          हम जब इस जंग की शुरूआत को देखते हैं तो एक बात मुझे हैरान भी करती है और परेशान भी करती है। पाकिस्तान नया-नया बना था। पाकिस्तान को बने हुए छः हफ्ते नहीं हुए थे। आप सोचिये, 15 अगस्त और अगस्त का महीना, आजादी की मिठाई मुंह में राख बन गई थी। पार्टीशन की जो कीमत लोगों ने अदा की थी, दोनों तरफ से, हर तरफ से। खून का माहौल था, सैलाब हो गया था। गांधी जी ने 15 अगस्त को कहा था कि आज मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं है, दिल में इतना सदमा था। ...(व्यवधान) उस माहौल में एक मुल्क तैयारी किस चीज की कर रहा है, यह नहीं कि वहां भी रिफ्यूजी हैं, वहां भी परेशानियां हैं, आपकी तिजोरियां खाली हैं। लेकिन उन सब चीजों के बावजूद कराची में किस चीज का जुनून था, उस वक्त पाकिस्तान की कैपिटल कराची थी। वहां किस चीज का जुनून था, जंग का जुनून था और अक्टूबर में जंग की शुरूआत हुई, हमने इस जंग को शुरू नहीं किया। हम उस वक्त भी वही कहते थे, वही अगस्त, अक्टूबर में हमारी जो सरकार रही, उस वक्त भी वही कहते थे और आज भी वही कहते हैं। आप भी जानते हैं कि कश्मीर उस वक्त न हमारे देश के साथ था और न पाकिस्तान के साथ था, उस वक्त वह किसी से नहीं जुड़ा था। कश्मीर के ऊपर बात होगी तो ट्रांसफर ऑफ पावर पेपर्स में आप देखियेगा कि जो हमारे प्रधान मंत्री थे, उस वक्त उन्होंने माउंटबेटन को एक नोट लिखा था कि कश्मीर के ऊपर हम अगले मार्च में जब spring thaw हो जायेगा, उसके बाद बातचीत करेंगे, कि इसकी status क्या होगी। क्योंकि independent status indepence Act के अंदर यह लीगल नहीं है। Independence legal option नहीं था । उस जमाने में यह भी याद रखना चाहिए कि दोनों मुल्क dominion status थे। हमारे संविधान आने के बाद हम पूरी तरह आजाद हुए। उस वक्त इन्होंने जो ऑप्शन चुना, वह आज तक है। आज तक वही option वे इस्तेमाल कर रहे हैं, कि हम इस मसले को जंग, लड़ाई से हासिल करेंगे। लड़ाई के दो साइड्स हैं - 1965 और 1971, जब फॉर्मल जंग हुईं। 1965 की लड़ाई के बारे में मैं आपको एक चीज बताना चाहता हूं, जिससे आपको अंदाजा हो जायेगा कि यह मसला हमारे लिए कितना existential है। मैं 1965 की लड़ाई में पाकिस्तान का सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण देता हूं।  एक covert operation हुआ, ऑपरेशन का नाम Gibraltar था और दूसरा ऑपरेशन ग्रांड स्लैम था। आप समझेंगे कि Gibraltar spain के पास एक छोटा सा आइलैंड है, उसका हमारे साथ क्या लेना-देना है, लेकिन लेना-देना है, क्योंकि Gibraltar वही island है, जहां से 711 में अरब forces उठकर, Gibraltar एक corruption है, असल में उसका नाम जबल तारिक है। उसे उन्होंने Gibraltar बना दिया है। वहां से शुरू होकर जो सारे स्पेन के ऊपर हुकूमत की गई, वह हम दोहराना चाहते हैं।

          उसके बाद Operation Grand Slam हुआ। ग्रैंड स्लैम तो आप जानते हैं, जो लोग bridge खेलते हैं। पता नहीं पाकिस्तान के जनरल कुरान शरीफ़ पढ़ते थे कि नहीं, लेकिन bridge जरूर खेलते थे। उसके बाद जब सन् 1971 में इनको पता चल गया कि अब फुल फ्रंट और सामने वाली लड़ाई से हम नहीं जीत सकेंगे तब उन्होंने terrorism और covert operations जिसको कहते हैं कि वॉर बाय अदर मींस, उसका इस्तेमाल करना शुरू किया। सन् 1970 के दशक में तो उतनी हिम्मत नहीं पड़ी, 1980 के दशक में आप समझते हैं कि सिर्फ कश्मीर पर ही वॉर नहीं था, पंजाब पर भी था, हम इसको क्यों भूल रहे हैं? पंजाब में हमने कितनी शहादत दी है। पंजाब में ये लोग कहां तक नहीं पहुंचे? यह षडयंत्र बहुत बड़ा है। इसके सामने contrast देखिए कि हमारी तरफ से हमेशा यह कहा गया है कि बातचीत कर के इस मसले को सुलझाओ। आज भी हम वही बात कर रहे हैं। पहले तो एक ऐसा भी वातावरण या situation आई, अगर बातचीत में जो हुआ वह सब सच्चाई निकल जाए तो विस्फोटक होगा। लेकिन वाजपेयी जी और आडवाणी जी की जब सरकार थी, मुझे याद है, आगरा का समिट हुआ और सुषमा जी उस समिट की spokeperson थीं। उस समिट में पहली बार एक लकीर बनाई गई। यह लकीर बनाई गई कि बातचीत ठीक है, लेकिन जब तक आप terrorism का इस्तेमाल करेंगे, तब तक बात करने के लायक आप नहीं हैं। उसके बाद सन् 2004 में पाकिस्तान ने commitment दी। उसके बाद ufa तक, अभी मोदी जी के साथ जो वार्ता हुई, उसमें भी commitment आई। यह commitment आई कि हम terrorism का इस्तेमाल नहीं करेंगे। जो लकीर  आगरा में बंधी हुई थी, उस लकीर को हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने पत्थर पर लिख दिया है और यह कहा है कि, talks and terror cannot coexist. इसमें हमारे प्रधान मंत्री का ईमान साफ है। इसमें हमारे प्रधान मंत्री की ज़बान साफ़ और हमारे प्रधान मंत्री का यकीन साफ़ है। इसी बेसिस पर हम आगे बढ़ेंगे। ...(व्यवधान)

          अगर आपको अंतर समझना है तो मैं आपको एक और उदाहरण दे देता हूँ। अपको याद होगा कि Peshawar के एक आर्मी स्कूल पर हमला हुआ, बच्चे मारे गए, हमारी तरफ से क्या reaction था? हमारी तरफ से सहानुभूति, messages, प्रधान मंत्री का message, सुषमा जी के message, राष्ट्रपति जी का message, पार्लियामेंट की तरफ से message गया। लेकिन जब वानी के खिलाफ एक्शन लिया जाता है तो आप Black Day मनाते हैं और समझते हैं कि हमारे यहां हम इसको खामोशी से accept कर लेंगे? हम नहीं करेंगे। हम इसको उठाएंगे। जब नवाज़ शरीफ साहब ने शायद संयुक्त राष्ट्र में कहा था और चार पॉइंट्स हमें टॉक्स के लिए दिए थे तो सुषमा जी का जवाब brilliant और to the point था कि चार point की कोई जरूरत नहीं है, आप एक पॉइंट पर समझ जाइए, सब कुछ ठीक हो जाएगा। इसलिए हमारी अपील है कि कि इस बात को समझ लीजिए क्योंकि अब   टैररिज्म और जो उसका खेल है अगर उसका इस्तेमाल आप करते रहेंगे - हम तो उस वॉर को संभाल लेंगे, लेकिन इस वॉर का जो असर आपके ऊपर होगा, वह आप संभाल नहीं पाएंगे। आप खुदखुशी कर रहे हैं। इस बात को हम कह रहे हैं और एक अच्छे neighbour और एक भाइचारे की spirit में कह रहे हैं कि अभी भी अपनी आँखें खोल लीजिए। अभी भी एक दुनिया सामने है, हम मिल कर उस horizon तक पहुंच सकते हैं।              

          यहाँ पर उनका पूरा target जो है, वह इस तरफ है। मेरा personal यह जरूर मानना है कि पाकिस्तान में भी ऐसी ताकतें होंगी या ऐसे लोग होंगे जो इस बात को समझते होंगे, जो समझते होंगे कि terrorism का खतरा कितना बड़ा है। मेरी आशा है, मेरा यकीन है कि वैसे भी लोग वहाँ होंगे।

          यहाँ पर सुबह हमारे दोस्त ने कहा, हमारे जो परमानेंट रेप्रिजेन्टेटिव हैं यूनाइटेड नेशंस में, उनका जो स्पीच था उसको quote करते हुए उन्होंने कहा कि बहुत नरम हैं। आप वह पूरा speech पढ़िए, पूरा speech पढ़ेंगे तो उसमें लिखा हुआ है कि terrorism is a monster. वहाँ लिखा है और उन्होंने कहा है कि if there is an issue in Kashmir, it is the fact that you have occupied the Pakistan Occupied Kashmir.  That is the real issue.’  This is a statement by our permanent representative in the United Nations. वह भी जरा पढ़ लेना चाहिए, क्योंकि मैं समझता हूँ कि कम से कम इस इश्यू पर,- देखिए राजनीति है, झगड़े होते रहेंगे, आप कुछ कहेंगे, हम कुछ कहेंगे, यह चलता रहेगा, लेकिन कम से कम देश के नाम पर, कश्मीर के नाम पर तो हम एक हों। उसके नाम पर तो हम एक हो सकते हैं।

          जहाँ तक कश्मीर की जमीन की जो सच्चाई है, जो अभी हालात हैं, आप इजाजत दें तो मैं एक personal बात कर दूँ। मुझे भी जाति तौर पर कश्मीर से बहुत हमदर्दी है। मेरे वालिद, मेरे father तो बिहार से थे, लेकिन मेरी माँ कश्मीरी है या थी, अब तो गुजर गईं, अल्लाह को प्यारी हो गई। जो बच्चे हम टेलिविजन पर देख रहे हैं, वे हमारे ही बच्चे हैं, वे इस देश के बच्चे हैं, कुछ बिगड़ गए हैं, बहुतों को बहकाया गया है, बहुतों को गुमराह किया गया है। हम उनको साथ लेकर चलें, हम उनको समझाएं और आपको मैं कहता हूँ, मैं दिल से कहता हूँ कि आज के वातावरण को परमानेंट वातावरण मत समझिए, यह मौसमी हवा है, तूफान भी हो सकता है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। पूरी सच्चाई कश्मीर की कश्मीरियत में है और कश्मीर की इंसानियत में है। यह वही कश्मीर है जो हमारे साथ, एक नेशन के साथ रहा, यह उस पार्टिशन के साथ नहीं रहा। कश्मीर की रगों में, कश्मीर की philosophy में एक ऐसी इंसानियत है, उस इंसानियत का मुजाहिरा, वह इंसानियत हमें तब नजर आती है जब इस कर्फ्यू में, जब इस माहौल में एक बॉडी को शमशान ले जाया जाता है तो सारा मौहल्ला, जो मौहल्ला मुसलमानों का है, वह उठकर साथ ले जाता है। यह है सच्चाई और यह सच्चाई ही हमारी पावर है। इस सच्चाई की बनिस्बत हमने इस देश को बनाया है और यही हमारा नेशनलिजम है। मैं आपका ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहता हूँ, लेकिन जो लोग समझते हैं कि हमारे देश की unity  और integrity के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं, उनको सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ और मैं समझता हूँ कि जब मैं यह बात कहूँगा तो सारे सदन की तरफ से कहूँगा। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि वर्ष 1947 अगस्त में तिरंगा दिल्ली में लहराया था और वर्ष 1947 अक्टूबर में तिरंगा श्रीनगर में लहराया गया था। वह तिरंगा जो उठा था, वह कभी नहीं झुकेगा, कभी नहीं झुकेगा, कभी नहीं झुकेगा। धन्यवाद।

श्री जय प्रकाश नारायण यादव (बाँका) : महोदय, मुझे आपने बोलने का मौका दिया और ऐसे वक्त पर बोलने का मौका दिया जब माननीय मंत्री एम.जे.अकबर साहब ने अपनी बात को रखा है। कई बातों की चर्चा हम करेंगे। समय का अभाव तो आएगा ही। हमारा समय बचना चाहिए।...(व्यवधान)

HON. DEPUTY SPEAKER: Please sit down.

श्री जय प्रकाश नारायण यादव: मैं एक माननीय मंत्री जी को अभी सुन रहा था, बरसों से उनसे परिचय भी है और एक पत्रकार को भी सुन रहा था। पत्रकार के रूप में पूर्व की बातों पर वे शंका भी ज़ाहिर कर रहे थे, वर्तमान पर चर्चा भी कर रहे थे और भविष्य में क्या चिन्ता हो, इस पर गंभीरता से जो तथ्य आने चाहिए, उस पर थोड़ा मौन स्वीकृति दिखाई पड़ी। खैर, उसके लिए कोई बात नहीं। एक पदधारक की बात हम सुन रहे थे।

          महोदय, जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। हम अखंड हैं। दुनिया की कोई भी ताकत हमें तोड़ नहीं सकती। हम सदन के अंदर बैठे हुए हैं। पार्टियाँ अलग-अलग हो सकती हैं, विचार अलग-अलग हो सकते हैं, धाराएँ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन जब भी देश की एकता का सवाल आएगा तो विपक्ष और भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेगा और सब एक होकर साथ देने का काम करेंगे। कश्मीर की धरती जिसको स्वर्ग का टुकड़ा कहा जाता है, वही हमारा चमन है। भाषा अलग होगी, बोली अलग होगी, गोली से कश्मीर का समाधान नहीं हो सकता है और गाली से भी कश्मीर का समाधान नहीं हो सकता है। रोग गहरा होगा, इलाज सस्ता नहीं होना चाहिए। गहराई में जाना है।

          एम.जे.अकबर साहब बोल रहे थे। हमारा इनसे बहुत पुराना परिचय है। आज गाली और गोली से नहीं, समन्वय से, सहकार से, सद्भावना से, भाईचारा से, मिल्लत से काम लेना चाहिए कि जो हमारी धारा है, हम सभी एक हैं, एकता में हमारी अखंडता है। कई तरह के बाहरी आतंकवाद और भीतरी आतंक हैं।  हमको पठानकोट के समय से भी संभलना चाहिए था लेकिन नहीं संभले। जाने दीजिए। गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, माननीय प्रधान मंत्री जी, सारी शक्तियाँ सामने हैं और हर बात पर नज़र रखे हुए है, लेकिन जो घटना वहाँ घटी, मौतें हुईं, नन्हे-मुन्हे  बच्चे मारे गए, हॉस्पिटल में भाई कराह रहे हैं, बहनें कराह रही हैं, औरतें कराह रही हैं। सुरक्षा बल और सिविलियन में अंतर होना चाहिए। इसीलिए हमने कहा समन्वय, भाषा और बोली एक होनी चाहिए। लेकिन सिविलियन को अलग नहीं किया गया। जनता से संवादहीनता 15 महीने में बनी है और ज़बर्दस्त बनी है। जब से बीजेपी और पीडीपी की सरकार बनी है, समन्वय और जनता से संवाद कट गया है। एक अलग विचारधारा चल रही है। जो कश्मीर हमारा स्वर्ग है, वहाँ बंदूक चल रही है। इसलिए हमने कहा कि सद्भावना सबसे बड़ी है, मिल्लत है। ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। ’ इस सन्मति को लीजिए। ...(व्यवधान)

HON. DEPUTY SPEAKER: Now, it is 6 o’clock.  If the House agrees, we can extend the time of the House by one hour because there are 15 more Members to participate in the debate.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes. 

श्री जय प्रकाश नारायण यादव: धर्म की राजनीति नहीं, यहाँ इंसानियत की राजनीति कश्मीर में होनी चाहिए। धर्म के नाम पर बातों को बांट दिया जाता है। बोलना पड़ रहा है, बाध्य किया गया बोलने के लिए, कि कहीं हिन्दू की धारा खड़ी कर दो, कहीं मुस्लिम भाइयों की धारा खड़ा कर दो। नहीं नहीं, जो भी हिन्दुस्तान में हैं, धर्म अलग हो सकता है, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, यही हमारा चमन है, यही हमारी बगिया है, यही हमारी फुलवारी है। हम सभी एक हैं और यही हमारा है। 

18.00 hours           महोदय, जनवरी से लेकर जून तक सौ बार घुसपैठ हो चुकी हैं। युवाओं से बातचीत होनी चाहिए। अगर माथे में दर्द हुआ है तो उसका इलाज़ होना चाहिए। हिंसा खत्म करने के लिए गांधी बनना पड़ेगा, भाषा और बोली पर लगाम लगानी पड़ेगी। विवादास्पद बयान नहीं देना होगा। वहां स्कूल बंद हैं, कॉलेज बंद हैं। आप मेक-इन-इंडिया की बात करते हैं, आप जरूर कीजिए। आपको यह अच्छा लगता है, लेकिन, देश में जब कश्मीर जल रहा है, हिन्दुस्तान जल रहा है तो यह मेक-इन-इंडिया नहीं, बल्कि यह बेक-इन-इंडिया हो रहा है। इसको याद करना पड़ेगा। आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ नहीं हो रहा है। देश को आज़ाद करने में सबका खून बहा, चाहे वह हिन्दू हो, मुस्लिम हो, सिख हो, इसाई हो, सभी खून से लथपथ हुए।

          महोदय, जब दिल सीने में नहीं हो तो मुंह से निकली हुई ज़ुबान का क्या कहना, कुछ नहीं कहना है। बात तो मुंह से निकल रही है, दिल से निकलनी चाहिए। अभी जो पी.डी.पी. और बी.जे.पी. की सरकार बनी है, इसमें बंद कमरे में अमन की सांस घोंटी जा रही है। अमन की, शांति की, भाईचारे की सांस घोंटी जा रही है। इंसान खिड़कियां खोलता है तो ज़हरीले नफरत की हवा आती है। यह नफरत की हवा आई है। इसे खत्म कीजिए और कश्मीर के सवाल पर एकजुटता बनाओ, आतंकवाद मिटाओ, इंसानियत के साथ कश्मीर बचाओ, कश्मीर बनाओ। कश्मीर बचाओ क्या, कश्मीर तो हमारा अंग है। इसलिए, ‘मन की बात’ नहीं, बल्कि मन पर कैसे राज करेंगे, इसके लिए सेंटीमेंटल एप्रोच जरूरी है, तभी अमन रहेगा, शांति रहेगी, भाईचारा रहेगा।

          महोदय, अभी हम गुलमर्ग गए थे। वहां पर हम एक इफ़्तार पार्टी में गए। वहां के सैनिकों और अन्य भाइयों ने भी कहा कि हम सभी एक हैं, हम भारतीय हैं, हमें कोई अलग नहीं कर सकता है। इसलिए, हमें कश्मीर, जो हमारे कलेजे का टुकड़ा है, हमारा मुकुट है, इसको बचाने के लिए हम सभी एक हैं। हम आतंकवाद मिटाएंगे। आतंकवाद पर कोई समझौता नहीं होगा। लेकिन आपकी विचारधारा बहुत गड़बड़ और गलत है। इससे दुनिया में कोई समझौता नहीं होगा।

 

श्री भगवंत मान (संगरूर): उपाध्यक्ष महोदय, बहुत-बहुत धन्यवाद। बहुत ही गंभीर मुद्दे पर बहस चल रही है। आज कश्मीर से जो खबरें आ रही हैं, वह हर आम नागरिक को बेचैन करने वालीं और दुःखदायक हैं। हालांकि, हमारे जाबांज पुलिस और सुरक्षा बल भी हमारे भाई हैं और जो पथराव कर रहे हैं और जो लोग फायरिंग में ज़ख्मी हो रहे हैं, मारे जा रहे हैं, वे भी हमारे ही भाई हैं। दोनों तरफ से खून तो हमारा ही बह रहा है।

          इस बात पर मैं कोई राजनीति नहीं करूंगा। माननीय गृह मंत्री जी बिल्कुल मेरे सामने बैठे हैं और बड़े ध्यान से सभी के पक्ष को सुन रहे हैं। मैंने इनका बयान भी सुना था और इन्होंने कहा था कि हमने डी.आई.जी. को और सुरक्षा बल के जो ऑफिसर्स हैं, उन्हें बुलाकर कहा है कि तत्काल एक्शन लीजिए और कम से कम नुकसान होना चाहिए।

          महोदय, हम लोग कश्मीर की धरती को तो प्यार करते हैं, लेकिन उस धरती पर रहने वाले लोगों के साथ हमें बातचीत करनी चाहिए। अगर हम नवाज़ शरीफ़ के जन्मदिन पर केक काट सकते हैं तो उनके साथ भी बैठ सकते हैं। बातचीत से मसले हल हो सकते हैं। बन्दूक किसी भी मसले का हल नहीं है।

          मैं पंजाब से आता हूं। पंजाब ने इसे बहुत झेला है। पंजाब में भी बन्दूकें बहुत चली थीं, लेकिन, हल तो फिर भी बातचीत के ज़रिए ही निकला। अगर हमारे परिवार में भी किसी मेम्बर को नाराज़गी है तो वह बातचीत से ही हल होता है, लड़ाई से वह घर बर्बाद हो जाता है। अगर वह लड़ाई बाहर आती है तो जो पड़ोसी हैं, वे सिर्फ तमाशा देखते हैं। पड़ोसियों की दया पर इसे मत छोड़िए।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि नफरत की राजनीति देश में जो फैल रही है। लव जिहाद, घर वापसी, रोहित बेमुला जैसे टैंलेंटेड लड़कों को सुसाइड करने पर मजबूर किया जाता है तो अल्पसंख्यकों के मन में इनसिक्योरिटी आ जाती है, डर का माहौल पैदा हो जाता है। मैं फिर कह रहा हूं कि मैं राजनीतिक बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन अगर ऐसी बातों को पहले से ही रोक दिया जाता तो शायद आज कश्मीर के हालात यहां तक न पहुंचते।

          मैं आपके जरिए सदन में यह बात रखना चाहता हूं कि आम आदमी पार्टी धर्म-निरपेक्ष पार्टी है, सेक्युलर पार्टी है। हम नहीं चाहते कि देश के टुकड़े हों, हम नहीं चाहते कि कश्मीर जैसे हालात पैदा हों, जहां लोगों को इतना आक्रोश में आना पड़ा है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी की सरकार वहां पर है। मुझे लग रहा है कि ये शायद नंबरिंग के गेम में न फंस जाएं कि हमारी इतनी स्टेट्स में सरकार है, उसूलों और सिद्धांतों पर भी कायम रहें। यह हमारी चुनी हुई सरकार है, देश के मतदाताओं ने चुनी है, हम सत्कार करते हैं। मैं एक शेर बोलकर अपनी जगह लूंगा -

"लंबे सफर को मीलों में मत बांटिए,                                   कौम को कबीलों में मत बांटिए,                                   एक बहता दरिया है मेरा भारतवर्ष,                                   इसको नदियों और झीलों में मत बांटिए। "

          बहुत-बहुत शुक्रिया।

                                                                                                           

डॉ. अरुण कुमार (जहानाबाद) : उपाध्यक्ष महोदय, नियम 193 के तहत एक अति संवेदनशील और गंभीर मसले पर आज हम यहां चर्चा कर रहे हैं। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। कश्मीर में सत्तर वर्षों में आजादी के बाद जिस तरह का घटनाक्रम हुआ है, हम यह कह सकते हैं कि अभी जो माननीय मंत्री जी, एम.जे.अकबर साहब बोल रहे थे, शत-प्रतिशत सही है कि हमने कश्मीर को कोई इल्लीगल तरीके से ऑक्यूपाई नहीं किया है। जो इल्लीगल तरीके से ऑक्यूपाई कर रहे हैं, जो ऑक्यूपाइड कश्मीर है पाकिस्तान के तहत, उसकी जो हालत है, इस बात से कश्मीर के लोगों को अवगत कराना चाहिए। चूंकि हमारे पुरखों ने जो इतिहास बनाया है, जो संस्कृति बनाई है, जो विरासत में चीजों को दिया है, वह नई पीढ़ी को समझने के लिए काफी है।

          महोदय, जब हम अमरनाथ की यात्रा और छड़ी मुबारक दोनों को देखते हैं तो यह तस्वीर साफ झलकती है कि विश्व मानवता का सबसे बड़ा विचारों का संवाहक भारत है और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, उस संस्कृति की विरासत का एक अंग है। हम किसी भी कीमत पर अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को खण्डित नहीं होने देंगे, यह तय है।

          कुछ साथी जब बोलते हैं तो सेक्युलरिज्म शब्द उनके माथे पर चस्पा होता है। सेक्युलरिज्म मानवीय गुणों से जुड़ा हुआ है। सेक्युलरिज्म हमारी विरासत में है। जब साथी बोल रहे थे, मैं उनका नाम नहीं लूंगा तो भारत माता की जय कहने पर या जय हिन्द कहने में कोई फर्क नहीं है और किसी को फोर्स नहीं करना चाहिए, लेकिन एक ही साथ उनको यह भी कहना चाहिए कि भारत के किसी भी हिस्से में पाकिस्तान जिन्दाबाद नहीं चलेगा। यदि ये दोनों बातें एक साथ कहेंगे तो निश्चित तौर से एक सकारात्मक भाव का बोध यहां की आवाम में जाएगा। आज वानी के दो स्वरूप हमारे सामने आए हैं, एक शहीद कह रहे हैं और दूसरा आतंकवादी कह रहे हैं।     लेकिन हमारे यहां भी शहीद का दर्जा देने का पूरा प्रयास हो रहा है और हम कह रहे हैं कि फौज के लोग काफी संयम से कार्य कर रहे हैं। आपने देखा चाहे अटल जी की सरकार हो, चाहे नरेन्द्र मोदी जी की सरकार हो, हमने हर समय दुनिया के लोगों को यह बताने का काम किया कि पाकिस्तान पड़ोसी देश है, हम इसके अस्तित्व की रक्षा करना चाहते हैं, लेकिन अपने अस्तित्व की कीमत पर नहीं। हमने हमेशा यह प्रयास किया है। हमारे सैनिकों ने इसके लिए बड़ी कुर्बानी दी है।

          जब कश्मीर में बाढ़ आई, इतनी विभीषिका हुई, उस समय भी कुछ आतंकवादी हमारे सैनिकों पर पत्थर बरसा रहे थे, लेकिन अपनी जान जोखिम में डालकर भी उन्होंने भारत के लोगों की रक्षा की। मैं कहना चाहूंगा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, मूल्य के लिए पीछे के वर्षों में जो राजनीतिक वातावरण पैदा करना चाहिए, उसमें त्रुटि हुई है। जब चर्चा करने की बात आती है तो साथियों को, नई पीढ़ी को बताना चाहिए कि ब्रिगेडियर उस्मान ने इस देश के लिए क्या दिया, अब्दुल हमीद ने इस देश के लिए क्या दिया, शैतान सिंह ने इस देश के लिए क्या दिया।...(व्यवधान)

          आज जब माननीय सदस्य तथागत साहब चर्चा कर रहे थे, आजादी के बाद पहली बार भारत सरकार ने उड़ान के तहत वहां के युवकों को प्रशिक्षित करके मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया। इसकी एक्रॉस दी पार्टी लाइन चर्चा होनी चाहिए, ताकि यह संदेश जाए कि यह सरकार और इस देश की जनता कश्मीर की भटकी हुई युवा शक्तियों को मुख्य धारा में लाना चाहते हैं। आजादी के काफी सालों बाद भी चाहे कश्मीर हो, चाहे नार्थ ईस्ट हो, विकास में पिछड़े रहे हैं। हम सिर्फ राजनीति करते रहे हैं, नारे लगाते रहे हैं, लेकिन चाहे अटल जी की सरकार हो या नरेन्द्र मोदी जी की सरकार हो, कश्मीर में विकास का जो पैमाना तय हुआ है, हमें उसमें झांकना चाहिए। सरकार ने नार्थ ईस्ट के लिए जो संकल्प लिया है, जो नक्शे बने हैं, हम निश्चित तौर से विकास के इस आयाम को मजबूत करके उन्हें मुख्य धारा में लाना चाहते हैं। नार्थ ईस्ट या कश्मीर की स्थिति इतनी बिगाड़ी गई है कि हम सिर्फ रूलिंग स्टेट के रूप में काम करते रहे हैं। उनमें एलियन फीलिंग हुई है। उसकी भरपाई का संकल्प इस सरकार ने लिया है। ऐसे सवालों के लिए पार्टी की सीमा से ऊपर उठकर हमें उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए, राष्ट्र को अखंड बनाए रखने के लिए इस भाव से अपने विचार रखने चाहिए।

          आज हम दो लाख लोगों की चर्चा कर रहे हैं। हमें यह भी सोचना चाहिए कि उन दो लाख लोगों में बहुत से लोग डर से भी गए हैं, जो आतंकवादियों से डरते हैं, अपनी रक्षा की दृष्टि से गए हैं। इसलिए ऐसे लोगों को महिमामंडित नहीं करना चाहिए। माननीय गृह मंत्री जी को भी जानकारी होगी कि पटना में इंजीनियरिंग कॉलेज से गांधी मैदान तक तीन घंटे तक पाकिस्तान जिन्दाबाद का नारा लगा और ग्लैमराइज़ किया गया।...(व्यवधान) निश्चित तौर से जब देश के अन्य हिस्सों में ये चर्चाएं होंगी और अति प्रगतिशीलता में...(व्यवधान) आप इसे खंडित करेंगे, मैं हवा में कोई बात नहीं करता। मैं उस दिन पटना में था। जयप्रकाश जी, मैं दिमाग खोलकर कह रहा हूं। इसे पूरा देश जान रहा है, डीजीपी ने बाद में एक्सेपट किया, लेकिन ये नहीं मान रहे हैं। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि हमारे राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत है, कम्पोजिट कल्चर है, हमने ऐसी नकारात्मक शक्तियों को एक तरफ वैचारिक रूप से और दूसरी तरफ पाठय़क्रमों में अब्दुल हमीद और ब्रिगेडियर उस्मान जैसे लोगों का जीवन चरित्र बच्चों के बीच ले जाने का प्रयास किया है, यह सराहनीय कदम है। इस तरह के अन्य स्रोतों पर काम करने की जरूरत है। मुझे समय देने के लिए आपका धन्यवाद।

 

श्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग (बारामुल्ला) : माननीय डिप्टी स्पीकर साहब, मुझे उम्मीद थी, चूंकि मैं कश्मीर से आता हूं और कश्मीर का वाहिद नुमाइंदा हूं जो इस समय हाऊस में हूं और भारतीय शहरी होने के अलावा एक कश्मीरी बाशिंदा होने की हैसियत से मुझे पहले मौका मिलेगा। मैं जो गुजारिशत करने वाला था, मैं चाहता था कि उस पर रिएक्शन हो और उसकी ताईद की जाए और जहां हमारी गलती हो, वहां दुरूस्ती की जाए। बहरहाल, देर आए दुरुस्त आए।

          मैं जो कुछ कहना चाहता था वह एम.जे.अकबर साहब कह चुके हैं। एम.जे.अकबर साहब को आपने 25 मिनट का वक्त दिया, क्योंकि उनकी मां कश्मीरी है, लेकिन मेरा तो बाप भी कश्मीरी है, इसलिए कम से कम डबल वक्त न दे तो कम से कम कुछ वक्त तो दीजिए। इस वक्त का जो मौजूं-ए-बहस है, मौजूदा समय में जो वाकया कश्मीर में हुआ और इस वक्त जो वहां सूरतेहाल है उस पर बहस की जाए। जैसा अकबर साहब ने कहा कि इस वाकये को समझने के लिए हमें अपनी तवारीख को समझना होगा। Those who do not remember their history are condemned to live it again.  हमारी हिस्ट्री दुख और दर्द की लंबी दास्तान है। वर्ष 1948 में अगर मुल्क का बंटावारा न किया गया होता, कुछ छोटे दिल वाले लोगों ने और छोटे जेहन वाले लोगों ने मजहब के नाम पर इस मुल्क को तकसीम न किया होता तो कश्मीर का मसला भी पैदा नहीं हुआ होता, लेकिन जो हो गया सो हो गया। हमारे लीडरों ने बार-बार कहा है, खासकर जब वाजपेयी साहब पाकिस्तान गए थे तो उन्होंने मीनारे-पाकिस्तान लाहौर में जाकर कहा कि पाकिस्तान के वजूद को हम तस्लीम करते हैं, यह पहली बार किसी प्राइम मिनिस्टर ने इखलाखी जुर्रत का सबूत दिया कि वह पार्टिशन के बाद पाकिस्तान की धरती पर पाकिस्तान के लोगों के दिल को जीतने के लिए ये कहा कि हम पाकिस्तान के वजूद को तस्लीम करते हैं और हम भाइयों की तरह रहना चाहते हैं। बदकिस्मती से कुछ दिनों के बाद कारगिल का युद्ध हुआ। हम इसकी निशानदेही इसलिए  नहीं करते कि हम पाकिस्तान के मुंह पर कालिख लगाना चाहते हैं सारी दुनिया इस तारीख को जानती है। प्राइम मिनिस्टर साहब ने जो फार्मूला बताया है कि किस तरह से इस मसले को डील किया जाए, उसी पर मैं जोर दूंगा। हम भी कहते हैं कि बातचीत हो, लेकिन बदकिस्मती से जब भी यहां से दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया वहां से दुश्मनी की कैंची ने उसे काट दिया और यह पहली बार नहीं हुआ है। यह गलती कहां से शुरू हुई बदकिस्मती से तारीख में इस पर बंटी हुई राय है, बहुत सारे हिस्टोरियन की राय इस पर बंटी हुई है कुछ कहते हैं कि महाराजा हरि सिंह ने जब इलहाक कर लिया था और पाकिस्तान ने अपने ट्राइबल्स के जरिए कश्मीर पर हमला किया था तो शायद उस वक्त हमारी फौज को खुला हाथ देना चाहिए था।   

           डिप्टी स्पीकर साहब, हमारी फौज ने कुछ दिनों में सारे कश्मीर को मुक्त कर दिया और आजाद कर लिया था। तारीख है और कई लोग कहते हैं कि उस समय की फोर्स के मेजर जनरल साहब ने कहा था कि हमें कुछ दिन और दीजिए, हम उस सारे इलाके को भी वापस हासिल कर लेंगे। उन्हें इज़ाज़त नहीं मिली और हम युनाइटेड नेशन्स चले गए और कहा कि सीज़ फायर हो। कुछ हिस्टोरियन यह कहते हैं कि यह गलती थी। कुछ कहते हैं कि प्राइम मिनिस्टर पं. जवाहर लाल नेहरू एक इंटरनैशनल स्टेट्समैन थे और उन्हें डर था कि कहीं हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के दरम्यान जंग न हो जाए, इसलिए उन्होंने सीज़ फायर कराया। लेकिन सीज़ फायर का क्या नतीजा निकला, जम्मू-कश्मीर की रियासत जो 84 हजार मुरब्बा मील है, इसमें सिर्फ 42 हजार, यानी 50 परसेंट भारत के साथ है और बाकी जो हमारी 50 परसेंट जो सरज़मीं है, उसमें से 30 हजार या 32 हजार मुरब्बा मील पाकिस्तान के पास है और 10 हजार या 12 हजार मुरब्बा मील जमीन चायना के पास है। इसलिए जैसा श्री मुलायम सिंह यादव जी ने यहां चायना के बारे कहा तो मुझे ताज़्ज़ुब नहीं हुआ। अगर हकीकत देखी जाए, तो चायना को उस हिन्दुस्तान की सरज़मीं में स्ट्रेटैजिक एडवांटेज है, इसलिए वह उसे अपने हाथ से जाने नहीं देगा। इसीलिए पाकिस्तान के साथ उनकी दोस्ती का जो हाथ बढ़ा है, उसके पीछे वह भी एक बहुत बड़ी ख्वाहिश है कि हिन्दुस्तान की वह सरजमीं उनके कब्जे में रहे। बहरहाल जो हुआ, सो हुआ। सीज़ फायर हो गया, लेकिन पाकिस्तान को कश्मीर में खेल खेलने का मौका किसने दिया।

          डिप्टी स्पीकर साहब, चूंकि कश्मीर में अक्लीयत मुसलमानों की थी इसलिए पाकिस्तान सोचता था कि उसे मज़हब के नाम पर वह इसे अपने साथ जोड़ लेगा, लेकिन इसके लिए मौका किसने दिया। सबसे पहले जो वहां पर हुक्मरान बने और जो कश्मीर के वाकई सबसे बड़े लीडर थे, लेकिन बगैर इलेक्शन के जो वहां प्राइम मिनिस्टर बने, वे शेख अब्दुल्ला साहब थे। जम्हूरी तरीके से इलेक्शन के द्वारा उन्हें चुनने का मौका वहां के लोगों को नहीं दिया गया। पहली कांस्टीटय़ूएंट असेंबली बनी, तो कश्मीर में एक शख्स को भी फॉर्म भरने की इज़ाज़त नहीं दी गई। जम्मू में 15 लोगों ने फॉर्म भरे, जिनमें से 14 रिजैक्ट कर दिए गए। वहां प्रजा परिषद् ने 15 फॉर्म भरे। उनमें से 14 रिजैक्ट कर दिए गए। दूसरे दिन प्रजा परिषद् को और सीटों के लिए फॉर्म भरने थे, लेकिन उन्होंने बॉयकाट किया। पहली असेम्बली, जो कश्मीर में बनी, वही लोगों की मर्जी के बगैर बनी और इलेक्शन के बगैर बनी। वहां से यह सिलसिला शुरू हुआ।

          डिप्टी स्पीकर साहब, बहरहाल जो हुआ, सो हुआ। शेख साहब ने अच्छा काम किया और वर्ष 1952 तक वे डटे रहे और कहते रहे कि हम हिन्दुस्तान का हिस्सा हैं। उस समय नारा था- ‘शेख साहब का क्या इरशाद, हिन्दू मुस्लिम सिख इत्तेहाद’, हिन्दू मुस्लिम सिख ईथाद, लेकिन फिर वर्ष 1953 में क्या हुआ। शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया, बख्शी गुलाम मोहम्मद को बैठाया गया। बख्शी गुलाम मोहम्मद ने भी जो इलेक्शन लड़े, वे नाम के इलेक्शन थे, काम के इलेक्शन नहीं थे, कोई फ्री इलेक्शन नहीं हुआ। कश्मीर में जम्हूरियत को पनपने का मौका नहीं दिया गया। फिर जब बख्शी गुलाम मोहम्मद, They say that he grew out of his size. जब वे कश्मीर के बारे में कुछ एसर्ट करने लगे, तो बख्शी गुलाम मोहम्मद को उतार दिया गया और उनसे यहां दिल्ली में सिगरेट की डिब्बी पर इस्तीफा ले लिया गया और फिर गुलाम मोहम्मद सादिक को बैठा दिया गया। जब गुलाम मोहम्मद सादिक कांस्टीटय़ूशन के बारे में कुछ कहने लगे कि कश्मीर से कांस्टीटय़ूशन रिलेशनशिप कैसी होनी चाहिए, तो उनके खिलाफ कांग्रेस में बगावत खड़ी कर दी गई और मीर कासिम को बैठाया गया। जब मीर कासिम वहां अपनी अथॉरिटी असर्ट करने लगे, तो शेख साहब को जेल से छोड़ कर एक बार फिर कश्मीर का चीफ मिनिस्टर बगैर किसी इलेक्शन के बनाया गया। उनका एक भी मैम्बर असेम्बली में नहीं था, लेकिन उन्हें दुबारा चीफ मिनिस्टर बना दिया गया। यह कौन सी जम्हूरियत थी। बहरहाल आपने बनाया, सो बनाया। दो साल के बाद कांग्रेस ने अपना सपोर्ट विथड्रा कर लिया और उनकी सरकार गिरा दी गई।

          सन् 1984 में इलैक्शन हुआ, जैसा हुआ वैसा हुआ, इलैक्शन तो हुआ, उसी हुकूमत को आपने चंद महीने में गिराया गया*और दूसरी हुकूमत लायी गई। फिर उस हुकूमत को ... * के लिए मंत्रियों को कश्मीर में ...* ताकि यहां ऐसा ... * कि उस चीफ मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़े, फिर उसको उतारा। इसके बाद जिसे कहते हैं... *दो पार्टियों ने मिलकर 1987 में जो इलैक्शन किया, उस वक्त तमाम लोग, जो हिंदुस्तान के खिलाफ थे और हिंदुस्तान के आईन को माना, वे सब इकट्ठे हो गए और कहा कि हम हिंदुस्तान के आईन के तहत इलैक्शन लड़ेंगे और अपना हक मांगेंगे। तमाम जमातें इकट्ठी हो गईं, उन्होंने इलैक्शन लड़ा, आपने क्या किया? आठ दिन तक आपने रिजल्ट का ऐलान... *  नहीं किया और फिर चुनकर दो या तीन लोगों को जीतने दिया, बाकी सब लोगों को ... *  हरा दिया। पाकिस्तान में हिजबुल मुजाहिदीन का जो आज सबसे बड़ा जो लीडर, युसूफ शाह है, वह उस्ताद था, उसने इस्तीफा दिया और इंडियन कांस्टीटय़ूशन के अंदर इलैक्शन लड़ा, वह जीत गया। उसके मुकाबले में मुही उद्दीन शाह हार गए, वे वकील थे। ...*   डेढ़ घंटे बाद ऐलान  हुआ कि मुही उद्दीन शाह जीत गए और युसूफ शाह हार गए। यासीन मलिक जो इतने बड़े लीडर अपने आपको मानते हैं, वे उसके इलैक्शन एजेंट थे। शाम होने तक युसूफ शाह और उनकी बीवी यासीन मलिक और यासीन मलिक की बहन को एक थाने में गिरफ्तार कर दिया गया। इंडिया टुडे पढ़िए, इंडिया टुडे में इंद्रजीत बधवार ने उनका इंटरव्यू उसी जमाने में छापा, जब यासीन मलिक से पूछा गया कि आपके साथ क्या सलूक किया गया? उन्होंने कहा कि मैं बता नहीं सकता, सिर्फ इतना कहा कि उन्होंने मुझसे पूछा कि “क्या तुम यूसुफ शाह के एजेंट थे, उन्होंने कहा कि हां, मैं एजेंट था।” कहा गया - ... *  इंद्रजीत ने उससे कहा कि अब तुम क्या करोगे? कहा- अब मैं पाकिस्तान जाने की कोशिश करूंगा और वहां से बंदूक लाऊंगा।...* These Kashmiris were pro-Indians and they were not pro-Pakistanis.

          उनके हाथ में बंदूक देने वाले कौन हैं? हम हैं। हम हैं। मैं समझता हूं कि... * हम ही जिम्मेदार हैं, बावजूद इसके कि वे हमारे सबसे बड़े लीडर थे, उन्होंने जम्हूर्रियत के बगैर कुर्सी संभाली। .... * जिन्होंने इलैक्शन में चोरी की...*, वही जिम्मेदार थे, जिस समय इलैक्शन की चोरी हुई। 1987 में हिंदुस्तान के सब दुश्मन इकट्ठे होकर इलैक्शन लड़ना चाहते थे, जिन्होंने उन लोगों की जुबान बंद की।  वो लोग जिम्मेदार थे, आज बीजेपी पर उंगली उठाई जा रही है, आज कहा जा रहा है कि यह झगड़ा क्यों हुआ? कश्मीर में झगड़ा क्यों हुआ?...(व्यवधान) आज कहा जा रहा है कि सफेद कमीज पर काला कपड़ा लग गया।...(व्यवधान)

SHRI K.C. VENUGOPAL (ALAPPUZHA): Sir, where is this discussion going on? … (Interruptions) Sir, he is going through the past. … (Interruptions) He is mentioning the historical things. … (Interruptions) How can it be allowed? … (Interruptions) Is this how we want the country united? … (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: No, I know that.

… (Interruptions)

श्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग: हमें बोलने दीजिए, आप बाद में बोलिए।...(व्यवधान) हम जख्मी हैं, हमारे दिल रो रहे हैं।...(व्यवधान) हमें मेहरबानी करके बोलने दीजिए।...(व्यवधान) कश्मीर की आवाज को दबाने की कोशिश की गई है।...(व्यवधान) हमारी आवाज को न दबाइए।...(व्यवधान)

SHRI K.C. VENUGOPAL : What is going on here? … (Interruptions) He is playing petty politics. … (Interruptions) This is an important discussion. … (Interruptions) Initially, it was mentioned that there is no Opposition and no Government in this discussion and that we will have a unanimous discussion. … (Interruptions) What is happening here? … (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: If there is anything unparliamentary, then you tell me. Otherwise, I will give time to you later on.

… (Interruptions)

SHRI K.C. VENUGOPAL: Sir, you should control it. … (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: After the speech you can raise it.

… (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: No, allow him to speak. Let him finish his speech, and then you can reply.

… (Interruptions)

SHRI K.C. VENUGOPAL: Sir, I am inviting your attention. … (Interruptions) This is not fair. … (Interruptions) This is not a fruitful discussion. … (Interruptions) This discussion is going in another way. … (Interruptions)

HON. DEPUTY SPEAKER: I will allow you to speak if you have any objection.

… (Interruptions)

SHRI K.C. VENUGOPAL: Sir, give me a chance. … (Interruptions)

श्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग: डिप्टी स्पीकर साहब, अगर यह मुझे बोलना नहीं देना चाहते, तो मैं खामोश हो जाऊंगा ।...(व्यवधान) हमारी यही शिकायत है कि आप लोगों ने हमारी आवाज को .. ...(व्यवधान).*  आपने इलैक्शन के नाम पर ... * किया। ...(व्यवधान) हमारी यही तो शिकायत है। हमने इसलिए बी.जे.पी. के साथ हाथ मिलाया है। ...(व्यवधान)

HON. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Baig, when you are speaking, I would request you not to refer to a member who is not here, though he might have said something at that time. … (Interruptions)

SHRI MUZAFFAR HUSSAIN BAIG : Sir, they are all historical figures and I can talk about those people.  वे सब हिस्टोरिकल फीगर्स थे। वर्ष 1984 में कौन था, वर्ष 1987 में कौन था, मैंने उनका नाम नहीं लिया, क्योंकि वे जिंदा हैं। ...(व्यवधान) वर्ष 1984 और 1987 में जिसने राज किया, वे जिंदा हैं, but I can talk about those historical figures. I know my rules very well. हमने बी.जे.पी. के साथ इसलिए हाथ मिलाया, क्योंकि बी.जे.पी. को हिन्दुस्तान के लोगों ने चुना था। ...(व्यवधान)

HON. DEPUTY-SPEAKER: If there is anything objectionable, I will go through the records.

श्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग: हमने बी.जे.पी. के साथ हाथ नहीं मिलाया, बल्कि हमने हिन्दुस्तान की 126 करोड़ लोगों की नुमाइंदा ज़मात के साथ हाथ मिलाया। ...(व्यवधान) हमने एक ऐसी ज़मात के साथ हाथ मिलाया, जिनके बारे में हमें यकीन है कि इनके पास इख़लाती जुर्ररत है। Nobody can accuse them of being ... *if they settle the Kashmir problem through a process of dialogue. इनके माथे पर वह दाग कभी नहीं लग सकता कि ये ... **हैं। हम लोगों को कहा जा रहा है कि सफेद कपड़े पर काला कपड़ा लगा दिया। क्या यह आपकी ज़म्हूरियत है, यह आपकी डेमोक्रेसी है? आप पावर से कुछ देर बाहर रहना बर्दाश्त नहीं कर सकते। आपको फिर मौका मिलेगा। ...(व्यवधान) लेकिन जब हम यह बात कहते हैं, उस वक्त हमें दुख के साथ एक और बात कहनी पड़ती है। मुझे मालूम नहीं है कि कांग्रेस मुक्त किया है ऐसा कुछ कहते हैं। यह मैंने सुना नहीं है लेकिन मैंने टेलीविजन पर सुना है। एक बहुत बड़ी महापुरुष शख्सियत ने कहा कि हिन्दुस्तान को अब हमने मुस्लिम मुक्त करना है। ...(व्यवधान) मैं उनका नाम नहीं लूंगा। ...(व्यवधान) वे मज़हबी लीडर हैं, एक धार्मिक लीडर हैं। ...(व्यवधान) वे जिंदा हैं, इसलिए मैं उनका नाम नहीं ले सकता। गवर्नमैंट ऑफ इंडिया खुद जान सकती है, तहकीकात कर सकती है। ...(व्यवधान) मैं दावे के साथ कहता हूं कि इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमान यहां बाबर के जरिये हमला करके आये, लेकिनtoday, I am as good an Indian as our Prime Minister. A Kashmiri is as good an Indian, and a Muslim is as good an Indian as Rajnath Singh Ji.

          हम फ़Lा से कहते हैं कि हम दुनिया की लार्जेस्ट डैमोक्रेसी है। ...(व्यवधान) हमें वे तमाम हक हासिल हैं। मुझे जो बोलने का हक है, वह भी उसी कांस्टीटय़ूशन से मिला है। फिर कुछ लोग अपने आपको सेक्युलरिज्म का ठेकेदार समझते हैं। इस हाउस में जितने भी सदस्य बैठे हैं, क्या हमने कांस्टीटय़ूशन ऑफ इंडिया की ओथ नहीं ली? क्या हमने कांस्टीटय़ूशन ऑफ इंडिया का प्रिएम्बल नहीं पढ़ा? प्रिएम्बल में लिखा है कि--“This shall be a secular democracy”. ये भी वही ओथ लेते हैं और हम भी वही ओथ लेते हैं। कुछ सेक्युलर हो जाते हैं और कुछ कम्युनल हो जाते हैं। जिन्होंने देश के बंटवारे को मज़हब के नाम पर कबूल किया, वे ...*हैं और जिन्होंने उस वक्त मुखालफत की, वे... * हैं। ...(व्यवधान) हमें अपने दामन में झांकना चाहिए। ...(व्यवधान)

SHRI ADHIR RANJAN CHOWDHURY (BAHARAMPUR): Sir, this is highly objectionable. … (Interruptions)

SHRI K.C. VENUGOPAL: Sir, I am raising a point of order.

HON. DEPUTY-SPEAKER: What is the point?

SHRI K.C. VENUGOPAL : Mr. Deputy-Speaker, Sir, from the afternoon onwards, we are discussing the very unfortunate incident which has taken place in Kashmir, which is a part and parcel of our nation. Both from this side and that side, there is unanimity that a feeling that our country is united should go outside. Unfortunately, in the speech which is being given here, what the hon. Member is saying is that the entire responsibility for what is happening in Kashmir lies on a person who is not alive today. That is unparliamentary. Now, he is saying that the entire political responsibility is to be given to his opponent political party. He is playing bad politics in such a very important discussion.

HON. DEPUTY-SPEAKER: That is not correct. Whatever is the issue… SHRI K.C. VENUGOPAL: This is not correct. This should not go on record. … (Interruptions)

I would request the Home Minister that a unanimous message should go to the country. … (Interruptions)

SHRI MUZAFFAR HUSSAIN BAIG: It hurts badly.

          मेरे भाई, आपने जो जख्म हमें दिए हैं, अगर मैं उन जख्मों को कुरेदूं तो आप क्या हमें उसकी इजाजत भी नहीं देंगे? आपने हमें जो जख्म दिए हैं, क्या हम उनको कुरेद भी नहीं सकते?...(व्यवधान)

HON. DEPUTY SPEAKER: Shri Venugopal, you have already objected to it.

… (Interruptions)

SHRI K.C. VENUGOPAL : Do not celebrate it. This will not help. … (Interruptions) It is very bad politics. … (Interruptions)

श्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग:  डिप्टी स्पीकर साहब, मैं यह इश्यू नहीं उठाता, लेकिन इनके मेंबर ने, इनकी पार्टी के सिन्धिया साहब ने कहा किमुज़फ्फ़र बेग ने कहा कि कश्मीर में जो बर्बादी हो रही है, वह बीजेपी और पीडीपी के गठजोड़ ने की है। काश, वह उस अखबार का नाम लेते, जहां मेरा बयान आया है तो मैं अपने आपको डिफेन्ड करता और उन पर डिफेमेशन का सूट फाइल करता।

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF AGRICULTURE AND FARMERS WELFARE AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI S.S. AHLUWALIA): We are discussing Kashmir and a sole representative of Kashmir is here. If he is narrating about the difficulties of Kashmiris, we must hear it. … (Interruptions)

SHRI K.C. VENUGOPAL: He is misleading the history. … (Interruptions)

SHRI S.S. AHLUWALIA: If we do not allow him to speak in the tallest temple of democracy, where is he going to speak? He is going to speak here only. … (Interruptions)

श्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग: डिप्टी स्पीकर साहब, "हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वे कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती। "...(व्यवधान) ये हम पर इल्जाम लगाते हैं, ये कश्मीर के मुसलमानों की नजरों में हमें ज़लील करना चाहते हैं कि बीजेपी के साथ हम मिले, इसलिए यह सब कुछ हुआ। ...(व्यवधान) इसीलिए मुझे तारीख में जाना पड़ा कि  इस फ़साद के बीज आपने बोए हैं और हमें इसका बोझ उठाना पड़ा।...(व्यवधान) आपका बोझ हम कन्धे पर उठाकर चल रहे हैं।...(व्यवधान)तारिक जी, हो गया, आपकी बात रजिस्टर हो गयी।...(व्यवधान) लेकिन अब यह जो वाकया हुआ, इस वाकये के बारे में मैंने ईमानदारी से बात की है। मैंने यह कहा है कि हुकूमते हिन्द को यह तहकीकात करनी चाहिए कि क्या उसको गिरफ्तार करना मुमकिन था या नामुमकिन था? अगर उसे गिरफ्तार करना नामुमकिन था तो ठीक हुआ, लेकिन अगर उसे गिरफ्तार कर सकते थे, तो फिर इंडिया को अपनी मॉरल अथॉरिटी इस्तेमाल करनी थी। कश्मीर की तारीख में बहुत खतरनाक मिलिटेंट्स रहे हैं। एक यूसुफ़ शाह थे, जो उस वक्त हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर थे। इंडिया की मॉरल अथॉरिटी थी, उसके साथ बात की, उसने इलेक्शन लड़ा और इलेक्शन जीता। बांदीपोरा में हिजबुल मुजाहिदीन के एक बहुत बड़े कमांडर थे, वह जिन्दा हैं, इसलिए मैं उनका नाम नहीं लूंगा, कई बार उनका एनकाउंटर हुआ। आखिरकार बातचीत हुई, उसने सरेंडर किया, इलेक्शन लड़ा और आज वह असेंबली का मेंबर है। किश्तवाड़, जम्मू के एक बहुत बड़े कमांडर थे, 1991 के रियल कमांडर थे, कोई पोस्टर ब्वाय नहीं थे, उसके साथ बातचीत हुई और वह लेजिस्लेटिव काउंसिल का मेंबर बना।...(व्यवधान) हमारी जमात में एक शख्स आया। हिजबुल मुजाहिदीन के बाद दूसरी एक बड़ी खतरनाक जमात उस वक्त वहां थी, वह उसका कमांडर था। एनकाउंटर हुआ, दो दिन आर्मी के साथ एनकाउंटर चला, आर्मी ने उस पर गोली नहीं चलाई। जब उसकी गोलियां खत्म हो गयीं, उसको गिरफ्तार किया, उसकी काउंसलिंग की। फिर उसने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के साथ बातचीत करने का ऑफर दिया। उस वक्त राव साहब के जमाने में जो पांच टॉप मिलिटेंट कमांडर्स थे, वे आए, उन्होंने बातचीत के लिए अपने आपको पेश किया। उन्होंने अपनी जिन्दगी के साथ खेला, बाद में, उनमें से एक हमारी पार्टी का जनरल सेक्रेटरी बना, बदकिस्मती से वह इलेक्शन के दौरान मर गया।

I, therefore, would say that if India has an option to use its moral authority to persuade people to surrender and talk, that is better than having to use its military authority.  पिछले साल दो मिलिटेंट्स के साथ हुई मुठभेड़ में हमारी फौजें थीं, 36 घंटे तक उन्होंने कोई किलिंग नहीं की। गोलियां चलाईं लेकिन किसी को मारा नहीं। फिर हमारे सिपाही ज़ख्मी हो गये। आखिर ये फौज वाले हैं, इनकी भी मां है, बहन-बेटियां है, जब मैं दुख के आंसू रोता हूं तो मैं उन सब लोगों के लिए रोता हूं जिनके बेटे मारे गये, चाहे वे उड़ीसा से थे या बारामूला से थे। 36 घंटे के बाद फिर मजबूरन उनको वह मकान ब्लास्ट करना पड़ा। इसलिए मैं यह कहता हूं कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया हमारे लिए नहीं, पब्लिक के लिए नहीं, अपने दुश्मनों को सबक मुहैया करने के लिए नहीं, लेकिन अपने जजमेंट के लिए, फ्यूचर की गाइडलाइन्स के लिए खुद तहकीकात करे was it possible to arrest him or was it inevitable to kill him? क्यों? क्योंकि यह वक्त मेरी नज़र में मुनासिब नहीं था। मैं गलत भी हो सकता हूं।

          अभी महबूबा जी ने बीजेपी के साथ अपने नाम पर इलेक्शन लड़ा और वह पहले से ज्यादा वोट लेकर जीतीं।...(व्यवधान) वहां गुड फीलिंग थीं। इस वक्त यात्री आ रहे थे। पंडितों के वापस आने की बातचीत चल रही थी। इस वक्त टूरिज्म पीक सीजन पर था। मेरी नज़र में जो बुरहान वानी था, मैंने कई  बयान, अखबारों में पढ़े हैं, जहां पुलिस ऑफिसर्स ने बयान दिया है, he is a poster boy, he is on the radar, we know his every movement.  यहां तक कि सोशल मीडिया में उस लड़के ने कुछ दिन पहले क्रिकेट मैच खेला और वह भी उसने सोशल मीडिया पर डाल दिया। He was not an invisible ghost. He was not Osama Bin Laden. Our police could have arrested him any time.   ...(व्यवधान) अगर यह सच है, जो मैं कहता हूं और सही है तो फिर यह टाइमिंग गलत थी और इसीलिए मैं चाहता हूं कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया अपनी तसल्ली के लिए देखे कि क्या यह सही था या गलत? उस एक के मर जाने पर उसके मां-बाप आंसुंओं से रोएंगे। उनके मां-बाप के साथ हमारी हमदर्दी है। उनका कोई कसूर नहीं। उन्होंने तो बड़ी उम्मीदों के साथ उसे पाला था कि यह अच्छा शहरी बनेगा, बुढ़ापे में उनके काम आएगा, कोई रोजी-रोटी कमाएगा। आखिर उनकी परमिशन लेकर, उनसे सर्टिफिकेट लेकर कोई थोड़े उसने बंदूक उठाई थी। यह एक आतंक का माहौल बन गया है, यह एक कारोबार जैसा बन गया है, जैसे कि एक माननीय सदस्य ने कहा, terrorism has become a business. अफगानिस्तान के अफीम से लेकर साउथ-कश्मीर की चरस तक एक बिजनैस बन चुका है और इस बिजनैस का शिकार कई हो गये। कई ग्लैमर का शिकार हो गये। मैं उनके लिए नहीं रोता हूं, लेकिन मुझे उसके मां-बाप के लिए दुख है और मेरे आंसू बहते हैं और सबके बहेंगे। क्या कसूर है, उस मां का, जिसका बच्चा बाहर निकला। धक्के लगे, कैसे गया, लोगों ने बहकाया और फिर उसकी आंखें चली गयीं या उसका रिप्रोडक्टिव सिस्टम खत्म हो गया। मैं इस बात से बहुत खुश हूं कि कल माननीय गृह मंत्री जी ने कहा कि वह पैलेट गन के इस्तेमाल पर गौर करेंगे। ज़ाहिर है कि चूंकि इतनी रेस्पांसिबल पोजीशन उनकी है, इसलिए वह अभी यूं नहीं कह सकते कि जी, मैं यह बंद कर दूंगा लेकिन उनका यह कहना ही हमारे लिए काफी है कि वे सोचते हैं कि वे इस पर गौर करेंगे। ज़ाहिर है कि उनको एजेंसी से, आर्मी से, दूसरी एजेंसी से, पुलिस से, पब्लिक से कंसल्टेशन करनी पड़ेगी कि किस तरह से पब्लिक एप्राइजिंग को कंट्रोल भी किया जाए और मिनिमम लॉस भी हो। यह कोई जादू की छड़ी नहीं है कि ऐसे घुमाई औऱ हालात ठीक हो गये। हमें माननीय प्रधान मंत्री जी के इस बयान से ही काफी इत्मीनान हो गया कि जब वे बाहर से वापस आए और उन्होंने कहा कि we should use minimum force. वे और क्या कहते? वे इतने बड़े देश के प्राइम मिनिस्टर हैं, यह कोई बनाना रिपब्लिक तो नहीं है, जब वह इतनी बात भी कहते हैं तो इसमें वजन है और मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि उनके इस बयान से और होम मिनिस्टर साहब के बयान से हमें इतनी खुशी के और इत्मिनान के पैगाम आए कि लगता है कि  there is some light at the end of the tunnel.

          होम मिनिस्टर साहब, आप की इज़ाजत हो तो मैं एक कहावत कहना चाहता हूं। मुसलमानों के यहां यह रवायत है, यह कहा जाता है कि अगर कुत्ता किसी कुएं में डूब कर मर जाये तो उसका पानी पीना हराम है। फिर वह हलाल कैसे हो सकता है, चालीस बकेट्स या चालीस घड़े पानी उसमें से निकाल कर फेंक दें तो फिर वह पानी हलाल हो जाएगा, पीने के काबिल हो जाएगा।

          कहते हैं कि एक गांव के कुएं में एक कुत्ता डूब गया। यह पता नहीं कि किसी ने उसको धक्का मारा, मालूम नहीं कोई नेबर अच्छा नहीं रहा होगा, क्या हुआ होगा, कुत्ता कुएं में डूब गया। उस गांव के लोग किसी इमाम के पास गये और कहा कि पानी में कुत्ता मरा हुआ है, उससे बदबू आती है। उन्होंने कहा कि इसका तो सिम्पल फार्मूला है, उसमें से चालीस घड़े पानी निकाल कर फेंक दो और फिर पानी पी लो। गांव के लोग दूसरे दिन फिर उनके पास आये और कहा कि पानी से बदबू आती है, उन्होंनें कहा कि उसमें से चालीस घड़े पानी निकाल कर फेंक दो। दूसरे दिन गांव वालों ने कुएं से चालीस घड़े पानी निकाल कर फेंक दिया, फिर भी पानी से बदबू आती रही। गांव वाले तीसरे दिन उनके पास गये तो उन्होंने कहा कि क्या आपने कुत्ते की लाश पानी से निकाली है? गांव वालों ने कहा कि साहब, आपने तो यह कहा नहीं।

          अब कश्मीर का मसला कुत्ते की लाश की तरह है। हर पांच-छः साल के बाद हम चुनाव करते हैं। वहां 75 प्रतिशत या 80 प्रतिशत लोग वोट देने के लिए घर से निकलते हैं और हम लोग जो हिन्दुस्तान के आईन का, हिन्द का हल्फ उठाते हैं। मैंने हल्फ उठाया है और आज मैं यहां भाषण दे रहा हूं, इससे मेरी मौत भी हो सकती है या मेरी किसी फैमली के मैम्बर की मौत हो सकती है, लेकिन मैंने हल्फ उठाया है। मैं आपसे यकीन से कहता हूं कि जो 75 प्रतिशत लोग वोट डालने के लिए आते हैं, वे हिन्दुस्तान में यकीन रखते हैं, वे हिन्दुस्तान की जम्हूरियत में यकीन रखते हैं, लेकिन पांच प्रतिशत या दस प्रतिशत लोग भी हमारे दुश्मन हों तो आखिर हमें उनसे भी डील करना ही पड़ेगा। अब तक हमारे देश ने बहुत कोशिशें कीं, रस्सियां डालीं, जंजीरें डालीं, ताकि किसी तरह से उस कुएं में से कुत्ते की लाश को निकाले, लेकिन हर बार, मैं नाम नहीं लूंगा, आप खुद समझ जायेंगे, वह कैंची वाला हमारी रस्सी को काट देता है और लाश दोबारा उस कुएं में गिर जाती है। लेकिन इस कुएं में से इस लाश को किसी तरह निकालना है।

          राजनाथ जी, आप जैसे लोग, आपके साथी और मोदी साहब कोई मजबूत जंजीर बनाएं जिससे कश्मीर के मसले की लाश को उस कुएं में से निकालें। सिर्फ हर पांच साल के बाद इलैक्शन करना ही काफी नहीं, जब तक कश्मीर के मसले को हल न किया जाए। मुझे यकीन है कि जो फार्मूला प्राइम मिनिस्टर साहब ने इलाहाबाद में अपनी बी.जे.पी. के एक्जेक्यूटिव कमेटी के सामने, रोड-मैप के रूप में दिया, उसी रोड-मैप से हम कश्मीर के मसले को हल कर सकते हैं। उन्होंने छः चीजें कही है, उन्हें याद रखिए, अपने लोगों के साथ वहां पर अप्लाई करें। उनका फार्मूला है- बैलेंस, पेशेन्स, पॉजिटिव अप्रोच, एम्पैथी और डायलॉग।

          हिन्दुस्तान एक सुपर पावर है, यह कोई माने या न माने, लेकिन यह सुपर पावर है। यह मॉरल एथॉरिटी के लिहाज से भी एक सुपर पावर बनने जा रहा है। इसके पास जो मॉरल एथॉरिटी है, उसको इस्तेमाल करना है। कुछ लोग गुमराह हैं, अगर किसी को कान खींचने की जरूरत है,तो उसकी गर्दन काटने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान भी हमसाया है। आप ही ने फरमाया है कि हम अपने रिश्तेदारों के इधर-उधर रिश्ते काट सकते हैं, लेकिन हमसाये को नहीं बदल सकते हैं। वह हमसाया है। पाकिस्तान खुद शिकार हो गया है, क्योंकि पाकिस्तान को क्या मिला? हम कहते हैं कि हमने नुकसान उठाया, ज़रा देखें कि कश्मीर का मसला उठाने के बाद पाकिस्तान को क्या फायदा मिला, अगर फायदा मिलता है तो हम कहते हैं, करो, तुम्हें फायदा मिल रहा है, लेकिन उनको क्या फायदा मिला? वर्ष 1947 के बाद उन्हें क्या फायदा मिला? उन्होंने वर्ष 1965 में यहां पर दरअंदाज़ भेजे, और फिर हमारी फौज ने लाहौर तक कब्जा कर लिया। फिर उन्हें घुटने झुका कर ताशकंद समझौता करना पड़ा, बड़ी मुश्किल से जमीन वापस मिली, क्या वह फायदा था? वर्ष 1971 में जंग लड़ी और अपने मुल्क के टुकड़े करा दिए। हिन्दुस्तान की नफरत में, कश्मीर का नाम ले कर बांग्लादेश में आपके टुकड़े हो गए। आपकी अस्सी हजार फौज गिरफ्तार हो गई, पंजाब तक, लाहौर तक आपकी ज़मीन पर कब्जा हो गया। क्या आपको फायदा हुआ? आपने शिमला महादा किया और सबसे पहले यह माना कि यह इंटरनेशनल ट्रीटी है। लोग कहते हैं कि सिक्योरिटी काउंसिल का रायशुमारी का रेज्योलूशन था। वह चैप्टर-6 का रेज्योलूशन था, वह बाइंडिंग नहीं था। चैप्टर-7 का रेज्योलूशन बाइंडिंग होता है। चैप्टर-6 का रेज्योलूशन रिक्मेंडेटरी होता है। आपने शिमला महादा के क्लाज़-1 में मान लिया कि सिक्योरिटी काउंसिल का रेज्योलूशन खत्म है। आपने कहा कि this is a bilateral issue. That means no third party, nor United Nations can intervene in this matter. This is a treaty binding between Pakistan and the Union of India. आपने क्लाज़-2 में कहा कि जो लाइन आफ कंट्रोल है, इसे बॉय फोर्स हम चेंज नहीं करेंगे। आपने उसे वायलेट किया। आपने करगिल वार करके उसे वायलेट किया। आपने हमारे नौजवानों को, यह ठीक है कि हमारी गलती की वजह से, हमने उनके मुंह में थूका, उन्होंने हिंदुस्तान की आईन का हलफ उठाया, हमने अपनी एक सीट के लिए उनके मुंह में थूका, हमारी गलती थी, लेकिन आपने उनके हाथ में हथियार दिए। आपके लोग उनके साथ आए। आपने लाइन आफ कंट्रोल को चेंज करने की कोशिश की। आपने शिमला एग्रीमेंट को वायलेट किया, इसका आपको क्या फायदा मिला? हमने भी आंसू बहाए। क्या हुआ जब पेशावर के स्कूल में सैकड़ों बच्चे मारे गए, हमने आंसू बहाए।

           आज आपका ब्लूचिस्तान जल रहा है और क्या-क्या इल्ज़ाम आपके ऊपर नहीं लग रहे हैं। हमने आंसू बहाए, हमने सैलिब्रेट नहीं किया। We will not celebrate it. हमारा हमसाया जल रहा है, चाहे दुश्मन ही क्यों न हो। हम सैलिब्रेट नहीं करेंगे क्योंकि उसकी आग हमारे मकान तक भी पहुंच जाएगी। यहां लोगों ने कहा कि कश्मीर में यह वाकया हो गया और प्रधानमंत्री जी विदेश से वापिस क्यों नहीं आ गए। वे वहां ड्रम बजा रहे थे। प्रधानमंत्री जी के बारे में ऐसे अल्फाज़ इस्तेमाल करना जायज नहीं है, बल्कि किसी के बारे में भी ऐसा नहीं कहना चाहिए। वे दूसरे देश में, सारी दुनिया के सामने हिंदुस्तान की इमेज को बना रहे थे। He was connecting the dots in history. He was connecting our history with the struggle of Mahatma Gandhi in Africa. जिससे बाद में अफ्रीका को भी आजादी मिली। नेल्सन मंडेला भी उस मुल्क को मिले, वह भी हमारे गुजरात के एक महात्मा की वजह से मिले। कश्मीर में कल भी ऐसा हो सकता है, परसों भी ऐसा हो सकता है, कभी भी ऐसी घटना घट सकती है क्योंकि एक तरह से पेट्रोल डाला जा रहा है, क्या PM विदेश से भाग कर वापस आते? इसी तरह से उन्हीं के एक सदस्य ने फरमाया कि अभी पाकिस्तान ब्लैक डे मना रहा है और हमने इस बारे में क्या किया है? हमारी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान से कहा कि ऐसा मत कीजिएगा। ठीक है, विदेश मंत्री जी ने उन्हें नसीहत दी। अकबर साहब, आप स्ट्रेटिजिस्ट हो। हम और क्या कर सकते हैं? आप तो फारेन मिनिस्टर भी हैं, डिप्टी ही सही, स्टेट मिनिस्टर ही सही। अगर पाकिस्तान ऐसा करता है तो हम उसे यही कहेंगे कि ऐसा मत करो, क्या उस पर एटम बम फैंकेंगे? क्या हम इतने इर्रिस्पोंसिबल हैं? प्रधानमंत्री के नाम को ऐसी चीजों के लिए घसीटना नहीं चाहिए।

          मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं बहुत मुतास्सिर हुआ हूं जो इलाहाबाद में प्रधानमंत्री जी ने छह बातें कहीं थीं - “Balance, patience, co-ordination, positive approach, empathy, and dialogue.” यही हुरियत कांफ्रेंस हो या पाकिस्तान हो, जो भी बातचीत करने के लिए तैयार हो और मैं आपको आज बताना चाहता हूं कि साउथ कश्मीर जल रहा है, श्रीनगर खामोश है। अगर इसके बाद वह कोई शरारत न करे। इस अमल में हुरियत कांग्रेस के लीडर्स का भी हाथ है, वे भी खत्म नहीं होना चाहते हैं। उन्हें मालूम है कि अगर इस किस्म का रैडिकलिज्म फैल गया तो हुरियत कांफ्रेस का वजूद भी नहीं रहेगा। श्रीनगर इस वक्त पुरअमन है। चाहे वह अपने बचाव के लिए या इंसानियत के लिए, अगर वे तैयार हैं अमन में हमारा हाथ बटाने के लिए, तो हमें खुशामदीद करना चाहिए। अगर पाकिस्तान को ब्लैक डे के बाद वाइट मार्निंग देखने की तमन्ना हो तो हम भी गुड मार्निंग कहने के लिए तैयार होने चाहिए। हम भी बातचीत करने के लिए तैयार होने चाहिए। मेरे लिए तो ये शब्द मंत्र हैं - “Balance, patience, co-ordination, positive approach, empathy, and dialogue.” अफ्रीका में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि उम्मीद पर जिओ। एक कौम और एक शख्स उम्मीद से बनता है क्योंकि वह उम्मीद से जीता है। हर दिन व्यक्ति मौत से सामना करता है और उन्होंने HOPE के बारे में कहा कि “H stands for harmony.” काश, हम सभी में सदभावना हो। हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, महाराष्ट्र के लोगों में, साउथ के लोगों में, नार्थ के लोगों में सदभावना, हार्मनी हो, होप हो। “O” से ओप्टिमिज्म, यह यकीन रखना कि कल का दिन अच्छा होगा और अगला साल इस साल से अच्छा होगा। हमारे बच्चों की जिंदगी हमसे बेहतर होगी। आने वाला भारत आज से भी ज्यादा महान और शानदार होगा। “P” से पोटेंशियल और “E” से एनर्जी। हमारे देश में पोटेंशियल और एनर्जी बहुत है। अलबत्ता बात यह है:

          "इस दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा। "
                                                       

श्री बदरुद्दीन अजमल (धुबरी):   माननीय उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे इस विषय पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ।

          आज पूरा सदन इस पर बहुत ही सीरियस है। आज कुछ लोगों ने बड़ी अच्छी बातें रखीं। श्री एम.जे.अकबर साहब ने भी बड़ी अच्छी बातें कहीं, वे एक हिस्टोरियन हैं, उनकी लाइफ की एक हिस्ट्री है। श्री तथागत साहब ने भी बड़ी ज़बरदस्त बातें कहीं। आज यह डिबेट हो रही है कि कश्मीर जल रहा है और हम लोग यहाँ किसी को हराने और किसी को जिताने पर तालियाँ बजा रहे हैं। ...(व्यवधान) ख़ैर, मैं गाली की बात नहीं करूँगा। मैं अपनी बात हमेशा एक-दो शेर से शुरू करता हूँ। आज के इस दुःख भरे माहौल में भी मैं कहना चाहूँगाः “जो ज़ख्म उसके जिस्म का नासूर बन गया, उस ज़ख्म को शुमार किसी ने नहीं किया, कश्मीर पे तो जान छिड़कते हैं सब, मगर कश्मीरियों से प्यार किसी ने नहीं किया।”    यह मेरे हिसाब से ठीक है। ...(व्यवधान) मैं वह कहने जा रहा हूँ, जो आप कहना चाह रहे हैं। आप भी मुंबई से हैं और मैं भी मुंबई से हूँ, लेकिन मैं असम से रिप्रजेंट करता हूँ। मेरा यह कहना है, आपने जो बातें आज कहीं, यदि मेरा बस चलता तो मैं आकर आपका पेशानी चूम लेता। अकबर साहब ने बातें कहीं, अभी श्री बेग साहब ने बातें कहीं, लेकिन क्या इससे हमारे मसले के हल के लिए कोई रास्ता निकला? होम मिनिस्टर साहब हमारे बड़े भाई हैं। वे आज या कल अपना बयान दे देंगे। जो आग वहाँ जल रही है, जिन माताओं की गोद उजड़ गयी है, जो 14 दिनों से भूखे-प्यासे तड़प रहे हैं, यह मसला अब एक दिन का नहीं रहा, यह मसला अब लगातार हो गया है। मुझे मालूम है कि मुझे बोलने के लिए ज्यादा वक्त नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारी पार्टी के तीन ही मेम्बर हैं। मुझे अपनी हैसियत मालूम है। बस इतना है कि इस मसले के परमानेंट सॉल्युशन के लिए, मैं एक मुसलमान की हैसियत से जिम्मेदारी के साथ कहना चाह रहा हूँ कि पाकिस्तान को इस वक्त मुँह तोड़ जवाब देने का वक्त आ चुका है। अब डायलॉग और दावत खाने से यह मसला हल होने वाला नहीं है। हमारे प्राइम मिनिस्टर साहब ने बहुत बड़ा दिल दिखाया। वे उनके घर में ज़बरदस्ती दावत खाने चले गये। ये इनका बड़प्पन था। लेकिन ये उनके दिल का मामला है, उनके घर की मजबूरी है, उनका वह पॉलिटिक्स करनी ही है। अभी एक आतंकवादी के मरने पर श्री बेग साहब कह रहे थे।

HON. DEPUTY SPEAKER: It is 7.00 o’clock now.  There are ten more Members to speak.  Therefore, we may extend the time of the House by one hour.  The Minister’s reply will be tomorrow but we will complete the discussion today.

श्री बदरुद्दीन अजमल: मेरा कहना है कि अब दावतों का सिलसिला बहुत हो गया। हमारे कश्मीरी भाइयों ने इस इलेक्शन से ही नहीं, बल्कि कई इलेक्शनों से यह साबित कर दिया कि वे हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान के साथ ही रहना चाहते हैं। उनका दिल, दिमाग और हर चीज़ हिन्दुस्तान के साथ है।

19.00 hours इससे बड़ा वह सबूत नहीं दे सकते हैं कि वह इलेक्शन में पार्टिसिपेट करते हैं और प्रूव करते हैं कि हम हिन्दुस्तानी हैं। इसलिए जैसा कि सत्पथी साहब ने कहा कि वहां के नौजवानों को जब तक मैन स्ट्रिम में नहीं लाएंगे और मैं भी हमारे होम मिनिस्टर साहब से निवेदन करूंगा कि वहां के नौजवानों को मैन स्ट्रिम में लाने की कोशिश कीजिए। यह जो नौजवान भटक रहे हैं, वह बेरोजगारी की वजह से भटक रहे हैं, उनके पास रोज़ी-रोटी का साधन नहीं है, इसलिए उनको कोई भी एक स्लाइस दिखा कर भटका लेता है, एक चॉकलेट दिखाकर भटका लेता है। इनको इससे बाहर लाइए। कश्मीर के बच्चे जब यूनिवर्सिटी या कॉलेज में जाते हैं तो पहले तो उनको एडमिशन नहीं मिलता है, उनको हिन्दुस्तान की इंडस्ट्री वाले मौका नहीं देते हैं, उनको नौकरी नहीं करने देते हैं, जब एक आदमी भूखा होगा तो वह कुछ भी कर सकता है। आज सिक्योरिटी फोर्सिस में कितने कश्मीरी हैं, इसका जवाब मुझे क्या कल होम मिनिस्टर साहब से मिलेगा, बीएसएफ में कितने लोग हैं, आर्मी में कितने लोग हैं, क्या इन्होंने कभी गद्दारी की है? अगर इन्होंने गद्दारी की होगी तो किसी एक आदमी ने गद्दारी की होगी, पूरी कौम ने कभी गद्दारी नहीं की है। जब तक इनके लोग इनमें नहीं होंगे, इसी तरह से गोलियां चलती रहेंगी और यह मामला कभी थमने वाला नहीं है। किसी ने कहा था कि वादी-ए-कश्मीर जन्नत का नजारा।  आज जन्नत का नजारा नहीं बल्कि स्वर्ग और दोज़ख का नजारा हो चुका है। इसको हमें डिबेट्स की बजाय कि कौन सी पार्टी हारेगी, कौन सी पार्टी जीतेगी, मसला यह नहीं है, मसला यह है कि वहां पचास लोग मर चुके हैं और शायद और भी लोग मरें। पता नहीं कितने लोग जख्मी हो चुके हैं? हजारों लोग जख्मी हो चुके हैं, जिनके घर उजड़ गए हैं। कश्मीरियों की आज यह हालत है कि एक तरफ तो टेररिस्ट इनको घर में आकर मारते हैं और इनके घरों में रहते हैं। अगर उनके खिलाफ कुछ करें तो उनकी जान लेते हैं, उनकी मां-बेटियों की इज्जत लूटते हैं। मुसलमान होकर मुसलमान बेटियों की इज्जत लूटते हैं। अगर कुछ नहीं करते हैं तो भी उनकी जान लेते हैं, वह तो दोनों के बीच में पाट की तरह हो गए हैं। हम लोग एक जिम्मेदारी वाली जगह पर बैठे हैं और पूरा हिन्दुस्तान हमारी तरफ देख रहा है। खुदा-न-ख्वास्ता कल यह कौम और तारीख, अकबर साहब ने जो तारीख बयान करने की कोशिश की, तारीख यह न कहे कि वहां कश्मीर जल रहा था और कश्मीर की समस्या का कोई समाधान नहीं निकल रहा था, लेकिन बड़ी-बड़ी दो पार्टियां वहां बैठकर लड़ाई कर रही थीं और जुबान से एक-दूसरे को हराने की कोशिश कर रही थी।

          अभी हमारे होम मिनिस्टर साहब मुझ से मिले तो मैंने उनसे कहा कि मेरा एक सजैशन है कि जितना जल्दी हो सके एक ऑल पार्टी डेलीगेशन वहां जाना चाहिए और वहां के नौजवानों से मिलना चाहिए। हमारे प्राइम मिनिस्टर साहब इतने लायक हैं कि वह खुद वहां जाएं, नौजवानों को बुलाएं और उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करें। होम मिनिस्टर साहब इस पूरी टीम को लीड करें, नौजवानों को बुलाएं और कहीं न कहीं उनको रोजगार से वाबस्ता कीजिए, उनके ऊपर भरोसा कीजिए। उन्होंने भरोसा करके हमें बता दिया है कि हम हिन्दुस्तानी हैं, हम पाकिस्तान के साथ नहीं हैं। अगर एक-दो बच्चे भटक गए हैं तो उसकी सजा उनकी पूरी कौम को नहीं मिलनी चाहिए। यही मेरा कहना है कि हम इसको सीरियसली लें और इस मसले को हल करने कोशिश करें। बहुत-बहुत शुक्रिया।

श्री दुष्यंत चौटाला (हिसार) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे कश्मीर घाटी में जो हिंसक घटनाएं हुईं, जिस पर नियम 193 के तहत चर्चा हो रही है, उस पर  आपने मुझे बोलने का मौका दिया।

       महोदय, मुझ से पूर्व अकबर साहब और बैग साहब ने बहुत ही अच्छी तरीके से कश्मीर घाटी में जो निरंतर हिंसक घटनाएं हुई हैं, उन पर लाइमलाइट डालने का काम किया है। आज गृह मंत्री जी भी यहां मौजूद हैं और अकबर साहब को विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गयी है, वह भी मौजूद हैं। कश्मीर एक ऐसा मामला है जो गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को मिलाकर सुलझाया जा सकता है। आज जब कश्मीर की बात करते हैं तो पम्पोर की घटना हो या आतंकवादियों की कश्मीर में घूसपैठ हो। वे बातें हों। हमें बारी-बारी इस सदन में और इस सदन से बाहर उस पर चर्चा करने को मिलती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कश्मीर एक प्राब्लम है या कुछ चुनिंदा लोग कश्मीर को प्राब्लम बनाकर रखना चाहते हैं। पिछले 70 सालों में हम कश्मीर की समस्या को क्यों सुलझा नहीं पाये। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज हमें पैरा मिलिट्री फोर्सेज, सैंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज की 15 परसैन्ट फोर्स अकेले कश्मीर घाटी में डिप्लॉय करके रखनी पड़ती है। कश्मीर के बॉर्डर्स को सिक्योर करने के लिए हमारे आर्म्ड फोर्सेज के जवानों को सियाचिन जैसी जगह पर माइनस 60-70 डिग्री के टैम्परेचर के दौरान क्यों खड़ा रहना पड़ता है?

          महोदय, करगिल 1999 में हुआ। शायद इसी जुलाई के महीने में हमने विजय दिवस मनाने का काम किया, विजय दिवस आने वाला है। जब हमने चाहे राइनो हिल, बत्रा टॉप, टाइगर हिल आदि  को जीतने का काम किया। मैं ऐसे प्रदेश से आता हूं, जहां से आज भी भारतीय सेना का हर दसवां जवान, हर दसवां अफसर हरियाणा प्रदेश से आता है। चाहे कैप्टन पवन कुमार हो, रॉकी हो, ऐसे वीर योद्धा इस देश के बॉर्डर की सुरक्षा करते हुए शहीद हुए। हमें उनकी कुर्बानियां याद ऱखनी पड़ेंगी। मगर एक व्यक्ति जिसे कोई आतंकवादी बोलता है और कोई शहीद बोलता है, जब उसका जनाजा निकाला जाता है तो दो-ढाई लाख लोग जनाजे में आते हैं और हमारे जवान जो देश के बार्डर की सुरक्षा करते हुए शहीद होते हैं, जब उनका जनाजा निकलता है तो हमारे डी.सी. और एस.पी. भी वहां मौजूद नहीं रहते। यह फर्क क्यों हैं? यह फर्क इसलिए है कि बारी-बारी कश्मीर जैसे मुद्दे को हम जलाने का काम करते हैं।

          महोदय, मैं पिछले दिनों टीवी पर कुछ साथियों के बयान देख रहा था। वे कहते हैं कि हरियाणा के अंदर गोलियां नहीं चलाई गई, कश्मीर में गोलियां चला दी जाती हैं। कश्मीर में सरकार कहती है कि रबर पैलेट्स चलाई जाएं और हरियाणा में सीधी गोली छाती पर मारी जाती है, गुजरात में सीधी गोली छाती पर   मारी जाती है, राजस्थान में सीधी गोली छाती पर मारी जाती है। हमारी सरकार का यह डबल फेस हमें देखने को क्यों मिलता है? सरकार जरूर इस पर भी जवाब देने का काम करेगी।

          मैं सरकार से तीन फैक्ट्स पूछना चाहता हूं। क्या पिछले एक साल में हमारी सैंट्रल आर्म्ड फोर्सेज के जो जवान कश्मीर घाटी में तैनात थे, क्या उनमें तीन-चार परसैन्ट की कटौती हमें देखने को मिली कि साढ़े सत्रह परसैन्ट की जगह साढ़े चौदह परसैन्ट हमने अपनी आर्म्ड फोर्सेज को वहां डिप्लॉय किया। क्या यह सच है कि 2011 में 340 घटनाएं वॉयलेंस की हुईं और जो फैक्ट्स सरकार ने 2015 में प्रोवाइड किये हैं, उनके अनुसार 208 हुई। लेकिन इनका नम्बर कम करने के लिए जो स्टोन पैल्टिंग जैसे इंसिडेन्ट्स हैं, उन्हें सरकार ने बाहर निकालने का काम किया। आज अगर हमारी सैंट्रल आर्म्ड फोर्सेज के जवान घायल होते हैं तो सबसे ज्यादा जवान पत्थरबाजी से घायल होते हैं। मुझे पिछले दिनों अर्बन डैवलपमैन्ट कमेटी के टूर पर श्रीनगर जाने का मौका मिला। जब मैं उस घाटी में उतरा तो उसी दौरान तीन पुलिस कर्मियों को गोली मार दी गई, उनके असलहे छीन लिये गये और जब उन आतंकवादियों ने, जिन्होंने उन पुलिसकर्मियों को गोली मारी थी, उन्हें आर्म्ड फोर्सेज ने एनकाउंटर करके मारने का काम किया तो अलगाववादी नेता कहते हैं कि कश्मीर बंद रहेगा। हमें सरकार के अधिकारियों की तरफ से आदेश दे दिये गये कि आप आज होटल से बाहर मत निकलिये, क्योंकि आज कश्मीर बंद है। आप बाहर जायेंगे तो गाड़ियों पर पत्थर मारे जायेंगे और उसे एक्ट ऑफ वॉयलेंस काउंट नहीं किया जायेगा। क्या यह हमारा हिंदुस्तान हैं, क्या यह हमारा भारत है, जहां आम नागरिकों को भी बाहर निकलने पर सरकार हिदायत देकर मना कर देती है।

          उपाध्यक्ष महोदय, इसका केवल एक ही कारण है कि आज कश्मीर की घाटी के अंदर जो हमारे सेना के जवान हैं, आर्म्ड फोर्सेस के जवान हैं, उनको कंसल्ट नहीं किया जाता है। केंद्र सरकार अगर कंसल्ट करती है तो चुनिंदा ब्युरोक्रेट्स, जो दिल्ली में बैठे हैं, जिनको कश्मीर घाटी के जिलों का नाम भी नहीं पता है, उनको कंसल्ट कर के कश्मीर की पॉलिसीज़ बनाई जाती है। आज सरकार को यह फैसला लेना पड़ेगा कि अगर कश्मीर के आवाम के लिए कोई फैसला लेना है तो उन अधिकारियों से ले, आर्म्ड फोर्सेस के उन अफसरों से ले जिन्होंने अपने जीवन के दस-दस, पंद्रह -पंद्रह साल वहां अमन चैन बनाने के लिए बिताने का काम किया है, तभी कश्मीर घाटी के जो हालात हैं, उनको सुधारने का काम किया जाएगा, मैं तो इतना ही कहना चाहूंगा। आज अगर कश्मीर की बात करें, तो कश्मीर की सुरक्षा के   लिए सबसे ज्यादा जवान हमारे प्रदेश के शहीद हुए हैं आज हमें दुख होता है, क्योंकि अगर कश्मीर में हालात बिगड़ते हैं तो हमारे प्रदेश के घर में मातम मनाया जाता है। इसके लिए सरकार को कदम उठाने पड़ेंगे। गृहमंत्री जी और विदेश मंत्री जी से भी मैं यह आग्रह करूंगा कि आप लोगों को प्रोएक्टिव हो कर कश्मीर के हालात सुधारने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे।

श्री कौशलेन्द्र कुमार (नालंदा) : उपाध्यक्ष महोदय, कश्मीर घाटी में जो घटना घटी है, उस पर हम लोग आज चर्चा कर रहे हैं। आपने मुझे इस पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपका धन्यवाद। लगभग एक से एक विद्वान लोगों के विचार यहां पर आए हैं और एक से एक जानकार लोगों ने अपनी बातें यहां रखी हैं। कश्मीर घाटी में जो घटना घटी है, आठ तारीख से आज लगभग 12 दिन हो गए हैं, लगातार कर्फ्यु लगा हुआ है। एक साधारण बात पर, अगाववादी नेता का एंकाउंटर होना, उस समय से जो घटनाएं घटी हैं, उस वजह से आज तक लगातार वहां कर्फ्यु लगा हुआ है। आम नागरिक इस हिंसक घटना में मारे जा रहे हैं। पुलिस के जवान भी मारे जा रहे हैं। घाटी पूरी तरह रण क्षेत्र बन चुका है। राज्य सरकार इस हिंसा को रोकने में नाकाम रही है। किंतु आश्चर्य की बात है कि केंद्र सरकार भी सिर्फ शांति की अपील कर रही है। जबकि घटनाओं को काबू करने का उपाय करना चाहिए। मैं समझता हूँ कि राज्य सरकार और सेना में परस्पर तालमेल न होना भी एक अहम कारण हो सकता है। इस घटना के पीछे पाकिस्तान की शह है या नहीं है, यह तो माननीय गृह मंत्री जी बताएंगे। किंतु पाकिस्तान द्वारा हमारे देश के अंदरूनी मामले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम सरकार के साथ हैं। सरकार पाकिस्तान को दो टूक जवाब दे। ढुलमुल रवैया अपनाने से काम नहीं चलेगा। अब 56 इंच का सीना दिखाने का वक्त आ गया है।

          अगर आज माननीय प्रधान मंत्री जी सदन में होते तो हमें खुशी होती। अभी कई साथियों ने यह बात कह दी कि 56 इंच का सीना दिखाने का वक्त आ गया है। इस सदन में जो आपने कहा था कि पड़ोसी अगर आँख दिखाएगा, हम आँख नीचे नहीं करेंगे, इसका जवाब आज देने की जरूरत है। उस अलगाववादी को शहीद मान कर पाकिस्तान काला दिवस मानाने की बात कर रहा है, यह तो हमारे अंदरूनी मामले में पाकिस्तान का सीधा-सीधा हस्तक्षेप है। सरकार से मैं अपील करूंगा कि कश्मीर घाटी में शांति बहाल करने के लिए आप कोई ठोस कदम उठाएं और समय जैसे-जैसे बीतता जा रहा है, वहां के स्थानीय लोगों की जो कठिनाई है, उस पर भी ख्याल रखना होगा।

SHRI E.T. MOHAMMAD BASHEER (PONNANI): Mr. Deputy-Speaker, Sir, thank you. To be frank, acute anarchy is continuing in the Kashmir Valley. Even today’s newspapers tell you the story of blood and tears from Kashmir. We can very well imagine the deplorable situation in places where the curfew is continuing for the last 12 days continuously. Food supply and drinking water are also affected, schools have remained closed, the death toll has reached 50, and telephone connectivity is completely suspended. In spite of all these things it is strange to note that some people are supporting the Jammu and Kashmir Government led by BJP and PDP.

          I would like to say with all the politeness that the Government in Jammu and Kashmir is the most inefficient Government that the State has ever seen. It is a Government good for nothing. They have miserably failed in controlling the situation. I fail to understand on what basis some people are justifying this Government.

          We are all proud of our democracy. Ours is the biggest democracy in the world. The Chief Minister still says that there is no curb on the Press. The Editors Guild of India today categorically stated that it is an undemocratic and coercive step against the Press. The Press was raided and was compelled to close down. We have to realise that what is happening there is muzzling of the print and electronic media.

          I would like to say that it is a shame on the nation that this kind of attitude is shown by the Government that is in power in Kashmir.

As far as the security forces are concerned, we must have a loud thinking about their activities. They are treating the civilians as enemies and as terrorists. It is a very serious thing. Generally the security forces have arms. We can very well understand that. But the security forces in Kashmir have a sharp edged unseen arm with them. What is that? It is AFSPA, the Armed Forces Special Power Act. Using that they are committing all kinds of cruelty against the civilians there. There is stone pelting from one side and gun firing from the other side and the civilians get caught in-between these two.

The Government is playing the role of a silent spectator. Our Prime Minister goes around the world and talks about world peace. But what is happening in our own country? We must have a serious thinking about that also.

My learned friends were talking about terrorism and the role of Pakistan in this. Yes, terrorism is there. It is engineered by Pakistan. That also is a fact. This country should unitedly support the Government to fight terrorism. All of us are with the Government in its fight against terrorism. We have to fight it tooth and nail. We all support the Government in that fight.

We have to understand one more thing. Is it the only reason? That is the point to be discussed. Is it the only reason for the turbulence in Kashmir? We have to think about that also. What is happening on the development front? My learned friends were saying that they are totally dissatisfied, discontented, disillusioned. … (Interruptions)

SHRI ADHIR RANJAN CHOWDHURY (BAHARAMPUR): There is no Minister from the Ministry of Home Affairs in the treasury benches. … (Interruptions)

SHRI E.T. MOHAMMAD BASHEER: If we examine the development indicators, we will be convinced that Kashmir is in the lowest bottom level. The development indicators shows that Kashmir is neglected like anything. We have to realize the fact that Kashmir is an integral part of India. When we are distributing the national wealth, we should do it in a judicious manner. Whether it is Kashmir, North-Eastern States, South, etc. judicious distribution should be there. I would like to say that ad hocism cannot work. This kind of black law should be scrapped. This House has demanded that several times. We are having bitter experience with various such legislations like POTA, TADA, UAPA, etc. These kinds of black laws will not bring good results. On the contrary, it would only add fuel to the fire. So, I would like to, once again, demand that such law should be scrapped at once.

          With these few words, I once again condemn the activities taking place in Kashmir. Thank you very much.

SHRI C.K. SANGMA (TURA): Thank you very much, Deputy-Speaker, Sir, for giving me the opportunity to speak in this debate. This is my maiden speech here. So, I am highly privileged and happy to be part of this debate. I won’t take much time. I will be very specific in my points.

          First of all, it is very sad that every time we discuss or hear about Kashmir, it is always for the wrong reasons. It is the same for the North-East also. Both are such beautiful and potential States and Regions, and yet always they are in the news for the wrong reasons. Even as we speak, tension prevails out there. As Mr. Baig, and Mr. M.J. Akbar have mentioned, there is a history behind the whole thing. Why has this happened? We all appreciate that history; and we all realize the complexity of the situation. Having said that, as a very new Member, I still feel like a person who is sitting in the Gallery and watching; in two days’ time, especially in today’s debate, it did hurt when I saw that in an issue like this, there was a lot of politics going on – who is right and who is wrong. As a young politician, you do look at this, and you do feel discouraged that these kinds of things happen especially when a sensitive issue like Kashmir is being talked about.

          Nonetheless, I am hopeful and I believe that if we put our hearts and minds together, solution will come. We will find a way forward. This is my belief. And I think that when we think about this, like we do in any problem, we look at the short-term, the medium-term and the long-term; and figure out how we can take different steps in all these aspects. Blaming each other is not going to help us. We all know that yes, there is a complex problem out here but a lot has to be done from across the border. The Government across the border to a large extent has been inactive and not stern in taking tough decisions. We all know that there are different terrorist camps across the border in Pakistan but the Pakistan Government has not done anything to stop or to destroy these camps. I must congratulate our Prime Minister who has taken steps to engage with the Pakistan Government  to ensure that these things are closed but sadly the Pakistan Government has not responded to it.

          We all know that this is because of the Pakistan Army and ISI. The Intelligence Group in Pakistan and the Army in Pakistan have a lot to do with this. If Kashmir issue is gone, Pakistan Army and ISI lose all its funding and importance. The only reason they are keeping Kashmir issue alive is to keep themselves alive.

Today, the PAKISTAN Government is run by ISI and the PAKISTAN Army. So, that is why, it is sad to see that the Pakistan Government is not able to act. I think, all the countries know, all the developed nations know that Pakistan has got different terrorists camps, yet action is not being taken. That is where I would like to once again thank our hon. Prime Minister. One of the Members has said that he is touring different countries and going around the world. There is definitely a purpose in this. Today, it is very critical that we do apply an international force; we do apply international sanctions to Pakistan to ensure that pressure is put from different countries to ensure that no funds are given to them. 

          So, if economic sanctions are put in, it would definitely have some effect. This can only be done when our relationship improves with different nations and, that is what our hon. Prime Minister is trying to do. I think that international pressure, those international sanctions will force Pakistan to act against these terrorist camps.

          But, in the mean time, it is very sad to see that our jawans and our Army personnel are facing the heat. While they do the sacred duty of protecting our people and our land, the kind of suffering that they go through is enormous. We all know the kind of sacrifice that they do while performing their duty. I take this opportunity to salute each and every one of them and to tell that that we are all proud of what they are doing for the nation.

          Sir, having said that, I strongly believe that we need to improve the infrastructure in different borders of our nation. Today, if we were to look at other countries across our border – I do not want to name, but I am sure everybody knows – the kind of infrastructure that they have at their border is very good. They do not even need to put people there to protect it because when there is problem, the Army and the personnel can reach there within half-an-hour or 15 minutes notice because the infrastructure is so good.

But in our country it is the opposite. We need to place our jawans and the Army personnel in such corners, in such difficult terrains of our country that they have to live in very difficult conditions. If the Government in India can improve the infrastructure in the border areas, it would help our Army people very much. In fact, I would like to know from the Minister as to how much money we spend for our jawans to work in those far-flung areas like Siachen. Siachen, of course, is a very critical point. We cannot let that go. But like Siachen, there are many locations which are cut off from the main land and Government is spending crores of rupees everyday to put our people there. Can we use that money, instead, to build the infrastructure so that our people can reach there at a faster pace? That would cut our cost, that would ensure we act faster and, at the same time, our jawans also will not suffer that much. The  situation in the Northeast is the same.

So, apart from the borders that we have, apart from the physical border and the physical infrastructure that we are going to create, for us to really hit this problem at the bottom, I strongly feel that we need economic borders. We need to create jobs and economic opportunities for our youth in our border areas. We need educational borders. We need to set up good educational institutions in these areas so that we are able to set up an educational border. We need to set up social borders. Simply having physical borders might not serve our purpose. So, I strongly encourage that we go in for economic borders, educational borders and social borders to solve this problem.

Sadly, when our jawans are in the forefront of action, sometimes civilians are affected. We are targeting the enemy, but we end up hurting our own people, sometimes totally unavoidable. But I guess it is important that we learn to differentiate and, I think, here we cannot blame our Armed Forces. They are doing their duty. I think it is the policy makers who need to make sure that the right policy is made.

I am sure our intelligence network – whether it is R&AW or whether it is IB – is doing its part very well. But I strongly feel that if there is action based on strong intelligence input and we have specific targets hit, I think the civilian impact will be lesser. So, I think, we need to invest more in intelligence gathering. We need to increase our budget allocation for R&AW and IB so that right inputs come to us and we are able to attack and target specific people and not the civilians in general, because, as I said, sometimes this causes more pain and harm than actual good to us.

Sir, having said that, we are all aware and, I think, so many Members before me have spoken about the Armed Forces (Special Powers) Act. As a person from the Northeast, with my own eyes I have seen the atrocities that are committed against the civilians. So, I would also like to join the rest to condemn the Armed Forces (Special Powers) Act and I would like to request the Government to ensure that this is repealed and this is taken out because this is a draconian Act. Sir, if this is done, I think, it will be the first step towards creating trust for the people.  People will start trusting the Government. 

          In Manipur, we know what is happening.  Sharmila has been fasting for more than 10 years on this particular issue.  Therefore, I strongly feel that when we have theActs like these and we act against civilians,   that is where we are going wrong.  When we attack civilians,  we  make them our enemies.  They are not enemies. Some of them are our friends but our actions lead them to become our enemies.

          In some areas, it is not a war. When you go Meghalaya, when you go to some parts of Arunachal and Manipur, it is not a war. But our actions make it a war. When the kind of atrocities we do against the common people, they want to get back at the system.

          So, I strongly feel, Sir,  that we need to realise that we need the human touch at the right place.  I feel that the intelligence network will help us to reach there.  Having said that, I have always believed that the problem of  militancy,  whether in the North-East or in most parts of the country, is not the actual problem. The problem is socio-economic; and the result is militancy.  It is not because these boys want to be militants but they have no choice.  As Mr. Badruddin Ajmal was also mentioning, they have no choice.  Some of them are on the payroll; they are paid Rs. 5000 to Rs. 10,000 to be part of a group.

          So, the problem is socio-economic and the result is militancy.  That is why I also believe and I would thank   the hon. Prime Minister for his mantra of Sabka saath, sabka vikas.  That is the way to move forward.  We need the development to touch the people.  If the socio-economic problems are resolved, I am sure that the militancy also would slowly, slowly disappear.  We need development for peace and not peace for development. So, we need development first, and I strongly feel that peace will follow forward.

          Sir, the last point, which I want to make is regarding the kind of way that we handle the people who come and surrender.  Recently, in my State of Meghalaya, there was a group called ‘ANVC’, which surrendered about two years back and signed the peace agreement with the Government of India.  But till today, दो साल हो गए, आज तक उस एग्रीमेंट का कुछ नहीं हुआ। वह एग्रीमेंट जैसा था, वैसा ही अभी तक है। न किसी कैडर को एक रुपया दिया गया है और न एक काम आज तक दिया गया है। अगर भारत सरकार की तरफ से और मेघालय सरकार की तरफ से जो वादा किया था, अगर वह वादा पूरी तरह नहीं निभायेंगे तो बाकी मिलिटेंट्स आगे कैसे आएंगे? बाकी मिलिटेंट्स के पास कैसे एक ट्रस्ट होगा कि हां, सरकार सीरियस है। दो साल हो गए। आज इन कैडर्स और इन ग्रुप्स के जो लोग हैं, वे वापस जाने की सोच रहे हैं या नया ग्रुप खोलने की सोच रहे हैं।

          मेरा सरकार से यह अनुरोध है कि इस इश्यू को सीरियसली लें। जब कुछ वादा किया है कि एग्रीमेंट में हम आपको ये-ये चीजें देंगे, तो उस वादे को पूरी तरह निभायें, तभी आगे जाकर विश्वास आएगा। इसमें सिक्स्थ शेडय़ूल का एक अमेंडमेंट था, जो कांस्टीटय़ूशन में सिक्स्थ अमेंडमेंट है रिगार्डिंग डिस्ट्रिक्ट काउंसिल, तो उसमें एक अमेंडमेंट था सिक्स्थ शेडय़ूल का, उस अमेंडमेंट का जो बिल है, वह दो साल पहले आना था, लेकिन आज तक नहीं आया और वह टैक्स एग्रीमेंट का एक भाग था। My request would be that the  Sixth Schedule Amendment that we had proposed, should be done immediately.  I would request the Home Ministry to look into that aspect because the trust of the people, the trust of these cadres who have surrendered, is going down. I think, if we lose the trust, then it would be very difficult to bring it back again.

          Sir, I do not want to take much of the time of the House.  I am thankful to you for giving me this opportunity.  I am very happy that all the parties are united today. It is a very positive sign.  Of course, a lot of fireworks were there, which is again healthy for democracy.  But I would like to urge that we work together. I also support the cause for an all-party delegation. If that can go to Kashmir and actually meet the people, I think, it will help a lot.

          Once again, I would thank you for giving me this opportunity to speak on this very important issue.

                                                                            

श्री असादुद्दीन ओवैसी (हैदराबाद) : डिप्टी स्पीकर साहब, मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं शुरूआत में भी इस बात से मुत्तफिख हूं कि हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के पास कोई जवाज़ नहीं है, कोई अख्तियार नहीं है कि वह हमारे इस अजीम मुल्क के अंदरूनी मामलात में मुदाखलत करे। जहां पर खुद आग लगी हो, वे उस आग को बुझाएं। हिन्दुस्तान एक अज़ीम मुल्क है, एक अज़ीम जम्हूरियत है। जहां पर हम इस बात को मानते हैं कि अज़ीम मुल्क, अज़ीम जम्हूरियत है, हमें अपने आपसे सवाल करना पड़ेगा, खास तौर से इख्तदार की कुर्सियों पर बैठने वाले लोगों से। उनको सोचना पड़ेगा कि क्या हम कश्मीरी को हिन्दुस्तान के अव्वल दर्जे का शहरी मानते हैं या नहीं। अगर मानते हैं तो फिर आखिर क्या वजह है कि 12 दिन में 1800 से ज्यादा लोग ज़ख्मी हुए, जिसमें से करीब 600 लोगों को पैलेट की गोली से ज़ख्मी किया गया, 125 लोग गोली से ज़ख्मी हुए हैं। पैलेट से ज़ख्मी 600 लोगों में से डेढ़ सौ लोगों की बिनाई जा चुकी है। यह मेरे अल्फाज़ नहीं हैं बल्कि एम्स से जो डाक्टर गए थे, उन्होंने वहां के मंज़र को देखकर कहा कि मैंने अपने कैरियर में इस तरह के हालात नहीं देखे। ऐसा लग रहा था कि ये जंग के ज़ख्मी हैं। मेरा यह सवाल हुकुमत से है कि अगर हम कश्मीरियों को अव्वल दर्जे का शहरी मानते हैं, तो फिर इस तरह का सलूक क्यों, इस तरह का जबर क्यों? हमने उनसे वादा किया था कि बुलेट जवाब नहीं है बैलेट जवाब है। मगर आज हम क्या कह रहे हैं कि पत्थर का जवाब गोली से देंगे। क्या इसीलिए कश्मीरी के अवाम् ने आपको वोट दिया था? डेढ़ साल से आपकी हुकुमत है और डेढ़ साल में आपने क्या इकदामात किए। हमने माज़ी से क्या सबक हासिल किया।

          वर्ष 2008 में ज़मीन का किस्सा था, 2010 में तुफैल अहमद की मौत थी और अब वर्ष 2016 में एक मिलिटैंट के लिए, जिसने बंदूक उठा ली थी, उसकी ताईद में दो-दो लाख लोग उसके नमाज-ए-जनाजा में शिरकत करते हैं। यह हम तमाम को सोचना पड़ेगा कि हम कैसे कश्मीर के नौजवानों से इस आज़ादी के नारे को निकालेंगे, कैसे वहां पाकिस्तान के झंडे नहीं बल्कि हिन्दुस्तान के तिरंगे को लहराएंगे, कैसे उनके दिल-ओ-दिमाग में हिन्दुस्तान की अज़ीम जम्हूरियत के उन इंसाफ के उसूलों को उनके दिल-ओ-दिमाग में डालेंगे? यह हम तमाम को सोचना है। यकीनन डेढ़ साल से आप इख्तदार पर हैं। मगर जो तमाम वाकयात हुए, उसमें यूपीए का भी रोल रहा है। इंटरलोक्यूटर की रिपोर्ट बनाई गई जो बर्फदान में नहीं बल्कि उसे उठाकर किसी कचरे के कटोरे में डाल दिया गया। हमसे कश्मीर के अवाम् यह पूछते हैं।

          जब हम वर्ष 2010 में ऑल पार्टी डैलिगेशन में गए थे, जिसमें बीजेपी के लोग भी थे, हर एक ने आकर कहा था कि आपको कश्मीर की फिक्र उस वक्त होती है जब कश्मीर जलता है। यह बताइए हमने इस इंटरिम में क्या किया। वर्ष 2008 में हुआ, खामोश हो गए और हमने समझा कि हम कामयाब हो गए। वर्ष 2010 में गड़बड़ हुई, अनरैस्ट हुआ, खामोशी आई, हम समझ गए कि कामयाब हो गए। वर्ष 2016 हुआ, अब फिर हम यही समझ रहे हैं कि वहां खामोशी हो गई। मैं हुकुमत से कहना चाह रहा हूं कि आपके पास क्या पॉलिसी है, क्या विज़न है, आप उन नौजवानों को क्या देना चाहते हैं जो इस तरह की हरकत कर रहे हैं जिसे हम नहीं मानते। हम क्या करना चाहते हैं, आप क्या करना चाहते हैं कि वे मिलिटैंट्स को छोड़ दें। सैपरेटिस्ट के कॉल को छोड़कर हिन्दुस्तान के इख्तदार की कुर्सियों पर बैठने वाले काइदीन के पीछे जाएं। आज अफसोस यह है कि साबेका चीफ मिनिस्टर की खबर की हिफाज़त करने के लिए 25 सीआरपीएफ के जवान वहां खड़े किए गए। मैं यह पहली मर्तबा नहीं कह रहा हूं, हमारे मोआज़िज़ वज़ीर-ए-दाखिला जानते हैं कि मैंने पिछले आठ महीने में हर बार इस मसले को उठाया। मैं बार-बार इनकी तवज्जह ज़ाने मजबूल कराया कि देखो, मिलिटैंट जब मर रहे हैं, उनके नमाज़-ए-जनाजा में हजारों लोग शिरकत कर रहे हैं। यह आपके लिए काफी था। क्या कर रही है आपकी आईबी? अगर आईबी ने रिपोर्ट भिजवाई तो आपको इख्दामात करने चाहिए।

          मेरा हुकुमत से मुतालबा है कि आपका पीडीपी के साथ एजैंडा ऑफ एलायंस है जिसमें आपने कहा कि अफ्सपा को निकालेंगे। आपने डेढ़ साल में अफ्सपा क्यों नहीं निकाला। इख्तदार आपके पास है। आपने अपने एजैंडा ऑफ एलायंस के डौक्यूमैंट में कहा कि हम हर स्टेकहोल्डर से बात करेंगे, सैपरेटिस्ट से बात करेंगे। आपने पोलिटिकल इनीशिएटिव, सियासी इख्दामात की शुरुआत क्यों नहीं की। आपके पास 280 एराकिन-ए-पार्लिमान हैं। आपके पास इतनी बड़ी मैजॉरिटी है तो फिर आपको किस बात का डर है। आपने एजैंडा ऑफ एलायंस किया। आपका शख्स वहां पर डिप्टी चीफ मिनिस्टर है। आपने डेढ़ साल में कौन से इख्दामात किए, हमको बताइए। सिर्फ खड़े होकर यह वफादारी, मोहब्बत और कौमियत की बातें करना बहुत अच्छा होगा, मैं भी बहुत ज्यादा कर सकता हूं। मगर हुकूमत में आप हैं, एक्खदमात मुस्तेकबिल में आप क्या करने वाले हैं? यह हुकूमत को बताना पड़ेगा।

          अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अगर पाकिस्तान के नापाक इरादों में उसको नाकाम करना है, मुझे अफसोस इस बात का है कि हमारे वजीरे दाखिले दूसरे हाऊस में तकरीर करते हुए कह रहे थे कि मैं हिन्दुस्तान के मुसलमानों से कहना चाहता हूं कि पाकिस्तान के बरगलाने में न आएं। आप हम पर गलत इल्जाम लगा रहे हैं। हमको पाकिस्तान से क्या लेना-देना है? हम कभी पाकिस्तान के बरगलाने में न आए हैं, ईंशा अल्लाह हम कभी आएंगे, न हम उन लोगों को बरगलाने में आएंगे जो हमारे मुल्क में हमारे वजूद के खिलाफ हैं, हम उनके बरगलाने में भी नहीं आएं। मगर सवाल पैदा होता है, इंसाफ का तकाजा यह है इक्खलाखी फरीजा हुकूमत का है कि वह इक्खदमात को आगे बढ़ाए। हालिया दिनों में सल्लाउदीन का बयान टेलीग्राफ अखबार में आया उसने साफ तौर पर कहा कि अब हम लोग तकरीबी कार्रवाइयां कश्मीर से बाहर करेंगे। आप इसके ऊपर क्या करेंगे? कश्मीर में बारह दिन से कर्फ्यू है, दूध नहीं है, दवाइयां हैं, क्या आप वहां पहुंचा रहे हैं, कश्मीर के तारीख का दर्द सब दे रहे हैं, मुझे तारीख मालूम है, मैंने ए.जी.नूरानी की किताब डिस्ट्रक्शन ऑफ कश्मीर पढ़ी है। मैं हकायक को इसलिए बयान कर रहा हूं कि आज की इस ऐवान की कार्रवाई को कल जब मुस्तकबिल में मौरिख लिखेगा तो मौरिख मुझ पर यह इल्जाम न लगाए कि मैंने मुनाफख्त की, मैंने चापलूसी की बल्कि मैं कोशिश कर रहा हूं कि हकायख को इस हुकूमत के सामने रखूं। यह हुकूमत की गलती थी कि आप डेढ़ साल से सो रहे थे, यह आपकी रैम्बो और जेम्स बाँड की अप्रोच नहीं चलने वाली है। आपको स्टेट्समैन का एप्रोच अपनाना पड़ेगा और स्टेट्समैन का एप्रोच आपसे इस बात का मुतालबा करता है कि आप बातचीत का आगाज कीजिए।        

          महोदय, जिन बच्चों के हाथ में  पत्थर है उनका हाथ पकड़िए। क्या हुकूमत एक कमीश्न ऑफ इनक्वायरी बनाएगी ताकि इन मरने वाले बच्चों को मालूम हो सके कि उनके मां-बाप को क्यों मारा गया? अल्फाज की हमदर्दी बहुत हो चुकी है, हर कश्मीरी हमारी बात पर यकीन नहीं करता, वह इंसाफ चाहता है क्योंकि वह हिन्दुस्तानी है। जो पैलेट की गोलियां मारीं गईं, पट्टीदार एजिटेशन हुआ, जाटों का आंदोलन हुआ, किसी एक के ऊपर आंख के ऊपर गोली मारी गई, किसी एक ने अपनी बिनाई खोई, क्या उसमें कोई अंधा हुआ? आप खुद सोच लीजिए, यदि इंसानियत जिंदा है तो मैं आपसे अपील करता हूं कि हम अपने सियासी इक्खतलाफ से उठकर देखें वरना याद रखिए यदि कश्मीर कमजोर होता रहेगा तो इसका फायदा उन अनासिर को होगा जो हिन्दुस्तान को मुस्तकहम नहीं देखना चाहते इसलिए कमीश्न ऑफ इनक्वायरी बनाइए, ऑल पार्टी डेलीगेशन भी कीजिए, एक्खदमात कीजिए, अपने एजेंडा ऑफ एलाएंस पर काम करके दिखाइए तभी जाकर वहां अमन कायम करने की शुरूआत होगी। यह मत समझिए की खामोशी आ गई तो हम कामयाब हो गए बल्कि इस पर कन्सिसटेंट काम करने की जरूरत है यही चंद गुजारिश मैं आपके जरिए हुकूमत के सामने रख रहा हूं। जो  कश्मीर में लोग मारे गए चाहे वे सिक्युरिटी फोर्स के लोग हों या पचास लोग हों मैं उन सबसे इजारे ताजियत करता हूं। मैं अपील करता हूं कि आप तस्दूत का रास्ता छोड़िए और हिन्दुस्तान की जम्हूरियत पर यकीन कीजिए, हम आपके हक के लिए लड़ेंगे। जो उनसे वादे किए गए उसे पूरा कीजिए, तवारीख का दर्द यहां पर मत दीजिए तवारीख सब लोग जानते हैं। शुक्रिया। 

     

SHRI ADHIR RANJAN CHOWDHURY (BAHARAMPUR): Sir, today the House has been deliberating on the Kashmir issue which is very sensitive, and we should all ponder over it.  But, in the course of discussion, some of our colleagues were trying to pass the buck to each other.  I think, it does not behove us, given the present situation in Kashmir and in our country. कई ऐसे डिजीज होते हैं जिसमें डॉक्टर के पास जाने से डॉक्टर कहता है कि यह अभी क्यूरेबल नहीं है लेकिन मैनेजबल है There are diseases which could be manageable but not yet curable.  मैं होम मिनिस्टर साहब से दरख्ववास्त करूंगा कि कश्मीर की हालात अभी इस हालत में क्यूरेबल न भी हो सके लेकिन मैनेजबल है इसलिए आपको सही कदम उठाना चाहिए नहीं तो कश्मीर का प्रोबल्म हम सबके लिए खतरा पैदा करेगा ऐसा मैं महसूस करता हूं।          

I had an occasion to visit Kashmir valley recently.  I had observed that a sense of alienation has been cropping up again.  Not only that, common people were saying to us that the syndrome of 90s again has been coming back in the valley.  That is popular support is being accrued by those militants which is reminiscent of those years of 90s.  So, I think it does not augur well for the country like us. 

          Sir, we know that Kashmir has been integrated with us by the Instrument of Accession.  It was due to the competency of those national leaders but still, we can say that Kashmir is an integral part of our country.  We have never preached for demolishing article 370 only for securing votes.

          The word ‘secular’ was inserted in our Constitution by no fewer than Smt. Indira Gandhi.  And it is in India where leaders like Mahatma Gandhi, Indira Gandhi and Rajiv Gandhi had laid down their lives for the sake of integrity and secularism of our country.  So, if any leader like MJ Akbar Ji says that for every text, there is a context, I would like to say, that to hide the failure, there must be some pretext and that pretext was uttered by MJ Akbar Ji. यहां आगरा समिट की बात कही गई,  मुझे यह मालूम नहीं हुआ कि वह बात यहां किसलिए कही गई। Agra Summit was total failure.  Kargil fiasco is still vivid in our memory.  ऊफा की बात कहे जा रहे हैं। The Government has been pursuing a flip-flop policy in regard to Pakistan.  That is well established in our country. 

          डिप्टी स्पीकर सर, मैं आज अपने होम मिनिस्टर साहब का ध्यान एक दूसरे पहलू की ओर खींचना चाहता हूं। यह हम सबकी जानकारी में था कि कश्मीर की समस्या है और नॉर्थ ईस्ट की भी समस्या है। आज यह समस्या भयानक रूप से उभर रही है, उसकी जड़ में हमारे डॉमेस्टिक टैररिस्ट्स यानी इनडीजीनस टैररिस्ट्स हैं। यह बात आप सबको बड़े ध्यान से सुननी चाहिए। आप सब लोग हिस्ट्री की बात कर रहे थे। अगर हिस्ट्री देखी जाए तो जिन इनडिजीनस टैररिस्ट्स की बात मैं कह रहा हूं यह समस्या हिन्दुस्तान में पैदा हुई और यह कब से पैदा हुई वह भी मैं बताना चाहता हूं। यह समस्या तब पैदा हुई जब बाबरी मस्जिद डिमॉलिश हुई और गुजरात में दंगे हुए। उसके बाद से हिन्दुस्तान में इनडिजीनस  टैररिस्ट्स या होम ग्रोन टैररिस्ट्स में इजाफा हो रहा है।  इसलिए मैं कह रहा हूं कि आज हमारी सोसायटी को इस्लामिक रेडीकलाइज करने के लिए बहुत सारी ताकतें बड़ी सक्रिय हो रही हैं।  

          पश्चिम बंगाल का 300 किलोमीटर बांग्लादेश के साथ बार्डर लगा हुआ है। हम सब जानते हैं कि कुछ दिन पहले 1 जुलाई में ढाका में टेररिस्ट्स का बड़ा हमला हुआ। टेररिस्ट्स का तार हिंदुस्तान में खासकर पश्चिम बंगाल से जुड़ा हुआ है। बांग्लादेश में जिस तरह से रेडिकलाइजेशन हो रहा है, इसका असर पश्चिम बंगाल और खासकर हिंदुस्तान में होगा। पश्चिम बंगाल में खासकर कोलकाता में जितने बड़े आतंकवादियों को पकड़ा गया, सबका लिंक बेंगलुरु, पुणे, दिल्ली से है जहां ब्लास्ट हुआ था, दहशत फैली थी। इन सबका ताल्लुक इनके साथ पाया गया है। हमारे लिए सोसाइटी का रेडिकलाइजेशन बहुत खतरनाक पहलू है।

          अब आपको आईसीआईएस के बारे में सोचना होगा। आईएसआईएस का लोन वोल्फ डॉक्टरिन क्या कर रहा है? आप फ्रांस को दिखिए, अमेरिका को देखिए, बेल्जियम को देखिए, आपको सारे हिंदुस्तान को इस परस्पेक्टिव से देखना होगा कि आईएसआईएस से दहशत सारी दुनिया में फैली है, इससे निपटने के लिए हिंदुस्तान को क्या करना चाहिए?

        Sir, I would request the hon. Home Minister that you should think over it because the ISIS phenomena has been entering into our country through Bangladesh, I mean, through West Bengal, through  North-Eastern India because the ISIS will not enter into our country through Jammu Kashmir or through Punjab because Pakistan does not allow them to flourish there in Pakistan.

But in so far as ISIS is concerned, I think the Government has done nothing. If they have done anything, at least we do not know. So, I would urge upon the hon. Home Minister to ponder over it and take immediate measures to arrest the situation which is going to demolish our country.  Thank you.

                                                                                               

श्री जुगल किशोर (जम्मू) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज यहां कश्मीर विषय को लेकर चर्चा हो रही है, आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। एक आतंकवादी के मरने के बाद जो सिचुएशन बनी है, जो हालात बने हैं, इस बारे में चर्चा हो रही है। बड़ी विंडबना की बात है कि एक आतंकवादी, जिसने कई निर्दोषों की जान ली और कई सुरक्षा कर्मचारियों पर हमले किए, इस कारण उनको शहादत देनी पड़ी, उसके बाद ही ऐसे हालात वहां बने हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जो माहौल को बिगाड़ने के लिए मौके की तलाश में रहते हैं। जब भी उन्हें मौका मिलता है, माहौल को बिगाड़ने का प्रयास करते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। एक आतंकवादी के मरने पर ऐसे हालात होना देशहित में नहीं है। इसके पीछे पाकिस्तान का भी हाथ है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि खास तौर पर कश्मीर में जो आतंकवादी सक्रिय हुए हैं, पत्थरबाज पत्थरबाजी करने के लिए सक्रिय हुए हैं, इसमें पाकिस्तान का बहुत बड़ा हाथ है। पाकिस्तान भी ऐसे मौके की तलाश करता रहता है। हालात और ज्यादा न बिगडें, हालात काबू में रहें, लोगों की जान और माल का नुकसान न हो, इसके लिए सरकार ने सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए कदम जरूर उठाए हैं। यहां जिक्र किया जा रहा है कि मीडिया को बंदी बना दिया गया और कॉम्युनिकेशन बंद कर दिया गया ।

          मैं कहना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर में एक चुनी हुई सरकार है।  भारतीय जनता पार्टी और पी.डी.पी. की सरकार है। लोगों ने उन्हें सरकार बनाने के लिए मत दिया है, इसलिए लोगों की सुरक्षा करना उसका दायित्व बनता है। जो कदम प्रदेश हित, समाज हित और लोगों की सुरक्षा के हित में हैं, वहां वही कदम उठाये जा रहे हैं। लेकिन वहां कुछ ऐसे लोग हैं, जो इन मौकों का फायदा उठाते हुए अपनी दुकानें चलाना चाहते हैं। अगर वे ऐसा न करें, तो उनकी दुकानें बंद हो जायेंगी। लेकिन जम्मू-कश्मीर की जनता भारतीयता में विश्वास रखती है। कश्मीर का नौजवान भारतीयता में विश्वास रखता है और वह भारत के साथ खड़ा है।

          उपाध्यक्ष महोदय, यहां बेग साहब बोल रहे थे। उन्होंने भी कहा और आपने भी देखा होगा कि वहां हमेशा लोकप्रिय सरकारें आती हैं। लेकिन कुछ ऐसे शरारती तत्व हैं, जो पाकिस्तान के इशारे पर यहां अपनी दुकानें खोले हुए हैं और वे कुछ नौजवानों को पत्थर मारने के लिए प्रेरित करते हैं। उन नौजवानों का भी दोष है कि वे उनके बहकावे में आते हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, यहां यह चर्चा भी काफी हुई कि वहां 1700 लोग जख्मी हैं, जिनमें से कई लोगों की आंखें चली गयी हैं। इस संबंध में कई वीडियोज वायरल हुए हैं, जिन्हें सबने देखा होगा। मैं एक सिपाही के संयम को सलाम करना चाहता हूं। कुछ लोग सिपाही के पीछे लगे हुए हैं और उसे पत्थर मार रहे हैं। उसका सिर फटा हुआ है, वह लहुलुहान है लेकिन फिर भी वह दौड़ रहा है। उसे पत्थरबाज पीछे से आकर धक्का लगाते हैं और वह गिर जाता है, लेकिन वह खड़ा होता है और अपनी जान बचाने के लिए भागता है। उसके हाथ में बन्दूक भी है, लेकिन वह बन्दूक का इस्तेमाल नहीं करता। मैं ऐसे सिपाही को सलाम करना चाहता हूं। लेकिन वह इसे कब तक सहन करेगा? अगर आप एक थाने का घेराव कर लेंगे और उस थाने में कुछ लोग सोये हुए हैं, कुछ जागे हुए हैं, कुछ डय़ूटी कर रहे हैं। उस थाने को कुछ लोग आग लगाने का प्रयास करें, पथराव भी करें और गोली भी चलायें, तो क्या वे अंदर से गोली चलाकर अपना बचाव भी न करें? इसलिए कोई भी नहीं चाहता कि आसानी से गोली चलायी जाये, लेकिन कई बार हालात को काबू करने के लिए ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह भी कहना चाहता हूं कि यहां पर कुछ ऐसे नेता हैं, जो नहीं चाहते कि जम्मू-कश्मीर में अमन और शांति बनी रहे। जब से जम्मू-कश्मीर में बी.जे.पी. और पी.डी.पी. की सरकार आयी है, तब से उसने लोगों की बेहतरी के लिए बहुत अच्छे कदम उठाये हैं। मैं नरेन्द्र भाई मोदी जी, जो देश के प्रधानमंत्री हैं, का आभार प्रकट करना चाहता हूं, क्योंकि वे जम्मू-कश्मीर की बहुत चिंता करते हैं। यहां पर कोई सदस्य कह रहा था कि कांग्रेस और यू.पी.ए. सरकार ने वहां जो अमन और चैन लाया था, उस पर इन्होंने पानी फेर दिया है। ऐसा नहीं है, लेकिन आपके जो मनसूबे थे, उन पर पानी जरूर फिर गया है। वहां पर भारतीय जनता पार्टी और पी.डी.पी. की सरकार बनी है, जिसे आप कभी भी नहीं चाहते थे।

          उपाध्यक्ष महोदय, हम नरेन्द्र भाई मोदी जी का आभार प्रकट करना चाहते हैं, जो जम्मू-कश्मीर प्रदेश की इतनी चिंता करते हैं। वे दिवाली न मनाते हुए जम्मू-कश्मीर के लोगों का दुख-दर्द बांटने के लिए वहां दिन-रात रहते हैं और जब समय आता है तो 80 हजार करोड़ रुपये का पैकेज जम्मू-कश्मीर के लोगों की बेहतरी और उनके डेवलपमैंट के लिए देते हैं। यह खाली पैकेज की ही बात नहीं है। आपने देखा होगा कि दूसरे प्रदेशों में एक ही एम्स मिला होगा, लेकिन जम्मू-कश्मीर में दो एम्स मिले हैं, आईआईटीज मिले हैं। अगर जम्मू-कश्मीर की सरकार रोड, पीएमजीएसवाई, टूरिज्म आदि का कोई भी प्रोजैक्ट सैंटर में भेजती है, तो यहां के खजाने खुल जाते हैं। मंत्री लोग कहते हैं कि आप प्रोजैक्ट लायें, हम जम्मू-कश्मीर के लिए पीछे नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर की जो चिंता भारतीय जनता पार्टी और यहां के मंत्रीगण कर रहे हैं, उससे ज्यादा चिंता और कोई नहीं कर सकता। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ठीक है, आज हालात ऐसे बने हुए हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में और भी बेहतरी लाने की जरूरत है। वहां पर रोजगार की जरूरत है, बड़ी-बड़ी फैक्टरीज की जरूरत हैं। वहां पर टूरिज्म के नाते और ज्यादा ध्यान दिया जाये, इसकी भी जरूरत है। इसके साथ-साथ जम्मू-कश्मीर और भारत का नाता ज्यादा से ज्यादा आगे बढ़े, इसकी भी जरूरत है। लेकिन कुछ लोग ऐसा नहीं चाहते।

          उपाध्यक्ष महोदय, मेरी आपके माध्यम से प्रार्थना है कि जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार है और बेहतरी के साथ आगे काम कर रही है। वहां पर जो लोग शहीद हो रहे हैं, जिनकी शहादत हो रही है। ...(व्यवधान)

                                                                                     

20.00 hours HON. DEPUTY SPEAKER: We extend the time of the House till three more Members, who want to speak, finish. So, Members may please be brief.

Shri N.K. Premachandran.

PROF. SUGATA BOSE (JADAVPUR): Sir, there is no heavy agenda tomorrow. So, you may allow us to speak tomorrow.

HON. DEPUTY SPEAKER: No. Only three Members are left. They can speak today itself so that we finish it now.

SHRI N.K. PREMACHANDRAN (KOLLAM): Hon. Deputy Speaker, Sir, I thank you for giving me this opportunity to take part in the debate.

          The recent incidents of violence in the Valley of Kashmir are really a matter of grave concern as far as the whole country is concerned. Definitely, I am not going to narrate the incidents which have taken place in the Valley of Kashmir during the last 20 to 25 days.

          When we discuss about the Kashmir issue, especially in light of recent incidents of violence, we have to see the real reason for these incidents of violence which took place during those days. I think, all these are the resulting effects or the aftermath of the killing of Burhan Wani, the 22-year old Hizbul Mujahideen Commander. He was a big social media activist also. All these incidents of violence took place as a result of the killing of this young person who was a militant and a commander at the age of 22. He had joined Hizbul Mujahideen at the age of 15. That may also be taken into consideration. His brother was brutally beaten by the security forces as a result of which he had joined Hizbul Mujahideen. That is a report which we are reading from the Press.

          When we talk about Kashmir, everybody is proud of saying that Kashmir is an integral part of India. I am also very proud to say that Kashmir is definitely an integral part of India. But when we talk about Kashmir being an integral part of India, we are only talking about the geographical integrity and not the demographic integrity in respect of Kashmir. That is the main of concern and that is the main issue to be addressed because when we talk about Kashmir, we are talking that the territory of Kashmir has to be protected and not the people of Kashmir. That is the feeling of the people who are residing over there and living in the Valley of Kashmir. It has also been seen as a land dispute or border dispute in those days.

          Now, a very dangerous situation is arising in the country in respect of Kashmir issue. Slowly, this issue is being diverted to as a socially polarizing issue between two religions. That is also a little bit coming into the picture. That is a very dangerous situation. The Government has to be more cautious on this. My request to the Government is that a paradigm shift in our approach to Kashmir is highly necessary so as to win the confidence of the people of Kashmir Valley. How should we win the confidence of the people of Kashmir Valley? I would like to ask whether the incidents which took place during recent days are sufficient to meet the situation, to address the situation in the country.

          According to me, it is absolutely the failure of the Government at the Centre as well as at the State in handling the issue of unrest, uprising among the youth of Kashmir. That is the point to be taken into consideration. We are always talking against extremism and we are always talking against terrorism, but kindly see the new situation emerging and the new generation politics. That is of unrest and uprising among the youth of Kashmir. That matter has to be addressed. How should we address that matter? Even this young boy of 22 years had been for the last seven years actively engaged in campaigning of terrorism or militancy in the Valley of Kashmir using the social media, but he could gather only 30 young people as terrorists. But after his killing, he has got an image of icon of martyr. It has been reported that two lakh people had gathered for the funeral ceremony of this young boy. What are the reasons?

On going through the articles written by political analysts, these reasons can be classified into five points. The first issue is rising youth unemployment. The second one is the alleged plan for establishing the pundit Hindu colonies. It is being stated as an issue by means of articles. The third reason is the various provoking irresponsible statements of the responsible persons who are in the administration. The next one is the declared policy of NDA Government to repeal Article 370 of the Constitution. The fifth one is the disproportionate and excess force applied on the civilian people of that State. So, they are under the impression that their civil liberty is being taken away by the military forces, paramilitary forces or the police force – in total, the overall security forces.

I would like to draw the attention of the Minister to the fact that the latest uprising is being driven by a new generation, namely, the disaffected Kashmiri youth. This is the issue, which we have to see. So, we have to win the confidence of the people of Kashmir. Definitely, the country has to be united to fight out the terrorist forces and militant forces. Absolutely, we are in full agreement with the Government, but at the same time the Government has to maintain the status quo, and the mindset and the attitude of the Government has to be changed so as to win the confidence of the people of Kashmir valley.

          Secondly, there should be minimum force and maximum restraint. I feel that this is the latest policy of the Government of India because disproportionate and excess force is being applied on people, which is the complaint. Pelleting gun among the students and youth can never be justified. If we are applying our force in such a way, then definitely the youth force will never come back to the mainstream of Indian politics. This is the point to be taken into consideration.

          After the return of the hon. Prime Minister, he had convened a meeting of the concerned officers as well as Ministers, and it was decided to maintain, absolute, restraint. I fully agree and welcome this suggestion also. But, unfortunately, when I heard the speech of Shri Anurag Thakur, he was asking the question as to what the security forces are to do when stone pelting is happening against the security forces. Is it the only way to disperse the mob, that is, by using the pelleting gun? There are so many other ways to do it. So, definitely, we want peace, harmony and not tension and threat, and this matter has to be taken into consideration.

          Thirdly, regarding the role of Pakistan, I do agree with the Government that may be Pakistan is having a definite role in this issue, but apart from the role of Pakistan, please keep in mind the sentiments and emotions of the new generation who have actively participated in this violence. This aspect has to be taken care of. I strongly condemn it.

Even today, the Prime Minister of Pakistan, Mr. Nawaz Sharif has declared that this is not an internal affair of the State of India, but it is an international issue. Today, the officials of Pakistan have also submitted a petition to the United Nations Secretary General, Mr. Ban Ki-moon, and the President of the Security Council also expressing concern on the Kashmir valley issue. What is the authority with them for doing this? So, we strongly condemn it because Pakistan is trying to internationalise the issue and raise the issue in the international fora. So, I appeal to the Government to be more cautious, be intelligent, be wise, and be restrained in addressing the issues of the youth of the country, especially, in the Kashmir valley.

          With these words, I conclude my speech. Thank you very much, Sir.

PROF. SUGATA BOSE (JADAVPUR): Mr. Deputy-Speaker, Sir. First of all, I would like to express my gratitude to the hon. Home Minister, Shri Rajnath Singh, for being present in the House  at this late hour to listen to us on this very sensitive topic of peace and security in Kashmir.

          I entirely agree with my good friend, Shri M. J. Akbar that every text has a context and that we can learn lessons from history in order to address the contemporary situation in Jammu & Kashmir. Shri Muzaffar Hussain Baig in his long and passionate speech gave his own reading of Kashmiri history. Since, unlike Shri M. J. Akbar and Shri Muzaffar Hussain Baig, I cannot claim Kashmiri parentage, I hope that this academic historian’s interpretation will be accepted as impartial and on the basis of that I want to make a very constructive proposal for the Government of India to consider.

          As the tragedy unfolded over the last 12 days, I picked up a book of history written by a former Kashmiri student of mine called Dr. Chitralekha Zutshi and found these lines that she quoted from a late 18th Century writer.

 “The garden of Kashmir became a wound of pain, The master’s pleasure became the people’s indigence, They fell upon the soul of Kashmir, As voracious dogs set loose.

The doors, walls, roofs and streets, And every soul complained like a doleful flute.

The hearts of the tyrants were as hard as stone, They were too implacable to feel the people’s pains.”   These lines were written about the tyrannical rule of the Afghans in Kashmir from 1752 to 1819 by Saiduddin Shahabadi in his late 18th century history of Kashmir titled Bagh-i-Suleiman (Solomon’s Garden). Since then, unfortunately, many managers of colonial and post-colonial States have been guided by territorial greed and have not felt the people’s pain. The time has now come, if it is not long overdue, to feel and respond to the people’s pain and embraceinsaniyat  or humanity just as Atal Bihari Vajpayee Ji had as the guiding principle in the quest for  just peace in this crucible of conflict.

          In my view, Kashmiri expressions of regional identity, at their best, have always been compatible with universal humanity. Who gave the Kashmiris their regional identity? They were the great devotional preachers like Lal Ded or Nund Rishi, Sheikh Nooruddin. They preached in the regional vernacular and created a close mesh between language and religion. They were not that different from the bhakti preachers, like Mirabai, in other regions of India. They taught the people to creatively accommodate their differences.

          Now, a namesake of our current Minister of State for External Affairs, another Akbar, conquered Kashmir in 1586. But that was no ordinary conquest. Akbar only claimed the highest manifestation of sovereignty and he left many other local and regional sovereigns in place. Now, of course, his son, Jahangir, was completely captivated by the beauty of the Kashmiri landscape and that created stereotypical images of the region. We have had our modern Jahangirs in the form of Jawaharlal Nehru, but what we need to remember today is that Kashmir is not just a landscape. There are people who inhabit that beautiful Valley.

          Now, what the British did was to have a kind of monolithic sovereignty of their own in the British Indian Provinces and then they had many Princely Rulers, and there was the Dogra Ruler of Jammu and Kashmir for 100 years – 1846 to 1947. Since the British guaranteed his sovereignty, he could be somewhat tyrannical. He need not grant patronage to the religious and cultural sites of all their subjects. So, some of his Muslim subjects were disaffected. The first mass movement took place in 1931 as a result of that kind of negation of understanding the needs of the people.

          Now, in the contemporary period, of course, since the late 1940s, the old historic State of Jammu and Kashmir has been divided into our own State and one-third has been under Pakistani occupation and a slice has been given away by Pakistan to China. I think there was an element of truth in what Muzaffar Baig Sahab was saying. It was in the 1950s, 1960s, early 1970s that successive Congress regimes, and there are no Congress Members present here right now – SHRI K.C. VENUGOPAL : I am here.

PROF. SUGATA BOSE: Oh, you are there! But they had whittled down Article 370. It became a shadow and a husk of what it originally was in 1952-53. It was a certain kind of denial of democracy and also a negation of genuine federal autonomy that led in 1989 to the beginning of the insurgency. I will not go through the history of the insurgency. There was the JKLF, supposedly a secular formation to begin with, but already by 1994, the balance of power shifted into the hands of the Hizbul Mujahideen; after that, there were groups like the Lashkar-e-Taiba and the Jaish-e-Mohammed, trained in terror by Pakistan, which attacked our military and civilian targets alike. All that I will say is that it is a story of brutalization that should hold the salutary lesson that tactics of terror generally prove self-defeating for the cause that they try to promote.Conversely, it is futile to seek an end to the cycle of terrorism without addressing the roots of injustice – real and perceived that nourish it.

Our former Prime Minister Shri Atal Behari Vajpayee had the vision and statesmanship to understand the complexity of the Kashmir problem. Can we forget that he released Hurriyat leaders from prison in the spring of 2000? He declared a Ramzantruce later that winter. He showed that his Government was capable of goodwill to try and grasp the Kashmir nettle. I would urge the current Government of India to follow in Shri Vajpayeeji’s footsteps and open a comprehensive political dialogue with all shades of opinion in Jammu and Kashmir.

Now if the British Government headed by Mr. John Major and Mr. Tony Blair could talk to Martin McGuinness, the de facto  head of the Irish Republican Army to reach the Good Friday Agreement of 1998, there is no reason why we cannot speak to those who are deeply alienated while maintaining our own commitment to the unity and integrity of India. Now, there will, of course, be no short cuts in this process. We have to have a people-centred approach; we should not treat Kashmir as a real estate dispute; and also we have to let Kashmiris to talk to one another. The demographic composition of Kashmir is very complex. That is why, no simple plebiscitary solution is possible there. We all know that in order to ensure rule by religiously defined majorities, Bengal and Punjab were partitioned in 1947 and also Ulster in Ireland  was partitioned. And those of us who know the human toll of this expedient decision to partition would want to keep census-takers and map-makers with an old colonial mindset as far away as possible from the drawing board of a Kashmir peace process.

I now come to the constructive proposal that I want to offer this Government. More than a decade ago, Shri Sumantro Bose -- who for reasons of transparency, I should say is my younger brother -- wrote a book called ‘Kashmir: Roots of Conflict, Path to Peace’ where he suggested that in the search for a peace-building framework, we could take a leaf or two out of the book of the Irish peace process. Now, the Irish experiment occasionally runs into rough weather but it has proceeded much further than is the case of  the sub-continent. We can modify it to suit our conditions. Shri Vajpayeeji had been willing and eager between 2000 and 2004 to open new channels of communication with a wide array of groups in Kashmir, even those who have been shunned earlier as separatists. He also did a major rethink on our earlier stance and negotiations with Islamabad as there seemed to be no prospect of long-term peace in Kashmir without bringing Pakistan on board. It is very easy to blame the neighbouring country. But, even Satan cannot enter until he has found a  flaw. So, we should look inwards and remove that flaw that we might have so that that does not happen. We need to talk to our own Kashmiri citizens once again. Let Kashmiris talk to one another, give the regional peoples of Jammu, Ladakh and Kashmir Valley a chance to arrive at an adjustment of their claims and counter claims. The people of Kashmir have a long history of knowing how to live with differences. We do not need to force them into communitarian ghettos.

The history of ancient, medieval, early modern India is replete with instances of Rajas, Maharajas, Maharajadhirajas, Shahs and Shehanshahs reigning in relative peace having shared out sovereignty along different layers of the Indian polity. An emperor was only a king at the centre of a circle of kings. Today, the Centre  needs to be a democratically elected Central Government at the Centre of a circle of State Governments. The best speeches today that I have heard have been from Leaders of regional parties, whether it is Shri Tathagata Satpathy speaking for the BJD or the person who spoke on behalf of the YSR. We have a chance now to completely re-negotiate the federal equation and have a new kind of a political centre which, I believe, will be a federal union that will be a long-lasting and stronger union. So, I would like to suggest to this Government that we in India learnt the concept of unitary sovereignty from the British and in 1947. We  were not able to layer and share sovereignty and sadly we divided the land. 

A drastic redefinition of sovereignty preceded the Good Friday Agreement in Ireland and also paved the way for Scottish and Welsh autonomy. And this ideational change was not easy to achieve. If the British can rethink the idea of sovereignty and share it, I do not see why we cannot do so. Let us take a leaf out of that book. The British gave up absolutist claims of sovereignty over Northern Ireland, yielded political space to new democratic arenas which hold lessons for comparable conflicts. Of course Brexit is going to create all kinds of problems now in Northern Ireland, but it was a good move.

Our best political theorists who lived in the pre-colonial period, who led our anti-colonial struggle, would have had no argument over the concept of layered and shared sovereignty. They knew its theory and practice. There is no reason why we should be beset by the ghosts of Curzon and Mountbatten and cling to a colonial definition of sovereignty. We can do much better if we rely on our own political traditions in building an Indian Union which young people in the Northern and also the North-Eastern extremities of our vast country will proudly want to be part of and certainly not want to leave.

So, I want this House, this Lok Sabha, to rise up to the full stature of its statesmanship and try its level best to turn Kashmir which has been a crucible of conflict into a cradle of peace. Thank you, Mr. Deputy Speaker for letting me speak.

श्री राजेश रंजन (मधेपुरा) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं गृह मंत्री जी को बधाई देता हूं कि इस मामले में उनकी गम्भीरता दिखती है। गृह मंत्री जी, यह सुनामी है और यहां जो बहस हो रही है, वह भविष्य के खतरे को दर्शाती है।

       कश्मीर को आर्थिक समाधान की आवश्यकता नहीं है। कश्मीर को बड़े व्यापक ढंग से समाधान की आवश्यकता है। वहां आर्थिक समाधान की आवश्यकता नहीं है। अकबर साहब और हमारे अन्य भाई बोल रहे थे कि बंटवारे के वक्त लोग मौन थे। महात्मा गांधी जी पूना पेक्ट के बाद अम्बेडकर जी के विचारों से असहमत होकर धरने पर बैठ गए थे। उन्होंने कहा था कि इसको मानना ही होगा। उन्होंने यहां तक कह दिया कि चाहे मेरी जान जाए या रहे, चाहे जितना बड़ा केओस देश में पैदा हो, हम इस सवाल से नहीं उठेंगे। अंत में बाबा साहेब अम्बेडकर को इन सवालों पर बैक होना पड़ा था। जब महात्मा गांधी जी उन विचारों पर दृढ़ हो सकते थे तो जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो रहा था, तो क्या उन मुद्दों पर गम्भीरता नहीं दिखायी जा सकती थी।

          मुझे लगता है कि जब-जब राजनीति, पार्टी, वोट और सत्ता खतरे में पड़ती है तो राजनैतिक व्यक्ति देश, धर्म और जाति को खतरे में डाल देता है। मुझे नहीं लगता है कि इस देश की किसी एक जाति, एक धर्म या इस दुनिया के अंतिम व्यक्ति को, जिस तरह की दुनिया की सामरिक व्यवस्था है, कोई टच कर सकता है। हिन्दुस्तान की आजादी के इतने समय के बाद भी यह समस्या बनी हुई है, क्या यह पॉलीटिकल सिस्टम और पॉलीटिकल विल पावर की वजह से नहीं है? क्या हम इस देश की सामाजिक व्यवस्था के लिए नासूर नहीं हो चुके हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सभी लोग कहते हैं कि कश्मीर में विश्व का सबसे बड़ा सूफिज्म था।

          कश्मीर की वादियों में चाहे वह कोई व्यक्ति हो अथवा कश्मीरी हो, यदि हम धर्म के लिए वहां जाते हैं तो वे पिठ्ठू का काम करते हैं। वे धर्म के काम में आगे आकर हाथ बंटाते हैं। कभी उन्होंने बुर्का नहीं पहना, जब हिंदुस्तान का अवाम कश्मीर को प्रदेश में बदल रहा था, तब उन्होंने स्वीकार किया। जब कश्मीरी झंडे को बदलकर हम राष्ट्रीय झंडे को वहां ले जा रहे थे, तब उन्होंने हमें स्वीकार किया। जब हम करेंसी बदल रहे थे, तब उन्होंने स्वीकार किया। जब हम गवर्नर दे रहे थे, तब उन्होंने स्वीकार किया। वे लगातार हमारे प्रयासों को सूफिज्म के आधार पर स्वीकार करते गये और कश्मीर को सम्पूर्ण भारत का हिस्सा बनाने में कश्मीरियों ने कभी भी अपने दिल को छोटा नहीं किया। फिर हम कश्मीर की वादियों में रहने वाले चाहे वे मुसलमान हों या अन्य कोई हों, हम उन्हें कैसे कुछ कह सकते हैं, हम उन पर आरोप कैसे लगा सकते हैं। आखिर क्या कारण है, आज जो कश्मीरी व्यवस्था है और उसमें जो हालात पैदा हुए हैं, वे राजनीतिक व्यवस्था के अलावा और पोलिटिकल विल पावर की कमी के कारण पैदा हुए हैं, जिसके कारण वहां दूसरी व्यवस्था लागू नहीं हो सकती।

          अभी कई लोगों ने कहा, हम देख रहे थे और पढ़ रहे थे कि आखिर विभाजन क्या है? भारत का विभाजन एक तरह से अपनी जातियों, मध्य वर्ग और जनता के बीच सम्पर्क की कमी की स्थिति का कानूनी दस्तावेज है, यह डा.राम मनोहर लोहिया ने कहा था। इसी तरीके से हेराल्ड जेलास्की ने भी यही शब्द कहे और जोसफ स्टालिन ने कहा है - राष्ट्र एक ऐसा जन समुदाय होता है, जिसका गठन ऐतिहासिक प्रक्रिया में होता है। समान भाषा, भौगोलिक क्षेत्र, आर्थिक जीवन और मनोवैज्ञानिक संरचना उसकी समान संस्कृति के आवयविक तत्व होते हैं। मैं बहुत ही गम्भीरता के साथ कहना चाहूंगा, आप सभी लोग यहां उपस्थित हैं, यदि आप किसी की सामाजिक संस्कृति पर चोट करेंगे, धार्मिक संस्कृति पर चोट करेंगे, आप उसकी आर्थिक संस्कृति पर चोट करेंगे, आप उसके वजूद को मिटायेंगे तो उसका परिणाम क्या होगा। हम जानना चाहते हैं कि आजादी के बाद आखिर क्या कारण है कि दलित जय भीम, बुद्धो नमः का नारा देते हैं। क्या कारण है कि वह अपने नीले झंडे को अपनी आत्मिक ताकत समझता है। कहीं न कहीं हमने दलितों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चीजों पर चोट की है। कहीं न कहीं हमने अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक संरचना पर चोट की है। क्या कारण है कि एन.एस.जी. में अल्पसंख्यक एक प्रतिशत भी नहीं हैं। क्या कारण है कि आजादी के बाद रॉ, सीबीआई, एस.पी.जी. और सेना में अल्पसंख्यकों की भागीदारी नहीं है। ...(व्यवधान) हम किसी को गाली नहीं देंगे। हम न उन्हें देंगे और न इन्हें देंगे। आप यदि उनकी सामाजिक और आर्थिक संरचना का ध्यान नहीं रखेंगे, आप यदि उनके वजूद को मिटायेंगे, आप यदि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचायेंगे, आप यदि उनके अस्तित्व को मिटाने का प्रयास करेंगे तो वह कहीं न कहीं और कोई सहारा लेगा। वह पाकिस्तान की बात नहीं करता है।

          जब कश्मीर में आंदोलन हो रहा था तो हम वहां गये थे। मैं वहां के नौजवानों से मिला। वे हिंदुस्तान के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हिंदुस्तान में आज तक राजनीतिक व्यवस्था के तहत, उनके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक वजूद को मिटाया गया, जिसके लिए उसके दिल में पीड़ा है, दर्द है। मैं माननीय गृह मंत्री जी से बहुत गम्भीरता के साथ कहना चाहूंगा कि हमारी जो वर्तमान सरकार है, हम लाल बहादुर शास्त्री जी को नहीं भूल सकते, हम सरदार पटेल को नहीं भूल सकते, हम इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जी को नहीं भूल सकते, जो लगातार देश की इस सामाजिक संरचना के लिए काम करते रहे। कश्मीर के मुद्दे को हम जब तक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर रखेंगे, तब तक कश्मीर के मुद्दे का सॉल्यूशन नहीं निकलेगा। अन्य देश अपने मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय नहीं बनाते और भारत के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा कहकर परोसते हैं। जब तक अमेरिका, चीन और रूस हमारे देश के भीतर पंचायत करते रहेंगे, जब तक चाइना की गिद्ध दृष्टि और अमेरिका की आर्थिक गिद्ध दृष्टि यहां लगी रहेगी, तब तक कुछ नहीं होगा। कश्मीर को दोनों तरफ सिर्फ इसीलिए मुद्दा बनाया गया, क्योंकि बड़ों का बाप, कइयों का बाप होता है। पाकिस्तान उनके लिए महत्वपूर्ण है और हिंदुस्तान भी उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान में रहने वाला अवाम कितना असुरक्षित है, यह आप जानते हैं, क्योंकि पाकिस्तानी हुकूमत आतंकवादियों की पक्षधर है।

          पाकिस्तान में जो सरकार है, वह चलती किसकी बदौलत है? उसकी अर्थव्यवस्था कहां से चलती है? राजनाथ सिंह जी गलत हो सकते हैं, पूरी जाति गलत नहीं हो सकती है। पप्पु यादव गलत हो सकता है, लेकिन पूरी जाति गलत नहीं हो सकती है। कोई आतंकवादी एक कौम का एक व्यक्ति हो सकता है, लेकिन हम मुसलमान को गाली नहीं दे सकते हैं। आज यह व्यवस्था बनाई जा रही है कि पूरी दुनिया का मुसलमान गलत है। यह बात तो मोहम्मद साहब ने भी कही है। कुरान में मोहम्मद साहब ने कहा है कि हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया में इस्लाम की विचारधारा बचेगी, हो सकता है कुछ व्यक्तियों के कारण मुसलमान मिट जाएं। गुरू नानक देव जी ने तो इतना तक कहा कि  "न रहिन मूसा, न बचिए ईसा। " इन दोनों का अस्तित्व मिट जाएगा। रामकृष्ण परमहंस ने तो 1836 की हिजरी की कल्पना की। संत रविदास ने तो इतना तक कहा कि  "रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा",  किस बात को ले कर उद्धत किया था? इसी इंसानियत के द्वारा जन्म दी हुई, सामरिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना पर जब चोट पहुंचती है, जब पेट में भूख लगती है तो धार्मिक हठधर्मिता नहीं चलती है। हम बधाई देते हैं, देश के वर्तमान प्रधानमंत्री को, निश्चित रूप से उन्होंने कभी भी बड़बोलेपन की व्यवस्था नहीं दिखाई। देश का कोई भी प्रधान मंत्री रहा हो, इस हिंदुस्तान की अस्मिता और विश्व को मजबूत करने के लिए उन्होंने हमेशा प्रयास किया है। वर्तमान सरकार के प्रधान मंत्री ने भी बढ़ कर प्रयास किए हैं। किसी प्रधान मंत्री को गाली नहीं दी जा सकती है।

          मेरा अंतिम आग्रह आपसे है, आप जानते हैं कि 77 हज़ार करोड़ रूपये, कश्मीर में अलग-अलग चैनलों से आतंकवाद को बढ़ाने के लिए कहां से आ रहे हैं? सारे दस्तावेज़ मेरे पास है, मैं आपको दूंगा। आप जानते हैं कि ज़ी न्यूज़ में भी सारी चीजों को दिखाया गया है कि हिंदुस्तान में सऊदी अरब और ऐसे बहुत से देशों से मस्जिद के माध्यम से पैसा आ रहा है। इस्लाम शत-प्रतिशत टॉलरेंस का नाम है। शत-प्रतिशत टॉलरेंस पर इस्लाम के विचारों का जन्म हुआ। जो जीरो प्रतिशत टालरेंस पर जीवन जीना चाहता है, वह इस्लाम नहीं है, वह मुसलमान नहीं है। मुसलमान वह है जो शत-प्रतिशत टालरेंस पर, मानवता और मोहब्बत का पैगाम देता है। मौ अपनी बात को समाप्त करूं, उसके पहले मैं गृह मंत्री जी से कहना चाहता हूँ कि कश्मीर हम लोगों के हाथ से निकलता जा रहा है। कश्मीर निकल चुका है। आप इस बात को मानें न मानें आप इस बात को एक दिन बोलिएगा। ...(व्यवधान) यदि हिंदुस्तान में इसी तरह पंचायत करने वाले बाहर के होंगे और यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनता रहेगा, तब तक कुछ नहीं होगा। हमारे एक मित्र कह रहे थे कि हमला कीजिए। क्या अमरीका, चाइना और रूस के रहते हमला कर पाएंगे? कभी नहीं कर पाएंगे और यह सॉल्युशन भी नहीं है। इसलिए कश्मीर की वादियों में रहने वाले लोगों की आर्थिक, शैक्षणिक और राजनैतिक ताकत को पहचान कर उसको हिंदुस्तान की अवाम की मूल आत्मा से जोड़ना होगा, तभी हम कश्मीर और कश्मीरियों को बचा पाएंगे।

 

HON. DEPUTY SPEAKER: The House now stands adjourned to meet tomorrow the 21st July, 2016 at 11 a.m. 20.34 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Thursday, July 21, 2016 / Ashadha 30, 1938 (Saka).      

           

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