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State Consumer Disputes Redressal Commission

L I C vs Vikram Singha on 19 July, 2017

  	 Cause Title/Judgement-Entry 	    	       STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP  C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010             First Appeal No. A/2002/2779  (Arisen out of Order Dated  in Case No.  of District State Commission)             1. L I C  A ...........Appellant(s)   Versus      1. Vikram Singha  A ...........Respondent(s)       	    BEFORE:      HON'BLE MR. Vijai Varma PRESIDING MEMBER    HON'BLE MR. Sanjay Kumar MEMBER          For the Appellant:  For the Respondent:    Dated : 19 Jul 2017    	     Final Order / Judgement    

 सुरक्षित

 

 

 

 राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।

 

 अपील संख्‍या-2779/2002

 

(जिला उपभोक्‍ता फोरम, प्रथम बरेली द्वारा परिवाद संख्‍या-422/1995 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 01.10.2002 के विरूद्ध)

 

 

 

1.

लाइफ इन्‍श्‍योरेन्‍स कारपोरेशन आफ इण्डिया द्वारा सीनियर डिवीजनल मैनेजर, डिवीजनल आफिस, 25-डी रामपुर बाग, बरेली।

2. लाइफ इन्‍श्‍योरेन्‍स कारपोरेशन आफ इण्डिया द्वारा सीनियर ब्रांच मैनेजर, सिटी ब्रांच-II, स्‍टेशन रोड, बरेली।

3. लाइफ इन्‍श्‍योरेन्‍स कारपोरेशन आफ इण्डिया द्वारा जोनल मैनेजर, जोनल आफिस, 16/98 महात्‍मा गांधी मार्ग, कानपुर।

                                      अपीलार्थीगण/विपक्षीगण बनाम्      विक्रम सिंगला पुत्र श्री पुरूषोत्‍तम लाल सिंगला, निवासी ए-19, राजेन्‍द्र नगर, बरेली।

                                    प्रत्‍यर्थी/परिवादी   समक्ष:-

1. माननीय श्री विजय वर्मा, पीठासीन सदस्‍य।
2. माननीय श्री संजय कुमार, सदस्‍य।

अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री विकास कुमार अग्रवाल, विद्वान अधिवक्‍ता।

प्रत्‍यर्थी की ओर से उपस्थित   : श्री संजीव बहादुर श्रीवास्‍तव, विद्वान अधिवक्‍ता।

दिनांक 28.08.2017 मा0 श्री संजय कुमार, सदस्‍य द्वारा उदघोषित निर्णय यह अपील, परिवाद संख्‍या 442/1995, विक्रम सिंगला बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम व अन्‍य में जिला उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष फोरम, प्रथम बरेली द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 01.10.2002 से क्षुब्‍ध होकर विपक्षीगण/अपीलार्थीगण की ओर से योजित की गयी है, जिसके अन्‍तर्गत जिला फोरम द्वारा निम्‍नवत् आदेश पारित किया गया है :-

'' परिवाद विपक्षीगण के विरूद्ध आज्ञप्‍त किया जाता है। विपक्षीगण को निर्देश दिया जाता है कि वह आदेशके एक माह के अन्‍दर परिवादी को बीमा धनराशि 2,00,000/-रूपये (दो लाख रूपये) तथा उस पर दिनांक 30-3-95 से भुगतान की तिथि तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्‍याज सहित अदा करें तथा 2,000/-रूपये वाद व्‍यय भी परिवादी को अदा करें। ''   अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री विकास कुमार अग्रवाल तथा प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री संजीव बहादुर श्रीवास्‍तव उपस्थित आये। विद्वान अधिवक्‍तागण को विस्‍तार से सुना गया एवं प्रश्‍नगत निर्णय/आदेश तथा उपलब्‍ध अभिलेखों का गम्‍भीरता से परिशीलन किया गया।
परिवाद पत्र का अभिवचन संक्षेप में इस प्रकार है कि परिवादी/प्रत्‍यर्थी की मां श्रीमती पुष्‍पलता सिंगला ने विपक्षी संख्‍या-2 से रू0 2,00,000/- की एक बीमा पालिसी प्‍लान 74-15 के अन्‍तर्गत दिनांक 28.05.1993 को विपक्षीगण के एजेण्‍ट द्वारा करवायी थी, जो दिनांक 28.05.1993 से दिनांक 28.05.2008 तक थी। बीमा प्रस्‍ताव भरते समय परिवादी की मां ने अपने पति की एक पालिसी 1,00,000/-, पालिसी संख्‍या-160318384 के अलावा कोई भी अन्‍य पालिसी अपने पति से सम्‍बन्धित नहीं बतायी थी और एजेण्‍ट द्वारा भी प्रस्‍ताव फार्म में उक्‍त एक पालिसी का ही विवरण भरा गया था। परिवादी/प्रत्‍यर्थी उपरोक्‍त पालिसी में नामिनी है। परिवादी/प्रत्‍यर्थी की मां द्वारा लगातार पालिसी की किश्‍तें निर्धारित तिथियों में जमा की जाती रहीं हैं। बीमा अवधि के दौरान ही अचानक परिवादी/प्रत्‍यर्थी की मां का देहांत 28.05.1994 को हो गया। उपरोक्‍त पालिसी में नामिनी होने की हैसियत से परिवादी/प्रत्‍यर्थी द्वारा विपक्षीगण के यहां बीमादावा प्रस्‍तुत किया गया और समस्‍त औपचारिकतायें पूर्ण की गयी। पत्र दिनांक 04.10.1994 द्वारा विपक्षी संख्‍या-1 ने परिवादी को सूचित किया कि उसकी मां ने प्रपोजल फार्म में दो पालिसी लिखी थी, जिसकी पालिसी सं0-160318384 एवं 160318385 लिखाया गया। परिवादी ने उक्‍त पत्र का उत्‍तर दिनांक 26.10.1994 को दे दिया गया, किन्‍तु विपक्षीगण द्वारा दिनांक 30.03.1995 के पत्र द्वारा परिवादी का क्‍लेम दावा अस्‍वीकृत कर दिया गया, जिससे क्षुब्‍ध होकर प्रश्‍नगत परिवाद जिला फोरम के समक्ष योजित किया गया।
जिला फोरम के समक्ष विपक्षीगण द्वारा परिवाद पत्र का विरोध करते हुए प्रतिवाद पत्र दाखिल किया गया और मुख्‍यत: यह कहा गया कि प्रस्‍तुत पत्र दिनांकित 01.09.1993 में बीमाधारक ने अपने पति के जीवन पर दो पालिसियों का कथन किया है, जिसका बीमा रूपये 2,00,000/- का था। अत: नियमानुसार उतने ही बीमाधन के लिए प्रस्‍तावक के जीवन पर जीवन जोखिम संरक्षित किया गया तथा परिवादी का दावा जांच के उपरांत इंकार कर दिया गया, जिसमें कोई सेवा में कमी नहीं की गयी है।
जिला फोरम ने दोनों पक्षों को सुनने के उपरांत गुणदोष के आधार पर उपरोक्‍त वर्णित निर्णय/आदेश पारित किया है, जिससे क्षुब्‍ध होकर वर्तमान अपील विपक्षीगण/अपीलार्थीगण की ओर से योजित है।
अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया कि बीमाधारक की मृत्‍यु पालिसी लेने के एक वर्ष के भीतर हो गयी। पालिसी के प्रावधानों के अनुसार जांच करायी गयी, जिसमें यह पाया गया कि बीमाधारक ने प्रस्‍ताव फार्म में गलत कथन किया था। बीमाधारक के पति ने दो पालीसियां ली थी तथा वह चालू थीं। बीमाधारक द्वारा गलत कथन किये जाने के कारण बीमा दावा निरस्‍त किया गया है। अपीलार्थीगण की ओर से सेवा में कोई कमी नहीं की गयी है। जिला फोरम जो निष्‍कर्ष दिया है कि प्रस्‍ताव फार्म में कटिंग एवं हैण्‍डराइटिंग में भिन्‍न प्रकार की स्‍याही का प्रयोग किया गया है, यह गलत है।
प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से यह तर्क किया गया कि बीमाधारक द्वारा प्रस्‍ताव फार्म भरते समय अपने पति की जीवन पालिसी के सम्‍बन्‍ध में केवल एक ही पालिसी का वर्णन किया गया था, जो चालू अवस्‍था में थी। दूसरी पालिसी का कथन नहीं किया गया था। किसी अन्‍य व्‍यक्ति द्वारा दूसरी पालिसी का नम्‍बर अंकित कर चालू अवस्‍था का वर्णन किया गया है। प्रस्‍ताव फार्म पर स्‍पष्‍ट रूप से भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार से लिखा गया है और स्‍याही भी भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की है, जिससे जालसाजी स्‍पष्‍ट रूप से दिखायी देती है। अत: जिला फोरम ने गहनता से विचार करने के उपरांत जो निर्णय/आदेश दिया है, वह सही एवं उचित है।
आधार अपील एवं सम्‍पूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया गया, जिससे यह तथ्‍य विदित होता है कि बीमाधारक ने अपने पति के जीवन काल में एक बीमा पालिसी संख्‍या-220522776 रूपये दो लाख की करायी थी, जो दिनांक 28.05.1993 से दिनांक 28.05.2008 तक थी। बीमाधारक की मृत्‍यु दिनांक 28.05.1994 को हो गयी। अपीलार्थीगण का यह तर्क कि बीमाधारक ने प्रस्‍ताव फार्म में 13 (सी) में दो पालिसी संख्‍या-160318384 एवं 160318385 का वर्णन किया है तथा पालिसी की वर्तमान स्थिति के सम्‍बन्‍ध में (Inforce) चालू वर्णित है। इस प्रकार प्रस्‍ताव पत्र 13 (सी) में किया गया कथन गलत है, क्‍योंकि पालिसी सं0-160318385 लैप्‍स हो गयी थी, परन्‍तु प्रस्‍ताव पत्र में चालू (Inforce) अंकित किया गया है। यह तर्क स्‍वीकार किये जाने योग्‍य नहीं है, क्‍योंकि प्रस्‍ताव पत्र के अवलोकन से ज्ञात होता है कि प्रथम पालिसी सं0-160318384 के निगम के कार्यालय का नाम Chandigar Bhatinda लिखा हुआ है, जबकि दूसरी पालिसी सं0-160318385 के निगम के कार्यालय का नाम केवल Bhatinda लिखा हुआ है तथा पालिसी की वर्तमान स्थिति के स्‍थान पर (Inforce) शब्‍द जो लिखा हुआ है, वह वास्‍तव में भिन्‍न हैण्‍डराइटिंग है। प्रस्‍ताव पत्र के अवलोकन से यह भी स्‍पष्‍ट है कि दूसरी पालिसी का वर्णन किसी अन्‍य व्‍यक्ति द्वारा सोची-समझी सजिश के अन्‍तर्गत किया गया है, क्‍योंकि दूसरी पालिसी के निगम के कार्यालय के नाम में चण्‍डीगढ़ शब्‍द छूट गया है। पालिसी संख्‍या के नीचे क्रास नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में किसी अन्‍य पालिसी की संख्‍या लिखी जा सकती है। प्रस्‍ताव पत्र के अवलोकन से यह स्‍पष्‍ट होता है कि जो दूसरी पालिसी संख्‍या-160318385 अंकित है, वह प्रस्‍तावक द्वारा अंकित नहीं किया गया है। अत: सम्‍पूर्ण विवेचना के आधार पर हम इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते हैं कि दूसरी पालिसी का नम्‍बर प्रस्‍तावक द्वारा नहीं लिखा गया है और न प्रस्‍ताव पत्र में कोई कथन गलत अथवा असत्‍य है। जिला फोरम ने गहनता से विचार करने के बाद जो निर्णय/आदेश दिया है, उसमें कोई त्रुटि नहीं है तथा जिला फोरम के निर्णय/आदेश में हस्‍तक्षेप करने का कोई औचित्‍य नहीं है। तदनुसार अपील निरस्‍त होने योग्‍य है।
आदेश   अपील निरस्‍त की जाती है।
पक्षकारान अपना-अपना अपीलीय व्‍यय स्‍वंय वहन करेंगे।
पक्षकारान को इस निर्णय की प्रमाणित प्रतिलिपि नियमानुसार उपलब्‍ध करा दी जाये।
   
   (विजय वर्मा)                        (संजय कुमार)

 

           पीठासीन सदस्‍य                             सदस्‍य

 

 

 

 

 

 

 

लक्ष्‍मन, आशु0, कोर्ट-2                 [HON'BLE MR. Vijai Varma]  PRESIDING MEMBER 
     [HON'BLE MR. Sanjay Kumar]  MEMBER