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Lok Sabha Debates

Discussion On The Motion For Consideration Of The Protection Of Children From ... on 22 May, 2012

> Title: Discussion on the motion for consideration of the Protection of Children from Sexual Offences Bill, 2012, as passed by Rajya Sabha (Discussion concluded and Bill passed).

 

महिला और बाल विकास मंत्रालय की राज्य मंत्री (श्रीमती कृष्णा तीरथ):  धन्यवाद, सभापति महोदय। बहुत देर के इंतज़ार के बाद बच्चों का एक ऐसा बिल लाने का मौका मिला है। महोदय, मैं आपकी अनुमति से प्रस्ताव करती हूं           "कि लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण           करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित या आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए। "        

         
          महोदय, मैं यह बताना चाहती हूं कि इस बिल को लाने में एक बहुत लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है। सभी मंत्रालयों, राज्य सरकारों, सिविल सोसायटी और एक्सपर्ट की सहायता से बिल को बनाया गया जो बच्चों की सुरक्षा करने में कारगर हैं।
          इस बिल को लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी, इसके ऊपर मैं सदन को आपके माध्यम से बताना चाहूंगी कि प्रतिदिन समाचार-पत्रों के माध्यम से तरह-तरह की शिकायतें जन प्रतिनिधियों को भी मिलती हैं कि बच्चों की स्थिति बहुत दयनीय है। यह बिल जेंडर न्यूट्रल है। इसमें लड़का-लड़की की बात नहीं है। इसमें छोटे बच्चों को मिसहैंडल करते हैं, उसके साथ इस तरह का एक वातावरण पैदा होता है कि बच्चों को बचपन से ही एक डर के माहौल में जीना पड़ता है और उसकी परवरिश भी अच्छी नहीं होती है।
          इसके पहले हमारे पास बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई बिल नहीं था। एक बिल जो हमलोग आई.पी.सी. में हमेशा से उपयोग करते रहे, वह बिल बिल्कुल इस तरह का था कि वर्तमान में जो सेक्सुअल ऑफेन्स थे, वे केवल इंडियन पेनल कोड के अंतर्गत थे जिसमें रेप का जो सेक्शन है- सेक्शन 375 और सेक्शन 376, अननैचुरल ऑफेन्स सेक्शन 377, थे। बड़े व्यक्ति के साथ जो रेप केस होता है या बच्चों के साथ कोई ऐसा केस होता है तो उसको एक जैसा ही ट्रीट करते थे। उसमें बार-बार उस बच्चे की स्थिति यह होती है कि जिस तरह से कोर्ट में उसे ले जाने, और उसके बारे में बातें की जाती हैं कि इससे उनके दिमाग पर जो छाप पड़ती है, वे उसे जीवन भर भूल नहीं पाते और उनका पूरा जीवन नारकीय हो जाता है। इस बिल को लाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि पहले तो यह एक जेंडर न्यूट्रल बिल है और दूसरा कि इसमें बर्डेन ऑफ प्रूफ एक्यूज्ड पर है, उस बच्चे पर नहीं है जिस बच्चे के साथ ऐसा हुआ है।
 
          इसके अलावा बहुत सारे सेक्सुअल ऑफेन्स ऐसे भी हैं जो आई.पी.सी. में विशेष रूप से परिभाषित नहीं किए गए हैं और न ही इनके लिए कोई दण्ड का प्रावधान है। इसके साथ-साथ कभी-कभी शिकायत भी मिली कि अधिकतर बच्चों के साथ मिसहैण्डलिंग हुई, बच्चे को उठा कर कहीं बाहर ले जाया गया, उसके साथ रेप कर उसका मर्डर कर दिया गया। इन सब चीज़ों को देखते हुए इस बिल को लाने की आवश्यकता पड़ी।
          महोदय, इस सदन को मैं यह भी बताना चाहूंगी और यह सदन उस बात को अप्रिशिएट करेगा कि एक बड़ी महिला के साथ रेप होता है और वह कोर्ट में पेश होती है तो उसकी हालात बहुत बुरी होती है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि बहुत सारी महिलाएं जिनके साथ इस तरह के केसेज हों तो वे कोर्ट में जाती ही नहीं हैं, अपनी शिकायत ही दर्ज़ नहीं करती हैं। लेकिन, हम जो यह बिल लेकर आए हैं, उसका यह मानना है कि इसमें जो शिकायत होगी, शिकायत करने वाला जिसकी शिकायत करेगा वह प्रुफ करेगा कि उसने यह गलती नहीं की।
          यह एक चाइल्ड-फ्रेंडली बिल है। इसमें बच्चे को कहीं जाना नहीं पड़ेगा। चाहे घर के भीतर या किसी ऐसी जगह पर जहां उसके माता-पिता या शिकायतकर्त्ता बताएं, वहां सुनवाई होगी। उस समय पुलिस वाला अपने यूनिफॉर्म में नहीं होगा। उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग होगी। अगर बच्चा कोई भाषा नहीं जानता है तो उसके साथ एक इंटरप्रेटर होगा और एक एक्सपर्ट होगा जो उसकी बातों को रखेगा। इन सभी चीज़ों को देखते हुए अनेक धाराएं इस विधेयक में रखी गयी हैं।
          महोदय, मैं यह बताना चाहूंगी कि मेरे मंत्रालय द्वारा वर्ष 2007 में एक स्टडी ऑन चाइल्ड अब्यूज कराया गया और उसमें करीब तेरह राज्यों में तेरह हजार बच्चों के ऊपर स्टडी किया गया। उन तेरह हजार बच्चों में 53 प्रतिशत बच्चों ने यह माना कि उनके साथ सेक्सुअली असॉल्ट हुआ है और वे सेक्सुअली ह्रास्ड हुए हैं। उन्होंने तो कम से कम यह बताया, पर कुछ बच्चे तो बता ही नहीं पाते। जो बच्चा दो, तीन, पांच, या दस साल का है, उसे तो पता ही नहीं कि क्या बताएं, कैसे बताएं। लेकिन, इन अपराधों से उसके दिमाग पर जो छाप पड़ती है, वह छाप इतनी गहरी होती है कि जीवन भर वह मानसिक रूप से विकसित नहीं हो पाता।   फिज़ीकली भी वह डिमोरलाइज़ रहता है और इन केसेज़ में भी 50 प्रतिशत केस इस तरह के सामने आये कि इस तरह का काम करने वाले उनकी जान-पहचान वाले थे, वे घर के सगे सम्बन्धी, पड़ोसी, आसपास के लोग, जो उनको जानते हैं, जो बच्चे को पहचानते हैं, उनके द्वारा इस तरह का केस किया गया। यह एक स्टडी की रिपोर्ट है। उस बच्चे के विरुद्ध यौन अपराधियों के मामले में अपराधियों को शीघ्र सजा मिले, इस बिल को राज्य सरकारों द्वारा स्पेशल कोर्ट हर जिले में, हर डिस्ट्रिक्ट में एक स्पेशल कोर्ट बने, इसका प्रावधान इसमें किया गया है। ये कोर्ट डैजिग्नेट करने की भी इस बिल में प्रावधान है। बिल में यह भी व्यवस्था की गई है कि विक्टिम बच्चों को बार-बार कोर्ट में न आना पड़े। कानूनी प्रक्रिया के दौरान अगर किसी स्थिति में बच्चा अपनी बात नहीं कर पाये तो जैसा मैंने कहा कि उसके लिए एक्सपर्ट या इंटरप्रेटर वगैरह की जरूरत हो, उसके मुताबिक बच्चों की मदद करें, इसके अन्दर यह प्रावधान है। इस बिल में बच्चों को ठीक प्रकार से परिभाषित किया गया है, जिस व्यक्ति की आयु 18 साल से कम है, वह बच्चे में आयेगा।
          मैं आपका ध्यान इस बिल की धारा 24, 25, 26, 27 और 33 की ओर दिलाना चाहती हूं, जिसके द्वारा हमने कानूनी प्रक्रिया के हर स्टैप को चाइल्ड फ्रेंडली बनाने का प्रयास किया है और इसमें प्रस्ताव रखा है, जहां एक ओर हम इस बिल के माध्यम से बच्चों के तमाम यौन अपराधों के लिए कठोर प्रावधान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों के लिए प्रोटैक्टिव माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी सरकार ने इसको ठीक करने के लिए इंटीग्रेटिड चाइल्ड प्रोटैक्शन स्कीम लेकर आई है और जो लागू हो चुकी है। पूरे राज्यों में यह स्कीम चल रही है, जिसमें बच्चों की सुरक्षा, उसकी देखभाल, आवश्यक स्ट्रक्चर बनाने के लिए राज्य को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। इस योजना में वर्ष 2011-12 में जो 170 करोड़ रुपये की राशि दी गई, वर्ष 2012-13 में यह धनराशि 400 करोड़ रुपये रखी गई है। इस योजना के लागू होने के बाद एस.जे.पी.यूज़. हैं, जो स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट्स हैं, उनकी संख्या भी जो पुलिस स्टेशंस में है, वह 660 हुई है। साथ ही चाइल्ड वैलफेयर कमेटियों की संख्या भी 548 हुई है। बच्चों की इमरजेंसी सहायता के लिए टेलीफोन हैल्पलाइन 1098, चाइल्ड हैल्पलाइन चलाई जा रही है, जिससे कभी भी किसी बच्चे के साथ यदि इस तरह की कोई घटना हो तो कोई भी व्यक्ति, उसमें उसके पेरेण्ट्स हों, कोई राहगीर हो, कोई चलता हो, जाने वाला हो, रास्ते में देखने वाला हो कि बच्चे के साथ यह स्थिति है तो इस टेलीफोन हैल्पलाइन पर टेलीफोन कर सकता है और उसे तुरन्त सहायता मिलेगी।
          वर्ष 2010-11 में 1098 पर 22.64 लाख से अधिक कॉल रिसीव की गई हैं। इस बिल के मूल प्रारूप में धारा तीन और धारा सात में हमने 16 से 18 साल के बच्चों के लिए सैक्सुअल एक्टिविटी में कंसेंट की बात कही थी। दूसरे शब्दों में प्रोवीज़ो के अनुसार 16 से 18 साल के बीच का एक बच्चा किसी व्यक्ति के साथ कितने वर्ष भी शारीरिक सम्बन्ध बनाता हो, उसके बाद अगर किसी कारण से उस व्यक्ति की शिकायत होती है तो मूल प्रावधान के अनुसार यह देखा जायेगा कि बच्चे की कंसेंट थी की नहीं थी और बार-बार यह बात पूछने के बाद जब शिकायत होगी तो बच्चे को बुलाया जायेगा, बच्चे पर फिर एक मानसिक दबाव पड़ेगा। उसके जो हालात हैं, वे ऐसे होंगे कि वह सोशियली सोसायटी से बायकाट होने की कोशिश करेगा, बाहर वह अपनी शक्ल नहीं दिखाएगा और इसीलिए जो हमारी पार्लियामेंटरी स्टेंडिंग कमेटी है, उसने यह माना कि बच्चे की आयु, जिसमें तमाम मैम्बरों ने यह माना कि बच्चे की आयु 18 साल से कम के नीचे की कंसेंट की बात नहीं होनी चाहिए और फिर इस बिल में इस प्रोवीजो के अनुसार इसको रख लिया गया है। मैं यह समझती हूं कि यह आयु रखना पूरे सदन में पता लगना चाहिए कि 18 से कम कोई कंसेंट के साथ इस तरह की एक्टिविटी में बच्चे को नहीं पड़ना चाहिए। अगर हम यह सोचते हैं कि इससे कम हुआ तो पहले बाल विवाह की जो हमने बुराई को दूर किया, वे बुराइयां फिर से हमारे समाज में उत्पन्न हो सकती हैं। पार्लियामेंटरी स्टेंडिंग कमेटी ने धारा तीन और सात में मूल प्रारूप में प्रोवीज़ो को हटाने की सिफारिश की थी। हमने इस बारे में काफी सोच-विचार के साथ यह महसूस किया कि इस प्रोवीजो को हटाने से 16 से 18 साल के बच्चों की ट्रैफिकिंग रोकने में भी हमें सहायता मिलेगी। अदरवाइज अगर हम 16 साल के बच्चे की कंसेंट की बात कर देते, तो यह होता कि ट्रैफिकिंग में बच्चे को ले जाते और जब वे पकड़े जाते तो कभी-कभी उनके ऊपर प्रेशर बनता और बच्चा खुद कह देता कि जी हां, कंसेंट थी, तो ट्रैफिकिंग को रोकने में भी मदद मिलेगी।  इस बिल की धारा 34(1) में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि अगर कोई बच्चा दूसरे बच्चे के साथ यदि इस बिल में जो डिफाइन अपराध है, उस तरह का अपराध करता है तो लोगों का मानना था, मेरे पास बहुत सारे लोग आये कि आप तो बच्चों को जेल में दे देंगे, ऐसा नहीं है।  अगर इस तरह के बच्चे, सेम ऐज ग्रुप के बच्चों में अगर इस तरह का कोई अपराध होता है तो उनके लिए जेजे एक्ट है।  जेजे एक्ट में उनके पैरेंट्स या कोई और शिकायत कर सकता है। जेजे एक्ट में कोई जेल या सजा का प्रावधान नहीं है।  उस स्थिति में जेजे एक्ट में जज यह छूट देता है कि बच्चे को समझा-बुझाकर छोड़ दिया जाये या उसकी लाइफ के बारे में उसे बता दिया जाये या उससे कहें कि आपको ये सोशल एक्टीविटीज करनी हैं।  इस तरह की बात कहकर उसे छोड़ दिया जाता है।   कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप नयी धारा 43 और 44 डाली गयी हैं।  धारा 43 के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार और सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आम जनता, बच्चों और अभिभावकों को इस कानून के बारे में जानकारी दी जाये।  इसकी अवेयरनेस करना जरूरी है कि पैरेंट्स को, बच्चों को या स्कूल में हों, छोटे बच्चे हों, कम्युनिटीज हों, आगंनबाड़ी सेंटर्स हों, हर जगह पर, मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा हर जगह पर हम इस बात को अवेयर करें कि यह बिल जो आ रहा है, इसमें बच्चों को प्रोटेक्शन, बच्चों को पूरी तरह से महफूज रखा जाये, उसे पूरी सुरक्षा दी जाये।  आज एक तरफ हम कहते हैं कि आज के बच्चे कल भारत का भविष्य बनते हैं। बड़े होकर वे भारत के भावी नागरिक बनेंगे और यदि अभी तक जो देखा गया है, मेरे अपने अनुभव से बहुत सारे लोगों से मुझे बात करने का मौका मिला है, अक्सर यह देखा गया है, 90-95 प्रतिशत बच्चों के साथ इस तरह के हालात पैदा हो जाते हैं, जब उनको कोई गोद में लेकर खिलाए या किसी और तरह से, उससे बच्चे के दिमाग में असर होता है, बहुत सारे डाक्टर्स से मेरी इस बारे में बात हुयी। इन सब चीजों को रोकने के लिए इस बिल को बहुत मजबूत बनाकर लाया गया है।  इसमें धारा 44 के अंतर्गत नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट, एनसीपीसीआर को इस कानून को मॉनीटरिंग करने का दायित्व सौंपा गया है। इसी प्रकार एससीपीसीआर, जो स्टेट में सीपीसीआर हैं, उनको मॉनीटरिंग का दायित्व दिया गया है।  समिति की सिफारिशों के अनुसार प्रस्तावित कानून की धारा 16 के अंतर्गत एक्सप्लेनेशन थ्री में भी यह ऐड किया गया है, इस अधिनियम के अंतर्गत बच्चों की सैक्सुअल परपज के लिए जो ट्रैफिकिंग करने वाला है, उसे भी सजा मिलेगी।  इसका मतलब यह है कि जो बच्चे को लेकर जाता है, उसके साथ सेक्सुअल एसॉल्ट तो नहीं कर रहा है, लेकिन उस बच्चे को कहीं लेकर जाता है तो वह भी उतनी ही सजा का भागीदार है, जितना कोई उसके साथ इस तरह की हरकत करता है।  इससे यह होगा कि बच्चे को किसी व्यक्ति ने अपने घर में जगह दी, कमरे में जगह दी, इस तरह की एक्टिविटीज करने के लिए कि बच्चा वहां आया और किसी ने उसके साथ सेक्सुअल एसॉल्ट या इसमें जो छः तरीके की चीजें बतायी गयी हैं, वह किया, तो उसको भी उतनी ही सजा है, जितनी कि ऑफेंस करने वाले को है।
          मैं यह भी बताना चाहूंगी कि इस बिल में मुख्यतः छः प्रकार के ऑफेंस कवर किए गए हैं।  Clause 3 – Penetrative sexual assault; Clause 5 – Aggravated penetrative sexual assault; Clause 7 – Sexual assault; Clause 9 – Aggravated sexual assault; Clause 11 – Sexual harassment of child; and Clause 13 – Use of child for pornographic purposes.  पहली बार ऐसा हुआ है कि जो इन सैक्शन के अंतर्गत अपराध करेगा, उसकी बहुत ही गहरी और कठोर सजा है।  सजा कहीं सात साल से कम नहीं है, कहीं तेरह साल, दस साल तो मिनिमम है, उसके बाद अगर कोर्ट चाहेगा तो लाइफ इप्रिजनमेंट भी है।  बच्चे के साथ इस तरह का व्यवहार करने के लिए उसकी पूरी जिंदगी के लिए सजा का प्रावधान है।  उसके साथ-साथ फाइन भी है।  यह जो बिल है, उसमें अलग-अलग सैक्शन के अंदर इसको बताया गया है।
          जैसा मैंने कहा कि बच्चे को जो जगह प्रोवाइड करता है या बच्चे को इस तरह की एक्टिविटीज के लिए प्रावधान करता है, उसको भी बराबर की वही सजा मिलेगी जिस एक्ट के अंदर वह आएगा।  इस बिल की विशेषता में सबसे बड़ी बात यह है कि हमने मुख्य उपधारा की धारा 3, 5, 7 और 9 में जो कवर्ड है, बर्डन ऑफ प्रूफ एक्यूज पर रखा है, यानी एक्यूज को कोर्ट के सामने यह प्रूफ करना होगा कि उसने अपराध नहीं किया है।      
          साथ ही, कानून के दुरूपयोग को रोकने के लिए गलत शिकायत करने वाले व्यक्ति को भी दंड देने का प्रावधान है। जैसे, कोई व्यक्ति किसी से राइवेलरी रखता है और वह उसकी गलत कंप्लेन करता है कि इस व्यक्ति ने किसी बच्चे के साथ इस तरह का ऐक्ट किया, अगर वह गलत निकला तो भी सजा का प्रावधान है। इसलिए इसतरह का प्रावधान रखा क्योंकि आए दिन जो आम जनता सोचती है कि आपने ऐसा प्रावधान बनया कि कोई भी किसी की कंप्लेन करेगा क्योंकि बर्डेन ऑफ प्रूव एक्यूज पर डाल दिया जाएगा, अगर आपने सबको एक्यूज बनाया, ऐसा नहीं है। गलत शिकायत करने वाले का भी एप्रूव होता है कि बच्चे के साथ ऐसा नहीं हुआ और उसने किसी मेलाफाइड इंटेन्शन से किया तो उसको भी सजा का प्रावधान इस बिल में रखा है।
          इसी प्रकार से बच्चे की बदनामी न हो इसे रोकने के लिए मीडिया पर भी अंकुश लगाने का प्रस्ताव है। जब तक यह प्रूव न हो कि कोई बात हुई मीडिया उसकी आइडेंटिटी डिसक्लोज नहीं करेगा। समिति की सिफारिशों के अनुसार बच्चों की आईडेंटिटी तभी डिसक्लोज की जा सकती है जब स्पेशल कोर्ट मीडिया को इस बात की इजाजत दे, और यह बात बच्चे की हक में हो।
          सभापति महोदय, हमारी पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी पीएसी ने और भी बहुत सारी सिफारिशें की है। हमने उसकी ज्यादतर सिफारिशों को मानते हुए इस बिल में अमेण्डमेंट के लिए प्रस्ताव राज्य सभा में रखा था जिसे राज्य सभा ने दस मई को पास कर दिया है।
          बच्चों के यौन शोषण से लड़ने के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्तावित कानून है। मुझे उम्मीद है कि इस बिल पर सदन के हर सदस्य का पूरा सहयोग मुझे मिलेगा।  इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।
MR CHAIRMAN : Motion moved:
“That the Bill to protect children from offences of sexual assault, sexual harassment and pornography and provide for establishment of Special Courts for trial of such offences and for matters connected therewith or incidental thereto, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration. ” श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़):सभापति महोदय, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण विधेयक के संबंध में मैं अपनी बात रखने के लिए खड़ा हुआ हूं। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। माननीय सभापति महोदय, बच्चे हमारे देश के भविष्य होते हैं। ये आने वाले कल का निर्माण करने वाले हैं। बच्चों को लेकर जिस तरह से समाज में घटनाएं बढ़ती चली जा रही है उन घटनाओं को देखते हुए हमारे सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो रहा है। जब कभी निठारी की घटना हमारे सामने आती है तो समूची मानवता हिल जाती है। वही दूसरी ओर, दिल्ली के अंदर ही शक्ति नगर में कुछ समय पूर्व यहां पर घटना घटित हुई थी कि तेरह साल उम्र की एक लड़की पंखे से लटकी हुई मिली थी। उसने आत्म हत्या कर ली इस तरह का प्रकट किया गया। मालिक और उसका भाई चिल्लाता हुआ आया कि लड़की ने आत्म हत्या कर ली। उसके पिता को ढूंढ कर बुलाया गया। उसका पिता बंगाल से यहां आकर रिक्शा चला कर अपने परिवार की रोजी-रोटी चलाता था। उसका पिता आया तो उसके पिता के हाथ में दाह संस्कार करने के लिए पैसे रख दिए गए। उस लड़की की जो छोटी बहन थी वह चीख-चीख कर कहने लगी कि हमारी बहन अक्सर कहती थी कि उसका मालिक उसके साथ में गंदा काम करता है। वह बिन माँ की बेटी अपने पिता को बता भी नहीं पाई कि उसका मालिक उसके साथ किस तरह की हरकत करता था। वह इस दुनिया से चली गई। यह एक घटना नहीं है।
 इस तरह की एक दूसरी घटना एक सात वर्षीय बालक के साथ इसी दिल्ली में घटी। उसको गर्म चिमटे से तब तक उसको दागा गया जब तक वह बेहोस हो कर नहीं गिर गया। यह काम एक वरिष्ठ केन्द्रीय सेवा में कार्यरत अधिकारी और उसकी पत्नी ने यह पाश्वीकृत किया। उसका अपराध क्या था? उसका अपराध मात्र इतना था कि उसने अपने मालिक के बेटे को जो दूध पिलाया था उसमें से दो-चार चम्मच दूध बच गया था वह दूध उसने पिया था। इस अपराध के कारण पति पत्नी ने मिल कर उसे इस तरह की सजा दी। अभी छः तारिख को मैंने भास्कर अखबार में पढ़ा।  तीन बच्चियों के साथ शोषण किया गया। पानीपत में एक पांचवीं कक्षा के छात्र के साथ हॉस्टल के वार्डन ने छ: महीने तक दुष्कर्म किया। एक दिन रोते हुए उस बालक ने अपनी मां को फोन किया। उसके मां-बाप आए और उसे लेकर काफी हंगामा हुआ। मधुबनी के लहरियागंज गांव से आठ-दस साल के चार बच्चे कारखाने में काम करने के लिए लाए गए। यादव जी, ये बिहार के बच्चे हैं। उन बच्चों को कारखाने में लगाया गया। वे काम करने के अभ्यस्त नहीं थे। स्वाभाविक है कि आठ-दस साल का बच्चा कैसे काम कर पाएगा। जब वे काम नहीं कर पाते थे तो उनका मालिक उन्हें बुरी तरह दीवार पर पटक-पटक कर मारता था। एक बच्चा खत्म हो गया। जब वे उसे चुपचाप दफनाने के लिए ले जा रहे थे तो कुछ लोगों ने देख लिया और चिल्लाकर कहा कि आप लोग यह क्या कर रहे हैं। उन्हें धमकी दी। बाद में जब काफी लोग वहां इकट्ठे हो गए तो वे उसे छोड़कर भाग गए। ये घटनाएं केवल सामान्य बच्चों के साथ नहीं बल्कि अंधे, मूक और बधिर बच्चों के लिए जो आवासीय विद्यालय बने हुए हैं, उनमें भी कई बार इस तरह की घटनाएं सुनने में आती हैं। जो बच्चे बोल नहीं पाते, सुन नहीं पाते, कह नहीं पाते, ऐसे मासूम और अबोध बच्चों के साथ भी बहुत सारी घटनाएं सुनने में आती हैं। मानसिक रूप से विक्षिप्त 11,12 साल के बालक, बालिकाओं के साथ भी वे लोग कृत्य करते हैं जिनके बारे में हम और आप कल्पना नहीं कर पाते, सोच नहीं पाते। वे कई बार दूर के लोग नहीं होते बल्कि परिवार के सगे रिश्तेदार होते हैं। अभिभावक को इस बात की कल्पना नहीं होती कि हमारे घर में हमारे ही परिवार का कोई सदस्य हमारे बेटे, बेटी के साथ इस तरह का काम कर रहा है। मेंने आपको जो घटनाएं बताईं, ये हमारे और आपके बेटे, भाई, बहन नहीं होंगे लेकिन इसमें किसी न किसी मां की बेटी होगी, किसी न किसी पिता का पुत्र होगा। मंत्री महोदया जो बिल लेकर आई हैं, इसके लिए मैं इन्हें धन्यवाद देना चाहता हूं। ये एक अच्छा बिल लेकर आई हैं। इससे पूरे समाज के सामने बहुत अच्छा संदेश जाएगा। मैं समझता हूं कि इसमें बहुत पहले पहल करने की आवश्यकता थी। लेकिन जब हम जागे तभी सवेरा।
          बच्चों से संबंधित अपराध में मुख्य रूप से चार तरह की घटनाएं होती हैं - बलात्कार, अपहरण, छोटे बच्चों की खरीद-फरोख्त और कन्या भ्रूण हत्या। वर्ष 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट - चाइल्ड सैक्सुअल ऐब्यूज प्रकाशित हुई थी। उस अध्ययन से पता चला था कि यौन दुर्व्यहार से पीड़ित बच्चों का प्रतिशत 2 से 62 तक है। भारत और वियतनाम के आंकड़े बताते हैं कि बालिकाओं की तुलना में बालकों के साथ यौन दुर्व्यहार की आशंकाएं ज्यादा घटित होती हैं। हमारे यहां भी ये घटनाएं ज्यादा बढ़ती जा रही हैं। विश्व में बच्चों की सर्वाधिक जनसंख्या हमारे देश में है। देश में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या जहां वर्ष 2001 में 42 करोड़ 80 लाख थी, वह वर्ष 2006 में बढ़कर 43 करोड़ हो गई। आगामी दशक में भी इसके 40 करोड़ से अधिक बने रहने का अनुमान है। अभी मंत्री महोदया जी ने बताया कि मंत्रालय द्वारा बालकों से उत्पीड़न के संबंध में वर्ष 2007 में सर्वे करवाया गया था जिसमें 13 राज्यों के 12,447 बच्चों का साक्षात्कार लिया गया था। उसमें से 53.22 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उनका एक से अधिक बार यौन शोषण हुआ है, उनके साथ दुर्व्य़हार किया गया। इसमें सर्वाधिक संख्या आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, दिल्ली की रही है। बालक और बालिकाओं दोनों के साथ यौन दुर्व्यहार हुआ। 21 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उनके साथ गंभीर तरह का यौन दुर्व्यहार हुआ।  50.76 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उनके साथ अन्य प्रकार का भी दुर्व्यहार हुआ है। आपने अभी सात कैटेगरी बताईं। मैं कहता हूं कि इस बिल में सब तरह के लैंगिक शोषण शामिल किए जाने चाहिए। 5.69 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उन पर यौन प्रहार किया गया यानी दैहिक शोषण के साथ-साथ गंभीर रूप से यौन प्रहार किए गए, उनके शरीर को क्षति भी पहुंचाई गई और उन्हें मरणासन्न हालत में छोड़ दिया गया। बेघर कामकाजी और संस्थाओं में रहने वाले बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। ये गरीब परिवारों के बच्चों होते हैं, मजदूरों के परिवारों के होते हैं। यौन शोषण की घटनाएं बड़े परिवार के बच्चों के साथ नहीं बल्कि साइकिल चलाने वाले, बर्तन मांजने वाले, चाय बेचने वाले गरीब मजदूर परिवार के बच्चों के साथ होती हैं। इनमें से ज्यादातर घर के नौकर और परिवार के रिश्तेदार के लोग होते हैं, जो उन्हें संभालने का काम करते हैं। उनके द्वारा ये घटनाएं की जाती हैं। बच्चे ज्यादातर मामलों में यह समझ नहीं पाते कि उनके साथ क्या हुआ और वे इस दुर्व्यहार को किसी को बताते नहीं हैं।  इस संबंध में 48.4 प्रतिशत बालिकाओं ने कहा था कि काश हम बालक होतीं।
          राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की बच्चों के साथ बलात्कार होने के संबंध में जो रिपोर्ट वर्ष 2005 में आयी, उसमें 4026 मामले हुए। वर्ष 2009 में ये मामले बढ़कर 5368 हो गये। वेश्यावृत्ति हेतु लड़कों को बेचे जाने के संबंध में वर्ष 2008 की तुलना में वर्ष 2009 में 16.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये आंकडे केवल वे हैं, जो दर्ज कराये गये है। लेकिन वास्तविक रूप में इनकी संख्या कई गुणा ज्यादा होगी। बच्चों के साथ बलात्कार करने के संबंध में जो मामले दर्ज हैं, जिनमें दोष सिद्ध हो गया, तो दोष सिद्ध होने के जो आंक़ड़े हैं, वे अपने आप में बहुत चिंता प्रकट कर रहे हैं। वर्ष 2001 में दोष सिद्ध हुए आंकड़ों की संख्या 38.7 परसेंट थी, जो वर्ष 2009 में घटकर 30.7 प्रतिशत रह गयी, यानी 8 परसेंट घट गयी। जबकि इस अवधि में नाबालिग बालिकाओं की खरीद-फरोख्त और दोष सिद्ध 39.1 परसेंट से घटकर 18.9 प्रतिशत रह गयी, जबकि इस अवधि में अपराध बहुत बढ़ गये। उसमें बहुत सारी विसंगतियां हैं, कई कारण हैं।
          माननीय मंत्री जी, आपने इस बिल में एक चीज बहुत अच्छी जोड़ी कि इस तरह का जब यौन शोषण होगा, तो इस मामले में जो अपराधी है, उसे सिद्ध करना पड़ेगा। क्योंकि सामान्य रूप से जब बलात्कार होता है या यौन शोषण होता है, तो उसमें साक्ष्य नहीं पाया जाता है। मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि एक अच्छा प्वाइंट इसमें जोड़ा गया है। एक कठिनाई और आती है कि हमारे यहां पुलिस की जांच प्रक्रिया बहुत लंबी और उबाऊ होती है। हमारे यहां पीड़ित बालक के लिए प्रभावित संरक्षण कार्यक्रमों का अभाव रहता है। लंबी न्याय प्रक्रिया और पीड़ित द्वारा यह सोचे जाने पर कि हम इस घटना की रिपोर्ट करने जायेंगे तो लोगों को मालूम पड़ जायेगा और इससे हमें व्यंग्य और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ेगा। इसी तरह पुलिस थानों में अपराध का ग्राफ कम दिखाया जाता है, क्योंकि वे यह बताना चाहते हैं कि हमारे  एरिया में अपराध हुए ही नहीं हैं। इस तरह पुलिस थानों में अपराध का ग्राफ कम दिखाने के लिए बहुत सारे प्रकरण दर्ज  ही नहीं किये जाते और उन्हें डांटकर भगा दिया जाता है कि हमारे यहां अपराध नहीं हो रहे हैं।
          राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने लैंगिंग अपराधों के शिकार बच्चों के मामले में एक बालक हितैषी न्यायिक प्रक्रिया पर बल दिया है कि पीड़ित बालकों के मामले में निर्णय लेने वाली न्यायिक प्रक्रिया मरहम लगाने वाली होनी चाहिए, न कि बच्चे को फिर से पीड़ित करने वाली होनी चाहिए। आयोग ने देश के विभिन्न भागों में न्यायाधीशों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, वकीलों, पुलिस अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षार्थियों को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की बात कही है। समिति ने जो सुझाव दिया है, उस सुझाव को भी शामिल किया जाना चाहिए कि पीड़ित बालक और उसके परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए  चिकित्सकों, परामर्शदाताओं, समाज सेवकों और एनजीओज सहित विभिन्न प्रोफैशनल लोगों को इसमें शामिल करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
           मैं समझता हूं कि जब हम बहुत सारी चीजों को इसमें शामिल कर रहे हैं, बच्चों के हित की बात कर रहे हैं, तो समिति का यह बहुत अच्छा सुझाव है, इसलिए इस सुझाव को भी इसमें शामिल करना चाहिए। उसके बाद पीड़ित बालकों के पुनर्वास एवं देख-भाल हेतु वित्तीय सहायता के लिए निधि की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें न्यायालय से दंड दिया जायेगा। दंड का स्वरूप यह होगा कि सरकार की तरफ से भी राशि दी जाये और उस आरोपी से जो राशि वसूल की जायेगी, वह राशि भी इस निधि में हस्तांतरित करके पीड़ित बालक या बालिका को दी जानी चाहिए। बालक के प्रति लैंगिंग अपराध की पुष्टि होने और विशेष न्यायालय द्वारा सजा सुनाने तक कार्रवाई नहीं, बल्कि यह प्रयास होना चाहिए कि बालक फिर से एक खुशहाल जिंदगी जी सके। इसके लिए व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है। किशोर न्याय कानून को मजबूत बनाने के लिए जिला बाल संरक्षण सोसायटियों, विशेष किशोर पुलिस इकाइयां, बाल कल्याण समितियां, कल्याण अधिकारियों और परीक्षा अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ये संस्थागत तंत्र अनेक राज्यों में अभी तक स्थापित नहीं हुए। इन संस्थागत व्यवस्थाओं को पूरी तरह से गतिशील बनाना होगा और सभी राज्यों में स्थापित करना होगा।  इसके लिए यहां से गाइडलाइन जानी चाहिए। रा­ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के लिए कोई भूमिका निश्चित नहीं की है, इनका काम सलाह देने तक सीमित रखा गया है जबकि रा­ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग पहले से इस क्षेत्र में जागरूकता लाने का काम कर रहा है। अतः समय-समय पर मूल्यांकन करने एवं कार्यान्वयन में कमियों को पूरा करने, सुधारात्मक उपायों की सिफारिश करने की भूमिका की कल्पना की जा सकती है। समिति का यह सुझाव भी उपयुक्त है कि सामूहिक लैंगिक हमले के संबंध में एक व्यक्ति या अधिक व्यक्तियों के द्वारा हमला किया जाने पर उसे सामूहिक हमला ही माना जाना चाहिए। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के संबंध में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में वयस्कों को सुविधाएं दी गयी हैं, अतः बच्चों को सुरक्षात्मक अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
          बाल दुर्व्यवहार के मामलों में अनिवार्य रिपोर्टिंग के संबंध में समिति के समक्ष लोगों ने आपत्ति उठाई कि सामाजिक कलंक, सामुदायिक दबाव, भावनात्मक एवं आर्थिक रूप से अपराधी परिवार के ऊपर निर्भरता यानि वह चाचा, मामा, फूफा या ताऊ हो सकता है, माता-पिता नहीं हैं, इसलिए वह उन पर निर्भर करता है, इस कारण से कई लोगों ने इस खण्ड को हटा देने का सुझाव दिया है। पर संबंध में मेरा कहना है कि अगर रिपोर्ट होगी नहीं, तो पीड़ित बालक को चिकित्सा व्यवस्था का लाभ नहीं मिल पाएगा और वह पुनः प्रताड़ना का शिकार हो सकता है। अतः इस पर गंभीरता  से विचार करना चाहिए। खण्ड-22 में मिथ्या सूचना के बारे में जो बात कही है कि मिथ्या सूचना देने पर छः माह का कारावास या अर्थदण्ड या दोनों हो सकता है, अनेक बार गवाहों के अभाव में वह सिद्ध नहीं हो पाता है। सूचना आने पर उसकी पु­िट होनी चाहिए, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि अपराध सही होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया एवं दांव-पेंच का सहारा लेकर कि उस समय हम यहां पर नहीं थे, दूसरे शहर में अस्पताल में भर्ती थे, इस तरह के दांव-पेंच का सहारा लेकर बचने का प्रयास करेगा, तो उसकी गहन विवेचना होने के बाद किसी भी तरह से अपराधी बचने न पाए और उस बालक को पूरी तरह से संरक्षण मिले, इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए। पीड़ित बालक को अदालत ले जाते समय मेडिकल जांच के लिए ले जाते समय पूरी गोपनीयता बरतनी चाहिए और अगर अपराधी परिवार का सदस्य है, तो न्यायिक प्रक्रिया होने के बाद उस बालक से पूछना चाहिए कि वह घर जाना चाहता है या नहीं या संरक्षण गृह में जाना चाहता है, उसी के अनुरूप उसके लिए व्यवस्था की जानी चाहिए। हमारे देश में लगभग 700 जिले हैं और 16000 पुलिस थाने हैं। हर थाने में बाल विकास अधिकारी की नियुक्ति की जरूरत है। यौन पीड़ित बच्चे की जिंदगी बर्बाद हो जाती है और वह अवसादग्रस्त हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि हम स्वयं के साथ ही बच्चों का सतर्क रहना सिखाएं। स्कूलों में भी इस दिशा में जागरूकता लाने के लिए एक पीरियड निश्चित करके वहां पर  पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए। उपरोक्त बिल के संदर्भ में जनजागरूकता लाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाने की आवश्यकता है। सिर्फ कानून बनाने से अपराध नहीं रुकेगा, उन कानूनों का सही ढंग से क्रियान्वयन भी करना होगा। इसके लिए गृह विभाग, विधि एवं न्याय विभाग, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, तीनों को मिलकर आपस में सामंजस्य करके इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है।
          सभापति महोदय, आखिरी एक लाइन कह कर मैं अपनी बात समाप्त करुंगा। किसी बच्चे की खामोशी यह बताती है कि वह कुछ नहीं कह पाता है। उसके साथ हुए अपराध से वह सहम सा जाता है। जहां वह सहम जाता है, यह बिल वहीं से उसकी ताकत बनकर उसे सम्मान, सुरक्षा, स्वाभिमान दिलाकर खुशहाल जिंदगी जीने के लिए आगे बढ़ाएगा।
          आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूं।
   
SHRIMATI J. HELEN DAVIDSON (KANYAKUMARI): Mr. Chairman, I express my sincere thanks to you for giving me this opportunity to speak on this important Bill. I stand to support the Protection of Children from Sexual Offences Bill, 2012.
          First of all, I would like to congratulate and thank the hon. Minister for Woman and Child Development for taking up this important legislation for the larger interest of society. By this measure our country will soon have a comprehensive law to deal with sexual offences against children. It will provide for stringent punishment up to ten years of jail term, which may even be extended to life imprisonment, if warranted.  Sexual offences against children are not adequately addressed by the extant laws. A large number of such offences are neither specifically provided for, nor are they adequately penalized, says the Statement of Objects of the Bill.
          The Bill seeks to protect children from offences such as sexual assault, sexual harassment and pornography and also provide for establishment of special courts for speedy trial.
          India is signatory to the UN Convention on the Rights of Children since 1992. It should take measures to prevent children from being forced into any unlawful sexual activity.
          Any person below the age of 18 years is defined as a child. The Bill seeks to penalise any person who commits offences such as sexual harassment and sexual assault against the children. The Bill says that sex with a person under the age of 18, even if consensual, would be deemed as statutory rape and an offence that would be tried under the Juvenile Justice Act, carrying a maximum punishment of three years imprisonment.
 
          An offence committed under this Act shall be reported to either the local police or to the Special Juvenile Police Unit who has to report the matter to the Special Court within 24 hours. The police also have to make special arrangement for the care of the child. In case a person fails to report a case, he shall be penalised. The Bill also includes penalties for making false complaints.
          Each district shall designate a Sessions Court to be the Special Court. I shall be established by the State Government in consultation with the Chief Justice of the High Court. The State Government shall appoint a Special Public Prosecutor for every Special Court. The court shall, as far as possible, complete the trial within one year. The trial shall be held in camera and in the presence of the child’s parents or any person trusted by the child.
          The guardian of the child has the right to take assistance from a legal counsel of his choice, subject to the provisions of Criminal Procedure Code, 1973.
          If an offence has been committed by a child, it shall be dealt with under the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000.
          As per report, more than 53 per cent of children interviewed reported having faced one or more forms of sexual abuse. Fifty per cent abusers were persons known to the child or in a position of trust and responsibility.
          Penetrative sexual assault has been defined as any sexual crime with a jail term of minimum seven years which can be extended up to life imprisonment. Secondly, this provision also applies where the aggravated penetrative sexual assault has been committed by a person who should have protected the child, such as a police officer, hospital staff, school functionary and a family member or a relative. This provision is also applicable where a child loses his or her mental balance because of the sexual assault or his inflicted with HIV or any other life threatening disease.
          The National Crime Records Bureau data shows that there has been a significant increase in cases of sexual offences against children from 2,265 in the year 2001 to 5,749 in the year 2008.
          It is quite good that the Bill envisages guidelines for media on reporting that would bar giving details of the victim and accused children’s family or personal details or any other form of reporting that can lead to their identification. Besides, it proposes Special Courts and more sensitive ways of dealing with crime against children.
           I urge upon the Government that there is an urgent need for this kind of legislation which will address this social evil and punish harshly the accused who are allegedly involved in all forms of sexual abuse, including child prostitution, child pornography, physical abuse, corporal punishment, bullying and trafficking of children. There is an urgent need to have a functioning administrative system to record and register child abuse cases.
I would also like to raise some other important points for the betterment of our children in the society. I would like to call upon all the learned school teachers that they should adhere to the moral education class. Every school must make it compulsory to have at least one moral class within a week. Students, particularly in the teenage group, would get inspirations from their teachers through moral education.
          I would also like to mention here that good parenting plays a vital role in character building. I would refer to a famous proverb ‘Charity begins at home.” Parents play a vital role in the life of every child. Hence, their inspiration is a must for the bright future of every child. Everything cannot be controlled by enacting law or by bringing a legislation by the Government.
I would also make a mention of television and internet. Due to too much viewing of television and misuse of internet surfing, children are being diverted from the right path towards the wrong path. Too much of violence, sex and fast activity viewing makes the brain of the child very violent and imbalanced.
During the schooling period, when the age of a child is below 18 years, he mostly opts to do the wrong things. Hence, there should be a control of the Censor Board over television programmes, particularly the reality shows, where children are also involved                                                                                                         SHRIMATI CHANDRESH KUMARI (JODHPUR): Chairman, Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to speak on this very important Bill. I congratulate the Prime Minister; the Government; and our Minister for bringing this Bill.
16.01 hrs                         (Dr. Girija Vyas in the Chair)           The children of our nation are our responsibility. They are the future of our nation. I find a lot of children begging on the streets and on the roads, and wanting help from all quarters. The United Nations General Assembly realized this in December 1992 and adopted a Resolution to protect the rights of children in which they ensured physical health, emotional, intellectual and social development of children. If you look at the Reports from the Ministry of Women and Child Development, it says that 53 per cent of children are being sexually abused. I would like to bring to your notice that sexual abuse is not the only abuse that the children are going through. There are many other forms of abuses like physical abuse; sexual abuse; mental abuse; child labour is also an abuse; children begging on the streets and forced to beg; trafficking; and child marriage are all abuses.

These are all abuses, which have to be looked into, and we have to address it to protect our children from being harassed. All these type of harassments, which the children face, are giving them mental trauma. They get mentally derailed, and this is causing a lot of children to get into crime; to become drug addicts; and to become terrorists. We have to protect them for the better of our nation and for the better of our children.

          So far, these heinous crimes have been clubbed together. There is no differentiation between the crime against children and crime against adults. All these crimes are treated together. I would like to point out one thing here, which has come to my notice. In the Indian Penal Code (IPC), Section 376 says that : “… unless the woman raped is his own wife and is not under twelve years of age will not be treated as a crime…”. Are we justifying child marriage? Child marriage is one of the main things, which is causing a lot of problems for rape of young girls. Even the Immoral Traffic (Prevention) Act protects the children below the age of 16 whereas in our Marriage Act it says that the girl child becomes mature only at the age of 18 years. How are we having these different ages at different places?

If we allow a child to be raped by her husband at the age of 12 and is not being considered as rape, then it is wrong. If we are allowing children under 16 only to be considered under the Immoral Traffic (Prevention) Act, then it is wrong. It should all be 18 years. It should be a uniform age for all girls, namely, the age should be 18 years.

          Besides this, very often, we do not realise how many young street boys are being used for sexual abuse. CRY has given the figures for it, and they are really very revealing figures. Every year, 8,950 children are missing. That means either they are picked up and used for begging or used for sexual abuse or used for illegal means of labour. Every year, five lakh children are estimated to be forced into sexual trade. And approximately, 2 million children are used for commercial sex between the age of 5 and 15 years. Approximately, 3.5 million children are entering into commercial sex between the age of 15 and 18 years. Around 40 per cent of the child population are forced into commercial sexual works. These are the figures. There are very astonishing figures. We have to take into consideration these figures. And we have to see how we can help our children.

I would like to bring to your notice here, Madam, that we have taken into consideration the homes which are going to be watched:- remand homes, protection homes, observation homes. What about orphanages?  In orphanages, we very often find that the children are being ill-treated.  And what about schools where we find that many of the children are being ill-treated? We have seen examples of little children being sexually abused by their teachers and they are not being able to say anything. Children are very often not being able to say anything because they do not know the depth of what they have gone through or the dimensions of the effect which is going to have on their lives. Therefore, it is very necessary that we have to monitor all these areas and keep a watch on our children.

Besides that, Madam, I would like to point out here that child marriages are still taking place and no action is being taken. What are we doing about the witnesses who are witnessing these child marriages?  They are not being punished; they are not being taken to task. This also has to be looked into in this Bill which is very important.

          I would also like to mention about how young girls or young boys do not have the courage to speak up. For example, there was a case in Rajasthan where a young girl, because of rivalry between the families, was picked up and taken away by the other family and then, she was gang raped. But she did not have the courage to speak up. She did not have the courage to go to the school; she did not have the courage to do her further studies and to stand on her own feet. With great difficulty, we got her back. The police were involved in protecting the culprits. So, what sort of action will be taken on those people? These are the things on which we have to look at.  But the main thing is, Madam, that I would like to request you here that we should not only look at sexual abuse, we should also look at the other abuses especially the abuses where the children are being forced into drugs; where the children are being forced into labour; where the children are being forced into begging. As you know, recently, in Harayana, it came out on the TV where children were being taken and their limbs were being cut so that they could be used for beggary. These are the things which we also have to look to and address all these difficulties that the children of this country are facing.

Besides that, Madam, there is another quarter where we have to look for the children in the orphans.  The orphan in India has no identity. They have no possibility to get admission in schools because they do not have an identity. They have no possibility to get bank accounts because they have no identity. They have no possibility to get jobs because they cannot identify their mothers and fathers. That is why, it is very necessary that in the new identity card system, these orphanages should be given preference and these children should be made proper citizens of India so they can also get all the benefits that we are giving them in this country.

With these words, once again Madam, I thank you very much for bringing this very important Bill and to cover all the aspects which have to be covered as far as sexual abuse is concerned. But I would request the Minister to consider by taking up the other abuses that the children are going through because it is a mental trauma for them and they are becoming social drop-outs and when they become social drop-outs, they become a responsibility and liability to the nation. With these words, Madam, once again I thank you very much for giving me the opportunity to speak.

 

सभापति महोदया :  श्री शैलेन्द्र कुमार।

          हम चाहते हैं कि पांच बजे यह महत्वपूर्ण बिल पास हो जाए। हम चाहते हैं कि माननीय सदस्य बहुत संक्षिप्त में महत्वपूर्ण बिंदु उठाएं।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): माननीय सभापति महोदया, मैं बहुत महत्वपूर्ण बिंदु ही रखूंगा। आपने मुझे लैंगिग अपराधों से बालकों के संरक्षण विधेयक, 2012 पर बोलने का अवसर दिया, मैं आपका बहुत आभारी हूं। इससे पहले भी संसद में भारतीय संविधान में बाल अधिकारों के संरक्षण की कई व्यवस्थाओं के बिल पास किए गए हैं। अनुच्छेद 39. 40. 15, 17, 19 और 21 में बाल अधिकारों के संबंध में बहुत विस्तार से व्यवस्था की है। भावनात्मक अधिकार महत्वपूर्ण हैं और इसमें परवरिश का महत्वपूर्ण स्थान है। छः से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य और नःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई है। इसका प्रावधान धाराओं और अनुच्छेद में किया गया है। खास तौर से 18 वर्ष के बच्चों के अधिकारों की रक्षा की व्यवस्था की गई है।

          महोदया, आंकड़ें उठाकर देखें तो पता चलता है कि भारत में 2010 में करीब 35 लाख शिशुओं में से केवल पांच लाख को ही बचाया जा सका है। भेदभाव बहुत जोरों पर है कि लिंग आधार पर अबार्शन कराए जाते हैं। लिंग परीक्षण बहुत बड़ी बीमारी है। इसी सदन में मैंने 14वीं लोकसभा में बात उठाई थी कि पंजाब के कुछ ऐसे किस्से सामने आए हैं कि प्रेगनेंट औरतों के ब्लड से पता चल जाता है कि बच्चा मेल है या फीमेल है। इस तरह के इक्विपमेंट्स पर रोक लगनी चाहिए। प्राइवेट मेडिकल प्रेक्टिस करने वाले लोगों पर व्यापक पैमाने पर गंभीरता से जांच करने की आवश्यकता है। सबसे बड़ी बात कम उम्र की शादियों की है। आंकड़ें बताते हैं कि 66 परसेंट बच्चे मुफलिसी के शिकार हैं, जिन्हें पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, जो कुपोषण के शिकार हैं। इसमें सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया समय समय पर अनेक प्रकार के केसिस उजागर करता है, जिनके बारे में हमें बहुत देर के बाद पता चलता है। यही व्यवस्था शिक्षा के संबंध में लागू की जानी चाहिए ताकि उनका शोषण न हो। मिड डे मील के माध्यमसे  योजना बनाई गई है ताकि बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और आगे निकलें।

          महोदय, विकलांग बच्चों का बहुत शोषण हो रहा है। आंकड़े देखने से पता चलता है कि दिल्ली में हजारों, लाखों की संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं। किसी भी गिरोह द्वारा बचपन में बच्चों को पकड़कर अपंग कर दिया जाता है और भीख मंगाई जाती है। आपने रेलवे स्टेशनों और चोराहों पर बच्चों को भीख मांगते देखा होगा। इस प्रकार शोषण हो रहा है, हमें देखना है कि किस प्रकार इन पर रोक लगाई जा सके। हमारे देश में विदेशी पर्यटक आते हैं, जब अन्य देशों से आकर लोग इस प्रकार की व्यवस्था देखते हैं तो हम बहुत शर्मसार होते हैं। हमें इस तरफ गंभीरता से सोचना होगा। आज भी 81.5 लाख बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। अनिवार्य और नःशुल्क शिक्षा का बिल लाया गया है, अगर इन्हें शिक्षा के लिए प्रेरित करें और कम्पलसरी कर दें तो जागरुकता आएगी। जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे बच्चों को शिक्षा की ओर ले जाएं तो मेरे ख्याल से शोषण, अन्याय और अत्याचार पर अंकुश लगा सकते हैं। आंकड़ों के अनुसार चार करोड़ बच्चे शिक्षा बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं। उनके लिए भी व्यवस्था करनी होगी।   बाल सुधार गृह हर जगह बने हुए। खास कर यह समाज कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित होते हैं। वहां की व्यवस्था और स्थिति बहुत ही खराब है। वहां पर भी उनके साथ यौन शोषण की तमाम शिकायतें आई हैं और उनको वहां इस प्रकार से रखा जाता है कि जो अपराधों में लिप्त हैं, वहां उनको सुधार करने के बाद, उनको शिक्षा देने के बात नहीं हो पा रही है। अगर वहां की व्यवस्था देखी जाए तो उनको न तो अच्छा खाना मिल पा रहा है और न बोर्डिंग अच्छी मिल पा रही है। ये तमाम तरह की दिक्कते हैं।

          महोदया, चूंकि आपने घंटी भी बजा दी है और मुझसे निवेदन भी किया है इसलिए सिर्फ एक बात कह कर मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा कि बच्चों से संबंधित जो भी मामले आएं तो उनके केसों को महिला पुलिस को देना चाहिए। महिला ममतामय होती हैं, वे अच्छी तरह से बच्चों की जांच कर सकती हैं या पुरूष पुलिस वाले जो जांच करते हैं उन्हें बच्चों के केसों की जांच करने की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाए तभी ये जांच कर सकते हैं और न्याय मिल सकता है। इन्हीं सुझावों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ और पुरजोर तरीके से इस बिल का समर्थन करता हूँ।

 

सभापति महोदया : श्री गोरख नाथ जी का नंबर है। लालू जी आप बाद में बोल लीजिएगा। मैं सभी के लिए बता दूं स्पेसिफिक बिल है - Protection of children from sexual offence bill.

श्री लालू प्रसाद (सारण): मैडम, मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। जब आज सत्र बंद होने वाला है तब माननीय मंत्री जी और सरकार यह बिल लाई है। यह बड़ा सेंसेटिव बिल है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ जो सेक्सुअल हरासमेंट होते हैं और हो रहे हैं, इस बारे में जो बिल आया है। यह बिल आया है, बिल का विरोध कोई आदमी नहीं करता है। लेकिन इस देश में ब्रितानी हुकूमत में, ब्रिटिश गवर्मेंट में, भारत के ऋषियों, महऋर्षियों, संस्कृति और चरित्र के विषय में बड़ा भारी अध्ययन किया था। अंग्रेज हो कर भी अध्ययन किया था कि भारत देश कितना चरित्रवान है। आइपीसी में जो भी ऑफेंस है, वह पुरूष साइड से है। आप विमन साइड से मत देखिएगा। हमारे बगल में वकील बैठे हुए हैं। महिलाओं की तरफ से ऑफेंस नहीं होता है। अंग्रेजों ने यह माना कि भारत की बेटियां, नारी और बहनें इतनी चरित्रवान हैं कि उनकी तरफ से कोई ऑफेंस नहीं होता है। भारत में जो भी ऑफेंस होता है, वह पुरूष के द्वारा होता है। वकील लोग इस बात को काट दें, तो हम अपनी गलती को स्वीकार कर लेंगे। इस बिल को लाया जा रहा है। इस बिल पर बहुत सारी बातें है कि हमें अच्छा नहीं लगता हैं, जो लोग नहीं समझेंगे, वे हंसेंगे, लजाएंगे, लज्जित होंगे और बोलेंगे कि इस बात को नहीं बोलना चाहिए। मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूँ कि आप जो बिल लाई हैं, क्या आपने ध्यान दिया कि दिल्ली हाई कोर्ट ने अनेचुरल ऑफेंस, जो अंग्रेजो ने, ब्रितानी सरकार ने आइपीसी में कॉगनिजेबल ऑफेंस माना है, उसमें सात साल की रिगरेस पनिशमेंट होती है। जेल में डालने की बात है। हम भी वकालत पढ़े हैं। हम भी एलएलबी हैं। सात साल की जेल का प्रावधान है। दिल्ली हाइकोर्ट ने मना कर दिया, इसको डिकलाइन कर दिया।  आप लोग कहां बैठे थे? क्या आपने उसे मरम्मत करने का इस बिल में प्रावधान किया है? सुप्रीम कोर्ट तक आप नहीं गये। इस देश के सभी पंथ के लोगों ने चाहे हिंदू पंथ हो, मुस्लिम हो, सिख हो, ईसाई हो, लोगों ने इन बातों को बिल्कुल नापसंद किया और आप लोगों से मिलकर भी बताने का काम किया।

          अननेचुरल ऑफेंस, चाहे वह चाइल्ड है या मेल है, इस देश की संस्कृति में, हमारे भारत के चरित्र में इसकी कहीं भी कोई इजाजत नहीं है। हम पशु नहीं हैं, हम इंसान हैं। इस बात पर आपने ध्यान दिया है या नहीं दिया है, क्या आप इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी हैं, आप नहीं गयी हैं। आज आप जो बिल आप ला रहे हैं, क्या आपने पता किया कि इस देश में कि 14 साल की उम्र के बच्चा-बच्ची की शादी हो जाती है? आपकी क्वालीफाइंग आयु दूसरी है, लेकिन बाल विवाह अभी भी हो रहे हैं, खासकर गरीब तबकों में, ट्राइबल इलाकों में बेटियों की शादी हो जाती है। वह पहले के जमाने की शादी अच्छी भी थी कि कम उम्र में लोगों की शादी हो जाती थी और गौना होता था। जब लड़की मैच्योर हो जाती थी, तब उसकी पति के यहां विदाई होती थी। हमने जो इंतजाम किया, मैडम बोल रही थीं, नाम मैं भूल रहा हूं, उन्होंने कहा कि इतने प्रतिशत अपराध इससे देश में बढ़ गया है। यह अननेचुरल ऑफेंस, जो अपराध है, हमारी बच्चियों को, लड़कियों को जो रेप करते हैं, बलात्कार करते हैं, आप यह सब बात ला रहे हैं कि जिस पर आरोप होगा, वही प्रमाणित करेगा, तो इसका दुरूपयोग होगा या नहीं होगा। कोई आरोप लगा दे कि इनके ऊपर यह बात बोल दो तो ठोस प्रमाण और प्रूफ देना चाहिए, प्रमाण पत्र देकर कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए।

          यह देश ऋषियों और संतों का है। एक जमाना था, आज सेक्स के प्रति जो जागृति हो रही है, चारों तरफ प्रचार किया जा रहा है, कोई भी परिवार एक साथ बैठकर फिल्म नहीं देख सकता है, ये सारी चीजें दिखायी जा रही हैं, डर्टी फिल्म बन रही है, यह माहौल बनाया जा रहा है। चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा कारखाना विद्यालय और महाविद्यालय हैं, जहां से बच्चे-बच्चियों को शिक्षा देनी चाहिए।

सभापति महोदया :  आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

श्री लालू प्रसाद : महोदया, यही दिक्कत है।

सभापति महोदय : इस विषय पर बाद में बोलेंगे।

श्री लालू प्रसाद : बिहार के बी.एन.कॉलेज का एक प्रोफेसर लवगुरू बन गया, आपको मालूम होगा। चारों तरफ प्रवचन, लवगुरू माने शिष्या को रख लिया और पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा। इस देश में क्या हो रहा है?

सभापति महोदय :  आज विषय दूसरा है, इसलिए मैं दूसरे का नाम ले रही हूं। कृपया आप बैठ जाइये।

श्री लालू प्रसाद : मैडम, मेरी बात सुनिये, यह मामला वही है। हमारा व्यक्तिगत चरित्र यदि ठीक नहीं रहेगा तो हमारा सार्वजनिक चरित्र ठीक नहीं होगा, यह चौधरी चरण सिंह जी कहा करते थे। क्या हो रहा है इस देश में? हम लोग भगही पहनते थे, गरीब के लड़कों पर कपड़ा नहीं रहता था, वे भगही पहनते थे, लेकिन आज क्या प्रदर्शन हो रहा है, क्या रिवार्ड मिल रहा है, क्या फोटो खिंचवाया जा रहा है बड़े-बड़े लोगों के साथ में, मॉडर्न बन रहा है, भई यह क्या मॉडर्न है, क्या नग्न प्रदर्शन हो रहा है, क्या हमारा आवरण है, क्या हमारी पोशाक है, हमारी ड्रेस, हमारा कपड़ा, हमारा रहन-सहन, हमारा खान-पान, यह सब बिगाड़ा जा रहा है। इसे बिगाड़ने के पीछे हमारे देश के चरित्र को, इन साधु-संत लोगों को देखिये, बहुत सारे संत लोग, साधु लोग बहुत अच्छे हैं। लेकिन इसमें कई साधु-संत पकड़े गये हैं। आपको मालूम होगा कि कितने पकड़े गए हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदया :  लालू जी, पाँच बजे बिल पास करना है। आप बैठ जाइए। आप तो बहुत अच्छे वक्ता हैं।

श्री लालू प्रसाद : असली बात तो सुनिये। पाँच बजे क्या है, सात बजे करिये, आठ बजे करिये। लगातार बहस करिये। यह क्या मामूली बात है?

सभापति महोदया : अभी आप गोरखनाथ जी को बोलने दीजिए।

श्री लालू प्रसाद : वे बोलेंगे, सब लोग बोलेंगे। सबको मौका दीजिए। लाज के मारे बहुत लोग नहीं बोलेंगे। और हम चूँकि गार्डेड लैंग्वेज में बोल रहे हैं इसलिए और बात है। मैं सूर्य मंदिर गया था पहली बार।

सभापति महोदया : अब बहुत हो गया। गोरखनाथ जी आप बोलें। लालू जी आज बंद करें।

श्री लालू प्रसाद : बंद कर दें अब?

सभापति महोदया : हाँ, आपने बहुत अच्छा बोल दिया है। सबने बहुत ध्यान से आपकी बात सुनी है।

श्री लालू प्रसाद : मैडम, कृपा कीजिए। आप मेरी बात को सुनिये। अच्छा लगे तो रखिये, अच्छा नहीं लगे तो दूसरी बात है। मैं सूर्य मंदिर में गया था। मैंने समझा कि वहाँ सूर्य भगवान होंगे। वहाँ क्या देखा मंदिर की दीवारों पर, कि एक समय था जब सैक्स के प्रति लोगों में विरक्ति थी, जनरेशन खत्म होने वाली थी। इसलिए खजुराहो से लेकर सब जगह यह दिखाया गया। ...( व्यवधान)

सभापति महोदया : गोरखनाथ जी, आप शुरू करें।

श्री लालू प्रसाद : जो बिल माननीय मंत्री कृष्णा तीरथ जी लेकर आई हैं और एक्ट बनाना चाहती हैं, आपको कम से कम ऑल पार्टी मीटिंग करके नेताओं से भी राय लेनी चाहिए थी, तब आपको बिल लाना चाहिए था। क्या इसका गलत इस्तेमाल नहीं होगा। किसी को भगा देगा। दस साल सज़ा है। प्रूफ़ दीजिए, सुबूत दीजिए, सब कुछ करिये, पूरा इंतज़ाम, और यह सब बात होनी चाहिए। 1 से 14 साल की उम्र के बच्चों को बच्चा माना गया है। इसमें आपने 18 साल से नीचे का किया है। बाल सुधार गृहों में जो रक्षक हैं, वही भक्षक हैं। जितनी भी शिकायतें मिली हैं, कहीं से भागकर बच्चियाँ जाती हैं, कहीं पकड़ी जाती हैं और उन्हें वहाँ रखा जाता है, वहाँ पर रक्षक ही उनके साथ गंदा काम करते हैं।...( व्यवधान) आप समय नहीं दे रही हैं। मुझे अफसोस है कि मेरे भीतर और बात थी जो मुझे कहनी थी।...( व्यवधान)

सभापति महोदया : अलग विषय पर सब बोलेंगे, यह विस्तृत विषय है।

श्री लालू प्रसाद : लेकिन आपके रोकने की वजह से मैं अपनी बात खत्म करना चाहता हूँ क्योंकि आप आती हैं तो हमें मौका दे देती हैं। इसलिए आपके आदेश को मैं मानता हूँ। इस बिल का हम समर्थन करते हैं, लेकिन ठोक-बजाकर बढ़िया से लाइए। यह सब कुछ ठीक नहीं है। इसी दिल्ली में क्या हुआ? इसी दिल्ली में चेहरे पर एस लिख लिखकर लोग घूमते हैं। ...( व्यवधान) यहाँ टैटू बनाकर लोग घूम रहे हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदया : गोरखनाथ जी, आप शुरू करें।

श्री लालू प्रसाद : महोदया, आप मुझे बोलने नहीं दे रही हैं, मुझे अफसोस है। पांडे जी खड़े हो गए हैं, तो पांडे जी बोलें। ...( व्यवधान)

सभापति महोदया : पांडे जी आप बोलिये।

श्री लालू प्रसाद : यह हमारा देश, ऋषियों का संतों का देश है और ये आर.एस.एस. के लोग, बीजेपी के लोग, चरित्र निर्माण की दुहाई देने वाले लोग ...( व्यवधान) ये ब्रह्मचारी लोग, ये चुप हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदया : कृपया शांति रखें। बहुत गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है।

श्री लालू प्रसाद : देश में चरित्र के मामले में बहुत सारी बात है, आगे बोलना ठीक नहीं है नहीं तो वह हमको ही कंट्रोवर्सी में डाल देगा। इसलिए हम बोलें तो हमें अपना चरित्र देखना है। ...( व्यवधान) आप यह बिल लाए हैं, हमारे देश के बच्चों और बच्चियों पर...( व्यवधान) मैं अपनी बात समाप्त कर देता हूँ लेकिन आगे से आप इस पर पर्याप्त टाइम दीजिएगा, फिर कभी इस पर बहस होगी।

                                                                                                   

श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही): माननीय सभापति जी, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण विधेयक 2012 के समर्थन में बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूँ। मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया।

          महोदया, यौन उत्पीड़न और यौन अपराध जो बच्चों के साथ देश में हो रहा है, आये दिन इस तरह की घटनाएँ देखी जाती हैं। निठारी कांड और इसके साथ अन्य ऐसी घटनाएँ इस देश को शर्मसार कर चुकी हैं। प्रतिदिन टेलीविजन, अखबारों और अन्य सूचना के साधनों के माध्यम से ऐसी घटनाएं हमारे समाज को शर्मसार करती हैं।

          महोदया, माननीय मंत्री जी की बात हम बहुत ध्यान से सुन रहे थे और हमें अच्छा लग रहा था, लेकिन कुछ बातों की तरफ मैं मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं। मैं पेशे से अध्यापक रहा हूं और बच्चों से मेरा बहुत निकटस्थ संबंध रहा है। शिशु से लेकर टीन एज तक बच्चों का मस्तिष्क बहुत कोमल होता है और वे कच्चे घड़े के समान होते हैं। बच्चों को सुधारने के लिए, उन्हें बनाने के लिए, उनके चरित्र निर्माण के लिए बहुत ही संजीदगी की आवश्यकता होती है। उनके साथ जो शोषण होता है या यौन शोषण हो रहा है, वह कई तरह का हो रहा है।

  16.31 hrs. (Madam Speaker in the Chair)           आप स्पीकर पद पर आसीन हैं, यह हमारे लिए बहुत सुअवसर है। आज इस देश में टीन एज में अपराध हो रहे हैं, जैसा मंत्री जी ने कहा कि 16 से 18 साल के बीच में बच्चों को जो व्यवस्था दी जा रही है, क्योंकि इस समय उनकी बुद्धि परिपक्व नहीं होती है। टीन एज के बच्चों के लिए सहमति को आधार बना कर उनके अपराध को परिभाषित करना कहीं से ठीक नहीं है।

          महोदया, मंत्री जी बताया कि धारा 3, 5, 7, 8, 9 के तहत अगर कोई भी शिकायत अगर झूठी पाई जाती है, तो उस पर भी एक्शन लिया जाएगा। कभी-कभी सही बात को भी किसी न किसी प्रभाव में आ कर झूठा बनाने का प्रयास किया जाता है। पीड़ित बच्चे अपनी बात संकोचवश व भयवश कह नहीं पाते हैं। वे अपने परिवार को भी अपनी बात नहीं कह पाते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि 50 प्रतिशत इस तरह के अपराध पारिवारिक संबंधों में रहने वाले लोग, रिश्तेदार या निकट संबंधियों द्वारा किए जा रहे हैं। आंकड़ों से भी ज्यादा घटनाएं हो रही हैं, क्योंकि सारे लोग अपनी शिकायतों को वहां तक नहीं पहुंचा पाते हैं, जहां तक पहुंचानी चाहिए। निश्चित रूप से गरीब, निरीह और निचले तबके के लोग यौन उत्पीड़न के ज्यादा शिकार हैं। देखा जाता है कि उन्हें इस प्रकार शोषित किया जाता है कि या तो वे अपराधी बन जाते हैं या मानसिक रूप से विकलांग हो जाते हैं या उन्हें किसी तरह से उनके अंग भंग करके भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, जिन्हें संरक्षण की जरूरत होती है, वहां भी ऐसे उदाहरण आए हैं जिनके कारण हम या हमारा समाज शर्मसार हुआ है। विद्यालयों के साथ ही साथ बाल सुधार गृह, जहां हम उन बच्चों को सुधारने के लिए रखते हैं, वहां भी आए दिन ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं। अनाथालयों में भी बच्चे और बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार होता रहा है। इस प्रकार की जो शिकायतें आई हैं, जो इस समाज में कुरीतियां हैं, जो समाज में इस तरह की गंदगी है, उसे दूर करने के लिए इस तरह के नियम आवश्यक हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो किसी शर्म, डर या सामाजिक सम्मान की वजह से वे थानों तक नहीं जाते हैं। यदि वे जाते भी हैं तो उनका जो निरीक्षण किया जाता है, वह भी उन्हें शर्मसार करता है। इसलिए मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि जो बच्चियां उत्पीड़न एवं यौन शोषण की शिकार बनती हैं, उनकी जांच के लिए महिला पुलिस की व्यवस्था की जाए, जो बच्चे शोषण एवं यौन उत्पीड़न के शिकार बनते हैं, उनकी जांच के लिए पुरुष पुलिस की व्यवस्था की जाए ताकि सही जांच हो सके और इस कानून का सही उपयोग हो सके।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

श्री महेश्वर हज़ारी (समस्तीपुर):अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण विधेयक, 2012 पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

          महोदया, वर्ष 2011 में सम्पन्न हुई 15वीं जनगणना से कई जानकारियां निकलकर सामने आयी हैं। उन जानकारियों को एकत्रित करके यदि हम समस्याओं के समाधान के लिए ठीक ढंग से पहल करें तो अधिक सफलता मिल सकती है। बालकों के साथ घटने वाली विभिन्न घटनाओं के जो कारण होते हैं, उनका मूल्यांकन ठीक ढंग से नहीं हो पाता है। उन्हें जानना होगा। उस पर गहनता से विचार करना होगा। यदि यह सब ठीक से हो जाए तो समस्याओं और अपराधों पर काबू पाने में सफलता का ग्राफ बढ़ जाएगा। सिर्फ कानून बना देने से सफलता नहीं मिल सकती।

          अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से आग्रह करना चाहूंगा कि लैंगिक अपराध के शिकार जो गांव के गरीब लोग हैं, जो नौकरी-चाकरी के लिए शहर में लाए जाते हैं, ईंट-भट्ठे पर लाए जाते हैं, होटलों में काम करते हैं, वे लोग होते हैं। इस पर गहनता से विचार करने की जरूरत है। गरीबी के चलते जो बच्चे शहर आते हैं, उन पर ज्यादा लैंगिक अपराध होते हैं।

          इस विधेयक में लैंगिक उत्पीड़न के साथ-साथ अश्लील साहित्य के संबंध में भी बालकों के प्रति सजगता की बात कही गयी है। महोदया, बालकों को आज देश में सैक्सुअल विज्ञापन बहुतायत में परोसे जा रहे हैं। आज इन्टरनेट के माध्यम से बच्चों तक अत्यंत अश्लील साहित्य और अन्य सामग्री बड़ी मात्रा में सुगमता से उपलब्ध हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों में खुलेआम सैक्सुअल विज्ञापन के बड़े-बड़े साइन बोर्ड नजर आते हैं। रोज-रोज जब ऐसे विज्ञापन नजर आएंगे तो क्या तेरह-चौदह वर्ष के बालकों में सैक्सुअल जागृति नहीं आएगी क्योंकि सैक्सुअल हार्मोन नेचुरल हैं और तेरह-चौदह वर्ष के ऊपर के बालकों में सैक्सुअल जिज्ञासा आने लगती है जिसके कारण लैंगिक अपराध में बढ़ोतरी होती है। मेरा तो मानना है कि इस विधेयक में ऐसे विज्ञापन को रोकने के लिए इस विधेयक में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। केवल, कानून द्वारा सजा की बात की गयी है। आपने लैंगिक अपराध को रोकने के लिए सिर्फ अवेयरनेस को माध्यम बनाने की चर्चा की है। यह अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए राशि का जिक्र नहीं किया गया। उसके लिए कितनी राशि खर्च की जाएगी, किन एजेंसियों के द्वारा अवेयरनेस चलाया जाएगा, ऐसे तमाम बिन्दुओं पर गौर करने की जरूरत है और उन शंकाओं को दूर करना चाहिए।

          बालकों के प्रति देश में बढ़ते अपराध और यौन शोषण की खबरों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया दोनों भरे रहते हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 में लगभग पांच हजार चार सौ बच्चे यौन उत्पीड़न के शिकार हुए। यह सरकारी आंकड़ा है। जो लोक-लज्जा एवं समाज के डर से सामने नहीं आते, इसकी कोई जानकारी नहीं है। उसकी जानकारी हो तो आंकड़ें कई गुना ज्यादा हो सकते हैं।

          हमारा देश विश्व का महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है। पर, बालकों के खिलाफ हिंसा किस तरह बेलगाम हो चुकी है, इसका अंदाजा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। दिल्ली में एक लाख की आबादी पर सोलह बालकों के साथ विभिन्न अपराध घटते हैं। आंकड़ें बताते हैं कि 75 फीसदी बालकों के प्रति घटने वाली घटनाएं उन्हें जानने वाले और आसपास में रहने वाले लोगों द्वारा होती हैं।

          भारत की सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति कुछ इस तरह की हैं कि बच्चों को टारगेट करना बेहद आसान है। यही वज़ह है कि भारत में सेक्स से जुड़े दलालों के द्वारा चाइल्ड सेक्स को टुरिज्म से जोड़ दिया गया है। देश में हर साल लगभग चार लाख बच्चे व्यावसायिक सेक्स वर्कर का हिस्सा बन जाते हैं जिनका शोषण विदेशी पर्यटकों के द्वारा किया जाता है।

          समाज सेवा के नाम पर जो अनाथालय चलते हैं, वहां भी बच्चों के यौन शोषण के मामले जगजाहिर होते हैं। हाल ही में दिल्ली में दरियागंज स्थित आर्य अनाथालय में बच्चों से यौन दुर्व्यवहार के मामले सामने आए हैं। ऐसे कई मामले अखबारों के माध्यम से आए दिन सुनने और देखने को मिलते हैं।

अध्यक्ष महोदया : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए, धन्यवाद।

श्री महेश्वर हज़ारी: महोदया, केन्द्र में जब राजग की सरकार थी तो ज्युवेनाइल जस्टिस एक्ट यानी केयर एण्ड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन कानून लाई थी। लेकिन, एक दशक से ज्यादा गुज़र जाने के बावजूद भी ज्यादातर राज्यों में इस पर अमल नहीं किया गया है जो चिंता की बात है। यदि इस कानून के प्रावधानों को लागू किया गया होता तो लैंगिक अपराधों पर विराम लगाने में मदद मिली होती। इतना ही नहीं, बच्चों को स्मगलिंग और सेक्स टुरिज्म के दलालों के इस खौफनाक जाल से निकालने के लिए एक स्पेशल पुलिस फोर्स कायम करने की जरूरत भी वर्षों से महसूस की जा रही है लेकिन इस दिशा में कोई सार्थक व्यवस्था अमल में नहीं आ पा रही है।

अध्यक्ष महोदया : बहुत-बहुत धन्यवाद। ठीक है, अब अपनी बात समाप्त करें।

श्री महेश्वर हज़ारी : अध्यक्ष महोदया, आपके माध्यम से आग्रह है कि माननीय मंत्री जी इस पर ध्यान देंगे।

 

DR. RATNA DE (HOOGHLY): Madam Speaker, I would like to thank you for allowing me to speak on this subject. 

          I appreciate the Bill as it seems to protect the children from sexual assault, sexual harassment and pornography sense.  This Bill is very timely.  Penalty against those indulge in sexual offences involving children should be severely dealt with.  The penalty at present against those sexual assaults is three to five years and a fine. It should be enhanced so that the same would serve as a deterrent.   Using children for pornographic purposes is a heinous crime.  This has been a global phenomenon.  It should be dealt with iron hand.  It is an accepted fact that sexual abuses involving children are not efficiently dealt with. In that sense, this Bill would go a long way in making an earnest attempt to protect the children from all sorts of sexual offences in the country.

          According to the statement of the hon. Minister for Women and Child Development, 53 per cent of the children were sexually abused.  As per the news items, 5,484 children are sexually assaulted and 1,408 were killed in 2010.  These news items are very disturbing.  Kidnapping of children is the highest in Delhi.  This too is a matter of shame to all of us.  As per the National Crime Records data, 10,670 children were kidnapped during 2011.  It is certainly an astonishing figure.  I hope the Ministry must show extra vigil in this regard to bring down the kidnappings of children.  So, it is a high time for such a law to come into effect.

          There is a mention that each district shall designate a Sessions Court to be a Special Court.  This has to be done by the State Government.  In fact, this is a gigantic task of designating Sessions Court to be a Special Court as the Sessions Court are already having heavy number of cases pending.  It would be an additional burden on the Sessions Court.  So, there is a need to establish Special Courts with extra infrastructure. 

          The Standing Committee, which studied this Bill, has recommended that compensation should be awarded in each case and a part of the amount should be paid by the perpetrator.  I do not think this would be a feasible proposition.  The Committee also suggested that a fund may be set up under the State Government or the Court for the purpose of paying compensation. This again would consume a lot of time.

          Under such circumstances, I would like to ask specifically as to who would give compensation to the child who had undergone the trauma of abuse, both physically and mentally.  When the law is strict, the court takes it very strongly, and delivers its verdict swiftly.  Only then and then, the offenders would not dare to indulge in these despicable activities.  The civil society organisations, NGOs and experts should assist the Government in erasing all sorts of sexual offences in the country so that children bloom into beautiful citizens to enjoy life, learn and contribute to the society.

          I hope such a dream would come true.

                                                                                                   

SHRIMATI SUSMITA BAURI (VISHNUPUR): Madam, I thank you for giving me this opportunity. 

          Firstly, while supporting the Bill, I would like to appreciate the hon. Minister for Women and Child Development for bringing this important Bill in this House.  The Protection of Children from Sexual Offences Bill is perhaps the most important piece of legislation in the interest of children that we have seen so far.  It addresses an important aspect of child care, that is to give protection to a child to live with dignity.  Our nation which proclaims high human values, peace and non-violence also has a bad record in the matter of treatment of children and women for that matter. The data from the National Crimes Record Bureau show an alarming increase in cases of sexual offences against children. If we see the record of many years, each year we would find that 25 per cent of the reported cases are against children.  Such offences are mostly committed by persons known to the child or are close to them or they are relatives to them.  Hence these cases are either not comprehended by the children or by their parents.  They do not even report it out of fear.  Our existing laws are not effective in curbing the crimes and in giving justice to the victims.  In this context, the proposed Bill is highly timely and welcomed by all. 

          Madam, although the Bill is fairly comprehensive in its approach and its provisions, there are a few areas in which changes are required.  स्टेंडिंग कमेटी ने ऑलरेडी जो रिकमेण्डेशन की है, उसको आपको एक्सैप्ट करना है, आपने कुछ-कुछ एक्सैप्ट किया है।    It is written in the Bill healthy physical, emotional, intellectual and social development  of the child. इसमें आपको साइकोलोजिकल भी जोड़ना चाहिए।  आपने जो फाइन की बात कही है, लेकिन कितना फाइन होगा, इसमें कुछ स्पेसिफिक आपने नहीं दिया है।  जो पनिशमेंट है, यह बहुत कम है, इसे भी इनहैंस करना है।  खासकर सारे देश में चाहे चाइल्ड होम्स हों, जुवेनाइल होम्स हों, उनमें भी बहुत सारे क्राइम्स होते हैं, उसके लिए भी आपको अच्छा प्रावधान करना चाहिए, क्योंकि हमारे देश की आज यह बहुत बड़ी प्राब्लम है और इस पर हमें अच्छे तरीके से सोचना चाहिए। हम लोगों ने आईपीसी में देखा है,  about the provisions regarding sexual acts, there are identical provisions which states that if a sexual assault is committed against a child between 16 and 18 years of age, it should be considered whether the consent had been obtained or not. 

  अध्यक्ष महोदया : सुस्मिता जी, अब आप समाप्त करिए।

  SHRIMATI SUSMITA BAURI : I understand that the Government has already decided to amend the similar provisions of Sections 375 and 377 of the Indian Penal Code in the matter of rape of women between the age group of 16 and 18 years of age. While supporting the provisions of consent of girls between 16 years and 18 years, I would like to express my concern on the issue regarding the marriage of teenagers who are getting married without the permission of their parents. We know there are many instances of honour killings reported from many States and it is also happening everyday in many States. Young men and women are getting married without the consent of their parents. I am apprehensive about the penal provisions against the offenders who are involved as victims in the Bill. 

MADAM SPEAKER: You may conclude now.

श्रीमती सुस्मिता बाउरी : मैडम, थोड़ा सा टाइम और दीजिए।   मैडम, यह बहुत इंपोर्टेंट है। आज सारे देश में यह समस्या है। 

अध्यक्ष महोदया : मैं समझ रही हूं।

श्रीमती सुस्मिता बाउरी : खासकर मेरी जो कांस्टीच्युंसी है, मेरे डिस्ट्रिक्ट में, जो बांकुरा है, वहां एक घटना घटी है, अभी वीरेन्द्र कुमार जी बहुत अच्छी तरह से सारे देश की घटनाओं के बारे में बोल रहे थे, मैं भी उसके बारे में बोलना चाहती हूं।  एक डैफ एंड डंब जो गर्ल थी, उसको डॉक्टर अलग कमरे में जांच करने के लिए ले गया, लेकिन उसने उसका रेप किया, मतलब सेक्सुअल एसॉल्ट किया।  हम लोग उसके लिए बोले या उसकी मां बोली, लेकिन उस पर क्या कार्रवाई हुयी?  उधर का जो एसपी था, उसको वहां की गवर्नमेंट ने हटा दिया। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब आप समाप्त करिए।   There is not much time.

श्रीमती सुस्मिता बाउरी : ऐसा बहुत जगह स्टेट्स में चल रहा है।  इसमें कुछ करना चाहिए।  मैं महिला मंत्री जी से अनुरोध करूंगी कि इसमें ज्यादा से ज्यादा कार्रवाई करनी चाहिए और इसके लिए और भी अमेंडमेंट लाना चाहिए, ताकि बच्चे को अच्छे से महफूज रख सकें।  

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी पूरी बात नहीं कह पायी, लेकिन आपका धन्यवाद करती हूं।   

 

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Madam, Speaker, thank you for giving me this opportunity to speak on this Bill. Article 15 of the Constitution confers upon the State to make special provisions for children. The United Nations Conventions on the Rights of Children ratified by India on 11th December, 1992 requires the State to take appropriate national level measures. The data that has been collected by National Crime Records Bureau and the study on Child abuse in India, 2007 also corroborate the issue that is prevalent today in this country. I would, at the outset, say that this is a watershed Bill to protect children below the age of 18 against sexual offences. It is aimed at speedy trials through special courts. This is at par with the best international practices. This Bill describes sexual assault against children in five categories and the hon. Minister also has narrated as to which are the punishments to be meted out. I would like to mention here that this Bill seeks to provide protection to children against pornography abuse. It shifts the onus of proving oneself innocent from the prosecution to the accused as applicable in many women related laws. As it is prevalent in this world, we are more adjusted to British Jurisprudence but there are certain laws which we have made specially relating to protection of women relating to French Jurisprudence where the accused has to prove that he is innocent. In that respect this is a very welcome step. I welcome it.

 I would like to draw the attention of the Government, through you, Madam, and the House to the number of children being kidnapped in this country.  The law is skewed in this aspect.  Loss of a child is dealt very casually by the police.   The latest National Crime Records Bureau data says that 10,670 children were kidnapped or abducted during the year in various States and UTs.    This relates to 2011. The national capital has reported the highest number of kidnapping of children in the country, that  is, 2982.   This leads to sexual abuse of children. The Home Minister is present here. I hope he takes cognizance of this issue. About 152 years have been completed since Lord Macaulay has promulgated Indian Penal Code.  … (Interruptions)

There is a need to go into this aspect as this type of crime has never happened earlier.  The Indian Penal Code does not spell out the definition of child abuse as a specific offence. Even the Juvenile Justice Act does not specifically address the issue of child sexual abuse. 

This Bill was tabled last year in March.  The Parliamentary Standing Committee went into it and also suggested certain amendments and it has included consensual sexual relationship with a girl under 18 years as a serious criminal offence and is punishable with life imprisonment.  This will go a long way to protect girl child from trafficking. 

Madam, I would like to draw the attention of a court judgment of Madurai Bench of Madras High Court.  It says: 

 
“Child sexual abuse happens because the system of silence around the act perpetuates it.  It represses children; the repression of children is unlikely to create a flourishing society, economically, emotionally, equally or spiritually” began a judgment passed by the Madras  High Court Bench there. ”     Justice K. Chandru delivered the judgement in a couple of writ petitions by the father of a seventh standard girl who was one among many reportedly subjected to various forms of sexual abuse by S. Arockiasamy, Headmaster of a Government High School at Podhumbu, a non-descript village in Madurai West Taluk there. The petitioner was provided with compensation. 
In this Bill, I would hope that the Minister, while asking the House to adopt it, will spell out the type of compensation.  Should we leave it to the special court or should it be spelt out in the rules? 
          Many Members have said that all investigations should be done by the women police.  But my request here would be that women police should be of DSP rank and not of a lower level.
          With these words,  I would say that it is a good piece of legislation but lacks provision for proper rehabilitation of the victims.  We urgently need legislation that specifically addresses child abuse but merely enacting legislation will not be enough unless this is followed by strict enforcement of the law with accountability defined.
                                                                                         
श्रीमती कृष्णा तीरथ:   धन्यवाद अध्यक्षा जी आज एक बहुत ऐतिहासिक बिल जो यहां आया, मुझे खुशी है कि दस माननीय सदस्य, जो इस सभा में मौजूद भी हैं उन्होंने अपनी-अपनी बात कही। मुझे उनकी बात सुनने में अच्छा भी लगा। उनके जो सुझाव आए हैं वे हमने पहले से इसमें ऑलरेडी रखे हैं। क्योंकि हमने पहले ही कहा था कि हमारा जो चाइल्ड प्रोटेक्शन बिल है, बच्चों की सुविधा, सभी बच्चे जो अठारह साल की उम्र से नीचे के हैं चाहे उनकी उम्र अठारह वर्ष से छः महीने या दो महीने कम हों उन्हें लिया है । उससे पहले हमने बताया था कि कौन से ऑफेनसेज में कवर किए हैं। मैंने इसमें छः ऑफेन्सेज बताए हैं।
          Penetrative assault  सेक्शन 3, इसकी पनिशमेंट हमनें सेक्शन 4 में ऑलरेडी है। दूसरा हमने लिया है   aggravated penetrative sexual assault, section 5, जिसका पनिशमेंट Section 6 में लिखा हुआ है।   Sexual Assault, Section 7, पनिशमेंट सेक्शन 8 में है।   Aggravated Sexual Assault, Section 9 उसका पनिशमेंट सेक्शन 10 में है। Sexual harassment of Child, Section 11, जिसका पनिशमेंट सेक्शन 12 में है और   Use of Child for pornographic purposes, Section 13  में है जिसका 14 में लिया गया है।
          वीरेन्द्र कुमार जी ने इसकी शुरुआत की। उनकी चाइल्ड लेबर पर एक्सपर्टीज है। उन्होंने कहा कि बच्चों का केस जल्दी से जल्दी खत्म होना चाहिए। मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि बच्चे का बयान 30 दिन के अंदर लेना होगा और एक साल में पूरा ट्रायल करके केस को खत्म करना होगा। ट्रायल बच्चे की मर्जी से होगा। वह बाहर नहीं होगा। अगर बच्चा घर के भीतर या किसी बंद जगह, जहां किसी को उसके बारे में पता नहीं होगा, ट्रायल कराना चाहेगा, तो इस तरह का ट्रायल होगा जिससे बच्चे के मन में कोई बुरा असर न हो। इन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी केस रजिस्टर नहीं करेगा। अगर पुलिस अधिकार केस रजिस्टर नहीं करता तो धारा 21 के अनुसार उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। अगर वे पूरा बिल पढ़ें तो उन्हें पता लगेगा कि उसमें सब चीजें हैं।
          हमारे यहां चाइल्ड वैल्फेयर कमेटी स्थापित की गई हैं। 548 चाइल्ड वैल्फेयर कमेटीज़ बन चुकी हैं और 660 स्पैशल जुविनाइल पुलिस यूनिट बने हैं। उनके लिए महिला अधिकारी की जो बात की गई है, हमने रखा है कि महिला अधिकारी होगी। धारा 44 में एनसीपीसीआर और एसीपीसीआर को उसकी मौनीटरिंग का जिम्मा दिया गया है। वे बहुत जिम्मेदारी के साथ अपना काम निभाते हैं। अवेयरनैस को पूरा करने का कार्यक्रम भी इस बिल में पहले ही दिया गया है। वीरेन्द्र कुमार जी ने कई घटनाओं का जिक्र किया कि सभी सिचुएशन्स में कठोर कार्यवाही की व्यवस्था की जाए। उन्होंने गुड़गांव, इलाहाबाद, नई दिल्ली आदि कई जगह की घटनाओं का जिक्र किया। उन पर कार्यवाही की गई है, लेकिन एक्ट या आईपीसी में पहले जो प्रावधान थे, उनसे ज्यादा कठोर प्रावधान हमने इस बिल में रखे हैं जिससे कोई भी व्यक्ति अपराध करने से पहले इस बात को सोचेगा कि अगर मैं बच्चे को छू रहा हूं तो मेरी मंशा क्या है। मैं किस आधार पर बच्चे को ले रहा हूं। अगर वह बच्चे को गोद में खिला रहा है और उसकी मैलाफाइड इंटैंशन है, गलत तरीके से कहीं ले जाकर कुछ करना चाहता है, तो इन कठोर प्रावधानों को देखते हुए वह डरेगा, उसकी रूह कांपेगी। कई बार देखा गया है कि कोई सैक्सुअल ऐसॉल्ट नहीं हुआ, ईव टीज़िंग भी नहीं है लेकिन एक बच्ची जा रही है और कोई व्यक्ति उसके पीछे-पीछे आता है, तो उसके खिलाफ भी वही कार्यवाही होगी जो मैंने छ: एक्ट इनमें बताए हैं। ...( व्यवधान)
श्री शैलेन्द्र कुमार : इसका मिसयूज भी हो सकता है।...( व्यवधान)
श्रीमती कृष्णा तीरथ :  नारायणा में एक केस हुआ था। लड़की ने जब अपने पेरैंट्स को बताया तो उसके पेरैंट्स ने उस लड़के को मारा। एक महीने बाद उसने उस लड़की को शूट कर दिया। मिसयूज कहां हुआ? कोई लड़की कभी भी किसी के खिलाफ गलत काम नहीं करती। हमने इसमें गलत शिकायत की सजा भी रखी है। मिसयूज को खत्म कर दिया गया है। इस तरह के क्राइम सुपरिटेंडैंट, टीचर, वार्डन, डाक्टर करे, अगर उनकी क्लिनिक में आता है तो वह एग्रिवेटेड ऑफैंस माना जाएगा और उसके तहत जो सजा है, वह उसे दी जाएगी। इसमें हमने बर्डन ऑफ प्रूफ ऐक्यूज पर ही रखा है।
          श्रीमती हेलैन ने कहा कि बच्चों के लिए स्पैशल कोर्ट होना चाहिए। स्पैशल कोर्ट का ऑलरेडी प्रावधान है। उन्होंने कहा कि बच्चों को कैसे पता चले, तो इसके लिए हैल्प लाइन 1098 है। अगर इसमें कोई बात करेगा तो बच्चे की पूरी व्यवस्था होगी। उन्होंने इंटरनैट और टेलीविजन की बात कही। मैंने आखिर में यूज़ ऑफ चाइल्ड फॉर पोर्नोग्राफी परपजेज जो बताया है, वह इसमें कवर होता है। उसके लिए सजा है। माननीय सदस्य जानेंगे कि बहुत सोच-समझकर, ध्यान से, लम्बी प्रक्रिया से, एक्टीविस्ट्स, पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी आदि बहुत से लोगों से बात करके मैं इस बिल को फुल प्रूफ बनाकर लाई हूं।
          श्रीमती चन्द्रेश कुमारी ने आईपीसी 375 में डिफरैंट एजेस के डिफरैंस की बात कही। 375 आईपीसी का है।
 

17.00 hrs. हम इससे और ऊपर उठकर बात कर रहे हैं। सैक्शन 375, 376 और 377, लालू जी ने अननैचुरल सैक्स की बात कही। हम इससे और ऊपर उठकर बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने की बात कर रहे हैं। स्कूल में सैक्सुअल ऐब्यूज, स्कूल अथॉरिटीज़ जो कमिट करते हैं, हमारे एक्ट के अनुसार जो एग्रिवेटिड ऑफैंस है, उसमें हाई पनिशमैंट है, यानी कम से कम दस साल। दस साल से ऊपर लाइफ इमप्रिजनमैंट प्लस फाइन भी है। लाइफ इमप्रिजनमैंट और फाइन, पूरी जिंदगी की सजा फाइन के साथ है। जैसे मैने कहा कि कोई भी व्यक्ति कुछ करने से पहले सोचेगा, समझेगा, डरेगा, तो इससे यह बुराई हमारे देश में कम होगी। बच्चा अच्छे माहौल में रहेगा, सुखी माहौल में रहेगा और उसका मैंटल डेवलपमैंट आगे बढ़ेगा। यह हमारी सोच है कि इस देश के बच्चे, जो कल के भारत के भविष्य होंगे, इतनी मजबूत बुनियाद पर खड़े हों कि उन्हें कोई डर, भय न हो। उनका फिजिकल और मैंटल डेवलपमैंट इतनी अच्छी तरह से हो कि उसे लगे कि वाकई मैं भारतीय हूं और भारत में मुझे पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान की गयी है।

          अभी चाइल्ड मैरिज के बारे में बात की गई। चाइल्ड मैरिज एक्ट अलग है। चाइल्ड मैरिज प्रोहिबिशन एक्ट को ध्यान में रखना और देखना है। बच्चे को ध्यान को रखते हुए हमने इसकी ऐज 18 साल रखी है। एक बात इन्होंने और कही कि इन बिलों की अवेयरनैस की जाये।  मैं इनको बताना चाहती हूं कि अभी हमने राजीव गांधी इम्पावरमैंट एडोलिसैंट स्कीम सबला के रूप में शुरू की है। वहां 11 साल से 18 साल की बच्चियां आती हैं, उनके माध्यम से यह अवेयरनैस क्रिएट कर रहे हैं। उन्हें हम एक तरह से अहिंसा मैसेंजर बना रहे हैं। यह अवेयरनैस वह अपने आप भी लेंगी और उस जगह से अपने घरों, मोहल्लों मे जायेंगी तो इस बात को अवेयर करेंगी कि बच्चों की सुरक्षा के लिए ये चीजें हैं। उनको न्यूट्रिशियन कैसे दिया जाये, उनके लिए स्किल डेवलपमैंट, ब्रिज एजुकेशन की बात है, तो ये तमाम चीजें इस बिल की मदद करती हैं। मैं बताना चाहती हूं कि राजीव गांधी इम्पावरमैंट एडोलिसैंट गर्ल्स स्कीम हमारी आलरेडी 200 जिलों में पायलट बेसिस पर चल रही हैं। जब यह स्कीम अच्छी  होगी, तो हम देश के सभी डिस्ट्रिक्ट्स में चलायेंगे।

          चन्द्रेश जी ने एक बात और कही कि आईपीसी में 18 से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने का जिक्र किया है। हमने पहले ही बात खत्म कर दी कि 18 साल से नीचे की लड़की को हम बच्चा ही मान रहे हैं। उससे हम सैक्सुअल ऑफैंस या शारीरिक संबंध बनाने की बात नहीं कर रहे। शैलेन्द्र कुमार जी ने बहुत सारी बातें कहीं जो हमारे सैक्शन 39, 40, 15, 17, 19, 21, जिनमें बाल अधिकारों की बात की गयी है। उन्होंने फ्री एजुकेशन की बात कही। अभी कपिल सिब्बल जी ने इस बारे में कहा है। छ: साल से लेकर 14 साल तक फ्री एजुकेशन है, लेकिन अब तो हमने सर्वशिक्षा अभियान भी शुरू किया है। 18 साल तक के बच्चे के कुपोषण की बात भी उन्होंने कही। अभी मैंने जैसे सबला की बात कही या हमारी और स्कीम्स हैं, उसमें कुपोषण को भी दूर करने की बात कही गयी है। महिला पुलिस अधिकारी के बारे में मैं पहले ही कह चुकी हूं कि महिला पुलिस अधिकारी होंगी।

          मैं शैलेन्द्र कुमार जी के सवालों के जवाब में बताना चाहती हूं कि हमारे बिल के 24(1) में यह व्यवस्था है कि सैक्सुअल ऐब्यूज  ऑफ चाइल्ड के मामले में यथासंभव वूमैन पुलिस आफिसर्स ही होंगी। इसमें इंसपैक्टर से नीचे के लैवल का कोई व्यक्ति नहीं होगा। अभी महताब जी ने डीसीपी लैवल या कुछ और लैवल के बारे में कहा। लेकिन अभी तक जितने पुलिस  आफिसर्स ऐवेलेबल हैं, उनमें हमने कहा कि इंसपैक्टर से नीचे के लैवल का कोई व्यक्ति इसमें नहीं होगा। ऐसे मामलों की शिकायत एसजेपीयूज में होगी और एसजेपीयूज स्टाफ की विशेष ट्रेनिंग की व्यवस्था आईपीसी में हमारी इंटीग्रेटिड चाइल्ड प्रोटक्शन स्कीम है, उसके अंतर्गत रखी गयी है। लालू जी ने बहुत अच्छी तरह से बातें कहीं। वे बात कुछ और कहना चाहते थे, लेकिन सब लोग उसे बहुत हंसी में ले रहे थे। लेकिन मैं जानती हूं कि आपने आईपीसी के अननैचुरल लॉ की बात की। लेकिन हम सैक्शन 377 की बात नहीं कर रहे। मैंने कहा कि यह चाइल्ड प्रोटेक्शन की बात है। आपने जो बात कही, अननैचुरल सैक्सुअल ऑफैंस पहले आईपीसी में थी। मैंने कहा कि इन सब चीजों से हटकर हम बच्चे को प्रोटैक्ट करने की बात कर रहे हैं। वह  बच्चा लड़का या लड़की, यह जेंडर न्यूट्रल है। इसमें यह नहीं है कि केवल लड़की की बात करें। अगर लड़के के साथ भी इस तरह का कोई ऑफैंस होता है, उसके साथ होमो सैक्सुअल की बात करते हैं, तो उसके लिए भी हमने उतना ही दंड रखा है --दस साल या लाइफ इमप्रिजनमैंट और उसके साथ फाइन।  वह हमने कोर्ट पर छोड़ा है। चाइल्ड मैरिज के बारे अलग से कानून है। ...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : मैडम, शॉर्टकट में मत जाइए। दिल्ली हाईकोर्ट ने डिसीजन दिया है कि यह ऑफेंस नहीं है - आईपीसी की धारा 377।

श्रीमती कृष्णा तीरथ:  यह बिल्कुल अलग विषय है। यहां हम चाइल्ड प्रोटेक्शन की बात कर रहे हैं।

श्री लालू प्रसाद : बच्चों के साथ भी ऐसी घटना होती है।

अध्यक्ष महोदया :  वह बता रही हैं, आप उनकी बात सुनिए।

श्रीमती कृष्णा तीरथ:  गोरखनाथ पाण्डेय जी ने निठारी कांड की बात की, मैं मानती हूं कि ऐसे बहुत से कांड हुए हैं, आए दिन हम सुनते हैं उनको रोकने की बात, लेकिन रोकने के लिए अभी तक हमारे पास कोई कानून नहीं था, कोई कठोर प्रावधान नहीं था। आईपीसी की धारा 375 और 376 के अलावा हमारे पास कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन अब हम यह कानून लेकर आए हैं, इसके बाद अब ऐसे अपराध के बारे में सोचने से भी रूह कांपेगी। कोई किसी के पीछे जाएगा या मन में सोचेगा क्योंकि इसमें एक प्रावधान यह भी रखा है कि अगर कोई किसी बच्चे को कहीं ले गया, उसकी मंशा थी उसके साथ सेक्सुअल एब्यूज करने का लेकिन बीच में कोई आ गया, जिसकी वजह से वह ऐसा नहीं कर सका, अगर यह बात पता चल जाए कि उसकी इंटेन्शन खराब थी, तो उसके लिए भी सजा का प्रावधान इस बिल में रखा गया है।  उसका पूरा कैरेक्टर देखेंगे कि जो व्यक्ति ले गया, जो किसी अन्य के आने की वजह से रुक गया, उसका पूरा कैरेक्टर क्या है। अगर इस तरह का कैरेक्टर है, तो उसे सजा मिलेगी। 16 से 18 साल तक की उम्र के बच्चों की बात कही है। उन्होंने बेगिंग की बात कही है, जो इससे बिल्कुल अलग है। चाइल्ड लेबर की बात कही गयी, जिसके लिए अलग कानून है। श्री महेश्वर हजारी जी ने कहा कि इस कानून की अवेयरनेस बढ़ाने के बारे में कोई प्रावधान नहीं है। मैं बताना चाहूंगी कि इसके लिए प्रावधान अलग से है, उसके लिए पैसा भी अलग से है, आईसीपीएस के थ्रू हम उसके लिए पैसा दे रहे हैं। बच्चों का यौन शोषण काम के स्थान पर हो, गली में हो, सड़क पर हो, घर के बाहर हो या घर के भीतर हो, किसी होटल में हो या अन्य किसी भी जगह पर हो, अगर वह किसी होटल में हो रहा है और होटल वाले को मालूम है, लेकिन वह बताता नहीं है, तो उसे भी पनिशमेंट मिलेगी। अगर किसी को भी पता है कि यहां ऐसा हो रहा है, फिर भी वह कंप्लेंट नहीं करता है, तो उसे भी सजा मिलेगी। बच्चों को एक सुरक्षित वातावरण इस भारतवर्ष में देना है क्योंकि बड़े होकर वे ही भारत का बोझ संभालेगे। अगर वे मेंटली और फिजीकली तंदुरूस्त रहेंगे, तभी हम कह सकेंगे कि भारत महानता की ओर बढ़ेगा, आगे बढ़ेगा। बच्चों को सुरक्षित रखने का जो जिम्मा हमने लिया है, हमारी सरकार ने लिया है, उसे पूरा करेंगे। डा. रत्ना डे जी ने कहा कि चाइल्ड एक्यूज्ड हुए हैं, जिनकी संख्या उन्होंने 5400 बताई है। मैं भी मानती हूं कि इनसे भी ज्यादा केसेज होंगे, लेकिन इन केसेज को रोका कैसे जाए।

अध्यक्ष महोदया : आप लोग आपस में बात मत कीजिए। मंत्री जी की बात सुनिए।

श्रीमती कृष्णा तीरथ:  इन केसेज को रोकने के लिए यह बिल लाया गया है। जितने भी केसेज हमारे सामने आ रहे हैं, पांच हजार-छः हजार केसेज सामने आए हैं, और भी बहुत से केसेज हो सकते हैं, लेकिन वे रुकें कैसे? आईपीसी के तहत नहीं रुक पा रहे थे, इसीलिए यह बिल लाया गया है। माननीय सदस्य ने कहा कि न्याय जल्दी मिल सके, इसके लिए स्पेशल कोर्ट का प्रावधान हो, स्पेशल कोर्ट का प्रावधान राज्यों को बताया गया है, हर राज्य के हर डिस्ट्रिक्ट में ऐसी स्पेशल कोर्ट्स होंगी और नीचे तालुका एवं ब्लॉक लेवल पर भी इसके लिए प्रावधान किया गया है। सुस्मिता बाउरी जी ने कहा प्रोटेक्शन मिलेगा, आंकड़े की बात कही है। उन्होंने कहा कि हमने इसमें फाइन नहीं बताया है, मैं कहना चाहती हूं कि फाइन हमने कोर्ट की डिसीजन पर छोड़ी है। इसलिए छोड़ा है कि कभी-कभी ऐसा होता है कि फाइन अगर ज्यादा कर दिया और वह व्यक्ति देने वाला नहीं है, तो मुश्किल होती है, लेकिन अगर हम फाइन कम रखते हैं, तो कोई अमीर आदमी, मिलिनियर है, तो वह फाइन देकर छूट जाएगा। इसलिए हमने इसको कोर्ट पर छोड़ा है। पहले इसको सेक्शन 4, 6, 8,12, 14 एवं 15 में इस बिल में रखा था। हमने इसकी डिसक्रिशनरी पावर कोर्ट को दी है, कोर्ट डिसाइड करेगी कि क्या फाइन होगा। महताब जी ने कहा कि हमने यूएन कंवेंशन में बात की है, पोर्नोग्राफी की बात की है, इन सबके साथ उन्होंने के.चन्द्रन जी के मामले में फैसले को कोट कर अपनी बात कही है। अगर आप ओवरआल देखें, इस बिल को अच्छी तरह पढें, तो इन सब चीजों से बच्चों को प्रोटेक्ट करने के लिए इस बिल में सारे प्रावधान किए गए हैं। इसलिए मैं चाहती हूं कि बिल को सदन द्वारा पारित किया जाए।

MADAM SPEAKER: The question is:

… (Interruptions)
श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी): अध्यक्ष महोदया, ऐसा है कि हमें इस बिल पर कुछ कहना है।
अध्यक्ष महोदया: मैं अब इस बिल को पास करा रही हूं।
श्री मुलायम सिंह यादव: अध्यक्ष महोदया, इसके क्या-क्या परिणाम होंगे, क्या-क्या होता है, कैसे होता है, हम कैसे बोल सकते हैं। यह जानते हुए भी हम कर रहे हैं, लेकिन हम कुछ बोल ही नहीं सकते। इसलिए इसे लाने की कौन सी जरूरत पड़ गई थी। पहले से कानून है, सैक्स के बारे में और सब चीजों के बारे में पहले से ही कानून हैं। मैं बताना चाहता हूं कि इसका इतना दुरुपयोग होगा कि भले-भले लोगों को कभी भी किसी भी तरह की परेशानी हो सकती है।
MADAM SPEAKER: I am in the middle of getting it passed. अब मैं पास करा रही हूं। आप अपना स्थान ले लें।
श्री मुलायम सिंह यादव :  हम इस बिल का विरोध करते हैं।
श्री लालू प्रसाद : जीर ऑवर का क्या हुआ?...( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: It is not going in the record.
(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: The question is:
“That the Bill to protect  children from offences of sexual assault, sexual harassment and pornography and provide for establishment of Special Courts for trial of such offences and for matters connected therewith or incidental thereto, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration.”   The motion was adopted.
 
MADAM SPEAKER: The House shall now take up clause by clause consideration of the Bill.
          The question is:
                    “That clauses 2 to 46 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clauses 2 to 46 were added to the Bill.
The Schedule, Clause 1, the Enacting Formula, Preamble and the Long Title were added to the Bill.
 
SHRIMATI KRISHNA TIRATH: I beg to move:
“That the Bill be passed.” MADAM SPEAKER: The question is:
“That the Bill be passed.” The motion was adopted.