Allahabad High Court
Gaya Prasad And Others vs Additional Sessions Judge/F.T.C.-5 ... on 22 July, 2025
Author: Saurabh Lavania
Bench: Saurabh Lavania
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, LUCKNOW BENCH Neutral Citation No. - 2025:AHC-LKO:42079 Court No. - 13 Case :- CRIMINAL MISC. WRIT PETITION No. - 1004513 of 2006 Petitioner :- Gaya Prasad And Others Respondent :- Additional Sessions Judge/F.T.C.-5 Sultanpur And Others Counsel for Petitioner :- O.N.Tripathi,Brijesh Kumar Singh Counsel for Respondent :- Govt.Advocate Hon'ble Saurabh Lavania,J.
(Crl. Misc. Application for Condonation of Delay/I.A. No.5 of 2023 and Crl. Misc. Application for Recall/I.A. No.6 of 2023)
1. Heard.
2. Finding the reasons/grounds mentioned in the affidavit to be sufficient for condoning the delay as well as for recall of the order dated 28.02.2019 and for hearing the petition on merits, the application for condonation of delay as also the application for recall of the order dated 28.02.2019, whereby the petition was dismissed for want of prosecution, to the view of this Court are liable to be allowed.
3. Accordingly, the application for condonation of delay as well as the application for recall are allowed.
4. The delay is condoned and the order dated 28.02.2019 is recalled. The writ petition is restored to its original number.
(Order on the Memo of the Writ Petition)
1. By means of the present petition, the petitioners have assailed the order dated 22.08.2006, passed by the Additional Sessions Judge/F.T.C.-5, Sultanpur in Criminal Revision No.443 of 2006 (Gaya Prasad and others Vs. State of U.P. and 02 others) and order dated 16.06.2006, passed by Sub Divisional Magistrate, Musafirkhana in Case No.52/54 (Vishwanath Lal and others Vs. Mata Prasad and others).
2. By the order dated 16.06.2006, the Pargana Magistrate, Musafirkhana, Sultanpur rejected the application preferred under Section 145 Cr.P.C. The relevant portion of the order dated 16.06.2006 reads as under :-
आदेश प्रस्तुत वाद में गया प्रसाद ने दिनांक 25-1-05 को आशय का प्रार्थना-पत्र जिलाधिकारी महोदय के यहां प्रस्तुत किया जो परगनाधिकारी मुसाफिरखाना के यहां दिनांक 27-1-2005 को प्राप्त हुई। गया प्रसाद ने इस आशय का प्रार्थना-पत्र दिया है कि तत्कालीन उप जिलाधिकारी मुसाफिरखाना ने दि०2-11-95 को विवादित आराजी अन्तर्गत धारा-145 व146 सी.आर.पी.सी. के अन्तर्गत कुर्क करने का आदेश दिया था तथा दि० 6-3-99 के विरुद्ध रिवीजन जिला जज महोदय के यहां प्रस्तुत हुई जो स्थानांतरित होकर अपर सत्र न्यायाधीश आवश्यक वस्तु अधिनियम द्वारा दिनांक 20-11-04 को निगरानी स्वीकार किया गया तथा आदेश दिनांक 6-3-99 निरस्त कर दिया गया। इसलिए उप जिलाधिकारी मुसाफिरखाना उक्त न्यायालय के आदेश के अनुपालन में मेरे पक्ष में बागुजार करने का आदेश प्रदान करें।
माननीय अपर सत्र न्यायाधीश महोदय ने अपने आदेश दिनांक 20-11-2004 में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया है विवादित संपत्ति के बारे में सिविल न्यायालय में वाद विचाराधीन है। इसलिए 145 सी. आर.पी.सी. की कार्यवाही समाप्त की जाती है। मेरे विचार से जब तक यह निर्णय नहीं हो जाता है कि यह विवादित संपत्ति किसकी है तब तक किसी के पक्ष में बागुजार करने का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता है। संपत्ति घोषित करने का अधिकार सिविल न्यायालय को ही है। जब यह तय हो जायेगा कि संपत्ति किसकी है उसके पश्चात ही किसी के पक्ष में बागुजार घोषित किया जायेगा। चूंकि मामले में यथास्थिति का आदेश है इसलिए मौके पर यथास्थिति कायम रखी जाय।
अतः बागुजार संबंधी प्रार्थना-पत्र श्री गया प्रसाद दिनांक 25-1-05 निरस्त किया जाता है। वाद आवश्यक कार्यवाही पत्रावली दाखिल दफ्तर हो। "
3. From the above quoted order dated 16.06.2006, it is apparent that the same is based upon the order of the Additional Session Judge dated 20.11.2004, according to which with regard to the property in dispute civil proceedings were pending consideration.
4. The order dated 16.06.2006, passed by the Pargana Magistrate, referred above, was challenged by means of the Criminal Revision No.443 of 2006 (Gaya Prasad and others Vs. State and 02 others). The revisional court taking note of the various aspects of the case found that the order of the Pargana Magistrate dated 16.06.2006 is liable to be affirmed and therefore, dismissed the criminal revision. The relevant portion of the revisional order 22.08.2006 reads as under :-
"यह स्वीकृति है कि पक्षों के मध्य गाटॉ संख्या- 40 रकबा 1 बिस्वा 10 धूर स्थित ग्राम रसूलपुर थाना बल्दी राय जिला सुल्तानपुर के सम्बन्ध में पक्षों के मध्य एक साधारणवाद संख्यॉ 153/95 राम फेर आदि बनाम विश्व नाथ आदि विचाराधीन है और उसमें दिनांक 16-8-95 को प्रार्थनापत्र 4 ग में एकपक्षीय रूप से यह आदेश पारित किया गया था कि इस बीच यदि निर्माण कर लिया जायेगा तो इस प्रार्थनापत्र का उद्देश्य बिफल हो जायेगा इस लिए नियत तिथि तक बिवादित निर्माण नष्ट न किया जाये और उसकी यथा स्थिति कायम रक्खी जाये। इस आदेश के पश्चात् दिनांक 28-10-95 को थाना बल्दी राय की पुलिस द्वारा उप परगना मजिस्ट्रेट मुसाफिर खाना ने कब्जे के बिवाद एवं शांति भंग की आशंका के सम्बन्ध में रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी और उप जिला मजिस्ट्रेट मुसाफिर खाना के आदेश दिनांक 6-3-99 के बिरुद्ध निगरानी न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश आवश्यक वस्तु अधिनियम न्यायालय कक्ष संख्यॉ-9 सुल्तानपुर के द्वारा निगरानी इस आशय से स्वीकार की गई थी जिसमें यह निष्कर्ष दिया गया था कि चूंकि इसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में एक दीवानी मुकदमा चल रहा है और वर्ष 1995 से लम्बित है इसलिए यह उचित होगा कि 4 ग प्रार्थना-पत्र का निस्तारण करने के लिए बिद्वान न्यायालय में याचना करे। यदि अब तक उसका निस्तारण न हुआ हो और यदि उसका निस्तारण हो चुका हो तो धारा-145 द०प्र०सं० की कार्यवाही करने का वैसे भी कोई औचित्य नहीं रह जाता है। जिसके सम्बन्ध में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा भी रिट पेटीशन 1794/06 में दिनांक 10-4-06 को दो महीने के अन्दर मुकदमें का निर्णय करने हेतु निर्देशित किया गया था परन्तु इसका निस्तारण नहीं हुआ जो प्रार्थनापत्र गया प्रसाद निगरानीकर्ता द्वारा दिनांक 25-1-05 को जिलाधिकारी को इस आशय से प्रस्तुत किया गया था उप जिलाधिकारी को निर्देशित किया जाये कि सत्र न्यायालय के आदेश दिनांक 20-11-04 के अनुपालन में भूमि ब गुजार करने की कार्यवाही हुई जिस पर परगना मैजिस्ट्रेट द्वारा यह आदेश पारित किया गया है माननीय अपर सत्र न्यायाधीश सुल्तानपुर द्वारा अपने आदेश में दिनांक 20-11-04 को इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया है कि बिवादित सम्पत्ति के बारे में सिबिल न्यायालय के वाद विचाराधीन है इस लिए धारा 145 द०प्र० सं० की कार्यवाही समाप्त की जाती है। मेरे विचार से जब तक यह निर्णीत न हो जाये कि बिवादित सम्पत्ति किसकी है तबतक किसी के पक्ष में बगुजार करने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है। सम्पत्ति घोषित करने का अधिकार सिबिल न्यायालय को ही है जब यह तय हो जायेगा कि सम्पत्ति किसकी है उसके पश्चात् किसी के पक्ष में बगुजार घोषित किया जायेगा। चूंकि मामले में यथा स्थिति का आदेश है तथा मौके पर यथा स्थित कायम रखी जाये।" निगरानी कर्ता की तरफ से अपने कथन के समर्थन में निर्णय जो बिधिमहादेव प्रसाद बनाम अपर जिला जज जौनपुर व अन्य 1999 प्रयाग निर्णय पत्रिका पेज 50 क्रि० उद्धत किया गया है जिसमें यह व्यवस्था दी गई है कि यदि बिवादित भूमि के सम्बन्ध में दीवानी न्यायालय में मुकदमा चल रहा है तो कोई आदेश पारित किया गया है तो धारा 145 द० प्र० स० की कार्यवाही नहीं चल सकती है। अन्य निर्णय जो बिधिमुस्ताक अली बनाम उ०प्र० राज्य 1990 ए०एल० जे० पेज 391 लखनऊ बेन्च उद्धत किया गया है जिसमें यह व्यवस्था दी गई है कि पक्षों के मध्य सिबिल वाद बिचाराधीन रहते हुए धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तर्गत कार्यवाही प्रारम्भ किया जाना व धारा 146 दं०प्र०सं० में दूकान की कुर्की निरस्त की गई है। इसके बिरुद्ध बिपक्षी गण की तरफ से निर्णय बिधि श्याम सुन्दरी (मृृत) बनाम जिला एवं सत्र न्यायाधीश बलिया व अन्य 2003 (46) ए०सी०सी० पेज 1019 उद्धत किया गया है जिसमें यह व्यवस्था दी गई है कि सिबिल न्यायालय द्वारा कब्जे के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया और कुर्की आदेश प्रथम दृष्टया इमरजेन्ट मामला पाते हुए सन्तुष्टि के आधार पर कुर्की की गई कब्जे के सम्बन्ध में बिना निष्कर्ष के यथा स्थिति का आदेश बेग है। धारा 145 द०प्र०सं० की कार्यवाही शान्ति व्यवस्था कायम करने के उद्देश्य से की जाती है। धारा 146 (1) की कार्यवाही को बैध माना गया इसी तरह निर्णय बिधि बहादुर बनाम चन्द्रभूषण व अन्य 2000 (40) ए०सी०सी० पेज 559 उद्धत किया है जिसमें यह व्यवस्था दी गई है कि मैजिस्ट्रेट द्वारा धारा 145 व 146 दं०प्र०सं० की कार्यवाही समाप्त कर दी गई परन्तु सम्पत्ति को एक पक्ष के कब्जे में दे दी गई यह निर्धारित किया गया कि मैजिस्ट्रेट वास्तविक कब्जे का निस्तारण नहीं कर सकता है परीक्षण न्यायालय द्वारा मजिस्ट्रेट को पुनः कार्यवाही किये जाने हेतु प्रत्यावर्तित किया जाना वैध है उपरोक्त निर्णय विधि में दिये गये निर्णय व्यवस्था को एक साथ अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सिबिल न्यायालय/ सक्ष्म न्यायालय द्वारा स्वामित्व व कब्जे के सम्बन्ध में निर्णय पारित नहीं कर दिया जाता तब तक मैजिस्ट्रेट को पक्षों में किसी भी एक पक्षकार के पक्ष में कब्जा दिया जाने का अधिकार नहीं है। प्रस्तुत मामले में भी चूंकि सिबिल न्यायालय द्वारा पक्षों के मध्य यह निस्तारित नहीं किया गया है कि बिवादित सम्पत्ति पर किस व्यक्ति का कब्जा है इसलिऐ उप जिला मैजिस्ट्रेट मुसाफिर खाना को किसी पक्ष का कब्जा दिलाये जाने का अधिकार नहीं है। इस प्रकार बिद्वान अबर न्यायालय द्वारा निगरानीकर्ता का प्रार्थना-पत्र निरस्त करके व किसी पक्ष को कब्जा न देकर अपने क्षेत्राधिकार का उचित प्रयोग किया है उसमें कोई बिधिक त्रुटि नहीं है। न ही कोई बिधिक अनियमितता ही की गई निगरानी निरस्त किये जाने योग्य है।
आदेश निगरानी सव्यय निरस्त की जाती है। पत्रावली अबर न्यायालय को अबिलम्ब वापस की जाये। पक्षकार अबर न्यायालय दिनांक 21-9-2006 को उपस्थित हो।
(रामकरन) अपर सत्र न्यायाधीश एफ०टी-सी०-5 सुल्तानपुर दिनांक 22-8-2006"
5. The above quoted order dated 22.08.2006 indicates that the same was passed after considering the fact that the regular suit with regard to the property in dispute, i.e. Regular Suit No.153 of 1995 (Ram Pher and others Vs. Vishwanath and others) is pending. By order dated 22.06.2006, the order dated 16.06.2006 was affirmed. The fact that the civil suit aforesaid is pending is not in dispute. It is also not in dispute that in relation to the property in dispute the proceedings under Section 107/116 Cr.P.C. were initiated against the parties for keeping the peace.
6. Upon due consideration of the pleadings and material on record as also the recital of the orders impugned as also taking note of the observations made by Hon'ble Apex Court in the judgment passed in the case of Ram Sumer Puri Mahant Vs. State of U.P. & others, AIR 1985 SC 472, Prakash Chand Sachdeva Vs. State and Another, AIR 1994 SC 1436, Jhummamal alias Devandas Vs. State of M.P. & others, AIR 1988 SC 1973, Amresh Tiwari Vs. Lalta Prasad Dubey and another, AIR 2000 SC 1504, Mohd. Shakir Vs. State of U.P., 2022 Live Law (SC) 727, M. Siddiq (Ram Janmabhumi Temple-5 J.) v. Suresh Das, (2020) 1 SCC 1, Sri Siddeshwar Temple Trust Committee v. Sri Malingaraya Temple Charitable Trust, (2020) 18 SCC 417 and Full Bench of this Court in the case of Ganga Bux Singh Vs. Sukhdin, AIR 1959 All 141 on the issue according to which in given facts of the case proceedings under Section 145 Cr.P.C. can be initiated even if the case before the civil court is pending, this Court is not inclined to interfere with the impugned orders.
7. The writ petition is, accordingly, dismissed.
8. Cost made easy.
Order Date :- 22.7.2025 ML/-