Lok Sabha Debates
Discussion On The Demands For Grants Nos. 82 To 84 Under The Control Of The Ministry ... on 14 March, 2011
> Title : Discussion on the Demands for Grants Nos. 82 to 84 under the control of the Ministry of Rural Development for 2011-12 ( cut motions moved were negatived and discussion concluded).
MADAM SPEAKER: The House will now take up discussion and voting on Demand Nos. 82 to 84 relating to the Ministry of Rural Development.
Hon. Members present in the House whose cut motions to the Demands for Grants have been circulated may, if they desire to move their cut motions, send slips to the Table within 15 minutes indicating the serial numbers of the cut motions they would like to move. Only those cut motions, slips in respect of which are received at the Table within the stipulated time, will be treated as moved.
A list showing the serial numbers of cut motions treated as moved will be put up on the Notice Board shortly thereafter. In case any Member finds any discrepancy in the list, he may kindly bring it to the notice of the Officer at the Table immediately.
Shri Shailendra Kumar.
“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2012, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 82 to 84 relating to the Ministry of Rural Development.” श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे वर्ष 2011-12 के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदानों की मांगों पर चर्चा में बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। हमारे जो पक्ष और विपक्ष के सम्मानित सदस्य तथा राज्यसभा के जो सम्मानित सदस्य हैं, वे जिले की निगरानी और सतर्कता समिति के भी अध्यक्ष हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय से संबंधित भारत-निर्माण के भी छ: बिन्दु हैं, इस प्रकार से उन बिन्दुओं पर अगर विस्तार से चर्चा की जाए तो मेरे ख्याल से ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत जो विकास से संबंधित घटक है, उस पर बड़े विस्तार से बात आ सकती है। इसमें प्रमुखता से सिंचाई, पेयजल, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना और ग्रामीण आवास विद्युतीकरण एवं ग्रामीण टेलीफोन का दिया गया है।
15.09 hrs. (Mr. Deputy Speaker in the Chair) उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहता हूं कि ग्रामीण टेली घनत्व सन् 2004 में 1.57 था, वह सन् 2010 में बढ़ कर 30.18 फीसदी हुआ है, 1999 में महज पांच फीसदी से बढ़ कर नवम्बर, 2010 में 84.5 फीसदी हुआ है।
उपाध्यक्ष महोदय, ग्रामीण टेलीफोन कनैक्शनों की संख्या वर्ष 2004 में सिर्फ 1 करोड़ 20 लाख थी, लेकिन ग्रामीण टेलीफोन कनैक्शनों की संख्या नवम्बर, 2010 में 25 करोड़ से ज्यादा हो गई है। जहां तक बिजली की व्यवस्था है, पूरे देश में अगर उस पर एक नजर डाली जाए, तो 11वीं पंचवर्षीय योजना में विद्युत क्षेत्र में 78 हजार मैगावाट क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था, जबकि बाद में इसे घटाकर 62,374 हजार मैगावाट कर दिया गया। 31 दिसम्बर, 2010 तक 32,032 मैगावाट का उत्पादन हासिल किया गया है। यह एक निराशाजनक रिपोर्ट है।
महोदय, जहां तक राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, महात्मा गांधी नरेगा स्कीम से संबंधित है। अगर इसमें देखा जाए, तो इसमें कुछ ऐसे राज्य हैं, जैसे राजस्थान, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तामिलनाडु और बिहार जहां पर रोजगार के अवसर कुछ ठीक आए हैं और लोगों को रोजगार मिला है, लेकिन जो हमारा सामाजिक लेखा परीक्षण है, वह बताता है कि 93 फीसदी कार्यक्रम में केवल सोश्यल ऑडिट हो पाया है। अभी मैं कल अपने निर्वाचन क्षेत्र में था, तो यह मालूम हुआ कि सभी जिलों में इकट्ठा सोश्यल ऑडिट हो रहा है। मेरे ख्याल से हड़बड़ी में ऐसा न किया जाए कि इसके सोश्यल ऑडिट में कुछ गड़बड़ी हो। इस पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इस योजना के लिए जहां तक मुझे मालूम है एक सरकारी अधिकारी की भी नियुक्ति की गई है। औसतन देखा जाए, तो वर्ष 2007-08 में 42 दिन और वर्ष 2009-10 में केवल 54 दिन का रोजगार मिल पाया है, जबकि सरकार का लक्ष्य था कि इसमें प्रति वर्ष 100 दिन का रोजगार मिलेगा। इस योजना के अन्तर्गत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिमी बंगाल और बिहार से ये शिकायतें बराबर आई हैं कि मजदूरों का जॉब कार्ड सरपंच के पास रहता है न कि मजदूरों के पास। यह भी एक चिन्ता का विषय है कि इसके कारण उन्हें समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं हो पाता है, जिसके कारण उन्हें अपनी जीविकोपार्जन हेतु बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
महोदय, इसी प्रकार स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना में लगभग 12 हजार करोड़ रुपए के खर्च से अब तक 9 लाख ग्रामीण बी.पी.एल. लाभार्थियों को सम्मिलित किया गया है जबकि यदि पूरे देश के स्तर पर अवलोकन किया जाए, तो बी.पी.एल. लोगों की संख्या अत्यधिक है। अब जो जनगणना हो रही है, मुझे इस बात की खुशी है कि वह जातिगत आधार पर हो रही है। इसमें आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक आधार अगर होगा, तो सही रूप में बी.पी.एल. की भी एक रूपरेखा आएगी।
महोदय, जहां तक भारत निर्माण की बात है, उसका एक घटक ग्रामीण पेयजल भी है। ग्रामीण पेयजल के बिन्दु पर अगर जाकर देखा जाए, तो वर्ष 2005-06 में केवल 40,98 करोड़ रुपए से बढ़ाकर वर्ष 2009-10 में 7,989 करोड़ रुपए दिए गए हैं। वर्ष 2010-11 में इस योजना में 9 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान है, जिसमें से अब तक केवल 7103 करोड़ रुपए ही खर्च हुए हैं। आज स्थिति यह है कि 2010-11 में केवल 76,316 बस्तियों को पेयजल देने की योजना है, जबकि वर्ष 2010 में 43,193 बस्तियों को शामिल किया गया है, जबकि 33 हजार बस्तियां ऐसी हैं, जिन्हें अभी तक शामिल नहीं किया गया है। अगर आंकड़ा देखा जाए, तो भारत में केवल 2.4 फीसदी ही जमीन, 16 फीसदी आबादी और 4 फीसदी जलसंसाधन से हम दोहन कर के पेयजल मुहैया करा रहे हैं। 85 फीसदी ग्रामीण आबादी ग्राउंड वाटर पर निर्भर करती है, जबकि देखा गया है और एक आंकड़ा बताता है कि गन्दे पानी के चलते हुए, पेयजल व्यवस्था हम आज तक पूरी नहीं कर पाए, फिर चाहे राष्ट्रीय स्वजल धारा योजना हो, चाहे राजीव गांधी पेयजल मिशन हो। देखा गया है और आंकड़े बताते हैं कि हिन्दुस्तान में गन्दा पानी पीने के कारण एक साल में कम से कम 7 लाख 82 हजार लोगों की मौत हुई है और 2142 मौतें रोज, यानी करीब 90 मौतें हर घंटे हो रही हैं। यह बड़ा गम्भीर मुद्दा है। हम चाहते हैं कि भारत सरकार इस दिशा में पहल करे और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को आगे कर के ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराए। ग्रामीण विकास का जहां तक 2011 का बजट है, केवल 87,800 करोड़ रुपये आबंटन किया गया है, जबकि पिछली बार की अपेक्षा केवल 12 फीसदी ही बढ़ाया गया है। भारत निर्माण कार्यक्रम के अन्तर्गत केवल 58 हजार करोड़ रुपये दिया गया है। मौजूदा साल में केवल 10 हजार करोड़ रुपये ज्यादा है। आज अगर पूरे देश में देखा जाये तो ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति आज भी बहुत खराब है। आज जरूरत इस बात की है कि हमें उस ओर भी ध्यान दोना पड़ेगा और इस बजट में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए और भी धन का आबंटन कराने की जरूरत थी।
ग्रामीण आवास की बात मैंने आपको पहले भी बताई, इस सदन में कई बार चर्चा हुई है कि आज भी ग्रामीण आवास के नाम पर, चाहे इन्दिरा आवास हो या इधर राजीव गांधी शहरी विकास के नाम पर जो स्लम बस्तियों में लोग निवास करने वाले हैं, उनके लिए आवास की योजना हो, लेकिन जहां तक इन्दिरा आवास की बात है, मैदानी क्षेत्र में 45 हजार किया गया है, पहाड़ों पर शायद 47 या 48 हजार रुपये किया गया है, जबकि आज की महंगाई को देखते हुए इन्दिरा आवास योजना में धनराशि बढ़ाने की जरूरत है। हम तो उम्मीद कर रहे थे कि इस बजट में जो इन्दिरा आवास योजना में कम से कम 50 हजार या 60 हजार रुपये करने की जरूरत थी, तब जाकर एक कोठरी, एक कमरा बन पाता है, उसमें छोटा सा एक बरामदा हो, तब जाकर एक गरीब का उसमें आवास बन पाता है।
दूसरी बात, पिछले तीन साल के अगर आंकड़े देखे जायें तो हमारे यहां जो राष्ट्रीय ग्राम स्वराज योजना के लिए 84 करोड़ रुपये का आबंटन हुआ है, वह भी एक तरीके से कम है। राजीव गांधी विद्युतीकरण, जो इस घटक में भी आता है, अगर ध्यान देंगे तो उत्तर प्रदेश में पिछली बार प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में पैसा गया ही नहीं है। अब यहां केन्द्र सरकार ने अगर उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा हो, और कहीं खर्च हुआ हो तो मुझे नहीं लगता, लेकिन दो वर्ष में जब से हम लोग 15वीं लोक सभा में चुनकर आये हैं, अभी तक प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में कोई भी गांव टेक-अप नहीं हो पाया है। यह बड़ी गम्भीर चिन्ता का विषय है। सरकार का यह लक्ष्य है कि आने वाले समय में हम 100 घर की आबादी पर बिजली दे देंगे, लेकिन आज ऐसे बड़े-बड़े पुरवे हैं, जो गांव के बराबर हो गये हैं। वे विद्युतीकरण से बिल्कुल वंचित रहे हैं। हम लोगों को अब जाकर दो करोड़ से पांच करोड़ बढ़ा है, हम लोग जब अपने क्षेत्रों में जाते हैं तो गांव के लोग मांग करते हैं कि आप विद्युतीकरण कराइये। एक गांव के विद्युतीकरण में मेरे ख्याल से 10-12 लाख रुपये से कम खर्च नहीं आता। ऐसे बहुत से पुरवे हैं, आज भी राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना से बिल्कुल वंचित हैं।
दूसरी तरफ, मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चहूंगा कि जो गरीबी की रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले बहुत से लोग हैं, जिनको हम बी.पी.एल. धारक कहते हैं, आज भी जब गांव में हम लोग जाते हैं तो तमाम ऐसे लोग शिकायत करते हैं कि बी.पी.एल. कार्ड उन लोगों का बना है, जिनकी स्थिति ठीक है, जिनके पास खेत है, मकान है, सब कुछ है। वहां बहुत से ऐसे गरीब हैं, जिनकी स्थिति हमने देखी, उनके घरों में बैठकर कि इनका नाम बी.पी.एल. में आना चाहिए। यह बात सत्य है कि सरपंच के ऊपर, ग्राम पंचायत का जो प्रधान होता है, उसके ऊपर बहुत बड़ा बोझ होता है। यहां तक कि अगर देखा गया कि अगर गांव में 50 का लक्ष्य रखा गया है तो वहां बी.पी.एल. लोगों की संख्या कम से कम 150-200 के करीब है। आज जरूरत इस बात की है कि जो हमारी सेंसस, जनगणना हो रही है, उसमें जो बी.पी.एल. धारक हैं, उनकी सही जनगणना होनी चाहिए और उसके आधार पर सरकार को जितनी भी योजनाएं हैं, वे उसी आधार पर जाती हैं, उससे वे लाभ पाते हैं। जैसा आपने देखा होगा, इसी हाउस में चर्चा हुई थी कि योजना आयोग की रिपोर्ट कुछ कहती है, तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट कुछ कहती है और सक्सैना कमेटी की रिपोर्ट कुछ कहती है कि हां, इतने बी.पी.एल. हैं, लेकिन जहां तक देखा गया है कि बी.पी.एल. की संख्या 50 से 60 फीसदी के बीच में एक आंकड़ा जो आता है, वह सभी समितियों की रिपोर्ट के बाद ऐसा लगता है कि 50 से 60 फीसदी के करीब हैं। हमको उसके अनुसार कम से कम धन का आबंटन, बजट का आबंटन करना चाहिए, ताकि हमारे जो बी.पी.एल. हैं, उनका भी जीवन-स्तर ऊपर उठ सके और भारत सरकार की जो भी विकास से सम्बन्धित योजनाएं हैं, उनसे पूरी तरीके से लाभ हो सके।
मनरेगा में 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी आपने ली है, उसके लिए एक लाख करोड़ रुपये की जरूरत है, लेकिन आपने आबंटन केवल 40,100 करोड़ रुपये का ही किया है। आंकड़े बताते हैं, आप किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में जाइए, तो वहां अभी तक मजदूरों को एक सौ दिन की मजदूरी नहीं मिल पायी है। मुश्किल से पचास या साठ दिन के एवरेज मजदूरी के आंकड़े सामने आए हैं। मैं चाहूंगा कि इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।
दूसरी बात, जो गांव के किसान हैं, जो गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, उनमें खेतिहर मजदूर की स्थिति बहुत खराब है। आपने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत उनको रोजगार देंगे। आज भी उनको जो भुगतान देने की व्यवस्था आपने की है कि वे खाता खोलकर बैंको से पैसा ले सकते हैं। उनको बैंकों में जाना पड़ता है, जहां तमाम ऐसे बिचौलिए या दलाल किस्म के लोग हैं, जो उनका शोषण करते हैं और उनको सही भुगतान नहीं मिल पाता है। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि हर मजदूर को सौ दिन का रोजगार मिल सके।
इस बजट से किसानों को काफी आस और उम्मीद थी। किसान जो थोड़ा-बहुत ऋण लिए हुए हैं, पिछली बार आपने थोड़ा-बहुत उनके लिए दिया है, उससे सीमांत और लघु कृषकों का ऋण माफ हुआ। इस बार भी वह चाहते थे कि ऋण माफ हो, जिससे उसका सीधा लाभ उनको मिल सके। ये ऐसे लोग हैं जो बहुत गरीब हैं, जो बीपीएल की श्रेणी में आते हैं, ऐसे लोगों को जरूरत थी कि कम से कम उनके ऋण माफ होते तो उनकी आर्थिक स्थिति ठीक होती। आज अगर 6 लाख गांवों में देखा जाए, तो केवल तीस हजार बैंकों की शाखायें हम खोल सके हैं। औसतन बीस गांवों पर एक बैंक है, बीस किलोमीटर के दायरे में केवल एक बैंक है। आज नरेगा, मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति यह है कि उनमें ज्यादातर अनपढ़ हैं। उन्हें ज्ञान नहीं है कि बैंक में जाकर कैसे हम अपना भुगतान या मजदूरी निकाल सकते हैं। उनके सामने बहुत बड़ा संकट है। ऐसी कोई व्यवस्था हमें करनी चाहिए। जिससे उनको लाभ मिल सके। मैं ज्यादा कुछ न कहकर इतना ही कहना चाहूंगा कि जिन बिंदुओं की ओर हमने ध्यान आकर्षित किया है, उन्हें माननीय मंत्री जी आप गंभीरता से लें। हम चाहेंगे कि जो हमारे देश के बीपीएल लोग हैं, उनको ज्यादा से ज्यादा सुविधा मिल सके।
CUT MOTIONS श्री यशवंत सिन्हा (हज़ारीबाग): उपाध्यक्ष महोदय, बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे विदेश मंत्रालय की मांगों पर बोलने का अवसर दिया। ...( व्यवधान) असल में गलत स्पीच हाथ में रह गया, तो मैंने सोचा कि शायद विदेश मंत्रालय होगा। ...( व्यवधान) ऐसा होता है न। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शांत रहें।
…( व्यवधान)
श्री यशवंत सिन्हा :उपाध्यक्ष महोदय, कभी-कभी ऐसी गलती हो जाती है, मैं माफी मांगता हूं। ...( व्यवधान) असल में बहुत देर से हमारे वरिष्ठ साथी जसवंत सिंह जी मुझसे कह रहे थे कि विदेश मंत्रालय पर बोलो, तो वही बात दिमाग में अटकी हुयी थी।
उपाध्यक्ष महोदय, अब मैं ग्रामीण विकास पर आता हूं। दोनों विषयों पर हमारी तैयारी थी, इसलिए कोई बात नहीं है। अध्यक्ष महोदया ने कहा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की जो एनुअल रिपोर्ट है, वह आज ही सर्कुलेट हुयी है। मुझे जानकारी नहीं थी, इसलिए मैं उसे नहीं ले पाया। मैंने पिछले साल की एनुअल रिपोर्ट गौर से देखी थी, मुझे लगता है कि तकरीबन वही इस साल की भी रिपोर्ट होगी, क्योंकि रिपोर्ट में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता है। उसमें जो बातें लिखी हुयी हैं, वही इस बार भी लिखी होंगी। मुझे लगता है कि शायद भारत सरकार का सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय अगर कोई है, तो वह ग्रामीण विकास मंत्रालय है। यह सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीधे इनकी नीतियों से, कार्यक्रमों से और इनके कार्यकलापों से देश की 65 प्रतिशत जनता की तकदीर जुड़ी हुयी है। शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री महोदय ने एक बहुत ही कर्मठ मंत्री को हाल ही में इसका जिम्मा सौंपा। मंत्री महोदय महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, इसलिए इनको बहुत गहन जानकारी होगी कि ग्रामीण विकास में क्या हो रहा है? इसमें बहुत सी बातें लिखी हैं, इसमें लिखा है कि इस मंत्रालय के डिक्लेयर्ड आब्जेक्टिव्स क्या हैं?
उसमें सबसे पहला था Bridging the rural-urban divide. दूसरा, Guaranteeing the wage employment and ensuring food security. तीसरा, Promotion of self-employment, चौथा, Ensuring people’s participation through self-help groups and PRI. उसके बाद Creating rural infrastructure providing for dignified living, that is, shelter, water, sanitation, Restoring loss of depleted productivity of the land. इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मंत्रालय कई योजनाएं चलाता है जिनमें महात्मा गांधी रूरल इम्प्लॉयमैंट, इंदिरा आवास, नेशनल सोशल एसोसिएशन प्रोग्राम, इंटिग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमैंट प्रोग्राम, नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर मिशन, नेशनल रूरल लाइवलिहुड। जैसे हमारे साथी शैलेन्द्र जी कह रहे थे कि इसके अलावा भारत निर्माण जिसमें 6-7 योजनाएं शामिल हैं, वे सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गांवों के लोगों की जिंदगी पर असर डालती हैं।
मैं देख रहा था कि इस साल का जो बजट है, उसमें मेरी सूचना के अनुसार मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से 1,19,610 करोड़ रुपये की मांग की थी और उन्हें 74,100 करोड़ रुपये मिले। This is the allocation, as against Rs.1,19,610 crore. They have received Rs.74,100 crore.
74,100 करोड़ रुपये में महात्मा गांधी नेशनल रूरल इम्प्लॉयमैंट गारंटी स्कीम में उनकी मांग 65,000 करोड़ रुपये की थी। They have been given Rs.40,000 crore, which is Rs.100 crore less than this year’s Budget.
जब मंत्री महोदय जवाब देने के लिए खड़े होंगे ते मैं उनसे जानना चाहूंगा, क्योंकि अब मनरेगा के वर्कर्स के वेजेस को cost of living index के साथ लिंक कर दिया गया है। मैंने कहीं देखा है कि यह भार राज्य सरकारों के ऊपर डाला गया है। अगर ऐसा है तो आप इस सदन में कन्फर्म करें और अगर ऐसा नहीं है तो मैं आपके सामने जो बिन्दु रखना चाहता हूं, वह यह है कि 40,000 करोड़ रुपये, महंगाई और इनफ्लेशन को भूल जाइए, यह कॉस्ट ऑफ लिविंग इन्डैक्स के साथ जोड़ा जाएगा तो 40,000 करोड़ रुपया जो वित्त मंत्री महोदय ने आपको दिया है, वह कितना एडिक्वेट या नाकाफी है। इस साल का रिवाइज़्ड एस्टीमेट 76,378 है। अगले साल का बजट that is, Rs.2000 crore less compared to the Revised Estimates. खर्चे का हिसाब देखें। मैंने भारत सरकार के कंट्रोलर ऑफ एकाउंट्स के आंकड़े देखे। शायद वित्त मंत्री जी ने यही आंकड़े देखकर ही उनके बजट में कटौती की है, क्योंकि इस साल up to January, the amount which has been spent is only 40 per cent of the Budget. फरवरी और मार्च, आपके पास दो महीने हैं। फरवरी बीत गया, मार्च आधा बीत रहा है और अगर इसमें राज्यों या मंत्रालय ने 40 प्रतिशत ही खर्च किए हैं, इसका मतलब बाकी के दो महीने में आपको 60 प्रतिशत खर्च करना है। जिसे मार्च लूट कहते हैं, उसकी खुली छूट 60 प्रतिशत में मिल जाएगी। क्यों नहीं मंत्रालय ने आज तक यह व्यवस्था की कि हम नियमित रूप से राज्य सरकारों के साथ मिलकर रिव्यू करेंगे ताकि जो एक्सपैंडीचर है, जैसे वित्त मंत्रालय का आदेश भी है, वह इतना इक्विली डिस्ट्रीब्यूटेड हो कि ईयर एंड में उसका एक समूह नहीं बन जाए।
इसका मैं मंत्री महोदय से उत्तर चाहूंगा, जब वे जवाब देने के लिए खड़े हों।
उपाध्यक्ष महोदय, शैलेन्द्र जी बीपीएल फैमिलीज के बारे में बोल रहे थे। हम सब लोगों का अनुभव है कि जब हम क्षेत्र में जाते हैं, गांव में जाते हैं, तो सबसे ज्यादा अगर किसी चीज की मांग होती है, तो वह यह होती है, लोग हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि हमें बीपीएल सूची में शामिल कीजिए। इसके अनेक दृष्टांत हैं। मैं सदन का टाइम उसमें जाया नहीं करना चाहता। लेकिन हर संसद सदस्य विशेषकर, जो लोक सभा का सदस्य है, उसे अपने क्षेत्र में एक मांग का सामना करना पड़ता है कि हमें बीपीएल सूची में शामिल करवाओ। हम इसमें असहाय हैं, क्योंकि हमें किसी न किसी से निवेदन करना पड़ेगा कि इन्हें बीपीएल सूची में शामिल करो। हम जानते हैं कि वे डिजर्व करते हैं। लेकिन उसमें एक वेटिंग लिस्ट बनी हुई है और जिला प्रशासन कहता है कि वे वेटिंग लिस्ट के मुताबिक करेंगे। अब तीन साल तक वेटिंग लिस्ट बनी हुई है, तो कहीं चार साल तक वेटिंग लिस्ट बनी हुई है। इस बीच गरीब मर जाये, तो कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन वह बीपीएल सूची में शामिल नहीं होगा। सरकार की जितनी योजनाएं चल रही हैं, वे सिर्फ इस बात पर निर्भर करती हैं कि कोई व्यक्ति बीपीएल सूची में या नहीं। अगर वह बीपीएल सूची में नहीं है, तो उसे वे रियायतें नहीं मिलेंगी, उन स्कीम्स का लाभ नहीं मिलेगा। अगर वह बीपीएल सूची में है तब उसे उनका लाभ मिलेगा, इसलिए बीपीएल लिस्ट में शामिल होने के लिए होड़ मची हुई है। उपाध्यक्ष महोदय, अब भारत सरकार क्या कर रही है? भारत सरकार लगातार कमेटी पर कमेटी बनायी जा रही है। उधर वह गरीब नंगा-भूखा कह रहा है कि मुझे पहचानो, मै गरीब हूं। हम कहते हैं कि रुको, अभी प्रोफेसर तेंदुलकर साहब से पूछ कर आते हैं कि तुम गरीब हो या नहीं। रुको, हम श्री एन.
सी. सक्सेना से पूछकर आते हैं कि तुम गरीब हो या नहीं। रुको, हम डॉक्टर हाशिम से पूछकर आते हैं। रुको, हम श्री सेनगुप्ता साहब से पूछकर आते हैं, अब तो वे बेचारे गुजर गये हैं।...( व्यवधान)
हम श्री मोंटेक सिंह आहलूवालिया से पूछते हैं कि वे गरीब हैं या नहीं। कमेटी ऑफ्टर कमेटी ऑफ्टर कमेटी और गरीब की पहचान इस मुल्क में नहीं हो रही है। भारत जैसे मुल्क में अगर हम गरीब की पहचान नहीं करते हैं, तो हम सब लोग जो यहां बैठे हैं, उनके लिए शर्म की बात है। ...( व्यवधान) गरीब को पहचानने में कितना टाइम लगता है और हम कमेटी पर कमेटी बनाये जा रहे हैं। आज क्या स्थिति है? उधर ग्रामीण विकास मंत्रालय, इधर प्लानिंग कमीशन, शहरी विकास मंत्रालय आदि सब कमेटी बनाने में लगे हुए हैं। सब लोग कमेटी बनाकर इंतजार कर रहे हैं कि जब कमेटी की रिपोर्ट आयेगी, तब हम गरीब की पहचान करेंगे।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि प्रोफेसर तेंदुलकर कमेटी ने, जो वर्ष 2005 में बनी थी, उसने तय किया, माफ कीजिएगा कि कैसे इस मुल्क में गरीब का मजाक उड़ाया जाता है। तेंदुलकर कमेटी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति प्रति माह आय 356 रुपये 30 पैसे है, तो वह गरीबी रेखा के नीचे है। इसी तरह अर्बन एरियाज में प्रति व्यक्ति प्रति माह आय 538 रुपये 60 पैसे है, तो वह गरीबी रेखा के नीचे है। यह 30 पैसे और 60 पैसे कैसे हैं? आप क्या मजाक कर रहे हैं? अब उसकी आय 356.30 के बदले 356.40 है, तो वह गरीब नहीं है, क्योंकि 356 रुपये 40 पैसे उसकी आमदनी है।
मैं सरकार से निवेदन करूंगा, मंत्री जी यहां बैठे हैं, कि आप एक्सपर्ट कमेटीज के चुंगल से निकलिए और गरीबों की पहचान बनाइये। गरीब की एक ही पहचान है कि वह अमीर नहीं है। आप अमीर की पहचान कर दीजिए, बाकी सब गरीब हैं। ...( व्यवधान) अमीर की पहचान कर लो कि जिसके पास मकान है, गाड़ी है, जो इनकम टैक्स देता है या कुछ भी हो, तो उसे देखते ही उसकी पहचान बन जायेगी। बाकी सब इस मुल्क में गरीब हैं। लेकिन हम 356 रुपये 30 पैसे के चक्कर में ही पड़े हैं।
आज महंगाई के जमाने में 356 रुपये 30 पैसे की क्या औकात रह गयी है? क्या कोई बताएगा? सेनगुप्ता कमेटी जब बनी थी, उन्होंने कहा था कि इस देश के 77 प्रतिशत लोग प्रतिदिन 20 रुपये से कम कमाते हैं। किसकी बात कर रहे हैं आप? अगर गरीब की पहचान नहीं होगी, तो गरीबी रेखा के नीचे कौन लोग रहेंगे, उनको क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी, यह पॉलिसी वहीं पर समाप्त हो जाएगी। माफ कीजिए, राज्य सरकारें भी जो पॉलिसी बनाती हैं, वे भी कहती हैं कि गरीबी रेखा के नीचे होंगे, तभी करेंगे। शैलेन्द्र जी ठीक ही कह रहे थे कि इनकी पहचान करने में भी भयानक गड़बड़ी है। कौन गरीब है - जिसके पास दोतल्ला मकान है वह गरीब है और जिसके पास टूटी झोपड़ी भी नहीं है, आज वह गरीब नहीं है। आज के दिन बीपीएल को लेकर यह स्थिति बनी हुई है। इसलिए मैं आपको एक सुझाव दूंगा। जिस तरह चुनावों में आप बाहर की फोर्स भेजते हैं, झारखण्ड में पंजाब की फोर्स जाती है, मध्य प्रदेश की फोर्स जाएगी। ऐसा इसलिए तय करते हैं जिससे चुनाव ठीक ढंग से हो। अगर गरीबों की पहचान करनी है, तो आप बाहर से लोगों को भेजिए जिनका वहां कोई वेस्टेड इंट्रेस्ट न हो। आंध्र प्रदेश के लोगों भेजिए, जो जाकर बिहार में रहें, बिहार के लोगों को भेजिए आंध्र प्रदेश में जाकर रहें। वहां वे तीन महीने रहकर वे गरीबों की पहचान कर देंगे, सही पहचान करेंगे, कोई गड़बड़ी शायद नहीं होगी। फिर उसकी रिव्यू करके इसमें आगे काम किया जाए, तत्काल किया जाए क्योंकि आज गरीब बिल्कुल मार्जिन्स ऑफ सोसाइटी पर है।
अब उसके लिए बहुत ढिंढोरा पीटा जाता है, महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया है - राष्ट्रीय रोजगार गारन्टी योजना। मैं अपनी बात नहीं कहूंगा क्योंकि रघुवंश जी बैठे हैं, वह बहुत नाराज होते हैं।...( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):क्या स्थिति है, वह भी बोलिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइए, आपको सब बता देंगे। पूरी बात बता देंगे।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठिए, कोई भी बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।
...( व्यवधान)* श्री यशवंत सिन्हा (हज़ारीबाग):अभी हाल में एक रिपोर्ट छपी थी, ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से ही यह रिपोर्ट आई थी:
“Only less than five per cent, 4.6 per cent of the works have been completed in a year, and less than 50 per cent of the works have been completed since the inception of this Scheme.” वर्ष 2006 से शुरू हुआ, 50 प्रतिशत से ज्यादा स्कीम्स कंप्लीट नहीं हुई हैं और इस साल आपका आंकड़ा 3.6 प्रतिशत है। मैंने एक बार कहा था कि this scheme is a bottomless pit. पैसा कहां जा रहा है, कुछ पता नहीं है। इसके अलावा पार्लियामेंट की कमेटीज की जो रिपोर्ट्स हैं, इसमें स्टैंडिंग कमेटी ऑफ फाइनेंस की रिपोर्ट है, पीएसी की रिपोर्ट है, सभी रिपोर्ट्स का एक ही निष्कर्ष है। मैं मंत्री महोदय से आपके माध्यम से निवेदन करूंगा कि इन रिपोर्ट्स कों मंगाकर उनका अध्ययन कीजिए। एक ही बात उन्होंने कही है कि कितने लोगों को 100 दिन का रोजगार मिला, इसका कोई रिकॉर्ड ही नहीं है कई राज्यों में कि 100 दिन का रोजगार मिला या नहीं? इसी तरह जो मैंडेटेड वेज 100 रुपये है, उनकी फाइंडिंग में यह औसतन 88.13 रुपये है। यही एमाउण्ट पे की गयी है। इसमें सीएंडएजी की रिपोर्ट है, इसमें कमेटीज ने जो अध्ययन किए हैं, उनकी रिपोर्ट्स हैं। सीएंडएजी ने कितना चेक किया। Wage-material ratio has not been observed. सीएंडएजी की एक रिपोर्ट में लिखा है:
“A disquieting feature of the programme is the fact that the quality of assets created under NREGA is by and large very substandard, non durable and non productive.” क्या यही उद्देश्य है कि सब स्टेंडर्ड, नॉन डय़ूरेबल, नॉन प्रोडक्टिव एसेट्स हम क्रिएट करें और ढिंढोरा पीटें। मैं आपसे कहता हूं कि यह बंद कर दीजिए कि हम एसेट क्रिएशन करेंगे। हम कोई परिसम्पत्ति नहीं बनाएंगे। हम यह पैसा जो बेरोजगार है, उसे दे देंगे, भले ही उससे कोई काम न लें। लेकिन झूठमूठ का जो यह बनाया गया है, हमारे यहां पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के साथी बैठे हुए हैं वे जानते हैं कि वास्तविकता क्या है। मनरेगा में यह है कि कच्चा रोड बनाएंगे, मिट्टी-मोरम की सड़क बनाएंगे। ये लोग जानते हैं। उसमें यह होता है कि दो टोकरी मिट्टी डाली, आधी टोकरी मोरम यानि ग्रैवल डाली और समझो रोड बन गया। पांच किलोमीटर बना दी और पैसा उठा लिया। अगर आप अर्थ का काम्पैक्टिंग नहीं करेंगे तो वह सड़क एक मानसून भी नहीं टिकेगी। एक बारिश में ही वह सड़क नहीं टिकती है और गायब हो जाती है यानि एक साल सड़क बनती है, दूसरे साल उस सड़क का नामो-निशान नहीं रहता। मैं आपसे इसलिए कह रहा हूं कि the schemes under this programme are flawed. They deserve your attention so that this does not happen. मैं अपने जिले की बात बताता हूं, जहां के डिप्टी कमिश्नर ने हमें आंकड़े दिए। Let me tell you that in my Zila Hazaribagh, there are 1,76,728 households, which have got job cards. Out of that, up to December, 2010, 52,894 households asked for employment and the same number, according to this Report, were provided the employment. उसमें अपटू दिसम्बर, उसमें आप जानते हैं मंत्री महोदय कि कितने लोगों को 100 दिन का रोजगार मिला है, Mr. Deputy-Speaker, Sir, only 794 households out of 52,894 households or almost 53,000 got 100 days employment. It is not even 1,000 households, which got the 100 days employment. हम कहते हैं कि हमने बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर दिया, अब कहीं कोई बेरोजगारी नहीं है।
About MNREGA, I would request you to please carry out an in-depth review of the schemes permitted under this. अगर आपने यह रिव्यू राज्यों के साथ नहीं बैठकर किया तो इस योजना का यही हाल रहेगा। आने वाले दिनों में भी…there are various estimates…जिन्होंने कहा है कि कम से कम 50 प्रतिशत, यह जो 40,000 करोड़ रुपए आप खर्च करेंगे, उसका 50 प्रतिशत लोगों की जेब में जाता है, जमीन पर नहीं उतरता है। आप कहते हैं कि ठेकेदार मत रखो, ठेकेदार काम कराते हैं। आप कहते हैं कि मशीन मत रखो। मशीन से रात के अंधेरे में काम कराया जाता है। अगर आप इसकी रिपोर्ट करें, तो कोई कार्रवाई नहीं होती है, क्योंकि वे पावरफुल लोग हैं, जो पैसे बना रहे हैं..they are so powerful that if you try and touch them, they can even get you murdered like they did recently in Latehar District of Jharkhand when a social activist was murdered. पिटाई हो जाती है, कुछ भी होता है। कहीं आप जाएं औचक निरीक्षण पर, तो आप पाएंगे कि कहीं पर कोई क्रेश नहीं है, कोई इंतजाम नहीं है, कहीं कोई बोर्ड नहीं लगा हुआ है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: कृपया आप बैठ जाएं और बीच में न बोलें।
SHRI H.D. DEVEGOWDA (HASSAN): Everywhere it is happening like this.
श्री लालू प्रसाद (सारण): सारा काम जेसीबी के माध्यम से होता है।
श्री यशवंत सिन्हा :रात के अंधेरे में जेसीबी से काम होता है। आप प्रशासन के लोगों को फोन करें तो वे सोए हुए मिलेंगे, क्योंकि नौ बज गए हैं, दस बज गए हैं, ग्यारह बज गए हैं, उन लोगों को बहुत काम है, जल्दी सोना है, नहीं तो जल्दी उठेंगे कैसे। उसके बाद आप देखें जो नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम है, इंदिरा गांधी ओलड एज पेंशन स्कीम, इंदिरा गांधी नेशनल विडो पेंशन स्कीम, इंदिरा गांधी नेशनल डिसेबिलिटी पेंशन स्कीम। तीनों योजनाओं का नाम इंदिरा जी के नाम पर रखा है। नेशनल विडो पेंशन स्कीम में एज ग्रुप 40 से 64 साल है। हम लोग गांव में जाते हैं तो विधवा महिलाएं आकर कहती हैं कि क्या भगवान 40 साल देखकर हमें विधवा करेगा, कोई 35 साल में विधवा हो गई, तो क्या उसे पेंशन अलाऊ नहीं है, कोई 20 साल में विधवा हो जाए, तो क्या उसे पेंशन अलाऊ नहीं है। मतलब यह है कि क्या अंधेर है, 35 साल में पेंशन नहीं मिलेगा, आपको 40 साल में विधवा होना पड़ेगा, क्यों भगवान का नियम नहीं है, भारत सरकार का नियम है।
मैं चुनौती देता हूं कि 40 वर्ष का, यह भारत सरकार का नियम है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शांत रहिये।
श्री यशवंत सिन्हा :अरे, आप लोगों को क्या मतलब...( व्यवधान) कहां से आई हैं, कहां जाएंगी।...( व्यवधान)
श्रीमती अन्नू टण्डन (उन्नाव):मैं एक विधवा हूं और मैं समझती हूं इस प्रॉब्लम को और मैं कहां से आई हूं और कहां जाऊंगी, मैं आपको बता सकती हूं। ...( व्यवधान)
श्री यशवंत सिन्हा :बताइये, बताइये।...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद: इन्हें तो जरूरत ही नहीं है। ...( व्यवधान) ये तो एनटाइटल्ड ही नहीं हैं।...( व्यवधान)
श्री यशवंत सिन्हा :वही तो हो रहा है, जो एनटाइटल्ड नहीं हैं उसे मिल जाता है। इंदिरा आवास किसे मिलता है। दुकान चलाने के लिए इंदिरा आवास बनता है, रहने के लिए नहीं। ...( व्यवधान)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS, MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PERSONNEL, PUBLIC GRIEVANCES AND PENSIONS AND MINISTER OF STATE IN THE PRIME MINISTER’S OFFICE (SHRI V. NARAYANASAMY): Yashwant Sinha Ji, who is implementing it?… (Interruptions)
SHRI YASHWANT SINHA : I will come to that.… (Interruptions)
SHRI HARIN PATHAK (AHMEDABAD EAST): What is the role of the Minister and the Central Government?
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शांत रहिये।
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): यह तो नियमों में संशोधन की बात कर रहे हैं।...( व्यवधान) जनहित की बात कर रहे हैं।...( व्यवधान)
श्री यशवंत सिन्हा :मैं जनहित की बात कर रहा हूं, मैंने किसी पर आरोप नहीं लगाया है। काहे के लिए आप दुखी हो रहे हो। मैंने कहा कि भगवान 40 साल उम्र देखकर विधवा किसी को नहीं बनाता है, क्या गलत कहा है, कभी भी कोई विधवा हो सकती है। वह 35 की है तो उसे पेंशन नहीं मिलेगी, 40 की है तो मिलेगी, मैं यह कह रहा हूं। भारत निर्माण वर्ष 2005-2006 के बजट में उस समय के वित्त मंत्री ने कहा कि “Bharat Nirman has been conceived as a business plan to be implemented over a period of four years for building infrastructure, especially in rural India. It will have six components, namely irrigation, roads, water supply, housing, rural electrification, rural telecom connectivity. In each of these areas, we must dare to be bold and set for ourselves high targets to be achieved by 2009. ” जब भारत निर्माण शुरु हुआ तो माननीय प्रधान मंत्री जी ने क्या कहा, I am quoting:
“Bharat Nirman will be a time-bound business plan for action in rural infrastructure for the next four years. Under Bharat Nirman, action is proposed in these areas…. We have set a specific target to be achieved under each of these goals so that there is accountability in the progress of this initiative.” फिर उन्होंने कहा -
“Every village will be provided electricity. Remaining 1, 25,000 villages will be covered by 2009 to connect 2.3 crore households. Every habitation of over 1,000 population and above, 500 population in hilly and tribal areas, is to be provided an all-weather road to be finished by 2009. Every habitation is to have safe drinking water to be completed by 2009. Every village is to be connected by telephone to be completed by 2009. Ten million hectares of additional irrigation capacity is to be created by 2009. 60 lakh houses are to be constructed for the rural poor by 2009. ” It was a business plan. I do not know what a business plan means. मुझे लगता है कि जब बिजनैस प्लान शब्द का उपयोग किया गया तो उसका मतलब यह था कि इसमें जितने पैसे की आवश्यकता होगी, जितने एलोकेशन की आवश्यकता होगी, हम देंगे, लेकिन यह टार्गेट पूरा करेंगे। अब मैं यहां सारे सदस्य लोक सभा के बैठे हैं, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आपके इलाके में क्या सब गांव सड़क से जुड़ गये, सब गांवों में बिजली आ गयी, सबको इंदिरा आवास मिल गया, सब गांवों में पीने का पानी आ गया और सब खेतों में पानी पहुंच गया। उपाध्यक्ष महोदय, आप और हम जिस राज्य से आते हैं, आपको भी पता है हमें भी पता है झारखंड से, वहां पर 26 प्रतिशत गांव इलैक्ट्रिफाइड हुए हैं और 10 प्रतिशत लैंड इर्रिगेटेड है। लोग हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि हमारे गांव में बिजली ले आओ और हम कितने असहाय हैं कि कुछ नहीं कर पाते हैं। अगर किसी को बुलाते हैं, तो कहा जाता है कि फारेस्ट विभाग वहां जाने नहीं देगा, क्योंकि जंगल से रास्ता जा रहा है और कहा जा रहा है कि हम 500 लोगों से ज्यादा की आबादी पर ट्राइबल एरिया में सड़क बना देंगे। श्री जयराम रमेश यहां नहीं हैं, फारेस्ट विभाग से बिजली का तार खींचने की इजाजत नहीं मिलती है। मेरे जिले में एक गांव है, जहां सिर्फ अनुसूचित जनजाति के लोग ही रहते हैं। वहां मैंने देखा कि कुछ नहीं है। मैंने कहा कि अगर इस गांव में बिजली नहीं आएगी, तो मैं यही रहना शुरू कर दूंगा। जब मैंने यह चेतावनी दी, जाहिर है कि जंगल में गांव है और नक्सल प्रभावित है, लोगों को चिंता हुई, तो उन्होंने बिजली लाने के लिए मशक्त करनी शुरू कर दी। ऐसे अनेक हज़ारों गांव देश में हैं, जहां बिजली नहीं पहुंची है। झारखंड जैसे राज्य में मात्र 26 प्रतिशत गांवों में बिजली पहुंची है। राजीव गांधी जी के नाम से योजना चला दी, वह योजना क्या है? वह योजना है कि एक गांव में आप बिजली ले जाएंगे और बीपीएल को बिजली देंगे। बीपीएल सर्वे हो गया। बीपीएल को बिजली देंगे और कन्डीशन है कि वह झोपड़ी में एक ही बल्ब जलाएगा और वह भी 40 वॉट का।
श्री शरद यादव (मधेपुरा):महोदय, ऐसा कार्यक्रम जो राजीव गांधी जी के नाम से चलाया है, यह कभी भी पूरी तरह से पूरा होने वाला नहीं है। आप गांव में बिजली ले जाना चाहते हैं और केवल बीपीएल के लिए योजना है, यह योजना बनाने वाला अधिकारी कौन है? ऐसे कौन से आफिसर हैं, जो ऐसी योजना बना रहे हैं?
श्री यशवंत सिन्हा :उपाध्यक्ष महोदय, 40 वॉट का एक बल्ब लगाने की इजाजत है।
ग्रामीण विकास मंत्री तथा पंचायती राज मंत्री (श्री विलासराव देशमुख): बिजली के बारे में माननीय सदस्य बात कह रहे हैं, लेकिन जो डिमान्ड्स आज यहां रखी हैं, उनमें बिजली का विषय नहीं है।...( व्यवधान) जो चर्चा हो रही है, उसमें ग्रामीण विद्युतीकरण विषय नहीं है।...( व्यवधान)
श्री शरद यादव : मंत्री जी हम आपके लिए नहीं बोल रहे हैं, हम बिजली मंत्री के लिए बोल रहे हैं।...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद: महोदय, ग्रामीण विकास गांव की गरीबी मिटाने की चर्चा हो रही है। पानी नहीं है, बिजली नहीं होगी, तो पानी का संकट कैसे दूर होगा। बिजली इससे संबंधित क्यों नहीं है? बिजली आएगी, तभी तो पानी मिलेगा, सड़कें बनेंगी। मंत्री जी कह रहे हैं कि ये बिजली आज के विषय से संबंधित नहीं है। बिजली की चर्चा इससे संबंधित है, भारत निर्माण से संबंधित है।
श्री यशवंत सिन्हा :महोदय, दिल्ली के विभिन्न भवनों के एसी कमरों में बैठ कर लोग गांव की योजना बनाएंगे, जो कभी गांव जाते ही नहीं हैं, तो देश का यही हाल होगा। उपाध्यक्ष महोदय, आपको भी अनुभव होगा। हमारे यहां बिजली लग गई और कहा गया कि गांव में बिजली पहुंच गई और दो लोगों ने हुक लगा दिए। ...( व्यवधान) गरीब ने एक या दो बल्ब जला लिए तो क्या हुआ कि 10 केवी, 15 केवी का ट्रंसफार्मर उड़ गया। एक दफा मेरे जिले में 177 ट्रंसफार्मर उड़े थे और गांव कागज में इलैक्ट्रीफाई हो गया, तुंत इलैक्ट्रीफाई हो गया। मंत्री महोदय, मैं जानता हूं, मेरा भी अनुभव है।...( व्यवधान)
SHRI K. BAPIRAJU (NARSAPURAM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I have the highest regard for Shri Yashwant Sinha, the former Finance Minister. In 1998, in your Budget and the President’s Address it was mentioned that पांच साल में पूरे गांवों को पानी सप्लाई करना प्रेजीडेंट एड्रेस में था। He was the Finance Minister at that time. Since the idea is good, there is nothing wrong with it. I just want to make it clear.
श्री यशवंत सिन्हा :उपाध्यक्ष महोदय, वास्तव में इन्होंने मेरी सहायता की है। ...( व्यवधान) मेरा दूसरा बिंदु यही था। मैं सिफारिश कर रहा था कि ग्रामीण विद्युतीकरण का जिम्मा माननीय देशमुख जी के मंत्रालय को दिया जाए लेकिन ये बीच में हमें ही टोकने लगे। मैं तो आप की ही सिफारिश कर रहा था। दूसरी बात है कि स्वतंत्र भारत का इतिहास 1947 में शुरू नहीं हुआ, स्वतंत्र भारत का इतिहास 1998 में शुरू हुआ। 1998 से 2004 तक जब हम शासन में थे और यही इनका रेफरेंस प्वाइंट है। हर चीज में 1998 और 2002 है। मैं सुन रहा था, यहां वित्त मंत्री जी और पूर्ववर्ती वित्त मंत्री जो आज गृह मंत्री हैं, ने भी कहा कि आपके टाइम में ग्रोथ रेट 5.8 परसेंट था, हमारे टाइम में यह 8.9 कुछ परसेंट था। आज ग्रोथ रेट 5.8 परसेंट पाप का विषय बन गया है, हम बड़े भारी पापी हैं क्योंकि हमारे टाइम में 5.8 परसेंट ग्रोथ रेट हुआ। I have here the figures. Who was in power during these Plans? In the First Five Year Plan during 1951-56, the growth rate was 3.7 per cent. In the Second Five Year Plan from 1956 to 1961, it was 4.2 per cent. During the Third Five Year Plan from 1961 to 1966, the growth rate was 2.8 per cent. Then during the three Annual Plans from 1966 to 1969, the growth rate was 3.9 per cent. During the Fourth Five Year Plan during 1969-74, it was 3.4 per cent....( व्यवधान) ये भूल गए, यह भारत का इतिहास नहीं है। भारत का इतिहास 1947 में शुरू हुआ, आप शासन में रहे हैं और आपने उन दिनों का भुला दिया। जो समाजवाद के झंडाबरदार हुआ करते थे, वे आज मार्किट इकानमी के हाई प्रीस्ट बनकर घूम रहे हैं, मुखौटा बनकर घूम रहे हैं और आप हमें समझा रहे हैं कि आपका ग्रोथ रेट इतना है, हमारा इतना है। आप ये नहीं बोलेंगे कि हमारे टाइम में इन्फलेशन कितना रहा और आपके टाइम में कितना है? मंत्री महोदय, आपमें हिम्मत है तो आज अपने जवाब में बताइए कि पिछले तीन साल में महंगाई के चलते कितने गरीब गरीबी रेखा से नीचे चले गए। आप बताइए, आप नहीं बताएंगे।
मैं आपसे अंत में कहना चाहता हूं where is the problem? आप गंभीरता से सोचें। यहां पूर्व मुख्य मंत्री बैठे हैं, पूर्व प्रधानमंत्री बैठे हैं, अनेक संसद सदस्य बैठे हैं जो मंत्री रहे हैं। मैं बहुत दुख के साथ कह रहा हूं कि We have all failed the people of India? हम अपने अंदर झांके, यह नहीं होना चाहिए कि तुमने क्या किया, हमने क्या किया। मैं स्वीकार करता हूं कि We have all failed the people of India.
16.00 hrs. क्योंकि इस धरती पर भारत में एक भी ऐसा गांव है जहां आज पीने का पानी नहीं है तो आपके लिये और मेरे लिये शर्म का विषय है। आज दिक्कत क्या है, मैं आपको बता रहा हूं? What is the institutional problem? The institutional problems are two. One is that the Government of India runs hundreds of schemes. पता नहीं 200 हैं, भारत सरकार में किसी से पूछिये कि कितनी योजनायें सैंट्रली स्पौंसर्ड चलती है, किसी को पता नहीं है, जिला लैवल पर पूछिये कि कितना योजनायें चलती हैं तो किसी को पता नहीं है। लेकिन चल रही है। भेड़ा पालन के लिये भारत सरकार की योजना है। उसके लिये फार्म बना हुआ है, वहां भेड़ा नहीं हैं, आदमी हैं लेकिन भेड़ा फार्म है।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं अंत में निवेदन कर रहा हूं कि इसका क्या मतलब है? मेरा एक सुझाव है कि अगर भारत सरकार में हिम्मत है तो इन सब स्कीम को अबौलिश करे and run only 10-12 schemes that are really necessary, and all these are in the State subject in the Constitution. कृषि, वाटर, लैंड, पब्लिक हैल्थ एंड सैनिटेशन , इलैक्ट्रिसिटी में इस तरह के दस मुद्दे हैं जहां पर आप उनको चला सकते हैं. उन सब की जबरदस्त मौनीटरिंग कीजिये, राज्य उनका एतराज नहीं करेंगे अगर आप 100 फीसदी पैसा देते हैं। हम लोगों ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरु की थी जिसकी आप लोग भी तारीफ करते हैं। उस योजना में हमने कहा था कि सरकार 100 फीसदी पैसा देगी लेकिन हम 100 फीसदी मौनीटरिंग भी करेंगे। आज भी 100 फीसदी मौनीटरिंग हो रही है, कहीं चोरी-चकारी होती होगी, उसके बारे में मैं नहीं जानता हूं। लेकिन आप भी आज के दिन मानते हैं कि यह सक्सैसफुल योजना थी और मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि...( व्यवधान)
कई माननीय सदस्य: अनपार्लियामेंटरी शब्द निकाल दीजिये।
उपाध्यक्ष महोदय : ठीक है, इस शब्द को प्रोसीडिंग्स में से निकाल देंगे।
श्री यशवंत सिन्हा उपाध्यक्ष महोदय, मैं कह रहा था कि इन 10-12 योजनाओं को चलाइये और सब का नाम प्रधानमंत्री योजना से होना चाहिये। यह सरकार नेताओं के नाम से जो योजनायें चलाती है, वह सब गलत है। उनका नाम बदनाम करते हैं। यह बात मै गम्भीरता से इसलिये कह रहा हूं क्योंकि आप ग्रामीण क्षेत्रों में जाइये, आप देखेंगे कि वहां स्व. राजीव गांधी का फोटो लगा हुआ है, लिखा हुआ है कि राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में गांव में बिजली आ गई है। लोग क्या सोचते होंगे?
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री यशवंत सिन्हा : उपाध्यक्ष महोदय, मैं समाप्त कर रहा हूं। मेरा दूसरा सुझाव है कि अल्टीमेटली यह गवर्नेंस का सवाल है। हमारे अंदर इच्छा शक्ति है। आप राज्यों की स्टेट लिस्ट में योजनायें चला रहे हैं और आप यह कहने से नहीं बच सकते हैं कि राज्य चला रहे हैं, उनकी जिम्मेदारी है। Then, why are you running those schemes? Just give them up and transfer the money to the States, and let the States run their own schemes.वे स्टेट लैजिस्लेचर के प्रति जिम्मेदार होंगे। जब आप भारत सरकार के पैसे को खर्च कर रहे हैं, और कहेंगे कि हम पैसे खर्च कर रहे हैं लेकिन जिम्मेदारी नहीं लेंगे। This lack of accountability is the bane of this Government . कोई अकाऊंटेब्लिटी नहीं है। अब क्या होता है? मंत्री महोदय बेचारे बैठे हैं। वह इस सैंस में बेचारे हैं कि मैं बहुत दुखी हुआ कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इनके खिलाफ स्ट्रिक्चर लगा दिया, सुप्रीम कोर्ट ने बहुत गलत काम किया, नहीं करना चाहिये था।...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद : बहुत अच्छे आदमी हैं।
श्री यशवंत सिन्हा :मैं देशमुख जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं कि बहुत अच्छे आदमी हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग बीच में टोका-टाकी मत कीजिए।
श्री शरद यादव : कोर्ट ने बहुत गलत काम किया है।
श्री यशवंत सिन्हा :मैं तो कह रहा हूं कि गलत काम किया है। I am suggesting to the hon. Minister that he should stand up for his honour in the Supreme Court.यह जो ज्यूडिशियल एक्टीविज्म हो रहा है, हर चीज को अपने कब्जे में लेकर जो चाहे कर दें, यह गलत है।
उपाध्यक्ष महोदय : आप विषय पर बोलिये। यह दूसरा विषय हो गया है, इसलिए यह रूरल डेवलपमेंट का विषय नहीं है। क्या आपकी बात समाप्त हो गयी है?
श्री यशवंत सिन्हा : महोदय, गवर्नेंस का सवाल है। बहुत सारे मूलभूत मुद्दे इसमें इन्वॉल्वड हैं। सिर्फ एक सतही जवाब देने से मंत्री महोदय काम नहीं चलेगा। My request to you with folded hands is that you should go into the fundamental issues and tackle the fundamental questions. यह जो एक इस सरकार की एक नीति बन गयी है कि महंगाई किसके जिम्मे, राज्यों के जिम्मे, सड़क निर्माण किसके जिम्मे, राज्यों के जिम्मे, हर चीज राज्यों के ऊपर डालकर मत मागने की कोशिश कीजिए। You are accountable to the people of India and that is why you are sitting here. Please show that accountability.
श्री उदय प्रताप सिंह (होशंगाबाद):महोदय, ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों की चर्चा में देश के गांव से आये हुए एक किसान सांसद को आपने कांग्रेस पार्टी की तरफ से शुरूआती वक्तव्य के लिए आदेशित किया है, इसके लिए मैं आपका बहुत आभार व्यक्त करता हूं।
महोदय, मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों के समर्थन में खड़ा हुआ हूं और हमारे आदरणीय वरिष्ठ नेता माननीय यशवंत सिन्हा जी से आग्रह करूंगा कि कृपया वे कुछ देर बैठकर नये सांसदों का, गांव से आये हुए सदस्यों की बातों को यहां बैठकर सुनेंगे भी और उन्हें प्रोत्साहित भी करेंगे। वर्ष 2011-12 में ग्रामीण विकास विभाग को वित्त मंत्रालय द्वारा 74.143 हजार करोड़ रूपये का आबंटन भारत सरकार की तरफ से प्राप्त हुआ है।
16.08 hrs (Dr. Girija Vyas in the Chair) मैं समझता हूं कि इस देश में गांव की प्रगति के लिए, इस देश के गांवों में रह रहे हमारे गरीब, बीपील धारकों के हित में काम करने के लिए यह पर्याप्त पैसा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जो अलग-अलग पैसे का आबंटन किया गया है, चाहे प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में 20 हजार करोड़ रूपये का हो, इंदिरा आवास योजना में 10 हजार करोड़ रूपये का हो, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में 40 हजार करोड़ रूपये हों, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के अंदर लगभग तीन हजार करोड़ रूपये हों, यहां तक कि बीपीएल का जो सर्वे होगा, उसके लिए भी ग्रामीण विकास मंत्रालय ने तीन सौ करोड़ रूपये की व्यवस्था की है। महिला किसानों के सशक्तिकरण के लिए पहली बार एक कार्यक्रम चालू किया गया है, उसके लिए भी 100 करोड़ की राशि इस बजट में आबंटित की गयी है और एक और महत्वपूर्ण कदम जो गांव को शहरों की तर्ज पर विकसित करने के लिए ‘पूरा’ के माध्यम से एक स्कीम आगे आने वाले समय में देश में स्वरूप लेने वाली है, उसे भी 100 करोड़ रूपये इस बजट में दिये गये हैं। माननीय मंत्री जी और भारत सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है। मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं।
महोदया, यशवंत सिन्हा जी जायें, इसके पहले मैं कुछ बातों को बताना चाहता हूं। चूंकि मैं मध्य प्रदेश राज्य से आता हूं, कई चीजें ऐसी हैं जो प्रदेश में इस बात पर रोक दी जाती हैं कि यह हमारा राज्य सरकार का मामला है, आप इसमें नहीं बोल सकते हैं। हम लोग सदन में बोलते हैं तो यहां इसलिए रोक दिया जाता है कि यह राज्य सरकार का मामला है, आप इसे सदन में नहीं बोल सकते। मैं सारे माननीय सांसदों की इस भावना को यहां रखना चाहता हूं कि आखिर सांसद करें क्या? अगर वैचारिक मत-भिन्नता की सरकार प्रदेश में है, वहां वह इसलिए नहीं बोल सकता कि वह कांग्रेस का है और सदन में इसलिए नहीं बोल सकता कि यह मामला राज्य सरकार का है।
तो इस संसदीय व्यवस्था का क्या होगा, मैं समझता हूँ कि आपसे बेहतर और कोई नहीं जानता। मध्य प्रदेश में किसान आत्महत्या करता है तो वहाँ के नेता, वहाँ के मुख्य मंत्री कहते हैं कि यह देश का मामला है, भारत सरकार की वजह से किसान आत्महत्या कर रहे हैं। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में अगर प्रदेश की सरकार बिजली नहीं दे पा रही, गाँवों का और सिंचाई का फीडर अलग-अलग नहीं बाँट पा रही, जिस मजरे-टोले में आज़ादी के पचास-साठ साल के बाद भी बिजली नहीं पहुंच पा रही, अगर वहाँ राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के माध्यम से भारत की सरकार सीधे कोई प्रयास कर रही है, तो यह भी आप कहते हैं कि गलत काम है, यह राज्य सरकार पर छोड़ देना चाहिए। मैं आपका ध्यान वर्ष 2003 के मध्य प्रदेश के चुनावों की ओर आकृष्ट कराना चाहता हूँ। चूँकि यहाँ पर झारखंड, बिहार और अन्य प्रांतों की बात भी चली है, इसलिए मैं संक्षेप में यह बात ज़रूर रखना चाहता हूँ। उस समय तत्कालीन नेत्री मध्य प्रदेश की बहुत कद्दावर नेता थीं। उमा भारती जी ने कहा था कि यदि हमारी सरकार बनेगी तो हम सौ दिन में बिजली और सड़कों की समस्या खत्म कर देंगे। मैं बहुत विनम्रतापूर्वक अनुरोध करना चाहता हूँ कि आदरणीय उमा भारती जी चली गईं, उसके बाद वहाँ से बाबू लाल गौर साहब चले गए। अब परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आदरणीय शिवराज सिंह जी की भी चला-चली की बेला है, लेकिन न सड़कों की समस्या हल हुई और न ही बिजली की समस्या हल हुई, आज सात साल के बाद भी जस की तस स्थिति है।
महोदया, मैं आदरणीय ग्रामीण विकास मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि बड़ा हिम्मत भरा कदम झारखंड में उठाया गया है। महात्मा गांधी के नाम पर, एक पुण्यात्मा के नाम पर इस देश की एक बहुत महत्वपूर्ण योजना, गरीबों के लिए महात्मा गांधी रोज़गार योजना चलाई जा रही है, वहाँ पर झारखंड में अनियमितताएँ हुईं, सीबीआई की जाँच हुई। मैं बहुत विनम्रतापूर्वक अनुरोध करना चाहता हूँ कि मध्य प्रदेश इस समय भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। मध्य प्रदेश में हमारे देश के ग्रामीण राज्य मंत्री आदरणीय प्रदीप जैन साहब कई बार दौरे पर गए, व्यक्तिगत रूप से उन्होंने कई ज़िलों में जाकर देखा कि इस योजना को वहाँ पर पलीता लगाया जा रहा है। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : उदय प्रताप जी के भाषण के अतिरिक्त कोई बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।
(Interruptions) … * सभापति महोदया : आप सुनने की क्षमता रखिये। आप बैठ जाइए।
श्री उदय प्रताप सिंह (होशंगाबाद):सभापति जी, आदरणीय निशिकांत जी कई मामलों में हमारे आदर्श हैं। ये बोलते हैं तो हम लोग बैठकर इनको सुनते हैं। इनको पहले हम नहीं जानते थे, सदन में आने के बाद इनके बोलने पर हमारे मन में इनकी पहचान बनी। हम उम्मीद करेंगे कि इनका सहयोग हमें मिलना चाहिए।
माननीय सभापति महोदय, आज गाँव से आए हुए विशुद्ध रूप से किसान के बेटे को कांग्रेस पार्टी ने जो यहाँ भाषण की शुरूआत करने का मौका दिया। शायद जब से सदन बना है, तब से पहली बार एक नए सांसद को किसी पार्टी ने इनॉगरल स्पीच के लिए मौका दिया होगा। इसके लिए हम आपके आभारी हैं। मैं अनुरोध करूँगा कि झारखंड की तरह मध्य प्रदेश में भी मनरेगा के अंदर सीबीआई जाँच कराई जाए, जिससे कम से कम आदरणीय जसवंत सिंह जी की भावनाओं को यहाँ पर बल मिल सके और वे जो चाह रहे हैं, उसको मूर्त रूप हमारी सरकार दे सके। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप शांति रखिये।
श्री उदय प्रताप सिंह : आदरणीय सभापति महदोय, यह शुरूआत हो रही है। एक-एक प्रांतों से अगर गड़बड़ियाँ मिलती जाएँगी तो यह जाँच व्यापकता लेती जाएगी और फिर हमारी सरकार के लिए यह चिन्तन का विषय होगा कि यह काम सीधे कराया जाए या राज्य सरकारों के माध्यम से कराया जाए।
आदरणीय सभापति महोदया, बहुत सी बातें थीं जो मैं बताना चाहता था। मैं लाडली लक्ष्मी योजना के बारे में बताना चाह रहा था, लेकिन चूँकि निशिकांत जी ने कहा है, तो वह भी उचित नहीं होगा क्योंकि वह भी राज्य सरकार का मामला है। विधवाओं की उम्र के बारे में बात चली थी। इसमें भी जहाँ तक मेरी जानकारी है, हो सकता है मैं गलत हूँ। जो विधवाएँ रहती हैं, उन्हें जनपद में केवल इस बात के प्रमाण-पत्र के बाद पेंशन बांधी जाती है कि वह विधवा है, उसकी उम्र नहीं पूछी जाती। मैं जनपद में अध्यक्ष रहा हूँ। हो सकता है मैं गलत हूँ, लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार विधवा की उम्र नहीं पूछी जाती, उसकी पेंशन बांधी जाती है। कमेटियों के बारे में आदरणीय यशवंत सिन्हा जी ने कहा था कि बहुत सारी कमेटीज़ बन गई हैं। मैं समझता हूँ कि ऐसी कोई भी सरकार नहीं रही होगी, ऐसा कोई भी पंचवर्षीय कार्यकाल नहीं निकला होगा जब कमेटियों के माध्यम से देश के विकास की संरचना की तैयारी न की गई हो। उन एक्सपर्ट्स में गाँव से आया हुआ अधिकारी भी होता है, उन एक्सपर्ट्स में एक नेता भी होता है, उन एक्सपर्ट्स में फाइनैन्स के एक्सपर्ट्स भी बैठते हैं और सारी तकनीकी जानकारियों के लोग बैठते हैं। जब तक ये सब लोग बैठकर कोई नीति न बनाएँ, मैं समझता हूँ कि सरकार किसी भी योजना का क्रियान्वयन देश के सामने नहीं करती।
मैं समझता हूं कि एनडीए की सरकार के समय में भी कमेटियां बनी होंगी, उनके जो निर्णय आए होंगे, उनका भी पालन हुआ होगा। आजादी के बाद से कुछ परम्पराएं रही हैं और प्रत्येक सरकार ने उन परम्पराओं का पालन किया है। यह सदन तो वैसे भी परम्पराओं का आदर्श स्थल है, जो परम्पराओं पर चलता है।
सभापति महोदया, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना इस देश की बहुत महत्वपूर्ण योजना है। यह योजना भी एनडीए की सरकार के समय में चालू हुई थी। यह एक अच्छी योजना है। हमारी सरकार जब चुनकर आयी तो हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपने शुरूआती भाषण में दो-तीन स्कीम्स को चुना था और कहा था कि हम अपने कार्यकाल में इन अच्छी योजनाओं को आगे बढ़ाएंगे। उसमें उन्होंने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को भी शामिल किया था। मैं समझता हूं कि आप लोगों को प्रधानमंत्री जी का धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए, क्योंकि हम आपकी योजना को आगे ले जा रहे हैं। भले ही उस समय में इस योजना में कम पैसा दिया जाता हो, लेकिन आज इस योजना को हजारों करोड़ रूपए सरकार ने उपलब्ध करवाएं हैं और इस बार लगभग 20 हजार करोड़ रूपए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के लिए आवंटित किए गए हैं। मैं समझता हूं कि यह राशि इस वित्तीय वर्ष के लिए पर्याप्त है। यह योजना किसानों और सर्वहारा वर्ग की उन्नति का कारण बन रही है। हम गांवों से आते हैं और हमारे देश में शहर कम हैं और गांव ज्यादा हैं और जब तक गांव सड़कों से नहीं जुड़ेंगे, मैं समझता हूं कि तब तक इस देश, किसान और गरीब आदमी का विकास नहीं हो सकता है।
महोदया, हम जब भी कोई योजना लेकर आते हैं, उसमें विसंगतियां आती हैं, पैसे के साथ विसंगति पैदा होती है, यह हर व्यक्ति जानता है। जहां पैसा होगा, वहां कहीं न कहीं टकराहट होगी, कहीं न कहीं गड़बड़ी होगी। मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के स्तर में गिरावट आयी है। उसकी वजह यह है कि हम ठेके देते हैं, टैन्डर होता है, ठेकेदार नियुक्त होता है, लेकिन उस ठेकेदार के बाद स्थानीय प्रशासन, चूंकि प्रदेश सरकार के नियंत्रण में अधिकारी काम करते हैं, आप भले ही जी.एम. बना दीजिए या कुछ बना दीजिए, लेकिन वह सी.एम. के तहत काम करते हैं। स्थानीय प्रशासन सी.एम. के निर्देशों का पालन करता है। एक कांट्रैक्टर बिड के माध्यम से चुना जाता है, उसके बाद वह किसी और को पेटी पर कांट्रैक्ट दे देता है, पेटी कांट्रैक्टर किसी और को पेटी पर कांट्रैक्ट दे देता है और अंत में यह महत्वपूर्ण योजना दम तोड़ देती है। मेरा आपसे अनुरोध है कि इसके नियमों में संशोधन किया जाए, जो व्यक्ति ठेका लेगा, वही काम करेगा, पेटी कांट्रेक्टर इसमें नियुक्त नहीं किए जाएंगे।
महोदया, प्रदेश सरकारों के साथ वैचारिक विभिन्नताओं के कारण ये महत्वपूर्ण योजनाएं दम तोड़ रही हैं। यशवंत सिंह जी की बात से मुझे बहुत बल मिला, मुझे लग रहा था कि मैं कैसे बोलूंगा? लेकिन जब मैंने उनको पूरा सुना तो मुझे बल मिला। आपने जिस अच्छे तरीके से प्रदेश और देश की सीमाएं खत्म करने की बात की है या फिर आपने कहा कि ऐसी दीवार खींच देनी चाहिए, जिससे प्रदेश देश में और देश प्रदेश में जाकर दखल न कर सके, आपकी इन बातों ने मुझे बल दिया। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से केवल यह कहना चाहता हूं कि राष्ट्रीय जांच दल जो पहले से गठित किए गए हैं। ये जांच दल सांसदों की शिकायतों पर जांच करने के लिए जाते हैं, लेकिन हमें यह जानकारी नहीं हो पाती है कि उन्होंने किस सड़क पर कब जाकर जांच कर ली, कब आकर रिपोर्ट सब्मिट कर दी, उस रिपोर्ट का क्या हुआ? जिस सड़क की शिकायत किसी जनप्रतिनिधि ने की है, जिस सड़क की शिकायत किसी अधिकारी ने की है, उसका निर्णय क्या हुआ, इसकी जानकारी हमें नहीं लग पाती है। जो भी जांच दल केन्द्र सरकार की तरफ से जाए उसकी सूचना जनप्रतिनिधि को होनी चाहिए, सांसद को होनी चाहिए और प्रैस के माध्यम से अखबारों में जरूर जाना चाहिए। अखबारों में पता लगे कि आज इस जिले के, इस भ्रष्ट ठेकेदार द्वारा बनायी गई सड़क की जांच करने दिल्ली की सरकार से कोई नुमाइंदा आया है। मंत्री जी, इसकी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।
महोदया, मैं एक और निवेदन करना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना और महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना ऐसी योजनाएं हैं, जिनके बारे में हम जनता के बीच जाकर कह पाते हैं कि यह हम करवा रहे हैं, हमारी यूपीए की सरकार करवा रही है। इनके बेहतर क्रियान्वयन के लिए यहां से थोड़ी सख्ती का बर्ताव किया जाना चाहिए। खास तौर से नरसिंह पुर, हौशंगाबाद, रायसेन, मंदसौर, देवास, उज्जैन, खंडवा और रायगढ़ जिलों में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के काम पिछले एक साल से रूके हुए हैं। ये मध्य प्रदेश के बहुत महत्वपूर्ण जिले हैं, जिनमें विकास की बहुत आवश्यकता है। यहां के गरीब और किसान यूपीए की सरकार की तरफ बहुत भरोसे की नजर से देख रहे हैं, हम अपेक्षा करेंगे कि आने वाले समय में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत इन जिलों में काम शुरू हो।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहता हूं कि एक और महत्वपूर्ण योजना स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना आपके माध्यम से चलती है। इसमें सेल्फ हैल्प ग्रुप के माध्यम से हम आम गरीब आदमी जो बीपीएल में रहता है, उसकी मदद करते हैं। यह केन्द्र सरकार की बहुत महत्वपूर्ण योजना है। यह भी सन् 1999 में शुरु की गई थी। जब एनडीए की सरकार थी, उस समय यह योजना शुरु की गई थी। इस योजना में आज देश में लाखों समूह ऐसे बने हैं, जो इस योजना के माध्यम से केन्द्र सरकार के अनुदान को लेकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं, अपने परिवारों की गरीबी दूर करके, मुख्य धारा से जुड़ कर देश की मुख्य धारा से जुड़ पा रहे हैं।
सभापति महोदया, मैं सदन में आपके माध्यम से मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि यह बहुत महत्वपूर्ण योजना है। कई बार राष्ट्रीयकृत बैंक, कोआपरेटिव बैंक और ग्रामीण बैंक अनुदान हेतु प्रकरण स्वीकृत कर देते हैं, परन्तु जो सामग्री है, उनका वितरण आने वाले कई वर्षों तक नहीं हो पाता। यह चिन्ता का विषय है। मध्य प्रदेश के कई जिले ऐसे हैं, जहां पर प्रपत्र चार काट दिया गया है, लेकिन आज भी प्रपत्र चार काट कर केन्द्र सरकार को जानकारी भेज देते हैं कि हमने अनुदान दे दिया और यह स्वरोजगार समूह काम करने लगा, लेकिन उन्हें उनकी सामग्री नहीं मिल पा रही। मध्य प्रदेश के अंदर 40 परसैंट ऐसे समूह हैं, जिनका स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में समूह बन गया है। केन्द्र का अनुदान उन्हें मिल गया है, लेकिन उन्हें सामग्री नहीं मिली। इसकी जांच एवं मोनिटरिंग होनी चाहिए। हम देख रहे हैं कि कई राज्यों में अच्छा काम हो रहा है। आप खुद साऊथ, आंध्रा एवं महाराष्ट्र में देखें, वहां सेल्फ हैल्प ग्रुप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। मैं साऊथ में एक-दो जगह पर गया हूं, वहां पर लोगों ने समूह बना कर उन्नति की है। स्थानीय स्तर पर जो प्रगति की है, वह वहां पर इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन का बहुत बड़ा प्रमाण है।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि जब पूरा योजना चालू होती है तो उसमें सौ करोड़ के आवंटन का बजट में प्रावधान किया गया है। इसमें ऐसे जिले शामिल किए जाएं, बहुत से ऐसे ग्रामीण क्षेत्र हैं, जहां अभी भी बिजली नहीं पहुंची। कई जगह ऐसी हैं, जहां पानी एवं सड़क की व्यवस्था नहीं है। पूरा जैसी योजनाओं का क्रियान्वयन उन जगहों पर होना चाहिए, जहां सड़क, पानी एवं बिजली की व्यवस्था है। अगर वहां सरकार थोड़ी सी मदद कर दे, उन गांवों को शहरों की तरफ ले जाने में थोड़े से धक्के की आवश्यकता हो, ऐसे गांवों और क्षेत्रों को हम चुनें, जिससे कि इस योजना का बेहतर क्रियान्वयन हम उन क्षेत्रों में कर सकें।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहता हूं, सारे सांसद इस बात से सहमत होंगे कि पूरे देश में एक विजिलेंस एंड मोनिटरिंग कमेटी बनाई गई है। अगर ये कमेटी नहीं होती तो मैं समझता हूं कि किसी सांसद को किसी प्रदेश में जिला प्रशासन किसी कार्य के लिए आपको आमंत्रण पत्र नहीं भेजता। ये केवल इकलौती एक कमेटी ऐसी है, जिसकी वजह से वे सोचते हैं कि सांसद आएगा, अध्यक्षता करेगा और पता नहीं कौन सा विषय उठवा देगा, एजेंडा में कौन सा विषय शामिल करा लेगा, इसलिए सांसद को बुला लिया जाए। इसके लिए मैं ग्रामीण विकास मंत्री जी को बहुत धन्यवाद दूंगा और मंत्रालय का आभार व्यक्त करूंगा, यह पूरे सांसदों के हित में एक बहुत बड़ा निर्णय है। मेरा उसमें यह निवेदन है कि इस विजिलेंस एंड मोनिटरिंग कमेटी में जो एनजीओज़ काम कर रहे हैं, क्योंकि इस समय एनजीओज़ भारत में एक बहुत बड़ी व्यवस्था को संचालित कर रहे हैं। मेरा निवेदन है कि विजिलेंस एंड मोनिटरिंग कमेटी में एनजीओज़ को भी शामिल किया जाए ताकि हम उन्हें वहां बुला सकें, उनसे पूछ सकें कि आपको जो फंड दिया गया है, आप जिले में कहां पर काम कर रहे हैं, किस स्थिति में आपका काम है? खासकर बैंकर्स, एलबीओ को यहां से निर्देश दिया जाए कि एलबीओ भी जिला विजिलेंस एंड मोनिटरिंग कमेटी में आकर बैठे। अगर एलबीओ वहां बैठेगा तो वह बता पाएगा कि ग्रामीण स्वरोजगार गारंटी योजना में कितने समूह बन गए हैं, कितना अनुदान दे दिया है, नहीं दिया है, सामग्री बंटी है या नहीं, बीपीएल के जो धारक हैं, उन्हें कितना फाइनेंस हुआ है। जब तक बैंकर्स, एलबीओ उस मीटिंग में नहीं आएंगे, तब तक मैं समझता हूं कि निचले स्तर की जानकारी हमें नहीं मिल पाएगी।
सभापति महोदया, मेरा आपके माध्यम से मंत्री जी से अनुरोध है कि विजिलेंस एंड मोनिटरिंग कमेटी में एलबीओ को भी शामिल किया जाए। आदरणीय यशवंत सिन्हा जी ने बीपीएल सर्वे की बात की थी, यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है। मैं मध्य प्रदेश का गांव का रहने वाला हूं, मुझे मालूम है कि बीपीएल की जो लिस्ट है, वह एक चरमराई व्यवस्था का बहुत बड़ा प्रमाण-पत्र है। पूरे मध्य प्रदेश में यह हालत है कि जिसका बीपीएल में नाम होना चाहिए, उसका नहीं है, बाकी सब के हैं। कई बार शर्म आती है, चार-चार मंजिल का भवन बना है, बाहर पीला पट्टा बना है और उसमें लिखा है कि मैं गरीब हूं। वहां कई जगह हमारे मुख्य मंत्री जी ने लिखवाया है कि ये गरीब है।
यह गरीब है और उसके नीचे नाम लिखा हुआ है। कई बड़े-बड़े और चार-चार मंजिले भवनों पर लिखा है कि मैं गरीब हूं, लेकिन उस झोंपड़ी में, जिसके ऊपर खपरैल नहीं है। उस पर नहीं लिखा है कि मैं गरीब हूं। वह एक बड़े आदमी होने का प्रमाण दे रहा है।
मेरा आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से अनुरोध है कि उन्होंने 300 करोड़ रुपए बी.पी.एल. के सर्वे के लिए दिए हैं, इसमें भले ही राशि और बढ़ाई जाए, लेकिन इसे जनगणना जैसा स्वरूप दिया जाए और यह एक ऐसा सर्वेक्षण प्रोग्राम हो, जो एक समान समय में, पूरे देश में चले और इसमें जिम्मेदारी फिक्स होनी चाहिए उस प्रदेश सरकार की, उस स्थानीय कर्मचारी की जो सर्वे करने जाएगा, यदि सर्वे गलत पाया जाएगा, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए और कांस्टीटय़ूशनल व्यवस्था होनी चाहिए कि गलत सर्वे पाने पर उसे दंडित किया जा सके। हर व्यक्ति चाहता है कि मेरा बी.पी.एल. में नाम हो। हर सुविधा बी.पी.एल. में मिलती है, तो हर व्यक्ति चाहता है कि मेरा नाम बी.पी.एल. में हो। जो आठ एकड़ का किसान है, वह भी चाहेगा कि उसका नाम बी.पी.एल. में और जो 20 एकड़ का किसान है वह भी चाहेगा कि उसका नाम भी बी.पी.एल. सूची में हो। जब बी.पी.एल. सूची के लोगों को लाभ मिलता है, तो गांव का हर व्यक्ति लाभ लेना चाहेगा। यह हमारी जिम्मेदारी बनती है, स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि पात्र व्यक्ति उसमें शामिल रहे और पात्र व्यक्ति को ही उसका लाभ मिले। इस सर्वे को करने वाले अधिकारी की जिम्मेदारी फिक्स हो। ऐसा माननीय मंत्री महोदय आपसे विनम्र अनुरोध है।
महोदया, चूंकि बजट में एलोकेशन है इसलिए नए सिरे से सर्वे होगा। अतः जो वहां पर बड़े लोग हैं, जो अमीर लोग हैं, उनके नाम बी.पी.एल. में नहीं आने चाहिए। जब हम लोग जाते हैं, तो सभाओं में बोलते हैं और निवेदन करते हैं कि जो बड़े आदमी हैं और जिनके नाम बी.पी.एल.की सूची में हैं वे अपने नाम कटवा लें, लेकिन कोई अपना नाम नहीं कटवाता है। कई तो शर्म के मारे नहीं कटवाते और कई जानबूझकर नहीं कटवाते हैं। उनके नाम उस सूची से कटने चाहिए।
सभापति महोदया: कृपया अब आप अपना भाषण समाप्त कीजिए।
श्री उदय प्रताप सिंह : सभापति महोदय, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के बारे में मैंने पूर्व में भी कहा था कि इसकी जांच होनी चाहिए मध्य प्रदेश में इसकी जांच होनी चाहिए। अभी इसमें बहुत अच्छे परिवर्तन किए गए हैं। पहले श्री जोशी जी के समय में यह व्यवस्था चालू हुई थी और अब श्री विलासराव देशमुख साहब ने उसे आगे बढ़ाया है। इसमें भारत सरकार अपनी तरफ से एक अधिकारी की नियुक्ति जिला स्तर पर करने जा रही है। यहां पर ई-मस्ट्रोल की व्यवस्था हो रही है। इंटरनैट के माध्यम से भी जानकारी रहेगी कि मस्ट्रोल बन रहे हैं या नहीं। यदि कागजों में गड़बड़ी करेंगे, तो यहां हम इंटरनैट के माध्यम से बता पाएंगे कि सही काम हो रहा है कि नहीं। चूंकि 88 प्रतिशत काम ग्राम पंचायतें करती हैं इसलिए उसकी मॉनीटरिंग भी बहुत संजीदगी से होनी चाहिए, क्योंकि ग्रामीण विकास की बहुत बड़ी जिम्मेदारी हमारी ग्राम पंचायतों पर होती है।
महोदया, मैं हमारी सरकार और ग्रामीण विकास मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने करप्शन को समाप्त करने के लिए आगे आने वाले समय में कुछ तैयारी कर रखी है। वे एक अधिकारी को नियुक्त कर रहे हैं। वे उस अधिकारी को इसलिए नियुक्त कर रहे हैं, जिससे वहां वह सभी कंप्लेंट को देखे और सभी प्रॉब्लम्स का निवारण करे। जो भी समस्याएं आएंगी वह वहां बैठकर उनका निराकरण करेगा। इसके लिए उन्होंने प्रावधान किया है।
सभापति महोदया, इंदिरा आवास योजना एक महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना के लिए हमारी सरकार ने 10 हजार करोड़ रुपए आबंटित किए हैं। यह एक ऐसी योजना है कि इसमें कितनी ही राशि बढ़ा दी जाए, ये कभी पूरी नहीं हो सकती क्योंकि यह आम आदमी से जुड़ा हुआ मामला है। इस समय इस योजना में सहायता राशि 45 हजार रुपए की गई है। मैं समझता हूं कि यह बहुत बढ़ाई गई है। पहले 15 हजार रुपए मिलती थी। फिर 25 हजार रुपए की गई और जब से हमारे आदरणीय वित्त मंत्री जी आए हैं, तब से ही इस योजना के अंदर धनराशि बढ़ती जा रही है। इसके लिए मैं माननीय वित्त मंत्री महोदय के प्रति आभार व्यक्त करता हूं। इसमें एक संशोधन की आवश्यकता है कि इंदिरा आवास योजना, जो ग्रामीण स्तर पर दी जा रही है, वह वर्ष 2002 की जो बी.पी.एल. की सूची है, उसे आधार बनाकर दी जा रही है। मेरा अनुरोध है कि बहुत से ऐसे परिवार हैं जो 2002 में गरीब नहीं थे, लेकिन अब गरीब हो गए और बहुत से लोग ऐसे हैं, जो उस समय गरीब रहे होंगे, लेकिन अब गरीब नहीं हैं। इसलिए इसका आधार निश्चित करने के लिए वर्तमान ग्राम पंचायत की ग्राम सभा के पास जाकर नियत किया जाना चाहिए कि आज की तारीख में उस गांव में सर्वाधिक गरीब कौन एस.सी. का कौन आदमी है, कौन सर्वाधिक गरीब एस.टी. का कौन आदमी है और सामान्य वर्ग का सर्वाधिक गरीब कौन है। यह चयन करने का काम वर्तमान ग्राम पंचायत की ग्राम सभा को मिलना चाहिए, क्योंकि स्थानीय प्रशासन इंदिरा आवास योजना के जो 10 नियम बने हैं, उनका पालन नहीं हो पाता है और इसमें बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार होता है।
महोदया, मैं एक और निवेदन करना चाहता हूं कि इंदिरा आवास योजना का जो तीन प्रतिशत धन जिला स्तर पर बचाया जाता है, उसमें से प्राकृतिक आपदा, बाढ़, सूखा अथवा मकान जलने आदि पर लोगों को सहायता देने के लिए प्रयोग किया जाता है। सांसद, विधायक और जिला परिषद् के लोगों के साथ कलैक्टर बैठकर प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित लोगों के लिए धन आबंटित करता है। मेरा आग्रह है कि इसे 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत किया जाए। विजिलैंस एंड मॉनीटरिंग कमेटी जो सांसद की अध्यक्षता में होती है, उसमें यह कोटा 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत किया जाए। इसलिए इस आबंटन की जिम्मेदारी इस कमेटी को दी जाए क्योंकि इसमें विधायक और जिला परिषद् के लोग भी होते हैं। प्राकृतिक आपदा पीड़ितों को धन आबंटित करने की जिम्मेदारी इस कमेटी को दी जाए। यह मेरा आपसे अनुरोध है।
मेरा दूसरा अनुरोध यह भी है कि चूंकि केन्द्र सरकार की बहुत सी योजनाएं चल रही हैं, आदरणीय जसवन्त सिंह जी ने कहा कि योजनाओं पर कई नेताओं के नाम लिखे हैं। यह स्वाभाविक सी प्रक्रिया है कि हम जिस दल से आते हैं, हमारा कर्तव्य बनता है कि हम उस दल की पैरवी करें। आप भी जैसे काम करते हैं, आपकी सरकारें जहां काम कर रही हैं,आपके वरिष्ठ नेता दीनदयाल जी के नाम से भी आप लोग योजनाओं के नाम रखते हैं। आप श्यामा प्रसाद मुकर्जी जी के नाम से रखते हैं, हम इन्दिरा जी के नाम से रखते हैं, हम राजीव जी के नाम से रखते हैं तो यह लगभग एक जैसी परम्परा है, जिसका लगभग सब दल पालन करते हैं। अगर इस पर कभी रोक लगेगी तो समान रूप से सब उसका पालन करेंगे।
मैं अपनी बात खत्म करने जा रहा हूं। मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि जितनी भी केन्द्र सरकार की योजनाएं हैं, आदरणीय मंत्री महोदय, चाहे मनरेगा हो, चाहे राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना हो, चाहे प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना हो, सारी योजनाओं के पहले एक बोर्ड जो बनता है, उस बोर्ड के लिए बजट में प्रावधान कर दिया जाये कि यह काम तब चालू होगा, जब बोर्ड लगा दिया जायेगा कि यह राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में काम चल रहा है। अगर बुरा काम होगा तो उसकी जिम्मेदारी हमारी होगी और अच्छा काम होगा तो उसकी प्रशंसा भी हमको मिलेगी, इसलिए मैं समझता हूं कि बजट में यह प्रावधान हो कि हर काम के पहले वहां पर बोर्ड लगाया जाये।
मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आप देखिये, यहां से मनरेगा का पैसा जाता है और वहां पर स्थानीय मुख्यमंत्री सड़क योजना के नाम से वहां सड़क बनने लगती है। अगर हम लोग उसका विरोध करते हैं तो स्थानीय स्तर पर बहुत विसंगतियां पैदा होती हैं, दबाव बनते हैं, हमको काम करने से रोका जाता है। इसमें कम से कम जब बोर्ड लगेगा कि महात्मा गांधी रोजगार गारंटी के पैसे से सड़क बनेगी तो उसमें मुख्यमंत्री सड़क योजना का नाम नहीं लिखा जायेगा, यह अनुरोध आपसे हैं। इन व्यवस्थाओं को आप रोकने की कृपा करें।...( व्यवधान)
सभापति महोदया: आप बैठिये। यह रिकार्ड में नहीं जायेगा। वे जनरल बात कर रहे हैं। माननीय सदस्य महोदय, आप बैठ जाइये। अब आप खत्म करिये।
…( व्यवधान)
सभापति महोदया : कृपया शान्त रहें।
श्री उदय प्रताप सिंह : अन्त में मैं अपनी बात खत्म करने के पहले हमारी यू.पी.ए. की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी जी के प्रति आभार व्यक्त करता हूं। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना, जिनकी सलाह पर, जिनके निर्देश पर चालू की गई है, आदरणीय राहुल गांधी जी, यह योजना पूरे देश में गरीबों के बीच में काम कर रही है, उनके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं। हमारे प्रधानमंत्री आदरणीय मनमोहन सिंह जी, जिनके नेतृत्व में हमारी सरकार काम कर रही है, के प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं।
अन्त में, ग्रामीण विकास विभाग आदरणीय देशमुख जी के नेतृत्व में, प्रदीप जैन जी के राजमंत्रित्व में इस देश में गरीबों की सेवा कर पाएगा, ऐसा हम सब का मानना है। मैं कांग्रेस का जो बजट ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों का यहां प्रस्तुत किया गया है, उसका समर्थन करता हूं।
MADAM CHAIRMAN : I have a long list of speakers to speak on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development. Therefore, those who want to lay their written speeches, they can lay them on the Table of the House. बोलने वालों की बहुत लम्बी लिस्ट है, इसलिए कृपया जो माननीय सदस्य अपने लिखित आलेख रखना चाहते हैं, वे कृपया टेबल पर रख दें।
श्री गोरखनाथ पांडे जी।
श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):माननीया सभापति जी, वर्ष 2011-12 के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदानों की मांगों पर चर्चा करने के लिए आपने मुझे अवसर दिया, मैं आपका आभारी हूं।
भारत देश गांवों में बसता है और गांवों में गरीब रहता है, किसान रहता है, मजदूर रहता है और मजबूर लोग रहते हैं। आज इस ग्रामीण विकास मंत्रालय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि गांवों को ऊपर उठाये। जब इस देश का गांव ऊपर उठेगा, गांवों का विकास होगा, किसानों की आमदनी बढ़ेगी, कृषि बढ़ेगी, तब यह देश भी उठेगा।
गांवों की बहुत सारी समस्याएं हैं, चूंकि हम गांवों से चुनकर आते हैं, हम पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाके के एक किसान परिवार के बेटे हैं, इसलिए हमें गांव की सारी ऐसी जानकारियों का सीधा-सीधा अनुभव है, जिनको किसी से पूछने की जरूरत नहीं है और जिसकी आवश्यकता है। मैं सदन के माध्यम से उन पर ध्यान देना और माननीय मंत्री जी का आपके माध्यम से ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं।
सबसे पहले मैं बी.पी.एल. की तरफ ही जाना चाहूंगा, क्योंकि हमारे बहुत से श्रेष्ठ वक्ताओं ने, वरिष्ठ वक्ताओं ने, बहुत सारी बातों को माननीय पूर्व मंत्री जी ने आंकड़ों के साथ प्रस्तुत किया है। मैं उन आंकड़ों में तो नहीं जाना चाहूंगा, लेकिन कुछ बिन्दुओं पर जरूर मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा।
इस देश के विकास के लिए जो बीपीएल सूची गांव में बनी है, जो गरीबों के लिए है, जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों के लिए बनी है, वहां सारी सुविधायें केंद्र के माध्यम से पहुंचनी चाहिए। मंशा यही है और यही अनुशंसा भी है, लेकिन सूची ही नहीं बन पायी है। ऐसे गरीब, जिनके चूल्हों में दोनों वक्त आग नहीं जलती, ऐसे गरीब जिनके पास रहने के लिए झोपड़ी नहीं हैं, ऐसे गरीब जिनके बच्चे स्कूल नहीं जाते, उन परिवारों के नाम बीपीएल सूची में नहीं हैं, अगर हैं, तो अट्टालिकाओं में रहने वाले लोगों के, जैसा मेरे पूर्व माननीय वक्ता ने कहा कि बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के बगल में लिखा है, हम गरीब हैं। उनका सर्वे कराने की जरूरत है। इसके पहले भी तेंदुलकर कमेटी की सर्वे जांच रिपोर्ट आयी, इसके बाद भी सर्वे हुआ। हमारे प्रदेश उत्तर प्रदेश में माननीय मुख्यमंत्री कुमारी मायावती जी ने अपनी तरफ से सर्वे कराकर उन गरीबों के लिए अतिरिक्त व्यवस्था दी है। ...( व्यवधान) आप मेरी बात सुनिए। ...( व्यवधान) मुझे अपनी बात कहने दीजिए। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया: आप बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
सभापति महोदया : पाण्डेय जी, आप चेयर को एड्रेस करिए।
…( व्यवधान)
श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):महोदया, मेरी बात से ये भी सहमत हैं। इनके मन में भी है कि वह जो सूची बनी है, उसका पुनरीक्षण होना चाहिए। उस सूची में जो अपात्र आ गए हैं, वे उससे बाहर जाएं, जो पात्र हैं, वे बीपीएल सूची में रखे जाएं। यह सारे सदन की मंशा है, सारे देश की मंशा है और सारे प्रदेशों से चुने गए हम प्रतिनिधियों की भी यह मंशा है। उस गरीब को वह सुविधायें केंद्र सरकार से मिलती हैं, जिसके वह हकदार हैं, लेकिन उनको वह नहीं मिल पा रही हैं। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि अगर इस ग्रामीण विकास को बढ़ाना है, अगर वास्तविक गरीबों को उनका हक दिलाना है, तो पहले बीपीएल सूची का पुनरीक्षण करके, उन गरीब परिवारों को उस सूची मे सम्मिलित किया जाए। यह मेरी पहली मांग है और सबसे महत्वपूर्ण मांग हैं। जो उसमें अपात्र लोग हैं, बड़े लोग हैं, उनको उससे निकाला जाए। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : कृपया शांत रहें।
श्री गोरखनाथ पाण्डेय : मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान इंदिरा आवास की ओर ले जाना चाहूंगा। इंदिरा आवास योजना गांव के मजबूर, मजदूर लोगों के लिए बनी है, लेकिन उसमें जो धन मुहैय्या कराया जाता है, उससे एक कमरा भी नहीं बन पाता है। कोई भी 45 हजार रूपए से एक अच्छा सा कमरा इस महंगाई के युग में आज नहीं बना पाएगा। मैं माननीय मंत्री जी से आपके माध्यम से आग्रह करना चाहूंगा कि इस धनराशि को बढ़ाकर कम से कम 60-65 हजार रूपए या उससे अधिक कर दिया जाए। ...( व्यवधान) ताकि उस गरीब को ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप बैठ जाइए। पाण्डेय जी के बात के अतिरिक्त और कुछ रिकार्ड में नहीं जाएगा।
(Interruptions) …* श्री गोरखनाथ पाण्डेय : मुझसे ज्यादा गरीबों की बात कमांडो जी आप नहीं जानते होंगे। मैं गांव में रहता हूं। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : पाण्डेय जी, आप चेयर को एड्रेस करिए।
श्री गोरखनाथ पाण्डेय: सभापति महोदया, आप हैंडपाइप की बात कर रहे हैं, मैं भी आपकी उस बात से सहमत हूं। हम जब गांवों में जाते हैं तो लोग हमसे पेयजल की बात कहते हैं। बड़े दुख के साथ सदन में कहना पड़ रहा है कि आजादी के लगभग 65 साल बाद भी अपने गांव के लोगों को शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं करा पाए हैं। इससे ज्यादा कष्ट की बात कोई नहीं हो सकती। मैं आपके माध्यम से निवेदन करूंगा और साथ ही साथ अपने वित्त मंत्री जी को बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने हम लोगों के लिए कुछ व्यवस्थायें दी हैं, लेकिन उसमें थोड़े सुधार की भी जरूरत है। उसमें कुछ विभाग ऐसे भी हैं जो काम अच्छा करते हैं, लेकिन उनको हम उस निधि से व्यवस्था नहीं करा पाते। जो बाउंडेशन है, उसे समाप्त करिए। जो अच्छी कार्यदायी संस्थायें है, जैसे जल निगम, उसको भी इसमें सम्मिलित किया जाए, ताकि वह री-बोर भी कर सकेंगे और अच्छी व्यवस्था भी दे पाएंगे।
महोदया, मैं माननीय मंत्री जी से मांग करता हूं कि हम सांसदों की अनुशंसा से कम से कम प्रतिवर्ष पांच सौ हैंडपंप जरूर लगवाने की व्यवस्था दें। हर विधानसभा में हम कम से कम हर वर्ष अपनी रिकमंडेशन से सौ हैंडपंप एक विधानसभा में लगा लेंगे, तो पांच सौ या जिनके यहां सात या आठ विधानसभाएं हैं, उनकी व्यवस्था इससे हो जाएगी।
पीएमजीएसवाई की बात आई।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : पाण्डेय जी, आप चेयर को संबोधित कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री गोरखनाथ पाण्डेय : मैं मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। उत्तर प्रदेश में अभी तक फेज़ 8 और 9 की धनराशि नहीं गई जबकि उसके तमाम प्रस्ताव लंबित पड़े हुए हैं। आप जहां मजरे, कस्बे और छोटी बस्तियों को पक्की सड़क से जोड़ने की बात कर रहे हैं, वहां उत्तर प्रदेश में आज भी धनराशि नहीं गई है। मैं मंत्री जी से मांग करता हूं कि वहां फेज 8 और 9 की धनराशि प्रेषित करें ताकि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में सड़क और यातायात की सुविधा प्रदान की जा सके।
मैं मनरेगा की बात भी कहना चाहूंगा। हम गांवों में रहते हैं और वहां की स्थिति से वाकिफ हैं। हमें पता है कि बहुत से माननीय सांसदों ने उसकी प्रशंसा की, लेकिन हकीकत यह है कि आज गांवों में मनरेगा की स्थिति वह नहीं है जो केन्द्र सरकार की मंशा है। वहां काम कुछ लोग करते हैं और रजिस्टर मेनटेन कुछ लोगों का होता है। मजदूरी कुछ मिलती है और उसमें व्यवस्था कुछ और की जाती है। मैं मंत्री जी से मांग करता हूं कि यदि यहां से धनराशि जा रही है तो उस काम की सारी मौनीटरिंग सांसदों को मिले। 50 प्रतिशत काम की मौनीटरिंग हम करें, हम गांवों में जाएं और उन्हें देखें। हमारी रिकमैंडेशन या ऑब्जैक्शन से उस पर एक्शन होना चाहिए।...( व्यवधान)
एक तरफ इंदिरा आवास में उतनी धनराशि से कमरा नहीं बन पाता। उसका दूसरा महत्वपूर्ण अंग है कि प्राकृतिक आपदा, अति वृष्टि, अनावृष्टि, आगजनी, सूखा आदि कारणों से गरीबों के पूंस के मकान गिर एवं जल जाते हैं। उन्हें भी इंदिरा आवास में प्राथमिकता से जोड़ दिया जाए और जिस आगजनी या अन्य प्राकृतिक आपदाओं की वजह से उनके झोंपड़े गिर जाते हैं, उन्हें उनसे जोड़कर कार्य किया जाए।
मैं एक-दो बिन्दु और बताना चाहूंगा। मैं राजीव विद्युत योजना के बारे में बताना चाहता हूं कि मेरे गांव में तार गया, लाइन खींच दी गई, लेकिन उसमें ट्रंसफार्मर नहीं लगे। पूर्व मंत्री जी कह रहे थे कि 40 वॉट से अधिक का बल्ब नहीं लगा सकते।...( व्यवधान) उस गांव में जहां अनुसूचित वर्ग के लोग, गरीब, मजदूर रहते हैं, उनके नाम पर उसकी व्यवस्था दी जा रही है, लेकिन वह भी सम्पूर्ण नहीं मिल पा रही है। उसमें सुधार की जरूरत है।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : प्लीज़, आप उन्हें डिस्टर्ब मत कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री गोरखनाथ पाण्डेय : जहां तक मनरेगा में सुधार की बात है, उनकी मौनीटरिंग हो और जो वास्तविक मजदूर हैं, उनकी मजदूरी भी बढ़ा दी जाए।
मैं अंतिम बात निवेदन के साथ कहना चाहूंगा कि हमारे क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। हम गांवों में जाते हैं और अगर वहां सौ, दो सौ लोग हैं, तो 90 प्रतिशत लोग हमसे हैंडपम्प मांगते हैं। मैं मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि हम लोगों की अनुशंसा से सड़क और हैंडपम्प की व्यवस्था करवाएं। साथ ही बिजली, पानी और किसानों की छोटी-मोटी समस्याओं का निदान करें। जब गांव उठेगा तब देश उठेगा। भारत का विकास तब होगा जब गांव का विकास होगा। सबसे महत्वपूर्ण योगदान मंत्री जी के मंत्रालय का है। मेरा आग्रह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बजट की धनराशि और बढ़ाकर गांवों के किसानों, गरीबों, मजदूरों, दलितों की स्थिति में सुधार करवाएं, तभी ग्रामीण विकास मंत्रालय का वास्तविक स्वरूप आएगा और इस देश का विकास होगा।
ओश्रीमती रमा देवी (शिवहर) ः महात्मा गांधी ने कहा था कि गांव के विकास के बिना देश के विकास का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाता है देश की 72 प्रतिशत जनसंख्या गांव में रहती है जो कृषि, पशुपालन एवं छोटे-मोटे व्यवसाय पर आधारित है । अगर कृषि, पशुपालन एवं गांव में कार्यरत छोटे-मोटे उद्योग पर निवेश किया जाए तो गांव की बैरोजगारी को दूर किया जा सकता है और शहरों की तरफ हो रहे पलायन को रोका जा सकता है । ग्रामीण विकास पर सरकार कितनी चिंतित है यह अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आर्थिक समीक्षा पुस्तिका में ग्रामीण विकास योजनाओं के तीन चार पेज है । जब तक अच्छे ढंग से ग्रामीण विकास की समीक्षा नहीं होगी तब तक ग्रामीण विकास की असली तस्वीर कैसे सामने आएगी ।
मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र बाढ़ से हर साल प्रभावित होता है। देश में हर साल बाढ़ आती है और इस बाढ़ से अरबों रूपये की किसानों की संपत्ति नष्ट हो जाती है और किसानों के हजारों पशु बह जाते हैं । देश में अभी भी किसान बरसात के पानी से अपने खेत सिंचते हैं । देश में अभी भी 60 से 70 प्रतिशत ऐसी कृषि योग्य भूमि है जहां पर पानी की व्यवस्था नहीं है । भारत निर्माण के तहत मैं अपने संसदीय क्षेत्र शिवहर बाढ़ के प्रभाव को रोकने के लिए सिंचाई की व्यवस्था किए जाने की मांग करती है । जो सिंचाइ परियोजना निर्माणाधीन है वह कई सालों की देरी से चल रही है । इन सिंचाई परियोजनाओं की देरी से चलने के कारण इन परियोजनाओं के निर्माण कार्य से गांव में रहने वाले लोगों को परेशानी हो रही है दूसरी ओर इन परियोजनाओं की लागत भी बढ़ रही है । सरकार से अनुरोध है कि भारत निर्माण के तहत मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर में सिंचाई के साधन बनाए जाए और बाढ़ पर नियंत्रण कार्य किए जाएं ।
भूमि विवाद के मामलों का कंप्यूटरीकरण हो जिससे भूमि दावे (विवाद) के मामले को आसानी से निपटाया जा सके और न्यायालय में भूमि संबंधी वाद-विवाद को कम किया जा सके । इस क्षेत्र में मेरे संसदीय क्षेत्र में भूमि स्वामीत्व के मामलों का कंप्यूटरीकरण नहीं हुआ है इसके मोबाईल कोर्ट की व्यवस्था की जाए जो व्यक्ति भूमि स्वामित्व के प्रमाण मांगें उन्हें उचित समय पर दे दिया जाए । इस कार्य को मेरे संसदीय क्षेत्र में अति शीघ्र लागू किया जाए ।
देश में 1985 से 2010-11 तक इन्दिरा आवास के तहत 2 करोड़ 52 लाख आवास बने हैं जिसमें बिहार में 44 लाख के करीब इन्दिरा आवास बने हैं । मेरे संसदीय क्षेत्र में इन्दिरा आवास जिसको मिलना चाहिए उनको नहीं मिल रहा, जिनके पास पहले से आवास है उनको इन्दिरा आवास आवंटित किए जा रहे हैं । इन कार्यों की समीक्षा की मांग करती हूं । देश के गांवों में इन्दिरा आवास योजना चल रही है जिसके * Speech was laid on the Table तहत 45 हजार की मदद की जाती है । लगता है सरकार गांव के गरीब लोगों से मजाक कर रही है जो गांव में इन्दिरा आवास बने दो साल में ही उनकी दीवार टूट गई है । किसी की छत टूट गई है, आंगन नहीं है, बाथरूम नहीं है । परंतु अच्छा घर बनाने के लिए कम से कम एक लाख का खर्चा होता है । इसलिए इन्दिरा आवास योजना के तहत एक आवास के लिए एक लाख रूपये या डेढ़ लाख रूपये की सहायता से इन्दिरा आवास बनाए जाने की व्यवस्था की जाए । 45 हजार से आजकल की महंगाई में एक दीवार भी नहीं बनती तो इन्दिरा आवास कैसे बनाया जा सकता है ।
गांव को जोड़ने वाली प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना सही ढंग से लागू नहीं की जा रही है । कई 1500 आबादी के गांव में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़कें नहीं बनाई जाती है क्योंकि उनके रिकार्ड में उस गांव में सड़कें है जबकि यह रिकार्ड कई दशक पुराना है एवं आज की तारीख में वहां पर उपयुक्त सड़कें नहीं है । सरकार से अनुरोध है कि ऐसे गांव में सड़कों का सरकारी रिकार्ड है परंतु वास्तव में आज की तारीख में इन गांव में सड़कें नहीं है तो वहां पर भी प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत सड़कें बनाई जाए । अभी हाल ही में विश्व बैंक ने 1.5 बिलियन डालर सड़कों के निर्माण के लिए दिया है । उसमें बिहार को अधिक से अधिक धन मिले इसकी मांग करती हूं । मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर के अंतर्गत जिन नियमों से प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत बननी चाहिए वह नहीं बन रही है जो एजेंसियां काम कर रही है उसमें घटिया सामग्री का प्रयोग कर रही है जिसके कारण एक साल के अंदर यह खराब सड़कें मेरे संसदीय क्षेत्र में होगी । गांव को जोड़ने वाली प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है कई गांव ऐसे है जहां पर इस योजना के अंतर्गत सड़कें बननी चाहिए परंतु सरकारी रिकार्ड में उसमें सड़कें है जबकि यह रिकार्ड कई दशक पुराना है । सरकार से अनुरोध है कि ऐसे गांव में सड़कों का सरकारी रिकार्ड है परंतु वास्तव में आज की तारीख में इन गांवों में सड़कें नहीं है तो वहां पर भी प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत सड़कें बनाई जाए । देश में 1 लाख 82 हजार 715 किलोमीटर सड़कें प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत बनाई गई है जिसमें बिहार की तरफ देखा जाए तो केवल 8,666 किलोमीटर सड़कें बनी है । इन सबके कारण बिहार सड़कों के अभाव में यथोचित प्रगति नहीं कर पा रहा है यह खेद की बात है ।
इस बजट में 165 करोड़ रूपये गांव में स्वच्छता का वातावरण तैयार करने में लगाने का प्रावधान है। मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर के गांवों में बरसात के दिनों में लोगों को शौच जाने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक 2005-06 के अनुसार बिहार के ग्रामीण इलाकों की 16.2 प्रतिशत जनसंख्या के पास ही शौचालय की व्यवस्था थी । देश में जो संपूर्ण स्वच्छता के तहत गांव स्वच्छ होते हैं और जहां पर गांव के लोग शौच के लिए नहीं जाते हैं उन्हें निर्मल गांव का खिताब मिलता है। परंतु इस बार जो निर्मल ग्राम पुरस्कार मिले हैं उन गांव में 50 प्रतिशत शौचालय नहीं बने हैं और जो बने हैं उनमें से बहुत टूट चुके हैं । उसके बाद भी ऐसे गांव को निर्मल ग्राम के रूप में पुरस्कृत किया और गांव के सरपंच को पांच लाख का ईनाम भी अलग से मिला । कहने का मतलब है कि ग्रामीण विकास की योजनाओं को सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है ।
काफी समय पूर्व जो जल नीति बनाई गई थी वह अभी तक चल रही है । गांव का जल से काफी नाता होता है परंतु इस जल नीति से ग्रामीण विकास के कार्य रोके हुए है जिससे कई लाख करोड़ रूपये खर्च करने की योजना है जिसमें गांवों में बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई कार्य, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र, पेयजल की आपूर्ति, जैसे काय किए गए हैं । परंतु मेरे क्षेत्र शिवहर में इन कार्यों की तस्वीरें दिखाई नहीं देती है । देश में 100 साल पुराने 114 डेम है जो जर्जर हालत में है जिसमें कोई भयानक घटना न हो इसके कारण बंद है । सरकार ने इन डेमों की मरम्मत किए जाने हेतु कोई प्रभावकारी कदम नहीं उठाए है । खेद की बात है कि कई डेमों को लेकर लोगों को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा है जिसमें सरकार की काफी किरकिरी हुई है । कहने का मतलब है कि बाढ़ जैसी समस्या से गांव को बचाने के लिए परंपरागत सिंचाई के साधन, डैम को बनाया जाना चाहिए । मेरे संसदीय क्षेत्र में इसकी काफी संभावनाएं है परंतु इस पर कार्य नहीं हो रहा है जिसके कारण जल जमाव जैसी समस्या बनी रहती है और बंजर भूमि बनने का खतरा बना रहता है।
गांवों के विकास में नदियों का योगदान रहता है । जनवरी, 2010 में उत्तर बिहार की तीनों प्रमुख नदियां गंडक, बूढ़ी गंडक और बागमती नदियां सूखी पड़ी थी और उत्तर बिहार का भूगर्भ जलस्तर जो पिछली गर्मी के न्यूनतम स्तर से भी नीचे हो गया था । केन्द्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट तो चौंकाने वाली है । सीतामढ़ी एवं मुजफ्फरपुर के बीच कटोझा में पानी का जलस्तर निर्धारित पैमाने के निम्न स्तर से भी नीचे चला गया और मुजफ्फरपुर जिले के कुडनी ब्लॉक का भी जलस्तर 43 सेमी0 से नीचे चला गया है। उत्तर बिहार की नदियां सूखी होने से यहां की धरती प्यासी हो गई है जिसके कारण भूमि की उर्वरता जो पूरे देश में सबसे अच्छी है नदियों में पर्याप्त पानी के अभाव में आने वाले समय में इसकी उर्वरता पर प्रभाव पड़ेगा । गांव के किसानों को खेतों में पानी के लिए उत्तरी बिहार में सिंचाई प्लांट लगाने के लिए उत्तर बिहार में जल संसाधन के विकास के नेपाल सरकार से बातचीत की जानी चाहिए जो नहीं हो रही है। मेरे गृह राज्य में वेस्टर्न कोसी केनाल का काम लंबे समय से चल रहा है । 1998 के करीब इसे त्वरीत सिंचाई लाभार्थी योजना के अंतर्गत कर दिया गया। उसके बाद भी यह पूरा नहीं हुआ । शुरू में इसकी लागत 13 करोड़ रूपये के लगभग थी जो बढ़कर अब 1307 करोड़ हो गई है । सरकार कई कारणों को इन देरी के लिए बताती है परंतु एक-दो कारणों को छोड़कर सभी कारण सरकारी अधिकारियों द्वारा पैदा किए हुए हैं ।
मेरे संसदीय क्षेत्र के बहुत से ऐसे गांव है जहां पर बिजली नहीं पहुंची है । जहां पर बिजली है वहां पर बिजली की आपूर्ति नहीं है । देश में ग्रामीण विद्युतीकरण के माध्यम से गांव में बिजली पहुंचाने का कार्य शुरू हुआ था जिसमें अरबों रूपया खर्च हो चुका है । 2005 में ग्रामीण विद्युतीकरण को राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण का नाम दिया है और लक्ष्य रखा गया कि एक लाख 25 हजार गांव में बिजली पहुंचाई जाएगी। यह कार्य असंतोषजनक ढंग से चल रहा है । खेद के साथ सदन को सूचित कर रही हूं कि मेरा संसदीय क्षेत्र बुरी तरह से बिजली की सुविधा से अभी तक वंचित है । मेरे संसदीय क्षेत्र में जो गांव हैं उनमें रहने वाले लोगों को चिकित्सा नियम के अनुसार नहीं मिल पा रही है । प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में चिकित्सा उपकरण नहीं है, दवाएं नहीं है और डॉक्टर भी कभी-कभी आते हैं । अब तक केवल देश में 381 चिकित्सा मोबाईल वैन हैं जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है ।
मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर में सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गांव के गरीब परिवार के लालन-पालन के लिए रियायती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने के उद्देश्य में पूरी तरह से असफल हो रही है। वास्तव में जो गरीब है उनके पास कार्ड नहीं है, जो गरीब नहीं है उनके पास गरीबी रेखा के कार्ड है । 30 जून, 2010 तक देश में 1 करोड़ 74 लाख जाली राशन कार्ड को पकड़ा गया, इन जाली राशन कार्ड पर राशन सप्लाई हो रहा था । 2007, 2008 एवं 2009 में 22 लाख 74 हजार 504 जांच हुई एवं 4 लाख 32 हजार 506 छापे मारे गए । इन जांच एवं छापे में केवल 87,308 लोगों के खिलाफ कार्यवाही की गई । उसमें से अधिकतर कारण बताओ नोटिस जारी हुए । लगता है कि कार्यवाही केवल नाममात्र की है । सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दोषियों को सरकार बचाने का काम कर रही है जिसके कारण इस प्रणाली में एक अनुमान है कि हर साल राशन दुकानदार राशन का खाद्यान्न काले बाजार में बेचकर 10 करोड़ कमाते हैं । राशन का खाद्यान्न ठीक प्रकार से सप्लाई करने के लिए एक एरिया आफिसर नियुक्त किया गया जो खाद्यान्न की गुणवत्ता से लोगों को मिलने वाले राशन की जांच करना है । परंतु शुरू में इसने प्रभावशाली काम किए परंतु यह भी आज सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरूस्त करने में असमर्थ है । कई कानून बने हैं परंतु अभी भी गरीब लोगों को राशन नहीं मिल रहा है और मिल भी रहा है तो पूरा नहीं । वह भी घटिया किस्म का ।
आज देश में ग्रामीण क्षेत्र में 41.8 प्रतिशत गरीबी है और इस औसत दर से 14 प्रतिशत ज्यादा यानि 55.7 प्रतिशत गरीबी बिहार में निवास करती है । मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर के गांवों में व्याप्त गरीबी के कारण रोजगार नहीं मिलने से लोग काम की तलाश मं शहरों की तरफ पलायन कर जाते हैं और गांव पिछड़े ही रहते हैं । अगर गांव के लोगों को गांव में व्यवसाय लगाने की शिक्षा दी जाए और उन्हें प्रशिक्षित किया जाए तो हम गांवों के लोगों को काम सिखाकर उन्हें खाली समय में कोई काम करने के लिए उत्साहित कर सकते हैं । यह ठीक है कि सरकार के पास ऐसी कोई मशीनरी इस वक्त न हो । इसके लिए गैर-सरकारी संगठन काम कर सकते हैं । कपार्ट इसके लिए काम करता था जो वर्तमान समय में अप्रभावशाली है । मेरा सरकार से अनुरोध है कि मेरे संसदीय क्षेत्र में ग्रामीण रोजगार की जो योजनाएं चलाई गई हैं उनकी समीक्षा की जाए । मनरेगा में 31,209 करोड़ इस बजट में दिया है । 1681 करोड़ दिया है जो गरीबी और बेरोजगारी को देखते हुए बहुत कम है । सरकार से अनुरोध करती हूं कि यह राशि बिहार में बढ़ाई जाए ।
मेरे संसदीय क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में अंत्योदय अन्न योजना का आरंभ 2000 में किया था जिसमें गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले सबसे गरीब लोगों को प्रत्येक माह दो रूपये प्रति किलोग्राम गेहूं एवं 3 रूपये पर चावल पर 35 किलो अन्न उपलब्ध कराने का उद्देश्य था और इसे ढाई करोड़ गरीब लोगों को इस योजना का लक्ष्य रखा गया है परंतु अंत्योदय अन्न योजना चरमरा गई और इसका खाद्यान्न काला बाजार में जाने लगा जिसके कारण वर्तमान समय में इसके सुधार की आवश्यकता महसूस होने लगी है । वर्तमान समय में अंत्योदय अन्न योजना के अंदर काफी भ्रष्टाचार बढ़ गया है जिस उद्देश्य से एनडीए सरकार ने यह योजना शुरू की है उसे यूपीए सरकार ने तहस नहस कर दिया ।
सितम्बर, 2010 तक 970 लाख 64 हजार लोगों को किसान क्रेडिट कार्ड बांटे जा चुके हें । मेरे संसदीय क्षेत्र शिवहर के तीन जिले मोतीहारी, सीतामढ़ी एवं मुजफ्फरपुर के जो ब्लॉक है उनमें केन्द्र प्रयोजित योजना के अंतर्गत एवं किसान क्रेडिट कार्ड के तहत अनुसूचित बैंकों द्वारा जो धन सहायता या ऋण के रूप में दिया जाता है उसमें धड़ल्ले से बिचौलिया द्वारा बैंक अधिकारियों की मिलीभगत करके कमीशन लिया जा रहा है एवं लाभान्वित लोगों को कम पैसा मिल रहा है । बैंक अधिकारी ऋण एवं सहायता के रूप में उन्हीं लोगों को धन देते हैं जो बिचौलिया द्वारा सिफारिश किए हुए होते हैं । ग्रामीण विकास की लगभग सभी योजनाओं में यह कमीशनखोरी का धंधा बड़े जोर-शोर से चल रहा है । मैंने कई ऐसे मामले पकड़े हैं और शिकायतें भी की परंतु उन पर आज तक कार्यवाही नहीं हुई है । कार्यवाही न होने से यह गोरखधंधा बिना किसी रोकटोक के चल रहा है और योजनाओं का लाभ ग्रामीण लोगों को नहीं मिल पा रहा है । इसके लिए सरकार को बैंकों के कार्य पर निगरानी रखनी होगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी तभी इन योजनाओं से ग्रामीण लोगों को लाभ मिलेगा । यह भी गौर करने की बात है कि 2008-09 में बिहार में 13961 सेल्फ हाउसिंग ग्रुप थे जो एक साल में ही 2009-10 में जिसकी संख्या 25027 हो गई यानि एक साल में दुगनी । इन सेल्फ हाउसिंग ग्रुप की जांच होनी चाहिए कि जाली और बनावटी तो नहीं है क्योंकि जाली एसएचजी से धन की बर्बादी होती है ।
ग्रामीण विकास की अनुदानों का उपयोग अच्छे ढंग से नहीं होगा और यह ग्रामीण विकास के लिए अपर्याप्त है और बिहार जैसे गरीब एवं पिछड़े राज्य के अनुकूल नहीं है इसलिए मैं इस ग्रामीण विकास अनुदान मांगों का विरोध करती हूं ।
ओश्रीमती जयश्रीबेन पटेल (महेसाणा) ः मैं अपने कुछ विचार 2011-12 के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदान मांगों पर चर्चा में पेश करना चाहती हूं ।
वित्त मंत्री मान. प्रणव मुखर्जी ने वर्ष 2010-11 के सामान्य बजट के वक्त ग्रामीण विकास मंत्रालय के बजट के बारे में यह शब्द कहे थे ............... महात्मा गांधी के शब्दों में " जिस प्रकार ये ब्रह्मांड स्वयं में विद्यमान है उसी प्रकार भारत गांवों में बसता है । " ग्रामीण विकास हेतु 66100 करोड़ रूपये का प्रावधान था और नरेगा के लिए 40100 करोड़ रूपये आवंटित किए थे और 2011-12 के सामान्य बजट में 40 हजार करोड़ आवंटित किए गए हैं जो गत वर्ष से 100 करोड़ कम है जहां 1 लाख करोड़ की जरूरत है वहां 40 हजार करोड़ से क्या प्रगति होगी ?
मनरेगा जो आज भ्रष्टाचार का अखाड़ा बन चुका है इसमें और सुधार की जरूरत है ।
देश में 70 प्रतिशत से अधिक लोग गांव में रहते हैं । गांव के विकास का अर्थ पूरे राष्ट्र का विकास है। ग्राम विकास मतलब भारत की आत्मा का विकास। भारत गांवों का देश है भारत की आत्मा गांवों में बसती है । भारत की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है । जब तक गांवों का विकास नहीं होगा तब तक पूरे राष्ट्र का विकास नहीं होगा । लेकिन देश की 17 प्रतिशत गांव की आबादी में से 60 प्रतिशत आबादी निर्धन है ।
इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत भवन निर्माण की लागत में 45000 और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए 4500 रू. का प्रस्ताव और इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए 10 हजार करोड़ रू. का आवंटन स्वागत योग्य कदम था ।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की महत्वपूर्ण भूमिका आजादी के 62 वर्षों के बाद भी दायित्वपूर्ण नहीं है।
कुपोषण, निम्न जन्मदर के बारे में मान. प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि यह राष्ट्रीय शर्म की बात है ।
पंचायत राज्य संस्थाओं में मोनीटरी की भी कमी है आज देश पंचायती राज की स्वर्णिम जयंती मना रहा है फिर भी अपने दायित्व को निभाने में पूरी तरह सफल रहा है ।
इस महंगाई में इंदिरा आवास योजना के तहत 45000 रू. का आवंटन बढ़ा कर 1 लाख रू. किया जाना चाहिए और पर्वतीय क्षेत्रों में डेढ़ लाख होना चाहिए । इस स्कीम को नगर पंचायत में भी लागू किया जाना चाहिए ।
भारत की 17 प्रतिशत गांव वाली जनसंख्या के लिए बजट में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यानी सकल घरेलू उत्पादन का केवल 2 प्रतिशत ही आवंटित किया है ।
* Speech was laid on the Table पेयजल और स्वच्छता जैसे प्रमुख क्षेत्रों में राशि पर्याप्त नहीं है ।
ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाली गरीब वंचित लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में यह सरकार नाकाम रही है । कालांतर में स्थिति ऐसी हो गई है कि गरीब और गरीब हो गए हैं और अमीर और अमीर बन गए हैं । अमीरों की अमीरी में 238 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसकी तुलना में गरीबों की गरीबी में सिर्फ 37 प्रतिशत ही घटावा हुआ है । सच्चाई यह है कि 5 से 10 फीसदी लोग ही सभी सुविधाओं का लाभ उठा पाए है ।
एमपीलैड निधि को बढ़ाकर 5 से 10 करोड़ रखना चाहिए ताकि सांसद ग्रामीण अवसंरचना के विकास के लिए खर्च कर सकें । प्रत्येक सांसद को अपने निर्वाचन क्षेत्र में 1000 हैंडपंप लगाने की अनुशंसा करने का अधिकार मिलना चाहिए ।
वर्ष के 365 दिन में मनरेगा के अंतर्गत सिर्फ 100 दिन की रोजगारी की गारंटी है बाकी के दिनों में बेरोजगारी की वजह से गांवों से लोगों का पलायन शहरों की ओर हो जाता है । शहरों में फिर झुग्गी-झोपड़ियों का बढ़ावा होता है और रोजी रोटी के लिए लोगों को दर-दर भटकना पड़ता है । उन लोगों को भिखारी समझ कर बुरे बर्ताव के साथ भगाया जाता है । यह गरीबी रेखा से जीवन यापन करने वाले लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है । इसके कारण बीपीएल की सूची से भी वह लोग बाहर निकल जाते हें और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं पा सकते ।
गरीबों की भूख शांत करने वाले अंत्योदय अन्नपूर्णा योजना कहां गायब हो गई पता ही नहीं चलता। घोषणाएं बहुत की जाती है लेकिन योजनाओं के बावजूद दरिद्रता में कोई कमी नहीं आई है ।
गुजरात जैसे राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है वह दुखदायक है । गुजरात में तो 1.50 लाख सैल्फ हैल्प ग्रुप बनाए गए हैं और उनके लिए 2010-11 के स्वर्णिम ज्यंती के बजट में 1000 करोड़ रूपयों का मंगलम मिशन योजना के तहत आवंटित किया गया है ।
मनरेगा के तहत 100 रू. की 100 दिन वाला रोजगार दिया जाता है उसको बढ़कर 200 रू. और 200 दिन कर देना चाहिए ।
गांव के खेत मजदूरों को मजदूरी देने के लिए जानवरों के कारण किसानों की फसलें तबाह हो रही है इससे मनरेगा योजना में जानवरों की रखवाली का हेतु भी सम्मिलित किया जाए ताकि गरीब लोगों को वहां रोजगारी भी मिले और किसानों की फसल भी बच सके । राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत सभी गांवों को संपूर्ण विद्युतीकरण करने के साथ-साथ गरीब, अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग को पूरी तरह इस योजना का शत-प्रतिशत लाभ दिया जाए । प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत सड़कों के लिए ग्राम की जनसंख्या को 100 तक निर्धारित किया जाए ताकि पहाड़ी क्षेत्रों को इसका लाभ मिल सके । फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट 1980 के अंतर्गत जो समस्याएं सड़कों को बनाने में आ रही है उसे और आसान करना चाहिए ।
गांवों में रोजगारी को बढ़ावा देने के लिए राइट टू वाटर के अंतर्गत पेयजल की सुविधा के लिए पर्याप्त संख्या में हैंड पंप उपलब्ध कराए जाएं । गांव के खेत मजदूरों को नजदीक वाले शहरों में जो कृषि मार्केट यार्ड है उनके साथ मजदूरी के लिए जोड़ना चाहिए । इसके कारण गरीबी का निर्मूलन होगा और सकारात्मक परिणाम मिलेंगे ।
जहां बुनकरों को पैसा देकर, सूत देकर बुनाई का कार्य कराया जाए और भारत सरकार उसकी खरीदारी करे तो उनको एक रोजगार मिल जाएगा ।
बेहतर सड़क संपर्क न होने के कारण दूर-दराज के गांवों में गरीब लोगों को खाद्यान्न नहीं पहुंच रहा है । उन्हें चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही है । प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी साधन युक्त नहीं है । एमपीलैड योजना के अंतर्गत मोबाईल औषधालयों और एम्बुलैंसों की खरीद हेतु निधियां स्वीकृत की जानी चाहिए ।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों की तासीर और तस्वीर बदलने का कार्य किया है ऐसी बस्तियों में जिनकी आबादी 250 से ऊपर है तथा जहां राजस्व नहीं है उनका भी सर्वे करवाकर सड़क से जोड़ने का कार्य किया जाना चाहिए । प्रत्येक गांव को पक्की सड़कों से जोड़ देना चाहिए इससे किसानों को अपने खेतों के उत्पादन को मंडियों तक पहुंचाने में और माल का आयात करने में आसानी हो जाएगी ।
रेलवे क्रासिंग पर होने वाला व्यय भी उक्त योजना के अंतर्गत सरकार को वहन करना चाहिए । वर्तमान में इस योजना के अंतर्गत 25 मीटर के स्थान पर 50 मीटर तक लंबे पुल निर्माण करने का निर्णय लिया गया है । मेरी मांग है कि इन पुलों की लंबाई 100 मीटर की जानी चाहिए जिससे रेल लाइन पर सिंगल लेन के पुलों का निर्माण भी हो सके । मेरा सुझाव है कि रेल मंत्रालय के अंतर्गत जो 17000 मैनलेस फाटक है वहीं 70 प्रतिशत गांव के गरीब परिवार से एक व्यक्ति को और शहरी गरीबों में से 30 प्रतिशत गरीब परिवार से एक व्यक्ति को फाटक मैन की नौकरी दी जाए जिससे गरीबों को बेरोजगारी की मार न झेलनी पड़े ।
पंचायती राज के माध्यम से ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए पंचायतों और ग्राम सभा को व्यापक शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए ।
गांवों में निर्मल गांव की योजना के तहत ग्रामीण स्वच्छता के नाम पर शौचालय बनाने के लिए 1500 से 1700 रू. दिए जा रहे हैं इसे बढ़ाकर 5 से 7 हजार रू. दिए जाने चाहिए ।
मेरी मांग है कि हर गांव में एक बड़ा या छोटा तालाब की खुदाई मनरेगा के माध्यम से की जाए और छोटे-छोटे नदी नालों पर चैक डेम बनाने को अग्रता दी जाए ।
अधिकांश किसान और कृषि कामगार गांव में रहते हैं वह अन्न उत्पादन करते हैं लेकिन पीड़ाजनक बात यह है कि उनके लिए भोजन दुर्लभ है । कृषि उत्पादन में बढ़ावा हुआ है और उनका लाभदारी मूल्य नहीं मिल रहा है । इसलिए किसानों को और कामगारों को रोजी रोटी के लिए प्रोत्साहन मिले । इसलिए हर गांव में 1 या 2 गोदाम बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए ।
हर गांव में लोअर प्राइमरी, अपर प्राइमरी की पूरी शिक्षा का प्रावधान करके उसमें शिक्षा कर्मियों की पूर्ण भर्ती की जानी चाहिए । उनको पंचायत की शिक्षा समिति के अंतर्गत लाभ चाहिए ।
ग्रामीण विकास की सभी योजनाओं में संशोधन करना बहुत जरूरी है ।
वित्त बजट 2010-11 में 2000 की बस्ती वाले प्रत्येक गांव में एक बैंक शाखा खोलने का प्रावधान है । इसमें शायद कोई प्रगति नहीं हुई । वहीं इन बैंकों में 0 बैलेंस से जॉब कार्ड वाले प्रत्येक मजदूर का बैंक एकाउंट खोलने का प्रावधान होना चाहिए उनको बैंक के माध्यम से रोजगारी मुहया की जानी चाहिए ।
जॉब कार्ड बायोमैट्रिक पद्धति से बनाए जाने चाहिए । इसमें ज्यादा वृद्धि दिखाई नहीं देती । जाली जॉब कार्ड और भ्रष्टाचार के मामले इस योजना के विकास में रोड़ा डालते हैं उनके निर्मूलन के लिए मोनिटरी-विजिलैंस कमिटी गठित की जानी चाहिए और उनको शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए ।
मेरा सुझाव है कि केन्द्र सरकार की हर योजना में जो जनपथ पे कार्यान्वित होती है इसमें उस जनपथ के एमपी को शामिल करना चाहिए ।
मनरेगा की योजना के तहत समानता के और समभाव के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को अधिनियम में ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि उसकी 50 दिन तक के कार्य का अग्रिम भुगतान किया जाए ताकि वह गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त विश्राम कर सके और गर्भावस्था के अंतिम चरणों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत वेतन वृद्धि की संस्तुति की जाना चाहिए और विकलांग लोगों को नियोजन पत्रों के द्वारा रोजगार प्रदान किया जाना चाहिए । ग्रामीण विकास और पंचायत राज्य मंत्री से मैं यह पूछना चाहती हूं कि पीएमजीएसवाई स्कीम के अंतर्गत कनेक्टीविटी को मजबूत करने की बात की गई है उसमें क्या वृद्धि हुई है।
राजीव गांधी सेवा केन्द्र की कल्पना में क्या ठोस नतीजा निकला ।
ब्लॉक या जिला स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र गठन करने की बात के अंतर्गत गरीब आदमी को न्याय दिलाने में राज्यों द्वारा क्या प्रगति हुई ।
सबसे बड़ी प्राथमिकता सैनिटेशन को दी गई जो निर्मल गांव कैमपेन में पीपीपी मोडल पर क्या परिणाम प्राप्त हुआ है ? गरीब आदमी की बीपीएल सूची में सरकार पोप्युलेशन का क्राइटीरया बनाना चाहती है। गरीबों कीHut से Heart तक पहुंचना है तोGood Governers के साथ साथ Great Good Governers ग्रामीण मंत्रालय में लाना पड़ेगा ।
देश में ग्रामीण क्षेत्र को रास्ते से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का प्रारंभ एनडीए सरकार ने 25 दिसम्बर, 2000 से किया था । तब गुजरात में 98 प्रतिशत ग्रामीण इलाके औरउनके सब इलाके को पक्के रास्ते से जोड़ दिया गया था । इसके तहत गुजरात में वर्तमान ग्रामीण इलाके के रास्ते के नेटवर्क की मजबूतीकरण की जरूरत दिखाई देती है । केन्द्र सरकार इस योजना के तहत नए ग्रामीण रास्ते को मिलाने का प्रावधान नहीं देती है । इसी कारण गुजरात में अन्य राज्यों के मुकाबले में बड़ा भारी नुकसान झेलना पड़ता है । इसके बारे में गुजरात सरकार ने 2008 से 15,10,2000 तक अनेक बार पत्राचार किया है लेकिन परिणाम शून्य ही है। गुजरात सरकार की नए रास्ते के बारे में 52.71 करोड़ रू. की दरखस्त को मंजूर करना चाहिए ।
गुजरात सरकार की ओर भी कई दूसरी दरखास्त है (IWMP) समेकित वाटर शेड मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत इसे गुजरात के वन विस्तार से बाहर रखने की जो दरखास्त की है उसके बारे में भी विचार किया जाना चाहिए क्योंकि इससे वाटरशेड कार्यक्रम की प्लानिंग और वाटर शेड नीति को वैज्ञानिक पैटर्न से सुनिश्चित किया जाए । इंदिरा आवास योजना के तहत जो आवास बनाए जा रहे हैं उनकी माल-समान की कीमतों में भारी बढ़ावा हुआ है । इसलिए 45000 युनिट कॉस्ट जिसमें 33750 रू. केन्द्र सरकार का फंड है और 11250 राज्य सरकारों का फंड है और 2001 के भूकंप के बाद नेशनल बिल्डिंग कोर्स रिवाइज किया गया है इसके तहत गुजरात सरकार द्वारा 2002 में बीपीएल आवास भूकंप प्रतिरोधक डिजाइन बिल्डिंग कोड के मुताबिक तैयार करने की योजना बनाई है ।
गुजरात के मुख्यमंत्री मान. नरेन्द्र मोदी ने 20.12.2008 को इंदिरा आवास योजना युनिट कॉस्ट 35,000 से बढ़ाकर 90,000 करने के लिए मान. प्रधानमंत्री जी को पत्राचार किया है । गुजरात सरकार की मांग है कि बीपीएल वाले गरीब भारतीयों को उचित वित्त सहायता नहीं मिल रही है उसके ऊपर पुनः विचार किया जाए । डीआरआई स्कीम के तहत भारतीय रिजर्व बैंक की गाईड लाइन के अनुसार इंदिरा आवास योजना के लाभार्थियों को आवास के निर्माण के लिए 20,000 वार्षिक 4 प्रतिशत कम ऋण दर से आवास लोन के जो प्रावधान हैं वो राज्य सरकार द्वारा कार्यान्वित सरदार आवास योजना के लाभार्थियों को उनका लाभ नहीं मिल पा रहा है । उनको लाभ दिलाने की व्यवस्था की जाए ।
ओश्री महेन्द्र सिंह पी. चौहाण (साबरकांठा) ः आप जानते हैं कि हमारा देश गांवों का देश है । भारत की आत्मा गांवों में बसती है । भारत का विकास तब तक नहीं हो पाएगा, जब तक गांवों का विकास नहीं होगा और गांव की पूरी अर्थव्यवस्था कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर रहती है । आजादी के बाद जिस तरह उद्योगों को महत्व दिया, उसी तर्ज पर कृषि पर ध्यान नहीं दिया गया । मैं उद्योगों के विकास का विरोध नहीं करता लेकिन कृषि एवं गांवों के साथ भी अन्याय नहीं होना चाहिए, जो हुआ है । देश को अगर खुशहाल बनाना है तो गांव को खुशहाल करने की पहली शर्त पूरी करनी होगी । बजट पूर्व जो आर्थिक समीक्षा संसद में पेश की गई उसमें गांव के विकास संबंधी सिर्फ तीन या चार पेज थे जो इस बात को दर्शाता है कि देश के ग्रामीण विकास के कार्यों की समीक्षा को महत्व नहीं दिया गया है । विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र देश को सफल बनाने का रास्ता गांव की गलियों से होकर जाता है ।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी गांव के विकास की है, जो धन केन्द्र सरकार से ग्रामीण विकास मंत्रालय को मिलता है, उसका एक-तिहाई खर्च नहीं करवा पाता है । इसमें कहीं पर राज्यों की सरकारें भी दोषी है । ग्रामीण विकास के लिए जो राशि सरकार ने तय की है, वह विस्तार एवं बस्ती की दृष्टि से देखें तो काफी कम है । मैं उसमें बढ़ोत्तरी की मांग करता हूं ताकि देश का विकास सही मायने में हो सके ।
मेरे संसदीय क्षेत्र सांबरकाठा जिसकी आबादी 25 लाख के आसपास है, जिसमें से 89.29 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और इस जिले के 7390 के भूभाग में 91 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्रों में गांव बसे हैं, पर इन गांवों में बुनियादी सेवा के अभाव में विकास कार्य नहीं हो रहे हैं और न ही यहां के पिछड़े एवं आदिवासी लोगों को सामाजिक एवं आर्थिक विकास हो रहा है । इस जिले में चार तहसील भिलोडा, खेडब्रह्मा, विजयनगर एवं मेधरज आदि आदिवासी क्षेत्र में यहां पर केन्द्र की प्रयोजित योजना सही मायने में पहुंच नहीं रही है ।
मेरे संसदीय क्षेत्र के गांवों में सिंचाई की व्यवस्था बहुत कम है, तीन तहसील, इडर, भोडासा एवं मेधरज डार्क जोन में शामिल किए जाने से परिस्थिति और खराब हो रही है । इन डार्क जोन घोषित इलाकों में छोटे किसानों को सिंचाई के लिए वीज कनेक्शन नहीं दिया जाता, जिसके कारण वो हैरान-परेशान है । गांव छोड़कर शहर के प्रति मजदूरी हेतु जा रहे हैं । परिस्थिति भयावह है । मैं मांग करता हूं कि भारत निर्माण के तहत मेरे संसदीय क्षेत्र में सिंचाई को प्राथमिकता दी जाए ।
* Speech was laid on the Table देश के विकास के बारे में कितने ही आंकड़े दिए जाएं या दावे किए जाए, परंतु असली तस्वीर कुछ और है । देश की गरीबी गांव में बसती है, गांव की आबादी का 42 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है । ग्रामीण गरीबी उन्मूलन के अनेकों कार्यक्रम चलने के बाद भी अमीरी से और गरीबी की आय में अंतर बढ़ रहा है । यह बात देश के जाने-माने अर्थशास्त्री एवं राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री सुरेश तेन्दुलकर ने बताया कि शहर में गरीबी है, परंतु गांव के हिसाब से कम है । शहरी गरीबी 25.7 प्रतिशत जबकि गांव की 41.8 प्रतिशत है । अगर गांव की गरीबी दूर करने के उपाय नहीं उठाए गए तो इसके दुष्परिणाम होंगे ।
देश में सरकार ने अत्यंत पिछड़े इलाकों के विकास के लिए क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए 2007 में 250 जिलों में पिछड़ा क्षेत्र विकास अनुदान योजना (बीआरजीएफ) चलाई है, जिसमें मेरा संसदीय क्षेत्र साबरकांठा भी शामिल है । इस अनुदान हेतु स्थानीय स्तर पर क्षमता पैदा करना पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना है । लेकिन योजना आयोग ने समीक्षा के बाद पाया कि योजना इनकी कारगर नहीं रही और इसमें सांसदों की कोई भूमिका नहीं रखी है । पूरे संसदीय क्षेत्र का जनप्रतिनिधि सांसद होता है, अपने क्षेत्र के विकास के बारे में उसके पास काफी योजनाएं एवं आयोजन होता है लेकिन इस प्रक्रिया में सांसद को शामिल नहीं किया जाता है । मेरी मांग है कि ये केन्द्र सरकार का अनुदान है, तो फिर सांसद को इस प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए ।
मेरे संसदीय क्षेत्र साबरकांठा के जंगलों में आदिवासी घास के छप्पर के घरों में रहते हैं वे कब तक जंगलों में फूल-पत्तियां खाते रहेंगे ? इनके विकास हेतु कोई योजना क्रियान्वित होती है तो भी वन विभाग के जड़ कानूनों की वजह से उनको लाभ नहीं मिल पाता । जंगल विकास के अधकारी, इन आदिवासी लोगों को अपने आवास निर्माण हेतु जरूरी सामान, बिजली का खम्भा एवं पीने के पानी का पाइप भी जंगल में से ले जाने की अनुमति नहीं देते । वन विभाग के जड़ एवं संवेदनहीन रवैये से सब लोग हैरान-परेशान हो रहे हैं । कच्ची सड़क को पक्की सड़क बनाने की परमीशन भी नहीं मिलती । मेरी मांग है कि इन वन विभाग के जड़ कानूनों में सुधार किया जाए और जनजाति के लोगों को सामान्य जीवन जीने के लिए प्राथमिक सुविधाएं दी जाए ।
गांव का बुनियादी ढांचा बदलने से गांव को सुविधा मिलेगी लेकिन साथ में गांव में चेतना का विकास, ज्ञान का विकास भी होना अति आवश्यक है । लोगों की क्रयशक्ति भी बढ़ानी जरूरी है । यानि की गांव के लोगों के जेब में पैसा भी होना अति आवश्यक है । इसके लिए हैंडलूम, कुटीर उद्योग, कृषि आधारित उद्योग, ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । आज भी थोड़े से उद्योग जीवंत हैं जो वर्तमान सरकार की औद्योगिक नीतियों के कारण बंद होने के कगार पर खड़े हैं । क्योंकि इनमें इतनी ताकत नहीं है कि ये बड़े उद्योग एवं मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ प्रतियोगिता में अपना काम काज चालू रख सकें । विदेशी वस्तुओं की भरमार से देश के गांवों में स्थित लघु उद्योग डेढ़ करोड़ की संख्या में बंद हो चुके हैं । लगभग ढाई करोड़ लोग बेरोजगार हो गए हैं । ये लघु उद्योग ग्रामीण उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । ग्रामीण उद्योगों को गति देना ग्रामीण विकास में सहयोग करना है, जो नहीं हो रहा है ।
गांव में जब फसल की बुआई का काम चलता है, तब यूरिया खाद की कमी रहती है । मेरे राज्य गुजरात की बात करूंग तो गुजरात में जुलाई 2011 मं यूरिया खाद की 2,50,000 टन की मांग थी, जबकि मिला केवल 1,48,000 टन यानी 1,02,000 टन कम । अभी भी यूरिया की मांग है । मेरा संसदीय क्षेत्र साबरकांठा जहां पर लोग कृषि एवं पशुपालन पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं । इस जिले में 2.9 हैक्टेयर भूमि पर बुआई के लिए जरूरी यूरिया खाद नहीं मिला । यूरिया आपूर्ति करने वाली एजेंसियां किसानों को कह रही है कि हमारे पास यूरिया खाद नहीं है । तो कहां से यूरिया दें, जबकि दूसरी तरफ भारत सरकार के उर्वरक मंत्री ने 22 जून, 2010 के परिपत्र से सभी सांसदों को बताया कि देश में यूरिया की कोई कमी नहीं है ।
केन्द्र सरकार किसानों एवं सांसदों को गुमराह करती है । देश के कुछ हिस्से में यूरिया की काला बाजारी हो रही है जो किसानों के हित में नहीं है । मेरा सरकार से अनुरोध है कि किसानों को योग्य समय पर यूरिया खाद उपलब्ध कराई जाए ।
साथ में किसानों के लिए नील गाय, सुअरों जैसे जंगली पशु एक समस्या बन गए हैं । मेरे संसदीय क्षेत्र साबरकांठा में गरीब किसानों की खड़ी फसल को बचाने के लिए शीध्र कारगर कदम उठाए जाएं, एवं जिन किसानों को इससे नुकसान हो रहा है उनको समुचित मुआवजा दिया जाए । गांवों में ये जंगली जानवर तैयार फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं । उनके बचाव के लिए पंचायत मंत्रालय एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय को मिलकर तार की बाढ़ लगाने का काम करना चाहिए ।
मैं इन अनुदानों का समर्थन नहीं करता हूं । ये अनुदान भेदभाव के तरीके से तैयार की गई है । इससे गांवों का विकास जिस तरीके से होना चाहिए नहीं हो पाएगा एवं बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने का भी कोई उपाय नहीं सुझाए हैं ।
ओश्री मनसुखभाई डी. वसावा (भरूच) ः ग्रामीण विकास के मुद्दे पर मैं अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं । गांवों और उसमें रहने वालों की समस्याएं इतनी अधिक है कि सभी का उल्लेख करना थोड़े समय में मुश्किल है लेकिन मैं गांवों की मुख्य-मुख्य समस्याओं का उल्लेख करना चाहूंगा जिनके निवारण से उनके जीवन स्तर को संवारने के लिए वर्तमान समय में मरहम का कार्य कर सकती है ः-
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत इच्छुक प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिन की मजदूरी रोजगार प्रदान करने के लिए वित्त मंत्री जी ने 40,000 करोड़ रूपये आबंटित किया है, वह ठीक है लेकिन मजदूरी का भुगतान हर सप्ताह करने की व्यवस्था की जाए और 100 दिन के स्थान पर कम से कम 200 दिन रोजगार प्रदान किया जाए ।
स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में 10,000 करोड़ का आवंटन हुआ है लेकिन लाभार्थियों की संख्या को देखते हुए यह धनराशि बहुत ही कम है इसे और बढ़ाए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है । साथ ही इस योजना के तहत गठित महिला बचत समूह को नःशुल्क भूमि, दुकानें आदि देने से अधिक लोग लाभान्वित हो सकेंगे ।
प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत 20,000 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं । ऐसा लगता है कि इस धनराशि को आवंटित करते समय केवल उन गांवों को ध्यान रखा गया है जो मुख्य सड़कों के पास है लेकिन उन गांवों का ध्यान नहीं रखा गया है जो दूरदराज स्थानों पर बसे हुए हैं और जहां पहुंचने के लिए सड़क को कौन कहे, रास्ता तक नहीं है । इसलिए या तो उन गांवों को प्राथमिकता दी जाए या आवंटित राशि बढ़ाई जाए ताकि उनको भी इसका लाभ मिल सके ।
गांवों में पड़ी बंजरभूमि को उपजाऊ बनाने के लिए कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है । यदि इन बंजरभूमियों को उपजाऊ बनाकर उस गांव के भूमिहीनों को दे दी जाए तो इसका लाभ उनको मिल सकता है ।
भूमि सुधार कानून गरीबों और भूमिहीनों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए ताकि उनको अधिक से अधिक लाभ मिल सके ।
सभी ग्रामीण दूरस्थ एवं जनजातीय इलाकों में जल-मल-व्ययन व्यवस्था के माध्यम से गंदगी दूर किए जाने की योजनाएं प्रारंभ की जानी चाहिए ताकि उनको इसका लाभ मिल सके ।
* Speech was laid on the Table ऐसा देखा गया है कि देश के विभिन्न भागों में भूजल स्तर गिरता जा रहा है और सरकारें उस पर कोई ध्यना नहीं दे रही है इसलिए व्यापक योजनाएं बनाई जाएं ताकि भूजल स्तर को गिरने से रोका जा सके ।
कहने को तो हिंदुस्तान गांवों का देश है लेकिन गांवों को सुविधा प्रदान करने के नाम पर कुछ भी नहीं किया जाता है । आजादी के 60 वर्ष से अधिक समय व्यतीत होने के बावजूद भी आज तक अनेक गांवों में सड़क की बात कौन कहें उन गांवों तक पहुंचने के लिए रास्ता तक नहीं है । उदाहरण के रूप में मैं अपने संसदीय क्षेत्र भरूच (गुजरात) में स्थित गांवों का उल्लेख करना चाहता हूं ः - कंजाल, फुलसर, बेबार, गढ़, कलतर, पांचउमर, गढ़ी, मोहबीसीसा, माथासर, चौपडी, नामगीर, बाणजी, बांड्री, वागउमर, डुमखल, मोहबुन्डी, सरिवार, मोरगडी, अम्बागाम, सुकबाल तथा राजपिपला तालुका (नांदोद) के कमोदिया, उपलाजूनाराज, पांचरबाड़ी, जूनाराज, झरवाणी, बारखाड़ी तथा सागबाडा तालुका भरूच जिले के झगड़िया तालुका के कई ऐसे गांव हैं जिनका विकास अभी तक नहीं हो पाया है । सड़कों का उल्लेख सबसे पहले मैंने इसलिए किया कि जब तक ऐसे गांवों में कोई जाएगा नहीं तब तक उसको उस गांव की समस्या की जानकारी नहीं हो सकती है ।
मेरे विचार और जानकारी के अनुसार जिन समस्याओं से ऐसे गांव जूझ रहे हैं वे निम्नवत् हैं ः-
1. पीने के पानी की समस्याः - इन गांवों में पीने के पानी की कोई व्यवस्था न होने के कारण लोग तालाब व नालों के पानी को पीने के लिए मजबूर हैं जिसका दुष्परिणाम किसी से छिपा नहीं है । इसलिए मैं चाहता हूं कि सरकार पीने के पानी की व्यवस्था अविलंब कराने का कष्ट करें ।
2. बिजली की व्यवस्थाः - सुदूर बसे इन ग्रामों में बिजली की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है । जिसके फलस्वरूप वहां के निवासी अंधेरे में रहने के लिए तो मजबूर हैं ही साथ ही देश के अन्य भागों से भी कटे हुए हैं । देश में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उनको नहीं हो पाती है । इसलिए इन गांवों में बिजली की अविलंब व्यवस्था की जाए ।
3. सिंचाईः - सिंचाई का कोई साधन न होने के कारण वहां के लोग खेती सही ढंग से नहीं कर पाते हैं क्योंकि सरकार चेक डैम और जूथकुआं तथा डीजल इंजन सिंचाई के लिए उपलब्ध कराती है जिससे पूरे वर्ष सिंचाई नहीं हो पाती है । यदि सरकार टय़ूबेल, मध्यम प्रकार के डैम की व्यवस्था कर दे तो पूरे वर्ष सिंचाई संभव हो सकती है । जिस प्रकार देश के वित्तमंत्री जी ने खेती को इन्द्र देवता की कृपा पर छोड़ दिया है उसी प्रकार ये भी ऐसा ही महसूस करते हैं । ऐसी परिस्थिति में उनका जीवन निर्वाह किस प्रकार होता होगा इसे सभी लोग भलीभांति जानते हैं । इसलिए ऐसे गांवों में सिंचाई की अविलंब व्यवस्था की जाए, इन्हें इन्द्र देवता के सहारे पर न छोड़ा जाए क्योंकि बारहों महीने सिंचाई के लिए पानी मिलने से अच्छी उपज होगी वहीं पर बारहों महीने काम मिलने की वजह से गांव से होने वाले पलायन को भी रोका जा सकता है । साथ ही टय़ूबेल की सुविधा होने से ऐसे गांवों में पशुपालन का कार्य भी भली प्रकार हो सकता है और कुछ लोग इस व्यवसाय से अपना जीवन स्तर सुधार सकते हैं ।
4. स्वजलधारा व वास्मा प्रोजक्ट पीने के पानी की योजना इसलिए सफल नहीं हो पा रही है क्योंकि इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार पूरा पैसा नहीं देती है । ऐसे गांव जहां के लोग अपना जीवन निर्वाह ही सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं वे न तो अपना हिस्सा सरकार को दे पा रहे हैं और न ही इस योजना का लाभ उठा पा रहे हैं । अतः मेरा आप से अनुरोध है कि सरकार ऐसे गांवों में उक्त योजना का क्रियान्वयन 100औ फण्ड देकर करे ताकि ऐसे गांव वाले भी इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकें ।
5. चिकित्सा सुविधाः - सुदूर बसे लोगों को चिकित्सा का भी कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। बिजली-पानी और यातायात की सुविधा न होने के कारण ऐसे गांवों में रहने वालों को चिकित्सा सुविधा मिल पाना बड़ा ही मुश्किल है क्योंकि कोई भी चिकित्सक वहां पर रहने के लिए तैयार नहीं होता और वहां के लोग बीमार पड़ने पर केवल भगवान के ही सहारे रहते हैं ।
अतः मेरा आग्रह है कि सरकार ऐसे गांवों में रहने वालों को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए कोई विशेष योजना बनाए ताकि ऐसे गांवों में रहने वालों को भी चिकित्सा सुविधा मिल सके । मेरा सुझाव है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तालुका और जिला स्तर पर जांच केन्द्र युक्त आधुनिक अस्पताल और अच्छे चिकित्सक (विशेषज्ञ) की सुविधा उपलब्ध कराई जाए ।
6. शिक्षाः - सुदूर बसे गांवों में रहने वालों को शिक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके कारण उन लोगों का जीवन स्तर बदत्तर से बदत्तर होता जा रहा है । इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसे सभी गांवों में शिक्षा का प्रचार प्रसार करने हेतु कोई विशेष प्रबंध करे ताकि उन लोगों को भी शिक्षा की सुविधा मिल सके ।
मेरे विचार से यदि सरकार ऐसे सुदूर बसे गांवों का जो उक्त समस्याओं से जूझ रहे हैं । उनका सर्वे कराकर उनके लिए विशेष पैकेज देकर उन गांवों का विकास सुनिश्चित करे तभी ऐसे गांवों का विकास संभव हो सकता है । इसलिए मेरी सरकार से मांग है कि ऐसे गांवों का सर्वे कराकर और उनको विशेष पैकेज देकर उन गांवों का विकास करे ताकि ऐसे गांव भी देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें ।
उक्त समस्याओं एवं उनके निवारण के संबंध में मेरे विचारों एवं सुझावों पर सरकार गंभीरतापूर्वक विचार करेगी एवं उनको क्रियान्वित करने का प्रयास करेगी, ऐसी आशा एवं विश्वास के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं ।
श्री जगदीश शर्मा (जहानाबाद):सभापति महोदया, आज ग्रामीण विकास विभाग की डिमांड्स पेश की गयी हैं। जब तक गांव का विकास नहीं होगा, तब तक देश के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। ग्रामीण विकास विभाग आज इस देश और प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण महकमा है। माननीय मंत्री जी एक राज्य के मुख्य मंत्री भी रह चुके हैं और देश के जाने-माने नेता हैं। लेकिन इनके विभाग के जो कार्यक्रम हैं, ग्रामीण विकास विभाग अकेला एक विभाग नहीं है, बल्कि इस विभाग में तीन बड़े घटक हैं। एक, ग्रामीण विकास विभाग, दूसरा पेयजल डिपार्टमैंट, तीसरा भूमि संसाधन विभाग और चौथा पंचायती राज विभाग है।
महोदया, मैं ग्रामीण इलाके से आता हूं। बिहार राज्य का जहानाबाद जिला एक महत्वपूर्ण जिला है, नक्सल प्रभावित जिला है। एक सांसद के नाते हम जो व्यावाहारिक कठिनाइयां जनता के बीच झेलते हैं, उसका अनुभव मैं आपके माध्यम से मंत्री जी के साथ बांटना चाहता हूं। एक बहुत बढ़िया योजना चली। गांव की तरक्की, गांव का विकास में जो सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, वह सड़कों का निर्माण है। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) चली, उसमें कुछ काम भी हुए। लेकिन खासकर बिहार में जो मौजूदा स्थिति है, मेरी जानकारी के मुताबिक दो साल से बिहार की कोई नयी योजना स्वीकृत नहीं हुई। डीपीआर सरकार के पास पड़े हुए हैं, लेकिन दो साल से एक भी योजना स्वीकृत नहीं हुए हैं। यूपीए वन की जो सरकार थी, उसमें डॉ. रघुवंश बाबू मंत्री थे। एक एमपी इनके पास जाता था, मैं उस समय एमएलए था और दूसरे दल का था, लेकिन जब-जब मैं सड़क के निर्माण की सूची लेकर इनके पास गया, सीधे मंत्री के आफिस से सड़क की स्वीकृत हो गयी, पैसा चला गया और सड़कों का निर्माण हो गया।
सभापति महोदया, हम आज मंत्री महोदय से आग्रह करना चाहते हैं कि एमपी वोट लेने के बाद जब गांव में जाते हैं, तो उनसे लोग डिमांड करते हैं कि आप सड़क बनाइये। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में हम मंत्री जी से निवेदन करना चाहते हैं कि यूपीए टू में आप सांसदों की अनुशंसा पर सीधे सड़क की स्वीकृति यहां से करके राज्य सरकार को पैसा भेजिये। उसके बाद कार्यान्वयन वहां से होगा।...( व्यवधान)
महोदया, प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत जिन सड़कों का निर्माण हो रहा है, उनमें दो एजेंसियां काम कर रही हैं। एक केन्द्रीय एजेंसियां हैं और दूसरा राज्य सरकार की एजेंसियां हैं। बिहार में इनकी जो केन्द्रीय एजेंसियां हैं, वे लगातार पांच-छः वर्षों से काम कर रही हैं चाहे एनबीसीसी हो, इरकॉन हो, एनपीसीसी हो, सीपीडब्ल्यूडी हो। अनेक एजेंसियां काम कर रही हैं महोदया, एक एजेंसी है, जिसे समय पर पैसा मिला। लेकिन केन्द्रीय एजेंसी पर मेरा आरोप है कि वह बिहार के साथ भेदभाव करके एक काम को भी कम्पलीट नहीं कर रही है। उनके दर बढ़ते जा रहे हैं, ऐस्टीमेट रिवाइज होते जा रहे हैं। हम मंत्री महोदय से आग्रह करना चाहते हैं कि जब वे उत्तर दें, तो हम जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे कि आखिर क्या वजह है कि केन्द्रीय एजेंसियों को पैसा मिला, अधूरे निर्माण के काम चल रहे है, मैंने स्टैंडिंग कमेटी में इस मामले को उठाया था।
मैं धन्यवाद देना चाहता हूं इस विभाग के सेक्रेटरी को, उन्होंने कहा कि हम इसकी जांच कराएंगे। मैं मंत्री महोदय से कहना चाहता हूं कि बिहार के सभी जिलो में, खास तौर से जिस जिले से मैं आता हूं, केन्द्रीय एजेंसियां बिल्कुल सुस्त ढंग से काम कर रही हैं, जैसे लगता है कि काम ही नहीं करना है। मैं आपसे आग्रह करना चाहता हूं कि जो एजेंसी फेल्योर हो रहा है, उसकी जांच कराइए और नीचे से लेकर ऊपर तक, अगर उसका कोई सीएमडी है और जरूरत पड़े, तो उन पर भी एफआईआर कीजिए जिससे उनमें मुस्तैदी आए।...( व्यवधान)
श्री शरद यादव (मधेपुरा):वहां पर भारत सरकार की सारी एजेंसियों ने काम लिया है, यह विशेष परिस्थिति में हो गया, जिस तरह से एस्केलेशन हुआ है, महंगाई बढ़ी है, दाम बढ़े हैं, इसमें सेंट्रल एजेंसीज की कोई गलती नहीं है, लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय से उनको पैसा नहीं मिल रहा है। राज्य सरकार उनको अपनी सड़कों के लिए पैसा दे रही है, लेकिन भारत सरकार की तरफ से, आपके विभाग की तरफ से पैसा नहीं जा रहा है। उसमें यह बहुत बड़ी दिक्कत आ रही है।
सभापति महोदया : शर्मा जी, आपकी पार्टी की तरफ से दो और सदस्यों को बोलना है, इसलिए आप वाइण्ड-अप कीजिए।
श्री जगदीश शर्मा : महोदया, मैं गांव से आता हूं। मैं अपनी बात अभी शुरू ही की है। मुझे आपका संरक्षण चाहिए।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : फिर आपकी पार्टी के अन्य सदस्य नहीं बोल पाएंगे।
…( व्यवधान)
श्री जगदीश शर्मा : महोदया, जो एनबीसीसी है, हमारे माननीय सदस्य श्री राजीव रंजन जी ने लिखा।...( व्यवधान) मैं आपकी मदद कर रहा हूं। हम एमपी लोग जो भोगते हैं, वही व्यथा यहां कह रहे हैं।...( व्यवधान) आपने एमपी की अध्यक्षता में निगरानी एवं मॉनीटरिंग कमेटी बनायी है। हमारे यहां एक सांप होता है - डोड़वा सांप, यह कमेटी उसी की तरह है। ड़ोड़वा सांप चाहे जितना काट ले, विष चढ़ने का सवाल ही नहीं होता है। यह कमेटी आपने बनाई है, लेकिन क्या उसको अधिकार दिए हैं? यह अगर किसी केस में कुछ रिकमेंड भी करती है, तो क्या उस पर कोई कार्रवाई होती है? पूरे देश में देख लीजिए, मेरी चुनौती है कि जब से यह कमेटी बनी है, इसकी रिकमेंडेशन पर एक के खिलाफ भी कोई कार्रवाई हुई हो, तो मैं आपसे माफी मांग लूंगा। क्यों बनाया है इसको? हम क्षेत्र में जाकर क्यों मीटिंग करें अगर हमें कोई अधिकार नहीं दिया? जब इसको बनाया है, तो इसे गेहुंअन सांप बनाइए, ड़ोड़वा सांप बनाकर मत रखिए। ...( व्यवधान) हमारे माननीय सांसद श्री राजीव रंजन सिंह जी ने ने मंत्री जी को पत्र लिखा कि एजेंसी काम नहीं कर रही है, डेढ़ महीने हो गए, इनको कोई एकनॉलेजमेंट भी नहीं मिली। यह स्थिति सभी के साथ है। आपने कहा कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में वर्ष 2009 तक 500 तक की आबादी वाले गांवों को बारहमासी सड़कों से जोड़ देंगे। इस लक्ष्य को बढ़ाकर वर्ष 2012 तक कर दिया गया, लेकिन जो रफ्तार है, उससे लगता कि अगले कई वर्षों तक यह काम होने वाला नहीं है। उग्रवाद प्रभावित इलाके के लिए आपने रिलैक्स किया है कि 500 तक की आबादी वाले जो गांव हैं, जो उग्रवाद प्रभावित है, एलडब्ल्यूई में, वहां बारहमासी सड़क बनाएंगे और 75 मीटर तक पुल बनाएंगे। लेकिन जो मेरी जानकारी है, इस संबंध में अब तक कोई गाइडलाइन भारत सरकार से बिहार सरकार को नहीं भेजी गयी है। जब आप राज्य सरकार को गाइडलाइन नहीं भेजेंगे, तो कैसे उस पर वह काम करेगी? मैं आग्रह करना चाहता हूं कि जो नक्सल प्रभावित इलाके हैं, वहां के लिए आपने स्पेशल स्कीम्स बनाई हैं एलडब्ल्यू में, वामपंथ उग्रवाद में, उनके लिए डायरेक्शन राज्य सरकार को भेजिए कि उनको क्या करना है। आपने बहुत जगहों पर सड़कें बनाई हैं, पुल बनाए ही नहीं है। उसका क्या मतलब है उसको बनाने का?...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप एक मिनट में अपनी बात समाप्त कीजिए।
श्री जगदीश शर्मा : महोदया, आपने जब सड़क बनाना स्वीकृत किया, लेकिन पुल नहीं बनाया, तो वह उस पूरे पैसे का दुरूपयोग है।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : पार्टी के अनुसार समय दिया जाता है, जिससे अन्य लोगों को भी बोलने दें।
श्री जगदीश शर्मा : आपने जो सड़क स्वीकृत की है, जहां जरूरत हो, वहां अविलंब पुल बनाइए।...( व्यवधान)
बिना पुल के सड़क नहीं बननी चाहिए और मेरा तो यह सुझाव है कि जहां सड़क बननी है, पहले पुल बनाएं, फिर सड़क बनाई जाए, जिससे सड़की उपलब्धता हो सके।
सभापति महोदया, मैं एक बात और कहना चाहता हूं। केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ भेदभाव होता है, खासकर हमारे प्रदेश की सरकार के साथ तो काफी होता है। वहां पर काम करने वाले कई लोग हैं, काम भी कई जगह हो रहा है, लेकिन पूरा पैसा नहीं मिलने के कारण कई काम अधूरे पड़े हैं। इस तरह के जो अधूरे काम हैं, वे पूरा नहीं होने के कारण खत्म होते जा रहे हैं।
सभापति महोदया : जगदीश शर्मा जी, अब आप अपनी बात समाप्त करें, क्योंकि आपकी पार्टी से अभी दो और सदस्यों ने बोलना है। कृपया एक मिनट में अपनी बात कहकर समाप्त करें, नहीं तो आपकी बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।
श्री जगदीश शर्मा : केन्द्र सरकार ने 80 साल से ऊपर की आयु वाले लोगों को पेंशन के रूप में 500 रुपए प्रति माह देने की बात कही है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि 80 साल और उससे ऊपर का कोई व्यक्ति पेंशन के लिए मिलेगा भी नहीं, इसलिए जो गरीब हैं, वास्तविक हकदार हैं, उन सभी को आप 500 रुपए प्रति माह पेंशन देने का प्रावधान करें।
मनरेगा में जो हो रहा है, आप भी जानती हैं, सब जानते हैं। यह एक लेबर ओरिएंटेड स्कीम है। मेरा इस सम्बन्ध में सुझाव है कि अगर आपको पैसा देना है तो राज्य सरकार को साल भर का पैसा एकमुश्त दे दें। इसके अलावा इस योजना में जो गड़बड़ी होती है, उसकी व्यापक जांच कराई जानी चाहिए।
*SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM):
I express my views in favour of the demands for grants of the Ministry of Rural Ministry which is currently being considered.
There are three points I would like to place before this august House.
All rural development programs that are done currently for the mountain states like Sikkim, Himachal Pradesh, Arunachal Pradesh and Uttarakhand should be designed with the mountain specificities in view. We do now have a lot of experience in the States and we can share the state inspired programs which factor in this. It is impossible to connect the regular programs in an effective way to the people of our rural areas as they do not take into consideration simple issues. Mountain people have livelihoods which have been highly sustainable over centuries. We need to be able to draw from the host of traditional knowledge that already exists. This I think should be done during the 12th Plan and I would urge the Minister to kindly take note right now so that it is incorporated in letter and spirit.
The second point is related to rural livelihoods. This to my mind is the most important of all the aspects of rural development. If we are able to provide livelihoods then we will be able to sustain not only our economic growth but also bring about food and other securities that we talk so much about whilst formulating our public policy interventions. Even though schemes like the SGSY and MGNREGA are supposed to generate livelihoods it is very typical that such schemes do not find many takers. I again allude to the first point that I have made. However, it is important that the MGNREGA scheme be made in such a manner that we are able to modify some of the schemes to make it more beneficial in terms of overall economic effectiveness for the people of the rural areas. For instance we should be able to do modify some of the schemes to make it more beneficial in terms of overall economic effectiveness for the people of the rural areas. For instance we should be able to do terracing of village land. This will bring more farmland under food cultivation. We should be able to link it up with other such like programs to be able to harness the labour content. Some innovation that can be done on the ground ought to be allowed and in fact encouraged. SGSY should be allowed to flourish in a way that led to many of the Micro Finance Organizations take advantage for private gain. This is eminently possible.
The third point that I would like to make is that as MPs we cannot be made to monitor the rural development programmes. It is not our role. We can offer valuable guidance when program formulation is being done or even in the State Level Committees for planning. However, the task of making us Chairpersons of the District Level Vigilance Committee is really the task of the Executive. We are Legislators and have to be able to carry out that work properly even though some may argue that it may lead to more reasoned debate. However, I am of the view that we cannot and should not get involved in matters of the Executive. So this burden should be removed from us as soon as possible.
In this I do agree with some of the members who have spoken before me that we need to cut down on the number of schemes that have proliferated over the years. The intentions are definitely right and not misplaced. However, what is obtained today is a lot of overlap and this leads to confusion, inefficiency and responsibility diffusion. Furthermore there is massive creation of bureaucratic machinery both at the Centre and the State Governments. This must be checked and reform of the implementation process is definitely in order.
With these words I commend that the demands for grants under consideration be passed.
SHRI R. THAMARAISELVAN (DHARMAPURI): Madam Chairman thank you very much for giving me the opportunity to speak on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development for 2011-12. Though we are making great strides in various fields like IT, still our soul lies in the rural areas. The UPA Government is giving utmost importance to the Ministry of Rural Development. This, in one way, shows the importance it gives to the development of rural areas.
Here I would like to quote Darling’s statement which was made in 1925 –“The Indian peasant is born in debt, lives in debt and bequeaths debt.” I think, even after 60 years of our Independence, this situation still exists. We need to ponder over this. In spite of vast development, around 70 per cent of people still live in the villages. Hence, arises the importance of addressing the issues involving rural areas of the country.
Being the nodal Ministry, Ministry of Rural Development has the onerous responsibility to bring in development in the rural areas by implementing developmental and welfare activities in the villages of our country. There cannot be two opinions on this.
Madam, important schemes of the Ministry of Rural Development, viz., Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme (MGNREGA), which is meant to provide employment in the rural areas and Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana is aimed at providing rural infrastructure. Such major schemes are aimed at bringing in much needed improvement in the lives of the people living in the rural areas.
Sometime back, the hon. Prime Minister has remarked that State Governments should redouble their efforts towards drought relief. Of course, drought is the major concern of any Government. Drought is a permanent fixture in the Indian economy. The Government has to address it innovatively, to ensure that allocation of funds under MGNREGA takes into account the yearly drought and accordingly help the farmers to cope up with the harsh situations during this hour of need.
In the first place, Sir, I would like to raise the issue of employment scheme.
In this Budget, huge amounts have been allocated for the implementation of various schemes.
17.00 hrs (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair) For example, the total allocation for the Rashtriya Krishna Vikas Yojana has been increased from Rs. 6,750 crore in 2010-11 to Rs. 7,860 crore in 2011-12. Likewise, the credit flow to the farms has been raised from Rs. 3.75,000 crore in 2010-11 to Rs. 4,75,000 crore in 2011-12. This would be of much help for the agricultural sector which has been witnessing droughts and floods almost every year.
Another redeeming feature of this year’s General Budget is that banks have been asked to step up direct lending for agriculture and credit to small and marginal farmers. Here, I would like to urge the Central Government to monitor as to whether this is being implemented by banks in letter and spirit to ensure that small and marginal farmers reap the benefits. There is no doubt that many schemes of the UPA II Government are aimed at rural population, in general, and for agriculture sector, in particular.
Here, I would like to strongly urge the Central Government to look into the schemes of the Government of Tamil Nadu which are benefiting the farmers of Tamil Nadu immensely and try to replicate them at the Centre so that farmers across the country reap the benefits which are, at present, being availed by the Tamil Nadu farmers under the able DMK Government.
It is pertinent to point out here that DMK Government has been awarded the topmost State in its overall performance by CNN-IBN Television Channel for 2010. It is, by no means, a mean achievement. This shows the concern of the DMK Government and our leader, Dr. Kalaignar towards the poor and the downtrodden. Many welfare schemes are being implemented in the last five years which has drawn the attention of the whole country. The people in Tamil Nadu are happy with the performance and the implementation of various welfare schemes of the DMK Government. This award by the CNN-IBN Television Channel is a testimony of its achievements in the last five years. We have taken a resolve to continue such schemes in future too.
Sir, the amount allocated under the Swarna Jayanti Rozgar Yojana should be increased. The amount for providing employment is not enough when we take into account the widespread unemployment in rural areas.
Regarding provision of sanitation facilities in rural areas under the Rural Sanitation Campaign, I would request that more and more toilets should be constructed. I would like to strongly urge the Government to allocate more funds for the implementation of this Campaign.
Here, I would like to proudly say that under the DMK regime, we could not find any farmer committing suicide because of the several developmental schemes being implemented by the DMK Government under the Chief Ministership of Dr. Kalaignar. Farmers, ‘the food providers to the country’, should be extended all the help so that their pain is reduced and they do not fall into debt trap.
Sir, banking in rural India is faced with the twin challenges of regulation and distribution. Regulation with respect to banking has been designed for delivery in urban India and distribution requires more manpower to be deployed in rural areas. About 500 to 600 million people in India still do not have bank accounts. For the rural segment, one needs to design no-frills products and deliver hard core value. Power, telecommunication, banking and transportation need to be strengthened more in rural areas to reduce the urban-rural divide.
Here, I would like to suggest to the Ministry of Rural Development that banks should make the terms and conditions simple so as to enable the farmers to get loans without any difficulty. Due to stringent formalities followed by banks, farmers are keeping away from banks and going after the money lenders who take advantage of their ignorance and cheat them by charging high rate of interest.
Sir, the hon. Minister may be aware that Tamil Nadu is encountering almost every year, either heavy rains or floods in some parts of the State or drought. Hence, farmers have become totally helpless and are living in a very miserable condition in spite of the assistance being extended by the State Government.
By undertaking an in-depth study of the districts in Tamil Nadu, the UPA Government should pinpoint districts which are backward and the same should be included in the Backward Area Development Scheme so that farmers in these districts would be immensely benefited. The Central Government could help these districts which are funds-starved and thereby save the lives of farmers living in these districts.
Sir, basic amenities like drinking water, electricity, health care, education, transport, communication etc. are still a far cry. If we want to become a developed country, we should take along rural areas of the country and we should ensure that basic amenities are provided to the whopping 70 per cent of our rural population. There is no doubt that the UPA II Government is striving hard to achieve this arduous goal. It has succeeded to a large extent, but much needs to be desired.
SHRI PULIN BIHARI BASKE (JHARGRAM): Thank you, Mr. Chairman, Sir for giving me chance to take part in the discussion on the Demands for Grants for 2011-12 under the control of the Ministry of Rural Development.
Sir, although the total budget for the Department of Rural Development shows an increase from Rs.66,000 crore in 2010-11 to Rs.76,000 crore in 2011-12 Revised Estimates, this time the allocation has been brought down to Rs.74,144 crore in 2011-12.
About 70 per cent of the total population is living in the rural areas. Mostly they are poor and they do not have basic amenities. Instead of being increased budgetary allocation of rural development, the Government has desperately decreased the budgetary allocation.
The Government policy should be changed in this regard and more allocation should be given to the most backward areas, underdeveloped areas and tribal dominated areas. We believe that if we can develop the rural areas, our country will develop.
As far as MNREGA is concerned, the initiation of the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme has been one of the most significant interventions made by the UPA Government. The budget this year saw some significant development with regard to this scheme. In pursuance of last year’s budget announcement to provide a real wage of Rs.100 per day, the hon. Finance Minister announced the Government’s decision to index the wage rates notified under the MNREGA to the Consumer Price Index for agricultural labour. However, the outlay for MNREGA has been restricted to Rs.40,000 crore in 2011-12; it was Rs.40,100 crore in 2010-11 and same amount has been allocated in 2010-11 Revised Estimates.
Sir, I would like to say that the actual budget allocation should be more; this is demand base scheme, so more people are demanding the jobs. The Government has not been able to ensure Rs.100 as daily wage per household. After four years of implementation the average stands at Rs.89 per day. In terms of providing employment, the average person days has not exceeded 48 days in 2008-09 per household, while only 14 per cent of job seekers have received the promised 100 days of employment. There is a need to bring more transparency and proper accountability in implementation of MNREGA.
Regarding the Indira Awas Yojana, the allocation has been reduced from Rs.10,267 crore in 2010-11 to Rs.9,896 crore in 2011-12. The unit cost for construction of housing under the Indira Awas Yojana should be enhanced as per the existing cost of material and construction. More houses need to be constructed in backward and tribal areas.
As far as SGSY is concerned, the same amount has been allocated in 2010-11. The hon. Minister should pay more attention for low credit mobilization. In rural areas, there are no bank facilities for the SGSY groups.
Regarding the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana, the outlay has been reduced from Rs.22,000 crore in 2010-11 to Rs.20,000 crore in 2011-12. It is evident from the reply of the Ministry that in and around 7,700 kms. of area, 8,045 habitations have still not been connected. Last year, the achievement was not satisfactory. There is an urgent need to closely monitor the maintenance of PMGSY roads during the period of contract. There is also a need to cover the areas with population of 100 and above in rural regions, most backward areas and tribal dominated areas by roads on priority basis under the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana.
Regarding RIDF and BRGF, allotment has been increased but in this regard, proper implementation is required. Regional imbalance and backwardness should be removed.
Regarding National Rural Drinking Water Programme, there has been a slight increase in the budgetary allotment. But, a lot of attention should be given to the fact that underground water level is going down continuously. The problem will become more acute, unless we take appropriate measures. I am from West Bengal. In West Bengal, in the last two consecutive years, there was no rainfall. The State Government had announced drought but no relief and compensation have been given from the Central Government. Thousands of people of drought prone areas are in acute crisis due to shortage of drinking water especially in Purulia, Bankura and West Midnapore districts. So I would urge upon the Ministry of Rural Development, Government of India to provide adequate fund to save the lives of the people.
There is an urgent need of comprehensive land reforms in the country as we have done in West Bengal and as other States like Tripura, Kerala also have done, keeping in view the interest of landless and poor people including Scheduled Castes, Scheduled Tribes and minorities.
The BPL List is one of the most important and key instrument regarding poverty alleviation programmes in the rural areas. The BPL census is being conducted after every five years by the Ministry of Rural Development. It was conducted during 1997, 2002 and it was supposed to be conducted in 2007. The Ministry of Rural Development has earmarked Rs. 162 for conducting BPL census for the 11th Plan.
The Department of Rural Development formulates the methodology and guidelines for identification of BPL households living in rural areas. But, unfortunately, Sir, even after 62 years of independence, we could not do it properly. A number of Committees have been formed like Arjun Sengupta Committee which says there are 77 per cent BPL people; Tendulkar Committee says there are 37 per cent BPL; Dr. N.C. Saxena Committee says there are 50 per cent BPL people and so on. We demand that the BPL list should be more authentic, realistic and genuine which will help to uplift the households.
Several issues relating to budgetary provisioning and governance reforms, for strengthening rural development programmes, need to be addressed by the Government. During its last tenure, the UPA Government had stepped up the provisioning of resources for various rural development schemes but this has dwindled in the subsequent years.
Various reasons have been identified for poor implementation of rural development schemes and programmes which include inadequate devolution of powers and functions to PRIs, besides an acute shortage of trained staff mostly at the level of PRIs. No significant provision has been made to strengthen PRIs through financial devolution.
Meetings of the Vigilance and Monitoring Committees have not been held on regular basis. It should be held in a regular manner to monitor the schemes and to find out as to whether the schemes are being implemented as per the guidelines or not.
ओश्री दत्ता मेघे (वर्धा):केन्द्र सरकार द्वारा पुरस्कृत प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत पूरे देश में सड़क निर्माण का अच्छा काम हो रहा है । इसके लिए मैं आपको और केन्द्र सरकार को बधाई देता हूं । लेकिन मेरे वर्धा निर्वाचन क्षेत्र के हालत कुछ अलग दिख रहे हैं । मैं सांसद होने के नाते वर्धा जिले में हो रहे प्रधानमंत्री ग्रामसड़क योजना की देखरेख समिति का अध्यक्ष भी हूं । पिछले माह में मैंने संबंधित विभाग के अधिकारी और पत्रकारों के साथ इन कामों का दौरा किया । इस दौरे में उजागर हुए तथ्य आपके सामने लाना चाहता हूं ।
कवठा-रसुलाबाद-बाभुलगाव (त.देवली) इस रास्ते की लम्बाई 15.600 किमी. है । इस रास्ते का काम कहां से शुरू हुआ है और कहां समाप्त हुआ इसकी कुछ जानकारी नहीं है । इस रस्ते के निर्माण पर 4 करोड़ 76 लाख रूपयों की लागत लगी है । देवली तहसील के पुलगाव से कांदेगाव रास्ते का 10.25 किमी. का निर्माण करना था । इस काम के बारे में कुछ जानकारी नहीं । हिंगणघाट से बोपापूर तक 15.840 किमी. रास्ता इतना खराब है कि वाहन चलाना भी मुश्किल है । इस काम पर 4 करोड़ 75 लाख रूपयों की लागत लगी है ।
इसी तरह समुद्रपूर तहसील में हुए कामों की स्थिति है । इस तहसील के नेंशनल हाइवे 07 के खंडाला पूल का बांधकाम और दसोडा से सिल्ली रास्ते के कामों में बहुत खामियां हैं । वर्धा जिले में इस योजना के अंतर्गत 100 करोड़ रूपयों के काम हुए हैं । लेकिन ये सब काम कागजों पर ही दिखते हैं । वास्तव में सिर्फ 50 करोड़ के ही काम होने की आशंका है । इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद रास्तों की हालात ठीक नहीं है । इसका मतलब साफ है कि इन कामों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है । इस भ्रष्टाचार में सड़क बनाने वाले ठेकेदार, स्थानिक अधिकारी शामिल है और उन्हें जिले के एक नेता का संरक्षण होने की बात खुलकर बोली जाती है ।
मेरा आपसे अनुरोध है कि वर्धा जिले में हुए पंत प्रधान ग्राम सड़क योजनाओं के कामों की उच्चस्तरीय जांच की जाए और जांच पाए दोषियों पर कार्यवाही करें ।
कृपया इस संबंध में की गई कारवाई से मुझे अवगत कराए । ऐसा मेरा आपसे अनुरोध है ।
* Speech was laid on the Table ओश्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): मैडम स्पीकर, मैं आर.डी. की अनुदान मांगों की चर्चा के संबंध में निम्नांकित सुझाव प्रस्तुत करना चाहता हूं।
1. IAY में अग्निपीड़ितों के लिए 2औ टोटल टारगेट में किया जाये। पूर्व में ऐसा प्रावधान रहा है।
2. IAY में रेगिस्तानी इलाकों में भी एन.ई. व पहाड़ी क्षेत्रों की भांति राशि देय होनी चाहिये।
3. मा. नरेगा में कृषि भूमि विकास हेतु सभी किसानों को सीधा अधिकृत किया जाये। मॉनिटरिंग के लिए किसानों की अपेक्स बॉडी को जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए।
4. मा. नरेगा में पक्के निर्माण में 60 + 40 के अनुपात में भी शिथिलता की जानी चाहिये ताकि आधारभूत संरचना के निर्माण में ज्यादा कार्य स्थाई रूप से संभव हो सके।
5. राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में केन्द्र राज्य सहभागिता का अनुपात आर.डी. की सभी योजनाओं में एन.ई. व पहाड़ी क्षेत्रों की भांति रखा जाये।
6. बी पी एल की लिस्ट में संशोधन करने का अधिकार डीएम/एसडीएम ऑफ द डिस्ट्रिक्ट को है लेकिन समय सीमा निर्धारित नहीं है। अतः समय सीमा निर्धारित की जाये।
7. पी एम जी एस वाई में मिसिंग लिंक व डिस्ट्रिक्ट क्रासिंग रोड़ के लिए मापदंडों में शिथिलता दी जाये।
8. मा. नरेगा में सोशल ऑडिट की जगह ऑडिट की अन्य वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करना चाहिए ताकि व्यर्थ में राशि न जावे व वित्तीय दुरूपयोग पर भी रोक लग सके।
9. मा. नरेगा में बैक एकांउट से राशि देने का प्रावधान है लेकिन बैंक एकांउट खोलने की टोल फ्री की व्यवस्था होने के बाद भी राष्ट्रीयकृत बैंक एकाउंट खोलने में अभी भी हिचकिचाते हैं। अतः स्ट्रॉग गाइड लाइन्स बैंकों को जारी होनी चाहिए ताकि मजदूरों को समय पर भुगतान संभव हो सके।
10. मा. नरेगा में संविदा पर टेक्निकल स्टाफ की नियुक्ति की जाती है जो ठीक नहीं, ऐसा स्टाफ स्थाई होना चाहिए एवं घपला करने पर पैसा उसको स्थाई रूप से उपलब्ध गारंटी की राशि से होना चाहिए।
* Speech was laid on the Table SHRI RUDRAMADHAB RAY (KANDHAMAL): Thank you, Mr. Chairman, Sir, for giving me an opportunity to take part in the discussion on the Demands for Grants under the control of the Ministry of Rural Development.
India is a country of villages. Nearly 80 per cent of the people live in villages and this Ministry nourishes and attends to the basic needs of the villages. Therefore, this Department has got a great importance.
Sir, the basic needs of the villages of our country are drinking water, sanitation, health and also communication. Sir, we utterly failed in our sanitation programme. Our achievement under TSC is very less. In most of the States like Orissa, Bihar, our achievement is less than 50 per cent. The WHO/UNICEF Report on India on open defection is 69 per cent whereas the Government of India claims that our achievement is more than 65 per cent. So, this is the deviation. The Standing Committee on Rural Development has noted this and asked the Government to institute an independent body to undertake this survey and find out the actual fact of the deviation.
Similarly, on drinking water, we are yet to give safe drinking water to all habitants, especially to adhivasis, tribals and scheduled castes. In hamlets, we are not able to supply drinking water. The physical progress in drinking water as per the Budget provision is very low. The Standing Committee has also observed that the progress is very low. I can give you three years’ figures. In 2007-08, as against the target of 49,653 habitations, our achievement was 18,757 habitations. In 2008-09, as against the target of 49,402 habitations, our achievement was 21,531 habitations. In 2009-10, till December, as against the target of 34,595 habitations, our achievement was only 11,962 habitations. So, it shows as to how we are progressing.
The Department must give more attention at least on these two subjects – sanitation and drinking water – so that we can achieve our targets.
Mr. Chairman, Sir, you will be astonished to see that in all these things, all the allotments were exhausted but the progress was very less. I would request the hon. Minister to find out the truth, how allotment was exhausted but the physical target is less. The cause must be found out.
Sir, I can say that Orissa is a backward State, and it is a naxal-prone State. PMGSY is meant to give connectivity to unconnected villages having 1000 population in urban area and 500 population in rural area, adhivasi areas. In the scheduled areas, it comes to 500 population and 200 population. Also in the naxal-prone areas, this is also relaxed.
In Orissa, there are 15 districts declared by the Government as ‘left wing- Extremist affected districts’, where left wing activities are there. Therefore, the Government of India is sanctioning special funds under the Integrated Action Plan to 15 districts of Orissa. So, I would urge upon the hon. Minister that these 15 districts which are accepted by the Home Department as left wing extremist-affected areas must also be taken up in that category.
Similarly, 60 number of bridge proposals are lying with the Ministry for sanction. The cost for these proposals comes to Rs. 165 crore. All the DPRs have been submitted since two years. The Empowered Committee also accepted them and got them through.
But the Ministry has not sanctioned these projects. Similar is the case of 120 roads. Although the Empowered Committee has recommended them but they have not been sanctioned yet. Therefore, I would urge upon the hon. Minister to kindly clear these projects immediately. The people of Orissa would be very much thankful to you for this.
Sir, during 2009-10 and 2010-11, not a single paisa has been released to the State Government of Orissa although it has submitted the DPRs. All the projects have been received by the Government of India but not a single project has been sanctioned and no money has been released. Therefore, I would urge upon the hon. Minister to please sanction and clear all these projects so that we can construct some roads in the Naxal Bone areas and the tribal pockets of Orissa.
Sir, I would cite an example from the reply of the hon. Minister: “In Orissa, there are 18,000 habitants, which are to be connected under the PMGSY.” But till December 30th, the number of habitants connected are only 5,423. The proposal cleared are 3,305. There are 9,403 habitants to be completed yet. If you are not clearing the projects to a poor State like Orissa for the last two years, how would the people of Orissa tolerate it? How would we function?
MR. CHAIRMAN : Hon. Member, please conclude now.
SHRI RUDRAMADHAB RAY : Sir, within two minutes, I am going to conclude.
In the BRGF, 19 districts have been covered. There are seven districts, for which the second installment of 2010-11 has not been released. Similarly, there are nine districts, for which the balance amounts have not been cleared. I would, therefore, urge upon the hon. Minister to kindly release all the funds for the years 2009-10 and 2010-11.
Sir, in the IAY, the Government has released an additional allocation for 25,000 houses in the five Naxal affected districts. I am very much thankful to him for this. But there are 15 Left Wing extremists affected districts. I should tell upon the hon. Minister to kindly consider it and give additional allotment to Orissa so that the Naxal prone areas are covered. The people of Orissa would be benefitted by this.
With these words, I conclude.
ओश्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): मैं ग्राम्य विकास मंत्री द्वारा प्रस्तुत 2011-12 के लिए बजट का समर्थन करता हूं। भारत के कांग्रेस एवं यूपीए सरकार की ग्राम्य विकास नीतियों के कारण ही जब देश एवं दुनिया वैश्विक मंदी से गुजर रहा था उस समय भी भारत ने अपना विकास द्वारा 8.6औ की वृद्धि होने के लिए ग्राम्य विकास के अंतर्गत भारत निर्माण की योजनाओं की देन है। ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों के बाधित प्रवाहों से निधि के प्रावधान को बढ़ा करके 3000 करोड़ रूपया किया गया है। आवास ऋण पर एक प्रतिशत की ब्याज सहायता की मौजूदा स्कीम को और उदार बनाने का काम सरकार ने किया है। प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के तहत रिहायशी इकाइयों के लिए आवास ऋण की मौजूदा सीमा को बढाकर निम्न आय समूह की ऋण सीमा को बढ़ाना और राजीव आवास योजना के तहत गारंटी कोष का सृजन किया गया है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत आबंटन 6,755 करोड़ रूपये से बढ़ाकर 7,860 करोड़ रूपये कर दिया गया है। भारत निर्माण कार्यक्रम के लिए मौजूदा वर्ष से 10,000 करोड़ रूपये की वृद्धि की गई है। इस वर्ष 2011-12 में भारत निर्माण के अंतर्गत विभिन्न योजनाओं को लागू करने के लिए 58,000 करोड़ रूप्ये का प्रावधान किया है। इसी तरह से देश में 3 वर्ष में सभी 250,000 पंचायतों को ग्रामीण ब्रांड बैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की योजना है। मनरेगा के अंतर्गत इस वर्ष 40,000 रूपये की व्यवस्था सरकार ने की है तथा गांवों में मनरेगा के अंतर्गत 100 रूपये की वास्तविक दैनिक मजदूरी के बारे में पिछली बजट घोषणा के अनुशरण में सरकार ने मनरेगा के तहत कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को अधिसूचित करने का निर्णय लिया है। इससे 14 जनवरी, 2011 को ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा अधिसूचित मजदूरी दर बढ़ गई है। इसके चलते देश भर में फैले लाभार्थियों की मजदूरी में वृद्धि की गई है।
भारत के ग्राम्य विकास के अंतर्गत राष्ट्रीय योजनाओं को लागू करने में देश की 22 लाख आगंनबाड़ियों को 1 अप्रैल, 2011 से आगंनबाड़ी कर्मियों को 1500 रूपये से 3000 रूपया तथा आंगनबाड़ी सहायकों का मेहनताना बढ़ा करके 750 रूपये से 1500 रूपये प्रतिमाह कर दिया गया है। प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना के अंतर्गत गुणवत्ता परक सड़क बनाने के लिए 20,000 करोड़ रूपय की व्यवस्था की है। इसी तरह ग्रामीण आवास में इंदिरा आवास योजना के तहत ग्रामीण गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को अपने मकान बनाने एवं कच्चे घरों को पक्का बनाने हेतु 10,000 करोड़ रूपया की व्यवस्था की गई है। स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना में ग्रामीण क्षेत्रों में सूक्ष्म उद्यमों की सापना करने के लिए कम से कम 50औ स्वरोजगारी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के 40औ महिला एवं 3औ विक्लांग के लिए 2914 करोड़ रूपये की व्यवस्था की है। अब सरकार ने एस जी एस वाई को पुनर्गठित * Speech was laid on the Table कर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बनाने का निर्णय लिया है।
सर्वशिक्षा अभियान के तहत सितम्बर, 2010 तक 309,727 नये विद्यालय खोले गये हैं। इसी तरह 254, 935 विद्यालय भवनों का निर्माण, 1,166,868 अतिरिक्त कक्षाओं का निर्माण और 8.70 करोड़ बच्चों को पाठय पुस्तकों की निशुल्क आपूर्ति की गई है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत अब तक 8.33 लाख प्रत्यापित समाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता एवं आशा का चयन किया है। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना की पात्रता आयु 65 से घटा करके 60 वर्ष किया गया है। शिक्षा के आबंटन में 24औ की वृद्धि तथा सर्वशिक्षा अभियान में 40औ वृद्धि की गई है। कुल 21,000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा गठित जिला विजिलेंस एवं अनुश्रवण समिति को शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है। जिससे योजनाओं का मूल्यांकन एवं गुणवत्ता पर करार रखा जा सके। इसी के साथ मैं प्रस्तुत बजट का समर्थन करता हूं।
श्रीमती भावना पाटील गवली (यवतमाल-वाशिम):महोदय, आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों पर बोलने का अवसर दिया है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। मैं सबसे पहले ग्रामीण रोजगार योजना की तरफ मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। ग्रामीण रोजगार योजना का सारे देश में प्रचार-प्रसार हुआ और उसके माध्यम से 100 दिन की रोजगार गारंटी हमें मिलेगी, ऐसी बहुत ज्यादा चर्चा हुई, लेकिन आज हम देखते हैं कि जो ग्रामीण रोजगार गारंटी बिल है, उसके माध्यम से लोगों को कई जगह पर रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। मैं मंत्री जी के ध्यान में यह बात लाना चाहूंगी कि यह योजना महाराष्ट्र ग्रामीण रोजगार योजना में से ली गयी है। महाराष्ट्र सरकार ने इसे चलाया था और उसके बाद अब इस योजना को पूरे देश में चलाने का काम ग्रामीण विकास मंत्रालय कर रहा है। मैं यहां पर बताना चाहूंगी की आज महाराष्ट्र में यह योजना पूरी तरह से फेल हुई है। महाराष्ट्र में जो रोजगार उपलब्ध होना चाहिए था, मैं समझती हूं कि वह रोजगार लोगों को नहीं मिल पा रहा है। इसका कारण यह है कि काम करने वाले मजदूरों को सात-सात दिन तक पैसा नहीं मिल पाता है। वे बैंक में खाता खुलवाते हैं, बैंक में चक्कर लगाते हैं, लेकिन उनके पास पैसा नहीं आता है। सात दिन कोई भी मजदूर बगैर पैसे के नहीं रह सकता है। इसलिए मेरा माननीय मंत्री जी से अनुरोध है, मैं उन्हें बताना चाहूंगी कि यह जो आपने सात दिन का पीरियड़ लगा रखा है, उसे कम किया जाये और अगर उसे उसी दिन तुरन्त पैसा मिलता है तो उसका घर-गुजारा चल सकता है।
यहाँ पर सात दिन की बात बोली है लेकिन मैं बताना चाहूँगी कि 15-20 दिनों तक वहाँ उनको पैसा नहीं मिल पाता है। महाराष्ट्र में दो महीने, तीन महीने, छः महीने तक भी पैसा कामगारों को नहीं मिल पा रहा है। मैं यहाँ पर कहना चाहूँगी कि यह जो योजना है, बुरी तरह से फेल हुई है। कितना भी यूपीए सरकार बोले कि हमने रोज़गार देने की योजना बनाई, लेकिन मैं समझती हूँ कि यह पूरी तरह से फेल हुई है।
सभापति जी, स्वर्ण जयन्ती ग्रामीण स्वरोज़गार योजना पर मैं बताना चाहूँगी कि जो ग्रामीण इलाकों के युवा लोग हैं, उनके लिए यह योजना चलाई जाती है कि गाँवों में रोज़गार प्राप्त हो, लेकिन आज जब युवा बैंक के पास जाते हैं तो उन्हें वहाँ बैंक से कोई सपोर्ट नहीं मिलता है। वहाँ उन्हें कोई मदद नहीं मिल पाती है। मैं चाहती हूँ कि मंत्री जी इस योजना पर भी ध्यान दें क्योंकि इस देश में साठ प्रतिशत लोग युवा हैं। यदि युवाओं को हम रोज़गार उपलब्ध करा देते हैं तो निश्चित रूप से हमारा जो बेरोज़गार युवक है, उसके हाथ को काम मिलेगा।
सभापति जी, इसी के साथ साथ राष्ट्रीय पेयजल योजना है जिसे हमने शुरू किया था - स्वजलधारा भारत निर्माण, वह अभी राष्ट्रीय पेयजल योजना बनी हुई है। यह योजना महाराष्ट्र में चली है, बाकी के राज्यों में भी चली है, लेकिन मैं मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहती हूँ कि महाराष्ट्र में यह योजना पूरी तरह से फेल हुई है। क्यों हुई है क्योंकि वहाँ पर ग्रामीण लैवल पर जो कमेटी बनी है, उस कमेटी के लोगों ने काम न करते हुए वैसे ही पैसे निकाल दिये हैं और काम कुछ भी नहीं हो पा रहा है। अभी हमने कुछ गाइडलाइऩ बदल दी हैं पर मुझे लगता है कि उससे भी अच्छे तरीके से काम नहीं हो पाएगा। राष्ट्रीय पेयजल योजना हमने इसलिए बनाई थी कि ग्रामीण इलाकों में अच्छा और स्वच्छ पानी मिले, लेकिन मैं समझती हूँ कि इस योजना में भी हम ज्यादा कुछ नहीं कर सके।
सभापति जी, वाटरशैड प्रोग्राम जो डीपीएपी, डीडीपी, आईडब्लूएमपी के नाम से शुरू करने जा रहे हैं, उसके संबंध में एक बात मैं खासकर महाराष्ट्र के संबंध में मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहूँगी । मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखा है, बंजर भूमि है, लेकिन यह प्रोजैक्ट कहाँ ज्यादा सैंक्शन हुए हैं - वैस्टर्न महाराष्ट्र में सैंक्शन हुए हैं। इस पर भी हमें देखना चाहिए कि वैस्टर्न महाराष्ट्र में यह प्रोग्राम ज्यादा क्यों लिये। क्यों नहीं महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में लिये जहाँ से हमारे मंत्री जी आते हैं। मराठवाड़ा में भी यह प्रोग्राम अच्छी तरह से चलाया जाए, इसके लिए वे ज़रूर वहाँ पर अच्छे कदम उठाएँगे, यह मैं उनसे अपेक्षा रखती हूँ।
सभापति जी, पंथ प्रधान सड़क योजना के बारे में मैं कहना चाहती हूं। ...( व्यवधान) वह तो ठीक है। सारा कुछ इसमें हो रहा है। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Please address the Chair.
श्रीमती भावना पाटील गवली : सारे देश में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, उसको तो हमें रोकना ही है। लेकिन मैं बताना चाहूँगी कि पंथ प्रधान सड़क योजना का दसवें फेज़ का जो पैसा हमें मिलना था, वह हमें नहीं मिल पा रहा है। कनैक्टिविटी बताने के कारण वहाँ पर पैसा नहीं मिला है, ऐसी मेरी जानकारी है। लेकिन एक बात मैं बताना चाहती हूँ कि अगर कोई राज्य अच्छा काम करता है तो उसे शाबाशी क्यों नहीं मिलेगी, उसकी पीठ थपथपाई क्यों नहीं जाएगी? अगर कनैक्टिविटी हमें चाहिए, अगर हमने पंद्रह साल पहले कुछ काम करके छोड़े हैं, लेकिन अभी पंद्रह साल में तो रास्ते नहीं रहे, वहाँ तो रोड बन ही नहीं रही तो उसे कनैक्टिविटी में जोड़ना चाहिए। मैं समझती हूँ कि सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि बाकी के राज्यों को भी इस योजना का फायदा देने के लिए आपको कदम उठाने की ज़रूरत है। अब मैं बीपीएल की तरफ आती हूँ। ...( व्यवधान) मैं दो तीन मिनट लूँगी।
जो बीपीएल का सर्वे होता है, वह पाँच साल में नहीं होता है, दस-ग्यारह साल हमें बीपीएल के सर्वे के लिए लगते हैं। बीपीएल के सर्वे में हम इतना फँस जाते हैं कि बड़े लोगों को कार्ड मिला, छोटे लोगों को नहीं मिला। इस पर वहाँ के सभी एमएलए लोगों ने हंगामा खड़ा किया था। तब पिछली बार हमारी महाराष्ट्र सरकार ने एक कदम उठाया था कि जिन बड़े लोगों के पास बीपीएल के कार्ड होंगे और वे उसके हकदार नहीं हैं, उनकी हियरिंग ली जाए, उनके खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज हो। ऐसी कोई बात नहीं हुई, और जो बड़े लोग हैं, वे अपना कार्ड वापस जमा नहीं करते हैं। मैं समझती हूँ कि यदि यह योजना और ज्यादा अच्छे तरीके से वहाँ पर काम करने के लिए लागू करनी है तो तीन साल में बीपीएल का सर्वे होना चाहिए। मेरी यह मांग है। अगर पांच लोग एमपी के पास आते हैं तो हम लोग उन्हें जवाब नहीं दे सकते हैं क्योंकि केन्द्र सरकार से सर्वे होता है, सब लोग कहते हैं कि केन्द्र सरकार सर्वे करती है, लेकिन सांसद इसमें क्या करता है? लोगों की अपेक्षा होती है बीपीएल कार्ड उन्हें मिले। इसलिए मेरी यह मांग है कि तीन साल में इसका सर्वे हो। विजिलेंस और मॉनिटरिंग कमेटी के बारे में मैं कहना चाहती हूं कि हमें इसका चैयरमैन बनाया गया है। यह हमें सम्मान दिया गया है। लेकिन उसकी 75 प्रतिशत निधि राज्यों में चली जाती है। यहां सभी माननीय सांसद बैठे हैं, वे आपको बता सकते हैं कि हम कितनी रिकमण्डेशन कर सकते हैं? आपको कितने अधिकार दिए गए हैं? आपको उसका क्या फायदा मिलता है? जिस राज्य में उनकी सरकार नहीं होती है, वहां तो सांसदों की सुनी भी नहीं जाती है। मैं यह समझती हूं कि हम यहां से जो एमाउण्ट भेजते हैं, उसमें से 25 प्रतिशत सांसदों के द्वारा रिकमण्ड करने का अधिकार प्रदान करें। आप अपने भाषण में यहां घोषणा करें, ताकि सभी सांसदों को काम करने में सुविधा हो और वे अच्छे काम कर सकें। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Kindly conclude.
श्रीमती भावना पाटील गवली : महोदय, मैं दो मिनट में समाप्त कर दूंगा। 15 साल पहले सांसद गांवों में जाते नहीं थे, लेकिन एनडीए की सरकार के बाद से, जब से हम यहां चुनकर आए हैं, हम गांव-गांव जाते हैं, लोगों की छोटी-छोटी परेशानियां सुनते हैं, इससे लोगों की अपेक्षा हम लोगों से बढ़ी है। हम काम करना चाहते हैं, लेकिन हमें केन्द्र सरकार का भी सहयोग मिले, यह मैं चाहती हूं।
महोदय, विधवा पेंशन योजना के बारे में यशवंत सिन्हा जी ने कहा। 18 साल से 65 साल उम्र की विधवाओं को विधवा पेंशन मिलती है और 65 साल के बाद उसे वृद्ध पेंशन योजना में चली जाती है। इसमें एक लगा रखा है कि वह बीपीएल की महिला होनी चाहिए...( व्यवधान) नहीं है। कई जगह पर वह मांग करते हैं कि बीपीएल का कार्ड होना चाहिए, तभी आपको उसकी सुविधा मिलेगी। मैं मांग करना चाहती हूं आपने इसमें यह जो बंधन डाला हुआ है, वह निकाल दिया जाए। मैं समझती हूं कि इतनी योजनाएं बनायी गई हैं...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Nothing is going on record. Please sit down. Shri C. Sivasami to speak.
(Interruptions) …* *SHRI C. SIVASAMI (TIRUPPUR): Mr. Chairman, Sir, I thank you heartily for giving me this opportunity to speak on the Demands for Grants pertaining to the Ministry of Rural Development. Rural development is vital to our country’s economy which is more dependent on it. At this juncture, I recall a song sung by our Founder Leader, Puratchi Thalaivar MGR in one of his movies.
“Annaanthu Parkkindra Maaligai Katti Athan Aruginile Olai Kudisai Katti Ponnana Ulagendru Peyarumittal Indha Bhoomi Sirikkum, Andha Saami Sirikkum.” (Having built sky scrapers on the one side and allowing slum cluster on the other side, preferring to call that world as golden one would be laughable both to the world and to the Gods.) Development is not mere raising of tall buildings and it is not in conducting big events like Commonwealth Games. Real development can be ensured only when we ensure that there is no village with houses having thatched roof and mud walls.
The funds meant for rural development flows from the Centre to various State Governments. If we go into the question whether such funds so allocated to the States are really spent on rural development, the answer we get is disappointing. There are several lacunae in its implementation. Even jobs that are to be done manually providing jobs to the poor are being done by machines. Thus, mismanagement and mistakes happen there. In order to stem the rot, we have formulated Vigilance and Monitoring Committee. There is a directive to hold its meeting once in six months. But this is more honoured in its violation.
* English translation of the speech originally delivered in Tamil.
I am a Member of this House for the past two years now. There is one such Committee for four districts like Tiruppur, Coimbatore, Nilgiris and Erode. I would like to point out that this monitoring committee met just once. …(Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Nothing will be recorded.
(Interruptions) …* SHRI C. SIVASAMI (TIRUPPUR): I request the Union Rural Development Minister to name a Chairman from among the Members of Parliament belonging to these districts to ensure an effective monitoring mechanism.
When ruling party members are appointed as Chairmen to such committees, it may only help covering up any possible lacuna rather than ensuring an effective monitoring mechanism. An opportunity to take corrective measures is missed. Hence I urge upon the Minister to appoint only Members of Parliament to head such monitoring committees.
Under the Indira Awaz Yojana scheme, Rs.75,000 is being given to the rural poor to construct hoses. But the construction costs have increased manifold. In Tamil Nadu, price of cement has spiraled up from Rs. 135 per bag to Rs. 270 per bag. Sand is now sold at Rs. 12,000 which has been sold at Rs. 6,000 till recently. Since cost escalation is there, considering the ground realities, the Centre must increase the subsidy under IAY Scheme to Rs. 1,50,000, only then quality house can be built.
Every Scheduled Caste habitation in each village must have public convenience facilities especially for women folk and every such habitation unit must have a Community Centre. Even after two years of my apportioning funds from my MPLADS fund, such women toilet complexes have not been constructed in the areas where Scheduled Caste people live in the villages of Anthiyur Panchayat Union. I painfully point out this state of affairs here now. Adi Dravidar colonies must have the necessary Community Centre facility. In the absence of them, we now find more than three-four families of two to three generations live together in small dwelling units. Hence I urge upon the Government to gear up land reform measures and acquire unused lands for constructing houses and distribute pattas to such needy poor families to raise their own dwelling units. Such acquired lands must be divided into small plots and must be distributed to large number of people who really need them.
In the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme, quite against the guidelines machines are being used depriving jobs to many rural poor thereby coming in the way of getting 100 days of assured jobs in a year. Because of this scheme, we find a scarcity for agricultural labour in the rural areas. Apart from 100 days of job which needs to be increased, the Government may consider engaging such people in agricultural occupation also by way of getting 50 per cent from the land owning agriculturists and pay the remaining 50 per cent from the NREGA funds. Through this, we can solve the problem of non-availability of agricultural labour for cultivation and we can also provide them with jobs throughout the year.
Our leader Puratchi Thalaivi Amma effectively introduced rain water harvesting scheme and an effective watershed management scheme when she was the Chief Minister of Tamil Nadu. By way of conserving rain water that may flow wastefully into the sea, ground water potential can be augmented that can help us to overcome the drinking water problem.
I urge upon the Union Government to accord top priority to effective watershed management. As a pioneering scheme Avanashi-Athikadavu Scheme that is pending for long on the beds of Bhavani River may be taken up which will help augmenting the ground water potential there. I urge upon the hon. Minister to apportion Rs. 500 crore for this scheme that can be taken up a model scheme.
When it comes to allocation of funds for rural development, Tamil Nadu is lagging behind in spite of our having so many Ministers from Tamil Nadu in the Union Cabinet. It has been pushed back and I charge the Union Ministers hailing from Tamil Nadu for not getting a better deal for our State. I would like to point out that during the election time now, there is an indirect effort to canvass for election while paying the labour for their doing their jobs under the MGNREGS. I urge upon the Union Government to take effective steps to curb this trend. … (Interruptions) I would like to impress upon the Union Government to offer viable schemes for the needy poor in the rural areas and to ensure rural development by way of able implementation and effective monitoring. Urging upon the Union Rural Development Minister to have a road map to ensure that there is no village with a mud house and thatched roof in any part of the country, let me conclude.
SHRI NAMA NAGESWARA RAO : Sir, thank you very much for giving me the opportunity to participate in the discussion on the Demands for Grants under the control of the Ministry of Rural Development. रूरल डैवलपमेंट का मैनली फंड्स यूटीलाइजेशन देखें, तो जब से यह गवर्नमेंट आई है, तब से हमेशा यही बोलती है कि यह सरकार इस देश के रूरल गरीब आदमी के लिए काफी फंड्स खर्च कर रही है। इस बजट में भी जितनी स्कीम्स हैं, उनमें 74,143 करोड़ रुपए रखा है। इसमें देखें तो टोटल 31 स्कीम्स हैं। मैनली रूरल डैवलपमेंट में 11 स्कीम्स हैं, ड्रिंकिंग वाटर सप्लाई में 9 स्कीम्स और लैंड रिसोर्सेस में 11 स्कीम्स हैं। इस प्रकार देखा जाए, तो कुल 31 स्कीम्स हैं। हर टाइम यह गवर्नमेंट एक ही बात बोलती है कि हम तो गरीब लोगों को काम दे रहे हैं। नरेगा के अंदर बहुत लोगों को 100 दिन का काम दिया जा रहा है, यह गवर्नमेंट ऐसा क्लेम करती है, लेकिन यह सही नहीं है। इस प्रकार यह सरकार कई गलत बातें इस हाउस में बोलती है।
सर, मिनिस्टर साहब यहां बैठे हैं। मैं आपके माध्यम से मिनिस्टर साहब से यह बात जानना चाहता हूं कि जब से इन स्कीम्स को आपने इंट्रोडय़ूज किया है, तब से बी.पी.एल. की संख्या बढ़ी है। इस देश में बी.पी.एल. की संख्या पहले 28.5 परसेंट थी। अभी पिछले तीन साल में यह फिगर 10 परसेंट बढ़कर 38 परसेंट हो गई है। आप एक तरफ बोलते हैं कि हमने गरीबों के लिए इतना पैसा केन्द्र सरकार की ओर से दिया है, यदि ऐसा है, तो गरीबों की संख्या क्यों बढ़ रही है? वह पैसा किधर जा रहा है? यदि वह पैसा गरीब के पास चला जाता, तो यह परसेंट बढ़ने की बजाय घटता। यदि ऐसा होता, तो गरीबी का आंकड़ा 10 परसेंट नहीं बढ़ता। यह सब देखें, तो इस पूरे पैसे की एक प्रकार से लूट हो रही है।
अभी मिस्टर उदय कुमार सिंह, इस हाउस में बोल रहे थे। वे कह रहे थे कि मध्य प्रदेश सरकार और झारखंड सरकार की सी.बी.आई. से जांच कराई जाए क्योंकि वहां केन्द्र सरकार की स्कीमों में गड़बड़ी की जा रही है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आप अपनी सेंट्रल गवर्नमेंट स्कीमों की सी.बी.आई. इन्क्वायरी क्यों नहीं कराते हैं, क्योंकि सबसे ज्यादा गड़बड़ी तो यहीं होती है। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Mr. Rao, please address the Chair.
… (Interruptions)
SHRI NAMA NAGESWARA RAO : Sorry, Sir. अगर सी.बी.आई. इन्क्वायरी करानी है, तो उसके लिए मध्य प्रदेश और झारखंड में ही क्यों कराई जाए। यह केवल मध्य प्रदेश और झारखंड का ही पार्ट नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के गरीबों के लिए यहां से जाने वाले पैसे का मामला है। जो पैसा यहां से गरीबों के लिए जाता है, उसमें से गरीबों को 10 पैसे भी नहीं मिलते हैं और बाकी 90 पैसे ये लोग बीच में खा जाते हैं। इसका मतलब तो यह है कि यह पूरा सिस्टम फेल्योर है। इसकी मॉनीटरिंग का कोई मैकेनिज्म नहीं है। इसके लिए यह पूरी गवर्नमेंट जिम्मेदार है। हम लोगों ने देखा कि आंध्र प्रदेश में 79,363 कम्पलेंट आई थीं। इतनी कंपलेंट्स एक जगह से आई हैं। मैं आपके माध्यम से इस गवर्नमेंट से यह पूछना चाहता हूं कि एक तरीके से आप इसके बारे में बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन पिछले साल आपने गरीबों को रोजगार देने का जो 100 दिन का लक्ष्य रखा था, उसमें से केवल 13.14 परसेंट ही टारगेट एचीव किया है। इस साल केवल 4.14 परसेंट लोगों को 100 रोज के हिसाब से काम मिला है। एक तरफ तो फंड्स की यूटीलाइजेशन नहीं होती है और दूसरी तरफ जो फंड्स यहां से जाते हैं, उनमें करप्शन होती है और तीसरी तरफ गरीब लोगों को काम नहीं मिल रहा है। जिस प्रकार से यह सरकार यहां पिछले तीन सालों से बात कर रही है, यदि वास्तव में देखा जाए तो 32 से 33 परसेंट फंड्स यूटीलाइजेशन नहीं हो रहा है। आपका मॉनीटरिंग सिस्टम पूरी तरफ फेल हो गया है। Why are you unable to monitor this system? यह सिस्टम फेल्योर है। करप्शन के लिए, फंड्स यूटीलाइजेशन के लिए और टोटल सिस्टम को करप्ट करने की जिम्मेदार यह गवर्नमेंट है। मैं सिर्फ दो बातें कहना चाहता हूं। मुझे मालूम है कि मेरा टाइम बहुत लिमिटेड है।
MR. CHAIRMAN: Mr. Rao, please conclude your speech.
SHRI NAMA NAGESWARA RAO : Sir, I am concluding my speech. आंध्र प्रदेश में जितनी स्कीम्स के लिए यहां से पैसा जाता है, उससे वे लोग अपनी नई स्कीमें चला रहे हैं।
इस बीच में स्टेट गवर्नमेंट ने एक जी.ओ. नं. 274 निकाल दिया। यहां से सैण्ट्रल गवर्नमेंट की स्कीम का पैसा उसके द्वारा मिसयूटीलाइज़ किया गया है। इसके लिए लोगों को कोर्ट में जाना पड़ा है, तब कोर्ट ने उसको कैंसिल किया है। यह बात उस समय में जोशी साहब मंत्री थे, हमने जोशी जी को भी जाकर बोला था कि इस तरह से हमारी स्टेट में गरीब का पैसा मिसयूटीलाइज़ हो रहा है, लेकिन उसके लिए एक्शन नहीं ले रहे हैं।
आखिर में एक ही पाइंट है कि मिनिस्ट्री ऑफ रूरल डैवलपमेंट के ऑफिस से पी.एम.जी.एस.वाई. का इनोगुरेशन लोकल एम.पी. करेगा, यहां से ऐसा लैटर 11.09.2010 को दिया गया है, लेकिन स्टेट गवर्नमेंट प्रोटोकॉल को फॉलो नहीं कर रही है। मैंने खम्माम डिस्ट्रिक्ट में इसके लिए लैटर लिखा है, लेकिन वहां की गवर्नमेंट प्रोटोकोल को लागू नहीं कर रही है और हम लोगों को इसका चांस नहीं दे रही है। इसके लिए भी हम आपके माध्यम से मिनिस्टर साहब को यह बोलते हैं कि इन सब चीजों को आप देखिये।
SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Every hon. Member in this august House may recall the remarks made by no other person than the outstanding personality of our nation, Bapu Ji, that India lives in the villages. It is a matter of regret that under the leadership of Dr. Manmohan Singh, the Congress Party is neglecting the villages. This sort of a Budget is a reflection of that attitude.
This Department has not found time to deal with the problem of land reforms. This Government has failed to identify the BPL category properly. If you go to any village and ask anybody there, they can show where the family of the poor persons is living. They can easily identify the poor family households. The Government has constituted Commission after Commission and incurred a huge expenditure on that. But till today, there is no scientific method of identifying BPL. I am not going to touch other points.
I want to confine myself only to the Demands for Grants. If you take the total budget for the Rural Development, the Revised Estimate for 2010-11 was Rs. 76,378 crore; now, it is reduced from Rs. 76,378 crore to Rs. 74,000 crore. This is the attitude. It is less by Rs. 2,234 crore in comparison with the previous budget.
We are talking about the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme. I do agree with it that the Government has decided to index the wage rates notified under this MNREGS to the Consumer Price Index. The outlay to this has been restricted to only Rs. 40,000 crore, which was Rs. 40,100 crore in the earlier Revised Estimates. It is less by Rs. 100 crore.
What about the outlay for Swarna Jayanti Gram Rozgar Yojana? It has been kept at Rs. 2,905.3 crore for 2011-12. It has been same as the Revised Estimates earlier and there is no increase in this regard.
Sir, the outlay for Indira Awas Yojana has been reduced from Rs.10,267 crore, which was the Revised Estimate figure in the last fiscal year, to Rs.9,896 crore. This is the attitude to the rural sector; this is the attitude to the rural people. On the other hand, what is happening is that the total magnitude of tax revenue foregone, as estimated by the Finance Ministry shows a rise from Rs.4.82 lakh crore to Rs.5.11 lakh crore in 2009-10, that is, in terms of the GDP it is 6.5 per cent. What happened to the stimulus package to the poor people? Now stimulus package has been provided to the elite sections, to the corporate sections, to the big businessmen and all these people and the rural people are getting neglected.
What is the outlay for the Bharat Nirman? It is increased only by Rs.10,000 crore in the current year, that is, Rs.2.58,000 crore. It includes the Prime Minister’s Gramin Sarak Yojana, Accelerated Irrigation Benefit Programme, Rajiv Gandhi Gramin Vidyuteekaran Yojana, Indira Awas Yojana, National Drinking Water and Programme for Rural Telephony. This is nothing but the peanut to the people. This is the attitude.
I just refer to the period of the UPA-I. During its first tenure, I must admit that the UPA Government had stepped up the resources for various rural development schemes. This NREGA programme has been commissioned and piloted by that Government and the hon. Dr. Raghuvansh Prasadji piloted all these schemes. Now, gradually they are shifting their attitude away from the villagers and they are providing stimulus package to the corporate sector and big business men. This is their attitude. That is why, I strongly object the essence of this Budget. I hope, the Government will rethink and the Government will be honest to the commitment with regard to the Aam Aadmi Yojana.
श्री जगदानंद सिंह (बक्सर):सभापति महोदय, मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि ग्रामीण भारत और विकास से जुड़े हुए विषय पर आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं यहां से शुरू कर रहा हूं कि मेरे अतारांकित प्रश्न 2,707 के उत्तर में वित्त मंत्रालय ने बताया कि इस राष्ट्र का बीस प्रतिशत क्वांटाइल समूह इस देश की संपदा में 52.7 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है और वहीं हमारे समाज का जो निचला तबका है, जो गांव में रहता है, उस 20 प्रतिशत क्वांटाइल समूह का केवल 5.2 प्रतिशत का योगदान इस राष्ट्र की संपदा पर है। बराबर का समूह है, लेकिन दस गुने का अंतर है। यही अंतर वाले लोग गांव में रहते हैं, जिनके विकास की बात, ग्रामीण विकास मंत्रालय संभालने की बात कर रहा है। खरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। राष्ट्र के सामने यह बात आ चुकी है कि बीस रूपए पर रोजाना जिंदगी जीने वाले परिवार की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है और शायद ऐसे ही लोगों के जीवन में सुधार के लिए सरकार ने भारत निर्माण की योजना को चलाने का कार्य किया है। मैं उनके अन्य विषयों की चर्चा नहीं कर रहा हूं, लेकिन ग्रामीण आवास, पेयजल और ग्रामीण सड़क, 6 योजनाओं में से 3 योजनाओं की जिम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय को मिली हुयी है।
महोदय, इस साल का बजट जिस पर बहस हो रही है, ग्रामीण रोजगार में गत साल से कोई वृद्धि नहीं हुई, आवास में गत साल से रिवाइज़्ड एस्टीमेट से 337 करोड़ रुपये की कमी कर दी गई। सड़क, पुल, पुलिया, रूरल कनैक्टिविटी, खेत से बाजार तक की योजना में इस बार रिवाइज्ड एस्टीमेट से दो हजार करोड़ रुपये कम कर दिए गए। यदि हम उन योजनाओं को भी कायदे से नहीं चला पाएंगे और उनके लिए पर्याप्त धन मुहैया नहीं करेंगे तो यह राष्ट्र कैसे बनेगा, गांवों की आमदनी कैसे बढ़ेगी, गांवों के लोगों की दौलत कैसे बढ़ेगी?
प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना - वर्ष 2009 तक एक हजार की आबादी को कनैक्टिविटी दे देनी थी। अन्य इलाके जहां उग्रवाद, आदिवासी, पहाड़ी आदि लोग हैं, वहां पांच सौ की बसावट को रूरल कनैक्टिविटी देनी थी। इस देश में रूरल कनैक्टिविटी का जो लक्ष्य तय किया गया, वह वर्ष 2012 तक नहीं बल्कि 2015 तक भी पूरा नहीं होने वाला है।
बिहार सबसे पिछड़ा इलाका है। वहां योजनाओं की 16 हजार करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन लगता है कि हमारी योजनाएं 6-7 सालों तक पूरी नहीं होंगी। मंत्री जी यहां बैठे हैं। 16 हजार करोड़ रुपये में से अब तक केवल 6 हजार करोड़ रुपये खर्च हो पाए हैं। 10 हजार करोड़ रुपये मिलने में पांच से सात साल लगेंगे। तब तक एसक्लेनेशन बढ़ जाएगा। डीपीआर से जो एक्सैस एमाउंट होगा, राज्यों को देना पड़ेगा, वे दे नहीं पाएंगे। सारी सड़कें अधूरी रह जाएंगी।
इंदिरा आवास 45 हजार प्रति यूनिट मिलने वाला है। उग्रवाद प्रभावित इलाकों में 48 हजार रुपये मिलेंगे। दिमाग में एक सवाल आता है कि यदि आवास निर्माण में 45 हजार रुपये मिलेंगे, उग्रवाद इलाकों में तीन हजार रुपये अधिक अर्थात् 48 हजार रुपये मिलेंगे, यह शायद उन्हें मिलेंगे जो लोग उग्रवाद में लगे हुए हैं। केवल स्थान बदलने से एक यूनिट का खर्च बदल नहीं जाता। आप 20 हजार रुपये कर्ज पर लेने की अनुमति देते हैं जो किसी को नहीं मिलता। यदि जमीन नहीं है तो 10 हजार रुपये आप गृह स्थल के लिए देंगे। लेकिन यह किसी को नहीं मिल पा रहे हैं। मैंने पहले चर्चा की है और आज भी सदन के सामने कह रहा हूं कि यदि आवास निर्माण के बदले एक कमरे के निर्माण की योजना चलती रही तो भारत के गावों के लोग ऐसी जगह जाकर खड़े होंगे जिनका भविष्य कुछ नहीं रहेगा। एक कमरे में परिवार नहीं रहता। इसलिए हैल्थ डिपार्टमैंट से सलाह लेकर एक परिवार के रहने लायक न्यूनतम स्थान मिलना चाहिए। उतने प्लिनथ एरिया का आवास बनाना पड़ेगा।...( व्यवधान) साथ ही सम्पूर्ण स्वच्छता, राजीव गांधी विद्युतीकरण, पेयजल आपूर्ति, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वराज योजना, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी की सारी योजनाओं को एक साथ जोड़कर चलाया जाएगा तब शायद ग्रामीण विकास का सपना साकार होगा।
मैं उस इलाके से आता हूं जहां लोगों को पीने के लिए स्वच्छ जल भी नहीं मिल रहा है। यह कहा जाता है कि सेफ ड्रिंकिंग वाटर में टीडीएस 90 से ऊपर नहीं जाना चाहिए। 700 से 800 टीडीएस का पानी पीने को लोग लाचार हैं। इतना ही नहीं, आर्सैनिक एक हजार गुना पर्मिसिबल लिमिट से आगे जा रहा है और लोग उस पानी को पीने के बाद रोगग्रस्त ही नहीं हो रहे बल्कि एक जिन्दा लाश बनकर रह रहे हैं।...( व्यवधान)
मैं स्वच्छता अभियान के बारे में कहना चाहता हूं। खुले में शौच करने की प्रवृत्ति को रोककर शौचालयों के निर्माण की बात हो रही है। मैं इस सदन में कहना चाहूंगा कि शौचालयों के निर्माण नहीं हो रहे हैं। मै कह सकता हूं कि घर के भीतर एक गंदा स्थान बनाने की नीति चल रही है। जिस पैसे से शौचालय बनाए जा रहे हैं, उससे परिवार रोगग्रस्त होगा और उसका भला कभी नहीं होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय चिंतन करे कि लोगों के लिए सही वातावरण कैसे बनाया जाए ताकि वह परिवार अपना जीवन ठीक से जी सके।
18.00 hrs. महोदय, मैं मनरेगा के बारे में बोलना चाहता हूं। ...( व्यवधान) मैं एक मिनट में कनक्लूड कर रहा हूं। बिहार राज्य में सबसे ज्यादा गरीब लोग रहते हैं। मनरेगा की जो किश्तें मिल रही हैं, वह रोजगार गारंटी नहीं, बल्कि बजट ओरियेन्टेड है। यह डिमांड ओरियेन्टेड नहीं रह गया है, बल्कि सप्लाई ओरियेन्टेड रह गया है। हर राज्य का बजट बनता है। यह 40 हजार करोड़ रुपये का बजट राज्यों में बांटा जायेगा। गत वर्ष आंध्र प्रदेश को 7418 करोड़ रुपये मनरेगा में मिले हैं। उत्तर प्रदेश को 7494 करोड़ रुपये और बिहार जैसे राज्य को, जहां 42 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, केवल 1681 करोड़ रुपये मिलते हैं। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, it is 6 o’ clock. There are 12 or 13 more Members to speak on this issue. Thereafter, we have the reply of the hon. Minister and then, the `Zero Hour’. So, if the House agrees, we can extend the time of the House till 8 o’ clock.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes, Sir.
श्री जगदानंद सिंह : इसका नतीजा क्या है? जहां मैं मौनीटरिंग कमेटी का चेयरमैन हूं वहां की स्थिति क्या है? जिले से छः सौ करोड़ रुपये का लेबर बजट दिया गया ...( व्यवधान)स्वीकृति केवल 60 करोड़ रुपये की होती है। ...( व्यवधान) 30 करोड़ रुपये के आसपास यह आबंटन जिलों को मिलता है। इस तरह से मनरेगा की योजना नहीं चल सकती। सौ दिन के बदले 30-35 दिन काम करने पर गरीब लोगों को कभी भी रोजगार की गारंटी नहीं मिल सकती। अंत में, मैं कहना चाहता हूं कि भारत सरकार अपनी योजनाओं को कमिटमैंट के मुताबिक चलाये और ग्रामीण विकास के सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
ओश्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी): मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय बजट के पक्ष में अपने विचार रखता हूं । ग्रामीण विकास मंत्रालय अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाता है । पहले केन्द्रीय बजट की चिंता या उत्सुकता केवल कोर्पोरेट सेक्टर, उद्योगों व बड़े-बड़े व्यवसायों तक ही सीमित रहती थी, लेकिन यूपीए सरकार आने के बाद जब भी बजट पेश किया गया, उसकी धूम दूर-दूर गांवों की गलियों तक पहुंचती है । जन-जन के उत्थान के लिए अनेक योजनाएं आई हैं । चाहे वे भारत निर्माण योजना के अंतर्गत विभिन्न फ्लेगशिप प्रोग्राम के बारे में हो या किसानों के कर्ज माफी के बारे में, जनता ने अहसास किया है कि हां यह सरकार आई है, जिसे ग्रामीणों की चिंता है, किसानों की चिंता है, दलित और अल्पसंख्यकों की चिंता है और इसीलिए यूपीए-1 को उसके कार्यक्रम तथा नीतियों के लिए जनादेश मिला और यूपीए-2 सरकार बनी ।
भारत की 70 प्रतिशत जनता 6,27,000 गांवों में रहती है । देश के 90 प्रतिशत गांवों की जनसंख्या 2000 से कम है । कृषि मुख्य व्यवसाय है । देश में कुल रोजगार का 52 प्रतिशत रोजगार कृषि पर ही निर्भर है । यही असली भारत है, जब तक यह भारत आगे नहीं बढ़ेगा देश आगे नहीं बढ़ सकता । जब तक इस भारत का विकास नहीं होता, तब तक देश विकसित नहीं हो सकता है । इसी बात का अहसास यूपीए सरकार ने किया है ।
हमारे गांवों में बसा भारत आज शहरी क्षेत्रों के मुकाबले बहुत पीछे है । शहरों में बिजली है, गांवों में नहीं है, शहरों में सड़कें है, गांवों में नहीं है, शहरों में अस्पताल है, गांवों में नहीं है । शहरों में विद्यालय है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में नहीं । शहरों में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था है, गांवों में नहीं है, शहरों में रोजगार है, लेकिन गांवो में रोजगार का अत्यंत अभाव है, जिससे लोग शहरों की तरफ पलायन करते हैं । यूपीए सरकार की संपूर्ण रणनीति इसी अंतर को समाप्त करने पर केन्द्रित है ।
इस अंतर को मिटाने के लिए 70 प्रतिशत जनता को सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से अनेक योजनाएं दी हैं, उनके लिए पहले से ज्यादा धन का आवंटन किया गया है । सरकार ने शहर और देहात के विकास का संतुलन बनाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने की मुहिम छेड़ी है ।
ग्रामीण विकास में कई महत्वपूर्ण योजनाएं हैं, जैसे महात्मा गांधी नरेगा, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, राष्ट्रीय पेयजल योजना, इन्दिरा आवास योजना आदि * Speech was laid on the Table मुख्य है । और इन योजनाओं के लिए 74100 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है । इसमें मनरेगा के लिए 40000 करोड़, इन्दिरा आवास के लिए 10000 करोड़ तथा PMGSY के लिए 20000 करोड़ का प्रावधान है ।
भारत निर्माण योजना इस योजना की शुरूआत वर्ष 2005 में की गई थी । इस योजना के माध्यम से सभी गांवों में चहुंमुखी विकास की योजना बनाई गई है । जिसमें सड़क, आवास, सिंचाई, टेलीफोन, बिजली और शुद्ध पेयजल जैसी सभी मूलभूत सुविधाओं की योजनाएं शामिल हैं । वर्तमान में इस योजना का दूसरा चरण प्रारंभ हो चुका है । भारत निर्माण कार्यक्रम के लिए 58,000 करोड़ स्वीकृत किया गया है, जोकि पिछले बजट की अपेक्षा 10,000 करोड़ ज्यादा है ।
शुद्ध पेयजल आपूर्ति विभाग पिछले वर्ष शुद्ध पेयजल हेतु 9000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया था, जबकि इस वर्ष शुद्ध पेयजल विभाग के लिए 9350 करोड़ रूपये का प्रावधान है, तथा संपूर्ण स्वच्छता अभियोजन के लिए 1650 करोड़ आवंटित किया गया है ।
महात्मा गांधी नरेगा यह कार्यक्रम सबसे महत्वपूर्ण है और मेरा मानना है कि विश्व में रोजगार देने के लिए इतना बड़ा कार्यक्रम नहीं है । इस योजना को चालू हुए 5 वर्ष हो चुके हें । इसमें 12 करोड़ जाब कार्ड जारी किए गए हैं तथ 9.19 करोड़ लोगों के बैंक खाते खुलवाए गए हैं, ताकि मजदूरी का पूरा वेतन सीधे बैंक के माध्यम से प्राप्त हो सके ।
यह एक अत्यंत क्रंतिकारी योजना है, जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को 100 दिन के रोजगार का अधिकार प्राप्त है । योजना में निर्धारित 100/- प्रतिदिन मजदूरी प्रति व्यक्ति से न्यूनतम मजदूरी दर बढ़ गई है और अधिक मजदूरी की दर निर्धारित करने की क्षमता में वृद्धि हुई है तथा घर से दूर दिल्ली/बम्बई जाकर मजदूरी करने की भी आवश्यकता नहीं है, वह अपने परिवार के साथ रह कर रोजी-रोटी कमाने की व्यवस्था कर सकता है । उसका शोषण नहीं हो सकता है ।
प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना ( PMGSY ) ः ग्रामीण भारत में सभी सुविधाएं पहुंचाने के उद्देश्य से यह योजना वर्ष 2000 में प्रारंभ की गई थी, इस योजना में बारामासी सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है । 2010-11 के बजट में 12000 करोड़ का प्रावधान किया गया था, जबकि इस वर्ष 20000 करोड़ का प्रावधान किया गया है ।
इंदिरा आवास योजना ( IAY ) ः इस योजना का प्रारंभ वर्ष 1985-86 में हुआ था, इस योजना के माध्यम से वर्ष 2017 तक हर गरीब को छत मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है ।
ग्रामीण क्षेत्र हेतु भारत निर्माण योजना के अंतर्गत 58000 करोड़ की धनराशि का प्रावधान किया गया जिनमें मुख्यतया निम्नलिखित है ः-
· प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना 20000 करोड़ · इन्दिरा आवास योजना 10000 करोड़ · ग्रामीण पेयजल योजना 9350 करोड़ · ग्रामीण विद्युतीकरण योजना 6000 करोड़ · ग्रामीण दूर संचार हेतु 10000 करोड़ (सभी ग्राम पंचायतों को 3 वर्ष में ब्राडबैण्ड कनेक्टीविटी) · सिंचाई की व्यवस्था हेतु 2549 करोड़ · सफाई व्यवस्था (Total Sanitation) 1650 करोड़ · स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना 2914 करोड़ · रक्षा सेवाओं के लिए ओएफसी नेटवर्क 1000 करोड़ · टेलिकॉम सर्विस के लिए 2100 करोड़ इसके अतिरिक्त इफ्रास्ट्रक्चर की मदों में प्रावधान निम्न प्रकार है ः- · सड़कों हेतु 33341 करोड़ · राष्ट्रीय राजमार्गों हेतु 10343 करोड़ · राज्यों तथा सीमावर्ती मार्गों हेतु 2930 करोड़ · पूर्वोत्तर राज्य सड़क परियोजना के लिए 68 करोड़ · प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना हेतु 20000 करोड़ · ग्रामीण विद्युतीकरण हेतु 6000 करोड़ · जल विद्युत 813 करोड़ · परमाणु विद्युत 4807 करोड़ · ऊर्जा सुधार कार्यक्रम 2340 करोड़
11वीं पंचवर्षीय योजना में 78000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन के लक्ष्य को पुनर्निर्धारित कर 68000 मेगावाट कर दिया गया है, जिसमें से 48000 मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन क्षमता की पूर्ति होने की संभावना है, जो 10वीं पंचवर्षीय योजना के 21000 मेगावाट की उपलब्धि से दो गुना से भी अधिक है । मैगा पावर प्रोजेक्टो के माध्यम से निजी क्षेत्र में भारी पूंजी निवेश होगा । इनमें प्रयोग होने वाली मशीनरी आयात कर से मुक्त की गई है ।
अधिक उत्पादन, पर्याप्त एवं कुशल आपूर्ति तथा वितरण व्यवस्था उपलब्ध कराना बजट की मुख्य विशेषता है, जिसके लिए अनेक कदम उठाए गए हैं और बजट में प्रावधान किया है ः-
1. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना 7800 करोड़
2. पूर्वी क्षेत्रों में हरित क्रंति हेतु 400 करोड़
3. 60000 दलहन गांवों में समन्वित विकास हेतु 300 करोड़
4. 60000 हैक्टर में ऑयल पाम की खेती हेतु 300 करोड़ (तीन लाख टन अतिरिक्त तेल उत्पादन)
5. 60000 हैक्टर सब्जी का सघन क्षेत्र (Veg Cluster) 300 करोड़
6. अत्याधिक प्रोटीन वाली खेती हेतु 300 करोड़ (बाजरा, ज्वार, मक्का रागी, मक्क, मोटा अनाज आदि)
7. National Mission for Protein Supplement हेतु 300 करोड़ (पशुपालन, डेयरी, पिगरी, पोल्ट्री, मछली पालन)
8. 25000 गांवों में पशु चारा विकास योजना हेतु 300 करोड़
9. सिंचाई क्षमता का विकास भारत निर्माण
10.कृषि ऋण हेतु 4,75,000 करोड़ (4 प्रतिशत प्रभावी ब्याज दर)
11.मेगा फूड पार्क
12.भण्डारण क्षमता के विकास हेतु
13.कोल्ड चैन विकसित करने की योजना
14.कृषि पर आधारित उद्योगों की मशीनें कर मुक्त
15.गांवों से बाजार तक फसलों को पहुंचाने के लिए प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना
16.National Horticulture Mission अंत में मैं माननीय ग्रामीण विकास मंत्री जी को मेरे लोक सभा क्षेत्र में काफी लंबे समय से लंबित योजनाओं के बारे में बताना चाहता हूं ।
प्रधानमंत्री सड़क योजना अत्यंत महत्वपूर्ण योजना हे, जिससे दूर-दराज के क्षेत्रों से किसान अपनी फसल को लेकर बाजार में पहुंच सकते हैं । मेरे लोक सभा क्षेत्र बाराबंकी के 104 सड़कों के प्रस्ताव जो फेज-7 व 8 में सम्मिलित है की स्वीकृति अभी तक नहीं हो पाई है । मेरा अनुरोध है कि इसकी स्वीकृति तत्काल देकर काम प्रारंभ कराया जाए । मैं यह भी मांग करता हूं कि बीपीएल सूची का संशोधन शीघ्र-अतिशीघ्र कराया जाए क्योंकि यह सूची सही नहीं बनी है और केन्द्रीय योजनाओं का लाभ सही और गरीब आदमी तक नहीं पहुंच रहा है । बाढ़ क्षेत्रों में बनने वाली सड़कों को तारकोल से सड़के न बनाकर सीमेंटेड रोड़ बननी चाहिए ।
बजट बहुत अच्छा है ग्रामीण क्षेत्र का विकास होगा तो देश आगे बढ़ेगा । इसी के साथ मैं ग्रामीण विकास के बजट का समर्थन करता हूं ।
*SMT. PARAMJIT KAUR GULSHAN (FARIDKOT) : Chairman Sir, I thank you for giving me the opportunity to participate in the discussion on the Demands for Grants under the control of the Ministry of Rural Development for 2011-12.
Sir, 70% people of India used to live in the villages. However, as the basic facilities are non-existent in the rural areas, people are migrating from villages to urban centres. The Government has consistently ignored the rural poor. The land under cultivation has come down considerably as farming has failed to become a remunerative profession. More over, fertile lands are being taken over by real estate agents and builders in the name of urbanization. However, sir, this is bound to take its toll on the economic health of the country. As the area under cultivation is shrinking, it will lead to reduction in the production of foodgrains. The gap between demand and supply will increase. We will be forced to import foodgrains at a higher rate. This will further increase inflation and the prices will sky-rocket.
Sir, there are a plethora of schemes. However, their implementation leaves much to be desired. Why have many schemes degenerated into flop-shows? The Government must introspect, discuss things threadbare in Parliament and take corrective remedial measures.
Chairman, Sir, even a much-touted flagship scheme like MGNREGA has failed to deliver as it has reached only 30% of the intended beneficiaries. If an honest survey is conducted in India, we will not find even a single labourer who can claim to have got 100 days of continuous wages.
Sir, all states in India have different sets of problems. Their climate and topography is different from one another. Some states are hilly, some are in the *English translation of the speech originally delivered in Punjabi.
plains. Some state have long coastlines, some are land-locked. Some states get scanty rainfall, other experience heavy downpours. However, a scheme like MGNREGA has a basic flaw. It does not take into account these differences. Instead, it has the same set of rules for all states. This has resulted in its failure.
Sir, step-motherly treatment has been meted out to Punjab even in the case of MGNREGA scheme. Only a paltry sum of Rs.125 crores have been granted to Punjab by the Central Government under this scheme. More money should have been given to Punjab as per the “Job Cards”.
Chairman, Sir, Haryana is our neighbour. Chandigarh is a Union Territory. A daily wage labourer gets Rs.150 per day in these places. However, he gets only Rs.123 per day in Punjab. Many a time, the labourers are not even paid this amount as the Central Government fails to release the funds in time. Moreover, when the cultivation season is on, these labourers get Rs.400 to Rs.500 per day. In such a scenario, there are no takers for Rs.100 wages that is given under MGRNREGA scheme. So, the need of the hour is to review and revise this scheme. And this scheme should be implemented keeping in view the specific conditions of each state.
Sir, under the Indira Housing Scheme only Rs.45,000 is given for the construction of a new house and Rs.15,000 is given for repair works. This is a cruel joke that is played upon the hapless poor. Sir, the mason takes Rs.400 per day. The labourer charges Rs.400 per day for his work. Hence, it is next to impossible to construct a house in the meagre amount of Rs.45,000 that is given under this scheme. Can the Hon’ble Minister name any of his relatives who has constructed a house in just Rs.45,000 ? So, I urge upon the Government to increase this amount to at least Rs.1,00,000, and Rs.50,000 should be given for repair work. The rules should be made flexible so that all those under-privileged people who live in “Kuccha’ houses can also avail of these benefits.
Sir, a measly amount of Rs.15,000 is given under the self-employement scheme. Sir, even a buffalo costs Rs. 60,000. Hence, the loan of Rs.15,000 at 4% interest being given by the Government is of no use. Moreover, the banks demand security which the poor people cannot furnish.
Chairman, Sir, if the Government is honest in its intentions and really wants our rural areas to flourish, then it must provide at least 10 lakh rupees as interest-free loan to the needy. It will help the under-privileged start their own business and become self-reliant.
Sir, Punjab has been consistently ignored as far as PM Road Scheme is concerned. Sir, the Hon’ble Prime Minister had visited Amritsar some time ago.
MR. CHAIRMAN : Please conclude.
SMT. PARAMJIT KAUR GULSHAN : Sir, I am raising a very important point in this august House. The Hon’ble Prime Minister had visited Amritsar recently. He had announced a sum of Rs.250 crores for the development of the border areas of Amritsar. The Punjab Government prepared a proposal worth Rs.250 crores for the construction and repair of rural roads to the Rural Development Ministry. However, this proposal was sent to the World Bank. The Punjab Government will now have to agree to the conditions of the World Bank. Instead of being a grant, it has now become a loan. This is just one instance of the step-motherly treatment that is meted out to Punjab.
MR. CHAIRMAN: Please conclude.
SMT. PARAMJIT KAUR GULSHAN : Chairman, Sir, I have yet to raise several important points. Kindly allow the rest of my written speech to be laid on the table of the House. The injustice that has been done to Punjab should find a place in the records.
SHRI H.D. DEVEGOWDA (HASSAN): Hon. Chairman, Sir, I know the time constraints. With all these things, your goodself has called me. I do not want to take much time. I know the limitations as far as time is concerned.
18.09 hrs (Shri Inder Singh Namdhari in the Chair) I would like to express my sincere views not based on any political considerations or partisan attitude. There are certain schemes drawn by the UPA Government and the Finance Minister has tried to provide certain funds with all these other areas of expenditure, which I can understand. The only thing which I have noticed is, which every hon. Member has already mentioned, the review the progress of money that is going to be released by the Union Government.
We get the progress report with respect to some programmes like 100 per cent or 95 per cent or 90 per cent; they are on paper only. But on the field, it is actually negative. I do not want to make any complaint against any officer, but the schemes are like that; and we try to plug the loopholes. We cannot blame any officer here.
I would like to give my own experience. As the Chief Minister, I went to the residence of a senior bureaucrat who had retired and who had the experience of serving in the Union Government. He was the then Development Commissioner; he is about 85 years now; he is Mr. G.V.K. Rao. I went to his house to understand how some of the projects work, which have been initiated by the Union Government. The then Government was headed by Shrimati Indira Gandhi. They were giving animals to the poor people so that they could survive on production of milk; they were given cows. I visited several areas and then tried to understand from him, why he had initiated such a scheme, as the Development Commissioner. He said, “What to do? We want to spend the money and we want to get progress.” The progress was only on paper. One cow was sold to several people, showing the same cow, on paper; and they were taking the money on that.
The other big experience which I had got is this. Ten cows were given to Scheduled Caste persons; but they were taken by a prominent leader of a village. I went to that village; I got the information and I got him arrested. The next day, all the ten Scheduled Caste people gave a statement in the police station saying, ‘he had kept the cows because we had no shelter and we get the milk. He only tried to protect them; so we kept them in the house of village leader and we get all the milk; there is no misappropriation like that.’ That statement was recorded; and the great man escaped from further prosecution.
This is the system that we have noticed. The Employment Guarantee scheme had been introduced by late Mr. Naik, the former Chief Minister of Maharashtra. We know that the Employment Guarantee scheme had been brought first in the country, in Maharashtra. The Minister hails from that State; he has got vast experience as the former Chief Minister and he knows the difficulties in the rural areas; there is no need for us to explain. I have heard the speeches of several hon. Members; I am very happy. From all the sides, they have given good suggestions.
The question is how to plug the loopholes and how to get the money properly utilized. What is the machinery we should use? Is there any accountability? In our federal structure, we have no area to interfere. The Government of India cannot interfere; it can only release the money. But the operative portion is left to the States. If the States are going to misuse the money, if the States are going to draw the money and use it for the purpose of salaries, they will be left with no money.
The hon. Finance Minister was telling that there will be Rs.one lakh surplus, every day; and nobody will be going for overdraft, in any State. He said that out of 28 States, only 3-4 are in difficulties. I do not know whether he gets the real picture or not. In my humble opinion, I do not know how the States are functioning. There is no need to criticize any State. Please pardon me – there is no need for us to mix politics. Every State is like that.
Our Bihar friends were speaking and I was happy to hear them. Shri Raghuvansh Prasad Singh was one of the honest men and he was holding the Rural Development Ministry in UPA-I. There is no point in making any comment on it. But the issue is, some of the State Governments are surviving only on the money released by the Union Government under its various programmes. There are a number of programmes and it takes about 15 minutes even to list the programmes being initiated by the UPA Government. In this background, I may tell you, Sir, I can sit with you for half-an-hour or one hour, whenever you feel convenient, and give my own suggestions. It is for you to accept them or reject them. This is all I would like to say because of time constraint.
With regard to Employment Guarantee Scheme, I would like to say that it covers one out of five landless labourers. What will the other four do? Do they have to sleep in their houses? They will be going by rotation. You have prescribed 20 days of work to one person. This defect is there. Have you checked up the asset building through various programmes, like road work, or removal of silt in the tank? Your good-self knows it. We also know it as we all come from rural areas.
Shri Yashwant Sinha was talking about the missionaries. How to get their progress? They are going to hammer the officers. What can we do? These are certain defects. You must review the flagship programmes. I feel sorry for the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme. You can remove Mahatma Gandhi’s name from that. With all sincerity and all honesty at my command, I would say that the name of Mahatma Gandhi does not suit that programme.
I do not want to mention the name of the State, but the AG has given a Report.
MR. CHAIRMAN : Shri Devegowda ji, SHRI H.D. DEVEGOWDA : I will stop here.
MR. CHAIRMAN: I am not asking you to conclude. The Chair will feel pleasure if you address the Chair.
SHRI H.D. DEVEGOWDA : I would say that the report of AG or for that matter report of any organization which does auditing has no value today. We have seen this. That is why I would say that there is no question of MPs presiding over such meetings which review the money released by the Government under its various programmes. Instead of making us a party in the sin, you can remove us from the Chairmanship of such committees. We are not worried about it. Why should I become a party to the sin committed by the Government? Why should I be a party to the mistake of the Government policies? Money is not the issue rather spending it is an issue. This is where you can improve. We can give our suggestions, I would not say valuable suggestions.
There are a number of issues. Rural development and agriculture are my favourite subjects. I am waiting from morning not just to speak myself but to hear other Members. I will sit in the House till 9 o’clock because I am not bothered about who speaks what. I want to hear everybody. I do not want to miss the views expressed from both sides on agriculture and rural development as these are my two favourite subjects and that is why I am sitting here. The hon. Minister is the former Chief Minister of Maharashtra and he knows that some of these schemes were first implemented in the country in Maharashtra. He must take the credit and try to improve some of the defects in the programme. In my humble opinion, rural development is one of the best programmes which he can implement with his vast experience.
SHRI PRALHAD JOSHI (DHARWAD): Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to speak on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development.
This Ministry has the highest plan outlay after the Ministry of Defence. Rural India is the real India and the development of the rural India alone can liberate the masses from the shackles of poverty. If rural India is liberated from poverty, social and economic backwardness, then only growth has proper meaning for the whole nation. Otherwise, growth has no meaning. In this background Mahatma Gandhi has said that only gram swaraj can bring swaraj in real sense.
The total plan outlay for the Ministry of Rural Development in 2011-12 is Rs.87,800 crore which is much less compared to 2010-11 when it was around Rs.89,578 crore. So, it has been reduced by Rs.1778 crore. According to me, at a time of such a high inflation, it is substantially less. In his reply, the Minister may kindly tell this House why the outlay has been reduced. This is my humble request to the hon. Minister. There are so many other points on the policy matter but since Shri Yashwant Sinhaji has already made an elaborate speech, straightaway I would come to my State where we are facing a problem on particular rural development issue.
I would like to tell the hon. Minister that for Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana, which was conceptualized by Shri Atal Behari Vajpayee, the outlay has been increased and I welcome it. In respect of its implementation, the Karnataka Government is one of the best in the country and we have taken an award for that. We are second in the country after Gujarat as far as its implementation is concerned. Not only in respect of physical and financial aspects, even qualitatively, the State has achieved the high standards as much as that the State needs to be encouraged with higher allocation.
The Government of Karnataka has submitted its proposal for the ninth phase on 18.2.2010. They have implemented it so well that I think they fall in the category of a few States which have created specific infrastructure to implement the PMGSY. In Karnataka, we have created 29 Project Implementation Units and 50 sub-divisions and they will be idle once work under Phase-VIII is completed, but they have not been given money under Phase-IX.
On 18.12.2010, we had approached the Government of India for Rs.1399 crore for upgradation of 4304 kilometres in Karnataka. Secondly, we have also approached the Government of India after the recent floods in Karnataka. After visiting Karnataka, the central team suggested the State Government to submit a proposal for 1850 kilometres flood affected roads. These roads were constructed under Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana. After that, proposal of Rs.635 crore was sent for 14 districts for 1815 kilometres. The Karnataka Chief Minister met the concerned Minister (Shri C.P. Joshi) at that time. The Minister of Rural Development, Government of Karnataka also met him. As far as my information goes, hon. Moilyji who is sitting here, had also written to the Ministry of Rural Development to release the amount for the ninth phase which is due from the Central Government. It was not given because it was just upgradation but for the upgradation also, as far as my information goes, for Andhra Pradesh it has been given. But it has not been given for Karnataka. I would like to request the hon. Minister to answer this point in his reply. It is my very sincere urge to him as to why ninth phase has not been sanctioned to Karnataka. Why are you not releasing the money? This is discrimination against States. राज्यों के साथ भेदभाव हो रहा है। I want to seriously bring this allegation against the Central Government. राज्यों के साथ भेदभाव हो रहा है। 9वें फेस में जो दूसरे राज्यों को दिया गया है, कर्नाटक को नहीं दिया गया क्योंकि यह भारतीय जनता पार्टी शासित है, इसलिए नहीं दे रहे हैं। I would like to urge upon the Central Government to release the money for the ninth phase immediately because it is pending for the last one and a half years.
Apart from that I would now like to refer to MNREGA.
MR. CHAIRMAN: Time is short.
SHRI PRALHAD JOSHI : Sir, I would finish in another two minutes. I am only the second speaker from my party.
MR. CHAIRMAN: I am really enjoying your speech. But there is a time constraint.
SHRI PRALHAD JOSHI : Though MNREGA is a good scheme but the question is of social accountability. I have some suggestions to make as far as MNREGA is concerned. The scheme is aimed at providing employment. But after five years of its inception we have to concentrate on creating some permanent and durable asset creation through this scheme of MNREGA. But what is happening is that one road is constructed by merely throwing some mud on it, basically it is not fully constructed and after one or two showers during the rainy seasons it gets completely washed away and the same road has to be constructed after a year or so. In order to avoid such kind of a thing and to create a durable and permanent asset, construction of a pucca road has to be thought over. Under MNREGA if once a road is constructed, it should be ensured that it is a puccaroad and the Central Government must do something in that regard.
My second point is about the selection of beneficiaries through the Gram Sabha. ग्राम सभा के लिए लोग नहीं आते हैं इसलिए मेरा सुझाव है कि ग्राम सभा को सिटिंग फी भी देनी चाहिए। It will not be more than Rs. 300 or Rs. 400 crore. To attract the people for Gram Sabha, they should be given some sitting fee.
My next point is about sanitation scheme. In the total sanitation campaign APL is not included. Since in the rural areas, the people under APL do not construct their toilets on their own, they should be given subsidy under MNREGA. The PMGSY caters to inter-village connectivity. Now, some provision also is required to be made for internal village connectivity and for firm approach roads. There is no good firm approach road in the villages.
Under the 13th Finance Commission, under the Panchayati Raj Institutions grant, they are giving a very meagre amount. For example, in my constituency, there is 122 Gram Panchayats. We got only Rs. 51 lakhs last year under this head and so the allocation per Gram Panchayat is even less than Rs. 40,000. So, this allocation has to be increased as per the recommendations of the 13th Finance Commission.
Sir, my last point is about rural hygiene for women. In my constituency one exemplary work has been done. One Self-help Group has come up with a sanitary napkin with assistance from a NABARD scheme. If that can be manufactured by the Self-help Group, then that can also be marketed by the same agency. Finally, the honorarium for the ASHA workers should be increased.
With these words, I would like to thank you for giving me this opportunity to participate in the discussion.
ओश्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़):ग्रामीण विकास मंत्रालय की चर्चा हो रही है । आजादी के बाद से हर वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों की सड़क, बिजली, पानी, सिंचाई, स्वास्थ्य के लिए राशि आबंटित की जाती है । मैं कहना चाहता हूं वह दिन कब आएगा जब हम कह सकेंगे कि अंतिम गांव में भी हैंडपंप का खनन हो गया है । आखिरी से आखिरी गांव में बिजली पहुंच गई है। देश की अंतिम सड़क का भी निर्माण हमने कर लिया तथा एक एकड़ भूमि के कृषक के खेत में भी सिंचाई हेतु आखिरी नहर का निर्माण कर लिया गया है। देश के अंतिम छोर के गांव में भी स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार स्टाफ दवाइयों सहित कर दिया गया है । भारत निर्माण सही अर्थों में तभी पूरा होगा । किंतु दुख के साथ कहना पड़ता है कि आज भी गर्मी के दिनों में गांवों में महिलाएं 3-4 किलोमीटर दूर से सिर पर पानी लाने को मजबूर है । बिजली अभी भी प्रत्येक राज्य के हजारों गांवों में दूर का सपना है । आज भी आटा पीसाने दूर-दूर के गांवों में लोग जाते हैं । प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के प्रति भी सरकार की उदासीनता के कारण अभी भी 250 एवं 500 की आबादी के बड़ी संख्या में गांव सड़कों से दूर है । स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो गांव चिकित्सा सुविधाओं से बहुत दूर है । जिस कारण स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में देश में प्रत्येक वर्ष गांवों में लाखों लोग मृत्यु की ओर बढ़ जाते हैं । दुर्भाग्य यह है कि शहरों में एसी कमरों में बैठकर ग्रामीण विकास का बजट बनाने वाले न तो गांव के जीवन से परिचित होते हैं, एवं न ही उनकी समस्याओं को जानते हैं । अतः ग्रामीण विकास का सपना अधूरा ही रह जाता है तथा ग्रामीण जनों का रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन होकर शहरों की तरफ तीव्रता से बढ़ना हो रहा है जिससे शहरों पर भी बोझ बढ़ रहा है ।
गांवों का विकास करने के लिए कृषकों को समुचित सिंचाई सुविधाओं के साथ सूखा से निपटने के लिए भी पर्याप्त आपदा प्रबंधन होना चाहिए । समय पर खाद, बीज उपलब्ध कराना चाहिए । पर्याप्त मात्रा में ताकि किसानों को ब्लैक में नहीं खरीदना पड़े । उपलब्ध जनशक्ति का उपयोग करने तथा उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने के लिए शासकीय योजनाओं एवं मशीनरी का सार्थक दिशा में उपयोग होना चाहिए । मनरेगा के अंतर्गत राज्यों को उनकी श्रमशक्ति के अनुरूप पर्याप्त राशि उपलब्ध करानी चाहिए । इंदिरा आवास एवं राजीव आवास योजना से वास्तविक आवासहीनों को आवास उपलब्ध कराना चाहिए ।
अपने गांव एवं अपने देश को सुंदर और संपन्न बनाना है तो जन-जन की शक्ति को देश की ताकत बनाना होगा । एक अरब बीस करोड़ की आबादी में युवाओं की संख्या 50 प्रतिशत है । यह बहुत बड़ी शक्ति है । उन युवाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ना होगा । उन्हें उनकी रूचि अनुसार गांवों में भी रोजगार के अवसरों को बढ़ाना होगा, भारत निर्माण का स्वप्न तभी पूरा होगा ।
* Speech was laid on the Table श्री हरीश चौधरी (बाड़मेर): सभापति महोदय, इस बार का बजट गंगा, गांव और गांधी के देश के आम आदमी को हाशिये से निकाल कर केन्द्र में लाने के लिये ऐसे प्रयास के रूप में जाना जायेगा जिसका असर न केवल देश की अर्थ-व्यवस्था पर समृद्ध रूप से पड़ेगा बल्कि ग्रामीण भारत और अरबन इंडिया के बीचे के पुल का फासला भी कम करने के लिये पड़ेगा।
सभापति महोदय, पेयजल से ज्यादा किसी भी वस्तु की आवश्यकता इन्सान को नहीं होती है। पिछली बार बजट के समय मैंने पेयजल के अधिकार की मांग इस सदन में रखी थी। मैं उस मांग को फिर से दोहराना चाहता हूं । मैं केन्द्र सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि 8415 करोड़ रुपये राष्ट्रीय पेयजल योजना के अंतर्गत सरकार ने दिये हैं। मैं आपके माध्यम से सदन को बताना चाहता हूं कि पेयजल के स्रोत के बाड़मेर जिले में जो पारम्परिक साधन है, वह एक आदर्श व्यवस्था है। इसमें बारिश के पानी को एकत्र करके पेयजल और दूसरे काम के लिये विश्व में अगर विश्वस्त तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। हम लोगों को आज पूरे विश्व में पानी के लिये चिन्ता है, तो एक मॉडल के तौर पर उसे लेना चाहिये। एक सर्वे के अनुसार वर्ष 1970-71 में प्रति व्यक्ति लैंड होल्डिंग 2.28 प्रतिशत थी तो वर्ष 2005 में घटकर 1.23 प्रतिशत रह गई है। आज इस देश में किसानों के सामने सब से बड़ी समस्या उनकी जमीन की है। किसान के साथ सिर्फ उसका भगवान है या काश्त करने वाली जमीन उसके साथ है। इस सदन में माननीय सदस्य कई बार इस बात को उठा चुके हैं। पिछले सप्ताह माननीय श्री शरद यादव जी ने भी यह बात उठाई थी। आज इस देश में कई प्रकार से भूमि अधिग्रहण के मामले हो रहे हैं। मेरे खुद के संसदीय क्षेत्र बाड़मेर में एक बहुत बड़ा कोयले के खदान के लिये भूमि अधिग्रहण हुई है। भूमि अधिग्रहण तेल-दोहन के लिये हुआ है।भूमि अधिग्रहण डैजर्ट नेशनल पार्क के लिये हुआ है लेकिन जो बात कागजों पर है, वह वस्तुस्थिति धरातल पर बिलकुल नहीं है। अभी हम सुन रहे हैं कि चीता अभ्यारण्य डैजर्ट में बनाने के लिये भूमि अधिग्रहण की बात चल रही है। मेरे क्षेत्र फतेहगढ़ में आर्मी की फायरिंग रेंज के लिये बात चल रही है। सब मानते हैं कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है कि हम लोग रक्षा के लिये अपनी जमीन देने के लिये तैयार हैं। लेकिन उसी जिले में आबादी की जमीन नहीं लेकर दूसरी जमीन जिस में आबादी कम है या नहीं है, अगर उसकी तरफ ध्यान दिया जायेगा तो हमारे जिले के लोगों को राहत मिलेगी।
सभापति महोदय, मनरेगा के बारे में इस सदन में काफी कुछ कहा जा चुका है, उसमें नकारात्मक भी कहा जा चुका है। मेरे खुद के जिले बाड़मेर के अंदर 50 हजार टाकों का निर्माण हुआ है। उनमें 1340 मिलियन लीटर पानी एकत्र हुआ है। मैं सदन को यह अवगत कराना चाहता हूं कि हम लोगों को रोजगार की थोड़ी-बहुत मदद मिली है तो मनरेगा के अंदर मिली है। इसलिये केवल नकारात्मक पहलू न देखकर, कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं, उनकी तरफ भी सदन को देखना चाहिये। वित्त मंत्री जी ने खुद इस सदन और देश को आश्वस्त किया है कि मनरेगा डिमांड वाली स्कीम है, इसके अंदर पैसों की कोई कमी नहीं आयेगी, उसके बावजूद बजट एलोकेशन को लेकर चिन्ता जाहिर की जा रही है, यह बात मुझे समझ में नहीं आती है।
सभापति महोदय, मुझे बहुत कुछ बोलना है लेकिन समय की कमी है जिस वजह से मैं कम बोल रहा हूं। इस देश के अंदर जो पिछड़ा हुआ क्षेत्र है, या कोई भी प्राकृतिक आपदा रखने वाले क्षेत्र हैं, उन को हम लोग प्राथमिकता देते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए भी इसी सोच के साथ केंद्र सरकार दस प्रतिशत राशि का ग्रामीण विकास के अंतर्गत आबंटन करती है। मैं इसके लिए केंद्र सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं। हम जिस रेगिस्तान के इलाके से आते हैं, वहां की बहुत ही विषम परिस्थितियां हैं। मालिक ने पूर्वोत्तर राज्यों को पेड़ और पानी से तो भरपूर सहयोग दिया है, लेकिन हमारे रेगिस्तान के इलाके के अंदर पेड़ और पानी की भी कमी है। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि हिल्ली एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के समकक्ष डैजर्ट एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम, जो पहले चलता था, उसे वापस चालू करके रेगिस्तान के इलाकों के अंदर इस प्रकार की सुविधा दी जाए।
सभापति महोदय : आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री हरीश चौधरी: महोदय, थोड़ा बहुत रिलैक्सेशन हमें भी दे दीजिए, आपने बाकी सभी को रिलैक्सेशन दिया है। रेगिस्तान के इलाके सबसे पिछड़े हुए इलाके हैं। मैं आखिरी बिन्दु बताकर अपनी बात समाप्त करता हूं। टोटल सैनिटेशन के अंदर जो 2200 रूपये शौचालय के लिए दिये जा रहे हैं, वह बहुत ही कम राशि है। उन 2200 रूपये से धरातल पर शौचालय नहीं बन पा रहा है, इसके कारण सैनिटेशन की टोटल राशि का उपयोग नहीं हो रहा है।
महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहता हूं कि इस 2200 रूपये की राशि को बढ़ायें, जिससे संपूर्ण स्वच्छता अभियान के अंदर हम लोगों को फायदा मिलेगा। आपने मुझे इतना समय दिया, इतना बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। मैं केंद्र सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। मैं सोनिया गांधी जी को, मनमोहन सिंह जी और ग्रामीण विकास मंत्री जी को शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि उन्होंने ऐसा बजट दिया है।
सभापति महोदयः हरीश जी, जितनी बैंचें आपके समय थपथपायी गयीं, बहुत कम लोगों के समय में ऐसा हुआ है।
श्री राजू शेट्टी (हातकंगले):महोदय, गांवों की आबादी बढ़ रही है और बढ़ती आबादी के तहत आज इस देश के गांवों में कोई प्लानिंग नहीं है। मैं मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहता हूं कि वे गांव के प्रधान से आज ग्रामीण विकास मंत्री बन चुके हैं, लेकिन आज भी इस देश के गांव वैसे के वैसे ही हैं।
महोदय, शहरों के लिए टाउन प्लानिंग होती है, वहां नव-निर्माण करने के लिए लॉज होते हैं, लेकिन गांवों की जो आबादी बढ़ रही है, उसके लिए कोई प्लानिंग नहीं है, उसके लिए कोई एक्शन प्लान नहीं है। आज गांवों की सड़कों की बहुत बुरी दुर्दशा हो चुकी है। मैं मंत्री महोदय से मांग करता हूं कि टाउन प्लानिंग के तहत रूरल प्लानिंग की भी हर गांव में आवश्यकता है। गांवों की बढ़ती हुई आबादी के लिए कुछ प्लानिंग होनी चाहिए। गांव की कितनी आबादी है, उसमें कितने स्कूलों की आवश्यकता है, सड़कों की क्या आवश्यकता है, पीने के पानी आदि के बारे में प्लान करने की आवश्यकता है।
महोदय, आज जो छोटे गांव हैं, न तो उनके पास कोई पैसा है और वे कोई भी नव-निर्माण नहीं कर सकते हैं। इसके लिए कोई एक्शन प्लान बनाने की आवश्यकता है। बाबुल गांव जैसे छोटे गांव के सरपंच रहने वाले विलास राव जी से मेरी विनती है कि इस देश में जो छोटे-छोटे गांव हैं, कस्बे हैं, वे उनके लिए कोई एक्शन प्लान करें। मैं उनसे ऐसा करने की विनती करता हूं।
महोदय, मुझे मंत्री महोदय से एक निवेदन और करना है। गांवों में किसानों को खेत तक जाने के लिए सड़क की कोई व्यवस्था नहीं है। आज खेती में बहुत बदलाव हो रहा है, यात्रिकीकरण हो रहा है। अब बैल की जगह ट्रैक्टर आ गये हैं, लेकिन खेत तक जाने के लिए किसानों के पास सड़क की कोई व्यवस्था नहीं है। मैं मंत्री जी से विनती करता हूं कि इस देश के हर-एक गांव के किसानों को उनके खेत तक पहुंचने के लिए वे अच्छी सड़क बनवायें। हमारी सरकार आज किसानों से कह रही है कि विदेश में जाकर अपनी फसलें बेचो, अपनी खेती का माल बेचो, लेकिन अगर किसान अपने खेत तक भी नहीं पहुंच सकेगा तो वह विदेशी बाजार में क्या जायेगा। इसलिए एक अच्छी सी सड़क हर-एक गांव के किसानों को उनके खेत तक जाने के लिए दिलवाने की आवश्यकता है।
महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से, खासकर सरकार से एक और विनती करना चाहता हूं। पहाड़ी इलाकों में रहने वाले, खासकर महाराष्ट्र के पश्चिम घाट में जो पहाड़ी इलाका है, उसमें रहने वाले बकरी पालने वाले लोग हैं। जंगल में रहने वाले आदिवासी तथा छोटी छोटी बस्तियों में रहने वाले जो लोग हैं, उनके यहाँ तक सड़क नहीं पहुँची है। वहाँ फॉरैस्ट के कुछ रूल्स हैं जिसकी वजह से सड़क नहीं बन पाई है। उनकी तीन-चार सौ की आबादी है और इन पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों को गाँवों तक पहुँचाने के लिए प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत कोई खास पैकेज देकर सड़क बनवाने की नितांत आवश्यकता है। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत महाराष्ट्र में बहुत सारे काम पिछड़ गए हैं। कहीं फॉरैस्ट रूल्स के तहत वे काम अटक गए हैं। उनका डीएसआर बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि कोई भी ठेकेदार पुराने काम करने के लिए तैयार नहीं है। पुराने काम नहीं हो रहे हैं, इसलिए आगे की प्लानिंग सैंक्शन नहीं हो रही है। इसके लिए भी मंत्री महोदय से मेरी विनती है कि इसके लिए गंभीरता से सोचें।
सभापति जी, मेरी एक और विनती है। मेरे चुनाव क्षेत्र में खासकर कोल्हापुर में पंचगंगा नदी बहती है। भारत सरकार की तरफ से गंगा शुद्धीकरण के लिए तो करोड़ों रुपये दिये गये लेकिन मेरे चुनाव क्षेत्र में बहने वाली पंचगंगा नदी बहुत गंदी हो चुकी है। इस नदी के किनारे रहने वाले बड़े शहर और औद्योगिक क्षेत्र से जो पानी नदी में छोड़ दिया जाता है, उससे पानी गंदा हो चुका है और वही पानी गाँव के लोगों को पीना पड़ता है और गैस्ट्रो जैसी बीमारियाँ आज भी वहाँ फैल रही हैं। राष्ट्रीय पेयजल योजना के तहत इन गाँवों के लिए विशेष पैकेज देने की नितांत आवश्यकता है। मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से विनती करता हूँ कि इसके बारे में विचार करें।
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन (भागलपुर):सभापति जी, मेरा सौभाग्य है कि आपके चेयर पर रहते मैं पहली बार बोल रहा हूँ।
सभापति महोदय: मैं तो आपके बोलने के लिए समय की व्यवस्था कर रहा था, और प्रहलाद जी को कह रहा था कि थोड़ा कम बोलिये, लेकिन वे पूरा बोल गए, थोड़ा सा अतिक्रमण कर गए।
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : सभापति जी, आपको देखकर मेरा कॉनफिडैन्स काफी बढ़ा है।
महोदय, मैं एक गंभीर विषय यहाँ रखना चाहता हूँ। मैं अपने क्षेत्र के बारे में और प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के बारे में ग्रामीण विकास मंत्री जी से मिला था। जैसा कि हमारे पहले वक्ता ने कहा कि बिहार में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में पहले 2004 में जो सड़कें ली गईं, एक टर्म बीत गया और वे सड़कें नहीं बनीं। जो सड़कें बाद में ली गईं, वे बन गईं क्योंकि वह एनबीसीसी की है और उसका रेट रिवाइज़ नहीं हुआ। हमारे यहाँ राजपुर-मुरहन पथ है, उस पर पुल बनना है। वहाँ जाना मुश्किल है। लोगों को लगता है कि एमपी साहब इतने प्रभावी हैं लेकिन सड़क क्यों नहीं बन रही है और बगल में क्यों बन रही है? इस बार विधान सभा के चुनावों में वहाँ के लोगों ने बॉयकॉट भी किया। उसी तरह एक भवानीपुर की सड़क हमारे यहाँ है। उसी तरह एक ढलवज्जा-खैरपुर की सड़क है और उसी तरह तिलघी गाँव की सड़क है। इन सब सड़कों पर जाना मुश्किल है। मैम्बर ऑफ पार्लियामैंट के बारे में लोग पर्सैप्शन बना लेते हैं। लोगों को इतनी उम्मीद हो जाती है कि ये मैम्बर ऑफ पार्लियामैंट हैं, यह केन्द्र की योजना है, ये आएँगे, एक नज़र देखेंगे तो हमारी तकदीर बन जाएगी। लेकिन यहाँ कहने के बावजूद कुछ नहीं हुआ। जब मैं पैटीशन कमेटी का चेयरमैन था, तो उसमें यह इश्यू आया। मैंनै मंत्रालय के लोगों को बुलाकर बात की। सैक्रेटरी लैवल के ऑफिसर आए, वे कमिटमैंट देकर चले गए कि राजपुर-मुरहन पथ बनाएँगे, भवानीपुर की सड़क बनाएँगे, ढलवज्जा-खैरपुर की सड़क बनाएँगे लेकिन नहीं बनी। ...( व्यवधान)
सभापति जी, मैं आपके ज़रिये अनुरोध करना चाहता हूँ कि मंत्री जी मुख्य मंत्री भी रहे हैं। इनसे बहुत उम्मीद है। जोशी जी जब मंत्री थे, तब भी उनको हमने बहुत एप्लीकेशन दीं लेकिन वे निरर्थक हो गईं, उसमें हमारा कोई काम नहीं हो सका। आपसे उम्मीद है कि यह जो हम लोगों की सड़कें हैं, जो सड़कें प्रधान मंत्री सड़क योजना में एनबीसीसी की ली गईं, आपके भी क्षेत्र का मामला होगा, और जगहों का भी मामला होगा कि पहले वह सड़क बननी चाहिए। अगर रेट रिवाइज़ करना है तो फिर से कर दीजिए। उस योजना में जब काम शुरू नहीं हुआ तो उसमें पैसा देने में क्या दिक्कत है?
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में बिहार के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।
महोदय, 22 तारीख को बिहार दिवस है। सभापति जी, आप भी बिहारी रहे हैं, अब झारखण्ड में हैं। बिहार दिवस है, इसलिए पूरा बिहार आपसे बहुत सारी उम्मीद लगाए हुए है। वहां के एक अखबार प्रभात खबर में यह बात चल रही है कि बिहार को विशेष दर्जा दिया जाए। हम उसके लिए साइन करने गए थे, पूरा आंदोलन चल रहा है। बिहार को विशेष दर्जा दिए जाने की तो हम मांग करते हैं, लेकिन बिहार इसी देश में है, नौ करोड़ लोग वहां रहते हैं, उनकी चिंता करना, मतलब देश की चिंता करने के बराबर है। हम यह समझते हैं कि यदि देश तरक्की करेगा और बिहार पिछड़ जाएगा तो फिर हम कैसे कहेंगे कि देश तरक्की कर रहा है? आज बिहार सरकार अपने संसाधन पर काम कर रही है। हम आपसे कहना चाहते हैं कि आप हमें विशेष राज्य का दर्जा कब देंगे, नहीं देंगे, वह अलग बात है, लेकिन कम से कम ग्रामीण विकास मंत्रालय में हमारा पैसा नहीं रूकना चाहिए। अभी हमारे यहां अनुश्रवण समिति की चर्चा हुई। हम लोग उसके अध्यक्ष हैं। उसमें दांत नहीं हैं और पावर दे दिया गया। कुछ होता नहीं है। बिना बात के जाएं और जाने के बाद कुछ बोलने पर यदि कुछ न हो तो ऐसी कमेटी बनाने का क्या फायदा है? आप केन्द्र सरकार की स्कीम्स को यहां से भेजते हैं, बिहार या अन्य राज्यों में विधायकों के लिए अलग से स्कीम, लेकिन केन्द्र सरकार की स्कीम्स में यदि सांसद का दखल आप बढ़ा देंगे तो ज्यादा फायदा तो आप ही को होगा, क्योंकि आपके ज्यादा सदस्य हैं। आपके 206 सदस्य हैं। मैं कोई ऐसी बात नहीं कह रहा हूं कि जिससे सिर्फ हमें ही फायदा हो। प्रणब दादा ने एमपी फंड बढ़ाया है, वह पैसा भी तो राज्य में जाएगा। अगर विकास होगा, तो राज्य का भी तो विकास होगा। विलासराव जी मैं आपसे उम्मीद करता हूं कि आपका भी बहुत नाम होगा, अगर आप सांसदों में अपनी लोकप्रियता चाहते हैं, तो आप अनुश्रवण समिति को ताकत दीजिए। जो हैंडपम्प देते हैं, उसमें एमपी की अनुशंसा होनी चाहिए।
सभापति जी, मैं एक बहुत गम्भीर विषय उठाना चाहता हूं। मैं गंगा नदी के तट का सांसद हूं। बनारस के बाद सबसे ज्यादा उत्तर वाहिनी गंगा हमारे क्षेत्र भागलपुर से कहलगांव तक बहती है। यह ऐसी जगह है, जहां से लोग गंगा जल लेकर निशीकांत जी के क्षेत्र देवघर जाते हैं। लेकिन आज गंगा के तट पर पानी आर्सनिक हो गया है। वाटर लेवल ऐसा हो गया है, जैसे कि एटम बम गिरने के बाद लोग अंधे पैदा होते हैं, किसी का पैर टेढ़ा हो गया है, हमारे क्षेत्र जगदीशपुर ब्लाक के अंदर पानी इतना आर्सनिक हो गया है कि लोग बीमार हो गए हैं। आज पानी की बहुत समस्या है। बिहार के अंदर वाटर लेवल बहुत नीचे चला गया है। बिहार सरकार अपने दम पर काम कर रही है, लेकिन हम आपसे कहना चाहते हैं कि ऐसी योजना बनाइए कि जो वाटर लेवल गिर गया है, उसके लिए अलग से इंतजाम करना चाहिए।
मैं आपके जरिए एक और अनुरोध करना चाहता हूं।
सभापति महोदय : आप इस विषय को अति गंभीर कह दीजिए।
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : हमारे राज्य से आपके राज्य में जाने के बीच में एक गेरूआ नदी आती है। सनहौला से हनवाड़ा एक रास्ता है, जहां पुल नहीं है। वह रास्ता ग्रामीण विकास मंत्रालय की मदद से बिहार सरकार बना रही है, लेकिन अगर वहां सेतु बन जाए, महोदय, हम तो सेतु बनाने वाले लोग हैं, जहां समाज टूटता है, वहां खड़े हो जाते हैं। जहां रोड़ टूटती है, वहां खड़े हो जाते हैं। हमने सिर्फ सेतु बनाने का काम किया है।...( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप चेयर को सम्बोधित कीजिए। आप स्वयं टोका-टाकी को आमंत्रित करते हैं।
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : महोदय, जब हमारे ये साथी कल्याण जी के साथ थे, तब सेक्यूलर बन गए थे।...( व्यवधान) महोदय, मैं अच्छी बात कह रहा था। मेरी जिंदगी का मकसद सेतु बनाना है। टूटे हुए दिल को जोड़ने का काम करना चाहिए। मैं आपके जरिए अनुरोध करता हूं कि बिहार से झारखंड अलग हो गया है।
हमारा रिश्ता रहा है, आप पटना में इतने दिन तक रहे। अगर मेरे क्षेत्र से आएंगे, ये हमारे पड़ौसी हैं, पड़ौसी से अच्छा रिश्ता होना चाहिए या नहीं?...( व्यवधान)
सभापति महोदय : अच्छा रिश्ता होना चाहिए।
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : पड़ौसी के क्षेत्र में गोड्डा में सनहौला से हनवाड़ा के बीच में एक बड़ा पुल है। अगर आपकी नज़रे इनायत हो जाएं या नज़रे करम हो जाए, एक नज़र से आप देख लें तो उस इलाके के लोगों की तकदीर संवर सकती है।
सभापति महोदय, हम आपके माध्यम से मंत्री जी अनुरोध करते हैं कि इसे जरूर करना चाहिए। ब् सभापति महोदय: शाहनवाज़ जी, आपको कहना चाहिए था कि हम बावफा थे, इसलिए नज़रों से गिर गए, शायद उन्हें तलाश किसी बेवफा की थी।
SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI): Thank you, Mr. Chairman, Sir, for opportunity to speak on the Demands for Grants relating to the Ministry of Rural Development.
The total budget provision of the Department of Rural Development for 2011-12 is Rs.74,143.72 crore, out of which a provision of Rs.74,100 crore has been provided under plan and Rs. 43.73 crore under non-plan. Under this, there are National Rural Employment Guarantee Scheme, Swarna Jayanti Gram Sadak Yojana, DRDA, Rural Housing, Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana are very important schemes.
सभापति महोदय: निशिकांत जी और शाहनवाज जी, मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप जरा बैठ जाइए।
SHRI S.S. RAMASUBBU : Now-a-days, there are provisions for the urban amenities for the rural areas, management support to R&D programme, PPL survey, which are all the important programmes and are being implemented for the rural areas.
Out UPA Government has made a marvelous achievement by the implementation of the rural programmes. Our country consists of various rural sectors where we are dependent on our villages. So, a balanced development is inevitable for the development of the nation. Both the urban and rural programmes should go hand in hand in the development process.
These are all the new programmes and our UPA Government has given a number of programmes for the development of our nation. One of the most important, historical and marvelous programmes is the rural employment programme. MNREGA is a very important programme as because of this programme, so many people in the rural areas are getting employment opportunities. Our UPA Government has given crores and crores of rupees for this programme. Through this programme, the UPA Government not only gives employment opportunities to people but it gives equal employment opportunity to men and women. That is very important. Empowerment of women is very important for our nation. The UPA Government is giving more importance to the women folk. No Government, even the Communist Government or the BJP Government, has given this equal opportunity to women. The UPA Government has given equal opportunity to men and women and empowerment of the rural women. This is very important to note.
At the same time, under the PMGSY, we are giving road facilities in every part of the country. Our senior Leader from the BJP side, Shri Yashwant Sinha, asked whether there is any improvement in the road facilities in our country. Most of the BJP Members told that there is no progress because of this road scheme. I would like to tell them frankly that in my constituency we are searching for new roads to be developed because we have already fulfilled the target under this scheme. This is a very important scheme to link the urban and rural areas. Because of this scheme, the rural areas are linked with the urban areas. Now the development is automatically taking place because there is a connection between the rural people and the urban people. This is a historic achievement of our UPA Government.
Now there is a very important point. We have given a new scheme for the rural development, namely, National Land Records Modernisation Programme. This is a very important programme. In the rural areas, there are some people selling their lands without knowing the owner of the land. When they go to register the name of the owner of the land in the Registrar’s Office, they face problem. Most of the lands belonging to the poor people in the rural areas are swindled. Nowadays the goondas and the brokers are swindling the lands of these poor people. Now there is the National Land Records Modernisation Programme and I would like to request our hon. Minister that the revenue department and the registration department should join together because immediately after the registration of the land, the land should be given the patta through the revenue department. Simultaneously, it should take place. Otherwise this problem will always be there in the rural areas. This problem is arising not only in the rural areas but also in the urban areas. There are so many other problems in the rural areas.
Water is an important thing. There should be provision of drinking water for the rural people. Water is essential for them. We have to implement our rural schemes. Nowadays, there are so many schemes for the provision of drinking water in our UPA regime. We have to give water facility to the people in the rural areas also *SHRI BHAUSAHEB RAJARAM WAKCHAURE (SHIRDI): I would like to say that though the Government has taken several measures to improve the standard of rural life, yet the status of the rural people, condition of rural people is not so good comparing to other developing and developed countries of the world.
It is a common say that India lives in its villages. More than 75% population of our country live in villages. But it is very sad that in the last 25 years while the cities have developed rapidly and enormously, rural areas of our country have not pulsed that kind of development. So, to make India strong, to make India’s economy strong, special thrust to be given to it. The rural economy needs to grow.
Despite taking so many steps by successive Governments to strengthen the rural economy and making the standard of life of our villagers, who toil in field for growing agricultural produce to feed a country with more than 120 crores people, the status of rural people has not elevated to a reasonable level. It is our misfortune. It is a great shame that after so many years of our independence, farmers from different parts of our country opt for suicidal route.
Rural areas are still beleaguered by problems of illiteracy, unemployment, malnourishment. Many of our villages are still backward, since these lack of basic infrastructure like schools, colleges, hospitals, sanitation, etc. If in some villages these facilities are available on pen and paper, but when you go there you will see that there is no teacher in the schools, no doctor, staff in the hospitals and proper sanitation is not available.
As there is no job available in villages, the youth from villages are moving out of villages in search of work to big cities. As a result of this our cities are also facing great population pressure and sometime not able to cater the need of the people of the cities as well as of these migrant people. Our villages need to grow at the speed in which cities are growing and standard of life of the villages has to be improved for inclusive growth of Indian Economy. If rural India is poor, India is poor.
India lives in many generations, if one pay visit to rural areas he can feel how our villages lag behind cities by decades. While we have latest services and products available in our cities, villagers are still coping with age old products. Some examples of difference in the standard of life and services of Cities and villages are – Cities have good schools with basic amenities, infrastructure but the schools in villages still don’t have benches and chairs. Computer is like a dream for the pupil of village schools. There is a huge shortage of teachers in rural areas, and the school dropout rate is also high. Whereas cities we have wide roads, flyovers and underpasses but many villages still don’t have proper roads. Urban-rural road links can play a vital role in rural growth. Employment opportunities are hardly there in villages which forces youth to move to cities creating imbalance in the ecosystem and leaving the villages deprived. In cities there are a large number of reputed hospitals, nursing homes and medical facilities, but villages neither have health awareness nor health facilities. So villagers have to go to big cities like, Mumbai, Delhi for treatment and only some rich village people can do so. And poor village people have no other option than to surrender to death without treatment. Many villages are not electrified.
I urge upon the Government to take following measures to strengthen our villages and the people lived therein.
1. Good School with basic amenities, bench, rooms, drinking water and to see that the teachers and staff work there.
2. Proper land reforms to make sure land is held, owned, cultivated, irrigated to make the most efficient use and maximum output which arrest the rend to rural youth to venture to cities in search of job.
3. Rural credit Banking services need to be popularized and credit with very low interest should be available for basic services like agriculture.
4. Electrification- Many villages still receive only 2 to 6 hours of electricity per day which needs to drastically improve to empower the villages of India. And the villages which are without electricity should be electrified.
5. Roads- All roads should be constructed with latest technology like it is done in cities so that all villages can be connected with main cities.
6. Good hospitals, Medical Centres should be set up so that rural people can get treatment in their villages without going to big cities.
At the last, I want to emphasize here, what we need is to empower the rural people by providing them education and proper health care. There is need to have infrastructure like electricity and water in villages so that they are free from the cycle of droughts and floods. We need to give them self-employment so that they should stay in villages instead of migrating in cities. There is a need to empower the villagers, and not just supporting them by food subsidies, loan waivers which end up crippling them. India will grow only when rural India marches hand in hand with cities in the twenty first century.
श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी (कोकराझार): आदरणीय सभापति जी, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं। I am very much thankful to you for giving me this opportunity to take part in the discussion on the Demands for Grants under the control of the Ministry of Rural Development for the year 2011-12.
मैं बड़ी तकलीफ और दुख के साथ एक बात दुबारा कहना चाहता हूं। जब जनरल बजट के ऊपर चर्चा चल रही थी, उस समय मुझे इस पर बोलने का ज्यादा समय नहीं मिला। मैं बहुत दुख और तकलीफ के साथ एक बात बताना चाहता हूं कि मैं बोडोलैंड स्वशासित अंचल से आया हुआ एक सांसद हूं। हमारे बोडो लैंड स्वशासित अंचल में टोटल आबादी 30 लाख है। इस आबादी के लिए हिन्दुस्तान की केन्द्रीय सरकार को सेंट्रल बजट में से जितना हिस्सा देना चाहिए था वह नहीं दिया। वर्ष 2009-10 और वर्ष 2011-12 में सिर्फ 50 करोड़ रुपए धनराशि आबंटित की है। यह बहुत कम है। It is a very meagre amount. And I do realy feel that by allocating only this meagre amount of fund, three million people of Bodoland area have been insulted like anything. It is very unfortunate because the budgetary fund for a nation or for a province increases every year.
19.00 hrs. Is it not a matter of an insult? कैसे इतनी कम धनराशि में कई 100 सालों से इतना पिछड़ा हुआ हमारा बोडोलैंड किस ढंग से, कैसे विकास करेगा, कैसे उसकी उन्नति होगी, इसलिए मैं मांग करना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान की सरकार हमारे बोड़ोलैंड स्वशासित अंचल को हर दिशा में विकास करने के लिए, उन्नति करने के लिए कम से कम और हर साल में एक हजार करोड़ रुपये आबंटन करने का दायित्व पूरा करे। यह भारत सरकार का दायित्व बनता है, फर्ज बनता है। This is the moral as well as constitutional responsibility and duty of the Government of India to allocate a minimum amount of Rs.1,000 crore per annum for the overall wellbeing and development of three million people living in Bodo area. उसके साथ मेरी जबरदस्त मांग है कि हमारे बोड़ोलैंड अंचल में रास्तों की बहुत कमी है, इसलिए पी.एम.जी.एस.वाई. के अन्दर रास्ते बनाने के लिए एक हजार करोड़ रुपया भारत सरकार की तरफ से देने की जरूरत है।
हमारे बोड़ोलैंड अंचल में भारी संख्या में नद-नदियां हैं, वे नद-नदियां हमेशा बाढ़ की समस्या और इरोज़न की समस्या की सृष्टि करके लोगों को बहुत परेशानी देती हैं । उस फ्लड और इरोज़न का मैनेजमेंट करने के लिए कम से कम एक हजार करोड़ रुपया हमारे बोड़ोलैंड अंचल को देने की जरूरत है।
मैं मांग करता हूं कि भारत सरकार असम और उत्तर पूर्वांचल की फ्लड और इरोज़न की जो समस्या है, उसको नेशनल समस्या के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है।...( व्यवधान)The flood and erosion problem of Assam should be recognized by the Government of India as the national problem, and for that huge amount of Central fund must be sanctioned and provided to the State Govt. of Assam and also to Bodoland Territorial Council.
सभापति महोदय : श्री नीरज शेखर।
श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी : उसके साथ-साथ मैं और मांग करना चाहता हूं कि मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स के लिए इस साल के बजट में जितनी धनराशि आबंटन की है, वह भी बहुत कम है। सारे हिन्दुस्तान में हमारे शैडय़ूल्ड ट्राइब्स की आबादी आज कम से कम 10 परसेंट होगी, इसलिए 10 परसेंट ट्राइबल्स के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में हर साल Ministry of Tribal Affairs को केन्द्रीय सरकार की तरफ से धनराशि देने की जरूरत है ।
सभापति महोदय : अब यह रिकार्ड में नहीं जायेगा। श्री नीरज शेखर।
(Interruptions) …* सभापति महोदय : आपको इसलिए भी जल्दी बिठाना जरूरी था कि कितने हजार करोड़ रुपये की मांग हो जायेगी, पता नहीं।
श्री नीरज शेखर (बलिया):सभापति जी, आपने मुझे इस विषय पर बोलने का मौका दिया है, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
पिछले कई दिनों से मैं सुनता आ रहा हूं, कभी प्रधानमंत्री जी बोलते हैं, कभी वित्त मंत्री जी बोलते हैं कि इन लोगों का, यू.पी.ए. का प्रयास है कि दो भारत न बनें, एक अमीरों का भारत और एक गरीबों का भारत, लेकिन मुझे लगता है कि यू.पी.ए. सरकार यही चाहती है कि दो भारत बनें, बल्कि दो भारत बन चुके हैं। अगर...( व्यवधान)
सभापति महोदय : श्री आरुन रशीद जी, आप बैठिये। लाल सिंह जी, आप मत कहिये।
…( व्यवधान)
सभापति महोदय : मेघवाल जी, आरुन जी, प्लीज़, आप बैठिये। आप भी बैठ जाइये।
…( व्यवधान)
सभापति महोदय : नीरज जी। जब चेयर कंट्रोल करने के लिए यहां पर है तो प्लीज़ बैठ जाइये।
…( व्यवधान)
सभापति महोदय : आरून रशीद जी, मैं आपसे आग्रह करना चाहता हूं, आप कहें तो मैं आपको बोलने का मौका देता हूं, आप इसका जवाब दीजिए, लेकिन बीच में व्यवधान मत कीजिए। एक बात और लाल सिंह जी, मैं गिन रहा हूं कि आपने मेरे बैठने के बाद कितनी सीटें बदली हैं। ...( व्यवधान)
श्री नीरज शेखर : सभापति महोदय, जब ग्रामीण इलाके की बात आती है, तो हम लोग तय कर लेते हैं कि ग्रामीण इलाके में 6 घंटे बिजली रहेगी और शहरों में 24 घंटे बिजली रहेगी। जहां तक चिकित्सा की बात है, इस सरकार ने कह दिया है कि तीन साल में डाक्टरी हो जाएगी और ग्रामीण इलाके में वे रहेंगे। शहरों के लिए पांच साल और ग्रामीण इलाके में तीन साल का डाक्टर, यह कहां तक सही है? दो भारत यह खुद बना रहे हैं। आज 63 साल बाद भी हम लोग अपने लोगों को स्वच्छ पीने का पानी नहीं दे पाए हैं। विशेषकर मैं अपने जिले की बात कहता हूं, आज वहां लोग आर्सेनिक पानी पी रहे हैं। वहां तीन सौ हैंडपंप हैं, जहां आबादी करीब चालीस लाख है, वहां केवल तीन सौ हैंडपंप फिल्टर लगाकर दिए गए हैं। आर्सेनिक पानी पीने से किडनी की बीमारियां होती हैं, लीवर की बीमारी होती है, स्किन की बहुत सारी डिसीज हो गयी हैं, बच्चे आज अपंग होना शुरू हो गए हैं और इस सरकार को उनकी कोई सुध ही नहीं है। आदरणीय यशवंत जी बोल रहे थे कि हम लोगों को शर्मिंदा होना चाहिए कि हम लोग आज तक पीने का पानी नहीं दे पाए। आज हम लोग तीन तरह का पानी संसद में पी रहे हैं। आप वहां बाहर देखिए, लिखा है - ठंडा गरम और सादा। तीन तरह का पानी खुद हम लोग पी रहे हैं और यहां बैठकर हम सब सिद्धांत की बात कर रहे हैं। चाहे इस तरफ के लोग हों या उस तरफ के लोग हों, लेकिन बात वहीं रहती है, गरीब आदमी, किसान आदमी अभी भी वही आर्सेनिक का पानी पी रहा है। पीने के पानी के लिए 9 हजार कुछ करोड़ रूपए दिए गए हैं। मैं कहूंगा कि इस धनराशि को और बढ़ाया जाए।
महोदय, दूसरी बात सैनीटेशन की है, इसके लिए 1,650 करोड़ दिए गए हैं। यहां बहुत सारी महिला सांसद हैं, जब आरक्षण की बात संसद में आती है, तो सब लोग एकजुट हो जाती हैं। लेकिन उन लोगों को महिलाओं का दर्द नहीं पता है। जब हमारी मातायें और बहनें सड़कों पर शौच करने के लिए जाती हैं, तब उनका मान-सम्मान कहां है? उन लोगों की चिंता हमारी महिला सांसदों को नहीं है, लेकिन आरक्षण के लिए सब लोग एकजुट हो जाते हैं। यह बहुत जरूरी है, आज हम लोग अपने गांव में निकलते हैं, अगर मातायें-बहनें सड़क पर शौच कर रही हैं, तो हम लोगों के लिए कितने शर्म की बात है? हम लोग 63 साल बाद भी अपनी माताओं और बहनों के सम्मान की बात नहीं कर पाए और हमें पहले यह चिंता है कि कैसे संसद में आया जाए? मैं आपके माध्यम से मंत्री जी अनुरोध करना चाहूंगा कि इसके लिए और धनराशि बढ़ायी जाए। शौच बनाने के लिए जो 2,200 रूपए की धनराशि दी जाती है, उसे बढ़ाकर कम से कम 5 हजार रूपए किया जाए। ...( व्यवधान) मैं एक और आग्रह करूंगा, जो इंदिरा आवास में पैसा दिया जाता है, बहुत अच्छा सुझाव माननीय सदस्य ने भी दिया है कि इसके लिए धनराशि जो 45 हजार रूपए है, उसे और बढ़ाया जाए। ...( व्यवधान) 1 लाख इसलिए जिससे कि उस धनराशि में कम से कम एक शौचालय बन सके। यह बहुत जरूरी है। ...( व्यवधान) दो कमरे बन सकें, ...( व्यवधान) क्योंकि 10 हजार रूपए तो उसके कमीशन में चले जाते हैं, जो उसे अधिकारी को देना पड़ता है। हमारी जो राज्य सरकार है, वहां सारे अधिकारी 10 हजार रूपए जरूर लेते हैं। प्रधानमंत्री रोड की मैं बात करना चाहूंगा, जब से मैं सदन में आया हूं, एक भी प्रस्ताव हम लोगों का नहीं आया, तीन साल से कोई पैसा उत्तर प्रदेश सरकार को नहीं मिला है। यह क्यों नहीं मिला, इसकी जरूर जानकारी हमें माननीय मंत्री जी दें। मुझे लगता है कि हम लोगों को बात पता चली है कि वहां की सरकार कमीशन ले रही है, इसलिए पैसा नहीं जा रहा है। इसलिए मैं आदरणीय मंत्री जी से जानना चाहूंगा कि क्यों नहीं पैसा उत्तर प्रदेश सरकार को जा रहा है? एक भी सड़क, जो प्रस्ताव हमने पिछले तीन सालों में दिए हैं, जो आठवीं सूची गयी थी, उसके बाद कोई भी नहीं मिला है। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : नीरज जी, कंक्ल्यूड कीजिए।
श्री नीरज शेखर : सभापति महोदय, मैं दो मिनट में नरेगा की बात कहकर अपनी समाप्त करूंगा। दो मिनट का समय आपने मुझे दिया, इसके लिए आपका मैं आभारी हूं। मैं कभी उसको मनरेगा नहीं बोलूंगा, नरेगा ही बोलूंगा। हमारे नेता कह चुके हैं कि उससे महात्मा गांधी शब्द हटा दिया जाए, क्योंकि उस योजना से कहीं लाभ नहीं हो रहा है। मैं मानूंगा कि कुछ लोगों को पैसा जरूर मिल जाता है, लेकिन मिट्टी निकालकर, गड्ढा खोदकर कोई काम नहीं होता है, क्योंकि जब बारिश आती है तो गड्ढा फिर भर जाता है। उससे फायदा क्या है? क्या निर्माण हो रहा है, मेरी समझ में नहीं आ रहा है। ...( व्यवधान) यहां से पैसा बस हम लोग दे रहे हैं। उसका गड्ढा खोदकर कोई निर्माण नहीं हो रहा है। मैं जरूर यह मानूंगा कि गरीबों को कुछ पैसा आज मिल रहा है, लेकिन उससे भारत के निर्माण में क्या हो रहा है, उससे गांव के निर्माण में क्या हो रहा है? उससे कोई लाभ नहीं हो रहा है।
इसलिए मैं आग्रह करूंगा कि इस पर संशोधन के लिए जरूर कानून बने।
अंत में मैं विजिलैंस कमेटी के बारे में कहना चाहता हूं। मैं पहले भी सुझाव दे चुका हूं कि जो सांसद निधि बढ़ी है, उसे खत्म करके जिले में ग्रामीण विकास का जो पैसा जाता है, हमें इतनी अनुमति मिल जाती कि उसमें से 5 या 10 प्रतिशत हमारे कहने से हो जाए तो बड़ा काम हो जाता।
इसी आग्रह के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री राधे मोहन सिंह (ग़ाज़ीपुर):सभापति महोदय, शेखर जी ने उत्तर प्रदेश में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की बात की है। उत्तर प्रदेश एक बड़ा प्रदेश है। मैं मंत्री जी से जानना चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश में पैसा क्यों नहीं जा रहा है?...( व्यवधान)
सभापति महोदय: माननीय सांसद जी, यह कोई तरीका नहीं है।
श्री राधे मोहन सिंह : उत्तर प्रदेश का विषय बहुत महत्वपूर्ण है।...( व्यवधान)
श्री प्रदीप टम्टा (अल्मोड़ा): सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। मैं इसके समर्थन में खड़ा हुआ हूं। बहुत सी बातें कही जा चुकी हैं, इसलिए मैं ज्यादा नहीं कहना चाहता, लेकिन मनरेगा के संदर्भ में फिर कहूंगा कि यह दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार की योजना है। यह इस देश के गरीबों को सशक्त करने की योजना है। इस योजना को और सुदृढ़ करने की जरूरत है। हम सबने कल्पना की थी कि पूरे देश में प्रत्येक परिवार के औसत के रूप में सौ दिन का रोजगार मिले। अभी हम केवल लगभग 50 दिन के रोजगार का एवरेज प्राप्त कर सके है। पिछले वर्ष 36 दिन का मिला, उससे पहले 54 दिन का मिला। यह योजना वर्ष 2006 से शुरू हुई है। अगर 3-4 सालों का आंकड़ा देखें, क्रमशः प्रतिवर्ष 43, 42, 48, 54 और 36 दिन का रोजगार मिला है। रोजगार के दिनों के औसत को और बढ़ाने की आवश्यकता है।
मजदूरी डायरैक्ट उनके बैंक या पोस्ट ऑफिस में जाती है। मैं उत्तराखंड क्षेत्र से आता हूं। मैं कहना चाहता हूं कि जिन क्षेत्रों में बैंक या पोस्ट ऑफिस दूर-दूर हैं, वहां लोगों को मजदूरी पाने के लिए बहुत तकलीफ होती है। बैंक और पोस्ट ऑफिसेज़ की संख्या बढ़ाई जाए जिससे लोगों को आसानी से मजदूरी मिल सके।
ग्रामीण रोजगार योजना को लागू करने के बारे में सपोर्टिंग स्टाफ की कमी है। उत्तराखंड राज्य में ऐसी प्राइवेट एजैंसी को कार्य दिया गया है जिसके कर्मचारी आए दिन आन्दोलन करते रहते हैं। उसकी वजह से वह योजना बुरी तरह दम तोड़ रही है। उत्तराखंड राज्य में 3 लाख 38 हजार लोगों ने काम मांगा है, लेकिन वहां औसतन मात्र 29 दिन का काम मिला है। सवाल है कि लोग काम मांग रहे हैं, लेकिन राज्य सरकारें काम नहीं दे पा रही हैं। मात्र 6,500 लोगों को सौ दिन का रोजगार मिला है। रोजगार की योजना महत्वपूर्ण है। उसे और सशक्त कैसे किया जाए, इसके लिए इंजीनियर, एकाउंटैंट की नियुक्तियां की गई है। सरकार ने उसमें एक और प्रोजैक्ट ऑफिसर नियुक्त किया है, इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया को और सरल किया जाए। यदि उसे ठेकेदारों के हाथों में न देकर सरकारी विभाग खुद अपने हाथों में ले तो यह योजना और मजबूत होगी।
मैं सरकार से एक मांग और करना चाहूंगा। उत्तराखंड पहाड़ी राज्य है। आपने उत्तर-पूर्वी राज्यों तथा सिक्किम के लिए स्पेशल बजट की व्यवस्था की है। उसी तरह उत्तराखंड और हिमाचल को भी वरीयता दी जाए। मैं इंदिरा आवास के बारे में कहना चाहूंगा। 48 हजार 500 रुपये पर्वतीय क्षेत्रों और 45 हजार रुपये मैदानी क्षेत्रों के लिए हैं। समय की मांग है कि इस धनराशि को और आगे बढ़ाया जाए।
क्या कारण है कि इस वर्ष अनुसूचित जाति के स्पैशल प्लान का बजट थोड़ा कम कर दिया गया है? वे समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लोग हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के विकास के लिए सरकार पूरी तरह कटिबद्ध है। इस बार इंदिरा आवास में एससीएसपी का आवंटन पिछले वर्ष के अनुपात में थोड़ा कम हुआ है। इस बारे में देखा जाए।
प्रधान मंत्री सड़क रोजगार योजना बहुत महत्वपूर्ण योजना है। वह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ा रही है और गांवों को सड़कों से जोड़ने का काम भी कर रही है। माननीय सांसदों और उनकी शिकायतों, उसकी मौनीटरिंग प्रक्रिया पर ध्यान देकर इस योजना को और सशक्त करने की जरूरत है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय एक ऐसा मंत्रालय है, जिसने सांसदों की भूमिका को थोड़ा और मजबूत किया है। लेकिन उस भूमिका को और ज्यादा मजबूत करने की आवश्यकता है, यही बात मैं कहना चाहता हूं।
श्रीमती मीना सिंह (आरा): महोदय, मैं आपका आभार प्रकट करती हूं कि आपने मुझे इस महत्वपूर्ण चर्चा में भाग लेने का अवसर प्रदान किया। मैं ग्रामीण विकास विभाग के अनुदानों की मांगों की बारीकियों पर चर्चा नहीं करना चाहती, क्योंकि एनडीए के नेता श्री यशवंत सिन्हा ने इस पर विस्तार से चर्चा की है। एक सांसद होने के नाते जब हम अपने राज्य और क्षेत्र का भ्रमण करते हैं, तो इस विभाग की योजनाओं की जो स्थिति देखने को मिलती है, उसकी चर्चा मैं यहां करनी चाहती हूं।
महोदय, भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जिन योजनाओं की शुरुआत की गयी है, अगर उनका कार्यान्वयन सही ढंग से किया जाये, जो काफी जनोपयोगी है, तो उससे ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति काफी सुधर गयी होती। परन्तु मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि धरातल पर इन योजनाओं की स्थिति बहुत ही खराब है। जब हम अपने क्षेत्र का भ्रमण करते हैं, तो जनता हमसे पूछती है कि करीब दस वर्षों से प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना चल रही है, परन्तु आज तक हमारा गांव मुख्य सड़क से नहीं जुड़ पाया है, जबकि वह इस योजना की सारी शर्तों को पूरा करता है। लोग जब हमसे पूछते हैं कि आखिर कब तक हमारा गांव मुख्य सड़क से जुड़ पायेगा, तो हमारे पास इन प्रश्नों का कोई जवाब ही नही होता।
महोदय, यूपीए वन के मंत्री आदरणीय रघुवंश बाबू की कृपा से बिहार में इस योजना का कुछ काम देखने को मिला, परन्तु जब से यूपीए-टू आयी है और रघुवंश बाबू गये हैं, तब से बिहार में खासकर हमारे संसदीय क्षेत्र आरा, जो भोजपुर जिले के अन्तर्गत आता है, इस योजना का कोई भी काम ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है।
महोदय, जनता हमसे सवाल करती है कि आखिर हमारे यहां सड़क क्यों नहीं बन रही है? जब हम इस बारे में जिला प्रशासन से पूछते हैं तो हमें जवाब मिलता है कि केन्द्र से पैसा ही नहीं आया है। मैं यहां इस बात का जिक्र अवश्य करना चाहूंगी कि बिहार में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की अधिकांश सड़कें केन्द्रीय एजेंसियों द्वारा बनायी जा रही हैं। मेरी समझ से यह परे है कि जब पैसा केन्द्र सरकार का है, एजेंसी भी केन्द्र सरकार की है, तो काम सही ढंग से सही समय पर क्यों नहीं हो पा रहा है?
महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहती हूं कि आप अपने जवाब में यह बताने का कष्ट करें कि बिहार के सभी गांव कब तक मुख्य सड़क से जुड़ पायेंगे। इस मंत्रालय की दूसरी महत्वपूर्ण योजना मनरेगा है। इस योजना का नाम लेने से भी डर लगता है। मैं समझती हूं कि इस प्रकार की लूट-खसोट और बंदरबाट दुनिया की किसी अन्य योजनाओं में नहीं हो सकती।
महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से आग्रह करना चाहती हूं कि वे इन योजनाओं के चयन और उनकी देख-रेख में सांसदों की सहभागिता सुनिश्चित करें। कमोबेश यही स्थिति इंदिरा आवास योजना में भी है। इस योजना के लाभार्थियों के चयन से लेकर निर्माण तक व्यापक धांधली देखने को मिलती है। सही मायने में जिनके पास छत नहीं है, वे आज भी खुले आसमान के नीचे रहते है। दूसरी ओर जिनके पास पक्का मकान है, उन्हीं को इस योजना का लाभ मिलता है।
महोदय, अगर हम पेयजल की बात करें, तो स्वच्छ पानी को कौन कहे, बिहार के गावों में चापाकल से पानी निकलना बन्द हो रहा है, तालाब सूख रहे है, पीने के पानी की भयंकर समस्या हो रही है। अतः दुख के साथ मुझे यह कहना पड़ रहा है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारी मां-बहनें सड़क के किनारे बैठकर शौच के लिए विवश हैं। अगर सरकार हमारी मां-बहनों के लिए शौचालय का इंतजाम नहीं कर सकती, अगर प्यासे को पानी नहीं दे सकती, अगर सरकार किसी विधवा को दो जून की रोटी नहीं दे सकती, अगर बेरोजगारों को न्यूनतम मजदूरी पर रोजगार उपलब्ध नहीं करा सकती, तो फिर किस प्रकार से इस देश को एक विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का सपना संजोए हुए है।...( व्यवधान)
महोदय, अंत में मैं एक बात का जिक्र अवश्य करूंगी कि इस मंत्रालय की अधिकांश योजनाओं का चयन एवं कार्यान्वयन पंचायत के द्वारा किया जाता है। मैं आपको बताना चाहती हूं और उम्मीद भी करती हूं कि यह सदन हमारी बातों से सहमत होगा कि योजनाओं के चयन और कार्यान्वयन में पंचायत एवं मुखिया के द्वारा व्यापक अनियमितता बरती जाती है, इस पर नियंत्रण किया जाए। मेरा एक पुनः मंत्री जी से आग्रह है कि इसके लिए इस तरह के नियम बनाएं कि इन योजनाओं का कार्यान्वयन सुचारू एवं सही रूप से हो सके और गरीबों को उचित लाभ मिल सके। बिहार भी इस देश का हिस्सा है, उसके साथ भी मैं न्याय चाहती हूं। वहां की बंद पड़ी योजनाओं के लिए यथाशीघ्र धन मुहैया कराया जाए।
श्री प्रेमचन्द गुड्डू (उज्जैन):सभापति महोदय, ग्रामीण विकास मंत्रालय की मांगों के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। काफी बातें यहां पर आ चुकी हैं, मैं भारत निर्माण के विषय में जो 58,000 करोड़ रुपये की राशि केन्द्र सरकार ने दी है, उसके लिए धन्यवाद देता हूं। हमारा देश कृषि प्रधान देश है और 80 प्रतिशत किसान लघु और सीमांत किसान हैं। नरेगा के तहत, कुएं, तालाब और स्टॉप डैम खोदने पर केन्द्र सरकार ने सभी जातियों - बीपीएल और एपीएल को छोड़कर, सभी जातियों, सभी समाजों के लोगों को कुएं आदि खोदने के लिए जो पैसा निशुल्क उपलब्ध कराया है, उसके लिए मैं आभारी हूं। मैं मध्य प्रदेश में महाकाल की नगरी उज्जैन से आता हूं। वहां पर जिस तरीके का अधिकारियों एवं ठेकेदारों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है। मॉनीटरिंग कमेटी, सर्तकता कमेटी और प्रदेश स्तरीय कमेटी का हाल यह है कि मैंने पिछली बार प्रश्न लगाया था, उन कमेटियों की मुश्किल से ही कोई मीटिंग हुई है। मध्य प्रदेश में मात्र एक बार मीटिंग हो पाई है और उसी तरीके से हम लोगों ने वहां जब-जब मामले उठाए हैं, केन्द्र से कमेटी गयी है, नेशनल कंट्रोल कमेटी ने यहां से जाकर वहां जांच की है, जांच करने के बाद यह रिपोर्ट दी है। जो नरेगा में काम करेगा, वह मरेगा - यह कमेंट वहां के सीओ ने दिए हैं। उसके बाद जो जांच रिपोर्ट्स आईं, उनमें यह पाया गया कि प्रधानमंत्री सड़क योजना में जहां 30 पुलिया बननी थीं, वहां मात्र 15 पुलिया बनी हैं। यहां पर रिपोर्ट आई, उसके बाद फिर एक जांच दल गया, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने उन भ्रष्ट और बेईमान अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मैं कहना चाहता हूं कि भारत निर्माण इस तरह से नहीं होगा। भारत निर्माण के लिए भ्रष्ट एवं बेईमान अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। उन पर भारत सरकार के नियंत्रण की जरूरत है।...( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
मैं इस वाद-विवाद के अंतिम वक्ता श्री कमल किशोर कमांडो का नाम बोलने के लिए ले रहा हूं।
श्री प्रेमचन्द गुड्डू : महोदय, हम लोगों को केन्द्र सरकार द्वारा इन अधिकारियों को नियंत्रित करने के लिए भी हमको वहां अध्यक्ष बना दिया, लेकिन इससे खुश होने की बात नहीं है।
लेकिन उनको यह अधिकार भी होना चाहिए कि इन भ्रष्ट और बेईमान अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही कर सकें।
श्री कमल किशोर ‘कमांडो’ (बहराइच) : सभापति महोदय, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं सबसे पहले तो ग्रामीण विकास मंत्री को बधाई देता हूं और जो बजट इन्होंने पेश किया है, उसके लिए सब लोगों को धन्यवाद देता हूँ। चाहे सोनिया गांधी जी हों, चाहे मनमोहन सिंह जी हों या राहुल गांधी जी हों। सबसे बड़ी बात मैं यह बताने जा रहा हूँ कि हमारी भारत सरकार ने आंगनबाड़ी में 22 लाख महिलाओं के लिए एक तोहफा दिया है। जो साढ़े सात सौ रूपए में काम करती थीं, वे अब 1500 रूपए में काम करेंगी। ये इतनी बड़ी चीज़ है, जिसके लिए मैं धन्यवाद देता हूँ। मैं मतलब की बात करूंगा, मतलब से अलग किसी किनारे नहीं जाऊंगा। कच्चे मकानों में, घास-फूस के इलाकों में रहने वाले जो लोग हैं वही इंदिरा आवास योजना के बारे में बता सकते हैं। मैं बहराइच कांस्टीटय़ुंसी से आता हूँ। चाहे बहराइच, बाराबंकी और उस इलाके में सिद्धार्थनगर और महाराजगंज तक चले जाइए जो नेपाल से सटा हुआ बॉर्डर का इलाका है। जहां झेपड़ियों में गरीब लोग रहते हैं, उन मकानों को ठीक करने की बात मैं यहां कहने आया हूँ। मैं बहराईच के लोगों के बारे में आपको बताना चाहता हूँ कि उन गावों में जाकर देखिए जहां उत्तर प्रदेश की सरकार उन लोगों को वह लाभ देने में कतराती है। वहां के जो भी आफीसर साहिबान हैं, उनकी स्थिति क्या है? ...( व्यवधान) एक आवास में दस हज़ार रूपए की घूस लेते हैं। गांव में काम करने वालो जो सचिव है, चाहे वह क्लास-थ्री एम्प्लाई हो, चाहे वह क्लास-वन एम्प्लाई हो वह दादा बना हुआ घूमता है। मुझे शर्म आती है, वहां के अफसरों के ऊपर, वहां के नेताओं के ऊपर, वहां के मंत्रियों के ऊपर और जो कहते हैं कि मैं चीफ मिनिस्टर हूँ। शर्म आती है कि खुलेआम वहां इस नरेगा में खुले आम चोरी और बेईमानी हो रही है। मैं मंत्री महोदय से आग्रह करूंगा कि इस पर जिले में जो भी मानीट्रिंग बनी हुई है इसको और तगड़ा करने की जरूरत है। बहराईच जो मेरा क्षेत्र है, घाघरा नदी, राप्ती नदी, बूढ़ी राप्ती, शारदा, जो फारेस्ट के इलाके से घूमा हुआ। Half of my constituency comes under forest reserve. Hence, it is very important. यह मैं मंत्री महोदय से निवेदन करूंगा कि जो नरेगा में काम करने के वक्त परेशानी आती हैं, इस परेशानी को दूर करना पड़ेगा। अगर गरीबों का भला आप लोग चाहते हैं, मैं सभी सांसदों से निवेदन करता हूँ कि ...( व्यवधान) अगर कहीं किसी प्रकार की तकलीफ है तो हम लोगों को मिलकर के एक स्पेशल बिल लाना चाहिए। सभापति महोदय, मैं आपसे और भी कहना चाहूंगा कि ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : कमल जी, कमल जी, आप बैठ जाइए।
...( व्यवधान)
श्री कमल किशोर ‘कमांडो’ : देखिए गरीब ही गरीब की बात को समझ सकता है। ...( व्यवधान) आज उत्तर प्रदेश में क्या हो रहा है। ...( व्यवधान) उत्तर प्रदेश में किस तरह से लूट और उत्पात मचा हुआ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Now, the reply of the hon. Minister.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Nothing else will go on record.
(Interruptions) …* सभापति महोदयः आसन की कुछ मजबूरियां हैं। जो प्रक्रिया होती है, उसमें सब दलों का एक राउंड लेना पड़ता है। इसलिए मैं इससे कतरा रहा हँ। अच्छा एक मिनट बोल लीजिए।
ओश्री तूफ़ानी सरोज (मछलीशहर): सभापति महोदया, मैं ग्रामीण विकास मंत्री का ध्यान ग्रामीण भारत की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं। सरकार द्वारा एक मोटी रकम गांवों के विकल्प के लिए दी जा रही है। मनरेगा उनमें एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। गांव में जल संचयन के दृष्टिकोण से तालाब खोदे जा रहे हैं। यह एक कारगर योजना है, लेकिन दुर्भाग्य है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश तीन वर्ष से सूखे की चपेट में है। हालत यह है कि कुएं तक सूख गये हैं, तालाब में पानी कहां से रह पायेगा। गांव के विकास के लिए जो धनराशि भेजी जा रही है, उसी में से कटौती करके कम से कम 500 हैडपम्प हर संसदीय क्षेत्र के लिए दिया जाये, जिससे लोगों को पानी की समस्या से निजात दिलाई जा सके।
पी.एम.जी.एस.वाई एवं राजीव गांधी विद्युत योजना के तहत दो वर्ष से पैसा नहीं भेजा जा रहा है। अभी भी तमाम गांव सड़कों से वंचित हैं। आज भी तमाम पिछड़े, दलित बस्तियों में बिजली की समस्या है। दलित के बच्चे डेवरी के प्रकाश में पढ़ने के लिए मजबूर हैं। विद्युत की घनघोर कटौती है, महंगा डीजल होने के कारण किसान अपनी कास्तकारी नहीं कर पा रहा है। राजीव गांधी विद्युत ग्रामीण योजना के अंतर्गत सर्वे कराकर अपूर्ण गांवों का विद्युतिकरण कराया जाये।
मैं जनपद जौनपुर में पॉवर प्लांट लगाने की मांग करता हूं, जिससे जौनपुर ही नहीं आसपास के जिले लाभान्वित हो सकें।
* Speech was laid on the Table ओश्री कौशलेन्द्र कुमार (नालंदा):ग्रामीण सड़कों को भारत निर्माण के छः घटकों में से एक रूप में अभिनिर्धारित किया गया है, अतः यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना है । अच्छी सड़कों के निर्माण से वाणिज्यिक एवं सामाजिक गतिविधियां बढ़ेगी । इसके अलावा इन स्थानों के वाशिंदों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा में भी सुधार आएगा । लेकिन बिहार के बारे में इसकी हालत बहुत ही खराब है । बिहार के माननीय मुख्यमंत्री, श्री नीतिश कुमार ने कहा है कि केन्द्र सरकार ने ग्रामीण इलाके में बनने वाली सड़कों की राशि अटका रखी है । प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत बिहार में 8600 करोड़ रूपये की लागत से 19 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण होना है ।
स्वीकृत योजनाओं के लिए केन्द्र ने अब तक मात्र 23 प्रतिशत राशि ही राज्य सरकार को उपलब्ध कराई है, जबकि इस बारे में बार-बार रिमाईन्डर भेजा जा रहा है । माननीय मुख्यमंत्री ने कहा है कि केन्द्र सरकार के असहयोग और राशि भुगतान को लेकर हो रहे टालमटोल के कारण ग्रामीण क्षेत्र में सड़कों की निर्माण गति प्रभावित हो रही है । इस मद में केन्द्र सरकार के पास एक हजार करोड़ रूपये का भुगतान लंबित हो गया है ।
मैं केन्द्र सरकार से यह मांग करता हूं कि वो बिहार राज्य को पीएमजीएसवाय के तहत स्वीकृत राशि का बकाया यथासंभव यथाशीघ्र भुगतान करें ।
फिर भारत निर्माण का एक दूसरा महत्वपूर्ण घटक मनरेगा है जिसमें गरीब परिवार के किसी एक आदमी को एक वर्ष में 365 दिन में 100 दिन का गारंटी रोजगार मिलता है । लेकिन इसका विज्ञापन केवल टीवी के लगभग सभी महत्वपूर्ण चैनल जैसे जी टीवी, स्टार टीवी इत्यादि के प्राईम टाईम में दिया जाता है, जिसका खर्च करोड़ों रूपये में है लेकिन लाभ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो लोग इससे लाभान्वित होते हैं, उनके घरों में बिजली नहीं होती है और ऊपर से टीवी नहीं है फिर ऐसे विज्ञापन का क्या अर्थ है, जिसका लाभ, मनरेगा के लाभान्वितों को न मिले । इसलिए मैं केन्द्र सरकार से यह मांग करता हूं कि इसको तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए ताकि देश के करोड़ों रूपए की बर्बादी को रोका जा सके ।
भारत सरकार ने 2012 तक यह आश्वासन दिया है कि सभी गांवों को राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना से जोड़ दिया जाएगा । लेकिन पंद्रहवी लोक सभा के गठन के समय से अब तक किसी भी गांव को राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना से जोड़ा नहीं गया है । मैं सरकार से यह मांग करता * Speech was laid on the Table हूं कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के काम मैं बिहार राज्य में तेजी लायी जाए तथा 16 केवीए के ट्रंसफार्मर की जगह पर 63 केवीए और 100 केवीए का ट्रंसफार्मर दिया जाए ताकि ग्रामीणों को फायदा पहुंचे ।
गांवों में रहने वाले गरीब परिवारों की पहचान, बीपीएल में अभी तक नहीं की गयी है । बिहार सरकार ने जो सर्वे करवाया है उसमें बीपीएल की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ हैं जबकि केन्द्र सरकार केवल 65 लाख परिवारों को ही बीपीएल मानती है । इस बीच के 85 लाख परिवार बीपीएल के लाभ से वंचित रह जाते हैं । मैं यह मांग करता हूं कि डेढ़ करोड़ बीपीएल परिवारों को अनाज दिया जाए ।
जो बजट आया है, इससे गांवों में रहने वाले किसानों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है । किसान परिवार गांव से शहर की ओर पलायन कर रहे हैं । इस बजट में किसानों की कर्जा माफी का कोई प्रावधान नहीं किया गया है । बिहार राज्य में कहीं सुखाड़ है, तो कहीं दहाड़ है, किसानों के लिए कोई योजना, बजट में नजर नहीं आती है । बजट में कृषि यंत्रों पर सब्सिडी देने की बात कही गई है, जोकि बहुत ही कम है । मैं यह मांग करता हूं कि कृषि यंत्रों पर सब्सिडी और बढ़ायी जाए ।
ग्रामीण पेय जलापूर्ति कार्यक्रम को समस्त पंचायतों के सभी गांवों में तत्परता से लागू किया जाए क्योंकि मेरे संसदीय क्षेत्र नालंदा में पिछले तीन वर्षों से लगातार सूखा पड़ रहा है जिससे भूजल काफी नीचे चला गया है । मैं यह भी मांग करता हूं कि नालंदा के सभी गांवों को ग्रामीण स्वच्छ पेयजल आपूर्ति से जोड़ा जाए ।
*SHRIMATI BOTCHA JHANSI LAKSHMI (VIZIANAGARAM): First of all I thank you very much for giving me an opportunity to express my views on demands for grants for the Ministry of Rural Development, the most important Ministry as far as India is concerned, as Mahatma Gandhi said : India Lives in Villages.
We all know that for our country to get the tag of “developed country” the rural areas must be developed on par with urban areas. The UPA Government under the leadership of Chairperson Soniaji and honourable Prime Minister Dr. Manmohan Singhji and the hon. Finance Minister, Shri Pranab Mukherjee for striving hard to change the face of rural India for sustainable development, from grassroot level to higher level. Continuing their efforts in Budget 2011-12 Rs.87,800 crore was allocated for Ministry of Rural Development of which Bharat Nirman Allocation was increased by Rs.10,000 crore. The proposed social sector allocation for 2011-12 stands at Rs.1,60,887 crores, an increase of 17 per cent over 2010-11 and eligibility for Indira Gandhi National Old Age Pension reduced from 65 years to 60. Pension rates hiked from Rs.200 to Rs.500 for 80 years and above. Alongwith old pensions, the Government has increased the allocation for Indira Awas Yojana to build 10 lakh houses. I thank the Government for providing food security, employment, training skills for SHGs, shelter, rural roads, drinking water and sanitation. At the same time, concentrating on comprehensive land development programme in rural areas populated with SC, ST and OBCs and other BPL families. This is also helping in strengthening the Panchyati Raj institutions and infrastructure in backward regions.
These budget proposals reflects the commitment of the UPA Government towards Aam Admi and the aspirations of the rural masses.
Allocation of Rs.87,800 crores has been provided in the Union Budget 2011-12 for the Ministry of Rural Development. The department wise break up is as follows :-
Department Allocation (in crores) Department of Rural Development Rs.74,100 Department of Drinking Water and Sanitation Rs. 11,000 Department of Land Resources Rs.2700 Total Rs.87,800 The allocation for Bharat Nirman has been hiked by Rs.10,000 crores from the current year to Rs.58,000 crores. Bharat Nirman consists of 6 flagship programs, the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY). Accelerated Irrigation Benefit Program, Rajiv Gandhi Grameen Vidyutikaran Yojana, Indira Awas Yojana, National Rural Drinking Water Program and Rural telephony.
I thank the Finance Minister for reallocating MGNREGA Rs.40,000/- for this financial year also. I request the Rural Development Ministry to put these funds for building permanent infrastructure in generating employment.
The social audit reports are pointing out that middlemen are still playing a role in making payments to the beneficiaries because of insufficient number of Bank and post office network. I request the honourable Rural Development Minister to give a serious thought to it, so that 100 percent amount reaches the beneficiaries of MGNREGA. I am very thankful to you Sir for appointing me as a Chairperson of the Sub Committee on Special Needs for Special Works exclusively for women, old age people and disabled people and special focus on SC and ST communities.
In my capacity as the Chairperson, I had an opportunity to visit two or three States and observed that most of the women attended to the works are anemic. There may be provision of supply of folic acid capsules to women wage seekers tying it up either with the Health Ministry or with the Women and Child Development Ministry. At present 10 percent of excess rates are allowed where distance of worksite is more than 5 KMs. This may be reduced to 2 KMs in case of disabled/pregnant wage seekers and in the hillocks. Though equal rates are ensured and distributed to women, when compared with the quantity of earth work executed by women wage seeker working for a period of seven hours is somewhat less than that of men wage seeker. Men wage seekers are not accepting women in their groups. To have a good formation of group women wage seeker’s/men wage seeker’s or aged more than 60 years may be allowed with extra wages, at least, 20 percent, that is, they may get wages of a man working seven hours by working six hours only.
Regarding coastal areas in the country there is a need to build protection walls to check soil erosion and also to protect the fishermen and their tools and equipment because of increase is sea levels. At the same time, there is a need to plant more and more trees along the sea coast like casuarinas, eucalyptus, coconut, cashew to provide livelihood to the fishermen community and also construction of fish tanks and water storage tanks for seed fish. Jelly fish also plays an important role in checking vector borne diseases. There is a need to increase the capacity of jelly fish and supply the same to the poor fishermen.
Construction of drying platforms for fishermen may be included in the programme. Construction of the compound walls for school buildings adjacent to highways, railway tracks, tanks, rivers and situated near foothill may be allowed under the MGNREGS. In plain areas and hilly areas, social forestry should be encouraged alongwith land development programme. Along with durable assets, dhobi ghats, open wells for irrigation and reacting tanks for soaking jute may be allowed under the programme. This type of works should be included in the shelf of the MGNREGA works.
My special thanks to the hon. Finance Minister for providing Rs.500 crore for Women SHG Development Fund. There are crores of women who will be benefited under this fund. We can provide training facilities under National Rural Livelihood Mission, for eco-friendly products. These can be manufactured with the help of the raw materials available locally. This will help women belonging to SC, STs, OBCs and BPL families.
I also request the Minister to include the shelf of works of MGNREGA to include agriculture works of small and medium farmers. Allocation of Rs.11,000 crores for drinking water and sanitation will go a long way in improving the health of rural people. It is better if the allocation is increased further.
NPS LITE (Swalamabana) Scheme is introduced for the benefit of Rural and Urban Self Help Group Members and their spouses. This scheme covers the weaker and economically disadvantaged sections of the society with theier limited investment potential and assures them regular monthly pension.
Annual contribution of Rs.1000/- from each member will be supported by another Rs.1000/- by Government of India facilitating enrolled members to get decent pension after 60 years.
The Government of India while introducing the scheme assured contribution of Rs.1000 per year for three years, later extended to 5 years. There is a lot of confusion in the community whether the Government of India will support with Rs.1000 per year after 5 five years or not. I request the Hon’ble Minister to give the clarification whether the Government of India is going to continue supporting Rs.1000/- per member per year till they attain 60 years. In this connection may I draw your attention to similar scheme which Government of Andhra Pradesh is implementing by name “ Abhayahastam”. My State Government is committed to co-contribution through an act an amount of Rs.365/- per member per year for all the Self Help Group members who have joined the scheme till she attains the age of 60 years from her joining date as long as member is contributting her share regularly.
I am very thankful to the Hon’ble Minister for Rural Development for having introduced the concept of developing the Grass Plots with Mahatma Gandhi NREGA funds. This will not only develop the rural barren/unproductive lands into productive public property grass plots but also gender friendly announcement which is in favour of women by decreasing the drudgery who will also take the responsibility of grazing the animal after coming back to her house from wage labour.
May I request Hon’ble Minister to consider the idea of handing over this concept of Grass Plot development to either Self Help Groups or their aggregations and support the activity for their maintenance for 2 years. (watering, cutting, wages to labourers on grass plots). Meanwhile community will understand the benefits of green grass feeding to their animals which not only improves the productivity in the form of enhanced milk but also increased fat content thereby better rate and more income and also healthy animal and above all lot of drudgery on the women is reduced thereby she can have ample time which again speaks on her better health.
In my parliamentary constituency there is acute drinking water problem. Though we are spending a lot of money on providing drinking water to the people, still there are some backward areas like my constituency Vizianagaram and Srikakulam which needs special attention due to brackish water to coastal areas. Under the National Rural Drinking Water Programme there are about 194 villages in Etcherla Assembly constituency. The Government of Andhra Pradesh has already submitted a proposal amounting to Rs.59 crores for the year 2010-11 from the source of water from the Nagavalli reservoir. Under the CPWS scheme to Etcherla and other habitations, Phase-II, estimation cost is Rs.9.3 crores.
A lot of network of roads was built under the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana since more than 10 years and these road network has to be assured of funds for renewals of black topping periodically under Rural Development Department Annual Budget.
Some missing bridges and culverts on the roads sanctioned under PMGSY so far were given sanction previous year, which is appreciable. But bridge projects left over under road works taken up under other programmes of Rural; Development Department should also be given sanction also be given sanction under PMGSY which is an assured programme from Government of India.
I also request the hon. Minister to include the shelf of works of MGNREGA to include agriculture works of small and marginal farmers.
With the help of agriculture producton GDP growth can be increased. All the works which I have suggested may be included under this programme to achieve this growth rate.
To conclude, I say villagers in India manifest a deep loyality to their village, identifying themselves to strangers as residents of a particular villages, harping back to family residence in the village that typically extends into the distant past. A family rooted in a particular village does not easily move to another and even people who have lived in a city for a generation or two refer to their ancestral village as “our village.” All our roots are in villages only. So, I wholeheartedly support the Demands for Grants for 2011-12 for this Ministry.
श्री मदन लाल शर्मा (जम्मू): मैं, एक ही बात कहूंगा, कोई तकरीर नहीं करूंगा। मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ कि आपने मुझे अपनी बात करने का मौका दिया। जहां हाऊस के अंदर आनरेबल मैंबरान ने अपनी-अपनी रियासत और अपनी-अपनी कांस्टीटय़ुंसी की बात की। मैं न तो कांस्टीटय़ुंसी की तरफ जाऊंगा ...( व्यवधान) और न मैं ओवरऑल बात करूंगा शाहनवाज़ जी,। लेकिन मैं एक बात कहना चाहूंगा कि मुझे खुशी हुई कि इन्होंने बहुत सारे सुझाव दिए।
मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि जिस रियासत में पंचायतें फंक्शन ही नहीं कर रहीं हैं कई सालों से, वहां पर जो पैसा रूरल डवलपमेंट के लिए मरकज़ी सरकार की तरफ से जाता है, उसका क्या हाल होता होगा, यह आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री के बार-बार कहने के बावजूद भी हमारी रियासत में आज भी थ्री टियर सिस्टम लागू नहीं हुआ है, वहां 73वां और 74वां संशोधन नहीं हुआ है। मरकज़ी सरकार, खासकर मंत्री जी को ज़ातीय तौर पर देखना चाहिए और हमारी रियासत जम्मू-कश्मीर को यह प्रार्थना करनी चाहिए कि वहां पर थ्री टियर सिस्टम लागू हो और सारे देश के राज्यों में जो यहां से ग्रामीण विकास के लिए पैसा जाता है, वहां भी जाए तथा वहां के ग्रामीण क्षेत्रों का विकास हो।
सभापति महोदय : मंत्री जी जवाब देंगे।
...( व्यवधान)
सभापति महोदय: मंत्री जी के अलावा और किसी की बात रिकार्ड में नहीं जाएगी। इसलिए कृपया आप लोग बैठ जाएं।
...( व्यवधान)* ग्रामीण विकास मंत्री तथा पंचायती राज मंत्री (श्री विलासराव देशमुख): सभापति महोदय, इस महत्वपूर्ण मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर करीब-करीब 27 माननीय सदस्यों ने हिस्सा लिया है और अपने विचार सदन के सामने रखे हैं। मुझे इस बात की खुशी है कि आज ग्रामीण विकास मंत्री के नाते मैं सदन में बोल रहा हूं, यह मेरी मेडन स्पीच है। मुझे इस बात की भी खुशी है कि मेरे राजनैतिक जीवन की शुरूआत मैंने अपने गांव के सरपंच के रूप में की थी। एक गांव का सरपंच, प्रदेश का मुख्य मंत्री बना और आज मैं केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय का कामकाज सम्भाल रहा हूं।
इस देश के 70 फीसदी लोग गांवों से जुड़े हुए हैं और उनसे सम्बद्ध यह विभाग है। मैं प्रधान मंत्री जी को और वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने ग्रामीण विकास के ऊपर विशेष ध्यान दिया है। जब ग्रामीण विकास की बात होती है तो बहुत सारे ऐसे विभाग भी आते हैं, जो हमारे मंत्रालय में नहीं आते। जैसे एजुकेशन है, हैल्थ है, बिजली है, टेलीफोन है। भारत निर्माण में ऐसे कई मंत्रालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन सारे विषयों को लेकर यूपीए सरकार ने इस साल के बजट में 2,25,000 करोड़ रुपए का प्रावधान ग्रामीण विकास के लिए किया है। जहां तक मेरे विभाग की बात है, तो इस साल हमारे विभाग को 74,100 करोड़ रुपए का आबंटन किया है, जो पिछले साल के मुकाबले 12 प्रतिशत अधिक है।
19.33 hrs. (Madam Speaker in the Chair) मनरेगा हमारे देश की एक अत्यंत महत्वपूर्ण योजना है, जिसके लिए हमने 64,000 करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन वित्त मंत्री जी ने 40,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। अपने बजट भाषण में उन्होंने सदन को आश्वस्त किया है कि जितना भी पैसा मांगा जाएगा, क्योंकि यह योजना डिमांड ड्रिवन स्कीम है, जितने लोग काम मांगेंगे, वह सारा पैसा देंगे। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई ज्यादा मुश्किल होगी।
मेरे विभाग की अनुदानों की मांगों पर बहस की शुरूआत शैलेन्द्र कुमार जी ने की थी। वह हमारे साथी हैं और ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं। इस नाते वहां की समस्याओं को वह भली-भांति जानते हैं। उसके बाद तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा जी ने अपने विचार यहां रखे। उन्होंने कई अच्छे सुझाव भी दिए हैं। जिन्होंने भी अपने सुझाव यहां रखे हैं, मैं उन सभी माननीय सदस्यों को धन्यवाद देना चाहूंगा। जब तक हम ग्रामीण विकास में ज्यादा रूचि नहीं लेंगे, तब तक हम ग्रामीण विकास नहीं कर पाएंगे। देश की आजादी से लेकर आज तक हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं, लेकिन समस्या वहीं की वहीं है। मैं कोई यह राजनीतिक बात नहीं कर रहा हूं।
कभी आप थे, आज हम हैं। राजनीति में उलटफेर होते रहते हैं उसकी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। लेकिन जो भी सत्ता में बैठता है, वह हमेशा विकास की बात करता है और विपक्ष का काम होता है उसमें जो कमियां है उसको दूर करने के लिए कुछ सुझाव भी देने की आवश्यकता होती है। गलतियां निकालना आसान होता है। आप सुधार कैसे कर सकते हैं? अगर आप कमियां बताएंगे तो सुधार करने में और आसानी हो सकती है। मैं इस बात को मानता हूं कि राजनीति चुनाव तक ही सीमित रहनी चाहिए। चुनाव के बाद डेवलपमेंट का जो काम होता है, वह हाथ में हाथ डाल कर के आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन बहुत बार हमारी यह दिक्कत होती है, यह हमारी मुश्किल है। हर योजना अच्छी होती है। योजना में कोई खराबी नहीं होती है। लेकिन जब हम उस पर अमल करते हैं, इम्प्लिमेंटेशन करते हैं तब हमें उसमें बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। केन्द्र सरकार का काम होता है और मैं जानता हूं कि जो भी सांसद सदस्य यहां पर बैठे हैं, वे हमेशा यह बात जानते हैं कि हम इतना सारा पैसा यहां बैठ कर के बजट में मंजूर करते हैं। पैसा स्टेट में जाता है लेकिन सांसद को यह पता ही नहीं होता कि क्या हो रहा है? सांसद की यह मुश्किल हमेशा होती है कि जो भी पैसा हम केन्द्र से भेजते हैं, उस पैसे का सही उपयोग हो रहा है कि नहीं हो रहा है। कई सांसद मुझसे मिलते हैं और कहते हैं कि हम अपने क्षेत्र में हैंड-पंप नहीं लगा सकते। यह हमारे सांसदों की समस्याएं हैं। मैं खूद जानता हूं और मुझे इस बात का भलीभाँति अनुभव रहा है। मेरी यह कोशिश रहेगी कि हम इस योजना में सांसद का भी महत्व किस तरह से बढ़ा सकते हैं? जिस दिन से मैंने इस विभाग को संभाला है, उस दिन से मैं इस बारे में सोच रहा हूं। हमेशा यह बात बतायी जाती है कि स्टेट सब्जेक्ट है। जैसे आपने बताया और फेडरल स्ट्रक्चर में हरेक की मर्यादा होती है, लेकिन मर्यादा में रहते हुए हम क्या कर सकते हैं? जैसे हमने विजिलेंस कमेटी बनायी लेकिन कई एमपीज ने कहा कि यह कंपनी बंद करो, कोई अधिकार नहीं है। सब कुछ ठीक है, हम काम नहीं कर सकते, कुछ सुझाव देंगे तो उसके ऊपर कार्रवाई नहीं होती। उनको हमने खाली रूरल डेवलपमेंट की योजनाओं का ही काम सौंपा है। मैं चाहता हूं कि उसका दायरा बढ़ाना चाहिए जैसे हमे हमारे शेडय़ुल ट्राइब के मंत्री जी ने हमें चिट्ठी लिखी है कि शेडय़ुल ट्राइब की जितनी भी योजनाएं है, वे सारी योजनाओं को भी मॉनिटरिंग और विजिलेंस करने का काम इस कमेटी को सुपूर्द करना चाहिए। मैं चाहूंगा कि हेल्थ डिपार्टमेंट, एजुकेशन डिपार्टमेंट, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट, इलेक्ट्रिफिकेशन जो भी भारत निर्माण की जितनी भी योजनाएं हैं, अगर वे सारी योजनाएं इस समिति को सुपूर्द करते हैं तो उसके लिए उसका मॉनिटरिंग करना उसके बारे में सुझाव देना, यह काम भी आसान हो सकता है।
मैं चाहता हूं कि जब तक हम ग्राम सभाओं को मजबूत नहीं करेंगे तब तक यह काम ठीक ढंग से नहीं हो सकता। अगर गांव में इन योजनाओं का निर्माण होना है तो गांव की ग्राम पंचायत और गांव की ग्राम सभा, मैं चाहता हूं कि आने वाले दिनों में तीन ही सभा का महत्व होना चाहिए, एक ग्राम सभा, दूसरी विधान सभा और तीसरी लोकसभा। जैसे मंत्री मंडल लोक सभा को अकाउंटेबल है, वैसे ही ग्राम पंचायत ग्रामसभा को अकाउंटेबल होनी चाहिए। अब इसकी व्यवस्था करने की आवश्यकता है। क्या कानून में सुधार करने की आवश्यकता है? आज इन सारी बातों के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन वह हमारा लक्ष्य होना चाहिए। जब तक हम ग्राम सभा को मजबूत नहीं करेगे, यदि ग्राम सभा सही दिशा में काम करेगी तो सही इंसान को, सही काम के लिए मदद मिलती है। जो भी बेनिफिशरिज हैं उनका सेलेक्शन करने की जिम्मेवारी हम ग्राम सभा को देते हैं तो सारे गांव के सामने सारी बातें आएंगी कि मदद सही आदमी को मिल रही है या गलत आदमी उसका फायदा उठा रहा है। आने वाले दिनों में हम चाहेंगे कि ग्राम सभा को हम किस तरह से मजबूत कर सकते हैं? अगर ग्राम सभा मजबूत होगी तो गांव में विकास के काम ठीक ढंग से होंगे उसके ऊपर सोशल ऑडिट होगा उसका सही ढंग से मॉनिटरिंग होगा। यह करने की ज्यादा आवश्यकता है। जहां तक महात्मा गांधी नरेगा स्कीम बनायी है और उसकी शुरुआत महाराष्ट्र में हुई। हमारे वरिष्ठ नेता श्री देवगौड़ा जी ने सही कहा कि वसंत राव नाइक जी जो हमारे महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री थे, उस वक्त इस योजना की शुरुआत हुई थी।
आज तक वह योजना महाराष्ट्र में चल रही है। केन्द्र सरकार की योजना होते हुए भी महाराष्ट्र ने अपनी योजना को शुरु रखने का निर्णय किया है और हर साल दो हजार करोड़ रुपये का प्रावधान महाराष्ट्र सरकार की उस योजना में हम करते हैं। इसलिए ज्यादा पैसा महात्मा गांधी नरेगा पर हम खर्च नहीं कर पाते हैं। तीन सौ करोड़ रुपये तक महाराष्ट्र पर खर्चा किया है, उसके मुकाबले में उत्तर प्रदेश में, तीन साल तक हर साल लगभग 4-5 हजार करोड़ रुपये का खर्चा हुआ है। इस साल भी 5 हजार करोड़ रुपये का खर्चा सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुआ है। मध्य प्रदेश में भी उतना ही खर्चा हुआ है। आपके बिहार में उतना ही पैसा खर्च हुआ है। पैसे की कमी नहीं है, हमारे उड़ीसा के सदस्य ने यहां पर शिकायत की है। आज ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कहा है कि अगर आप इस पर कोई मॉनिटरिंग करने की कोई व्यवस्था नहीं करेंगे, तो हमें उसमें हस्तक्षेप करना पड़ेगा। ये सारी बातें आज महात्मा गांधी नरेगा में हो रही हैं। अच्छे कामों को बारे में हम कम चर्चा कर रहे हैं लेकिन करप्शन और बाकी चीजों की चर्चा ज्यादा कर रहे हैं। एक अच्छी योजना जिसकी शुरुआत अच्छे विचार से हुई। एक अच्छा मॉडल महाराष्ट्र में बना, अगर उसका फायदा पूरे देश को होता है तो उससे लोगों को काम मिलेगा और जो काम मांगता है उसे काम देने की व्यवस्था उसमें है। सौ दिन की शुरुआत हुई है और जो परसेंट हमने निकाला है तो 54 परसेंट के ऊपर एवरेज नहीं गया है। मैं जानता हूं कि उसमें और सुधार लाने की आवश्यकता है और उसे सहायता देने में और लोग चाहिए जैसे पंचायत में असिस्टेंट तथा तकनीकी स्टॉफ नहीं है। इस योजना में हमने 6 परसेंट एडमिनिस्ट्रेशन पर खर्च करने की परमिशन दी है लेकिन बहुत सी ग्राम पंचायतों में यह व्यवस्था नहीं है। जब तक यह व्यवस्था ठीक ढंग से हम वहां नहीं करेंगे, महात्मा गांधी नरेगा स्कीम ठीक ढंग से लोगों तक नहीं पहुंच पाती है, इसे भी हम अच्छी तरह से जानते हैं। हम चाहेंगे कि जो बातें यहां उठ रही हैं उन्हें कैसे रोका जा सके और उसमें सही काम और उसमें असेट क्रीएट करने के काम हों और हम तो चाहेंगे कि अन्य स्कीमों को भी उसमें जोड़ा जाना चाहिए। इस स्कीम को पांच साल हो गये हैं और इन पांच सालों का अनुभव हमारे पास है। अगर इसे आगे और बढ़ाना है तो अन्य जो भारत निर्माण की योजनाएं हैं उनके सात अगर हम उसे जोड़ सकते हैं तो और भी अच्छा काम आने वाले दिनों में हो सकता है और यह सुधार करने की व्यवस्था हम बहुत जल्दी करने जा रहे हैं।
SHRI P.T. THOMAS (IDUKKI): Dairy farming may be included in this.
श्री विलासराव देशमुख: उसके बारे में हम बाद में बात कर सकते हैं। एक बात मैं और कहना चाहता हूं कि एक सुझाव हमारे पास और आया है। इतने कम समय में सारी बातें आप यहां नहीं रख सकते हैं। कई लोग अपनी पूरी बात यहां नहीं बोल पाते हैं। इसलिए मैंने अपने विभाग की तरफ से यह निर्णय किया है कि जो रुरल क्षेत्र के एमपीज हैं उनके साथ मैं हर स्टेट की अलग से मीटिंग करुंगा और उनके क्षेत्र की जो समस्याएं हैं उनके ऊपर अलग से चर्चा करेंगे, जिससे हमारे पास उसका रिकार्ड भी होगा तथा उसमें क्या कार्रवाई हुई है, उसे भी बताने की कोशिश करेंगे।
झारखंड के चीफ मिनिस्टर को हमें चिट्ठी लिखनी पड़ी। हमारे यशवंत सिन्हा जी भी झारखंड से आते हैं, उन्होंने वहां के मुख्यमंत्री जी का भी चयन किया है, लेकिन वहां चार मर्डर हो चुके हैं और किसी के ऊपर भी ठीक कार्रवाई नहीं हुई है। हमने मुख्यमंत्री जी को चिट्ठी लिखी है कि अगर आप समय सीमा में उस पर एक्शन नहीं करेंगे तो हमें महात्मा गांधी नरेगा का पैसा यहां से रोकना पड़ेगा। हमने डीओपीटी को भी चिट्ठी लिखी है कि जो मर्डर्स हुए हैं उनकी सीबीआई जांच होनी चाहिए। जब तक इन चीजों पर हम कोई ठोस कदम नहीं उटाएंगे और कहेंगे कि यह स्टेट का मामला है और हम इसमें आगे नहीं बढ़ सकते तो बात बनेगी नहीं। ये सारे जवाब देते-देते हम थक गये हैं और हमने अब यह तय किया है कि अगर कोई सीरियस शिकायत हमारे पास आती है तो हम सीधा सीबीआई से कार्रवाई करने के लिए कहेंगे, ऐसा निर्णय हमारे विभाग ने किया है। इस तरह के सख्त कदम हमें आपके सहयोग से उठाने पड़ेंगे, अगर आप चाहते हैं कि योजना का सही क्रियान्वयन हो।
SHRI YASHWANT SINHA : Madam Speaker, I myself referred to the dangers which social activists face while they are auditing or commenting upon MNREGA work, and it is unfortunate that some murders have taken place in my State of Jharkhand. But I would only like to make one request to the Minister and that is, do not punish the people of the State by stopping the money. We will all join you in ensuring that the guilty are brought to book as quickly as possible but do not threaten to stop the MNREGA funds to Jharkhand. That will be punishing the people and let us not do it.
SHRI VILASRAO DESHMUKH: That is not the intention. It is just to warn the State that if they do not take effective action, ultimately that would be last resort for the Central Government. It is a wake up call, nothing more than that. If they respond properly, we do not have any objection. तो यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब शिकायतें आती हैं उस वक्त मुझे लगता है कि कोई न कोई एक्शन सरकार को लेने की आवश्यकता होती है। एक दूसरी योजना के बारे में यहां पर बहुत-सी चर्चा हुई, वह है प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक योजना और कई सदस्यों ने अपने सुझाव भी यहां पर रखे हैं कि कौन-सी सड़क होनी चाहिए, कहां पुल होना चाहिए।
ये सारे जो सुझाव आपने दिए हैं, वे हमारे पास रखे हैं और मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि जो भी सुझाव आप लोगों ने दिए हैं और भविष्य में आप देना चाहते हैं तो हम चाहेंगे कि जो भी सूची सांसद हमें भेजेंगे, उस सूची को एक तो जो कोर प्लानिंग होता है उसमें होना चाहिए, उसका नेटवर्किंग जो होता है, कोर नेटवर्किंग। ...( व्यवधान) इसलिए अगर कोर नेटवर्किंग में आप जो सुझाव देंगे और आप सड़क के बारे में बताएंगे अगर वह नहीं है तो हम राज्य सरकार को लिखेंगे कि उसे इन्क्लूड करो। लेकिन एक बात मैं यहां साफ बताना चाहता हूं कि अगर सांसद को प्रभावी रूप से अपनी कंस्टीटय़ून्सी में काम करना है तो जो संसद सदस्य यहां पर बैठ कर बजट मंजूर करते हैं, उनको थोड़ी सी प्राथमिकता उसमें मिलनी चाहिए, इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती। । वह जमाना गया जब सांसद चुनकर आते थे और लोग उनको कभी पूछते भी नहीं थे कि आपने क्या काम किया? अब तो इतनी जागरूकता आ गयी है और 18 साल के नौजवानों को हमने मतदान का अधिकार दे दिया है। लोग संसद में हो रहे सारे काम को इंटरनेट पर लाइव देखते हैं। अब तो सांसद की पहले की भूमिका और आज की भूमिका में बहुत अन्तर है। मैं आपके विचार से पूरी तरह से सहमत हूं कि कोई सांसद अगर प्रभावी रूप से अपनी कंस्टीटय़ून्सी में काम करना चाहे तो उसको जितना ज्यादा अधिकार हमारे विभाग से दे सकते हैं, वह देने की मेरी पूरी तैयारी रहेगी, यह बात भी मैं आपको बताना चाहता हूं। जहां तक ड्रिकिंग वाटर की बात है ... ...( व्यवधान)
कर्नाटक का जो आपने सवाल उठाया था उसमें हम लोगों ने 11 मार्च तक 1200 करोड़ रूपए रिलीज किए हैं । आप जाकर जांच कीजिए अपनी राज्य सरकार के साथ।
श्री गोविन्द प्रसाद मिश्र (सीधी):मध्य प्रदेश का भी हुआ है?
श्री विलासराव देशमुख : हर राज्य को हमने दिया है, बिहार को 2800 करोड़ रूपए हमने रिलीज किए हैं। उत्तर प्रदेश को भी पैसा हमने रिलीज किया है। ...( व्यवधान)प्रत्येक सांसद को जो जानकारी चाहिए, हम आपको वह जानकारी पहुंचा देंगे।
अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए, कृपया बैठ जाइए श्री विलासराव देशमुख : प्रत्येक सांसद को उसके अपने राज्य की जो जानकारी चाहिए, आपको कितना पैसा रिलीज किया और कितना राज्य सरकार ने खर्च किया है, वह जानकारी हम आपके पास पहुंचा देंगे। जो भी योजना हैं, उसके बारे में हम जानकारी दे देंगे। ...( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Please do not disturb the Minister.
श्री विलासराव देशमुख : मैडम, सदन को यह बात मैं बताना चाहता हूं कि जितनी भी योजना हैं, महात्मा गांधी सड़क योजना नहीं, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना नहीं, जो भी योजनाएं हैं, ...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए ...... ( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) …* श्री विलासराव देशमुख : मैं संसद को बताना चाहता हूं कि अलग-अलग योजना में हर राज्य सरकार को दिया है, उसकी जानकारी हर सांसद को भेजने का काम हम लोग करेंगे। दूसरा जो महत्वपूर्ण मुद्दा है यहां पर उठाया गया वह है गरीबी रेखा से नीचे का जो......( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Please let the Minister complete his reply. Do not disturb him. Nothing to be recorded, except the Minister’s reply.
(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया : पूरा तो करने दीजिए...... ( व्यवधान)
श्री विलासराव देशमुख : महोदया, एक महत्वपूर्ण मुद्दा बीपीएल का उठाया गया।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : आप मंत्री जी को बोलने दीजिए।
…( व्यवधान)
श्री विलासराव देशमुख : महोदया, बीपीएल के बारे में यहां बहुत चर्चा हुई, क्योंकि जब लिस्ट बनती है, तो कुछ गलत लोग लिस्ट में आ जाते हैं और जिन लोगों को मदद मिलनी चाहिए, वे लिस्ट के बाहर रह जाते हैं। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर हमने निर्णय किया है और सिन्हा जी ने कमेटी के बारे में बहुत कमेन्ट्स किए कि कमेटी बनती है, लेकिन उससे कोई हल नहीं निकलता है। मैं कहना चाहता हूं कि भविष्य में हम कम कमेटियां बनाएंगे, लेकिन मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि जो भी कमेटियां बनी हैं और सक्सेना कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर नए बीपीएल की जनगणना करने का निर्णय हमारे विभाग ने किया है। यह काम आने वाले जून महीने से शुरू हो जाएगा और साल में एक नई लिस्ट बना ली जाएगी। इसमें आटोमेटिक एक्सक्लूज़न और आटोमेटिक एनक्लूज़न भी रखा है और जो दोनों में नहीं आते हैं, उनके लिए मार्किंग का सिस्टम भी रखा है। ये डिटेल्स मैं हर सांसद को भेजना चाहता हूं। जब जनगणना होगी और हमारे सांसद इसमें मदद करेंगे, तो यह काम और आसान हो जाएगा। कब यह जनगणना शुरू होने वाली है, यह भी आपको बताएंगे। उसमें क्या गाइड लाइन्स रखी गई हैं, उसकी कापी भी आपको भेजेंगे, जिससे कि आपको पता चल जाए कि इसमें सही लोग आ रहे हैं या गलत लोग आ रहे हैं, लेकिन प्लानिंग कमीशन ने हर राज्य का कोटा तय किया है। ...( व्यवधान)
श्री यशवंत सिन्हा (हज़ारीबाग):कोटे से आपका क्या मतलब है?...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : मंत्री जी के भाषण के अलावा कुछ भी रिकार्ड में नहीं जाएगा।
...( व्यवधान)* अध्यक्ष महोदया : मंत्री जी, आप कृपया चेयर को एड्रेस कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री विलासराव देशमुख : अध्यक्ष महोदया, बीपीएल के बारे में जो भी गाइड लाइन्स प्लानिंग कमीशन ने हमें दी हैं, हर राज्य के बारे में उन्होंने कहा कि जब पहला सर्वे हो जाएगा, ...( व्यवधान) पहले मुझे बात समाप्त करने दीजिए।...( व्यवधान)
SHRI YASHWANT SINHA : The Leader of the House is sitting here. I would like to request….… (Interruptions)
MADAM SPEAKER: Are you yielding, Mr. Minister?
SHRI VILASRAO DESHMUKH: I am not yielding.
MADAM SPEAKER: Let him complete, please.
श्री विलासराव देशमुख : अध्यक्ष महोदया, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि सबसे महत्वपूर्ण निर्णय हमारे विभाग की तरफ से लिया गया है कि जो लास्ट सर्वे वर्ष 2002-03 में हुआ था, जब एनडीए की सरकार थी, उसके बाद सर्वे नहीं हुआ है। इस संबंध में बहुत-सी शिकायतें आने के बाद यूपीए सरकार ने निर्णय किया है कि इसका दोबारा सर्वे होना चाहिए। उसके लिए हमने गाइडलाइन्स भी तय की हैं। मैं चाहता हूं कि सांसद अगर ठीक ढंग से इसकी जानकारी लेते हैं और मदद करते हैं, तो यह काम और आसान हो सकता है तथा सही लोग बीपीएल में आ सकते हैं। एक बार बीपीएल की लिस्ट में आने के बाद जो भी सरकार की योजनाएं होती हैं, उनका फायदा गरीब व्यक्ति को मिलने में आसानी होती है। इस काम में आप हमारा सहयोग करेंगे, इस बात को हम आपके ऊपर छोड़ते हैं।
हमारी कई महिला सदस्यों ने पीने के पानी की समस्या और सेनिटेशन की समस्या को उठाया है। आज भी सेनिटेशन के बारे में इतनी कोशिश करने के बाद निर्मल ग्राम पुरस्कार और ग्राम पंचायतों से लोगों को बुलाते हैं और सम्मानित करते हैं, फिर भी यह काम अधूरा है। इसमें राज्य सरकार और जो भी लोकल एनजीओज़ हैं, वे अगर हमारे साथ नहीं आते हैं, तो यह काम करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि इसके लिए ज्यादा पैसा लगता है और सरकार की तरफ से भी पैसे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य सरकार को भी इसके लिए आगे आने की आवश्यकता है। खास कर जो बीपीएल परिवार हैं, उनके लिए हम ज्यादा काम करना चाहते हैं। इसी तरह से पीने के पानी की सप्लाई में भी 75 परसेंट राज्य सरकार खर्चा करती है और बाकी का पैसा केंद्र सरकार को देना पड़ता है। इंदिरा आवास योजना एक ऐसी योजना है, जिसमें हमने यूनिट का 45 हजार रुपए और हिली एरिया में 48 हजार रुपए किए हैं। मैं जानता हूं कि ये पैसा कम है।
लेकिन हमने यूनिट की जो कॉस्ट बनाई है, उसमें 20 परसेंट राज्य सरकार को पैसा देना है। आंध्र प्रदेश में बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया है, अलग से मकान बनाए हैं। केंद्र सरकार से 100 परसेंट अपेक्षा करना कि वह खर्च करे, यह बहुत मुश्किल है। मैं कहना चाहता हूं कि केंद्र सरकार अपना कन्ट्रीब्यूट करेगी और बाकी के पैसे के लिए राज्य सरकार आगे आ सकती है, राज्य सरकार ज्यादा पैसा खर्च कर सकती है। अभी हमने इसमें बढ़ोतरी की है। आपका सुझाव है कि इसमें और बढ़ोतरी होनी चाहिए तो हम वित्त मंत्री जी के साथ अवश्य बात करेंगे कि आने वाले समय में और क्या सुधार कर सकते हैं, इसे देख सकते हैं। पीने का पानी, सेनिटेशन की व्यवस्था, गरीब लोगों को घर और रोजगार देने की व्यवस्था, ये सारी योजनाएं ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं। महात्मा गांधी नरेगा योजना एक हिस्टारिकल स्कीम है। मैं स्वयं जानता हूं और महसूस करता हूं कि इसके महाराष्ट्र में कितने अच्छे परिणाम हुए हैं। मैं हमारी नेता सोनिया गांधी जी, माननीय प्रधानमंत्री जी और वित्त मंत्री जी को धन्यवाद करना चाहता हूं कि इस काम के लिए जितना पैसा चाहिए देने के लिए तैयार हैं। मेरी सब एमपीज़ से विनती है कि इस योजना को ध्यान से देखें ताकि कम से कम लोगों का नुकसान हो और लोगों को ज्यादा से ज्यादा काम मिले। अगर इस काम के लिए सांसद इफेक्टिवली हिस्सा लेते हैं तो मुझे लगता है कि इस काम को आगे बढ़ाने में हमें कोई मुश्किल नहीं आएगी।
अध्यक्ष महोदया, कई सांसदों ने अपने इन्डीविजुअल क्षेत्र के कई सवाल रखे हैं। जहां तक फारेस्ट एरिया का सवाल है मुझे लगता है कि सड़क बनाने या बिजली का खंबा लगाने आदि के लिए फारेस्ट डिपार्टमेंट से परमिशन लेनी पड़ती है। हमारे विभाग की तरफ से कोशिश रहेगी लेकिन राज्य सरकार को अगुआई करनी चाहिए। जहां तक हमारे विभाग का सवाल है हम भी पर्यावरण मंत्रालय से बात करेंगे क्योंकि अगर ग्रामीण क्षेत्र में पानी नहीं जाएगा, बिजली नहीं पहुंचेगी, सड़क नहीं बनेगी तो वे लोग मेन स्ट्रीम में नहीं आ सकेंगे इसलिए इसमें थोड़ा सा रास्ता निकालने की आवश्यकता है। रमेश जी इस विभाग के मंत्री हैं और हमारी कोशिश होगी कि कम से कम ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए जो नियम हैं, उनसे थोड़ी सहूलियत लें। ...( व्यवधान)
श्री गोविन्द प्रसाद मिश्र (सीधी):महोदया, 60 और 40 में छूट करें।...( व्यवधान) 50 और 50 करें।...( व्यवधान)
ताकि छोटे-छोटे नाले बन सकें।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : आप उनकी बात सुन लीजिए। अभी उनका रिप्लाई पूरा नहीं हुआ है। आप बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
श्री गोविन्द प्रसाद मिश्र : संपत्तियां नहीं बन पा रही हैं, कोई काम नहीं हो पा रहा है। आप इसे एग्जामिन कराएं और देखें कि लोग सफरर हैं या नहीं? ...( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) …* MADAM SPEAKER: Please let him reply. अब आप बैठ जाएं। हो सकता है वे इस पर बोल रहे हों।
…( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) … * MADAM SPEAKER: Nothing will go on record except the reply of the hon. Minister. Only whatever the hon. Minister is saying will go on record.
(Interruptions) …* श्री विलासराव देशमुख: महोदया, मैं कहना चाहता हूं कि कई सांसदों ने सुझाव रखे हैं लेकिन अभी सारे सुझावों का जवाब देना मुश्किल है। मैंने इसलिए कहा कि हर प्रांत के एमपीज़ के साथ अलग से बैठेंगे, उनके सुझाव सुनेंगे और हमारी कोशिश मदद करने की होगी। जब हमारा आपके साथ इतना प्रोएक्टिव रोल है तो आप बीच-बीच में बार-बार क्यों उठ रहे हैं? हम 60 और 40 के बारे में बहुत पहले से जानते हैं। मैंने इसलिए कहा कि इस योजना को किसी और योजना से जोड़ सकते हैं। 60 और 40 का काम नरेगा से हो सकता है और बाकी का काम प्रधानमंत्री सड़क योजना से हो सकता है। हम इसे जोड़ने का काम इस विभाग की तरफ से करना जा रहे हैं।
20.00 hrs. मुझे लगता है कि ये जो सारे काम हैं या जो अच्छे सुझाव हैं, उन पर हमारा विभाग विचार करेंगा। हम चाहेंगे कि इस विभाग की तरफ से जो भी सपना महात्मा गांधी ने देखा था, उस सपने को पूरा करने की हमारी कोशिश रहेगी। ग्राम स्वराज्य की जो भूमिका उन्होंने रखी थी, और जो कहा कि जब तक गांव का विकास नहीं होगा, तब तक देश का विकास होने में मुश्किल है। उस विचारधारा को मन में रखते हुये हमारा विभाग एक-एक कदम आगे बढ़ाता रहेगा। हमारे विभाग की तरफ से उस सपने को पूरा करने की पूरी कोशिश होगी। यह तब जाकर यह बात बनेगी जब सारे सांसद इस काम में अपने आपको झोंक देंगे। यह अकेले का काम नहीं, राज्य सरकार का काम नहीं है, केन्द्र का काम नहीं है लेकिन राज्य सरकार और केन्द्र के बीच में लड़ाई होती रहेगी। जब तक अपने अपने क्षेत्र के बारे में सांसद जोर से काम नहीं लगेंगे, तब तक यह सपना पूरा नही होगा। मैं फिर से उन माननीय सदस्यों का धन्यवाद करना चाहूंगा जिन्होंने इस बहस में हिस्सा लिया या जिन्होंने नहीं लिया। मुझे आशा है कि आप सभी का सहयोग इस विभाग के काम में मिलता रहेगा।
अध्यक्ष महोदया, मैं इन्हीं शब्दों के साथ आप सब से विनती करता हूं कि ग्रामीण विकास विभाग की मांगों को पारित कराने में सहयोग प्रदान करें।
अध्यक्ष महोदया : माननीय सदस्यगण, इस चर्चा के पश्चात् शून्य काल की समाप्ति तक सदन की कार्यवाही बढ़ाई जाती है।
MADAM SPEAKER: Hon. Members, a total of 14 cut motions have been moved by Members to the Demands for Grants relating to the Ministry of Rural Development. Shall I put all the cut motions to the vote of the House together or does any hon. Member want any particular cut motion to be separately?
SEVERAL HON. MEMBERS: You may put all the cut motions to the vote of the House together.
MADAM SPEAKER: I shall now put all the cut motions, which have been move together, to the vote of the House.
All the cut motions were put and negatived.
MADAM SPEAKER: I shall now put the Demands for Grants relating to the Ministry of Rural Development to the vote of the House:
The question is:
“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account shown in the third column of the Order paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2012, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 82 to 84 relating to the Ministry of Rural Development.” The motion was adopted.
MADAM SPEAKER: Let us have order in the House. We are continuing with the next business, that is ‘Zero Hour’