State Consumer Disputes Redressal Commission
Akash Institute vs Sakshi Srivastava on 15 February, 2017
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/1255/2015 (Arisen out of Order Dated 19/05/2015 in Case No. C/10/2014 of District Varanasi) 1. Akash Institute Varansi ...........Appellant(s) Versus 1. Sakshi Srivastava Varansi ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Vijai Varma PRESIDING MEMBER For the Appellant: For the Respondent: Dated : 15 Feb 2017 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ अपील संख्या-1255/2015 ( सुरक्षित ) (जिला उपभोक्ता फोरम, वाराणसी द्वारा परिवाद संख्या-10/2014 में पारित निर्णय और आदेश दिनांकित 19-05-2015 के विरूद्ध) Aakash Institute, Situated at :B-27/97, IInd Floor, Dharm Sangh Shiksha Mandal, Durga Kund, Varanasi, through its Proprietor Vishnu Deo Tiwari. Aakash Institute, Girls Hostel, Situated at : B-26/64, Kasmiriganj, through its Warden Smt. Ankita Tiwari Wife of Vishnu Deo Tiwari.
अपीलार्थी/विपक्षीगण बनाम् Km. Sakshi Srivastava, D/o Sri Sushil Kumar Srivastava, resident of :18/48-R-11 Kunti Vihar Colony, Nakhi Ghat, Varanasi..
प्रत्यर्थी/परिवादिनी समक्ष :-
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष।
माननीय श्री महेश चन्द, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री वासुदेव मिश्रा।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : श्री एच0 के0 श्रीवास्तव। दिनांक :
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान , अध्यक्ष द्वारा उद्घोषित निर्णय परिवाद संख्या-10/2014 कु0 साक्षी श्रीवास्तव बनाम् आकाश इन्स्टीट्यूट स्थित बी-27/97 द्वितीय तल धर्मसंघ शिक्षा मण्डल दुर्गाकुण्ड वाराणसी जरिये फ्रैन्चाइजी व दो अन्य में जिला फोरम, वाराणसी द्वारा पारित निर्णय और आदेश दिनांक 19-05-2015 के विरूद्ध यह अपील उपरोक्त परिवाद के विपक्षीगण Aakash Institute, Situated at :B-27/97, IInd Floor, Dharm Sangh Shiksha Mandal, Durga Kund, Varanasi, through its Proprietor Vishnu Deo Tiwari एवं Aakash Institute, Girls Hostel, Situated at : B-26/64, Kasmiriganj, through its Warden Smt. Ankita Tiwari Wife of 2 Vishnu Deo Tiwari की ओर से धारा-15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986 के अन्तर्गत इस आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गयी है।
आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा जिला फोरम ने उपरोक्त परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए परिवाद के सभी विपक्षीगण को संयुक्त एवं एकाकी रूप से आदेशित किया है कि आदेश की तिथि से एक माह में परिवादिनी से ली गयी हास्टल फीस मु0 30,000/-रू0, शिक्षण शुल्क मु0 24506/-रू0, मानसिक, शारीरिक कष्ट की क्षतिपूर्ति की धनराशि मु0 25,000/-रू0 और वाद व्यय की धनराशि मु0 3,000/-रू0 परिवादिनी को अदा करे अन्यथा अवधि बीत जाने पर समस्त धनराशि पर परिवाद प्रस्तुत करने की तिथि से भुगतान की तिथि तक 08 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।
अपीलार्थीगण की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री वासुदेव मिश्रा तथा प्रत्यर्थी की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री एच0 के0 श्रीवास्तव उपस्थित आए।
हमने उभयपक्ष के विद्धान अधिवक्तागण के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय और आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादिनी का कथन है कि उसने यू0पी0 बोर्ड की इण्टरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी में 69.6 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया। प्रत्यर्थी/परिवादिनी मेडिकल में एडमीशन चाहती थी और इसी क्रम में उसने विपक्षी संख्या-1 आकाश इंस्टीट्यूट जो कि एक कोचिंग संस्थान है, के समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन से प्रेरित होकर मेडिकल इन्ट्रेन्स परीक्षा की तैयारी के लिए विपक्षी संख्या-1 के रेगुलर कोर्स NEET-2014 में प्रवेश लेने का निश्चय किया और प्रवेश प्राप्त किया। प्रवेश के 3 समय सह टेस्ट फार्म मु0 500/-रू0, हास्टल की वार्षिक फीस मु0 54,000/-रू0 तथा कोचिंग फीस की प्रथम किश्त मु0 25,606/-रू0 यानि कुल मु0 80,000/-रू0 रसीद संख्या-128/रजि0/एन-20130000852 दिनांक 15-06-2013 और कोचिंग फीस की किश्त मु0 25,506/-रू0 रसीद संख्या-128/रजि0/एन-20130000854 दिनांक 15-06-2013 के द्वारा जमा किया। तदोपरान्त एडमीशन लेने के तीन दिन बाद वह क्लास करने हेतु हास्टल गयी परन्तु हास्टल में खाने की व्यवस्था ठीक नहीं थी और खाना समय पर नहीं दिया जाता था तथा बासी और खराब खाना दिया जाता था और कभी-कभी खाना खत्म होने की बात कहकर खाना दिया ही नहीं जाता था। परिवादिनी ने इस स्थिति से अपने घरवालों को अवगत कराया। तब परिवादिनी के चाचा अमित श्रीवास्तव दिनांक 07-08-2013 को शिकयत करने विपक्षी संख्या-1 के यहॉं गये तो उसे वार्डेन विपक्षी संख्या-3 से बात करने के लिए कहा गया और विपक्षी संख्या-3 से शिकायत करने पर वह आग बबूला हो गयी तथा उन्होंने फोन करके विपक्षी संख्या-2 को बुलाया जो तीन-चार अन्य गुण्डे किस्म के लोगों के साथ वहॉं आये और भद्दी-भद्दी गालियॉं देते हुए परिवादिनी के चाचा को खूब मारा-पीटा। इसके साथ ही परिवादिनी को कोचिंग संस्थान से निकाल दिया और उसके द्वारा जमा फीस और पैसा भी वापस नहीं किया गया। अत: विवश होकर प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने दूसरे विघालय में बी0एस0सी0 की कक्षा में दाखिला लिया। उपरोक्त कथन के साथ ही प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने परिवाद प्रस्तुत कर जमा फीस 80,106/-रू0 18 प्रतिशत ब्याज सहित वापस दिलाये जाने का निवेदन किया और साथ ही 5,00,000/-रू0 क्षतिपूर्ति की धनराशि 4 और 2,00,000/-रू0 शारीरिक, मानसिक क्षति तथा 5,000/-रू0 वाद व्यय की भी मांग की है।
विपक्षीगण संख्या-1 व 2 की ओर से संयुक्त लिखित कथन जिला फोरम के समक्ष प्रस्तुत कर परिवाद का विरोध किया गया और कहा गया कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आती है और कथन किया कि विपक्षी के कोचिंग संस्थान में 600 विद्यार्थी कोचिंग करते है जो अपने वाहन से आते है अथवा हास्टल में रहते हैं। टीचिंग स्टाफ बहुत ही गुणवत्तावाला है। लिखित कथन में विपक्षीगण संख्या-1 और 2 की ओर से यह भी कहा गया कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी व उसके अभिभावक ने प्रवेश के समय प्रवेश के प्रार्थना-पत्र पर हस्ताक्षर किया है जिसमें प्रवेश की शर्तें अंकित है। दोनों विपक्षीगण ने लिखित कथन में कहा है कि हास्टल से उनका कोई संबंध नहीं है। उन्होंने 54,000/-रू0 हास्टल फीस लिये जाने से इंकार किया है और कहा है कि हास्टल से उनका कोई संबंध नहीं है और हास्टल की गतिविधि की उनको जानकारी है। उनका कथन है कि दिनांक 07-08-2013 को प्रत्यर्थी/परिवादिनी के संरक्षक कोचिंग सेन्टर पर आए एवं कोचिंग फीस की द्वितीय किस्त को लेकर विवाद किया और हंगामा किया तथा दुर्व्यवहार किया। अत: एडमीशन शर्त के क्लाज-24 के अनुसार परिवादिनी/प्रत्यर्थी को संस्थान से निकाल दिया गया है।।
विपक्षी संख्या-3 की ओर से भी लिखित कथन प्रस्तुत कर परिवाद के कथन का खण्डन किया गया है और कहा गया है कि न तो उसे कभी 54,000/-रू0 दिया गया है और न हास्टल से उसका कोई संबंध है। हास्टल की किसी गतिविधि की उसको जानकारी नहीं है।5
जिला फोरम ने उभयपक्ष के अभिकथन और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के उपरान्त परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उपरोक्त प्रकार से आदेश पारित किया है।
अपीलार्थी/विपक्षीगण के विद्धान अधिवक्ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश साक्ष्य और विधि के विपरीत है।
अपीलार्थी/विपक्षीगण के विद्धान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता नहीं है। अत: जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश अधिकार रहित है।
प्रत्यर्थी/परिवादिनी के विद्धान अधिवक्ता ने जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश का समर्थन करते हुए तर्क किया कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता है और उसके द्वारा प्रस्तुत परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य है। प्रत्यर्थी/परिवादिनी के विद्धान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि अपीलार्थी/विपक्षीगण ने प्रत्यर्थी/परिवादिनी को हास्टल में ठीक ढंग से खाना नहीं दिया और शिकायत करने पर प्रत्यर्थी/परिवादिनी के संरक्षक से दुर्व्यवहार किया तथा बिना किसी उचित कारण के प्रत्यर्थी/परिवादिनी को अपने संस्थान से निकाल दिया है। अत: ऐसी स्थिति में जिला फोरम ने जो आक्षेपित निर्णय और आदेश पारित किया है वह उचित और विधिसम्मत है और उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हमने उभयपक्ष के तर्क पर विचार किया है।
सर्वप्रथम विचारणीय बिन्दु यह है कि क्या प्रत्यर्थी/परिवादिनी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता है।6
अपीलार्थी/विपक्षीगण के विद्धान अधिवक्ता ने हमारे समक्ष मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा III (2014) CPJ 120 (NC) Regional Institute of Cooperative Management Vs. Naveen Kumar Chaudhary, Shitanshu Ranjan, Anshul Saini, Anamika Singh, Nisha, Aarif Faridi. के वाद में पारित निर्णय की नजीर प्रस्तुत की है जिसमें मा0 राष्ट्रीय आयोग ने मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Civil Appeal No. 697 of 2014, Indian Institute of Bank & Finance (IIBF) Vs. Mukul Srivastava में पारित निर्णय दिनांक 17-01-2014 में प्रतिपादित सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए यह माना है कि विद्यार्थी उपभोक्ता नहीं है। अत: शिक्षण संस्थान के विरूद्ध प्रस्तुत परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत ग्राह्य नहीं है।
हमने मा0 सर्वोच्च न्यायालय एवं मा0 राष्ट्रीय आयोग के उपरोक्त निर्णयों पर आदरपूर्वक विचार किया है।
परिवाद पत्र के अभिकथन से स्पष्ट है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने अपीलार्थी/विपक्षीगण की कोचिंग संस्थान में मेडिकल परीक्षा की तैयारी हेतु प्रवेश लिया है। अपीलार्थी/विपक्षीगण केवल परीक्षा की तैयारी कराते है, डिग्री नहीं प्रदान करते हैं और न ही परीक्षा आयोजित करते है। अत: वर्तमान वाद के तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में यह मानने हेतु उचित आधार है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी अपीलार्थी/विपक्षीगण की कोचिंग संस्थान की उपभोक्ता है। अत: वर्तमान वाद के तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में अपीलार्थी/विपक्षीगण के विद्धान अधिवक्ता द्वारा संदर्भित उपरोक्त नजीर लागू नहीं होती है। सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के उपरान्त हम इस मत के हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता है।7
अब प्रश्न यह है कि क्या प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने अपीलार्थी/विपक्षीगण के संस्थान में 500/-रू0 प्रवेश सह टेस्ट फार्म फीस, हास्टल की वार्षिक फीस 54,000/-रू0 तथा कोचिंग की प्रथम किश्त की धनराशि 25,606/-रू0 जमा किया है।
परिवाद पत्र की धारा-4 में प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने प्रवेश सह टेस्ट फार्म फीस मु0 500/-रू0, हास्टल की वार्षिक फीस 54,000/-रू0 तथा कोचिंग की प्रथम किश्त की फीस 25,606/-रू0 अपीलार्थी/विपक्षीगण के कोचिंग संस्थान में रसीद संख्या-128/रजि0/एन-20130000852 के द्वारा जमा करने का कथन किया है और साथ ही कोचिंग फीस की किश्त 25,506/-रू0 उसी दिन दिनांक 15-06-2013 को रसीद संख्या-20130000854 के द्वारा जमा करना बताया है।
अपीलार्थी/विपक्षीगण ने अपने लिखित कथन में परिवाद-पत्र की धारा-4 के कथन से इंकार किया है और स्पष्ट रूप से कथन किया है कि हास्टल से उनका कोई संबंध नहीं है और उन्हें 54,000/-रू0 हास्टल फीस प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने अदा नहीं किया है।
परिवाद पत्र की धारा-6 में प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने कथन किया है कि एडमीशन लेने के तीन दिन बाद जब वह क्लास करने हास्टल गयी तो हास्टल के कमरे में अन्य दो लड़कियॉं कु0 आशु सिंह और प्रियंका पाण्डेय रहती थी और बगल के कमरे में मु0 दीक्षा सिंह, कु0 शालिनी सिंह, कु0 राबिया खातून तथा कु0 दामिनी और प्रिया रहती थी।
अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से प्रस्तुत लिखित कथन से यह स्पष्ट है कि उन्होंने हास्टल का संबंध अपनी कोचिंग संस्थान से होने से इंकार 8 किया है और इस बात से भी इंकार किया है कि उन्होंने हास्टल हेतु 54,000/-रू0 प्रत्यर्थी/परिवादिनी से लिया है।
जिला फोरम के आक्षेपित निर्णय और आदेश से यह स्पष्ट है कि जिला फोरम के समक्ष प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने 54,000/-रू0 हास्टल फीस की कोई रसीद प्रस्तुत नहीं किया है जबकि उसने परिवाद पत्र की उपरोक्त धारा-4 में 54,000/-रू0 हास्टल फीस की भी रसीद अपीलार्थी/विपक्षीगण द्वारा दिये जाने का उल्लेख किया है।
उल्लेखनीय है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी की ओर से आयोग के समक्ष प्रस्तुत लिखित तर्क की धारा-4 में कथन किया गया है कि अपीलार्थी/विपक्षीगण ने प्रत्यर्थी/परिवादिनी से 54,000/-रू0 हास्टल की फीस लिया है लेकिन उसकी कोई रसीद नहीं दिया है। अत: यह स्पष्ट है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने परिवाद में 54,000/-रू0 हास्टल फीस की रसीद दिये जाने का जो उल्लेख किया है वह गलत है। अत: पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा अपीलार्थी/विपक्षीगण को 54,000/-य0 हास्टल फीस दिया जाना कदापि प्रमाणित नहीं होता है।
परिवाद पत्र में प्रत्यर्थी/परिवादिनी का नाम और पता इस प्रकार अंकित है कि कु0 साक्षी श्रीवास्तव अवयस्क पुत्री श्री सुशील कुमार श्रीवास्तव है जो कि उसके संरक्षक/पिता है है तथा परिवादिनी के पिता का शहर में आवास स्थित है। अत: प्रत्यर्थी/परिवादिनी के पिता का आवास वाराणसी शहर में होते हुए भी प्रत्यर्थी/परिवादिनी के पिता द्वारा उसे हास्टल में रखा जाना अस्वाभाविक प्रतीत होता है और उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि कथित हास्टल फीस 54,000/-रू0 की कोई रसीद प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने 9 प्रस्तुत नहीं किया है जब कि उसने परिवाद पत्र में रसीद प्राप्त होने का उल्लेख किया है।
उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचना एवं उभयपक्ष के अभिकथन और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि जिला फोरम ने 54,000/-रू0 हास्टल फीस जमा किये जाने का जो निष्कर्ष प्रत्यर्थी/परिवादिनी के शपथ पत्र के आधार पर निकाला है वह विधि की दृष्टि से उचित और मान्य नहीं है।
अपीलार्थी/विपक्षीगण ने प्रत्यर्थी/परिवादिनी से प्रवेश सह टेस्ट फार्म मु0 500/-रू0 और कोचिंग की प्रथम किश्त मु0 25,606/-रू0 की धनराशि प्राप्त करना स्वीकार किया है अत: यह प्रमाणित है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने अपीलार्थी/विपक्षीगण के संस्थान में प्रवेश सह टेस्ट फार्म मु0 500/-रू0 और कोचिंग की प्रथम किश्त की धनराशि मु0 25,606/-रू0 जमा की है।
अब प्रश्न यह है कि क्या अपीलार्थी/विपक्षीगण ने प्रत्यर्थी/परिवादिनी की सेवा में कमी की है और प्रत्यर्थी/परिवादिनी अपीलार्थी/विपक्षीगण से जमा धनराशि व क्षतिपूर्ति पाने की अधिकारिणी है।
परिवाद-पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादिनी अपीलार्थी/विपक्षीगण के हास्टल में जून, 2013 में गयी है और उसके करीब 45 दिन बाद दिनांक 07-08-2013 को उसके चाचा अविभावक श्री अमित श्रीवास्तव अपीलार्थी/विपक्षीगण के कोचिंग संस्थान में गये है, जहॉं पर उनका विवाद अपीलार्थी/विपक्षीगण से हुआ है और हंगामा भी हुआ है। दिनांक 07-08-2013 के पहले प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा अपीलार्थी/विपक्षीगण से खाने के संबंध में कोई शिकायत किया जाना प्रमाणित नहीं होता है। इसके साथ ही 10 प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा हास्टल लेना और उसकी फीस 54,000/-रू0 जमा करना भी प्रमाणित नहीं होता है।
अत: दिनांक 07-08-2013 को प्रत्यर्थी/परिवादिनी के चाचा श्री अमित श्रीवास्तव ने अपीलार्थी/विपक्षीगण के यहॉं जाने का जो कारण बताया है वह विश्वसनीय और आधारयुक्त नहीं दिखता है।
परिवाद पत्र की धारा-4 से ही यह स्पष्ट है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने कोचिंग की प्रथम किश्त 25,606/-रू0 जमा किया था। इससे स्पष्ट है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी को कोचिंग फीस की और किश्तें देना बाकी था। अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से दर्शित फीस चार्ट से यह स्पष्ट होता है कि द्वितीय किश्त दिनांक 04-08-2013 को देय थी अत: अपीलार्थी/विपक्षीगण का यह कथन आधारयुक्त दिखता है कि प्रत्यर्थी/परिवादिनी के अभिभावक श्री अमित श्रीवास्तव दिनांक 07-08-2013 को कोचिंग फीस की द्वितीय किश्त के संदर्भ में ही अपीलार्थी/विपक्षीगण के संस्थान में गये है और विवाद किया है। इतने बड़े विवाद के बाद प्रत्यर्थी/परिवादिनी को अपीलार्थी/विपक्षीगण द्वारा अपने संस्थान में रखना सम्भव नहीं दिखता है और प्रत्यर्थी/परिवादिनी ने कोचिंग की प्रथम किश्त के बाद द्वितीय किश्त जमा भी नहीं किया है अत: ऐसी स्थिति में प्रत्यर्थी/परिवादिनी को अपीलार्थी/विपक्षीगण की कोचिंग संस्थान से निकाले जाने का उचित आधार है और इसे अपीलार्थी/विपक्षीगण की सेवा में कमी अथवा अनुचित व्यापार पद्धति नहीं कहा जा सकता है।
उपरोक्त विवेचना एवं सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के उपरान्त हम इस मत के हैं कि अपीलार्थी/विपक्षीगण ने सेवा में कोई त्रुटि नहीं की है। जिला फोरम के आक्षेपित निर्णय और आदेश के 11 अवलोकन से यह स्पष्ट है कि जिला फोरम ने साक्ष्यों पर सही ढंग से विचार किये बिना मात्र अनुमान एवं अटकलों के आधार पर अपीलार्थी/विपक्षीगण को सेवा में कमी का दोषी माना है।
प्रत्यर्थी/परिवादिनी की ओर से उनके विद्धान अधिवक्ता ने मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा Revision Petition No. 2684 of 2014 FIIT JEE Ltd. Vs. S. Balavignesh, Revision Petition No. 3066 of 2008 Fiit Jee Ltd. Vs. Ms. Ishaan Punj on 01 October, 2013 Revision Petition No. 1932 of 2012 M/s Fiitjee Limited Vs. Shri Anil Kumar Jain of 17 April, 2013, Revision Petition No. 3365 of 2016 FIITJEE Ltd. Vs. Dr. (Mrs.) Minathi Rath में पारित निर्णयों की नजीरें प्रस्तुत किया है।
प्रत्यर्थी/परिवादिनी के विद्धान अधिवक्ता ने मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा Dhirendra Kumar (Dead) & Ors. Vs. M.R. Asrangapani & Ors. के वाद में पारित निर्णय जो I(2015)CPJ 550 (NC) में प्रकाशित है की नजीर भी प्रस्तुत किया है।
प्रत्यर्थी/परिवादिनी के विद्धान अधिवक्ता ने मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Civil Appeal No. 1135 of 2001 D/d 13-02-2009 Buddhist Mission Dental College & Hospital Vs. Bhupesh Khurana &Others में पारित निर्णय की प्रति भी प्रस्तुत की है।
हमने प्रत्यर्थी/परिवादिनी के विद्धान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत उपरोक्त न्याय निर्णयों का आदरपूर्वक अवलोकन किया है। उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम इस मत के हैं कि इन निर्णयों का कोई लाभ वर्तमान वाद 12 के तथ्यों और साक्ष्यों के परिप्रेक्ष्य में प्रत्यर्थी/परिवादिनी को नहीं दिया जा सकता है।
उपरोक्त निष्कर्षों के आधार पर हम इस मत के हैं कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश साक्ष्य और विधि के विरूद्ध है एवं निरस्त किये जाने योग्य है और परिवादिनी द्वारा प्रस्तुत परिवाद भी निरस्त किये जाने योग्य है।
आदेश अपील स्वीकार की जाती है। जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश अपास्त किया जाता है और प्रत्यर्थी/परिवादिनी द्वारा प्रस्तुत परिवाद निरस्त किया जाता है।
उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान) (महेश चन्द ) अध्यक्ष सदस्य कोर्ट नं0-1 प्रदीप मिश्रा [HON'BLE MR. Vijai Varma] PRESIDING MEMBER