Lok Sabha Debates
Further Discussion On Need To Lay Down Specific Parameters For Conducting The ... on 6 May, 2010
Title: Further discussion on need to lay down specific parameters for conducting the Census, 2011, raised by Sh. Ananth Kumar on 5th May, 2010. (Not concluded).
MR DEPUTY-SPEAKER: The House shall now take up Discussion under Rule 193.
Shri Mulayam Singh Yadav.
श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी): उपाध्यक्ष महोदय, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, कि आपने एक महत्वपूर्ण सवाल और मुद्दे पर हमें बोलने का मौका दिया। हम समाजवादियों ने हमेशा यह स्वीकार किया है कि जाति समाज की गंदगी है। जितनी जातियाँ हैं, जाति के आधार पर पहचान हो, लेकिन यह समाज की गंदगी है यह भी हम स्वीकार करते हैं। यह गंदगी कपड़े से छिपाने से नहीं जा सकती। इसकी सफाई के लिए संविधान में शैक्षिक और सामाजिक आधार पर जो बहुत छोटी जातियाँ हैं, कमज़ोर हैं, जिनकी संख्या भी कम है, उन जातियों को भी आगे लाने के लिए शैक्षिक और सामाजिक आधार पर विशेष अवसर देने के लिए उनको आरक्षण देने की नीति बनाने का अवसर संविधान निर्माताओं ने दिया है। हम आपसे कहना चाहते हैं कि आज ऐसी बहुत सी जातियाँ हैं। हमने क्यों जाति के आधार पर जनगणना करने का फैसला किया और आप लोगों पर दबाव दिया, इसकी माँग की, जिस पर पूरा सदन तैयार हुआ, सहमत हो गया- क्योंकि ऐसी बहुत सारी जातियाँ हैं जिनकी अभी कोई पहचान ही नहीं है। इसके लिए हमने पहली बार उत्तर प्रदेश में कदम उठाया। ये जातियाँ हैं- राजभर, निषाद, प्रजापति, मल्लाह, कहार, कश्यप, कुम्हार, धीमर, बिन्द, भर, केवट, धीवर, वाथम, मछुआरे, माँझी, तुरहा और गोड़ - ये लगभग 17 जातियाँ ऐसी हैं जिनके बारे में हमने देखा कि उत्तर प्रदेश में जिनकी कोई पहचान नहीं है और कहीं किसी तरह से नौकरियों में या विधान सभाओं और लोक सभा में इनका कोई खास महत्व नहीं है। हमने यह कदम उठाया था। इससे उनको नौकरियाँ मिलीं और आज भी कुछ नौकरियाँ करने वाले हैं। लेकिन दूसरी सरकार जो आई तो उसने इन 17जातियों को खत्म कर दिया। विधान सभा का प्रस्ताव हमने दिल्ली में सरकार को भेजा। जाति के आधार पर जनगणना की माँग हमने इसलिए रखी ताकि इन जातियों की पहचान हो।
ये छोटी-छोटी संख्या वाली जातियां हैं और गरीब भी हैं। ये बहुत पीछे रह गई हैं। चौहान को भी हम मानते हैं, ये हमारे विरोधी हैं, लेकिन इन्हें हम मानते हैं, इन्हें भी इसमें शामिल कर रहे हैं। ये ऐसी जातियां हैं, जिनकी पहचान नहीं है। इसलिए हम लोगों ने जाति के आधार पर आपसे मांग की थी और इसलिए की थी कि आरक्षण तो हो ही गया, मंडल आयोग आदि सब हुआ है। जाति के आधार पर आरक्षण हुआ है। जाति के आधार पर सदन एक बार मान चुका है, हम केवल यह चाहते हैं कि अभी जो जनगणना हो रही है और इस जनगणना में इतनी सहूलियत एवं सुविधा है कि केवल एक कॉलम बन जाएगा। ये जो कहते हैं कि बड़ी मुश्किल होगी, हमने वरिष्ठ अधिकारियों से बात की है, वे कह रहे हैं कि इसमें कोई मुश्किल नहीं है, एक कॉलम अलग हो जाएगा, उसमें जाति रखी जाएगी।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि जातियों के बारे में पता तो चले। इतनी कमजोर और कम संख्या वाली जो जातियां हैं, उनकी स्थिति क्या है। जनगणना में शिक्षा, मकान और खेती आदि के बारे में सब जानकारी की जा रही है। ये जो सब ताल-तलैया, पेड़-पौधे, नाले हो रहे हैं, इनके बारे में लिखा जा रहा है तो जाति जनगणना में सरकार को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, इसे सरकार को स्वीकार कर लेना चाहिए। यह हमारा आधार और तर्क है। दूसरा हमारा यह कहना है कि जाति बगैर जनगणना करने से काका कालेलकर ने स्वीकार किया कि हमें इस कमीशन में असुविधा हो रही है, क्योंकि जात का पता ही नहीं है कि कितनी कौन सी जात है। मंडल कमिशन बैठा, उसने भी स्वीकार किया कि जब तक जात नहीं लिखी जाएगी, जात का पता नहीं होगा कि कौन कितनी जात के हैं तो हम आरक्षण कैसे दें। फिर किसी तरह से उन्होंने54फीसदी ऐसे ही अंदाज से माना। दूसरी तरफ मुसलमान भी पिछड़े हैं, इनकी तादाद लिखी जाएगी। रंगनाथ मिश्रा और तमाम कमिशन इसी सरकार ने बैठाए, लेकिन इसे किसी ने स्वीकार नहीं किया, हम कई बार सदन में बोल चुके हैं, हम उस पर नहीं जाना चाहते। हम इतना ही कहना चाहते हैं कि जात लिखना क्यों जरूरी है। मंडल कमिशन बैठा, मंडल कमिशन, काका कालेलकर और सब ने स्वीकार किया, बाद में रंगनाथ मिश्रा से लेकर जितने भी कमिशन बैठे हैं, इसी कांग्रेस सरकार ने कमिशन बैठाएं, मंडल को छोड़ कर, मंडल कमिशन हमारी सरकार ने बैठाया, जनता पार्टी ने, जब चौधरी चरण सिंह होम मिनिस्टर थे, बाकी सभी कमिशन कांग्रेस सरकार ने बैठाए। उन कमिशनों की रिपोर्ट लाकर रख दी, इस कारण से हम लोगों में असमानता आई कि इन्होंने यह क्या किया है। सवाल यह है कि जैसे कमिशन ने लिखा है कि मुसलमानों की हालत अनुसूचित जाति एवं जनजाति से भी गिरी हुई हालत है। इन्हें विशेष अवसर देने की जरूरत है। इसी तरह पिछड़े वर्ग की जो जातियां हैं, इनमें सारी जातियां, आप सही कहेंगे कि तीनों यादव बैठ कर अलग से चर्चा करते हैं, पता नहीं क्यों। ये पिछड़े निकल कर आ गए हैं, अन्य जातियों में बस्ती में, रायबरेली और प्रतापगढ़ में मैंने खुद इस तरह की चीजें देखी हैं कि वहां पर कुर्मी-यादव या कुशवाहा आदि की हालत क्या है। आप कहीं पर भी देख लीजिए, केवल रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर या बस्ती में जाकर देख लीजिए, हम उत्तर प्रदेश के जिले बता रहे हैं। इनकी हालत इतनी खराब है, जब जाति में लिखा जाएगा तो पता चलेगा कि कितनी जातियों की हालत खराब है। इनको आगे बढ़ाने के लिए सरकार काम करे और करना चाहिए, इनके बारे में आपको सोचना पड़ेगा। यहां तस्वीरें देख लीजिए, लालू जी, मुलायम सिंह जी और शरद यादव जी, सब आगे बढ़ गए। हमें तो जनता ने आगे बढ़ा दिया है, लेकिन समाज में आज यह हालत है, इस समाज को मैंने क्यों कहा गंदगी है। गृह मंत्री जी, चाहे कितना पढ़ा-लिखा दलित व्यक्ति किसी के दरवाजे पर जाए, वह आफिसर भी बन जाए, जितनी ऊंची जाति के आफिसर की इज्जत समाज में है, गांव में जाए तो वहां भी उसकी इज्जत है, उतनी दलित जाति के आफिसर की नहीं है। ये संस्कार हैं, इन संस्कारों को मिटाने के लिए या तो जात-पात खत्म कर दें या फिर उन्हें विशेष सुविधाएं दें, दो ही उपाय हैं। इसलिए मैंने सुबह कहा कि समाज की गंदगी को दूर करने के लिए आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा और स्वीकारना पड़ेगा।
जब ओ.बी.सी. का रिजर्वेशन हुआ, शायद सदन को पता नहीं होगा कि इंदिरा साहनी केस चला, तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि जाति की गणना जब तक नहीं होगी, तब तक सटीक फैसला नहीं हो सकता, क्योंकि पता नहीं कितनी जातियां हैं, इसलिए फैसला करना बहुत मुश्किल हो रहा है। इसी तरह शिक्षण संस्थाओं में हुआ। शिक्षण संस्थाओं में बहुत मुश्किल हो रही है। हम शिक्षा क्षेत्र से बहुत जुड़े रहे हैं और आज भी जुड़े हुए हैं। आज भी हमारे यहां बड़े-बड़े कॉलेज हैं। अब हमने अपने दूसरे भाई को दे दिया है, वह चला रहा है। पी.जी. कॉलेज हैं। हमारे क्षेत्र में मैडीकल कॉलेज है, हम देख रहे हैं। आज स्थिति यह है कि इन जातियों की अभी तक कोई खास संख्या नौकरियों में नहीं है। इसलिए कि अभी तक यह पता नहीं है कि कितनी संख्या कौन सी जाति की है। अंदाजे पर हिन्दुस्तान की सरकारें चल रही हैं। हमें कोई बता दे और स्पष्ट कर दे कि हमारी यह नीति थी।
महोदय, अभी तक महिलाओं की बात चल रही थी। महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए हमने अपने समय में बी.ए. तक की शिक्षा मुफ्त दी और 20हजार रुपए उन्हें कन्या धन के रूप में दिया और वजीफा अलग दिया। हिसाब लगाया, तो 2000 रुपए महीना लड़कियों को मिला, जिससे वे आगे पढ़ने के लिए गईं और कुछ जगह तो ऐसी हालत हो गई कि लड़कियों की तादाद ज्यादा और लड़कों की कम। हम अपने यहां की बताना चाहते हैं। हमारे यहां बी.ए. और एम.ए. की क्लासों में लड़कियों की तादाद ज्यादा और लड़कों की कम थी। जब उत्तर प्रदेश में दूसरी सरकार आई, तो ये सारी सुविधाएं समाप्त कर दी गईं। इससे लड़कों की तादाद ज्यादा हो गई और लड़कियों की तादादा 25-30प्रतिशत रह गई। यानी आगे बढ़ाने के लिए विशेष अवसर देने की बात हुई है। इसलिए जब तक जाति के आधार पर गणना नहीं होगी, तब तक आप क्या सुविधा किसे और कैसे देंगे?इसलिए हम चाहते हैं कि जनसंख्या की गणना जाति पर आधारित हो, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में भी इसके कारण बहुत मुश्किलें हो रही हैं। वजीफा देने में भी कठिनाई आ रही है। वजीफा लेने के लिए लड़कियों को अनेक जगह जाना पड़ रहा है। तहसील से लिखाना, लेखपाल से लिखाना, एस.डी.एम. से लिखाना और चारों तरफ से लिखाकर लाए, तो जितना वजीफा मिलेगा उससे ज्यादा तो उसका किराए-भाड़े में ही खर्च हो जाएगा। अगर जाति लिखी होगी, तो प्रमाणपत्र बनाने की कोई जरूरत ही नहीं होगी। प्रधान लिखकर भेज देगा। मतदाता सूची लेकर चला जाएगा कि हमारी जाति यह है। जाति का प्रमाणपत्र देने में बहुत भारी करप्शन है। इस करप्शन से भी हम लोग बच जाएंगे।
वजीफा के लिए चाहे कितने बैकवर्ड लोग हैं, शरद यादव और लालू जी को पता है और आप सभी लोगों को पता है कि वजीफा लेने के लिए तमाम तरह के पत्र लाने में कितनी असुविधा होती है। कहां-कहां से लिखाना पड़ता है, तब कहीं जाकर वजीफा के लिए एप्लाई करता है और तब कहीं वजीफा मिलता है और जितना वजीफा मिलता है, उससे कहीं ज्यादा उस पर खर्च हो जाता है। इसलिए सरकार को यह देखना आवश्यक हो गया है।
महोदय, मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं कि संविधान निर्माताओं ने अपने संविधान के अध्याय 16में कुछ खास वर्गों का उल्लेख किया था और विशेष उपबन्धों के तहत कुछ प्रावधान भी किए गए और कहा कि एंग्लो इंडियन, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सरकारी सेवाओं में, विधायिका और संसद में उनके स्थान आरक्षित कर दिए जाएं और उनका कोटा निर्धारित कर दिया जाए। इसी आधार पर वहां आप भी आ गए और हम यहां लोक सभा में या विधान सभाओं में आ गए, वरना हमें कोई नहीं आने देता। हम लोग तो ज्यों के त्यों रह गए, लेकिन मैं, हम लोग का इस्तेमाल कर रहा हूं, मैं का नहीं, जिसमें सब लोग शामिल हो जाते हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, ऐसी व्यवस्था जो की गई है कि नीचे के वर्गों की हिफाजत के लिए एक आयोग बनाया गया कि अनुसूचित जाति को उनका हक मिल रहा है या नहीं। इसलिए आयोग बन गया। मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि जो आयोग बनाया गया है क्या उसके पास इतने संसाधन हैं कि वे जाति के नाम पर संख्या लिख कर चले जाएं और सब जगह पता लगा लें कि कहां किस जाति की कितनी संख्या है?चाहे पिछड़ा आयोग हो, चाहे अनुसूचित जाति आयोग हो या फिर अनुसूचित जनजाति आयोग। उनके पास इतना पैसा ही नहीं है। उनके पास स्टेशनरी यानी कागज, पेंसिल और फर्नीचर तक के लिए रुपए नहीं हैं, क्योंकि हमने ये सब उन्हें दिए हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि पिछड़ा आयोग, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति आयोग के द्वारा यह कैसे किया जा सकता ह?् यह संभव नहीं है। इसलिए मुझे खुशी है कि कल कैबिनेट में कुछ लोगों ने इस सवाल को गंभीरता से उठाया। कुछ लोगों ने विरोध भी किया, लेकिन मुझे कहना नहीं है कि किसने विरोध किया और कौन पक्ष में रहे।अखबारों में आया कि कैबनेट में कुछ मंत्रियों मजबूती के साथ हमारी इस मांग के पक्ष में बोले और कुछ मान्यवर खिलाफ भी बोले।यही मानसिकता का सवाल है। मानसिकता में जो संस्कार है, इस संस्कार को मिटाने के लिए तभी संभव हो सकता है, जब पिछड़े और नीचे स्तर के लोगों को आगे बढ़ाया जाए। ...( व्यवधान) आप यदि कुर्सी पर बैठें है ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया अपनी बात समाप्त करें।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप15 मिनट ले चुके हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : महोदय, मैं जल्दी ही अपनी बात समाप्त करूंगा।संविधान के अनुच्छेद 340 के अंदर भारत के राष्ट्रपति को समाज में शैक्षिक रूप से जो पिछड़े हैं, उनकी तरक्की के लिए सुझाव और उनकी पहचान करने के लिए कमीशन की नियुक्ति की बात कही। आप उसको नहीं मानेंगे। मंडल कमीशन, काका कालेलकर और सुप्रीम कोर्ट सभी यह चाहते हैं कि जाति के आधार देश में मालूम हो, उनकी जनसंख्या हो, उनके नाम के सामने जाति लिखी जाए।
उपाध्यक्ष महोदय, यह सही है कि इसी कमीशन ने शिक्षा क्षेत्र में जो पहले आफर किया था, जो मैं बता चुका हूं कि लड़के मारे-मारे फिरते हैं कि उन्हें किस तरह से जाति का प्रमाण पत्र मिले।पिछड़ा वर्ग आयोग हो या अनुसूचित जाति वर्ग हो, दोनों जातियों को पिछड़े वर्ग के आधार पर उन्हें विशेष सुविधा देने की बात कही गयी। किसी ने आपत्ति नहीं की। संविधान के अनुच्छेद 340 में स्पष्ट है कि पिछड़ों को जहां दलित हैं, अनुसूचित जाति हैं, मुसलमानों में भी बहुत से पिछड़ी जाति के लोग हैं, उनकी बहुत बड़ी तादाद मुसलमानों में भी है। ...( व्यवधान) इस आधार पर हमारी बात को सरकार मानें।सदन की भावना का आदर करे। जिनका बहुमत है, आपको उनका आदर करना पड़ेगा, अगर ऐसा नहीं करेंगे तो आपको दिक्कत होगी।मैं आज आपको बता रहा हूं कि यह सवाल पूरे देश में चल गया है।अब दिक्कत होने लगेगी और बहुत बड़ी दिक्कत होगी।नेता सदन आप अच्छी तरह से समझते हैं, गांव-गांव में चौपालों में चर्चा हो चुकी है, अब इनसे जो टकरायेगा, वह मिट्टी में लुप्त हो जाएगा।...( व्यवधान) हमारा पुराना नारा था...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया अपनी बात समाप्त करें।
...( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव : महोदय, इसीलिए हम कहना चाहते हैं कि इसको सहर्ष स्वीकार कीजिए। हमें खुशी है कि ऊंची जाति के लोगों ने अनुसूचित जाति और जनजाति का आग्रह सहर्ष स्वीकार किया।मंडल कमीशन की सिफारिशें भी सभी जातियों ने सहर्ष स्वीकार कीं। इसीलिए हम विशेषकर ऊंची जाति के लोगों से कहना चाहते हैं कि इसमें सबसे ज्यादा अगुवाई आपको करना चाहिए।हम लोगों ने मजबूरी में इसलिए किया है कि इस सवाल को उठाने की किसी की हिम्मत नहीं थी, कोई कहने को तैयार नहीं था।इसीलिए हम लोगों ने इस सवाल को उठाया है। अब यह सवाल ऐसा उठा है कि जिसके चलते सदन नहीं चल पाया है और गांव-गावं चर्चा हो गयी कि उनकी मांग क्या है। गांव का आदमी कहता है कि यह क्या बात हो गयी?अगर जाति का नाम लग जाएगा तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा? जाति लगने में दिक्कत क्या है?उनको सुविधा देना या न देना बात अलग होगी, इनके लिए सुविधा नहीं मांग रहे हैं। सुविधा की बात अलग है, केवल जाति लिखी जाए।हम आपसे पैसा नहीं मांग रहे हैं, हम आपसे भत्ता नहीं मांग रहे हैं, हम आपसे कोई नौकरी नहीं मांग रहे हैं। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करिए।
श्री मुलायम सिंह यादव : महोदय, दो मिनट दे दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आप बीस मिनट ले चुके हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव: महोदय, ऐसा अवसर बार-बार नहीं आएगा।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप बहुत समय ले चुके हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : महोदय,आपकी अध्यक्षता में यह हो रहा है, आप बैठे हुए हैं।मुझे थोड़ा समय दे दीजिए।मैं बैठ जाऊंगा।
उपाध्यक्ष महोदय : आप दो मिनट में अपनी बात समाप्त करिए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप कृपया बैठ जाइए।उनको बोलने दीजिए, वह समाप्त कर रहे हैं।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप कृपया बैठ जाइए, उनको बोलने दीजिए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।
(Interruptions) … * श्री मुलायम सिंह यादव : महोदय, मैं कहना चाहूंगा कि जनगणना बहुत जरूरी है। ...( व्यवधान) उन्होंने जवाब दे दिया कि कैबिनेट में सवाल उठा था, ...( व्यवधान) तो मैं उन्हें विशेष धन्यवाद दे दूं, जिन्होंने समर्थन किया है, उनको बधाई देना चाहता हूं।मुझे खुशी होगी कि सर्वसम्मति से कैबिनेट इसे स्वीकार कर ले।यह छिपी नहीं रहेगी। यह पता चल जाएगा कि कैबिनेट में किसने पक्ष में किया और किसने विपक्ष में किया।आज गुप्त बना रहेगा लेकिन आगे चलकर इसे पूरा देश जानेगा। इसलिए हम चाहते हैं कि कैबिनेट भी इसे सर्वसम्मति से स्वीकार करे। आपने दलितों का स्वीकार किया, अनुसूचित जाति का किया, पिछड़ी जाति का मंडल के लिए स्वीकार किया। इसके लिए हम धन्यवाद देते हैं, चाहे जो भी सरकारें रही हों, हमारी रही हो या आपकी रही हो। मंडल कमीशन हमारी सरकार में बैठा था।...( व्यवधान)
डॉ. रतन सिंह अजनाला (खडूर साहिब): मुलायम सिंह जी, सिखों में भी गरीब लोग हैं।...( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव : जी हां, सिख में भी हैं। अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक केवल मुसलमान नहीं हैं, हमने एंगलो इंडियन आदि सब पहले कह दिया है, मुसलमान भी कह दिया, सिख भी कह दिया।...( व्यवधान) हम जान-बूझकर वह शब्द इस्तेमाल नहीं करेंगे जिससे किसी को दुख हो। नहीं तो हम कह सकते थे कि कुछ दूषित मनोवृति की भावना नहीं आनी चाहिए।...( व्यवधान) जब देश की रक्षा के लिए जवान सीमा पर शहीद होते हैं, इसका पता लगवा लीजिए, हम जहां से आए हैं, मुझे गर्व है कि 11 में से 9 यही लोग शहीद हुए हैं।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम सिंह जी, आप पुराने आदमी हैं।
…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव : वहां भी इसी तरह की हालत है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप समय की व्यवस्था देखिए।
…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव : जब देश की रक्षा के लिए लड़ना पड़ता है तो इसी वर्ग के लोग लड़ने जाते हैं।...( व्यवधान) अफसर हैं लेकिन सामने गोली चलाने वाला, सीमा की रक्षा करना वाला यही वर्ग है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया आप बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव : कृपया एक मिनट बोलने का समय दे दीजिए।...( व्यवधान) इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि आबादी कितनी है, किसकी है, पिछड़े लोगों की आबादी कितनी है, इसमें कोई मतभेद नहीं होगा, आपके सामने ऐसी कोई समस्या नहीं होगी। अपना हक मांगने का अधिकार है। आज आप इस ऐतिहासिक अवसर पर सदन की अध्यक्षता कर रहे हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि एक कॉलम बनाकर उस जाति के आगे-पीछे अनुसूचित जाति लिखना बहुत आसान है। यह पिछड़े लोगों के लिए भी आवश्यक है।...( व्यवधान)
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आशा करता हूं कि सदन इससे पूरा सहमत होगा।
श्री भक्त चरण दास (कालाहांडी): आज काफी गंभीर सवाल है। हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या सामाजिक समस्या है और इस समस्या की चर्चा एक ऐतिहासिक चर्चा मानी जाती है। आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया, इसलिए मैं आपके प्रति आभार प्रकट करता हूं। अभी सैन्सस 2011 शुरू हो चुका है। मैं इस बारे में कहने से पहले इसके कई पहलुओं पर जाना चाहता हूं। पहला सवाल यह है कि इसका ऐतिहासिक पहलू क्या है। दूसरा, वर्तमान सामाजिक क्षेत्र में हम कहां तक प्रभावित हैं और हमारी तरक्की कहां तक हुई है। तीसरा,हम कौन सा समाज बनाना चाहते हैं, देश को किस ओर ले जाना चाहते हैं। मैं अपनी बात की शुरुआत करने से पहले कहना चाहता हूं कि आजादी के सेनानी, हमारे देश के बड़े नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सैन्सस कौफ्रैंस फरवरी,1950 में जो कहा था, मैं उसे कोट करना चाहता हूं।
Sardar Patel, in his address to the Census Conference in February 1950 said:
“Formerly, there used to be elaborate caste table which was required in India partially to satisfy the theory that it was a caste ridden country and partially to meet the needs of administrative measures dependent upon caste division.” In the forthcoming census, this will no longer be a prominent feature.” सन्1951में जो सेंसस हुआ, उस समय के सेंसस को मीन करके सरदार पटेल जी की यह टिप्पणी है। हमारे देश के तमाम तबकों के साथ अंग्रेजों ने किस तरह से बिहेव किया, इनकी इस टिप्पणी से, कमेंट्स से यह परिभाषा आती है। दूसरी बात है कि संसद में पहली बार जातीय आधार पर जनगणना की चर्चा नहीं हो रही। पहला सेंसस वर्ष 1872 में हुआ। उसके बाद1931,1941,1981और हाल ही में2001में हुआ। वर्ष2001में जातीय आधार पर चर्चा हुई, तो एनडीए के पीरियड मे काफी जानकारियां आईं, कास्ट कम्पोजिशन की बात आयीं। एनडीए के कैबिनेट में इस बात को लाया गया था और बाद में इसे विदड्रा कर दिया गया। तत्कालीन होम सैक्रेट्री ने एक संसद सदस्य को जो रिप्लाई दिया, वह छः पेज के लैटर का रिप्लाई है, उसमें इसकी आवश्यकता नहीं है, इस बात का उन्होंने जिक्र किया है।वर्ष2005 में हमारी एडवाइजरी काउंसिल ने इस पर काफी चर्चा की। वर्ष 2006 में वेल्फेयर एंड सोशल जस्टिस मिनिस्ट्री की स्टैंडिंग कमेटी और दिसम्बर 2006में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर जो रिएक्शन हुआ है, हर समय एक ही स्टैंड रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने लिया है कि इसकी प्रासंगिकता कहांतक है, इस बात को सोचना चाहिए। अभी रिसेन्टली एक रिट पेटीशन ओनरेबल सुप्रीम कोर्ट में फाइल हुई थी। On the Writ Petition 133 of 2009 filed in the Supreme Court, the hon. Court has made the following observation which is extremely relevant. I quote the observation:
“How can we give a direction to the Government to conduct a caste-based census? It is a policy decision. If it was not done for last more than 70 years, there must be some reason behind it. Why should it be done now? Some fear that there could be a social problem.
There is a Backward Class Commission. Why don't you go there? These are policy matters of serious implications. The courts can neither interfere nor give any direction to the Government in such matters” उसके बाद पेटिश्नर ने सुप्रीम कोर्ट से पेटीशन विदड्रा की थी। जब वर्ष1941में कास्ट कम्पोजिशन की रिपोर्ट आयी, तो उसमें बहुत सारी समस्याएं दिखायी दीं। वर्ष1951से पहले यानी आजादी से पहले जितने भी सेंसस हुए हैं, उनमें जो तथ्य आये थे, उसमें सरनेम, टाइटल और गोत्र आदि कई तरह के कन्फ्यूजन आये, जिससे सही रिपोर्ट नहीं आ पायी।
उपाध्यक्ष महोदय, एक और पहलू है। हमने यह देखा कि हमारे देश में सेंसस के अध्ययन के हिसाब से शैडय़ूल कास्ट्स और शैडय़ूल ट्राइब्स की 1885जातियां हैं। वर्ष 2001 में जब इसका सर्वेक्षण किया गया, तो 18,740जातियों के नाम आये। करीब नौ से दस गुणा नाम बढ़ गये। इसी तरह हमारे देश में सैंट्रल गवर्नमैंट की लिस्ट में ओबीसी केटेगिरी में छः हजार लोगों के नाम हैं। अगर उसी तरह से जातीय आधार पर जनगणना हो, तो जिस तरह से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह की स्थिति है, तो जो रिपोर्ट आयेगी, वह नौ से दस गुणा ज्यादा होगी। अगर आप देखें, तो एक लाख से ज्यादा जातीय रिपोर्ट आने के चांसेजहैं।हमें इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के स्टेटमेंट, आजादी के सेनानी सरदार वल्लभ भाई पटेल जिन्होंने भारत बनाने में योगदान दिया है, उनको देखते हुए हमें आज किस तरह का देश बनाना है, उसको सोचना चाहिए। जहां तक दलित और आदिवासी का सवाल है, उस समय सामाजिक अस्पृश्यता इतनी ज्यादा थी, कि उनको स्वाभिमान भरा जीवन देना जरूरी था, इसीलिए बाबा साहेब डा. अंबेडकर ने इस बात को जोर देकर दलित-आदिवासी के लिए आरक्षण के प्रावधान की व्यवस्था करने की बात की थी। मैं आज मानता हूं कि जिस तरह हमारा देश इस 63 साल के अंदर गुजरा है, हमारी जो खामियां हैं, संविधान में सारे प्रावधान होने के बावजूद भी गरीब आज क्यों गरीब रह गया?हमारा बीपीएल सर्वे कहता है कि 37 प्रतिशत से ज्यादा लोग आज गरीबी रेखा से नीचे हैं, मैं तो कहूंगा वास्तव में कम से कम 50प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। आज राज्य व्यवस्था के लिए यह सबसे ज्यादा जरूरी है कि लोगों न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हों। हम कहां तक उनके लिए पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था, उनको इंसानियत का जीवन देने की व्यवस्था कर पाने में कामयाब हुए हैं? इस बात की ओर हम कहां तक ध्यान दे पाए हैं, इस पक्ष को भी हमें नेगलेक्ट नहीं करना चाहिए।
हमारे उपनिषदों में वसुधैव कुटुंबकम् की बात कही गयी है। हमारे देश के तमाम दार्शनिकों एवं बड़े नेताओं ने, चाहे किसी भी पार्टी या जाति के रहे हों, जब जरूरत पडी, देश पर संकट आया, सभी ने सारे विश्व के एक होने की बात कही। परमपिता, जिसने हम सभी को पैदा किया है और हम सभी एक हैं, सारे विश्व के सन्दर्भ में इस बात को इस सदन में और सदन के बाहर भी कई बार हमारे नेताओं ने कही है। यह क्यों?जब जाति और धर्म के नाम पर देश पर खतरा आता है, जब-जब ऐसे खतरे आए हैं, हमारे बड़े लोगों ने इन बातों को जनता का ध्यान आकर्षण करने के लिए सामने रखा है। आज हम एक जातीय तनाव देखते हैं। आज आदिवासियों में भी बहुत सारी जातियां हैं, आपस में इनका जो समझौता होना चाहिए, वह नहीं है। शिडय़ूल्ड कास्ट्स में भी बहुत सारी जातियां हैं, मैं अपनी बात कहता हूं, मैं शिडय़ूल्ड कास्ट से संबंधित हूं। मैं एक अति दलित कम्यूनिटी से आता हूं और कालाहांडी की भूख के साथ मेरी लड़ाई हुई। मैंने वर्ष 1985 में भूख की बात को छेड़ा। इस सदन में हमारे बड़े नेता लोग हैं, वे जानते हैं कि किस तरह से हमने इस बात को छेड़ा। भूख से कौन लोग मरते थे? गरीब लोग, जाहिर है कि उनमें शिडय़ूल्ड कास्ट्स, शिडय़ूल्ड ट्राइब्स और ओबीसी लोग होंगे। मैं एक अति दलित परिवार से होने के बावजूद किस तरह से इस संसद में तीन बार जनरल सीट से जीतकर, जनता के वोट से जीतकर आया हूं। मैं किसके लिए संसद में पैरवी करूंगा। मैं सदन से पूछना चाहता हूं कि जब हमने काम किया है, मैं केवल दलित का प्रतिनिधित्व नहीं करता हूं, मेरी कांस्टीटवेंसी में सबसे ज्यादा आदिवासी हैं और उनसे ज्यादा ओबीसी हैं और जिनको जब जरूरत पड़ी, किसी भी विषय पर चाहे वह पीने के पानी की बात हो, चाहे भुखमरी का सवाल हो, चाहे जमीन के बंटवारे का सवाल हो, चाहे अति पिछड़े एरिया के विकास का सवाल हो, हर सवाल में हमने जुड़कर काम किया है। हमारे संविधान को सम्मान देते हुए, जनता के हक की बात हमने छेड़ी। यही नहीं, इस बात को देश के तमाम न्युजपेपर्स एवं मैगजीन्स ने और यहां तक कि विदेश की मैगजीन्स तक भी इस बात को उठाया।हम लगातार जनता के बीच में रहे और जनता ने हमें वोट दिया। हम आज भी देखते हैं कि जो एट्रोसिटीज एक्ट का दुरुपयोग होता है। पुलिस का एसएचओ जो आईओ होता है, जो लोग समाज में इस एक्ट का दुरुपयोग करके लोगों से अपना बदला लेना चाहते हैं। हम जब इस तरह की मानसिकता को देखते हैं तो लगता है कि ऐसे लोग हमारी राष्ट्रीय एकता को धोखा देना चाहते हैं, दलितों को प्रताड़ित करना चाहते हैं।
महोदय, मैं आपसे अर्ज करना चाहता हूं कि आज जो भी जातीय तनाव दिखाई दे रहा है, हम आपस में ही देख लें, सारा देश देख रहा है कि यहां हम 24 पार्टीज के जो सांसद हैं, इनमें आपस में बिल्कुल भी समझौता नहीं है। हम एक दूसरे को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं रहते हैं। एक जाति के लोग पर्टिकुलर ओबीसी में आप देखें, दूसरी जाति में शादी करना पसंद नहीं करते। अगर उनकी केटेगरी का ओबीसी, आदिवासी या अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं होगा, तो वे शादी नहीं करते हैं। अगर ऐसा होता है तो आपस में हिंसक हो जाते हैं, उनमें तनाव पैदा हो जाता है और इतनी लड़ाई करते हैं कि विकास को भूल जाते हैं। इससे क्या होता है कि हमारी लड़ाई सामने आ जाती है। यही बात संसद में भी देखने को मिलती है कि हम जब आपसे में तनावग्रस्त हो जाते हैं तो हमारी लड़ाई सामने आ जाती है, ऐसे ही गांव और जिलों में भी होता है। जब देश और दुनिया तरक्की कर रही है, तो इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए।
हमारे पूर्वजों ने इस बात को ध्यान से देखा है कि भारत में लाखों जातियां और धर्म हैं और उनके बीच हिंसा फैल रही है। इसी बात को सामने रखते हुए महात्मा बुद्ध ने अहिंसा परमो धर्म की बात कही थी। इसी बात को गांधी जी ने दोहराते हुए हमारी संस्कृति में अहिंसा परमो धर्म की बात कही थी। जातियों के तनाव से जो हिंसा होती है, यह लोगों को कमजोर बनाती है, लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाती है और देश कभी तरक्की नहीं कर पाता है। इसलिए हमें देखना होगा कि अगर हमारे मन में इस तरह की भावना है, तो उससे क्या-क्या हो सकता है।
महोदय, मैं आदरणीय लालू जी, मुलायम जी और शरद यादव जी की बहुत इज्जत करता हूं। वे भी इस बात को जानते हैं। मैं उनके सामने बहुत छोटा व्यक्ति हूं। जब शरद यादव जी युवा अध्यक्ष बने, तब मैं कालेज में प्रेजीडेंट था। एक कार्यकर्ता होने के नाते उनके भाषण को सुनने के लिए मैं नागपुर गया था। मुझे बहुत समय तक उनके साथ काम करने का मौका मिला। उनमें समाज में प्रगति लाने की जो मानसिकता थी, वह मैंने देखी है। जब लालू जी बिहार के मुख्य मंत्री बने, मुलायम सिंह जी मुख्य मंत्री बने तो वहां के पिछड़े वर्ग के लोगों को बहुत उम्मीद थी कि वे उनकी तरफ ध्यान देंगे। मैं बिहार गया था, वहां मैंने देखा कि बिहार विकास के मामले में बहुत पीछे है। मैं कहना चाहता हूं कि केवल मेरी बात से या मैं दलित हूं, दलितों के लिए जितने भी उद्गार व्यक्त करूं या ओबीसी के लिए करूं, उससे दलित का पेट नहीं भरेगा। उसे स्वाभिमान चाहिए और स्वाभिमानी जीवन जीने के लिए उसकी जो मूलभूत आवश्यकताएं हैं, उन्हें पूरा करना होगा। हमारे यहां करोड़ों हाथ बेरोजगार हैं, जिनके बारे में कोई नेता नहीं सोचता है। हम इसे लेकर लड़ाई भी नहीं लड़ रहे हैं। हमारे बच्चे आज भी पौष्टिक आहार के अभाव में मर रहे हैं। हमारी महिलाएं, जो कि सबसे बड़ा तबका है, चाहे किसी भी धर्म या जाति की हों, वे आज सबसे कमजोर हैं, उन्हें काबिल बनाने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। हमारे पिछड़े इलाकों में आज किस तरह का कानून चाहिए या व्यवस्था चाहिए, जिससे वहां का विकास हो, इस पर कोई विचार नहीं होता है। संविधान में हमारे पूर्वजों द्वारा इतनी व्यवस्थाओं के होने के बावजूद भी गरीबों और दलितों के इलाके क्यों पिछड़े हैं, इस पर पूरी तरह से ध्यान नहीं दिया गया है।
यह देश 120 करोड़ लोगों का है। अगर हम अपने देश से गरीबी और अमीरी की बात निकाल देंगे तो हम काफी तरक्की कर सकते हैं। मैं मुलायम सिंह जी की बात से सहमत हूं कि हमें जातीय भावना से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। हम जाति निर्माण की जगह जाति तोड़ो की बात करें। कोई जात-पात नहीं होनी चाहिए, सबका जीवन स्वाभिमान भरा जीवन होना चाहिए। संविधान के अंदर सबको एक बनाने की व्यवस्था है, वह पूरी होनी चाहिए। हमारी बात को, हमारी संसद की गरिमा को, हम लोग कितना और पुश बटन करेंगे, let us not push button the Parliament, the great Parliament of our forefathers. Please prepare it. इसको इस तरह से बनाओ कि हर हृदय का मंदिर बने, ताकतवर मंदिर बने, ताकि हमारा देश विश्व के सामने सबसे ताकतवर देश बनकर उभरे।
श्री दारा सिंह चौहान(घोसी): उपाध्यक्ष महोदय, काफी कशमकश के बाद, आज ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर मिला है। जनगणना के बारे में माननीय सदस्यों के विचार आए हैं और जो असमंजस की स्थिति संसद में है कि शायद यह जनगणना किसी जाति-विशेष की है, लेकिन ऐसा नहीं है। इसमें चाहे अगड़े हों, पिछड़े हों, मुसलमान हों, सब लोगों की जाति की गणना की बात हो रही है। जाति पर जो यह आरोप लग रहा है तो जाति आज की बात नहीं है, आदिकाल से चली आ रही है। जाति इस देश की सच्चाई है और इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है। ...( व्यवधान)
SHRI HUKMADEO NARAYAN YADAV (MADHUBANI): It is a fact and truth.
उपाध्यक्ष महोदय : हुक्मदेव जी, आपने कब से अंग्रेजी बोलनी शुरु कर दी।
श्री दारा सिंह चौहान:जब तक जाति के नाम पर कुछ लोगों को सम्मान मिलेगा और जाति विशेष में पैदा होने के कारण किसी का अपमान होगा, इसका मतलब है कि जातिवाद इस मुल्क में कायम है। उस जाति को तोड़ने के लिए, इस देश में तमाम महापुरुष हुए। चाहे साहूजी हों, नारायणा गुरू हों, जब इस देश में महिला आरक्षण की बात बड़े जोर से होती है, जब स्त्री-सूत्र की बात जो रामायण में लिखी गयी, तब ज्योतिबाबा फूले की पत्नी सावित्रीबाई फूले ने, इस देश की आधी आबादी को शिक्षित करने का संकल्प लिया, जिसे इस समाज के लोगों द्वारा अपमानित भी होना पड़ा। इस देश में जहां तालाब में जानवर और कुत्ते-बिल्ली पानी पी सकते हैं लेकिन इंसान को उस तालाब से पानी पीने का अधिकार नहीं था। चाहे महातालाब हो, चाहे कालाराम मंदिर हो, ऐसा था। इसलिए जाति की सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है। आप जानते हैं कि बाबा साहेब अम्बेडकर ने इस देश के संविधान में धारा 340 की व्यवस्था की। इस देश में रहने वाले दलितों की पीड़ा, एससीएसटी की पीड़ा, ओबीसी की पीड़ा, माइनोरिटी की पीड़ा, आजादी के 63 सालों में यही है कि आम लोगों के मुकाबले में वे पीछे हैं। इसलिए डा. अम्बेडकर ने संविधान की धारा 340 में व्यवस्था की कि यह समाज जब पढ़-लिखकर आगे बढ़ेगा तो अपने अधिकार की बात करेगा। वर्ष1951-52 में काका कालेलकर के नेतृत्व में जो आयोग बना, उसे कूड़े में फेंक दिया गया। वर्ष1980 में बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के नेतृत्व में मंडल कमीशन बना कि पिछड़े लोगों की संख्या क्या है और उन्होंने इसे 52 प्रतिशत बताया था। इसके बाद कानून की लड़ाई शुरू हुई। वर्ष 1989 मेंजब मंडल कमीशन लागू हुआ तो कानून की दीवार खड़ी करके उसे रोकने की साजिश हुई। वर्ष 1992 में जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया और मैं समझता हूं कि आंशिक रूप से इस देश में मंडल कमीशन लागू हुआ।
मैं सदन के संज्ञान में लाना चाहता हूं कि कितनी जद्दोजहद के बाद जब मंडल कमीशन लागू हुआ, 52 फीसदी समाज का हिस्सा, जिसे 27 प्रतिशत नौकरियों में तो आरक्षण मिला, लेकिन किसी और क्षेत्र में आरक्षण नहीं मिला। इसके बावजूद जो क्लास वन, टू, थ्री, फोर में, ए, बी, सी, डी कैटेगिरी में मुश्किल से दो, चार या पांच फीसदी लोग ही नौकरी प्राप्त कर सके हैं। जो लोग आजादी से पहले, आदिकाल से अब तक जाति के नाम से अपमानित हो रहे हैं, सताए जा रहे हैं, अगर जाति के आधार पर उनकी जनगणना हो जाएगी, तो शायद उन्हें इंसाफ मिल सकेगा, क्योंकि सरकार की जिम्मेदारी है कि संख्या के आधार पर लोगों को सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। हम किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं हैं। हम जाति के बंधन को तोड़ना चाहते हैं। मैं कहना चाहता हूं कि जाति तोड़ो और समाज जोड़ो। मान्यवर कांशी राम इस देश में दलित समाज में पैदा हुए थे, जिन्होंने सामाजिक परिवर्तन के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। उन्होंने कहा कि जाति तोड़ो और समाज जोड़ो। इसके बावजूद भी हम पर जातिवाद का आरोप लगता है। जब तक जाति खत्म नहीं होगी।...( व्यवधान) मैं सभी महापुरुषों की बात कर रहा हूं। मैं गांधी जी, लोहिया जी की बात कह रहा हूं। मैं डॉ. अम्बेडकर की भी बात कह रहा हूं।...( व्यवधान) मैं कहना चाहता हूं कि जब इस देश में पेड़, पौधे, तालाब, जानवर, मकान, तालाब की जनगणना हो सकती है, तो इस देश में रहने वाले इंसान की जाति के आधार पर जनगणना क्यों नहीं हो सकती है, जो आजादी के 63 सालों बाद भी कहीं-कहीं जानवर से बदतर जिंदगी बिता रहा है। मैं बधाई दूंगा, क्योंकि मैंने पेपर में पढ़ा कि केबिनेट के कुछ हमारे सहयोगी इसके पक्ष में थे और कुछ विपक्ष में भी थे, मैं वह बात नहीं कर रहा, लेकिन तीन चरणों में जनगणना होने जा रही है। यह कहना बहानेबाजी है कि जनगणना शुरू हो चुकी है, अभी तो फार्म भी नहीं छपे हैं। फरवरी,2011 तक आप कालम को बढ़ा सकते हैं। गरीबों की संख्या जानने के लिए देश में कई कमीशन बने, चाहे तेंदुलकर समिति हो, चाहे अर्जुन सेन गुप्ता समिति हो, लेकिन देश में इनकी संख्या का सही आंकड़ा न होने के कारण इस देश के गरीब आज भी बेबस और लाचार हैं। प्रदेश की सरकारों से हमेशा बात होती है, संसद में इसकी डिमांड हुई कि बीपीएल की संख्या बढ़ाई जाए, लेकिन सही संख्या न होने के कारण हम सही नीतियां नहीं बना पा रहे हैं। मेरा मानना है, हमारी पार्टी के नेता का मानना है कि जब तक हम रोग को नहीं पहचानेंगे, तब तक उसका इलाज नहीं हो सकता है। हमें रोग की जानकारी होनी चाहिए कि समाज में कौन सा रोग है। चाहे वेनसांग हो, चाहे फाहयान हो, चाहे इबनेबतूता हो, उन्होंने भी अपनी पुस्तक में जाति का उल्लेख किया है। इस देश में बीपीएल लोगों की संख्या न होने के कारण आज उनके लिए केंद्र सरकार कोई योजना नहीं बना पा रही है। इसी कारण यूपीए की सरकार जो कांग्रेस के नेतृत्व में बनी है, आजादी के इतने सालों में ज्यादातर समय आपके हाथ में देश की सत्ता रही है, आपने हमेशा नारा दिया कि गरीबी को हटाना है, लेकिन सही संख्या न होने के कारण आप गरीबों के लिए सही नीतियां नहीं बना पाए। इस नाते आज भी आंकड़ा नहीं था, इस नाते देश में आजादी के 63सालों के बाद गरीबी नहीं खत्म हुई। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार है। मैं उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री, बहन मायावती जी को बधाई देना चाहता हूं कि हमने यहां अनुरोध किया था कि संख्या बढ़ाई जाए और 30 लाख लोगों के लिए 2000करोड़ का प्रावधान है, जो बीपीएल सूची में नहीं आ पाते हैं, आपने संख्या निर्धारित की है और हर गरीब को, बिलो पावर्टी लाइन महिलाओं300रुपए को देंगे जब तक बीपीएल की सही जानकारी केंद्र सरकार के पास नहीं आती है।
मैं माननीय सदस्यों को सुन रहा था, जहां तक अनुसूचित जाति को शामिल करने का सवाल है, किसी जाति को किसी प्रदेश की सरकार को किसी भी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार देश की संसद को है, भारत सरकार को है। मैं कह सकता हूं कि पिछड़ा समाज का बहुत बड़ा हिस्सा है, मैं भी उसी समाज में हूं जिसे अति पिछड़ा कहा है। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि हमें पार्लियामेंट में आने का मौका मिलेगा। चाहे किसी जाति, धर्म या मजहब के हों, जिनका बाप मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट नहीं भर पाता है, जिनके बच्चियां पढ़ी-लिखी नहीं हैं, ऐसे लोगों की पढ़ाई के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरी व्यवस्था की है। 25,000 रुपए ऐसे गरीबों को दो किश्तों में देने का काम किया है। आज अनुसूचित जाति की संख्या बढ़ी है, पिछड़ी जाति के लोगों की संख्या बढ़ी है, केंद्र सरकार की जिम्मेदारी इस देश में गैर-बराबरी खत्म करने की है। जब तक जातिहीन और समता मूलक समाज नहीं बनेगा तब तक जाति के आधार पर जनसंख्या रहेगी।
श्री शरद यादव (मधेपुरा): अध्यक्ष महोदया, आज जद्दोजहद के बाद यह अवसर मिला है। यहां बहुत से साथी बोले, मैं उसे दोहराना नहीं चाहता हूं। मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान में जाति हकीकत है, चाहे इसे अच्छाई कहिए या बुराई, स्वस्थ समाज कहिए या बीमार कहिए। यह ऐसा हिमालय पहाड़ है इसे कोई बयान नहीं कर सकता। मार्क्सवादी साथी क्लास की बात कह रहे थे, सवाल सीधा है कि दुनिया में किसी मुल्क में इंडियन कंटीनेंट को छोड़कर इतना अन्यायपूर्ण, जुल्म और ज्यादतियों से भरा समाज नहीं है। कदम-कदम पर अन्याय और जुल्म है। ऐसी सभ्यता है कि यदि कोई बड़ा है, ऊंचा है या ताकतवर है तो चाटो, अगर कमजोर है तो उसे काटो। ऐसा दुनिया में और कहीं नहीं है।कहीं नहीं है और इस देश में पाखंड यह है कि ये कहते हैं कि जाति-पाति की जनगणना मत करो। बड़ी अजीब बात है, यानी शोषण से है दुनिया में रंगभेद, चमड़ी से धर्म पता लग जाता है। वह एक लड़ाई अपार्थीड की, वह लड़ाई समझ में आती थी। लेकिन भारत के शोषण में दुनिया से कुछ मुठ्ठी भर लोगों का सम्पर्क है, इसलिए दुनिया को पता नहीं कि हिंदुस्तान में काले और गोरे की लड़ाई से भी विकट और भयंकर लड़ाई जाति व्यवस्था की है। शरीर का शोषण, दिमाग का शोषण, मन का शोषण, आर्थिक शोषण के अलावा बाकी ये सब शोषण, हर चीज का शोषण भारतीय समाज में जाति के आधार पर होता है। जाति की गणना पर अभी हमारे सब साथियों श्री मुलायम सिंह यादव और श्री दारा सिंह चौहान ने कहा कि दर्द और तकलीफ से भरे हुए लोगों ने कितनी बार इसकी मांग की। काका कालेलकर कमीशऩ, मंडल कमीशन आदि सब मांग करते रहे, लेकिन हिंदुस्तान में यह सवाल जो सबसे सच और ठीक सवाल है। हम ऐसा पाखंडी समाज क्यों बनाकर रखना चाहते हैं? जाति हिंदुस्तान में हकीकत है, सिस्टम का मतलब कास्ट सिस्टम है। मैं आंकड़ों के रूप में आपके सामने अभी रखूंगा कि सिस्टम का मतलब कास्ट सिस्टम है। मगर हम इसके खिलाफ हैं। हजारों वर्ष से जो जाति व्यवस्था के चलते पीड़ित हैं, तकलीफ में हैं, उनके दर्द को साठ वर्ष में भी आप नहीं समझ पाये और न समझना चाहते हैं।
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जिसे धरती के भीतर का ज्वालामुखी कहते हैं, वह ज्वालामुखी खदबद, खदबद कर रहा है। यह आज नहीं तो कल ऐसा फूटेगा कि यह देश संभाले नहीं संभलेगा। हर बार सच को कुचलकर आप आगे बढ़ते रहे हैं। इस सच्चाई को, इस बीमारी को बगैर बात और बगैर बहस के आप नजरअंदाज करते रहे हैं। होम मिनिस्टर साहब, आप तो उस इलाके से आते हैं, लेकिन मुझे अफसोस होता है कि आपके मंत्रालय ने यह बात रखी कि नहीं जनगणना नहीं होनी चाहिए। आप मेरे साथ गये हैं, मैं आपको देखकर हमेशा यह सोचता था कि समाज के बदलाव में, समाज की गैरबराबरी में आप बहुत मजबूत साथी हैं। तमिलनाडु वह सूबा है, जहां पेरियार ने आजादी के पहले से हिंदुस्तान की जाति व्यवस्था के खिलाफ बहुत बड़ा संग्राम किया था, बसवन्ना ने, नारायण स्वामी ने, बाबा साहब अम्बेडकर ने, साहू महाराज ने, महात्मा फुले ने, डा. लोहिया और श्री जयप्रकाश नारायण आदि ने भी आवाज उठाई थी। तमिलनाडु वह सूबा है, जिसके कारण संविधान में पहली बार संशोधन हुआ। चिदम्बरम जी, यह गौरव आपके सूबे को प्राप्त है कि आपने ही पहली बार पिछड़ी जाति का जो बहुसंख्यक हिन्दू समाज है और पिछड़ी जाति का मतलब हिन्दू नहीं होता, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी सब होता है। उनके संविधान सम्मत हक के लिए जवाहर लाल नेहरू के समय में पहला संविधान संशोधन किया था। जो आपके सूबे के कारण हुआ, यह हमारे कारण नहीं हुआ। गंगा के मैदान में तो हलचल ही नहीं हुई थी, यदि यहां हलचल हुई होती तो हिंदुस्तान बदल जाता। लेकिन यह गंगा और यमुना का मैदान है और मैं समझता हूं कि इसमें विद्रोह नहीं हुआ। यदि होता तो क्या आज इस तरह का अन्याय आप कर सकते थे। मैं आपसे कहता हूं कि जाति इतनी बड़ी हकीकत है कि आदमी बस में, ट्रेन में यात्रा करता है तो जब तक एक-दूसरे की जाति न पता चल जाए और वे कोई बुरा नहीं करते।
15.00 hrs. जाति का पता चलते ही चर्चा फिक्स हो जाती है। जाति हकीकत है, मैं नहीं कह रहा हूं कि अच्छी है या बुरी। इस हकीकत से चेहरा कब तक बचाओगे, कब तक छुपाओगे?किसी भी पार्टी में टिकट नहीं बंटता है, भारत की किसी पार्टी में टिकट नहीं बंटता। मैं इस बात को कबूल करता हूं कि यदि मैं एक अहीर के अंदर पैदा नहीं होता तो हिन्दुस्तान के तीन सूबों से मैं चुनाव नहीं जीत सकता था। उसने क्या अपराध किया है लेकिन मैं तीन सूबों के अंदर जीत गया - उत्तर प्रदेश बिहार और मध्यप्रदेश। मेरे अलावा दो औऱ लोग-इन्दिरा जी और अटल बिहारी वाजपेयी जी दूसरे सूबों से चुनाव जीते हैं। मैं इस बात को कबूल करूंगा लेकिन दूसरे कबूल नहीं करेंगें। यह इतनी बड़ी बीमारी है। आप इस बीमारी के बारे में डॉटा इकट्ठा करना चाहते हैं और आप चाहते हैं कि बीमारी के बारे में डॉटा कलैक्शन हो जाये। श्री मुलायम सिंह जी ने ठीक कहा कि ये नौकरी नहीं मांग रहे हैं, कुछ नहीं मांग रहे हैं। केवल इतना ही बता दो कि हम पिछड़े हैं और लोकतंत्र में यह बताना जरूरी है कि वोट की संख्याही आदमी की ताकत बनाता है और पहचानता है। क्यों?आप उस पहचान से उसे दूर रखना चाहते हो? उसे बोध न हो जाये, उसे अहसास न हो जाये कि मैं कितनी बली हूं, मेरी कितनी ताकत है? आप इसलिये उसे छुपाना चाहते हो। पिछले 60साल से क्या हालत है कि 17 साल से मंडल कमीशन लगा हुआ है। होम मिनिस्ट्री के डीओपीटी में सर्वे हुआ है।
15.02 hrs. (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair) मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल, पब्लिक ग्रीवांसेज़ सैल- यह होम मिनिस्टी का2006-07 का सर्वे है। यह सर्वे 01.01.2005 में शुरु हुआ था। उसमें यह कहा गया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों की भारत सरकार की नौकरियों में फौज और रेल दो विभागों को छोड़कर संख्या कितनी है? यह सरकार यू.पी.ए. सरकार ने करवाया है उस सर्वें में क्या आया, मैं ज्यादा नहीं बताना चाहता।
सभापति महोदय, ग्रुप ए में कुल नौकरियां80हजार 569 हैं जिसमें अनुसूचित जाति 9651 - 11.9प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 3448- 4.3प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्ग 3791-4.7प्रतिशत हैं। यानी 27 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी के लिये मिला हुआ लेकिन 17 साल में कितना दिया, यह बेईमानी कौन कर रहा है? आपके प्रधानमंत्री से मिला, तब यह आया, गृह मंत्री जी, आप उनसे अकेले में पूछना। इसी तरह ग्रुप बी में कुल नौकरियां एक लाख 39 हजार956जिसमें अनुसूचितजाति को 19194 - 13.7प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 6230-4.5प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्गों को 3252 - 2.3प्रतिशत। हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक समाज पर हिन्दू होने का गर्व करते हैं लेकिन ग्रुप सी में उनको कितनी नौकरियां हैं?ग्रुप सी में कुल नौकरियां 20लाख, 36 हजार103हैं।
ये बारिंग रेल और बारिंग फौज हैं। उसमें शैडय़ूल कास्ट तीन लाख तैंतीस हजार है, 16.4 परसेंट है। शैडय़ूल ट्राइब्स एक लाख इक्तीस हजार समथिंग है,6.5परसेंट है। ओबीसी एक लाख उन्नीस हजार है, दोनों से कम है, 5.9परसेंट है, और नीचे है, आगे मैं नहीं पढूंगा।...( व्यवधान)
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी): यह हमारा पुश्तैनी काम है।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, please do not disturb him. He knows how to speak.
श्री शरद यादव : महोदय, डीओपीटी से फिर एक आंकड़ा आया है कि about reservations for OBCs as on 1.1.2006 उसमें लिखा हुआ है कि मुख्य-मुख्य मिनिस्ट्रियों में इनका क्या आंकड़ा है, यह डीओपीटी ने बताया है। राष्ट्रपति भवन में ग्रुप ए की सर्विस में टोटल ऑफीसर 22हैं, ओबीसी जीरो है। पी.एम. ऑफिस में ऑफिसर 24हैं, ओबीसी जीरो है। इलेक्शन कमीशन में 36 ऑफीसर हैं, ओबीसी जीरो हैं।...( व्यवधान) कोल मिनिस्ट्री में 30 ऑफिसर हैं, ओबीसी जीरो हैं।
MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please wind up. You made your point.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: You may please keep quiet.
श्री शरद यादव : पार्लियामेंट्री अफेयर्स मिनिस्ट्री में ओबीसी जीरो। यानी मैं आपसे कहूं कि हिन्दुस्तान मे in 20 Ministries, and 18 departments of the Ministries not a single OBC is there in Group A category. मैं यह आकडे टेबल पर दे दूंगा, जिससे ये आंकड़े सरकार देख ले। मैं आपसे यही निवेदन करना चाहता हूं। भक्त चरण दास जी, आप हमारे बाजू में थे, आप जो बोल रहे थे, आपकी ऐसी बदकिस्मती है कि गोल, गोल, गोल, गोल, आप कुछ बात नहीं कह पाये, आप कुछ समझा नहीं पाये।...( व्यवधान) आप सरकार से कहिये। चिदम्बरम जी आप उस सूबे से आते हैं, मुझे अफसोस है, कोई दूसरी जगह से आते तो मुझे कुछ कहना नहीं था, यहां लॉ मिनिस्टर मोइली साहब बैठे हैं, इन्होंने प्राइम मिनिस्टर के यहां बैकवर्ड क्लासेज़ के लिये लिखकर दिया। मैं आपसे कहता हूं कि हिन्दुस्तान की सारी जातियों का पता लगना चाहिए। मैंने जो आंकड़े बताये हैं, उसमें सारे वीकर सेक्शन के पास 20 परसेंट से भी..
MR. CHAIRMAN: Please wind up.
श्री शरद यादव : महोदय, मैं आपसे यही विनती करना चाहता हूं कि यह आपने ऐसी जगह खड़ा कर दिया है, यूपीए सरकार के साथियों और मित्रों मैं कहना चाहता हूं कि आप हर ऐसी चीज को छेड़ रहे हो, हिन्दुस्तान में सुकून छोड़िये जो लोग बर्दाश और सहन करके बैठे हुए हैं, उन्हें धकिया, धकिया कर, हुदिया, हुदिया कर आप चाहते हैं कि इस देश में तबाही का दौर चल जाये, तबाही के दौर पर खड़े हो जायें। खबरदार, मैं यह साफ कहना चाहता हूं, यह बहस यहीं समाप्त नहीं होगी, इसे ठीक कराइये। आप जानवर की संख्या लेते हो, आप जनरल की संख्या ले लेते हो, नदी कितनी हैं, आप उनकी संख्या ले लेते हो।
MR. CHAIRMAN: Please wind up.
श्री शरद यादव : कितने नाले हैं, आप उनकी संख्या ले लेते हो, लेकिन आप आदमियों की संख्या लेने के लिए तैयार नहीं हैं।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please sit down.
श्री दारा सिंह चौहान : महोदय और कुछ नहीं तो बोलने का अधिकार तो दीजिये।...( व्यवधान) MR. CHAIRMAN: Hon. Member, you should understand before they shout that we have the time constraint.
श्री शरद यादव : महोदय, मैं समझ गया हूं। मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: His party time was three minutes and he has taken 20 minutes. He gave a beautiful speech. Please do not disturb him. Hon. Member, please wind up.
श्री शरद यादव : गृह मंत्री साहब, आपके जो अफसर हैं, उन्हें थोड़ा समझाईये। हिन्दुस्तान के80फीसदी लोगों के पास 20 फीसदी नौकरियां हैं, तीनों का आंकड़ा आपके पास है, मैंने आंकड़े दिये हैं।इसमें भी कह रहे हैं कि80प्रतिशत लेने के बाद भी हमें रिज़र्वेशन चाहिए। सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर यह रिज़र्वेशन है लेकिन अभी भी लोग नारा लगाते हैं।...( व्यवधान) यह सब पता लग जाएगा ...( व्यवधान) ऊँची जाति का भी लगाइए। उसमें कौन दिक्कत और तकलीफ़ में है? उनके बारे में भी हमें कोई योजना बनानी है। हमें कोई ऐतराज़ नहीं है। हम इतना जानते हैं कि जाति से ही गरीबी चलती है। जैसे जैसे जाति नीचे आती जाएगी, वैसे वैसे गरीबों की संख्या बढ़ती जाएगी। मैथेमैटिकली मेरे पास चार्ट है, मैं कभी आपको चिट्ठी के साथ दे दूँगा। गरीबी कहाँ बढ़ती है? गरीबी बढ़ती है जैसे-जैसे जाति छोटी होती जाती है, गरीबी की संख्या फैलती जाती है, और विस्तारित होती जाती है। इसलिए मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूँ कि सरकार इसको हल्के रूप में न ले। ये इस तरह के सवाल छेड़ रहे हैं जो बहुत दिक्कत और तकलीफ़ दे रहे हैं। हमारे जैसे लोग हिन्दुस्तान में तकलीफ़ के साथ इतने वर्षों से समरस समाज के लिए जी रहे हैं, लगे हुए हैं, उस समरस समाज को तोड़िये मत। आप संख्या गिनिये और यह मामला यहीं खत्म होने वाला नहीं है, अगली लोक सभा में भी यह पीछा होगा और ऐसा होगा जिसका अंदाज़ आपने नहीं किया है। ...( व्यवधान) अभी तो कल और है।
इन्हीं बातों के साथ मेरी आपसे विनती है और सारी सरकार से मेरा कहना है कि ...( व्यवधान) हाँ, अगली लोक सभा में। ...( व्यवधान) मेरी आपसे विनती है, हम आपसे कुछ नहीं माँग रहे हैं। हम आपसे अपनी संख्या मांग रहे हैं। हम कितने हैं उतने गिन लो। आप बजट एलोकेट करते हैं तो वह कैसे बाँटोगे, कैसे दोगे, हम इतनी बात कह रहे हैं। पिछड़ी जाति का जो कमीशन है, उसको दाँत दो। अभी आपने उसके दाँत तोड़ दिये हैं। जिस तरह से शैडय़ूल्ड कास्ट्स, शैडय़ूल्ड ट्राइब्ज़ और माइनारिटीज़ का है, इसी प्रकार उसको भी दाँत देने का काम करो।
SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Hon. Chairman, on behalf of my Party, I support this step undertaken by the Central Government as regards census. We support that.
India is a country where we say Hindus, Buddhists, Sikhs, Jains, Parsis, Muslims, Christians remain together. The great poet Tagore said:
“Punjab- Sindh- Gujarat- Maratha, Dravida-Utkal- Banga Vindhya-Himachal-Yamuna-Ganga Uchchala-jaladhi-taranga.” We are the firm believers of the principles of secularism, communal harmony and unity of the nation. The great poet of Bengal Shri Atul Prasad Sen wrote: “Nana Bhasha, nana man, nana paridhan, vividher majhe dekho, milono mahan.” We are united in our country. We are aware that a sense of insecurity exists in the minds of the Harijans, cobblers, scavengers, other backward classes and minorities etc. Right from the commencement of our Constitution, not only the makers of the Constitution, time to time this august House has extended the benefit of the constitutional provisions to the Scheduled Castes, to the Scheduled Tribes, to the OBCs. This has come and benefits have been extended. There is no harm for a detailed report after census which would emerge caste-wise. There is no harm on that. Today we are having a Right to Information Act. If anybody is making an application in respect of the population in an area, detailed report, caste-wise report, how will the Government give it? If the Government is ready to take steps for a particular area, for a particular Scheduled Caste, Scheduled Tribe or OBC for providing the necessary help, how will the Government give it?
The Government has to act on the basis of documents and not on the basis of emotions. If these details are not available with the Government, how can the Government take appropriate steps and extend help to the people in particular areas where it is needed? The people who really need help have to be identified. They cannot be brought to the surface on the basis of any lecture or on the basis of expressions of emotions. If I wish to help a certain person, I have to identify him first. Who are the people who need help from the Government under Part IV of the Constitution, the Directive Principles? How will it be known unless a detailed picture is available? It is nice to hear emotional lectures. It is nice to blame people. But nothing comes out of that. It is really difficult to work for the betterment of the people, if certain details are not there.
I fully support the steps undertaken by the Government to undertake detailed caste-wise census It would be very useful if the census report makes available these figures state-wise. We firmly believe that if such a detailed report comes to the Government, the Government will be in a position to give a clear picture to the country as to how many OBCs are there in which areas of the country.
It has just been said that employment opportunities to OBCs have not been commensurate with their percentage in population. I agree with that argument. But where are these OBCs living and where is employment necessary? There is no scope for somebody to come from the street and enter into Central Government employment. Awareness has to be created within the OBCs and within the SCs and STs. It is right that the Naxal and Maoist movements are on the increase. That is because places have not been identified at all in the area of Jharkhand and West Bengal border. The people who deserve the benefits of Government schemes have not got the benefits and these movements are gaining ground. That is because the beneficiaries have not been properly identified. This identification is essential.
I do not want to deliver a long speech on this. I have a very short point and that is that caste-based census are necessary. On behalf of my Party I support the steps undertaken by the Central Government because it is only after such census are carried out that ultimately the people who need help from the Government will get it and not others.
SHRI T.K.S. ELANGOVAN (CHENNAI NORTH): Mr. Chairman, Sir, we come from the State where Thandai Periyar E.V. Ramasamy’s Self-respect Movement had a great impact. The impact was such that in the whole of India there is only one State, that is Tamil Nadu, where people do not attach their caste names to their names. We are against caste differences. We do not want caste. But how to abolish caste? We have to abolish caste by empowering the backward people.
I can quote one classic example from Tamil Nadu. There was a particular caste of people who were called the denotified class.
They were even made to go to the police stations and sign daily. Those people are not Scheduled Tribes people; they are from Backward Classes. One great leader of Tamil Nadu, Pasumpon Muthuramalinga Devar, who was also a Member of this House, twice, fought for their rights, and those people were identified, targeted, and they were given education and they were rehabilitated. If the people identify themselves as to which caste they belong to, the Government could rehabilitate them. There are certain communities – the figures say that India’s literacy rate is 64 per cent. What about the remaining 36 per cent? Are they spread over in all communities? No. There are certain communities which are isolated from the mainstream. We should identify them. They believe that they are Backward Classes. They are the people who have to serve the upper castes because of Manu Dharma; they believe that Chaturvanyam Mayashristham. Chaturvanyam is the creation of God. So, when God says something, that we should follow. Those people are still not uplifted. They have to be identified; they have to be targeted. How will you identify them unless you know their castes? How will you rehabilitate them unless you know their castes?
I wish to quote Babasaheb Ambedkar, in his classic work, “Who were the Shudras?” had stated:
"If people have no idea of the magnitude of the problem (of the Shudras) it is because they have not cared to know what the population of Shudras is. Unfortunately, the census does not show their population separately. But there is no doubt that excluding the untouchables, the Shudras form 75 to 80 per cent of the population of Hindus".
This has to be taken note of. Dr. Ambedkar was a great social reformer. His vision has to be considered very seriously. Only then, India will have a casteless society in the future. Caste cannot be abolished by law. We should empower the people. We should empower the downtrodden people so that we can abolish caste. So, to empower them, we should identify them. Hence, caste-based enumeration is necessary.
Three Backward Classes Commissions were formed. None of the Commission could give proper figure because there is no census based on caste. I would like to quote Havanor Commission Report, 1975. The Government cannot hide behind the provisions of the Constitution. The Government cannot say that articles 15, 16 and 29(2) of the Constitution prohibit them from having a caste-based census. I can quote Havanor Commission:
"We have got to examine the correctness or the bona fides of such an assertion. It is to be noted that Articles 15, 16 & 29(2) prohibit the State from making discrimination against any citizen on grounds not only of caste, but also religion, race, sex, place of birth, descent, residence and language. Have the religions, castes, races, languages, etc., ceased to exist because of prohibition of discrimination? No. One fails to understand the logic of the contention that the abolition of caste particulars in Census was right, when other particulars relating to religion, race, sex, place of birth, descent and language are enumerated in the Census. The logic or the reason that is applied in the abolition of caste particulars would also have been applied in matters relating to religion, race, sex, place of birth, descent and language. What is the justification in the enumeration of people on the ground of their place or residence in urban and rural areas? What is the justification in the enumeration of people belonging to Scheduled Tribes? What is the justification in the enumeration of people of their peculiar descent like Anglo Indians? Further what is the justification to mention the similarly prohibited aspects of religion, race, sex, place of birth, residence and descent in the Birth and Death Registers, in the Admission Registers of Schools and Colleges and the Service Registers of Government Servants? Have they not made people conscious of their religion, sex, race and language? Is it not discriminatory against Hindu castes if particulars, of castes are not enumerated"
This was the report of the Havanur Commission in 1975. So, the Government should consider this. To target the backward people, to identify the people, and to rehabilitate them, caste-wise enumeration is necessary. I wish to join the other Members of this side in requesting the Government to have a caste-wise census.
DR. RAM CHANDRA DOME (BOLPUR): Thank you for allowing me to take part in the Short Duration Discussion on Census, 2011.
Our country is a Democratic Secular Republic. On principle, we cannot support the division of the society on the basis of caste, religion and creed. This is our principled position. Our country is integrated in the philosophy of unity in diversity. It is a diverse nation. Secularism and pluralism is the mainstay of integration of our country.
But why we are discussing this important issue of Census 2011? All of a sudden, the hon. Minister, Mr. Moily, the other day, in this House told us that our Census 2011 started and it is going on. This process of enumeration of different sections of our people started, but we have no time to discuss it in the House, before the process is started. This is very unfortunate.
We cannot deny the legacy of the manuvadi society in our country; still it is remaining; at this given point of time, caste system and religious division in our country is there; we cannot deny that. So, for all practical purposes, enumeration of people, particularly for categorizing the priority sector, the deserving category of section of our society, should be there; and we cannot deny census on the basis of caste.
So, our planning process, our different policies and programmes are made on the basis of the exact composition of the people. The Government is fixing priority of its policy on the basis of the population-composition. The reservation is made by Constitution. The Founding Father of our Constitution has enshrined this right on that basis. They realized the caste system and they have given this right in the Constitution. It is unfortunate that we are having this caste system, the manuvadi system in our country; this is continuing and we are not able to eradicate; we cannot blame the illiterate, backward people in the country. But the advanced people, the educated elites are not free from caste legacies. This is a very unfortunate situation which I must admit here.
For that reason, the demand for enumeration of census on the basis of caste system should be there; we cannot deny this practical proposition. This is the ground reality. So, the enumeration should be there on the basis of caste and also religious communities. Similarly, the composition of religious communities should also be enumerated. This is our clear understanding. We are against this system and wish that this system should not continue longer. We are for the casteless and classless society. That type of a society must come in our country. For the present, we are carrying on the legacy of the past. So, our census should fix the priority areas. Enumeration on the basis of caste cannot be denied. The process of census has already started and I do not know whether it is possible to include at this point of time but I would say that the Government should evolve a mechanism to include OBC also in the enumeration process. Either the Central Government or the State Government should formulate such a mechanism otherwise the whole purpose of enumeration will have no meaning.
With these words, I urge upon the Government to re-think and be practical. Caste system cannot be denied in our society. I would say that Scheduled Caste, Scheduled Tribe, OBC and minority communities should be included in the enumeration process.
SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Thank you, Mr. Chairman. I stand here to participate in the discussion initiated by Shri Ananth Kumar relating to laying down specific parameters for conducting 2011 census.
Before I dwell into the issue I would like to quote what was published in The Hindu on 6th April, 2010.
“A petition has been filed in Kerala High Court, which was admitted and the petitioner has pointed out that the Backward Class Commission Chairman, Dr. Kaka Kalelkar and the Mandal Commission had recommended a caste and community-based census so that various Constitutional provisions could be implemented.” In 1998 the former Census Commissioner had announced that the Union Welfare Minister had mooted a proposal to conduct a caste-based enumeration in future national census. However, when the Notification on the present census was published there was no proposal to include caste in the enumeration. I would again quote another newspaper The Times of India dated 15th September, 2009.
“The findings of an official survey, indicating that Other Backward Class population in rural areas was around 38.5 per cent, have given fresh impetus to call for a caste-based census with the Law Minister, who is present here now in this House, Shri Veerappa Moily asking the Prime Minister Shri Manmohan Singh to do away with the bar on caste enumeration in the 2011 census.” I am referring to these two newspapers here to elucidate my point and to clearly state that census is a useful tool for policy purposes. Often a question is posed which is nothing new in our country: Why should a Census engage in such a task unless some policy is on the anvil that will use this information? I believe Census is the work arm of policy making. It is the basic work of the Government. It does a tedious job of adding numbers but only on matters that are going to become or are already aspects of State policy.
As many hon. Members have already said, the last caste-based Census was done during colonial period in 1931 and its purpose was very different. Today, the purpose is to frame new policies or to propagate the policy that are being vouchsafed there. That period was something else. Since Independence, no such Census has been done.
A question has been posed by the Supreme Court which was referred to by Mr. Bhakt Charan Das, my good old friend, why no caste-based Census was done during the last 70 years and why should it be done now? But different courts in our country have repeatedly asked the Government why you are not doing the caste-based Census. I would like to understand from the Government the reason they have submitted to different courts.
The Constitution has provided caste-based reservation to Scheduled Castes and Scheduled Tribes. Let us not play with words. By shutting our eyes, we cannot do away with the reality that is encompassing us. Other backward classes have been identified by caste alone. I was talking to some of my friends here. When other backward classes are being identified, what are the parameters through which a class can be identified? What are the criteria? What are the stratifications through which the class can be identified? In their collective wisdom in 1990, the caste became the basis on which OBCs were identified. What are the other parameters through which a class can be identified and stratified? One other parameter is the economic status. Who is going to do it? It is the Government that has to do it. They have not done it in the last 70 years. Rather Kaka Kalelkar had insisted on caste enumeration. Mandal Commission had also asked for caste-based Census. It is not the economic or financial backwardness that is being targeted to provide reservation. It is caste and caste is a reality and we cannot wish it away. I am reminded of a very pathetic situation which occurred during pre-Independence period when Mahatma Gandhi visited Orissa. He was campaigning in Barboi near Delang. Without taking permission of Mahatma Gandhi, Kasturba left that place and went to pay obeisance to Lord Jagannath. When she came back, Mahatma Gandhi asked her: Where had you been? She replied that she had gone to Lord Jagannath. Why? She replied that she had come from Gujarat and wanted to pay obeisance to Lord Jagannath. He asked her: Do you not know that all Hindus are not allowed to enter that temple and that I have taken a vow and you are aware of it that until and unless everybody and every Hindu is allowed to enter that temple, we will not go into that temple? He fasted for two days. Subsequently, a rapprochement was agreed upon.
He did not go into the temple. He never visited the temple. But on his demise, rather 12 days after his demise, on the 12th of February, in a purely non-violent way, the dalits of Orissa did a Satyagraha and forced the temple management and the gates of the temple were opened for the dalits. That is how the dalits enjoyed the prestige in Orissa and in Oriya community we have a number of such instances. Caste classification in Orissa is not that rampant. But caste is a reality and constitutionally we have strengthened it through our various approaches and that is a positive aspect. It is not a negative aspect. It is easy to say sitting in London, New York or Tokyo that casteism is weakening our society. It is easy to say that but this is a positive aspect that reservation is being provided. Therefore, I would say that refusal to include a question on caste in the census makes no sense. Keeping caste out of the census does not mean that we can wish it away. More importantly, as long as the government offers affirmative action for groups that backward for historical reasons, it must gather as much information about them as possible. That does not mean just counting the numbers of the backward caste, it would also help policy makers in identifying more precisely just which groups are disadvantaged and to what extent. This is essential because policy then can deal with facts rather than with impressions as is the case now in the absence of authoritative data.
What happened some months back in Supreme Court? A case was filed in the Supreme Court. Should I name the judge?
MR. CHAIRMAN : You cannot take his name.
SHRI B. MAHTAB : In the open court the Justice asked as to how did one arrive at 27 per cent? That is a question, I think, that the Government had to answer. What is the basis? The basis is the 1931 census on which the Mandal Commission relied upon. With the growth of population, with the growth in different castes, it has come to 52 per cent or 54 per cent, but because it is not allowed more than 49 per cent, it came down to 27 per cent. What is the logic? Today, as Shri Sharad Yadav ji had said, the discussion here has started today but is not going to end. This is the beginning. Sporadically, in various High Courts the petitions are being filed. In the Madras High Court a petition was filed and this was in the month of January. Chief Justice H.L.Gokhale and Chief Justice K K Sashidharan asked the Union Home Secretary, the Register General and the Census Commissioner Government of India to consider the representations and had given eight weeks to respond. This was in the month of January and today we are in the month of May. The Government must have responded… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please address the Chair. Please conclude now. I will give two more minutes. Some other speakers also are left.
SHRI B. MAHTAB : It is not a very emotive issue here today. I do not want to make it an emotive issue. But as we are dealing with policy matters, there is a necessity to know the number of castes. What is census? An enumerator will only ask a question. He is not an investigator. If I have five rooms in my house, then he will just ask me as to how many rooms I have in my house. If I say 4, he will write 4. He will not object to saying, `no, no, I know you have five rooms’. He is not an investigator. He is just an enumerator. He will write down all the information that he collects. The basic purpose is that demographic parameters like age, sex, literacy, religion, languages known, economic activity, status, migration, etc. are being collected in respect of each individual. I am told that requests for conducting caste-based census were received from Government of West Bengal. I do not know why Dr. Ramchandra Dome did not mention it. The Government of West Bengal had made a request to the Union Government of India. I do not know whether any other State Governments have made that request or not. The first bench of Madras High Court, about which I had mentioned, has said “seriously consider”. This was the direction of the Madras High Court. This was published in The Indian Express on 23rd January, 2010.
Sir, therefore, I would plead that caste-based census is necessary. It is not that time has run out. The house-to-house census will start. Since time is short, I am not going into all those details. It can be added in the forms which every member has to fill up through the enumerator. It starts on 1st February, 2011. The enumeration which has started today is the first phase. Actual enumeration will start next year. I am not going into the information which I have. I am not privy to what happened in the Cabinet. There are differences of opinion. But I would also like to state one more point because the subject under discussion today is the methodology. I would plead before this Government to include caste-based census.
Sir, you would appreciate the second suggestion which I would like to make here. I would also like to know from the Government as to why the third gender is not being counted in India. The transgender people in the country should not be given a miss this time. Census 2011 does not provide them a separate gender option. In the comprehensive house listing and housing census which is spread over 35 columns, the gender option is confined to the usual male/female. The current census will lead to the issuing of Unique Identity Cards for the first time in the country. It is reported that one Assistant Director in the office of the Registrar General and Census Commissioner of India has come out openly and said that no suggestion has come on the option for third gender in census form. He has said that option could be considered in the main data of the census form to be held in February, 2011. With enough suggestions which had come to this effect, this grave injustice should be corrected.
Lastly, third gender does exist in the society and it cannot be ignored. The Punjab and Haryana Governments had recently announced including the third gender in the category of male for the purpose of Government services. The High Court has issued a notice to the Government of India on a petition asking it to spell its policy on this issue. Two years ago, the third gender won a huge battle in Tamil Nadu when the third sex was granted official status by the State. In the ration cards and application forms for college education, there is a provision to record third gender or transgender as an option. However, in Tamil Nadu, the third gender has to wait for a separate categorisation in passports and voter identity cards since it requires a policy decision to be taken by the Government.
Therefore, there is a necessity for including them as we are revisiting this issue and this is the beginning of it. We have to have a caste-based enumeration and if possible, also include the third gender in it.
श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड): सभापति महोदय, मैं ऐसा मानता हूं कि आज इस सदन में एक ऐतिहासिक बहस हो रही है, क्योंकि इस देश में 54 प्रतिशत ओबीसीज हैं। इसका मतलब यह है कि 54 करोड़ लोगों के जीवन से संबंधित विषय पर हम बहस कर रहे हैं। इस विषय पर सरकार ने फैसला नहीं किया है। वर्ष 1931 में एक बार सिर्फ जनगणना हुई थी। ओबीसीज की जनसंख्या कितनी है, 80 वर्ष से इस बारे में जनगणना नहीं हुई है। अगर हम अब भी ओबीसीज की जनगणना नहीं करेंगे तो ओबीसीज को सोशल-जस्टिस देने के लिए और इंतजार करना पड़ेगा और यह उन पर अन्याय होगा। यह जनगणना की मांग क्यों कर रहे हैं? वर्ष2007 में आईआईटी में ओबीसीज को आरक्षण देने के बाद, एक पब्लिक लिटिगेशन दाखिल हुई थी, उस समय कोर्ट ने ओबीसीज की पॉपुलेशन के बारे में सरकार को तथ्य कोर्ट को देने के लिए कहा। सरकार ने कहा कि आजादी के बाद हमारे पास ओबीसीज पॉपुलेशन के कोई स्टेटिस्टिक नहीं हैं। इसलिए आरक्षण देने के लिए, कोई स्टेटिस्टिक उपलब्ध नहीं है तो कितना परसेंट आरक्षण दें, यह तय नहीं किया जा सकता। उस समय बहस में एडीशनल एडवोकेट जनरल ने भरी कोर्ट में कहा कि हां, सरकार को ओबीसीज की जनगणना करनी चाहिए। अब जब जनगणना हो रही है तो ओबीसीज की जनगणना क्यों नहीं की जा रही है। अभी हमारे माननीय सदस्य कह रहे थे कि गुणवत्ता के आधार पर समाज में न्याय मिलना चाहिए। मुझे आप दूसरे मनु दिखाई दे रहे हैं। आज समाज में समानता कहां है? आप दलित होते हुए, ओपन सीट पर चुनकर आये, मैं आपका अभिनंदन करता हूं। लेकिन हमारे संविधान में एससीएसटी को आरक्षण नहीं होता, तो क्या बाकी सदस्य जीतकर आ सकते थे? आपकी सोच सच्चाई से कोसों दूर है। आपको न्याय मिला, इसलिए सब को अन्याय में मत घसीटिये।
सभापति महोदय, क्या आज छुआछूत बंद हो गयी है? नहीं हुई है। क्या आज दलितों को मंदिर में प्रवेश करने दिया जाता है? बाबा साहेब अम्बेडकर को नहीं, हर अम्बेडकर का प्रवेश नकारा जा रहा है। छोड़िये कल की बातें, परसों क्या हरियाणा में दलितों के घर नहीं जलाए गये? महाराष्ट्र के किरलांजी में बहन, बेटी, मां को बेकपड़ा करके प्रोसेशन निकाल कर जलाया गया। ......( व्यवधान) मैं किसी सरकार को दोष नहीं दे रहा हूं। समाज की वास्तविकता बता रहा हूं। हम हर दिन मंच से कहते हैं कि छूत-अछूत सब बंद हो गया है, हम सब बराबर हैं। यह सिर्फ कहने की बात है, कहने और करने में फर्क है, वास्तविकता इससे बिलकुल उलट है। आप कास्ट लेस समाज का निर्माण करना चाहते हैं, मैं पूछना चाहता हूं, मैं पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखता हूं, लेकिन अगर मुझे हिंदुस्तान में फिर से जन्म लेना है और भगवान को अगर मैं प्रार्थना करूं कि बिना जाति के घर में मुझे जन्म दो, तो क्या यह संभव है?कौन सा ऐसा घर है, जो बिना जाति का है।...( व्यवधान) ठीक है, अगली बार यादव के घर में जन्म लूंगा और यादव मुंडे के घर में जन्म लेगा। ओबीसी कास्ट नहीं है, यह क्लास है। शेडय़ूल कास्ट एक क्लास है, शेडय़ूल ट्राइब एक क्लास है और ओबीसी भी एक क्लास है, क्योंकि इनमें कई जातियां आती हैं। संविधान ने एससी और एसटी को आरक्षण दिया है, लेकिन ओबीसी को आरक्षण नहीं दिया। काकेलकर कमीशन बनी और विभिन्न प्रदेशों को अधिकार दिया कि वे अपने यहां ओबीसी को अधिकार दें।...( व्यवधान) पहले नहीं था, लेकिन अमेंडमेंट आया। मैं कहना चाहता हूं कि इस देश मद्रास और कर्नाटक ऐसे प्रदेश हैं, जिन्होंने आजादी के पहले भी आरक्षण दिया था। मैं महाराष्ट्र से हूं, जहां से साहू महाराज ने ओबीसी, एससी को आजादी से पहले आरक्षण दिया था और डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर को स्कोलरशिप साहू महाराज ने बड़ौदा से दी थी। मैं ऐसा नहीं मानता हूं कि सत्ता के कारण कास्ट सिस्टम गड़बड़ हुई है, लेकिन वास्तविकता है कि जात कभी जाती नहीं है। कई लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया, कई मुगलों के जमाने में मुस्लिम बने। जाति के आधार पर जनगणना की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि पिछड़ापन जाति से जुड़ा है और जाति पिछड़ेपन से जुड़ी है। जो गांव में रहते हैं, वे पिछड़े हैं, जिनको पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं है। जिन्होंने सड़क नहीं देखी, बिजली नहीं देखी। जिनके पास तन ढकने के लिए वस्त्र भी नहीं हैं। ये लोग पिछड़े हैं। आप 63 साल की आजादी के बाद भी उन्हें न्याय नहीं देना चाहते हैं। जनगणना में ओबीसी की गिनती नहीं करना, ओबीसी को सामाजिक न्याय नहीं देने के बराबर है। सरकार सोशल जस्टिस देना नहीं चाहती है। बाबा साहब अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फूले, साहू महाराज नहीं होते, तो यह वर्ग संगठित न होता। इनके पास लड़ाई लड़ने की ताकत भी न रहती। उन्होंने समता का विचार रखा, समानता का विचार रखा। हमारे देश में विभिन्न जातियां होते हुए भी क्या गड़बड़ है, यह अच्छाई है या बुराई है, यह सोचने का समय नहीं है। अलग जाति, अलग पहनावा, अलग भाषा, अलग प्रदेश फिर भी हमारा एक देश। इसलिए पिछड़े हुए वर्गों की देशभक्ति के बारे में आशंका जताना गलत है। किसी भी काम के लिए वे तैयार हैं। यह पिछड़ापन सालों से है, सदियों से है। वेलफेयर स्टेट गवर्नमेंट में उन्हें न्याय देना चाहते हैं या नहीं, यह सवाल हमारे सामने है। काकेलर कमीशन के बाद मंडल आयोग आया। मंडल आयोग ने ढूंगा कि कितनी जातियां हैं। 3743 जातियां हैं और इसमें उपजातियां भी हैं। इतनी जातियां हैं कि जयप्रकाश नारायण ने जाति तोड़ो आंदोलन चलाया।
16.00 hrs. कई लागों ने इंटरकास्ट मैरिज की, मैंने भी की। अब इंटरकास्ट शादी करने वालों की जाति अलग हो गई है। मंडल आयोग ने कहा कि 52 परसेंट ओबीसी हैं, उन्हें52परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन कोर्ट ने 50 परसेंट आरक्षण का फैसला किया। क्यों?जिन लोगों को आज तक सोशल जस्टिस नहीं मिला, सामाजिक न्याय नहीं मिला, जो दूसरों की बराबरी के नहीं हैं, उन्हें न्याय देने के लिए आरक्षण आया। उन्हें आरक्षण किस आधार पर दिया जाता है? उन्हें केवल जाति के आधार पर आरक्षण दिया जाता है इसलिए जनगणना आवश्यक है।
वर्ष2004में रेनके आयोग की नीति माननीय अटल जी की सरकार में नियुक्त हुई थी, उन्होंने 2008में रिपोर्ट दी, उनमें ओबीसी जातियां आती हैं। उन्होंने कहा कि 47 परसेंट ओबीसी जाति हैं। कई लोगों के मतदाता सूची में नाम नहीं हैं और उन्होंने नोमेडिक ट्राइब्स के लिए नियुक्त किया था। सरकार ने रिपोर्ट लागू नहीं की। रेनके आयोग की रिपोर्ट सरकार को लागू करनी चाहिए और ओबीसी को न्याय देना चाहिए। उनके पास कोई घर या जमीन नहीं है। कालेलकर, मंडल और रेणके आयोग का कहना है कि ओबीसी की जनसंख्या कितनी है उसका अंदाजा किसी को नहीं है। क्या यह देश साइंटिफिक रूप से तैयार होगा?किसी को कहने का कोई अधिकार नहीं है। क्या साइंटिफिक रूप से देश तैयार होगा कि यह जनसंख्या है और इस जनसंख्या के आधार पर विभिन्न प्रदेशों में आरक्षण दिया जा सकता है?कांस्टीटय़ूशन में शेडय़ूल कास्ट के लिए शेडय़ूल है, शेडय़ूल ट्राइब के लिए शेडय़ूल है। कांस्टीटय़ूशन में पार्लियामेंट और स्टेट गवर्नमेंट के लिए शेडय़ूल है। माननीय राजीव गांधी जी ने कांस्टीटय़ूशन में परिवर्तन करके पंचायती राज को लागू किया। मेरी मांग है कि जिस तरह से शेडय़ूल कास्ट और शेडय़ूल ट्राइब्स के लिए शेडय़ूल है उसी तरह से ओबीसी के लिए शेडय़ूल होना चाहिए। इनके लिए अलग मंत्रालय भी होना चाहिए। इनके लिए सब जातियां बराबर हैं। क्रीमी लेयर लागू है, शेडय़ूल कास्ट्स और शेडय़ूल ट्राइब्स के लिए क्रीमी लेयर नहीं है लेकिन ओबीसी के लिए है। मेरा बेटा ओबीसी की सहूलियत नहीं ले सकता, यादव जी का बेटा ओबीसी की सहूलियत नहीं ले सकता क्योंकि चांस बचा ही कहां है। क्रीमी लेयर बनाई है जिसके कारण उन्हें अपनी सहूलियतें ही नहीं मिलती हैं। मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि यहां जो तथ्य बताए गए, ओबीसी का तथ्य बताया गया। शेडय़ूल कास्ट्स के लिए 13 परसेंट आरक्षण है, शेडय़ूल ट्राइब्स को 9परसेंट और कुछ राज्यों में सात परसेंट आरक्षण है। क्या उतने लोग सर्विस में हैं? सच्चर आयोग से मुसलमानों की स्थिति का जायजा लिया गया है। मैं मांग करता हूं कि शेडय़ूल कास्ट्स, शेडय़ूल ट्राइब्स और ओबीसी के लिए आरक्षण आजादी के63सालों में तो मिले। 13 परसेंट था लेकिन चार परसेंट मिला, ओबीसी का तो 2.4 परसेंट है जबकि आरक्षण27परसेंट है। कितना मिला है? कागजों पर फैसले करने से न्याय नहीं मिलता है। न्याय तब कहा जाएगा जब उन्हें उनका अधिकार मिलेगा। आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला है। यह लड़ाई सोशल जस्टिस की है, जनगणना में नाम लिखने की नहीं है। मैं दोहराना नहीं चाहता हूं, सबका नाम लिख रहे हैं तो इस जाति का क्यों नहीं लिख रहे हैं?जाति बन जाने से ढकने वाली नहीं है। मुझे मालूम नहीं कि सरकार क्यों सोच रही है? अब संघर्ष भी हो रहे हैं।अब अमीरी और गरीबी में अंतर बढ़ गया है। पिछड़ी जातियां63परसेंट हो गई हैं, इसका जिम्मेदार कौन है? मैं चरण दास जी से पूछना चाहता हूं कि अगर63साल में सबका बराबरी का दर्जा होता, सबको समान अवसर मिलता तो ओबीसी आरक्षण नहीं मांगते। ये ज्यादा पिछड़े हुए हैं।
न तो वे किसी एजूकेशन के क्षेत्र में हैं और न पोलिटिक्स में हैं। हर स्तर पर यदि वे पिछड़े रहेंगे, 54 परसैन्ट पापुलेशन यदि विकास, प्रगति और सुविधा से दूर रहेगी तो देश आगे कैसे बढ़ेगा। मुझे लगता है कि ओबीसी को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाकर उन्हें आरक्षण सुविधा देनी चाहिए और उनकी जनगणना करनी ही चाहिए।
16.06 hrs. (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair) सभापति महोदय, ओबीसी की जनगणना की मांग हम इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि सरकार को यह अवसर मिला है। स्वामी जी आपको यह मौका नहीं खोना चाहिए। मोइली जी जिस मंत्रिमंडल में तुम्हारी बात नहीं सुनी जाती है तो आप ऐसे मंत्रिमंडल में क्यों बैठे हो? ओबीसी के लिए एक लड़ाई होने दो। लोग आपको सिर पर उठा लेंगे।...( व्यवधान) यह मैं नारायणस्वामी जी को नहीं बता रहा हूं।
महोदय, यह मामला जनसंख्या का है। ओबीसी की जनगणना क्यों नहीं होती? आपको केवल एक कालम ही भरना है शेडय़ूल्ड कास्ट, शेडय़ूल्ड ट्राइब्स और ओबीसी। वह ओबीसी लिखकर अपनी कास्ट लिखेगा। उसमें सरकार का क्या नुकसान है। किसी ने मांग नहीं की, लेकिन आज सारे ओबीसी देश में मांग कर रहे हैं कि सैन्सज होनी चाहिए। यह मांग सब तरफ से उठ रही है और सरकार क्या गूंगी-बहरी है कि उसके कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है कि आज सब तरफ से ओबीसी आवाज उठा रहे हैं। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि आज मंत्री महोदय जब जवाब देंगे तो उन्हें यह घोषणा करनी चाहिए कि ओबीसी की अलग जनगणना होगी। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो75 परसैन्ट पापुलेशन का गुस्सा आपके ऊपर फूटेगा। आज आपकी सरकार है, सरकार चाहे किसी भी दल की हो। सरकार का काम होता है समाज को न्याय देना और वह न्याय देने का काम आप करें, न्याय देने का फर्ज पूरा करें। एक कांस्टीटय़ूशन रिस्पांसिबिलिटी आप पर आई है, जिस कांस्टीटय़ूशन में पिछड़े हुए वर्गों को न्याय देने की भूमिका डा.बाबा साहेब अम्बेडकर ने लिखी है, उस बाबा साहेब अम्बेडकर का सपना और भारत के सभी गरीब लोगों की आशा और आकांक्षा है कि लोकतंत्र में हमें न्याय मिलेगा, इस विश्वास के साथ 63 साल उन्होंने बिताये हैं, उनका वह विश्वास आप कभी न कभी पूरा करो। वे ज्यादा कुछ नहीं मांग रहे हैं. वे कह रहे हैं कि केवल हमारी जनगणना करो। हम इस देश के नागरिक हैं, आप हमारी भी गिनती करो। इसलिए मेरा निवेदन है कि सरकार एक बार यह गिनती अवश्य करे। इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री भक्त चरण दास : सभापति महोदय, मैंने अपने संबोधन में कहीं भी यह नहीं कहा कि ओबीसी का आरक्षण नहीं होना चाहिए।...( व्यवधान)
सभापति महोदय : ठीक है, आप बैठिये। श्री संदीप दीक्षित, आप बोलिये।
श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली): सभापति महोदय, आपने मुझे जनसंख्या2011 के इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। 2011 की जनसंख्या पर चर्चा में किन-किन मुद्दों पर सर्वेक्षण किया जाए, क्या-क्या नये मुद्दे डाले जाएं या न डाले जाएं, इस बात पर इस चर्चा को प्रारम्भ किया गया है। मैं बहुत देर से इस चर्चा में तमाम वरिष्ठ नेताओं को सुन रहा हूं। लेकिन मुझे इसमें यह बात जरूर लगी कि इस बात को केन्द्रित करना कि केवल वर्तमान सरकार में ऐसा नहीं हुआ। पहले मैं इस बात को स्पष्ट कर दूं, दारा सिंह चौहान जी एस.सी.,एस.टी. की बात कर रहे थे, मैं कहना चाहता हूं कि एस.सी.,एस.टी. की जनगणना सम्पूर्ण रूप से की जाती है, बल्कि छः हजार उपजातियों के अंतर्गत की जाती है। वह डाटा छापा जाता है, यह सम्पूर्ण रुप से किया जाता है। यदि आप एससी, एसटी के 1999 के टेबल्स देखने की कोशिश करें तो तमाम आपको सूचियां मिलेंगी। बल्कि यह आपके पक्ष को सशक्त करता है कि अगर एससी, एसटी. की गणना हो सकती है तो ओबीसी की गणना भी हो सकती है। ऐसी बात नहीं है कि इस गणना का अनुभव सरकार में नहीं है। लेकिन मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि कई सरकारें रही हैं। जब 1981 का सैन्सज हुआ था तो उसके पहले 1979-80 में जब प्रिपरेशन हो रही थी तो केन्द्र में कांग्रेस की सरकार काबिज नहीं थी। पिछली बार वर्ष 2001 में जब सैन्सज हुआ था तो मुंडे जी ही की सरकार थी। आज मुंडे जी नारायणस्वामी जी और मोइली जी से कहते हैं कि आप लोग वे कैबिनेट छोड़ दीजिए, जिसमें उनकी गणना नहीं होती। इस तरह के उत्तेजक शब्द वह2001 के सर्वेक्षण में भी कह सकते थे। तो बात राजनीति की नहीं है। इस बात को यह कह देना कि एक दलविशेष का व्यक्ति चाहता है, यह गलत है। यह बात एक समय के बाद उभरकर सामने आती है, उस बात को देखा जाता है। लगता है कि समाज में न्याय लाने के लिये गिनती की और ज्यादा आवश्यकता है। इस बात को पहले तय करें और इस पर बात करें। इस समय संसद में जिस तरह का एक मत बन रहा है, इसका रुझान देख रहे हैं और हम भी उस रूप में चाहते हैं कि हम अपना मत व्यक्त करें। हम भी कह सकते हैं कि 1979-80में जिसकी सरकार थी, उस समय क्यों नहीं किया?पिछली बार किसी और की सरकार थी, उस समय ओबीसी का सर्वेक्षण क्यों नहीं किया?बात यह नहीं होती। आज से दो साल पहले इसमें से बहुत से एमपीज़ हैं जो उस समय तब भी थे। मुझे रजिस्ट्रार जनरल साहब की चिट्ठी आयी कि 2011 में सर्वेक्षण होना है, हम आपका मत जानना चाहते हैं। इन सब मुद्दों पर चर्चा हुई लेकिन उस समय विज्ञान भवन में केवल मैं ऐसा सासंद था जो वहां गया, बाकी क्यों नहीं गये?मैं भी कह सकता हूं कि यह बात क्यों हो? उस समय भी लोग मत व्यक्त कर सकते थे लेकिन एक समय की बात होती है, हमें भी करनी आती है लेकिन जो सत्ता में आये और यह कह देना कि कोई एक सरकार या घटक दल इसी चीज के विरोध में है तो मैं इस बारे में अपना पक्ष रखना चाहता था कि यह बात गलत है। आज हम सरकार के संमक्ष हम अपनी बात रख रहे हैं। यहां होम मिनिस्टर और स्टेट मिनिस्टर फार होम बैठे हुये हैं, वे हमारी इस बात को सुन रहे हैं और मुझे पूरा विश्वास है किजो हम बात कह रहे हैं, वे ध्यान में रखेंगे। यह बात अति आवश्यक है और कई लोगों ने कही कि हमारे समाज में जाति में विषमता रही है, अलग अलग तरीके से जाति के प्रभाव को कम करना, उसके दुप्रभावों को कम करना, हम सब लोग इसे अपने अपने तरीकों से करते रहे हैं। इसमें दक्षिण भारत के तमाम क्रान्तिकारी धन्य हैं। यहां पेरियार साहब औऱ अन्य लोगों का नाम लिया गया जिन्होंने पिछले 70-80 सालों में क्रान्ति लाकरदक्षिण भारत की जो दुविधायें थीं, सब तरीके से समाप्त कीं। दुर्भाग्य से हम उत्तर भारत के लोग इस चीज में पीछे रहे हैं। इस तरह के क्रान्तिकारी हमारे यहां के समाज में नहीं आये जिससे समाज में परिवर्तन नहीं हो पाया और समाज में जाति पर अपनाकब्जा बनाकर रखा हुआ है। लेकिन यह हमारी पालिसी पर आधारित है। अगर आज हमारे पास एस.सी. एस.टी. के आंकड़े नहीं होते तो उनके लिये कोई कार्यक्रम हम लोग नहीं बना पाते।
सभापति जी, जिस प्रकार हमारे पास एस.टी. के लिये कई प्रकार के कार्यक्रम हैं और इसी संसदमें कुछ समय पहले हम ट्राईब्लस के लिए एक एक्ट लेकर आये थे। उस एक्ट से हमें वह ताकत मिली जब कि बहुत से लोग थे जो वाईल्डलाईफ लॉबी के नाम से थे, बार बार अपनी बात रख रहे थे लेकिनहम लोग आंकड़ों के दम पर इस बात को सामने ला पाये कि हमारे यहां इतने जनजातीय लोग हैं, इतनी उनके पास जमीनें हैं, इतनी जमीनों से वे वंचित हो गये हैं, प्रभाव और आंकड़ों के बल पर हम अपनी बात सामने रख पाये। आंकडों का सही रूप में सामने आना,जनसंख्या का सही दर्पण सही रूप में हमारे सामने आना, हमारे ख्याल से बहुत आवश्यक बात है। इसलिये मैं चाहूंगा कि सरकार संवेदनशीलता से इस पर जरूर विचार करे।
सभापति जी, मैं एक बात और आपके सामने रखना चाहता हूं कि 2011के सर्वेक्षण में आप इस बात को रख सकते हैं या नहीं रख सकते हैं, थोड़ा इस बात को सरकार ध्यान में रखकर सोचे। मैं जानता हूं कि और सर्वे आप कर सकते हैं। एक भावना यह है कि अगर हम सैंसेज के अंदर इस बात को गिन सकें तो शायद एक मेसेज संसद की तरफ से जायेगा कि राष्ट्र का जो महत्वपूर्ण कार्य होता है, उसमें हम अपनी जनसंख्या की एक तस्वीर बनाते हैं जिसकी हम डेमोग्रैफिक तस्वीर बनाते हैं, उस तस्वीर में कहीं न कहीं हमारी फोटो है। जब शादी होती है तो परिवार का हर आदमी चाहता है कि वह भी टेढ़ा होकर आये ताकि उसकी तस्वीर रहे।इसी प्रकार कई जातियां कह रही हैं कि मेरी गर्दन टेढ़ी है, उस तस्वीर में मेरी तस्वीर आ जाये। यह भावना केवल मुझे इस सदन में दिखाई दी है जिसका मैं समर्थन करता हूं।
सभापति जी, मैं अपनी बात को इससे आगे ले जाना चाहूंगा कि यहां सदन में बहुत से नेता बैठे हुये हैं, जो सब जातियों से संबंध रखते हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वे किसी जाति विशेष के नेता हैं लेकिन देश की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। जनसंख्या के आंकड़े आने के बाद हमें अगले कदम पर चलना है। एस.सी एस. टी के अंदर तमाम उपजातियां हैं। क्या हम उनके साथ न्याय कर रहे हैं? मैं मध्य प्रदेश में काम कर चुका हूं। यहां पर मध्य प्रदेश से एस.टी. के बहुत से सदस्य हैं। बहुत सी एस.टी. की जातियां इस बात को कहती हैं कि हमारी जाति को जो बैनिफिट्स दिये गये हैं, हम लोगों में से कुछ के बीच में चले गये हैं।मैं सब को बीच में बांटने की बात नहीं कर रहा हूं। जब हम न्याय देने की बात कर रहे हैं तो जातियों में सब से ज्यादा पिछड़ी जातियां हैं, उन्हें भी चिन्हित करके हमें उनकी मदद करने के लिये अगला कदम जरूर रखना चाहिये। अगर ओबीसी के अंदर भी ऐसी कम्युनिटियां आती हैं, मुझे मालूम है कि मुलायम सिंह जी, शरद यादव जी, लालू जी बैठे हुए हैं, वे मेरी बात से इत्तेफाक रखेंगे, लेकिन हमें भी इन अगले कदमों को उठाने के लिए एक संकल्प करना पड़ेगा।
महोदय, इसमें एक बात और है, मैं गृह मंत्री जी से बात करना चाहता हूं, शायद उनके माध्यम से रजिस्ट्रार जनरल साहब और उनके तमाम अधिकारियो से। बहुत से ऐसे टेब्ल्स और संख्याएं सेन्सस में हैं, जो हमें इतनी ज्यादा जानकारी देती हैं कि आगे चलकर हम सही रूप में इस देश की तस्वीर बना सकते हैं। आज स्वास्थ्य की बात होती है, स्वास्थ्य का सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा शिशु मृत्यु दर होता है। शायद किसी सांसद महोदय को न पता हो कि शिशु मृत्यु दर पता करने का सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा हमारा सेन्सस होता है। उसमें हम जातिवार शिशु मृत्यु दर भी पता कर सकते हैं, लेकिन क्योंकि हमारे रजिस्ट्रार जनरल का ऑफिस अपने आप में सशक्त नहीं है, पन्द्रह-पन्द्रह साल तक उन आंकड़ों को नहीं निकाल पाते हैं। मैं गृह मंत्री साहब से यह भी दरख्वास्त करूंगा कि न केवल हमें उनकी संख्या के बारे में जानने की आवश्यकता है, बल्कि हमें उनकी यथास्थिति के बारे में भी जानने की आवश्यकता है। हमें इसी सेन्सस से पता चलेगा कि उनके कितने बच्चे, यहां तक कि हमें उपजाति तक पता चल सकती है कि किस जाति के कितने बच्चे आज कॉलेज में हैं। किस जाति के कितने बच्चे स्नातक हो चुके हैं, किस जाति के कितने बच्चों के पास साईकिलें हैं, कितनों के पास बैंक एकाउन्ट्स हैं? सेन्सस हमें यहां तक सूचना देता है, लेकिन अगर वर्ष 1991 तक के टेबल आज तक नहीं छपे हैं तो हमें पॉलिसी में उसका क्या फायदा है?इसलिए मैं आपके माध्यम से, सदन के माध्यम से सरकार से कहूंगा कि अगर गृह मंत्री जी को, रजिस्ट्रार जनरल को और संसाधनों की जरूरत है तो उन्हें मदद करें। जब ये आंकड़े सामने आयें और आंकड़ों के साथ-साथ उस तस्वीर का हर पहलू पता चले, उनके चेहरे का जब हर रंग हमें पता चले, उस रंग को सुधारने के लिए, उस तस्वीर को और सुन्दर बनाने के लिए उन आंकड़ों का सही रूप में हर रूप हमारे सामने आये। जब तस्वीर सही सामने आयेगी तो नीति सही बनेगी और जब नीति सही बनेगी तो हम और आप सशक्त होंगे। हमें जिन लोगों ने संसद में भेजा है, उन्हें उस नीति के अंतर्गत न्याय मिले। महोदय, यही मेरा आपसे निवेदन था कि सेन्सस को सिर्फ यहीं ना छोड़ें। बहुत सी ऐसी जानकारियां हैं, दुर्भाग्य की बात यह हो जाती है कि सेन्सस खत्म होने के बाद एक आंकड़ा आता है, महामहिम राष्ट्रपति जी, जब अपनी कलम से दस्तखत करते हैं, उसके बाद अगले दिन अखबारों में आ जाता है कि हम115या 120 करोड़ हैं, थोड़ी बहुत चिन्ता हमारे घटते हुए लिंग अनुपात पर हो जाती है कि महिलाएं कम हो गयी हैं, कुछ बच्चों आदि पर चिंता हो जाती है और हम उससे आगे नहीं जा पाते हैं। हमें इसे आगे ले जाना है। इसमें केवल आरक्षण ही एक मुद्दा नहीं है, उसे तो मैं मानता हूं। जैसे मुंडे जी ने बड़े सशक्त रूप में अपनी वाणी से कहा कि आरक्षण लाने से, लोगों को अपनी जगह सरकारी नौकरियों में देने से हम देश की जनता में एक संदेश भेजते हैं कि जिस आजादी की लड़ाई के लिए हम लड़े थे, उस आजादी की लड़ाई के बाद जिस भारत का निर्माण हुआ है, उसके आगे विकास में हम सबकी भागीदारी है। यह तो एक महत्वपूर्ण संदेश जाता ही है, लेकिन विकास में भी हम सही रूप में इसका विश्लेषण करके नीति को उस तरीके से बना सकें।
महोदय, इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं। आखिरी में मैं अपनी तरफ से दो या तीन छोटी-छोटी दरख्वास्त करता हूं। महताब जी ने अपने बारे में दो-तीन बातें कही थीं। मैं यह भी कहूंगा कि जब भाषा का इसमें आकलन होता है, इसमें पूछा जाता है कि मुख्य रूप से आपकी मातृभाषा हिन्दी है, तमिल है या कन्नड़ है या कोई और है। हमारे यहां जो डाइलैट्स होते हैं, उनके बारे में आकलन नहीं हो पा रहा है। कुछ दिनों पहले मेरे काबिल मित्र महाबल जी ने भोजपुरी भाषा की बात की थी। हमें नहीं मालूम कि उस भाषा को बोलने वाले कितने लोग हैं। जहां मैं पैदा हुआ था, वहां हिन्दी की एक अवधी भाषा बोली जाती है, हमें आज भी नहीं मालूम है कि उस भाषा को बोलने वाले कितने लोग हैं। हम भी जानना चाहेंगे कि मेरे जैसी हिन्दी बोलने वाले देश में कितने लोग हैं, जो इस तरह की भाषा बोल पाते हैं? अगर हम उसकी भी सबकास्ट को गिन सकें, हमारे रिलीजन पर तमाम चीजों का किया गया है। आखिरी में मुझ जैसा व्यक्ति जो अपने आप को किसी भी एक धर्म का व्यक्ति नहीं मानता है, जो अपने आप को केवल नास्तिक मानता है, मेरे लिए भी उसमें एक कॉलम जरूर होना चाहिए। मैं इस दरख्वास्त से कि अगली बार जब एन्युमरेटर मेरे घर आयेगा और मुझसे पूछेगा कि आपका धर्म क्या है और मैं कहूंगा कि मेरा धर्म कोई नहीं है तो मुझे कोई नहीं धर्म लिखने की भी उस सेन्सस में जगह मिलनी चाहिए।
SHRI SAMEER BHUJBAL (NASHIK): Mr. Chairman, Sir, thank you very much. India’s national Census – it is 15th since the exercise began under the British Rule in 1872 – is under way to bring out a veritable wealth of statistics on different characteristics every 10 years. However, I wish to take this opportunity to raise certain basic issues of which, I am sure, the Government would take cognizance and issue necessary guidelines.
The refusal to include a question on caste in the Census makes no sense. Keeping caste out of Census does not mean we can wish it away.
More importantly, as long as the Government offers affirmative action for groups that are backward for historical reasons, it must gather as much information about them as possible. It also would help the policymakers in identifying more precisely just which groups are disadvantaged and to what extent. This is essential because policy can then deal with facts rather than impressions, as is the case now in the absence of any authoritative data. In fact, inclusion of ‘Caste’ in the census will help allocations to be made for OBCs and other marginalized groups.
Today, in the absence of a clear data on various castes and particularly OBCs, we are ‘suppressing the reality of the backward class percentage going up by not allowing a caste-based census that has not been carried out since 1931, to know the real number of the Other Backward Classes’. Consequently, OBCs are not getting their due share in terms of reservation, since their latest count is not available.
In this regard, I would like to mention that earlier the Member had said that there was a case in the Supreme Court, and there was a judgment passed. I would like to tell all the Members here, कि अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषद् एक सामाजिक संगठन है जो महात्मा फुले और अंबेडकर जी की नीतियों के आधार पर 15-20सालों से काम कर रहा है। इसी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल फाइल किया हुआ है। उसी के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिये हैं कि तीन हफ्ते में उनको रिप्लाई फाइल करना है जिसकी डेट कल है। इन्होंने कहा कि कुछ अलग केस के बारे में कहा होगा लेकिन अभी भी सुप्रीम कोर्ट में यह केस पैन्डिंग है। हमारा पीआईएल अभी भी वहाँ जारी है और कल वहाँ कोर्ट को गवर्नमैंट के लिए एफिडेविट फाइल करना है। मेरी सरकार से दर्ख्वास्त है कि यह एफिडैविट फाइल करते वक्त इस सदन में जिस तरह से मांग हुई है कि सैन्सस में ओबीसी की जनगणना होनी चाहिए, उस मांग की पूर्ति सरकार करे। यह बहुत ज़रूरी है कि ओबीसी का सैन्सस हो। आज जो बात हो रही है कि यह बहुत लेट हुआ है, ऐसा नहीं है। तीन-चार साल पहले भी समता परिषद् के माध्यम से इसी दिल्ली के रामलीला मैदान में हमारे नेता आदरणीय पवार साहब, लालू प्रसाद यादव जी, कांग्रेस के जायसवाल साहब, ये सब उस रैली में मौजूद थे और हमारे महाराष्ट्र के नेता छगन भुजबल जी भी मौजूद थे। उसी रैली में हमने मांग की थी कि जब भी आगे का सैन्सस होगा, उसमें ओबीसी का डाटा ज़रूर कलैक्ट किया जाए। लेकिन अभी तक हमारी वह मांग पूरी नहीं की गई। आज जब वक्त आया है तो कहते हैं कि अब देर हो गई है। मैं बहुत बहुत धन्यवाद करता हूँ हमारे मंत्री जी मोइली जी का। मैं उनको कहना चाहता हूँ कि आपने जिस तरह का स्टैन्ड लिया है, आपने और नारायणस्वामी जी ने, वायलार रवि जी ने, बहुत महत्वपूर्ण स्टैन्ड लिया है और मैं उनको बधाई देता हूँ कि आपने जिस तरह से ओबीसी के सैन्सस के लिए सपोर्ट किया है, और कांग्रेस के हाईकमान के समक्ष यह बात रखी, उसके लिए मैं आपका अभिनन्दन करता हूँ। मोइली जी ने जो कहा है, उस संबंध में मैं पढ़कर सुनाना चाहता हूँ।
“I had written to the Prime Minister six months back for it (caste-based Census)”, Mr. Moily said.
“After 1931, no caste-based data was prepared and the Centre also does not have any caste-based data of its own. Government depends upon States for it,” Mr. Moily said adding. “It is required for implementation of different schemes and employment programmes for the OBCs.” मंत्रिमंडल के एक सीनियर सदस्य का भी यह कहना है कि अगर कोई स्कीम्स लागू करनी हैं और उसके तहत कोई सुविधा उपलब्ध करनी है या फंड्ज़ एलोकेट करने हैं तो उसके लिए डाटा की आवश्यकता है। महोदय, मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि क्यों नहीं यह सच सामने लाया जाए? इस सच को छिपाने की क्या आवश्यकता है? जैसे सबने कहा कि जाति किसी से छिपकर रहने वाली नहीं है, जाति सबको मालूम है और यह सच हमें भी आज मालूम पड़ना चाहिए, आज पूरे देश में जनता और पिछड़ा वर्ग आस लगाए बैठा है। आज कम से कम इस पर चर्चा तो शुरू हुई।
इस चर्चा के उपरांत इसका फल उन्हें जरूर मिलेगा। 60साल से जो पिछड़ा वर्ग, आम आदमी है, कांग्रेस का आम आदमी है, जिनके लिए कांग्रेस काम करती है, उसमें भी ओबीसी शामिल है, जो उन्हें वोट देती है। आम आदमी की मदद करने के लिए डाटा कलेक्शन करने के बाद उन्हें जो सुविधा मिलने वाली है, फंड मिलने वाला है, कार्पोरेशन के माध्यम से उन्हें एजुकेशन और नौकरियों में जो सुविधा मिलेगी, उसके लिए डाटा कलेक्ट करने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट के अनेक डायरेक्शन अनेक विषयों पर आए हैं। महाराष्ट्र हाईकोर्ट, मद्रास हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट, अनेक हाईकोर्टों में अलग-अलग विषयों पर जब केसेस लड़े तो हर बार कोर्ट ने गवर्नमेंट या उनके वकीलों से पूछा कि क्या आपके पास डाटा है। हर बार गवर्नमेंट की तरफ से यही कहा गया कि हमारे पास डाटा नहीं है, इसलिए हम इस पर डिसीजन नहीं दे सकते। गवर्नमेंट को हर कोर्ट ने कहा है कि अब आने वाले सेंसस में या किसी अलग तरह से इनका डाटा कलेक्ट करने के लिए आप सुविधा करें, लेकिन आज तक किसी ने इस काम को नहीं किया है।
In the Fifteenth Report of the Standing Commission on Social Justice and Empowerment in the year 2005-06 on National Backward Classes Finance and Development Corporation, the Committee observed:
“The Committee, therefore, strongly recommend that the Ministry should vigorously pursue with the Registrar General of India to conduct a survey of the OBCs and the persons living below double the poverty line in this category so that the Ministry could prepare its Action Plan, so that the required amount of funds can be made available to the State Governments for effective implementation of the NBCFDC’s various schemes for the development of the backward classes.” अलग कमिशन, मंडल कमिशन, काका कालेलकर कमिशन, लोक सभा की कमेटी की रिपोर्ट के बावजूद आज तक इस पर किसी ने विचार नहीं किया।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से इतना ही कहना चाहूंगा कि इसमें ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है, कहा गया है कि यह बहुत लेट हुआ है।
There is only a minimum change, which is required be done. It is not a very difficult matter to collect the caste details in the Census operations. As a matter of fact, the necessary columns are already there; and no structural alterations are required in the forms and schedules. For example, in the 2001 Census operations, in the household schedule of the social demographic study of villages, column 2.2, Section 2: general characteristics of the household reads:
“To which caste/community does the head of the household belong.
Name..........
(Register Code in case of SC/ST)” Here, after ‘Register Code in case of SC/ST’ we may add the word ‘/OBC’. This is the only thing, the Ministry has to do, the Government has to do. Let the truth come out in front of the country as to what is the number of people living under the OBC category. This is the only request from my side.
With these few words, I conclude my speech.
SHRI ANAND PRAKASH PARANJPE (KALYAN): Thank you very much, Mr. Chairman, Sir, for giving me this opportunity to take part in an important topic, the Census, 2011.
Many hon. Members who have spoken before, have elaborately spoken about the Census, viz., how it would be conducted, in what phase it would be there, how much money would be spent on it. To conduct a Census is really a huge and gigantic task, which the Government is going to perform.
Census, 2011 has already started from the 1st of April, 2010. The first Census was conducted in 1872 and the last Census was conducted in 2001. I remember, as a youngster, as to how the person had come to collect the information regarding Census, the question he asked and the manner in which the form was filled. A questionnaire is prepared for collecting the information. Nearly 35 parameters have been short-listed. All the data, which is going to be collected, is given to the local Tehsildar.
When I went through all the 35 parameters, I found out that in one column the caste column was there. Against the caste column, it was mentioned, ‘SC/ST and others’. Nobody in the House will deny that a caste system is prevalent in India.मुझे याद है, जब से स्कूल लीविंग सर्टीफिकेट मिला है, उसमें हम देखते हैं कि कास्ट और रिलीजन लिखा हुआ रहता है। इसलिए संसद में मौजूद सारे सदस्य इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर, भारत में अनेक प्रथाएं आज भी मौजूद हैं। जब मैं 10वीं का अपना स्कूल लीविंग सर्टीफिकेट देखता हूं, तो मैं आज भी पाता हूं कि उसमें हिन्दू और ब्राह्मण शब्द लिखे हुए हैं। इसलिए हम शिव सेना पार्टी की ओर से मांग करते हैं कि ओ.बी.सी. का डाटा भी इस सैंसस के दौरान कलैक्ट किया जाना चाहिए। ओ.बी.सी. वह वर्ग है, जिसे सरकार की ओर से जितनी मदद मिलनी चाहिए, उतनी मदद आज भी नहीं मिल पा रही है।
सभापति महोदय, मैं दूसरी बात महाराष्ट्र के बारे में कहना चाहता हूं कि वहां एक क्षेत्र में सैंसस का काम शुरू हुआ है, वहां प्राइमरी टीचर्स को इस काम के लिए लगाया गया है। यदि मैं अपने खुद के संसदीय क्षेत्र कल्याण की बात कहूं, तो जो डेटा कलैक्शन का काम चालू है, वह ठीक ढंग से नहीं किया जा रहा है। यही प्राइमरी टीचर्स थे या टीचिंग स्टाफ था, जिसने मतदान सूचियां बनाई थीं, वे ठीक प्रकार से नहीं बनाई थीं। मेरे मुम्बई के जो मित्र हैं, वे इस बात को जानते हैं कि 30-30 और40-40परसेंट नाम उनमें डुप्लीकेट थे। इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि मतदान सूचियां भी ठीक ढंग से नहीं बनाई गई थीं। इसलिए मेरे मन में आशंका है कि सैंसस 2011का डेटा कलैक्शन का जो काम चालू है, क्या उससे हमें सही डेटा मिलने वाला है? आज इस काम पर सरकार करीब सात हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। तकरीबन60रुपए प्रति व्यक्ति इस सैंसस के लिए खर्च किए जा रहे हैं। मेरी आपके माध्यम से विनती है कि जब माननीय मंत्री जी जवाब दें, तो सदन को आश्वस्त करें कि सैंसस2011का जो डेटा कलैक्शन किया जा रहा है वह सही होगा।
महोदय, मैं तीसरी बात खासकर मुम्बई, थाणा, रायगढ़ और नवीं मुम्बई के बारे में कहना चाहता हूं कि वहां बांग्लादेशी इम्मीग्रेंट की संख्या बहुत है। इसलिए मेरे मन में यह आशंका है कि जो नैशनल पापुलेशन रजिस्टर बनाने वाले हैं, उसमें उनका एनरोलमेंट कैसे रोकेंगे? मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से यही दरख्वास्त करना चाहता हूं कि वे सदन को आश्वस्त करें कि इल्लीगल बांग्लादेशी, पाकिस्तानी और नेपाली, जो इस भारत देश के नागरिक नहीं हैं, उनका किसी भी तरह से नैशनल पापुलेशन रजिस्टर में एनरोलमेंट नहीं होना चाहिए। मैं एक बार पुनः शिव सेना की तरफ से दोहराना चाहूंगा कि ओ.बी.सी. का डेटा कलैक्ट होना चाहिए। यह मांग मैं पुनश्च करता हूं। मुझे आपने बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री नामा नागेश्वर राव (खम्माम): चेयरमैन सर, जनगणना 2011 हो रही है। सैंसस बहुत इम्पौर्टेंट इश्यू है। ब्रिटिश टाइम में वर्ष1931 में ओ.बी.सी. की सैंसस की काउंटिंग हुई है। हम लोगों के इंडीपेंडेंट होने के बाद से आज तक ओ.बी.सी. की सैंसस नहीं हुई है। लॉ मिनिस्टर ने, रीसेंटली, महिला विधेयक के ऊपर बोलते हुए कहा था कि 1931 के बाद से ओ.बी.सी. की सैंसस नहीं हुई है, इसलिए हमारे पास ओ.बी.सी. की संख्या के सही डिटेल्स नहीं हैं। अतः महिला रिजर्वेशन में ओ.बी.सी. का रिप्रजेंटेशन अभी सही तरीके से नहीं हो पा रहा है, लेकिन उन्होंने सदन को एश्योर किया कि आगे आने वाले समय में वे इस विषय में जरूर कुछ करेंगे, लेकिन वही मिनिस्टर बाहर कास्ट-वाइज डिटेल लेने को अपोज कर रहे हैं। एक मिनिस्टर एक ही मुंह से दो तरह की बात बोल रहे हैं। सदन में कुछ बोलते हैं और बाहर कुछ और बोल रहे हैं। राज्य सभा में महिला बिल के टाइम में उन मिनिस्टर साहब ने खुद बोला है, लेकिन वही मिनिस्टर सदन के बाहर दूसरी बात बोल रहे हैं।इस तरह से नहीं होना चाहिए। हम लोग गवर्नमेंट से यही डिमांड कर रहे हैं क्योंकि सेन्सस बहुत इंपोर्टेंट है। इसमें सबकी डिटेल्स होनी चाहिए।National population register is very important. आने वाले टाइम में कोई भी डेवलपमेंट एक्टिविटी लेने के लिए, जब तक ओबीसी की डिटेल्स नहीं रहेगी, तब तक उन लोगों के साथ न्याय नहीं होगा। इसलिए उसमें ओबीसी की डिटेल्स जरूर होनी चाहिए।इस संबध में हमारे नेता चंद्र बाबू नायडू जी ने आलरेडी प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा है। जब तेलगूदेशम पार्टी स्टार्ट की गयी थी, तब हमारे फाउंडर एन. टी. रामाराव साहब ने ओबीसी को लेकर विदआउट रिजर्वेशन, ...( व्यवधान) वी हैव गिवेन टिकट्स और वह ओबीसी को काफी आगे लेकर आए हैं।हम लोग गवर्नमेंट से डिमांड कर रहे हैं कि सेन्सस में ओबीसी की पूरी डिटेल्स लेनी चाहिए।उसके साथ जो लोग रेलवे स्टेशंस में हैं, प्लेटफार्म्स में हैं और जो बैगर्स हैं, इन सबका सिटीजन आफ दि इंडिया के पापुलेशन रजिस्टर में नाम होना चाहिए।इसी तरह से जो इल्लीगल माइग्रेंट हैं, उनको खास तौर से अवाइड करना चाहिए और उनको आइडेंटीफाई करना चाहिए। उनको इंडिया से वापस भेजना चाहिए। इस काम को करने की जिम्मेदारी गवर्नमेंट की है।हम लोग यही चाहते हैं कि आगे डेवलपमेंट लेने के लिए, बजट एलोकेशन लेने के लिए, कंट्री के डेवलपमेंट के लिए सेन्सस बहुत इंपोर्टेंट है। इसमें आप ओबीसी की डिटेल्स जरूर लें। इसके साथ-साथ हम लोगों की मांग यही है कि आज जो डेवलपमेंट की एक्टिविटीज होती हैं, ओबीसी का हमारे यहां जितना भी पर्सेंटेज है, उतना पर्सेंटेज उन लोगों का हक है। उतना शेयर उन लोगों को देना चाहिए।
महोदय, सेन्सस का फार्मेट दिया गया है, उसके संदर्भ में माननीय सदस्य ने सजेशन्स दिए हैं और हमारा भी इस बारे में एक सजेशन है। इसमें हेल्थ या मेडिकल फैसिलिटी के बारे में कुछ नहीं लिखा है। उसमें इसके बारे में एक कॉलम तैयार करते हुए और ओबीसी की डिटेल्स लेते हुए सेन्सस होना चाहिए। गवर्नमेंट को ये चेन्ज करना चाहिए। अगर चेन्ज नहीं हो पाता है, तो आगे आने वाले दिनों में बहुत दिक्कत हो जाएगी।यह बहुत इंपोर्टेंट फैक्टर है।
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, there are still 30 names of hon. Members with me who want to speak. I request all of them to confine their speeches to five minutes each. Otherwise, it will be very difficult to accommodate all of them. Moreover, we are also having a number of other business. Four official Bills have to be passed. If some hon. Members want to lay their speeches on the Table of the House, they can do so.
Now, hon. Member, Shri Gurudas Dasgupta-ji.
SHRI H.D. DEVEGOWDA (HASSAN): Mr. Chairman, on behalf of my Party, I want to speak for five minutes.
MR. CHAIRMAN: All right, Sir. After Shri Gurudas-ji.
SHRI GURUDAS DASGUPTA (GHATAL): Mr. Chairman, I join unhesitatingly the unanimity of the House that the identification of a person should be on the basis of social status, that is, caste. I agree with it totally.
The fact of the matter is that the Scheduled Castes, Scheduled Tribes, OBCs, and Muslims are subjected to social atrocity all over the country and nobody can deny it. We have not been able to break poverty; nor have we been able to bring about economic empowerment of the people. It is a reality that the most poor people of this country belong to this section. Who are the most poor people? They are the Dalits, they are the Adivasis, the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes, the Muslims and the Tribals. If it is so, then what is wrong in identifying them on the basis of their own identification status, that is, caste?
I do not say that caste will bring about the division of the country. It is not possible because despite the caste system, India has existed, despite the caste system, the national unity has not been impaired.
It is a long history, not of today but of the past and days immemorial. Today there is a statement by the hon. Minister that the census system cannot be changed. Today there is a statement by the hon. Minister that the census system cannot be changed because it has already started. We have got the news, right or wrong, that the Cabinet is divided. It is not for me to substantiate. There are Members of the Cabinet who say that if it is done on the basis of caste it will divide the nation. Can you wish away the caste? क्या आप कास्ट सिस्टम को बर्बाद करना चाहते हैं? Is it possible? There is caste. Therefore, the point is, if there is a caste, let us do our bit and bring about a situation when we are able to bring India economically empowered on the basis of the salvation of the caste.
I wish that the Government does not take a narrow view and the Government takes a broad view and if the Government takes a broad view and accepts the unanimity of the House, then there will be a democratic sense prevailing in the Government.
Therefore, I do not want to go into any jargon, any politics, anything at all. The social system is based on caste system. Therefore, it should be taken into account while the census is done. This is my submission in unity with the cross-section of the opinion that has been reflected in the House. मैं पूरे हाउस से सहमत हूं कि सैन्सस करना चाहिए, कास्ट के हिसाब से होना चाहिए।
SHRI H.D. DEVEGOWDA (HASSAN): Mr. Chairman, Sir, I would like to draw the attention of the House to some points. Some of our Members from the Treasury Benches mentioned about the Havanur Commission’s recommendations. In that period as Leader of the Opposition in Karnataka I moved a resolution. I will read resolution :
“Recommending to the Government of India to conduct caste-wise census of the people of the country.” This is the resolution which I have moved in 1974 as the Leader of the Opposition. I do not want to go into the details of all the figures that he has quoted which I have quoted in my speech.
How many Governors belong to the upper castes? How many Chief Ministers belong to those castes? I have got all these figures here. I do not want to elaborate and take much time of the House. I would like to draw attention of the House to only one point.
Late Shri Rajiv Gandhi wanted to give constitutional teeth to the Panchayati Raj and the Nagarpalikas and the Local Bodies and to these institutions. But he was unable to get two-third majority and the legislations were defeated. During the time of late Shri P.V. Narasimha Rao the 73rd and 74th constitutional amendments were brought and they were adopted, passed by both the Houses. But before passing these two amendments, I was also included in one of the Joint Parliamentary Committees and in that Joint Parliamentary Committee we were unable to come to a unanimous decision so far as the backward classes are concerned. It was because of the recommendations made by Dr. Kaka Kalelkar and various other State-level Backward Class Commissions. There, there were differences among the Members in the Joint Parliamentary Committee as there was no details about the caste.
Then we took a decision in the Committee that the reservation, so far as the backward classes are concerned, can be left to the States so far as reserving the constituencies for the castes which were carved so far as the Panchayat Raj system was concerned.
Sir, the only problem at that time was that we did not have Census figures. That was the reason for which we were unable to come to a unanimous decision so far as Joint Parliamentary Committee was concerned. Subsequently, in Karnataka, we have taken certain decisions. As the seniormost leader Shri Gurudas Dasgupta has said, we have taken the decision in Karnataka about dalit Christians and minorities. Shri Moily is also here. He knows that Karnataka has formulated it. Of course, we cannot overrule the decision of the Supreme Court and we cannot exceed reservation for the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and Other Backward Classes beyond 50 per cent. So, we have categorised them. I would like to read that reservation list, which is within the ambit of the decision of the Supreme Court. It is general merit – 50 per cent; Scheduled Caste – 15 per cent; Scheduled Tribe – 3 per cent; Category I – 4 per cent; Category IIA – 15 per cent; and Category IIB – 4 per cent which is exclusively for Muslims. Since Muslim population in Karnataka is hardly 10 per cent, we created a separate compartment and gave 4 per cent reservation to them in 1995. Category IIIA belongs to my own community, which is given 4 per cent reservation. There is not only Vokkaliga community, but 23 other communities also clubbed in it, and Lingayats are given 5 per cent reservation. I do not want to go into all these details of the exercise we made.
When the Deputy Leader of the BJP was speaking, I was hearing. So far as the decision of the Supreme Court limiting the reservation to 50 per cent is concerned, it is very difficult to accommodate all these communities. There are various communities I know of and I can quote the number of communities which we have dealt with in the Havanur Commission on Backward Classes. He had gone very extensively into it, much more than all the previous Commissions. The Havanur Commission made a very deep study of that. He is no more now. That is why, this House may have to take a decision reversing the decision of the Supreme Court which limits the reservation. The House in its wisdom can allow it to exceed more than 50 per cent. Otherwise, we are not going to do justice to those neglected communities. Unless and until, as he said, poverty is eradicated, social disparity or injustice will continue. As long as we allow this injustice to continue, we cannot provide what is called peace and harmony in the society. This is my honest opinion. You can deliberate more on this and have more discussion on this. Peace and harmony comes only when we completely eradicate poverty and there is 100 per cent literacy. Only then, it can be achieved; otherwise we cannot achieve it.
Sir, I wholeheartedly support the leaders. We have done everything for them, including the Muslims and the women. Shri Moily is here. We have given 33 per cent reservation to women. From primary education to university education, 50 per cent of all the teaching posts are reserved for women, whether it is the post of Professor, Assistant Professor or ordinary teacher. We are all talking of women empowerment today. There is 33 per cent reservation in all posts. Article 15(4)… (Interruptions) Yes, it is there in Karnataka. There is nothing new in it.
Our seniormost leader, Dr. Kalaignar had once said that he would have to adopt Karnataka model. I know that. I am telling this because Karnataka has shown that and tried to bring it within the purview of 50 per cent ceiling of reservation, especially the reservation for women. Not only that, the posts of Chairperson are also reserved for them. The post of Chairperson or Chairman or Deputy Chairman in Zila Panchayat, Taluka Panchayat, Gram Panchayat and Nagar Palika rotation basis goes to backward classes, the Scheduled Caste, the Scheduled Tribe and then the so-called general category. All these things are going on for the last 15 years. More than 8,000 and odd engineers of the Muslim community are qualified and they are working in various countries and nearly 1,400 doctors are there so far as the Muslim community is concerned. I am only giving a couple of information to this august House, namely, as to what benefit has been given to the Muslim minority in Karnataka in the last 15 years. It is more than 8,000 engineers and nearly 1,400 doctors.
I would like to express my sincere thanks to you for allowing me some time, on behalf of my Party, to express my views.
MR. CHAIRMAN: Thank you.
श्री मुलायम सिंह यादव : महोदय, मैं सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं। महिलाओं के लिए इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में अगर 50 फीसदी आरक्षण कर दिया जाए तो बड़ी कृपा होगी।
MR. CHAIRMAN: All right, please sit down.
… (Interruptions)
श्री लालू प्रसाद (सारण): महोदय, मेरा नाम नहीं बुलाया गया।...( व्यवधान)
सभापति महोदय : आपने नाम नहीं दिया है। आप वरिष्ठ नेता हैं।
…( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: You are a senior Member, and I should not tell you anything.
… (Interruptions)
सभापति महोदय : ठीक है, आप बोलेंगे, लेकिन आपकी पार्टी की ओर से कुछ आना चाहिए।
…( व्यवधान)
श्रीमती परमजीत कौर गुलशन(फ़रीदकोट): लालू जी, बड़ी मुश्किल से हमारी बारी आती है, हमें बोलने दीजिए।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please sit down.
… (Interruptions)
*SHRIMATI PARAMJIT KAUR GULSHAN (FARIDKOT) : Thank you, Chairman sir for giving me the opportunity to speak on “ need to lay down specific parameters for conducting Census, 2011. We are discussing an important subject today. It has national importance. The data and statistics that are collected during the Census exercise are very important in nature.
However, sir, in this august House, I want to place on record an important point that has been left untouched by other Hon. Members. Sir, I am basically a teacher. I can feel the agony and concerns of the teaching community.
Sir, Census is an important exercise. However, the teachers and students – the future of our country, are also associated with the exercise of Census. At least 90% school teachers are roped in this exercise by the Government. As a result, teaching has taken a back seat. Admissions have been put on hold. This whole exercise is taking its toll on teachers and students. In Punjab, more than 37,000 teachers of Government schools are involved in this gargantuan task. In the rural areas, many schools have only one teacher. These schools have been forced to shut down. The teachers as well as students are having a hard time due to the Census exercise.
Sir, many a time, we compare the result of private schools with Government schools. However, teachers of private schools are never roped in to perform any duty during the Census exercise. On the other hand, the teachers of Government schools have to perform many tasks during elections or Census exercise. These teachers have to even perform tasks like killing rodents and rats in their respective areas. Naturally, teaching is the casualty and students suffer.
Sir, in fact, the poor people are adversely affected due to this policy of the Government. We all know that mostly, students from poor families study in Government schools. They afford to study in affluent private schools. This is sheer injustice perpetrated on the poor students. Hon. HRD Minister has started the semester system in schools. The first semester will begin from September. The school teachers will be busy in performing Census duties in May and June. Teaching is bound to be the casualty as a result of this onerous exercise.
Sir, I have a suggestion. The Government should explore some alternatives so that teaching does not suffer. Why not rope in the educated unemployed youths in this exercise. Each unemployed youth involved in this exercise can be given Rs.5500/- as honorarium. Thus, the Government will be able to provide help to the educated unemployed youths of this country. We cannot expect the teachers to teach as well as deliver the goods on the Census front. This is a grave injustice against these hapless teachers. They are already overburdened. So, I appeal to the Government to involve educated unemployed youths in this exercise.
Sir, the enumeration of data in 1931 Census had taken place on the basis of caste. I wholeheartedly support the demand made by many Hon. Members that caste-based Census enumeration should be allowed. Only then can a clear picture emerge. We will come to know about the real percentage of population belonging to OBCs and other categories.
Sir, Rai Sikhs reside not only in Punjab but throughout the country. In Punjab, facilities and concessions have been provided to the Rai Sikhs. However, no other state in India has done so. Hence, I appeal to the Government to enumerate Rai Sikhs separately during the on-going Census exercise. They should be granted SC status.
Sir, I am sorry to say that there is no column seeking health-related information in the Census enumeration – form. This is an area of vital importance that is being ignored. This error should be rectified. Health related information will help the Government chalk out specific programmes of health-care for the needy. We ought to know how many people in the country are able-bodied, how many are chronically ill and how many are handicapped. It will help the Government formulate better programmes for those who require them. Also, language and dialect related information should also be collected. The current format of Census does not have this column.
Who is a genuine Indian citizen and who is not -- how will we cull this information? The current format of Census data collection is silent on this issue. Hence, it is flawed. We all know that millions of illegal Bangladeshi migrants are residing in this country. People from Nepal also reside in this country. Infiltration from Pakistan goes on unabated. For instance, I recently visited Dharamshala. I asked a shopkeeper whether he was an Indian. To my surprise, he replied in the negative and emphasized that he was a Tibetan. The names of such people should not be registered as Indian citizens. Such people should not get multi-purpose I-cards. Terrorists can misuse such I-cards.
Sir, when the Census exercise takes place in villages, it is generally seen that the enumerators only visit the house of the village headman. They do not visit the hutments of poor people. All information is collected from the village headman. So, the real picture that emerges is either incomplete or faulty. Until and unless the data collected in regard to SCs STs and OBCs is complete, the Government cannot frame policies for their welfare. Neither can these policies be implemented properly in the absence of correct information.
17.00 hrs. MR. CHAIRMAN : Please conclude. Many other Hon. Members have yet to speak.
SHRIMATI PARAMJIT KAUR GULSHAN : Sir, there is another discrepancy regarding collection of data pertaining to the Sikhs. Only turbaned Sikhs are placed in the category of Sikhs. The non-turbaned or ‘Sehajdhari’ Sikhs are not included in this category. In Delhi, the member of Sikhs shown in the Census is far less than the actual figures. Who will correct these discrepancies? So, I appeal to the Government to rectify this error.
The enumerators do not have any mechanism to verify the information provided by the respondents. Claims must be verified.
श्री लालू प्रसाद (सारण): सभापति जी, पिछड़े वर्गों, एससीएसटी और मुस्लिम की जो जनगणना हो रही है, यह विषय सबसे पहले माननीय मुलायम सिंह यादव ने उठाया था। मुझे खुशी है कि सभी दलों की इस बारे में सहमति है जो भाषणों से साफ दिखाई दे रही है। हम सरकार को सुझाव देना चाहते हैं कि गांव-गांव में, पार्टियों के बीच युद्ध मत करवाइये। मैं जानता हूं कि आप क्या जवाब देंगें। जिन लोगों ने मंडल कमीशन को नकारा था, जो ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ था, उसे लोगों ने देखा था। कांग्रेस पार्टी सत्ता में है, इसलिए जनता की भावना को समझिये। कई अवसरों पर कहा गया है कि बीपीएल फिगर्स सही नहीं हैं, हायर-एजुकेशन में पिछड़े वर्गों को कितना प्रतिशत दिया जाए, फिगर्स नहीं है। सन् 1931 के बाद 80 साल हो गये हैं। अंग्रेजी सरकार ने इस देश पर शासन किया और उसने जनगणना करवाई थी, गजेटियर भी है, जातियों का वर्णन भी है। सारे कलेक्ट्रेट में, देश भर के गजेटियर में आप देखेंगे कि हर जाति के रूप, रंग और उसके चरित्र के विषय में भी लिखा है। जो जमीन की रजिस्ट्री होती है, उसमें भी कास्ट लिखी होती है और कास्ट सर्टिफिकेट आप देते हैं। कितना पिछड़े वर्गों को मिला, नहीं मिला।
17.04 hrs. (Dr. Girija Vyas in the Chair) माननीय शरद जी ने जो सवाल उठाया था कि क्लास(1) की सर्विस में गोल-गोल लड्डू जो उसमें है, वह आज बहस की बात नहीं है। आज सीधा और सरल सवाल है कि आप कास्ट के आधार पर जनगणना करवाना चाहते हैं या नहीं। वर्ष 1931 के बाद एससीएसटी की जनसंख्या बढ़ी है। पिछड़े वर्गों की जनसंख्या बढ़ी है, मुसलमान भाइयों की क्या, सभी जातियों के लोगों की संख्या बढ़ी है। अगर ब्राह्मण है, तो ब्रेकेट में हिंदू ब्राह्मण लिखें। ठाकुर हैं, तो आप साथ में लिखिए, पिछड़ा वर्ग हैं तो ब्रेकेट में सबकास्ट लिखिए। इसमें अगर कोई पार्टी बहानेबाजी करती है कि अब तो जनगणना शुरू हो गई है, तो मैं कहना चाहता हूं कि कहीं भी जनगणना शुरू नहीं हुई है। अभी फार्म भी नहीं छपे हैं। अगर फार्म छप भी गए हैं, तो उन्हें फाड़ दीजिए। अभी तैयारी हो रही है कि जनगणना शुरू की जाएगी।2011में जनगणना शुरू होगी। श्री पुनिया जी को बोलने का अवसर नहीं मिला। हम किसी जाति से नफरत नहीं करते हैं, लेकिन आपको पिछड़े वर्गों की गिनती जरूर करनी चाहिए। जब जनगणना होगी, तब एससी और एसटी की संख्या सरकार में भी बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और सरकार के स्तर पर भी, मैं श्री महताब को, मुंडे जी को भी धन्यवाद देता हूं कि आपने भारतीय जनता पार्टी के कलंक को आज धोने का काम किया है। आप पिछड़े वर्ग से हो, इस सच्चाई को आपने स्वीकार किया है। जब हम मंडल की लड़ाई लड़ रहे थे, तब शरद भाई की जुबान में लोग कमंडल ले कर घूम रहे थे। मैं सीपीएम और सीपीआई को धन्यवाद देता हूं, जब मंडल कमीशन की बात देश में आई, तो क्लास स्ट्रगल पर विश्वास करने वाली लेफ्ट पार्टी और स्वर्गीय कामरेड ज्योति बाबू ने कहा कि नहीं कास्ट भी है, कास्ट को इस देश में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए आप लाल कपड़ा देख कर मत भड़किए। जैसे हम विदेशों में देखते हैं, कोई व्यक्ति लाल कपड़ा निकालता है और सांड भड़क जाता है। भड़कना और बहानेबाजी नहीं चलेगी। आप सबकी गिनती कीजिए और जाति लिखिए। मंडल कमीशन लागू भी हुआ, तो उसे कतर दिया गया। लोगों को कुछ नहीं मिला। आप जो पालिसी बनाते हैं, बजट बनाते हैं, लोग बहुत संख्या में नक्सली बन रहे हैं। पेपर ग्रुप वार में जा रहे हैं कि बात करेंगे, बात करेंगे। आप क्या बात करेंगे?आप गिनती कीजिए और गिनती करने के बाद लोगों को मालूम हो जाएगा कि हमारी यह संख्या है। मैं तमाम पिछड़े वर्गों से, एससी, एसटी लोगों से सदन के माध्यम से अपील करना चाहते हैं, जब महात्मा बुद्ध भगवान हुए, बोधगया में जब एन्लाइटमेंट हुआ, तब उन्होंने दो ही संदेश दिए थे। बुद्धम् शरणम गच्छामि, संघम् शरणम गच्छामि। बुद्धिमान बनो, चतुर बनो। इसी बात को बाबा ज्योतिबा फूले, बाबा अम्बेडकर ने देश भर के दलित भाइयों को ललकारा था - जागो, पढ़ो-लिखो, अधिकारों के लिए संघर्ष करो। एकता को मजबूत करो। पिछड़े दलित मुसलमानों के सेंसस शरणम् गच्छामि। तभी वहीं से पावर मिलेगी। इस काम को आपको करना पड़ेगा।...( व्यवधान) क्या हमसे ज्यादा धर्म का पालन करने वाले आप लोग हैं? ग्रंथ में लिखा है कि हे यादव, हे माधव।
मुंडे जी ने कहा कि अगर पुनर्जन्म होगा तो होगा। कृष्ण भगवान ने अर्जुन से कहा-तुम डरपोक हो, मौत से डर रहे हो, आदमी मरता नहीं है - न जन्म लेता न मरता है, आत्मा को अग्नि नहीं जला सकती, हवा काट नहीं सकती, सिर्फ केंचुली बदल जाती है। आपका पुनर्जन्म जरूर होगा और हम प्रार्थना करते हैं कि बिहार में यादव बिरादरी में हो।...( व्यवधान) सरकार को नेक सलाह है, सामी जी और लॉ मिनिस्टर साहब अच्छे आदमी हैं। He belongs to the Most Backward Community. We have full faith on you. When you reply, today or tomorrow, you accept and announce that on the basis of caste, the Backward Classes and Minorities, census would take place. अगर जनगणना का अधिकारी सरकार का व्यू नहीं मानता तो उसे बाहर कीजिए। आप जब कल जवाब दें तो ठोक बजा कर जवाब दें। हम टकराव नहीं चाहते, हम टकराव को टालना चाहते हैं।...( व्यवधान) बहुमत का सामर्थ्य है। एक तरफ सुपरमेसी ऑफ दि पार्लियामेंट है और प्रसाद साहब ने भी कहा था कि आपके पास फिगर नहीं है, कैसे करोगे?ऐसी कोई बहानेबाजी नहीं होनी चाहिए। कान खड़े नहीं करने चाहिए कि हम क्यों बोल रहे हैं। घबराइए नहीं, हमारे पास कास्ट की फिगर होनी चाहिए। आप बकरी, भैंस, बिछावन, पक्षी, बाघ, सियार, बेडशीट, तोता और मोर की जनगणना कर रहे हैं। आज जो देश में मोर की तरह गरीब लोग हैं, उनकी भी काउंटिंग कीजिए, हमारा यही सुझाव है। जो लोग ऐसा घटिया तर्क देते हैं कि इसे जातपात फैल जाएगी, ऐसा नहीं है। जाति यथार्थ है, रिएलिटी है। बहुत से लोग बोल रहे हैं कि जाति तोड़ो, जाति छोड़ो। जाति चलती है और हम भी इसके पक्षधर हैं कि जाति टूटती नहीं है। यह तोड़ने से कहां टूटती है, और जो टूट जाती है उस जाति को आप रिकोग्नाइज नहीं करते। इसलिए मेरा सुझाव है कि इस देश में जो पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग है, उनके लिए सरकारी सेवाओं में एक अलग कम्पार्टमेंट बना दें ताकि उनको लाभ मिले। हम सामी जी से कहना चाहते हैं कि जब जवाब दें तो उल्टा-पुलटा सुझाव मत दें। आप इस पर जवाब दें यही हमारी मांग है।
सभापति महोदया : बेनी प्रसाद वर्मा जी।
श्री मुलायम सिंह यादव : बेनी जी, हमने तो आपको पहचाना ही नहीं।
श्री बेनी प्रसाद वर्मा (गोंडा): किसी चीज पर किसी का एकाधिकार नहीं है।
सभापति महोदया : आप चेयर को संबोधित करते हुए भाषण शुरू करें।
श्री बेनी प्रसाद वर्मा : महोदया, मैं इनको समझा रहा हूं, ये हमारे पुराने दोस्त हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : टाई कहां है?
श्री बेनी प्रसाद वर्मा: आपको इस जन्म में तो नसीब नहीं होगी। टाई इस सूट पर नहीं लगाई जाती है। हम टाई लगाकर भी आएंगे। ...( व्यवधान)
श्री बेनी प्रसाद वर्मा : महोदया, आपने मुझे नियम193 नियम के अधीन बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। जाति हीन समाज होना चाहिए, हम जाति तोड़ के पक्षधर हैं। समाजवादी विचारधारा से हम से राजनीति में आए हैं। लेकिन क्या हमारा समाज आजादी के इतने वर्षों बाद जातिविहीन हो पाया है? पिछड़े वर्गों को आरक्षण क्यों, दलितों को आरक्षण क्यों, अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की मांग क्यों उठी है? सच्चर कमेटी की पक्षधर कांग्रेस पार्टी भी रही है। लेकिन फैसला कैसे होगा? कम से कम राष्ट्रीय महत्व के किसी भी मुद्दे पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर न तो सरकार को कोई निर्णय लेना चाहिए और न सदन के किसी सदस्य को अपनी राय देनी चाहिए। अगर जनगणना की जाती है और सिर्फ इसलिए की जाती है कि हमारे देश की कितनी आबादी है, उसका क्या मतलब है? समाज में क्या संदेश जायेगा?दलितों की कितनी आबादी है, यह कैसे मालूम होगा?अल्पसंख्यक कितने हैं, कैसे मालूम होगा? मुलायम सिंह जी और हम कितने हैं, कैसे मालूम होगा? पिछड़े वर्गों को 27 परसैन्ट आरक्षण क्यों और दलितों को 22.5परसैन्ट ही क्यों दिया जाए? मुसलमानों को 15 फीसदी आरक्षण क्यों दिया जाए? सरकार इसका क्या जवाब देगी? देश क्या जवाब देगा? 1931के बाद हमारे पास कोई आंकड़े नहीं हैं। 1931 के बाद देश भी बंट गया। कितने अगड़े पाकिस्तान गये, कितने पिछड़े बंग्लादेश गये, कितने हिन्दू वहां रह गये, कितने मुसलमान यहां रह गये, क्या इनका कोई आंकड़ा है?नहीं है। मैं किसी के साथ द्वेष की भावना से कहने नहीं जा रहा हूं। जो भी जाति के आधार पर जनगणना का विरोधी है, निष्पक्षता का विरोधी है, हम उसे विरोधी मानते हैं। सरकार कैसे निर्णय लेगी, सदन में कैसे बहस होगी? देश में विद्रोह पनपेगा। विद्रोह का ही परिणाम है कि लालू जी और मुलायम सिंह जी मुख्य मंत्री और नेता बने। उनका नाम हम नहीं लेंगे, लेकिन मायावती जी विद्रोह की प्रतीक हैं। अगर आजादी के बाद सामाजिक न्याय मिला होता तो न मुलायम सिंह जी पैदा होते, न लालू जी पैदा होते और न मायावती पैदा होती। इससे देश में विद्रोह पनपेगा। हम कितने हैं, हमें मालूम होना चाहिए। जातिविहीन समाज बनना चाहिए। अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। अंतरधार्मिक विवाहों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, तब जातिविहीन समाज बनेगा। धर्मविहीन समाज के भी हम पक्षधर हैं। लेकिन आपके पास फिगर्स नहीं हैं, आप कैसे करोगे?सिर्फ एक टर्म में कह दोगे कि जाति आधारित जनगणना समाज को तोड़ने वाला विषय है। क्या हम मान लेंगे, क्या मुलायम सिंह जी मान लेंगे, क्या लालू प्रसाद जी मान लेंगे, क्या मायावती जी मान लेंगी, क्या देवेगौड़ा जी मानेंगे?नहीं मानेंगे और यही देश के आधे से ज्यादा हैं। जब आधे से ज्यादा आपके फैसले को नहीं मानेंगे तो फिर फैसले का क्या मतलब है? हम अधिक लम्बा नहीं बोलेंगे, पता नहीं मुलायम सिंह जी कहां टोक दें और कहां हम उन्हें कुछ कह दें। ...( व्यवधान) जातियों में भी सामन्त पैदा हो गये हैं, वर्गों में भी सामन्त पैदा हो गये हैं, धर्मों में भी सामन्त पैदा हो गये हैं। यह जातीय और धार्मिक सामन्तवाद कैसे खत्म होगा। मुलायम सिंह जी हमें इस पर भी विचार करना होगा कि जाति आधारित जनगणना जब सामने आयेगी तो हमें और आपको सोचना पड़ेगा। ...( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव : सुनो, मैंने अखिलेश की शादी कर दी है, आप भी अंतरजातीय विवाह करिये।
सभापति महोदया : कृपया आपस में बातचीत न करें। बेनी प्रसाद जी, आप चेयर को संबोधित करें।
श्री बेनी प्रसाद वर्मा : हमारे सब लड़के, लड़कियों की शादी हो गई है। लेकिन मालूम कर लीजिए, हमने गोत्रविहीन शादी की है।
श्री लालू प्रसाद : नाती, पोतों की करिये।
श्री बेनी प्रसाद वर्मा : नाती, पोते जो होंगे, हमारी लड़की होगी, आप कर लीजिएगा, आपकी लड़की होगी, हम कर लेंगे।
उस पर हमारा कोई विरोध नहीं है। यह बनना चाहिये लेकिन जाति आधारित जनगणना के बगैर जाति-विहीन समाज नहीं बन सकता है, सामाजिक न्याय स्थापित नहीं हो सकता है, सामाजिक न्याय नहीं दिया जा सकता है, धार्मिक न्याय नहीं दिया जा सकता है। इसलिये जाति-विहीन जनगणना के पक्ष में सदन का बहुमत है...( व्यवधान)
श्री लालू प्रसाद : सर्वसम्मतिहै।
श्री बेनी प्रसाद वर्मा :सर्वसम्मति सरकार को मानना चाहिये, इससे देश आगे बढ़ेगा। इससे देश में सामाजिक न्याय स्थापित होगा। इससे समान समाज बनने का रास्ता प्रशस्त होगा।
SHRI O.S. MANIAN (MAYILADUTHURAI): Thank you, Madam Chairman. The most important work on Census 2011 has started. In this census 35 questions or details are being asked. As far as possible, the number of details may be curtailed, but at the same time the most important ones should not be ignored.
At many places the stay of the head of the family or the person who leaves his native place to some other country, State or place, is only temporary. Most of them return back to their respective native places. Census for such people should not be left behind. Most of them return during their religious customary functions or other important functions. People at the Taluk level and Union level should take necessary steps to include these people in the census during this period. There should be no double entry as well.
The illiterate people are finding it very difficult to answer the queries asked by the census officials. Necessary arrangements may be made to depute officials who can take exact details from such people during the census.
The work of census for people living in coastal areas has been handed over to private companies and the same have already started the work. I humbly submit that the census may be done on the righteous path and submitted at the earliest.
सभापति महोदया : कृपया सदन में शान्त रहें। जो लोग बोल चुके हैं, वे दूसरों को सुनें।
SHRI O.S. MANIAN : The census should be a successful one. The main objective of the census is to find the exact details of the socially, economically and backward people so that they are uplifted.
The census is being taken once in ten years. The data which is taken during the census is being used by the Government as a parameter for the economic conditions and requirements of the people in order to introduce welfare schemes for their upliftment.
I would like to say that for getting admission of our children to school, the first question that the school authorities ask us is our caste. Even at the time of interview for employment the selection authority verifies the caste certificate. So, what is wrong in mentioning the caste?
Before concluding my speech, I, on behalf of the AIADMK Party support the caste-based census.
श्री शरीफ़ुद्दीन शारिक (बारामुला): मैडम चेयरपरसन। आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने मेरा नाम पुकारा।
जिस संजीदा मसले पर सुबह से बहस हो रही है और इस पर बहुत से बड़े नेता अपने ख्यालात का इज़हार कर गये। दरअसल, हम जो समझ रहे हैं कि यह उन लोगों की तरफ से बेइन्साफी के खिलाफ आवाज उठाने की एक तमन्ना है। जो लोग यह कहते हैं कि हमारी जाति को पहचान लें कि हम कौन हैं, उनका फैशन के तौर पर कोई बात नहीं कि दलित लिख लो, आदिवासी लिख लो या हरिजन लिख लो। ये वे लोग हैं, जो सदियों से इस समाज की बेइंसाफियों के नीचे कुचले गये हैं। ये वे लोग हैं, जिनकी जुबान है, लेकिन जुबान में अलफ़ाज नहीं हैं। ये वही लोग हैं, जिनके दिल हैं, लेकिन दिल की धड़कन को धड़कने की इजाजत नहीं दी गयी है। ये वही लोग हैं, जिनकी रगों में खून है, लेकिन उस खून को इस समाज की बालादस्ती ने और इस समाज के बेइंसाफ तबके ने उस खून को गर्दिश करने का मौका नहीं दिया। नतीजा यह निकला कि यह वर्ग, जिन्हें हम छोटी जातियां कहते हैं, मुझे छोटी जातियां कहते हुए शर्म आती है, हमारे पास छोटा-बड़ा कोई नहीं है। मेरे कुराने-मजीद में लिखा है-ऐ लोगों, खुदा से डरो, जिसने आप सबको एक ही मां-बाप से पैदा किया है। तुम्हारी अलग-अलग जाति नहीं है, अगर जाति है तो सिर्फ कबीले इसलिए बनाये, ताकि तुम्हारा ताररूफ हो, तुम पहचाने जाओ। हम छोटा-बड़ा नहीं मानते हैं। मैं उस करप्ट ब्यूरोक्रेट से, मैं उस करप्ट सियासी लीडर से उस मोची को बेहतर मानता हूं, जो पटरी पर लोगों के जूते सी-सीकर इंसानियत की खिदमत करता है। उस ब्यूरोक्रेट को जो एक-एक सेकेंड से, एक सियासी लीडर जो एक-एक सेकेंड से करोड़ों रूपये का घपला करता है। मैं उस मोची को, जिसे आप चमार कहते हैं, उसे बेहतर मानता हूं। जो यहां कहा गया है कि हमारी पहचान हो कि दलित कौन है, पिछड़े वर्ग के लोग कौन हैं ताकि पता लगे कि इस देश में कौन-कौन से लोग रहते हैं?कुछ लोग जिनकी पचास साल, साठ साल, हजारों साल से एक बालादस्ती रही है, उन्हें यह पता चले कि बालादस्ती का दौर खत्म हो गया है, अब जमीन करवट ले रही है, इंकलाब आ रहा है। उसी इंकलाब के प्रतीक ये लोग हैं, उसी इंकलाब की आवाज बनकर आपसे यह मुतालबा किया जा रहा है। मैं सरकार से निवेदन करूंगा, पुरजोर गुजारिश करूंगा, मुल्क के इत्तिहाद के लिए, मुल्क के इत्तिफाक के लिए, आदमियत की इज्जत के लिए, इंसानियत और शराफत की इज्जत और आबरू के लिए कि आप अपने प्रोग्राम में तब्दीली करके इन मुतालबात को मानकर उस फॉर्मेट में तब्दील कीजिये। ताकि सबके साथ इंसाफ हो, यह एक इंसाफ की तहरीक है कि आगे बढ़ें। खुदा हाफिज़।
*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT) : Respected madam chairperson, Census is a very important matter and there should be unanimity among various political parties and other forums on this. Through you, today I would like to express the views of my party in this august House. Census is a decennial affair – it takes place after every 10 years. While doing this, the social, economic and castes factors of the people of the country should be taken into consideration. The enumerators should have a definite idea about the demographic alignment and arrangement of the entire population. If this is not done or known properly then the Government would not understand what it should do for the welfare of its citizens and what policies should be adopted for their benefits.
To date, the manner in which Census have been conducted revealed only incomplete and inadequate data. Merely religious beliefs or caste traits are not enough to identify the citizens of a country. To have a clear idea about the actual condition of the people living in a country, one must have information of their economic status and background along with caste and creed.
Thus we demand that during the Census 2011, data regarding the occupation, or livelihood of the citizens of India must be taken into consideration. In other words, we demand occupation based Census.
We also want to say very strongly that this Census should bring to light the actual number of people living below the poverty line and should also highlight in what manner the income of an individual affects one’s position in the hierarchy of society.
Here I would like to say clearly that we have two Bangladesh in this world one is the neighbouring country Bangladesh and another is our state of West Bengal. In both the places, Bengali speaking people live and there are Hindus and Muslims in either side of the border thousands of Bengali people from West Bengal come to Delhi or other Indian states in search of work. They are genuine citizens of this country. So if Hon. Members in this House raise a clamour that, these people are Bagladeshis then it would be a grave mistake. However, I admit that from Bengladesh, lacs of illegal migrants are coming over to India and this is causing immense damage to our country’s infrastructure and resources. Since there is no natural barrier along the border, only artificial barriers are not enough to stop cross-border infiltration. So this aspect must be looked into seriously.
Another point is there to make a mention of Census which is taking place in Delhi is not being properly conducted. I have learnt from the enumerators that they are turned away every time they go to perform their duties and are being harassed. So the Government should monitor the entire process if it wants to have a successful programme.
With these words I thank you and conclude my speech.
SHRI MOHAMMED E.T. BASHEER (PONNANI): Madam, while participating in the discussion on the Census, on behalf of my party, I believe and would like to logically argue that caste based census is very much required in the Indian situation today. As has been correctly mentioned by the former speakers, caste system in India is a reality which cannot be disputed. If we pretend that we have not seen it, then I would like to say that this is nothing but hypocrisy. There is no logic in saying that secularism and casteless society will come into existence if we are not taking census on the basis of caste. The very agenda of this Government is inclusive development. As has been correctly mentioned by the former speakers, various Commissions from the Kaka Kalekar Commission, to the Ranganath Mishra Commission have suggested various measures that need to be taken for the upliftment of the backward sections of the society. I would like to ask the Government, how are we going to make policies and programmes without identifying the target groups? Without understanding the right number of beneficiaries, how can we have effective planning?
Madam, the Government should seriously think about this. We have to do a lot of things for the progress and welfare of the down-trodden and the marginal sections of the society. This kind of a census is very much required and we need to have a different kind of an interpretation to that. I once again strongly argue that caste based census should be there. It is very much required.
Madam, I would like to make another point in this regard and that is about the NRIs. The Indians working abroad are not including in the census merely on the technical ground that they are not present in their houses at the time of taking the census. There is no logic in that. We all know that Indians working abroad is only a temporal thing. They should not be ignored. They will have to be included in the census and that would be a just and fair action. This is my humble submission.
चौधरी लाल सिंह (उधमपुर): मैडम, मैं आपकी परमीशन से कहना चाहूंगा कि यहां जो सेंसेशन का इश्यु डिसकस हो रहा है, इस देश की जनगणना करवाई जा रही है। मेरी सबमिशन है कि अंग्रेजों ने जब सन् 1931 में जनगणना करवाई थी तो आपने देखा कि किस आधार पर करवाई गई थी। उसका नतीजा क्या हुआ था, उसे सारी दुनिया जानती है - एक पाकिस्तान बना और एक हिन्दुस्तान।...( व्यवधान) आप ही की थोड़ी चलेगी, इस देश की सब की चलेगी।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि यह देश गरीब और अमीर का देश है। यहां जो गरीब पिसता जा रहा है, वह किसी कौम का नहीं होता। क्या ये लोग चीफ मिनिस्टर बनने के बाद भी गरीब हैं? अभी भी पिछड़े हैं, जो पिछड़ा है, वह किसी कौम, जाति एवं वर्ग विशेष का है। वह गरीब है, उस गरीब की सुनवाई होनी चाहिए, इसमें दो राय नहीं हैं।...( व्यवधान) मैं जानता हूं, मैंने देखा है कि मेरी कांस्टीटय़ूंसी, मेरे स्टेट में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध आदि सारी जातियां हैं।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि मेरी कांस्टीटय़ूंसी में 60 परसैंट हिन्दू और 40 परसैंट मुसलमान हैं। मुझे 40 परसैंट में 39 परसैंट मुसलमान लोगों ने वोट दिए। आप मुझे बताएं कि कौन सी जाति, कौन सा वर्ग और कौन सी बातें करें। आप पहाड़ों में चल कर देखें तो आपको पता चलेगा।...( व्यवधान) एक मुस्लिम को शेडय़ूल ट्राइब मिला, दूसरा मुस्लिम उसी पहाड़ पर भूखा मर रहा है, उस मुस्लिम को किसी ने नहीं पूछा। आप पूंछ, रजौरी में उन मुसलमानों से जाकर पूछिए। ...( व्यवधान) वहां जो बैकवर्ड इलाके हैं, वहां सड़क, बिजली, स्कूल, पानी एवं जमीन नहीं है। वहां बुरा हाल है। क्या वहां कोई कौम तगड़ी एवं अमीर होगी, मैं यह जानना चाहता हूं?...( व्यवधान)
सभापति महोदया : लाल सिंह जी, अब आप कंक्लुड करें।
चौधरी लाल सिंह : सभापति महोदया, मेरी आपके माध्यम से सबमिशन है कि मेरे इलाके में गुज्जर जाति के लोग इतने गरीब हैं, ...( व्यवधान) मैं बता नहीं सकता हूं।...( व्यवधान)
सभापति महोदया: लाल सिंह जी, मेहरबानी करके आप बैठ जाएं।
…( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN: Nothing will go on record.
(Interruptions) … * सभापति महोदया:माननीय सदस्यगण, कृपया आप बैठ जाएं।
…( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN: Shri Asaduddin Owaisi.
… (Interruptions)
MADAM CHAIRMAN: Except Shri Owaisi’s speech, nothing will go on record.
(Interruptions) … * MADAM CHAIRMAN: Those who want to lay their speeches on the Table of the House may please do so.
… (Interruptions)
SHRI ASADUDDIN OWAISI (HYDERABAD): Madam Chairman, I stand here to support the demand that has been made, through a census, about backward class communities.
I only have seven points to make because of paucity of time. Why do we require the census of backward class communities to be done? Firstly, it is for better development planning of BCs so that their educational and social level parameters come up to the level of upper castes.
The second point is that numerous writ petitions are being filed in the courts of law stating that there is no population of backward classes. To negative these writ petitions which are being filed in courts of law, it is needed.
There is a misconception that constitutional safeguards are only for Scheduled Castes and Scheduled Tribes. This is totally true. For Scheduled Castes and Scheduled Tribes, articles 341 and 342 are there. For BCs, article 340 is there, though it was implemented lately, in 1990s only.
Article 15 (4) was given by none other than the great Pandit Jawaharlal Nehru. I would like to know from the Congress Party whether Pandit Jawaharlal Nehru was a castiest. He has given article 15 (4) wherein reservation was given to OBCs. This is the point which the hon. Minister must answer when he replies to the debate. That is why, in the light of article 15 (4), this demand is being made.
Which OBC list should be followed? This is a census done by the Central Organisation. So, the Central OBC list should be followed. In the Central OBC list, how many BCs are there? It is 1,963. The number of Scheduled Castes and Scheduled Tribes are 1,300. So, not much difference is there.
The next point is, why can the NCBC or the State BC Commission not do this exercise? This exercise cannot be done by them. The NCBC and the State BC Commission can do a survey. But they cannot do a census. They do not have the wherewithal; they do not have the infrastructure and the capability to do it.
My next point is very point. There is a confidentiality clause in the census, whereas in the Citizenship Act and the rules, no such confidentiality clause is there. In the light of the recent eves dropping conspiracy and telephone tapping, I would like to know from the Government as to what steps will be taken to protect my privacy. This information will be there. All my ten fingers will be there. The information of citizens, especially of the Muslim community will be there. I would like to know what would be the safety mechanism for upholding the privacy of the citizens in the light of the NATGRID? This information can be shared by the IB and other organisations. … (Interruptions)
What will happen to fifty lakh Indians who are working in Gulf countries? Will they open an NPR because NPR is being done now? Will this exercise continue not only for the next year but on a continuous basis? It is because their names have to be reflected so that they can get the Unique Identification Card.
The last point is that, for this population enumeration, can the forms be given in Urdu, especially in Andhra Pradesh, Bengaluru and Lucknow? It is because when the enumerators are going and asking the details in Muslim localities, they are answering in Urdu.
The last and important point is that for the first time we are seeing how the BJP is badly exposed. The BJP’s slogan was “Justice to all and appeasement to none.” But what Shri Munde has said, has exposed the BJP.
*श्री हंसराज गं. अहीर(चन्द्रपुर) ः महोदय, भारत देश में विभिन्न सामाजिक संरचनाओं के कारण अनेकता दिखायी देती है । लेकिन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कारण आसेतू हिमाचल समान अनेक बिंदू दिखायी देते हैं । भारत में जातिगत व्यवस्था अनेक पीढ़ियो से प्रचलित है । पूर्व में सामाजिक संस्कारों का जो अंग्रेजों द्वारा डिव्हाईड ऍन्ड रूल नीति के कारण जातिगत संरचना में विभेद पैदा हो गए थे ।
स्वाधीनतापूर्व काल में 1931 में देश में पहली जातिगत आधार पर जनगणना की गयी आज भी इसी आधार पर हम एससी, एसटी और ओबीसी प्रजातियों को आरक्षण दे रहे हैं । भारत में जनसंख्या विश्व के मुकाबले में तेजी से बढ रही है, इस बढती हुई जनसंख्या के आधार पर सभी जातियों को सत्ता में समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नए सिरे से जाति जनगणना करना आवश्यक है ।
1979 में तत्कालीन सरकार द्वारा ओबीसी जातियों के समूह और उनकी जनसंख्या का पता लगाने के लिए मंडल आयोग का गठन किया गया इसकी रिपोर्ट 1998 में दी गयी तत्कालीन सरकार द्वारा उक्त सिफारिशों के अनुसार ओबीसी के लिए आरक्षण लागू किए गए मंडल आयोग के अनुसार देश के 3 हजार जाति समूहों को पिछडी जातियों में शामिल होने की बात कही गयी थी । मंडल आयोग के अनुसार देश में ओबीसी जाति समूहों की संख्या कुल 52 प्रतिशत होने की बात कही गयी है । लेकिन इसके बावजूद सरकार के पास आज भी ओबीसी जनसंख्या के कोई अधिकारिक आंकडे नहीं हैं ।
भारतीय व्यवस्थापन शास्त्र(आईआईएम) के द्वारा ओबीसी अभ्यर्थियों को व्यवस्थापन शिक्षा में प्रवेश के लिए सरकार द्वारा किए गए संशोधन को उच्चतम न्यायालय(सुप्रीम कोर्ट) ने ओबीसी की जनसंख्या की सरकार से जानकारी मांगने के बाद सरकार द्वारा इसे देने में असमर्थता व्यक्त की गयी थी । यह सरकार की ओबीसी जाति के प्रति उपेक्षा का ज्वलंत उदाहरण है । एक तरफ मंडल आयोग कहता है कि देश में ओबीसी की 52 प्रतिशत जनसंख्या है और दूसरी तरफ सरकार के अन्य विभाग जैसे कि नेशनल सैंपल सर्वे और योजना आयोग के आंकडे अलग दिखायी देते हैं । सरकार ने देश के जातिगत अनुपात में बजटीय सहायता का अनुमोदन करने की नीति निर्धारित की है । इसके अनुसार आज जनजाति और अनुसूचित जाति के लिए जनसंख्या के अनुपात में बजटीय आवंटन किया जाता है । लेकिन ओबीसी यह देश में पिछड़ी जाति होने के बाद भी इसकी जनसंख्या का कोइ निश्चित आधार नहीं होने के कारण उन्हें आज भी संख्या के अनुपात में बजटीय समर्थन नहीं मिल पा रहा है । यह ओबीसी के साथ किया जा रहा छल है । सरकार ने ओबीसी छात्रों के लिए जो छात्रवृत्ति लागू की है उसकी राशि बहुतेक राज्यों में आज भी बकाया है । सरकार अल्पसंख्यक छात्रों के लिए भारी राशि का निवेश करती है । लेकिन ओबीसी छात्रों के नाम पर सरकार द्वारा छलावा किया जा रहा है ।
महाराष्ट्र राज्य में ओबीसी के लिए केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषी योजनाओं को भारी राशि केंद्र सरकार पर बकाया है । यह केंद्र सरकार द्वारा ओबीसी के अधिकार की उपेक्षा का परिचायक है । अगर सरकार देश में एसटी, एससी और अल्पसंख्यकों के विकास के लिए प्रतिबद्ध होने का दम भरती है तो देश के बहुसंख्यक कहे जाने वाले ओबीसी की उपेक्षा क्यों की जा रही है । मैं सरकार से मांग करता हूं कि ब्रिटिश काल में 1931 में की गयी जातिगत जनगणना के आंकडों में विगत 79 साल में भारी परिवर्तन हो गया है । ओबीसी जातियों को सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक आधार पर समृद्ध करने के लिए इसका जातिगत आधार पर नए सिरे से जनगणना करना आवश्यक है । सरकार द्वारा की जा रही आगामी जनगणना एवं राष्ट्रीय बहुउद्देशीय पहचानपत्र संकल्पना में संशोधन कर इस में ओबीसी समाज को योग्य प्रतिनिधित्व एवं विकास में समान भागीदारी देने के लिए सरकार जातिगत जनगणना करने के लिए सार्थक पहले करें ।
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी): सभापति महोदया, मैं हृदय से आपको धन्यवाद देता हूं, आभार प्रकट करता हूं कि इस विषय पर आपने मुझे कुछ कहने का अवसर दिया। ऐसे विषय पर सदन में गम्भीरता से चर्चा हो रही है। सत्ता और विपक्ष की जितनी उपस्थिति आज इस विषय पर चर्चा होने के समय सदन में है, उतनी उपस्थिति किसी अन्य विषय पर होने वाली बहस में नहीं रहती। इससे यह सिद्ध होता है कि इस बहस की कितनी गम्भीरता है। यह न सरकार के ऊपर आरोप है, न हम पर है और न किसी और पर है, बल्कि जाति प्रथा के कारण आज अगर भारत में शोषण हैं, अन्याय है, अत्याचार है, जुल्म है या जो कुछ भी है, तो भारत के माथे पर यह सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कलंक है। इसके लिए शुरू से आज तक भारत की जो जाति व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था रही है, वह संपूर्ण रूप से जिम्मेदार है। ऋषि और मुनियों के द्वारा इस जाति प्रथा को तोड़ने के बड़े ही आन्दोलन और प्रचार किए गए, उपदेश दिए गए, लेकिन भारत से आज तक जाति प्रथा नहीं हिल पाई है। यही इसका एक प्रमाण है।
महोदया, हिन्दुस्तान में जाति प्रथा के कारण दो तरह की भूख है। इंसान के अंदर एक भूख है पेट की और दूसरी भूख है मन की। पेट की भूख रोटी से मिटती है, लेकिन मन की भूख सम्मान से मिटती है। हिन्दुस्तान के पिछड़े, दलित, आदिवासी, शोषित और पीड़ितों को रोटी नहीं चाहिए, अगर चाहिए, तो मन का सम्मान चाहिए, जो आज वे नहीं पा रहे हैं। योग्यता, क्षमता, दक्षता और प्रतिभा की बात करने वालों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या हिन्दुस्तान में पिछड़े, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक या जो भी हों, क्या उनमें कोई योग्य, दक्ष, बुद्धिमान और प्रतिभाशाली नहीं हैं? क्या इन जातियों में कोई व्यक्ति आज तक नहीं निकले, जो प्रशासन या शासन चलाने के योग्य हों? आज85 प्रतिशत लोग हाथ जोड़ कर विनय कर रहे हैं कि मुझे अधिकार दे दो-मुझे अधिकार दे दो।
मुझे जनगणना में अधिकार दे दो, नौकरी का अधिकार दे दो।जब85प्रतिशत भिखमंगा के जैसे मांग रहा है, तो यह भारत के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है। लोकतंत्र के नाम पर कलंक है। यह देने वाला कौन है? वह 15 प्रतिशत कौन है, जिसकी खोज इस सदन को करना चाहिए और इस समाज को करना चाहिए, जिसके सामने यह85प्रतिशत आज भी भिखमंगा बनकर खड़ा है? उस15प्रतिशत की खोज करो। मुलायम सिंह यादव जी, मैं किसी सवर्ण या वर्ण की बात नहीं करूंगा, लेकिन वह 15 प्रतिशत कौन हैं? चाहे वह शासक हों, चाहे वह प्रशासक हों, सरकारी नौकरी में ऊंची कुर्सियों पर जो बैठते हैं, भारत के सामंतवादी चरित्र के हैं, वे हमारी पीड़ा को क्या जानेंगे?“कादुख जाने दुखिया, या जाने दुखिया की माई, जाकी पैर न फटे बिवाई, सो का जाने पीर पराई” जाति के नाम पर जो अपमान मुझे झेलना पड़ा है, वह दूसरे नहीं जानेंगे। मुंडे जी को जो अपमान झेलना पड़ा होगा, वह दूसरे नहीं जानेंगे। शरद यादव जी, जब कहीं चुनाव लड़ रहे थे, मैं नाम नहीं लूंगा, तब नारा लगता था-शरद यादव लाठी ले लो, गांव में जाकर भैंस चराओ।क्या आज भी हम इस नारे को सहन कर सकते हैं? चौधरी चरण सिंह जी की जब मृत्यु हुयी थी, जो भारत के इतने बड़े विख्यात नेता थे, तब उनकी मृत्यु पर हिंदुस्तान के अंग्रेजी अखबार वालों ने लिखा था - जाट मरा तब जानियो, जब चौदहवीं हो जाए। उस समाज में आग लगा दो, जो पिछड़ी जातियों के प्रति, दलित के प्रति और समाज के अंदर जो वनवासी हैं, उनके लिए ऐसा सोचते है इनमें अगर कोई तेजस्वी भी निकले, तो राष्ट्रीय नेता नहीं निकले।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : हुक्मदेव जी, आप अपनी बात समाप्त करें।
श्री हुक्मदेव नारायण यादव : महोदया, अंत में केवल एक ही बात कहकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। अगर आप जनगणना में हमें अधिकार नहीं देंगे, तो एक बात याद रख लो कि यह बात संसद तक नहीं रहेगी, सड़क तक चली जाएगी।याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन से ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : श्री तरूण मंडल, अब आप शुरू करिए।
श्री हुक्मदेव नारायण यादव : भारत में अशांति को मत जन्म दो, आपसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि गांधी जी के रास्ते पर चले हो, तो आओ भारत की बात मानो, भारत का इतिहास बदलो, पिछड़े वर्ग को सम्मान दो, इन नेताओं ने जो कहा है, इनकी बात पर ध्यान दो।अगर न मानोगे, तो यह समाज पछताएगा, यह देश पछताएगा।
*श्री हरिभाऊ जावले (रावेर): महोदया, नियम 193 के अधीन चर्चा में मेरे लिखित विचार मैं सदन के सामने रखना चाहता हूं।
जनगणना 2011 के लिए विशिष्ट मापदंड निर्धारित किये जाने की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जनगणना में सब जातियों का समावेश होना चाहिए। पढ़ाई शुरू करने के साथ नौकरी मिलने तक हमेशा जात का विचार किया जाता है, पूछा जाता है। ओ.बी.सी. जात पूरे देश में एक पिछड़ी जाति है। अब तक उनको नौकरी में बढ़ती मिलने के लिए ओ.बी.सी को समाविष्ट नहीं किया गया है। मेरा निवेदन है कि जनगणना में ओ.बी.सी. का समावेश होना चाहिए और इसके लिए सरकार को तत्काल निर्णय लेना चाहिए।
DR. TARUN MANDAL (JAYNAGAR): Madam, at the very outset, I would like to say that this is a very serious and sensitive issue. Many hon. Members have expressed the view that it is an insignificant matter.… (Interruption) MADAM CHAIRMAN : I again request that those hon. Members who want to lay their speeches on the Table of the House may do that.
DR. TARUN MANDAL : They said that it can be taken as simply mentioning in the census register. But I do not think it is an insignificant matter at all. It has got far-reaching consequences in our national history.
I definitely believe that our society is divided into many religions, castes, sub-castes and multiple divisions but simply mentioning the caste divisions and caste identification in our census calculation will not at all help development and upliftment of the so-called dalits or the under-privileged sections of the society. I personally believe that even mentioning religion and such kinds of things will flare up caste feelings, religious feelings and religious hatred amongst our population. So, Madam, we cannot accept it in our census recording.
MADAM CHAIRMAN: Please conclude. Only two minutes each are given. I have already requested that those hon. Members who want to lay their speeches can do that because we are short of time.
DR. TARUN MANDAL : Madam, I am a new Member. Please help me in making my points clear. I have made only one point.
Secondly, in reality, many things are prevailing in our society like that of untouchability, child marriage, etc. Communal hatred is prevailing in our society. But whatever is the reality in our society, we cannot make it recorded because, in future, it will not help our progress and civilization. In British India, there was the divide and rule policy. For that reason, in their census, they utilized it but our country now should not accept it. It should continue to remain as a Democratic, Secular Republic and a scientific nation. It should not go by caste divisions or religious divisions.
With these words, I conclude.
श्री राजाराम पाल (अकबरपुर): सभापति महोदया, मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं कि आपने मुझे ऐसे संवेदनशील विषय पर बोलने का अवसर दिया। हमें लगता है कि इस सत्र में यह सबसे पहला दिन है जब किसी गंभीर विषय पर पक्ष और विपक्ष के सदस्य पूरी तरह सहमत हैं। हमें लगता है कि निश्चित तौर पर सरकार भी इससे बेखबर नहीं है। हमें पूरा भरोसा है कि इतनी देर डिबेट करने की आवश्यकता नहीं थी। पूरे बटलोई का एक चावल देखकर समझ लेना चाहिए कि इस देश की आधी से ज्यादा आबादी क्या चाहती है। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि इस देश में जो लोग मांग कर रहे हैं, उन्होंने जातियां नहीं बनाईं।इस देश में चार वर्ण थे - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।...( व्यवधान) इस देश में जब अंग्रेजों ने साइमन कमीशन भेजा, तब उन्होंने अनुसूचित जातियों का एक सर्वे करवाया। जो लोग उस सूची में शामिल हो गए, वे शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडय़ूल्ड ट्राइब्स हो गए और जो बच गए, वे 63 साल की आजादी के बाद भी अपने पिछड़ेपन का रोना रोने का काम कर रहे हैं। हमें लगता है कि सब्र की हद हो गई है। अब सब्र का बांध टूट गया है। मैं कहना चाहता हूं कि यह वे लोग हैं जो आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनैतिक रूप से देश की मुख्य धारा से पिछड़ गए हैं। ...( व्यवधान) मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि संविधान निर्माताओं ने कहा था कि हमने वोट का राइट दे दिया, आपको राजनीतिक आजादी मिल जाएगी। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी के लोग अब चुनकर आने लगे हैं। लेकिन उन्होंने कहा था कि इससे सबका भला होने वाला नहीं है। इस देश में जब तक सामाजिक और आर्थिक आजादी नहीं मिलेगी, तब तक राजनीतिक आजादी का कोई अर्थ नहीं है। ...( व्यवधान) मैं कहना चाहता हूं कि संविधान निर्माताओं ने कहा था कि आर्थिक आजादी के लिए आपको देश में एक और जंग लड़नी होगी। इसलिए मैं सरकार से मांग करना चाहता हूं, सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय से मांग करना चाहता हूं कि 54 फीसदी लोगों की आवाज को सुनकर कल जब इस सदन में जवाब आए, तब उन्हें सैन्सस में शामिल करने का काम करेंगे। धन्यवाद।
सभापति महोदया : डा. रघुवंश प्रसाद सिंह। रघुवंश प्रसाद जी की बात के अलावा और कुछ भी रिकार्ड में नहीं जाएगा।
...( व्यवधान) * *SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Madam, Once in 10 years Census is taken. Census means survey of population. Now the process of taking Census has started. This discussion on the question of Census enumeration either be based on caste-wise or not should have been initiated and decided much earlier. Suppression of OBCs with major population along with SCs, STs is a historical fact.
Equal opportunities and rights guaranteed some 60 years back in the Constitution was a farce. Marginalized communities still continue to suffer. They continued to be oppressed socially and economically. There is a need to look into their genuine demands and grievances. Caste-wise enumeration may create a passage for reaching the goal. But this alone will not give answer to this issue. What is required is a change in the mindset of the people entrusted with the task of Governance of the country.
Commission after Commission have brought out reports about the plight of OBCs, but what is lacking is implementation process. Nobody can deny that. The demands of the backward communities to uplift themselves through concessions and schemes are genuine.
But the scale and extension of benefits conferred to the OBCs are not sufficient to meet the demands. The Central and State Governments should adopt a liberal and broad approach towards the real issues and problems faced by the OBCs and discuss across the table with the political leaders, economists, socialists and other interested in the issue and work out a blue print of action for implementation within a time frame.
I endorse the views of the members those who are pressing for the parameters for conducting Census. The reasons for raising such demand are genuine and acceptable. That is why I am saying that the reasons for the demands have to be looked into primarily. Before starting the treatment proper diagnose is *Speech was laid on the Table much important. If we find out the root cause of all the problems the solution would be very easy. There is nothing wrong in taking caste-base census enumeration. This is a real mirror which will focus the real face of the total population.
Let us sit together, look into the issue and hammer out policies and programmes that will give substantial relief to the oppressed OBCs of the country. Let us not postpone the issue and put the issue under burner by citing one reason or the other.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदया, सन् 31 की जनगणना के बाद काका कालेलकर, मंडल आयोग, सुप्रीम कोर्ट और सरकार की तरफ से बयान आया है कि पिछड़ी जातियों की जनसंख्या की जानकारी के बिना कैसे उनका हिस्सा दिया जाए। उस सवाल का जवाब, सभी आयोग और कोर्ट के सवालों का जवाब यही है कि सन् 2011 की जनगणना में पिछड़ी जातियों की जाति आधारित जनगणना हो। इसमें दूसरा कोई लॉजिक नहीं है। कन्सैन्सस हो गया और अब सरकार का बहाना नहीं चलने वाला है, इससे यह साबित होता है। महोदया, एक लॉजिक है कि जब पिछड़े, दबे, शोषित, वंचित, उपेक्षित, अनुसूचित जनजाति की गणना है, माइनॉरिटी की गणना है, तब इतनी बड़ी संख्या में जो लोग हैं, उनकी गणना क्यों नहीं है। जब तक उनकी गणना न हो, इसका जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसे देने में क्या घबराहट है। इसमें आना-कानी करने का कोई लॉजिक कहां बनता है। कोई बहाना नहीं चलेगा। इस साल का पांचवा महीना बीत रहा है और सन् 2011 में जनगणना होनी है। समय भी पर्याप्त है, इसलिए यह होना चाहिए। मैं अब सरकार का चरित्र देखता हूं। सामाजिक न्याय और आधिकारिता विभाग अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और सबको देखता है। माइनॉरिटी का अलग मंत्रालय हो गया, ट्राइबल्स के लिए अलग मंत्रालय है तो 54 फीसदी बैकवर्ड क्लास के लिए अलग मंत्रालय क्यों नहीं है? हम जवाब चाहते हैं। क्यों इतनी बड़ी आबादी की उपेक्षा है? हिन्दुस्तान के अंदर कोई माई का लाल जवाब दे कि यहां जो 54 फीसदी पिछड़े लोग हैं, उनके लिए एक मंत्रालय क्यों नहीं है।जब कम लोगों के लिए मंत्रालय है, तो ज्यादा लोगों के लिए मंत्रालय क्यों नहीं है?इसलिए यह साबित है कि दुनिया के मुल्कों में हिन्दुस्तान तब तक पिछली सीढ़ी पर बैठेगा, जब तक देश के करोड़ों लोगों को पिछड़ा, दलित, अनुसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति कहकर पीछे छोड़ दिया जायेगा। जब तक करोड़ों बहुसंख्यक लोगों को पीछे और अपमानजनक स्थिति में रखा जायेगा तब तक हिन्दुस्तानदुनिया के विकसित और ताकतवर मुल्कों के साथ बराबरी नहीं कर सकता। हिन्दुस्तान दुनिया के शक्तिशाली मुल्कों के साथ हो, इसके लिए करोड़ों दबे हुए, वंचित बहुसंख्यक लोगोंको सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन करके हिस्सेदारी देना पड़ेगी। ...( व्यवधान) नहीं तो लोग ठीक कहते हैं कि युद्ध की संभावना हो जायेगी। युद्ध होगा और हिस्सामारी नहीं चलेगी। आप उनको भागीदारी दो। ...( व्यवधान) हिस्सामारी बंद करो और उनका जितना हिस्सा है, उतना हिस्सा उनको दो ...( व्यवधान) संघर्ष के बिना कोई दे नहीं सकता ...( व्यवधान) नहीं तो संघर्ष के लिए तैयार हो जाओ। ...( व्यवधान) करोड़ों लोग सड़क पर आयेंगे। ...( व्यवधान) सड़क से संसद तक लड़ाई चलेगी और कोई इसे रोक नहीं पायेगा।इन्हीं शब्दों के साथ यह ऐलान अभी होना चाहिए। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : रघुवंश जी, अब आप समाप्त करें। इसके बाद कुछ भी रिकार्ड में नहीं जायेगा।
...( व्यवधान) * *श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): महोदया, देश में जनणना2011 के लिए मापदंड निर्धारित किए जाने की आवश्यकता है कि जातिगत आधार पर हो। एस.सी/एस.टी, पिछड़ों एवं मुस्लिमों के साथ ही बीपीएल लोगों की पहचान होगी। इससे देश के विकास के साथ लोगों के जीवन स्तर में सुधार अवश्य आयेगा। मैं इस चर्चा पर बल देते हुए सरकार से मांग करता हूं कि जातिगत आधार पर जनगणना 2011 होना चाहिए।
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Hon. Madam Chairperson, I am thankful to you for giving me an opportunity to participate in the discussion and debate initiated by Mr. Anant Kumar on the ' need to lay down specific parameters for operating the Census 2011'.
Here, I would like to submit some of my observations and suggestions and I would also like to urge upon the Government to take corrective measures in the matter of doing Census on the population of the Scheduled Tribes, Scheduled Castes and Other Backward Classes. In 2001 Census, the figure shown in the case of the Scheduled Tribe population is only as 8,45,26,240 out of 102,86,10,328.
MADAM CHAIRMAN : Please conclude.
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY : In terms of percentage is concerned, it is only eight-point something. So far as my observation with regard to the ST population is concerned, the population of the Scheduled Tribes has not been enumerated in an accurate way. If the population of the upper caste people can grow, why cannot the population of the Schedule Tribes and Scheduled Castes increase in the last 60 years after Independence?
MADAM CHAIRMAN: Please conclude now. Shri Vinay Kumar Pandey to speak now.
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY : Based on 1971 Census, figure you have fixed the reservation quota for the Tribal people at only seven-and-a-half per cent across the country. In 2002, several communities have been included in the list of Scheduled Tribes without increasing the rate of reservation quota… (Interruptions)
सभापति महोदया : विनय कुमार पाण्डेय जी के अलावा किसी की कोई बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।
...( व्यवधान) * डॉ. विनय कुमार पाण्डेय(श्रावस्ती): सभापति महोदया, आपने इस अति महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
MADAM CHAIRMAN: Nothing is going on record.
(Interruptions) … * 18.00 hrs. सभापति महोदया : पाण्डेय जी, आप बोलिए।
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय: माननीय शरद यादव, श्री मुलायम सिंह यादव, मुंडे जी आदि वरिष्ठ नेताओं की बातें मैंने सुनी हैं।...( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN: Hon. Member, please cooperate.
… (Interruptions)
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय: सभी अन्य वरिष्ठ सदस्यों की बातों को मैंने ध्यान से सुना है। मैं जानता हूं कि समय कम है और कम समय में ही मुझे अपनी बात रखनी है। अल्प समय में ही अपनी भावना से इस महान सदन को अवगत कराना चाहूंगा।...( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN: Now it is six o’clock. If the House agrees, we can extend the time of the House till we complete the business listed for today. What is the sense of the House?
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
MADAM CHAIRMAN: Thank you. The time of the House is extended till we complete the business listed for today.
I would request the hon. Members to lay their speeches on the Table of the House because we have to pass four Bills today.
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय: महोदया, मेरे पूर्व वक्ताओं ने बहुत ही गहन, विस्तार से और बड़ी गंभीरता से इस विषय पर चर्चा की है। मैं कहना चाहूंगा कि मेरे पूर्व वक्ता और भाई आदरणीस संदीप दीक्षित जी ने कहा था कि मैं नास्तिक हूं, लेकिन मैं आपके माध्यम से इस सदन और पूरे राष्ट्र से यह विनती करना चाहता हूं, बताना चाहता हूं कि मैं घोर आस्तिक व्यक्ति हूं। मैं अपने धर्म और जाति में पूर्ण विश्वास रखता हूं। मैं अपने उन पुरखों को, जिन्होंने इस राष्ट्र को बनाने में अपनी कुर्बानियां दी हैं, उनके प्रति सच्चा आभार और सच्ची श्रद्धा रखता हूं। यहां कुछ ऐसी बातें हो रही थीं जिनको सुनकर दुख हो रहा था कि आने वाली पीढ़ी क्या सोचेगी, हमारे माननीय वरिष्ठ सदस्यों ने जिस तरीके से इस विषय पर चर्चा करते हुए हिन्दुस्तान को जाति-धर्मों की बात कर दी, मैं आपके माध्यम से पूछना चाहता हूं कि वह दिन कब आएगा जब हम हिन्दुस्तानी यह कह सकेंगे कि हमारी जाति हिन्दुस्तानी है, हमारा धर्म हिन्दुस्तान का संविधान है, इसकी तरक्की ही हमारा ध्येय है और हमारे पुरखे महात्मा गाधी हैं, अशफाकुल्ला हैं, चन्द्रशेखर आजाद हैं, शिवाजी हैं, महाराणा प्रताप हैं? कब हम यह कह सकेंगे कि अशफाकुल्ला, राम प्रसाद बिस्मिल और भगत सिंह हमारे पुरखे हैं जिनमें हम सच्ची श्रद्धा रखते हैं? यह विचारणीय विषय है।
MADAM CHAIRMAN: Shrimati Rama Devi, the last speaker.
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन(भागलपुर): महोदया, आज श्रीमती रमा देवी जी का जन्मदिन है। हम सभी को इनको जन्मदिन की बधाई देनी चाहिए।
सभापति महोदया : रमा देवी जी, मैं आपको हम सभी की ओर से जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई देती हूं।
श्रीमती रमा देवी (शिवहर): आदरणीय सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आभार व्यक्त करती हूं।
आज इस विषय पर कई माननीय सदस्यों ने बहुत सी बातें कही हैं। हम लोग जब इस सदन में आते हैं, तो लोगों का पिछड़ापन देखकर, जाति के आधार पर उन लोगों को दबाकर रखा गया, उनमें हम लोग भी दबे हुए थे। सांसद बनकर आने का मतलब है - सांस द । लेकिन यहां लोग सांस छीन लेते हैं, सांस बंद कर देते हैं, तो हम उन लोगों को सांस क्या देंगे। लोग चाहते हैं कि क्या हमारा सांसद हमारे लिए कोई तोहफा लेकर आएंगी या हमारा उद्वार करने का कोई उपाय करेंगी। आज हमारा समाज पिछड़ा है, समाज का नीचे का जो तबका है, ओबीसी, एससी, एसटी, आदिवासी, वे आज भी उसी तरह का जीवन जी रहे हैं। अगर उनकी बातें करने वाली इस सरकार में यह चीज आ जाएगी कि ये लोग भी हमारा ही अंग है और उनके लिए हम कुछ करने को तैयार हैं तो मैं समझूंगी कि आज हमें आजादी मिली है। देश को आजाद हुए 60 वर्ष से ज्यादा हो गए हैं। जब देश आजाद हुआ था, तो हम लोग सोचते थे कि हम भी आगे बढ़ेंगे। आजादी के लिए हमने बहुत संघर्ष किया, कुर्बानियां दीं और यहां तक पहुंचे हैं। आज महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय है। उन्हें घर में भी काम करना पड़ता है और बाहर भी करना पड़ता है। उन्हें इतनी आजादी नहीं कि किसी से बात तक कर सकें। हम लोग कितने दबे हुए हैं, इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
सदन में जनगणना कार्यक्रम पर चर्चा चल रही है। कई माननीय सदस्यों ने बहुत अच्छे सुझाव दिए हैं। इस चर्चा में पूरा सदन एकजुट दिखाई दे रहा है। इस चर्चा से पता चलता है कि आजादी का क्या मतलब होता है। जनगणना में ओबीसी और अन्य जातियों का भी विवरण होना चाहिए, इस तरह के कई सुझाव माननीय सदस्यों ने दिए हैं। मैं भी उनका समर्थन करती हूं और आपने मुझे जो बोलने का अवसर दिया, उसके लिए आपको धन्यवाद देती हूं।
सभापति महोदया : मेरा सदन से अनुरोध है कि जो माननीय सदस्य इस विषय पर अपनी बात कहना चाहते हैं, वे अपना भाषण सदन के पटल पर रख सकते हैं।
*श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी(अहमदनगर): महोदया, भारत देश एक विशाल देश होने के नाते और बहुभाषी, देश है । इस देश में सभी को न्याय दिलाने की दृष्टि से और सभी को समान अधिकार दिलाने की दृष्टि से हर जाति का जनगणना, में हर जाति को उनकी जनगणना की आवश्यकता सरकार की अलग अलग नीतियों के कारण हर उस समाज को (जाति को) लगता है कि हमारी जनसंख्या के आधार पर हमें सुधार के लिये सरकार की योजना का फायदा मिलेगा इसलिये 1947 में भारत की आजादी से आज तक एक समाज जो जैन कहलाता है उससे इस देश की सेवा में बड़ा योगदान दिया है । इसलिये इस जनगणना में जैन की भी अलग से जनगणना होनी चाहिये । यह मेरी और सभी जैनों की मांग है ।
*श्री दानवे रावसाहेब पाटील (जालना): महोदया जी, मैं 193 के तहत हो रही चर्चा में अपने विचार रखना चाहता हूं। देश में जो जनगणना चल रही है, उस जनगणना में ओ.बी.सी की अलग से गणना की जाये, मैं इस पक्ष में हूं, क्योंकि इस देश की आबादी 125 करोड़ है और इतनी बड़ी जनसंख्या में जैसे कि एस.सी और एस.टी की अलग से जनगणना होती है, वैसे ही ओ.बी.सी की भी होनी चाहिए। इसका कारण है कि हर जाति, समाज को अपना हक मिलने के लिए सरकार को भी मालूम होना चाहिये कि इस देश में किस समाज के कितने जाति के लोग रहते हैं? इसलिए ओ.बी.सी की अलग से जनगणना करना जरूरी है।
*श्री गोरख प्रसाद जायसवाल (देवरिया): महोदया, मैं सदन के सदस्यों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ कि भारत सरकार पिछड़ों के विकास पर ईमानदारी से काम नहीं कर रही है भारत सरकार नहीं चाहती है कि देश की विचारधारा में जो जातियां पीछे रह गई है उनका विकास किया जाये । देश में कितने पिछड़े वर्ग के लोग है इसकी गणना किये जाने के लिए कई बार अनुरोध किया गया है परंतु सरकार ने आज तक पिछड़े वर्गों की गणना नहीं कराई है 2011 में जो गणना किये जाने का कार्य1 अप्रैल2010 से शुरू किया गया है उसमें ओ बी सी का कालम नहीं है । सरकार के पास ओ बी सी के कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे है इसकी जानकारी भी नहीं है । देश के कितनी महिलाऐंं ओ बी सी के है इसकी जानकारी भी सरकार के पास नही है । केन्द्रीय विधि मंत्री एम वीरप्पा मोईली ने महिला आरक्षण विधेयक पर पिछड़े वर्ग को आरक्षण को मानने से इंकार किया है और कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर ओ बी सी के आंकड़े उपलब्ध नही है1931 के बाद से अब तक ओ बी सी की कोई गणना नही हुई है । इसलिए जब तक ये आकड़े उपलब्ध नही हो जाते हैं तब तक कि यह फैसला नहीं किया जा सकता है कि कौन ओ बी सी है और कौन ओ बी सी नही है । इस से साफ हो गया है कि भारत सरकार की मंशा ओ बी सी के कल्याण की नही है । केवल ओ बी सी की योजनाओं का नाम लेकर केवल ढोग रचती है । देश की आधे से ज्यादा आबादी के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के ओ बी सी यूनिट में सात आदमी काम करते है । बिना उनकी जनसंख्या का पता लगाये कौन सा कल्याण कार्य ओ बी सी का हो रहा है ओ बी सी का विकास यू पी ए सरकार के एजेन्डे में नही हे । जब2011 जनगणना में जातियो का पता लगाया जा रहा है तो ओ बी सी कालम क्यो नहीं है क्या ओ बी सी इस राष्ट्र के हिस्से नही है राष्ट्र निर्माण में ओ बी सी की कोई भूमिका नही है। स्कूल कालेजो में जातियों का उल्लेख हो रहा है सरकारी कार्यालयों से जाति प्रमाण पत्र जारी हो रहे है दूसरी ओर सरकार कहती है कि ओ बी सी की गणना से जातिय विद्वेष फैलेगा । क्या जनगणना में जातियों को उल्लेख से जाति विद्वेष नही फैलेगा ।
मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि 2011 की जनगणना में ओ बी सी की जनगणना कराइ जाये और महिला आरक्षण विधेयक में ओ बी सी , अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का आरक्षण उनकी संख्या बल के आधार पर ज्यादा से ज्यादा किया जाये ।
इन डेमोक्रेसी मेजोरिटी इज फंडामेंटल राईट सो देयरफोर मेजोरिटी मस्ट बी ग्रांटेड ।बहुमत की सरकार होती है अतः बहुतम का अदर होना चाहिये आपके थ्रु से सदन से पुरजोर गुजारिश है कि आप सभी सदन के सम्मानित साथीसरकार को सुझाव देवे कि बहुमतकी बात मानी जाए । वार्ना इसे रोका नहीं जा सकता । इसलिये सरकार से निवेदन है कि अपने विशाल हृदय का परिचय देते हुये सदन का सम्मान करे आज तक जो गलती हुई उसे भुलाकर अबसे सही काम करे । देर से आये दुरूस्त आवे सभी सम्मानित सदन को सम्मान करे इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।
*SHRI P.T. THOMAS (IDUKKI): Regarding specific parameters for conducting census 2011, my humble request is to find some other specific methods for calculating the actual living conditions of each and every communities in our country. The caste base census is not the solution for the real backwardness of our country. Madam, 2011 census is already started and the half of the work is also completed. My sincere opinion is that caste base census will spoil our secularist concept. Madam, the need of the hour is the unity of our country. For the unity and integrity of our nation, caste base census will not help in any way.
I am requesting to include the NRI’s in the census. Tens and thousand of NRI’s are eagerly waiting to get into the census list of their own mother country. Therefore, I am requesting to consider to include the NRI’s in census.
With these words, I am concluding my short deliberations.
श्री शरद यादव (मधेपुरा): सभापति महोदया, मैं कोई वक्तव्य नहीं दे रहा हूं। मैं आपके माध्यम से यही कहना चाहता हूं कि देश भर में बड़ी आलोचना होती है इस सदन की। मैं मानता हूं कि यदि देश देख रहा होगा तो उसे मालूम पड़ेगा कि यहां कितने गुणी और जमीन की समझ वाले लोग आए हुए हैं। जो आज की बहस हुई है, वह जाहिर करती है कि संसद में कितनी जान है, कितनी ताकत है, यह आज शो हो गया है।
MADAM CHAIRMAN: Now, I would like to inform the House that the hon. Minister will reply to this Discussion under Rule 193 tomorrow.
*श्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी): अध्यक्ष महोदया, मैं आभारी हूं कि आपने 193 नियम के अंतर्गत पिछड़े वर्ग की जनगणना के अंतर्गत अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया।
हमारे विद्वान साथियों ने, सदन के हर वर्ग ने इसका समर्थन किया है। मैं भी इसका पुरजोर समर्थन करता हूं। आज मैंने जनगणना का फार्म देखा है, उसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की जनगणना की व्यवस्था है लेकिन इसमें पिछड़ों की तथा अल्पसंख्यकों की जनगणना का प्रावधान नहीं है। यह बडी खेदजनक स्थिति है।
कहा जाता है कि पहले जाति के आधार पर जनगणना नहीं होती रही है। मैं कहना चाहता हूं कि समय परिवर्तनशील है। मंडल कमीशन लागू किया गया, आरक्षण प्रदान किया गया, शिक्षण संस्थाओं में भी पिछड़ों को आरक्षण दिया गया, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने पूछा कि आरक्षणका निर्धारण किस सर्वे के आधार पर दिया गया। हमारे गृह मंत्री एक मशहूर वकील हैं, उन्हें इस आधार पर स्वयं पिछड़ों की जनगणना के लिए पहल करनी चाहिए थी।
इसी प्रकार अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है। सच्चर कमेटी की नियुक्ति, उसकी रिर्पोट पर कार्यवाही, नए अल्पसंख्यक मंत्रालय का गठन, प्रधान मंत्री 15 सूत्री कार्यक्रम, देश के 90 अल्पसंख्यक बाहुल्य जनपदों के लिए विशेष योजना वगैरह क्रंतिकारी काम किए हैं लेकिन अल्पसंख्यकों की जनगणना नहीं की जा रही है। यह हमसे चूक हुई है। इसमें सुधार किया जाना चाहिए।
पिछड़ा वर्ग के लिए अलग योजनाएं हैं। अलग बजट है। उनकी आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति क्या है, उसकी जानकारी जनगणना के माध्यम से हो सकती है ताकि भविष्य में योजना बनाने में, इस वर्ग को आगे बढ़ाने में सुविधा होती।
यह तर्क दिया जाता है कि जनगणना प्रारंभ हो चुकी है। अतः अब उसमें परिवर्तन नहीं हो सकता है। यह तर्क अत्यंत लचर है। यदि ऐसी जनगणना कर ली जाती है तो उसका क्या महत्व है? मेरी मांग है कि जनगणना को रोक कर अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के साथ अल्पसंख्यक तथा पिछड़ों को शामिल करते हुए पूरी तैयारी के साथ पुनः जनगणना प्रारंभ की जाये।
मैं इसके लिए आपका अत्यंत आभार व्यक्त करता हूं।
*श्री अवतार सिंह भडानाः इस समय सदन में जनगणना पर चर्चा हो रही है । मैं गुर्जर समुदाय से आता हूँ । पिछली जनगणना1971 में हुई थी उसमें गुर्जर समुदाय को वंचित रखा गया था । इस अनदेखी का परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं और इसी कारण देश के कई भागों में गुर्जरों द्वारा आंदोलन किये जा रहे हैं । जहां जम्मू और कश्मीर की घाटियों में ये रहते हैं, वहां राजस्थान में ये रेतीली पहाड़ियों के पीछे रहकर अपना गुजर बसर करते हैं । यह एक घुमक्कड़ समुदाय है, जो पशुधन को पालते हैं और एक जगह से दूसरी जगह पर रोज अपना रैन बसेरा करते हैं । पशुपालन करके ही ये अपने परिवार की परवरिश करते हैं । इस समुदाय की अनदेखी हर क्षेत्र में हुई है, चाहे वह शिक्षा की दृष्टि से हो चाहे नौकरी की दृष्टि से हो । आज भी गुर्जर परिवार अधिकांशतः अशिक्षित, बेरोजगार और बेसहारा हैं । इनका कोई एक ठिकाना नहीं है। जंगलों में रहकर ये अपना गुजर बसर करते हैं । इनके पास न मतदान कार्ड हैं और न ही इनके पास कोई राशन कार्ड है । कहीं भी इनका स्थायित्व नहीं दिखाया गया है । आज राजस्थान, मध्य प्रदेश, एवं देश के अन्य भागों में ये अपने हक के लिए आंदोलन कर रहे हैं । राजस्थान की ताजाह घटना आपके सामने हैं, हां ये शिक्षा, नौकरी एवं अन्य जातियों की तरह अपने समाज के विकास के लिए आरक्षण मांग रहे हैं । हमारा देश की राजनीति बिना जाति और धरम के करनी बहुत ही मुश्किल है । इसलिए मैं जाति के आधार पर जनगणना करने का समर्थन करता हूँ । और मेरी सरकार से प्रार्थना है कि गुर्जर समुदाय चाहे वह जम्मू और कश्मीर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड का हो, उनके समाज को अन्य जातियों की तरह आगे बढ़ने का मौका देने के लिए इस जाति का शिक्षा, नौकरी में आरक्षण देना नितान्त आवश्यक है । गुर्जर समाज एक ऐसी जाति हैं जो देश के सबसे बड़े देश भक्त हैं । उनका नारा है कि पहले हम गुर्जर हैं और उसके बाद देश भक्त हैं । ये हिन्दू-मुस्लिम जातियों की तरह विभाजित नहीं है । जंगलों पर रहकर ये देश की सीमाओं, राज्य की सीमाओं में एक देश भक्त सिपाही की तरह अपनी सेवा दे रहे हैं । इस समुदाय को आरक्षण देकर वह सारी सुविधाएं उनके ही समान प्रदान की जाए जो अन्य आरक्षण प्राप्त जातियों को मिली हुई हैं ।
मेरी मांग है कि गुर्जर समुदाय की इन मांगों पर गंभीरता से विचार करेंगे ताकि स्वतंत्र भारत में इस वंचित समुदाय को आरक्षण और न्याय मिल सके । जनगणना2011 में जहां-जहां गुर्जर समुदाय के लोग हैं, उनको इस जनगणना में लिया जाए ।