State Consumer Disputes Redressal Commission
Zabbar Siddiqui vs National Insurance Co. Ltd. on 25 August, 2015
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2003/387 (Arisen out of Order Dated in Case No. of District ) 1. Zabbar Siddiqui Bareilly ...........Appellant(s) Versus 1. National Insurance Co. Ltd. Bareilly ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Jitendra Nath Sinha PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. Smt Balkumari MEMBER For the Appellant: For the Respondent: ORDER
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ।
मौखिक अपील संख्या-387/ 2003 (जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, द्वितीय बरेली द्वारा परिवाद संख्या-518/1994 में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 23-01-2003 के विरूद्ध) Zabbar Siddiqui, S/o Abdul Gaffar Siddiqui , R/o House No : Bajaria Inayatganj, District-Bareilly.
अपीलार्थी/परिवादी बनाम् National Insurance Co. Ltd. Through zonal Manager, Branch Office, Second 131, Civil Lines Bareilly.
प्रत्यर्थी/विपक्षी समक्ष :-
1- मा0 श्री जितेन्द्र नाथ सिन्हा, पीठासीन सदस्य।
2- मा0 श्रीमती बाल कुमारी, सदस्य।
1- अपीलार्थी की ओर से उपस्थित - श्री अरूण टंण्डन।
2- प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित - कोई नहीं। दिनांक : 25-08-2015 मा0 श्रीमती बाल कुमारी , सदस्या द्वारा उदघोषित निर्णय:
प्रस्तुत अपीलार्थी जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, द्वितीय बरेली द्वारा परिवाद संख्या-518/1994 में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 23-01-2003 से क्षुब्ध होकर अपील दिनांक 15-02-2003 को संस्थित किया है। जिसमें विद्धान जिला मंच ने निम्न आदेश पारित किया है:-
''परिवादी का परिवाद निरस्त किया जाता है। पक्षकार अपना-अपना व्यय स्वयं वहन करेंगे।'' अपीलार्थी की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री अरूण टंण्डन उपस्थित आए। उन्हें एकल रूप से सुना गया।प्रत्यर्थी की ओर से विद्धान अधिवक्ता अनुपस्थित।
हमने अपीलार्थी के विद्धान अधिवक्ता के तर्क सुने एवं उनके तर्क के परिप्रेक्ष्य में पत्रावली का परिशीलन किया।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार है कि परिवादी ने ट्रक संख्या-यूजीएल 465 लिया जिसका बीमा विपक्षी से दिनांक 28-02-1993 को कराया और जिसका प्रीमियम जमा किया। जो दिनांक 28-02-1994 तक वैध था। दिनांक 14-09-1993 को सायं 6 बजे पीलीभीत बाईपास के पास बीमित अवधि में निकट मजार शीफर बरेली में दुर्घटनाग्रस्त होकर क्षतिग्रस्त हो गया। जिसकी सूचना वादी द्वारा थाना बारादरी व विपक्षी बीमा कम्पनी को दी। परिवादी ने विपक्षी बीमा कम्पनी के निर्देशानुसार दुर्घटनाग्रस्त वाहन को दुर्घटना स्थल से श्यामगंज बरेली स्थित पप्पू बॉडी मेकर के यहॉं पहुँचाया। वाहन की मरम्मत हेतु वादी ने 57,650/-रू0 का भुगतान किया एवं वाहन में 7,789/-रू0 के नये पार्टस लगवाये। परिवादी को दुर्घटनाग्रस्त वाहन में 86,939/-रू0 की क्षति हुई। जिसको वह विपक्षी बीमा कम्पनी से पाने का हकदार है। जिसका भुगतान विपक्षीगण/प्रत्यर्थी द्वारा नहीं किया गया अत: परिवाद योजित किया गया।
विपक्षी/प्रत्यर्थी की ओर से लिखित कथन योजित किया गया जिसमें कहा गया कि परिवादी ने प्रस्तुत परिवाद उचित रूप से प्रस्तुत नहीं किया है और न ही हस्ताक्षरित है तथा वादी ने दुर्घटना की सूचना विपक्षी को नहीं दी और परिवाद गलत तथ्यों पर आधारित है। विपक्षी द्वारा कभी क्लेम देने से इंकार नहीं किया गया है। विपक्षी द्वारा कभी कोई सर्वेयर नियुक्त नहीं किया गया क्योंकि उसे कोई शिकायत की सूचना नहीं थी। विपक्षी द्वारा कोई क्लेम इनटरटेन नहीं किया गया और न ही इंकार किया गया अत: कम्पनी द्वारा सेवाओं में कोई कमी नहीं की गयी। परिवादी का परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत चलने योग्य नहीं है क्योंकि ट्रक मालिक उपभोक्ता नहीं है तथा अन्य तथ्यों को इंकार किया गया। परिवाद निरस्त होने योग्य है।
अपीलार्थी/परिवादी के विद्धान अधिवक्ता का तर्क है कि विद्धान जिला मंच द्वारा जो आदेश पारित किया गया है वह विधि अनुकूल नहीं है उसे निरस्त करते हुए अपील स्वीकार की जाए।
पत्रावली का परिशीलन यह दर्शाता है कि परिवादी/अपीलार्थी यह सिद्ध करने में असफल रहा है कि उसके द्वारा विपक्षी/प्रत्यर्थी के कार्यालय में प्रश्नगत वाहन के दुर्घटनाग्रस्त होने के संबंध में कोई सूचना दी गयी थी और न ही उसका दावा दर्ज हुआ था एवं उसकी जॉंच हुई है या विपक्षी/प्रत्यर्थी कम्पनी द्वारा कोई सर्वेयर नियुक्त किया था अत: ऐसी परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता है कि विपक्षी द्वारा अपनी सेवाओं में कोई त्रुटि की गयी है। अत: हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि विद्धान जिला मंच द्वारा जो आदेश पारित किया गया है वह विधि अनुकूल है उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। तद्नुसार अपील खण्डित होने योग्य है।
वर्तमान प्रकरण में यह भी पाया जाता है कि अपीलार्थी को पैरवी करने हेतु निर्देशित किया गया था किन्तु उनके द्वारा पैरवी नहीं की गयी है। अत: पैरवी न किये जाने के कारण भी अपील खण्डित किये जाने योग्य है।
आदेश अपील खण्डित की जाती है। पक्षकार अपना अपना अपीलीय व्यय भार स्वयं वहन करेंगे।
( जितेन्द्र नाथ सिन्हा ) ( बाल कुमारी ) पीठासीन सदस्य सदस्य प्रदीप मिश्रा, आशुलिपिक, कोर्ट नं0-3 [HON'BLE MR. Jitendra Nath Sinha] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. Smt Balkumari] MEMBER