Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Shri Arjun Ram Meghwal Called The Attention Of The Minister Of Social Justice And ... on 20 December, 2011

> Title: Shri Arjun Ram Meghwal called the attention of the Minister of Social Justice and Empowerment to the need to take adequate safety measures to protect the lives of Safai Karamcharis (Sewer cleaners) and provide health insurance cover to them.

   

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): महोदया, मैं सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री का ध्यान अविलम्बनीय लोक महत्व के निम्नलिखित विषय की ओर दिलाता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि वह इस संबंध में वव्तव्य दें:

"सफाई कर्मचारियों (सीवर क्लीनर) के जीवन का संरक्षण करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय करने  तथा उन्हें स्वास्थ्य बीमा कवर प्रदान किये जाने की आवश्यकता और सरकार द्वारा उठाए गए कदम।"
 

THE MINISTER OF SOCIAL JUSTICE AND EMPOWERMENT (SHRI MUKUL WASNIK): Madam Speaker, the Government is cognizant of the issue of sanitation workers who have to perform hazardous work of cleaning sewers … (Interruptions)

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):माननीय मंत्री जी से अनुरोध है कि यह तबका बहुत गरीब है, वह हिन्दी जानता है। इसलिए कृपया आप हिन्दी में बोलें। ...( व्यवधान)

 

SHRI MUKUL WASNIK: Madam Speaker, I will read the Statement in Hindi.

          सरकार को ऐसे सफाई कामगारों के मुद्दे का संज्ञान है जिन्हें सीवर की सफाई का जोखिम भरा कार्य करना पड़ता है।

2.       कार्य की स्थिति, नियोक्ता का दायित्व, कामगारों की क्षतिपूर्ति और वृद्धावस्था पैंशन सहित श्रमिक कल्याण संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 24 में शामिल है। इस प्रकार केन्द्र तथा राज्य सरकारों दोनों को इन मामलों में कार्रवाई करनी होती है।

3.       विशेष रूप से सीवर सफाई कामगारों और सैप्टिक टैंक क्लीनरों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दृष्टि से सफाई कर्मियों के कार्य करने की स्थितियों को विनियमित करने की अभिस्वीकृत आवश्यकता है। सरकार मौजूदा श्रम कानूनों के सुदृढ़ कार्यान्वयन तथा यदि आवश्यक हो तो नया विधान अधिनियमित करके इस उद्देश्य को प्राप्त करने की संभावना की जाँच कर रही है।

4.       आंध्र प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और दिल्ली नामक 6 राज्यों ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के अंतर्गत सीवर तथा सैप्टिक टैंक कामगारों को अधिसूचित कर दिया है तथा इसलिए इन राज्यों में मृत्यु अथवा अक्षम होने की स्थिति में ये कामगार उपर्युक्त अधिनियम के अंतर्गत सांविधिक मुआवज़े के अधिकारी हैं। इस कवरेज को संपूर्ण देश में प्रदान करने के प्रयास किये जाएँगे।

5.       यह भी आवश्यक है कि जोखिम भरे सफाई कार्य में लगे कामगारों के लिए नियमित स्वास्थ्य जाँच तथा पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित की जाए। इस उद्देश्य को मौजूदा श्रमिक कानूनों और अन्य साधनों के ज़रिये भी हासिल करने के प्रयास किये जाएँगे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना को भी इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त रूप से उपयोग में लाया जाएगा।

6.       सरकार ने सफाई कर्मचारियों सहित असंगठित कर्मचारियों जीवन और विकलांगता, स्वस्थ और मातृत्व लाभों और वृद्धावस्था संरक्षण को कवर करने के लिए सामाजिक सुरक्षा और कल्याण प्रदान करने संबंधी योजनाओं के लिए असंगठित कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 अधिनियमित किया है। इस अधिनियम में राज्य सरकारों द्वारा कल्याण योजनाएँ तैयार करने की भी व्यवस्था है।

7.       असंगठित क्षेत्र में बीपीएल परिवारों (पाँच का एक यूनिट) के लिए 30 हज़ार रुपये प्रति परिवार प्रति वर्ष स्मार्ट कार्ड आधारित कैशलैस स्वास्थ्य बीमा के लिए आरएसबीवाई प्रदान करने के लिए असंगठित क्षेत्र में बीपीएल परिवारों के लिए 1.10.2007 को आरंभ की थी।  ऐसे कर्मचारी जो बीपीएल श्रेणी में हैं, इस योजना के अंतर्गत शामिल किये जा रहे हैं।

8.       राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग सीवर कर्मचारियों सहित सफाई कर्मचारियों के हितों की मॉनीटरिंग और संरक्षण का कार्य करता है। इसकी सिफारिशों पर समुचित ध्यान दिया जा रहा है।

9.       सरकार विभिन्न उपाय करते हुए, माननीय सदस्यों से इस महत्वपूर्ण विषय पर बहुमूल्य सुझावों की प्रत्याशा रखती है। सरकार अपना दायित्व पूरी तत्परता से निभाने का प्रयास करती रहेगी।  

                                                                                             

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):धन्यवाद, अध्यक्ष जी। आपने समाज के सबसे शोषित और वंचित वर्गों के लिए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की जो अनुमति दी है, मैं उसके लिए आपका शुक्रिया अदा करता हूं। अध्यक्ष जी, यह समाज का वह तबका है जिसे वीकर सेक्शन ऑफ द सोसायटी कहा जाता है। लेकिन मैं उसको वीकेस्ट सेक्शन ऑफ द सोसायटी, सबसे कमज़ोर तबका कहता हूं। अभी गीता की बात भी आयी।  कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषुकदाचनः -यह गीता का उपदेश है। लेकिन जो गटर में काम करने वाले लोग हैं जो सीवर प्रणाली में काम करने वाले लोग हैं, उनको अपने जन्म के आधार पर यह घृणित कार्य करना पड़ता है और उसको काम का वह फल नहीं मिलता, जो मिलना चाहिए। हालांकि गीता में कहा गया कि फल की इच्छा मत करो। वह फल की इच्छा नहीं करता लेकिन सरकार को उनकी चिंता करनी चाहिए थी। मैं एक घटनाक्रम के माध्यम से आपको जानकारी देना चाहता हूं  कि सरकार ने इन वर्गो की चिन्ता नहीं की। संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया है  "वी द पिपुल ऑफ इण्डिया ", "हम भारत के लोग "। अभी अन्ना जी और अन्ना टीम के लोगों ने इस संविधान की प्रस्तावना के बारे में ख़ूब कहा, मीडिया में भी आया कि हम भारत के लोग हैं, लेकिन संविधान की प्रस्तावना में आगे भी कुछ लिखा हुआ है। समस्त नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय की परिकल्पना इस प्रस्तावना में की गयी है। संविधान की प्रस्तावना में यह भी कहा गया है कि इस परिकल्पना को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति की गरिमा बढ़ाने वाली बंधुता का उल्लेख किया गया है। इस प्रस्तावना में बहुत-सी चीज़ों का उल्लेख है। इसमें बहुत पूर्ण बातें कही गयी हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं  में अपूर्णता नज़र आती है।

          मैं आपके माध्यम से यह कहना चाहता हूं कि संविधान के अनुच्छेद पन्द्रह में यह साफ-साफ कहा गया है कि मूल वंश, धर्म, जाति, लिंग और जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। संविधान के अनुच्छेद सत्रह में छुआछूत को समाप्त किया गया और उसके बाद सरकार ने दो कानून बनाए - नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989। लेकिन फिर भी मैडम स्पीकर, यह सुनने में आता है कि दलितों के मानव अधिकारों का उल्लंघन लगातार जारी है। सरकार भी नहीं चेती और न ही सरकार गंभीर हुई।

          एक दिल्ली बोर्ड का मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में गया। वर्ष 2005 और 2006 में सेन्टर फोर एजुकेशन एण्ड कम्युनिकेशन ने सीवर सफाई मजदूरों के काम करने के हालात, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर के संबंध में एक सर्वेक्षण कराया। उस सर्वेक्षण के आधार पर उन्होंने एक रिपोर्ट भी दी। उसी सर्वेक्षण के आधार पर नेशनल कैम्पेन फोर डिग्निटी एण्ड राइट्स ऑफ सीवरेज एण्ड एलाइड वर्कर्स ने  ...( व्यवधान)दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। इसमें दिल्ली जल बोर्ड ने कहा कि ये ठेकेदारों के मजदूर हैं, हमारे नहीं। इसमें जो फैसला आया, उसमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह कहा कि चाहे मजदूर ठेकेदारों के क्यों न हों, आपको इन्हें मुआवज़ा देना पड़ेगा और न्यायालय में मुआवज़ा राशि तय कर दी। मैं आपके माध्यम से इस पूरे तंत्र को यह कहकर झकझोरना चाहता हूं कि जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दे दिया तो फिर दिल्ली जल बोर्ड दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ़ उच्चतम न्यायालय में अपील करने क्यों गया? उन्होंने मुआवज़ा क्यों नहीं दिया? यह कैसा तंत्र है?  

यह कौन सी संवेदनशीलता है? दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दे दिया और फिर उसके खिलाफ आप सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रहे हैं कि मुआवजा देना दिल्ली जल बोर्ड का काम नहीं है। दिल्ली जल बोर्ड की इसी टिप्पणी का, ये दिल्ली जल बोर्ड के कौन से अधिकारी हैं, जिन्होंने फाइल चलाई होगी,िकसी प्रोसिक्युशन विंग की टिप्पणी भी ली होगी, विधि विभाग में भी मामला गया होगा। क्या इतनी संवेदनशीलता सरकार को पता नहीं है। दिल्ली सरकार क्या कर रही थी? लेकिन जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणी की, वह बहुत खतरनाक थी। जब बहस हो रही थी तो उस समय भी कुछ वकीलों ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल करने का अधिकार नहीं है।

          अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आपने इतने एक्ट बना दिए। अभी मंत्री जी अपने जवाब में कह रहे थे कि हम इस विषय को कंकरेंट लिस्ट में ले आए हैं। 24 नम्बर पर ले आए हैं। सरकारों को कहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा नहीं कहा। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत कड़ी फटकार लगाई। वकीलों, दिल्ली जल बोर्ड और सरकार को भी चेताया। उन्होंने जो कहा, उसे मैं पढ़ना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि "यह किस तरह का सरकारी तंत्र है। सरकारी तंत्र में जो लोग बैठे हैं, उनमें क्या संवेदनशीलता नहीं हैं। जो गरीब होने के कारण मजबूरी में विकट परिस्थितियों में ऐसे कठिन काम करते हैं। एक तरफ पुलिस मुठभेड़ में मारे गए लोगों को मुआवजा देती है और जो काम करते हैं, इस देश की सफाई करते हैं, उनको मुआवजा देने के लिए इनकार करती है। ये मेरी टिप्पणी नहीं है, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि जब सरकारें ऐसे संवेदनशील इश्यु पर भी नहीं चेतेंगी तो हम हस्तक्षेप करते रहेंगे। ये डिबेट चली, मीडिया में भी आया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे दखलअंदाजी कैसे की? मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या सरकार संवेदनशील है या नहीं?

          मंत्री जी अभी 1993 का जिक्र कर रहे थे, जब मैंने इस प्रश्न को उठाया। मैं एक अन्य चीज भी कहना चाहता हूं, हम इसे पिछले मानसून सत्र में लाए तो यह कहा गया कि यह शहरी विकास मंत्रालय से संबंधित है। अब जब हम इसे अब लाए तो ये कह रहे हैं कि यह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से संबंधित है। मेरा प्रस्ताव भी ठोकरें खाते-खाते दो मंत्रालयों में अटक रहा है तो  सीवरेज़ कर्मचारियों की जो मुआवजे की राशि है, पता नहीं ये कितने मंत्रालयों में अटक रहा होगा, उसे कितनी ठोकरें खानी पड़ती होंगी।  सरकार के  मंत्रालयों में कोआर्डीनेशन नहीं है, जिसके कारण यह समस्या पैदा हुई है।

          अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि 1993 में शहरी विकास मंत्रालय ने एक मेनुअल तैयार किया, जिसका नाम है  - Manual on Sewerage and Sewage Plants published by the Ministry of Urban Development, 1993 provides guidelines on maintenance of sewerage system and various precautionary measures and safety equipment for sanitation workers. 1993 में ये मेनुअल इन्होंने प्रकाशित किया। अब तक सरकार क्या कर रही थी? क्या इस मेनुअल के बारे में सरकार को जानकारी नहीं थी? इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में क्यों फटकार खाई और फटकार खाने के बाद भी, मैं आपको एक अन्य चीज बताना चाहता हूं, हाईकोर्ट का डिसीजन आ गया, फिर इन्होंने कहा कि कैसे करेंगे, यह होगा या नहीं। फिर सुप्रीम कोर्ट का डिसीजन आ गया, फिर इन्होंने एक कमेटी बना दी। मंत्री जी को पता नहीं जानकारी है या नहीं, इस कमेटी की अभी तक 50 बैठकें हो चुकी हैं। उसमें एक रिटायर्ड आईएस ऑफिसर आता है, जो इसकी अध्यक्षता करता है। वह प्रत्येक मीटिंग का पांच हजार रुपए लेता है। गरीब को मुआवजा नहीं देते हैं और उसे पांच हजार रुपए प्रत्येक मीटिंग का दे रहे हैं और सीवरेज कर्मचारियों को मुआवजा देने के लिए कोई नीति तय नहीं कर रहे। यह कैसी सरकार है, यह बात समझ में नहीं आती है?

          अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि इसी सदन ने 1993 में एक कानून पास किया था, भारत सरकार ने कानून बनाया। जिसके तहत यह कहा गया कि हाथ से मैला ढोना और हाथ से मानव मल-मूत्र की सफाई करने की कुप्रथा को समाप्त किया जाता है। इसी संस्था ने यह सर्वे किया, अभी  मैं इसी का जिक्र कर रहा था। Centre for Education and Communication, सीवर सफाई पर सर्वे किया।  उन्होंने यह माना कि अभी भी देश में 13 लाख लोग, खासकर उसमें महिलाएं और दलित हैं। अभी भी  वे मानव मल-मूत्र की सफाई करते हैं और अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। सरकार के आंकड़े खुद कहते हैं कि 13 लाख लोग अभी भी ऐसे हैं, तो क्या मंत्री जी जब अपना जवाब देंगे, तब यह बताएंगे कि आपने एक हलफनामा उस समय भी सुप्रीम कोर्ट में दिया था और राज्यों की सरकारों को चीफ सैक्रेटरीज़ से कहा था कि कह दीजिए कि हमारे यहां यह प्रथा बन्द हो गई है। मुझे अच्छी तरह से ध्यान है, हमारे आगरा से एक सांसद रमाशंकर जी आते हैं, उन्होंने भी यह विषय उठाते हुए कहा था कि आगरा में अभी भी मैला उठाने की प्रथा है, यह कुप्रथा चल रही है, हाथ से सफाई हो रही है। एक प्रश्न के जवाब में जो रेल मंत्रालय से सम्बन्धित प्रश्न था, उसमें एक जवाब में मंत्री जी ने माना कि हां, मैं मानता हूं कि रेलवे में अभी भी हाथ से मल-मूत्र की सफाई होती है।

          अध्यक्ष जी, हम आपके माध्यम से यह जानना चाहते हैं कि जब आपने 1993 में कानून बना दिया, 1993 में एक मैनुअल बना दिया तो सरकार अभी तक चेती क्यों नहीं? सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं, यह भी पता नहीं चल रहा ह क्या सफाई कर्मचारियों के प्रति सरकार संवेदनशील है? मैं यह कहना चाहता हूं कि मैं बीकानेर संसदीय क्षेत्र से आता हूं, मुझे यह पीड़ा क्यों हुई, मैंने यह इश्यू क्यों उठाया। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि मैं राजस्थान के बीकानेर संसदीय क्षेत्र से आता हूं, वह रेगिस्तानी इलाका है। हमारे यहां कुछ असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग सीवरेज सिस्टम नहीं होने के कारण शहरों में, छोटे शहरों में और गांवों में एक कुई खोदते हैं। हमारे राजस्थान के लोग जानते होंगे, जो यहां बैठे हैं, वे कुई खोदते हैं।...( व्यवधान) हमारे साथी हैं, बहुत बढ़िया है। कुई खोदते-खोदते कभी-कभी वह कुई ढह जाती है तो वह जो असंगठित क्षेत्र का मजदूर है, उसकी मौत हो जाती है। मेरे सामने भी ऐसा एक केस आया। उन्होंने कहा कि यह सीवरेज सिस्टम में काम करता है, कुई खोद रहा था, इसकी डैथ हो गई, इसको कुछ मुआवजा दिया जाये। मैंने जिला कलैक्टर से बात की, मैंने विकास अधिकारी से बात की तो मुझे क्या जवाब मिला। मुझे यह जवाब मिला कि ये गैरकानूनी काम कर रहे थे, यह सरकारी जवाब है कि ये गैरकानूनी काम कर रहे थे। मैंने उन मजदूरों से पूछा कि क्या गैरकानूनी काम था, आप क्या कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि हमें तो इस मालिक ने कहा था कि आप एक कुई खोद दो, जिससे मेरे घर का जो कचरा है, मल-मूत्र है, वह इसमें समा जाये, जो 8-10 साल में भर जायेगा तो फिर एक दूसरी कुई खोद लेंगे। अब सीवरेज सिस्टम तो गांवों में है नहीं, छोटे-छोटे कस्बों में भी नहीं है।  उसका मकान मालिक अपने घर में सफाई रखने के लिए देखता है और एक कुई खुदवा लेता है और जब वह कुई खुदवाता है और उसमें कोई एक्सीडेंट हो जाता है, वह असंगठित क्षेत्र का मजदूर होता है या तो वह बाल्मीकि समाज का होता है या वह इतना भूखा होता है कि उसको पेट पालने के लिए इस काम को करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।  फिर उसको सरकार यह कहती है कि आप गैरकानूनी काम कर रहे थे। मुझे तो उस जवाब पर शर्म आती है कि कैसे उन्होंने कह दिया कि गैरकानूनी काम कर रहे थे और उनको कोई मुआवजा नहीं दिया जाता है।

          अभी मंत्री जी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की बात कर रहे थे। उसकी भी मैंने उनसे बात की, बोले कि यह उन पर लागू नहीं है, फिर वह किस पर लागू है? बोले, यह उन पर लागू नहीं है और अभी तक उनको मुआवजा नहीं मिला, इसलिए मुझे पीड़ा हुई और मैंने कई बार अध्यक्ष जी आपसे व्यक्तिगत सम्पर्क करके कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है, मैं इस विषय को उठाना चाहता हूं। मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने इस विषय को इस ऑगस्ट हाउस में उठाने की मुझे अनुमति दी। मेरे सब साथी भी इस समय गम्भीर होकर सुन रहे हैं, लेकिन मैं यह कह रहा हूं कि हाई कोर्ट की फटकार, सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी सरकार क्या कह रही है कि हमने इसको समवर्ती सूची की एण्ट्री 24 में डाल दिया है। मंत्री जी, उसको एण्ट्री नं. 24 में डालने की जरूरत नहीं है, आपको एक ऐसी नीति बनानी पड़ेगी, जो गटर में काम करते हैं, उनको सेफ्टी के उपकरण उपलब्ध कराने पड़ेंगे, उनको ऑक्सीजन मास्क देना पड़ेगा। हाई कोर्ट ने यह भी कहा है, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि आप ये उपकरण क्यों नहीं दे रहे हो तो दिल्ली जल बोर्ड ने क्या कहा कि उपकरण देने के लिए हमारे पास बजट नहीं है तो फिर कौन से आदमी के लिए आपके पास बजट है? यह सरकार आम आदमी की बात करती है, आम आदमी के नाम पर सत्ता में आती है और फिर आम आदमी को ही नकारने का काम करती है, यह ठीक नहीं है।  यह बात केवल राजस्थान की नहीं है, देश भर की पालिसी बनने की बात है, जो घरों की सफाई करते हैं, जो पूरे देश में सफाई करते हैं, जो मजबूरी में ऐसा घृणित कार्य करते हैं, लेकिन पेट भरने के लिए करते हैं।  संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम नागरिकों की डिगनिटी को ध्यान में रखेंगे, उनकी बंधुता को बढ़ायेंगे, सामाजिक न्याय देंगे।  उनको अब तक क्यों सामाजिक न्याय नहीं दिया जा रहा है?  महोदया, मैं आपके माध्यम से सरकार से पूछना चाहता हूं। ...( व्यवधान) मैं सुझाव दे रहा हूं।

अध्यक्ष महोदया : आप इधर संबोधित करिए।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : महोदया, मैं सुझाव पर आ रहा हूं।  मैंने जैसा बताया कि सर्वे में करीब तेरह लाख इनकी संख्या है, हो सकता है कि इनकी संख्या ज्यादा हो, पहला तो मेरा यही सुझाव है कि सरकार एक प्रॉपर सर्वेक्षण कराए कि कितना आंकड़ा है, जो अभी भी हाथ से सफाई का काम करते हैं?  यह आंकड़ा सही होना चाहिए।  यह बीपीएल की लिस्ट की तरह नहीं होना चाहिए कि वह लिस्ट अभी भी तय नहीं हुयी कि कितने बीपीएल हैं?  यह बीपीएल की लिस्ट की तरह नहीं होना चाहिए, इस पर कमेटी पर कमेटी बनाने की जरूरत नहीं है।  आप नगर पालिकाओं से सूची ले सकते हैं, जो इस सेक्टर में काम करने वाले एनजीओज हैं, उनसे सूची ले सकते हैं, चाहें तो आप मेंबर आफ पार्लियामेंट से भी सूची ले सकते हैं, अगर आपके पास बजट की कमी है तो हम आपको सर्वे करके दे सकते हैं, क्योंकि इस परोपकार के कार्य के लिए अपनी सेवा देने के लिए हम तैयार हैं।  हम सरकार को सर्वे करके दे सकते हैं कि कितने सफाई कर्मचारी हैं, जो अभी हाथ से मैला ढोते हैं।  एक तो इनका सर्वेक्षण प्रापर हो, कोई तेरह लाख कह रहे हैं, कोई बीस लाख कह रहे हैं, कोई तीस लाख कह रहे हैं, ये कितने लोग हैं?  उनके लिए एक पॉलिसी बने।  जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा के बारे में कह दिया कि उसका लाभ लो, ऐसा नहीं, इनके लिए अलग से एक पॉलिसी बननी चाहिए।

          सुप्रीम कोर्ट ने काफी चीजें रिकमेंड की हैं, मंत्री जी को जानकारी भी होगी, लेकिन अगर जानकारी नहीं है, तो मैं बताना चाहता हूं।  उन्होंने कहा है कि इनको सुरक्षा कवच चाहिए, जो सीवरेज में काम करने वाला आदमी है। जैसे ही आपने इस चर्चा की मंजूरी दी, दिल्ली में मैंने जाकर भी देखा।  मैंने एक मजदूर से पूछा कि आप कैसे काम करते हो?  उन्होंने कहा कि हमें किसी तरह के यंत्र या उपकरण नहीं मिलते हैं।  हम जैसे ही गटर में घुसते हैं, तो शरीर पर सरसों का तेल लगा लेते हैं।  मैंने पूछा कि बस इतना ही समान है।  वह बोला कि कच्छा, बनियान पहने हुए शरीर पर सरसों का तेल लगाकर अंदर घुस जाते हैं।  वहां जहरीली गैसें होती हैं।  कई बार मजदूर गैंसों के कारण मर जाता है।  सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट यह भी कहती है कि अस्सी परसेंट सीवर कर्मचारी रिटायरमेंट की आयु से पहले ही मर जाते हैं।  अध्यक्ष जी, यह कितना गंभीर मामला है कि उनकी रिटायरमेंट की आयु साठ वर्ष होती है, लेकिन कोई 45 या 50 वर्ष की आयु में मर जाता है।  ये एक्सीडेंट से मरने वाले नहीं हैं, एक्सीडेंट से मरने वाले अलग हैं।  एक्सीडेंट से मरने वालों पर ये दिल्ली हाई कोर्ट गए थे, क्योंकि जल बोर्ड ने मना किया था, उसने कहा था कि हम मुआवजा नहीं दे सकते हैं, वह संख्या तो तीस है, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह संख्या दिल्ली में तीस नहीं साठ है।  बड़े शहरों में इनकी संख्या हजारों में होगी।  मैं जो एक्सीडेंट से मर रहे हैं, मैं उनके बारे में नहीं कह रहा हूं।  मैं उनके बारे में कह रहा हूं, जो गैस के कारण मर जाते हैं।  जो अंदर गए, उनको एक ऐसी स्किन डिसीज हो गयी, उसके बाद उनके घर वाले भी उसके नजदीक नहीं आते हैं कि तुम्हें तो बीमारी हो गयी, वे तो ऐसे ही मर जाते हैं।  वह जो संख्या है, वह कितनी है, इसकी जानकारी भी ली जाए।  उनके लिए अलग से एक योजना लायी लाए।  

          दूसरा, इनके जितने भी सुरक्षा कवच हैं, चाहे ऑक्सीजन का मास्क हो या दूसरे उपकरण हों, अभी मैं उनके पास देखकर आया कि एक फावड़ा है, एक रस्सी है और एक सरसों के तेल की शीशी उनके पास है, बस इतना लगाकर वे अंदर घुस जाते हैं।  ...( व्यवधान) उनके पैर में जूते भी नहीं हैं।  हैंड ग्लब्ज नहीं हैं, पैर में न  जूते हैं न ऑक्सीजन मास्क है, जितने भी सुरक्षा उपकरणों की जरूरत है  ये उनको मिलने चाहिए।  हांगकांग में एक संस्था है, वह अच्छा काम कर रही है।   हांगकांग में सिवरेज सिस्टम बहुत बढ़िया हैं। उसका अध्ययन भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती है? उसका अध्ययन मंत्री जी क्यों नहीं कर सकते हैं?  विकसित देशों में सिवरेज में मेकैनिकल सिस्टम लागू हो गया है। मेरा दूसरा सुझाव है कि क्या आप इन को हाथ से काम करने देंगे या इनका सिस्टम मेकैनिकल करेंगे? क्योंकि जब तक आप इन को मेकैनिकल उपकरण उपलब्ध नहीं कराएंगे तब तक यह प्रथा समाप्त नहीं होगी। जो संस्था है उसको भी कम्प्लशन करिए कि वे भी मेकैनिकल उपकरण  से ही कार्य कराएंगे, वह चाहे कोई ठेकेदार हो या जलबोर्ड हो। मेरा अगला सुझाव है कि उनका बीमा कवर होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, it is not sufficient. मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि उन के लिए अलग बीमा योजना हो। वे कितना घृणित कार्य करते हैं तो क्या इनके लिए आप एक अलग बीमा योजना नहीं ला सकते हैं? आपने इसे एमाउण्ट के साथ जोड़ दिया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में बीपीएल होना चाहिए। मंत्री जी जवाब देंगे तो बताएंगे। यह काम करने वाले कई लोगों का नाम बीपीएल की सूची में नहीं होता है। ये काम तो ऐसा करते हैं लेकिन BPL सूची सही नहीं बनती है। इसलिए वे बीपीएल की श्रेणी में नहीं आते हैं। वे बीपीएल नहीं होते तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का उन्हें लाभ नहीं मिलता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने एक दूसरे फैसले में यह टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है “एक तो हंगर लिस्ट होनी चाहिए और एक बीपीएल लिस्ट होनी चाहिए। इस देश में कितने लोग भूखे मर रहे हैं, आप उनकी एक लिस्ट बना लो।”  यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने की है। मैं आप के माध्यम से कहना चाह रहा हूं कि इनके लिए अलग से बीमा योजना लागू होनी चाहिए। इनके लिए अलग से आवास योजना लागू होनी चाहिए। अभी मैं दिल्ली की एक बस्ती में गया  तो देखा कि एक टप्पर सा लगा हुआ है उसमें ये लोग रह रहे हैं। उनके रहने के लिए कोई मकान ही नहीं है। उनके लिए अलग से मकान, अलग से बीमा योजना और जितना भी सुरक्षा कवच है, सभी दी जानी चाहिए। क्योंकि ये जो काम कर रहे हैं वह साधारण काम नहीं है। एक शायर ने इनके बारे में लिखा है। वह मैं पढ़ कर सुनाना चाहता हूं कि यह काम कितना महत्वपूर्ण है। वाल्मिकी समाज के लोग हों या ठेकेदारों के माध्यम से जिन को भूख लगती है, व  भूख मिटने का और कोई साधन नहीं है जो इस काम में लग जाते हैं असंगठित क्षेत्र उनके लिए शायर ने लिखा है कि "इन्होंने हर गम को खुशी में ढाला है, इनका अंदाज ही निराला है। लोग जिन हादसों से डरते हैं, इनको उन हादसों ने पाला है।"

अध्यक्ष महोदया :  अब समाप्त कीजिए।
श्री अर्जुन राम मेघवाल :  मैं कन्क्लूड ही कर रहा हूं। मैं यह कहना चाहता हूं कि पिछली बार मंत्री जी ने जवाब दिया कि हम ने इनकी योजना बनाने के लिए प्लानिंग कमीशन में प्रकरण भेज दिया है। मैडम, प्लानिंग कमीशन से लोगों का भरोसा अब उठ रहा है। वह 24 रूपये और 32 रूपये की बातें करते हैं। आप इनकी योजना बनाने के लिए प्लानिंग कमीशन में मत भेजो। एक छोटी कमेटी बना कर, इसे मेकैनिकल करने का वादा सरकार करे। तीसरा सुझाव मैं यह देना चाहता हूं कि जेएनएनयूआरएम एक योजना है। क्या इस काम को आप जेएनएनयूआरएम से नहीं जोड़ सकते हैं? यह शहरों के सिवरेज प्रणाली से संबंधित है। अभी तक इस को आपने जेएनएनयूआरएम से जोड़ा नहीं है। मेरा यह सुझाव है कि सरकार इसे जेएनएनयूआरएम से जोड़े और अगर जलबोर्ड या किसी के पास बजट कम है तो बजट उपलब्ध कराए। इन्हें बीमा एवं स्वास्थ्य बीमा योजना से भी जोड़ने के साथ-साथ रेलवे में भी हाथ से मैला ढ़ोने की जो परम्परा है उसे भी समाप्त करें। मैं मानता हूं कि यह सरकार के लिए चुनौती है लेकिन दुष्यंत कुमार जी ने ठीक कहा है कि ""यह पीर, हो गई है पीर पर्वत-सी अब पिघलनी चाहिए और इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए""।
अध्यक्ष महोदया :  बहुत अच्छा।अब आप समाप्त कर दीजिए।
श्री अर्जुन राम मेघवाल :  ""आग मेरे सीने में न सही, आप के सीने में सही। जहां कहीं भी हो आग, आग लगनी चाहिए।" सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं है। मेरा यह उद्देश्य नहीं है कि कॉलिंग अटेन्शन ला कर सरकार को खींचूं। मेरा यह मकसद हो भी सकता है लेकिन मेरी कोशिश है कि सिवरेज कर्मचारियों की सूरत बदलनी चाहिए। धन्यवाद।
श्री शैलेन्द्र कुमार :  अध्यक्ष महोदया, हमने नोटिस दिया है।
अध्यक्ष महोदया :  आपका नाम बैलेट में नहीं है।
 
श्री शैलेन्द्र कुमार :  मैंने पिछली बार भी नोटिस दिया था।
अध्यक्ष महोदया :  ऐज ए स्पेशल केस, आप एक सवाल पूछिए।
श्री शैलेन्द्र कुमार : धन्यवाद अध्यक्ष महोदया। पिछली बार यह ध्यानाकर्षण मेरे नाम से आया था, लेकिन आखिरी वक्त पर चूंकि संसद का सत्र समाप्त हो रहा था इसलिए इस पर चर्चा नहीं हो पाई। अर्जुन मेघवाल जी ने जो बातें उठाई हैं, मैं उनसे अपने को समबद्ध करते हुए कहना चाहूंगा कि यह बात सत्य है कि इन लोगों की संख्या लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ों में है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि इस विषय को सामाजिक न्याय एवम् अधिकारिता मंत्रालय से ही नहीं, बल्कि शहरी विकास मंत्रालय और जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिनुअल मिशन के साथ भी जोड़ना चाहिए।
           यह भी देखा गया है कि नगर पालिकाओं, नगर निगम और ग्रामीण क्षेत्रों में जो टाउन एरियाज हैं, उनसे भी ये लोग सम्बन्ध रखते हैं। चाहे गटर हो, सुक्ता हो या गड्ढे हों, ये लोग बड़ा जोखिम भरा काम करते हैं और समाज से बहुत उपेक्षित रहते हैं। यहां तक कि इन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, छुआछूत भी मानते हैं। इस सम्बन्ध में मेरे मन में दर्द और पीड़ा है। मैं बताना चाहूंगा कि ये लोग गांवों में बस्ती के किनारे, उत्तरी क्षेत्र में झोंपड़ी या मकान बनाकर रहते हैं। इन्हें हैंडपम्प पर पानी नहीं पीने दिया जाता है। जब पूरा गांव पानी भर लेता है, तब वह बेचारा अंतिम छोर का व्यक्ति, वाल्मीकि समाज का हरिजन आकर वहां से पानी भरता है। यह स्थिति आज है और यह इनकी दुर्दशा है। जब ये लोग पानी भर लेते हैं, तो उस हैंडपम्प को धोया जाता है, तब दूसरे लोग पानी पीते हैं। हमारे माननीय नेता जी कहते हैं कि अगर कोई चीज ये लोग छू भी लें तो उसे सोना डालकर, पानी डालकर शुद्ध करके इस्तेमाल करते हैं। इतना उपेक्षित और घृणित समाज इन्हें समझा जाता है। इनके बच्चों के शिक्षा की, स्वास्थ्य की, रोजगार और आवास की समस्या बहुत है। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से इतना ही जानना चाहूंगा कि इन्हें सुरक्षा कवच मुहैया कराया जाए।
          यह बात भी सत्य है कि हममें से कई लोग गांव या शहरों में जब गटर में इन्हें जाना होता है, तो इन्हें शराब पिला दी जाती है और फिर इन्हें गटर में सफाई के लिए उतारा जाता है। यह बात अर्जुन मेघवाल जी ने नहीं बताई, मैं बता रहा हूं। हम लोग जो समाज के जिम्मेदार लोग हैं, थोड़ी सी शराब पिलाकर उन्हें गटर में उतारते हैं, जहां पर उन्हें होश-ओ-हवास नहीं रहता और कई बार तो उनकी मृत्यु तक हो जाती है। आज जो राष्ट्रीय सुरक्षा बीमा योजना लागू करने की बात कही गई है। मैं कहना चाहता हूं कि इन लोगों के लिए सरकार अलग से एक कारगर नीति बनाए और विशेष बीमा योजना के तहत इन्हें शामिल करके इनके स्तर को सुधारने की बात माननीय मंत्री करेंगे, इतना ही मैं कह कर अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री रामकिशुन (चन्दौली): अध्यक्ष महोदया, मैं एक बात कहना चाहूंगा।
अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाएं, यह कोई प्रश्न काल नहीं है।
 
श्री मुकुल वासनिक: अध्यक्ष महोदया, मैं अर्जुन मेघवाल जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं कि आज इस अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर उन्होंने ध्यान आकर्षित करने का प्रस्ताव सदन में रखा और जिसकी आपने अनुमति दी। इसी कारण आज एक बहुत ही संवेदनशील विषय पर सदन में चर्चा होना सम्भव हो पाया है। जिस भावना से, जिस पीड़ा से, जिस दर्द से माननीय सदस्य अर्जुन मेघवाल जी ने सारी परिस्थितियों का वर्णन किया, मैं उनकी बात से अपने आपको जोड़ता हूं। उम्मीद करता हूं कि आज की चर्चा का असर इस तरह से हो कि सफाई कर्मचारियों की जिंदगी बेहतर होने में इस चर्चा का लाभ निश्चित तौर से मिल पाए।
          सिर पर मैला ढोने के संदर्भ में यहां पर चर्चा हुई। यह कहा गया और जानकारी इस तरह की भी है कि देश में करीब 13 लाख लोग सिर पर मैला ढोने का काम करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकारों से जो जानकारी केन्द्र सरकार को प्राप्त हुई, उसके आधार पर मैं बताना चाहूंगा कि हमारे पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 1,16,000 के करीब इनकी संख्या है।...( व्यवधान) आप कृपया सुन लीजिए। मैं समझता हूं कि यहां पर किसी भी तरह से सरकार या विपक्ष में ऐसे विषय पर चर्चा न हो तो बेहतर होगा। जिस भावना से यहां सिर पर मैला ढोने वाले कर्मचारियों की स्थिति पर बात हुई है, उस भावना से मैं भी अपने आपको अलग नहीं रखता, हमारी भी वही भावना है। इसलिए प्रदेश सरकारों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1,16,000 के करीब ऐसे व्यक्ति थे जो सिर पर मैला ढोने का काम किया करते थे।
 
13.00 hrs.      केन्द्र सरकार की एक योजना उनके पुनर्वास के लिए, उनके स्वरोजगार के लिए शुरु की गयी और राज्य सरकारों के माध्यम से जहां पर उन्होंने कुछ स्टेट चैनलाइजिंग एजेंसीज नियुक्त कीं, उन एजेंसीज के जरिये सिर पर मैला ढोने वाले व्यक्तियों के पुनर्वास का कार्यक्रम चलाया गया। यहां पर मैं यह भी कहना चाहूंगा माननीय स्पीकर महोदया कि जब आप इसी मंत्रालय में मंत्री की हैसियत से जिम्मेदारी संभालती थी तो जितनी जिम्मेदारी से आपने इस काम को संभाला, उससे मैला ढोने वाले व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए बहुत गति प्राप्त हुई और पूरे कार्यक्रम को गंभीरता से लेने का काम हुआ। ...( व्यवधान) राज्य सरकारों से समय-समय पर हमें जो आंकड़े आते गये, वे बड़े विचित्र स्वरूप के थे, अगर मैं यह कहूं तो वह गलत नहीं होगा। हर महीने-दो महीने में जो जानकारी आती थी आंकड़े कम होते थे, कहीं कोई मर गया, कहीं कोई लापता है, कहीं कोई नाबालिग है या कहीं पर कोई डिफाल्टर है, इसीलिए इस श्रेणी में आने वाले व्यक्तियों के पुनर्वास की आवश्यकता नहीं, यह राज्य सरकारों से बात आने लगी। हमने राज्य सरकारों से कहा कि आप हमें आंकड़े मत दीजिए, ...( व्यवधान) I think, this is a very important issue, let us take it with extreme seriousness.
अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइये। Please don’t disturb. Sit down, please.
श्री मुकुल वासनिक :  हमने राज्य सरकारों से यह अनुरोध किया कि कृपया आप आंकड़े मत दीजिए, सूची दीजिए, यह बताएं कि कौन सा व्यक्ति मर गया, कौन सा लापता है, कौन सा नाबालिग है, कौन सा डिफाल्टर है? वह सूची मंत्रालय में प्राप्त हुई है, मंत्रालय की वैबसाइट पर है, पूरे प्रदेश के विभागों के वैबसाइट पर है, मैं समझता हूं कि उसे भी देखने की आवश्यकता होगी। लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद और करीब 80 हजार लोगों के पुनर्वास का कार्यक्रम चल पाया तथा अन्य दूसरे लोग इस श्रेणी में नहीं आते, यह राज्य सरकार की जानकारी थी। मार्च 31, 2010 को सारे प्रांतों की सरकारों ने यह कहा कि अब किसी के पुनर्वास की आवश्यकता नहीं है। माननीय अर्जुन मेघवाल जी कहते हैं कि कहीं-कहीं आंकड़े 13 लाख तक के भी बताए जाते हैं। नेशनल एडवाइजरी कौंसिल में इस संदर्भ में चर्चा हुई, यूपीए चेयर-पर्सन माननीय सोनिया गांधी जी ने माननीय प्रधान मंत्री जी को पत्र लिखा। गरिमा नाम का  एक एनजीओ है जो मैला ढोने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए काम करता है। सफाई कर्मचारी आंदोलन नाम का एक दूसरा संगठन है जो इन वर्गों के हितों के लिए काम करता है। उन्होंने भी हमें जानकारी और सूची दी कि इन राज्यों में, इन जिलों में यह व्यक्ति है, उसकी यह तस्वीर है जो आज भी मैला ढोने का काम करता है। हमने 24 घंटे के भीतर प्रदेश की सरकारों को यह जानकारी भेजी कि यह आज हमारे पास जानकारी उपलब्ध है, कृपया इसकी तहकीकात कीजिए और वास्तविकता क्या है, वह हमारे पास भेजिये।
          सर्वे की बात माननीय मेघवाल जी ने कही। नया सर्वे ऐसी स्थिति में जहां प्रदेश की कोई सरकार यह नहीं मानती कि आज भी पुनर्वास की आवश्यकता है, हमने फिर एक सर्वे कराने का फैसला किया और कुछ ही दिनों में वह सर्वे शुरु होगा। लोकल बॉडीज इसमें शामिल की जाएंगी और जहां-जहां लोक प्रतिनिधियों को इसमें शामिल होना है, एनजीओज को शामिल होना है, उन्हें भी शामिल किया जाएगा ताकि ऐसा सर्वे आये, कि हमारे सामने वास्तविकता रहे कि कितने लोग आज भी हैं जिनके पुनर्वास की आवश्यकता है।
          हमारे दूसरे साथी माननीय शैलेन्द्र कुमार जी ने कहा कि सीवर में काम करते वक्त, गटर में काम करते वक्त इन कर्मचारियों को शराब पिलाई जाती है क्योंकि बगैर शराब पीये कोई ऐसे गंदे काम करने के लिए कोई खुद को नहीं डाल सकता है। ऐसी काम की परिस्थितियां, जिससे काम के संदर्भ में होने वाली परेशानियां, उनकी आयु घटने जाने की स्थिति, ये सारी परिस्थितियां बड़ी चिंताजनक हैं। हम इन सभी बातों को बड़ी गंभीरता से लेते हैं। आज आवश्यकता है कि जिसकी जो जिम्मेदारी है, उस जिम्मेदारी का निर्वहन करे।   अगर लोकल बॉडीज़ के अधीन ये कर्मचारी हैं तो लोकल बॉडीज़ को उनकी सुरक्षा के लिए, रक्षा के लिए कदम उठाना होगा। जहां राज्य सरकार के अधीन हैं, वहां राज्य सरकार को करना होगा। जहां केन्द्र सरकार के अधीन हैं, वहां केन्द्र सरकार को करना होगा। मैंने शुरू के अपने वक्तव्य में यह बात कही थी कि इम्पलाईज़ कम्पनसैशन एक्ट को छः प्रांतों में इन कर्मचारियों के लिए लागू करने का काम हुआ, अन्य प्रांतों ने नहीं किया। मैंने मल्लिकार्जुन खरगे जी से अनुरोध किया है, क्योंकि यह कानून उनके दायरे में आता है, कि सिर्फ छः प्रांतों में ही क्यों? क्यों नहीं अन्य प्रांतों में भी इसे लागू किया जाता है? दूसरे प्रांतों में भी यदि लागू किया जाएगा तो जो स्टैच्यूटरी बैनीफिट्स इम्पलाईज़ कम्पनेसैशन एक्ट के तहत प्राप्त होते हैं, अन्य कर्मचारियों को, इन कर्मचारियों को भी वे प्राप्त होंगे, यह हमें करना होगा और हमें प्रदेश की सरकारों को बताना होगा।
          स्वास्थ्य बीमा योजना के संदर्भ में कहा गया है कि जो बीपीएल की श्रेणी में आते हैं, उनको ही इस बीमा योजना का लाभ प्राप्त होता है, अन्य दूसरों को नहीं होता है। ये भी एक प्रस्ताव आज मल्लिकार्जुन खरगे जी के पास है कि सभी सफाई कर्मचारी को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत जोड़ा जाए। उस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन इन्होंने जो प्रस्ताव तैयार किया है, उसकी जानकारी मुझे भी है।...( व्यवधान) वह सुझाव आज की चर्चा में आया है, उस पर भी ध्यान देंगे, लेकिन जो आज हो रहा है, उसके बारे में मैं अपनी बात आपके सामने रखना चाहता हूं। हम यह मानते हैं, सामाजिक न्याय की यहां पर बात हुई, बुनियादी मानवीय अधिकारों की जहां पर रक्षा होती है, वैसी स्थिति में हम कह पाएंगे कि हम सामाजिक न्याय करते हैं। सम्मान से जीवित रहने का अधिकार की अगर हम रक्षा कर पाएंगे तो हम कह पाएंगे कि हम सामाजिक न्याय करते हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग अगर सम्मान से नहीं जी पाता है, उसको यह अधिकार हम मूर्त रूप से नहीं दे पाते हैं तो फिर हम उसके प्रति सामाजिक न्याय नहीं करते हैं। संविधान में यह अधिकार है, लेकिन वास्तविकता में अगर यह अधिकार प्राप्त नहीं होता है तो हमें ध्यान देना होगा।
          यहां प्रोटैक्शन ऑफ सिविल राइट्स, 1955 के कानून की बात हुई। शेडयूल्ड कॉस्ट एण्ड शेडयूल्ड ट्राइब्स प्रिवैंशन आफ एट्रोसिटीज़ एक्ट, 1989 की बात हुई। ऐसा क्यों होता है कि आज के हिन्दुस्तान में भी 30-35 हजार घटनाएं इन कानूनों के बावजूद हर साल दर्ज होती हैं। इस तरह की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने का काम जो लोक प्रतिनिधि इस सदन में आते हैं, अगर इस काम में लग जाएंगे, केवल सरकार काम करने से ही नहीं हो सकता है, इसके लिए समाज को और अधिक संवेदनशील बनाने की आवश्यकता होगी।
          कई सारे सुझाव चर्चा आए हैं, उन तमाम बातों में जाना सम्भव नहीं होगा, लेकिन सैनिटेशन के संदर्भ में जहां ग्रामीण विकास मंत्रालय में टोटल सैनिटेशन स्कीम चली है, हाउसिंग एंड अर्बन पावर्टी एलीविएशन मिनिस्टरी के तहत जो लो कास्ट सैनिटेशन प्रोग्राम चला है, उसका भी असर यह प्रथा समाप्त करने की दृष्टि से निश्चित तौर पर होगा। रेलवेज़ के संदर्भ में भी यहां उल्लेख किया गया है। रेलवे से भी हम लगातार इस विषय पर बात कर रहे हैं और जो सर्वे मैनुअल स्कैवेंजिग के संदर्भ में किया जाएगा, अगर रेलवे में भी कहीं होता है, तो उसका भी सर्वे इसमें अंतरभूत किया गया है।
          माननीय सदस्यों ने जितने भी सुझाव दिए हैं, कहीं वे लेबर मिनिस्टरी से संबंधित हैं, तो हम उनसे बात करेंगे। अगर अर्बन डवलपमेंट या हाउसिंग एंड अर्बन पावर्टी एलिविएशन से संबंधित हैं, तो उनसे बात करेंगे और अगर कहीं प्रदेश की सरकारों से संबंधित है, तो उनसे भी बात करेंगे। मैं श्री अर्जुन मेघवाल को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। बहुत पीड़ा से, बहुत जिम्मेदारी से आपने यहां इस विषय पर चर्चा कराई है, मैं समझता हूं कि इसका लाभ निश्चित तौर पर हमें होगा।
)   अध्यक्ष महोदया : बहुत धन्यवाद। मैं समझती हूं कि जिस तल्लीनता और संवेदना से सदन में सभी सदस्यों ने इस चर्चा को सुना है और जिस प्रकार से चर्चा की गई है, समाज का जो सबसे दलित व्यक्ति है, दबा हुआ है, उसकी पीड़ा को उजागर किया गया है। उससे मैं समझती हूं इससे सदन का वैभव और बढ़ गया है।
श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): माननीय अध्यक्ष महोदया, इस विषय पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।
अध्यक्ष महोदया :  ठीक है, आप नोटिस दीजिए।
 (Placed in Library, See No. LT 5899/15/11)