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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motor-Vehicles (Amendment) Bill, 2000 Moved By Shri ... on 26 July, 2000

Title: Further discussion on the Motor-Vehicles (Amendment) Bill, 2000 moved by Shri Rajnath Singh on 25-7-2000.

1438 hrs MR. Deputy-Speaker: The House will continue discussion on Motor Vehicles (Amendment) Bill. Shri Rajo Singh was on his legs.

१४.३८ बजे श्री राजो सिंह (बेगूसराय) : उपाध्यक्ष महोदय, मोटरयान (संशोधन) विधेयक, २००० पर मैंने कल अपना भाषण प्रारम्भ किया था, लेकिन समय नहीं मिलने के कारण आज मुझको आपने बोलने का अवसर दिया है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

बिल बहुत छोटा है, लेकिन बिल को हाउस में प्रवेश कराते-कराते सम्माननीय मंत्री जी ने बहुत समय ले लिया। मुझको ऐसा लगा था कि बिल में बहुत कुछ सम्मिलित किया गया है, इसलिए मंत्री जी ने अधिक समय लिया है, लेकिन बिल को देखने से यह कहावत याद आती है कि देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर। आपने सिर्फ दो ही क्लाजेज का इसमें संशोधन का प्रस्ताव रखा है। मंत्री महोदय, आप एक १४३९ बजे(श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा पीठासीन हुईं) सज्जन आदमी हैं। इस विभाग में आप अभी कम ही दिन रहे हैं। मैं ऐसा नहीं कह सकता कि आपने इस बिल को सांगोपांग पढ़ा होगा या नहीं पढ़ा होगा। आपकी बगल में हमारे बिहार के रहने वाले हुक्मदेव बाबू मौजूद हैं, ये हमारे साथ विधान सभा में रहते थे और बड़ा क्रान्तिकारी भाषण दिया करते थे।

 यहां आपके साथ हो गए, वहां लोहिया जी के साथ रहते थे और स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर जी के अनन्य सेवक थे। यह बिल १९३९ का बिल है। अभी के संशोधन को मिला कर इसमें चार संशोधन हो चुके हैं। आपने १९८८ में इस बिल में संशोधन किया, फिर १९९४ में किया और अब २००० में फिर संशोधन करने के लिए इस बिल को लाए हैं। लेकिन नतीजा वही निकलता है--खोदा पहाड़, निकली चुहिया। आपने इसमें क्या किया है ? आपने क्लाज ५२ के बदले ५२ ही रखी है, लेकिन उसकी भाषा, उसके शब्द बदल दिए हैं। अगर यही करना था तो संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी। आपने इसमें दो बार परंतु, परंतु जोड़ा है। पृष्ठ दो में देखें, परंतु यह और कि केन्द्रीय सरकार ऐसे संपरिवर्तन किटों के लिए वनिर्देश, अनुमोदन, अनुरुपांतरण या अन्य सम्बन्धित विषयों के लिए शर्तें वहित कर सकेगी। शर्तें वहित कर सकेगी, यह बड़ी पुरानी परम्परा है। कानून वालों को लगता है कि हम ऐसा शब्द रखें कि जनसाधारण उसको समझ नहीं पाए। इसमें रूल बनाने का प्रोवीजन है। प्राय: देखा जाता है, वधि मंत्रालय समीक्षा करके देखे, आपने संसद में भी एक्ट पास किया होगा, लेकिन उसकी नियमावली नहीं बनी होगी। कहा है कि नियमावली में और संशोधन करेंगे। उसीमें आपने दूसरा परंतु जोड़ दिया। परंतु यह और भी कि केन्द्रीय सरकार किसी वनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए, ऊपर वनिर्दिष्ट रीति से भिन्न रीति में यान में परिवर्तन के लिए छूट प्रदान कर सकेगी। यह बिल तो खत्म हो गया, आपने इसके आधार पर स्पेशल पावर ले ली हैं। आपने कह दिया कि गेट से कोई आदमी प्रवेश नहीं करेगा। इंजन बदलेंगे, नहीं बदल सकते हैं, प्रमाण पत्र देंगे, नहीं ले सकते हैं। एम.वी.आई. से जांच कराएंगे, हम वहां चैकिंग कराएंगे। लेकिन आपने कह दिया कि अगर कोई विशेष परिस्थिति होगी तो इसमें हम छूट दे सकते हैं, तो सीधे दरवाजा खोल दें आने दें, खिडकी से लोगों को प्रवेश करने की कोशिश क्यों करा रहे हैं। यह बड़ा गम्भीर मामला है।

आप सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले नेता हैं। आप कोई अफसरशाही नहीं हैं। अफसरशाही कानून बना देती है और उसको मंत्री जी सदन में ले आते हैं। यहां जो विशेषज्ञ हैं, पुराने सांसद हैं, जिनको इन बातों की जानकारी है, उनसे विचार करते और एक-दो बरस बाद अगर संशोधन की आवश्यकता होती तो एक सांगोपांग बिल लाते, तो मैं समझता कि सदन इसको अच्छा मानता और सारे देश को लाभ मिलता।

आपने कहा है कि हम प्रदूषण रोकेंगे। कहां-कहां प्रदूषण रोकेंगे। आपके उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें। हम लोगों को जब बनारस और विंध्यांचल जाने का अवसर मिलता है, मुगलसराय से उतर कर वहां जो बसें मिलती हैं उनको देखने का अवसर शायद आपको मिला होगा या नहीं, यह मैं नहीं जानता। आप धरती के नेता हैं, ऐसी मेरी मान्यता है, अगर वहां की बसों में चढ़ने का अवसर नहीं मिला तो देखने का जरूर मिला होगा।

क्या वहां धुआ नहीं निकलता है ? क्या वहां प्रदूषण नहीं होता है? क्या उसका शीशा टूटा हुआ नहीं है? क्या उसके ब्रेक फेल नहीं कर गए हैं? ऐसी गाड़ियां रोड पर चल रही हैं। इसके लिए जवाबदेह कौन है ? सजा किसको मिलती है ? एक्सीडेंट रेलवे में होता है और रिजाइन नीतीश जी ने किया। क्या वह ट्रेन चला रहे थे? दुनिया का दस्तूर बदल गया है। एक विक्रमादित्य का जमाना था जो सत्य बोलता था, उसकी रिहाई हो जाती थी। आज सत्य बोलने वाले को एक मिनट में कोर्ट में सजा हो जाएगी। अगर वह कह दे कि हमने मदद की है तो गवाह की जरूरत नहीं पड़ेगी और एक मिनट में उसे सजा हो जाएगी। अब जमाना बदल गया है।

श्री रामदास आठवले (पंढऱपुर) : जमाना बदल रहा है, सरकार भी बदलनी चाहिए।

श्री राजो सिंह : ऩहीं, सरकार नहीं बदलनी चाहिए। हम सरकार बदलने के पक्ष में नहीं है, इसलिए कि चुनाव बार-बार लड़ना पड़ता है और बड़ी परेशानी होती है। बिल ठीक है। बिल के विपक्ष में हम नहीं बोल रहे हैं। हम कह रहे हैं कि इस बिल को औऱ विस्तार पूर्वक लाना चाहिए था और कठिनाई इस बिल में यह है कि राजनाथ बाबू, आपने एम.वी.आईज. को पॉवर दे दी है। हमारे बिहार में एक बड़े प्रोगेसिव ट्रांसपोर्ट कमिश्नर ने डयूटी ज्वाइन करते ही दूसरे दिन सारे एम.वी.आईज. को बुलाया। उनका नाम एन.के. सिन्हा था। उन्होंने एम.वी.आईज. को कहा कि आप तो फिटनैस का सर्टफिकेट देते हो कि यह गाड़ी ठीक है तब डिस्टि्रक्ट ट्रांसपोर्ट ऑफिसर रजिस्ट्रेशन करता है। उन्होंने कहा कि जरा हमारे सामने गाड़ी चलाकर दिखा दो। आप मानिए कि तीन गाड़ी एक्सीडेंट्स कर गईं। सिर्फ एक ही एम.वी.आई. जो इंस्पेक्टर था, वह गाड़ी चला सका। उन्होंने उन लोगों को सस्पेंड कर दिया। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि आज जो एम.वी.आईज. हैं, जो डिस्टि्रक्ट ट्रांसपोर्ट के पदाधिकारी हैं, वे ही ड्राईवर को लाइसेंस देते हैं और गाड़ी का रजिस्ट्रेशन भी करते हैं। किस गाड़ी का रजिस्ट्रेशन होता है? आपने सारा प्रतिबंध लगा दिया। आपने कहा कि प्रदूषण होता है। आपने भी कहा और माननीय उच्च न्यायालय ने भी आदेश दिया कि प्रदूषण रोकने की व्यवस्था करिए। प्रदूषण रोकने की व्यवस्था कौन करेगा? माननीय मंत्री महोदय बगल में बैठे हए हैं। सारे काम तो आजकल ऊपर से आदेश आता है, उसके मुताबिक होते हैं। हम सुप्रीम नहीं हैं। सुप्रीम कोई दूसरा है। उसके आदेश पर हम चलते हैं। हमारे आदेश पर चलना चाहिए था। आप गाड़ी का कानून बना रहे हैं और गाड़ी को आगे बढ़ना चाहिए तो पीछे गाड़ी चल रही है। मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि आपने सारे भारतवर्ष के लिए कानून बनाया है या दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता या चेन्नई के लिए बनाया है ? यह गाड़ी कहां चलेगी? क्या यह गाड़ी सिर्फ यही चलती है ? बच्चों के लिए इसमें आपने प्रोवीजन किया है लेकिन स्कूल दिल्ली में ही नहीं हैं, स्कूल आपके प्रखंड में भी हैं और जो प्रखंड में हैं और गांवों से जो बच्चे आते हैं, वे किस चीज से आते हैं ? आप गांव के रहने वाले हैं। वे तिपहिया से आते हैं या स्कूटर से आते हैं या आटो-रिक्शा से आते हैं और आटो-रिक्शा पैट्रोल से चलता है तथा उसमें भी मिलावट हो रही है। मैं कह रहा था कि पैट्रोलियम मनिस्टर राम नाईक जी बगल में बैठे हैं। आप किन जगह की जानकारी करके आये हैं ? क्या यह सब कानून बनाने से ठीक हो जाएगा? देश में कानून बनाया हुआ है कि १७-१८ वर्ष से ऊपर की उम्र के लड़का-लड़की की शादी होनी चाहिए लेकिन हममें से कितने आदमी हैं जो क्षेत्र के निमंत्रण में जाते हैं ?

छोटे लड़के-लड़कियों की शादी होती रहती है और हम लोग मूक दर्शक की तरह वहां बैठे रहते हैं। कानून बना हुआ है, दरोगा जी वहां बैठे हुए हैं और सारे लोग भोज कर रहे हैं, लेकिन उनको कोई पकड़ने वाला नहीं है। कानून आप बना रहे हैं, लेकिन ऐसी गाड़ियां चलेंगी और धुंआ निकलेगा। राजनाथ जी, कभी आपने सड़कों को देखा है, मुंह पर कपड़ा बांधे हुए लोग मोटर चलाते हैं।

महोदय, मैं पांच मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा। पैट्रोल-डीजल मिलावटी मिल रहा है। जब तक यह मिलावटी पैट्रोल मिलेगा, आप कितना ही कानून बना दें, तब तक गाड़ियों से धुंआ निकलेगा। इसके साथ आपको यह भी विचार करना चाहिए कि रोड किस तरह की होनी चाहिए। कृषि मंत्री जी बैठे हुए हैं, हमारा और इनका जिला बगल में है, लेकिन जिले के ये प्रतनधि नहीं है। वहां के प्रतनधि जार्ज साहब हैं। जब हम वहां जाते हैं, तो लोग गाली देते हैं और कहते हैं कि रोड को देखते जाइएगा कि रोड गाड़ी चलाने के लायक भी है या नहीं, पानी भरा रहता है। हम उनको कहते हैं कि आप जिनको वोट दिए हैं, उनसे कहिए। आप लोग हमको वोट कहां दिए हैं, आप तो भारतीय जनता पार्टी को दिए हैं। नेशनल हाई-वे रोड पर पानी का जमाव है, ऐसी स्थिति में तो वहां मछली पालन का इन्तजाम करना चाहिए। जब तक आप रोड को दुरुस्त नहीं कराइएगा, तब तक गाड़ी नहीं चल सकती है। बेकारी की स्थिति में आदमी एक पुरानी बस खरीद लेता है और उसको चलाना चाहता है। आप कानून बनाकर काम करने से रोक रहे हैं। ऐसी स्थिति में उसका खर्च बढ़ जाएगा। वह गांड़ी चलेगी, टूटी हुई गाड़ी चलेगी, रोड आपकी खराब रहेगी, तो उसको आपके अधिकारियों को पैसा देना पड़ेगा। आपके डिस्टि्रक्ट ट्रांसपोर्ट आफिसर, एमडीआई को पैसा देना पड़ेगा और जो रजिस्ट्रेशन करेगा, उसको पैसा देना पड़ेगा। इस संबंध में मैं आपको तीन सुझाव देना चाहता हूं। पहला सुझाव है - आप यह निर्धारित कर दीजिए कि एक घन्टे में कितने किलोमीटर गाड़ी चलानी है। वह तेज गाड़ी चलाता है, शराब पीकर चलाता है और बच्चा या औरत जब सड़क पार करती है, तो एक्सीडेंट करता है। कहीं किसी ने कोई रिजाइन नहीं किया। नीतीश जी ने दिया, लेकिन रोड मनिस्टर को रिजाइन देना चाहिए। लेकिन मैं इसके पक्ष में नहीं हूं, जो दोषी है, उनको सजा होनी चाहिए। मैंने एक राहुल सासकृत्कियान की किताब में पढ़ा है - भागो नहीं, दुनिया को बदलो। नीतीश जी ने रिजाइन किया, यह कोई अच्छी बात नहीं है और जो कमी थी, उसको दुरुस्त करना चाहिए। इसलिए मैं कहना चाहता हूं, नेशनल हाई-वे बिहार के लिए जो स्वीकृत हुआ है, उसके लिए पैसा दीजिए। आप तो उत्तर प्रदेश में ज्यादा समय लगा रहे हैं। आप छह बरस के लिए राज्य सभा में पहुंच गए हैं। एक कहावत है - रंग लगे न फिटकरी, माल हो जाए चोखा, हम को तो वोट मांगने जाना पड़ेगा। इसलिए आप मुस्तैदी से बिहार के नेशनल हाई-वे के काम को दुरुस्त करें और रोड्स को ठीक करें।

सड़क बन जाने के कारण टूटी-फूटी गाड़ियां भी चलती हैं। उनको अगर आप रोकना चाहते हैं और आप धुएं को, प्रदूषण को रोकना चाहते हैं तो गांव की ओर चलिये। यह संसद केवल मुम्बई और दिल्ली के लिए नहीं बैठी हुई है। हम लोग गांव से चुनकर आते हैं, १२-१३ लाख वोट लेते हैं, लेकिन आप उनके लिए कोई प्रबंध नहीं करते हैं, आप लोग केवल तीन प्रतिशत लोगों की भलाई के लिए ही जवाबदेह हो जाते हैं और उन्हीं के लिए आप काम करते हैं। मैं मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं और चाहता हूं कि आप कृपा करके एक अच्छा कानून बना लीजिए जिससे आपको १२-१५ साल तक फिर उसमें संशोधन की कोई जरूरत न पड़े। मेरी आपसे यह भी गुजारिश है कि आप जो कानून को लागू करने वाले ऑफिसर्स हैं उनकी लगाम कसिये, आप इनको सुधारिये। ये समझते हैं कि ये कानून बना देंगे और मंत्री जी उस पर दस्तखत कर देंगे। आप इस परिपाटी को समाप्त कीजिए। आप अपने स्तर पर इनको सुधारिये। बिहार में जो नेशनल हाई-वे नीतीश कुमार जी ने स्वीकृत किया है, बिहार की सरकार ने जो परपोजल भेजा है और जिसको माना गया है। दिग्विजय बाबू यहां बैठे हैं, रेलवे के स्टेट-मनिस्टर हैं। मेरा कहना है कि एक रोड बरबीघा से दुमका तक जाती है, वहां बस बहुत दिक्कत से चलती है। उसको बरबीघा से शेखपुरा सिकन्द्रा होते हुए, जमुई होते हुए,देवचर बैजनाथ धाम दुमका तक होते हुए नेशलन हाई-वे बना दीजिए। राजनाथ बाबू फिर अ् पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री (श्री राम नाईक) : सभापति महोदया जी, मैं इस विधेयक की चर्चा में थोड़ा सा हस्तक्षेप करना चाहता हूं। माननीय राजो सिंह जी ने जो कहावत कही, वह मुझे अच्छी लगी। उन्होंने कहा कि " देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर " । मैंने इसे कर दिया कि " देखन में छोटा लगे, लाभ पहुंचे भरपूर " । अब तक वाहन के ईंधन के रूप में पेट्रोलियम गैस एल.पी.जी. को पर्मिशन नहीं थी जिसके कारण कई प्रकार की असुविधा होती थी। इसमें जो संशोधन आये हैं उनके कारण जो चार-पहिया के वाहन हैं उनमें एल.पी.जी. का उपयोग हो सकेगा। यह मेरी द्ृष्टि से एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सुधार का काम है। देश में आज एलपीजी भरपूर है। हमने करीब-करीब सारे लोगों की वैटिंग-लिस्ट समाप्त करते-करते इस वर्ष के अंत तक जो भी वैटिंग लिस्ट बाकी है उसको समाप्त कर देंगे।

सभापति महोदय : रूरल एरिया में अभी भी बहुत ज्यादा वैटिंग लिस्ट है।

श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज) : गांव में वैटिंग लिस्ट समाप्त नहीं हुई है, केवल शहरों में हुई होगी।

श्री राम नाईक : मैंने कहा है कि वैटिंग लिस्ट समाप्त कर रहे हैं, समाप्त हो गयी है ऐसा मैंने नहीं कहा है। हमने नीतिगत फैसला किया है कि हम हर ब्लॉक स्तर पर एलपीजी की एजेंसी देंगे। इसलिए भविष्य में एलपीजी और अधिक उपलब्ध होगी। इससे पर्यावरण में शुद्धता आयेगी, प्रदूषण कम होगा तथा पेट्रोल और डीजल से इसकी कीमत भी कम होगी। मिलावट वाले पेट्रोल-डीजल से जो वाहन खराब होते हैं, उनमें भी इससे कमी आ सकती है।

15.00 hrs. ऐसा एक बहुगुणी ईंधन आएगा।

बिल पास होने के बाद आगे क्या होने वाला है, मैं यही बताना चाहता हूं। बिल पास होने के बाद एक्ट बन जाएगा तो आज तक एल.पी.जी. का वाहनों में उपयोग करने पर जो प्रतिबन्ध था, वह एक नोटफिकेशन निकाल कर समाप्त हो जाएगा और इसका उपयोग प्रारम्भ हो सकेगा। इस समय हिन्दुस्तान के कई शहरों में गैर कानूनी ढंग से एल.पी.जी. का उपयोग हो रहा है। डोमैस्टिक काम के लिए जो सिलैंडर उपयोग किया जाता है और जिस पर सबसिडी दी जाती है, उसे वाहन पर लगाया जाता है। इस प्रकार कार वाले सबसिडी ले रहे हैं। एक्सीडैंट होने पर उन्हें इंश्योरेंस का कुछ नहीं मिलता है। इस भूमिका में यह जो परिवर्तन किया गया है, उसका लाभ भविष्य में मिल सकेगा।

देश के बड़े-बड़े महानगर दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता और चेन्नई ही नहीं बल्कि हर प्रदेश में जो बड़ा महानगर है, हमने वहां एल.पी.जी. गैस की द्ृष्टि से तैयारी शुरु की दी है। हम पहले २१२ स्थानों पर एल.पी.जी. के यूनिट्स खड़े करेंगे और जहां पैट्रोल पंप हैं, वहां इसे लगाएंगे। ९२ की तैयारी सभी द्ृष्टि से पूरी हुई है। इसमें सिलैंडर दूसरे साइज का होगा। घरेलू उपयोग वाली गैस इसी काम के लिए इस्तेमाल होने पर जैसा मैंने कहा कि इसका कमर्शियल इस्तेमाल करके सबसिडी का दुरुपयोग होगा लेकिन पैट्रोल से कुछ मात्रा में कम मूल्य पर ये सिलैंडर उपलब्ध होंगे और उसी प्रकार से हम काम करेंगे। यह प्रारम्भ में केवल चार पहिए वाली मोटर कार में उपयोग होगा। इस द्ृष्टि से सारा संशोधन और संरचनाएं पूरी हुई हैं।

इसकी दूसरी स्टेज यह है कि क्या ऑटोरिक्शा या स्कूटर, मोटर साइकिल जैसे दो पहिए वाले वाहनों पर इसका उपयोग किया जा सकता है? इसका उपयोग करने की द्ृष्टि से एक समति २३ अप्रैल, २००० को बनाई गई। उसमें ऑटोमोबाइल रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया, पूणे जो एक बड़ी संस्था है, एल.पी.जी. इक्विपमैंट रिसर्च सैंटर बंगलौर और चीफ कंट्रोलर ऑफ एक्सप्लोसिव, नागपुर को सम्मिलित करके यह समति बनाई गई ताकि ऑटोरिक्शा, स्कूटर और मोटर साइकिल वाले इसका उपयोग कर सकें। तुलनात्मक द्ृष्टि से या आर्थिक द्ृष्टि से कम तबके के लोग इनका उपयोग कर सकें, इस द्ृष्टि से हम प्रयास कर रहे हैं।

इसे बड़े शहरों के साथ-साथ लगभग सभी राज्यों में प्रारम्भ करने का विचार है। इसी भूमिका में मैंने सोचा कि एल.पी.जी. का उपयोग वाहनों के लिए होना एक बड़ी ऐतिहासिक बात होगी। इस द्ृष्टि से मैंने इस विधेयक में हस्तक्षेप किया। मैं सदन से प्रार्थना करूंगा कि यह विधेयक सब मिल कर एक राय से मंजूर करें। इन शब्दों के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद।

SHRI M.O.H. FAROOK (PONDICHERRY): Will you be able to supply LPG at a lesser cost for cars?

SHRI RAM NAIK: Lesser as compared to petrol but not with subsidy.

श्री राजो सिंह (बेगूसराय) : क्या आप हर ब्लाक में एल.पी.जी. दुकानें खोलने वाले हैं? क्या सभी एम.पीज. की सिफारिशें स्वीकार करेंगे?

सभापति महोदय: उसके लिए कमेटी बनाई गई है।

मेजर जनरल (सेवा निवृत्त) भुवन चन्द्र खंडूड़ी (गढ़वाल) : सभापति महोदय, मैं मोटरयान संशोधन विधेयक २००० का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। इस विधेयक के जरिए चार मुख्य बातें हो रही हैं। इसके द्वारा सड़क, यात्रियों की सुरक्षा और प्रदूषण कम करना है। इसमें शैक्षिक संस्थाओं को भी इजाजत लेने की जरूरत पड़ेगी। परमिट का नवीनीकरण करने का प्रावधान करके अच्छा काम किया है। यह एक अच्छा बिल है। जैसा पूर्ववक्ताओं ने कहा कि यह बिल पहले आना चाहिए था।

लेकिन मुझसे पूर्व वक्ताओं ने जो कहा है, उसे ही दोहराते हुए कहूंगा कि हमारे पास कायदे-कानून बहुत हैं और आज आप एक नया कायदा यह भी बना रहे हैं । इसका आप इंपलीमेंटेशन कर सकेंगे, इसमें मुझे शंका रहती है। नये-नये कानून बनते रहते हैं लेकिन उनको इंपलीमेंट करने के लिये कोई व्यवस्था नहीं होती है। इस संदर्भ में हमारे पास बहुत से कायदे-कानून हैं। सड़क पर चलते हुये उनको न मानने का काम ज्यादा होता है और उन आदेशों का पालन बहुत कम होता है। मेरा माननीय मंत्री जी से निवेदन है और वह अपने जवाब में बतायें कि किस प्रकार ऐसे नये नियमो को लागू करेंगे, सुनिश्चित करेंगे। कहीं ऐसा न हो कि पहले की तरह ही किये गये संशोधन कागजात पर ही रह जायें और जनता को उसका कोई फायदा न हो। इस प्रकार के कानून बनाने से जनता को कोई लाभ नहीं मिलता है। जनता इससे हतोत्साहित होती है। इससे पूरी संस्था पर एक किस्म की शंका पैदा होती है। मैं चाहूंगा कि आप इस दिशा में हम लोगों का ज्ञानवर्द्धन करें।

सभापति महोदय, इसमें क्लाज ५२ में संशोधन करके कुछ नई बातें लिखी गई हैं। इसके क्लाज ५२(२) में कहा गया है कि जिसके पास कम से कम १० परिवहन का परमिट होगा, उनको अनुमति दिये बिना वह परिवर्तन कर सकेंगे। मैं नहीं जानता कि माननीय मंत्री जी ने यह क्लाज क्यों रखा है। जैसा श्री राजो सिंह जी ने कहा कि छूटें बीच में आ जाती हैं क्योंकि जिस व्यक्ति के पास १०० गाड़ियां हैं, वह १० आदमी के नाम कराकर अपना काम चला लेगा, मैं नहीं जानता इस प्रकार की छूट देने की क्या आवश्यकता थी? इस प्रकार की छूट क्यों होनी चाहिये कि किसी के पास एक गाड़ी है या दस गाड़ियां हैं, हम अलग-अलग कायदे-कानून क्यों बनाना चाहते हैं? मैं जानना चाहूंगा कि इसकी क्या जरूरत थी कि आप छूट दें कि जिनकी दस से कम गाड़ियां हैं, उन्हें परमिट देने में क्या मुश्किल पड़ेगी अगर सारे कायदे-कानून उन पर लागू करें। आपने क्लाज ५२(३) में लिखा है कि अगर कोई आदमी बिना इजाजत काम करता है और आदेश का उल्लंघन होने के १४ दिन के अंदर वह फिर इजाजत ले ले तो आपने उसकी व्यवस्था की है। उसकी कोई सजा या फाइन नहीं लेकिन फीस जमा करनी है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी क्या जरूरत है, क्या मजबूरी है कि पहले हम मानते हैं, स्वीकार करते हैं, कि कानून का उल्लंघन कीजिये और फिर कहते हैं कि १४ दिन के अंदर आप इसको ठीक कर लें, इसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।

सभापति महोदय, तीसरी बात मुझे यह कहनी है कि वैसे ही हमारे पास कायदे-कानून बहुत है । जब हम सड़क पर चलते हैं तो देखते हैं कि ट्रक ओवर-लोडेड होते हैं। जितनी ट्रक की ऊंचाई होती है, उसकी ऊंचाई से ज्यादा सामान उसमें भरा रहता है। उसमें स्टील की बड़ी बड़ी छड़ें, स्टील के रोल्स, राड्स या दूसरी चीजें होती हैं, वे ८-१० फुट बाहर निकली हुई होती हैं। हमारे पास उसके लिए कानून बने हुये हैं लेकिन उसका पालन नहीं किया जाता है मैं जानना चाहता हूं कि आप उन नियमो का पालन किस प्रकार से करवायेंगे?

सभापति महोदय, मैं आपका ध्यान दो-तीन जरूरी बातों की ओर दिलाना चाहूंगा। ट्रकों के प्रैशर हान्र्स पर काबू नहीं पाया जा रहा है। वे इतने खतरनाक और ध्यान इधर-उधर करने वाले होते है कि उनसे एक्सीडेंट होने का खतरा बना रहता है। इस पर आप काबू नहीं पा सके हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई ट्रकों की हैडलाइट्स काफी तेज़ होती हैं क्योंकि वे हाई वाल्टेज की बैटरीज़ इस्तेमाल करते हैं। इस पर रोक लगाने के लिये इस विधेयक में कहीं कोई व्यवस्था नहीं की गई है। मैं चाहूंगा कि माननीय मंत्री जी इस खतरे को देखते हुये विचार करें और कोई व्यवस्था कर सकें तो अच्छा होगा।

अक्सर हम लोगों के भाषण कागज पर ही रहते हैं, परंतु कभी-कभी मंत्री जी का ध्यान हो जाए तो शायद कोई चीज रजिस्टर हो जाए।

मैडम. चेयरपर्सन, मैं अंत में कहना चाहता हूं कि माननीय पैट्रोलियम मंत्री जी यहां बैठे हैं और इस बारे में अक्सर हम उनसे कहते हैं कि पहाड़ों में बहुत दूर-दूर तक पेट्रोल पम्प नहीं मिलते और हमें अपने साथ केन आदि में पेट्रोल और डीजल ले जाना पड़ता है। इस प्रकार की व्यवस्था कुछ गाड़ियां और ट्रक्स आदि भी करते हैं और वे एडीशनल टैंक लगाते हैं। मुझे मालूम है कि इसकी इजाजत नहीं है। लेकिन क्या आप इस प्रकार की व्यवस्था करेंगे कि पहाड़ी इलाकों में जहां पेट्रोल पम्प्स नहीं हैं, ऐसा मैदानी क्षेत्रों में भी हो सकता है, मुझे कभी-कभी अपने क्षेत्र से सौ किलोमीटर दूर सिर्फ डीजल लेने के लिए जाना पड़ता है। यदि डीजल हमारे पास नहीं होता है तो सिर्फ डीजल के लिए ही हमें जाना पड़ता है। खासकर हम फौज में इस प्रकार की व्यवस्था करते थे कि एडीशनल टैंक गाड़ी में लगाते थे, ताकि हमें इस प्रकार की कठिनाई न हो। क्या आप इसके ऊपर विचार करके ऐसे क्षेत्रो में कुछ सुविधाएं देंगे, कुछ छूट देंगे। इसके साथ ही मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आप यह बिल लाये हें और प्रार्थना करता हूं कि इसके इम्पलीमेंटेशन के लिए आप कुछ सख्त तरीका निकालें, ताकि इसका सदुपयोग हो। इतना कहकर इस बिल का समर्थन करते हुए मैं बैठता हूं। धन्यवाद।

SHRI G.M. BANATWALLA (PONNANI): Madam Chairperson, the Bill has very commendable objectives. I congratulate the hon. Minister for having expressed his concern at this important question of vehicular pollution as well as road safety. It is with these twin objectives of preventing vehicular pollution and of also considering the road safety aspects that this Bill has come.

At the outset, I would like to emphasise that mere legislation is not sufficient to achieve these objectives. There are several areas that need to be considered. I may draw the attention of the hon. Minister to some of these areas. For example, since 1993, there is a scheme to provide hundred per cent grants to States so that they may be able to procure pollution testing equipment. It is a good scheme in order to help the States to have the sophisticated equipment for testing pollution. But then, unfortunately a cut was applied and from 1st June, 1998, this hundred per cent grant-in-aid has been reduced to 75 per cent grant. So, we find that, on the one hand, we express concern over prevention of pollution and come out with very laudable Bills and, on the other hand, we apply cuts to our schemes directed towards the control of pollution.

Further, you will find that with respect to budgetary allocations for the same pollution testing equipment, for 1999-2000, the Budget estimate was Rs. 100 lakh or Rs. 1 crore. But in the revised estimate, the whole thing was cut down by 50 per cent. It was brought down to Rs. 50 lakh.

I do not comment upon the amount involved. I say that on the one hand, we come with pieces of legislation to prevent pollution and on the other hand 50 per cent cut is given to budgetary allocations directed towards the control of pollution. These are areas that require attention.

Now, after applying this 50 per cent, what is the position? The position is that during 1998-99, the Statewise distribution of funds came to hardly Rs.64 lakh and out of so many States that we have, only four, namely, Kerala, Assam, Mizoram, and Goa were given the Grant-in-Aid. I must therefore, emphasise on greater attention to various areas that we have selected for the purpose of control of this pollution.

Similarly, there are other schemes for control of pollution of motor vehicles. We are told that there are awareness activities. But what are those awareness activities by the Department concerned? Hardly two workshops to train our officials in the modern methods of pollution control, throughout the length and breadth of the country have been held. What I am emphasising is that there also the budgetary allocation was cut and that too could not be properly utilised. Hardly Rs.10 lakh on these two workshops were there.

We are told about the safety aspect of the roads. It is a very big step. The entire machinery will have to be strengthened and a greater concern will have to be shown, say, for example, the condition of roads. That is very important with respect to accidents. Even, take the case of national highways. The condition of none of our national highway is equivalent to the norms that are internationally accepted for any highway. I know it involves gigantic expenditure, but then we have to see to it. But there is not a single national highway in India, the conditions of which may compare with the international norms of the highways.

There is this particular question that on the one hand, we have these national highways not conforming to all the norms of national highways and on the other hand what is the attention being given on maintenance or repairs of national highways. We find serious shortage in allocation of funds for maintenance of national highways as compared to the requirements. In the year 1997-98, we are told from budgetary papers that the shortage was as high as 34 per cent merely on maintenance not to talk of the norms of the national highways. In 1981-82, this percentage of shortfall for maintenance of national highways was 15.39 per cent and this shortfall figure for maintenance has gone up from 15 per cent to as high as 34 per cent. These are the areas that require greater attention.

  Of course, there are constraints of resources. But the point that I was making is that not mere legislation but strengthening of machinery, strengthening of various schemes, greater resources, and all these are the things that will require the attention of the Government. Of course, I have congratulated the Government for having come out with this particular Bill that was needed exceptfor one or two lacunae that are still there.

MR. CHAIRMAN : Please conclude now.

SHRI G.M. BANATWALLA : Madam Chairperson, I have not yet come to the Bill as such.

MR. CHAIRMAN: Shri Banatwalla, you have taken ten minutes on your introduction.

SHRI G.M. BANATWALLA: Madam, it is a very important matter and it relates to our roads.

MR. CHAIRMAN: You are a member of the BAC. Only one hour has been allotted for this Bill. You must understand my problem.

SHRI G.M. BANATWALLA: I do not know as to who has suggested this time-frame.

MR. CHAIRMAN: It was the decision of the BAC.

SHRI G.M. BANATWALLA : No Business Advisory Committee Report has come to us.

Madam Chairperson, now I come to the Bill. What is the position? The present position is that for any alterations or modifications as far as the vehicle is concerned, an application has to be made to the registering authority. Now, no application is needed. Now, with the passage of this Bill, no approval of the registering authority is needed in the area of carrying out modifications to the engine. Certain conditions will be prescribed. That is all. And then I have to comply with those conditions. I need not go to any registering authority for the purpose of any prior approval. Now, when prior approval was wanted and still we had so much of vehicular pollution, I only hope that by merely prescribing certain conditions for modifications of engine and then leaving to the persons concerned to carry out their modification without any prior approval of the registering authority may not aggravate the matters. Of course, I do understand that within 14 days, the Bill says, the person concerned, who has carried out the modification, has to go to the registering authority but for what purpose. It is only for paying the fees and getting the thing recorded in his Registration Certificate. I think, it has to be strengthened more. That is what I am saying of this particular clause that is necessary.

Then, with respect to the conditions that may be laid down for carrying out the modifications to engine, etc., all the authority is concentrated with the Central Government. The State Governments, with their own problems, with their own local conditions, do not come into the picture at all. I think that in these days of decentralisation, this is an area that needs a greater attention.

I will make a last point and I will conclude. The Bill is good enough but then there are several other problems that must be considered. Now, here we know that adulterated fuel is also one of the major causes for pollution. We have just heard the hon. Minister, Shri Ram Naik telling us about LPG, etc. That apart, the ordinary machinery that we have for the detection of adulteration of oil that creates a lot of problems not only with respect to the old cabs and cars but even with respect to the newer ones also.

I have just referred to the old cabs. Here, in Delhi, under Supreme Court order, there are restrictions on taxis. But then those people are in a miserable plight. Something has to be done about them. The taxis of more than 10 years--I believe, it is 10 years—cannot ply. That is the order of the court. But then, when you go out, look at the situation and look at the ground realities, you find that those taxi people are in great miserable plight. I must, therefore, appeal to the Government to see that every endeavour, and not a half-hearted measure, but every endeavour is made in order to see that the plight of these taxi drivers is also mitigated.

In deference to your restlessness, Madam Chairperson, I conclude.

1526 बजे श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : सभापति महोदय, मोटर व्हीकल अमेंडमैंट बिल, २००० सुरक्षा और पर्यावरण को मजबूत बनाने के लिए लाया गया है। सबसे पहले यह कानून १९३९ में बना था। उसके बाद इसमें पहला संशोधन १९८८ में हुआ और दूसरा संशोधन १९९४ में हुआ। १९३९ में जब यह कानून बना तब से लेकर १९९८ तक भारत वर्ष में काफी एक्सीडैंट हुए। सुरक्षा व्यवस्था खतरनाक अवस्था में पहुंच गई थी। इसके साथ-साथ पर्यावरण की स्थिति भी बहुत बिगड़ती जा रही थी। मैं जानना चाहता हूं कि इन ४९ सालों में सरकार ने इसमें अमेंडमैंट करने के बारे में क्यों नहीं विचार किया? सुरक्षा के बारे में तो हर बार कानून बनते हैं और कानून बनाने वाले बहुत आते हैं लेकिन कानून को मानने वाले लोगों की संख्या काफी कम होती जा रही है इसलिए कानून बनाने से जितना परिवर्तन होना चाहिए उतना नहीं हो रहा है।

इसी तरह रोड्स पर चलने वाली जो लारियां हैं, उनमें साढ़े बारह या चौदह टन तक का लोड ले जा सकते हैं। मेरा कहना है कि इस तरह का कानून होने के बावजूद हरेक लारी में १६, १८ या २० टन का सामान ढोया जाता है। जिस तरह हम इसमें कानून बनाने का काम करते हैं, उसी तरह करप्शन भी उतना ही बढ़ता जा रहा है। यदि आप २० टन सामान लाते हैं तो आर.टी.ओ. को कुछ पैसा देने के बाद ही वह गाड़ी आगे जा सकती है। यह बहुत खतरनाक अवस्था है और इसकी वजह से काफी एक्सीडैंट होते हैं।

मेरा कहना है कि कानून तो बनने चाहिए मगर इनको सख्त बनाने से उनमें करप्शन भी उतना ही बढ़ता जा रहा है। आर.टी.ओ. को भी थोड़ा सुधारने के बारे में हम लोगों को विचार करने की आवश्यकता है। आर.टी.ओ. डिपार्टमैंट पैसा खाने वाला डिपार्टमैंट है। जब तक उनको देने वाले लोग हैं तब तक वे खाने वाले हैं। जिस तरह राजमार्ग पर गाड़ी चलती है, उसी तरह आपका नाम भी राजनाथ सिंह है। आप राजमार्ग को सुधारने के लिए जो बिल लाये हैं, उसमें मेरा इतना ही सुझाव है कि हमें आर.टी.ओ. डिपार्टमैंट को भी थोडा सुधारने के लिए विचार करने की आवश्यकता है।

सभापति महोदय, आजकल एक्सीडैंट्स की संख्या बढ़ती जा रही है। इस संबंध में मेरा कहना है कि वनवे सड़क होनी चाहिए। जब हम नैशनल हाईवे बनाते हैं तो वे हमें इंटरनैशनल हाईवे की तरह बनाने चाहिए। एक गाड़ी जब इधर से जाती है और दूसरी गाड़ी को ओवरटेक करना हो तो हमारी गाड़ी उसे ओवरटेक नहीं कर सकती। इसी वजह से श्री राजेश पायलट जी का एक्सीडैंट हुआ। एक गाड़ी उधर से जाती है और दूसरी गाड़ी इधर से आती है तो उसके लिए रोड भी चौड़े करने की आवश्यकता है।

वन-वे सिस्टम होना चाहिए। ऐक्सीडैंट्स सिर्फ रोड्स पर होते हैं, ऐसा नहीं है। रोड्स पर तो ऐक्सीडैंट्स होते हैं लेकिन सरकार का भी बहुत बड़ा ऐक्सीडैंट होता है जैसे अभी शिव सेना ने हंगामा मचाया था। जब एन.डी.ए. इधर से आएगी और शिव सेना उधर से आएगी तो ऐक्सीडैंट होना ही है। जिस तरह गाड़ी को चलाते हैं उसी तरह सरकार को चलाने के लिए ज्यादा मैम्बर होने चाहिए। यदि मैम्बर कम होंगे तो एक दिन ऐक्सीडैंट हो जाएगा। वह ऐक्सीडैंट कब होगा, यह मैं नहीं बताऊंगा।

इस बिल के बारे में मेरा एक सुझाव है। श्री राम नाईक अभी बैठे नहीं है। मैं कहना चाहता हूं कि पर्यावरण को सुधारने के लिए डीजल और पैट्रोल में मिलावट को कम करना होगा। पैट्रोल पम्पों के मालिकों का कहना है कि हम मिक्िंसग नहीं करेंगे। पैट्रोल और डीजल देने वाले लोगों के कमीशन को बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे मिक्िंसग कम होगी। ...(व्यवधान)

कई ड्राईवर शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं। कुछ लोग शराब पिए बिना गाड़ी नहीं चला सकते। जिस तरह ड्राईवर शराब पीकर गाड़ी चलाता है उसी तरह आपकी सरकार भी चल रही है। सरकार को भी चलना है और गाड़ी को भी चलना है। ...(व्यवधान)

सभापति महोदय : वहां भी मिक्िंसग थोड़ी ज्यादा हो गई है।

श्री रामदास आठवले : मेरा कहना है कि ड्राईवर पर पाबन्दी होनी चाहिए। शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले ड्राईवर का लाईसैंस यदि एक बार कैंसिल कर दिया तो उसे दुबारा लाईसैंस नहीं देना चाहिए। इस तरह का प्रावधान करने की आवश्यकता है।

एल.पी.जी. गैस लगाकर गाड़ियां चलाई जा रही हैं। इससे इंजन जल्दी खराब हो जाता है। इस बारे में संशोधन करने की आवश्यकता है। आप इसके लिए कानून बना रहे हैं, लेकिन पहले से ही बहुत सी गाड़ियां और टैक्सियां गैस सिलेंडर से चल रही हैं। इस बारे में इन्क्वारी करने की आवश्यकता है। यदि गैस सिलेंडर लगाने से गाड़ी का इंजन जल्दी खराब होगा तो उसे गाड़ी में लगाने की आवश्यकता नहीं है।

हर साल साठ-सत्तर हजार लोग ऐक्सीडैंट्स में मरते हैं। ऐक्सीडैंट्स को कम करने के बारे में सबको विचार करना होगा। इसके लिए मेरा मंत्री जी को सुझाव है कि नेशनल हाईवेज और स्टेट हाईवेज को वन वे बनाने की आवश्यकता है। जब तक आप वन वे रोड्स नहीं बनाएंगे तब तक सरकार भी पांच साल तक नहीं चलेगी।

मैं इस बिल का समर्थन इसलिए नहीं करता क्योंकि कानून बनते तो हैं लेकिन कानून को मानने वाले लोग बहुत कम हैं। यह कानून ज्यादा अच्छा नहीं है, थोड़ा ठीक है। इस बिल में आप ज्यादा से ज्यादा सुधार करने के बारे में प्रयत्न करें। जो कानून बने, अधिकारियों को उस कानून की रक्षा करनी चाहिए। लेकिन कानून बनता है और रोज अधिकारी उस कानून को तोड़ते हैं। लोग थोड़ा सा कानून तोड़ते हैं उनको सजा दी जाती है लेकिन जो अधिकारी कानून तोड़ते हैं, उनको अंदर करने के बारे में भी इसमें प्रावधान करने की आवश््यकता है।

जब तक आप सब लोग राज से बाहर नहीं होंगे, तब तक राज चलने वाला नहीं है। राजनाथ सिंह साहब, अगर इसमें सुधार होने वाला है तो मैं बैठूंगा। इसमें सुधार करने की आवश्यकता है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री सुन्दर लाल तिवारी (रीवा): माननीय सभापति जी, मोटर व्हिकल एमेंडमेंट बिल, २००० का मैं समर्थऩ करता हूं।

लेकिन इसके साथ-साथ माननीय मंत्री जी का मैं ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि कुछ आवश्यक एमेंडमेंट इसमें रह गये हैं। मोटर व्हिकल एक्ट, १९८८ के कानून में कई पहलू हैं। एक पहलू तो गाड़ी का रजिस्ट्रेशन, गाड़ी चलाने के नियम का हो गया और दूसरा पहलू कम्पेंसेशन का है। मोटरयान अधनियम, १९८८ में कम्पेंसेशन देने में विसंगति है। कोई व्यक्ति रोड पर मर जाता है तो उसको कम्पेंसेशन देने के लिए आपके यहां कई धाराएं आपके कानून में बनी हुई हैं। धारा १६१ में एक प्रोवीजन है, एक आदमी रोड पर जा रहा है, वह सामने की गाड़ी से टकरा गया, यदि गाड़ी का नम्बर मालूम है कि किस गाड़ी ने उस आदमी को मारा है तो ऐसी स्थिति में उसके लिए कम्पेंसेशन ५० हजार रुपये देने का प्रोवीजन है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति सड़क पर पैदल चला जा रहा है या साइकिल से चला जा रहा है, उसको कोई गाड़ी अगर टक्कर मारकर चली गई तो ऐसी स्थिति में उसको केवल २५ हजार रुपये कम्पेंसेशन देने का प्रोवीजन इस एक्ट में है। मेरा निवेदन है, माननीय मंत्री जी, कि इस पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाये। मेरा निवेदन है कि यह भिन्नता क्यों है। जिस आदमी को चोट लगी है, वह आहत हुआ है, जो आदमी एक्सीडेंट में आहत हो गया, मर गया तो दोनों लोगों के परिवारों को कम्पेंसेशन दिया जाता है और दोनों स्थितियों में दोनों परिवारों को कम्पेंसेशन की बराबर की आवश्यकता है। मैं सैक्शन १४० के सैकिण्ड पार्ट को पढ़कर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा, क्योंकि पूरा सैक्शन तो काफी लम्बा है :

Liability to pay compensation in certain cases on the principle of no fault." The second part is like this:
"The amount of compensation which shall be payable under sub-section (1) in respect of the death of any person shall be a fixed sum of `fifty thousand rupees’ and the amount of compensation payable under that sub-section in respect of permanent disablement of any person shall be a fixed sum of `twenty five thousand rupees".

यह क्लियर है कि सैक्शन १४० में ५० हजार रुपये की लायबलिटी है, ५० हजार रुपया इंश्योरेंस कम्पनी देती है।

 

Section 161 says:

" Special provisions as to compensation in case of hit and run motor accident--(1) For the purposes of this section, section 162 and section 163--"

यह प्रोवीजन है हिट एंड रन, जो मार कर चला गया, ऐसी परिस्थिति में आपने धारा १६१ (३) (ए) में कहा है-

"in respect of the death of any person resulting from a hit and run motor accident, a fixed sum of twenty-five thousand rupees;"

यहां पर केवल २५,००० रुपए दिए हैं। यह भिन्नता कानून में क्यों है। मेरा निवेदन है कि दोनों स्थितियों में धारा १४० और १६१ में मुआवजा दिया जाता है जो व्यक्ति अपाहिज हो गया हो या जिसकी मृत्यु हो गई हो उसके परिवार वालों को। अगर मुआवजे का प्रावधान रखा है तो भिन्नता क्यों है। एक में आप २५,००० रुपए दे रहे हैं और दूसरे केस में ५०,००० रुपए दे रहे हैं।

"Scheme for payment of compensation in case of hit and run motor accidents--"

आपने एक स्कीम बनाई है। जिसके तहत कलेक्टर को जिले में अधिकृत किया है और एक कमेटी है जिसको कानून के माध्यम से अधिकृत किया है कि वह परीक्षण करने के बाद २५,००० रुपए देती है। मोटर व्हीकल एक्ट में आपने एक सीमा रखी थी कि कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना से मर जाता है तो उसके परिजन छ: महीने के अंदर अदालत में क्लेम दायर कर सकते हैं, लेकिन उस सीमा को आपने खत्म कर दिया है। अब मृतक का कोई भी परिजन मुआवजे के लिए कभी भी आवेदन पत्र दे सकता है और उसको मुआवजा मिलेगा। लेकिन ऐसी परिस्थिति में जब कोई वाहन टक्कर मार कर चला जाए और जिसका नम्बर मालूम नहीं हो, उसमें आज भी आपने छ: महीने की सीमा रखी है कि अगर इस अवधि में आवेदन पत्र नहीं देता तो उसके परिजन मुआवजे के अधिकारी नहीं होंगे। अगर एक सीमा एक परिस्थिति में खत्म कर दी है तो दूसरी में रख कर दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है। वहां भी यह खत्म होनी चाहिए। आहत या मृतक के परिवार के लोग कभी भी आवेदन पत्र दे सकते हैं।

सभापति महोदय, मैंने दो बिंदुओं की ओर मंत्री जी का ध्यान आकर्षित किया है। आपको जिन लोगों ने इस कानून के संशोधन के बारे में राय दी हो या आपने जानकारी प्राप्त की हो, आपने इस बिल में मानव जाति को सहयोग करने वाली इस बात को छोड़ दिया है। अगर आज भी यह संशोधन रह जाएगा तो एक लम्बा समूह इस लाभ से वंचित रहेगा। इंशोरेंस कम्पनीज इसका लाभ उठाती रहेंगी, क्योंकि वे नहीं चाहतीं कि इस तरह का संशोधन हो।

मैं आपके मूल संशोधन का समर्थन करता हूं, लेकिन यह भी चाहता हूं कि मेरे बताए दो बिंदुओं को अपनाकर आप इस बिल को ठीक करने का कष्ट करें।

सभापति महोदय : राशिद अलवी जी, आपको पांच मिनट का समय दिया जा रहा है, उसके बाद मंत्री जी को रिप्लाई देना है और समय कम है।

श्री राजीव प्रताप रूडी (छपरा) : मंत्री जी का जवाब लम्बा होना चाहिए, बिल के अनुरूप होना चाहिए।

सभापति महोदय : सबने बिल का समर्थन किया है, इसमें कोई कंट्रोवर्सी नहीं है।

 

श्री राशिद अलवी (अमरोहा) : मैडम चेयरपरसन, मोटर वैहिकल एक्ट, २००० जो सदन में पेश किया गया है, उसके बारे में मेरा निश्चित मत है कि यह बिल बहुत जल्दी में लाया गया है, बहुत जल्दी में ड्राफ्ट किया गया है। आब्जैक्ट एंड रीजन्स को पढ़ने से लगता है कि इस बिल का एक ही मकसद है कि मोटर और कारों के अन्दर एलपीजी के इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाए। सरकार को मालूम होगा कि पहले से ही नजायज तौर पर, गैरकानूनी तरीके से खुल्लम-खुल्ला एलपीजी का इस्तेमाल गाड़ियों के अन्दर हो रहा है। शायद सरकार अब उसको लीगलाइज करना चाहती है। अगर सरकार काम्प्रिहैसिंव तरीके से, सोच-विचार करके इस बिल में अमेडमेंट लाती, तो ज्यादा बेहतर होता। मोटर वैहिकल एक्ट में बड़ी तबदीली की जरूरत है, लेकिन एलपीजी से संबंधित यह बहुत ही छोटा संशोधन प्रस्तुत किया गया है। दिन-प्रतदिन एक्सीडेंट्स बढ़ रहे हैं, लोग मोटर वैहिकल एक्ट की इज्जत नहीं करते हैं। ब्यूरोक्रेसी और पुलिस इसको नजरअन्दाज करती है। दिल्ली के अन्दर ऐसी बहुत सी जगहें हैं, जहां जीरो-टालरैंस लिखा होता है, लेकिन वहां पर लोग अधिक आफैंसेस करते हैं। इस कानून को लागू करने के लिए सरकार के पास विल की जरूरत है। जब तक सरकार के पास विल नहीं होगी, तब तक इस कानून को लागू नहीं किया जा सकता है। मैं इस बिल के बारे में ज्यादा एक्सपर्ट नहीं हूं, लेकिन मुझे जानकारी है, गांड़ी में एलपीजी लगवाने से गाड़ी की स्पीड कम हो जाएगी। गाड़ियां स्पीड से नहीं चल सकती हैं, जिस स्पीड से पैट्रोल या डीजल से चलती है। उनकी स्पीड बहुत हद तक कम हो जाएगी। ७०-८० किलोमीटर की स्पीड से ज्यादा गाड़िया नहीं चल पायेंगी। मुझे मालूम नहीं है, सरकार ने इस बारे में एक्सपर्टेस से राय ली है या नहीं, अगर राय ली होती, तो बेहतर होता या एक्सपट्र्स की कोई कमेटी बना दी जाती, तो बेहतर होता। एलपीजी को लगाने से कितना पोल्युशन कम होगा, मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता हूं। दिल्ली के अन्दर जिनता पोल्युशन है, उतना पोल्युशन दुनिया के किसी दूसरे देश में नहीं है। सरकार ने कम्पलसरी किया है कि हर मोटर वाले को पोल्युशन सर्टफिकेट लेना होगा। मैं आपको हाल ही की एक पैट्रोल पम्प की घटना सुनाता हूं। एक बहुत पुरानी कार पोल्युशन चैक कराने के लिए आई। मशीन की सुईं आखिरी हिंसे तक पहुंच गई, लेकिन उस व्यक्ति ने दुगुना पैसा देकर सर्टफिकेट ले लिया। मैं इस बात को सरकार की नोटिस में लाना चाहता हूं। आप एलपीजी को इन्ट्रोडयूस कर रहे हैं, तो आपको एक्सपट्र्स की राय लेनी चाहिए थी। अगर आप राय नहीं लेगे, तो मुझे खतरा है कि एक्सीडैंट्स की तादाद ज्यादा हो जाएगी। मोटर वैहिकल एक्ट में कम्पैसेशन का एक प्रोवीजन है, जिसको इम्मिडिएट बदलने की जरूरत है। तीन-चार-पांच साल तक लोगों को कम्पैंसेशन नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में कनसिक्वैंसेस बहुत बड़े होने वाले हैं।

मैडम, मैं ज्यादा समय न लेते हुए, दो-तीन बिन्दुओं पर अपने विचार रखना चाहता हूं।

…( व्यवधान) मैडम, बिल में एक प्रोवीजन किया गया है कि जिनके पास दस गाड़ियां होंगी, उनको परमीशन लेने की जरूरत नहीं होगी।

यह शर्त इसलिए लगाई गई है कि जिनकी दस बसें होंगी,…( व्यवधान) Is the House being run by the Chairman or the Parliamentary Affairs Minister?

MR. CHAIRMAN : That is not the point. I have already told that you are the last person to speak because the Minister has to reply before 4 o’clock, and the debate on resolution passed by Jammu and Kashmir Legislative Assembly has to start.

SHRI PRAMOD MAHAJAN: I am not running the House. Originally, two hours’ time was given. We have already taken three hours.

SHRI RASHID ALVI : I am sorry that I am the last person to speak.

आप कहते हैं तो मैं बैठ जाता हूं।

SHRI PRAMOD MAHAJAN: At 4 o’clock, we have to start another discussion. Otherwise, we will take one more day for concluding this debate.

सभापति महोदय : अलवी साहब, मैंने आपको एकोमोडेट कर दिया, आपका नाम ओरिजनली नहीं था। अब आप जल्दी खत्म करिए।

श्री राशिद अलवी : ठीक है, मेरी आवाज तो जीरो ऑवर में भी चिल्लाते-चिल्लाते बैठ गई, मुझे इन लोगों ने बोलने नहीं दिया।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप डिस्टर्ब मत करिए, इन्हें अपनी बात खत्म करने दीजिए।

श्री राशिद अलवी : मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जो दस बसों का प्रोविजन है, मैं उसे समझने से कासिर हूं, इसे रीथिंक करना चाहिए। दूसरी बात आपने यह कही है कि आप १४ दिन की एप्रूवल के लिए कंडीशन रखेंगे, वह १४ दिन के अंदर-अंदर आथोरिटीस को बता दी जाए। इसके अंदर भी कुछ शर्त लगानी चाहिए, वरना लोग इसका नाजायज़ फायदा उठाएंगे।

इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश की सङकों पर बहुत सारे व्हीकल्स बगैर परमिट और इजाजत के चलते हैं। आप तो जानते होंगे कि वहां जुगाड. नाम का एक व्हीकल चलता है, जिसके ऊपर कोई नम्बर नहीं होता, उसके ऊपर कोई पाबन्दी नहीं होती। इसलिए मैं चाहूंगा कि उसके ऊपर खास तौर से तवज्जो दें और इस तरीके के कानून बनाएं।

जल-भूतल परिवहन मंत्री (श्री राजनाथ सिंह) : सभापति महोदय, मोटर व्हीकल अमेंडमेंट बिल पर इस सदन के कई माननीय सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए। इस बिल पर जब चर्चा हो रही थी तो मैं सुन रहा था। हमने जो संशोधन प्रस्तुत किए हैं उन्होंने केवल उसी पर विचार व्यक्त नहीं किए हैं बल्कि मोटर व्हीकल अमेंडमेंट बिल में एक कॉम्प्रीहेंसिव अमेंडमेंट लाने की बात भी माननीय सदस्यों ने कही है। वैसे तो इस चर्चा में लगभग १३ माननीय सदस्यों ने भाग लिया, लेकिन मेरे समक्ष सबसे बङा संकट यह है कि चार बजे ही मुझे अपना भाषण समाप्त करना है और माननीय सदस्यों ने कई प्रमुख बिन्दुओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इतने कम समय में सभी माननीय सदस्यों का अलग-अलग उत्तर दे पाना मेरे लिए संभव नहीं हो पाएगा, लेकिन मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो सके मैं सभी माननीय सदस्यों के प्रश्नों का उत्तर दे दूं।

यहां स्कूल बसों के परमिट की व्यवस्था के बारे में कुछ माननीय सदस्यों ने चिन्ता व्यक्त की। उनका कहना है कि स्कूल बसों के लिए परमिट की व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए। लेकिन सभी माननीय सदस्य जानते हैं कि कई ऐसी गंभीर दुर्घटनाएं हो गई हैं, जिनमें काफी संख्या में बच्चे आहत हुए हैं। दिल्ली में ही एक बहुत बङी घटना घटी थी। इसलिए सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही हमारे मंत्रालय ने यह फैसला किया है कि इसमें अमेंडमेंट होना चाहिए। लोगों ने कहा है कि यह परमिट न:शुल्क होना चाहिए। यह स्टेट गवर्नमेंट का ज्यूरिसडिकशन है, स्टेट गवर्नमेंट जितना भी शुल्क निर्धारित करना चाहती है, उतना कर सकती है। उसमें सेंट्रल गवर्नमेंट का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। कुछ माननीय सदस्यों ने यह भी सुझाव दिया कि जो स्कूल बसें हैं, उनका एक विशेष प्रकार का रंग होना चाहिए। यह तो स्कूलों पर निर्भर करता है कि वे अपनी स्कूल की बसों का कौन सा रंग रखना चाहते हैं। वे जो भी रंग रखना चाहते हैं, रख सकते हैं। स्टेट गवर्नमेंट यदि चाहे तो विद्यालयों के लिए एक प्रकार का कलर प्रेसक्राइब कर सकती है, उसमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन स्कूल और कालेजों की चार्टर्ड बसों के लिए जो व्यवस्था है, उन बसों के लिए हम कोई स्पेसफिक कलर प्रेसक्राइब नहीं कर सकते, क्योंकि बहुत सारे ऐसे विद्यालय हैं, जिनकी अपनी बसें नहीं हैं लेकिन वे चार्टर्ड बसें रखते हैं।

सभापति महोदय, कुछ माननीय सदस्यों ने कहा है कि हम जो ५८(४) डिलीट कर रहे हैं, उसे डिलीट करने की आवश्यकता नहीं है। हम उसे इसलिए डिलीट कर रहे हैं ताकि छोटी गाङियों में बङी केपेसिटी के टायर लगा कर ज्यादा लोड केरी करने के कारण सङकों की जो क्षति हो रही है और यातायात असुरक्षित हो रहा है, उसे रोका जा सके।

इस अमेंडमेंट के कारण मोटर-वाहन रूल्स में और इस नोटफिकेशन में जो भी चेंज करने की आवश्यकता होगी, जिससे इस अमेंडमेंट का उद्देश्य पूरा हो सके, हम उसी प्रकार के रूल्स बनाएंगे, यह मैं संसद को आश्वासन देना चाहता हूं।

कुछ सम्मानित सदस्यों ने आशंका जाहिर की है कि इसका पूरा इंफोर्समेंट नहीं हो पायेगा। यह ठीक है कि पॉलिसी हम बनाते हैं लेकिन इसका इंफोर्समेंट राज्य सरकारें करती हैं। पहले भी देखने में आया है कि कानून और नियम तो बहुत सारे बन जाते हैं लेकिन जिस प्रकार से उनका क्रियान्वयन होना चाहिए, वह समुचित रूप से नहीं हो पाता है। हम मोटर-वाहन एक्ट के माध्यम से देश में रोड ट्रांसपोर्ट को रैगूलेट करने का काम करते हैं, लेकिन इंफोर्समेंट तो राज्य सरकारें ही करती हैं। अभी जून में ट्रांसपोर्ट मनिस्टर्स की सभा हुई थी जिसमें उन्होंने भी बहुत सारी कठिनाइयों की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और सबकी सहमति बनी थी कि एक सिटीजन चार्टर की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे जो ट्रांसपोर्ट ऑफिसर्स हैं उनको भी सब बातों की जानकारी होनी चाहिए। अगर हमें ड्राइविंग लाइसेंस लेना है तो हमें क्या करना है, परमिट लेना है तो क्या करना है और कितने दिनों में हमें लाइसेंस और परमिट प्राप्त हो जायेगा। हमने ट्रांसपोर्ट ऑफिसर्स से आग्रह भी किया है कि वे सिटीजन चार्टर की व्यवस्था को अपने-अपने राज्यों में लागू करें। हम ऐसा इसलिए भी करना चाहते हैं ताकि लाइसेंस और परमिट देने में अधिक से अधिक पारदर्शिता लाई जा सके।

ड्राइविंग लाइसेंस के बारे में कुछ सम्माननीय सदस्यों ने शिकायत की है कि ड्राइविंग लाइसेंस जितनी जांच पड़ताल के बाद दिये जाने चाहिए, उतनी जांच पड़ताल के बाद नहीं दिये जाते। हम जानते हैं कि बहुत सारे लोगों को तो ड्राइविंग लाइसेंस घर बैठे-बैठे ब्रोकरों के द्वारा प्राप्त हो जाते हैं। हम में से भी बहुत सारे ऐसे सदस्य होंगे जिनको ड्राइविंग लाइसेंस के लिए किसी कार्यालय में जाने की आवश्यकता नहीं हुई होगी बल्कि घर बैठे-बैठे ही उनको वह प्राप्त हो गया होगा। इसके लिए कुछ सख्त कानून बनाने की आवश्यकता है और इस पर भी हम गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं।

कुछ सम्माननीय सदस्यों ने कहा है कि जिनके पास दस वाहन से ज्यादा हैं उनके लिए तो आपने आल्ट्रेशन की व्यवस्था सुनिश्चित कर दी है लेकिन जिनके पास दस वाहन से कम हैं उनके लिए यह सुविधा मुहैया आपने नहीं कराई है। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि किसी भी प्रकार का भेद-भाव हमने नहीं किया है। सैक्शन ५२(१) के अन्तर्गत जो रूल्स बनाए जायेंगे, उनमें पर्मिशन आदि की व्यवस्था की जायेगी, ऐसा मैं सदन को आश्वस्त करना चाहता हूं। जब सेम-मेक और सेम-टाइप के इंजन को रिप्लेस किया जायेगा, तब सूचना देने की व्यवस्था है और यही इस संशोधित बिल में मैंने व्यवस्था की है। जब इस संबंध में रूल्स बनाए जायेंगे तब उसमें यह व्यवस्था अवश्य करेंगे कि इस सुविधा का किसी भी सूरत में दुरूपयोग न होने पाये। अभी माननीय खंडूरी जी जब अपने विचार व्यक्त कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि १४ दिन का समय रूल्स के उल्लंघन को रैगूलराइज करने के लिए आपने दिया है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि हमने नियम का उल्लंघन करने वालों को कोई विशेष सुविधा मुहैया नहीं कराई है बल्कि हमारा उद्देश्य यह है कि राज्य सरकारों द्वारा बनाए गये रूल्स के अन्तर्गत जो सबसे अधिक वाहनों के मालिक हैं वे अपनी गाड़ियों में सेम-टाइप और सेम-मेक के इंजन से बदलाव करेंगे।

16.00 hrs. और इसका विवरण रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के रिकॉर्ड के लिए वह १४ दिन में उस रजिस्िंट्रग एथॉरिटी को सूचित कर देंगे। इसी उद्देश्य से ही हमने १४ दिन में रजिस्िंट्रग एथॉरिटी को सूचना देने की बात इस विधेयक में की है।

रोड एक्सीडैंट के बारे में सम्मानित सदस्यों ने चिंता व्यक्त की। हम सभी जानते हैं कि खराब रोड के कारण दुर्घटनाएं होती हैं जबकि ऐसी बात नहीं है। विकसित देशों में सड़कों की अच्छी हालत होने के कारण भी दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। मैं पिछले दिनों मलेशिया में था। मुझे बताया गया कि जब से वहां की सड़कों की हालत अच्छी हो गई, तब से दुर्घटनाओं की संख्या गाड़ियों के तेज चलने के कारण बढ़ गई। मैं इस बात को समझता हूं कि ट्रैफिक सैंस लोगों में डेवलप करना चाहिए। सड़कों की हालत सुधारने के लिए हमारी सरकार पूरी तरह प्रयत्नशील है। मैं राज्य सरकारों से भी अनुरोध करूंगा जो स्टेट हाइवेज हैं, वे उनकी स्थिति को सुधारने के लिए प्रयत्न करें।

श्री राजो सिंह जी ने बिहार की सड़कों के सम्बन्ध में अपनी चिंता व्यक्त की। मैं उन्हें जानकारी देना चाहूंगा कि केन्द्र सरकार ने जितनी धनराशि बिहार को मुहैय्या कराई, उसका उपयोग पिछले वित्त वर्ष में सड़कों के निर्माण, सड़कों की स्थिति सुधारने में नहीं हो पाया। ट्रैफिक सैंस लोगों का किस प्रकार बढ़े, हम इसके ऊपर गम्भीरतापूर्वक विचार करेंगे कि किस प्रकार के कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए हमने इस बार ट्रांसपोर्ट मनिस्टर्स की कान्फ्रेंस में एक यूनिफाइड एथॉरिटी बनाने पर भी विचार किया है। उसमें स्टेट पुलिस के लोग होंगे, ट्रांसपोर्ट एथॉरिटी के लोग होंगे और नेशनल हाइवे एथॉरिटी के लोग होंगे। इसकी मॉडैलिटी को वर्क आउट करने के लिए हमने अपने राज्य मंत्री श्री हुक्मदेव नारायण यादव की अध्यक्षता में एक समति का गठन किया है जो तीन महीने में अपनी रिपोर्ट दे देगी और यूनिफाइड एथॉरिटी का गठन हो जाएगा। हमारी कोशिश होगी कि क्राइम और एक्सीडैंट को कैसे कम किया जाए? जो मॉडैलिटी वर्क आउट की जाएगी, वह उसमें सामने आ सकेगी।

इसके अतरिक्त सम्मानित सदस्यों ने यह आशंका व्यक्त की है कि यह बिल पारित तो हो जाएगा, एक्ट बन जाएगा लेकिन रूल जल्दी नहीं बन पाएंगे। किसी सम्मानित सदस्य ने यह भी कहा कि १९८८ में एक्ट बन गया लेकिन रूल बन नहीं पाया। मैं उस सम्मानित सदस्य को बताना चाहता हूं कि १९८८ में एक्ट बनने के छ: महीने में रूल बन गया था। हम यहां जो अमैंडमैंट कर रहे हैं, उसके बाद दो-ढ़ाई महीने में रूल बन जाएगा। रूल इस बात को ध्यान में रख कर बनाया जाएगा ताकि इस संशोधन का जो उद्देश्य है, उसकी पूर्ति हो सके।

सबसे महत्वपूर्ण बात प्रदूषण को कम करने की है। इस संशोधन विधेयक के साथ यह व्यवस्था सुनिश्चित हो सकेगी कि हम पैट्रोल की जगह एल.पी.जी. फ्यूल का प्रयोग कर सकेंगे। राम नाइक जी ने विस्तार से इसकी जानकारी दी है कि एल.पी.जी. फ्यूल का उपयोग सस्ता होगा और प्रदूषण कम होगा।

इसके अतरिक्त अन्य बहुत से बिन्दु हैं लेकिन समय अभाव है। एक महत्वपूर्ण बिन्दु जो सुन्दर लाल जी द्वारा उठाया गया है, उसका जिक्र करना चाहता हूं। सैक्शन १४० और सैक्शन १६१ की विसंगतियों को दूर करने के सम्बन्ध में उन्होंने अपनी बात कही। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि इस सम्बन्ध में इंश्योरेंस कम्पनी और वित्त मंत्रालय से विचार-विमर्श करके जो भी आवश्यक होगा, हम इसके बारे में निर्णय करेंगे।

हिट ऐंड रन के मामले में केस दायर करने की जो समय सीमा होती है,वह समय सीमा समाप्त कर दी गई है। इससे ज्यादा कुछ न कहते हुए मैं उन सभी सम्मानित सदस्यों को अपनी तरफ से धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने इस संशोधन बिल पर अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। मैं उनसे अनुरोध कूरंगा कि वह इस बिल को सर्वसम्मति से पारित करने की कृपा करें।

 

MR. CHAIRMAN : We are supposed to start the discussion under Rule 193 regarding resolution passed by Jammu and Kashmir Legislative Assembly for autonomy at four o’clock. If the House permits, it can be taken up after this Bill is passed.

SEVERAL HON. MEMBERS: We agree.

MR. CHAIRMAN: The question is:

"That the Bill further to amend the Motor Vehicles Act, 1988, be taken into consideration. "

The motion was adopted.

MR. CHAIRMAN: The House shall now take up clause-by-clause consideration of the Bill.

The question is:

"That clauses 2 to 5 stand part of the Bill."

The motion was adopted.

Clauses 2 to 5 were added to the Bill.

Clause 1, the Enacting Formula and the Title were added to the Bill.

श्री राजनाथ सिंह : मैं प्रस्ताव करता हूं :

" कि विधेयक पारित किया जाये "

MR. CHAIRMAN: The question is:

"That the Bill be passed."

The motion was adopted.