Lok Sabha Debates
Motion For Consideration Of The Government Of National Capital Territory Of ... on 22 March, 2021
Seventeenth Loksabha > Title: Motion for consideration of the Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Bill, 2021 (Bill passed).
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HOME AFFAIRS (SHRI G. KISHAN REDDY): Hon. Chairperson, Madam, I, on behalf of Shri Amit Shah, beg to move:
“That the Bill further to amend the Government of National Capital Territory of Delhi Act, 1991 be taken into consideration.” आदरणीय मैडम चेयरपर्सन, इस सदन में गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरीटरी ऑफ डेल्ही (अमेंडमेंट) बिल, 2020-21 पर चर्चा करने की अनुमति प्रदान करने के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं । वर्ष 1991 में, इसी संसद में, 69वां संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में दो नए आर्टिकल्स, एक आर्टिकल-239 ए, और दूसरा आर्टिकल-239 एबी लाए गए । इस संदर्भ में, मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूं कि संविधान के अनुसार दिल्ली एक यूनियन टेरीटरी विद लेजिस्लेचर है, विद लिमिटेड पावर्स । ऑनरेबल हाई कोर्ट ने भी अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यह एक यूनियन टेरीटरी है । इस अमेंडमेंट का उद्देश्य है, सिर्फ उत्पन्न हुई अस्पष्टता को हटाने के लिए आज संशोधन विधेयक संसद के समक्ष लाना पड़ा । यहां सभी प्रस्तावित संशोधन कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्णयों के अनुरूप हैं । इससे दिल्ली के लोगों का भला होगा ।
14.56 hrs (Shrimati Rama Devi in the Chair) महोदया, इस संसद के सभी माननीय सदस्य इससे अवगत हैं कि नेशनल कैपिटल टेरीटरी ऑफ दिल्ली का प्रशासन तीन मुख्य प्रोविजंस के ऊपर आधारित है – संविधान का आर्टिकल 239 ए, जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 और ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस ऑफ द जीएनसीटीडी रूल्स, 1993. वर्ष 1991 से दिसम्बर, 2013 तक दिल्ली का प्रशासन सुचारू रूप से चलता रहा और आम तौर पर सभी मुद्दों का समाधान विचार-विमर्श और चर्चा के माध्यम से हो जाता था । लेकिन, वर्ष 2015 में संविधान के कुछ प्रोविजन्स के इंटरप्रेटेशन को लेकर कुछ कॉन्फ्लिक्ट ऑफ रूल्स खड़े किए गए । संविधान के आर्टिकल 239 और 239 एए, जीएनसीटीडी एक्ट, 1991, ट्रांजैक्शंस ऑफ बिजनेस ऑफ जीएनसीटीडी रूल्स, 1993 के वाक्यों को लेकर ऑनरेबल हाई कोर्ट में कई केसेज फाइल किए गए । ऑनरेबल कोर्ट ने भी इन केसेज और इनसे जुड़े हुए मुद्दों पर समय-समय पर अपने फैसले सुनाए । ऑनरेबल कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के संदर्भ में मंत्रीपरिषद को अपने द्वारा लिए गए फैसलों को लेफ्टिनेंट गवर्नर को सूचित करना अनिवार्य है, ताकि संविधान के तहत लेफ्टिनेंट गवर्नर अपने अधिकारों का सही तरीके से प्रयोग कर सके । इन विषयों पर कुछ स्पष्टीकरण की आवश्यकता है, जिनके अभाव में सबसे अधिक नुकसान दिल्ली के हमारे आम नागरिकों का हो रहा है । इससे दिल्ली की प्रगति पर भी बुरा असर पड़ रहा है क्योंकि दिल्ली एक यूनियन टेरिटरी है । इसलिए भारत सरकार का और इस संसद का भी कर्तव्य बनता है कि एप्रोप्रिएट लेजिस्लेटिव मेजर्स के द्वारा इस कानून पर प्रशासनिक अस्पष्टता को हटाया जाए, टेक्निकल एण्ड लीगल एडमिनिस्ट्रेशन एम्बिगुइटीज़ को हटाया जाए । इसकी आवश्यकता है कि उचित स्पष्टीकरण किया जाए, ताकि दिल्ली और दिल्लीवासियों को एक अच्छे प्रशासन की व्यवस्था मिल सके ।
15.00 hrs इन सभी तथ्यों का मद्देनजर रखते हुए इस सदन में जी.एन.सी.टी.डी अमेंडमेंट बिल 2021 को लाया गया है । संविधान के आर्टिकल 239ए की क्लॉज 7 भारत के संविधान को सशक्त करती है कि वहाँ कानून के द्वारा प्रोविजन्स बनाया जा सके और जिसके आर्टिकल 239ए के क्लॉज 1 से लेकर 6 के प्रोविजन्स को सप्लीमेंट किया जा सके । इसके तहत संसद ने जी.एन.सी.टी.डी. एक्ट 1991 को पारित किया था, इसलिए इसमें कोई भी संशोधन करने के लिए यह संसद पूरी तरह सक्षम है और पूरा अधिकार भी है । इसके अनुसार मैं इस विधेयक को प्रस्तुत करता हॅूं । इसके माध्यम से दिल्ली प्रशासन से जुड़े हुए कई मुद्दों को स्पष्ट किया जाएगा । इसके लिए यह विधेयक 4 सेक्शंस में सेक्शन 21, सेक्शन 24, सेक्शन 33 और सेक्शन 42 से संशोधन प्रस्तावित करता हूँ ।
सभापति जी, इससे दिल्ली गवर्नमेंट की एडमिनिस्ट्रेटिव एफिशिएंसी बढ़ेगी और एग्जीक्यूटिव तथा लेजिस्लेचर के रिलेशंस बेहतर होंगे । यह टेक्निकल बिल है । यह कोई राजनीति संबंधित बिल नहीं है । डे टू डे एडमिनिस्ट्रेशन में कुछ टेक्निकल ऐम्बिग्यूइटीज़ की समस्या आ रही हैं । इसको हटाना इस संसद की जिम्मेदारी बनती है । जो बिल 1991 बनाया गया, उसे इस संसद ने ही बनाया । आज कुछ दिनों में ऐम्बिग्यूइटीज़ उठाकर जनता और कोर्ट के सामने अलग-अलग केसेस दिए जा रहे हैं । इसी दृष्टिकोण से आज संसद के सामने मैं अनुरोध करता हूँ कि जी.एन.सी.टी.डी. अमेंडमेंट बिल 2021 पर विचार किया जाए और इसे पारित किया जाए ।
माननीय सभापति : प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ:
“कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 का और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए ।” श्री मनीष तिवारी (आनंदपुर साहिब): सभापति महोदया, बहुत-बहुत धन्यवाद । एनडीए भाजपा की जो केन्द्र सरकार है, इसकी एक बड़ी तकलीफ है । तकलीफ यह है कि किस मुद्दे पर वह कहाँ खड़े हैं,वह इस पर निर्भर करता है कि वह इस समय कहाँ बैठे हैं । परंतु दिल्ली के मुद्दे के ऊपर इनकी जो राय थी, जब वह वहीं बैठते थे,वह राय आज की राय से पूरी तरह से विपरीत, भिन्न और 180 डिग्री के ऊपर है । शायद मंत्री जी को मालूम नहीं होगा कि वर्ष 2003 में सम्मानित श्री लालकृष्ण आडवाणी इस देश के गृह मंत्री थे ।
इसी सदन में श्री लालकृष्ण आडवाणी ने 102वाँ संविधान संशोधन कानून और स्टेट ऑफ डेल्ही बिल 2003 को इंट्रोड्यूस किया था । उस संवैधानिक संशोधन और विधेयक का उद्देश्य क्या था? उसका उद्देश्य यह था कि नई दिल्ली के इलाके को छोड़कर बाकी दिल्ली का जितना इलाका है, उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए । आज यह बहुत ही विचित्र और अद्भूत परिस्थिति है कि वही एनडीए भाजपा की सरकार 18 वर्षों बाद एक विधेयक लेकर आई है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था वर्ष 1991 में 69वाँ संविधान संशोधन के तहत दिल्ली के लोगों के लिए बनाई गई थी, उसको पूरी तरह से समाप्त करना चाहती है ।
I would say that the present legislation is completely unconstitutional. It is a coloured, targeted and mala fide legislation which seeks to take away the representative character of Delhi Government.
It amends Article 239AA without following the Constitutional process with regard to the amendment of the Constitution. Moreover, it removes the substratum of the Constitution Bench Judgment, which laid down the limits to the power of the Lieutenant Governor and the Union of India qua the National Capital Territory of Delhi.
Contrary to what the Minister has stated, Madam Chairperson, this unconstitutional legislation is not saved by Article 239AA, Clause 7, which the Minister had referred to; and I would demonstrate as to how.
But before that, let me take you a little into the background. It was the year, 1991 – if I remember correctly, the 12th of December, 1991-- when this House passed the 69th Constitutional Amendment Bill and the consequential Bill with regard to the National Capital Territory of Delhi. What the 69th Constitution Amendment envisaged was to give a special status to the National Capital among Union Territories -- कि दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेशों की श्रृंखला में एक विशेष स्थान दिया जाए । यह उस संविधान संशोधन का अभिप्राय था, यह उसका ऑब्जेक्टिव था । इस संवैधानिक संशोधन ने भारत के संविधान में दो नई धारायें जोड़ी, 239( एए) और 239( बी), इससे जो दिल्ली का संवैधानिक डिजाइन था, जो संवैधानिक ढांचा था, वह बिल्कुल पूरी तरह से साफ हो गया । वह संवैधानिक ढांचा क्या था? वह संवैधानिक ढांचा यह था कि पुलिस, पब्लिक आर्डर और भूमि को छोड़कर बाकी सारे विषयों के ऊपर कानून बनाने का अख्तियार दिल्ली विधान सभा का है । आज यह विधेयक जो मंत्री महोदय लेकर आए हैं, उन अधिकारों को छीनने का काम करता है । उसके साथ-साथ इस संवैधानिक संशोधन ने यह भी सुनिश्चित किया कि एक चुनी हुई विधान सभा होगी और एक मंत्रिमंडल होगा । उस मंत्रिमंडल की जवाबदारी उस विधान सभा को होगी । मैं इस सदन की जानकारी के लिए वह आर्टिकल 239(एए) एक बार पढ़ना चाहता हूं ।
It says:
“Subject to the provisions of this Constitution, the Legislative Assembly shall have power to make laws for the whole or any part of the National Capital Territory with respect to any of the matters enumerated in the State List or in the Concurrent List insofar as any such matter is applicable to Union territories except matters with respect to Entries 1, 2 and 18 of the State List and Entries 64, 65 and 66 of that List insofar as they relate to the said Entries 1, 2, and 18.
यह एंट्री 1, 2 और 18 क्या है? यह एंट्री 1 ,2 और ,18, पुलिस, पब्लिक आर्डर और जो दिल्ली की भूमि है, उससे संबंधित है । सिर्फ इन 3 विषयों के ऊपर केंद्र सरकार को या इस संसद को कानून बनाने का अख्तियार था, बाकी सबके ऊपर विधान सभा को कानून बनाने का अख्तयिार था । अब समय-समय पर, केंद्र सरकार के दिल्ली में क्या अधिकार होने चाहिए, राज्य सरकार का क्या अधिकार होना चाहिए, इसके ऊपर वाद-विवाद होता रहा । यह मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा । उच्चतम न्यायालय ने इस चीज को सुनिश्चित किया कि दिल्ली सरकार के क्या अख्तियार हैं और केंद्र सरकार के क्या अख्तियार हैं । वर्ष 2018 में जो फैसला दिया गया, मैं सिर्फ उसकी दो लाइनें पढ़कर आपको सुनाना चाहता हूं । उस फैसले में साफ तौर पर यह कहा गया:
“Article 239-AA(4) confers executive powers on the Government of NCT of Delhi whereas the executive power of the Union stems from Article 73 and is coextensive with Parliament's legislative power. Further, the ideas of pragmatic federalism and collaborative federalism will fall to the ground if we are to say that the Union has overriding executive powers in respect of matters for which the Delhi Legislative Assembly has legislative powers. Thus, it can be very well said that the executive power of the Union in respect of NCT of Delhi is confined to the three matters in the State List for which the legislative power of the Delhi Legislative Assembly has been excluded under Article 239-AA(3)(a).” आगे उच्चतम न्यायालय ने ये कहा “Such an interpretation would thwart any attempt on the part of the Union Government to seize all control and allow the concepts of pragmatic federalism and federal balance to prevail by giving NCT of Delhi some degree of required independence in its functioning subject to the limitations imposed by the Constitution.” यह विधेयक जो काम करने जा रहा है, उसी काम को उच्चतम न्यायालय की एक संवैधानिक खंडपीठ ने उसके ऊपर रोक लगाई थी कि केन्द्र सरकार के अख्तियार का जो दायरा है, उसके आसपास उन्होंने एक लक्ष्मण रेखा खींच दी थी कि अगर आप इससे बाहर जाने की कोशिश करेंगे तो यह सीधे-धीरे दिल्ली विधान सभा को जो अधिकार संविधान ने दिए हैं, उसके ऊपर कुठाराघात करेंगे, उसका उल्लंघन करेंगे ।
उन्होंने लेफ्टिनेंट गवर्नर के बारे में क्या कहा, मैं एक लाइन पढ़ना चाहता हूं, “The status of NCT of Delhi is sui generis, a class apart, and the status of the Lieutenant Governor of Delhi is not that of a Governor of a State, rather he remains an Administrator, in a limited sense, working with the designation of Lieutenant Governor.” इसका मतलब उसका नाम लेफ्टिनेंट गवर्नर है, किन्तु काम उसका प्रशासक का है । उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ ने इस चीज की साफ-साफ पूरी तरह से पुष्टि की थी और उसका अनुमोदन किया था । अब मैं आपके विधेयक के ऊपर आता हूं, जिस विधेयक को लेकर आप आए हैं । Now, this particular Bill proposes to amend Section 21. Now, the unamended Section 21, basically, circumscribes the power of the Assembly to make laws with respect to Articles 286, 287, 288 and 304 of the Constitution of India.
यह बहुत ही विचित्र और अद्भुत बात है कि इसमें आपने प्रोवाइजो जोड़ दिया है कि दिल्ली सरकार का मतलब लेफ्टिनेंट गवर्नर होगा । ये कैसे हो सकता है? दिल्ली सरकार का मतलब वह होगा, जो भारत के संविधान में लिखा है । दिल्ली सरकार का मतलब वह होगा, जो संसद ने कानून पारित किया है, उसमें लिखा है । दिल्ली सकरार का मतलब लेफ्टिनेंट गवर्नर कैसे हो सकता है? खासकर जब उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि उसका टाइटल लेफ्टिनेंट गवर्नर होगा लेकिन उसका काम एक प्रशासक से ज्यादा नहीं होगा । यह बिल्कुल साफ है कि आप पिछले दरवाजे से दिल्ली में जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है, उसको समाप्त करना चाहते हैं और एलजी के माध्यम से दिल्ली को चलाना चाहते हैं ।
आप दूसरा संशोधन धारा 24 लेकर आए हैं । that bars the Lieutenant Governor’s assent to some Bills: “That would have another proviso… Incidentally, cases/matters falling outside the purview of powers conferred by the Assembly…” वे तीन मामले हैं, जिनके ऊपर केन्द्र सरकार को कानून बनाने का अख्तियार है । अगर दिल्ली विधान सभा खुदा न खास्ता या गलती से कोई ऐसा कनून बना देती है जो उन तीन पॉवर्स के ऊपर इम्पिन्ज करता है, उनके ऊपर असर डालता है तो लेफ्टिनेंट गवर्नर उस कानून की मंजूरी नहीं देगा ।
मुझे नहीं लगता कि इससे किसी को आपत्ति होनी चाहिए और हमें भी इससे कोई आपत्ति नहीं है । आप जो अगला संशोधन लेकर आए हैं, 33(1) यह लगता बहुत सरल है । It looks very innocuous but it is an assault on the sovereignty of the Delhi Vidhan Sabha to frame its rules of procedure. दिल्ली विधान सभा के जो रूल्स और प्रोसिजर होंगे, वे वैसे ही होंगे, जैसे लोक सभा के हैं ।
मैं यह पूछना चाहता हूं कि दिल्ली विधान सभा के ऊपर इतनी कृपा क्यों हो रही है? राज्य सभा के रूल्स और प्रोसिजर्स भी लोक सभा से भिन्न हैं । हर विधान सभा के रूल्स और प्रोसिजर्स दूसरी विधान सभा से भिन्न हैं । ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा कि आपको जो हाऊस की साव्रन्टी है, उस साव्रन्टी के ऊपर आप आघात कर रहे हैं ।
यह कहकर कि उनको यह अख्तियार नहीं है कि किस तरह से वह अपने हाउस को चलाएं, किस तरह से वहां कार्यशैली चले, क्या वह भी तय यह संसद करेगी? मैं माननीय मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि अगर संसद को ही तय करना है तो दिल्ली विधान सभा की जरूरत ही क्या है?
माननीय सभापति जी, नया प्रोवाइजो सैक्शन 33 में जोड़ा गया है, वह सोने पर सुहागा है । It takes the cake; it basically cuts the legs out from under the Delhi Vidhan Sabha. दिल्ली असेम्बली का औचित्य ही पूरी तरह से समाप्त कर देता है । यह कहता है – दिल्ली विधान सभा ऐसा कोई काम नहीं कर सकती, जिससे सरकार की प्रशासनिक गतिविधि पर किसी तरह की ओवरसाइट एक्सरसाइज़ करें ।
महोदया, मैं पांच मिनट और लूंगा क्योंकि यह कानून संवैधानिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए मैं आपकी इंडेलजेंस चाहता हूं । मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं, अगर एक विधान सभा सरकार की कार्यशैली के ऊपर, कामकाज के ऊपर अपनी ओवरसाइट एक्साइज़ नहीं कर सकती तो उस विधान सभा का क्या फायदा? क्या वह विधान सभा सिर्फ वाद-विवाद और संवाद के लिए बनाई गई है? आप बिल्कुल ही विचित्र किस्म का कानून लेकर आए हैं ।
इससे भी ज्यादा खतरनाक सैक्शन 44 का सबसैक्शन 2 है जो बिल्कुल पूरी तरह से 69वें कांस्टीट्यूशन अमेंडमेंट की धज्जियां उड़ा देता है । यह कहता है – जिन मामलों के ऊपर दिल्ली सरकार को कानून बनाने का अख्तियार है, अगर दिल्ली सरकार उस पर कानून बनाती है तो उस पर कोई प्रशासनिक कार्रवाई करने से पहले उनको लैफ्टिनेंट गवर्नर की अनुमति लेनी चाहिए ।
महोदया, मैं पूछता हूं कि ऐसा कौन सा फैसला है जिसे आप प्रशासनिक कार्रवाई से वंचित कर सकें? How can you divorce a decision from its implementation? Therefore, it is very evident that you completely want to emasculate the Government of Delhi; you want to rule through the Lieutenant Governor; and you want to subvert representative democracy in Delhi, whereby you will not even give the Government of Delhi the powers to execute decisions where they have the constitutional right to take those decisions in terms of not only the 69th Constitutional Amendment but also according to a Constitution Bench of the Supreme Court.
In conclusion, Madam Chairperson, since your bell is very insistent, I would just like to say that this law is completely misconceived. Mr. Minister, please go back and read the 102nd Constitutional Amendment, go and read the law which was proposed by the then Home Minister, Shri Lal Krishna Advani, and see the distance that you have travelled from your very worthy predecessors. Thank you very much.
श्रीमती मीनाक्षी लेखी (नई दिल्ली): माननीय सभापति जी,इतने हिस्सों में बंट गई है दिल्ली कि उसके हिस्से में अब कुछ बचा ही नहीं है ।
मैं आपके माध्यम से बताना चाहती हूं, मेरे मित्र भाषण दे रहे थे । मैं इतना जानती हूं कि यह सांसद भले ही पंजाब से हैं लेकिन दिल्ली में रहते हैं । इनके घर के आगे जो नाली बनी है, वह एमसीडी ने बनाई है,लेकिन उसका पानी दिल्ली जल बोर्ड के नाले में जाता है । जब बारिश पड़ती है, उस नाले की सफाई नहीं होने के कारण पानी बैक फ्लो मारकर इनके घर के आगे जमा हो जाता है । यह दिल्ली की वस्तुत: स्थिति है । यह दिल्ली की स्थिति नहीं बताएंगे ।
इसके बारे में बगल में जो साथी बैठे हैं,वह बताएंगे । मुझे याद है अर्बन डेवलपमेंट मिनिस्ट्री की मीटिंग थी,इन्होंने जिक्र किया था कि नई दिल्ली में मिंटो ब्रिज में एक व्यक्ति डूबकर मर रहा है, इसकी जिम्मेदारी किसकी है? पता चला कि जल बोर्ड की जिम्मेदारी सरकार की है,लेकिन वह नाला साफ नहीं करती है, जो नाली उसमें मिलती है,वह एनडीएमसी की है, लेकिन उस पर काम नहीं होता है । एक हाथी के बराबर जानवर उसमें जा सकता है,लेकिन इसके बावजूद नाली चोक्ड रहती है । यह दिल्ली की स्थिति है । इसका बड़ा कारण मिसमैनेजेंट ऑफ दिल्ली है जो एनसीटी ऑफ दिल्ली के नाम पर कांग्रेस ने ही किया था ।
आज, जब उसको ठीक करने की बारी आई है, तो बीजेपी की केंद्र सरकार उसको ठीक कर रही है । इतना ही शौक था, तो उस वक्त दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे देते । क्यों नहीं दिया? इसलिए, नहीं दिया, क्योंकि जितने नियम हैं, जितनी रिपोर्ट्स हैं, वे उसके खिलाफ थीं । केवल एक राजनीतिक जीत के रहते यह काम किया गया, लेकिन उसका जो बुरा असर है, वह आज हम सबके सामने है । यही कारण है कि इस सब गुत्थी को सुलझाना बहुत जरूरी है । मैरे मित्र ने आर्टिकल-239 (एए) तो पढ़ा, लेकिन आर्टिकल-239 (एबी) को नहीं पढ़ा और आर्टिकल-239 (4) को भी नहीं पढ़ा । मैं आपके सामने वह पढ़कर जरूर सुनाना चाहती हूं । आर्टिकल-239 (एए) दिल्ली को एक स्पेशल दर्जा देने के लिए बना था । मुझे आज तक समझ नहीं आया कि दिल्ली में और पुदुचेरी में क्या अंतर है? दिल्ली में और अंडमान निकोबार में क्या अंतर है? दिल्ली में और तमाम यूनियन टेरीटोरीज में क्या अंतर है? वह अंतर यह है कि दिल्ली भारत की राजधानी है और इसी कारण यहां मिस-गवर्नेंस रहनी चाहिए, ऐसा मुझे लगता है, जो दिल्ली की स्थिति है ।
“Article 239AA(4): There shall be a Council of Ministers consisting of not more than ten per cent…” और इससे पहले दिल्ली में यह हरकत हो चुकी है । दस परसेंट से अधिक मंत्री बनाए जा चुके हैं ।
“…of the total number of members in the Legislative Assembly, with the Chief Minister at the head to aid and advise the Lieutenant Governor in the exercise of his functions...” लेफ्टिनेंट गर्वनर के जो काम हैं, उसकी असिस्टेंट इनको करनी है । ये अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते हैं ।
“… in relation to matters with respect to which the Legislative Assembly has power to make laws, except in so far as he is, by or under any law, required to act in his discretion.” लेफ्टिनेंट गर्वनर की डिस्क्रिशन है ।
“Provided that in the case of difference of opinion between the Lieutenant Governor and his Ministers on any matter, the Lieutenant Governor shall refer it to the President for decision.” यानी, जो रेफरेंस का अधिकार, लेफ्टिनेंट गवर्नर की मर्जी का अधिकार और लेफ्टिनेंट गवर्नर के काम करने का अधिकार है, वह काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के ऊपर है । सिर्फ यही नहीं मेरे मित्र ने खुद अपनी भाषा में बताया कि लेफ्टिनेंट गवर्नर केवल एग्जीक्यूटिव हेड नहीं हैं, लेफ्टिनेंट गवर्नर दिल्ली का एडमिनिस्ट्रेटर है, यानी यूनियन टेरेटरी का एडमिमिस्ट्रेटर वाला जो कैरेक्टर है, वह आज भी दिल्ली रिटेन करती है । बावजूद उसके, दिल्ली की ये सब समस्याएं हैं कि आदमी डूबकर नई दिल्ली की सड़क पर मर जाता है और जवाबदेही किसी की नहीं है । नाली का पानी सीवेज में जाता है, लेकिन, सीवेज कोई साफ नहीं करता है, तो आप एम.सी.डी. को कहते हैं । बिजली का खंभा किसी का है, तो बिजली किसी और को देनी है । सबसे बड़ी बात यह है कि बिजली का खंभा म्युनिसिपल कार्पोरेशन लगाती है, लेकिन दिल्ली असेम्बली कहती है कि हम इसको बिजली देंगे और उस खंभे के ऊपर, जहां ऑलरेडी लाइट लगी हुई है, नीचे एक और ब्रैकेट लगाकर दिल्ली की जनता का पैसा खराब कर देती है । मुझे मालूम है कि इसी सदन के अंदर कई बार यह बात हो चुकी है । महाराष्ट्र के मेरे मित्र से मेरी एडवर्टाइजिंग को लेकर बात हुई थी । मैं आपके माध्यम से आज दिल्ली की जनता को चेताना चाहती हूं कि 524 करोड़ एक शहर में एक सरकार का एडवर्टाइजिंग बजट है । शीला जी के समय में 32 करोड़ था । उससे पहले 11 करोड़ था । मैं कहती हूं कि चलो भाई, नई सरकार आई है, तो 32 का 50 कर सकती है, 524 करोड़ है । 524 करोड़ ही नहीं, 524 करोड़ के इश्तेहार बेंगलुरु में, गुजरात में, उत्तर प्रदेश में, सभी जगह छपते हैं । यह दिल्ली की स्थिति है । यह दिल्ली की असलियत है कि कोरोना के समय में दिल्ली के अंदर लाशों के ढेर लग जाते हैं । यहां के मुख्य मंत्री अपने घर से बाहर नहीं निकलते हैं । मजबूरी में, चूंकि यह केंद्र है, भारत की राजधानी है, गृह मंत्री जी को हस्तक्षेप करके यहां पर नेताजी के नाम पर, सरदार पटेल के नाम पर इंस्टिट्यूट खड़े करने पड़ते हैं और वे सब काम करवाने पड़ते हैं, जो कायदे से दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को करने चाहिए । …(व्यवधान) आपको यह समझना होगा कि दिल्ली पर सिर्फ देश की नहीं, बल्कि पूरी अंतर्राष्ट्रीय निगाह लगी रहती है । दिल्ली के बॉर्डर पर जब किसानों के नाम पर आंदोलन किया गया, मैं जान-बूझकर कह रही हूं ‘किसानों के नाम पर’, किसानों का नहीं, बल्कि किसानों के नाम पर और दिल्ली में कूच जैसी स्थिति पैदा की गई । आपको लगता है कि दिल्ली का जो रहने वाला व्यक्ति है, वह उसका स्वागत करता है? क्या दिल्ली में रहने वाला यह चाहेगा कि उसके यहां लॉ एंड आर्डर सिचुएशन खराब करने के लिए बाहर से लोग आ जाएं, ट्रैक्टर चढ़ा दें, पुलिस वालों को मार दें? क्या दिल्ली में रहने वाला कोई भी नागरिक इन बातों को पसंद करेगा?
लेकिन जब ऐसी स्थिति पैदा की गई, उसमें कोई और नहीं, बल्कि सीधे तौर पर दिल्ली की सरकार कहीं न कहीं राजनैतिक कारणों से मिली हुई थी । उन्होंने दिल्ली पुलिस को बसें देने से इंकार कर दिया था, जबकि उनका एक लॉन्ग स्टैंडिंग डीटीसी के साथ कॉन्ट्रैक्ट है कि जब भी दिल्ली पुलिस को ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ेगी, उसको ट्रांसपोर्ट मुहैया कराया जाएगा । चाहे वह डीटीसा का घोटाला हो, वायदा किया जाता है कि हम दिल्ली में नई बसें चलाएंगे, लेकिन दिल्ली में कोई नई बस नहीं चली है । जब ये लोग सरकार में आए थे, तब तकरीबन दिल्ली में 6,000 बसें थीं, लेकिन आज वे कम होकर 3,000 या 3,500 बसें रह गई हैं । जो पैसा बसों पर खर्च होना चाहिए था, वह कहीं और खर्च हो रहा है ।
दिल्ली वालों के हिस्से में लगातार इस तरह की बदनसीबी आई है । अब उस बदनसीबी को ठीक करने के लिए अगर संविधान के द्वारा जो स्कीम ऑफ थिंग्स है, सरकार उसको इम्प्लीमेंट करने का प्रयास कर रही है, तो इन लोगों को क्यों तकलीफ हो रही है?क्योंकि बवाल क्रिएट करने वाले कोई और नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस की ही सरकार थी, जिसने इस तरीके का विभाजन खड़ा किया है । अगर देखा जाए तो अन्य राज्यों से आने वाले जो मेरे मित्र हैं, उनको यह बात समझ नहीं आएगी कि पानी राज्य सरकार का काम होता है या म्युनिसिपैलिटी का काम होता है । मैं अधिकतर राज्यों के बारे में जानती हूं कि वहां पर पानी म्युनिसिपैलिटी के हिस्से आता है । अभी कुछ दिन पहले मेरे साथ कॉलेज़ में पढ़ने वाली मेरी एक सीनियर का फोन आया कि चित्रा विहार के अंदर बहुत दिनों से पानी आ रहा है और सीवेज का पानी मिक्स होकर रहा है, आप क्यों नहीं कुछ करती हैं? आप बताइए कि क्या मैं उनके आगे हाथ खड़े कर दूं कि मैं तो कुछ कर ही नहीं सकती हूं, क्योंकि यह दिल्ली जल बोर्ड का काम है और दिल्ली जल बोर्ड वाले मेरी बात नहीं सुनते हैं ।
मेरे पास राज्य सभा में काम करने वाले अनगिनत लोग आए और उन्होंने बताया कि हमारे लिए एक नई स्कीम आई थी और हम लोगों ने उसके तहत उन क्वॉर्टर्स में घर बनाए हैं, लेकिन वह सब कुछ करने के बावजूद भी हम लोगों को पानी ही नहीं मिला है । अब पार्टी का नाम तो आम आदमी पार्टी है, लेकिन जो आम आदमी रहता है, उसको कैसे पानी नहीं दिया जाए, यह आम आदमी पार्टी की सरकार बहुत अच्छे से जानती है । यही कारण है कि राज्य सभा में काम करने वाले जो लोग हैं, उनके यहां पर एक टैंकर माफिया चलता है । उसमें आपको एक महीने में 10,000 रुपये देने हैं, तभी आपके यहां पर टैंकर आएगा,नहीं तो आपके यहां पर टैंकर नहीं आएगा । यह दिल्ली की स्थिति है । अमृत योजना और स्मार्ट सिटी के तहत दिल्ली को कई-कई सौ करोड़ रुपये मिल चुके हैं, लेकिन अगर आप दिल्ली सरकार से उसका हिसाब मांगेंगे,तो उस हिसाब के नाम पर आपको कुछ नहीं मिलेगा ।
मैं नई दिल्ली की सांसद हूं और मुझे इस बात का बेइंतहा दुख है । नई दिल्ली जो कि भारत की राजधानी है, मेरे कई मित्र जो कि दक्षिण भारत,उत्तर प्रदेश या अन्य जगहों से आते होंगे,वे यह जानकर हैरान होंगे कि नई दिल्ली के अंदर,कुछ नहीं यहां से 5 किलोमीटर की दूरी पर पटेल नगर जैसी एक रिहायशी बस्ती है, जिसमें आज तक पीने के पानी की पाइपलाइन ही नहीं है । आप सोच सकते हैं, यह दिल्ली है । आंध्र वाले मित्र मेरी तरफ देखकर इशारा कर रहे हैं, क्योंकि आंध्र प्रदेश में उनके संसदीय क्षेत्रों में पानी पहुंच चुका है, लेकिन नई दिल्ली के अंदर गोल मार्केट में मेरे आने से पहले तक पानी नहीं आया था । आपको यह जानकर हैरानी होगी । वहां पर ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ के स्टॉफ क्वॉर्टर्स हैं, हमने एनडीएमसी से लड़-झगड़कर,क्योंकि वह गृह मंत्रालय के तहत काम करती है, हमने मेहनत करके वहां पर पहली बार पानी पहुंचाया है, नहीं तो वहां पर पीने के पानी के लिए वॉटर सप्लाई नहीं थी । यह नई दिल्ली की स्थिति है । यही कारण है कि सिर्फ यह नई दिल्ली की ही नहीं,बल्कि यह पूरी दिल्ली की स्थिति है । इस बदहाली के लिए कोई और नहीं,बल्कि आम आदमी पार्टी के नाम पर और कांग्रेस की जो मिली-जुली सरकारें हैं, इन लोगों के कारनामे रहे हैं ।
जब दिल्ली पर कूच जैसी स्थिति बनी, तब आंखें खुलने का समय था कि आप पुलिस को अपना काम नहीं करने देंगे । जब एंटी सीएए राइट्स हुए थे, तो मैं आप सभी के माध्यम से और सभापति महोदया खासतौर से आपके माध्यम से देश को यह बताना चाहती हूं कि इसमें आम आदमी पार्टी के काउंसलर और एमएलए इन्वॉल्वड थे । उन लोगों के रहते यहां पर इस तरीके का दंगा-फसाद हुआ । दिल्ली का नुकसान हुआ और सड़क घेरने का काम हुआ था । रायटिंग हुई और जब उसके ऊपर केस बन गए,तब केस बनने के बाद उसमें हाई कोर्ट के अंदर कौन वकील खड़ा होगा?जाहिर तौर पर अगर पुलिस का केस है और आपका कहना है कि पुलिस को केन्द्र सरकार चलाती है, तब वहां पर कौन-सा वकील खड़ा होगा,तो यह केन्द्र सरकार का अधिकार क्षेत्र है या नहीं है?
इन्होंने वहां पर झगड़ा मचा दिया कि दिल्ली सरकार की स्टैंडिंग काउंसिल जिसको अपॉइंट करेगी, वह खड़ा होगा ताकि कन्हैया कुमार जैसे लोगों के खिलाफ जब कार्रवाई हो तो उनको सिटीजन के ऊपर कभी मंजूरी न मिले । ऐसे में जब एमसीडी के केस होते हैं, जब वे डीसीलिंग का केस करना चाहते हैं तो नीचे से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसका वकील खड़ा होगा? एमसीडी को बीजेपी कंट्रोल करती है, लेकिन एमसीडी को अपना वकील खड़ा करने का अधिकार नहीं है । दिल्ली सरकार अपना वकील खड़ा करती है । दिल्ली की ऐसी स्थिति बना रखी है, जिससे हर चीज को फेल करने का काम किया जा सके । उसको सुधारने का काम कॉन्स्टिट्यूशन स्कीम के अंदर, कॉन्स्टिट्यूशन मैकेनिज्म के अंदर दिया गया है । बहुत चालाकी से 239(एए) तो पढ़ा गया, लेकिन 239(एए)(4) नहीं पढ़ा गया । इसके तहत लेफ्टिनेंट गवर्नर को ऑलरेडी अधिकार है कि किसी भी विषय के ऊपर वह अपनी बात प्रेसिडेंट के पास भेज सकता है, बिल्स को भेज सकता है और यही नहीं, उसको हर मामले के अंदर रेफरेंस का भी अधिकार है । जब लोग फेडरल स्ट्रक्चर के बारे में कहते हैं तो मुझे लगता है कि ये अमेरिका से कुछ ज्यादा पढ़कर आ जाते हैं और वहां से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि भारत का ही संविधान भूल जाते हैं । भारत का संविधान फेडरल स्ट्रक्चर नहीं है । हमारा क्वॉजी फेडरल स्ट्रक्चर है, जहां केन्द्र की महत्ता राज्य की महत्ता से कहीं अधिक होती है । यही कारण है कि भारत इकट्ठा है ।
अगर राज्यों को यह अधिकार दे दिया जाए कि भिन्न-भिन्न पार्टी के लोग भिन्न-भिन्न शासन करें तो आपने केरल का उदाहरण देखा होगा कि एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट केस फाइल करता है, क्योंकि वहां पर गोल्ड स्मगलिंग चल रही है और तमाम तरह की रैकेटिंग चल रही है, तब भी वहां पर ईडी के खिलाफ केस कर देते हैं । आप सोचिए, यह फेडरल स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं है । यह क्वॉजी फेडरल स्ट्रक्चर है, जिसके अन्दर कुछ विषयों के ऊपर केन्द्र की महत्ता हमेशा रहेगी और रहनी भी चाहिए । यह मैं नहीं कह रही हूँ । दिल्ली को लेकर ‘बालाकृष्ण रिपोर्ट’ है । सन् 1991 की यह बालाकृष्ण रिपोर्ट है । मैं आपके सामने इसकी कुछ लाइन्स पढ़ना जरूर चाहूंगी ।
बालाकृष्ण रिपोर्ट ने कहा कि “Full Statehood cannot be extended to NCT of Delhi considering its importance as the seat of Union Government.” भारत की राजधानी होने के कारण दिल्ली को कभी भी पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता । यह बात मेरी कही हुई नहीं है, बल्कि यह बात ‘बालाकृष्ण रिपोर्ट’ में कहीं गई है । इसीलिए कुछ यूनिक फीचर्स हैं, जिसमें एलजी का रोल बहुत महत्वपूर्ण है । मनीष जी के शब्दों के अनुसार वह एडमिनिस्ट्रेटर है । The model of Government of Union Territory Act, 1963 को फॉलो किया जाना चाहिए । Creation of local Legislative Assembly, Council of Ministers with restricted powers, उसमें रेस्ट्रिक्शन है । जहां पर संसद के अधिकारों की बात आती है तो हम कौन से एडमिनिस्ट्रेटिव हैं?
हम संसद में बैठे हैं, केन्द्र सरकार को रिप्रेजेंट कर रहे हैं, लेकिन क्या हमारा डे टू डे किसी भी सरकार के फंक्शनिंग पर अधिकार है? इसका जवाब ‘नहीं’ है । डे टू डे फंक्शनिंग पर किसी भी चुनी हुई सरकार का अधिकार नहीं है, लेकिन यहां पर दिल्ली की राज्य सरकार यह क्लेम करती है कि कुछ भी इंवेस्टिगेट करने का, कुछ भी इंक्वायर करने का और किसी भी हद तक जाने का मेरा अधिकार है, जो उनके पास नहीं है । खासतौर से जब रेस्ट्रिक्टेड पावर्स की बात बालाकृष्ण कमेटी रिपोर्ट में, सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट्स में और हाईकोर्ट के जजमेंट्स में कही गई है तो ये अपने आप उस अधिकार को एज्यूम नहीं कर सकते हैं । यहां पर आपकी मर्जी नहीं, बल्कि दिल्ली के लोगों की मर्जी चलेगी ।
जब आप कहते हैं कि ‘आप’ चुनी हुई सरकार हैं तो मान लीजिए कि हम सब भी चुने हुए लोग हैं । यहां पर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन भी चुने हुए लोगों की है । यह बैलेंस ऑफ पावर है और इस बैलेंस ऑफ पावर के अन्दर किसी भी राज्य सरकार को अधिकार नहीं है, आम आदमी पार्टी को अधिकार नहीं है कि भाजपा के कार्यों में हस्तक्षेप करे और कामों को रोके ।
Executive power to be retained in Union of India. यह रिपोर्ट में कहा गया है । इसमें कहा गया है कि एग्जीक्यूटिव पावर्स रिटेन की जाएंगी और केन्द्र के इंट्रेस्ट्स को प्रोटेक्ट किया जाएगा । अभी दिल्ली में केन्द्र का इंट्रेस्ट क्या है? एक तो यहां पर राजधानी है । प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का पैसा पूरे देश के किसानों को मिल गया, लेकिन दिल्ली के किसान को नहीं मिलेगा, क्योंकि आम आदमी पार्टी ने उसको इम्प्लीमेंट करने से मना कर दिया । आपको सब तरफ, सड़कों के ऊपर झुग्गी-झोपड़ी लगाए हुए लोग मिलेंगे, जिनको जबर्दस्ती वहां बैठाया जाएगा और राज्य सरकार उनको नहीं हटाएगी, क्योंकि वह एक वोट बैंक है । उनको प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जो घर मिलने वाले थे, वे घर उनको नहीं दिए जाएंगे, क्योंकि यहां पर राज्य सरकार केन्द्र सरकार के कामों में हस्तक्षेप करेगी । यहां पर ‘अमृत’ का पैसा लिया जाएगा, लेकिन पटेल नगर में पानी नहीं पहुंचाया जाएगा । चित्रा विहार के अंदर सीवेज आएगा और हौज़खास के अंदर लोग मुझे कहेंगे कि बहन जी, यहां पर आप फेंसिंग करवा दो, हमारे घरों में बहुत शोर आता है, तब मैं कहूंगी कि पी.ड्ब्ल्यू.डी. के पास यह सड़क है और इस पीडब्ल्यूडी की सड़क के लिए जो इनका 19 हजार करोड़ रुपये का बजट है, उसमें वे कुछ करवा सकते हैं । एम.एल.ए. के पास पैसा है, मेरे पास पैसा नहीं है । सबसे बड़ी बात आप यह समझिए कि सांसद की सांसद निधि एक साल के लिए पांच करोड़ रुपये है और वह भी दो साल के लिए नहीं मिल रही है, लेकिन एक संसदीय क्षेत्र के अंदर दस लेजिस्लेटिव असेम्बली कांस्टीट्वेंसीज हैं । उन दस असेम्बली कांस्टीट्वेंसीज के अंदर एक एम.एल.ए. के पास एक साल में दस करोड़ रुपये होते हैं, जिनका वे इस्तेमाल नहीं करते हैं । इसका मतलब यह है कि एक साल के अंदर मेरे क्षेत्र में दस एम.एल.ए. के पास दस-दस करोड़ रुपये के हिसाब से 100 करोड़ रुपये होते हैं । अगर आप मेरे लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान कर दें तो मैं आपकी बताती हूं कि नई दिल्ली के अंदर पानी-बिजली कैसे पहुंचाई जाती है । उसमें भी, जब वर्ष 2015 में बिजली के ट्रांसफार्मर्स फटे जा रहे थे, उसके लिए पैसा केन्द्र सरकार से मैं मांग कर लेकर गई थी । मैंने रिक्वेस्ट की थी कि हमें पानी-बिजली की बहुत असुविधा है, आप कुछ पैसा दे दीजिए । वह काम स्पेशल प्रावधान कराकर किया गया, लेकिन उस पर लेबल अरविंद केजरीवाल जी ने अपना लगा दिया । पैसा हमने मांगा, स्पेशल प्रावधान मांगा । यह दिल्ली की स्थिति है । Executive power to be retained in Union of India and additional safeguards to be provided for protecting the Centre’s interest in relation to every subject. यह स्कीम है । केन्द्र के जो भी इंट्रेस्ट हैं, उनको यूनियन टेरिटरी के माध्यम से प्रोटेक्ट किया जाएगा । Council of Ministers may aid and advise the administrator. Lieutenant Governor is the administrator. He is not a Governor. He exercises more powers than a Governor. A Governor has to act on the aid and advice. In this case, aid and advice is to the Lieutenant Governor, the exercise of such functions which are delegated to him. However, this aid and advice would not be binding and the LG could form a different opinion. लेफ्टिनेंट गवर्नर को अधिकार है अपना अलग मत रखने का । फाइनल डिसीजन के पहले वह उसको प्रेजिडेंट को भेज सकता है और जब कोई इम्पोर्टेंट परिस्थिति है तो उसमें वह डिसीजन भी ले सकता है । For stability alone, the provision for Delhi may be inserted. कांस्टीट्यूशन के अंदर, कांस्टीट्यूशनल अमेंडमेंट के द्वारा जो अभी किया जा रहा है, उसमें यह जो परमानेंट सवाल है कि दिल्ली राज्य है, यूनियन टेरिटरी है, उसे राज्य का पूर्ण दर्जा मिलना चाहिए या नहीं मिलना चाहिए, क्या होना चाहिए, उसके ऊपर क्वाइटस लग जाता है, उस पर एक सील लग जाती है कि भाई, अब ऐसे ही काम होगा । लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधिकार हैं, उनके तहत ही असेम्बली को उसे सपोर्ट करना होगा और आप इन मान्यताओं से बाहर आइए । आपके पास कोई अधिकार नहीं हैं । आपके पास अधिकार है दिल्ली की जनता का सेवा करने का, आप दिल्ली के मालिक नहीं हैं, जो कि दिल्ली के मुख्यमंत्री लगातार कहते हैं कि मैं दिल्ली का मालिक हूं । दिल्ली का मालिक कोई और नहीं, दिल्ली की जनता है, जिसकी सेवा में हम सब खड़े हैं, एमसीडी भी खड़ी है और सांसद भी खड़े हैं । दिल्ली ने हमें भी चुनकर भेजा है । हम भी चुनी हुई सरकार का हिस्सा हैं । हमारे अधिकारों का भी हनन नहीं होना चाहिए । …(व्यवधान)
सभापति महोदया, मेरा दर्द दिल्ली की जनता का दर्द है और मुझे दर्द है । मुझे बहुत दर्द है । मुझे दर्द है कि ऐसे … * लोग चुनकर दिल्ली में बैठ गए हैं, जिन्होंने दिल्ली को तबाह कर दिया है । जहां पर राशन की दुकानों के अंदर लगातार मिलावट की जाती है, फेयर प्राइस के नाम पर लोगों को राशन नहीं दिया जाता है । इसके बारे में दिल्ली हाई कोर्ट के अंदर एफिडेविट फाइल्ड है । यह बात अच्छा किया आपने कि मुझे याद दिलाई ।
दिल्ली में कोरोना फैला, किसने फैलाया, आपने । जब पूरा देश एक है और दिल्ली भारत की राजधानी है, यहां आए हुए माइग्रेंट लेबरर्स को भगाने का काम किसने किया, हमने नहीं किया और उनके लिए डीटीसी की बसें लगाई जाती हैं, लेकिन पुलिस को पहुंचाने के लिए डीटीसी की बसें अवेलेबल नहीं है । आपको समझना होगा कि दिल्ली सरकार ने हाई कोर्ट के अंदर एफिडेविट फाइल किया और कहा कि जहां 39 हजार टन अनाज केन्द्र सरकार ने दिल्ली को दिया है, वहां पर दिल्ली ने सिर्फ 63 टन अनाज बांटा था । मैं एक सांसद होकर यह बात इस सदन के अंदर कह सकती हूं कि एक दिन के अंदर, मेरे जैसे अन्य सांसदों का भी रिकॉर्ड रहा होगा कि 70-70 टन तो हमने एज एमपीज़ बांट दिया । हमारे पास कोई सरकारी सुविधा नहीं थी । हमने अपने लोगों की मदद से ये सब काम करवाया । दिल्ली की यह हालत है । दिल्ली की हालत है कि केंद्र सरकार से प्याज उठाया जाता है, लेकिन दिल्ली में प्याज ब्लैक किया जाता है । यह दिल्ली की हालत है । ‘प्रधान मंत्री आवास योजना’ लागू नहीं की जाती है, ‘आयुष्मान भारत योजना’ लागू नहीं की जाती है ।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से स्कीम बताना चाहती हूं कि 239 एए है, उसको आपको 239 एए (4) के साथ पढ़ना पड़ेगा, जहां पर लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधिकारों को मुकर्रर किया गया है । उसी के आधार पर सेक्शन 44(2) का अमेंडमेंट लाया गया है, जिसमें बताया गया है कि एक्सप्रेशन है - इन द नेम ऑफ लेफ्टिनेंट गवर्नर, यानी सरकार के मायने तो एनसीटी ऑफ दिल्ली होगा । आप जो सरकारी काम करेंगे, वह लेफ्टिनेंट गवर्नर के नाम पर होगा, वही एनसीटी ऑफ दिल्ली है और यही दिल्ली की स्कीम है । जो फार्मूला है और जो डेफिनेशन है, उसके अंदर जो ऑल्टरिंग द डेफिनेशन, यानी सरकार की डेफिनेशन, सरकार की कोई डेफिनेशन बदली नहीं गई है, क्योंकि सरकार की डेफिनेशन ही नहीं है । चूंकि सरकार की डेफिनेशन नहीं है, इसलिए जो पावर्स प्रेजीडेंट के लिए रिजर्व्ड हैं, जो पावर लेफ्टिनेंट गवर्नर की हैं और लेफ्टिनेंट गवर्नर की पावर हर मामले पर अपना ओपिनियन देने की है । यह स्कीम तो ऑलरेडी एग्जिस्ट करती है और उसी स्कीम को स्पष्टता से लागू किए जाने के लिए यह अमेंडमेंट लाया गया है और गवर्नमेंट क्या होगी, उसको डिफाइन किया गया है । मैं आपको एक उदाहरण देना चाहती हूं कि वर्ष 2017 में प्रेजीडेंट के माध्यम से, इसमें पहले वर्ष 2015 में बिल लाया गया - 'The Delhi (Right of Citizen to Time Bound Delivery of Services) Amendment Bill, 2015'. इन्होंने उसमें गवर्नमेंट की जो डेफिनेशन है, टर्म गवर्नमेंट को बदलने का प्रयास किया गया । जब वह प्रेजीडेंट के पास भेजा गया तो प्रेजीडेंट ने उस गवर्नमेंट को ओमिट किया, उसको हटाया और उसके बाद यह असेंबली से पास हो सका । उसी प्रकार से नेताजी सुभाष यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (NSUT), दिल्ली है, यह वर्ष 2017 की एमएचए की चिट्ठी है, वर्ष 2015 में बिल आया और उसमें भी यही स्थिति खड़ी की गई । उसमें इन्होंने गवर्नमेंट को डिफाइन करने का प्रयास किया और उसको भी हटा कर जब राष्ट्रपति जी द्वारा भेजा गया, तब वह पारित हुआ, यानी इतना टाइम वेस्ट करना । जो काम अमूमन जल्दी से हो सकता है, इसमें गवर्नमेंट मतलब एनसीटी ऑफ दिल्ली करके आप बिल पास कीजिए । इसलिए आज तक क्योंकि कोई डेफिनेशन नहीं थी, उसमें कन्फ्यूजन पैदा किया गया था और जानबूझकर कन्फ्यूजन पैदा किया गया था, मैं ऐसा मानती हूं । इसको स्पष्टता से अब अमेंड करके यह बताया गया है कि जो एनसीटी ऑफ दिल्ली एक्ट का सेक्शन 21 है, उसको बदलकर अब सरकार का मतलब ही इन द नेम ऑफ लेफ्टिनेंट गवर्नर आपको करना होगा और वही प्रावधान परमानेंटली रहेगा । इसलिए आए दिन की प्रॉब्लम का यही स्टेच्युटरी सॉल्यूशन है । अब जो बोलते हैं कि मर्डर ऑफ डेमोक्रेसी, अब डेमोक्रेसी का मतलब मर्डर ऑफ सिटीजन तो नहीं हो सकता है । आप लाल किले के ऊपर चढ़कर झंडे को खराब करने का काम तो नहीं कर सकते हैं या जो खराब कर रहे हैं, उनकी मदद करने का काम तो आप नहीं कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज को लगातार डेसिक्रेट करने का काम जिन लोगों ने किया और पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई न कर पाए तो आप पुलिस को डीटीसी बसें ही नहीं देंगे ।
आप ये काम करेंगे! क्या इसके लिए आपने दिल्ली की जनता की परमिशन ली थी? Murder of democracy का मतलब murder of its honest citizens नहीं होता है । सुचारू रूप से दिल्ली में कार्रवाई चले, सभी काम आराम से हो सकें, इसी के लिए दिल्ली की जनता ने सभी को वोट्स दिए हैं । जब लोग कोऑपरेटिव फेड्रलिज्म की बात करते हैं, तो कोऑपरेटिव तरीके से काम किया जाना चाहिए । जहां पर कोऑपरेटिव तरीके से काम नहीं किया जाएगा, वहां पर जवाबदेही आपकी है, हमारी भी जवाबदेही है । हमारी जवाबदेही ज्यादा है, क्योंकि हम सेंटर में बैठे हैं, इसलिए उसको सुधारने का काम भी हमारा ही है । ऐसा हमें संविधान ने अधिकार दिया है, आपने यह अधिकार नहीं दिया है । आपके अधिकार लेने-देने से कुछ नहीं होता है । “This will impede development and progress of NCT of Delhi by enhancing the powers of LG.”एलजी को पावर हम नहीं दे सकते हैं । एलजी की पावर क्या है, वह संविधान ने मुकर्रर किया है । लेंफ्टिनेंट गवर्नर की पावर, हमारे मित्र शायद गलती से बोल गए कि वह एडमिनिस्ट्रेटर हैं, गवर्नर नहीं हैं । गवर्नर को काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स की एडवाइज पर काम करना है, लेकिन लेफ्टिनेंट गवर्नर को असिस्ट मिनिस्टर ऑफ काउंसिल ने करना है, अगर यह अंतर समझ आ जाता तो यह द्वंद ही नहीं होता । बात यह है कि लेफ्टिनेंट गवर्नर का अधिकार क्षेत्र एडमिनिस्ट्रेटर वाला है और उसके पास एग्जीक्यूटिव पावर्स और एडमिनिस्ट्रेटर पावर्स दोनों वेस्ट करती हैं । इसलिए वह सुपरविजन ऑन एग्जीक्यूटिव पावर भी होगा ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति : हम यह जानना चाहते हैं कि लोग बोलने के बाद क्यों चले जाते हैं?कम से कम एक दूसरे की बात को सुनें ।
श्री मनीष तिवारी: सभापति महोदया । …(व्यवधान)
माननीय सभापति : अच्छा!आप वहां जाकर बैठ गए हैं । जितनी बातें हो रही हैं,उसमें आपको सुधार समझ में आ रहा है कि कितनी गलतियां आप लोगों के द्वारा हुईं ।
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : सभापति महोदया जी,मेरी बात उन तक पहुंच रही है । वे सिर्फ चेहरा नहीं दिखा रहे हैं ।…(व्यवधान)
संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा भारी उद्योग और लोक उद्यम मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अर्जुन राम मेघवाल): सभापति महोदया को मनीष तिवारी जी नहीं दिख रहे हैं,उन्हें सभापति महोदया को दिखना भी चाहिए ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति : वह खंभे के पीछे जा कर बैठ गए हैं ।
…( व्यवधान)
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : सभापति महोदया, वे खंभे के पीछे जा कर बैठे हैं ।…(व्यवधान) वे खंभे के पीछे जा कर अपना चेहरा छुपा रहे हैं ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति : हमें ध्यान रहता है कि आप सही बोले या मीनाक्षी जी सही बोल रही हैं । हमें कम्पेयर करना होगा ।
…( व्यवधान)
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : सभापति महोदया, न राज्य सरकार के अधिकारों को बदला गया है और न ही लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधिकारों को बदला गया है, दोनों के अधिकार बराबर हैं, मतलब डिफाइन्ड हैं । केवल और केवल उसका स्पष्टीकरण दिया गया है कि अगर यह संविधानिक स्कीम है, तो आज से आप कैसे काम करेंगे । उस काम के अंदर यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जहां पर भी कांफ्लिक्ट होगा तो कैसे रिजॉल्व होगा,कांफ्लिक्ट नहीं है, तो क्या होगा,राष्ट्रपति जी के पास कौन-सी चीजें जाएंगी और क्या?
मैं एक और बात अपने सभी मित्रों को बताना चाहती हूं कि क्या आप सोच सकते हैं कि किसी भी लेजिस्लेटिव असेम्बली के अंदर ऐसा नियम बनाया जाए, जहां पर संसद के नियमों का उल्लंघन हो?आप सोचिए । वर्ष 2017 में दिल्ली की लेजिस्लेटिव असेम्बली में जो एलोकेशन ऑफ बिजनेस रूल्स हैं और डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ वर्क रूल्स हैं, उनको अमेंड कर दिया गया । आप ऐसा सोच सकते हैं,कोई राज्य सरकार ऐसा करती है!ये अनार्किस्ट हैं । आप किस किस्म के लोगों से डील कर रहे हैं, आपको समझना होगा । कौन-सी लेजिस्लेटिव असेम्बली पार्लियामेंट ऑफ इंडिया के रूल्स बदल सकती है?इसको क्लैरिफाई किया गया है कि पार्लियामेंट ऑफ इंडिया के नियमों को असेम्बली नहीं बदल सकती है और दिल्ली की असेम्बली तो बिल्कुल ही नहीं बदल सकती है ।…(व्यवधान)
श्री भगवंत मान (संगरूर): हम चुन कर यहां आए हैं ।…( व्यवधान)
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : आप बैठ जाइए । हम भी यहां चुन कर आए हैं ।…( व्यवधान) हमें आपसे ज्यादा वोट्स मिले हैं ।…(व्यवधान)
आपको चुने जाने से पहले यह पता कर लेना चाहिए था कि लेफ्टिनेंट गवर्नर वाला राज्य है या गवर्नर वाला राज्य है, तो शायद यह कंफ्यूजन खत्म हो जाता ।…(व्यवधान)
हम नहीं हारते हैं, लेकिन आपको हारने का बहुत अनुभव है ।…(व्यवधान) इन्होंने हारने की बात कही है तो मुझे लगता है कि एक चुटकुला सुना दिया जाए ।
एक बार हमारी इंडिया की क्रिकेट टीम अपना क्रिकेट मैच हार गई,तो कोहली ने … * को फोन किया और कहा कि आपको तो हारने का बहुत अनुभव है,तो जरा मुझे बताइए कि लोगों को कैसे फेस करूं । उन्होंने कहा कि कुछ नहीं, आप बोलिए कि हम लोगों को डिजिटल बोर्ड नहीं चाहिए, हमें पुराने वाले बोर्ड्स चाहिए, ताकि हम उसे मैनुअली बदल सकें । ये बोर्ड की गलती है ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति : माननीय सांसद नाम मत लीजिए । ये रिकॉर्ड में नहीं जाएगा ।
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : माननीय सभापति,इस काम्प्लेक्सिटी के लिए अगर मैं दिल्ली की डिटेल्स में जाऊं,तो शायद यहां बैठे हुए लोगों को यह समझ नहीं आएगा कि कैसी जगह है । ड्यूसिव डीडीए बनाता है और डीडीए किसके अंदर काम करता है, तो यह केन्द्र सरकार की मिनिस्ट्री अर्बन डेवलेपमेंट के तहत काम करता है । वह दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड मतलब झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर को देखने के लिए उसकी मियाद 10 साल की थी, वह बढ़ती चली जाती है । वह दिल्ली सरकार के तहत काम करते हैं और कोई काम नहीं करता है, यह आप सबके सामने है ।
माननीय सभापति: आप पांच मिनट में अपनी बात समाप्त कीजिए ।
…( व्यवधान)
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : सभापति महोदया,मैंने पहले ही फूड डिस्ट्रिब्यूशन के बारे में बताया है कि राशन की दुकानों पर क्या-क्या चीजें हुई । सरकार कोई भी हो चाहे वह राज्य सरकार हो या कोई और हो, वह दूसरी सरकार के कामों को हाईजैक नहीं कर सकती है । दिल्ली में रहने वाले रेजिडेंट्स और भारत के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हमें चुना गया है । हम सेवक हैं, हम मालिक नहीं हैं, यह बात सबको क्लीयर होनी चाहिए,लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अपने आप को दिल्ली का मालिक बोलते हैं, ऐसा उन्होंने पब्लिकली स्टैंड लिया हुआ है ।
सेवक होने के नाते जो कॉपरेटिव फेडरलिज्म के सिद्धांत का अनुपालन करते हुए, लेफ्टिनेंट गवर्नमेंट के साथ मिलकर आप सरकार चलाइए । आपको किसने मना किया है । आप असेंबली में वह नियम पारित करें,जो दिल्ली की जनता के महत्व के हैं । आप लोगों को पानी,बिजली,ट्रांसफॉर्मर्स,अच्छे से पढ़ाई आदि की सुविधाएं दें । यह झूठमूठ के मोहल्ला क्लिनिक में पैसे खराब करने के बजाय ‘आयुष्मान भारत योजना’लागू कर दें । आप वह लागू नहीं कर रहे हैं । इसलिए कॉपरेटिव फेडरलिज्म दिया गया है और जो सीएए,एंटी सीएए और फार्मर्स के नाम पर जो प्रोटेस्ट हुए हैं, उन्होंने दिल्ली सरकार का आम आदमी पार्टी सरकार का असली चेहरा दिखा दिया है । उस चेहरे को बेनकाब करने का काम लेजिस्लेटिव असेंबली के माध्यम से जिस तरीके की चीजें इन्होंने की है, उसके लिए यह अमेंडमेंट लाना बहुत जरूरी था, ताकि यह स्पष्टीकरण हो जाए कि दिल्ली के लिए जिम्मेवार कौन है और काम किस तरीके से किया जाएगा ।
अनकॉन्सटीट्यूशनल की बात करने वाले और कॉवर्ड तथा साइकोपैथ जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, मैं उन्हें यह बताना चाहती हूं कि अनकॉन्सटीट्यूशनल कानून नहीं है, क्योंकि कानून भी पढ़ा है और सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट्स भी अच्छी तरह से रिसर्च किए हैं । अनकॉन्सटीट्यूशनल भाषा है, जिसमें भारत के चुने हुए प्रधान मंत्री जी के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री इन शब्दावली का प्रयोग करते हैं । अमेंडमेंट टू द बिल चाहे वह वर्ष 1987 की बालाकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट हो, जब हम लोग शासन में नहीं थे । दूसरी वर्ष 2002 की एक चिट्ठी है, जिसके माध्यम से उस समय की सरकार ने दिल्ली को बताया था कि सरकार का मतलब क्या होगा?सरकार का मतलब यूनियन टेरिटरी ऑफ दिल्ली है, यह उस समय की सरकार ने दिल्ली सरकार को बताया है ।
मैं अपनी बात को समाप्त करने के क्रम में एक और बात बताना चाहती हूं कि तीन चीजें हैं, जिनके खिलाफ आप नियम नहीं बना सकते हैं । पहला यह कि हाई कोर्ट की पावर्स हैं, उसके खिलाफ आप नियम नहीं बना सकते हैं । जिसमें प्रेसीडेंट की पावर्स रिजर्व्ड हैं, राष्ट्रपति की पावर्स पर किसी का नियम नहीं चल सकता है, वह राष्ट्रपति की पावर्स हैं, Dealing with salaries and allowances of the Speaker, Deputy-Speaker and Members of the Assembly and Ministers जैसे मैंने बताया कि 10-10 करोड़ रुपये हैं और उसका कोई काम दिखाई नहीं देता है । Relating to official languages of the Assembly of NCT of Delhi की ऑफिशियल लैंग्वेज क्या होगी?लेफ्टिनेंट गवर्नर का क्या होगा?
61वाँ अमेंडमेंट बालाकृष्णा रिपोर्ट के माध्यम से दिया गया था । बालाकृष्णा रिपोर्ट में बिल्कुल सही जानकारी है कि यह काम किस प्रकार से किया जाए । जो सॉवरेन लेजिस्लेटिव और एग्जिक्यूटिव पॉवर्स हैं, वे स्टेट के पास हैं, उनमें पार्लियामेंट के अधिकार को भी डिफाइन किया गया है, चाहे कोई भी पॉलिटिकल पार्टी आती-जाती रहे, लेकिन दिल्ली की जनता को नुकसान नहीं होना चाहिए । इसलिए यह अमेंडमेंट लाया गया है ।
जो एग्जिक्यूटिव पॉवर्स हैं, उनमें उनका क्या एक्सटेंट है, आप किस हद तक नियम बना सकते हैं, किस हद तक कानून बना सकते हैं, क्या भारत की संसद के नियमों का आप उल्लंघन कर सकते हैं, इन बातों को क्लैरिफाई किया गया है ताकि जो लोगों की स्पेशल रेस्पांसिबिलिटीज हैं, वे उनको ठीक से डिस्चार्ज कर सकें और दिल्ली के प्रति जिम्मेवारी से काम हो सके ।
काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स का लेजिस्लेटिव असेम्बली के प्रति क्या एसिस्टिव रोल है? सेक्शन 49 में यह डिफाइन्ड है । जो इलैक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल्स हैं, उसको इन्होंने कैसे रोका था, उसको भी इसमें बाद में, वर्ष 2020 में री-इम्प्लीमेंट किया गया । जो भी एम्बिग्युटीज थीं, जो भी घालमेल था, उसको तार-तार करके, साफ करके दिल्ली को प्रस्तुत किया जा रहा है, इस सभा के माध्यम से देश को प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि दिल्ली में रहने वाले भारत के तमाम निवासी, देश से आने वाले सभी लोग और दिल्ली के नागरिकों की समस्याओं का हल हो । हम सब दिल्ली के सेवक हैं, हम मालिक नहीं हैं । दिल्ली के प्रति जवाबदेही सिर्फ आपकी है, ऐसा नहीं है, हम सबकी जवाबदेही है । केन्द्र को मजबूरी में हस्तक्षेप करना पड़ता है क्योंकि जब लाशों के अम्बार खड़े हो गए, जब लोगों को खाना मिलना बंद हो गया, माइग्रेंट लेबरर को इस तरह से भगाया गया, जैसे वे कोई विदेशी घुसपैठिए हों, तो केन्द्र सरकार को इन सब चीजों के लिए काम करना पड़ा । इसीलिए लेफ्टिनेंट गवर्नर की पॉवर्स को मेनटेन करने का काम इस कानून ने किया है ।
मैं इसका समर्थन करती हूँ और मैं माननीय मंत्री जी के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ कि समयानुसार आप बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं ।
धन्यवाद ।
SHRI BELLANA CHANDRA SEKHAR (VIZIANAGARAM): Madam, thank you very much for allowing me to speak on this important Bill on behalf of my Party, YSRCP.
The Bill amends the Government of National Capital Territory of Delhi Act, 1991 which provides a framework for the functioning of the Legislative Assembly and the Government of the National Capital Territory of Delhi.
The Government, through this Bill, is ensuring that the National Capital Territory has the highest standards of living, better citizen services and better infrastructure, and that they become models of good governance and development for the rest of the country to follow. It is consistent with the status of Delhi as a Union Territory. It addresses the ambiguities in the interpretation of the legislative provisions. It ensures that the Lieutenant Governor exercises the power entrusted to him under Article 239 AA of the Constitution.
Following the announcement of the Atmanirbhar Bharat Abhiyan, all efforts are being made to ensure an effective and outcome-oriented implementation of developmental programmes of the Government of India. The Bill provides for `Ease of Doing Governance’ in the Capital.
The Bill will promote harmonious relations between the Legislature and the Executive. It will define the responsibilities of the elected Government and the Lieutenant Governor in line with the constitutional scheme of governance of the National Capital Territory of Delhi, as also interpreted by the hon. Supreme Court. We welcome this, Madam.
I am confident that the amendments proposed in the National Capital Territory of Delhi Act, 1991 will provide for better infrastructure development, tourism growth, and ramp up the security of the Capital.
Thank you, Madam.
16.00 hrs श्री विनायक भाउराव राऊत (रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग):सभापति महोदया,The Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Bill, 2021 – मैं इस बिल का विरोध करने के लिए खड़ा हुआ हूं ।
सभापति महोदया, इस बिल के माध्यम से परम पूज्य बाबासाहेब अंबेडकर जी के प्रयासों से अपने देश में जो लोकशाही का निर्माण हुआ, उस लोकशाही की हत्या दिल्ली से शुरू हुई है । …(व्यवधान) महाराष्ट्र में जो हुआ, वह सबको मालूम है, सुबह उसके बारे में बताया था । …(व्यवधान) ये कानून के बारे में बता रहे हैं? दुर्भाग्य की बात है, जिसे सब सुनिए । पिछले 30 वर्षों से कई प्रयास करने के बाद भी दिल्ली में दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी शासन नहीं कर सकी, इसलिए लेफ्टिनेंट गवर्नर के माध्यम से शासन करने का प्रयास इस विधेयक के माध्यम से हो रहा है । …(व्यवधान)
सभापति महोदया, मैं आपको पढ़कर सुनाता हूं । …(व्यवधान) यह बिल लाते वक्त बिल में मेंशन किया कि संशोधित बिल के अनुसार विधान सभा का कामकाज लोक सभा के नियमों के हिसाब से चलना चाहिए, यानी विधान सभा में जो व्यक्ति मौजूद नहीं है या उसका सदस्य नहीं है, उस व्यक्ति की आलोचना नहीं हो सकती । इस बिल पर बात करते वक्त भारतीय जनता पाटी की सम्माननीय सदस्या ने दिल्ली के जिस व्यक्ति का नाम लिया है, उन्होंने इस बिल का उल्लंघन किया है । …(व्यवधान) एक तरफ दिल्ली का बिल लाते हैं, जिसे लोग फॉलो करें, उसका अनुकरण करें और आप ही इस बिल पर भाषण देते वक्त कानून तोड़ने का काम कर रही हैं? …(व्यवधान)
माननीय सभापति : नाम निकाल दिया गया है ।
…( व्यवधान)
श्री विनायक भाउराव राऊत : सभापति महोदया,दो बार नाम लिया है । …(व्यवधान)
माननीय सभापति:दोनों बार नाम निकाल दिया गया है ।
…( व्यवधान)
श्री विनायक भाउराव राऊत:सभापति महोदया,ठीक है । मैं आपको धन्यवाद दूंगा । आपकी सतर्कता के कारण नाम निकल गया, लेकिन उन्होंने नाम तो लिया ही था । …(व्यवधान) मैं दूसरी बात कहना चाहूंगा । एक और शब्द पर मेरा आक्षेप है । उन्होंने कहा कि …* चुनकर आए हैं, दिल्ली में … * चुनकर आए हैं । …(व्यवधान)
माननीय सभापति:वह भी हटा दिया गया है ।
…( व्यवधान)
माननीय सभापति:इसे भी रिकॉर्ड से हटा दिया जाए ।
…( व्यवधान)
श्री विनायक भाउराव राऊत:सभापति महोदया,ठीक है, आप हटाने का काम करते हैं, लेकिन ऐसे शब्द का उच्चारण करते समय सम्माननीय सदस्या को मतदाताओं का अपमान न हो,इसकी तरफ तो ध्यान देना चाहिए था? …(व्यवधान) यह दिल्ली की जनता का अपमान है । उन्होंने चुनावों के माध्यम से वर्तमान सरकार को चुना है, कन्टीन्यूअसली दो बार चुना है । …(व्यवधान) काम क्या होता है, कैसे होता है, यह मुझे नहीं मालूम है । दुर्भाग्य से दिल्ली की सरकार के लिए यह कहा गया है । …(व्यवधान) सरकार शब्द का निर्माण संविधान ने किया है । उस संविधान को हटाकर वहां एलजी का नाम लगाया गया है । इसके दुष्परिणाम क्या होंगे?
आज मुझे यह बताते हुए दु:ख हो रहा है कि दादर और नागर हवेली के एलजी की वजह से इस सभाग्रह के एक सांसद, जो सात बार चुनकर आए थे, उनको खुदखुशी करनी पड़ी । …(व्यवधान) उन्होंने अपने सुसाइड-नोट में लिखा कि दादर और नागर हवेली के एलजी कैसे मुझे तकलीफ दे रहे हैं, कैसे मुझे परेशान कर रहे हैं । …(व्यवधान) दुर्भाग्य की बात है कि श्री मोहनभाई देलकर जी ने पेटीशन कमेटी के सामने सबको बोला कि यदि यह सब नहीं रुका, तो मुझे खुदखुशी करनी पड़ेगी । …(व्यवधान) एजी हो या एलजी हो, विधान सभा की अपनी स्वायत्ता होती है । लोकशाही में लोक सभा जैसे सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही विधान सभा राज्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है । राज्य के हित के लिए कानून बनाना विधान सभा का काम है और देश को चलाना, देश के हित के लिए कानून बनाना लोक सभा का काम है । इसीलिए, लोक सभा का कर्तव्य है कि वह विधान सभा का संरक्षण करे और जितने भी स्वराज्य संस्थाएं हैं, चाहे वह ग्राम पंचायत हो, पंचायत समिति हो, जिला परिषद हो या नगर पालिका हो, इन सब संस्थाओं का संरक्षण करना लोक सभा का कर्तव्य है । लोक सभा को इस पर ध्यान देना चाहिए, ताकि लोक नियुक्त प्रतिनिधि अपना काम कर सकें, अपना कर्तव्य निभा सकें । लोकशाही के खिलाफ हो, जनता के खिलाफ हो, अगर विधान सभा के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, तो उसे कंट्रोल करने की जिम्मेदारी न्यायपीठ की है ।
लोक सभा में पारित होने वाले कानूनों का विशलेषण करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की पीठ है, वैसे ही राज्य की विधान सभा यदि कुछ गलत करती है, तो कानून में उसके लिए भी प्रावधान कर के रखा गया है । महोदया, मुझे ऐसी शंका आ रही है कि क्या हम ब्रिटिश राज की तरह काम कर रहे हैं?
माननीय सभापति : नहीं, ऐसी बात नहीं है ।
श्री विनायक भाउराव राऊत:महोदया, एक लोक प्रतिनिधि की अवमानना करके जब वहां प्रशासक बैठाएंगे और दुर्भाग्य से बायस माइंड से वह प्रशासक कार्य करेगा,तो कैसे सही काम हो सकता है? वह सोच कर चलेगा कि विधान सभा जो कानून तैयार करेगी,उसके ऊपर वह कट मारेगा । किसी भी मंत्रालय में कोई भी निर्णय लिया जाएगा,उसको रोका जाएगा । इस बिल का दुष्परिणाम होगा कि दिल्ली विधान सभा कोई निर्णय नहीं ले सकेगी,दिल्ली का कोई भी मंत्री निर्णय नहीं ले सकेगा । यदि उसे कोई निर्णय लेना होगा,तो एलजी के पास जाना होगा । आज लोकशाही खत्म करके प्रशासकों को बढ़ावा देने का काम इस बिल के माध्यम से किया जा रहा है, इसलिए मैं इस बिल का विरोध करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं ।
कुंवर दानिश अली (अमरोहा): महोदया, आपने मुझे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के दिल्ली सरकार की पॉवर्स को सीज करने वाले बिल पर बोलने का मौका दिया, मैं इसके लिए आभारी हूं । यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के संविधान को लगातार ध्वस्त करने का काम केंद्र सरकार बार-बार कर रही है । लोकतंत्र में लोक सभा हो या विधान सभा हो, लेजिस्लेचर की सबसे बड़ी एकाउंटेबिलिटी होती है लेकिन आज जो बिल लाया गया है यह साफ दर्शाता है कि जो डिसेंट्रेलाइजेशन ऑफ पॉवर्स है,जो हमारे संविधान में दिया गया है, जो हमारे लेजिस्लेचर को एकाउंटेबिलिटी दी गई है,उस एकाउंटेबिलिटी को खत्म करके एक व्यक्ति को पॉवर देने का काम किया जा रहा है । आप इसे अपने दल में कर सकते हैं, लेकिन देश के संविधान के साथ खिलवाड़ मत कीजिए । हो सकता है कि आपका कोई व्यक्तिगत मतभेद दिल्ली के मुख्यमंत्री से रहा हो और यह जगजाहिर है । उन्होंने बहुत कोशिश की और नए चुनाव होने के बाद आपकी गोद में आकर बैठे थे । इसीलिए कन्हैया कुमार, एक स्टूडेंट लीडर के खिलाफ चार्जशीट का क्लीयरेंस दिया था । इसीलिए जो नार्थ-ईस्ट में दंगे हुए, उनमें उन्हें जो भूमिका निभानी चाहिए थी, वह नहीं निभाई । इसीलिए कोरोना काल में सबसे पहले प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि कोरोना दिल्ली के मरकज से फैल रहा है और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी लताड़ लगाई । उसके बाद भी दिल्ली के मुख्य मंत्री ने आपके साथ मिल जुलकर चलने की कोशिश की थी । हम जानते हैं कि उनकी गलती थी । आपकी नीयत देश में लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म करने की है,इसलिए आप यह बिल लेकर आए हैं । मुझसे पहले अभी सत्ता पक्ष की सांसद बोल रही थीं कि यहां दिल्ली में दस करोड़ रुपये एमएलए लैड फंड है और एक एमपी के अंडर दस एमएलए आते हैं,लेकिन तब भी आपको … * नहीं आ रही है और आपने देश के सभी एमपीज का एमपी लैड फंड खत्म कर दिया । कम से कम आप इनसे कुछ अच्छा सीख लो । आपको यह फंड तो बहाल कर देना चाहिए था ।
महोदया, हम उत्तर प्रदेश से सांसद जरूर हैं, लेकिन हमने शिक्षा दिल्ली में ग्रहण की है । मैं जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का स्टूडेंट रहा हूं और साथ ही स्टूडेंट लीडर भी रहा हूं । मुझे याद है कि जब हम पढ़ते थे तो सबसे ज्यादा शोर मचाने का काम कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए, माननीय आडवाणी जी और मदन लाल खुराना जी किया करते थे और गली-गली घूमा करते थे । आज आप बिल्कुल उसका उल्टा कर रहे हैं । दिल्ली के जो अधिकार हैं, उनको आप सीज़ करने का काम कर रहे हैं ।
माननीय सभापति: कृपया जल्दी बात समाप्त कीजिए । कई अन्य माननीय सदस्य भी हैं ।
कुंवर दानिश अली : माननीय सभापति महोदया, यह कहां का न्याय है कि दिल्ली के अंदर विधान सभा अगर कोई लेजिस्लेशन लाना चाहती है, तो उसके लिए पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर से अनुमति ली जाएगी । हम जानते हैं कि लेफ्टिनेंट गवर्नर्स और गवर्नर्स कैसे बिहेव करते हैं । जब दूसरे राज्यों में सरकारें गिराई जाती हैं तब वे कैसे बिहेव करते हैं, हमें अच्छी तरह याद है । माननीय राजनाथ सिंह जी यहां बैठे हैं और स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी कितनी बार स्टेट्स के गवर्नर्स के खिलाफ राष्ट्रपति भवन में धरने पर जाकर बैठे थे । उस समय केंद्र सरकार के इशारे पर गवर्नर्स को कठपुतली बताया गया । आज ऐसा क्या हो गया कि पूरी दिल्ली का भविष्य आप एक एलजी के हाथ में दे रहे हैं । यह बिलकुल न्यायसंगत नहीं है और दिल्ली की जनता के साथ आप धोखा कर रहे हैं । जिस दिल्ली की जनता ने बार-बार भारतीय जनता पार्टी को विधान सभा में जिताया था और लोक सभा के चुनावों में लगातार जिताया है, लेकिन यदि दिल्ली विधान सभा में किसी दूसरी पार्टी ने सरकार बना दी, तो इतनी द्वेष-भावना से दिल्ली की जनता के साथ ऐसा व्यवहार मत कीजिए ।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि सीएए और एनआरसी का जिक्र सत्ता पक्ष की माननीय सांसद की तरफ से किया गया, लेकिन क्या हुआ? जिन्होंने दिल्ली के चुनाव में नारे लगाए थे कि गोली मारो, उनके खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं हुई । …(व्यवधान) आपके मंत्रियों ने नारे लगाए थे कि गोली मारो, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई । आपकी पार्टी के एक नेता, जिसकी वजह से दिल्ली में दंगा हुआ, आज तक उस … * के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई और आप दिल्ली सरकार के अधिकारों को छीनने का काम करते हैं । आम आदमी पार्टी ने आपके साथ मिलकर अपने कॉर्पोरेटर को निष्काषित किया ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति: आप इतना मत चिल्लाइए और अपनी बात समाप्त कीजिए । ये सारी बातें रिकार्ड में नहीं जाएंगी ।
…( व्यवधान)… * کنور دانش علی (امروہہ): محترم چیرمین صاحب، آپ نے مجھے راشٹریئے راجدھانی شیتر کے دہلی کی پاورس کو سیز کرنے والے بِل پر بولنے کا موقع دیا، میں اس کے لئے آپ کا شکر گزار ہوں۔ یہ بہت بدقسمتی کی بات ہے کہ بابا صاحب بھیم راوُ امبیڈکر کے آئین کو لگا تار دھوست کرنے کا کام مرکزی سرکار بار بار کر رہی ہے۔ جمہوریت میں لوک سبھا ہو یا وِدھان سبھا ہو، لیجِسلیچر کی سب سے بڑی اکاوُنٹیبلیٹی ہوتی ہے، لیکن آج جو بِل لایا گیا ہے، یہ صاف ظاہر کرتا ہے کہ جو ڈیسینٹرلائزیشن آف پاورس ہے، جو ہمارے آئین میں دیا گیا ہے، جو ہمارے لیجسلیچر کو اکاوُنٹیبلیٹی دی گئی ہے، اس اکاوُنٹیبلیٹی کو ختم کرکے ایک آدمی کو طاقت دینے کا کام کیا جا رہا ہے۔ آپ اسے اپنی پارٹی میں کر سکتے ہیں، لیکن ملک کے آئین کے ساتھ کھلواڑ مت کیجیئے۔ ہو سکتا ہے کہ آپ کا کوئی انفرادی اختلافات دہلی کے وزیرِ اعلیٰ سے رہا ہو اور یہ جگ ظاہر ہے۔ انہوں نے بہت کوشش کی اور نئے انتخابات ہونے کے بعد آپ کی گود میں آکر بیٹھے تھے۔ اس لئے کنہیا کمار کا، ایک اسٹوڈینٹ لیڈر کے خلاف چارج شیٹ کا کلیرینس دیا تھا۔ اس لئے نارتھ ایسٹ میں دنگے ہوئے، اس میں انہوں نے جو رول ادا کرنا چاہئیے تھا وہ نہیں کرا۔ اس لئے کورونا کال میں سب سے پہلے پریس کانفرنس کرکے کہا کہ کورونا دہلی کے مرکز سے پھیل رہا ہے، اور مانئیے سپریم کورٹ نے بھی لتاڑ لگائی ۔ اس کے بعد بھی دہلی کے وزیرِ اعلیٰ نے آپ کے ساتھ مل جُل کر چلنے کی کوشش کی تھی۔ ہم جانتے ہیں کہ ان کی غلطی تھی۔ آپ کی نیت ملک میں جمہوری حقوق کو ختم کرنے کی ہے، اس لئے آپ یہ بِل لے کر آئے ہیں۔ مجھسے پہلے ابھی حکمراں جماعت کی ممبر بول رہی تھیں کہ یہاں دہلی میں دس کروڑ روپئیے ایم۔ایل۔اے۔ لیڈ فنڈ ہے اور ایک ایم۔پی۔ کے اندر دس ایم۔ایل۔ایز آتے ہیں، لیکن تب بھی آپ کو (کاروائی میں شامل نہیں) نہیں آ رہی ہے اور آپ نے ملک کے سبھی ایم۔پیز کا ایم۔پی۔ لیڈ فنڈ ختم کر دیا ہے۔ کم سے کم آپ ان سے کچھ اچھا سیکھ لو۔ آپ کو یہ فنڈ تو بحال کر دینا چاہئیے تھا۔ محترمہ چیرمین صاحبہ، ہم اتر پردیش سے ممبر آف پارلیمنٹ ضرور ہیں، لیکن ہم نے تعلیم دہلی میں ہی حاصل کی ہے۔ میں جامعہ ملیہ اسلامیہ یونیورسٹی، نئی دہلی کا طالب علم رہا ہوں، اور ساتھ ہی اسٹوڈینٹ لیڈر بھی رہا ہوں۔ مجھے یاد ہے جب ہم پڑھتے تھےتو سب سے زیادہ شور مچانے کا کام دہلی کو مکمل ریاست کا درجہ دیا جائے، محترم اڈوانی جی اور مدن لال کھورانہ جی کرتے تھے اور گلی گلی گھوما کرتے تھے۔ آج آپ بالکل اسے برعکس کر رہے ہیں۔ دہلی کے جو حقوق ہیں، ان کو آپ سیز کرنے کا کام کر رہے ہیں.
محترمہ چیرمین صاحبہ، یہ کہاں کا انصاف ہے کہ دہلی کے اندر وِدھان سبھا اگر کوئی لیجِسلیشن لانا چاہتی ہے، تو اس کے لئے پہلے لیفٹینینٹ گورنر سے اجازت لی جائے گی۔ ہم جانتے ہیں کہ لیفٹینینٹ گورنرس اور گورنرس کیسے برتاوُ کرتے ہیں۔ جب دوسری ریاستوں میں سرکاریں گرائیں جاتی ہیں تب وہ کیسے برتاوُ کرتے ہیں، ہمیں اچھی طرح یاد ہے۔ محترم راجناتھ سنگھ جی یہاں بیٹھے ہیں اور مرحوم اٹل بہاری باجپئی جی کتنی بار اسٹیٹس گورنرس کے خلاف راشٹرپتی بھون میں دھرنے پر جا کر بیٹھے تھے۔ اس وقت مرکزی سرکار کے اشارے پر گورنرس کو کٹھپتلی بتایا گیا۔ آج ایسا کیا ہو گیا کہ پوری دہلی کا مستقبل آپ ایک ایل۔جی۔ کے ہاتھوں میں دے رہے ہیں۔ یہ بالکل نیائے سنگت نہیں ہے اور دہلی کی عوام کے ساتھ آپ دھوکہ کر رہے ہیں۔ جس دہلی کی عوام نے بار بار بھارتیہ جنتا پارٹی کو اسمبلی میں جتوایا تھا اور لوک سبھا کے انتخابات میں لگاتار جتوایا ہے، لیکن اگر دہلی اسمبلی میں کسی دوسری پارٹی نے سرکار بنا دی، تو اتنے بدلے کی بھاونا سے دہلی کی عوام کے ساتھ ایسا برتاوُ مت کیجیئے۔ محترمہ چیرمین صاحب، میں آپ کے ذریعہ سے کہنا چاہتا ہوں کہ سی۔اے۔اے۔ اور این۔آر۔سی۔ کا ذکر حکمراں جماعت کی معزّز ممبر آف پارلیمنٹ نے کیا ، لیکن کیا ہوا؟ جنہوں نے دہلی کے چناوُ میں نارے لگائے تھے کہ گولی مارو، ان کے خلاف تو کوئی کاروائی نہیں ہوئی۔ (مداخلت)۔۔ آپ کے منتریوں نے نارے لگائے تھے کہ گولی مارو، لیکن آج تک کوئی کاروائی نہیں ہوئی۔ آپ کی پارٹی کے ایک نیتا جس کی وجہ سے دہلی میں دنگا ہوا، آج تک اس (کاروائی میں شامل نہیں) کے خلاف کوئی کاروائی نہیں ہوئی اور آپ دہلی سرکار کے حقوق کو چھین لینے کا کام کرتے ہیں۔ عام آدمی پارٹی کے ساتھ مل کر اپنے کارپوریٹر کو نشکاسِت کیا (مداخلت)۔۔۔۔ (ختم شد) माननीय सभापति: श्रीमती सुप्रिया सुले जी ।
…( व्यवधान)
माननीय सभापति: सुप्रिया जी, आपका टाइम जा रहा है ।
श्रीमती सुप्रिया सदानंद सुले (बारामती): मैडम, ऐसा नहीं हो सकता है ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति: ऐसे चिल्लाने से काम नहीं होता है । जब अमेरिका के राष्ट्रपति आए थे, तब इतनी गोलियां चली थीं कि लोग क्षत-विक्षत हो गए थे । आप यह नहीं बोलते हैं कि दिल्ली सरकार में क्या-क्या हुआ था?
…( व्यवधान)
श्री रितेश पाण्डेय (अम्बेडकर नगर): मैडम,आप चेयर पर बैठी हुई हैं । …( व्यवधान)…* माननीय सभापति: कृपया शांत रहिए और बात खत्म कीजिए । मैंने आपको पर्याप्त टाइम दिया है ।
…( व्यवधान)
माननीय सभापति: सही बात सुनने के लिए हम चेयर पर बैठे हैं । सही बात सुनने के लिए सदन है, गलत बात सुनने के लिए नहीं है । आपकी कोई बात रिकॉर्ड में नहीं जा रही है । आप कृपया बैठ जाइए । सुप्रिया जी, आप बोलिए ।
…( व्यवधान)
SHRIMATI SUPRIYA SADANAND SULE : The House has to be in order. इतना इम्पॉर्टेंट बिल है । बीजेपी के लोग भी बोलने लगे हैं । ट्रेजरी बेंच भी अब बोलने लगी है ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति: रितेश पांडेय जी, कृपया बैठ जाइए । बेनीवाल SHRIMATI SUPRIYA SADANAND SULE (BARAMATI): Madam, I stand here to oppose the Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Bill, 2021.
आज मनीष जी और मीनाक्षी जी, दोनों का बहुत अच्छा भाषण सुनने को मिला, बहुत कुछ नया सीखने को भी मिला । दो लॉयर बोल रहे थे, लेकिन मैं थोड़ी कंफ्यूज हो गई, इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से विनती करूँगी कि वे इसका एक पॉइंटेड क्लैरिफिकेशन दें । It is because, there is a complete contradiction in how it has been interpreted. So, I need a clarification. It is a specific, pointed question to the hon. Minister. She has said in her speech where she has corrected Mr. Manish Tewari. I would not read the first two lines; I will read what is relevant to you. It says: “The status of NCT of Delhi is sui generis, a class apart, and the status of the Lieutenant Governor of Delhi is not that of a Governor of a State, rather he remains an Administrator, in a limited sense, working with the designation of LG.” So, his role is of a limited sense. So, can you clarify it? It is because there is a contradiction in what he has said which we have interpreted in English vis-à-vis what your hon. Member from the BJP has said. So, I think, the Minister would be the right and appropriate authority to clarify to this nation whether he is an LG. It is because, then, as an administrator, she said, his rights are slightly different. Whatever little that we understand, what Meenakashi ji said is very true, हम थोड़े दिन के लिए दिल्ली में आते हैं और जो भी यहाँ का मेनेजमेंट है, जो उन्होंने पानी, बिजली के बारे में कहा, I understand where you are coming from, there are two or three questions which I would like to ask as a novice to you. You talked about Delhi’s management of water, about electricity कि बिजली केंद्र सरकार देती है, लेकिन फोटो सीएम का लगता है । यह तो हर जगह होता है । हमारे टाइम में भी हुआ करता था, अलग-अलग राज्य होते हैं । But what was very interesting for me, दिल्ली में आम आदमी पार्टी एक नहीं, शायद दो या तीन बार बड़ी मेजोरिटी से सत्ता में आई है, तो वे कुछ तो ढंग का करते होंगे और जो बहुत ही रोचक है, जिसके बारे में दानिश भाई ने भी कहा कि यहाँ के एमएलएज को 10 करोड़ रुपये देते हैं । अभी कोविड में हमारे तो 12 करोड़ रुपये एमपीलैड्स फण्ड के काटे गए हैं । महाराष्ट्र में 5 करोड़ रुपये दिए गए हैं, दिल्ली में 10 करोड़ रुपए दिए हैं । इतना पैसा अगर एक स्टेट दे सकता है, जब हमारे जीएसटी का पैसा नहीं आया है तो कुछ तो दिल्ली सरकार दिल्ली में ठीक कर रही होगी । It is complimentary. और 10 एमएलए हैं तो 100 करोड़ हो गया । Meenakashi ji is a very good friend of mine. I did not heckle and I never heckle her. So, just hear me out.
SHRIMATI MEENAKASHI LEKHI : That is precisely the point that what we get as Rs.5 crore, you can see the impact. But it is Rs.100 crore for the same area and there is no impact. People are crying. People are coming and asking questions to me that get this done, get that done and I have no money. The money vests with the State Government where MLAs are non-performers. That is the point.
SHRIMATI SUPRIYA SADANAND SULE: I appreciate that. I think, you should raise it with the hon. Finance Minister during the discussion on the Finance Bill. It is because if she gives us Rs.5 crore, we can all spend it as MPLADS in our constituency.
SHRIMATI MEENAKASHI LEKHI : Not with the LG because these are the works of Delhi Administration and the Administration should do that. Roads have to be made. Water needs to be supplied irrespective of who is in the Government.
SHRIMATI SUPRIYA SADANAND SULE : Well, I appreciate what you are saying but the point is this. The fact that they get elected with such a large majority, कुछ तो ढंग का करते होंगे, इतना भी नहीं है । I think, it is very unfair. It is because, I think, out of 70 assembly seats, 62 MLAs, अगर तीसरी बार इतने एमएलए चुनकर आए हैं तो इतना भी गलत नहीं करते हैं । I understand, there will be challenges. I have been through what you have been through because जब पिछले पाँच साल महाराष्ट्र में किसी और विचार की सरकार थी, तो हमें भी वही दिक्कत आती थी । आपके गिरीश बापट जी यहाँ नहीं हैं, वे हमारे पालक मंत्री थे, तब हमें भी म्युनिसिपल कारपोरेशन में बहुत चक्कर काटने पड़ते थे, कुछ पैसा नहीं मिलता था । सौभाग्य से अभी बदलाव हो गया और हमारे यहाँ थोड़ा अलग सा सिस्टम है । किसी की भी सरकार हो, किसी विचार का भी एमएलए, एमपी हो, उसको पैसा दिया जाता है । आप महाराष्ट्र में बीजेपी के एमएलऐज से इस बारे में पूछिए । हमारे यहाँ ऐसी राजनीति नहीं होती है ।…(व्यवधान) But I think they are doing a fairly good job. उन्होंने एक चीज और कही कि बड़े-बड़े इश्तिहार चलते हैं । I know this is not connected with the subject but since the Treasury Bench brought it, उन्होंने कहा कि दिल्ली के विज्ञापन देश भर में चलते हैं । महाराष्ट्र में यूपी के भी बहुत विज्ञापन आते हैं । हमारे इश्तिहार वाले, पेपर वाले बड़े खुश हैं, लेकिन कहीं भी आप देश में जाओ, बहुत सारे राज्य हैं, जो बहुत सारा पैसा विज्ञापन पर खर्च करते हैं । केवल दिल्ली वालों की बात नहीं है, यूपी वाले भी अलग-अलग स्कीम्स के फुल पेज विज्ञापन हमारे यहाँ देते हैं ।…(व्यवधान)
अच्छी बात है,मैं टीका नहीं कर रही हूं । मीनाक्षी जी कर रही थीं,इसलिए मैं उसको एड कर रही हूं । अगर मीनाक्षी जी का सुझाव हो तो मैं भी मीनाक्षी जी से विनती करूंगी कि अगर आपको यह गलत लगता हो कि बहुत सारा खर्चा हर सरकार एडवरटाइजिंग पर कर रही है,क्यों न हम सब मिलकर सोचें कि आज से एडवरटाइजिंग पर न आपकी, न हमारी किसी की भी सरकार न करे । जो इम्पोर्टेंट चीजें हैं,जैसे अवेयरनेस या कोविड के बारे में या सिर्फ स्कीम के बारे में बता दें । बाकी जो एडवरटाइजिंग होती है,वह नहीं करें ।…(व्यवधान) अगर ऐसा आपका भी सुझाव हो तो I will whole-heartedly support you. Together we can pass it, if it is the sense of the House. …(व्यवधान) कौन बोल रहा है कि हैकल कर रहे हैं । भईया, खड़े होकर बोलो, ऐसे बैठ कर क्यों बोल रहे हो?…(व्यवधान)
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : दिल्ली शहर है । It is a city. It is just a city and for one city you have Rs.124 crore.
SHRIMATI SUPRIYA SADANAND SULE : I am appreciating your point. I agree with you. No Government should do any electoral advertising. They should focus on governance. It is unfortunate.
I wanted one clarification about India’s rating. I know, you all do not like international quotes but I have seen Freedom House Report and V-Dem’s Report. This Government selectively uses international relationships. They have said that India is going through an electoral autocracy. Cooperative federalism is something which the Government constantly talks about. I think this legislation is going to affect cooperative federalism. If any MLA or MP is feeling threatened, we have to have a larger debate. I am not completely against what you are saying. I respect what you have said. मैं सिर्फ एक सुझाव देना चाहती हूं । If you feel there is such a contrast of decisions, why not send this Bill to the Select Committee? जल्दी क्या है? कोई जल्दी नहीं है । भले ही तीन महीने ले लो, सेलेक्ट कमेटी में भेजिए । Call the Chief Minister of Delhi. एमएलएज़ से मिलिए । इतना बवाल और इतनी जल्दी करने की जरूरत क्या है? It is not a national crisis. Why not send this Bill to a Select Committee? Meenakashi ji and all MPs of Delhi can participate in it. The Chief Minister of Delhi and MLAs can be consulted. I think, it is a very-very important Bill. So, I would urge this Government to send this Bill to a Select Committee, and I am sure a good legislation will come when all Parties put their heads together in the larger interest of this nation. Thank you.
डॉ. एस. टी. हसन (मुरादाबाद): मैडम,हम समझते हैं कि हम एक डेमोक्रेटिक कंट्री के अंदर रहते हैं । बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी के संविधान की रूह भी यही है कि प्रजातंत्र सर्वोपरि होना चाहिए । लेकिन बदकिस्मती से हमें यह एहसास होने लगा है कि शायद अब हम ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम की तरफ आगे बढ़ रहे हैं । यह कानून जो पास किया जा रहा है, यह टोटल असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक कानून है, क्योंकि इसमें दिल्ली की चुनी हुई सरकार के ऊपर बैरियर लगाए जा रहे हैं, जो हमारे कानून के मुताबिक नहीं लगाने चाहिए । दिल्ली में चुनी हुई सरकार के बजाय उपराज्यपाल अब सरकार चलाएंगे,वह एडमिनिस्टर करेंगे और दिल्ली के मुख्यमंत्री और दिल्ली के मंत्री स्वतंत्र तरीके से अपना काम नहीं कर पाएंगे । उनको उपराज्यपाल के ऊपर डिपेंड होना पड़ेगा ।
मैडम,संविधान में साफ-साफ लिखा गया है कि दिल्ली की चुनी हुई विधान सभा होगी । दिल्ली की चुनी हुई विधान सभा सिर्फ तीन मामलों को छोड़ कर सब जगह अपना कानून बना सकती है । जो सूची में 1, 12 और 18 पर लिखे गए हैं यानी कि पब्लिक ऑर्डर,पुलिस और जमीन के मुताल्लिक ये कानून नहीं बनाएंगे,बाकी सब चीजों के लिए कानून बनाएंगे । दिल्ली की सरकार विधान सभा के लिए जवाबदेह होगी,न कि एलजी के लिए जवाबदेह होगी,यह हमारे कानून में दिया हुआ है ।
मैडम,उपराज्यपाल के लिए लिखा है कि उपराज्यपाल सलाह देने का काम करेंगे,एड एंड एडवाइज़ करेंगे,न कि डिक्टेट करेंगे । यहां तो इस कानून के तहत और इस अमेंडमेंट के तहत वह डिक्टेट करेंगे । संविधान के प्रावधानों से अगर वह असहमत हो रहे हैं तो वह इसको प्रेजीडेंट के पास भेज सकते हैं और उनसे सलाह ले सकते हैं ।
मैडम,जब 2015 में चुनी हुई सरकार आई और केन्द्र सरकार ने उसको ओवर पावर करने के लिए एलजी को पावर देने की कोशिश की तो सुप्रीम कोर्ट के अंदर एक याचिका दायिर हुई तथा 04 जुलाई, 2018 में एक निर्णय आया । मैं कोई वकील तो हूं नहीं । अभी मैंने बहुत लर्नेड वकीलों के पूरे कथन सुने और बहुत सी धाराओं की बात हुई । लेकिन मैं जजमेंट के जरिये बताना चाहता हूं कि जजमेंट में आखिर फाइल हुआ क्या?सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल तीन विषयों के अलावा दिल्ली की सरकार को निर्णय लेने का अधिकार है ।
दूसरी बात, सरकार अपने निर्णयों से राज्यपाल को अवगत कराएगी, यह सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है, न कि राज्यपाल उनसे कुछ कहेंगे । अवगत का अर्थ राज्यपाल की मंजूरी लेना नहीं है । यह भी साफ लिखा हुआ है । अवगत कराएगी, मंजूरी नहीं लेगी । तीसरा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उप-राज्यपाल दिल्ली सरकार के कामों में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे । चौथा, अगर वे चुनी हुई सरकार से असहमत होते हैं तो वे राष्ट्रपति को भेजेंगे । लेकिन एक बात साफ-साफ उन्होंने कही है, इसका मतलब यह नहीं है कि असहमति हर मामले में हो और यह कभी-कभार किसी मामले में होनी चाहिए ।
मैडम, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ, जिस पीठ में पांच जज होते हैं, यह उसका निर्णय है । उसको आज हम पार्लियामेंट से पलट रहे हैं, उसके खिलाफ हम जा रहे हैं । मैडम, इस तरह से कैबिनेट के हर निर्णय को एलजी के ऊपर निर्भर होना पड़ेगा । सवाल यह उठता है कि फिर ये इलैक्शन क्यों कराए जा रहे हैं? इलैक्शन भी कराना बंद कर दें । जब डेमोक्रेसी रहेगी ही नहीं, जब सारा काम एलजी को ही करना है तो इलैक्शन छोड़िए इस विधान सभा को ही भंग कीजिए और एलजी को ही सारा काम दे दीजिए । इससे देश के अंदर एक तानाशाही और हिटलरशाही एलजी की होगी । मैं इसी कथन के साथ इस बिल का विरोध करता हॅूं । बहुत-बहुत शुक्रिया ।
SHRI BRIJENDRA SINGH (HISAR): Hon. Chairperson, Madam, thank you for affording me this opportunity to speak on the Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Bill, 2021.
I stand to speak in support of the Bill because it seeks to put an end to the acrimony, unpleasantness, and uncertainty that has prevailed in the National Capital Territory for the last almost seven and a half years. This Bill seeks to amend the Government of NCT Delhi Act, 1991 by four short but very significant amendments and these amendments are being made to Sections 21, 24, 33, and 44 of the GNCTD Act, 1991. इनके बारे में पहले ही विस्तार से बोला जा चुका है, लेकिन मैं फिर भी दो-तीन बिंदु यहां पर रखना चाहूंगा ।
Section 21 deals with the restriction on laws passed by the Legislative Assembly concerning certain matters. इसमें जो अब संशोधन लाया गया है, उससे जोड़ा गया है that this Bill provides that the term ‘Government’ referred to in any law made by the Legislative Assembly will imply Lieutenant Governor. शायद यह इन अमेंडमेंट्स का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि अभी तक, सरकार क्या होगी, उसको परिभाषित नहीं किया गया था । यहां पर उसमें एक क्लैरिटी दी गई है, ताकि यह जो तनातनी चलती है, मुख्य मंत्री और उसके काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स में और लेफ्टिनेंट गवर्नर में, उससे निजात पाई जा सके ।
Section 24 deals with assent to Bills passed by the Legislative Assembly. यह जिक्र किया गया कि लेफ्टिनेंट गवर्नर, तिवारी जी ने कहा कि वह तो सिर्फ एक प्रशासक है, एडमिनिस्ट्रेटर शब्द इस्तेमाल किया गया है । मुझे पता नहीं, उन्होंने किस हिसाब से इस प्रशासक शब्द को लेजिसलेटिव असेंबली से या मुख्य मंत्री से नीचे मान लिया, क्योंकि जो व्यवस्था आर्टिकल-239 में दी गई है, जहां पर यूनियन टेरिटरीज़ क्रिएट किए गए, जो सन् 1956 का हमारा 7वां अमेंडमेंट था, उसमें बड़ा क्लियरकट है कि राष्ट्रपति जी यूनियन टेरिटरीज़ का जो एडिमिनिस्ट्रेशन और उसकी जो सरकार है, वह एक एडमिनिस्ट्रेटर के माध्मय से चलाएंगे । उस एडमिनिस्ट्रेटर की संज्ञा क्या होगी, वह चीफ कमिश्नर भी हो सकता है, वह लेफ्टिनेंट गवर्नर भी हो सकता है और वह एक नियरबाय स्टेट का गवर्नर भी हो सकता है, जो एडमिनिस्ट्रेटर की कैपेसिटी में काम करे, जैसे कि चंडीगढ़ के साथ है । पंजाब का जो गवर्नर है, वह चंडीगढ़ का एडमिनिस्ट्रेटर भी है । जहां तक असेंट ऑफ बिल्स का सवाल है, ऑलरेडी बहुत सारी पॉवर्स लेफ्टिनेंट गवर्नर को उसके अंदर दी गई हैं । लेफ्टिनेंट गवर्नर असेंट चाहे, कोई बिल पास हो तो उसको असेंट दे सकता है, चाहे तो असेंट विदहोल्ड कर सकता है और यदि उसे लगे कि इसे राष्ट्रपति को रेफर किया जाना चाहिए, तो वह भी कर सकता है ।
ऐसा नहीं है कि इसके अन्दर बहुत नई चीजें लाई जा रही हैं । इस एक्ट में और संविधान की जो धाराएं हैं, उनके तहत लेफ्टिनेंट गवर्नर पहले से बहुत सशक्त है ।
इसके अलावा, एक जो महत्वपूर्ण संशोधन आया है, वह सेक्शन-44 में आया है । Section 44 deals with the conduct of business. Accordingly, all executive decisions taken by the elected Government should be under the Lieutenant Governor’s name. इसके अन्दर जो संशोधन करके लाया गया है, वह यह है कि the Bill empowers the Lieutenant Governor to specify his suggestions on certain matters. His opinion has to be taken before taking any executive action or decisions by the Minister or Council of Ministers.
मनीष तिवारी जी ने कहा कि जब लेजिस्लेशन ही पास हो गई तो उसकी इम्प्लीमेंटेशन में रोक-टोक किसलिए हो, उसकी इम्प्लीमेंटेशन पर एडमिनिस्ट्रेटर का अख्तियार किसलिए हो । शायद इसलिए आपको उससे पढ़ कर देखना होगा, जब लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास असेंट विदहोल्ड करने का भी पावर है और यदि उसे लेजिस्लेटिव असेम्बली द्वारा पास किए गए बिल को राष्ट्रपति के पास रेफर करने का अधिकार है तो उससे बेहतर यह होगा कि पहले ही लेफ्टिनेंट गवर्नर की संस्तुति ले ली जाए, ताकि असेम्बली जो बिल पास करे, अगर उस पर पहले से ही लेफ्टिनेंट गवर्नर की संस्तुति है तो उसे आगे आने में, उसके इम्प्लीमेंटेशन में सुविधा हो सके । लेकिन, सारी बात यह है कि हम आज इस पर किस लिए पहुंचे हैं? इस अमेंडमेंट बिल को लाने की क्या जरूरत पड़ी? ऐसा क्या हुआ कि ये बिल लाए गए? इसके बारे में जो बहुत सी चीजें कही गई कि ये अन-कंस्टीट्यूशनल है । इसमें डेमोक्रेसी का हनन हो गया, डेमोक्रेसी का कत्ल हो गया, इस प्रकार की भाषा इस्तेमाल की गई ।
सुबह इंश्योरेंस बिल पर मनीष तिवारी जी बोल रहे थे और अभी भी बोल रहे थे, दोनों में उन्होंने एक बात जरूर कही कि राय और जो फैसले लिए जाते हैं, शायद यह इस बात पर निर्भर करता है कि सदन में कौन अब कहां बैठा है । मेरे ख्याल से, वे अपना दर्द और अपनी पार्टी का दर्द ज्यादा जताने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि धारा-370 को उनकी सरकार पिछले 50 सालों से शनै:-शनै: करके, it was whittling it away, it was chipping it away, लेकिन उनमें इतना आत्मबल या विल पावर नहीं थी कि उसे एक झटके में समाप्त कर सके, जो नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने किया ।
इसी प्रकार से इंश्योरेंस बिल के बारे में उन्होंने कहा कि ये सारी चीजें हम करना चाहते थे, लेकिन उस समय तो आपने करने नहीं दी । जब वे खुद ही कह रहे हैं कि आप जहां बैठे हैं, उससे बहुत प्रभाव पड़ता है कि आपका मत क्या होगा तो आप आज उस इंश्योरेंस बिल का क्यों विरोध कर रहे थे, जो आप अपने समय में खुद लाना चाहते थे और किसी कारण से आप नहीं ला पाए । यही स्थिति इस एनसीटी बिल की भी है । वर्ष 1951 का जो कानून है, उसमें भी तीन बड़ी प्रमुख चीजें, प्रदेश की जो सरकार है, प्रदेश से मेरा मतलब यूनियन टेरिटरी ऑफ दिल्ली की जो लेजिस्लेटिव असेम्बली है, उसके परव्यू से कुछ चीजें बाहर रखी गईं, उनमें पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और लैंड हैं । सिर्फ ये ही नहीं, इस एक्ट में कुछ ऐसी चीजें ओपेन-एन्डेड छोड़ दी गईं, जिनकी वज़ह से विवाद आज खड़ा हुआ है, जिसे ठीक करने का प्रयास आज संसद यहां कर रही है । सबने वर्ष 1991 वाले एक्ट और उसके आगे की कहानी का जिक्र किया, लेकिन इसमें वह बात को समझना बहुत जरूरी है कि पूरे सिलसिले का इतिहास क्या है । मैं संक्षेप में बताना चाहूंगा कि जब से देश आज़ाद हुआ, उस समय दिल्ली को यूनियन टेरिटरी की संज्ञा नहीं दी गई थी, उस समय वह भाग-VIII में फर्स्ट शेड्यूल की जो ‘सी’ कैटेगरी के अन्तर्गत स्टेट्स थे, उसमें दिल्ली आती थी । वर्ष 1956 में सातवें संशोधन के साथ इनको यूनियन टेरिटरीज़ का दर्जा दिया गया । वर्ष 1962 में जो चौदहवां अमेंडमेंट आया, उसमें कुछ यूनियन टेरिटरीज़ को या तो लेजिस्लेटिव असेम्बली दी गई या काउन्सिल ऑफ मिनिस्टर्स या दोनों दिए गए । लेकिन, ध्यान रखने की बात यह है कि दिल्ली को उस समय भी यह दर्जा नहीं दिया गया । दिल्ली को करीब 40 साल बाद यह दर्जा मिला, वर्ष 1991 का जो एक्ट आया था, उसके अन्डर लेजिस्लेटिव असेम्बली और काउन्सिल ऑफ मिनिस्टर्स का प्रावधान किया गया क्योंकि दिल्ली शायद बहुत ज्यादा एक्सपैंड कर गई थी । यहां पर बहुत ज्यादा लोग आकर बस गए थे, शायद इस चीज को महसूस किया गया कि यहां पर एक लेजिस्लेटिव असेम्बली होनी चाहिए । लेकिन, जो मुख्य बात है, वह यह है कि दिल्ली शुरू से और आज तक एक विशुद्ध यूनियन टेरिटरी के रूप से एग्जिस्ट करती है ।
जो दिल्ली की यूनियन टेरिटरी है, वह किसी और यूनियन टेरिटरीज़ की तरह नहीं है । यह किसी दो प्रदेशों में विवाद की वजह से बनी हुई यूनियन टेरिटरी नहीं है । यह चंडीगढ़ की तरह यूनियन टेरिटरी नहीं है । यह किसी स्ट्रैटीजिक इम्पोर्टेंस की वजह से यूनियन टेरिटरी नहीं है, जैसे अंडमान निकोबार आइलैंड्स हैं । यह किसी कलोनियल लेगसी की वजह से यूनियन टेरिटरी नहीं है । किसी जमाने में गोवा भी यूनियन टेरिटरी होता था । दमन-दीव और पुदुचेरी कलोनियल लेगसी के तहत यूनियन टेरिटरीज़ बनी थीं । दिल्ली यूनियन टेरिटरी इसलिए रखी गई थी, क्योंकि यह हमारे देश की राजधानी है । यहाँ पर संसद है, यहाँ पर भारत सरकार है और उसकी सारी मिनिस्ट्रीज़ हैं । सारे दुनिया के देशों की यहाँ पर ऐम्बेसीज़ हैं । पूरे देश का इसके ऊपर अधिकार है । हालांकि हमारे संविधान के हिसाब से अधिकार तो हर हिस्से पर है, लेकिन दिल्ली सबकी है । दिल्ली को चलाने की जो मुख्य जिम्मेदारी है, वह भी केन्द्र सरकार की सर्वप्रथम है । उसके बाद बाकी सारी चीजें फ्लो करती हैं । इसीलिए संविधान में प्रावधान किया गया था कि राष्ट्रपति इसकी गवर्नेंस के लिए एक एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करेंगे, जैसा मैंने शुरू में कहा था कि इसकी मुख्य रेस्पॉन्सबिलिटी यहाँ सरकार और प्रशासन प्रदान करना होगा ।
ये सारा सिलसिला दिसंबर 2013 के बाद से बिगड़ा । एक ऐसा व्यक्ति जो खुद कहता है कि मैं एनार्किस्ट हूँ, एक ऐसा व्यक्ति जो इस देश के प्रधानमंत्री के लिए अनपार्लियामेन्ट्री वगैरह तो बहुत सभ्य शब्द है, इतनी अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया, जोकि गाली देने से कम नहीं थे । एक ऐसा व्यक्ति जो मुख्यमंत्री होते हुए केन्द्र सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ सकता है, एक ऐसा व्यक्ति जो पूरी काउसिंल ऑफ मिनिस्टर्स के साथ कई दिनों तक लेफ्टिनेंट गवर्नर के आवास पर धरना दे सकता है, एक रोते हुए बच्चे की तरह कि मुझे झुनझुना दो, नहीं तो तब तक मैं यहाँ पर रोते रहूँगा और अपना पाँव पीटता रहूँगा । ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचिए कि यदि किसी स्टेज पर पूर्ण दर्जा दे दिया गया होता और उसके पास पुलिस तथा पब्लिक ऑर्डर जैसे विषय भी होते तो यह सोच कर भी रूह काँप जाती है कि शायद हम ऐसी स्थिति में गृह युद्ध के काफी करीब पहुँच सकते थे ।
यहाँ पर हमारे कानून के निर्माता हैं । उसके बाद जितनी भी सरकारें आईं, मैं उन सब के विवेक को बधाई देना चाहता हूँ । वे इस चीज को शुरू से ही समझ बैठे थे कि दिल्ली जहाँ पर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया बैठती है, वहाँ पर किसी प्रकार द्वंद्व संभव न हो, इसके लिए दिल्ली का यूनियन टेरिटरी रहना जरूरी है । इसका सीधा-सीधा कंट्रोल केन्द्र सरकार के पास हो, भारत सरकार के पास हो, वह बहुत ही आवश्यक है और वह इस बात की गारंटी है ।…(व्यवधान)
मैडम, मैं थोड़े ही समय में अपनी बात खत्म करूँगा ।
माननीय सभापति : आप अच्छा बोल रहे हैं ।
श्री बृजेन्द्र सिंह : मैडम, धन्यवाद । अब दिल्ली में सरकार की शक्तियाँ क्या हों, सरकार किसे कहें, एल.जी. और लेजिस्लेटिव असेम्बली में क्या संबंध हो, एल.जी. और काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के बीच शक्तियों और कर्तव्यों का बँटवारा कैसे हो, इस प्रकार के जुड़े सवाल हैं, जिनका जिक्र अभी किया गया । माननीय उच्चतम न्यायालय ने इसके ऊपर वर्ष 2018 में भी और वर्ष 2019 में भी दो जजमेन्ट्स दिए । एक जजमेंट कंस्टिट्यूशन बेंच का है और दूसरा डिविजन बेंच का है । यह जो अमेंडमेंट बिल लाया गया है, मेरा यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के जो जजमेंट्स थे, उनको अमलीजामा पहनाने का काम इस अमेंडमेंट के द्वारा किया जा रहा है ।
महोदय, जैसा मैंने शुरू में कहा कि सरकार को परिभाषित किया गया है, ताकि आपस में जो तकरार रहती है, वह सदा के लिए खत्म की जा सके । इसके साथ-साथ सरकार और प्रशासन में जो एक अस्पष्टता तथा अनिश्चितता रहती है, उसको दूर करने का एक पूरक प्रयास है । यहाँ पर मीनाक्षी लेखी जी ने भी जिक्र किया कि पानी किसी का आता है, सीवरेज किसी का है, बिजली का पोल कोई लगाता है, उस पोल के ऊपर मीटर कोई और लगाता है । इस प्रकार से प्रशासन में यहाँ बहुत-सी विसंगतियाँ हैं । मैं भी वर्ष 1985 से दिल्ली में रह रहा हूँ । मैं इतना इसकी जड़ में नहीं गया था, लेकिन कोरोना के टाइम में मुझे पहली बार पता लगा कि यहाँ केन्द्र सरकार के भी अस्पताल हैं, यहाँ राज्य सरकार के भी अस्पताल हैं और यहाँ म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के भी अस्पताल हैं । मुझे आज तक यह पता नहीं है कि कौन-सा अस्पताल किसका है, लेकिन इस प्रकार की यहाँ व्यवस्था है ।
जमीन एनडीएमसी के पास भी है, उसमें एमसीडी की भी है, उसमें दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी की भी है, उसमें मिनिस्ट्री ऑफ अर्बन डेवलपमेंट की भी है और कैंटोनमेंट बोर्ड की भी है, जो मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के पास है । इस तरह की जहां व्यवस्था हो, वहां एक चैन आफ कमांड कम से कम बड़ा स्पष्ट और क्लियर कट होना चाहिए । हम यह क्यों भूल जाते हैं, जब 1993 में पहली सरकार यहां गठित हुई, बीजेपी की सरकार बनी थी, उस समय करीब तीन साल तक इस देश के कांग्रेस पार्टी के नरसिम्हा राव जी प्रधान मंत्री थे, उसके बाद 15 साल शीला दीक्षित जी की सरकार रही, उस समय 6 साल केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी । ऐसी स्थिति जब थी, उस समय कुछ नोंक-झोंक तो हुई थी, लेकिन कभी भी संवैधानिक व्यवस्था टूट जाए, कांस्टीट्यूशनल ब्रेक डाउन हो जाए, ऐसी स्थिति कभी नहीं आई थी । वह स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, जो पिछले साढ़े सात साल में हुई है और उसी की वजह से ये अमेंडमेंट लाए गए हैं ।
इसी के साथ, मैं उम्मीद करता हूं कि इन संशोधनों के बाद एक ज्यादा कारगर और जवाबदेह प्रशासन दिल्लीवासियों को प्रदान किया जा सकेगा और दिल्ली को दुनिया के उच्चतम दर्जे के महानगरों में स्थान मिल पाएगा । इसीलिए, मैं सदन से अनुरोध करता हूं कि इस संशोधन बिल को पूरे बहुमत के साथ आप पारित करें और दिल्ली शहर का राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते जो गौरव है, उसे और ऊपर ले जाएं । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, जयहिंद ।
श्री हसनैन मसूदी (अनन्तनाग): मैडम चेयरपर्सन, मैं गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरेटरी ऑफ दिल्ली अमेंडमेंट बिल, 2021 के विरोध में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं । यह जो कदम उठाया जा रहा है, यह एक खुला आक्रमण है, दिल्ली की असेंबली को डिसएंपावर करने का प्रयास है । यह बिल्कुल एंटी फेडरल है । हमारे कांस्टीट्यूशन की जो फेडरलिज्म की बेसिक थीम है, यह उसके खिलाफ है । जम्मू-कश्मीर का भी 5 अगस्त, 2019 को इसी मामले का सामना हुआ । आईन का जो तकाजा था, यक्सर उसको भूलकर, नजरंदाज करके, आईन को रोल कर हमारा जो स्पेशल स्टैटस था, उस पर हमला किया गया । एक स्टेट को तीन हिस्सों में तकसीम किया गया । आर्टिकल 3 जो कांस्टीट्यूशन का था, आर्टिकल 370 था, 367 का दुरुपयोग करके वे सारे फैसले किए गए । ऐसा ही एक छोटा-मोटा फैसला यह भी है । इसमें उस दिन कहा गया कि 370 एक आरजी था । यह नहीं समझा गया कि 370 एक आरजी होता, तो कैसे वह व्यवस्था करता, कैसे उसमें कांस्टीट्यूशनल असेंबली का प्रोवीजन होता, एक इंडीपेंडेंट कांस्टीट्यूशन का जम्मू और कश्मीर के लिए प्रोवीजन होता । यह नहीं समझा गया कि अगर वह 370 टेम्परेरी होता, तो वह सारे पार्ट में जो 371 ए से जे तक हैं, वे भी टेम्परेरी थे । वे सारे एक ही पार्ट बी का हिस्सा हैं । बहरहाल मैं इस बिल पर आता हूं ।
मैडम, आज एक अजीब बात सुनने को मिली । जो कानून जानने वाले है, आईन जानने वाले हैं, कहा गया कि हमारा मुल्क क्वासी फेडरल है । यह बात पहले सुनने में नहीं आई थी । सुप्रीम कोर्ट ने साफ और वाजे अल्फाज़ में कहा है कि फेडरलिज्म हमारे कांस्टीट्यूशन का बेसिक फीचर है । यह जो हाउस है, इसको भी यह अख्तियार नहीं है कि वह फेडरलिज्म के साथ छेड़छाड़ करे । सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती केस में यह कहा है । उसके बाद भी जजमेंट्स आ गईं कि फेडरलिज्म हमारे आईन का बेसिक फीचर है और इसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है । हमारा जो संविधान है, कांस्टीट्यूशनल डेमोक्रेसी में कांस्टीट्यूशन सॉवरेन है, यह हाउस नहीं है । प्रयास क्या हो रहा है? दरअसल क्या हुआ, जो तकरीर भी यहां की गई, जो एड्रेस किया गया, उससे यह साफ जाहिर हुआ कि ये आप और बीजेपी अपनी जंग इस हाउस में लाना चाहते हैं । पानी किसी का है, नाला किसी का है । इस बिल का प्रयास वह सब हल करने का नहीं है । किया यह जा रहा है कि इलेक्टेड गवर्नमेंट के सारे पावर्स केंद्रित किए जा रहे हैं, सेंट्रलाइज किये जा रहे हैं । अगर ऐसी बात है, अगर आप इस फिराक में हैं कि असेंबली नहीं होनी चाहिए, तो असेंबली ही नहीं रखिए । सब कुछ लेफ्टीनेंट गवर्नर के हाथ में रखिए । एक लेजिस्लेटिव असेंबली रखने का मतलब ही क्या है? जब लेजिस्लेटिव असेंबली आपने रखी है तो उसका कांस्टीट्यूशन के तहत एक रोल है । उसको अपने लिए कानून बनाने का हक है । अगर मीनाक्षी जी या और जो भी यहां के ऑनरेबल मेंबर्स हैं, वे इस फिराक में हैं कि यह होना ही नहीं चाहिए, क्योंकि तीन बार या चार बार उनकी हार हुई है । अगर आप ऐसा फैसला करें, तो असेंबली मत रखिए । सब कहिए कि लेफ्टीनेंट गवर्नर ही सब होगा, जो हमारा एक नॉमिनी होगा ।
लेकिन देखिए यह क्या किया जा रहा है, धारा 24 में अमेंडमेंट्स करके लेफ्टिनेंट गवर्नर पर लाजिम किया गया है, एक तो उनको पॉवर दिया गया है कि असेन्ट विदहोल्ड करे । यह लाजिम किया गया है कि असेन्ट न दे, सेक्शन 24 में ए, बी और सी जोड़ दिया गया है, अब डी जोड़ा जा रहा है । डी क्या है? अगर उनको लगे कि कोई कानून incidentally covers any of the matters which fall outside the purview of the powers conferred on the Legislative Assembly. एक मौलिक ऐतबार हमारी जिम्मेदारी नहीं थी? हम किसी पार्टी के पक्ष में नहीं हैं । जब 5 अगस्त, 2019 के फैसले हुए थे, उसमें आपने हमारा अपोजिशन किया था । जब हमारे स्टेट को फ्रेगमेंट किया गया था । ये इस फिराक में थे कि दिल्ली का दर्जा बुलंद किया जाए ।
लेकिन कोई बात नहीं, हम बोल रहे हैं क्योंकि यह कन्सटीट्यूशनल क्वैश्चन है, जिसको भी लाभ हो । incidentally covers any of the matters which fall outside the purview of the powers conferred on the Legislative Assembly. यह लाजिम है कि लेफ्टिनेन्ट गवर्नर असेन्ट न दे । यह फैसला कौन करेगा कि यह इन्सिडेंटली है? प्राइमरली नहीं लिखा गया, प्रोमिनेन्टली नहीं लिखा गया, यहां बहुत जानने वाले लोग बैठे हुए हैं ।
इसका मतलब है कि असेम्बली की पॉवर को बिल्कुल ही खत्म कर दिया गया । असेम्बली को इस हक से भी महरुम किया गया कि वह अपने रूल्स बना सके । इस हाऊस के लिए रूल्स हैं कि कैसे प्रोसिजर चलेगा । 33 में प्रोवाइजो एड करने जा रहे हैं, "Provided that the Legislative Assembly shall not make any rule to enable itself or its Committees to consider the matters of day-to-day administration of the Capital or conduct inquiries…” पोस्ट फैक्टो में कहा गया कि अगर कोई कदम उठाया गया है तो इस एक्ट के बाद वह वॉइड होगा । …(व्यवधान)
माननीय सभापति : श्री ई. टी. मोहम्मद बशीर जी ।
श्री हसनैन मसूदी : सभापति महोदय, 44 में प्रोवाइजो किया गया है, "Provided that before taking any executive action in pursuance of the decision of the Council of Ministers or a Minister, to exercise powers of Government…,” यह लाजिम होगा कि आप लेफ्टिनेन्ट गवर्नर से असेन्ट लें । माननीय गृह मंत्री जी बार-बार कह रहे हैं कि लेफ्टिनेन्ट गवर्नर का रुतबा गवर्नर से ऊपर होता है । यह कैसी बात कर रहे हैं? लेफ्टिनेन्ट हर जगह प्रिफिक्स होता है, इसका मतलब है कि लेफ्टिनेंट गवर्नर से नीचे है ।
मनीष जी ने बिल्कुल सही कहा कि यह एक एडमिनिस्ट्रेटर की पोजिशन है, इस एडमिनिस्ट्रेटर को प्राइमरली और फोर्सफुली इनके मशवरे पर चलना है । लेजिस्लेटिव असेम्बली को कानून बनाने का हक है, दिल्ली में सब उल्टा किया जा रहा है । यह फेडरलिज्म के बेसिक स्ट्रक्चर के खिलाफ है ।
SHRI E.T. MOHAMMED BASHEER (PONNANI): Madam Chairperson, I thank you for giving me this opportunity.
Madam, I differ with this piece of legislation for three pertinent reasons. First of all, this Bill tantamounts to giving extra-constitutional power to the Lieutenant Governor. Secondly, it will disable the elected Government of Delhi. Thirdly, it is emasculating the power of the democratically elected Government of Delhi.
I was closely listening to the speeches made by our friends from the other side. Actually, they were using the major chunk of the time to criticize the AAP Government in Delhi. Of course, they are at liberty to do it. I am not against it. They were talking about their role in anti-CAA agitation, failure of AAP Government in development activities etc. It shows that there is every reason to believe that they want to settle an account with AAP. In politics, it is natural. But why should they use the sanctity of this House for their political interest? If they have got any difference of opinion with the Government of Delhi led by AAP, they can fight them democratically and find out a solution. On the other hand, if they try to equip the Lieutenant Governor and strengthen him to teach a lesson to the AAP Government, that is a bad thing. That is why, I vehemently object this piece of legislation.
Madam, I would like to say that it amounts to nullifying the Supreme Court order. This case was settled. This dispute between the Delhi Administration and the Central Administration was widely discussed in the Supreme Court. Finally, the Supreme Court arrived at a conclusion that ‘Delhi Government can take decisions within its jurisdiction and execute them without obtaining the concurrence of the Lieutenant Governor.’ It also added that ‘the elected Government of Delhi can take all decisions within its jurisdiction and execute them without obtaining the concurrence of the Lieutenant Governor. In case of difference of opinion on matters between the Lieutenant Governor and the Government, the former should make all efforts to resolve it and only in extreme cases, should she or he refer the matter to the President of India.’ This is very clear.
So, what I am saying is that the Centre should not interfere in these kinds of things. But there is a dangerous move by them. What is that move? If we go through the various clauses of this legislation, you would easily understand that it is an effort in tightening the grip of the Central Government on the Delhi Government.
Similarly, the Central Government is trying to govern the Delhi Administration through the Lieutenant Governor. It is a new style of the BJP Government to rule through the Governors. Here, it is a Lieutenant Governor. These kinds of things should not be there.
I would like to say that this Government is recklessly jeopardising the basic principles of federal cooperation. That is also a very dangerous move. So, I would humbly appeal to this Government to kindly think in practical terms. Ours is a democracy. You can fight with your opponents, but taking this kind of a crooked method, is highly condemnable.
With these few words, Madam, I conclude my speech. Thank you very much.
श्री भगवंत मान (संगरूर): माननीय सभापति जी,आपका बहुत धन्यवाद । आज जो बिल दिल्ली सरकार के बारे में लाया गया है,वैसे तो केंद्र सरकार राज्यों के अधिकार का हनन करने की स्पेशलिस्ट है,चाहे वह खेती कानून के जरिए हो, जो स्टेट सब्जैक्ट है,लेकिन वाणिज्य, व्यापार लिखकर यहां से पास कर दिया गया,चाहे वह राज्यपालों के जरिए हो ।
सभापति जी,आप मुझे समय दे दीजिएगा क्योंकि मैं आम आदमी पार्टी से बिलाँग करता हूं और हमारी सरकार को शक्तिहीन करने का यह बिल है । मैं सबका बहुत धन्यवाद करता हूं जिन्होंने इस बिल का विरोध किया है, क्योंकि कल बारी किसी की भी आ सकती है ।
माननीय सभापति जी,22-23 साल से दिल्ली से बीजेपी सत्ता से बाहर है । इनको हार हज़म नहीं हो रही है । खुद इलेक्शन भी लड़ते हैं,ठीक है,डेमोक्रेटिक सबका राइट है । वैचारिक मतभेद हो सकते हैं । आप हार गए तो विपक्ष में बैठना चाहिए । आप पहले इधर भी तो विपक्ष में बैठते थे । अब बीजेपी की विपक्ष में बैठने की आदत छूट रही है । मध्य प्रदेश में बीजेपी के लिए लोगों ने वोट नहीं किया था, चुनाव से नहीं आते, वहां उप-चुनाव से आ जाते हैं । कर्नाटक में बीजेपी के लिए वोट नहीं किया था, उप-चुनाव से आ जाते हैं । वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने फैसला दिया कि तीन विषयों को छोड़कर बाकी सब दिल्ली की चुनी हुई सरकार चलाएगी, तो लाट साहब का … * क्यों यहां लाया जा रहा है?
आपको पता है,मैडम, जिस घर में एलजी रहते हैं, अंग्रेजों के जमाने में वहां वायसराय रहते थे । शायद उसी वायसराय की आत्मा के जरिए आप दिल्ली को चलाना चाहते हैं । जब दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई फैसला नहीं ले सकता फिर इलैक्शन करवाने का फायदा क्या हुआ? आप मुझे बता दीजिए ।
उस आदमी को,जो मैगसेसे अवार्ड विनर है, उसको … * पता नहीं, ये,वो …(व्यवधान) वह ऐसा आदमी है, जिसने दिल्ली की जनता को कहा कि मेरा पांच साल का काम देख लो, अगर काम अच्छे लगते हैं तो वोट कर देना वरना नहीं । क्या आप कर सकते हैं? इसके लिए जिगरा चाहिए । आप जो कहते थे, वह तो जुमले थे, 15 लाख कालाधन, जुमले थे । अपने मैनिफेस्टो में पूर्ण राज्य की बात करते रहे । आडवाणी जी बात करते रहे, वह अलग बात है उनकी हर बात उल्ट चलती है । शायद आडवाणी जी भी दुखी हो रहे होंगे कि यह क्या हो रहा है? दुखी किस बात से? असल में क्या हुआ, ये दुखी किस बात से हैं? दो-तीन बार तो मुख्य मंत्री जी के घर पर दरोगा भेज कर रेड करवा दी । पहले हमसे एंटी करप्शन ब्यूरो छीन ली । अब आपको क्या दिक्कत है? आपको विपक्ष में बैठने से क्या दिक्कत है? आपकी आठ सीटें हैं, आठ एमएलएज हैं, आप वहां रखें । यहां बिट्टू जी बैठे हैं, आपने यहां पर कांग्रेस को एलओपी का दर्जा नहीं दिया । लेकिन, हमने, जब आपके तीन विधायक थे, उनको भी एलओपी का दर्जा दिया था । भले ही तीन थे, लेकिन लोकतंत्र है । हालांकि परसेंटेज के मुताबिक बहुत कम थे । मैं यह कहना चाहता हूं कि जब हमने स्टेडियम नहीं दिए किसानों को, आपने वहां पर जेल बनाने के लिए स्टेडियम मांगे थे, तब से हमारे मुख्य मंत्री जी और हमारी सरकार से नाराज चल रहे हैं । सरकार कौन चलाता है? यह तो सबको पता है । आप मुझे यह बता दीजिए, मेरे सामने साक्षी महाराज जी बैठे हैं, कुछ दिन पहले इनका बयान आया था कि अब देश में चुनाव ही नहीं होने चाहिए । कल वह बिल भी ले आएंगे कि देश में चुनाव ही न हो । पुतिन की तरह 2036 तक मोदी जी रहेंगे । आप इसको फेडरल स्ट्रक्चर कह रहे हैं? मीनाक्षी जी आप कह रही हैं कि फेडरल स्ट्रक्चर से हमारा देश नहीं चलता है । आप मुझे बता दीजिए कि क्या तानाशाही से चलेगा? …(व्यवधान) आप वकील हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप यहां केस लड़ रही हैं । आप लोकतंत्र की … * कर रहे हैं । …(व्यवधान) कल आप कह देंगे कि जो राज्य सभा में …(व्यवधान)
माननीय सभापति: ‘हत्या’शब्द रिकॉर्ड में नहीं जाएगा ।
…( व्यवधान)
श्री भगवंत मान : राज्य में चुने हुए, दिल्ली के जो तीन सांसद हैं,वे किसी वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सकते हैं । वे किसी डिबेट में भाग नहीं सकते हैं,क्योंकि उनको तो उन एमएलएज ने चुना है,जिनके पास शक्ति नहीं है । आप देश को किस तरफ लेकर जा रहे हैं? थोड़ा-बहुत ख्याल कीजिए । …(व्यवधान)
माननीय सभापति: “हत्या’ शब्द रेकॉर्ड में नहीं जाएगा ।
…( व्यवधान)
श्री भगवंत मान: मैं यही कहना चाहता हूं कि दिल्ली देश का दिल है । मैं दिल्ली के स्कूलों और दिल्ली के अस्पतालों के बारे में बताना चाहता हूं । दिल्ली के 73 परसेंट घरों में बिजली का बिल जीरो आता है । दिल्ली में,जहां 70 सालों तक पानी नहीं पहुंच पाया था,वहां तक हमने पानी पहुंचा दिया । प्रधान मंत्री जी जिस ट्रंप के लिए वहां पर प्रचार करके आए थे,उनकी पत्नी एमसीडी के स्कूल देखने आई थी । स्कूल दिखाया केजरीवाल जी का और केजरीवाल जी को बैन कर दिया कि वहां नहीं आ सकते । दिल्ली के अस्पतालों में इलाज फ्री है । दिल्ली में एक जज का बेटा,एक रिक्शे वाले का बेटा,एक डिप्टी कमीशनर का बेटा एक ही बेंच पर पढ़ रहे हैं,क्योंकि केजरीवाल जी और मनीष सिसोदिया जी ने शिक्षा प्रणाली को …(व्यवधान)
मैडम,एक मिनट तो दे दीजिए, जितनी देर मीनाक्षी जी घंटी बजने के बाद बोली थीं, उतना समय तो दे दीजिए । इनको क्या हो रहा है? आप दिल्ली को … * तरीके से लाट साहब के … * से चलाना चाहते हैं । यह बिल्कुल गैर संवैधानिक है । यह संविधान की … * है । …(व्यवधान) यह लोकतंत्र की … * है । …(व्यवधान) इस बिल को तुरंत वापस लेना चाहिए । …(व्यवधान) अगली बार तुम जीत लेना …(व्यवधान) देश की हिस्ट्री में पहली बार हुआ है कि कोई सरकार 90 परसेंट से ज्यादा बहुमत लेकर आई है । …(व्यवधान) आप अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं । हारना सीखिए, वरना, फ्यूचर में आप इतनी बड़ी हार झेल नहीं पाएंगे ।
माननीय सभापति: इतना क्यों चिल्लाते हैं । यही बात अच्छे से बोलिए । ऐसे नहीं बोला जाता है ।
श्रीमती मीनाक्षी लेखी : माननीय सभापति जी,अभी मेरे साथी सांसद ने कहा कि स्कूल के एक ही बेंच पर एक डिप्टी कमीशनर का बच्चा, एक जज का बच्चा और एक रिक्शे वाले का बच्चा साथ में बैठते हैं,मैं उन बच्चों की और उनके माता-पिता की जानकारी इनसे प्राप्त करना चाहती हैं । मुझे ये डिटेल दें और स्कूल का नाम बताएं । …(व्यवधान)
16.59 hrs (Shri Rajendra Agrawal in the Chair) श्री जसबीर सिंह गिल (खडूर साहिब):धन्यवाद सभापति महोदया, दिल्ली प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार है,मैं न तो उसका समर्थक हूं,न उससे प्यार करता हूं ।
मगर, एक आदमी सरकार में एंटी करप्शन के प्लैंक के आधार पर आए,मगर, उसकी धज्जियां उड़ाईं ।
17.00 hrs इसके बावजूद भी हमें यह हक नहीं है कि हम एक आदमी के इगो या उसके झूठ की सजा पौने दो करोड़ दिल्ली वालों को दें । पिछले छः इलेक्शन्स से दिल्ली में इनकी सरकार नहीं आई है । मगर जहां-कहीं भी सरकार नहीं आती है, इनको वहां पर सरकार बनानी होती है । कर्नाटक में क्या हुआ? मणिपुर में क्या हुआ? मध्य प्रदेश में क्या हुआ? वहां पर बाई इलेक्शन नहीं हो सकें, इलेक्शन में नहीं आए और बाई इलेक्शन में भी नहीं आए, तो फिर ऐसे-ऐसे काम होते हैं, जैसे लाड साहब सीधे डीजीपी या चीफ सेक्रेटरी को बुलाना शुरू कर देते हैं । यह पंजाब में हुआ, यह बंगाल में हुआ । अगर यह भी नहीं होता है, तो फिर कोई … * पैदा हो जाता है । अगर यह भी नहीं होता है, तो ईडी जैसे विभागों से नोटिस आने शुरू हो जाते हैं । यही वजह है कि आज हम इस जगह पर पहुंच गए हैं कि स्टेट्स ने आर्डर पास कर दिए हैं कि यहां पर सीबीआई रेड नहीं करेगी ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति:कोई भी नाम रिकॉर्ड में नहीं जाएगा ।
…( व्यवधान)
श्री जसबीर सिंह गिल : महोदय, यहां पर एक मेंबर ने बोलते हुए बताया है कि केरल में ईडी के खिलाफ केस दर्ज कर दिया गया है ।…(व्यवधान) देश में ऐसे हालात क्यों पैदा हो रहे हैं?यह चिंता का विषय है । हमें इसके बारे में सोचना चाहिए । हमारा देश इसलिए नहीं बना है,इस देश का आपसी भाईचारा सबसे जरूरी है । हम किसी भी पार्टी से आएं,किसी भी रीज़न से आएं,लेकिन मैंने कभी-भी केन्द्र और स्टेट्स का तकरार नहीं देखा है ।
माननीय सभापति महोदय, यह सरकार एक नया काम कर रही है,दिल्ली में एक सुपर सीएम बनाया जा रहा है । वह सुपर सीएम जिसने कोई पर्चा नहीं भरा है,जिसने वोट नहीं मांगें हैं,जिसने इलेक्शन नहीं लड़ा है,उसे वोट का मूल्य नहीं पता है । आज वह लोगों की समस्या का हल नहीं कर पाएगा । हमें चुनी हुई सरकार को काम करने देना चाहिए ।
सभापति महोदय, मेरी आपके माध्यम से सरकार से यह गुज़ारिश है कि हम इसमें जो नया प्रावधान करने जा रहे हैं,विधान सभा की शक्तियां खत्म कर रहे हैं कि वह अपना कानून भी नहीं बना सकती है । फिर इसको राज्य का दर्जा क्यों देना है? यहां तक की विधान सभा भी क्यों बनानी है? वर्ष 1991 में जो था,हम वैसे ही ले आएं,सीधा महामहिम राष्ट्रपति जी इसको चलाएं । यहां पर कई माननीय सांसदों ने कहा है,जो ट्रेजेरी बेंचों से बोल रहे थे । उन्होंने कहा है कि एलजी का प्रशासक का दर्जा है । अगर आप एक्ट को ध्यान से पढ़ेंगे, तो उसमें लिखा है कि उसका प्रशासक का नहीं, बल्कि पार्शली प्रशासक का दर्जा है । मैं यह विनती करना चाहता हूं कि सरकार को स्टेट्स को स्ट्रॉन्ग करना चाहिए, उनको तगड़ा करना चाहिए, उनको सपोर्ट करना चाहिए । अगर स्टेट्स तगड़े होंगे, स्टेट्स डेवलेप्ड होंगे, तो देश तगड़ा होगा । इसलिए, मैं इस बिल का विरोध करते हुए अपनी वाणी को समाप्त करता हूं ।
श्री जी. किशन रेड्डी: सभापति महोदय, आज चर्चा करते हुए बहुत से माननीय सदस्यों ने यहां पर अपना-अपना मत रखा है । कांग्रेस पार्टी के माननीय सांसद मनीष तिवारी जी,जसबीर सिंह गिल जी और बीएसपी से दानिश अली जी ने बोला है । अभी वह यहां पर नहीं हैं ।
एसपी से जनाब एस.टी. हसन साहब, नेशनल कांफ्रेस पार्टी से जनाब हसनैन मसूदी साहब, आप पार्टी से भंगवत मान, शिवसेना से आदरणीय विनायक राऊत जी, वाईएसआरसीपी से चन्द्रशेखर जी, एनसीपी से सुप्रिया सुले जी, भारतीय जनता पार्टी से बहन मीनाक्षी लेखी जी और बृजेन्द्र सिंह जी ने अपना-अपना मत रखा है ।
सभापति महोदय, मैं आपको फंडामेंटली एक क्लियेरिटी देना चाहता हूँ । दिल्ली यूनियन टेरिटरी है । इसको सब लोगों को समझना चाहिए । ये लोग दूसरी स्टेट से दिल्ली को कंपेयर कर रहे हैं, जो कि गलत है । दिल्ली UT with Legislative Assembly with limited legislative powers के साथ है । यहां दूसरे स्टेट की तरह अधिकार नहीं हैं । इस संसद को अधिकार है । अगर यू.टी. है तो इस संसद को कॉन्स्टिट्यूशन के आधार पर यूनियन टेरिटरी पर अधिकार होता है । यहां पर सभी लोगों ने बड़े-बड़े शब्द यूज किए कि प्रजातंत्र की हत्या हो रही है, डिक्टेटरशिप हो रही है । मैं इन राजनीतिक बातों में नहीं जाऊंगा । कांग्रेस की सरकार में सन् 1991 में यू.टी. बनाए गए । यू.टी. बनाते समय आर्टिकल 239(ए)(ए) और आर्टिकल 239(ए)(बी) को कॉन्स्टिट्यूशन में जोड़ा गया । उस समय तात्कालीन गृह मंत्री आदरणीय एस.बी. चव्हाण साहब ने इस संसद में इसी बिल के संदर्भ में व्यक्तव्य दिया था । मैं उनके विचारों को आपके माध्यम से यहां कोट करना चाहूंगा । कांग्रेस सरकार ने दिल्ली को यू.टी. बनाने के साथ-साथ यहां असेंबली बनाने के लिए बालाकृष्ण कमेटी का गठन किया । उस बालाकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली को असेंबली दी गई । दिल्ली को जनरल असेंबली नहीं बल्कि यूनियन टेरिटरी की असेंबली दी गई । आदरणीय गृह मंत्री एस.बी. चव्हाण जी ने जो स्टेटमेंट दिया था, उसको में कोट करना चाहता हूँ । चव्हाण साहब ने कहा कि:-
“Any arrangement that involves a Constitutional division of functions and responsibilities between the Union and Delhi Administration will be against the national interest and should be ruled out, and therefore, Delhi should continue to be a UT with Legislative Assembly with appropriate powers. The subject of public order, police and land should be retained with the Central Government as they are matters of vital importance for which responsibility cannot be divided.” माननीय सभापति महोदय, सन् 1991 में तत्कालीन गृह मंत्री श्री एस.बी. चव्हाण जी के विचारों से यह पूर्ण रूप से स्पष्ट होता है कि उस समय काफी विचार-विमर्श करके अलग-अलग तर्कों को प्रस्तुत होने के बाद राष्ट्र हित में और दिल्ली में सुचारू रूप से प्रशासन हेतु दिल्ली को UT with Legislative Assembly with limited legislative powers दिए गए । यह हमने नहीं दिए, बल्कि कांग्रेस पार्टी ने दिए हैं । कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बनाने का निर्णय किया है । सन् 1991 से लेकर अब तक सब सही चल रहा था, लेकिन कुछ सालों से इस विषय पर लोग हाई कोर्ट गए, लेकिन हम नहीं गए । भारत सरकार नहीं गई । जब कांग्रेस पार्टी की सरकार थी, तब ही हाईकोर्ट में गए, सुप्रीम कोर्ट में गए, क्योंकि इसमें अस्पष्टता है । क्लियेरिटी नहीं है ।
हाई कोर्ट ने भी बार-बार फैसला सुनाया । इसलिए मैं आपको बताना चाहता हूं कि संविधान के आर्टिकल 239एए के तहत महामहिम राष्ट्रपति महोदय दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटर को लेफ्टिनेंट गवर्नर के तौर पर नियुक्त करते हैं । दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटर को राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं, यह जनरल गवर्नर नहीं है, यह एडमिनिस्ट्रेटर है । इसलिए एडमिनिस्ट्रेटर को डे-टू-डे एक्टिविटीज में, एडमिनिस्ट्रेशन के सन्दर्भ में उनके पास अधिकार रहते हैं । ये अधिकार हमने नहीं दिए हैं, वे कांग्रेस पार्टी सरकार में दिए गए हैं, यह आपको समझना चाहिए ।
सभापति जी, संविधान के इस प्रॉविजन को सप्लीमेंट करने के लिए संसद द्वारा जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 लाया गया । इस एक्ट में दिल्ली विधान सभा के कामकाज और लेफ्टिनेंट गवर्नर की मंत्रिपरिषद के कामकाज के बारे में पूरी डिटेल्स बताई गई हैं । हमने नहीं बताया, पहले ही 1991 में बताया गया है । हम इसमें कुछ क्लैरिटी लाने का प्रयास कर रहे हैं । मगर किसी का कोई अधिकार नहीं छीना जा रहा है, कोई प्रजातंत्र की हत्या या अन्य कुछ इस पार्लियामेंट के द्वारा, इस अमेंडमेंट के द्वारा नहीं हो रहा है । गलत प्रचार नहीं करना चाहिए । यह गलत है । बार-बार मोदी सरकार के ऊपर विपक्ष के नेता यह कहते हैं – डिक्टेटर, प्रजातंत्र की हत्या । ऐसी एक आदत बन गई है । यह गलत है, यह आदत नहीं रहनी चाहिए ।
सभापति जी, जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 के सेक्शन 44 में दिए गए अधिकारों के तहत भारत के महामहिम राष्ट्रपति जी ने रूल्स, 1993 और ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस (जीएनसीटीडी) रूल्स इश्यु किए हैं, जिनके तहत बताया गया है कि यदि लेफ्टिनेंट गवर्नर की मंत्रिपरिषद या किसी एक मंत्री से कोई अलग राय है तो क्या प्रक्रिया होगी । अगर स्टेट गवर्नमेंट की मिनिस्ट्री और दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटर या लेफ्टिनेंट गवर्नर से कोई मतभेद है तो उसमें भी क्लैरिटी है । इस एक्ट में पूरा अधिकार एडमिनिस्ट्रेटर को नहीं दिया गया है । मैं 1991 वाले एक्ट के बारे में बता रहा हूं । हम किसी का कोई अधिकार नहीं छीन रहे हैं और किसी को कोई नया अधिकार नहीं दे रहे हैं । हम स्टेट गवर्नमेंट से कोई अधिकार नहीं छीन रहे हैं और कोई नया अधिकार दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटर या लेफ्टिनेंट गवर्नर को इस अमेंडमेंट के द्वारा नहीं दे रहे हैं । मगर उसमें यह क्लैरिटी है कि अगर मिनिस्ट्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच कोई मतभेद है तो उस विषय को लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब सीधे-सीधे महामहिम राष्ट्रपति को भेज सकते हैं । इसमें उनका कोई अधिकार नहीं है, वे उसे सिर्फ महामहिम राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं । लेकिन अगर कोई इमरजेंसी है, इमरजेंसी के अंदर महामहिम राष्ट्रपति से उसकी क्लैरिटी आने में, सम्मति आने में देरी हो सकती है, तब उस समय वह कुछ निर्णय ले सकते हैं । यह क्लैरिटी 1991 वाले एक्ट में भी है, यह नई चीज नहीं है ।
सभापति जी, लेफ्टिनेंट गवर्नर को मंत्रिमंडल के ऊपर कोई अधिकार नहीं है, यह क्लॉज किसने लगाया? यह हमने नहीं लगाया । यह क्या क्लॉज लगाई गई है? अगर मंत्रिमंडल ने कोई निर्णय लिया, उस निर्णय के ऊपर अगर मंत्रिमंडल और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच कोई मतभेद है तो उस मतभेद को क्लैरिफाई करने के लिए, फाइनल निर्णय लेने के लिए महामहिम राष्ट्रपति के पास भेजना चाहिए । यह प्रॉविजन एक्ट के अंदर हम नहीं लाए हैं, यह उसमें पहले से ही है । …(व्यवधान) हम उसमें क्लैरिटी ला रहे हैं । जो एम्बिग्युटी है, जो सुप्रीम कोर्ट ने भी बताया है, उसके विषय में मैं आ रहा हूं । जब तक महामहिम राष्ट्रपति जी का निर्णय नहीं आता है और लेफ्टिनेंट गवर्नर को लगता है कि विषय का अर्जेंट नेचर है और उस पर उन्हें तुरंत कार्रवाई करने की आवश्यकता है तो अपनी समझ के अनुसार जो जरूरी निर्देश देना हो, उसके लिए आदेश वह जारी कर सकते हैं । जो दिल्ली असेम्बली है, उसकी जनता के विकास के विषय पर, डे-टू-डे एक्टिविटीज के विषय पर, दिल्ली की जनता के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के विषय पर और सोशल वेलफेयर एक्टिविटीज के विषय पर ज्यादा जिम्मेदारी रहती है । इसीलिए भारत सरकार इस अमेंडमेंट के द्वारा किसी का एक भी अधिकार नहीं छीन रहे हैं । यह मैं आपके माध्यम से, सदन के माध्यम से दिल्ली की जनता को और देश की जनता को स्पष्ट करना चाहता हूं ।
सभापति जी, दानिश अली जी बोल रहे थे । This Bill is as per the constitutional scheme of things. बार-बार हाई कोर्ट ने कहा है एम्बिग्युटी रहना चाहिए, लेफ्टिनेंट गवर्नर के क्या अधिकार हैं, असेम्बली के क्या अधिकार हैं । …(व्यवधान) मैं बताता हूं । मैं उसी विषय पर आ रहा हूं । …(व्यवधान)
श्रीमती सुप्रिया सदानंद सुले : एम्बिग्युटी नहीं क्लैरिटी होनी चाहिए ।…(व्यवधान)
माननीय सभापति : माननीय मंत्री जी, शायद आपने क्लैरिटी की जगह एम्बिग्युटी शब्द बोल दिया होगा ।
श्री जी. किशन रेड्डी: जी, हां । हम एम्बिग्युटी को क्लैरिटी देना चाहते हैं । …(व्यवधान)
मैं दक्षिण से आता हूं, मगर हिन्दी में बोल रहा हूं ।
माननीय सभापति : आप बोलिए, आप अच्छा बोल रहे हैं ।
SHRI G. KISHAN REDDY: Under Article 239 of the Constitution, the Lieutenant Governor is the Administrator of the Union Territory. His position is different from the Governor of other States. He has independent Executive powers. He has the authority to refer matters, where he disagrees with the elected Government of the State, to the President whose decision is final as per Article 239AA(4). अल्टीमेटली लेफ्टिनेट गवर्नर का, एडमिनिस्ट्रेटर का फाइनल नहीं है, महामहिम राष्ट्रपति जी का अधिकार फाइनल होता है । इसमें कोई एम्बिग्युइटी है, तो बताइए । The hon. court has endorsed the above position. जो वर्ष 1991 में कांग्रेस पार्टी ने एक्ट बनाया,कोर्ट ने भी उसको एंडोर्स किया है ।
Coming to cooperative federalism, the Bill promotes cooperative federalism and will improve the coordination with the GNCTD consistent with its status as a Union Territory. कुछ लोगों ने बोला कि अधिकार छीने गए हैं,लेकिन हमने कोई अधिकार नहीं छीना है, हम अधिकार में क्लेरिटी देना चाहते हैं । Secondly, the proposed amendment does not amend the Constitution.
It is totally in tune with the court judgements. मैं सुप्रीम कोर्ट के बारे में बताना चाहता हूं । In the State NCT Delhi versus Union of India, 2020/12/SCC/259, it says:
“Where Lieutenant Governor differs with his Minister, Lieutenant Governor is supposed to refer the matter to the President for decision and act according to the decision given by the President.” The Supreme Court has given the decision. It means that the Council of Ministers is supposed to convey its decision to the Lieutenant Governor to enable the Lieutenant Governor to frame his view thereupon. The decision cannot be implemented without referring the same to the Lieutenant Governor in the first instance. The decision here touches upon the Government of UT.
Sir, I may tell the House about the other court judgement. In the State NCT Delhi versus Union of India, 2018/SCC/501, 2018/SCC Online/SC/661 at page no. 649, it says:
“Articles 239A and 239AB read with provisions of the GNCTD Act, 1991 and corresponding 1993 TBR indicates that the Lieutenant Governor, being the administrative head, shall be kept informed with respect to all decisions taken by the Council of Ministers…...” जो निर्णय लेते हैं, हमने आज भी अमेंडमेंट एम्बिग्युइटी हटाने के लिए यही बताया है, जो निर्णय मंत्रिपरिषद लेती है, उसको लेफ्टिनेंट गवर्नर को समय-समय पर बताना चाहिए । यही इसमें कोर्ट ने भी एंडोर्स किया है । It says :
‘.. so as to keep him apprised in order to enable him to exercise the powers conferred upon him under Article 239AA(4) and proviso thereafter.’ Another judgement in Government of NCT of Delhi vs. Union of India 2018 was this. The scheme as delineated by 1991 Act and 1993 Rules clearly indicate that the Lieutenant Governor has to be kept informed of all proposals, agendas – I am talking of before meeting agendas only – of meeting and decisions taken. पहले ही बताना चाहिए,निर्णय लेने के बाद बताना चाहिए,यह माननीय हाई कोर्ट ने भी एंडोर्समेंट किया है । The communication of all decisions is necessary to enable the Lieutenant Governor to perform duties and obligations to oversee the administration of GNCTD and where he is of a different opinion, he can make a reference to the President. उसमें भी बताया गया है कि राज्य सरकार,कैबिनेट या असेम्बली ने कोई निर्णय लिया है, अगर उसमें किसी एडमिनिस्ट्रेटर ने डेफर किया,तो वह उस विषय पर महामहिम राष्ट्रपति जी को भेज सकते हैं । इस अधिकार पर माननीय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने भी बारबार क्लैरिटी दी है । The Delhi Netaji Subhas University of Technology Bill, 2015 के संदर्भ में भी स्टेट गवर्नमेंट ने जो अमेंडमेंट्स किए हैं, वे अमेंडमेंट्स स्वीकार किया है, मेरे पास डिटेल्स हैं ।
आज देश में तीन तरह से राज्यों की एडमिनिस्ट्रेटिव और लेजिस्लेटिव व्यवस्था है । हम सभी को यह समझना चाहिए । यह उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कोई संबंध नहीं है, उत्तर प्रदेश की सरकार अलग है, उनकी असेम्बली का अधिकार अलग है और दिल्ली की असेम्बली का अधिकार अलग है । हरियाण की असेम्बली का अधिकार अलग है और दिल्ली की असेम्बली का अधिकार अलग है । Full-fledged States, like UP, Madhya Pradesh, Andhra Pradesh, Himachal Pradesh, have different rights. देश में यूनियन टेरिटरीज हैं – अंडमान,लक्षद्वीप,चंडीगढ़ आदि, वे अलग हैं । UTs with Legislative Assemblies with limited powers, अभी तीन प्रांत हैं – दिल्ली,पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर भी है । जम्मू-कश्मीर अभी नया बना है । ये तीन UTs with Legislative Assemblies with limited powers. पूरे देश में जो असेम्बलीज चलती हैं, उस विषय पर बात करते हैं कि प्रजातंत्र की हत्या हुई, यह गलत है । उनके पास लिमिटेड पावर्स हैं, उसके आधार पर ही सरकार चलानी पड़ेगी,क्योंकि जो अधिकार,जो कंस्टीटूशन,इस असेम्बली में, इस संसद ने बनाए हैं, इस संसद का जो आदेश है, निर्णय है, जो एक्ट है, जो भी स्टेट्स हैं, उसका पालन करना पड़ेगा । हम बात कर सकते हैं, हम भाषण दे सकते हैं, लेकिन उसके आधार पर इस संसद का एक्ट नहीं बदल सकते हैं । स्टेट्स के अधिकार अलग-अलग हैं, यूनियन टेरिटरीज के अधिकार अलग-अलग हैं और यूनियन टेरिटरीज विथ असेम्बली के अधिकार अलग-अलग हैं । हमें ये सब समझना चाहिए,क्योंकि हम पढ़े-लिखे लोग हैं, रिस्पेक्टेड ऑनरेबल मैम्बर्स हैं, यह समझ कर बोलना चाहिए । अगर हमारी गलती है, तो हम उसे मानने के लिए तैयार हैं । अगर बिना गलती के गालियां देंगे,तो हम उसे सुनने वाले नहीं हैं ।
According to the Constitution and NCT of Delhi Act, 1991, NCT of Delhi is a Union Territory with Legislature with limited powers. ऑनरेबल कोर्ट ने सभी निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि दिल्ली एक यूनियन टेरिटरी है । इस अमेंडमेंट का उद्देश्य सिर्फ अस्पष्टता को हटाने के लिए उत्पन्न हुआ है । यहां सभी प्रस्तावित संशोधन कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्णयों के अनुरूप हैं । कोई गलत नहीं है । इसी से दिल्ली के लोगों का भला होगा और प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर होगी । The proposed amendment in the Act shall create a sound Government’s mechanism in the NCT of Delhi which will improve equity and inclusiveness, and the amendments proposed will lead to transparency and clarity in governance in the NCT of Delhi and thus enhance public accountability.
सभापति महोदय, यह जीएनसीटी एक्ट 1991 में संसद के द्वारा बनाया गया था । इस एक्ट पर लगातार फोरम में चर्चा हो रही थी । यह हमारे कारण नहीं हुआ है । हम ने यह एक्ट नहीं बनाया है । यह मोदी सरकार ने भी नहीं बनाया है, इसे अमीत शाह जी ने नहीं बनाया है, इनसे पहले राजनाथ सिंह जी थे,राजनाथ सिंह जी ने भी यह नहीं बनाया है । यह वर्ष 1991 में, कांग्रेस के जमाने में एस. बी.चौहान जी, होम मिनिस्टर थे, उस जमाने में यह बनाया गया था । जीएनसीटी एक्ट के बारे में ऑनरेबल दिल्ली हाई कोर्ट में और ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट में केसेज फाइल हुए । कोर्ट में अनेक बार उस पर सुनवाई हुई । ऑनरेबल हाई कोर्ट ने और ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट ने जेएनसीसी एक्ट के बारे में जजमेंट सुनाई ।
पार्लियामेंट में यह एक्ट बनने के बाद, अलग-अलग फोरम पर इस एक्ट के बारे में चर्चा हो रही थी । कोर्ट जजमेंट सुनाती थी, लेकिन पार्लियामेंट स्पेक्टेटर जैसा नहीं रहेगा, क्योंकि इस पार्लियामेंट ने ही इस एक्ट को बनाया है । पार्लियामेंट की यह जिम्मेदारी बनती है, इस एक्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट में धरना होता है, इसके साथ ही राजभवन में भी 10 दिनों तक धरना होता है । इस एक्ट पर अलग-अलग फोरम पर इस एक्ट के बारे में चर्चा हो रही थी, आप लड़ लीजिए, लेकिन हम एक्ट को नहीं छोड़ेंगे । इसलिए हमें क्लैरिटी देनी पड़ेगी, यह पार्लियामेंट की रिस्पॉन्सिब्लिटी है । हमने जो एक्ट बनाया, जो एम्बिग्युइटीज है, उसे निकालना होगा, इस पर क्लैरिटी हो इसलिए आज यह एक्ट लाया गया है ।
माननीय सभापति जी, इस अमेंडमेंट का प्रमुख लक्ष्य एनसीटी दिल्ली, 1991 में जो एम्बिग्युइटीज है, इंटरप्रिटेशंस में दिक्कत आ रही हैं, उसे दूर करना है । ड्यूटी और रिस्पॉन्सिब्लिटी पर मोर क्लैरिटी देना है । कंफ्लिक्टिंग एंड अंडरस्टैंडिंग पर समाधान लाना है । मिस अंडरस्टैंडिंग को दूर करना, मोर क्लैरिटी के साथ एडमिनिस्ट्रेशन एंड रजिस्ट्रेशन में अपनी-अपनी जिम्मेदारी को निभाना, कंफ्यूजंस में क्लैरिफिकेशन लाना, यह मोदी सरकार का काम है । इसीलिए इसमें राजनीतिक दृष्टिकोण से कुछ भी नहीं है । हम सिर्फ टेक्निकल ग्राउंड्स पर यह अमेंडमेंट बिल लाए हैं । मैं आपके माध्यम से सभी माननीय सदस्यों से अनुरोध करता हूं, फिर एक बार बता रहा हूं, इसमें राजनीतिक दृष्टिकोण से कुछ भी नहीं है । इस पर बहुत सालों से सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में चर्चा हो रही है और इस पर सुनवाई होनी चाहिए । मैं आप लोगों से अनुरोध करता हूं कि सर्वसम्मति से इस अमेंडमेंट को पास करें ।
माननीय सभापति : प्रश्न यह है:
“कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 का और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए ।” प्रस्ताव स्वीकृत हुआ ।
माननीय सभापति: अब सभा विधेयक पर खंडवार विचार करेगी ।
प्रश्न यह है:
“कि खंड 2 से 5 विधेयक का अंग बने ।” प्रस्ताव स्वीकृत हुआ ।
खंड 2 से 5 विधेयक में जोड़ दिए गए ।
खंड 1, अधिनियमन सूत्र और विधेयक का पूरा नाम विधेयक में जोड़ दिए गए ।
SHRI G. KISHAN REDDY: Sir, I beg to move:
“That the Bill be passed.” माननीय सभापति: प्रश्न यह है:
“कि विधेयक पारित किया जाए ।” प्रस्ताव स्वीकृत हुआ ।
_________ 17.28 hrs