State Consumer Disputes Redressal Commission
Sbi vs Hira on 8 December, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/63/2019 ( Date of Filing : 14 Jan 2019 ) (Arisen out of Order Dated 13/12/2018 in Case No. Complaint Case No. CC/113/2017 of District Maharajganj) 1. SBI Maharajganj Maharajganj ...........Appellant(s) Versus 1. Hira Maharajganj Maharajganj ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR PRESIDENT HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 08 Dec 2022 Final Order / Judgement राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ अपील संख्या-63/2019 (मौखिक) (जिला उपभोक्ता आयोग, महराजगंज द्वारा परिवाद संख्या 113/2017 में पारित आदेश दिनांक 13.12.2018 के विरूद्ध) स्टेट बैंक आफ इण्डिया, ब्रांच मुडि़ला बाजार, जिला महराजगंज, द्वारा ब्रांच मैनेजर ........................अपीलार्थी/विपक्षी बनाम हीरा पुत्र कौलेश्वर, निवासी- सराय खुटहा तप्पा वाकी, परगना हवेली, तहसील सदर, थाना-कोतवाली, जिला महराजगंज ...................प्रत्यर्थी/परिवादी समक्ष:- 1.
माननीय न्यायमूर्ति श्री अशोक कुमार, अध्यक्ष।
2. माननीय श्री विकास सक्सेना, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री अंशुमाली सूद, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : श्री उमेश कुमार शर्मा, विद्वान अधिवक्ता।
दिनांक: 08.12.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना, सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय प्रस्तुत अपील अपीलार्थी स्टेट बैंक आफ इण्डिया द्वारा इस न्यायालय के सम्मुख जिला उपभोक्ता आयोग, महराजगंज द्वारा परिवाद संख्या-113/2017 हीरा बनाम शाखा प्रबन्धक, भारतीय स्टेट बैंक में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 13.12.2018 के विरूद्ध प्रस्तुत की गयी है।
प्रश्नगत निर्णय और आदेश के द्वारा जिला उपभोक्ता आयोग ने परिवाद अंशत: स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है:-
'' प्रस्तुत परिवाद, विपक्षी के विरूद्ध अंशत: सव्यय स्वीकार किया जाता है। विपक्षी को यह आदेशित किया जाता है कि वह परिवादी को आज की तिथि से पैतालीस दिवसों के अन्दर परिवादी को हुए मानसिक कष्ट की क्षति हेतु मु0-15000/-(पन्द्रह हजार) रूपये क्षतिपूर्ति की -2- धनराशि व वाद व्यय मु0-3000/-(तीन हजार) रूपये अदा कर दें। यदि विपक्षी द्वारा इस निर्धारित अवधि में परिवादी को उपरोक्त क्षतिपूर्ति की धनराशि की अदायगी नही की जाती है तो विपक्षी इस क्षतिपूर्ति की धनराशि पर अंतिम अदायगी तक (दस) 10 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज की अदायगी करेगा।'' अपीलार्थी की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री अंशुमाली सूद एवं प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री उमेश कुमार शर्मा को सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।
संक्षेप में वाद के तथ्य इस प्रकार हैं कि परिवादी द्वारा विपक्षी बैंक की शाखा में एक किसान क्रेडिट कार्ड खाता सं0-31152290456 खोला गया था तथा उक्त कार्ड के खाता की आहरण सीमा 96,000/-रू0 थी। परिवादी द्वारा उक्त खाते से दिनांक 02.11.2015 को 40,000/-रू0 का आहरण किया गया, परन्तु परिवादी द्वारा ऋण की उक्त धनराशि वापस नहीं की जा सकी। इसके पश्चात् परिवादी द्वारा उक्त खाते से किसी प्रकार का कोई संव्यवहार अथवा लेनदेन नहीं किया गया। इसी मध्य राज्य सरकार द्वारा अपनी कर्ज माफी योजना के अन्तर्गत लघु एवं सीमान्त किसानों का कृषि ऋण माफ कर दिया गया था तथा उक्त ऋण माफी की अधिसूचना निर्गत की गयी थी, जिसकी जानकारी विपक्षी बैंक को थी।
परिवादी का कथन है कि विपक्षी द्वारा परिवादी को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से दिनांक 12.07.2017 को परिवादी के संयुक्त बचत खाता सं0-11621628064 से बिना कोई निकासी पत्र भरवाये तथा बिना किसी प्रलेखीय कार्यवाही किये परिवादी के पुत्र अनिरूद्ध पासवान के खाते से 35,500/-रू0 परिवादी के किसान क्रेडिट कार्ड के खाते में अन्तरित कर दिया। परिवादी द्वारा इस संबंध में विपक्षी से पूछताछ की गयी तो विपक्षी द्वारा कोई समुचित उत्तर नहीं दिया गया तथा विपक्षी द्वारा परिवादी को अपमानित किया गया, जिससे परिवादी की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची तथा मानसिक कष्ट हुआ। परिवादी को इससे आर्थिक क्षति भी हुई। परिवादी द्वारा विपक्षी को विधिक नोटिस प्रेषित की गयी, परन्तु विपक्षी द्वारा उसका कोई उत्तर नहीं दिया गया। अत: क्षुब्ध होकर परिवादी -3- द्वारा विपक्षी के विरूद्ध परिवाद जिला उपभोक्ता आयोग के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए वांछित अनुतोष की मांग की गयी।
जिला उपभोक्ता आयोग के सम्मुख विपक्षी बैंक द्वारा लिखित कथन प्रस्तुत किया गया तथा कथन किया गया कि परिवादी द्वारा परिवाद गलत, भ्रामक व काल्पनिक तथ्यों पर प्रस्तुत किया गया है। परिवादी द्वारा विपक्षी बैंक की शाखा में उक्त किसान क्रेडिट कार्ड खाता वर्ष 2015 में खोला गया था, जिसका संचालन परिवादी द्वारा स्वयं किया जाता है। परिवादी के इस ऋण खाते की देयता थी। इस कारण विपक्षी द्वारा परिवादी के इस ऋण खाते को नियमानुसार नियमित करने के लिए परिवादी के बचत खाता सं0-11621628064, जो कि परिवादी के पुत्र अनिरूद्ध पासवान के साथ संयुक्त खाता था, से दिनांक 12.07.2017 को 35,500/-रू0 परिवादी के ऋण खाते में अन्तरित कर जमा कराया गया था। राज्य सरकार द्वारा विपक्षी को ऐसा कोई निर्देश निर्गत नहीं किया गया था कि वह बैंक ऋण की वसूली न करे। राज्य सरकार द्वारा ऋण माफी की कोई धनराशि बैंक को प्राप्त नहीं हुई है। यदि राज्य सरकार द्वारा कोर्इ अनुदान या छूट दी जाती है तो वह ऋण खाता धारक को दे दी जायेगी। विपक्षी द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गयी है। ऋण छूट हेतु प्रेषित सूची में परिवादी का नाम क्रमांक 361 पर है। परिवाद पोषणीय नहीं है। परिवादी की कोई नोटिस विपक्षी को प्राप्त नहीं हुई है। परिवाद निरस्त होने योग्य है।
परिवादी द्वारा परिवाद पत्र में इस आशय की दावेदारी की गयी थी कि उत्तर प्रदेश शासन के शासनादेश दिनांकित 07.04.2017 के द्वारा उत्तर प्रदेश के सभी लघु एवं सीमान्त किसानों के फसली ऋणी माफी के संबंध में आदेश पारित किये गये। इस योजना के अन्तर्गत परिवादी के ऋण की माफी होनी थी। अत: किसान क्रेडिट कार्ड के संबंध में बकाया धनराशि वसूली योग्य नहीं थी। इस संबंध में विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग का निर्णय आया है, जिसके पृष्ठ संख्या-4 के प्रथम प्रस्तर में यह अंकित है कि ऋण माफी योजना की सूची के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि विपक्षी ने ऋण माफी हेतु पात्र किसानों के नाम की सूची में परिवादी का नाम सम्मिलित किया था, किन्तु परिवादी को इस ऋण माफी का लाभ -4- प्राप्त करने हेतु अपात्र पाया गया, जिस कारण उसे ऋण माफी का लाभ नहीं दिया गया।
प्रत्यर्थी की ओर से इस तथ्य को खण्डित करने के लिए वर्तमान स्तर पर भी कोई प्रपत्र प्रस्तुत नहीं किये गये, जिनके आधार पर यह स्थापित होता हो कि परिवादी लघु एवं सीमान्त किसानों की श्रेणी के अन्तर्गत आता था और वह उपरोक्त उल्लिखित शासनादेश की परिधि में ऋण माफी का अधिकार रखता था। अत: वर्तमान स्तर पर भी किसी साक्ष्य के अभाव में यह निष्कर्ष नहीं दिया जा सकता है कि परिवादी ऋण माफी का पात्र था और अपीलार्थी बैंक द्वारा इस ऋण माफी की राहत का लाभ परिवादी को नहीं दिया गया।
प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने मुख्य रूप से इस बिन्दु पर निर्णय पारित किया है कि परिवादी के संयुक्त खाते में, जो उसके तथा उसके पुत्र अनिरूद्ध पासवान के नाम संयुक्त था, से 35,500/-रू0 आहरित किया गया, जिसका कोई अधिकार बैंक को नहीं था क्योंकि यह एक पृथक धनराशि थी, जो बैंक के पास एक अन्य खाते के रूप में थी। इस संबंध में अपीलार्थी बैंक का यह कथन आया है कि बैंक को यह अधिकार था कि वह परिवादी के किसी भी खाते में जो बैंक के पास हो वह ऋण की धनराशि में समायोजित कर सकता है। इस संबंध में धारा 171 भारतीय संविदा अधिनियम 1872 पर बल दिया गया, जो निम्नवत् है:-
"171. General lien of bankers, factors, wharfingers, attorneys and policy-brokers.--Bankers, factors, wharfingers, attorneys of a High Court and policy-brokers may, in the absence of a contract to the contrary, retain as a security for a general balance of account, any goods bailed to them; but no other persons have a right to retain, as a security for such balance, goods bailed to them, unless there is an express contract to that effect."
उपरोक्त प्रावधान के अनुसार बैंक तथा धारा 171 भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अन्तर्गत प्रदान किये गये व्यक्तियों को यह अधिकार है कि वे उनके पास रखे गये किसी भी खाते या धनराशि का प्रयोग किसी ऋण की प्रतिभूति के रूप में कर सकते हैं।
-5-इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय सिंडिकेट बैंक बनाम विजय कुमार व अन्य, प्रकाशित ए0आई0आर0 1992 सुप्रीम कोर्ट पृष्ठ 1066 का उल्लेख करना उचित होगा, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया है कि व्यापारिक वित्तीय प्रक्रिया में बैंक को उसके पास रखे गये उपभोग की सभी प्रतिभूतियों, बिलों तथा निगोशिएबल इंस्ट्रूमेन्ट्स को ऋण की प्रतिभूति के रूप में रखने का अधिकार होता है, जो ग्राहक द्वारा साधारण बैंकिंग व्यापार में बैंक को प्रदान किये जाते हैं। इस निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित प्रकार से उल्लिखित किया गया है:-
"By Mercantile system the Bank has a general lien over all forms of securities or negotiable instruments deposited by or on behalf of the customer in the ordinary course of banking business and that the general lien is a valuable right of the banker judicially recognised and in the absence of an agreement to the contrary, a Banker has a general lien over such securities or bills received from a customer in the ordinary course of banking business and has a right to use the proceeds in respect of any balance that may be due from the customer by way of reduction of customer's debit balance."
उपरोक्त निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह प्रदान किया गया है कि बैंक को संविदा अधिनियम की उपरोक्त धारा के अन्तर्गत ग्रहणाधिकार अथवा Lien होता है। ग्रहणाधिकार अथवा Lien दो प्रकार का दर्शाया गया है, (1) विशिष्ट ग्रहणाधिकार तथा (2) सामान्य ग्रहणाधिकार, जिसमें से विशिष्ट ग्रहणाधिकार के ऋण के संबंध में दी गयी प्रतिभूति को ऋण के विरूद्ध प्राप्त करने का अधिकार है, जबकि सामान्य ग्रहणाधिकार अर्थात् General Lien किसी भी खाते अथवा बैंकिंग सामान्य प्रक्रिया में ग्राहक द्वारा दी गयी धनराशि है, जिसे ऋण की प्रतिभूति के रूप में बैंक रख सकता है।
एक इंग्लिश निर्णय Brandao v. Barnett (1846) 12 C1 & Fin 787 में भी बैंकर के ग्रहणाधिकार (General Lien) को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया गया है:-
"Bankers most undoubtedly have a general lien on all securities deposited with them as bankers by a customer, unless there be an express contract, or circumstances that show an implied contract, inconsistent with -6- lien." The above passages go to show that by mercantile system the Bank has a general lien over all forms of securities or negotiable instruments deposited by or on behalf of the customer in the ordinary course of banking business and that the general lien is a valuable right of the banker judicially recognised and in the absence of an agreement to the contrary, a Banker has a general lien over such securities or bills received from a customer in the ordinary course of banking business and has a right to use the proceeds in respect of any balance that may be due from the customer by way of reduction of customer's debit balance. Such a lien is also applicable to negotiable instruments including FDRs which are remitted the Bank by the customer for the purpose of collection. There is no gainsaying that such a lien extends to FDRs also which are deposited by the customer."
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के अनुसार बैंकिंग व्यापार में बैंक को यह अधिकार है कि वह उक्त धनराशि का प्रयोग ग्राहक के डेबिट बैलेंस को कम करने में प्रयोग कर सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय को दृष्टिगत रखते हुए बैंक द्वारा इस मामले में परिवादी के खाते से उसके ऋण के विपरीत धनराशि आहरित करके ऋण की कमी को पूरा करना अनुचित नहीं माना जा सकता है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने धारा 171 भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के प्राविधानों को अनदेखा करते हुए परिवादी के खाते से धनराशि ऋण के विपरीत आहरित किया जाना गलत माना है एवं अपीलार्थी बैंक के विरूद्ध निर्णय दिया है, जो निर्णय अपास्त होने योग्य है एवं प्रस्तुत अपील स्वीकार होने योग्य है।
आदेश प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाती है। जिला उपभोक्ता आयोग, महराजगंज द्वारा परिवाद संख्या-113/2017 हीरा बनाम शाखा प्रबन्धक, भारतीय स्टेट बैंक में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 13.12.2018 अपास्त किया जाता है।
प्रस्तुत अपील में अपीलार्थी द्वारा जमा धनराशि अर्जित ब्याज सहित अपीलार्थी को 01 माह में विधि के अनुसार वापस की जाए।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश
-7-
को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(न्यायमूर्ति अशोक कुमार) (विकास सक्सेना)
अध्यक्ष सदस्य
जितेन्द्र आशु0
कोर्ट नं0-1
[HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR] PRESIDENT
[HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER