State Consumer Disputes Redressal Commission
Dr Chandra Lekha Singh vs Smt Suman on 5 May, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2006/950 ( Date of Filing : 20 Apr 2006 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Smt Suman Singh Kanpur Nagar ...........Appellant(s) Versus 1. Dr Chandralekha Singh Kanpur Nagar ...........Respondent(s) First Appeal No. A/2005/1861 ( Date of Filing : 05 Jun 2005 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Dr Chandra Lekha Singh a ...........Appellant(s) Versus 1. Smt Suman a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR PRESIDENT HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 05 May 2022 Final Order / Judgement राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ (सुरक्षित) अपील संख्या-1861/2005 (जिला उपभोक्ता आयोग, कानपुर नगर द्वारा परिवाद संख्या 17/1999 में पारित आदेश दिनांक 05.10.2005 के विरूद्ध) 1.
डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक), पत्नी डा0 बलराम सिंह
2. डा0 बलराम सिंह, उम्र लगभग 57 वर्ष, पुत्र स्व0 शिव बदन सिंह दोनों अपीलार्थीगण प्रोप्राइटर सुशीला सर्जिकल क्लीनिक एण्ड मैटरनिटी होम, 974 डब्लू-1 साकेत नगर, कानपुर नगर।
........................अपीलार्थीगण/विपक्षी सं01 व 2 बनाम
1. श्रीमती सुमन, पत्नी श्री अरूण कुमार द्विवेदी
2. अरूण कुमार द्विवेदी दोनों निवासीगण- 31-ए यशोदा नगर, कानपुर।
..................प्रत्यर्थीगण/परिवादी सं01 व 2
3. ब्रांच मैनेजर, न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी लि0 कानपुर, बेना झाबर, ब्रांच कानपुर नगर। ..................प्रत्यर्थी/विपक्षी सं03 एवं अपील संख्या-1967/2005 (जिला उपभोक्ता आयोग, कानपुर नगर द्वारा परिवाद संख्या 17/1999 में पारित आदेश दिनांक 05.10.2005 के विरूद्ध) दि न्यू इण्डिया एश्योरेंस कं0लि0 द्वारा शाखा प्रबन्धक, बेनाझाबर शाखा, कानपुर नगर ........................अपीलार्थी/विपक्षी सं03 बनाम
1. श्रीमती सुमन पत्नी श्री अरूण कुमार द्विवेदी
2. अरूण कुमार द्विवेदी दोनों निवासीगण- 31 ए, यशोदा नगर, कानपुर नगर ..................प्रत्यर्थीगण/परिवादी सं01 व 2
3. डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक), पत्नी डा0 बलराम सिंह
4. डा0 बलराम सिंह दोनों निवासीगण- सुशीला नर्सिंग होम, 974 डब्लू-1,साकेत नगर, कानपुर नगर ..............प्रत्यर्थीगण/विपक्षी सं01 व 2 एवं -2- अपील संख्या-950/2006 (जिला उपभोक्ता आयोग, कानपुर नगर द्वारा परिवाद संख्या 17/1999 में पारित आदेश दिनांक 05.10.2005 के विरूद्ध)
1. श्रीमती सुमन, पत्नी अरूण कुमार द्विवेदी
2. अरूण कुमार द्विवेदी दोनों निवासीगण-31-ए, यशोदा नगर, कानपुर नगर ........................अपीलार्थीगण/परिवादी सं01 व 2 बनाम
1. डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) पत्नी डा0 बलराम सिंह
2. डा0 बलराम सिंह दोनों निवासीगण- सुशीला नर्सिंग होम, 974 डब्लू1-साकेत नगर, कानपुर नगर ................प्रत्यर्थीगण/विपक्षी सं01 व 2
3. ब्रांच मैनेजर, न्यू इण्डिया एश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड, बेनाझाबर ब्रांच, कानपुर नगर। ..................प्रत्यर्थी/विपक्षी सं03 समक्ष:-
1. माननीय न्यायमूर्ति श्री अशोक कुमार, अध्यक्ष।
2. माननीय श्री विकास सक्सेना, सदस्य।
परिवादी सं01 व 2 की ओर से उपस्थित : श्री संजय कुमार वर्मा, विद्वान अधिवक्ता।
विपक्षी सं01 व 2 की ओर से उपस्थित : श्री जी0सी0 वर्मा के सहयोगी श्री राज दीपक चौधरी, विद्वान अधिवक्ता।
विपक्षी सं0 3 की ओर से उपस्थित : श्री जफर अजीज, विद्वान अधिवक्ता।
दिनांक: 01.06.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना, सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय परिवाद संख्या-17/1999 श्रीमती सुमन व एक अन्य बनाम डा0 चन्द्रलेखा सिंह व दो अन्य में जिला उपभोक्ता आयोग, कानपुर -3- नगर द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 05.10.2005 के विरूद्ध उपरोक्त अपील संख्या-1861/2005 डा0 चन्द्रलेखा सिंह व एक अन्य बनाम श्रीमती सुमन व दो अन्य परिवाद के विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण की ओर से एवं उपरोक्त अपील संख्या-1967/2005दि न्यू इण्डिया एश्योरेंस कं0लि0 बनाम श्रीमती सुमन व तीन अन्य परिवाद के विपक्षी संख्या-3 बीमा कम्पनी की ओर से एवं उपरोक्त अपील संख्या-950/2006 श्रीमती सुमन व एक अन्य बनाम डा0 चन्द्रलेखा सिंह व दो अन्य परिवाद के परिवादीगण की ओर से राज्य आयोग के समक्ष योजित की गयी है।
प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश के द्वारा जिला उपभोक्ता आयोग ने परिवाद स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है:-
''परिवादीगण का उपभोक्ता परिवाद स्वीकार किया जाता है। विपक्षी सं0-1 डॉ0 चन्द्रलेखा सिंह को आदेश दिया जाता है कि वह परिवादीगण को चिकित्सा व्यय रू0 50,000/- (पचास हजार रू0) तथा शारीरिक, मानसिक व आर्थिक क्षतिपूर्ति के लिए रू0 1,00,000/- (एक लाख रू0) इस निर्णय के दिनांक से दो माह के अंदर भुगतान करे। उपरोक्त धनराशि विपक्षी सं0-1 व 3 द्वारा संयुक्त रूप से व पृथक-2 रूप से देय है।'' जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णय एवं आदेश से उभय पक्ष सन्तुष्ट नहीं हैं। अत: विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण एवं विपक्षी संख्या-3 बीमा कम्पनी ने उपरोक्त अपीलें प्रस्तुत कर जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश अपास्त किये जाने का अनुरोध किया है, जबकि परिवादीगण ने उपरोक्त अपील प्रस्तुत कर परिवाद में याचित क्षतिपूर्ति 4,99,000/-रू0 ब्याज सहित प्रदान किये जाने का अनुरोध किया है।
उपरोक्त तीनों अपीलों में परिवादीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री संजय कुमार वर्मा, विपक्षी संख्या-1 व 2 की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री जी0सी0 वर्मा के सहयोगी श्री राज दीपक -4- चौधरी और विपक्षी संख्या-3 की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री जफर अजीज उपस्थित आये हैं।
हमने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण को तीनों अपीलों में सुना और प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
परिवादीगण का कथन परिवाद-पत्र में इस प्रकार है कि परिवादी संख्या-1 व 2 पति-पत्नी हैं। दिनांक 06.06.1998 को परिवादिनी श्रीमती सुमन06 माह की गर्भवती होने के कारण विपक्षी के नर्सिंग होम में चेकअप के लिए गयी तब से परिवादिनी विपक्षी संख्या-1 डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) के उपचार में थी, जिन्होंने दिनांक 15.08.1998 को परिवादिनी श्रीमती सुमन को भर्ती कर लिया और आरम्भ में नार्मल डिलीवरी का आश्वासन देकर प्रसव काल में आपरेशन करने के लिए कहा। परिवादिनी के मना करने के बावजूद विपक्षीगण ने परिवादिनी श्रीमती सुमन का आपरेशन कर दिया। आपरेशन से बच्ची उत्पन्न हुई। आपरेशन के उपरान्त परिवादिनी को बराबर ब्लीडिंग व पेशाब में रिसाव होता रहा, किन्तु विपक्षीगण ने उसे कोई दवा नहीं दी न ही देखरेख की। दिनांक 22.08.1998 को श्रीमती सुमन की हालत ठीक न होने पर एवं उपरोक्त समस्या बरकरार रहने के कारण विपक्षीगण ने दवा न देकर उसे डिस्चार्ज कर दिया। इसके बाद भी विपक्षीगण ने यह कथन किया कि प्रसव के बाद ऐसा हो जाता है धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। इसके उपरान्त श्रीमती सुमन को एक अन्य चिकित्सक डा0 कमलेश वर्मा को दिखाना पड़ा। पुन: डा0 प्रतिभा रोहतगी एवं इसके उपरान्त डा0 इन्दू गोस्वामी के यहॉं दिखाया, जिन्होंने विशेषज्ञ डा0 राजेश प्रताप सिंह भदौरिया को रिफर कर दिया, जिन्होंने चेकअप व टेस्टिंग के उपरान्त बताया कि परिवादिनी श्रीमती सुमन का आपरेशन होगा। दिनांक 11.09.1998 को जे0एन0 रोहतगी हास्पिटल, सर्वोदय नगर, कानपुर में उसका आपरेशन हुआ, जिसका इलाज अभी भी हो रहा है।-5-
परिवादीगण का कथन है कि विपक्षी संख्या-1 बिना विशेष डिग्री के स्त्रियों का इलाज कर रही है और मनमाना धन वसूल कर रही है। विपक्षीगण ने बिना परिवादीगण को बताये हुए परिवादिनी श्रीमती सुमन का यूटरस (बच्चादानी) निकाल दिया इस तरह परिवादिनी श्रीमती सुमनके जीवन के साथ खिलवाड़ किया है। परिवादीगण ने इलाज में हुए व्यय एवं मानसिक व शारीरिक कष्ट हेतु 4,39,000/-रू0 की क्षतिपूर्ति की प्रार्थना की।
विपक्षी संख्या-1 व 2 ने अपने प्रतिवाद पत्र में आपरेशन द्वारा बच्चे का जन्म होना स्वीकार किया है। उनका कथन है कि प्रसव के समय परिवादिनी श्रीमती सुमन का Placenta उसकी बच्चेदानी से बेहद चिपका हुआ था, अत: मरीज की जान बचाने के लिए बच्चेदानी निकालनी पड़ी। यह बात परिवादिनी के साथ आये हुए तीमारदारों को बता दी गयी थी। उनको बताया गया था कि ऐसी स्थिति में बच्चादानी अक्सर पेशाब की थैली से चिपकी हुई रहती है, अत: आपरेशन के बाद भी कभी-कभी पेशाब में खून आने की स्थिति होती है। यह आपरेशन के बाद की जटिलता है और इसके लिए डाक्टर जिम्मेदार नहीं होता हे। परिवादिनी श्रीमती सुमन को दिनांक 15.08.1998 से दिनांक 22.08.1998 तक नर्सिंग होम में रही तथा उसे कुछ दिन और नर्सिंग होम में रहने की हिदायत दी गयी थी, जिससे टांके सूख जाये और पेशाब में खून आने की शिकायत दूर की जा सके, किन्तु परिवादिनी व उसके तीमारदार अपनी इच्छा से परिवादिनी को डिस्चार्ज कराकर ले गये। विपक्षी एक विशेषज्ञ स्त्री व प्रसूति रोग चिकित्सक है एवं अनुभवी है। उसके द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गयी है। अत: परिवाद स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
विपक्षी संख्या-3 बीमा कम्पनी द्वारा यह कथन किया गया कि विपक्षी डा0 चन्द्रलेखा सिंह ने परिवादिनी व उसके तीमारदारों को विश्वास में रखकर गर्भाशय निकाला है और इस प्रकार उसने -6- सेवा में कोई कमी नहीं की है। परिवादिनी का परिवाद निरस्त किये जाने योग्य है।
विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने इस आधार पर परिवाद स्वीकार किया कि परिवादिनी के उपरोक्त Fistula उत्पन्न होने और पेशाब में लगातार खून आना इस बात का द्योतक है कि विपक्षी डा0 चन्द्रलेखा सिंह की उपेक्षापूर्ण चिकित्सा हुई थी और उन्होंने सेवा में कमी की है।
जिला उपभोक्ता आयोग के उपरोक्त निर्णय से व्यथित होकर उपरोक्त अपील संख्या-1861/2005 में डा0 चन्द्रलेखा सिंह एवं डा0 बलराम सिंह द्वारा मुख्य आधार यह लिये गये हैं कि निर्णय दिनांक 05.10.2005 पूर्णत: अवैध, मनमाना और बिना साक्ष्य एवं तथ्यों पर गौर किये हुए पारित किया गया है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने अपने निष्कर्ष में अंकित किया है कि डा0 चन्द्रलेखा सिंह स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं थीं, किन्तु इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया गया कि डा0 चन्द्रलेखा सिंह द्वारा किंग जार्ज मेडिकल कालेज, लखनऊ से एम0बी0बी0एस0 की डिग्री तथा वर्ष 1977 में एम0डी0 किया गया था। रोगियों का इलाज पुरूष एवं महिला डाक्टरों द्वारा मिलकर किया जाता है। इस मामले में डा0 बलराम सिंह द्वारा वर्ष 1972 में एम0बी0बी0एस0 एवं वर्ष 1978 में सर्जरी की स्नातकोत्तर डिग्री (एम0एस0) प्राप्त की थी। इसके अतिरिक्त गर्भाशय निकालने में परिवादिनी एवें उसके परिवारीजनों की राय ले ली गयी थी। इस तथ्य को परिवादिनी की ओर से नहीं बताया गया। परिवादिनी के गर्भाशय निकाले जाने का तथ्य उसकी केस-शीट में अंकित है, जिसको परिवादीगण ने नहीं दर्शाया है। दिनांक 15.08.1998 को शल्य क्रिया की सहमति दी गयी थी, जो अभिलेख पर है। मरीज को जो जटिलतायें व परेशानी आयीं वे इस प्रकार के आपरेशन में आने वाली सम्भावित जटिलतायें हैं, जिसमें चिकित्सक का कोई दोष नहीं है। परिवादिनी का पहला बच्चा भी आपरेशन के माध्यम से हुआ था ऐसे मामलों -7- में सामान्य प्रसव होने की सम्भावना अत्यन्त कम होती है, जो परिवादिनी के मामले में हुआ है। विपक्षी चिकित्सक बीमा कम्पनी से अपने कार्य के लिए आच्छादित हैं और यदि कोई बीमा धनराशि प्रदान की जानी है तो वह बीमा कम्पनी द्वारा दी जायेगी।
विपक्षी संख्या-1 व 2 द्वारा यह भी कथन किया गया है कि परिवादिनी को उत्पन्न हुई जटिलता VESICO VAGINAL FISTULA के नाम से परिभाषित की गयी है, जो सर्जरी की किताबों में दिया गया है, जिसमें चिकित्सक का कोई दोष नहीं होता है। अत: प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश अवैध एवं तथ्यों के विपरीत है एवं अपास्त किये जाने योग्य है।
उपरोक्त अपील संख्या-1967/2005 में बीमा कम्पनी द्वारा मुख्य आधार यह लिये गये हैं कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा निर्णय एवं आदेश दिनांक 05.10.2005 को पारित किया गया। इसके उपरान्त निर्णय एवं आदेश का पुनर्विलोकन करते हुए दिनांक 22.10.2005 को आदेश पारित किया गया, जो क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर किया गया है क्योंकि जिला उपभोक्ता आयोग को पुनर्विलोकन का कोई अधिकार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत प्राप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त पुनर्विलोकन प्रार्थना-पत्र की प्रतिलिपि विपक्षी संख्या-3 बीमा कम्पनी को नहीं दी गयी थी। पुनर्विलोकन प्रार्थना पत्र की प्रतिलिपि जिसे दी गयी थी वे बीमा कम्पनी के अधिवक्ता नहीं थे, बल्कि अन्य व्यक्तियों के अधिवक्ता थे। इसके अतिरिक्त तत्कालीन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग को पुनर्विलोकन करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है, इसलिए प्रश्नगत निर्णय क्षेत्राधिकार से बाहर एवं शून्य है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग का आदेश इस आधार पर भी अपास्त होने योग्य है कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने वादोत्तर के प्रस्तर-8 पर ध्यान नहीं दिया, जिसमें गोपाल कृष्ण सर्जिकल मैटरनिटी क्लीनिक को पक्षकार बनाये जाने की प्रार्थना की गयी थी क्योंकि वह परिवाद -8- में एक आवश्यक पक्षकार थे। इसके अतिरिक्त डा0 प्रतिभा रोहतगी को भी पक्षकार नहीं बनाया गया, जो परिवाद में एक आवश्यक पक्षकार थीं। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग के सम्मुख यह तथ्य साबित नहीं हो सका है कि मरीज की बच्चेदानी स्वयं उसके तथा उसके परिवारीजन की इच्छा के विरूद्ध निकालने का आपरेशन किया गया था। स्वयं परिवादिनी के अनुसार परिवादिनी का इलाज पहले डा0 चन्द्रलेखा सिंह तथा डा0 बलराम सिंह द्वारा किया गया था। इसके उपरान्त परिवादिनी का इलाज गोपाल कृष्ण सर्जिकल मैटरनिटी क्लीनिक में हुआ था। तदोपरान्त डा0 प्रतिभा रोहतगी, डा0 इन्दर गोस्वामी, डा0 राजेश प्रताप सिंह भदौरिया तथा डा0 जे0एल0 रोहतगी द्वारा किया गया था। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा इस तथ्य को भी अनदेखा किया है कि परिवादिनी यह तथ्य सिद्ध करने में असफल रही है कि उपरोक्त सभी चिकित्सकों ने ऐसा कोई निष्कर्ष दिया हो कि परिवादिनी की बच्चेदानी सदभावनापूर्वक न निकाली गयी हो। अत: परिवादिनी उत्तरदाता चिकित्सक की सेवा में कमी सिद्ध करने में असफल रही है। उपरोक्त कारणों से प्रत्यर्थी संख्या-1 व 2 (परिवादीगण) का प्रत्यर्थी संख्या-3 व 4 (चिकित्सकगण) के विरूद्ध कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता है। इस कारण बीमा कम्पनी द्वारा क्षतिपूर्ति दिये जाने का कोई औचित्य नहीं है। इन आधारों पर अपील को स्वीकार किये जाने और प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश अपास्त किये जाने की प्रार्थना की गयी है।
उपरोक्त अपील संख्या-950/2006 जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक 05.10.2005 के विरूद्ध परिवादीगण ने क्षतिपूर्ति की धनराशि को बढ़ाये जाने की प्रार्थना के साथ प्रस्तुत की है। मुख्य रूप से परिवादीगण का कथन यह है कि परिवादिनी ने जितनी धनराशि 4,99,000/-रू0 मांगी थी उसको घटाकर 1,50,000/-रू0 किये जाने का औचित्य प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश में नहीं दिया गया है। विपक्षीगण ने भी -9- परिवादीगण द्वारा मांगी गयी क्षतिपूर्ति की धनराशि पर कोई आपत्ति नहीं की है। अत: इस धनराशि को घटाये जाने का कोई औचित्य नहीं था। उपरोक्त आधारों पर क्षतिपूर्ति की धनराशि को बढ़ाये जाने और तद्नुसार निर्णय परिवर्तित किये जाने की प्रार्थना की गयी है।
इस मामले में परिवादीगण द्वारा विपक्षी संख्या-1 डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) एवं विपक्षी संख्या-2 डा0 बलराम सिंह पर यह अभियोग लगाया गया है कि उनके द्वारा चिकित्सीय लापरवाही की गयी। मरीज परिवादिनी श्रीमती सुमन के प्रसव के उपरान्त अत्यधिक रक्तस्राव होने के कारण उसके गर्भाशय को निकाला गया एवं इसके उपरान्त भी रक्तस्राव बन्द न होने के कारण एवं अन्य जटिलतायें हो जाने के उपरान्त परिवादिनी को अपना अन्यत्र इलाज कराना पड़ा। इस प्रकार विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण पर चिकित्सीय लापरवाही का अभियोग लगाया गया है।
चिकित्सीय लापरवाही के सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय कुसुम शर्मा व अन्य बनाम बत्रा हास्पिटल एण्ड मेडिकल रिसर्च सेन्टर व अन्य,प्रकाशित 2010 एन0सी0जे0 पृष्ठ 449 (सुप्रीम कोर्ट) का उल्लेख करना होगा, जिसमें चिकित्सीय लापरवाही किन दशाओं में मानी जायेगी, पर विस्तृत निष्कर्ष दिया गया है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने एक अन्य पूर्व के निर्णय जेकब मेथ्यू व अन्य बनाम स्टेट आफ पंजाब व अन्य, प्रकाशित (2005) 6 एस0सी0सी0 पृष्ठ 1 में अवधारित किया गया है।
"In the law of negligence, professionals such as lawyers, doctors, architects and others are included in the category of persons professing some special skill or skilled persons generally. Any task which is required to be performed with a special skill would generally be admitted or undertaken to be performed only if the person possesses the requisite skill for performing that task. Any reasonable man entering into a profession which requires a particular level of learning to be called a professional of that branch, impliedly assures the person dealing with him that the skill which he professes to possess shall be exercised and -10- exercised with reasonable degree of care and caution. He does not assure his client of the result. A lawyer does not tell his client that the client shall win the case in all circumstances. A physician would not assure the patient of full recovery in every case. A surgeon cannot and does not guarantee that the result of surgery would invariably be beneficial, much less to the extent of 100% for the person operated on. The only assurance which such a professional can give or can be understood to have given by implication is that he is possessed of the requisite skill in that branch of profession which he is practising and while undertaking the performance of the task entrusted to him he would be exercising his skill with reasonable competence. This is all what the person approaching the professional can expect. Judged by this standard, a professional may be held liable for negligence on one of two findings: either he was not possessed of the requisite skill which he professed to have possessed, or, he did not exercise, with reasonable competence in the given case, the skill which he did possess. The standard to be applied for judging, whether the person charged has been negligent or not, would be that of an ordinary competent person exercising ordinary skill in that profession. It is not necessary for every professional to possess the highest level of expertise in that branch which he practises."
उपरोक्त निर्णय के निष्कर्ष को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अन्य निर्णयों वी0 किशन राव बनाम निखिल सुपर स्पेशियल्टी हास्पिटल, सिविल अपील संख्या-2641/2010 में दोहराया गया है। उपरोक्त निर्णयों में प्रसिद्ध इंग्लिश केस बोलम बनाम फ्री अर्न हास्पिटल मैनेजमेन्ट कमेटी 1957 Vol. 2 आल इंग्लैण्ड रिपोर्ट पृष्ठ 118 पर अवधारित किया गया है, जिसमें प्रसिद्ध बोलम टेस्ट अवधारित किया गया है, जो निम्नलिखित प्रकार से है:-
"A professional may be held liable for negligence on one of the two findings: either he was not possessed of the requisite skill which he professed to have possessed, or, he did not exercise, with reasonable competence in the given case, the skill which he did possess. The standard to be applied for judging, whether the person charged has been negligent or not, would be that of an ordinary competent person exercising ordinary skill in that profession. It is not possible for every professional to possess the highest level of expertise or skills in that branch which he practises. A highly skilled professional may be possessed of better qualities, but that cannot be made the basis or the yardstick for judging the performance of the professional proceeded against on indictment of negligence."
1. चिकित्सक लापरवाही का दोषी तब माना जायेगा, जबकि उसने चिकित्सा में ऐसा कार्य किया है, जिसके लिए वह कुशलता एवं -11- अर्हता नहीं रखता है एवं अपनी अर्हताओं के अनुसार वह उक्त चिकित्सीय कार्य करने में सक्षम नहीं है।
2. चिकित्सक द्वारा एक युक्तियुक्त स्तर की सावधानी नहीं बरती गयी है।
पहले बिन्दु के सम्बन्ध में परिवादीगण की ओर से यह कथन किया गया है कि मरीज परिवादिनी श्रीमती सुमन की बच्चेदानी (गर्भाशय) निकाले जाने की शल्य क्रिया उपरोक्त चिकित्सकगण विपक्षी संख्या-1 व 2 द्वारा की गयी थी, जबकि विपक्षी संख्या-1 डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) मात्र एम0बी0बी0एस0 हैं, उनके पास Gynaecology and Obstetrics से सम्बन्धित स्नातकोत्तर की कोई डिग्री एम0डी0 अथवा एम0एस0 नहीं हैं। अत: वे इस शल्य क्रिया को करने के लिए सक्षम नहीं थीं। इस सम्बन्ध में विपक्षी संख्या-2 डा0 बलराम सिंह द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों का अवलोकन करने से स्पष्ट होता है कि उपरोक्त डा0 चन्द्रलेखा सिंह की एम0बी0बी0एस0 की डिग्री, जो उनके द्वारा कुमारी चन्द्रलेखा कटियार के रूप में सन् 1972 में उत्तीर्ण की गयी, की प्रतिलिपि संलग्न की गयी है। इसके अतिरिक्त किंग जार्ज मेडिकल कालेज लखनऊ के डा0 डी0 कुली, विभागाध्यक्ष, Gynaecology and Obstetrics का प्रमाण पत्र दिनांकित 22.08.1977 की प्रतिलिपि अभिलेख पर है, जिसमें उल्लेख है कि इस विभाग में वर्ष 1976-1977 में लगभग 01 वर्ष डा0 चन्द्रलेखा सिंह द्वारा सीनियर रेजीडेन्ट के रूप में कार्य किया गया है एवं उनके द्वारा विभिन्न Gynaecology की शल्य क्रियाओं में क्रियाशील भाग लिया गया। इसके अतिरिक्त किंग जार्ज मेडिकल कालेज के चीफ सुपरवाइजर द्वारा निर्गत प्रमाण पत्र दिनांकित 31.07.1977 की प्रतिलिपि भी अभिलेख पर है, जिसमें डा0 चन्द्रलेखा सिंह द्वारा एनीथीसिया विभाग में कार्य करने का लम्बा अनुभव होने का प्रमाण पत्र दिया गया है।
इस मामले में स्वीकृत रूप से डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) के -12- साथ उनके पति डा0 बलराम सिंह एम0बी0बी0एस0, एम0एस0 द्वारा संयुक्त रूप से परिवादिनी की शल्य क्रिया किये जाने का कथन किया गया है। डा0 बलराम सिंह ने अपने शपथ पत्र के साथ अपना शल्य क्रिया स्नातकोत्तर का प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि संलग्न की है, जिसके अनुसार कानपुर विश्वविद्यालय के चिकित्सा संकाय से उनके द्वारा शल्यविज्ञान-निष्णात की डिग्री अर्थात् स्नातकोत्तर डिग्री प्रदान किये जाने का वर्णन है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मरीज परिवादिनी श्रीमती सुमन का आपरेशन शल्य क्रिया में स्नातकोत्तर डा0 बलराम सिंह एवं उनकी पत्नी डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक), जिन्हें Gynaecology and Obstetrics का अनुभव प्राप्त था, के द्वारा किया गया है। उक्त शल्य क्रिया जिसमें गर्भाशय निकाला गया था वह कुशल चिकित्सक सर्जन द्वारा एवं अनुभवी Gynaecology and Obstetrics की देखरेख में हुआ, इसलिए यह नहीं माना जा सकता है कि यह शल्य क्रिया ऐसे चिकित्सकों द्वारा की गयी जिनको यह चिकित्सा करने की अर्हता नहीं थी।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णयों में निर्धारित किये गये चिकित्सीय लापरवाही के द्वितीय बिन्दु के सम्बन्ध में परिवादिनी का कथन यह आया है कि विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण द्वारा अकुशलता से प्रसव कराया गया, जिसके कारण बाद में गर्भाशय निकालना पड़ा एवं गर्भाशय निकालने के उपरान्त VESICO VAGINAL FISTULA उत्पन्न हो गया, जिसका इलाज परिवादिनी को अन्य चिकित्सकगण से कराना पड़ा और इस प्रकार विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण की चिकित्सीय लापरवाही के कारण परिवादिनी को शारीरिक एवं मानसिक क्षति हुई।
गर्भाशय निकाले जाने अर्थात् Hysterectomy के सम्बन्ध में चिकित्सीय साहित्य John A. Rock, MD एवं Howard W. Jones III, MD द्वारा लिखी गयी पुस्तक "TE LINDE'S -13- Operative Gynecology" नवां संस्करण पीठ के समक्ष रखा गया, जिसके अनुसार Hysterectomy के मामले 86 प्रतिशत आपरेशन के उपरान्त प्रसव तथा 14 प्रतिशत साधारण प्रसव के उपरान्त पाये जाते हैं। पुस्तक के लेखक के अनुसार गर्भाशय निकालने अर्थात् Hysterectomy के मामले Accreta Uterus तथा Atony of Uterus के कारण होते हैं। शेष 1/3 मामले पेशाब की नली गर्भाशय की शल्य क्रिया के दौरान कट जाने से अथवा फाइब्रोसिस के कारण होते हैं।
"There are several indications for emergency peripartum hysterectomy. The three most common reasons are uterine rupture, abnormal placentation, and uterine atony. Although the exact incidence of emergency peripartum hysterectomy is not known, several authors have reported a rate of 0.004 to 1.5 per 1,000.Obstetric hemorrhage secondary to a variety of etiologies is a common indication reported for peripartum emergency hysterectomy. Clark and associates reviewed 70 cases of emergency hysterectomy for obstetric hemorrhage. Sixty (86%) of these procedures were performed after caesarean delivery and 10 (14%) were performedaftervaginal delivery. Uterine atony and placenta accreta accounted for almost three fourths of the cases. Other indications were uterinerupture, extension of the uterine incision, and fibroids precluding closure of the uterine incision."
Uterus Accreta को वेबसाइट mayoclinic.org में निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया गया है:-
"Accreta is a serious pregnancy condition that occurs when the placenta grows too deeply into the uterine wall. Typically, the placenta detaches from the uterine wall after childbirth. With placenta accreta, part or all of the placenta remains attached. This can cause severe blood loss after delivery."
इसी प्रकार Uterus Atony को वेबसाइट healthline.com में निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया गया है:-
"Atony of the uterus, also called uterine atony, is a serious condition that can occur after childbirth. It occurs when the uterus fails to contract after the delivery of the baby and it can lead to a potentially lifethreatening condition. Know as postpartum hemorrhage."-14-
इस प्रकार उपरोक्त चिकित्सीय साहित्य के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि न केवल आपरेशन के दौरान अनावश्यक कटाव से बल्कि अन्य कारणों से रक्तस्राव अधिक होने का अंदेशा रहता है, जिसके उपरान्त चिकित्सक के पास गर्भाशय निकालकर मरीज का जीवन सुरक्षित करने का उपाय ही होता है। यह शल्य क्रिया के द्वारा प्रसव में 60 प्रतिशत मामलों में इस प्रकार का अंदेशा होना विद्वान लेखक द्वारा राय दी गयी है, जिससे स्पष्ट है कि प्रस्तुत मामले में चिकित्सकगण ने गर्भाशय निकालने का जो निर्णय लिया, वह चिकित्सीय आकस्मिकता के आधार पर भी लिया जा सकता है। जब तक कि यह तथ्य सिद्ध न हो कि अनावश्यक रूप से गर्भाशय मरीज का निकाला गया तब तक यह निष्कर्ष देना उचित नहीं है कि चिकित्सकगण द्वारा लापरवाही के कारण गर्भाशय को निकालने की आकस्मिकता उत्पन्न हुई थी।
इस सम्बन्ध में उपरोक्त विद्वान लेखक ने आगे दिया है कि उनके द्वारा देखे गये 45 प्रतिशत मामलों में पेशाब की नली के कट-फट जाने के आधार पर, 16 प्रतिशत मामले में Uterus Atony के कारण तथा 09 प्रतिशत मामलों में Placenta Accreta के कारण आकस्मिक Hysterectomy का आपरेशन करना पड़ा।
"Chestnut and associates reported that in 44 women undergoing emergency hysterectomy, 20 (45%) procedures were performed for uterine rupture, seven (16%) were performed for uterine atony, and four (9%) were performed for placenta accreta. Other indications included broad ligament hematoma, placenta previa, and chorioamnionitis. Twenty nine of the cases in this series were emergency caesarean hysterectomies, and 15 were postpartum hysterectomies."
अत: उक्त चिकित्सीय साहित्य से यह स्पष्ट होता है कि इस मामले में बिना किसी विशेषज्ञ आख्या अथवा पुष्टिकारक साक्ष्य के अभाव में यह मान लेना उचित नहीं है कि मरीज परिवादिनी श्रीमती सुमन के hysterectomy की शल्य क्रिया चिकित्सीय लापरवाही के कारण हुई थी।
-15-परिवादीगण की ओर से विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण पर यह आरोप भी लगाया गया है कि उनके द्वारा लापरवाही से शल्य चिकित्सा करने के कारण मरीज परिवादिनी श्रीमती सुमन को VESICO VAGINAL FISTULA हो गया था, जिसके सम्बन्ध में लेखक ERIC L. FARQUHARSON, M.D. द्वारा लिखित पुस्तक Textbook of Operative Surgery के पृष्ठ 872 पर दिया गया है:-
"Vesico-vaginal fistula may result from pressure neerosis affecting the contiguous walls of bladder and vagina during prolonged labour, from injury to the bladder during a difficult hysterectomy, from advancing careinoma of the cervix or from post-irradiation neerosis.
Sometime a recent fistula of small size will heal if the bladder is kept empty by an indwelling urethral catheter. Preliminary fulguration of the fistulous track, both eystoseopically and from the vaginal surface, may assist in closure."
इसी प्रकार लेखक Jonathan S. Berek, M.D. द्वारा लिखित पुस्तक Novak's Gynecology में दिया गया है:-
"Vesicovaginal Fistula Vesicovaginal fistulas occur most often after total abdominal hysterectomy for benign gynecologic disease (83). Intraoperative steps to avoid the formation of a vesicovaginal fistula include correct identification of the proper plane between the bladder and cervix, sharp rather than blunt dissection of the bladder, and care in clamping and suturing the vaginal cuff. The development of a postoperative vesicovaginal fistula after hysterectomy is rare, the incidence is as low as 0.2% (82.83).
Patients who have a postoperative vesicovaginal fistula develop a watery vaginal discharge 10 to 14 days after surgery. Some fistulas resulting from surgery are noted as early as the first 48 to 72 hours after surgery (84)."
उपरोक्त चिकित्सीय साहित्य से स्पष्ट होता है कि VESICO VAGINAL FISTULA शल्य चिकित्सा में अधिक कटाव हो जाने के अतिरिक्त अन्य कारणों से भी होता है। लेखन में यह भी कहा गया है कि यदि VESICO VAGINAL FISTULA शल्य क्रिया के दौरान होता भी है तो यह कठिन शल्य क्रिया जो Hysterectomy -16- के कारण की जाती है, के दौरान होता है, जिससे स्पष्ट है कि यह कठिन आपरेशन के कारण ही हो सकता है, जबकि इसके होने के अन्य कारण भी हो सकते हैं। अत: चिकित्सा साहित्य से यह भी स्पष्ट है कि VESICO VAGINAL FISTULA यदि इस मामले में हुआ है तो यह बिना उचित साक्ष्य के उपधारणा कर लेना उचित नहीं है कि यह शल्य क्रिया में असावधानी के कारण हुआ है क्योंकि विशेषज्ञ लेखकों द्वारा उपरोक्त वर्णन किया गया है कि शल्य क्रिया के दौरान विशेषकर जटिल शल्य क्रिया के दौरान उपरोक्त VESICO VAGINAL FISTULA हो सकता है। इसके अतिरिक्त इसके होने के अन्य कारण भी हो सकते हैं।
इस सम्बन्ध में माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित निर्णय हंस मैटरनिटी होम व अन्य बनाम दलजीत कौर, प्रकाशित III (2016) CPJ पृष्ठ 404 (NC) का उल्लेख करना उचित होगा। माननीय राष्ट्रीय आयोग के समक्ष मामले के तथ्य इस मामले के तथ्य से मिलते-जुलते हैं। इस मामले में भी चिकित्सक द्वारा Hysterectomy की शल्य क्रिया की गयी। जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया कि शल्य क्रिया के दौरान रक्तचाप बढ़ने के कारण इस तरह की जटिलता हो सकती है और केवल यही निष्कर्ष निकाला जाना उचित नहीं है कि इस मामले में अत्यधिक रक्तस्राव शल्य क्रिया की चूक के कारण ही हुआ है। इस मामले में साक्ष्य के अभाव में चिकित्सीय लापरवाही नहीं मानी गयी, जिसे माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा पुष्ट किया गया।
माननीय राष्ट्रीय आयोग के समक्ष एक अन्य मामले रजनी तिवारी बनाम जबलपुर हास्पिटल तथा रिसर्च सेन्टर व अन्य, प्रकाशित III (2007) CPJ पृष्ठ 428 (NC) का भी उल्लेख करना उचित होगा। इस मामले में Hysterectomy अर्थात् गर्भाशय के निकाले जाने की शल्य चिकित्सा की गयी। शल्य चिकित्सा के दौरान पेशाब की नली कट गयी। यह पाते हुए कि गर्भाशय शल्य क्रिया के दौरान फूल गया था तथा पेशाब की नली गर्भाशय से -17- चिपक गयी थी एवं शल्य क्रिया के दौरान यह चूक हुई। माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा यह माना गया कि मरीज को उचित इलाज दिया गया है एवं माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा चिकित्सा में लापरवाही के तथ्य को स्वीकार नहीं किया गया।
माननीय राष्ट्रीय आयोग के उपरोक्त निर्णयों को दृष्टिगत रखते हुए इस मामले में भी उपरोक्त आधार पर गर्भाशय निकाले जाने की शल्य क्रिया के उपरान्त VESICO VAGINAL FISTULA उत्पन्न हो गया। यह उपधारणा कर लेना उचित नहीं होगा कि यह चिकित्सीय लापरवाही के कारण हुआ है।
परिवादीगण की ओर से एक तर्क यह भी प्रस्तुत किया गया कि चिकित्सक महोदय ने आक्सीटोसिन नामक दवाई की राय मरीज परिवादिनी श्रीमती सुमन को दी, जबकि यह प्रतिबन्धित दवा है और यह केवल जानवरों को दी जाती है। उक्त के सम्बन्ध में वेबसाइट www.medicalnewstoday.com में आक्सीटोसिन की परिभाषा निम्न प्रकार से दी गयी है:-
"Oxytocin is a peptide hormone and neuropeptide normally produced in the hypothalamus and released by the posterior pituitary. It plays a role in social bonding, reproduction, childbirth, and the period after childbirth."
उपरोक्त परिभाषा में आगे यह दिया गया कि आक्सीटोसिन एक ऐसा हार्मोन है, जो न्यूरोट्रांसमीटर की भांति कार्य करता है तथा यह शिशु जन्म तथा स्तनपान के समय उत्पन्न होता है और इसका प्रयोग प्रसव के दौरान किया जाता है।
वेबसाइट ncby.nlm.nih.gov में यह दिया गया है कि आक्सीटोसिन की भूमिका महिलाओं के प्रसव के दौरान होती है तथा प्रसव के दौरान यह बड़ी मात्रा में उत्पन्न होता है। उक्त वेबसाइट में यह भी अंकित है कि दुग्ध उत्पादन करने वाले जानवरों को अक्सर डेयरी आदि में अवैध रूप से जानवरों का दूध आदि बढ़ाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
उपरोक्त वेबसाइट के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि -18- परिवादीगण की ओर से जो तर्क प्रस्तुत किया गया है कि आक्सीटोसिन दवा जानवरों को दी जाती है, यह तर्क उचित प्रतीत नहीं होता है बल्कि उपरोक्त लेखन से यह स्पष्ट होता है कि यह दवा दूध के व्यवसायी अवैध रूप से जानवरों को दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए करते हैं तथा वास्तव में यह हार्मोन महिलाओं के प्रसव के दौरान उत्पन्न होता है एवं कमी होने पर ऊपर से चिकित्सक द्वारा प्रदान भी किया जा सकता है। अत: परिवादीगण का यह तर्क मानने योग्य नहीं है कि चिकित्सकगण द्वारा परिवादिनी को अवैध एवं प्रतिबन्धित दवा आक्सीटोसिन देकर चिकित्सीय लापरवाही की गयी।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस मामले में विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण द्वारा प्रसव के दौरान अथवा गर्भाशय निकाले जाने में अथवा शल्य क्रिया के उपरान्त VESICO VAGINAL FISTULA उत्पन्न होने इन सभी प्रक्रियाओं में चिकित्सीय लापरवाही सिद्ध नहीं होती है, न ही ऐसा कोई साक्ष्य परिवादीगण की ओर से प्रस्तुत किया गया है। अत: यह तर्क मानना उचित नहीं है कि विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण चिकित्सीय लापरवाही के दोषी हैं और परिवादिनी को चिकित्सीय लापरवाही के कारण शारीरिक तथा मानसिक क्षति हुई है। अत: परिवादीगण को क्षतिपूर्ति प्रदान किया जाना इस मामले में उचित प्रतीत नहीं होता है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा परिवादीगण का परिवाद आज्ञप्त करते हुए जो क्षतिपूर्ति प्रदान किये जाने का निर्देश दिया गया है वह न्यायोचित नहीं है।
तद्नुसार अपील संख्या-1861/2005 डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) व एक अन्य बनाम श्रीमती सुमन व दो अन्य, जो विपक्षी संख्या-1 व 2 चिकित्सकगण द्वारा प्रस्तुत की गयी है, वह चिकित्सकगण द्वारा चिकित्सीय लापरवाही न माने जाने के आधार पर स्वीकार किये जाने योग्य है एवं प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश अपास्त किये जाने योग्य है।
-19-इसी प्रकार अपील संख्या-1967/2005 दि न्यू इण्डिया एश्योरेंस कं0लि0 बनाम श्रीमती सुमन व तीन अन्य, जो बीमा कम्पनी द्वारा प्रस्तुत की गयी है, वह भी स्वीकार किये जाने योग्य है।
अपील संख्या-950/2006 श्रीमती सुमन व एक अन्य बनाम डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) व दो अन्य, जो परिवादीगण द्वारा क्षतिपूर्ति की धनराशि बढ़ाये जाने के लिए प्रस्तुत की गयी है, वह निरस्त किये जाने योग्य है।
आदेश उपरोक्त अपील संख्या-1861/2005 डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) व एक अन्य बनाम श्रीमती सुमन व दो अन्य एवं उपरोक्त अपील संख्या-1967/2005 दि न्यू इण्डिया एश्योरेंस कं0लि0 बनाम श्रीमती सुमन व तीन अन्य स्वीकार की जाती है तथा जिला उपभोक्ता आयोग, कानपुर नगर द्वारा परिवाद संख्या-17/1999 श्रीमती सुमन व एक अन्य बनाम डा0 चन्द्रलेखा सिंह व दो अन्य में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक 05.10.2005 अपास्त किया जाता है।
उपरोक्त अपील संख्या-950/2006 श्रीमती सुमन व एक अन्य बनाम डा0 चन्द्रलेखा सिंह (मृतक) व दो अन्य निरस्त की जाती है।
इस निर्णय की एक प्रति अपील संख्या-1967/2005 एवं अपील संख्या-950/2006 में भी रखी जाये।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(न्यायमूर्ति अशोक कुमार) (विकास सक्सेना) अध्यक्ष सदस्य जितेन्द्र आशु0 कोर्ट नं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR] PRESIDENT [HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER