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Lok Sabha Debates

Further Combined Discussion On The Budget (General) €“ 2011-12 And ... on 11 March, 2011

> Title : Further combined discussion on the Budget (General) – 2011-12 and Supplementary Demands for Grants (General) – 2010-11. (Discussion Concluded).

 

MADAM SPEAKER: Item Nos. 25 and 26 to be taken up together.

जो भी माननीय सदस्य अपना लिखित भाषण देना चाहते हैं, वे कृपया सभा पटल पर दे दें।

…( व्यवधान)

 

*श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): लोक सभा में वर्ष 2011-12 के सामान्य बजट पर चर्चा करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि इस बार का बजट आम आदमी एवं किसानोन्मुखी है। इस बार के बजट में वित्तीय प्रबंधन, विकास दर, कृषि में अधिक समावेश तथा मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने का उपाय वित्त मंत्री प्रणव दादा ने किया है। वित्त मंत्री जी बजट में बिना खर्च को बढ़ाये राजकोषीय घाटे को 5.5औ से 5.1औ तक लाने में सफल रहे हैं। वास्तव में यह वित्त मंत्री के वित्तीय प्रबंधन का कौशल है। आगामी महीनों में मुद्रास्फीति को और कम करने के ा।लए मौद्रिक नीतिगत उपाय किये जायेंगे। वर्ष 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद में वस्तुतः 8.6औ की वृद्धि का अनुमान है। मुद्रास्फीति प्रबंधन संबंधी ढांचागत चिंताओं का समाधान बढ़ती घरेलू मांग के अनुसार कृषि संबंधी आपूर्ति बढ़ाकर तथा सöदृढ़ राजकोषीय समेकन के माध्यम से किया जायेगा। अप्रैल जनवरी 2010-11 के दौरान विगत वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले निर्यात में 29.4औ और आयैंत में 17.6औ वृद्धि हुई है।

          वित्त मंत्री ने कर सुधार के ा।लए प्रत्यक्ष कर संहिता डी.टी.सी पहली अप्रैल 2012 से लागू करने का प्रस्ताव किया है। पहली बार बजट में कांग्रेस यूपीए की सरकार सब्सिडी का लाभ गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को सीधे नकद पैसा देने का प्रस्ताव किया है। भविष्य में मिट्टी का तेल, एलपीजी और उर्वरक की सब्सिडी का लाभ कंपनियों के बजाय आम आदमी को नकद के रूप में मिलेगा। इसके ा।लए सरकार वर्ष 2011-12 में विनिवेश के जरिये 40,000 करोड़ रूपये जुटाने का उपाय करेगी। किसी भी सरकार के ा।लए सबसे बड़ी चुनौती मुद्रास्फीति को कम करके महंगाई पर अंकुश लगाना तथा विकास दर (जीडीपी) बढ़ा करके नये रोजगार ज्यादा से ज्यादा पैदा करना। इसीलिए बजट में कृषि के ा।हतों के ा।लए अधिक से अधिक समावेश करने की व्यवस्था की गई है। इस बार का बजट कृषि के ा।हतों के ा।लए समर्पित किया गया है। भारत सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत 6,755 करोड़ रूपये से बढ़ाकर 7860 करोड़ रूपये किया गया है। सरकार का कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश का उद्देश्य दूसरी हरित क्रंति लाना है। इसके ा।लए देश के किसानों के ऋण प्रवाह को बढ़ाकर वर्ष 2011-12 में किसानों के ा।लए 3,75,000 करोड़ रूपये से 4,75,000 करोड़ रूपये का परिव्यय निर्धारित किया गया है। इन किसानों को जो अपना फसल ऋण समय पर अदा करते हैं उन्हें 4औ पर अल्पावधि फसल ऋण उपलब्ध कराया जायेगा। आर्थिक सहायता को 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत करने का प्रस्ताव किया गया है। इस प्रकार किसानों को 7औ ऋण अब 4 प्रतिशत पर मिलेगा। कृषि निवेश से उत्पादन में वृद्धि होगी। उससे उत्पादन एवं आपूर्ति में र्सेतुलन कायम होगा। तभी महंगाई पर काबू पाया जा सकता है। विगत दिनों खाद्य पदार्थों, खासकर सब्जियों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के कारण ही मुद्रास्फीति 18औ तक पहुंच गई थी, पर पाबंदी लगाई गई। प्याज के आयैंत के ा।लए जीरो इंपोर्ट डयूटी की गई तथा प्याज मंडियों में आयकर विभागों के द्वारा छापे भी मारे गये लेकिन महंगाई को रोकना मुख्यतयाः राज्य सरकार का काम है। क्योंकि वितरण प्रणाली (पीडीएस) राज्य सरकारों के हाथों में है। धारा 3/7 आवश्यक खाद्य वस्तु अधिनियम में भी जमाखोरों एवं कालाबाजारों के खिलाफ कार्यवाही की शक्ति राज्य सरकार में  निहित है। आज राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से पंगु हो गई है। चीनी, मिट्टी का तेल खुले आम ब्लैक हो रहा है। आज केन्द्र सरकार द्वारा जितना गेहूं एवं चावल की मांग राज्य सरकारों के द्वारा किया जाता है उसकी आपूर्ति भारत सरकार केन्द्रीय पूल से करती है। इसीलिए गेहूं एवं चावल के दामों में काफी स्थिरता है। पूर्वी क्षेत्र में हरित क्रंति के ा।लए चावल आधारित फसल प्रणाली में सुधार करने के ा।लए 400 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है।  वर्षा सिंचित क्षेत्रों में 60,000 दलहन ग्रामों को प्रैंोत्साहित करने के ा।लए 300 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है। इसी तरह आयल पाम के पौधों के रोपण के ा।लए 60,000 हैक्टेयर के ा।लए 300 करोड़ रूपये की व्यवस्था बजट में की गई है। पहली बार भारत सरकार के 2012 के बजट में शहरों के किनारे सब्जियों की पैदावार बढ़ाने के ा।लए सब्जी कार्यव्रड्ढम के क्रियान्वयन हेतु 300 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है।

          भारत में पोषक अनाज समाप्ति के कगार पर था। उसके पुनःद्धार के ा।लए बाजरा, ज्वार, रागी और अन्य मोटे अनाज, जो पौष्टिक तथा औषधीय गुणों वाले होते हैं, उसके उत्पादन बढ़ाने के ा।लए 300 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है। इसी तरह पशुधन विकास को बढ़ावा देने के ा।लए 300 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है। 25,000 गांवों के ा।लए त्वरित चारा विकास कार्यव्रड्ढम के तहत 300 करोड़ रूपये की व्यवस्था की गई है। भारत निर्माण कार्यव्रड्ढम के ा।लए मौजूदा वर्ष में 10,000 करोड़ रूपये की वृद्धि करके वर्ष 2011-12 के ा।लए 58,000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। देश में 3 वर्ष में सभी 2,50,000 पंचायतों को ग्रामीण ब्राडबैंड कनैक्विटी मुहैया कराने की योजना है। देश के ग्रामों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत 18 वर्ष के युवकों अथवा युवतियों को 100 दिन के रोजगार के ा।लए 100 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से व्यवस्था देने के ा।लए 40,000 करोड़ रूपये की व्यवस्था की गई है। देश की 22 लाख आंगनबाड़ी कार्यक्रत्री एवं सहायिकाओं का मेहनताना बढ़ाकर 1500 रूपये प्रतिमाह और 750 रूपये प्रतिमाह से व्रड्ढमशः 3000 और 1500 रूपया देने का निर्णय लिया गया है। इस बार के वित्तीय वर्ष के बजट में शिक्षा के परिव्यय में 21,000 करोड़ रूपये आबंटित किये गये हैं, जो बजट 2010-11 में 40 प्रतिशत अधिक है। स्वास्थ्य के ा।लए आयोजना आबंटन में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गई है। वर्ष 2011-12 में देश में 15 मेगा फूड पार्कों की स्थापना होगी।

          भारत का बजट केवल प्राप्तियों एवं खर्चों का लेखा-जोखा मात्र नहीं है बल्कि देश के विकास एवं ग्रोथ दर बढ़ाने के ा।लए योजनाओं में पूंजी निवेश का योजनाबद्ध ढंग से दिया गया ब्यौरा है। बजट के वित्तीय प्रबंधन में सापड्ढतौर से परिलक्षित है कि वर्ष 2011-12 में अवसरंचना (infrastructure)के ा।लए 2,14,000 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है। इसमें 2010-11 के मुकाबले 23.3 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। साथ ही यह कुल आयोजना आबंटन की 48.5 प्रतिशत है। सरकार बाजार से पूंजी निवेश बढ़ाने के ा।लए परियोजनाओं को लागू करने के ा।लए एक व्यापक नीति निर्धारित की गई है। इस वर्ष भारत सरकार द्वारा देश में आम आदमियों के ा।लए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का कानून बना करके खाद्यान्न की गारंटी दी जायेगी। इस के ा।लए खाद्यान्न के भंडारण क्ष़्मता में निजी उद्यमियों द्वारा एवं भंडारण निगमों के माध्यम से वृद्धि की जायेगी। देश के करोड़ों बुनकरों के ऋण वापस न करने के कारण उनके समक्ष भयंकर आर्थिक संकट पैदा हो गया है। पड्ढलस्वरूप, हथकरघा, बुनकर समितियां अलाभकारी हो गई हैं।

          वित्त मंत्री जी ने किसानों की तरह बुनकरों की सहायता के ा।लए नावार्ड को 3000 करोड़ रूपये की सहायता करने की व्यवस्था की है। सावर्जनिक क्षेत्र के बैंकों के ा।लए प्राथमिकता क्षेत्रगत ऋण के अंतर्गत बकाया ऋणों के रूप में 15 प्रतिशत ऋण अल्पसंख्यक समुदायों के बीच बांटने का लक्ष्य रखा गया है। इसी प्रकार देश के रिहायशी इकाइयों के ा।लए आवास ऋण की मौजूदा सीमा को बढा करके 25 लाख रूपये कर दिया गया है तथा आवास ऋण पर ब्याज की मौजूदा स्कीम को उदार बनाने के ा।लए एक प्रतिशत की ब्याज में छूट देने का निर्णय लिया गया है। इस बार बजट में महंगाई को रोकने के ा।लए एवं आम आदमी के सुविधा हेतु टैक्स में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। केवल दायरा बढ़ाकरके संसाधनों को वृद्धि करने का प्रयास होगा।

          हमारी सरकार ने भ्रष्टाचार को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके, इसके रोकने हेतु ठोस उपाय तैयार करने के ा।लए मंत्रियों के समूह का गठन किया है। पहली बार सरकार ने देश के बाहर गये काले धन को वापस लाने हेतु पांच सूत्री कार्य योजना लागू की गई है। काले धन के विरूद्ध लड़ने के ा।लए दूसरे देशों के साथ र्एतर्राष्ट्रीय मंचों पर सूचना के आदान प्रदान के ा।लए समझौता किया गया है। हमारी सरकार ने आम आदमी के बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के ा।लए काम के अधिकार, रोजगार, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार लागू करने के बाद खाद्यान्न के अधिकार के ा।लए विधेयक लाने का निर्णय किया गया है। कांग्रेस एवं यूपीए सरकार ने आम आदमी की सभी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के ा।लए कानून बनाया है। इसके बावजूद विपक्ष कहता हे कि सरकार ने बजट में क्या किया है। इसके ा।लए हम उन्हें दो पंक्तियां समर्पित करना चाहेंगे।

                    "समय की शिला पर मधुर चित्र किसी ने बनाये, किसी ने बिगाड़े"

          इसी के साथ माननीय वित्त मंत्री प्रणवदा के द्वारा प्रस्तुत बजट का समर्थन करता हूं।

*श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी (संत कबीर नगर):  वित्त मंत्री ने अपने बजट में कुछ घोषणाएं की हैं, उनका मैं स्वागत करता हूं, परंतु अभी भी बहुत सारी ऐसी योजनाएं और परियोजनाएं हैं जिन पर अमली जामा पहनाने के लिए बहुत कुछ किया जाना जरूरी है ।

          वित्त मंत्री के ऊपर देश के विकास की गति को बरकरार रखने की जिम्मेदारी और साथ ही आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने की संकल्पना की है । पर आज हम देख रहे हैं कि देश का आम आदमी चाहे वह मेहनतकश किसान हो, मजदूर हो, नौकरीपेशा हो या गृहणी सभी मंहगाई से परेशान है ।

          आने वाले दिनों में जैसाकि सुन रहे हैं, पेट्रोल और डीजल के दाम और बढ़ सकते हैं, कोई शुभ संकेत मंहगाई रोकने के प्रयास में नहीं दे रहे हैं ।

         आजessential commodities जिनमें खाद्य पदार्थ शामिल हैं, के दामों में कोई गिरावट देखने को नहीं मिल रही है । दूध के दाम तो अलग से ही बढ़ रहे हैं ।

          आपने अपने बजट में स्वयं यह माना है कि मुद्रास्फीति को रोकने के लिए सरकार के सामने कृषि उत्पादों की सप्लाई को घरेलू मांग के चलते पूरा करना एक बहुत बड़ा चैलेंज है । योजनाओं का क्रियान्वयन और उनकी गुणवत्ता पर नजर रखना एक अलग ही समस्या पैदा कर रहा है । घोटालों का जिस तरह से ग्राफ बढ़ता जा रहा है वह सरकार की तरफ से भ्रष्टाचार को रोकने के लिए उसकी उदासीनता का द्योतक है । राष्ट्र संपत्ति का इस तरह से दोहन मैं समझता हूं हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल है जिन पर वित्त मंत्री को कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे । सिर्फ पुलिसिया कार्यवाही से बात नहीं बनेगी बल्कि दोषी व्यक्तियों से देश की संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करवानी पड़ेगी । इसी तरह से देश तथा देश से बाहर काले धन की राष्ट्रीय कोष में वापसी के लिए ठोस उपाय करने पड़ेंगे तभी हम राष्ट्र के समक्ष खड़ी हुई चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पायेंगे ।

          वित्त मंत्री ने साल 2010-11 में जीडीपी का ग्रोथ 8.6 प्रतिशत होने का दावा किया है । हम लोग बहुत दिनों से सुन रहे हैं कि यह विकास दो अंकों में हो जायेगा परंतु अभी तक इंतजार ही है।

          कृषि की बात करते हैं तो इस साल बजट में उसमें सुधार लाने के लिए बहुत से प्रस्ताव किए गए हैं । कृषि और संबद्ध क्रियाकलापों के लिए बजट अनुपान वर्ष 2011-12 के लिए 14744 करोड़ रूपये है । इन पैसों को कुछ नई योजनाओं पर भी खर्च करने का प्रस्ताव है जिससे कि कृषि पैदावार में बढ़ोत्तरी हो जिससे हम खाद्य पदार्थों की कमी की समस्या से निजात पा सके । पूर्वोत्तर भारत में हरित क्रंति लाने की मुहिम भी एक स्वागत योग्य कदम है ।

          इस संदर्भ में सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिधनियम का भी लोग इंतजार कर रहे हैं ।

           उत्तर प्रदेश और खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश आर्थिक दृष्टि से काफी पिछड़ा है। इस संदर्भ में बीपीएल सूची में रिवीजन की आवश्यकता है जिससे वंचित वर्गों के ज्यादा से ज्यादा लोग लाभांवित हो सके ।

          यह प्रदेश बिजली की भी भारी कमी से जूझ रहा है । आपने इस वर्ष 6000 करोड़ रूपये राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को आवंटित किए हैं परंतु राज्यों को इसका समय से आबंटन हो सके यह देखना होगा । उत्तर प्रदेश में विद्युत आपूर्ति की बढ़ोततरी से उसका औद्योगिक विकास होगा तथा आर्थिक पिछड़ापन समाप्त होने के आसार पैदा होंगे ।

          इस तरह से प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के 20,000 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है परंतु यह देखा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश को मिलने वाली हिस्सेदारी से उसे वंचित रखा जा रहा है । फलस्वरूप वहां पर प्रस्तावित विकास कार्य बाधित हो रहे हैं जिसका खामियाजा जनता भुगत रही है। मैं राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के संदर्भ में बताना चाहूंगा कि यह योजना धन के अभाव में सुस्त गति से चल रहा है । इस योजना के ऊपर टिप्पणी करते हुए बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जी ने यहां तक कहा था कि राज्यों को जो ट्रंसफार्मर उपलब्ध कराया जा रहा है वह सब स्टैन्डर्ड का है । अतः मैं सरकार से यह मांग करता हें कि इस बजट में इस योजना के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराया जाए जिससे कि सरकार का यह महत्वाकांक्षी योजना सफल हो सके एवं ग्रामीण क्षेत्रों की जनता को इस योजना से लाभ प्राप्त हो सके ।

          इसी तरह से सेन्ट्रल रोड फंड के माध्यम से जो प्रदेश सरकार के प्रस्ताव, वह भी अभी लंबित है ।

          इसी तरह से पूर्वी उत्तर प्रदेश को बाढ़ की विभीषिका से भी जूझना पड़ता है । इस संदर्भ में भी हमें केन्द्र सरकार से मदद की आवश्यकता है परंतु बजट में इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है । इन सबको देखते हुए मेरी वित्त मंत्री से मांग है कि वह देश तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों को सस्ते बीज, कीटनाशक, सिंचाई की सुविधा तथा उनके उत्पादों की लागत मूल्य के अनुसार लाभकारी मूल्य दे ताकि वहां समृद्धि आ सके । इसके लिए मैं वित्त मंत्री से पूर्व उत्तर प्रदेश के लिए विशेष पैकेज की मांग करता हूं ।

          वित्त मंत्री ने 21000 करोड़ रूपये सर्व शिक्षा अभियान के लिए आवंटित किए हैं । यह पिछले आवंटन से 40औ ज्यादा है । शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद राज्यों से इस मद की मांग में वृद्धि होना अवश्यभावी है । मेरी मांग है कि स्तरीय शिक्षा हेतु इस राशि में आवंटित राशि को राज्यों के विकास इन्डैक्स को देखते हुए उसके अनुरूप आवंटित करने की आवश्यकता है जिससे शिक्षा के क्षेत्र में समग्र विकास हो सके ।

          बजट में आंगनबाड़ियों में कार्यरत कर्मियों के वेतन में वृद्धि की गई है । मैं इसका स्वागत करता हूं ।

          इसी तरह जो वित्त मंत्री ने जो कर सीमा में इजाफा किया है । सीनियर सिटीजन और 80 के ऊपर के व्यक्तियों के लिए मैं उसका स्वागत करता हूं तथा उन्हें बधाई भी देता हूं कि वह उनकी सीनियर सिटीजन के प्रति संवेदनशीलता को प्रकट करता है । परंतु मैं साथ ही यह कहना चाहूंगा कि आम वेतनभोगी की कर सीमा को 1,80,000/- से बढ़ाकर दो लाख पच्चीस हजार किया जाए ।

          इसके साथ ही वित्त मंत्री ने सर्विस टैक्स का दायरा बढ़ाया है और जो उसमें वृद्धि की है, वह आम आदमी पर बोझ बढ़ाएगी खासकर 25 बैड या उससे अधिक बढ़े, अस्पतालों पर रोगियों द्वारा ली जा रही सेवाओं पर सर्विस टैक्स तो बिल्कुल ही बेतुका है, इसे वापस लिया जाना चाहिए ।

          गत वर्ष अल्पसंख्यक मंत्रालय का कुल बजट 2514.50 करोड़ का था । परंतु खेद के साथ यहां कहना पड़ रहा है कि मदरसा आधुनिकीकरण योजना में जितने शिक्षकों की नियुक्तियां हुई थीं उनको गत दो वर्षों से वेतन का भुगतान सरकार करने में असमर्थ रही है । यह सिर्फ एक उदाहरण है । मेरा मानना है कि सरकार इस मंत्रालय का बजट और बढ़ाए ताकि इन शिक्षकों को वेतन का भुगतान किया जा सके तथा पूर्ण रूप से अल्पसंख्यक समाज का विकास किया जा सके ।

          आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्रकार की बीमारियां जैसे इनफ्लाटिस इत्यादि बीमारी होने से तथा उचित इलाज नहीं होने के कारण काफी लोगों की मौत प्रतिवर्ष होती रहती है। मेरा सरकार से आग्रह है कि प्रत्येक प्रखंड (ब्लॉक) में एक एवं तथा प्रत्येक जिला में पूर्ण प्रयोगशाला सहित इस बजट में खोलने का प्रावधान किया जाए । एवं स्वच्छता अभियान के तहत प्रत्येक गांव में प्रत्येक घर के अलावा एक सामूहिक सुलभ शौचालय का प्रावधान भीइस बजट में किया जाए ताकि ग्रामीण पुरूष एवं महिलाओं को शौच के लिए जंगल या खुले मैदान में जाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़े । अभी सरकार द्वारा जो स्वच्छता अभियान योजना चलाई जा रही है वह पूर्णतया सफल नहीं है । अतः इसमें उपरोक्त सुझाव सम्मिलित कर इस अभियान को सही दिशा देने का इसी बजट में प्रावधान किया जाए ।

          उत्तर प्रदेश में केन्द्र सरकार के विद्युत प्रतिष्ठानों से 8,753 मेगावाट विद्युत का उत्पादन किया जाता है, परंतु सरकार सिर्फ 38 प्रतिशत की उत्तर प्रदेश को उपलब्ध कराती है । विद्युत की कमी के कारण उत्तर प्रदेश के किसान तथा उद्योग धंधे करने वालों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मेरा सरकार से आग्रह है कि उत्तर प्रदेश में उत्पादित विद्युत का 75 प्रतिशत विद्युत उत्तर प्रदेश को उपलब्ध कराया जाए जिससे यहां के किसानों को तथा उद्योग से जुड़े लोगों को किसी प्रकार की विद्युत की कमी नहीं हो सके ।

          विगत वित्त वर्ष में पीएमजीएसवाई को कुल 14898.50 करोड़ का निधि सरकार ने आवंटित की थी लेकिन सभी को पता है आज शहरों की सड़कें तो ठीक है परंतु गांवों की सड़कों की हालत एकदम विपरीत है । उसमें भी इस वित्त वर्ष के निधि में कटौती की गई है तथा कुल निधि 12667.10 करोड़ का ही प्रावधान किया गया है । मेरा सरकार से आग्रह है कि जहां 80 प्रतिशत देश की जनता रहती है उस ग्रामीण सड़कों को चुस्त-दुरूस्त किया जाए तथा पीएमजीएसवाई को और निधि आवंटित की जाए जिससे गांव की सड़कों को चुस्त-दुरूस्त किया जा सके तथा सरकार का यह महत्वाकांक्षी योजना सफल हो सके ।

           जैसे कि मा0 वित्त मंत्री जी ने अपने 2010-11 के घोषणाओं कार्यान्वयन में उल्लेख किया है कि कृषि हमारे अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है तथा 60 प्रतिशत जनसंख्या का आहार इसी से प्राप्त होता है । चूंकि गत वित्त वर्ष में मा0 मंत्री जी ने 3,75,000 करोड़ रूपया कृषि ऋण प्रवाह में निर्धारित किया था । 7 प्रतिशत ब्याज की दर से तथा समय पर अदायगी करने वाले किसानों को 2 प्रतिशत का सहायता देने का घोषणा किया था । इस वित्तीय वर्ष में इस राशि को बढ़ाया जो 4,75,000/- करोड़ कर दिया तथा सहायता प्रतिशत 3 प्रतिशत कर दिया । महोदया जी मेरा आग्रह हे कि इस राशि को बढ़ाकर 10,0000 करोड़ रूपया कर दिया जाए तथा ब्याज से किसानों को मुक्त कर दिया जाए । आज देश के किसान इसी ब्याज को चुकता नहीं कर पाने के कारण आत्महत्या तक कर लेते हैं । अतः किसानों को ब्याज मुक्त ऋण उपलपब्ध कराया जाए ।

          मैं देश में एक अत्यंत पिछड़ा जिले का प्रतिनिधित्व करता हूं । जहां बाढ़ से किसानों का खरीफ का फसल प्रतिवर्ष बर्बाद हो जाता है तथा किसान शहरों के तरफ मजदूरी करने के लिए पलायन कर जाता है । महोदया जी, आपके द्वारा सरकार से मेरा आग्रह कि पूर्वांचल के किसानों के लिए एक आर्थिक पैकेज की घोषणा इसी बजट सत्र में किया जाए । जिस प्रकार बुंदेलखंड तथा देश के और प्रदेशों के लिए किया गया था तथा इस क्षेत्र के किसानों के फसलों का बीमा सरकार अपने खर्चों से करें अगर किसानों की फसल प्राकृतिक आपदा में नष्ट होती है । पूर्वांचल में प्रत्येक वर्ष घाघरा, राप्ती, कुआनों, आमी, बढ़ी राप्ती तथा गंडक नदी के बाढ़ से फसल तो फसल किसानों के घर, मवेशी यहां तक की जान भी नष्ट हो जाती है और कुछ बचता है तो वह सिर्फ उनके आंखों में आंसू और घोर निराशा । अतः मेरा एक यह भी आग्रह है सरकार कोई एक ऐसा प्रयत्न करे कि इस क्षेत्र के जनता को इस आपदा से बचाया जा सके ।

          पूर्वांचल के किसानों को उनके खेती के लिए खाद बीज तथा सिंचाई के लिए इस बजट में अलग से प्रावधान किया जाए तथा इस क्षेत्र में प्रत्येक प्रखंड के स्तर पर एक-एक कृषि ट्रेनिंग संस्थान बनाया जाए जिससे कि इस क्षेत्र के किसानों को उन्नत कृषि (खेती) करने के लिए शिक्षा मिल सके ।

          इस क्षेत्र में एक भी औद्योगिक कारखाने नहीं है तथा इस क्षेत्र के बेरोजगार युवक पलायन करने पर मजबूर है तथा मुंबई जैसे शहरों में राज ठाकरे जैसे लोगों का प्रताड़ना सहने को मजबूर है। अतः सरकार से मेरा आग्रह है कि इस क्षेत्र में औद्योगिक कारखाने लगाने के लिए इस बजट में प्रावधान करे ।

           इस क्षेत्र में बुनकरों, कासा तथा फुल के बर्तन बनाने वाले कारीगरों तथा टेराकोटा बनाने वाले कारीगरों की बहुत जनसंख्या है । आज देश में खास तौर से गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे प्रदेशों में बड़े-बड़े कपड़े बनाने की मिलें, बर्तन बनाने की कारखाने बन जाने से इन बुनकरों तथा कारीगरों की रोजी-रोटी बंद हो गया है तथा ये भुखमरी के कागार पर खडे हैं ।

          मेरा आपसे आग्रह है कि इन गरीब बुनकरों तथा बर्तन बनाने वाले कारीगरों को सरकार एक पैकेज की घोषणा इसी वित्तीय बजट में करे । जिससे इन गरीब लोगों को रोजी-रोटी का साधन उपलब्ध हो ।

          यह क्षेत्र लघु कॉटेज इंडस्ट्रीज के लिए विश्व विख्यात था । परंतु दुख के साथ कहना पड़ता है कि केन्द्रीय सरकार के उदासीन रवैये के कारण ये लघु हथकरघा उद्योग खत्म हो गया है । मैं आपको बताना चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश का शासन आजादी के बाद सबसे ज्यादा कांग्रेस के हाथ में रहा । आपको बताना चाहूंगा कि ये बुनकर/कारीगर सभी अल्पसंख्यक समुदाय (मुस्लिम) से आते हैं। कांग्रेस हमेशा ही इन समुदाय के लोगों के हित का दम भरती है और ये बहुत ही दयनीय हालात में हैं । अतः आपसे मेरा पुनः आग्रह है कि इनके तथा इनके बच्चों के रोजगार के लिए पैकेज का इसी बजट में प्रावधान किया जाए ।

          हमारे इस संसदीय क्षेत्र का नाम महान सूफी संत कबीर के नाम पर है । अतः इस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र घोषित कर पर्यटन के हिसाब से जितनी सुविधाएं हो वह उपलब्ध कराया जाए । यह एक महान सूफी संत कबीर को श्रद्धांजलि भी होगी । देश में चीनी उत्पादन के संदर्भ में उत्तरप्रदेश एक अग्रणी प्रदेश है । परंतु यहां का ईख उत्पादक किसान की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है । अतः मेरा आग्रह है कि ईख उत्पादक किसान को सरकार एक आर्थिक पैकेज का प्रावधान इसी वित्तीय वर्ष में दे कि यहां के किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके ।

          इस जिले में एक भी राष्ट्रीय स्तर का प्रौद्योगिकी तथा व्यावसायिक शिक्षा केन्द्र नहीं है । यहां के गरीब किसान, मजदूर, बुनकर, कारीगर के बच्चे आर्थिक तंगी के कारण ये शिक्षा से वंचित रह जाते हैं । इन लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि इनको गोरखपुर, लखनऊ, दिल्ली, बंगलौर या अन्य जगहों पर भेजकर पढ़ा सके । मेरा आपसे आग्रह है कि इस जनपद में उपरोक्त शिक्षा संस्थान खोला जाए जिससे कि इस जनपद की गरीब जनता भी ऐसी शिक्षा ग्रहण कर सके । क्रीड़ा-खेल के क्षेत्र में भी यह जनपद बहुत पिछड़ा हुआ है । मेरा आपसे आग्रह है कि खेलों से संबंधित संस्थान तथा राष्ट्रीय स्तर के खेल मैदान (स्टेडियम) का निर्माण कराया जाए । जिससे इस क्षेत्र के युवक खेल (क्रीडा) के क्षेत्र में भी देश तथा प्रदेश का नाम गौर्वान्वित कर सके ।

*श्री हरीश चौधरी (बाड़मेर):माननीय प्रधान मंत्री जी डा0 मनमोहन सिंह के नेतृत्व में एवं आदरणीय श्रीमती सोनिया गांणी जी की अगुवाई में आदरणीय वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने जो बेहद संतुलित बजट पेश किया है जो आर्थिक विकास की दिशा के मार्ग को सुगम बनाएगा एवं समाज के प्रत्येक वर्ग को लाभ पहुंचाएगा । भारतीय अर्थव्यवस्थाविश्व की उन चंद बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जो विश्व व्यापी आर्थिक मंदी के असर को सफलतापूर्वक झेल गई और हमने रह सह कर आर्थिक विकास की दर 8.6औ को हासिल किया है ।

          ग्रामीण एवं कृषि विकास को मद्देनजर इस बजट में कृषि निवेश को बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में कर्ज के लिए 4.75 लाख करोड़ की व्यवस्था की है एवं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का बजट 7860 करोड़ किया है । नाबार्ड के लिए 30 अरब का प्रावधान किया है, खाद की समस्या से निजात पाने के लिए नई फर्टीलाईजर नीति लाई जाने का प्रस्ताव किया है एवं ग्रामीण विकास के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए 180 अरब रूपये की व्यवस्था की है । यह सभी कदम निसंदेह भारतीय कृषि व्यवस्था को विकास गति को तेज करेंगे एवं ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं मिलने के अवसर प्राप्त होंगे ।

          भारत में कच्चे माल की कमी नहीं है आवश्यकता है कि इस कच्चे माल का समुचित उपयोग करके उसका उत्पादन करने की जिससे रोजगार में वृद्धि हो और घरेलू उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो इसके लिए सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन दिए जाने हेतु प्रयास किए हैं । हमारे देश में हर साल 3 अरब की सब्जी एवं फल भंडारण एवं परिवहन के अभाव में खराब हो जाते हैं । इस बजट में सब्जियों, खाद्यान्न एवं फलों के भंडारण एवं उनके प्रसंस्करण किए जाने हेतु इस बजट में प्राथमिकता दी है जिसकी नितांत आवश्यकता थी ।

          इस बजट में उत्तरी पूर्वी राज्य अपनी भौगोलिक कारणों से अन्य राज्यों की अपेक्षा काफी पिछड़े है उनके विकास के लिए सरकार ने विशेष पैकेज की व्यवस्था इस बजट में की है । सदन के माध्यम से सरकार से मेरा अनुरोध हे कि उत्तरी पूर्वी राज्यों की तरह राजस्थान के मरूस्थल इलाका भी भौगोलिक कारणों से अन्य क्षेत्रों से काफी पिछड़े है । मेरे संसदीय क्षेत्र बाड़मेर एवं जैसलमेर में उद्योगों की काफी कमी है जिसके कारण यहां के लोगों को पलायन करके दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है । बाड़मेर में आज देश के कुल पेट्रोलियम पदार्थों का 25 प्रतिशत के करीब उत्पादित हो रहा है और बाड़मेर में सरकारी क्षेत्र में एक रिफाईनरी स्थापित करने की अति आवश्यकता है साथ ही इस क्षेत्र में जो पेट्रोलियम कंपनियां पेट्रोलियम पदार्थों को निकाल रही है उनके द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से यहां के लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए बुनियादी सुविधाएं दिलवाई जाए ।

          हमारा देश के 65 प्रतिशत लोग खेतीबाड़ी पर निर्भर है और देश के लिए अनाज पैदा कर रहा है परंतु उनकी जमीनों को अधिग्रहित करने के लिए पुराने कानूनों का सहारा लिया जाता है जिसके कारण उनको उनकी भूमि का बाजार मूल्य नहीं मिलता है और न ही उनको रोजगार । इसलिए भूमि अधिग्रहण में व्याप्त कानूनों में संशोधन किया जाए जो सरकार ला रही है परंतु इसमें देरी करने से किसानों के साथ अन्याय होगा । भूमि अधिग्रहण तभी किया जाए तो जब अति आवश्यक हो देखा गया है कि चाहे सेना हो, चाहे रेलवे हो, या राज्य सरकार को या केन्द्र सरकार हो यह किसानों से भूमि लेकर छोड़ देती है जहां पर परियोजनाएं नहीं लगी है और जिस कार्यों के लिए जमीन ली गई है वह कार्य नहीं किए जा रहे हैं तो किसानों की जमीन को वापिस कर देना चाहिए । इससे खाद्यान्न के उत्पादन में सहायता मिलेगी । इस बजट में किसान के लिए 7 प्रतिशत पर ब्याज को जारी रखा है और जो किसान समय पर कर्ज को अदा कर देंगे तो उनको 3 प्रतिशत की राहत मिलेगी इससे किसान में ऋण लेने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और कर्ज अदा करने की भी । किसानों का शोषण करने वाले साहूकारों से मुक्ति भी ।

          देश के लिए गरीबी एक अभिशाप है यूपीए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार देने हेतु कई कार्यक्रम दिए हैं जैसे ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा, इन्दिरा आवास, ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल एवं स्वच्छता हेतु कार्य किए जा रहे हैं । ग्रामीण क्षेत्र में किसानों का खुशहाल करने के लिए डेयरी, मत्स्य पालन, मुर्गी पाल, मधुमक्खी पालन जैसे कार्य शुरू किए है जिससे गांव के लोगों को रोजार की तलाश करने के लिए शहरों की तरफ न दौड़ना पड़े । इन सबका परिणाम यह हुआ है कि देश में 1993-94 में 32 करोड़ थे जो घटकर 30 करोड़ से कम रह गए हैं जिस गति से विकास हो रहा है उससे गरीबी का पूरी तरह से उन्मूलन हो जाएगा । इस दस सालों के दौरान साढ़े पांच करोड़ गरीब परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया गया है जो दर्शाता है कि देश में 8.23 प्रतिशत गरीबी हटी है । शहरों में सुविधा दिलाने एवं स्लम मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए कई सुविधाएं दी हैं और राजीव आवास योजना में शहरों के गरीब लोगों को मकानों का मालिकाना हक दिलाने हेतु प्रयास किए जा रहे हैं ।

          विदेशों में हमारे नवयुवकों को उनकी योग्यता एवं तकनीकी शिक्षा के आधार पर अच्छी-अच्छी नौकरी मिल रही है और सर्विस क्षेत्र में हमारे नवयुवक विदेशों में काम करके देश का नाम कमा रहे हैं और विदेशी मुद्रा भारत भेज रहे हैं । पहिले हम मजदूर बनकर विदेश जाते थे और आज हम डॉक्टर एवं इंजीनियर बनकर विदेश जाते हैं । शिक्षा प्राप्ति की ओर जिस प्रकार का उत्साह देखा जा रहा है कि हमारे क्षेत्र में शिक्षा संस्थान कम पड़ गए हैं । हमारे भारत में शिक्षा का अधिकार एवं निशुल्क शिक्षा का अधिकार का कानून बनाने पर हमें विश्व में प्रशंसा मिल रही है । इस बजट में हमने 52.57 हजार करोड़ की राशि का प्रावधान किया है जो एक रिकार्ड है ।

          देश में बच्चों के विकास हेतु सरकार ने बुनियादी सुविधाएं दिलवाई है और इस बजट में आंगनवाड़ी में कार्यरत सहायकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन को दुगना किया है विधव की पेंशन राशि को प्राप्त करने की आयु को 65 से 60 किया है । स्वास्थ्य क्षेत्र में 20 प्रतिशत की वृद्धि की है परंतु जहांपर जनसंख्या घनत्व कम है वहां पर स्वास्थ्य की सेवा ग्रामीण लोग वंचित है । इसलिए स्वास्थ्य सेवा को जनसंख्या का आधार न बनाकर दूरी का आधार बनाया जाए ।

          देश के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां पर पानी की बहुत कमी है जिसके कारण उनके खेतों को पानी नहीं मिलने से फसल पर बुरा असर होता है और दूसरी ओर चारे की समस्या से पशुपालन पर बुरा असर होता है । मेरे संसदीय क्षेत्र में लिफ्ट परियोजना स्वीकृत हो गई है । इस परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर देखा जाना चाहिए और नर्मदा परियोजना का लाभ राजस्थान के मरू भूमि पर दिलाने हेतु जोर दिया जाए ।

          अंत में मैं माननीय वित्त मंत्री जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था के विकास को गति प्रदान करने के लिए कड़ी मेहनत से यह बजट तैयार किया है और इसका तहेदिन से समर्थन करता हूं ।

       

*श्री श्रीपाद येसो नाईक (उत्तर गोवा): माननीय वित्त मंत्रीजी ने वर्ष 2011-12 का बजट देशवासियों के सामने पेश किया । अपेक्षा थी कि देश में हुए भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ोत्तरी के कारण त्रस्त हुई देश की जनता को और बढ़ती हुई महंगाई कारण त्रस्त जनता को कुछ ना कुछ राहत मिलेगी । लेकिन डायरेक्ट टैक्स के अधीन 20 हजार का टैक्स स्लैब (1,60,000 से 1,80,000) तक बढ़ाके सिर्फ 20,000/- की पूरी साल के लिए राहत दिलाई है । और दूसरा आंगनवाड़ी कर्मियों का मानधन रूपये 1500 से 3000 तक बढ़ाया इसके सिवाय आम आदमी की घोर निराशा की गई है ।

          आने वाला बजट कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने वाला होगा ऐसी चर्चा थी लेकिन बढ़ावा देने के बजाय कृषि क्षेत्र का पैरा घटाया गया है यह दुर्भाग्य की बात है । कृषि हमारी रीढ़ की हड्डी है । कृषि उत्पादन बढ़ गया तो देश का आम आदमी ठीक तरह से जीवनयापन कर सकेगा । सरकार ने किसानों के ऋण पर ब्याज यदि कम करते तो किसान के पैर पर खड़े हो सकते थे । मगर सरकार ने आलिशान कारों के ऊपर ब्याज कम कर दिया ताकि अमीर लोगों को और अमीर बनाने का प्रयास किया है ।

          मैं सरकार से यही पूछना चाहता हूं कि महंगाई कम करने के लिए इस बजट में आपने क्या व्यवस्था की है ? महंगाई से आज आम आदमी त्रस्त है । किसान हर दिन आत्महत्या करने लगा है। आखिर यहां का अन्नदाता किसान ऐसी आत्महत्याएं करने लगा तो आम आदमी जियेगा किस के आधार पर ? आज धान, सब्जियों की, दालों की कीमतें बढ़ी है । लेकिन यह पैसा किसानों को नहीं मिलता । बिचौलिया और साठेबाज ही उसका फायदा उठा रहे हैं । सरकार इनके ऊपर कुछ कारवाई नहीं करती । लोग कहते हैं कि साठेबाज और सरकार की साठगांठ है ।

          आज देश ऐसे विकट परिस्थितियों से गुजर रहा है कि आगे अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है । सरकार में भ्रष्टाचार की परिसिमा हुई है । एक के बाद दूसरा स्कैंडल उसमें 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला है। 1,76,000 करोड़ का जो स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा है । कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर हजारों करोड़ का घोटाला हमने देखा है । आदर्श घोटाले जैसे अनेक घोटाले हर स्तर पर होते जा रहे हैं । जब सरकार के ही मंत्री, सांसद घोटाले करने लगे तो साधारण आदमी क्यों नहीं करेगा भ्रष्टाचार ?

          आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान को छू रहे हैं । 60 करोड़ लोगों को दोनों वक्त की रोटी तक नहीं मिल रही है । उत्पादन बढ़ाने की कोशिश नहीं हो रही है । सरकार किसानों को अच्छे बीज नहीं दे पा रही है । उपजाऊ जमीन के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही । किसान खाद की कमी से परेशान है । दूसरी ओर गोदाम की पर्याप्त व्यवस्था ना होने के कारण देश का कई लाखों टन अनाज बाहर सड़ रहा है । आखिर इस के लिए सरकार की ही जिम्मेदारी है । देश का किसान आज संकट में है । कहीं ज्यादा बारिश, कहीं कम बारिश से फसल बर्बाद हो जाती है । कर्ज अदा नहीं कर पाता है । सरकार ने इस बजट में ऋण का ब्याज कम करना चाहिए था। ज्यादा ब्याज के कारण किसान और त्रस्त हो रहा है । अतः मेरी प्रार्थना है कि किसान का ब्याज दर 7 प्रतिशत से 4 प्रतिशत कर उन्हें मदद दी जाए ।

          सरकार ने बहुत योजनाएं देश में चलाई है, लेकिन इनकी अमलबजावनी ठीक तरह से नहीं हो पा रही है । 40 प्रतिशत से ज्यादा बजट का पैसा खर्च नहीं हो रहा है । उसमें भी भ्रष्टाचार है । इस योजनाओं को चलाने के लिए आम आदमी को बैंक कर्ज देने में असमर्थता दिखाते हैं । पीएमआरवाई एसजीआर द्वारा और कई योजना बैंक के कारण सफल नहीं हो पाती है ।

          देश में अनाज का उत्पादन बढ़ा है लेकिन हजारों लाखों टन अनाज मैनेजमेंट के अभाव से गोदामों में और बाहर सड़ रहा है । सड़ा हुआ अनाज गरीबी तक सरकार क्यों पहुंचाने में असमर्थ है? सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से नाकामयाब साबित हुई है । लोगों को सार्वनजिक वितरण प्रणाली का अनाज वक्त पर नहीं मिल रहा है । अतः मेरा आग्रह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार किया जाए ताकि गरीबों को ठीक तरह से अनाज मिले ।

          यूपीए सरकार ने देश को गहरे संकटों में डाल दिया है । भ्रष्टाचार चरमसीमा पर है। मंहगाई ने आम आदमी की रीढ़ तोड़ दी है, किसानों की आत्महत्याएं हर दिन हो रही है, कानून व्यवस्था चरमरा रही है, लुटेरों ने हडकंप मचाया है, दिन-दहाड़े महिलाओं की हत्याएं हो रही है । साठेबाज इस गरम माहौल में अपनी रोटियां सेंक रहा है । किसान, आम आदमी भगवान भरोसे जी रहा है । इन परिस्थितियों से देश को ऊपर उठाने के लिए, देश को खड़ा करने का प्रयास यूपीए सरकार करे यही हमारी मांग है ।

       

*SHRI IJYARAJ SINGH (KOTA): I would like to complement the finance minister on having presented an excellent budget.  The macroeconomic situation under which the budget has been presented is not an easy one.

          We are facing the issue of inflation, which is worldwide, though admittedly the degrees vary.  This is coupled with the fact that a number of nations in the world are still tackling the economic slowdown or are just emerging from it. Fiscal stimulus packages have been used by many countries to battle the economic slowdown.  However, care needs to be taken to ensure that demand is not stimulated to such a degree that demand outstrips supply, and create inflationary pressures.

          What is very welcome is the increased focus on infrastructure.  The outlay on infrastructure has been increased by 23% in 2011-12 to Rs.214 crore. To increase the inflow of funds which can be used for infrastructure development, SEBI approved mutual funds can now receive investments from foreign institutional investors.  In addition, the ceiling on FII investments into infrastructure bonds has been increased to $40 billion.  FII’s can also invest into unlisted bonds with a minimum lock in period of 3 years.  In addition, notified infrastructure dedicated debt funds will now attract a withholding tax of 5% as opposed to the current 20%.  The income tax deduction on the investment in infrastructure bond continues, in order to encourage these kinds of investments.

          One of India’s most valuable assets is its human resource.  This can be a source of great advantage to us in the coming years.  We have a large percentage of our population in the youth bracket, but they need to be well educated, and have vocational skills.  It is with this in mind that there is a big increase in the allocation for education, especially primary education.  The allocation for Sarva Shiksha Abhiyan has been increased by 40%.  The allocation for secondary and higher education has been increased by 24%. Scholarships to those belonging the SC/ST category has been increased and would benefit about 40 lakh students.

          The budget has attempted to increase the efficiency of the segments which are of primary importance for an agrarian economy like India’s.  Agriculture contributes about 24% of India’s GDP, and India is the 2nd largest food producer in the world.  There are increased incentives for investment in godowns, silos, cold chains and refrigerated warehouses.  Infrastructure status has been granted to post harvest storage to enable foreign and increased investment in this sector.  Machinery and equipment used in cold storage, mandis and warehouses has been extended excise duty exemptions. Due to increased demand for food grain and fruit and vegetables, their effective storage is vital.  This would also encourage the food processing industry which depends a lot on the ability to store perishable produce (such as fruits and vegetables) which often end up getting spoiled and rotting in the absence of proper and adequate storage.  Another step in this direction is the proposed setting up 15 food parks.

          To improve the efficiency of farming, steps have been taken to encourage the procurement of agriculture machinery and micro irrigation, by reducing customs duty from 5 to 2.5%, and from 7.5 to 5% respectively.  Micro irrigation methods like drip irrigation and sprinkler systems would be very beneficial where there is need to use water resources effectively in rain-fed and water scarce regions.

          The finance minister has also announced that farmers repaying loans on time will get a discount or incentive of 3%, making their effective rate of interest 4%.  This will be of benefit to countless number of farmers. The finance minister has also attempted to improve agricultural credit further, by infusing Rs.3000 crore into NABARD.

          To further aid development, the allocation to Bharat Nirman, which includes Pradhan Mantri Gram Sadak Yojna, Accelerated Irrigation benefit Programme, Rajiv Gandhi Vidyutikaran Yojna, Indira Awas Yojana, National Rural Drinking Water Yojna and Rural Telephony, has been allocated 58,000 crore, which is an increase of 10,000 crore.

          The wage rates under MNREGA has been indexed to the Consumer Price Index for Agriculture Labour, which will benefit thousands of rural inhabitants.  We have all experienced and seen that subsidies for LPG, Kerosene and fertilizers do not reach where they should, despite the best intentions of the government. Therefore, the stated intent of the Government to move towards a system of direct transfer of cash to those targeted for the subsidies by March 2012, in a phased manner, is most welcome and laudable.  This will also free up resources for use elsewhere by their more efficient use.

          Healthcare allocation has been increased by 20%, which is a very positive step. Rashtriya Swasthya Bima Yojana, which benefits poor and marginal workers, has been extended to MNREGA workers, in addition to others           To enable the common man to have more money left in his pocket in these times when inflation is a worry, the Finance Minister has raised the no tax bracket to Rs.1,80,000.  There have been cuts in excise duty on several items to benefit the common man.

          The age for qualifying as a Senior citizen has been lowered from 65 to 60, and the exemption limit raised from 2,40,000 to 2,50,000.  For citizens over the age of 80, the tax exemption limit has been raised to 5,00,000.  All these measures will help our elderly citizens live better and more honourably.

          However, service tax has been imposed on hospitals having more than 25 beds and being centrally air conditioned.  This will hurt the common man, and effect the smallest hospitals, as a hospital of 25 beds is not very large and in certain weather conditions, air conditioning is a necessity.  The service tax component will be passed on the patients already affected by inflation.  In addition, service tax has been imposed on hotels having a room rate of more than Rs.1000.  This will hurt the tourism industry, which has suffered due to the economic downturn.  Tourists from the US and Europe have dropped in numbers, and are now price sensitive.  Major tourist destinations like Rajasthan and Kerala will be particularly effected.

          One of the very positive steps has been to increase the salaries being paid to Anganbadi workers.  This has been doubled for all categories, and will greatly benefit the workers who generally come from a very impoverished background.

          I once again congratulate the finance minister on a presenting a good budget.

          Finally, I commend the budget.

                                             

*श्री रघुवीर सिंह मीणा (उदयपुर): मैं आदरणीय वित्त मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत 2011-12 के बजट का समर्थन करता हूं । यह गर्व की बात हे कि भारत आज दुनिया में चीन के बाद सबसे तेज गति से विकास की ओर बढ़ने वाला देश है । जब दुनिया के बहुत सारे देश, खासकर विकसित देश, पिछले 2-3 वर्षों में, मंदी के दौर से गुजर रहे थे, भारत की प्रगति सराहनीय रही है ।

          2011-12 में विकास की दर का लक्ष्य 9औ का रखा गया है जोकि निश्चित रूप से हमारी पहुंच में है । कृषि विकास दर 2010-11 में 5.4औ रही है जो कि अच्छे मानसून व सरकार के प्रयासों का नतीजा है । अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों की भी विकास दर अपेक्षाओं के अनुसार हो रही है ।

 

कृषि विकास को महत्व

3.       मैं वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस बार आपने अपने बजट भाषण में कृषि विकास पर फोकस किया है एवं विस्तृत रूप में सरकार की प्राथमिकताओं को सुनिश्चित किया है । आपने बजट में एक स्पष्ट संदेश (message) दिया है कि भारत जैसे देश के लिए दालों एवं तिलहनों में आत्मनिर्भरता उतनी ही आवश्यक है जितना कि गेहूं व चावल में । पहली बार मोटे अनाज (coarse cereals) जैसे बाजरा, मक्का, ज्वार को पोषक (nutiritional) अनाज का दर्जा देकर इसके प्रसंस्करण (processing) को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है । इससे छोटे व सीमांत किसान, खासकर आदिवासी क्षेत्रों के किसानों एवं वर्षा आधारित (rainfed area) खेती करने वाले किसानों को लाभ होगा ।

4.       कई वर्षों से हम सुन रहे हैं कि दूसरी हरित क्रंति की आवश्यकता है जिससे कि देश में खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित किया जा सके । स्वामिनाथन साहब की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने भी इसकी सिफारिश की थी । इस बजट में इसकी घोषणा हुई है कि देश के पूर्वी राज्यों - बिहार, पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, आसाम, छत्तीसगढ़, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसकी शुरूआत करनी है । असल में देश के इन राज्यों में अच्छा व पर्याप्त पानी है, अच्छी भूमि है, परंतु कृषि उत्पादकता बहुत कम है जिसको एक दिशा देकर आसानी से बढ़ाया जा सकता है । इसलिए वित्त मंत्री जी का यह एक सराहनीय कदम है । इसके अतिरिक्त पशु चारे का उत्पादन, भण्डारण क्षमता बढ़ाने और कृषि ऋण की मात्रा को 3.75 लाख करोड़ से 4.75 लाख करोड़ का करना, विशेष कदम है ।

5.       वित्त मंत्री जी ने टिकाऊ खेती (sustainable agriculture) का भी प्रावधान रखा है । इस बारे में मेरा एक सुझाव है कि आदिवासी क्षेत्रों में जहां अब तक रासायनिक खाद (chemical furtilizer) और कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल न के बराबर है वहां एक योजनाबद्ध तरीके से जैविक (organic) फसलों को पैदा करने के आवश्यक सहायता, वित्तीय और तकनीकी सहायता (financial and technical) केन्द्र सरकार की विशेष योजना द्वारा उपलब्ध कराना चाहिए ।

6.       दूसरा सुझाव है कि जैव उर्वरक (bio-furtilizer) व कम्पोस्ट खाद का उत्पादन एक संगठित तरीके से करवाना चाहिए जिससे इसकी गुणवत्ता एवं विपणन सुनिश्चित होगी । किसानों को सस्ती खाद मिलेगी, उनको पशुधन से गोबर प्राप्त होता है उसकी अच्छी कीमत मिलेगी जोकि आज आधे से ज्यादा मिट्टी हो जाता है । हम सब जानते हैं कि इसके इस्तेमाल से जमीन की सेहत व गुणवत्ता बनी रहेगी एवं इसकी ज्यादा पानी प्रतिधारण क्षमता (water retention capacity) होने से कम पानी में ज्यादा उत्पादकता प्राप्त की जा सकेगी । इन फायदों को देखते हुए देश में जैव उर्वरक (bio-furtilizer) का संगठित तरीके से उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है कि इसके उत्पादनकर्ताओं को रासायनिक खाद (chemical furtilizer) की तर्ज पर सब्सिडी उपलब्ध कराएं तथा उसके लिए एक उचित विपणन तंत्र (marketing network) को बढ़ावा दें । चूंकि आदिवासी समाज पशुधन व जंगलों पर आधारित है इस तरह की व्यवस्था से उनको भी फायदा होगा ।

7.       टिकाऊ खेती (sustainable agruculture) के परिप्रेक्ष्य में जल संरक्षण एवं इसके उचित उपयोग का बहुत महत्व है । यद्यपि देश में फव्वारा व बूंद-बूंद सिंचाई (sprinkler and drip irrigation) को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, लेकिन इसकी प्रगति धीमी है । अभी तक देश में केवल 25 लाख हेक्टेयर में यह व्यवस्था हो पाई है । हमें अगले 2-3 वर्षों में कम से कम 150 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखना चाहिए । इससे न केवल पानी की बचत होती है बल्कि उत्पादकता में 25 से 30औ वृद्धि भी होती है । भविष्य में भूमि की उर्वरकता बनी रहती है । लेकिन इसमें शुरूआती खर्चा ज्यादा आता है जोकि छोटे व सीमांत किसानों के बस की बात नहीं है । इसलिए सरकार को इसके लिए 90औ सब्सिडी देनी चाहिए ।

8.       इसके अतिरिक्त देश में कृषि के उपकरण (tractors, thrashers, cultivators) आज भी काफी महंगे हैं एवं आम किसान की पहुंच से बाहर है । इन पर ऋण मिलता है लेकिन ब्याज दर ज्यादा है । जिस तरह से अल्प अवधि के लिए फसल ऋण (crop loan) पर 4औ ब्याज कर दिया है, इसी तरह से इन पर ब्याज दर कम करने की आवश्यकता है । यह इसलिए भी जरूरी हो गया है कि मनरेगा (MNAREGA) में गरीब मजदूरों को रोजगार मिलने से कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त मजदूरों की उपलब्धता नहीं है एवं मजदूरी लागत बढ़ने से किसान की उत्पादन लागत भी बढ़ गई है। समय पर कृषि कार्य (जुताई, बुआई, कटाई) नहीं होने से उत्पादकता भी कम हो जाती है । इसलिए ऐसी स्थिति में कृषि का मशीनीकरण आवश्यक हो गया है जिसके लिए हमें ब्याज दर में ही कमी करने की जरूरत नहीं है बल्कि कृषि उपकरणों का देश में बड़ स्तर पर उत्पादन हो, इसको भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है ।

9.       इसमें कोई संशय नहीं है कि आने वाले वर्षों में देश में खाद्यान्नों की मांग, उत्पादन से ज्यादा होने वाली है । कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा गैर कृषि कार्यों के लिए जा रहा है जोकि देश में बढ़ते विकास का परिणाम भी है । प्रश्न यह है कि इस घाटे की पूर्ति कैसे करें । देश में राष्ट्रीय दूरसंवेदी एजेंसी (National Remote Sensing Agency - NRSA) के अनुसार करीब 55 मिलियन हैक्टेयर (550 लाख हैक्टेयर) भूमि उसर या degraded है हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि कम से कम 15 मिलियन हैक्टेयर जमीन को हम अगले 3-4 वर्षों में कृषि योग्य बना सके । इसके लिए एक विशेष कार्यक्रम (land development) शुरू होना चाहिए जिसकी नजदीकी से निगरानी (monitoring) होनी चाहिए । मैं जानता हूं कि आज भी देश में बहुत से कार्यक्रम चल रहे हैं, भूमि विकास के दावे भी किए जा रहे हैं, लेकिन इस विकसित भूमि से उत्पादन बढ़ा है इसके प्रमाण बहुत कम है । इसलिए मैंने नजदीकी निगरानी का सुझाव दिया है ।

 

चिकित्सा सुविधा का अधिकार

10.     बजट 2011-12 के परिप्रेक्ष्य में एक और बात रखना चाहूंगा, जोकि आदरणीय वित्त मंत्री जी एवं स्वास्थ्य मंत्री जी से संबंधित है । जिस तरह से हमारी सरकार ने रोजगार के अधिकार एवं शिक्षा के अधिकार का प्रावधान किया है और खाद्य सुरक्षा के अधिकार पर अभी विचार हो रहा है, उसी तरह से चिकित्सा सुविधा के अधिकार, विशेषकर गरीब तबकों के लिए, की भी अत्यंत आवश्यकता है । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में करीब एक लाख करोड़ रूपयों की दवाओं का उत्पादन होता है और करीब 50,000 करोड़ रूपये का हम निर्यात (export) भी करते हैं । लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक भारत में अभी भी करीब 65औ जनसंख्या को आधुनिक दवा नहीं मिल पाती है एवं इसमें गरीब लोग सबसे ज्यादा है । इसके कई कारण हैं, दवा नहीं है, दवा की दुकान नहीं है, डॉक्टर नहीं है, नर्स नहीं है एवं दवा की कीमत ज्यादा है ।

11.     एक अनुमान के अनुसार, यद्यपि अमेरिका में 38औ डॉक्टर भारतीय है, हमारे देश में अभी करीब 7 लाख डॉक्टरों की कमी है । यह कमी 2020 तक और बढ़ेगी । 2020 तक 19 लाख डॉक्टर, 37 लाख नर्स तथा 82 लाख पैरा मेडिकल स्टाफ कुल मांग की तुलना में कम रहेंगे । यह एक गंभीर स्थिति है । आज भारत में हर वर्ष करीब 33-34,000 डॉक्टर बनते हैं । नर्स भी हर वर्ष मांग की तुलना में बहुत कम बनती है । क्या उपाय किए जाएं, हमको प्राथमिकता के आधार पर आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है ।

12.     गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं किस तरह से उपलब्ध कराएं यह सुनिश्चित करने की जरूरत है । आज स्वास्थ्य पर करीब 80औ खर्चा व्यक्ति अपनी जेब से करता है, राज्य एवं केन्द्र सरकार दोनों मिल कर करीब 15औ खर्चा करते हैं, बाकी बीमा स्कीमों के मार्फत होता है । आज, औसत तौर पर दवा पर प्रति व्यक्ति खर्चा करीब 300 रू0 प्रति वर्ष होता है । कुल स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्चा, जो अस्पताल में भर्ती होने पर होता है वह करीब 1500 रू0 है । इस आधार पर सरकार यदि बीपीएल (BPL) परिवारों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवा देने का निर्णय लेती है तो कुल वार्षिक खर्चा एक अनुमान के अनुसार 9000 करोड़ रूपये से लेकर 29000 करोड़ रूपये आता है ।

13.     इस बारे में मैं एक उदाहरण, राजस्थान का देना चाहूंगा । वहां पर एसएमएस व अन्य बड़े अस्पतालों में Life Line Stores के मार्फत liquid injectable और intra-venous fluids (ग्लूकोज की बोतलें) बाजार भाव से 20 से 70औ कम कीमत पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं । इस दिशा में "मुख्यमंत्री जीवन रक्षा कोश " योजना के तहत BPL परिवारों को जनवरी, 2009 से मुफ्त इलाज व दवाईयां उपलब्ध कराई जा रही है । यदि कोई दवा या किसी बीमारी विशेष का इलाज सरकारी दुकान या अस्पताल में उपलब्ध नहीं है तो उन्हें निर्धारित अस्पतालों से यह सुविधा दी जाती है । इस योजना के तहत पिछले एक वर्ष में करीब 66 लाख मरीजों का मुफ्त इलाज हुआ एवं राज्य बजट से करीब 65 करोड़ रूपया खर्च किया गया ।

14.     इसको देखते हुए मेरा सुझाव यह है कि केन्द्र सरकार बीपीएल (BPL) परिवारों के लिए स्वास्थ्य गारंटी योजना (Health Guarantee Scheme) के तहत राज्य सरकारों को 70औ हिस्सा देने का प्रावधान करे । राज्य सरकारों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए 30औ व्यय वे स्वयं करे । इसमें जो भी दवाईयां चाहिए वे राज्य सरकार अपने स्तर पर एक निविदा समिति (Tender Committee) के द्वारा दवाईयां जानी-मानी कंपनियों से खरीदे । राजस्थान का अनुभव बताता है कि निविदा प्रणाली (tender system) से बाजार भाव के 10-20औ पर ही दवाईयां खरीदी जा सकती है। मतलब, 10 रूपये की दवा 2 रूपये में खरीदी जा सकती है । इससे रोगियों पर कम भार तो पड़ेगा ही साथ ही सरकार कम पैसे में ज्यादा लोगों का इलाज कराने में सक्षम होगी ।

15.     मेरा यह मानना है कि गरीब को स्वास्थ्य गारंटी (Health Guarantee) देने के लिए 9000 करोड़ रूपये या 29000 करोड़ रूपये बहुत ज्यादा राशि नहीं है । और यदि व्यक्ति स्वस्थ रहता है तो ज्यादा कमाता है एवं इससे उसकी पारिवारिक आय बढ़ने के अतिरिक्त हमारी सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर (GDP Growth Rate) भी बढ़ेगी ।

16.     मैं अपेक्षा करता हूं कि आप मेरे द्वारा दिए गए सुझावों पर गौर करेंगे । आपने मुझे बोलने का मौका दिया, मैं इसके लिए बहुत आभारी हूं ।

17.     अंत में मैं बजट का समर्थन करते हुए अपनी बात को विराम देता हूं ।

                       

*SHRI M. ANANDAN (VILUPPURAM):  I would like to lay my views on the general budget 2011-12 on behalf of AIADMK Party.

          As per the implementation of Special Component Plan (SC) and Tribal Sub Plan (TSP) initiated in 1980 and 1974 to bring SCs & STs into mainstream focusing on their socio and economic development, it has been decided to allocate budget for the same according to their population percentage.  But the allocation has been always very low from the required (16.2% for SCs and 8.2% for STs).  In the present Union Budget also the allocation under SCP is 8.98% and TSP is 5.11%.  For the development of SCs and STs Government should have allocated Rs.55,121 crores and Rs.25,430 crores respectively.  But it has allocated Rs.30,551 for SCs and Rs.17,371 crore for STs.  Out of 104 departments only 24 departments have made allocation under SCP and 26 departments have made allocations under TSP.  It is a sorry affair according to the framed policy this allocation is very low. The number of departments like industries, mines, coal, steel, atomic energy etc. are being left out.

          In the present budget the allocation to Indira Awas Yojana have been reduced from Rs.6000 crores to 3530 crores.  The Ministry of Youth Affairs has reduced its budget on SCP by 32%.  I appeal to the Hon’ble Minister to ensure the following.

1.             allocation under SCP and TSP should be as per the population percentage of SCs and STs.

2.             all departments like Energy, Power, Roads and Bridges, Coal, Petroleum, Mines, Coal, Industry etc., should allocate SCP and TSP

3.             all departments must have separate cell on SCP and TSP which are proactive in ensuring effective implementation of the programme.

4.             clear schemes and programmes which have utility value for the SCs and STs need to be innovated for SCP and TSP.

   

*डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी (अहमदाबाद पश्चिम): यूपीए-2 के हमारे विद्वान और आदरणीय वित्त मंत्री जी के इस बजट में सरकार ने अपनी वित्तीय व्यवस्थापन को बेहद सफल दिखाया है और ग्लोबल मंदी होते हुए भी जीडीपी को 9 प्रतिशत रख के अपनी पीठ खुद ही थपथपाई है । मगर अगर सही मायने में देखा जाए तो ये सिर्फ भ्रामक स्थिति है । सही मायने में देखों तो प्रणालीगत भारतीय अर्थतंत्र का ढांचा ही ऐसा है, जिसकी वजह से हमारा अर्थतंत्र एक आर्थिक सभ्यता की मजबूत बुनियाद पे खड़ा है । मैं मानता हूं कि यही भारतीय वित्तीय व्यवस्था सदियों से चली आती है और जो मजबूत नींव पर खड़ी है । वही शक्ति के तहत हम ग्लोबल रीसेसशन दौर में अपने आपको बचा सके हैं ।

          ये सरकार जीडीपी 9 प्रतिशत हासिल करने का दावा कर रही है मगर वास्तविकता ये है कि जिस "आम आदमी " की दुहाई देके ये सरकार सत्ता में आई है । आज वो आदमी बेबस और महंगाई के चक्कर में फंसा हुआ है । जहां 9 प्रतिशत जीडीपी के बिगुल बजाए जाते हैं वहां वास्तविक स्थिति ये है कि बीपीएल की संख्या तेजी से बढ़ रही है । कमनसीब बात ये है कि ये सरकार बीपीएल धारकों की सही सूची भी नहीं बता सकती है । मेरा स्पष्ट मानना है कि यूपीए सरकार के 9 प्रतिशत जीडीपी के खोखले दावे के बावजूद गरीबों और अमीरों के बीच की खाई तेजी से बढ़ रही है । ये व्यवस्था में कुछ गिने चुने "खास लोगों " को ही फायदा पहुंचा है और "आम आदमी " और गरीब होता जा रहा है ।

          जबसे ये सरकार सत्ता में आई है तब से महंगाई तेजी से बढ़ रही है । यूपीए-2 के दो साल के कार्यकाल में ये ही गलत नीतियों की वजह से महंगाई बढ़ती जा रही है । इस बजट में महंगाई कम करने के लिए कोई भी प्रावधान नहीं रखा गया है ।

          जब महंगाई और डबल डीजीट ईन्फेशन को काबू में रखने को यूनियन सरकार विफल रही है तब एक आशा की किरण है कि महंगाई को काबू में रखने के लिए आदरणीय श्री नरेन्द्रभाई मोदी के नेतृत्व में गठन की गई समिति ने कुछ ठोस उपाय प्रस्तुत किया है, जैसे कि ः

          -         वायदा के व्यापार पर बैन लगाना

          -         एफसीआई का पुनर्गठन और डी सैन्ट्रलाइजेशन

          -         खेत में पैदा फसलें और रिटेल मार्केट की कीमतों की दूरी को कम करना

          -         कानून को सख्त करते रीटेल मार्केट के दामों को स्थिर रखना

          -         लंबी दूरी की, ठोस कृषि नीति बनाना

-         रीटेल कोमोडिटी एक्ट-10 ए को और चुस्त बनाना औरउसके लिए स्पेशीयल एवं फास्ट कोर्ट बनाना

          -         पीबीएम एक्ट में संशोधन करके डीटेइनमेंट अवधि को 6 मास से बढ़ाना             बढ़ती हुई महंगाई और अन्य दामों की वृद्धि को रोकने के लिए ये कमिटी ने प्रस्तुत किए विकल्पों के साथ और अन्य ठोस कदम उठाने की मैं प्रार्थना करता हूं । इस बजट में असंगतताएं एवं त्रुटियां है, जैसे कि

-         रोकाणकारों के लिए कोई प्रावधान नहीं है ।

-         कृषि क्षेत्र में समतोल और लचीली नीति होनी चाहिए ।   

-         लंबी दूरी की डेवलप्मेंट पोलिसी बनानी चाहिए ।   

-         अनुसूचित जाति और जनजातियों की पोप्युलेशन करीब 25 प्रतिशत से भी ज्यादा है, मगर उनके लिए अब के सभी बजटों में .1 से .2 प्रतिशत ही आबंटन किया जाता है । एससी/एसटी के नाम पर दुहाई देने वाली ये खोखली राजनीति का त्याग कर सही आबंटन करना चाहिए । मेरा आपसे नम्र निवेदन है कि इन वर्गों के लिए बजट में 25 प्रतिशत प्रावधान किया जाना चाहिए ।   

-         सर्विस टैक्स में हैल्थकेयर सैक्टर पर भारी बोझ लादा गया है । मैं मानता हूं कि ये आम आदमी के आरोग्य प्रति असंवेदनशील रवैया है । उसे शीघ्र ही वापस लिया जाना चाहिए और सर्विस टैक्स के दायरे को नेशनलाइज करना चाहिए ।   

-         सर्विस टैक्स पेमेंट में ढील पर पैनल्टी रू. 2000 से बढ़ाकर रू. 20,000 की गई है। उसे भी रेशनालाईस करना चाहिए ।   

-         गारमेंट इंडस्ट्री पर 10 प्रतिशत एक्साइज डय़ूटी बढ़ाई गई है । मैं अहमदाबाद (गुजरात) मतक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूं । जैसे अनेक प्रदेशों में ये बढ़ावा की तहत वस्त्र उद्योग मुश्किल में आ पड़ा है, मैं उसे शीघ्र ही वापस लेने का निवेदन करता हूं ।   

-         सहकारी क्षेत्र पर इन्कम टैक्स लेना, सहकारी मूवमेंट को नकारात्मक गति देता है । मैं उसे वापस लेने की प्रार्थना करता हूं ।   

    

          माननीय वित्त मंत्री ने यह बजट में राष्ट्र की गंभीर समस्याओं जैसे की भ्रष्टाचार, कालाधन, बेरोजगारी क्षेत्रों में कोई ठोस सुझाव एवं उपाय नहीं किए हैं । इनके लिए स्पष्ट नीति और प्रावधानों की जरूरत है ।

                                               

* SHRI KHAGEN DAS (TRIPURA WEST): While participating in the discussion, at the outset I would like to say that I strongly oppose the Budget for the year 2011-12. The Union budget for 2011 has singularly failed to protect the interest of common man. The budget is very disappointing particularly for North East special category states. It has failed to address the burning issues the nation is grappling with today like unabated inflation, corruption and black money stashed in foreign bank and unemployment. The Union Budget for 2011-12 is taking the country to a path of unbridled liberalization and open market economy in total disregard to the interest of the common man. The budget will only protect and benefit the Indian corporate and foreign Multi National Companies.

5.                        In the Budget speech, the Finance Minister has claimed the allocation for special assistance has been almost doubled to Rs. 8,000 crore for 2011-12 in order to boost development in the North Eastern Region and Special Category States. Though the BE 2010-11 for special assistance was Rs. 4500 cr, it was actually increased to Rs 11,657 cr in RE 2010-11 for special category states. Thus, the provision foe special assistance has actually come down from Rs. 11,657 cr in RE 2010-11 to 8,000 cr for BE 2011-12. Moreover, additional money as reflected in RE to the tune of Rs. 7,157 cr has been distributed to selected states in a non transparent manner, which is highly discriminatory. I can say Tripura did not get any single penny. The reduced allocation of Rs. 8,000 cr for BE 2011-12 is highly inadequate to take care the developmental needs of the region. This is insufficient particularly in keeping in view the shortfall on committed liabilities like salary, pension etc created by 13th Finance Commission. The Non Plan salary and pension expenditure of Tripura for the current financial year (2010-11) as per R.E. is about Rs.2,034.06 crore and Rs. 661.51 crore respectively whereas the assessment of 13 Finance Commission for these were only Rs. 1,505.05 crore and^ Rs.455.21 crore respectively indicating a shortfall of about Rs. 735.31 cr on salary and pension1

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* Speech was Laid on the Table           alone and the state is struggling to raise resource for plan even upto the last year's level ie Rs.1 1860 cr. The position of other North East states is no better.

          To address problems related to Left Wing Extremism affected districts, an Integrated Action Plan (IAP) for 60 selected tribal and backward districts has been launched in December 2010. The scheme is being implemented with 100 per cent block grant of Rs.25 crore and Rs. 30 crore per district during the years 2010-11 and 2011-12, respectively. But no fund has been kept for those districts which are suffering from other forms of extremism. Tripura, though a small special category state, has been forced to spend large part of its budget on maintenance of Law and order. Police constitute 25% of total employee strength which is a heavy burden on a small State. Yearly increase in salary expenditure is about Rs. 50 crore which is quite substantial. Between 2000-01 and 2009-10, the expenditure of Home(Police) Department has gone up by about Rs. 338 cr yearly. The government of India should shoulder part of this burden by yearly grant for maintenance of Law and Order.

          For MGNREGA, the allocation for this scheme has actually been reduced from 40,100 cr this year to 40,000 cr for 11-12. On the other hand, the wage has been increased and cost of construction materials have gone up, on the other allocation of MGNREGA has been reduced. Even with allocation of Rs. 40,100 crore the actual mandays of work created was much less than 100. Now, with reduced allocation, it will be impossible for the government to guarantee 100 mandays of work to each card holder.

          For Bharat Nirman which consist of PMGSY, AIBP, RGGVY (Rajiv Gandhi Grameen Vidyutikaran Yojana), I AY, National Rural Drinking water Programme and Rural Telephony, allocation has been increased by only 10,000 cr. As the large chunk of additionality will go in Rural Telephony, the provision for 2011-12 is quite inadequate.

          The allocation for IAY has been reduced from Rs. 9333.50 cr. in RE 2010-11 to Rs. 8,996.00 crore in BE 2011-12. The housing for poor in rural areas does not appear a priority for the central government.

          The allocation of PMGSY has been reduced from Rs. 21,110 cr in RE 2010-11 to Rs. 17,789.00 crore for BE 2011-12. With reduced allocation how does the government expect to provide road connectivity to rural areas particularly those in inaccessible and difficult areas of North East?

          Provision for SGSY (Swarnajayanti Gran? Swarozgar Yojana) has been reduced from Rs. 301.00 cr in BE & RE 2010-11 to Rs. 292.40 cr for BE 2011-12. The reduction in allocation indicates lack of commitment of the government for creating self employment of poor particularly SHGs.

          No measures have been indicated in the budget to deal with unprecedented price rise in the country particularly food inflation. The base rate of central excise duty has been increased from 4% to 5% which will add to inflationary pressure on essential commodities.

          No concrete measures to deal with corruption in public life except formation of GOM (Group of Ministers). Five fold strategy mentioned in budget are nothing but existing mechanisms which have proved to be totally ineffective. Similarly, no measure has been announced to bring back money in foreign banks and measures to deal with black money except formation of a task force.

          The Central Government is still pursuing the policy of disinvestment in public sector undertakings and a target of 40,000 cr has been kept for 2011-12. The disinvestment policy will adversely affect the functioning of these undertakings and limit further employment in public sectors.

          There is proposal to increase the income tax exemption limit to 1.80 lakh from 1.60 lakh , but the exemption limit for woman remains at Rs. 1.90 lakh. The women have been given a raw deal in this matter.

          The Budget for 2011-12 on the whole does not hold much promise for the poor. It also lacks focus on the special requirement of the North East of the country.

   

*SHRI SUKHDEV SINGH (FATEHGARH SAHIB):  I thank to the Hon’ble FM, the biggest point that he made in budget was improving the governance.  Hon’ble committed to strengthening all the flagship programmes from Agriculture, Education and healthcare infrastructure.

          I would like to complement to Hon’ble FM for increasing the salaries of the Anganwari Workers, which was I think milestone decision taken by the Hon’ble FM.  It also part of appreciations that Hon’ble FM tried to keep balance between the Urban and Rural and he has tried to please most of us in the interest of the country.

          I come from the state of Punjab, the state totally based on the agriculture, the agriculture is the backbone of the state. The state is totally dependent on agriculture.  So there are some points which I would like to highlights especially for Agriculture Sector of the state of Punjab:-

          I represent a side of the country where more than 70% people of my entire constituency is rural and dependent directly or indirectly on agriculture.  I want to make a request to the Hon’ble FM that Crop Insurance Facilities also provided to the farmers of state of Punjab.  If any provision for Crop Insurance for state of Punjab in this budget, I shall be thankful on the behalf of more than two crore farmers of state of Punjab.
          I am thankful on the behalf of more than two crore farmers of state of Punjab due to 4% rate of interest for farmers in place of 7% in last years but Hon’ble FM the agriculture sector especially small farmers needs more subsidies for their survival because agriculture is not profitable profession this is like a service to the nation country without any profitable motive.
          I am thankful on behalf of farmers of the country regarding agro food processing for giving to more Mega Park in the country but I request to the Hon’ble FM on the behalf of the farmers of Punjab for consideration and providing Mega Park in state of Punjab.
          I thankful to the Hon’ble FM on the behalf of the BPL families of Punjab regarding FM and Govt. giving the direct cash transfer subsidies schemes for BPL families.  I request to the Hon’ble FM that BPL list revised once a every year the person cross the barrier due to more income they deleted from the list and the person involved in financial crisis they shall putted in the BPL list.
          I made a request to the Hon’ble FM on the behalf of the SCs/STs and downtrodden people especially for the women to provide the more funds for their upliftment e.g. education, health and recognition.
          I made the request to the Hon’ble FM the more funds provided for education to the ignored classes and rural areas especially for state of Punjab, because education in rural area of the Punjab totally collapsed.
          Lastly, I thankful to the Hon’ble Speaker Madam for giving me a chance to express my views on the General Budget presented by the Hon’ble FM for 2010-2011.
                               
*श्री प्रेमदास (इटावा):वित्त मंत्री जी के द्वारा रखे गए बजट 2011-2012 में किसानों के लिए सुविधा उपलब्ध कराए जाने के रूप में प्रचारित किया जा रहा है लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है । देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र तथा उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे भूमि अधिग्रहण के कारण कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है और उ.प्र. सहित कई राज्यों में किसानों को दिए जा रहे भूमि के कोड़ियों के दाम के कारण असंतोष निर्माण हो रहा है । अंग्रेजों के द्वारा 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में विसंगतियों के कारण किसानों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है वह विद्रोह की स्थिति में आ गए हैं । इसे देखकर किसान हितैषी नए भूमि अधिग्रहण कानून बनाए जाने की आवश्यकता है ।
          सरकार ने कृषि क्षेत्र में 375000 करोड़ रू0 के पिछले वर्ष के मुकाबले में इस वर्ष 475000 करोड़ रू0 कृषि ऋण के लिए उपलब्ध कराए लेकिन छोटा किसान अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए साहूकारों पर आश्रित है । उसे बैंकों के द्वारा ऋण उपलब्ध नहीं कराया जाता है। मेरे क्षेत्र में ऐसे कई मामले आए हैं फिर इतनी बड़ी राशि के प्रावधान करने का क्या फायदा । किसानों को अच्छे बीज खाद एवं सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के मद में अधिक राशि खर्च करने की आवश्यकता है लेकिन सरकार किसानों का कर्ज लेकर खेती कराने पर अमादा दिखाई देती है । देश के किसान को समृद्ध होने के लिए उसे कर्ज से अधिक सिंचाई और अच्छे बीज की आवश्यकता है लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया है । केन्द्र सरकार के द्वारा स्वास्थ्य से संबंधित क्षेत्र में ध्यान देने की जरूरत है । देश दूर दराज क्षेत्रों से मरीज इलाज कराने आए हैं । उनको तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है । अगर किसी मरीज को गंभीर बीमारी है तो उसे आपरेशन की तारीख 8 माह एवं साल भर तक दे दी जाती है । सरकार ने देश में पांच बड़े अस्पताल खोलने संबंधी चर्चा हुई थी लेकिन उस तरह भी कोई ध्यान नहीं दिया गया अगर एम्स की तर्ज पर पांच बड़े अस्पताल खुल जाते हैं तो देश की जनता को बहुत राहत मिलेगी । देश में सरकारी बड़े अस्पतालों की आवश्यकता है ।
          देश में बढ़ती बेरोजगारी को देखते हुए सरकार बेरोजगार छात्र एवं छात्राओं की तरफ ध्यान देने योग्य कोई भी बात नहीं की गई है । सरकार को देश के छात्र छात्राओं की तरफ ध्याना देना चाहिए ।
          देश में बढ़ती हुई महंगाई को देखते हुए सरकार का ध्यान देश की गरीब जनता की तरफ आकर्षित करना चाहता हूं । अगर सरकार ने खाद्यान्न पदार्थों के बढ़ते दामों की कीमतों में कमी नहीं की तो देश की जनता त्राहिमाम करने लगेगी जिससे कि मेरा सरकार से आग्रह है कि बढ़ती महंगाई को रोकने के लिए सरकार के द्वारा आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है जिससे कि गरीब जनता को राहत की सांस मिल सके ।
                                           
*श्री गोरख प्रसाद जायसवाल (देवरिया): माननीय वित्त मंत्री जी ने जो 2011-12 का जो बजट पेश किया है वे देश की वास्तविक अर्थव्यवस्था से काफी दूर है । उसमें आम आदमी नजर नहीं आ रहा है । उद्योग जगत को सुविधाएं दी है । कृषि को बजट में कृषि के महत्व के हिसाब से कम आवंटन किया है जिससे देश में खाद्यान्न उत्पादन पर बहुत असर पड़ेगा । सरकार काले धन और महंगाई पर बातें ही कर रही है अमल में कुछ नहीं कर रही है ।
          बजट के शुरू में बुनकरों के संबंध में देश में कृषि के बाद हथकरघा क्षेत्र में 65 लोगों को रोजगार मिला हुआ है और इसमें 61 प्रतिशत महिलाएं है जो अपनी पारंपरिक कला को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं और कई आत्म हत्या कर रहे हैं । सरकार ने अनेकों योजनाएं चलाई रखी है परंतु उनका कोई असर नहीं हो रहा है । एक टाईम में भारत का बना कपड़ा का काफी मान एवं सम्मान था जिन्हें आज के आर्थिक स्थिति के कमजोर बुनकरों के पूर्वज बनाया करते थे । बनारसी साड़ी का आज अता पता नहीं है । जो धन बुनकरों के कल्याण के लिए आवंटित किया है वह भी कहा जा रहा है पता नहीं है क्योंकि उनका कोई कल्याण तो हो ही नहीं रहा ।
          इस बजट में पूर्वांचल के विकास की तरफ ध्यान नहीं दिया है । भारत अनेक क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है, फिर भी हमारी आबादी के कई ऐसे हिस्से ऐसे है जिन तक विकास का लाभ अभी तक नहीं पहुंचा है । यह बात उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर विशेष रूप से लागू होती है जिनके क्षेत्र विकसित क्षेत्रों की गति के साथ तालमेल नहीं रख पाए हैं । इन क्षेत्रों के पिछड़ेपन के पीछे अनेक कारण हैं इनमें सड़क, संचार, स्कूल और स्वास्थ्य देखभाल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव शामिल है । महात्मा गांधी जी का स्वप्न था जब तक गांव का विकास नहीं होगा तब तक पूरे भारत का संतुलित विकास नहीं हो सकता है ।
          उत्तर प्रदेश के कई जिले पिछड़े हैं उनके लिए इस बजट में किसी पैकेज दिए जाने का जिक्र नहीं है । देश में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर कर देश का संतुलित विकास होना चाहिए । इसके लिए सरकार प्रयासरत भी है परंतु अभी तक हो रहे पूर्वी उत्तर प्रदेश के अत्यंत पिछड़ेपन से ग्रामीण लोगों का शहरों की तरफ पलायन हो रहा है जिससे लगता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश यानि पूर्वांचल का विकास यथोचित ढंग से नहीं हो हुआ है । अभी तक पूर्वांचल के 29 जिलों में विकास के बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं हुआ है । जिसके कारण पूर्वी क्षेत्र के कुछ जिलों में नेपाल की नदियां हर साल बाढ़ का कहर ढाती हे और पूर्वी क्षेत्र के कुछ जिलों में सिंचाई के अभाव में ये जिले हर साल सूखे की चपेट में आ जाते हैं जिसके कारण पूर्वांचल में भूखमरी, मलेरिया एवं दिमागी बुखार से हजारों की संख्या में लोग मौत के शिकार हो जाते हैं ।
          कई परिस्थितियों ने पूर्वांचल में कई समस्याएं खड़ी कर दी गई है जिसके कारण पूर्वांचल के 29 जिलों को आर्थिक पैकेज दिए जाने की अत्यंत आवश्यकता है । पूर्वांचल का कुम्हार जिसको प्लास्टिक ने मार दिया है । बनारस के आस पास का सिल्क कारीगर भी आज खली बैठा है जिसने पूरी दुनिया में भारत को इज्जत और सम्मान दिलवाया था उसको कच्चा माल सस्ता नहीं मिला रहा है जिसके कारण वह कपड़ा बनाने में असमर्थ है । मछुआरे भी तालाब की कमी एवं नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण से मछलियां नहीं पकड़ पा रहे हैं वे भी बेरोजगार हो गया है । पूर्वांचल में लोगों को अपना जीवन चलाने के लिए कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और कई लोग तो पूर्वांचल में पैदा होने पर अपने आपको बदकिस्मती की श्रेणी में ला रहे हैं और भगवान को दोषी मान रहे हैं ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र देवरिया के अंतर्गत जो छोटे शहर है वहां ग्रामीण बैंकों की शाखाएं नहीं है। पूर्वांचल में विकास न होने से कई अनुसूचित बैंकों ने अपनी शाखाएं बंद कर दी है और ग्रामीण बैंक बंद होते जा रहे हैं और इन अनुसूचित बैंकों में म्यूचल फंड जैसी योजना को नहीं चला रखा है । कइ जगहों पर भूमि का जलस्तर 50 फुट से ज्यादा चला गया है । पूर्वांचल का युवा वर्ग अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहा है क्योंकि पढ़-लिखकर उसको अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है ।
          मेरा संसदीय क्षेत्र देवरिया शिक्षा के क्षेत्र में, सामाजिक क्षेत्र में, आर्थिक विकास क्षेत्र में अभी तक पिछड़ा है एवं गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले गरीब लोगों की संख्या भी ज्यादा है परंतु देवरिया को पिछड़े जिलों में शामिल नहीं किया है इसकी जांच की जाए और देवरिया को पिछड़ा जिला घोषित किया जाए । देश में सरकार ने अत्यंत पिछड़े इलाकों के विकास के लिए क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए 2007 में 259 जिलों में पिछड़ा क्षेत्र विकास अनुदान योजना चलाई है । इस अनुदान से स्थानीय स्तर पर क्षमता पैदा करना और इन पिछड़े क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देना था परंतु योजना आयोग ने समीक्षा के बाद पाया है कि ये योजना भी कारगर नहीं है । जहां तक क्षेत्रीय विकास एवं क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की बात है उसमें पंचायतें एक अहम भूमिका निभा सकती है । परंतु वहां पर भ्रष्ट आचरण एवं पक्षपात ने क्षेत्रीय संतुलन के उद्देश्य प्राप्ति में कठिनाई पैदा कर रही है ।
          देश के कर्ज व्यवस्था पर ध्यान दे तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है । आज देश के हर नागरिक चाहे वह बच्चा क्यों न हो उस पर 29 हजार 800 रूपया का कर्जा है और विदेशी कर्जा 1177 रूपये का है । देश में आज 25 लाख करोड़ रूपया का कर्जा है और इसका ब्याज हम बजट के खर्चा अगर एक रूपया है तो हम 19 पैसे ब्याज के रूप में कर रहे हैं । इस कर्जे से सरकार ने अब तक क्या किया है लगता है कि इन कर्जों का नाजायज उपयोग किया जा रहा है और इस कज के उपयोग करने जो मशीनरी है वह भी अयोग्य एवं अकुशल है । अगर इस कर्ज का उपयोग सही ढंग से किया जाए तो प्रत्येक बेरोजगार को नौकरी मिल सकती है । इस बात का संकेत यही है कि देश में प्रबंध व्यवस्था सही नहीं है एवं वित्त मंत्री जी इस प्रबंध व्यवस्था के मालिक है तो दोष मालिक का ही तो होगा ।
          देखा यह जाता है कि सरकारी योजनाओं का फायदा गरीब किसान नहीं उठा पाते हैं । उसका फायदा अमीर किसान ही उठा रहे हैं । देश में छोटे किसान की मासिक आय केवल 1578 रूपया है और बड़े किसान की आय 8321 करोड़ मासिक है । छोटे एवं बड़े किसान की आय में इतना अंतर । आज देश में दो हैक्टेयर खेत में काम करने वाले किसान 70 प्रतिशत है इस बात का पूरा ध्यान रखा जाए कि केन्द्रीय योजनाओं से छोटे किसान को भी मिले ।
          सूखे से निपटने के लिए बिजली के माध्यम से काफी राहत के काम किए जा सकते हैं । टय़ूब वेल इत्यादि बिजली सेचलाकर खेतों को पानी पहुंचाया जा सकता है । आज उत्तर प्रदेश में जो बिजली की हालत है वे केन्द्र सरकार ने की हुई है । उत्तर प्रदेश के लिए बिजली की मांग एवं आपूर्ति में 3000 मेगावाट का अंतर है । जितनी हमारी बिजली की मांग है उससे बहुत ही कम बिजली दी जा रही है । केन्द्र सरकार से हमारी मांग है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो बिजली की मांग की है उसकी आपूर्ति की जाए । केन्द्र सरकार बिजली उत्पादन करने में हमेशा पीछे रहती है । अगर सूखे से प्रभावित खेतों में सिंचाई नहीं हुई तो उसके लिए राज्य सरकार जिम्मेदार नहीं है अपितु केन्द्र सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है । बारिश होने के लिए कई जगहों पर मेढक मेढकी का विवाह हो रहा है । महिलाएं खेतों में बैलों के स्थान पर स्वयं अपने कंधों पर हल चला रही है कई तरह के टोटके हो रहे है कई मुख्यमंत्री एवं कई मंत्रीगण बारिश करवाने के लिए मन्दिरों में जा रहे हैं । नई सरकार के आते ही मानसून हमसे रूठ गया है ।
          देश में 2007-08 में 109 चीनी मिले बंद पड़ी थी । जो 2009-10 में यह बढ़कर 172 हो गई एवं जून 2010 की स्थिति के अनुसार 23 प्राईवेट एवं 139 कापरेटिव चीनी मिले बीमार पड़ी है। यानि 162 मिले बीमार है अगर बंद चीनी मिलों की संख्या बीमार पड़ी चीनी मिलों की संख्या मिला दी जाए तो इनकी संख्या 334 हो जाएगी । देश की 334 चीनी मिले बंद पड़ी हो और बीमार हो तो इसका मतलब है कि देश में इनको पर्याप्त मात्रा में गन्ना नहीं मिल रहा है या इनकी उत्पादन लागत पूरी नहीं होने से यह घाटे में है या आधुनिक तकनीकी से काम करने की स्थिति में है जिसके कारण एक ओर तो किसानों को गन्ना को बेचने में दिक्कत आएगी उसके आय स्त्रोत घटेगें। दूसरी ओर बेरोजगारी और चीनी के उत्पादन कम होगा । देश के कृषि मंत्री चीनी मिलों के मामले में एक निपुण व्यक्ति है निपुणता के बाद भी देश की चीनी मिलों का यह हाल है तो आगे राम जाने क्या होगा ।
          देश में कृषि के प्रति किसानों का रूझान कम हो रहा है । देश में 40 प्रतिशत से ज्यादा किसान आज खेतीबाड़ी में कोई रूचि नहीं ले रहे क्योंकि किसानों को अपनी उत्पादन की लागत भी नहीं मिल रही है और किसानों के कल्याण की योजनाएं छोटे किसानों तक पहुंच नहीं रही है । उसका फायदा कुछ ही बड़े किसान उठा रहे हैं और कई राज्यों में आत्महत्या खाद्यान्न उत्पादन करने वाला किसान कर रहा है ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत देवरिया एवं कुशीनगर के राष्ट्रीय राजमार्ग दुरस्त नहीं है । देश की सड़क सुरक्षा व्यवस्था अत्यंक खराब है, वाहन शराब पीकर चलाए जाते हैं । देश में 2008 के साल में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 37,096 दुर्घटनाएं हुई और इसमें 42,670 लोगों की मौत हुई और खेद की बात है एक साल बीत जाने के बाद भी सरकार के पास 2009 में इन सड़कों पर कितनी मौते हुई है के आंकड़े सरकार के पास नहीं है । हिट एवं रन मामलों की सूचनाएं सरकार एकत्र नहीं करती है ।
          देश में विदेशी व्यापार घाटा बढ़ रहा है जिसका मतलब है कि विश्व में हम नीचे जा रहे हैं । निर्यात से ज्यादा हम आयात कर रहे हैं और पेट्रोलियम पदार्थों का आयात बड़े पैमाने पर किया जाता है जबकि भारत में पेट्रोलियम पदार्थों के विकल्प उत्पादन किए जाने की काफी संभावनाएं हैं । परंतु हम नहीं कर पा रहे हैं जबकि विश्व का छोटा ब्राजील देश एक-तिहाई विकल्प पेट्रोलियम पदार्थों का उत्पादन कर रहा है ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र में उद्योगों की कमी है और बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही है । देश में रोजगार सृजन के, निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा कमाने में एवं क्षेत्रीय विकास के संतुलित विकास में लघु, कुटीर, कृषि एवं ग्रामीण उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । परंतु औद्योगिक नीतियों में बात तो छोटे उद्योगों के विकास की जाती है परंतु बढ़ावा बड़ी-बड़ी कंपनियों को दिया जाता है । 2009 में देश में 261 लाख सूक्ष्म, मध्यम एवं लघु उद्योग इकाईयां थी एवं कृषि, ग्रामीण, कुटीर एवं लघु उद्योग के 1553 लाख पंजीकृत इकाईयां थी । इन उद्योगों में 51.77 लाख ग्रामीण कार्यरत थे एवं जिसमें 7.36 प्रतिशत महिलाएं थीं । खेद की बात हे कि ईमानदारी से इन छोटे-छोटे उद्योगों का विकास नहीं हो पा रहा है और न ही समुचित मात्रा में उन्हें ऋण मिल पा रहा है । जिससे छोटे-छोटे उद्योगपतियों के बीच कोई उत्साह नहीं है और देश में बेरोजगारी तेजी के साथ बढ़ रही है ।
          इस बजट ने इधर दिया उधर से लिया वाले सिद्धांत अपनाए हैं । प्रत्यक्ष करों में बढ़ोत्तरी की तो अप्रत्यक्ष में बढ़ोत्तरी की । वेट घटाया तो मेट बढ़ाया । जब तक देश में बुनियादी ढांचा ठीक नहीं होगा तब विकास की कल्पना बेकार है । देश की सड़कें ठीक नहीं है, सिंचाई के साधन देश के आधे भाग में है, बेरोजगारी फैल रही है, बेरोजगार आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं । खाद्यान्न का उत्पादन कम हो रहा है, 20 करोड़ एवं उससे ज्यादा वाली लागत परियोजनाएं देश में अपने निर्धारित समय पर पूरी नहीं हो रही है । देश में 31 मार्च 2010 की स्थिति के अनुसार 1005 परियोजनाएं में से 478 परियोजनाएं देरी से चल रही है जिससे उनकी उत्पादन लागत देरी के कारण बढ़ रही है जो सुविधाएं जनता को आज मिल जानी चाहिए वे नहीं मिल पाई है इसके लिए सरकार ने किसी भी अधिकारी को आज तक जिम्मेदार नहीं ठहराया है । सरकारको इसके लिए जिम्मेदारी निश्चित करके सजा दी जानी चाहिए ।
          इस बजट का हमारी वास्तविक अर्थव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है । यह हमारे देश की आर्थिक विकास की गति भी नहीं देगी और गत ही करेगी । इसलिए मैं इसका विरोध करता हूं ।
       
*श्री लक्ष्मण टुडु (मयूरभंज):2011-12 के बजट देश में व्याप्त महंगाई को रोकने में असफल रहेगा और आम आदमी की समस्याओं का कोई निराकरण नहीं करता है । इस बजट में आदिवासियों के विकास की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है जबकि देश में आदिवासियों की जनसंख्या 9  प्रतिशत के बराबर है और बजट का 9 प्रतिशत हिस्सा भी आदिवासियों के लिए नहीं है । 64 साल की आजादी के बाद भी आज जंगलों में आदिवासी नारकीय जीवन बिता रहे हैं और बुनियादी सेवा से पूरी तरह से वंचित है। वन कानूनों के कारण उनको विकास जैसी बुनियादी सेवाएं सड़क, चिकित्सा एवं शिक्षा से वे मुहताज है ।
          देश में आदिवासी क्षेत्र से संबंधित कई योजनाएं कई दशकों से क्लीरेयंस कारण से लंबित है जिसके कारण आदिवासी क्षेत्र के अधिकांश क्षेत्र अभी तक सिंचाई सुविधा से वंचित है । और राष्ट्र का खाद्यान्न उत्पादन को नहीं बढ़ाया जा सकता है । आदिवासी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा के कार्य में कई खामियां हैं और अनावश्यक देरी हो रही है । सिंचाई योजना में देरी से क्रियान्वयन एवं इन सिंचाई योजना में जनजाति क्षेत्र की उपेक्षा पर चर्चा होने से वास्तविक तस्वीर देश के सामने आएगी । केन्द्र सरकार राज्य सरकार को दोषी बताती है और राज्य सरकार केन्द्र सरकार को दोषी बताती है इससे देरी कहां पर हो रही है इससे पता चल जाएगा ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र मयूरभंज में सिमलीपाल एक रमणीय जगह है जो पर्यटन स्थल बनाया जा सकता है परंतु इस रमणीय स्थान पर पहुंचने के साधन नहीं है । अगर इस पर्यटन स्थल तक पहुंचने के लिए आने जाने के अच्छे साधन हो तो विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है । पर्यटन के बढ़ने से यहां के लोगों को रोजगार भी मिलेगा । यहां पर नेशनल पार्क भी है । देवकुंड, खिचिंग एवं लूलंग आदि भी पर्यटन स्थल है जो पर्यटन स्थल के रूप में उन्नयन किए जा सकते हैं। इस पर्यटन स्थन पर आकर्षित करने के लिए रासगोविन्दपुर एयर स्टेप पर छोटे हवाई जहाजों की सेवा शुरू की जा सकती है ।
          गरीब लोगों को आवंटित खाद्यान्न को खुले बाजार में बेचा जा रहा है । सरकार के पास ऐसा कोई आकलन नहीं है जिससे पता लगाया जा सके कि कितना खाद्यान्न काला बाजार में जा रहा है लेकिन देश में 42 प्रतिशत राशन खुले बाजार में चला जाता है। सर्वाच्च न्यायालय ने भी कहा है कि कल्याणकारी योजनाओं के लिए जारी खाद्यान्न केवल काला बाजार में जाता है परंतु सरकार ने इस संबंध में कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की है । यह काम भ्रष्ट अधिकारियों से मिलीभगत से हो रहा है । देश में कई आधुनिक तकनीकी का उपयोग हो रहा है क्यों नहीं सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आधुनिक तकनीकी का उपयोग किया जाए जिससे हम एक ओर तो गरीबों को उनका खाद्यान्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत दिलवा सकते हैं और इस प्रणाली में से भ्रष्टाचार को दूर कर सकते हैं ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र मयूरभंज उड़ीसा का सबसे बड़ा जिला है जहां पर आदिवासी की जनसंख्या बहुत ज्यादा है पर सरकार की स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं आदिवासी गांव तक नहीं पहुंच रही है । समेकित बाल विकास योजना से यहां के बच्चों को विशेष फायदा नहीं हुआ है । सदन के माध्यम से अनुरोध है कि मेरे संसदीय क्षेत्र में चल रही स्वास्थ्य संबंधी एवं बाल विकास योजनाओं की समीक्षा की जाए ।
          भारत अनेक क्षेत्रों में तेजी से प्रगति कर रहा है, फिर भी हमारी आबादी के कई ऐसे हिस्से ऐसे है जिन तक विकास का लाभ अभी तक नहीं पहुंचा है । मेरा संसदीय क्षेत्र मयूरभंज ऐसे जिलों में है । यह बात उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर विशेष रूप से लागू होती है जिनके क्षेत्र विकसित क्षेत्रों की गति के साथ तालमेल नहीं रख पाए है । इन क्षेत्रों के पिछड़ेपन के पीछे अनेक कारण है । इनमें सड़क, संचार, स्कूल और स्वास्थ्य देखभाल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव शामिल है । महात्मा गांधी जी का स्वप्न था जब तक गांव का विकास नहीं होगा तब तक पूरे भारत का संतुलित विकास नहीं हो सकता है । मेरे संसदीय क्षेत्र मयूरभंज में ग्रामीण विकास कार्यों की समीक्षा करके उसमें सुधार किया जाए ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग 5 स्थित है जिसे चार लेन बनाने की स्वीकृति मिल चुकी है पर अभी तक कार्य शुरू नहीं किया गया है । इसे जल्द से जल्द शुरू किया जाए । यह कार्य नहीं होने से यातायात जाम होता है और भीषण दुर्घटनाएं हो रही है ।
          आज देश के 90 प्रतिशत कोयला खदानों, 72 प्रतिशत जंगल और 80 प्रतिशत खनिज उत्पाद क्षेत्रों की कोख में भारत की कुल आबादी का 10 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी बसे हुए हैं और अपनी आंखों से प्रकृति के साथ खिलवाड़ का खेल देख रहे हैं । देश के 15 प्रतिशत भूभाग पर आदिवासी प्रकृति के साथ मिलकर देश में पर्यावरण को कायम रखे हुए हैं । देश में आदिवासी के विकास का नाटक प्रथम पंचवर्षीय योजना के साथ चला था जब 43 योजनाएं चलाई गई थी जो बूरी तरह से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल रही । एक तरह से यह योजनाएं नहीं थी यह तो केवल उप-योजनाएं थी जो कई दूसरी योजनाओं के साथ जोड़ दी गई थी । आज भी शहरों की बुनियादी सुविधाएं एवे औद्योगिकीकरण के संसाधनों को इन आदिवासी क्षेत्रों से जुटाया जाता है । इन आदिवासियों में से 85 प्रतिशत आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं । यह आदिवासी आज अपने को राष्ट्र की मुख्य धारा में अलग-थलग महसूस कर रहे हैं । 2001 की जनगणना के अनुसार कुल आदिवासी की आबादी का 93 प्रतिशत बंधुआ मजदूर है । सदन के माध्यम से सरकार से अनुरोध है कि आदिवासियों के विकास के लिए अलग से प्रयास किए जाएं और जोर दिया जाए ।
          आज के युग में बिजली का बहुत महत्व है । मेरे संसदीय क्षेत्र में अभी तक ऐसे गांव हैं जहां पर बिजली नहीं पहुंची है । इन गांवों का विद्युतीकरण किया जाए जिससे लोगों को बिजली के अभाव में हो रही असुविधा से मुक्ति मिल सके एवं बिजली की आपूर्ति को बढ़ाने के लिए नए बिजली प्लांटें  लगाए जाए ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र के केशोपुर में एवं इसके आस पास सिल्वर कापर के अपार भंडार है । इसका एक सर्वेक्षण किया गया है । परंतु कुछ कारणों से सर्वेक्षण कार्य पूरा नहीं किया गया है । इसका पुनः सर्वेक्षण किया जाए और खनन कार्य के साथ यहां पर सिल्वर एवं कापर आधारित उद्योग लगाए जाए । मेरे संसदीय क्षेत्र में चाईना कले जैसे काओलाईन पदार्थ है । अगर इसके उत्खलन कार्य के साथ काओलाईन आधारित उद्योग को बढ़ावा दिया जाए तो यहां पर व्याप्त बेरोजगारी को दूर किया जा सकता है । इस क्षेत्र में बिजली की कमी है और सौर प्लांट स्थापित किया जाए तो बिजली की कमी की समस्या का निराकरण हो सकता है ।
          शिक्षा के क्षेत्र में मेरे संसदीय क्षेत्र में संतोषजनक काम नहीं हो रहा है और साक्षरता दर अभी तक 50 प्रतिशत से अधिक है । मेरे आदिवासी बहूल्य संसदीय क्षेत्र में केन्द्रीय विश्वविद्यालय को स्थापित किया जाना अति आवश्यक है ।
          सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी आदिवासी क्षेत्र में काम नहीं करना चाहते हैं जिसके कारण आदिवासी के शिक्षा एवं स्वास्थ्य कार्य पर बुरा असर पड़ रहा है । जहां तक शिक्षा के विकास की बात है आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी वर्ग के पढ़े-लिखे लोगों को नौकरी देकर शिक्षा का काम किया जा सकता है वह स्थानीय भाषा को अच्छी तरह से जानते हैं । आदिवासी क्षेत्रों में काम करने के लिए जोखिम भत्ता, आवास एवं अन्य अनुदान इत्यादि पर भी विचार किया जाना चाहिए । निजी क्षेत्र के लोग कई कारणों से आदिवासी क्षेत्रों में पूंजी नहीं लगाना चाहते । इसके लिए पहले सरकार को आगे आना होगा । आदिवासी क्षेत्र में जो उद्योग चलते हैं वहां सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत उस उद्योग के आस पास लोगों को कल्याण संबंधी कार्य करने का प्रावधान है परंतु भारत ने कानून ऐसे बना रखे हैं कि यह उद्योग पर निर्भर करता है वह सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्थानीय लोगों के कल्याण संबंधी काम करे या न करे ।
          इस बजट में गरीब, किसान, एवं आदिवासी एवं महिला वर्ग को कोई फायदा नहीं हो रहा है इसलिए मैं इस बजट का विरोध करता हूं ।
                                                             
*श्री यशवंत लागुरी (क्योंझर):देश के संतुलित विकास में यह आने वाले वित्तीय वर्ष किसी प्रकार से सहायक नहीं है । यह एक घुमावदार बजट है जो एक हाथ से दे रहा है दूसरे हाथ से ले रहा है । ऊपर से देखने में बजट अच्छा सा लगता है परंतु अंदर केवल गरीब को और गरीब कर रहा है और अमीरों को और अमीर कर रहा है । विश्व में कुछ ही देश हैं जो 10 लाख करोड़ का बजट बनाते हैं पर भारत 12 लाख 57 हजार 729 करोड़ रूपये का बजट है जिसमें 9 लाख के करीब आय से मिलेगा इससे यह बजट में 3 लाख करोड़ का घाटा है जो देश में महंगाई को बढ़ाएगा जबकि पहले देश का आम आदमी महंगाई से चूर-चूर हो गया है इसलिए मैं इस बजट के विरोध में खड़ा हुआ हूं ।
          मेरा संसदीय क्षेत्र क्योझर एक आदिवासी बहूल्य क्षेत्र है । इस बजट में एक सरकारी आंकड़ों के आधार पर 9 प्रतिशत से भी अनुसूचित जनजाति के लोग एवं अधिकतर जंगलों में रहते हैं उन्हें Depressed class कहकर भी पुकारा जाता है । पिछले साल उनके लिए 185 करोड़ की व्यवस्था जो इस साल बढ़ाकर 244 करोड़ किया है जो उनके विकास के लिए बहुत ही कम है । इस बजट में आदिवासी के साथ न्याय नहीं हुआ है । आदिवासी हर दृष्टि से कमजोर है और देश की आधुनिक सुविधा से वंचित है । उनके लिए जो कानून बनाए हैं उनको इस तरह से अपनाया जा रहा है कि उनको लाभ के स्थान पर घाटा हो रहा है ।
          बजट में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई स्कीम नहीं चलाई है जिससे देश में भ्रष्टाचार की बीमारी और फैलेगी । मेरे संसदीय क्षेत्र क्योझर में सार्वजनिक वितरण योजना एवं केन्द्र प्रयोजित योजनाएं भ्रष्टाचार के चलते ज्यादा कारगर नहीं हुई है । आज देश में कई विशेषज्ञों ने अवलोकन किया है कि देश में ऐसी धारणा है कि नौकरशाही में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है और सरकार स्वयं मानती है कि यह भयावह समस्या है जिसका समाज पर व्यापक दुप्रभाव पड़ता है परंतु भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने के कार्य में सरकार मंजूरी नहीं देती है और कई बार बड़े गंभीर अपराध पर केवल मामूली दंड देती है जिसके कारण भ्रष्टाचार भष्मासुर की तरह बढ़ता ही जा रहा है । कभी-कभी सरकार भ्रष्टाचारी अधिकारी को दूसरी जगह पर ट्रंस्फर कर पोस्टिंग कर देती है परंतु यह अधिकारी भ्रष्ट आचरण अपनाए बिना बाज नहीं आते क्योंकि चोर चोरी से जाए हैराफेरी से नहीं ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र क्योझर एक सूखा प्रवण क्षेत्र है जहां पर अधिकांश खेती पर सिंचाई की सुविधा नहीं है और एआईबीपी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है । देश में कई इलाके सिंचाई के अभाव में खेती बाडी पर बुरा असर कर रहे हैं । नदियों से सिंचाई व्यवस्था की जा सकती है । दूसरी ओर देश में नदियों में प्रदूषित समस्या बढ़ रही है जबकि इस पर भारत सरकार करोड़ों रूपया कई वर्षों से पानी की तरह बहा रही है जबकि आज प्रथम श्रेणी एवं द्वितीय श्रेणी के शहरों से सीवर का पानी एवं गन्दगी 382540 लाख लीटर रोजाना निकलकर नदियों में बह रहा है जबकि भारत में केवल 117870 लीटर रोजाना इस सीवर के पानी एवं गन्दगी को समाप्त करने की क्षमता है । 270000 लीटर सीवर का पानी या गन्दगी नदियों में मिल रही है । यह तो भला हो राम का कि इस गन्दगी को नदियां अपने बहाव में बहा ले जाती है अन्यथा बड़ी भयानक स्थिति होगी । विदेशों में सीवर के पानी एवं गन्दगी को समाप्त करने की अच्छी व्यवस्था है परंतु भारत में प्रदूषण को रोकने के अच्छे इंतजाम नहीं है ।
          देश में बजट में कई बातें कही जाती है परंतु उस पर पालन सहीं ढंग से नहीं हो पाता है जिससे देश कल्याणकारी योजनाओं का ज्यादा पैसे का दुरूपयोग हो रहा है । देश में सरकार कानून बना देती है और कई दिशानिर्देश जारी कर देती है परंतु उनका पालन हो रहा है या नहीं इस बात की सरकार चिंता नहीं करती है । कृषि क्षेत्र को कुल ऋण का 18 प्रतिशत दिए जाने का प्रावधान तो बना दिया परंतु इसको लागू नहीं किया गया है । आज बैंक कृषि की बजाय उद्योगपतियों को ज्यादा ऋण दिया जाना पसंद करते हैं क्योंकि भ्रष्ट लोगों का यह कमाई का जरिया है । 18 प्रतिशत का लक्ष्य अभी तक नहीं पहुंचा है जिसके कारण आज का किसान साहूकारों की शरण में रहकर शोषित होता रहता है और किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है । देश के वित्त मंत्री किसानों की बजाय उद्योगपतियों के समूहों से ज्यादा समय बिताने में लगाते हैं । किसानों के हित की बजाय कारपोरेट जगह के लोगों का ज्यादा ध्यान रखते हैं । मैं वित्त मंत्री से पूछना चाहता हूं कि वित्त मंत्री जी गत तीन वर्षों के दौरान बड़े घरानों को कितना ऋण दिया गया है और उनकी अदायगी कितनी हो गई और कितनी धनराशि समय पर अदायगी नहीं दी गई । एक बात और जो उद्योग मध्यम किस्म के हैं जहां पर लोगों को अधिक रोजगार मिलता है वहां पर बैंकों द्वारा ऋण की मात्रा कम होती जा रही है ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र क्योझर में कच्चा माल एवं खनिज पदार्थ प्रचूर मात्रा में है जो विदेशों में भेजे जा रहे हैं । अगर उनका उपयोग उद्योग स्थापित करके देश में किया जाए तो रोजगार में वृद्धि होगी और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा । परंतु वित्त का अभाव के कारण ऐसा नहीं हो रहा है । मैं इस क्षेत्र में सरकारी स्टलील प्लांट लगाने की मांग कर रहा हूं परंतु आज तक कार्यवाही नहीं हुई है । विदेश में रहने वाले लोग भारतीय मूल के लोग भारत में निवेश करना चाहते हैं इसके लिए सरकार ने जो नियम बनाए हैं वह इतने कठिन है जिनके कारण अपने देश के प्रति हमदर्दी रखने वाले यह भारतीय मूल के लोग सरकार के कामकाज के कारण भारत में निवेश करने में असमर्थ है। कितने भारतीय मूल के लोगों ने भारत में निवेश किया है इसके आंकड़े सरकार के पास नहीं है । यह रूकावटे कुछ औद्योगिक घरानों के दबाव में हो रही है क्योंकि वह नहीं चाहते है कि विदेशों से भारत में निवेश हो क्योंकि इससे उनको कम्पटीशेसन करना पड़ेगा और भारत के आद्योगिक घराने प्रतियोगिता के खेल में काबिले योग्य नहीं है क्योंकि उनके बढ़ने का एकमात्र रास्ता सरकारी संरक्षण है जो उपभोक्ता को मिलना चाहिए परंतु हमारे देश में यह संरक्षण बड़े औद्योगिक घराने को मिलता है । 2008-09 में 7,314 करोड़ रूपये का निवेश हुआ था जो घटकर 2009-10 में 1,691 करोड़ रह गया है यानि एक साल में यह निवेश की मात्रा 5700 करोड़ के लगभग कम हुई । इस निवेश में भारत में रोजगार और उत्पादन बढ़ने के आसार होते हैं परंतु सरकार की गलत नीतियों से इस निवेश से होने वाली रोजगार और उत्पादन वृद्धि को प्राप्त करने में असमर्थ है ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र क्योझर में रोजगार के अभाव में शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं यह बजट बेरोजगारी को दूर करने में सहायक नहीं है । बेरोजगारी की अनदेशी की गई है । देश में बेरोजगारी आज से दस वर्ष पूर्व 2.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जो 2004-05 में यह बढ़कर 2.3 प्रतिशत हो गया है और आज 5 प्रतिशत से भी ज्यादा की दर से बढ़ रही है एवं 2005 से 2008 के बीच दो तीन राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में सार्वजनिक क्षेत्र में बेरोजगारी वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ रही है जबकि इन सार्वजनिक क्षेत्रों में खरबों अरबों रूपयों के मूल्य का निवेश हो रखा है एवं सात से दस राज्यों में निजी क्षेत्रों में भी बेरोजगारी तेजी के साथ बढ़ रही है जिन राज्यों में बेरोजगारी बढ़ी है वहां केन्द्र सरकार ने उद्योग को लगाने के लिए प्रयास नहीं किए हैं जिसके कारण इन राज्यों के लोग अन्य राज्यों में रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं ।
          जुलाई 2010 तक जनजातीय भूमि अन्य संक्रमण के 4.77 लाख मामले पंजीकृत किए गए जिसमें 8.10 लाख एक भूमि कवर हुई है । खेद के साथ सदन को सूचित करना पड़ रहा है कि 3.78 लाख मामलों का जिसके अंतर्गत 7.86 लाख कवर है उनका निर्णय न्यायालय को करना पड़ा है जो काम सरकार को करना चाहिए था उसे न्यायालय को करना पड़ा । और न्यायालय ने हस्तक्षेप करके 2.09 लाख मामले का निर्णय जनजातियों के पक्ष में दिया जिसमें 4.06 लाख एकड़ भूमि कवर थी । जिसका सीधा मतलब है कि यह सरकार जनजाति विरोधी है और जनजातियों को अपने हक के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़ी ।
          कोयला खानों एवं अन्य खनन कार्यों में सुरक्षा निर्देशों की खुली अवहेलना हो रही है जिससे आए दिन खनन कार्यों में घातक दुर्घटनाए हो रहे हैं और गरीब मजदूरों की मौत हो रही है । 2008 में 145 घातक घटनाएं खानों में हुई है और इन दुर्घटनाओं में 179 मजदूर मारे गए । 2010 में मारे गए मजदूरों की संख्या 175 थी । दूसरी तरफ श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत खान सुरक्षा महानिदेशालय का कहना है कि सुरक्षा मानदंडों के नियमों की उल्लंघन की कोई विशिष्ट जानकारी उनको नहीं है जबकि भारत सरकार खानों की सुरक्षा का जिम्मा खान सुरक्षा महानिदेशालय को देती है और इसके कार्यालय पर करोड़ों रूपया हर साल खर्चा हो रहा है । इस तरह के महानिदेशालय की क्या जरूरत है अगर खानों में असुरक्षा बढ़ रही हो ।
          देश में अवैध खनन के मामले बढ़ रहे हैं । 2006 में 36,677 अवैध खनन के मामले थे जो बढ़कर 2008 में 43,560 हो गए हैं । राज्य सरकारों ने 1,47,922 वाहन जब्त किए जो अवैध खनन के कार्यों में लगे हुए थे एवं केवल 4,827 मामलों की एफआईआर दर्ज की गई । 39,483.96 लाख रूपये जुर्माने के तौर पर प्राप्त किए है इससे पता लगता है कि देश में अवैध खनन कार्य बड़ी मात्रा में हो रहे हैं और अवैध खनन के कानूनों की धज्जियां उड़ रही है ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र क्योझर में सिंचाई एवं पेयजल के स्त्रोत में कई पारंपरिक जल स्त्रोत है जिस पर सरकार कोई विशेष ध्यान नहीं दे रही है । देश में औसत वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 1869 बिलियन घन मीटर है और उसमें से हम केवल 1123 बिलियन घन मीटर का उपयोग कर रहे हैं क्योंकि हमारे कई पुराने डैम एवं जलाशय जर्जर हालत में है । सरकार ने ग्यारहवीं योजना में 10,000 करोड़ धनराशि का प्रावधान किया है परंतु उस पर केवल अभी तक केवल 25 प्रतिशत भी खर्च नहीं हुआ है जिससे यह पता लगता है कि हमारे डैम एवं जलाशय के मरम्मत कार्य सही ढंग से नहीं हो रहा है जिसके कारण जल संरक्षण की समस्या बढ़ती जा रही है ।
          मेरे संसदीय क्षेत्र क्योंझर में आदिवासी लोगों को केन्द्र की खाद्यान्न योजनाओं से यथोचित लाभ नहीं मिल रहा है । केन्द्र सरकार ने गरीबों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली आरभ की थी परंतु आज लगभग 358 करोड़ रूपये का खाद्यान्न कल्याणकारी योजनाओं एवं राशन की दुकानों पर दिए जाने की बजाय खुले बाजार में चला जाता है। इस तरह से गरीबों का राशन यह माफिया लोग डकार जाते हैं । 2008-09 में केन्द्र सरकार ने 49000 करोड़ रूपये की खाद्यान्न सब्सिडी प्रदान की है । भ्रष्टाचार की शुरूआत राशन की दुकान आवंटित होने से शुरू हो जाती है । एक अनुमान है कि हर साल राशन दुकानदार राशन का खाद्यान्न काले बाजार में बेचकर 10 करोड़ कमाते हैं और इसकी कोई शिकायत करते हैं तो शिकायतों पर भी कोई कार्यवाही नहीं होती है ।
          यह बजट बढ़ती महंगाई को रोक नहीं पाएगा, गरीबी एवं आम आदमी के हितों पर चोट करता है । इसलिए इस बजट का विरोध करता हूं ।
                             
*श्री दत्ता मेघे (वर्धा):सबसे पहले मैं माननीय वित्त मंत्री महोदय को इस बात की बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने जहां भारत के गरीब लोगों को राहत देने की कोशिश की है वहां उन्होंने ऊंचे वर्ग के लोगों को अपनी आय में से कुछ और सरकार को देने के लिए प्रेरित किया है । एक तरफ उन्होंने जहां देश के किसानों के लिए खजाना ही खोल दिया है वहां आम आदमी को आय कर में छूट देने की घोषणा करते हुए गरीब आदमी के लिए बनने वाले मकानों को भी दिल खोलकर सरकारी राहत देने की कोशिश की है । उन्होंने व्यक्तिगत आयकर की सीमा 1 लाख 60 हजार रूपये से बढ़ाकर 1 लाख 80 हजार रूपये कर दी है और 80 साल से अधिक उम्र के वृद्ध आदमियों के लिए यह सीमा 5 लाख रूपये करने की घोषणा की है । इसी तरह से बड़े बुजुर्गों के लिए पेंशन 200 रूपयों से बढ़ाकर 500 रूपये कर दी है । ये सब स्वागत योग्य कदम है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वित्त मंत्री जी ने इस बजट के माध्यम से भविष्य के भारत का ध्यान रखा है और ग्रामीण व कृषि क्षेत्र से लेकर नई पीढ़ी के लिए शिक्षा का समुचित प्रबंध करने की कोशिश की है ।
 
भारत निर्माण योजनाएं           मैं सरकार का ध्यान भारत निर्माण योजनाओं की तरफ दिलाना चाहता हूं । यह अच्छी बात है कि इस वर्ष 2011-12 के लिए भारत निर्माण को कुल मिलाकर 58,000 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं । यह मौजूदा वर्ष से 10,000 करोड़ रूपये अधिक है । केन्द्र सरकार द्वारा योजना के तहत जो लक्ष्य दिल्ली में निर्धारित किए जाते हैं, राज्यों तक पहुंचते वे सिकुड़कर एक-चौथाई से भी कम रह जाते हैं । भारत निर्माण के तहत पांच साल पहले यानी 2005-06 से 2008-09 तक एक करोड़ हेक्टेयर खेतों को सिंचिंत करने का लक्ष्य रखा था, परंतु योजना कार्यकाल पूरा होने के बाद भी लक्ष्य की परिधि में रखे किसानों के अधिकतर खेत पानी केलिए तरसते रहे हैं । कोई भी राज्य सरकार लक्ष्य प्राप्त करना तो दूर, इसके आसपास तक फटकने में भी सफल नहीं रही । 2008-09 में योजना के 9878.26 हजार हेक्टेयर सिंचाई के लक्ष्य के विपरीत 1196.777 हेक्टेयर का लक्ष्य ही प्राप्त हो सका । मेरा निवेदन यह है कि नरेगा, मध्यान्ह भोजन, सर्वशिक्षा अभियान, जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन समेत ऐसी कई योजनाओं का मकसद न सिर्फ शोषित-वंचित लोगों का उत्थान करना है बल्कि मौजूदा क्षेत्रीय व सामाजिक असंतुलन को खत्म कर इसमें एकरूपता लाना भी है । आज आवश्यकता इस बात की है हमारी सरकार सामाजिक विकास को सबसे ज्यादा तरजीह दे । हमारे विदर्भ क्षेत्र में सिंचाई की स्थिति अत्यंत दयनीय है ।
 
प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क निर्माण योजना           इस योजना के अंतर्गत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण तो हो रहा है, लेकिन सड़कों की हालत अत्यंत खराब है । उनकी देखरेख करने का कोई समुचित प्रबंध नहीं है । मेरे निर्वाचन क्षेत्र में तो सड़कों की हालत बहुत ही खराब है । इसलिए मेरा निवेदन है कि इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ।
 
शिक्षा संबंधी सुधारों की आवश्यकता           यह खुशी की बात है कि सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में मौजूदा वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक धन की व्यवस्था की है । वित्त मंत्री महोदय ने अपने बजट भाषण में कहा है कि माध्यमिक शिक्षा सभी के लिए सुलभ हो, उच्च शिक्षा क्षेत्र में हमारे विद्वानों का प्रतिशत बढ़ और कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था हो, इसके लिए प्रयास किए गए हैं । हमारे देश में ऐसे भी बच्चे हैं जो प्राइमरी, मिडिल या दसवीं के बाद आगे नहीं पढ़ पाते हैं। हमारे देश में ऐसे भी स्कूल हैं जो छप्परों में चल रहे हैं । इस तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है ।
          सरकार ने इस बात की घोषणा की है कि जिन राज्यों में केन्द्रीय विश्वविद्यालय नहीं खोला गया है उन राज्यों में केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोले जाएंगे । मेरा निवेदन यह है कि राज्यों के जो अपने विश्वविद्यालय हैं उनके शिक्षा के स्तर में सुधार लाया जाना चाहिए और उनको केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के स्तर का बनाया जाना चाहिए ।
 
बेरोजगारी की समस्या           मंत्री महोदय ने अपने भाषण में कहा है कि 2025 तक हमारे देश में 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय कामकाजी आयु के हो जाएंगे । इस दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक है कि हमें इन नवजवानों के लिए रोजगार के अवसर देने होंगे । अभी भी अनेक सरकारी कार्यालयों में नई भर्ती पर प्रतिबंध लगा हुआ है । कई कार्यालयों में ठेके पर कर्मचारियों को रखा जाता है और कुछ समय के बाद उनको बेरोजगार छोड़ दिया जाता है । यह प्रथा उचित नहीं है ।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं           वित्त मंत्री महोदय ने स्वास्थ्य के लिए 2011-12 में आयोजना व्यय को 20 प्रतिशत तक बढ़ाकर 26,760 करोड़ रूपये करने का प्रस्ताव किया है । मैं सरकार का ध्यान इस बात की तरफ दिलाना चाहता हूं कि ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के कारण लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और अनेक बार मृत्यु भी हो जाती है ।
          हमारे देश में डाक्टरों का प्रतिशत हमारी आबादी का बहुत कम है । इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़ाया जाए और जो डाक्टर गांवों में और दूरदराज के क्षेत्रों में काम करते हैं उनको प्रोत्साहन देने के लिए विशेष प्रावधान किया जाना चाहिए और उनको विशेष पदोन्नति भी दी जानी चाहिए ।
 
बिजली उत्पादन में वृद्धि           महोदय, मैं सरकार का ध्यान बिजली उत्पादन की तरफ दिलाना चाहता हूं । हमारे विदर्भ क्षेत्र में स्थिति यह है कि घंटों तक बिजली नहीं आती है और लोडशेडिंग किया जाता है । पर्याप्त मात्रा में बिजली न मिलने के कारण खेती पर बहुत बुरा असर पड़ता है ।
          अंत में मैं यह कहना चाहता हूं कि यह बजट आम लोगों के हित में है । इसमें हर वर्ग का ध्यान रखा गया है । इस बजट में किसानों को लाभ पहुंचाया गया है । महिलाओं और वरिष्ठ नागरिको के लिए आयकर में छूट की सीमा बढ़ाई गई है । मैं समझता हूं कि यह बजट आर्थिक वृद्धि की चुनौतियों का मुकाबला करेगा । वित्त मंत्री जी ने यह एक अत्यंत सराहनीय कार्य किया है।
                     
*SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM):     I would like to request the Hon’ble Finance Minister to withdraw the concession given for import of bamboo sticks. Import duty is reduced from 30% to 10%.
          This will have an adverse effect on the producers whose number in their lakhs for whom this is the only livelihood. Most of them are from are from Tripura and North Eastern States. In fact more relief should be given to these workers and provide them further incentives.  Bamboo must be brought within the ambit of the agriculture domain.  This will enable more bamboo industry to come up. Dumping from China and Vietnam must be checked.
          Thank you and I support the budget proposals.
                             
*श्री राकेश सचान (फतेहपुर):मैं वित्त मंत्री द्वारा 2011-12 का बजट जो सदन में पेश किया गया है उसमें बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं । बजट में वित्त मंत्री द्वारा भ्रष्टाचार व काले धन के मुद्दों से निपटने के लिए सरकार कोई ठोस उपाय नहीं ढूंढ सकी है । विदश में जमा कालाधन वापस लाने के लिए कोई ठोस उपाय फार्मूला नहीं खोज सकी है । 75 लाख करोड़ डॉलर काला धन अगर सरकार हिन्दुस्तान ले आए तो देश का संपूर्ण विकास हो सकता है । इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम देशहित में उठाना चाहिए ।
          लंबे समय से इस देश का किसान एवं कृषि क्षेत्र उपेक्षित है । इसको सुधारने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की है । देश की 60 प्रतिशत भूमि सिंचित नहीं है । उसे सिंचित करने का कोई उपाय नहीं किया गया है । ना ही कोई बजट का आवंटन किया गया है । नहरों में टेल तक पानी नहीं जा रहा है । हमारे निर्वाचन क्षेत्र में किसान सिंचाई न हो पाने से भुखमरी के कगार पर है । हमारा क्षेत्र जनपद फतेहपुर उ0प्र0 गंगा एवं यमुना नदी के बीच का क्षेत्र है। अगर सरकार यमुना व गंगा में बांध बनवाने की सरकार व्यवस्था इस बजट में कर दें तो फतेहपुर, कौशाम्बी, इलाहाबाद के किसानों का भला हो सकता है, क्योंकि राम गंगा व निचली राम गंगा नहरों का पानी टेल तक 20 वर्षों से नहीं गया है । उन्हीं नहरों में गंगा नदी व यमुना नदी का पानी लिफ्ट कर के उन्हीं नहरों में डाल दिया जाए तो सिंचाई हो सकती है और नलकूप में अधिक धन आवंटन का प्रावधान इस बजट में किया जाए ।
          आजादी के इतने वर्षों बाद भी आज तक इस देश की कृषि नीति नहीं बनाई गई जो एक दुर्भाग्यपूर्ण है । इस देश के किसानों का आज भी वह अपनी जमीन का असली मालिक नहीं । सरकार जब चाहे उसकी जमीन अधिग्रहित कर उसे कौड़ियों के दानों में हथिया लेती हैं । वह बेचारा कुछ नहीं कर सकता है। अंग्रेजों के द्वारा बताए गए इस काले कानून को विधेयक लाकर संशोधन होना चाहिए । जमीन का मालिकाना हक किसान को मिलना चाहिए । वित्त मंत्री द्वारा किसानों को ब्याज की दर में छूट की गई है कि जो किसान समय से किस्त देकर समय सीमा में कर्ज अदा करेगा उसे 3 प्रतिशत की ब्याज दर पर छूट मिले । गणित की आप अभी तक इस देश में सर्वे कराकर इस सदन को अवगत कराए कि पूर्व में देश के कितने किसान हैं जो कर्ज समय से चुकाते हैं तो पता चलेगा । 1 प्रतिशत से ज्यादा संख्या किसानों की नहीं है जो समय से कर्ज चुकाते हैं इसलिए मैं मांग करता हूं कि वित्त मंत्री जी ने जो समय सीमा बांधी उसे खत्म करे तभी किसानों को लाभ मिलेगा ।
          हरित क्रंति लाने के लिए जो आवंटन किया गया है वह कम है । दलहन-तिलहन सब्जियों की पैदावार बढ़ाने के लिए भी बजट में धन का कम आवंटन किया गया है । इस बजट में धन का आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए ।
          सात हजार करोड़ किसानों को फर्टिलाइजर में धन आवंटन किया गया है लेकिन फर्टिलाइजर कहां से लायेंगे सदन को अवगत करायें ।
          सबसे अधिक निराशाजनक बात है कि सरकारी खर्चों में कमी लाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं । राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के आसार बिल्कुल नहीं है क्योंकि कोई ठोस कार्य योजना प्रस्तुत नहीं की गई है ।
          बेलगाम महंगाई को देखते हुए आयकर में दी गई छूट एक तरह से न के बराबर है ।
          महंगाई रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए गए जिससे नतीजे मिलने में काफी समय लगेगा । मध्य एशिया में अगर पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़े तो महंगाई और बढ़ेगी । इस बजट से केन्द्र सरकार के प्रति आम आदमी की नाराजगी दूर होने की संभावनाएं शून्य हैं ।
          आम बजट 2011-12 में सेवा कर से संबंधित नए प्रावधान से होटल में न सिर्फ खाना खाना महंगा हो जाएगा बल्कि ठहरने और जीवन बीमा प्रीमियम जमा करने में जेब ढीली करनी पड़ेगी ।
          इस बजट में महंगे इलाज से कराह रहे लोगों का दर्द और बढ़ जाएगा । किसी भी तरह की बीमारी से पैथालॉजी में जांच कराने पांच फीसदी सेवा कर देना होगा । मैं वित्त मंत्री से मांग करता हूं कि इस देश के गरीब आदमी आम आदमी को मुफ्त इलाज हेतु इस सदन में एक विधेयक लाए और देश के हर व्यक्ति को मुफ्त इलाज की व्यवस्था कराने की घोषणा सरकार करे । फतेहपुर दो महानगरों के बीच में है यहां पर एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के स्तर का अस्पताल खोला जाए जिससे इस क्षेत्र के लोगों को अपना इलाज कराने के लिए न भटकना पड़े ।
          शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यकों का ध्यान नहीं रखा गया है । 20 प्रतिशत हिस्सेदारी न होने से अल्पसंख्यक वर्ग में नाराजगी है । उत्तर प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा है । मेरे निर्वाचन क्षेत्र फतेहपुर में कोई केन्द्रीय विद्यालय नहीं है, इसे खोलने की मैं मांग करता हूं । इसे इस वर्ष के बजट में धन का आवंटन किया जाए ।
          बीपीएल का सर्वे 2002 में कराया गया था जबकि 9 वर्षों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या बढ़ गई है । पुनः सर्वे कराके नए बीपीएल कार्ड बनाए जाए जिससे गांवों में रहने वाले गरीब लोगों को सरकारी सहायता का लाभ मिल सके ।
          इस बजट में वित्त मंत्री जी ने रेशम पर छूट दी है लेकिन देश का 80 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है जो सूती एवं खादी पहनती है । उसमें छूट दी जानी चाहिए , वह नहीं दी गई, जो दी जानी चाहिए ।
          आज देश में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन बेरोजगारों को रोजगार मिले उसका कोई भी उपाय इस बजट में नहीं किया गया है । जबकि इस देश में लगभग 40 करोड़ लोग पढ़े-लिखे बेरोजगार है । उनको काम दो या बेरोजगारी भत्ता कि व्यवस्था इस बजट में होनी चाहिए ।
          अतः मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि सांसद विकास निधि जो दो करोड़ रूपये है, उसे बढ़ाकर कम से कम 10 करोड़ की जाए जिससे क्षेत्र का विकास हो सके । पिछले बजट में मैं आपको व प्रधानमंत्री जी को इस सदन के लगभग 200 संसद सदस्यों के हस्ताक्षर कराकर एक पत्र भी आपको दिया था कि क्षेत्रीय सांसद विकास निधि बढ़ाए जाने से इससे देश में पेयजल की समस्या को देखते हुए प्रत्येक लोक सभा क्षेत्र में प्रति सदस्य को 1000 हैंडपंप देने की मांग भी की गई थी लेकिन आप द्वारा कोई व्यवस्था नहीं किया गया है । मैं वित्त मंत्री जी से मांग करता हूं कि इस बार आप जब रिप्लाई दें तो अवश्यक इसमें सदन को अवगत कराए । अंत में मैं अपनी बात का समर्थन करते हुए समाप्त करता हूं ।
                   
*श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह): सर्वप्रथम मैं माननीय वित्त मंत्री जी द्वारा वर्ष 2011-12 का केन्द्रीय बजट पेश करने के लिए हार्दिक बधाई देना चाहता हूं क्योंकि बजट पेश होने के बाद बदहाल बाजार की अवस्था में सुधार आये। परन्तु, आज आजादी के 63 वर्षों के बाद भी देश की आर्थिक तस्वीर कुछ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती। आज जितने भी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को बनाया गया है उनकक कार्यान्वयन  के मापदण्ड में कई विसंगतियां व्याप्त हैं। आज देश भीषण महंगाई और भ्रष्टाचार के दंश से व्यथित है। कुछ करोड़ की संख्या में सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग का गठन हो जाता है, कुछ विशेष लोगों के लिए रियायत दर पर खानपान व्यवस्था उपलब्ध करा दी जाती है। परन्तु, आज देश के करोड़ों बीपीएल और एपीएल परिवारों की भूख और फरियाद को देखने वाला और सुनने वालों की संख्या में काफी कमी है।
           खाद्य मुद्रास्फीति फरवरी 2010 में 20.2 प्रतिशत पर पहुंच गयी थी और पुनः यह दर दिसम्बर, 2010 से फरवरी, 2011 तक करीब 18 प्रतिशत, जबकि सरकारी आंकड़े 9.3 प्रतिशत बताये जाते हैं।  आज हम कृषि प्रधान देश में कृषि के क्षेत्र में जो विकास करना चाहते हों, वह नहीं कर पाये। आज देश का सामान्य किसान बदहाली की जिंदगी जी रहा है, वहीं शहरों के फार्म हाउस के किसानों की फसल इतनी अच्छी होती है कि वह रातोंरात धनवान हो जाते हैं। इस पर सरकार को ध्यान देना होगा।
          अभी हाल में आर बी आई गवर्नर ने मनरेगा के श्रमिकों का पारिश्रमिक भुगतान बैंकों के माध्यम से करने की विवशता दिखाई है क्योंकि हमारे देश के कुल गांवों की संख्या के अनुपात में बैंकों की संख्या काफी कम है। देश के बैंकों में डकैती, चोरी और अपराधिक घटनाओं में वृद्धि हो रही है, परन्तु इसे रोकने हेतु सरकार के द्वारा कोई प्रभावी कदम नहीं उठाये जाते हैं। इससे भी दुखद स्थिति देश में जाली मुद्राओं के विचलन का है।
          आज जिस रफ्तार से देश में काले धन का प्रचलन और देश का पैसा विदेशों में जमा है, उसके लिए सरकार के पास कोई नीति नहीं है। आज देश में जिस प्रकार महंगाई दर बढ़ी है, उसके अनुपात में आयकर में सामान्य श्रेणी के लिए छूट सीमा 1,60000 से बढ़ाकर 1,80000 रूपया किया गया है, वह उचित नहीं है।  आज के परिवेश में यह छूट सीमा 2,50000 रूपया होना चाहिए। कृषकों के उपज के लिए बाजार व्यवस्था प्रत्येक पंचायतों में बैंकों की स्थापना और झारखंड के कृषक, जो अभी हाल में अकाल से जूझ रहे हैं, उनके फसलों के क्षतिपूर्ति के लिए विशेष/अतिरिक्त निधी का आबंटन करने की आवश्यकता है। अभी एन.एच के उन्नयन एवं विकास के लिए मंत्रालय द्वारा 21 करोड़ की मांग की गई     थी, लेकिन वित्त मंत्रालय द्वारा आधे से भी कम राशि उपलब्ध कराई गई है। आज झारखंड में बीपीएल सूची की स्वीकृति नहीं हुई है। अतः सरकार से मेरा आग्रह है कि जनहित में विचार किया जाये और इन समस्याओं के निष्पादन के लिए सरकार एक समयबद्ध कार्यक्रम तैयार कर इसके अनुपालन हेतु त्वरित कार्रवाई करे।
 
*श्री कौशलेन्द्र कुमार (नालंदा): बिहार के माननीय मुख्यमंत्री, बिहार सरकार, श्री नीतीश कुमार ने कहा है कि इस बजट में कहीं पर यह उल्लेख नहीं है । महंगाई को कैसे काबू में किया जाए और कहीं पर यह भी वर्णन नहीं किया गया है कि गरीबी उन्मूलन कैसे होगा और नए जॉब एवेन्यू कैसे क्रिएट होगा । यह बिल्कुल बजट में नहीं कहा गया है ।
          बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने यह भी कहा है कि बजट में बिहार के कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रोपोजल नहीं है जबकि बिहार में कृषि आधारित आर्थिक व्यवस्था है और जो कृषि यंत्रों पर मूल्य को घटाने का प्रोपोजल है, वो बहुत ही तुच्छ है । बजट में जो पूर्वांचल के राज्यों के लिए बजट में कृषि क्षेत्र में मदद के लिए जो राशि देने का प्रोपोजल है, वो समुद्र में से एक बूंद पानी निकालने जैसा है तथा समझिए कि ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर है । महंगाई का एक बड़ा कारण है भ्रष्टाचार और काला धन ।
          लेकिन बजट में कहीं पर यह चर्चा नहीं है कि भ्रष्टाचार को कैसे टैकल किया जाएगा तथा विदेश स्थित बैंक में से भारतीय काला धन को कैसे वापिस लाया जाएगा ? यह बात बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कही है ।
          महंगाई का एक बड़ा कारण बीपीएल को अनाज वितरण तथा अन्य लाभ नहीं मिलने से होता है । बिहार में बीपीएल की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है जबकि केन्द्र सरकार केवल 65 लाख बीपीएल को सहायता पहुंचाती है ।
          पिछड़ा क्षेत्र का विकास नहीं होने से भी महंगाई बढ़ती है । बिहार में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि के तहत राज्य सरकार की मांग प्रतिवर्ष 4000 करोड़ रूपये अगले पंचवर्षीय योजनाओं में, को इस बजट में ठुकरा दिया है तथा बिहार ऐसे राज्य में जहां विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की जरूरत थी, पूरी तरह से इस बजट में नेगलेक्ट किया गया है । यह क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ाता है और यही चीज महंगाई बढ़ाने का एक बड़ा कारण है ।
          खाद्य पदार्थों की महंगाई रोकने के लिए गरीबों को खाद्य सुरक्षा बिल के तहत कितना कैश राज सहायता दिया जाएगा, इसको बिल्कुल नेग्लेक्ट किया गया है ।
          महंगाई बढ़ने का एक बड़ा कारण लोगों का अशिक्षित होना भी है । सर्व शिक्षा अभियान के तहत 21,000 करोड़ रूपये का बिहार को आवंटन बहुत ही तुच्छ है ।
          अंत मं मैं यही कहूंगा कि जब तक गरीबों, बीपीएल के लिए सही योजना नहीं बनेगी तब तक देश का सही विकास नहीं होगा, यह लोग राष्ट्रीय मुख्यधारा मं नहीं आ पाएंगे । इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।
                                                 
MADAM SPEAKER:  Hon. Finance Minister, Shri Pranab Mukherjee.
THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Madam Speaker, eleven days ago I had the privilege of presenting the General Budget for the year 2011-12 to this august House. Since then this has been debated and discussed both within the House and outside the House. I had the privilege of listening to some of the hon. Members who have made their very valuable contributions while participating in the Budget discussions. As many as 45 hon. Members spoke on the floor of the House and almost an equal number, 44 hon. Members, laid their written speeches on the Table of the House as they could not get time to make their observations. I am deeply indebted to them for making their observations.
          As I was following the debate inside the House and also some of the comments made in the Media, in the Television Channels, it appeared that there are two trends in these discussions. First, there is a viable rise in the expectations of our people, farmers, small business entrepreneurs, youth and the vulnerable sections of our society. More is expected from policy makers of the Government. This can happen only when they see some of their concerns are being addressed and then they will expect other issues also to be addressed adequately. I consider this as a recognition of the fact that Government is acting. It encourages me to take courage in both hands and to address some of the issues which require to be addressed.
          The second thought which comes to my mind is that emphasis is being laid on the concerns of our rural and urban poor, agriculture, importance of better education and health. As per constitutional scheme of things most of these happen to be within the domain of the State Governments. But that does not mean that as Union Finance Minister I have no role to play there. I am to play a very important and a vital role as Union Finance Minister to ensure the right macro economic environment for sustaining high broad based growth, control inflation and ensure inclusive growth. If we could achieve broad based growth, then it will generate wealth; it will ensure more resources to the private sector, to the public sector, to the Central agencies and to the State agencies. If the devolution through the Thirteenth Finance Commission has increased substantially to be transferred to the States, it has been possible because of high tax GDP ratio, because of generation of wealth and because of higher output from the factories and fields. Therefore, keeping that objective in view I would like to address the concerns which the hon. Members have raised during the course of the discussion and which have been commented outside. 
          Let me first deal with inflation. There is no doubt that inflation is the most important issue which needs to be addressed adequately. In my own Budget speech, I mentioned in the later part of paragraph 4 as:
“We also have to improve the supply response of agriculture to the expanding domestic demand.  Determined measures on both these issues will help address the structural concerns on inflation management.”   Inflation happens mainly due to two constraints.  They are demand constraints and supply constraints.  If there is too much money to chase too few goods, it leads to the classical concept of inflation.   If there is lack of supply of essential goods, it leads to inflation. If there is a lack of proper coordination between the various agents acting in the field, it leads to supply constraints.  We started the year 2010 when the rate of inflation was already as high as 20.2 per cent.  When I am speaking before this august House, and through them to the nation, it has come down to 9.3 per cent but, I say, I underline, that it is not acceptable.  This figure is equally unacceptable.
          Now, let us analyse as to how it happens. In the initial part of the year, cereals inflation became the major concern, namely, prices of wheat, prices of rice, prices of pulse and prices of sugar.  In the second half of the year, suddenly we found that there was a spurt in the prices of vegetables, eggs, milk and certain other commodities. These commodities including the poultry products contribute nearly 9.5 per cent of the total 14.34 per cent which is the weightage of the food prices in the wholesale price index. Therefore, we have to address that. 
What has been the impact after the steps taken?  I am not going to elaborate on the steps taken. To improve the supply, we kept the import door open. For the medium term, we took certain steps to improve the production of those commodities which are in short supply. To ensure the availability of goods at a moderate price at least to a section of the people - I am not going into the debate right now, that part will come a little later -  or to the families living below the poverty line, as per the present calculation of more than 6.5 crore families, through the Public Distribution System, a Committee was appointed under the Chairmanship of Chief Minister of Gujarat. Recently, he has submitted the Report on how to revamp the Public Distribution System because when we were looking at these aspects, it came to our notice that in large parts of the country, the Public Distribution System was not in a place to pick it up. 
I will give two classical examples. Pulses were imported and provided at subsidized rate of Rs. 10 per kilo.  But it was not possible to reach a large number of BPL families because of the non-existence of effective Public Distribution System.  Where it was there it reached; where it was not there it did not reach. Oil was imported and it was decided that a subsidy of Rs. 15 per litre would be provided.  But unfortunately it could not be effectively distributed all over the country, even to the limited number of families belonging to the BPL as per the old statistics.  That brought to our attention the serious constraints on the distribution side and how we shall have to address this issue.          Therefore, the Prime Minister decided to address this issue by constituting a Group consisting of Chief Ministers of certain States and certain experts, including the Minister of Agriculture, to look into this aspect.  Shri Modi has submitted his Report.  There are many suggestions which can be implemented.
          In respect of inflation, I would like to draw the attention of the hon. Members to certain facts.  Of course, I am not taking any plea. This is not an excuse that as there is inflation in other countries, so there should be high inflation in India also. That is not my plea.  But the fact of the matter is that the inflationary pressure is visible all over the world. It is not confined merely to our country. I have some latest inflationary figures of other countries. These figures are up to January.  The inflation was 14.7 per cent in Argentina; 9.8 per cent in Bangladesh; 9.21 per cent in Brazil; 11.7 per cent in China; 17.3 per cent in Egypt; 15.6 per cent in Indonesia; 18.9 per cent in Iran; 20.4 per cent in Pakistan; 30.1 per cent in Ukraine; 9.1 per cent in Uruguay; and 33.8 per cent in Venezuela. It is because there is an apprehension – which is not merely an apprehension, because it got reflected in the ground reality also – that the surplus liquidity is being converted into commodity. It is happening in the case of oil; it is happening in the case of food grains; and it is happening in the case of certain other essential commodities. These are the economic factors. We might try to wish them away, but they cannot be wished away because of global linkages. 
          Again I am saying that, that does not give me an excuse not to address the issue. The issue has to be addressed squarely. How am I addressing these issues? I have taken positive steps in the Budget.  I have taken initiatives in the agricultural sector.  These initiatives are for strengthening the storage and cold chains; focus on fiscal consolidation; supportive monetary policy towards fiscal action; and controlling core inflation.
Therefore, when I talk of 60,000 pulse villages, it is not merely a rhetoric that it just to identify with the 60th year of the Republic. The Special Package Programme for 60,000 villages has paid dividend this year itself. This year itself the pulse production has increased by almost two million tonnes. When I talk of 25,000 oil farm farmers, it is not merely a rhetoric or just a tokenism. It will give me three lakh tonnes of palm oil after five years.
One of the major objectives is to bring back the economy to the higher growth trajectory. Somebody has expressed doubt as to how we will be able to do it and how we can achieve that. I have achieved it. We have been able to do it. Please remember, when I presented the interim Budget in February, 2009, I did not have the mandate. It was just on the eve of elections. We recognized the fact that there was a major financial crisis.  The major international financial crisis was at its peak. We began the year 2008-09 with the GDP growth of almost nine per cent in the first quarter. In the last quarter, we were alarmed to notice that it is coming down as low as 5.8 per cent.  Therefore, it was the responsibility of the Government to take the risk like many other countries.  We had huge fiscal expansion and we wanted to sustain the growth by generating demand domestically as the external-demand generation was not possible at that point of time.  It was possible for us and we are able to arrest the further deceleration of growth and the year ended with 7.6 per cent. Next year, it was eight per cent; the year which was coming to an end is 8.6 per cent.  Therefore, if I project that my GDP growth will be nine per cent, the figure is credible.  After all, test of a pudding is in eating.
          Madam Speaker I would just like to give you a comparative picture of the last six years and the previous six years. In 1989-90, it was 6.4 per cent; in 1990-91, it was 6.3 per cent; in 2000-01, it was 4.4 per cent; in 2001-02, it was 5.8 per cent; in 2002-03, it was 3.8 per cent; in 2003-04, it was 8.5 per cent.  The average is 5.8 per cent.  Similarly, in 2004-05, it was 7.5 per cent; in 2005-06, it was 9.5 per cent; in 2006-07, it was 9.6 per cent; in 2007-08, it was 9.3 per cent; and in 2008-09, which was extremely a bad year as there was international financial crisis, it was 6.8 per cent; in 2009-10, it was eight per cent and in 2010-11, it was 8.6 per cent. So, the last six years period average is 5.8 per cent and the current six years average is 8.5 per cent.  We can and we shall do.
          Madam Speaker, to me growth is just not merely a statistical satisfaction.  To me growth means empowerment to the Government.  If I have high growth, I will have the capacity to take the risk of going to the extent of loan waiver of Rs. 65,000 crore to give benefit to the four crore farmers.  If I have higher growth and, high employment generation, it would be possible for me to transfer more resources to the States.   I had the privilege of being the Minister of Finance in early 1980s. I used to have a picture. State after State Finance Ministers and Chief Ministers were coming to me to increase the ways and means of advances and to allow overdraft from the Reserve Bank of India.  Today, when I am talking to you, hon. Members, except three States for which I have appointed a Committee to look into their special problems, 25 States, out of the 28 States, are having cash surplus to the extent of Rs. 1 lakh crore throughout the year. No Finance Minister or Chief Minister of any State used to come and tell me to allow him to have an overdraft.   It is because we have been able to transfer more resources. All those figures are there in the budgetary document. I need not elaborate on it, but these are there.  Therefore, if we have higher growth, it is possible to generate more employment.  I will come to the figure a little later.
          Now, another doubt has been raised about fiscal deficit.  I am oblique and sometimes not so oblique.  A suggestion has been made that perhaps I have fudged the figures.   
          I have taken into account the prevailing situation.  I do not know what would happen tomorrow. When we formulate the Budget, we formulate the Budget considering the situation prevailing at that point of time and we can foresee what is going to happen. If somebody tells me why I have taken only Rs.20,000 crore as oil subsidy, first of all, I would like to most respectfully remind the House that in previous years, oil subsidy was never put in the Budget at the BE stage. It was provided through the Bonds. Bonds were taken out of the fiscal deficit computation. That is not sound economy. I did not believe in that.  I wanted to make it transparent. I am giving direct subsidy, not through the Bonds. I am showing it in computing the fiscal deficit. Anybody may say: What is the relevance of the figure of just Rs.20,000 crore when the oil prices are going high? I know the world oil prices are going high. I know the uncertainty in Africa and the Arab world. I know it is going to affect the oil supply in the medium and long-terms or even in the short-term. But, at the same time, another picture comes to my mind –  not in the remote past but in 2008. We assumed office in  May, 2004. From June onwards, I noticed that there was an upward movement of the international oil prices starting from $ 36 per barrel, about which my good friends Shri Jaswant Singh and Shri Yaswant Sinha had the advantage; they did not have to bother about! But, after that, it continuously moved up. We did not know where it would settle – whether at $ 60 or $ 70 or $ 80 per barrel. When the international financial crisis came, in June, it reached as high as $ 125 per barrel. In August, it reached as high as $ 147 per barrel. I am talking  of 2008. Then, in January, it came down  softly to $ 50 per barrel. Oil is slippery! Again, it is moving up. I know my requirement. Out of 100 plus million tonnes every year, we have to import it. Our domestic production is a little less than one-third of it – 33 or 32 million tonnes. Therefore, it may offset. But normal prudence says that it can be adjusted.
          Complaints have been made saying how could I show my BE figure of 2011-12 less than the RE figure of 2010-11. First, there should be comparison between the comparables. BE should be compared to BE. RE should not be compared to BE because RE includes the additional amount which we give, which you are going to approve after my speech – the third batch of Supplementary Demands. When we find that the resources come, extra additional resources come, we deploy those additional resources.
          Therefore, many of the items in 2010-11 are there. I can mention some of these items for the hon. Members’ consideration. But, before that, I would like to clarify one more point which Dr. Joshi elaborated on. It was said: “Well, you have been able to reduce the fiscal deficit from 5.6 per cent to  5.1 per cent of unexpected bonanza. छप्पर फाड़कर रिसोर्सेज़ आया, छप्पर फाड़कर आया। Yes, छप्पर फाड़कर आया। I do not know whether I am telling correct Hindi.
SHRIMATI SUSHMA SWARAJ (VIDISHA):   It is correct.
SHRI PRANAB MUKHERJEE: Please correct me. Yes, it came. In my own Budget projection, I showed  Rs.35,000 crore. I got Rs. 1,06,000 crore. But at least you must appreciate that I use these resources to reduce the deficit. Yes, I do admit that I do not believe in that phraseThose who want to live in the fiscal prudence, they are less imaginative and those who want to live in the borrowed resources, they are more imaginative, I do not believe that belief and in that philosophy.  I believe that we should live in the fiscal prudence.  I have to resort to fiscal expansion to overcome the crisis of deterioration of GDP growth.
But the moment to stabilise, I, on the floor of this House while presenting the full Budget of 2009-10 after receiving the mandate from the people, mentioned that I would like to come back to the path of fiscal consolidation and I gave the road map.  I gave the three years’ road map.  I gave that it would be 5.5 per cent in 2010-11 and it would be 4.8 per cent in 2011-12 and thereafter it will proceed and these road maps have also been indicated by the Thirteenth Finance Commission.
Therefore, taking advantage of that, I have also expanded.  If you please remember, in the first batch of supplementary I up fronted the developmental expenditure. I have given substantial quantum of money for the developmental expenditure.  I can give you just a few examples: Pradhan Mantri Grameen Sadak Yojana, Rs.10,000 crore, Rs.4,000 crore for implementation to the Right to Education, Rs.4,279 crore as Central Assistance of Special Category States, Rs.2,212 crore under the National Agricultural Insurance Scheme.
Some of the Revised Estimates of the year are just temporary.  Two eminent Finance Ministers, my predecessors, Shri Jaswant Singh and Shri Yashwant Sinha are sitting in front of me.  They know that sometimes an emergency situation comes and we have to make some adjustments.  This year I had to do.  I had to provide a short-term credit of Rs.5,000 crore to FCI and I know I will get it back next year.  To overcome the temporary crisis I had to resort to it.  But if somebody comes to the conclusion, as I had to give it in 2010-11, I shall have to repeat in 2011-12, it is not correct.
The third thing which we have done and I think I have done correctly. You have noticed in the Budget every year, those who are diligence prudence of the Budget Document, that some expenditure we show in the revenue account, and particularly, those which you transfer to the States as capital grants – transferring it as capital grants but showing it as revenue.  I discontinued this practice and I have taken into account on the capital side and not on the revenue side. 
There have been recommendations of expert bodies on earlier occasions and I have implemented it, for instance, re-capitalisation of the public sector banks.  Last year I gave Rs.14,157 crore; this year we are giving Rs.9,000 crore because we do not want our public sector banks sick.  They must maintain their CRAR at the credible limit, at least, at eight per cent.  Not only that, we have increased the equity of a particular public sector bank.  I have increased it to 58 per cent. Therefore, these expenditures are essentially developmental expenditure.
So, I do not believe that I have done anything wrong, which should not be done in projecting the fiscal deficit 5.1 and if you look at the track record, I am quite confident that we will be able to convince you that in every year we have been able to maintain this fiscal deficit as we have done in past.
          Madam Speaker, while talking on the social security plan expenditure, we have emphasised on social security; we have emphasised on infrastructure. 23 per cent of the total developmental outlay of this year has been spent on social security; 48 per cent of the total plan has been invested in the infrastructure sector.  It is because these are the requirements to ensure that we could achieve the higher growth trajectory.
          A large number of comments have been made on agriculture.  Yes, I do believe that agriculture is an important aspect and this aspect we cannot ignore.  I would like to deal with three topics connected with agriculture: agriculture, agricultural credit, and agricultural Minimum Support Price.  My basic objective in agriculture is to encourage production, to reduce wastage, to expand capacity to process, and to expand the capacities of storing in cold chains.   I said it earlier; and I have repeated it.  I do believe nobody can feed one billion plus people except India.  I have great confidence on the Indian farmers; and they will do it.  This year also, I can tell you that.  I will just make two comparisons.  We had severe drought in the year 2009.  Everybody on the floor of this House – Lalu ji was there – said there will be serious food riot because there was a huge drought.  We discussed it twice, three. Yes, drought was there, but we did not succumb to it, thanks to the farmers of Punjab, Haryana, Western Uttar Pradesh, Andhra Pradesh and a couple of other areas.  And I must thank the State Governments also.  They took the prompt action; provided additional electricity; provided diesel; and standing crop was not allowed to be destroyed. We provided monetary support and in that way we could reduce the adverse impact of that drought.  Yes, agricultural growth came down, but it was not negative.  It was a positive growth of 0.2 per cent in 2009-10 compared to the similar type of drought in 2002-03 when the agricultural growth was minus 7.2 per cent. Therefore do not think that we are neglecting agriculture. 
          Yes, we ought to give more money to the farmers. And I do still believe that despite tremendous pressures, taking the risk of having higher food inflation, we did not hesitate to increase the support price to the farmers because if we do not provide them what they require, they will not be able to produce more. 
Just I will give you some information in respect of Minimum Support Price for some important items, not for all.  For paddy, in 1999-00, it was Rs. 490 per quintal.  In 2003-04, in four years, it increased by just sixty rupees from Rs. 490 per quintal to Rs. 550 per quintal.  During the UPA regime, it increased from Rs. 550 to Rs. 1000. It increased by Rs. 450 per quintal in five years.
In the case of wheat, it increased by Rs. 50, from Rs. 580 to Rs. 630. During the UPA regime, it increased by Rs. 480, from Rs. 640 to Rs. 1120 in five years.  There are series of items. 
          In the case of sugarcane, it increased from Rs. 56.10 to Rs. 73.10 per quintal, which means, Rs.16.90 per quintal had increased. But during the UPA regime, it increased by Rs. 64.92 per quintal, from Rs. 74.50 to Rs. 139.12 per quintal. There is no disincentive and we shall have to carry on this. 
          Now, another aspect is of the credit.  In the morning it was being discussed.  I understand the apprehensions and concerns of the hon. Members.  When they feel that not enough is being done, I always agree that whatever is being done is less than what it should be done and what is our requirement.
I do not dispute that there is a gap; between our aspirations and actual achievements; between our requirement and performance. But that does not mean that we are not performing.  If I have increased the agricultural credit to the small farmers at the interest rate of 7 per cent, from Rs. 86,000 crore in 2003-04 to       Rs. 4,75,000 crore, in 2011-12, it is negligence to the farmers!  You may say, you do it with Rs. 6,00,000 crore, I can understand that but please do not say that we are neglecting the farmers. We are doing what is possible. I have brought down the interest rate from three consecutive years.  We served the farmers by interest subvention from 7 per cent to 4 per cent because it was the demand of the farmers. 
After the first interaction, which we have with the various stakeholders’ pre-Budget consultation, they have chosen deliberately to interact with the farmers, with the agriculturists.  It was an overwhelming demand.
Some of the hon. Members who are off-season and out of season, pointed out that stop agricultural products from forward trading. Yes, it may have some advantage from the consumers’ side but all the farmers’ organisations are against it.  They demanded that Indian farmers should have the advantage of world market. Why should they be bounded to a particular system?  We could not go to that extent.  We shall have to strike a balance between Producers’ interests and the consumers’ interests and exactly we are trying to do that. 
Lot of criticism has been made that storage capacity is not being created.  Yes, it is true that what we have required it has not yet been done.  But it would be wrong to say that no decision has been taken.  On January 1, 2011, I know the food grains’ stock reached to 470 lakh tonnes that means 47 million tonnes, which means 2.7 times more than 174 lakh metric tonnes. 
The storage capacity is being attempted to be created.  Now process to create new storage capacity of 150 lakh metric tonnes through private entrepreneurs and warehousing corporations has already been done.  Decision to create 20 lakh metric tonnes of storage capacity under the Public Entrepreneurs Guarantee Scheme through modern silos has already been taken.  We will be able to add about 2.6 lakh tonnes of capacity by March this year, best on existing sanctions; the addition will reach 40 lakh tonnes by March, 2012.  During 2010-11, another 25 lakh metric tonnes of storage capacity has been created.
13.00 hrs.           About cold chain, 24 cold storage projects have already been sanctioned with a capacity of 1.4 lakh metric tonnes under the National Horticulture Mission; 107 cold storage projects with a capacity of 50.9 lakh metric tonnes have been approved by the National Horticulture Mission. 

In short, during 2010-11, the National Horticulture Mission has approved 24 cold storage projects with a capacity of 1.36 lakh metric tonnes; 200 projects are in the pipeline, which will take off in 2011.

Under the Rural Godown Scheme, 1,968 godowns with a capacity of 24 lakh metric tonnes have been completed during this year itself.  I have also extended the policy support to these activities.

To attract investment in this sector, the capital investment in the creation of modern storage capacity will be eligible for viability gap funding scheme of the Finance Ministry.  It is also proposed to recognize cold chains and post-harvest storage as the infrastructure sub-sector, and they will get all these benefits.

Madam Speaker, I will not like to take much more time but I would like to bring to the notice one basic infrastructure development.  All along we used to complaint, and it was rightly so, that there is inadequacy of power.  Without power we cannot have the desired level of growth.  Therefore, emphasis was given.  We have added a capacity of 32,762 MW and 10,460 MW during this year itself in the current Plan, which is higher than the capacity added in any of the previous years.  We hope to add 15,000 MW by the end of the current financial year, and I congratulate my colleague, the Power Minister because more than often I used to criticize him that his projects are going slow, and he has correctly responded to that. … (Interruptions)  No, I have given credit to all. … (Interruption)  Please do not disturb me.  This is not the way. … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Please allow him to speak.

                                               … (Interruptions)     

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Dr. Joshi, while he was making his observations, mentioned first about employment. … (Interruptions) Do not plead for yourselves.  Let others speak for you; not yourself speak for you. Please do not mind it. … (Interruptions)

          Dr. Joshi spoke of employment.  He was speaking that it is jobless growth; it is jobless growth and it is not employment-oriented.  Yes, it has not created employment fast enough, much more is to be done but it has not retarded. 

          During the UPA period, from 31st March 2005 to 31st March 2008, the total number of persons engaged in the organized sector increased from two crore sixty-four lakhs to two crore seventy-five lakhs – 11 lakhs more employment had been created.  … (Interruptions)  In the rural sector, in the four years, we had given employment to fifteen crore twenty-six lakh households. If you consider … (Interruptions)

SHRI GURUDAS DASGUPTA (GHATAL): What about job loss? … (Interruptions)

SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA):  How many have lost employment? … (Interruptions)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: If you consider that only the jobs of clerks are the creation of employment; and those who are getting jobs by hard work are not employment generation, I am afraid, I disagree with you.  I have the latest Labour Bureau figures with me.  Based on the quick surveys over the last four quarters -- from September, 2010 over September, 2009 -- the overall employment has increased by 12.96 lakh, mostly in IT, BPO sector followed by textile, metal, automobile, gems and jewelleries.  It is not a jobless growth.

          Therefore, Madam Speaker, my approach has always been to ensure that there is inclusive growth. Keeping that objective in view, I have increased substantial allocations to rural sectors, rural infrastructures and social sectors. It is because the new paradigm of our developmental strategy is to empower people, empowerment not by slogans but empowerment by entitlement, entitlement by legal enactment. We have done it in the case of Right to Information; we have done it in the case of Rural Employment Guarantee; we have done it in Right to Education; and we are going to do it in Right to Food.

          Madam Speaker, there has been a discussion on the black money. A large number of Members have expressed their anxiety, their concern – and rightly so – about black money.  Newspaper headlines are also there; I am not going to comment on it. What I am going to tell is that we have done.  First of all, I would like to make it quite clear that there is no quantum specified by anybody as to what the quantum of black money is.  Various figures are being floated.  I have two figures with me.  One figure was provided through the interim recommendations of the BJP Taskforce of 2009; and they have estimated the amount of black money to be between 500 billion dollars to 1,400 billion dollars.  The range is very high –between Rs.500 billion dollars and 1,400 billion dollars.   And, it is obvious because you quantify it.  Another figure, which is available to us, has come from the Global Financial Integrity, which Dr. Joshi was quoting on that day and I corrected him that it is not for two-three years; it is from 1948 to 2008, over a period of 60 years. By juxtaposing the exchange fluctuations, it comes to about 462 billion US dollars.

          Therefore, the first thing, which I have decided to do is to appoint a Group to quantify the black money, which is being generated… (Interruptions)  As soon as the Report is available, I would share it with you.

          Now, the question is: any amount of anxiety is not going to bring money. We live in a society, which is governed by the rule of law; and we shall have to proceed as per the law.  Simply, if you want to hang somebody, do not blame me. I give my personal experiences. In my younger days being overwhelmed  with these types of sentiments, I conducted some raids on a very important family. It was not a fruitless raid. One ton primary gold with Swiss marks was discovered. Later on, with the change of Government, I was accused of causing Emergency excesses; and I was put in the dock before the Shah Commission.

          I was put on the dock of Shah Commission. Those are documents of 1975 and 1976. Go through the proceedings of 1977, 1978 and 1979 of this House. Therefore, please do not indulge in this rhetoric.  The point is, how to deal with the black money? It is a serious issue. We shall have to first go with the legal framework, and we have done it. Do not forget that before the Pittsburgh Summit, the world leaders were totally indifferent to this aspect of the issue. First Pittsburgh Summit followed by Seoul Summit, it has been decided… (Interruptions) Please do not disturb me. If you have your own view, you hold it. Do not disturb me. Thereafter, the world community impressed upon those countries which were reluctant to share banking information. The atmosphere was created.

As a result of that, we have been able to enter into two types of legal agreements. Under Double Taxation Avoidance Agreement, the exchange of information regarding bank deposit, tax evasion, will have to be given. Out of 65 countries, we have been able to complete the Double Taxation Avoidance Agreement with 23 countries, including Switzerland. But simply, we have become entitled through agreement does not mean that money will come from tomorrow. When their legal ratification process will be completed, we will get the information. I have signed the agreement with my counterpart in Swiss Government in August. They are still taking time for ratification, and when it will be ratified, from 1st of April this year we will get the information.

Somebody was jokingly saying why agreement with Bermuda, Isle of Man, St. Kitts and Cameron Island. These are the entities where the tax havens have been created. Therefore, we shall have to enter into agreement with those countries. They are not sovereign jurisdictions. They are tax havens. It cannot be Double Taxation Avoidance Agreement (DTTA) with them. I shall have to enter into Tax Exchange Information Agreement with them and we have entered into ten such Tax Exchange Information Agreements.

 Now, what have we done up to now? Has there been any progress or a little progress? Yes, there has been some progress, not much as envisioned. But there is some progress. You know in the Income Tax Act, there is a regular provision of search and seizure. This year when we intensified search and seizure, we have got undisclosed income of Rs.25,000 crore in the last 24 months. Out of that, Rs.7,000 crore of additional taxes have been realized. We have been able to get through direct ways of international taxation, an additional amount of Rs.34,601 crore.

Also, there is a new mechanism. Everyday when new technology is coming, those who are indulging in financial crime, they are also resorting to those technologies. Through the transfer pricing mechanism, we have been able to detect about Rs.33,784 crore. In other words, this much amount of money has been prevented from siphoning out of our country. Here we shall have to keep in mind, and surely my distinguished predecessor will not mind.… (Interruptions) Just let me complete. I am completing.

श्री शरद यादव : आपने ब्लैक मनी वगैरह पकड़ी, उसके बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। मैं आपके माध्यम से सिर्फ इतना ही निवेदन करना चाहूंगा कि कोर्ट ने कहा तो हसन अली जेल के अंदर हो गया, लेकिन वह इतने लम्बे समय तक बाहर रहा। हमें अपने सिस्टम को ठीक करना पड़ेगा। सदन भी यही निवेदन करना चाहता है कि आप इन सारी चीजों के लिए सिस्टम को कैसे ठीक करेंगे।

SHRI PRANAB MUKHERJEE: I agree with you; there are no two opinions or dispute about the fact that we must improve our system. I was going to say that, but somebody shouted at me. In order to have the expertise and develop the expertise in transfer pricing mechanism, in between I have got 36 persons specially trained for the purpose. India’s activities against money laundering and black-marketing are being well recognised. We have become the 34th member of the world body. India is the Vice-Chair of one of the important international organisations which is dealing with money laundering and black-money. But I must agree and say that a lot of improvement has to take place. We have done it earlier. Sometimes we have to face the political flak because of what I have just mentioned. I do not mind it. But the fact of the matter is that always we shall have to keep in mind that we ought to proceed within the framework of the law. We cannot by-pass that.

          Madam Speaker, I think I have taken a little longer time than I intended to. … (Interruptions) My friends are a little bit disturbed. Please do not disturb me.… (Interruptions)

Hon. Members cutting across party lines from both the Houses have been demanding increase in the allocation under the MPLADS.… (Interruptions) Do not thump the desks right now, listen to me. We have considered the matter and I am happy to announce an increase in the allocation under the Scheme from Rs.2 crore to Rs.5 crore. … (Interruptions) It will result in an additional allocation of Rs.2370 crore per year.

Here, I shall have to add one more word of caution. Just yesterday I have received a report from the CAG which has dealt with this subject. They have made certain recommendations. Surely, Dr. Joshi’s PAC will examine them and give me the report, so that I can improve my guidelines of MPLADS in consultation with the Chairmen of MPLADS Committees of the two Houses, so that it can be made more effective. It will be effective from the 1st of April this year.

Please remember one more point. As election is going on, Code of Conduct is in operation. I checked up from the Chief Election Commissioner whether I am entitled to make this announcement. He said, ‘yes, I can do it; but please tell your colleagues coming from the election-going States that they can use this money or even make commitment not now, but from end-May’. So, they will be able to do it from end-May.

I shall have to make another suggestion. Investment in education and health sector is a very important point...… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Let us have order in the House.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Investment in education and health sector has a high priority in our policy framework. There is a need to further accelerate the creation of infrastructure in this domain. I am happy to announce that henceforth capital stock in educational institutions and hospitals will be treated as infrastructure sub-sector. Accordingly, capital investment for these sub-sectors will be eligible for the viability gap funding scheme of the Ministry of Finance. Detailed guidelines in this matter will be announced shortly.

          In my Budget Speech, I had proposed the creation of a Women Self-Help Group Development Fund with a corpus of Rs. 500 crore. The proposed Fund will operate through NABARD and will be exclusively utilised for providing refinance loans given to the women self-help groups on soft terms, and the other details of the scheme will be worked out.

          As I had mentioned about the inclusive growth, regarding the fish farmers and fishermen, the UPA is sensitive to the problems being faced by the fishermen. To meet their credit needs, I am happy to announce the extension of the existing Interest Subvention Scheme of providing short-term credit loans to farmers at seven per cent interest, with additional interest subvention for timely repayment. That means three per cent, if they make payment up to the loan of rupees three lakh, would be provided to them. This would benefit over 20 lakh fish farmers and fishermen engaged in the fishing operations in the country. The details of the scheme will be worked out.

           Madam Speaker, I spoke little longer than I intended to have. I am deeply grateful to the hon. Members, the Leader of the Opposition and Advaniji for the indulgence which they have shown to me.

MADAM SPEAKER: I shall now put the Supplementary Demands for Grants (General) for 2010-2011 to the vote of the House.

          The question is:

“That the respective supplementary sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1 to 5, 7,9, 11 to 23, 26, 29 to 33, 35, 40 to 43, 45 to 51, 53 to 55, 57 to 62, 64, 65, 67 to 74, 77, 79 to 81, 83 to 88, 90, 92 to 98, 100 and 103 to 105.”