Lok Sabha Debates
Discussion Regarding Ayodhya Issue Raised By Shri Mulyam Singh Yadav. on 27 February, 2003
/font> 14.30 hrs. The Lok Sabha re-assembled after Lunch at thirty minutes past Fourteen of the Clock.
(Shri K. Yerrannaidu in the Chair) Title: Discussion regarding Ayodhya issue raised by Shri Mulyam Singh Yadav.
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, the discussion regarding the Ayodhya Issue has been admitted in the names of Shri Ramjilal Suman and Shri Nawal Kishore Rai. Shri Ramjilal Suman has since requested me to allow Shri Mulayam Singh Yadav to raise the discussion on his behalf, I have allowed Shri Mulayam Singh Yadav to raise the discussion. Now, Shri Malayam Singh Yadav.
श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल):सभापति महोदय, आज इतने महत्वपूर्ण और गम्भीर विषय पर सदन में बहस होने जा रही है, उस बहस की शुरूआत करने का आपने हमें अवसर दिया, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। अयोध्या प्रकरण पर संसद और संसद के बाहर १५ वर्षों से लगातार बहस चलती चली आ रही है और बहस ही नहीं, कुछ ऐसी भी घटनाएं भी हुई हैं जिनके हम स्वयं एवं हमारे अनेक साथी भुक्तभोगी हैं।
सभापति महोदय, अयोध्या विवाद ऐसे अवसर पर उठाया जाता है जब चुनावी राजनीतिक सरगर्मियां तेज होती हैं। इस विषय को उठाकर सदैव राजनीतिक लाभ लिया जाता रहा है। इस वक्त देश के सामने अनेक गम्भीर संकट हैं। कई तरह के खतरे हैं जिनमें आन्तरिक एवं बाहरी खतरे भी शामिल हैं। देश की जनता में बहुत असन्तोष है और हर वर्ग के लोग हर स्तर पर दुखी हैं। इस प्रकार से जब देश के सामने कई प्रकार की चुनौतियां हों और खतरे हों तब देश को एक रखकर उनका मुकाबला करना चाहिए और यह सवाल केवल हमारा, विपक्ष का या समाजवादी पार्टी का नहीं है बल्कि पूरे देश का सवाल है। ऐसे अवसर पर देश को एक रखने की आवश्यकता है। जब चुनौतियों का मुकाबला करना हो, तो देश को एक रखना चाहिए और सबको इस हेतु विश्वास में लेना चाहिए।
सभापति महोदय, वर्ष १९९४ में तत्कालीन सर्वोच्य न्यायालय के न्यायाधीश श्री जे.एस. वर्मा ने एक फैसला दिया था जिसके अनुसार जल्दी ही इस मुद्दे को बन्द कर दिया जाना चाहिए, इसका फैसला बातचीत से करना चाहिए और यदि बातचीत से कोई समाधानकारक हल न निकले, तो फिर अदालत पर छोड़ देना चाहिए। चूंकि लोकतंत्र में न्यायालय के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, इसलिए इस निर्णय पर अमल होना चाहिए था। उच्चतम न्यायालय ने माना कि अयोध्या की पूरी जमीन विवादित है और उस पर जब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय अन्तिम रूप से नहीं आ जाता है तब तक किसी भी पक्ष को कोई भी निर्माण कार्य करने का अधिकार नहीं है और न किसी प्रकार का निर्माण उस भूमि पर किया जा सकता है। इसलिए अदालत के निर्णय का इन्तजार करना चाहिए।
महोदय, ऐसे अवसर पर, जब अयोध्या विवाद को छेड़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी और जब देश अन्य अनेक प्रकार के संकटों से गुजर रहा हो, चाहे वे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हो या अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति का सवाल हो, तब ऐसी विषय स्थिति में अयोध्या विवाद को पुन: जागृत करने की कोई आवश्यकता नही थी । …( व्यवधान)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): I thought in such an important debate which Shri Malayam Singh Yadav is initiating, at least one Cabinet Minister should be present in the House. I am not questioning the bona fides of other Ministers.
संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया) : सभापति महोदय , सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री, डॉ. सत्यनारायण जटिया जी सदन में उपस्थित हैं।
सभापति महोदय :डॉ. जटिया जी, आप फ्रंट सीट पर आ जाइए ताकि माननीय सदस्यों को दिखे कि आप हाउस में प्रैजेंट हैं।
श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया : वे बीच में बैठे हैं, आगे नहीं बैठे हैं, इसलिए आपको दिखाई नही दे रहे।
श्री मुलायम सिंह यादव : यह मात्र औपचारिकता है, लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री, उपप्रधान मंत्री या केबिनेट मनिस्टर को यहां सदन में होना चाहिए। हम जानते हैं कि ये हमेशा बच कर रहना चाहते हैं और इस संबंध में हमारी राय और अधिक पक्की हो गई।…( व्यवधान)
14.36 hrs. (Mr. Deputy-Speaker in the Chair) … (Interruptions)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HOME AFFAIRS AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PERSONNEL, PUBLIC GRIEVANCES AND PENSIONS (SHRI HARIN PATHAK): Sir, the hon. Deputy Prime Minister has some foreign dignitaries as guests. So, he will come here within half-an-hour. He would be here at 3 p.m. श्री मुलायम सिंह यादव :आपने नये कानून मंत्री कानून बनाने के लिए बना ही दिए हैं और मुझे पता है कि इन विवादों के लिए एक सीधा-साधे आदमी को हटा कर इन्हें कानून मंत्री बनाया गया है। हमारी पक्की राय है कि अब भारतीय जनता पार्टी इस विवाद हेतु सीधे इन आंदोलनों में साझेदारी नहीं करेगी। उसका कारण यह है कि अगर सीधे साम्प्रदायिक और हिन्दुत्व की भावनाओं को भड़का कर संघर्ष में आएंगे तो साम्प्रदायिक मुद्दो को उठाने वाले दलों को मान्यता देने की समस्या चुनाव आयोग के समक्ष खडी हो सकती है। महाराष्ट्र में जिस प्रकार से हिन्दुत्व का नारा देकर और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़का कर हिन्दुत्व के नाम पर वोट लेने की अपील पर चुनाव जीता गया था, न्यायालय ने इस प्रकार चुनाव जीतने वाले जनप्रतनधि के चुनाव को रद्द कर दिया था और एक दल के सुप्रीमो को वोट देने का अधिकार छीन लिया था। अब केवल अदालत के भय और कानून दायरे के कारण सीधे भारतीय जनता पार्टी सामने नहीं आना चाहती क्योंकि भाजपा इस तरह के मुद्दो को प्रत्यक्ष अथवा चुनावी मुद्दे के रूप नही उठा सकती । लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने एक रास्ता निकाला है - तथाकथित गेरूआ वस्त्रधारियों को आगे कर भारतीय जनता पार्टी ने साधु प्रकोष्ठ खोल दिया है। आप इस बात को गंभीरता से सुनिए। ये कोई साधु संत नहीं है, यह भारतीय जनता पार्टी का साधु प्रकोष्ठ है और भारतीय जनता पार्टी के इस प्रकोष्ठ ने गेरूआ वस्त्रधारियों को आगे करके, इन्हें मैदान में कर दिया है। अब वे आगे आए हैं और ये तब आगे आते हैं जब कोई चुनाव होता है। अभी गुजरात में जो कुछ हुआ है, वह अयोध्या की तरह ही हुआ है। चाहे रामसेवक के नाम पर किया गया हों। वहां जो कुछ हुआ है, जघन्य अपराध हुआ है, हत्याएं एवं आगजनी हुई है, इसके लिए पूरी तरह गुजरात सरकार जिम्मेदार है। उन्होंने जो नारा दिया, उसके कारण ही गुजरात की सरकार दोबारा सिंहासन पर बैठ गई है। अभी हिमाचल में चुनाव हो रहे थे तथा अन्य कई सूबों में भी २६ तारीख को चुनाव हुए। उन चुनावों को लेकर फिर शुरूआत की गई और इससे पहले उत्तर प्रदेश के जब चुनाव हो रहे थे तो अयोध्या में कुम्भ महापर्व के अवसर पर भी यही भारतीय जनता पार्टी का साधू प्रकोष्ठ था, जिसने कहा कि हम राम की सौगंध खाते हैं कि मंदिर वहीं बनायेगें, के उदघोष के साथ संकल्प लिया गया और यह केवल चुनाव की द्ृष्टि से किया गया।
महोदय, यह सरकार हर स्तर और मोर्चे पर विफल रही है। सरकार गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, विदेश नीति के मामलों में पूरी तरह विफल रही है, पड़ोसी देशों से बढ़ती हुई कटुता, २००४ में लोक सभा के चुनाव होने वाले हैं, ये सारे मुद्दे आगे आने वाले चुनाव में कहीं राजनीतिक मुद्दे न बन पाएं, इसलिए अब साधु प्रकोष्ठ को आगे करके, उन्हें बढ़ावा देकर, आपने उच्च न्यायालय में एक अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया। जमीन न्यास को देना चाहते हैं और विश्व हिन्दू परिषद के नाम से देना चाहते हैं। शायद बहुत से लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि जो देशभक्त धर्मदास संत हैं, उन्होंने मुकदमा दायर किया है जिससे यह न्यास विवादित हो गया है। उन्होंने कहा कि इस न्यास में सिंघल नाम का व्यक्ति कहां से आ गया।
यह मामला अदालत में है कि कोई तथाकथित सिंघल इसमें है या नहीं है। उनका अदालत में यह आरोप है। समाचार-पत्रों के माध्यम से आपने पढ़ा होगा कि विश्व हिन्दू परिषद के पास अरबों रुपया कहां से आया, क्या विदेशों से आया? यह बताना चाहिए। यह हम नहीं कह रहे, धर्मदास जी जैसे देशभक्त सन्त ने यह आरोप लगाया है। इस रुपये को बर्बाद किया जा रहा है। शौकीनी पर खर्च किया जा रहा है। जब भी साधू प्रकोष्ठ का कोई सम्मेलन होता है तो सरकारी खर्चे पर होता है। अभी यहां पर सम्मेलन हुआ था तो सरकारी खर्चे पर हुआ था।
न्यास के जो जबरदस्ती सदस्य बने हैं, वे आजकल सब कुछ बोल रहे हैं। आज उन्होंने यहां तक कह दिया कि जापान की एक राडार कम्पनी है, उसने अन्वेषणकर कह दिया कि यहां मंदिर था और मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई। हमें तब आश्चर्य हुआ, जब हिमाचल प्रदेश के चुनाव में प्रधानमंत्री जी गये और उन्होनें सिंघल जी की भाषा को वहां दोहरा दिया। वे आजकल सिंघल से ज्ञानार्जन कर रहे हैं। जो सिंघल साहब बोले, वही प्रधानमंत्री जी हिमाचल में जाकर सभा में बोले। उन्होंने कहा कि वहां पर मंदिर था, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई। उपाध्यक्ष जी, कितना गम्भीर मामला है। छ: मार्च को उच्चतम न्यायालय में फैसला होने वाला हो, उस समय प्रधानमंत्री का इस प्रकार का बयान आया। प्रधानमंत्री के कन्धों पर लोकतंत्र के सबसे उच्च पद पर बैठकर संविधान की रक्षा करने का दायित्व है। पूरे हिन्दुस्तान में यदि लोगों की भावनाओं की रक्षा का भार प्रधानमंत्री के कन्धों पर हो, वह प्रधानमंत्री ऐसे अवसर पर जाकर कहे, जबकि उच्चतम न्यायालय में छ: मार्च को फैसला होने वाला हो तो क्या यह न्यायपालिका को प्रभावित करने वाला बयान नहीं है? जो न्यायालय निर्भीक और निष्पक्ष निर्णय देने में विख्यात है, उस समय देश के समक्ष प्रधानमंत्री का बयान न्यायालय को सरासर प्रभावित करने वाला है। प्रधानमंत्री अपना निर्णय स्वत : सुना रहे है । प्रधानमंत्री ने ऐसा बयान देकर अपने पद की गरिमा गिराई है।
हालांकि पद की गरिमा तो कई जगह जाकर वे गिराते चले जा रहे हैं। गुजरात में आपने देखा। यह परम्परा है कि कोई भी मुख्यमंत्री शपथ लेने के बाद अपना सम्मान प्रकट करने के लिए प्रधानमंत्री के घर आता है, प्रधानमंत्री से मिलता है। लेकिन ये हिन्दुस्तान के लोकतंत्र के पहले प्रधानमंत्री हैं, जो एक मुख्यमंत्री के लिए अपने पद की मर्यादा तोड़कर सम्मान प्रकट करने गये। ऐसा कभी नहीं हुआ। हमने कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि अटल जी जैसे प्रधानमंत्री, मर्यादा की बात करने वाले और मर्यादा का पालन करने वाले, हम लोगों को भी उपदेश देने वाले, अब भी कहते हैं कि हमने सवाल को रोक दिया है। हम लोग देश के महत्वपूर्ण सवालों को उठाते हैं तो वे हमें उपदेश देते हैं, संदेश देते हैं तो हम उनकी उम्र को देखते हुए बहुत सी बातें कह नहीं पाते हैं। उनकी उम्र का लिहाज तो करना ही पड़ता है। देश के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए लिहाज तो करना ही पड़ता है। क्या प्रधानमंत्री जी जवाब देंगे कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं या भारतीय जनता पार्टी के और साधू प्रकोष्ठ के प्रधानमंत्री हैं, मैं पूछना चाहता हूं? वे हमारे भी प्रधानमंत्री हैं, देश के प्रधानमंत्री हैं। देश के प्रधानमंत्री को देश की बात करनी चाहिए, लेकिन आज वे खुद क्या कहते हैं, यह सबके समक्ष है।
हम यह कहना चाहते हैं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसर हैं, एक श्री एस.पी. श्रीवास्तव हैं और दूसरे श्री बी.एन. मंडल हैं, दोनों को पुरातत्वविद माना जाता है। उनके ग्रन्थ को आप देख लें। उन्होंने लिखा है कि यहां पर कभी भी कहीं कोई मंदिर का नामोनिशान नहीं था। क्या आपने उसे पढ़ा है, क्या आप उनके खिलाफ कुछ कहेंगे, क्या उस ग्रन्थ की सदन में चर्चा करेंगे?वे दोनों इलाहाबाद में विश्वविद्यालय में जोशी जी के साथी रहे हैं। उन्हीं लोगों ने यह ग्रन्थ लिखा है। उसमें उन्होंने लिखा है कि वहां कहीं भी मंदिर नहीं था। लेकिन प्रधानमंत्री जी जैसा सिंघल जी कहते हैं, उनका समर्थन करते हुए जब सभा में कहते हैं तो न्यायालय का औचित्य क्या है ? जब सरकार न्यास को जमीन दे देगी तो उच्च न्यायालय में जो मुकदमा चल रहा है, उसके निर्णय का क्या होगा ? व्यावहारिक रूप से मेरा देखा हुआ है, यदि मुस्लिम मस्जिद जात भी जायें तो प्रवेश कैसे और कहां से कर सकेगें?
वह जमीन किसको दे रहे हैं, जो न्यास में भी नहीं है। ा दिनांक २२,२३ और २४ फरवरी को धर्म संसद की बैठक हुई। उसमें उन्हें इसके बारे में कोई जन समर्थन नहीं मिला इसलिए वापिस लौट गये। यह कौन है, जिन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट से माफी मांगी है ? वे कहते हैं कि २४ मार्च तक आत्महत्या कर लेंगे। उन्होंने कितनी बार आत्महत्या करने का ऐलान किया लेकिन कभी भी आत्महत्या नहीं की। पता नहीं उन्होंने आत्महत्या क्यों नहीं की? मेरा कहना है क वे लोग ही आत्महत्या करते हैं जो कायर होते हैं। ये लोग कितनी बार आत्महत्या करेंगे?जब देखो तब कह देते हैं कि मैं आत्महत्या करूंगा। अब फिर २४ फरवरी तक उन्होंने आत्महत्या करने के लिए कहा है। आज साधु प्रकोष्ठ जो बार-बार कह रहा है, उसके बारे में हिन्दुस्तान के पत्रकार और नेता आदि सभी लोग कहते हैं कि भाजपा साधु प्रकोष्ठ के माध्यम से राजनीति कर रही है। देश की एकता का बिखराव किया जा रहा है। यहां मंदिर-मस्जिद का विवाद चल रहा है कि हम वहीं मंदिर मस्जिद बनायेंगे जबकि समाजवादी पार्टी कहती हैं कि हम देश बनायेंगे। अगर देश बनेगा तो मंदिर-मस्जिद आदि सब कुछ बनेगा। यदि देश की एकता खत्म हो गई तो न मंदिर बनेगा और न मस्जिद बनेगी। यह प्रश्न आज देश के सामने है।
आज गेरूआ वस्त्र धारण करने वाले लोग देश में जिस तरह का बयान दे रहे हैं और जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, मेरा कहना है कि उन पर कडा प्रतिबंध लगाया जाये, कड़ी कार्रवाई की जाये और उन्हें तत्काल गिरफ्तार करके जेल भेजा जाये। यह हमारी मांग है, क्योंकि ये देश की एकता को तोड़क हैं । देश को तोडने वाले लोग है। ये देश की एकता को तोड रहे हैं। जब हम देश को एक बनाये रखने वाले लोग कह रहे हैं कि देश को एक बनाये रखना है, मंदिर मस्जिद सब बन जायेंगे लेकिन ये ऐसा किसी तरह से नहीं होने देना चाहते।
गुजरात में जो नंगा तांडव हुआ, उसके बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है। हमारे कुछ साथी यहां बैठे हुए हैं। वे हमारा छोटे भाई की तरह आदर करते हैं। वे कहते हैं कि वहां श्री नरेन्द्र मोदी ने अभी थोड़ी ही मूंछ घुमाई है, हम पूरी मूंछ घुमा देंगे। मेरा कहना है कि इसका मतलब क्या है ? इसका मतलब यह है कि अभी केवल एक सूबे में आग लगाई गई ऐसी आग पूरे देश में लगा देगें । मेरे साथी हैं, वह छोटे भाई की तरह है वह पूरे देश में आग लगाना चाहते है। …( व्यवधान)मैंने नाम नहीं लिया।…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार (फैज़ाबाद):हनुमान जी की पूंछ में आग किसने लगाई ? उसे रावण के लोगों ने लगाई, इसी कारण लंका जल गयी। …( व्यवधान)आप इशारा कर रहे थे इसलिए कह रहा हूं। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :आप हनुमान को ज्यादा मानते हैं ? क्या आप हनुमान चालीसा पढ़कर आये हैं ? …( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : आप उन्हें मानते हैं।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हम हनुमान चालीसा पढ़कर आये हैं और रोज पढ़ते हैं। …( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : आप मानते हैं इसलिए मैं कह रहा हूं। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हम कुछ भी नहीं करते हैं। हम किसी को नहीं मानते। केवल हनुमान जी को मानते हैं। मेरे पलंग के बगल में हनुमानजी की तस्वीर है। …( व्यवधान)हमें १९६६ के दिन याद हैं, जब कहा जाता था कि देश धर्म का नाता है, गऊ हमारी माता है जबकि इनके घर में गाय की पूंछ भी नहीं है। आपके पास कितनी गाय हैं ? …( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : हमारे पास चार गाय हैं। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :श्री आडवाणी जी के पास कितनी गाय हैं ?
श्री विनय कटियार : उनके पास उतनी ही गाय है जितनी आपके पास हैं। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हमारे पास १४ गाय हैं।…( व्यवधान)जितनी आप सबके पास है, उतनी मेरे पास अकेले हैं। …( व्यवधान)अच्छी बात है। …( व्यवधान)
श्री हरिन पाठक : सब सांसदों को आप दूध भिजवा दीजिए।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हमारे पास से कुछ चली गयी, वही उनके पास हैं। …( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह जी के पास हैं। वे हमारा साथ छोड कर चले गये हैं …( व्यवधान)जो भी हमारे साथ छोड कर चले गये, उन्हीं के पास गायें है। …( व्यवधान)
मैं कहना चाहता हूं कि न्यायपालिका को हम मानते हैं और हमें उस पर पूरा भरोसा है। प्रधान मंत्री जी कोर्ट में जो कुछ लिखकर दें, न्यायपालिका हमेशा निर्भीक और निष्पक्षता से अपना निर्णय देने के लिए विख्यात रही है। वह इन सब चीजों को समझती है। हम जानते हैं कि जस्टिस जे.एस. वर्मा ने कहा कि मैं राष्ट्र हित में अपनी जुबान खोल रहा हूं। मैं इसलिए कह रहा हूं कि हमारे निर्णय की व्याख्या जो तरह-तरह से की जा रही है, वह गलत है इसीलिए हमें बोलना पड़ रहा है। ये न्यायालय को मानने वाले नहीं हैं। इनका साधु प्रकोष्ठ कहता है कि न्यायालय निर्णय दे या न दे, हम बहुमत के बल पर वहां मंदिर बनायेंगे। मार-पीटकर, हत्या करके, आग लगाकर हम गुजरात को पूरे देश में दोहरालेंगे।
गुजरात को जब बनाएंगे तो पहले दिन ही आपको पता चलेगा कि गुजरात कैसा बनाया।…( व्यवधान)मैनें भी राजग का राष्ट्रीय ऐजेंन्डा देखा है । इसमें अयोध्या विवाद से दूर रहने की कोशिश है । एनडीए के एजेंडा में किसी भी पेज पर, किसी भी लाइन पर मन्दिर मस्जिद का विवाद का उल्लेख नही है। फिर भी अयोध्या की गैर विवादित राम जन्मभूमि न्यास को सुपुर्द करने की अर्जी लेकर केन्द्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय में चली गई ,…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : प्रवोक मत कीजिए।
श्री मुलायम सिंह यादव : जो पिछलग्गू दल हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि यह सबसे अक्षम्य राष्ट्रीय अपराधी सरकार है। उस सरकार के पिछलग्गू बने हुए हैं। सहयोगी दलों के कंधों पर सवार होकर यह सरकार चल रही है और मुझे अफसोस होता है कि हमारे कुछ पुराने साथी भी इसमें शामिल हैं। वे अपने कंधों पर इस सरकार को चला रहे हैं।…( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : हम लोग तो आपके पिछलग्गू हैं लेकिन आप लोग कुछ कर ही नहीं रहे हैं तो हम लोग क्या करें? …( व्यवधान)कुछ करिए॥…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :यह सही है। प्रभुनाथ के बारे में इनकी धारणा जो कुछ बनी रहे लेकिन इस मामले में वह सही हैं। वह हमारे साथी हैं।…( व्यवधान)पिछलग्गू तो और लोग हैं।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : क्याप्रभुनाथ सिंह भी आपके साथ पहले थे?
श्री रघुनाथ झा : हम लोग सब साथ के हैं।…( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम सब लोग एक ही कुटिया से निकले हुए हैं।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :प्रभुनाथ सिंह, एवं रघुनाथ झा जी आपकी दशा वैसी होगी जैसी हिमाचल में पंडित सुखराम की हुई कि पांच साल सरकार चलाई और भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर लात मारकर अलग कर दिया गया।…( व्यवधान)
श्री रघुनाथ झा : हम भी आपको कहना चाहते हैं कि हम लोग एजेंडा से एक कदम भी पीछे नहीं हटने वाले हैं। हम लोग उस एजेंडा पर कायम हैं।…( व्यवधान)उसके खिलाफ कुछ बात होगी तो हम कभी साथ नहीं देंगे।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :बहुत अच्छी बात है लेकिन पूछिए कि १९९४ के न्यायालय के फैसले के बाद उच्चतम न्यायालय क्यों गए? …( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: If the speaker does not yield, this kind of interruptions will not go on record.
(Interruptions) …* श्री मुलायम सिंह यादव :प्रभुनाथ सिंह, एवं रघुनाथ झा जी के जो संस्कार हैं, वे नहीं जा सकते। हम भी मौके की तलाश में हैं। जहां तक यह कहा गया कि हम लोग कुछ नहीं कर रहे हैं तो हम कोशिश करेगें कि हनारे जो समाजवादी साथी भटक गये वे पुन: वापस आजायें।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except Shri Mulayam Singh Yadav’s speech.
(Interruptions) …* श्री मुलायम सिंह यादव :हम कहना चाहते हैं कि क्या यह सवाल उठा सकते हो ? क्योंकि इस मामले में सरकार सुप्रीम कोर्ट में चली गयी कि न्यास को जमीन दे दी जाये। क्या यह भी कह सकते हो कि १९९२ में जिन अदालतों में मस्जिद के गिराने वाले दोषी हैं, उन पर मुकदमा चल रहा है तो क्या न्यायालय में जाओगे कि इनका भी फैसला जल्दी कर दो? अगर जरा भी गैरत है तो इसको भी कहना चाहिए। कि जो लोग जो मस्जिद गिराने के दोषी हैं, उनके खिलाफ जो न्यायालय में कार्रवाई चल रही है, उस मुकदमें के भी शाघ्र निस्तारण की फरियाद यह सरकार क्या न्यायलय से करेगी ? क्या आप दो जीभों से बात करोगे?दो जीभों की बात करने वाले लोग बड़े खतरनाक और ज़हरीले होते हैं। यह दो जीभ वाला कौन होता है?प्रधान मंत्री जी और पूरा मंत्री मंडल राष्ट्रपति जी से कहलवाए कि यह मामला बातचीत से नहीं, अदालत से तय हो और आप उच्चतम न्यायालय में चले जाएं, आप उच्चतम न्यायालय में क्यों गए?आप इस मामले में क्यों नहीं जाते हो कि जो लोग मस्जिद गिराने के दोषी हैं, जो चार्जशीटेड हैं, उनके खिलाफ भी जल्दी से फैसला होना चाहिए।
यह भी आपको करना चाहिए। ये दो जीभ से बात क्यों करते हैं, क्योंकि दो जीभ वाला तो सांप होता है, और वह अगर काट ले तो बड़ा जहरीला होता है।
* Not Recorded उपाध्यक्ष महोदय, मैं समय नहीं लूंगा। मैं चन्द्रशेखर जी से प्रार्थना करूंगा कि वे भी इस पर बोलें, क्योंकि अगर आप नहीं बोलेंगे, तटस्थ रहेंगे तो यह भी सही बात नहीं है। रामधारी सिंह दिनकर जी ने जो कहा है, वह आपको भी याद होगा। मैं उन पंक्तियों को यहां नहीं सुनाना चाहता, क्योंकि मैं आपका आदर करता हूं। आपको खुलकर अपने विचार रखने चाहिए, तटस्थ नहीं रहना चाहिए। हम लोगों को या इधर या उधर रहना चाहिए। ये गठबन्धन सरकार के लोग तो देश को बर्बाद करने वाले, देश का बिखराव करने वाले हैं, जबकि हम लोग देश को जोड़ने वाले हैं और देश को एक रखना चाहते हैं। आज हम कहना चाहते हैं कि जो देश के अंदर आतंक फैलाने वाले लोग हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी तो हम विदेशी आतंकवादियों के खिलाफ नहीं लड़ सकते। इनके कारनामों के कारण जितना नुकसान हिन्दुओं को उठाना पड़ा है, उतना और किसी को नहीं उठाना पड़ा है। ये सही अर्थों में हिन्दुओं के हमदर्द नहीं हैं। इनके कारनामों की वजह से ही आज हिन्दुओं को अमरनाथ और वैष्णों देवी की यात्रा करने में परेशानी हो रही है, मुश्किल हो रही है। वहां कितने हिन्दुओं की हत्या हुई, कितने हिन्दू परेशान हैं, केवल गठबन्धन सरकार कारनामों से ही यह हुआ है। आज दुनिया में अकेला हिन्दू बहुमूल्य राष्ट्र भारत बचा है, वहां भी देश की एकता टूट गई तो इस देश को दुनिया में कोई पूछने वाला नहीं होगा, हिन्दुओं को कोई पूछने वाला नहीं होगा।…( व्यवधान) हम गम्भीरता से कह रहे हैं और आप हंस रहे हैं। हम असली हिन्दू हैं और आप नकली हिन्दू हैं।…( व्यवधान) हम कह रहे हैं कि आप अकेले होते जा रहे हैं, कोई आपके साथ नहीं है। नेपाल जो हिन्दू राष्ट्र है, वह भी आपके साथ नहीं है, उसको भी आप ठीक से साथ नहीं रख पाए। यहां पर भी आपका साथ देने वाले, नही हैं। आप हमें चुनौती देते हैं कि समाजवादी, वामपंथियों के खिलाफ महाभारत करेंगे। क्या इनको गिरफ्तार नहीं करना चाहिए ?अगर एक भी समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता पर हाथ उठा दिया तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे और आपको पता चल जाएगा। समाजवादी बड़ा जोखिम उठाने वाले लोग होते हैं। हमारे पुरखों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। आचार्य नरेन्द्र, डा. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जी जैसे समाजवादी हमारे पुरखे हैं। आप लोग माफी मांगने वाले हैं। आप हमसे क्या महाभारत करेंगे। आप गृह मंत्रालय से सूची मंगाइए तो पता चल जाएगा कि इमर्जेंसी के अंदर किन लोगों ने माफी मांगी थी। हम न झुकेंगे, न डरेंगे और न टूटेगें। आप हम लोगों से महाभारत की बात करते हैं, हमें चुनौती देते हैं। हम किसी को चुनौती नहीं देते, अगर कोई हमें चुनौती देता है तो वह हमें स्वीकार है। हमें साधु प्रकोष्ठ की चुनौता स्वीकार है। हम राजनीतिक विचारधारा से लड़ना चाहते हैं, हमारा कोई दुश्मन नहीं है। लेकिन अगर भाजपा चुनौती देती हैं तो हम उसे स्वीकारने को तैयार हैं, जिस तरह से भी लड़ना चाहो लड़ लें। हम हिंसा में विश्वास नहीं रखते। आप कहते हैं समाजवादी और वामपंथी, आपने एक को छोड़ दिया। हम पर आरोप लगाते हैं। कहां गए रघुनाथ झा जी, उनको पता होना चाहिए कि इन्होंने समाजवादियों को, वामपंथियों को और मुसलमानों को चुनौती दी है।
श्री रघुनाथ झा : पहले समाजवादी तो एक हो जाएं।
श्री मुलायम सिंह यादव : इन्होंने कांग्रेस को चुनौती नहीं दी। हम लोगों को चुनौती दी हैं।
उपाधयक्ष महोदय : मुलायम सिंह जी आप उनको प्रवोक करते हैं तो यहां गड़बड़ होती है।
श्री मुलायम सिंह यादव : आपने मंदिर मुद्दे का बातचीत से हल निकालने की बात राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के माध्यम से कहलाई है। हम पूछना चाहते हैं कि प्रधान मंत्री जी बताएं कि पांच साल सरकार चल गई। इस अवधि में सभी पक्षों को एक साथ बैठाकर हल करने की कोई सरकारी पहल की गई? आप क्यों देश के लोगों को गुमराह करना चाहते हैं कि हम बातचीत कर रहे हैं। हम आपसे पूछना चाहते हैं कि हिन्दुओं के पुरखों ने विश्व हिन्दु परिषद को वाटरमार्क पेपर पर हिन्दुत्व का पट्टा, वारिसनामा कर दिया है कि आप ही इस देश के और हिन्दुओं के मालिक हैं ? हम आपसे कहीं ज्यादा हिन्दुत्व की बात करने वाले हैं। लेकिन हिन्दुत्व का मतलब है आपस में मेलजोल की सभ्यता को कायम रखना। हम सनातनी हिन्दू हैं। सनातनी धर्म का मतलब है आपस में मेलजोल की सभ्यता, संस्कृति और सबको साथ लेकर चलना तथा सभी धर्मो की आदर करना। इसी बात को लेकर यह देश महान बना है और आप इसके टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं। आप बहुमत के लोगों की भावनाओं को भड़काकर देश को एक नहीं रखना चाहते हैं।
15.00 hrs. जब आप देश को एक नहीं रख सकते तो गरीबी, बेरोजगारी और मेहनतकश लोगों की समस्याओं को कैसे दूर सकते हैं। आज हमारे देश के जवान हमारी ही जमीन पर शहीद हो रहे हैं। इससे ज्यादा राष्ट्रीय शर्म की बात और क्या हो सकती है। इससे ज्यादा राष्ट्र के लिए अपराधी सरकार और कौन सी हो सकती है? तीन बार दुश्मनों को खदेड़ने वाले हमारे बहादुर जवान अपनी ही जमीन पर शहीद हो रहे हैं। आज देश को एक रखने का सवाल है। माननीय प्रधान मंत्री जी कहते हैं कि हमारी बातचीत हो रही है तो वे बताएं कि कहां-कहां बातचीत हुई, क्या बातचीत हुई। पूरा देश जानना चाहता है। हम जो कहेंगे उसे तो ये मानेंगे नहीं। हमारे पूर्वजों ने विश्व-हिंदू परिषद् के नाम कोई वसीयतनामा नहीं लिख दिया है, जो ये ही हिंदुओं के ठेकेदार बनते हैं। संसद ने पास किया है कि १५ अगस्त १९४७ के बाद पूजा-स्थलों के बारे में किसी भी प्रकार का कोई विवाद खड़ा नहीं कर सकता। जिन धर्म स्थलों की जो स्थिति थी , उसकी यथा स्थिति बनाये रखाना केन्द्रीय सरकार का दायित्व होगा। अगर कोई इसका उलंघन करता है तो वह दंडनीय अपराध माना जाएगा। विश्व-हिंदू परिषद के लोग तो ३ हजार मस्जिदों पर कब्जा करना चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने गेरूआ वस्त्रधारी साधु प्रकोष्ठ खोला हुआ है। जैसे हमारे यहां समाजवादी युवा संगठन है उसी प्रकार का उनका यह प्रकोष्ठ है। बजरंग दल वाले हमारे भाई मानेंगे नहीं। ये राजनैतिक लाभ उठाने के लिए यह सब कर रहे हैं। इन्हें देश की चिंता नहीं है, देश को एक रखने की चिंता नहीं है। आज देश पर आतंकवादियों से खतरा है। आज १५ अगस्त और २६ जनवरी हम दहशत के माहौल में मनाते हैं। संसद में भी ऐसी सिक्योरिटी लगी हुई है जैसे हम संसद से जिंदा भी जायेंगे या नहीं जायेंगे। एक बार तो हम बच चुके हैं। इसलिए हमें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे दूसरे समाज के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचे।
योगी आदित्यनाथ (गोरखपुर) : कम से कम माननीय मुलायस सिंह जी ने यह तो माना कि यह हिंदू राष्ट्र है।
श्री मुलायम सिंह यादव : यह हिंदू राष्ट्र नहीं है बल्कि हिंदू बहुमत वाला देश है। मेरा कहना है कि आज आप विश्व में अकेले पड़ गये हैं। आप ऐसे कारनामें करोगे तो दुनिया में आपको पूछने वाला कोई नहीं मिलेगा। यह मैं आपको अपनी सच्ची राय एवं चेतावनी दे रहा हूं। आप जितना मुसलमानों, सिखों या ईसाईयों का नुकसान कर रहे हैं उससे कहीं ज्यादा आप हिंदुओं का नुकसान कर रहे हैं। हिंदुओं का अपमान और हत्याएं कहीं ज्यादा हो रही हैं। हिन्दु लोग अमरनाथ यात्रा नहीं कर पा रहे हैं, वैष्णों देवी मंदिर के दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। आप हिंदू विरोधी हैं। आप लोग झगड़ालू हैं। अयोध्या के विवाद में लोगों को ले जाकर जो मुख्य मुद्दे गरीबी, महगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा के हैं उनसे आप लोगों का ध्यान बंटाना चाहते हैं। ताकि वे चुनावी बहस के मुद्दे बन जायें इसलिए आप ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं। हमारे लिए देश की एकता और सार्वभौमिकता बड़ी है, सर्वोपरि है। हम देश को एक रखना चाहते हैं। हमारा कोई दुश्मन नहीं है, हम तो राजनैतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। हम किसी को भी दुश्मन नहीं मानते हैं। ठीक है हमने देश की एकता और अखंडता के लिए कठोर कार्रवाई की। माननीय शंकराचार्य जी को गिरफ्तार करवाना पडा। हमारे भाई विनय कटियार इस बात को नहीं भूलेंगे, बहन उमा भारती भी परेशान हुई होंगी कि मैंने उनको गिरफ्तार कराया । लेकिन हमने देश की एकता और अखंडता की खातिर न चाहते हुये यह सब किया था। हमने समाजवादी पार्टी की सरकार के लिए यह सब नहीं किया था। हम जानते हैं कि इसके कारण माननीय चन्द्रशेखर जी की सरकार को हटना पड़ा, हमें भी हटना पड़ा। लेकिन देश हित में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखने के लिये कार्यवाही करने में संकोच नही किया ।
कांग्रेस की कृपा न होती, तो चन्द्रशेखर जी नहीं हटते और हमारी भी सरकार नही बनने दी। यह सही है कि ये सफल रहे हैं, हम साथ देते रहेंगे, क्योंकि हम वचन के पक्के हैं। …( व्यवधान)चुनाव के बाद प्रदान मंत्री कौन बनेगा हम तय कर लेगें। परन्तु इस गंठबंधन को तो सराकार से हटना पडेगा । किसी को तो बनना है और बनना भी इन्हीं लोगों में से और इधर से ही बनना है।
उपाध्यक्ष महोदय, २००४ का चुनाव निकट है आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए, ये सवाल उठाए जा रहे हैं। हम देश को ढाढस बंधाना चाहते हैं । और इस सरकार की कोशिश है कि हिन्दू-मुस्लिम व साम्प्रदायिक तनाव के कारण देश के असली मुद्दे न उठने पायें। यही हमारी आपसे अपील है। हम ज्यादा नहीं कहना चाहते हैं।…( व्यवधान)हम इस बात को कई बार कह चुके हैं। …( व्यवधान)अन्य माननीय सदस्यों को मौका देंगे। आप हमारी बात मानें, तो हम सदन का समय नही लें। आप हमारी बात नहीं मानेगें। हम कहना चाहते हैं कि इन संगठनों पर कड़ाई से कार्यवाही करें और प्रतिबन्ध लगायें। इन पर मुकद्दमा चलायें और देश को एक रखने के लिए इनको बन्द करें। अगर आप इनको जमीन देते हैं, तो तुष्टीकरण की राजनीति बन्द करें। हम पर आरोप लगाया जाता है कि हम मुसलमानों के साथ तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं। हम हिन्दू, मुसलान और सिक्ख, सभी के साथ हैं और हम अन्याय के साथ हैं। सत्य का हम साथ देते हैं। उत्तर प्रदेश जो हमारे विरोधी हैं और उनके ही बल पर आपने साढ़े पांच साल सरकार चलाई है। हम जानते है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। इसलिये समाजवादी पार्टी अन्याय के विरोध में उनके साथ है । हम पोटा कानून के विरोध में हैं। हम पोटा हटाने के पक्ष में हैं और सिद्धान्तत: पोटा कानून के खिलाफ हैं। हम लोग अगर सत्ता में आये, तो पोटा कानून किसी पर नहीं लगेगा। गलती करेंगे, तो IPC और CrPC कानून दुनिया के मुकाबले हमारे देश में काफी सख्त हैं और उनके माध्यम से पूरी सजा दी जा सकती है, लेकिन इस कायर सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह संविधान की रक्षा करे। इससे यह उम्मीद नहीं है कि हमारे देश की भावनाओं का आदर करें। हम चाहते हैं कि तुष्टीकरण की राजनीति खत्म करिए और इस सदन व इस देश की भावनाओं का आदर कीजिए। इस देश की भावनाओं का आदर करते हुए आपका दायित्व है कि न्यास को जमीन दिलाने की जो बात कही है, तथा न्यायालय से अनुरोध किया है उसको वापिस लें और देश को एक रखें। देश को एक रखकर शक्तिशाली बनायें। सरकार तुष्टीकरण की अपनी नीति को नमस्कार करे और देश रक्षा के संकल्प को पूरा करने में संसग की भावनाओं का आदर करे। यही मेरा आपसे निवेदन है।
श्री चिन्मयानन्द स्वामी (जौनपुर):उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने अत्यन्त संवेदनशील मुद्दे पर सदन में चर्चा करने का अवसर मुझे दिया। मैं श्री मुलायम सिंह जी का भी आभारी हूं, जिन्होंने विषय पर तो कम, विषय से हठकर पर्याप्त चर्चा की है। लेकिन मैं उनको विश्वास दिलाता हूं कि मैं विषय से बिलकुल भी बाहर नहीं जाऊंगा और अयोध्या के संबंध में ही चर्चा करना चाहूंगा।
महोदय, मैं श्री मुलायम सिहं जी से सहमत हूं कि १५ साल से लगातार यह मसला सदन में उठ रहा है। संसद का शायद ही कोई ऐसा सत्र होगा, जिस सत्र में अयोध्या की चर्चा सन् १९९१ के बाद से न हुई हो। मैं १९९१ से इस लोक सभा का लगातार सदस्य रहा हूं, बीच के कुछ अन्तर को छोड़ कर और संभवत: कोई ऐसा सत्र नहीं गया है, जब इस पर चर्चा न हुई हो।
लेकिन लगता है कि चर्चा ही होती रहेगी। इस चर्चा का अंत कहां होगा, इस चर्चा का विश्राम कहां होगा, कहना मुश्किल है क्योंकि जब तक इस मसले को हल करने के लिए सम्प्रभुता सम्पन्न संसद स्वंय विचार नहीं करेगी क्योंकि यह देश का सर्वोच्च सदन है, सर्व शक्तिमान सदन है, यहीं के बनाए कानूनों पर न्यायालयों में चर्चा और बहस होती है तब तक कोई हल निकलना कठिन हो। एक दिन किसी चर्चा के दौरान माननीय दासमुंशी जी ने कहा था कि हम संसद के कॉलैक्टिव विजडम ‘सामूहिक विवेक’ का उपयोग अयोध्या जैसे मसले को हल करने के लिए नहीं कर पाए। मैं बड़े दुखी मन के साथ कहना चाहता हूं कि माननीय मुलायम सिंह जी कि चिन्ता हम सब की चिन्ता है। राष्ट्र बिखर जाएगा, देश बिखर जाएगा, परिवार बिखर जाएगा और समाज बिखर जाएगा। परिवार और समाज बिखर जाए यह कोई नहीं चाहेगा क्योंकि बिखरे हुए देश में जीना मुश्किल होगा । जातीय बिखराव हमारे सामने चुनौती पैदा करता है। मुलायम सिंह जी ठीक समझते हैं कि जातियां किस प्रकार आपस में लड़ रही हैं, उन्हें लड़ाने वाले कौन हैं और जातीय विद्वेष की आग में देश को धक्का देने वाले कौन लोग हैं यह बताने की जरूरत नहीं है ? सभी आदरणीय नेता जानते हैं। स्वाधीनता आन्दोलन से पहले देश में जातीयता जैसी कोई चीज नहीं थी। जातियां थी। वे आज से नहीं, अनेकों वर्षों से हैं लेकिन जातीयता नहीं थी और जाति समाज को बांटने नहीं जोड़ने के लिए थी।
मैं खेतिहर परिवार में पैदा हुआ हूं। दूर-दूर तक खेतों में पहुंचने के लिए मेढ़ बनाए जाते हैं। जमीन को बांटने के लिए मेढ़ नहीं बनाए जाते हैं। इसी तरह समाज में जो जातियां है, वे आपस में जोडने के लिए है लेकिन जातियों में जहर पैदा किया गया। किस के लिए पैदा किया गया मैं नहीं जानता लेकिन उस जहर में देश जल रहा है। जिस साम्प्रदायिकता की बात कही जाती है, मैं समझता हूं कि जातीयता के जहर को अगर हम कम करने की कोशिश करें तो साम्प्रदायिकता अपने आप सिमट जाएगी। कहा गया कि अयोध्या के मसले में राजनीति की जा रही है। यह बात सच है। हम १५ अगस्त, २६ जनवरी और दूसरे राष्ट्रीय दिवस में उतने उत्तेजित नहीं होते, जितने हर वर्ष ६ दिसम्बर को होते हैं। यह संसद का कर्मकांड बन गया और हम इस पर लगातार चर्चा करवाते हैं। जब भी विंटर सैशन होता है तो ऐसा होता है। दूसरे मौके हम कभी-कभी चूक जाते हैं। लेकिन अयोध्या की हर मौके पर चर्चा की जाती है। १९३ में ही नहीं, नियम १८४ में भी एक बार चर्चा हो चुकी है। …( व्यवधान)कृपया मंत्री शान्त रहें।
उपाध्यक्ष महोदय: आप इसमें मेरी मदद कर रहे हैं।
श्री चिन्मयानन्द स्वामी : मैं अनुरोध कर रहा हूं। नियम १८४ के अन्तर्गत भी इस पर चर्चा हो चुकी है और मत विभाजन भी हो चुका है। उस संबंध में लोक सभा ने अपना बहुमत भी दिया है। हमें याद होना चाहिए कि माननीय प्रधान मंत्री ने कहा था अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण है। इसे लेकर नियम १८४ में चर्चा हुई थी और मत विभाजन हुआ था। माननीय प्रधान मंत्री जी के वक्तव्य का लोक सभा ने बहुमत से समर्थन किया था।
एक बात श्री नरसिंह राव जी ने भी कही थी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुझे कहा था कि यदि यह मामला राजनीति से अलग हो जाए तो मसला हल हो सकता है। मैं भी इस बात को समझता हूं कि यह राजनीति से अलग हो जाए क्योंकि शुरु से ही इसमें राजनीति हुई है। १९४९ से नहीं, मैं बहुत पीछे जाता हूं। मुकदमों का इतिहास बहुत पुराना है। सबसे पहला मुकदमा महन्त रघुवर दास ने १८८५ में किया था। उस समय मजिस्ट्रेट ने कहा था कि यह सच है कि मन्दिर तोड़ कर मस्जिद बनायी गई थी लेकिन बात बहुत पुरानी हो चुकी है इसलिए इस पर कोई फैसला देना बहुत मुश्किल है।
उपाध्यक्ष महोदय, यह सन् १८८५ की बात है। उसी साल कांग्रेस की स्थापना हुई थी। जितनी कांग्रेस पुरानी है, उतना ही यह मसला पुराना है। सन् १९३४ में एक दंगा हुआ था, जिसमें यह ढांचा टूटा था। अंग्रेज सरकार ने उसकी मरम्मत कराकर उसे ठीक करवा दिया लेकिन उसके बाद से वहां आज तक नमाज अदा नहीं की गई। उसके पहले वहां नमाज़ पढ़ी जाती थी, यह भी कहना मुश्किल है। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने २४ सितम्बर, १९९१ को इसी सदन में कहा था कि अगर कोई कुराने पाक की कसम खाकर यह कहे कि मैंने वहां नमाज पढ़ी है तो उस विषय पर हम पुनर्विचार करने के लिये तैयार हैं और उन्हें यह ढांचा दिया भी जा सकता है। लेकिन उस समय सैयद शाहाबुद्दीन, सासंद खड़े हो गये और कहने लगे कि दो प्रकार की मस्जिदें होती हैं - एक वह जहां नमाज पढ़ी जाती है- और दूसरी वह जहां नमाज नहीं पढ़ी जाती है। हमारे एक मित्र कहते हैं कि वह मस्जिद नहीं है, महज़ एक जिद्द है, उस जिद्द को ठीक से पहचान रहे हैं। यह वही जिद्द है जिसके कारण देश का बटवारा हुआ, देश के टुकड़े हुये। इस सब के पीछे एक ही ज़िद्द थी अन्यथा मुसलमान जितने इस देश में सुरक्षित रहते हैं, उतना दुनिया के किसी मुल्क में सुरक्षित नहीं हैं। मैं श्री मुलायम सिंह जी की इस बात से सहमत नहीं हूं…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) … * श्री चिन्मयानन्द स्वामी :मैं आपसे सहयोग कर रहा हूं, आप मुझे सहयोग कीजिये।
SHRI G.M. BANATWALLA (PONNANI): Sir, there is a total misleading of the House. The 1885-year case is being misrepresented. Evidence is there about masjid also.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Banatwalla, when you speak, when you get your chance, you place your viewpoints.
SHRI G.M. BANATWALLA : But there should be certain respect for truth.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Banatwalla, he is not yielding.
श्री चिन्मयानन्द स्वामी :उपाध्यक्ष जी, मैं निवेदन कर रहा था कि जितना माननीय मुलायम सिंह जी यादव को समय मिला, उसकी डिस्टर्बैंस में से माइनस करके, मुझे भी पूरा समय दिया जाये।
SHRI G.M. BANATWALLA : There is no respect for truth.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Banatwalla, when you get your chance, you place your viewpoints. Now, he is not yielding. How can I give you the floor?
श्री चिन्मयानन्द स्वामी :उपाध्यक्ष जी, श्री बनातवाला साहब मेरे बुजुर्ग हैं। मैं इनका लिहाज करता हूं और इनका सम्मान करता हूं। उपाध्यक्ष जी, मुझे इतना वक्त दिया जाये कि मैं अपनी बात कह सकूं, उसके बाद मैं इनकी पूरी बात सुनूंगा।
श्री जी.एम.बनातवाला: लेकिन आप सच्चाई कहियेगा।
श्री चिन्मयानन्द स्वामी : यदि मैं सत्य नहीं कह रहा हूँ तो आपको मुझे बेनकाब करने का पूरा अधिकार है।
उपाध्यक्ष महोदय : बनातवाला जी, मैंने आपसे जो कहा था, वही स्वामी जी भी कह रहे हैं।
। ग़्द्ृ ङड्ढहद्ृद्धड्डड्ढड्ड श्री चिन्मयानन्द स्वामी : उपाध्यक्ष जी, मैं इस सम्बंध में मुकदमों का इतिहास बताना चाहता हूं। लेकिन दिक्कत यह है कि लोग सच्चाई बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं। मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि यह देश और इस देश का आम आदमी आश्वासन देता है जो भी मज़हब जहां भी पैदा हुआ हो, यदि वहां वो खत्म हो जाता तो भारत में उसके लिये जगह है । उसे शान्ति से रहने के लिये भारत की जमीन है। हम मज़हबों को खत्म नहीं करना चाहते, हम उसे मानना चाहते हैं, उसका आदर करना चाहते हैं। इसलिये कहा गया है :
सर्वे:भवन्तु सुखिन:
सर्वे:संतु निरामय:
सर्वेभद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद् दु:ख भाग भवेत्।
इस धरती पर हम किसी का नुकसान नहीं चाहते हैं। जो पर्शियन लोग अपने देश में पैदा हुये और वहां से यहां चले आये, वे इस देश में सुरक्षित रह रहे हैं। उनकी कौम को कोई खतरा नहीं है।
उपाध्यक्ष जी, मुकदमों का इतिहास बहुत लम्बा है। सन् १८८५ में पहला मुकदमा हुआ। उसके बाद में झगड़ा हुआ। उसके बाद से वहां आज तक नमाज़ नहीं अदा की जा रही है। आजादी के बाद सन् १९४७ में एक घटना हुई। सोमनाथ मन्दिर, जिसे आक्रान्ताओं द्वारा तोड़ दिया गया था, इस देश के स्वाभिमानी गृह मंत्री माननीय पटेल जी के हस्तक्षेप से, राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू की उपस्थिति में, वहां पूजा हुई और वह मंदिर पुनर्प्रतिष्ठित हुआ। अयोध्या के लोगो में भी विश्वास पैदा हुआ कि जैसे सोमनाथ का मंदिर बहाल हुआ है, वैसे ही अयोध्या का मंदिर भी बहाल होगा। लेकिन जब दो साल तक इंतजार करने पर कुछ नहीं हुआ तो २२ दिसम्बर, १९४९ की रात को हुए चमत्कार की कहानी मैं नहीं दोहरा रहा हूं, केवल इतना कहता हूं कि वहां रामलला का प्राकटय हुआ…( व्यवधान)कुछ भी हो भगवान स्वयंभू ही होते हैं। भगवान किसी के पैदा किये हुए नहीं होते हैं।
श्री मणि शंकर अय्यर (मइलादुतुरई): स्वयंभू या डिस्टि्रक्ट मजिस्ट्रेट के हाथ से, यह बताइये।…( व्यवधान)
श्री रघुनाथ झा : आपका ही राज था।…( व्यवधान)
श्री चिन्मयानन्द स्वामी :उपाध्यक्ष महोदय, मैं मणि जी को बताना चाहता हूं कि वह भी आई.ए.एस. अफसर थे, आप भी पहले आई.ए.एस. अफसर रहे हैं, आप लोग जो कुछ करते हैं उसे आप मुझसे ज्यादा समझते हैं, आपको ज्यादा पता है, आप एक-दूसरे को समझते हैं।
जो भी हो, उस समय प्रदेश और देश में कांग्रेस की सरकार थी, कोई दूसरी सरकार नहीं थी। जब वहां रामलला का प्राकटय हुआ तो वहां नगरपालिका के अध्यक्ष श्री प्रियदत्त राम थे, वे कांग्रेस के ही नगरपालिका अध्यक्ष थे। उन्हीं को इसकी व्यवस्था सौंपी गई। इसके बाद फिर श्री गोपाल सिंह विषारद ने न्यायालय से पूजा का अधिकार मांगा था हमें पूजा का अधिकार मिलना चाहिए. न्यायालय ने उन्हें पूजा का अधिकार दिया और कहा कि आप पूजा कर सकते हैं। उसके खिलाफ दूसरा पक्ष कोर्ट में गया तो कोर्ट ने उसे मना कर दिया और मना ही नहीं किया बल्कि यहां तक कह दिया कि आप वहां बाधा पहुंचाने नहीं जायेंगे, दो सौ गज के अंदर आप नहीं जा सकते। यह न्यायालय का निर्णय था। और विवाद को देखते हुए वहां ताला लगा दिया गया। ताले का कोई न्यायिक औचित्य नहीं था। उस ताले के पीछे कोई जूडशियल जजमैन्ट नहीं था। बल्कि स्थानीय प्रशासन ने ऐसे ही ताला लगा दिया था। यह बड़ी वचित्र बात लगती है कि रामलला को बिठाया भी गया, रिसीवर बैठाया गया, पूजा का अधिकार दिलाया गया, उसके बाद ताला लगा दिया गया। यानी थोड़ा शुरू, थोड़ा बंद। वहां ताला लगा रहा। २२ दिसम्बर, १९४९ की घटना के विरोध में १८ दिसम्बर, १९६१ को, ११ साल, ११ महीने और २६ दिन के बाद दूसरे पक्ष को ज्ञान हुआ कि वहां हमें मस्जिद का अधिकार पाना चाहिए। ११ साल, ११ महीने और २६ दिन तक उस मस्जिद पर दावा करने के लिए कोई आगे नहीं आया। इससे जाहिर होता है कि यदि इसके पीछे राजनीति नहीं होती तो यह मसला नहीं उठता। उसे कभी किसी ने मस्जिद नहीं कहा, उसे सभी जन्मस्थान कहते थे। आज श्री बी.एन.कृपाल साहब ने जो निर्णय दिया है उसमें उसे रामचंद्र कोट कहा है। उस इलाके का नाम रामचंद्र कोट है।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं निवेदन करना चाहता हूं कि १९४९ के बाद लगातार जितने भी मुकदमे हुए हैं, उन सभी में फैसला रामभक्तों के पक्ष में हुआ है। भले ही वहां कोई स्टे दिया गया हो, लेकिन स्टे भी बाद में रामभक्तों के पक्ष में खारिज किये गये। इसके बाद मैं उस बात पर आना चाहता हूं जब ताला खोला गया। जब उसका ताला खोला गया तो उस समय देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री राजीव गांधी थे, प्रदेश में मुख्य मंत्री श्री वीर बहादुर सिंह जी थे और केन्द्र में गृह मंत्री श्री अरूण नेहरू थे। ताला खोलने के लिए एक उमेश पांडे नाम का आदमी कोर्ट में गया। अभी माननीय मुलायम सिंह जी कह रहे थे कि मुकदमे पड़े हुए हैं, जिनका निपटारा नहीं होता है, यह सच है। लेकिन वह मुकदमा बड़े अद्भुत ढंग से तय हुआ। २३ जनवरी, ८६ को वह कोर्ट में गया, २५ जनवरी को वहां खारिज हुआ, उसी दिन वह दूसरी कोर्ट में चला गया और एक फरवरी को फैसला आ गया कि ताला हटाया जाना चाहिए और और एक फरवरी, १९८६ को कोर्ट के आदेश से ताला हट गया। जब कोर्ट के आदेश से ताला हटा तो उसका विरोध करने के लिए बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का जन्म हुआ। न्यायालय के निर्णय का विरोध करने के लिए एक फरवरी, १९८६ को ताला खोला गया और १४ फरवरी, १९८६ को बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ।
ये कहते हैं कि न्यायालय की बात मानेंगे। कौन भरोसा करेगा इन पर कि ये न्यायालय की बात मानेंगे। एक बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की घोषणा की गई। न्यायालय ने निर्णय दिया था कि २०० गज के अंदर नहीं आएंगे लेकिन अयोध्या में मार्च का आयोजन किया गया। अयोध्या में भक्त लोग यात्रा करने के लिए जाते हैं लेकिन वहां मार्च का आयोजन किया गया। चुनौती दी गई जैसे जेहाद के लिए जा रहे हैं। मैं निवेदन करना चाहूँगा कि यह मसला हल हो गया होता अगर इसके पीछे नीयत साफ होती। नीयत साफ नहीं थी। फिर सवाल आया शिलान्यास का। बड़ा ताज्जुब होता है कि जिस दिन शिलान्यास होना था, उसके २४ घंटे पहले तक, ८ नवंबर तक, वह जगह विवादित थी। कोर्ट ने वह जगह विवादित घोषित कर रखी थी, लेकिन पता नहीं रातों रात क्या चमत्कार हुआ कि भारत सरकार के गृह मंत्री माननीय बूटा सिंह जी वहां गए। वहां भी नारायण दत्त तिवारी जी थे। इनकी आपस में बातचीत हुई और सवेरे वह मसला हल हो गया, कहा गया कि यह ज़मीन विवाद से बाहर है। वहां शिलान्यास हो गया। जब शिलान्यास होता है तो उसका मतलब होता है शुरुआत। मंदिर बनने की शुरूआत किसके समय में हुई? वह शुरुआत किसने की? और वह शुरुआत ही नहीं की, जब शिलान्यास हो गया तो उसके बाद वहां जनसभा हुई जिसमें रामराज्य स्थापित करने की घोषणा एक माननीय प्रधान मंत्री द्वारा की गई कि हम देश में रामराज्य की स्थापना करेंगे। उन्होंने अयोध्या से अपनी चुनावी यात्रा शुरू की। शिलान्यास के बाद दूसरे दिन जब लोग निर्माण के लिए पहुँचे तो कहा कि यह स्थान गलती से विवाद से बाहर नही है, केवल शिलान्यास के लिए वह विवाद से बाहर था और शिलान्यास होते ही वह फिर विवादित हो गया। जैसे मंदिर में रामलला स्थापित होते ही ताला लगा दिया गया था। कुछ बढ़ो, कुछ रुको, रुक-रुककर चलो जिससे सब मौकों पर इसमें राजनीति की जा सके। राजनीति किसने की? माननीय मुलायम सिंह जी ने भी ताल ठोंका था कि वहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता - ऐसी एक चुनौती दी थी। परिन्दा तो नहीं मरा, मगर न जाने कितने ज़िन्दा लोग मरे। वह शाबाशी है आपको।
श्री मुलायम सिंह यादव : कितने मरे?
श्री चिन्मयानन्द स्वामी : गिनती आप करें, मारने वाले आप थे। हम क्या बताएं।…( व्यवधान) लाशें गिनना मेरा काम नहीं है, मैं तो गोलियां गिनता हूँ। कितनी गोलियां चलाईं वह गिनता हूँ। ..( व्यवधान)
खैर, वह हुआ और पहली बार हुआ । आज भी आप कह रहे हैं कि साधु-संतों को गिरफ्तार करो। मध्य प्रदेश के एक मुख्य मंत्री हैं। उन्होंने कहा कि धर्म संसद में नकली साधु आए थे। मज़ेदार बात यह है कि वह जिनको नकली कह रहे हैं, उन्हीं में से कुछ लोगों से वह कथा सुनते हैं, लेकिन जब वे यहां आ जाते हैं तो उनको नकली कहते हैं। नकली-असली का भेद इतना है कि आपके घर में है तो असली और हमारे घर में है तो नकली।
गेरुए वस्त्र की बात जो माननीय मुलायम सिंह जी ने कही है, साक्षी सच्चिदानन्द महाराज को सब जानते हैं, कौन नहीं जानता। उनको आपने राज्य सभा में सम्मानपूर्वक भेजा। वह इसी साधु प्रकोष्ठ के सदस्य हैं और हमसे ज्यादा गाढ़ा कपड़ा पहनते हैं। …( व्यवधान)ये धर्मदास की बात करते हैं। धर्मदास अभी पिछले एक साल तक उसी साधु प्रकोष्ठ के सदस्य थे। इसे ब्रजभूषण शरण सिंह जी अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि पहलवानी में कई बार इनकी उनसे कुश्ती हुई है। मगर उन पर भरोसा मत कीजिए। वह कितने दिन आपके साथ रहेंगे, हमें भरोसा नहीं है। जैसे साक्षी जी महाराज रूठ गए, वैसे धर्मदास भी टिकने वाले नहीं हैं।
मैं निवेदन कर रहा था कि स्थिति किस तरह से बिगाड़ी जाती है। उस समय वार्ता की बात आनी चाहिए थी। माननीय मुलायम सिंह जी के लिए बड़ा अनुकूल समय था क्योंकि उस समय लोग इनके साथ थे और प्रदेश में जिस चुनाव को लड़कर मुख्य मंत्री बने थे, उस चुनाव में सब लोग मिलकर एक हुए थे, मिलकर चुनाव लड़ा था। अच्छा मौका था, बाहर बैठकर बात करते। मैं धन्यवाद देना चाहूंगा और बड़ी हिम्मत के साथ धन्यवाद देना चाहूंगा माननीय चंद्रशेखर जी को। इस सारे प्रकरण में अगर किसी ने ईमानदारी से इस मसले को हल करने के लिए कदम बढ़ाया तो वह पूरे हिन्दुस्तान में और पूरे सदन में अकेले व्यक्ति हैं -- माननीय चन्द्रशेखर जी।
इन्होंने अकेले नहीं किया। इसमें मुलायम सिंह जी को भी शामिल किया। माननीय भैरो सिंह शेखावत जी और शरद पवार जी को भी साथ लिया। तीनों मुख्यमंत्रियों को साथ बैठाया था और दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाने का काम किया था, लेकिन वह भी कांग्रेस को बर्दाश्त नहीं हुआ। जब मसला हल होने लगा, हल के करीब पहुंच गया और यहां तक कि दोनों पक्ष राजी हो गए थे कि यदि वहां यह साबित हो जाए कि मंदिर का स्ट्रक्चर तोड़ कर यहां मस्जिद बनाई गई है तो हम अपना दावा वापस ले लेंगे। इसके लिए दोनों पक्षों में सहमति बन गई थी। यहां तक कि विदेश के कई शासकों ने उस समय के प्रधान मंत्री, श्री चन्द्रशेखर को आश्वस्त भी किया था कि यह सही है, हम इसे उचित मानते हैं, लेकिन जैसे ही यह मसला हल होने वाला था तो पता नहीं हरियाणा के दो पुलिस वाले राजीव जी के घर पर पहुंच गए और उन्होनें भडक कर चन्द्रशेखर की सरकार से समर्थनव् वापस ले लिया । अगर ये इस मसले को हल करना चाहते तो माननीय चन्द्रशेखर जी को थोड़ा समय और दे देते, कौन सी आफत आ रही थी, लेकिन इन्होंने बाधा पहुंचाई, लगा कि अगर यह मसला हल हो गया तो इन्हें राजनीति करने का मौका नहीं मिलेगा। आप राजनीति करना चाहते थे। चन्द्रशेखर जी का कार्यकाल पूरा हुआ और चुनाव हुए। उसके बाद राव साहब की सरकार बनी। इनके कार्यकाल में भी पूरी कोशिश की गई, लेकिन उसमें उकसाने का काम ज्यादा किया गया। मुझे वह भाषा अभी भी याद है कि मंदिर बने एवं भव्य बने लेकिन मस्ज़िद न टूटे। यह बात लालकिले से कही गई और दोनों बातें एक साथ कही गईं। उस समय इस मसले को हल करने का प्रयास नहीं किया गया था। नतीजा यह हुआ कि आक्रोश बढ़ गया और वह आक्रोश उस ढांचें पर जाकर फूटा। ढांचा हटाने का वह तरीका सही नहीं था, गलत था।
महोदय, अगर ये चाहते तो दोनों पक्षों के लोग बैठते और उस मसले के बारे में सोचते कि इसे कैसे हल किया जाए। उसके लिए परिस्थितियां निर्मित नही की गईं। मैं १८ दिसम्बर, ९२ का भाषण दोहराना नहीं चाहता हूं, क्योंकि वह लम्बा भाषण है। उसमें मैनें एक-एक बिन्दू स्पष्ट किया था। किस तरह लोगों को उकसाया गया, हम इस विषय पर किसी को उकसाना नहीं चाहते। वह मसला वहीं पर रह गया। आज खुशी और संतोष की बात यह है कि प्रधान मंत्री जी शिमला में कहते हैं कि मुझे उम्मीद है कि न्यायालय से निर्णय आएगा। कारण यह है कि न्यायालय में, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में जो बात चल रही है, उसमें केवल इस बात पर बहस हो रही है, जिसे माननीय चन्द्रशेखर जी ने अधूरा छोड़ था। क्या वहां कोई स्ट्रक्चर पहले से था, इस पर बात चल रही है और इस पर जो गवाह हैं, मैंने अभी मुलायम सिंह जी से जिन दो इतिहासकारों की बात सुनी है। अच्छा होता कि जब कोर्ट द्वारा गवाह मांगा गया था तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की ओर से वे गवाही देने जाते। वे गए या नहीं गए, मुझे नहीं पता, लेकिन उन्हें जाना चाहिए था। आक्र्योलोजिकल सर्वे आफ इन्डिया के डायरेक्टर, डा. बी.बी. लाल, जिन्होंने सन् १९७५ में वहां खुदाई की थी और वह खुदाई माननीय इंदिरा गांधी जी के आदेश से की थी। मुझे ७४-७५ की बात याद है, ७४ में पूरे देश में रामचरित मानस की रचना, ४००वां वर्ष मनाया गया था। एक समति बनाई गई थी और उस समति की अध्यक्षा श्रीमती इंदिरा गांधी थी, कार्यवाहक अध्यक्ष, माननीय कमलापति त्रिपाठी जी थे और मैं भी उस समति में था। उस समय एक चर्चा आई कि राम कथा से जुड़े हुए जितने स्थल हैं, उन्हें पर्यटन की द्ृष्टि से डेवलप किया जाना चाहिए और उनकी प्राचीनता पर शोध किया जाना चाहिए। उस शोध के क्रम में ही डा. बी.बी. लाल ने खुदाई की थी, इनकी खुदाई ७५ से लेकर ८० तक चली। जब मंदिर के साक्ष्य आने लगे, इन्हें रोक दिया गया। जब ढांचा टूटा तभी तमाम सबूत मिले थे, लेकिन उसे ये लोग नहीं मानते, क्योंकि इनका मानना है यह कहीं से ले जाकर रख दिए गए थे। अब न्यायालय में एक एप्लीकेशन दी गई कि इस मुद्दे पर हिस्टोरियन आक्र्योलोजिस्ट की रिपोर्ट मांगी जानी चाहिए। कुछ लोग गए, उनके बयान लिए गए। न्यायालय को लगा कि इसका सर्वे किया जाना चाहिए। उन्होंने आक्र्योलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को आदेश दिया कि आप किसी को इंगित कीजिए। उसका राडार सिस्टम से (जीपीआरएस), ग्राउंड पेनीट्रेटिंग राडार सिस्टम से भूगर्भीय अध्ययन किया जाए, जो जमीन के नीचे की फोटो खींचता है। मैं उस रिपोर्ट को कोट नहीं करूंगा, इसलिए कि अभी न्यायालय ने उसे सार्वजानिक करने सो रोक दिया है ।
मैं आपसे निवेदन करूंगा कि यह रिपोर्ट पार्लियामेंट में टेबल की जाये, । आर्कियोलोजिकल डिपार्टमेंट यह रिपोर्ट टेबल करें, क्योंकि कोर्ट ने पार्लियामेंट में रखने से मना नहीं किया है। इसमें सारी बातें उभरकर सामने आई हैं। अगर यह मसला हल करने की हमारी नीयत है तो हमें हल करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए, कोशिश करनी चाहिए और इस पर संसद के सभी पक्षों को, सभी लोगों को केवल सरकार के ऊपर इसकी जिम्मेदारी नही छोड़ देनी चाहिए। पिछली सरकारों ने क्या किया, इस इतिहास को दुहराने की जरूरत नहीं है, बल्कि संसद को स्वयं अपनी संप्रभुता का ख्याल रखना चाहिए और जैसा दासमुंशी जी ने कहा था कि इसे हल करने की दिशा में कलैक्टिव विस्डम आगे आनी चाहिए। यह देश के लिए इतना महत्वपूर्ण प्रश्न है श्री मुलायम सिंह जी ने भी कहा है कि इससे कितना बड़ा नुकसान हो रहा है। एक बार माननीय आडवाणी जी ने भी कहा था कि यह मसला जितना लम्बा चलेगा, उतना ही देश का नुकसान होगा। जब देश के नुकसान को सभी महसूस करते हैं, तब इस मसले को लम्बा करने से कैसे रोका जायेगा। इस पर भी विचार होना चाहिए । क्या इसे पार्लियामेंट तय नहीं नहीं कर सकती, क्या देश के चुने हुए लोग, देश की सर्वोच्च संस्था संसद इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर सकती?
माननीय उपाध्यक्ष जी, मेरी पीड़ा है, मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूं, देश में ऐसे तमाम डिस्प्यूट्स होते हैं तो आप लोगो को बुलाकर, बिठाकर बात करते हैं और कहते है कि आप इसका कोई हल निकालिये तो क्या इसका हल निकालने के लिए संसद को आडे नहीं आना चाहिए?मैं निवेदन करना चाहूंगा और विश्व हिन्दू परिषद और धर्म संसद के लोगों ने जो कुछ भी ऐसा पारित नही किया है, जिसमें कुछ आपत्तिजनक हो। उन्होंने जमीन नहीं मांगी है और इस सरकार को कोई अधिकार नहीं है कि वह जमीन उनको दे, मैं इससे सहमत हूं। लेकिन न्यायालयने यह कहाहै कि जो जमीन के पूर्व मालिकान हैं, उनको वह जरूरत से अधिक जमीन वापस की जाये।
श्री सोमनाथ दादा, मैं आपकी तरह ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं हूं, लेकिन मैंने भी थोड़ी अंग्रेजी और कानून पढ़ा है। मुलायम सिंह जी, मैं एक ही पैरा पढ़ूंगा, ज्यादा नहीं।
"The embargo on transfer till adjudication, and in terms thereof, to be read in Section 6(1)…"
6(1) वह है, जिसके बारे में वे स्वयं कहते हैं कि ६(१) में क्या है :
"The interest claimed by the Muslims is only over the disputed site where the mosque stood before its demolition. The objection of the Hindus to this claim has to be adjudicated. The remaining entire property acquired under the Act is such over which no title is claimed by the Muslims. A large part thereof consists of properties of Hindus of which the title is not even in dispute."
श्री एस.जयपाल रेड्डी (मिरयालगुडा):स्वामी जी, पैरा नम्बर बताइये।
श्री चिन्मयानन्द स्वामी : यह जजमेंट का हिस्सा है। इसे मैं अभी टेबल पर रख दूंगा।* "The embargo on transfer till adjudication, and in terms thereof, to be read in Section 6(1), relates only to the disputed area, while transfer of any part of the excess area, retention of which till adjudication of the dispute relating to the dispute area may not be necessary, is not inhibited till then, since the acquisition of the excess area is absolute subject to the duty to restore it to the owner if its retention is found to be unnecessary, as indicated."
"The meaning of the word ‘vaste’ in Sections 3 and 6 has to be so construed differently in relation to the disputed area and excess area in its vicinity."
हमने अखबारों में पढ़कर न्यायालय के निर्णय को परिभाषित नहीं करना चाहिए, जजमेंट हमारे सामने है, पढ़ना चाहिए। वर्मा जी ने जो कुछ अखबार में कहा, दूसरे दिन उन्होंने कहा कि मुझे सब कुछ याद नहीं था और मैं यह भी याद दिला दूं कि मुलायम सिंह जी कई चीजें भूल जाते हैं। उस समय चीफ जस्टिस वेंकटचेलैया जी थे १९९३ में भारत सरकार ने एक जमीन का एक्वीजीशन किया था, वह इसीलिए किया गया था कि जो डिस्प्यूटिड लैंड है, अगर उसका निर्णय किसी के पक्ष में हो जाता है, मान लीजिए, मुसलमानों के पक्ष में जाता है तो वहां तक आने-जाने का रास्ता उनको मिले।
अब गवर्नमैंट क्यों कोर्ट में गयी ?गवर्नमैंट कोर्ट में इसलिए गयी क्योंकि वह रिसीवर है। गवर्नमैंट को ही * As the Speaker subsequently did not accord the necessary permission, the paper/document was not treated as laid on the table.
आदेश पालन के लिये कहा गया है। यह अपेक्षित है कि वह ऐसा करें इसलिए वह कोर्ट में गयी। पिछले साल जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बैन लगाया गया वह दस हफ्तों के लिए लगाया गया। वह दस हफ्ते बहुत पहले पूरे हो गये। पिछली १३ मार्च को यह दस हफ्ते शुरू हुए थे इसलिए वह काफी समय पहले पूरे हो गये। हमारा कहना है कि गवर्नमैंट किसी के पक्ष में नहीं गयी है। वह इसलिए गयी है कि १९९४ के निर्णय में यह बात है तो न्यायालय का आदेश इसे इनके पूर्व स्वामियों को वापिस दे। वह किसी पक्ष विशेष को देने की बात नहीं कह रही है।
इसलिए मैं निवेदन करना चाहूंगा कि हमें गलतफहमियों से ऊपर उठकर, राजनीति से ऊपर उठकर, वोट बैंक निर्माण करने से ऊपर उठकर इस मसले को हर करने के लिए एक मन बनाना चाहिए। राम सबके हैं। इकबाल ने राम को इमामे हिंद कहा है। वह इस देश के इमाम हैं। राम ने इस देश को क्या दिया है, यह स्वाधीनता आंदोलन के सेनानियों से आप पूछो। पूरे देश को एक सूत्र में बांधा था तो वह राम था। आज भी चाहे राम विलास पासवान जी हों या काशी राम हों, वे सभी राम से जुड़े हुए हैं। राम से कोई अलग नहीं है। राम की अयोध्या राष्ट्र के स्वाभिमान की अयोध्या है। इस छोटे से डिस्प्यूट को लेकर, इस छोटे से झगड़े को लेकर आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम बदनाम हो रहे हैं कि हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुसलमान में एका नहीं है। उनमें झगड़ा हो रहा है।
मैं निवेदन करना चाहूंगा कि इसे राष्ट्रीय सौहार्द या राष्ट्रीय सम्मान का विषय बनाना चाहिए। संसद स्वयं इस मसले को हल करके देश में सद्भाव कायम करने का प्रयास करे। उसके बाद अगर कोई इस तरह का मसला उठाता है तो वह वाजिब नहीं है। राव साहब ने १५ अगस्त १९४७ की स्थिति में जो कानून बनाया था, उसमें सारे देश के मंदिरों को खड़ा किया था लेकिन अयोध्या को उससे बाहर रखा था। अयोध्या को इसलिए बाहर रखा था क्योंकि उनके मन में कहीं न कहीं यह था कि वहां मंदिर बनना चाहिए। इसलिए हम कांग्रेस के लोगों से कहना चाहते हैं कि आज जैसे वीर सावरकर जी के बारे में आपकी नीतियां बदल गयी, पहले आपने उनके नाम पर डाक टिकट जारी किये। अंडमान में आपने सेलुलर जेल को उनका स्मारक बनाया और संसदीय समति में आपने उनका चित्र बनाने की सिफारिश की लेकिन उसके बाद आप बदल गये वैसे ही राम जी के बारे में आप बराबर बदल रहे हैं। कम से कम राष्ट्रीय महापुरुषों के बारे में जो आपके पूर्व नेताओं की धारणा रही है, उसको आप समझो। आज नेता बदल देने से नीयत नहीं बदलनी चाहिए।
इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI S. JAIPAL REDDY (MIRYALGUDA): Mr. Deputy-Speaker, Sir, Shri Swami Chinmayanand spoke like an advocate of the Ram Temple Committee. Let me assure you that I am not going to speak as an advocate of All India Babri Masjid Action Committee. I am going to speak as an advocate of the rule of law, which is the root of democracy. … (Interruptions)
श्री रघुनाथ झा : आप सब बात सही-सही कहिये। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : यह बहुत गंभीर मामला है इसलिए आप जरा सावधानी से बोलिये।
...( व्यवधान)
SHRI S. JAIPAL REDDY : We have discussed this issue umpteen times during the last 13 years. However, the context in which we are discussing the issue today is qualitatively different because the present discussion has been caused by the deliberate and blatant mischief of this Government. If the Government had not taken the initiative in the Supreme Court, there would have been no cause for discussion in the House today.
I would like to say at the very outset that this initiative of the Government is brazenly, partisan and blatantly anti-Constitutional.
Sir, it amounts to subversion of the system. This Government tries to stage a coup against the Constitution of India. Sir, the political question is, as to why the Government has gathered this kind of political impudence to take this kind of immoral, improper initiative? This is an occasion for some substantive political analysis and for some historical insights. This House is the forum where we record our thoughts for the sake of historians, for posterity.… (Interruptions)
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): Sir, I am on a point of order. The last speaker has submitted some papers. I would like to know whether they are going to become a part of the proceeding and whether they have been authenticated or not. If it is there just for reference … (Interruptions)
It has to be authenticated. I am not objecting to anything. It cannot be a part of the record unless it is authenticated.… (Interruptions)
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, as a Member, may I give my opinion on the point of order being raised? I think the Member has only made a reference to the document. He did not quote from the document. Therefore, it cannot form part of the record. I am only giving my opinion.… (Interruptions)
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : Sir, I would like to have your ruling on this. There are rules of procedure. I am only saying that those rules of procedure should be followed.
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, let me go ahead with my presentation.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Somnath Chatterjee had asked the paragraph from which Swami ji was quoting. That particular paragraph he said he would lay on the Table of the House.
… (Interruptions)
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : Sir, any document that is laid on the Table has to be authenticated by the person who refers to it.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Swamiji has laid that paragraph on the Table of the House. Swami ji, are you authenticating it?
… (Interruptions)
SHRI CHANDRA SHEKHAR (BALLIA, U.P.): A new procedure should not be adopted. I think Swmai ji has sent that paper in order to facilitate the reporters for reporting. It is just for helping the reporters and it is not to be laid on the Table of the House. This should be taken like that.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: No, he has laid it on the Table of the House.
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : I am again on a point of order, Sir. He has neither asked your permission to lay it on the Table of the House nor have you given him the permission.… (Interruptions) He has to first take your permission. That is more important.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He had said that the paragraph of the judgement which he was referring to, he would authenticate it and I am allowing him to lay it on the Table of the House.
… (Interruptions)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I am on a point of clarification. I am not objecting to his submitting any document. He has not referred to any judgement as such. I have just now seen. He is quoting from what, we must know before it becomes a part of the record. I have no objection. Let him do it. But let him first indicate what it is.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He had mentioned that judgement earlier in his speech.
… (Interruptions)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Which judgement? We are not asking for deleting his speech.… (Interruptions)
श्री चिन्मयानन्द स्वामी:हमने स्पीच में कहा था, आपने नहीं सुना।
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : If it is given to the reporters, it is all right.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He had mentioned a paragraph and I am allowing that to be laid on the Table of the House.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I would like to know it is a part of which judgement.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He had already quoted that judgement in his speech.
… (Interruptions)
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : He had not quoted the judgement.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Let me see the record.
SHRI CHANDRA SHEKHAR : Sir, may I request you that a paragraph cannot be authenticated unless and until the whole judgement is authenticated? So, it can be only treated as help to the Reporters to quote it. It will be there in his speech. What purpose would be served if he authenticates it and lays it on the Table of the House? I shall request Swamiji that he should not insist on laying it on the Table. I would request that it may not be struck down from the proceedings.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : All right. We are agreeable to it fully… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: It is all right as long as he is not insisting that that is a part of the judgement. If he says that it is a part of the judgement, he has to authenticate it.
… (Interruptions)
SHRI K. YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Sir, if any Member insists that it is a part of the judgement, he has to authenticate it. Otherwise, it can be treated as part of his speech. So, he has submitted it for the Reporters’ convenience. But if he wants to lay it on the Table of the House, he has to quote the judgement and other details also.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Is it part of your speech?
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Let me understand it. Is it part of your speech?
श्री चिन्मयानन्द स्वामी :वह मेरे भाषण का हिस्सा है, मैंने अपने भाषण में स्पष्ट कहा है।
उपाध्यक्ष महोदय : आपके भाषण का हिस्सा है, तो फिर ठीक है। वह ले लीजिए।
श्री चिन्मयानन्द स्वामी : २४ अक्तूबर, १९९४ को जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है, जिसको माननीय जे.एस. वर्मा ने लिखा है, पढ़ा है, उस बैंच में जस्टिस वेंकटचलैया जी रहे हैं। उसी बैंच का एक अंश है।
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI: Sir, I am respectful to the hon. Member. I appreciate his truthfulness. Since he has insisted that he has quoted it as part of the Venkatachaliah Judgement, I demand that the full judgement has to be authenticated. A paragraph cannot be authenticated or let him, at least, quote the number of the paragraph… (Interruptions)
SHRI HARIN PATHAK: Sir, he is not insisting.
MR. DEPUTY-SPEAKER: What he says is that it is a part of the judgement which he has quoted.
SHRI HARIN PATHAK: But when you requested, he agreed to put it as part of his speech.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Pathak, now he says that it is a part of the judgement.
… (Interruptions)
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : Sir, he has not authenticated that… (Interruptions) I have no objection to his quoting from any document. But if he lays that document on the Table of the House, that has to be authenticated not by him but by the agency which has given it. He cannot authenticate it by himself. He is not the authenticating authority.… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : आप उसका पैराग्राफ बताएं, वह ले कीजिए।
श्री चिन्मयानन्द स्वामी : पैरा ५६, वही १९९४ वाला है।
श्री प्रकाश यशवंत अम्बेडकर: रिट पीटिशन का नम्बर भी कोट करें।
Sir, I would like you to direct that the copy of the judgement be placed on the Table of the House. He cannot lay one or two pages from the judgement. It is because you cannot make out from that whether it is a part of the judgement or a part of the discussion… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He has already quoted this in his speech.
आप रिकार्ड चैकअप कर लीजिए। अगर उन्होंने कोट किया है तोthis will be treated as part of the speech.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He has now laid the total judgement on the Table of the House. There is no confusion now. Shri Reddy, you may please continue now.
डॉ.विजय कुमार मल्होत्रा (दक्षिण दिल्ली):आप जो भी मांगना चाहेंगे, वे हम टेबल पर रख देंगे।
उपाध्यक्ष महोदय : स्वामी जी, आप बहुत शांत और धैर्यवान सदस्य माने जाते हैं, इसलिए कृपया करके आप बैठ जाइये।
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, in the history of this particular dispute, this is for the first time the Government of India has gone to the Supreme Court. Why has the Government gone to the Supreme Court? Why did the same Government not go to the Supreme Court before? That was the point I was trying to emphasise before this intermission took place.
Sir, my postulate is that the BJP is back to its pre-1996 agenda with a vengeance. Although the agenda is very old, yet the situation has undergone a qualitative transformation on six important counts… (Interruptions)
Sir, I do not even know as to who is going to respond to this debate. Anyway, all the Ministers are taking down notes but we do not even have the Minister to reply to the debate in the House.
Sir, be that as it may. Six important developments have taken place in the last seven years. First, the BJP in the pre-1996 period was in the Opposition. Now, they are in office. Second, the BJP was being led at that time by Shri Advani. Now, it is being led by Shri Vajpayee. Third, the BJP which was being led by Shri Advani was ploughing a lone furrow at that time. It was searching desperately for allies. Its sectarian slogans were a cry in the wilderness. Today, they have got NDA partners to back them. Fourth, at that time Shri Vajpayee was still wearing thatmukhota of being a malleable moderate, today he is donning the hat of a Hindutvahawk. Fifth, the BJP in the meantime had to abandon its agenda formally and had to go to the polls twice without that agenda in 1998 and in 1999.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: What is this running commentary going on? Order please.
SHRI S. JAIPAL REDDY : Now, the NDA partners have been so completely marginalised that NDA now can be described as a non-descript appendage of the BJP.
16.00 hrs. They are no longer partners; they are prisoners because they have entered into a Faustian bargain. It was said in the great dramaDr. Faustus, written by both Charles Marlowe in English and Goethe in German, that Dr. Faustus sold his soul to a devil. This is what exactly the NDA partners have done; they have sold their soul to the BJP. As a consequence of this, the BJP-led Government could pick up … (Interruptions)
I am coming to Ayodhya only. I am talking Ayodhya. If you do not understand, I pity your ignorance. … (Interruptions)
16.01 hrs. (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) Shri Atal Bihar Vajpayee has tested the water before he took the initiative. It was in November 2000, in New York that Shri Vajpayee described himself as a Swayamsevak. That was when the NDA partners feebly protested. Then, on 6th December 2000, Shri Vajpayee made a statement that the Ram Temple was an expression of national sentiment. Then again, NDA partners formally protested. Then came the Modi affair which witnessed a tumultuous debate in the House and the NDA partners could only protest formally; could not carry the protest beyond a point. The NDA partners were willing to wound, but afraid to strike. That was the reason why the BJP-led Government has finally decided go to back to its original communal agenda. Today, it is no longer hiding its agenda.
SHRI K. YERRANNAIDU : This is the NDA Government. Nobody will go back to their old agenda. We are all here. They never said they are going back to their original agenda. Recently also Shri Vajpayee and Shri Advani said that the Government is based on the Common Minimum Programme of the NDA.
SHRI S. JAIPAL REDDY : If Shri Yerrannaidu would like to live in a fool’s paradise, he is entitled to his quota of stupidity, which is of course very immense.
The point I am making is, recently even the Convenor of the NDA, Shri George Fernandes, supported the Government’s move. Shri Yerrannaidu’snaidu,Shri Chandrababu Naidu also supported this move. Is this move in conformity with the NDA’s agenda? I am raising this question. Let him answer it. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Are you going to yield, Mr. Reddy?
SHRI S. JAIPAL REDDY : No, not to these men.
MR. CHAIRMAN: He is not yielding; please take your seats. Mr. Reddy is not willing to yield.
श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, मैं यह कह रहा हूं कि श्री जयपाल रेड्डी जी ने जार्ज फर्नान्डीज जी का नाम लिया है, जो एनडीए की सरकार के संयोजक हैं। एनडीए के एजेडे में जो प्रावधान है, उसका समर्थन किया है और उस पर ही सरकार चल रही है। उस सरकार को चलाने के लिए मंदिर या मस्जिद को तोड़ने या बनाने की बात नहीं है और उस पर कोई समर्थन जार्ज फर्नान्डीज जी का नहीं है। एनडीए का जो एजेंडा है, उस पर समर्थन है।
SHRI S. JAIPAL REDDY : I welcome the clarification. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Mr. Ramdas, please take your seat.
Shri Ramdas Athawale, I am not allowing you. Please take your seat. Nothing will go on record.
(Interruptions) …* SHRI S. JAIPAL REDDY : The clarification given by Mr. Prabhu Nath Singh is not based on truth because I am quoting from the statement made by Shri George Fernandes to the Press. Today, taking full advantage of the helplessness of NDA partners, the BJP leaders have removed the fig leaf and are flaunting their original agenda with absolute abundance.
* Not Recorded The Prime Minister made a statement in the course of a public meeting in Himachal Pradesh. I am reading the statement. He said:
"We want to build Ram Temple at Ayodhya. We are confident that it will be proved by historical evidence that there existed a temple."
First of all, his statement in Himachal Pradesh was made in the course of an election meeting speech in utter violation of the election rules. That apart, I would like to know from the House and from the Government on one point. When the Prime Minister said ‘we’, what does it mean? Whom does ‘we’ indicate? Is he speaking as the leader of the BJP or is he speaking as an individual or is he speaking as the Prime Minister of the country? Can a Prime Minister make such a statement? Swamy Chinmayananda can become an advocate of Ram Temple construction at a particular spot. Can the Prime Minister of the country become an advocate in that fashion? Has he not violated the oath which he took as the Prime Minister of the country?
Let me quote from a part of the oath that the Prime Minister took. When Shri Vajpayee took oath as the Prime Minister, among other things which he said in the oath, he said:
"…that I will do right to all manner of people in accordance with the Constitution and the law, without fear or favour, affection or ill will."
He has said ‘all manner of people’. It does not include Hindus alone or it does not include a section of Hindus that he represents as the leader of the BJP. It includes everybody in the country without affection or ill will. But his statement speaks of his affection to a particular section and ill will towards another section. He leaves nothing to the courts. He says:
"We are confident that it will be proved by historical evidence that there existed a temple."
We are not saying that no temple had existed nor are we saying now that the temple had existed. It is for the courts to decide. It is not for parties in Parliament to decide. And what was the basis on which the Prime Minister made the statement? What was the provocation for this extremely communal blazen partisan statement?
I may quote a couple of lines from Alice in Wonderland because Alice in Wonderland has just now walked into Blunderland, Mr. Arun Jaitley. The line says:
"I will be judge, I will be jury, Said the cunning old Fury. I will try the whole cause and condemn it to death."
So, here is a Prime Minister who wants to be the prosecutor, who wants to be the jury, who wants to be the judge and who wants to be everything. He would like to read judgement on behalf of the courts even before the courts have considered the matter.
That is why I charge the Prime Minister with having committed breach of the oath that he took as the Prime Minister of India and I charge the Prime Minister with having committed ...(Expunged as ordered by the Chair) against the Constitution of India under the system of our country.
Sir, in the course of debate in December 2000, I said that the Prime Minister has lost his moral right to continue. Now, my case is that he has lost his legal right too because he has violated the essence of the oath that he took. It is another matter whether our system is capable of enforcing that kind of liability on the Prime Minister.
I may have many differences with the foreign policy approach of the Government of America. But I have nothing but tremendous admiration for their democracy; for the glories of their democracy. Kenneth Starr, an ordinary prosecutor could summon, with subpoena, the DNA of the President of USA, Bill Clinton. So, it is that system in America which is sustaining the power of America.
I may refer to a recent incident that occurred in America. Recently, the majority leader in the American Senate, Trent Lott had to resign because he paid a compliment to another Senator who had retired from the Senate. The name of the Senator in America who retired was Storm Thurmond. He was a centenarian. He reached hundred while he was in the Senate. When he retired from elections, as leader of his party, he paid a tribute outside. What did he say? He merely said: "Mr. Thurmond was a segregationist with whom I have sympathy". For this simple remark, Trent Lott had to resign as leader of the party. He paid this tribute to Storm Thurmond when he was retiring. There, it led to a storm of protest. It let to a huge revolt within his party. He had to resign.
But the position in this country is that Shri Vajpayee is getting away with murder of democracy. Famously, Shri Vajpayee told Shri Modi to follow raj dharm. But now I am asking Shri Vajpayee as to whether he is following raj dharm. I accuse the Prime Minister of not only not having followed the raj dharm, but of having floutedraj dharm. He has flouted the law of the land.
Sir, many people are wondering as to what is the great difference between Shri Praveen Togadia and our Prime Minister. I say there is a huge huge difference between Shri Praveen Togadia and Shri Vajpayee. The difference is in style and not in content. Shri Praveen Togadia outrages our sensibilities, whereas Shri Vajpayee sabotages our sensibilities. The result of both the operations is the same, that is to administer anaesthesia to the Constitution of India, to the democracy of the country.
Our BJP leaders or the leaders of the Sangh network have created a new maya. What is that maya? It is that there are two kinds of land. One is the disputed land and the other one is the undisputed land. They want to propagate a myth that the undisputed land from the very beginning had belong to the Ram Janmabhoomi Nyas. The fact of the matter is that the 42 acres of land was gifted by the Uttar Pradesh Government, when Shri Kalyan Singh was the Chief Minister, to the Ram Janmabhoomi Nyas. Only one acre was purchased by the Ram Janmabhoomi Nyas. The remaining 42-acre land was gifted by the Government. While this is a fact which cannot be denied, they are trying to spread the illusion that there was the undisputed land which had belonged to the Ram Janmabhoomi Nyas.Therefore, they say: "You are doing injustice to certain sections." Their entire propaganda is based on utter untruth. This is being done to bamboozle the people and also, I am afraid, to bulldoze the courts.
I am happy that my friend Shri Arun Jaitley is here. I do not know on what basis the Government could go to the Supreme Court to say that the undisputed land should be given away. When the question arose in March 2002, the Attorney-General gave the same opinion. Let us remember this. Our memory is not so short. Shri Soli Sorajbi, as the Attorney-General, gave the same opinion. At that time, Shri Jaitley, as the Law Minister said, that he gave the opinion under the Government. The Prime Minister’s statement in the Lok Sabha said that the Attorney-General gave the opinion as the Attorney-General. Later on, the Attorney-General addressed the Press for two hours on live television to say that he gave an opinion as a friend of the court, as an eminent Amicus Curiae and not as the Attorney-General of the Government. Now, the cat is out of the bag. The stand taken by the Attorney-General has now been formally taken by the Government itself.
With due apologies to Shri Somnath Chatterjee, I would like to say that a judgement, in my opinion, is better understood by non-lawyers. I quote from para 45 of the Supreme Court cases, 1994, Vol. VI. Shri Arun Jaitley, please take out your copy and see it. It says:
"Section 7, as we read it, is a transitory provision, intended to maintain status quo in the disputed area, till transfer of the property is made by the Central Government on resolution of the dispute. This is to effectuate the purpose of that transfer and to make it meaningful avoiding any possibility of frustration of the exercise as a result of any change in the existing situation in the disputed area during the interregnum. Unless status quo is ensured, the final outcome on resolution of the dispute may be frustrated by any change made in the disputed area which may frustrate the implementation of the result in favour of the successful party and render it meaningless. "
"A direction to maintain status quo in the disputed property is a well known method and the usual order made during the pendency of a dispute for preserving the property and protecting the interest of the true owner till the adjudication is made. A change in the existing situation is fraught with the danger and prejudicing the rights of the true owner, yet to be determined. This itself is a clear indication that the exercise made is to find out the true owner of the disputed area, to maintain status quo therein during the interregnum and to hand it over to the true owner found entitled to it."
So, until the final adjudication is made, the status quo has to be maintained entirely.
THE MINISTER OF LAW AND JUSTICE AND MINISTER OF COMMERCE AND INDUSTRY (SHRI ARUN JAITLEY): Is it on the disputed area?
SHRI S. JAIPAL REDDY : No. … (Interruptions)
SHRI ARUN JAITLEY: Mr. Chairman, Sir, will he yield for a moment?
SHRI S. JAIPAL REDDY : Yes.
SHRI ARUN JAITLEY: Sir, if we read paragraph 45, it deals only with the disputed area and the status quo of the disputed area which is the structure over the Garb Graha. It does not deal with the rest of the 71 acres. … (Interruptions)
THE MINISTER OF PETROLEUM AND NATURAL GAS (SHRI RAM NAIK): Mr. Chairman, Sir, I would like to draw the attention of the House to a remark made earlier by Shri Jaipal Reddy. I am not as good as Shri Jaipal Reddy in English, but he used a particular word about the Prime Minister and I noted it. He said: "The Prime Minister has played … with the Constitution." Am I right?
SHRI S. JAIPAL REDDY : Yes.
SHRI RAM NAIK: Since I am not good in English, I took the Oxford Dictionary and it indicates the meaning for the word …. Now, I have got the book of Unparliamentary Expressions and in page 138, it is stated that the word … is treated as an ‘unparliamentary’ word. So, in good grace, if he withdraws or apologises, that would be better. … (Interruptions) So, he must apologise for the word which he has used.
सभापति महोदय : इसे दिखवा लिया जाएगा। कोई भी अनपार्लियामेंट्री शब्द प्रोसीडिंग्ज़ में नहीं जाएगा।
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, if the word is unparliamentary, you may delete it, but I can quote from the rulings of the House of Commons. Unless we call a person ‘treacherous’, we can call an act of ‘treachery’. Therefore, it depends on how the sentence is constructed. Anyway, I do not want to quarrel on non-essentials. … (Interruptions)
SHRI RAM NAIK: Sir, does he mean to say that calling the Prime Minister … a non-issue?
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, I have not called him a ‘treacherous person’. If I say, ‘he has committed treachery’, that is not unparliamentary. I stand by my contention. However, I would leave it to the wisdom of the Chair.
सभापति महोदय : इसको देख लिया जाएगा। आप आगे बोलिये।
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, let me now quote from paragraph 49 of the same judgement. It says:
"It is clear that one of the purposes of the acquisition of the adjacent properties is the ensurement of the effective enjoyment of the disputed site by the Muslim community in the event of its success in the litigation; and acquisition of the adjacent area is incidental to the main purpose and cannot be termed unreasonable."
Therefore, the status quo applies not merely to the disputed area of 2.7 acres, but to the entire area which was acquired in 1993. The entire acquisition was upheld and the entire acquired area is to be kept in abeyance until there is a final judgement. In the face of this kind of judgement, the Government had the temerity to go to the Supreme Court. If this was the case, why did they not do that last year? When the Attorney-General made a suggestion, why did they distance themselves?
Why did the NDA partners, at that time, take objection? I know, a number of NDA leaders took objection. Why are they not taking objection now? Have they since been emasculated? What exactly has happened in the meantime?
I am quoting again from para 57:
"Even though, prima facie, the acquisition of the adjacent area in respect of which there is no dispute of title and which belongs to Hindus may appear to be a slant against the Hindus, yet on closer scrutiny, it is not so since it is for the larger national purpose of maintaining and promoting communal harmony and in consonance with the creed of secularism."
This is a part of judgment. In spite of all this, Shri Arun Jaitley came back to the Government only to commit this kind of an assault on the Constitution. … (Interruptions) It is nothing but an assault on the Constitution.
The point I am making is that the entire discussion today has been provoked on account of the brazen intervention of the Government. And the Government’s intervention is not only anti-constitutional, but also, in my view, anti-national because it seeks to favour one party as against another. It is not a job of the Government of India to favour one party as against another.
Now, everybody says that the Court’s judgment will prevail. Does the VHP agree? The VHP, even day before yesterday, made a public statement that they wanted every piece of land, including the disputed piece of land, by March 27. Has the VHP made a commitment to the Court that they would abide by the judgement of the Supreme Court? No. The VHP is above the law of the land because BJP is in power. And BJP is in power because NDA partners have put them in power.
We are, of course, for expeditious settlement of the case relating to title suits. What is pending in the Supreme Court? Why did the Government of India have to go to the Supreme Court? Therefore, if you take any steps to get the settlement of the title suits expedited, - I am told that the process is really on – we welcome such a settlement but through the Courts and not through the Government’s intervention.
In my view, earlier, we did discuss political situations. Today, we are discussing an extraordinary situation arising from the Government’s illegal, immoral and partisan initiative. There is an effort not only to hoodwink the people but also to purchase the Court. But we, as a Party, have intense faith in the fierce independence of the Indian Judiciary. Our system is on trial. Our system is facing a crisis of confidence. I am afraid that many parties, which are aligned to the NDA, are not alive to the magnitude of the crisis. They have all become partners in a crime. I hope, it is never too late for them to wake up. Be that as it may, we will continue to expose the Government’s wrongs. We will continue to repose faith in our courts.
श्री चन्द्रशेखर:सभापति महोदय, मैं इस विषय पर बोलना नहीं चाहता था लेकिन हमारे मित्र श्री मुलायम सिंह यादव जी ने दो वाक्य ऐसे कहे जिससे मैं दो शब्द कहने के लिए विवश हूं। मैं इस मामले में निष्पक्ष नहीं हूं। मैं पूरी तरह से उसी विचार का हूं जिस विचार के श्री मुलायम सिंह यादव हैं। उनकी और मेरी भाषा अलग हो सकती है। वह भाषा शायद मैं न इस्तेमाल करूं। प्रधान मंत्री जी का हिमाचल प्रदेश में दिया गया वक्तव्य दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं समझता हूं कि आज जो यहां कहा जा रहा है, चाहे एक तरफ से या दूसरी तरफ जो कुछ कहा जा रहा है, वह मामले को और पेचीदा बनायेगा इसलिए मैं इतने दिन से चुप था।
अभी स्वामी जी ने अपने भाषण में कहा कि मैंने इस मामले को सुलझाने के लिए प्रयास किया था। मैंने कोई प्रयास नहीं किया था। प्रयास करने वाले श्री भैरो सिंह शेखावत, श्री शरद पवार और मुलायम सिंह यादव जी थे। मैं उन लोगों का सहायक था, उन लोगों की मदद कर रहा था। सारी बातें उनको मालूम हैं। लेकिन तब से चार सरकारें गयीं। पहले श्री नरसिंह राव जी प्रधान मंत्री हुए, फिर देवेगौड़ा जी प्रधान मंत्री हुए, उसके बाद श्री गुजराल जी प्रधान मंत्री हुए और अब श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधान मंत्री हैं। चारों प्रधान मंत्रियों ने चार मिनट भी हमसे बात नहीं कि वह मामला कैसे सुलझ रहा था। यदि मामले को सुलझाने की कोई नीयत होती तो मेरे जैसे छोटे से, अदने से आदमी के पास उनको आने में लज्जा हो सकती है लेकिन वे श्री भैरों सिंह शेखावत, श्री मुलायम सिंह या शरद पवार जी से बात कर सकते थे। अगर उसमें भी कष्ट है तो सारे दस्तावेज गृह मंत्रालय में पड़े हुए हैं, लेकिन फिर भी कुछ नहीं किया गया।
यह बात सही है कि यह मामला सुलझ सकता था, आज भी सुलझ सकता है लेकिन जितनी अधिक बहस होगी उतना ही मामला उलझता जायेगा। मैं यह समझता हूं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार इस बहस को बढ़ा रही है। मैं नहीं समझता, चाहे हमारे मित्र श्री अरुण जेटली जी जितने भी चतुर, सुजान वकील हों, सरकार इस समय क्यों गई ?इस समय सरकार का उच्चतम न्यायालय में जाना केवल एक ही बात को दर्शाता है कि उनके ऊपर कोई दबाव है। प्रधान मंत्री जी के वक्तव्य का भी यही द्योतक है कि उनके ऊपर दबाव है। दबाव के अंदर अगर सरकार, प्रधान मंत्री जी और मंत्रिमंडल काम करेगा तो इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
मुझे दुख इस बात का है कि जिस मामले को हम लोग आपस में बैठकर सुलझा सकते थे, उसमें तरह-तरह की दलीलें दी जाती हैं कि उच्चतम न्यायालय के पास जायें, वकीलों की बहस करें और जो बहस हमारे मित्र श्री जयपाल रेड्डी जी ने किताबें पढ़कर कीं, वही किताबें सुप्रीम कोर्ट में पढ़ी जायेंगी। मैं नहीं जानता कि छह तारीख को फैसला क्या होगा ?
मैं न्यायपालिका का बड़ा आदर करता हूं लेकिन न्यायपालिका में श्री अरुण जेटली जी कोई प्रस्ताव लेकर गये होंगे तो बिना अर्थ नहीं गये होंगे। बिना जाने नहीं गये होंगे। कुछ तो उनकी द्ृष्टि में रहा होगा कि उनके पक्ष में भी फैसला हो सकता है। अगर छह तारीख को फैसला हो गया तो फिर क्या होगा? …( व्यवधान)मैं नहीं समझता कि इससे कोई देश में अच्छा वातावरण बनेगा। अभी जो हमारे मित्र सरकारी पक्ष में हैं चाहे एन.डी.ए. में हों या भाजपा में हों, उन्होंने एक नारा दिया है--सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। पता नहीं वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है ? मैं तो इसे समझ नहीं पाता हूं लेकिन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का यही मतलब है जो मतलब, स्वामी जी यहां पर नहीं हैं, मैं बड़े विनम्रता पूर्वक शब्दों में कहना चाहता हूं कि राम में ही सारा देश है तो राम का वह भक्त है जो सारे स्टेट्स को अपना मानता है। कण-कण में राम व्याप्त है, जब यह माना जाता है तो फिर किसी से विरोध क्यों?आज जितना काम हो रहा है, जिस तरह के नारे लगाये जा रहे हैं, जिस तरह के कदम उठाये जा रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि हमारे देश के वासी जो बड़ी संख्या में हैं, उनके मन में एक तनाव पैदा होगा, अविश्वास पैदा होगा।
मैं बड़े विनम्रतापूर्वक शब्दों में इस सरकार से निवेदन करूंगा कि उसके सुप्रीम कोर्ट में जाने से उनके मन में एक संदेह पैदा हुआ है। वास्तविकता क्या है, कानून क्या है, दोनों में बड़ा अंतर है। अगर वास्तविकता यह है कि सरकार के कदम से अल्पमत लोगों में अविश्वास पैदा होता है, उनके मन में एक वेदना, पीड़ा होती है तो उससे समाज में और गतिरोध पैदा होगा। जिस दौर से दुनिया आज गुजर रही है, उसमें भारत के लिए एक बड़ा भारी संकट उपस्थित हो सकता है। अगर उनकी व्याख्या का राष्ट्रवाद बदले तो मैं नहीं जानता कि कश्मीर में यह दावा कितना सफल हो सकेगा। हम उत्तर पूर्व के राज्यों को अपने साथ बनाये रखें या नहीं, आदिवासी इलाकों के असंतोष को दबा पायेंगे या नहीं, पंजाब हमारे साथ रहेगा या नहीं, यह बात सोचनी चाहिए कि हम शांति की ओर, आपस में बातचीत के जरिए ही बढ़ सकते हैं। कानूनी दायरे में जाकर अरुण जेटली जी आप जीत सकते हैं लेकिन लोगों का मन नहीं जीत सकते हैं। लोगों का मन जीतने की कोशिश कीजिए। आप जो कुछ भी कर रहे हैं, मुझे दुख इस बात का है कि अरुण जेटली जी से मुझे बड़ी आशा थी। जनता पार्टी के दिनों में मैंने उनको बहुत सराहा था जिसे वह जानते हैं और सारे लोगों के विरोध के बावजूद भी सराहा था। उसी तरह मेरे मन में अटल जी के लिए बहुत आदर था और आज भी है लेकिन मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि हिमाचल प्रदेश का चुनाव जीतने के लिए और जीतेंगे कि हारेंगे, मैं नहीं जानता लेकिन जीतने के लिए वह वक्तव्य देश का प्रधान मंत्री, चाहे कोई भी हो, कैसे दे सकता है जो वक्तव्य उन्होंने दिया जिसका जिक्र उन्होंने किया है। मैं अपना दुख प्रगट करना चाहता हूं और यही दुख प्रगट करने के लिए आपसे मैंने समय मांगा क्योंकि किसी आवश्यक कार्यवश मुझे कहीं औऱ जाना है और मैं आपसे और सदन से क्षमा चाहता हूं कि मैं इसके बाद यहां सदन में नहीं रह सकूंगा।
श्री विनय कटियार (फैज़ाबाद):सभापति जी, जैसा कि मुलायम सिंह जी ने कहा कि यह बहस बीस सालों से चल रही है। ठीक है कि बीस सालों से चर्चा चल रही होगी लेकिन यह बहस १५२८ से इस देश के अंदर शुरू हुई है। १५२८ से लेकर आज तक इस देश के अंदर वभिन्न प्रकार के उतार-चढ़ाव आए, वभिन्न प्रकार के लोगों ने इस देश के अंदर हमले भी किये। मैं विस्तार में नहीं जाऊंगा लेकिन इतनी जरूर चर्चा करना चाहूंगा कि बाबर के साथ जो इस देश के लोग जुड़ते हैं, उनको अपनी मनोभावना को समझना चाहिए और हमारे महापुरुषों के इतिहास को भी पढ़ना चाहिए। मुलायम सिंह जी डा. लोहिया और बाबा भीमराव अम्बेडकर जी की विचारधाराओं के समर्थक रहे हैं। हमारे देश के अंदर कोई कतारी मुसलमान नहीं था और न कोई मंगोलियाई था। हमारे देश के अंदर रहने वाले किसी मुसलमान ने हमला नहीं किया। हमला तो बाहर के लोगों ने आकर किया। यह भी इतिहास में सच है कि कतारी, मंगोलियाई या अफगानी ये सब आपस में लड़ते थे और पूरी ताकत के साथ लड़ते थे, एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते थे और आज भी इस्लामिक राष्ट्रो के अंदर, विश्व के अंदर इसी प्रकार का दिखाई दे रहा है लेकिन भारत के अंदर जब आते थे तो एक सूत्रीय कार्यक्रम रहता था कि इस देश की संस्कृति को नष्ट करना है, इसको अपमानित करना है और उसके लिए समय अनुसार काम किया। मैं कांग्रेस के लोगों से पूछना चाहता हूं कि जब बाबर मर गया तो आगरा के पास उसकी मज़ार बनाने की बात आई और मज़ार बनी भी लेकिन उसके परिवार के लोग उसे उखाड़कर अफगानिस्तान ले गये और वहां पर जब उसकी मज़ार बनाने की बात आई तो अफगानियों ने कहा कि इसकी मजार यहां नहीं बन सकती क्योंकि यह अफगानी नहीं है, यह कतारी है। कतारी का स्मारक अफगानिस्तान में किसी भी प्रकार से नहीं बन सकता। तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि अगर अफगानिस्तान कहता है कि कतारी हमलावर हैं, उसका स्मारक नही बन सकता तो भारत के अंदंर बाबर के नाम पर स्मारक कैसे बन सकता है? इस देश का हिन्दू-मुसलमान कैसे इसे स्वीकार कर सकता है कि उसका स्मारक यहां बने।…( व्यवधान)उसका स्मारक भी नहीं बन सकता। इसलिए कांग्रेस के लोगों ने सदा सर्वदा यह कोशिश की। आप तो उस समय शायद इस दल में नहीं थे। दूसरे दल में थे और आपको उस समय का इतिहास भी नहीं मालूम है। मैं आज पहली बार इस विषय पर कहना चाहता हूं।
सभापति महोदय : आप आसन की ओर मुखातिब होकर बोलें।
श्री विनय कटियार : आपको भी जानकारी नहीं होगी। चन्द्रशेखर जी चले गये हैं।
जिस समय अयोध्या के अंदर मामला आया।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : प्रवीण राष्ट्रपाल जी आप बैठ जाएं। अगर वे ईल्ड करेंगे, तभी आप बोल सकते हैं।
श्री विनय कटियार : मैं इस विषय पर पहली बार बोल रहा हूं और इस बात का रहस्योद्घाटन करना चाहता हूं इसलिए कृपया मेरी बात सुनें। मैं बताना चाहता हूं कि मैंने कहा था कि देश की स्थिति बहुत खराब है, कृपा करके कोई रास्ता निकालें। चौहान साहब तैयार थे, लेकिन आपके प्रधान मंत्री तैयार नहीं थे। नरसिंह राव जी से हमारी बातचीत हुई, उन्होंने हमसे कहा कि हमारी और आपकी भेंट हो रही है, किसी को जानकारी नहीं होनी चाहिए। मैंने कहा कि चोरी-छिपे मिलने आया हूं, यह नहीं हो सकता, क्योंकि मैं एक आंदोलनकारी नेता हूं। इसलिए बात सार्वजनिक हो, देश के हित में हो। जिस स्थान की चर्चा अभी जयपाल रेड्डी जी कर रहे थे और उसमें घालमेल कर रहे थे, तो मैं उनसे कहना चाहता हूं कि आपको वहां का इतिहास नहीं मालूम है। न ही आपको नक्शा मालूम है कि कौन सी जमीन कहां है, कौन सा मंदिर पहले कहां था। इसलिए आपने उस जजमेंट को इधर का उधर किया। उस समय मैं नक्शा लेकर गया और कहा कि कोई जमीन विवादित नहीं है। विवादित केवल ६० बाई ४० स्केयर फीट जमीन है। मुसलमान बंधुओं ने भी कहा कि सीता रसोई, राम चबूतरा यह विवादित नहीं है। कोर्ट में लिखकर यह दे रखा है। विवादित केवल ६० बाई ४० स्केयर फीट जमीन है। मैंने कहा कि इस समस्या का आप समाधान निकालिए। कोई चीज ऐसी न हो जाए कि देश में खून-खराबा हो, स्थिति को आप नियंत्रित करें और मैं आपका उसमें सहयोग करना चाहता हूं। ६ दिसम्बर के पहले २८-२९ नवम्बर को प्रधान मंत्री जी से हमारी भेट होती है और उस विषय को मैं नक्शे के साथ रखता हूं। वाह रे कांग्रेस वालों की सोच, अच्छी-मीटी बात कही, तुरंत अदालत ले गए। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में इसे ले गए और कहा कि इसको भी विवादित कर दो। अदालत ने इनकी बात नहीं मानी। उस दिन से लगा कि कांग्रेस पार्टी कहती कुछ है और करती कुछ है। इनका पुराना इतिहास रहा है और उसकी जड़ कांग्रेस की है। मैं कहना चाहता हूं शायद नरसिंह राव जी किसके दबाव में थे, यह मालूम नहीं। राजीव जी के समय में अर्जुन सिंह जी उनके सलाहकार थे, शायद उनके दबाव में थे। लेकिन आदरणीय मुलायम सिंह जी से हमें बड़ी शिकायत है। आप साधु प्रकोष्ठ की बात कर रहे थे। आप जिसकी बात कर रहे थे वृंदावन के उसी आश्रम में जाकर उस गुरू के सामने आप भी मत्था टेकते हो। अगर वह आपको आशीर्वाद देता है तो राम जन्म भूमि के लिए वह हमें भी आशीर्वाद देता है। इससे वह भाजपा का प्रकोष्ठ कैसे हो गया, क्या वह साधु भाजपा का प्रकोष्ठ हो गया, आपका नहीं रहा। संतों के विषय में इस प्रकार की वाणी बोलना कहीं से भी उचित नहीं है। आप भी वी.पी. सिंह जी के चक्कर में फंस गए। आप दोनों में टकराहट शुरू हो गई थी कि इसका श्रेय कौन ले। वी.पी. सिंह जी लें या आप लें। हम चाहते थे कि आप श्रेय ले लें। आप गए भी थे, एक संदेश भी भेजा, आज मैं उसकी चर्चा नहीं करूंगा। आप चाहते थे।
श्री मुलायम सिंह यादव : करिए-करिए।
श्री विनय कटियार : नहीं करूंगा, अगली बार जब बहस होगी, तब करूंगा।…( व्यवधान) अगली बार भी इस पर बहस होगी, क्योंकि ये नहीं चाहते कि समस्या का समाधान हो। जिस विवादित स्थान की आप चर्चा कर रहे हैं, क्या आपके मन में, ६० बाई ४० स्केयर फीट को छोड़कर, यह बात नहीं थी कि आप तत्काल चारों तरफ घेरकर मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करें। जब आपके मन में यह बात थी कि मन का निर्माण कार्य शुरू होना चाहिए, श्री मुलायम सिंह यादव : सभापति जी, ऐसा नहीं था। मेरा कहना था कि कहीं अलग जमीन ले लो। हम पर्यटन की द्ृष्टि से आपकी जमीन विकसित कर देंगे और जब जीत या हार हो, दूसरा मंदिर बनवा लो। जो यह कह रहे हैं, वह मैंने नहीं कहा था।
श्री विनय कटियार : अच्छा है। वैसे इनका स्वभाव कभी बदलने का नहीं है, अपनी बात पर कायम रहते हैं। लेकिन जब से कांग्रेस से सत्संग होने लगा है तो कुछ का कुछ कहते रहते हैं। लग रहा है कि आपका स्वभाव बदल रहा है।
श्री मुलायम सिंह यादव : यह प्रदेश की विधान सभा की कार्यवाही है। आप वहां की लाइब्रेरी में जाकर पढ़ो तो आपको पता चल जाएगा कि ऐसा नहीं है। कहीं अलग जमीन लेते, हम विकसित करते। जब जीत या हार होती तो मंदिर बनवा देते। अब पश्चाताप कर रहे हैं कि मुलायम सिंह जी की बात नहीं मानी, गलती हुई मंदिर बन जाता। उसको बाद में देखते।
मैं चाहता हूं कि आज भी ये उसी रास्ते पर चलते। उसी से समस्या का समाधान होगा। हमने तो नहीं कहा कि डिस्प्यूटेड लैंड है। आज डिस्प्यूटेड लैंड की बात हो रही है। जो विवादित स्थान था, आपके मन में भी उस विवादित स्थान को छोड़ने की कल्पना थी। वहीं की चर्चा चल रही है। आज जिसको कह रहे हैं रेड्डी साहब, वह हमारा ऑफिस था। आप उसी एक एकड़ जमीन की वकालत कर दीजिए हाउस में। आप हाउस में कह दें कि दे दीजिए। आपने जिस एक एकड़ जमीन की बात कही कि हमने खरीदी है, आप वही कहिये, आप समर्थन करिये तो कल से विवाद खत्म। आप शुरू करिये। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या आप उसका समर्थन करते हैं। क्या आप उस एक एकड़ भूमि पर विश्व-हिंदू परिषद् और श्रीराम जन्मभूमि न्यास की मल्कियत को स्वीकार करते हैं। अगर आप उसे स्वीकर करते हैं और जैसा आपने कहा कि उनकी जमीन है तो फिर आप हमरा समर्थन करिये। आज से ही समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन आपको समाधान नहीं करना है, आपको तो जो ऊधर से सिग्नल मिला होगा, वही आपको बोलना है। मेरा आशय कहां से है, आप जानते हैं।
आपने कहा कि अशोक सिंघल कौन हैं? वे श्रीराम जन्मभूमि न्यास से प्रबंधक हैं, अध्यक्ष दूसरे हैं। आपने अदालत की चर्चा कर दी। हमने कब अदालत का सम्मान नहीं किया। हमने तो सर्वदा अदालत का सम्मान किया है लेकिन अदालत की अगर किसी ने अवेहलना की है तो कांग्रेस ने अवेहलना करने की शुरूआत की। इंदिरा गांधी जी के खिलाफ जजमेंट आ गया, आपने पुतला फूंकना शुरू कर दिया। वकीलों को अपमानित करना शुरू कर दिया। अदालत के सम्मान की आज आप बात कर रहे हैं। हम अपमान कर रहे हैं, ऐसा आप कह रहे हैं। अपमान तो आपने किया।
दूसरे आपने अभी अदालत की बात कही। मैं तारीख बताता हूं। सन् १३ सितम्बर १९९४ को आपके लोगों ने इलाहाबाद में किया किया था। आपके लोगों ने भी अदालत के अंदर उसी प्रकार से मारपीट की। आपने कहां अदालत का सम्मान रखा।
जहां तक अमरनाथ यात्रा का सवाल है तो हम तो कहते हैं कि कुछ विषय तय कर लीजिए। सब नेता बैठ जाएं। सारे विषय तय हो जाएं कि ये-ये विवादित विषय हैं। इन विषयों पर एक सप्ताह, महीना भर बैठ कर उनका समाधान कीजिए। अमरनाथ यात्रा पर अगर कहीं हमला हो रहा है तो उसके लिए कौन दोषी है, किसकी नीतियां दोषी हैं? किसने कश्मीर के अंदर आतंकवाद फैलाया, किसने वहां के लोगों का रक्त बहाया।…( व्यवधान)अभी जब माननीय मुलायम सिंह जी बोल रहे थे तो दादा जी मेज थपथपा रहे थे। हम तो केवल उसका जवाब दे रहे हैं। अपने ही देश के अंदर लाखों की संख्या में खुले आसमान के नीचे रहने के लिए विवश कौन हैं? किसने यह सब किया? हम मानते हैं कि इसके लिए कांग्रेस की नीतियां दोषी हैं। यह ठीक है कि हम सभी कहीं न कहीं आतंकवाद से पीड़ित हैं। आतंकवादियों द्वारा जब कार्रवाई होती है तो सबको दु:ख होता है। खुशी की बात है कि आतंकवाद के खिलाफ सभी लोग मिलकर लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या दिसम्बर १९२६ में हुई। वे बीमार थे। अब्दूल रशीद ने उनको मारा। उसके बाद दिल्ली के प्रसिद्ध आर्य समाजी लाला नानक चंद की हत्या ६ अप्रैल १९२९ को हुई। सितम्बर १९३४ में नाथुराम शर्मा की हत्या हुई। कई और नेताओं की हत्याएं हुई, उनकी चर्चा मैं यहां नहीं करना चाहता।
SHRI R.L. JALAPPA (CHIKABALLAPUR): Sir, the discussion is on the Ayodhya issue. From Ayodhya, where is he going?
MR. CHAIRMAN : Please take your seat.
श्री विनय कटियार : हत्यारेअब्दूल क्यूम का पक्ष लेते हुए बैरिस्टर बरकत अली ने कह् कन क्यूम हत्या के दोषी नहीं हैं क्योंकि कुरान के हिसाब से हत्या जायज है। यह विनय कटियार नहीं बोल रहे हैं। यह डा. अम्बेडकर ने कहा है। उनकी यह पुस्तक है।
SHRI E. AHAMED (MANJERI): Sir, he is quoting somebody’s name and saying that Koran is saying like that. I dispute it.
Sir, he is denigrating our holy book. What authority does he have to do that? … (Interruptions) He is only quoting somebody and saying that is what the Koran is saying. … (Interruptions)
SHRI PRAVIN RASHTRAPAL (PATAN): Sir, this has nothing to do with the discussion on Ayodhya.
SHRI R.L. JALAPPA: He does not know anything. He does not know what he is speaking. … (Interruptions)
श्री विनय कटियार : महोदय, स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या की बात कही, लेकिन मैं इन सब चीजों में नहीं जाना चाहता हूं। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि…( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप विषय पर बोलिए।
...( व्यवधान)
श्री अशोक कुमार सिंह चन्देल (हमीरपुर, उ.प्र.) : महोदय, इस सदन में अयोध्या विषय पर चर्चा चल रही है। इसके महानायक श्री मुलायम सिंह जी और श्री कल्याण सिंह जी है। इन दोनों पर चर्चा होनी चाहिए। विवादित भूमि पर चर्चा होनी चाहिए।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : श्री विनय कटियार जी के अलावा कोई बात रिकार्ड पर नहीं जाएगी।
श्री नरेश पुगलिया: अगर वे गलत बात कहेंगे । …( व्यवधान)
सभापति महोदय : अगर गलत बोलेंगे, तो पाइंट आफ आर्डर के द्वारा आप अपनी बात कह सकते हैं कि माननीय सदस्य कोई गलत बात कह रहे हैं। उसके लिए आपको अनुमति दी जाएगी।
श्री विनय कटियार : १५२६ई.में अयोध्या के अन्दर मन्दिर तोड़े। अगर हमारे देश के महापुरुषों के बारे में इस तरह की बातें कही जायेंगी…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :यह बताइए, आपने रामजन्म भूमि के आसपास मंदिरों को नहीं तोड़ा?
श्री विनय कटियार : हमने नहीं तोड़ा।
श्री मुलायम सिंह यादव : सब तोड़ दिया है। एक महीने में सत्तर संतों को खाना खिलाया है, सबने रो-रोकर कहा कि बर्बाद कर दिया। उन सब को हटाया है और मंदिर तोड़ दिए गए हैं। …( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : महोदय, मैं रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विषय तक ही अपने आपको सीमित करता हूं।
औरंगजेब के पुत्र की पुत्री ने १७वीं शताब्दी के अंत और १८वी शताब्दी के प्रारमभ में रचित (सहीफा-ए-चहल नसाही बहादुरशाही) ४० नसीहतें दी गई हैं। यह पुस्तक हमारी लिखी हुई नहीं है, यह उनकी पुत्री की लिखी हुई पुस्तक है। उसमें जो लिखा है, मैं उसको उद्धृत करना चाहता हूं। उसमें उन्होंने लिखा है - मथुरा, बनारस व अवध(अयोध्या) आदि स्थानों पर स्थित हिन्दू देवालयों तथा कन्हैया के जन्म स्थान पर नमाज नहीं हो सकती । …( व्यवधान)
SHRI S. JAIPAL REDDY : Who is the teacher of Shri Murli Manohar Joshi? Shri Vinay Katiyar is the guru of Shri Murli Manohar Joshi. … (Interruptions)
श्री विनय कटियार : महोदय, मैं तीसरा उदाहरण दे रहा हूं - हदाकएसाइदा १८५६ ई. लेखक हैं - मिजा जान॥ उन्होंने लिखा है - सीता राम की पत्नी का नाम है। जहां पर जन्म स्थान राम का मूल मंदिर है। अत: उस स्थान पर बाबर बादशाह ने मूसा आशिकां के मार्गदर्श में मस्जिद बनवाई। ये ऐतिहासिक बातें हैं। इन्होंने १५ साल की बात कही है, लेकिन यह ते १५२८ई. की बात है। चौथा उदाहरण - शेख मुहम्मद अजमद अली ने कौरवीं द्वारा रचित तीराखें - अवध(मूकां-ए-खुसरवीं) में लिखा है - अवध ही अयोध्या के नाम से जानी जाती है। लक्ष्मण और राम के पिता की राजधानी अयोध्या रही है। जहां पर राम जन्म स्थान में एक भव्य मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया गया। निर्माण की तारीख का आकलन खैर बाकी सेकिया जा सकता है। अगला उदाहरण - मौलवी अब्दुल करीम करत गुम गरते हलाते अयोध्या अवध(अयोध्या की भूली बिसरी घटनायें) में लिखा है - तारीखें पढ़निया मदीना अलवालिया(१८८५) ये पुस्तक फारसी है। ये बाबरी मस्जिद का जो इमाम बनाया गया था, हजरत शाह जमाल गौजरी करी दरगाह का विवरण उसने दिया है, जिसमें राम के मन्दिर को तोड़ने और बाबर के आदेश पर मस्जिद बनाने का उल्लेख है।
१८८० का फैजाबाद सैटलमेंट रिपोर्ट में भी यही लिखा है। इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण है - कमालुद्दीन हैदर-उस्मी-अल हुसैनी-अल मसाहदी कृत यह १८९६(खण्ड-२) पृष्ठ १०० से लेकर ११२ तक इस पुस्तक का नाम है - केसरूल त्वारिख अवध। इन्होंने लिखा है - रामचन्द्र जी त्रेतायुग के ठाकुर थे और उनके मन्दिर को बाबर ने जन्म स्थान को ध्वस्त करके मस्जिद बनवाई। अली मियां साहब के पास मुलायम सिंह जी भी जाते रहे हैं। उनका देश में ही नहीं, पूरे विश्व में सम्मान है।
आज वह हमारे बीच नहीं हैं। उनके पिताजी ने भी इसी प्रकार की पुस्तक लिखी। मैं उनके उदाहरण देकर बात आगे बढ़ाना चाहता हूं।
सभापति महोदय : आप वर्ष २००३ पर आइए।
श्री विनय कटियार: मौलाना हाकिम शहीद अब्दुल हमी कृत(हिन्दुस्तान इस्लामी आहित में) मौलाना हाकिम सहीद अब्दुल हमीद जिन की मृत्यु १९२३ में हुई इस्लामी संस्कृति के, इतिहास के मूर्धन्य विद्वान थे, नदवत उल उल्मा के रैक्टर थे उन्होंने २०वीं शताब्दी के प्रारम्भ में हिन्दुस्तान इस्लामी आहिद के नाम से अरबी भाषा में एक पुस्तक लिखी जो १९७२ में हैदराबाद से प्रकाशित हुई इसका उर्दू अनुवाद, उनके विद्वान योग्य पुत्र मौलाना जिन को अली मिया के नाम से जाना जाता है अब्दुल हसन, नदवी उपाक्य अली मिया के प्राक्कथन सहित नदवत उल उलमा लखनऊ में १९७३ में प्रकाशित हुआ और १९७७ में उसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ। इस पुस्तक में हिन्दुस्तान की मस्जिदों के शीर्षक से एक अध्याय था। इसमें कम से कम ऐसी ६ मस्जिदों के निर्माण के उदाहरण दिए गए हैं ।
माननीय सदस्यों को इतिहास जानना चाहिए। राम जन्म भूमि के संबंध में वह लिखते हैं इस मस्जिद का निर्माण बाबर द्वारा अयोध्या में किया गया था। मैं केवल मुसलमान साक्ष्य नहीं परन्तु कुछ विदेशी साक्ष्य भी आपको देना चाहता हूं। मैं अदालत में इसलिए जाना नहीं चाहता हूं क्योंकि स्वामी चिन्मयानन्द जी ने सारे विषय रख दिए, कुछ आपने रखे. हमारे और वक्ता उन्हें रखेंगे। लेकिन ऐतिहासिक सच क्या है, साक्ष्य क्या है हम उसे पढ़े, जानें। यूरोपवासी यात्री वलियम फिंग्स की यात्रा रिपोर्ट १६०८ से १६११ तक है। उसने लिखा है कि राम कोट मोहल्ले में राम के मंदिर जिस में हिन्दुओं की हजारों वर्ष पहले जहां राम ने अवतार लिया था वहां बाबर ने मंदिर तोड़ा। मैं एक और बात कहना चाहता हूं क्योंकि इन लोगों को कठिनाई हो रही है। अगर इस देश के मुसलमानों को किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं।…( व्यवधान)१८३८ एडवर्ड थार्टन इस्ट इंडिया कम्पनी गजटियर (१८५४) वह भी ऐसा ही कहता है। सर्जन जनरल एडवर्ड - बाल फोर कृति उन्होंने भी १२५८ में ऐसे ही लिखा है।
श्री मुलायम सिंह यादव:यह सही है कि यह हमारे भाई हैं और पढ़ाई-लिखाई करते हैं। अध्यक्ष महोदय ने कहा था कि अदालत में सरकार क्यों गई और उसके क्या परिणाण हुए, उस पर बहस होगी। …( व्यवधान)हमारा भी फर्ज है । हम आपको हिस्ट्री का लैक्चरार बना देंगे लेकिन आप यहां भी बने रहोगे। …( व्यवधान)
श्री हरिन पाठक : हिमाचल प्रदेश में क्या हुआ, उस पर बहस हो सकती हैं तो इस पर कैसे बहस नहीं हो सकती है? …( व्यवधान)
Shri Mulayam Singh Yadav has said that the issue is why the Government has gone to the court. It is to be discussed. Then, why are we discussing the role of the NDA’s partners? … (Interruptions)
SHRI S. JAIPAL REDDY : Now, we know that Shri Vinay Katiyar is the guru of Dr. Murli Manohar Joshi, who is engaged in rewriting history. … (Interruptions)
SHRI HARIN PATHAK: You are referring to Prime Minister’s speech in Himachal Pradesh. … (Interruptions)
सभापति महोदय: विनय कटियार जी के अलावा किसी की बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।
...( व्यवधान)... ।
सभापति महोदय: माननीय सदस्य बोल रहे हैं। मंत्री जी आप बैठिए।
ह्ल( व्यवधान)
सभापति महोदय: कटियार जी, आप बोलिए। दूसरे सदस्यों की बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगा।
...( व्यवधान)... * श्री विनय कटियार : मैं किसी के खिलाफ नहीं बोल रहा हूं। मेरी मंशा किसी की भावना को आहत करने की नहीं है। जब भी यह चर्चा होती है हर बार यह विषय आता है। यहां अदालत का जजमैंट कोट हो सकता है तो उनसे संबंधित जो लोग रहे, मुस्लिम शासक रहे यदि उन्होंने अपनी बातें राम जन्म भूमि के संबंध में लिखी हैं तो मैं उन्हें पढ़ रहा हूं। मैं किसी दूसरे स्थान के संबंध में चर्चा करूं तो मुझे जरूर टोक दीजिए। मैं सिर्फ राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद के विवाद तक ही सीमित हूं। सारा विषय देश के सामने आना चाहिए।
गजेटियर ऑफ दी प्रोविंस ऑफ अवध १८७७ में पुष्टि करता है कि मुगलों ने अयोध्या में तीन महत्वपूर्ण मंदिरों को नष्ट किया। उनके स्थानों पर मस्जिदें बनायी। बाबर ने १५२८ में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनवाई। फैजाबाद स्टेट (१८८०) सैटलमैंट रिपोर्ट में भी यही लिखा है।
* Not Recorded 17.00 hrs. इम्पीरियल गज़ेटियर ऑफ फैज़ाबाद, १९०२ में भी यह लिखा है कि ठाकुर मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई। ए.आर.नेविल गज़ेटियर आफ बाराबंकी, १८०१ और फैज़ाबाद (१९०५) में यही लिखा है। इसके अलावा एनटोनीट बिवरीज (बाबरनामा इन इंगलिश) १९२० में यही लिखा है कि बाबरी मस्जिद का विश्लेषण करने के बाद पुरातत्व वास्तु विशेषज्ञ के अध्ययन के उपरांत लेखक का कहना है कि बाबर ने मन्दिर के स्थान पर मस्जिद बनाने का काम किया।
सभापति महोदय : अब आप १९४७ में देश को आजादी मिली, उस के बाद आगे कहिये।
श्री विनय कटियार : सभापति जी, जहां तक अदालत का सवाल है, इस्लामी कानून के अनुसार मस्जिद में मुल्तवी को वधि प्रक्रिया के प्रारम्भ करने का अधिकार नहीं है। अगर कहीं होता है तो उसे किसी प्रकार का काम नहीं है। मैं मुसलमान बन्धुओं से निवेदन करना चाहता हूं कि आप अपने आपको तातारी, अफगानी, गज़नी, मंगोलिया के साथ क्यों जोड़ते हो? हिन्दुस्तान का मुसलमान यहां सब के साथ मिल-जुलकर रहता है…( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप लोग बैठिये, श्री कटियार कन्कलूड कर रहे हैं।
श्री विनय कटियार : सभापति महोदय, मैं समझता हूं कि अगर इस देश में विवाद भी है तो अदालत के बाहर भी इस समस्या का समाधान हो सकता है बशर्ते ये लोग तैयार हों। मैं मुसलमान बन्धुओं को बताना चाहता हूं कि मोहम्मद रसूल के सात साथी हुआ करते थे। उनके नाम पर जब झगड़ा शुरु हुआ तो मोहम्मद रसूल ने उन सातों के नाम अलग-अलग मस्जिद का निर्माण कराया। ये मस्जिदें मुसलमानों के लिये बहुत ही पवित्र मानी जाती थीं क्योंकि ये मोहम्मद रसूल ने मस्जिदें बनवाई थीं। मैं ऐसी पांच मस्जिदों के नाम बताता हूं…( व्यवधान)
श्री राशिद अलवी :सभापति जी, यह बात गलत है…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : सभापति जी, मैं उन पांच मस्जिदों के बारे में पवित्र शब्द कह रहा हूं, फिर क्या बात है…( व्यवधान)
सभापति महोदय : राशिद साहब, आप बैठिये, आपका नाम सूची में है, आप अपनी बात कहियेगा, जब आपको मौका मिलेगा।
श्री विनय कटियार : सभापति जी, ये लोग हमारे मन्दिरों के बारे में बोल सकते हैं, हम तो इन लोगों की पवित्र मस्जिद के बारे में कह रहे हैं। हम पवित्र कहकर उनका सम्मान कर रहे हैं, फिर इन्हें क्यो आपत्ति हो रही है? हम इनकी भावनाओं का आदर करते हैं। मैं बता रहा था कि वे पांच मस्जिदें हैं - मस्जिदे मोहम्मद, मस्जिदे अबु बक्र, मस्जिदे उमर, मस्जिदे उसमान और मस्जिदे अली। इन पांच मस्जिदों में से चार को तोड़ दिया गया, क्यों तोड़ा गया? इसलिये कि वहां सड़क को चौड़ा करना था। अगर यह बात साबित न हो जाये तो मैं लोकसभा से इस्तीफा दे दूंगा, अन्यथा ये इस्तीफा दे देंगे। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं। मैं हल्की-फुल्की बात नहीं करता।
श्री राशिद अलवी : कटियार जी, मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं....
सभापति महोदय : राशिद जी, आपको जब समय मिलेगा, आप अपना इतिहास कहियेगा। अब आप बैठिये।
श्री मुलायम सिंह यादव : सभापति जी, यह ठीक है कि कटियार जी तथ्यों का इतिहास बता रहे हैं लेकिन मेरे पास भी उज्जैन, कन्नौज आदि मन्दिरों के इतिहास हैं जहां पर पूजा और प्रशाद के लिये और उन मन्दिरों को मदद देने के लिये औरंगजेब ने सरकारी खज़ाने में से पैसा दिया।
श्री विनय कटियार : सभापति जी, अगर यह बात साबित हो जायेगी…( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप लोग अपना स्थान ग्रहण कीजिये।
...( व्यवधान)
सभापति महोदय : मुलायम सिंह जी, आप अपना स्थान ग्रहण कीजिए।
श्री विनय कटियार : सभापति महोदय, वर्षों से ये मुस्लिम समाज के पवित्र स्थान माने जाते हैं। इसलिए मैं मुस्लिम बंधुओं से अपील करना चाहता हूं और इस रौ में अपील करना चाहता हूं, जब मैंने आंदोलन प्रारंभ किया था तो मैं देवबंद गया था और वहां से एक फतवा लाया…( व्यवधान)
सभापति महोदय : जाधव जी, आप क्यों खड़े हैं, मैं आपको अलाऊ नहीं कर रहा हूं, आप अपनी सीट पर बैठिये। कटियार जी, आप बोलिये।
श्री विनय कटियार : इसलिए हम चाहते हैं कि हिन्दू-मुसलमानों में एकता स्थापित हो और इसमें से राजनीति दूर हो। अगर वहां ये सब हो सकता है, सौहार्दपूर्वक हो सकता है, अच्छे वातावरण में हो सकता है, इस्लामिक राष्ट्रों में भी मस्जिदें हटाई गई हैं, यदि वहां हो सकता है…( व्यवधान)आप ठीक कह रहे हैं, हम आपकी बात का सम्मान करते हैं। यही मैंने प्रारंभ में अपील की थी कि अगर वहां ये सब हो सकता है तो हिंदुस्तान में क्यों नहीं हो सकता। अयोध्या के अंदर अवध के नवाब ने हनुमानगढ़ी का निर्माण कराया था, जो आज भी वहां पर है। वहां सारे लोग पूजा करने और माथा टेकने के लिए जाते हैं। ये केवल कुछ लोग हैं, जिसमें कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्होंने कभी नहीं चाहा कि इस समस्या का समाधान हो। दूसरी भूमिका इसमें आदरणीय मुलायम सिंह जी और आदरणीय वी.पी.सिंह जी की आपस की लड़ाई थी।
श्री मुलायम सिंह यादव : नहीं।
श्री विनय कटियार : इस लड़ाई के कारण इस समस्या का समाधान आज तक नहीं निकला। लेकिन मैं एक बात नहीं समझ पा रहा हूं कि आप भी लोक सभा में बहस करते हो और कहते हो कि अदालत निर्णय दे दे या बातचीत से समाधान हो जाए, ये बात आप रोज कहते हो। माननीय अटल जी या हमारी सरकार ने ऐसा तो नहीं कहा कि इसका निर्णय ऐसा कर दो, इसके पक्ष में कर दो या उसके विपक्ष में कर दो। यदि उन्होंने कहा कि इस समस्या का समाधान हो और इसका आप जल्दी निर्णय कर दो तो इसमें कौन सी आपत्ति हो गई। अगर छ: दिसम्बर, १९९२ के पहले कांग्रेस सरकार यह निर्णय देती, जब मैं मिलने गया था तो मैंने यही निवेदन किया था कि पांच तारीख को यह फैसला होने वाला है, इसका इस समय निर्णय करा दीजिए। जो हमने नक्शा दिया, उस पर कोई विवाद नहीं है। उस पर मुसलमान भी असहमत नहीं है। दादा आप उस समय अयोध्या गये थे या नहीं, मुझे याद नहीं आ रहा है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि आप भी वहां गये थे। जो लोग वहां गये थे, उन्होंने उसी स्थान पर जाकर प्रसाद लिया और कहा कि कहां है वह स्थान। भारत के उस समय के गृह मंत्री श्री चव्हाण साहब ने हमसे कहा कि कटियार १७.०७ ण्द्ध. (ग्द्ध. च्द्रड्ढठ्ठड्ढद्ध त्द ण्ड्ढ ण्ठ्ठत्द्ध) साहब जहां मुझे आना था, वह विवादित स्थान कहां है। उन्होंने कहा कि आप मंदिर क्यों ले आये। मैंने कहा आप पहले प्रसाद ले लीजिए। उसके बाद मैंने कहा कि यही वह स्थान है। वहां जो जाता था, उसे मंदिर दिखाई देता था, लेकिन जैसे ही हवाई जहाज में बैठते हैं, दिल्ली आने लगती है और कुर्सी दिखाई देने लगती है तो मंदिर के स्थान पर मस्जिद दिखाई देने लगती है। जब तक यह होता रहेगा, तब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा।
अध्यक्ष महोदय, अंत में एक बात कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं, मैं बाकी कुछ नहीं बोलूंगा।…( व्यवधान)मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया है। डा.अम्बेडकर ने कहा है, महोदय, आप जहां के माननीय मुख्य मंत्री रहे हैं, वहां डा. अम्बेडकर ने ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’नाम की पुस्तक लिखी। यह उसका १५वां हिन्दी संस्करण है। हमारी सरकार तब नहीं थी। आपके रिजीम में वह पुस्तक नहीं लिखी गई, कांग्रेस के रिजीम में यह पुस्तक लिखी गई। हिन्दू शिक्षा मंत्री और मुस्लिम शिक्षा राज्य मंत्री दोनों ने मिलकर उनके भाषण और लेख की पुस्तक लिख डाली। इस पुस्तक में बाबरी मस्जिद, बनारस की मस्जिद, मथुरा और विदेशी आक्रांताओं का उल्लेख है। अगर आप कहेंगे तो मैं इस पुस्तक को सदन के पटल पर रख दूंगा। इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। इसमें ‘एकता का विघटन’नाम का एक चैप्टर है, इसमें सारे विचार उपलब्ध हैं। मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लूंगा। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि कुछ लोग जो डा.अम्बेडकर का नाम लेते-लेते दिन-रात सोते और जागते हैं, आज अगर विनय कटियार ने डा. अम्बेडकर पर बोलना शुरू कर दिया तो पता क्यों इन्हें बीमारी सी शुरू हो गई।
मैं इसीलिए उस पर बोलना नहीं चाहता हूँ। लेकिन एक बात कहूँगा कि जब सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन होने जा रहा था, तो उस समय कन्हैयालाल मुंशी जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा मैं उस पत्र का एक वाक्य उद्धृत करना चाहता हूँ। उन्होंने लिखा :
"… मेरे लिए स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा, यदि वह मुझे मेरी भग्वद्गीता से वंचित कर दे अथवा इस देश के करोड़ों देशवासियों की श्रद्धा ही उजाड़ दे, जिस श्रद्धा से वे अपने मंदिरों को निहारते हैं। फिर तो जीवन का सारा ताना-बाना ही बिखरकर रह जाएगा। … "
इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि मुंशी जी के पदचिहनों पर चलते हुए सदन एक बार तय करे और इस समस्या का समाधान करे तथा जल्दी करे। इतने सारे प्रमाण मौजूद हैं देश के अंदर और विवाद केवल १५ सालों का नहीं है, विवाद १५२८ से प्रारंभ हुआ है। उस विवाद को समाप्त करिये और समाप्त होने का एक ही रास्ता है कि उसी स्थान पर भगवान राम का मंदिर भव्य और सुन्दर बने, यही एक समाधान है।
SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): Mr. Speaker, Sir, our friends from the other side say, ‘Why should we discuss Ayodhya in every Session?’ After hearing the speeches of the two very distinguished Members of the Bharatiya Janata Party, the House, I believe, feels that it is absolutely necessary that we should discuss this issue in depth. Otherwise, the Parliament of India will have absolved its responsibility in dealing with one of the major issues which is now confronting the nation.
It is correct – we have been saying that and even yesterday we raised - that there are many vital issues confronting our nation, like the issue of unemployment, the issue of industrial recession, the issue of farmers’ plight in this country, the issue of drought, the issue of disinvestment. Every sphere of our national life is afflicted by one crisis or the other and we want to give primacy to that. There is no doubt about it. We have been asking for opportunities to raise them and you have been very accommodative. I have nothing to say except to appreciate your kind concern. However, the reason that has prompted us to request you to grant this discussion today was this sudden decision of the Government of India to go to the Supreme Court in a matter where there was no necessity at all.
If any of the Parties - Shri Vinay Katiyar in his capacity as the President of Bharatiya Janata Party, Uttar Pradesh branch and of Bajrang Dal; I do not know whether he has been removed or not - had gone to court in that capacity, we would not have raised this issue. We could not have. But it is the Government of India which has solemnly taken a decision suddenly, without any provocation, on the 5th of February to go to the Supreme Court of India to change the existing order and, therefore, to change the status quo.
The two hon. Members who have spoken from Bharatiya Janata Party have not said one word in justification of that. They taught us history, their own version of history, from 14th century onwards. We have been told what was there and what was not there, as if we sitting here today can decide whether there was a mosque or a temple, or what should be done with regard to that. We cannot decide that. The matter is before the Supreme Court. That is why, we expressed our great anguish and objection when a person no less than the Prime Minister made a comment on a pending matter.
Why did we object? We objected because the matter was before the highest court of this land. He may be the Prime Minister but he must be conscious of his responsibilities of holding the highest office of the country. He is the head of the Government and how could he have suddenly made some observations on a pending issue? Therefore, my friend Shri Jaipal Reddy was absolutely right in saying that this card has to be played for the purpose of the Himachal Pradesh Assembly elections.
Sir, this issue is not arising today only and -- whether Shri Yerranaidu likes it or not-- this is a part of the agenda of the BJP.
श्री विनय कटियार : आप अपना एजेंडा बना लें, क्या दिक्कत है। आप अपना एजेंडा बना लें तब मामला हल हो जाएगा।…( व्यवधान)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I am thankful to you for your intervention. I admire Shri L.K.Advani for his candour. He says what he believes in. He says that he believed in his own agenda but for the purpose of remaining in office he has taken the National Agenda for Governance. Now, what did he say the other day in a meeting of the Chief Ministers and Party Presidents of those States that are going to elections? That has not been denied till now. It has been reported and I quote:
"Shri L.K.Advani today signalled that the BJP Government was willing to dump the National Democratic Alliance Agenda for Governance and was ready to bring in legislation to enable handing over the entire 67 acre land acquired in Ayodha including the disputed plot to the Viswa Hindu Parishad controlled Trust."
He was reported to have said that the Government could bring in legislation on Uniform Civil Code, ban on religious conversions and it would also legislate to ban cow slaughter throughout the country. This has not been denied so far. The comment says that it has been done under pressure from the VHP and the RSS. It is not for the first time that it has been done.
Sir, when Shri Advani was the President of the BJP, he had written a foreward of a very important Party publication, `BJP’s White Paper on Ayodha and the Ram Temple Movement’. This is the book published by the BJP and the foreward has been written by Shri Advaniji. What does it say: I quote:
"The structure which Mir Baqi put up on the orders of Babar never had any special significance from a religious point of view. It was purely and simply a symbol not of devotion and of religion but of conquest. Correspondingly, quite apart from it being an obstacle preventing Hindus from worshipping the birth place of their idol, Shri Rama, it was for the country a symbol of subjugation."
That is how the BJP has considered it – the Babri Masjid was a symbol of subjugation. He further says:
"The manner in which the State versus the Government of the day..." --presumably meant the Congress Government --
"went to the fundamentalists and terrorists, the manner in which the self-styled leaders of minorities sought to revive the politics of separatism which had led to the partition of the country and even more so, the manner in which the Prime Ministers and others genuflected on them and the double standards which came more and more to mark public discourse in India to the point that the word Hindu became something to be ashamed about. To the point that nationalism became a dirty word, these ignited a great revulsion on the people. As all these were done in the name of secularism it led people to feel what is being practised was not secularism but a perversion. People began to search for what true secularism meant. They began to wonder how our country could at all survive if nationalism was to be an anathema. Reconstructing the temple for Shri Rama became the symbol of these rising consciousness."
He said:
"Our Governments refused to pay heed to the intense longing of the people with regard to Ram Janam Bhoomi and I regret to say that the courts heeded our people no more."
Judiciary did not suit him then. It did not suit the BJP. He said:
"Governments remained lost in their calculations. Our leaders continued to be obstructive and to boost their thrust in being clever, our courts allowed themselves to remain entangled in legalism."
But I would read the last sentence from this book. It says:
"The karsevaks did more. They did not just erase the symbol of our subjugation; they did not just begin building a symbol of resurgence; they showed us as if in a flash how far we have to travel for the country reacted in two diametrically opposite…. "
He justified it on the basis of what he calls cultural nationalism. He everyday accuses us of pseudo-secularism and on his turn he was also accused of pseudo- secularism by VHP for the purpose of their followers’ consumption.
Shri L.K. Advani has openly said that because of the Rath Yatra, they are in power. He has said that. What is the meaning of that? He has also said ‘well, NDA is there, but we are in a coalition Government’. There is no relevance of ideology in a coalition Government. The only relevance is to remain in power.
Now, I will read out what he has said when the immediate elections are there in Himachal Pradesh and other States. Their very good friend Shri Prabhu Chawla, the new Padma Vibusan, has said:
"Politics is the art of striking deals. Sometimes it also involves breaching them. After almost five years in power, Shri Atal Bihari Vajpayee will, in two months, become the first non-Congress Prime Minister to complete five years in office. The BJP seems to have mastered both. For the first time since 1998 the Party made it clear last seek that it is not bound by the compulsions imposed by the ruling NDA’s National Agenda for Governance while making a subtle distinction between the NAG and the Party manifesto for the forthcoming Assembly polls in several States. The BJP sent a clear signal to its allies that its main plank would be the core ideological issue that prompted the manifold growth of the Party in fifteen years.
Recently, there was a meeting with regard to Assembly elections in Himachal Pradesh in February; in Delhi, Rajasthan, MP and Chattisgarh later this year. The meeting was attended by thirty top leaders including the Deputy Prime Minister and the Party President. It was Advani who set the tone for deliberation by unambiguously stating …."
It has appeared in India Today of 3rd February, 2003. This article is written by Shri Prabhu Chawla, whose weakness for which Party is known. He says:
"The Gujarat election results have given new vibrancy and confidence to the BJP. The Congress has not yet realised that it lost because of pseudo secularism and Hindu bashing. The BJP is clear in its ideology and programme and is not apologetic about it."
This is the crux of the decision which has prompted this Government to go to the court. This is what we are trying to say.
Last year, in March 2002, after the 1994 decision which put a quietus on the whole issue, everybody admitted it will depend on the decision of the court. I have got a letter which was earlier circulated by the hon. Prime Minister to all of us.
In a letter dated 7th June, 1998, he said to Shrimati Sonia Gandhi as President of the Congress Party like this.
"As far as my Government is concerned, the Constitution and the rule of Law are supreme. The judiciary will be unfettered in discharging its duty in the Ayodhya matter. If the Supreme Court paves the way for the construction of the Ram Mandir at Ayodhya, the verdict will be given effect to accordingly. If, on the other hand, the apex court gives a contrary ruling, my Government will perform its constitutional duty of ensuring that nobody will act against that verdict."In 1994, a decision was given. The judgement was given when the challenge was thrown to the Acquisition Act of 1993, when the land was acquired after the demolition, what we call the infamous and shameful incident of the nation, when the Babri Masjid was demolished on 6th December, 1992. In 1993, the land was acquired. About 67 acres plus 2.77 acres of land was acquired and this very matter had been gone into exhaustively. Chief Justice Venkatachelliah, Justice Verma and Justice Ray were in a majority which binds us and there, it was categorically said that only upon a final adjudication of the matter, the question of dealing with the land, either disputed or undisputed, can be decided. I find our very illustrious legal luminary who is resurrected as the Law Minister, as I said, shaking his head.
Sir, instead of taking the time of the House and yourself, we can read the conclusions of this matter. On the Conclusions chapter, there is an elaborate discussion. If any hon. Member wishes to look into it, they are welcome. It is my request that they may read paragraph 49 of this judgement which is reported in Volume-VI of 1994, Supreme Court Cases and also 1995 AIR. I am going to read from paragraph 96 of the Conclusions. Mr. Alvi, I know that you have a very difficult role to play. Please also read paragraph 49 to paragraph 53.
"The vesting of the said disputed area in the Central Government by virtue of Section 3 of the Act is limited, as a statutory receiver, with the duty for its management and administration according to Section 7. The duty of the Central Government as the statutory receiver is to hand over the disputed area in accordance with Section 6 of the Act, in terms of the adjudication made in the suits for implementation of the final decision therein. This is the purpose for which the disputed area has been so acquired.
The vesting of the adjacent area, other than the disputed area, acquired by the Act in the Central Government by virtue of Section 3 of the Act is absolute with the power of management and administration thereof in accordance with sub-section 1 of Section 7 of the Act, till its further vesting in any authority or any body or trustees of any trust in accordance with Section 6 of the Act. The further vesting of the adjacent area, other than the disputed area, in accordance with Section 6 of the Act has to be made at the time and in the manner indicated, in view of the purpose of its acquisition, namely, upon final acquisition."
This is categorically said. Sub-paragraph 9 of paragraph 96 says:
"The challenge to acquisition of any part of the adjacent area on the ground that it is unnecessary for achieving the professed objective of settling the long-standing dispute cannot be examined at this stage. However, the area found to be superfluous (on which a wrong reading is made) on the exact area needed for the purpose being determined on adjudication of the dispute must be restored to the undisputed owners."
What is excess or what is not, how to utilise or not can only be determined on the adjudication of the dispute. The Supreme Court has categorically said that. From 1994 everybody accepted that position. There was no problem until last year when a venerable sanyasi, Shankaracharya of Kanchi Mutt came to Delhi. There was suddenly a demand for doing shila puja. Please recall that. Even last year there was no demand that the land should be immediately given to them. They said that they wanted to hold some puja there. Only that was made. No other claim was made. Even then, we raised our contention. The country was agitated. There was a serious danger of disturbances in Ayodhya, Uttar Pradesh. The whole country was agitated. This House was agitated. We discussed it.
Then the Supreme Court said that no shila puja will be permitted. In spite of the ‘great’ intervention of Shri Soli Sorabjee, our Attorney General, the Supreme Court overruled his contention. What was his contention? How can it be a legal contention? Of course, we are much humbler lawyers. The Attorney-General, Shri Soli Sorabjee, told the court then that allowing the temporary use of the undisputed land for a brief duration for the performance of a symbolic puja would not constitute a violation of the status quo. He said the requirement of status quo pertained only to the ‘disputed land’. Well, he keeps such a company. What more can we expect from him? He argued forcefully that a symbolic round of puja, with 300 to 400 sadhus participating and kar sevaks being allowed to watch from a distance without actually entering the land, could be considered. The Supreme Court unceremoniously rejected that contention. He said: "I was doing it as a friend of the Court,amicus curiae". The Supreme Court, the three-judge bench, ordered that no part of the acquired land shall be handed over to anyone by the Central Government. It added that the same shall be retained and no part will be allowed to be used for any other purpose till further orders.
"We direct that on 67.703 acres of land located on plot no. 159/60 in village Ramchandrapuram vested in the Central Government, no religious activity of any nature by anyone, including bhumi puja,shila puja, and shila daan shall be allowed till further orders. "
Since the contention was that it does not relate to undisputed land, the Supreme Court clarified the position. I would like to quote it:
"In the meantime, we direct that on this 67.703 acres of land located in revenue plot nos. 159 and 160 in village Kot Ramchandra, as well as and including the land described in the schedule to the Acquisition of Certain Area at Ayodhya Act, 1993 (Act No. 33/1993), which is vested in the Central Government, no religious activity of any kind by anyone, either symbolic or actual, including bhumi puja or shila puja shall be permitted or allowed to take place."
This is the Order which the Government of India wants to get vacated. For what purpose? What is the objective behind it? They say: "We are not asking for disputed land". If it is vacated tomorrow, what the Government will do? It does not belong to the Central Government either. What will the UP Government do? To whom will it hand over? You are not asking for 2.77 acres of land – that mercy has been shown – where the mosque was there and wantonly demolished. You want the other portion. What for? Is it to make construction, construction of the temple? It has been their case all along that Sanctum Sanctorum will be at the same spot where the mosque was. You cannot construct it there. Anyway, nobody is claiming that, unless the matter is finally adjudicated. What is the purpose behind it? What is the interest of the Central Government in it?
Deliberately, a wrong impression is being given throughout the country saying that the Supreme Court made an order only to prevent the risk of disturbance that was there at that time; otherwise the Supreme Court would not have done it. It is further said that now there is peace - peace of the graveyard - and there is no trouble; there is no apprehension and, therefore, they can give the land to those people. They shall make it over to whom? Shall they make it over to the Nyas or to the VHP or to the Bajrang Dal? To whom will it be made over? By whom will it be done? This is why our anxiety is there. Our anxiety is about this - a part of the Hindutva that they have found out very handy and very useful because Gujarat has shown to them that this is where they can only score. If I read a few lines from an article as part of my submission from theFrontline,it would be clear. It is from the February 28th issue. I quote:
"Having realised the efficacy of the Hindutva card yet again in Gujarat, the Bharatiya Janata Party has shed all its inhibitions on the contentious Ram Temple issue in Ayodhya. Obviously with an eye on the coming elections in several States this year, possibly followed by early Lok Sabha polls, the party is all set to revive the issue in league with the Vishwa Hindu Parishad."That is why, I said that this is the link they have. This is their intention of making this application before the court. The purpose of making this application is to continue with their only agenda that they have. They rely on the agenda of Hindutva.
Well, our good friends, the allies of the BJP Government, your conscience is not disturbed. What can you do? You stand up and say every time that you are only concerned with the National Agenda for Governance. I do not know whether to sympathise with you or feel pity for you. But I feel for the country’s future. What is going to happen to the country? Who will bother for you? They have said that for the Assembly elections in Rajasthan, you people do not count; for elections in Madhya Pradesh, you people do not count. Nobody counts to them. They do not bother whether you remain with them or go out. Where will you go? You have tasted the blood. You have tasted a very sweet blood. This is a Government of give and take. You people have got all the benefits and more material benefits than anything else, not temporal benefits but you are trying to give them temporal support! Some educated people like Dr. Sengupta are remaining there and have become uneducated. He is very eager to find out corruption in West Bengal. Dr. Sengupta, you do not find out that corruption is here. It is a country of scams. You are supporting this Government of scams. Is this not political corruption? Is this not a moral corruption to go to the court on this issue? It does not disturb you because you have sold out your conscience if there was any.… (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA (CONTAI): I strongly protest it.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I said that it is political corruption. I have not said that it is financial corruption. People of the country know about it. I need not say about it. It is a question of political and moral corruption. Dr. Vijay Kumar Malhotra is not with me. I feel very upset. If he agrees with me, then, there is some problem.… (Interruptions)
DR. VIJAY KUMAR MALHOTRA : Going to court is the Fundamental Right of everybody in the country. How can you object to going to the court?
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I will come to that. It is a very good thing. We are reminded that it is the Fundamental Right of every citizen to go to court. The Fundamental Right is only to go to the Supreme Court under Article 32 and nowhere else! The Fundamental Right is to go to the Supreme Court under Article 32 and not to go to any other court. However, the Government has gone to court. I only ask you one question. What was the necessity? One day, the Government wakes up and says: "Let us go to court." It is not like Shri Arun Jaitley. Shri Arun Jaitley goes to the court to earn money. Why has the Government gone to the court on this issue? It is with some objective in mind. Rightly, I am told that he has recently got the sanman for paying his taxes.
DR. NITISH SENGUPTA : Any interested party can always go to court and ask for expeditious hearing. … (Interruptions)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Of course, in his anxiety to get their favour, he has said that the Government is an interested party. … (Interruptions) Yes; the Government is an interested party in this dispute. That is our submission. … (Interruptions) They have neither any sense nor conscience. Therefore, you can rely on them. … (Interruptions) You are there as a bonded labour. Carry on. … (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA : Mr. Speaker, Sir, this is all unnecessary.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Then, why have you criticised us unnecessarily?
DR. NITISH SENGUPTA : No; I only mentioned the speech made by the present Chief Minister. … (Interruptions) I only mentioned the speech made by one of our colleagues, a sitting Member of this House. … (Interruptions)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Sir, we are not discussing about West Bengal here. … (Interruptions) You are part of the Government. Do not forget that. … (Interruptions) You have been removed. You wanted to become a Minister, you could not get a Ministry. … (Interruptions)
Mr. Speaker, Sir, this is our question. Suddenly, one day somebody wakes up and goes to court. Everybody goes to court not for just pleasure. It is not a pleasure trip to go to the Supreme Court. We go there to make some application, not to see the gardens there, not to see the Chief Justice’s Court. It is a beautiful building we are all proud of. I have also made some money sometimes there.
SHRI PRAKASH PARANJPE (THANE): You made money without giving justice.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I do not have to give to justice. I can only seek justice. … (Interruptions)Sir, hold some classes for them.
Sir, this Government is clearly acting in tandem with the VHP, with Sankaracharyas and with the Dharma Sansad. What is happening now? Kindly see the date. February 22 is the date for Dharma Sansad. Now, our good Prime Minister is shivering. Earlier he used to stand up against them. Now, they are regular visitors to 7, Race Course Road. Of course, they have a right to go and he has a right to invite.
SHRI RAMDAS ATHAWALE (PANDHARPUR): They are going there to convince the Prime Minister.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : No; not to convince him. They are saying: "Either you toe our line; otherwise you go." This was the message given. Naturally he has to fall in their position. In Goa, Manali and whenever he goes outside, he had his musings. … (Interruptions)
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : मैं सोमनाथ चटर्जी जी से एक ही बात जानना चाहता हूं। अभी आपने एक पत्रिका में से पढ़ कर सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के बारे में भी आपने पढ़ कर सुनाया। आपने यह भी कहा कि राजनीतिक भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन इस समस्या का निदान कैसे होगा, इस बारे में वे कुछ नहीं बोलते हैं, केवल भूमिका बांध रहे हैं। आप इस बारे में बताइए कि क्या करना है और कैसे करना है।
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Thank you, Prabhunath Ji. I have almost finished my speech. If you had waited for five minutes more, you would have found.
Sir, therefore, our concern is, the very serious question of maintaining the secular structure of this country is at stake. What has happened in Gujarat? We have been reminded of the Prime Minister taking the trouble of going to Gujarat – Shri Mulayam Singh Yadav also has mentioned that – to claim a great success of the present Chief Minister there on the dead bodies of the innocent people. That has now been targeted. That is why, Shri Advani says: "We are not apologetic about it; this is our card, agenda."
Therefore, they are working in tandem with the demand that was made by Dharma Sansad. The Dharma Sansad has given warnings. The VHP now says that they are the self-appointed representatives of Hindus; 85 per cent of the people of this country are Hindus. Who has appointed them? There has been no referendum. They say, ‘we are Hindus’, as if they have the monopoly of Hindus.
Today, we heard from Shri Vinay Katiyar all sorts of his knowledge about Hinduism. He is a very good friend of ours. He is a very nice person. In the Lobby, he is an embodiment of civility and affection. We like him. I like him very much. He is in my Committee. He is very helpful. I make an open commitment to that admission. Shri Pawan Kumar Bansal would also agree.
We are saying that this is the Government’s policy. Now, BJP’s – the main party - decision is to jettison the NAG and to come to the BJP’s card. Therefore, it is a part of that game. It is a part of that decision. This application has been made to keep Dharam Sansad people happy and the Vishva Hindu Parishad happy. What more can you do? It is very easy to say: "Here is the Supreme Court which is standing in our way. Therefore, I have gone to the Supreme Court. How can you blame me if I go to the Court?" But see the sinister objective behind it. The diabolical method that they have adopted is to try to get, if possible, a judicial sanction. And if judicial sanction is not given, that will be an answer to Dharam Sansad, and Shri Vajpayee’s intent is shown for the time being until something happens. Therefore our solution is very clear.
श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) :सॉल्यूशन बताइए।
श्री सोमनाथ चटर्जी : मैंने सॉल्यूशन ठीक बताया है और इसका सॉल्यूशन एक ही है। Shri Vajpayee has been repeatedly saying it. It is now changing. That is why we are opposing. The solution is: ‘either by negotiation or by final judicial determination’. We are saying nothing else. … (Interruptions)
I find there is glee over there. ‘Determination’ does not mean an ad interim order. Determination should be on the main question whether one likes it or not. Whether my friends in the BJP like it or not, the main issue is whether there was a temple or there was a mosque or the mosque was built by demolishing a temple. The destruction of the mosque is not disputed. Whether you call it a dhancha or not, it does not matter. But was that structure, which you call dhancha and we call it a mosque, destroyed? Before that, was there any temple? This is the issue.
The matter is being heard, I am told, almost daily. A lot of witnesses have given their evidence. So far as I know, those who are in favour of the existence of the mosque have already given their evidence. Those who contend otherwise are now giving evidence. The matter will be decided. Subject to correction, it is being heard almost daily or at a regular periodicity. Then, what has happened suddenly except the DharamSansad, except the VHP’s outburst and except the result of the Gujarat election, which has given them a new card. They are openly saying, the President of the BJP is openly saying: "Yes, our card - election plank - is Hindutva,Hindutva and Hindutva. Then, why should I not say that?"
Therefore, as my friend very justifiably asked: "What is our suggestion?" Now, our suggestion is: "Let us behave in a civilised manner." The Supreme Court of India has given its decision. It says: "You wait till the final adjudication. The final adjudication is being processed. Therefore, let us wait until all parties say and not some self-appointed leaders or self-appointed representatives suddenly say: "We will represent."
Kindly consider. I will take only one more minute. From 1994 to 2002, there was no trouble until that demand was made for ""shilapoojan"". From March, 2002, there was no trouble until this DharamSansad made a demand: "New elections in different States are coming near. Utilise thisvatavaran. Utilise the new concept. You have got, what you call,Moditva or Hindutva. Now, follow that. Therefore, forget these small fries. They are good for Delhi. They are useless for Madhya Pradesh, Rajasthan and other States where the elections will be held. They do not matter." Therefore, our opposition is for the purpose of keeping this country united.
We shall continue to go on pressing for this and we shall continue fighting against these people who want to divide the country on the basis of religion. The people of this country will never accept that division and I demand that the Government should withdraw that petition.
SHRI K. YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Hon. Speaker Sir, this issue of Ayodhaya was discussed on the floor of this House many times. The TDP, from the beginning, is fighting for secularism. The Government should not deviate from the Common Minimum Programme. Whenever there is an objection to secularism or there is any deviation from the CMP, we make our voice heard on the floor of the House and even outside the Parliament also.
The whole country knows about the philosophy of TDP, about the secular fabric of this country. After this petition was filed by the Government of India in the Supreme Court, media persons asked my Chief Minister about that. He said, ‘I do not know how they filed the petition in the Supreme Court of India. We are not part of the Government. We are not part of the NDA. We are extending our support from outside basing on the Common Minimum Programme.’ In this present scenario, immediately I reacted to it and it came in the newspapers also. I asked why have they approached the court. My philosophy is that we have a lot of faith in the courts, we abide by the Constitution of India, the rule of law. I told them that several times so many organisations are talking above the Constitution, the rule of the law. Sometimes, some organisations have said that even if the court delivers the judgement, they would not accept the judgement. This is above the rule of law. No Government will accept it.
Even last year, in the month of March, we discussed about the issue of Shilanayas. The whole House appreciated the Government. At that time, they had taken the stand and they prevented the Kar Sewaks to enter the disputed side. We appreciated this even on the floor of the House. Even the hon. Prime Minister and hon. Deputy Prime Minister categorically said, ‘we should abide by the Constitution of India, the rule of law’. Shri Somnath Chatterjee just mentioned about the letter written to Shrimati Sonia Gandhi. That is the philosophy of the NDA Government. The BJP may have its own agenda, the TDP has its own agenda. At the time of Twelfth Lok Sabha elections, we contested against each other. It all depends upon the circumstances. We had to avoid further elections at that time that is why we are supporting this Government from outside. Even we contested the Thirteen Lok Sabha elections against each other on seat sharing basis, but with certain conditions that all these contentious issues will not be incorporated in the Common Minimum Programme. With that binding only the TDP extended the support to NDA Government. As and when it deviates from the CMP, we make our voice heard as a political party extending support from outside. We are doing our job, the whole country knows this.
In Andhra Pradesh, since 1995, not a single riot has taken place. Even after the incidents of Gujarat, what happened in the country the entire House knows, so many States had communal riots but not in Andhra Pradesh. We are preventing these things to maintain peace.
In the present situation, we told them that the Government has failed, the religious leaders have failed, even the organisations have failed to come to an understanding to settle this issue. Even Shankracharya also tried his level best to solve this issue but he could not succeed in his efforts. That is why, all the issues are pending in the courts. Some issues are pending in the Allahabad High Court and some in the Supreme Court.
At this crucial juncture I am requesting all the political parties, as we, the Members of Parliament, have taken oath to abide by the Constitution, let us not divide the country on this issue. The country is one.
We do not belong to one religion. We belong to all the religions, and we can live harmoniously. The population of one religion may be 80 per cent, and population of another religion may be five per cent, even then, we can live harmoniously. Our country is a secular country. We have taken oath on the floor of the House as per the Constitution. We have to respect the Constitution. We respect all religions in this Country. Our forefathers have given us this Constitution. That is why, TDP has faith on the Apex court. Many issues are pending in the court. Even the Government approached the court but the court did not give any verdict on the Government’s petition. The court will take all the circumstances into consideration before giving a verdict. The Government appeared before the Court. Even I appeared before the Court. Before the court of law everybody is equal. So, do not worry about this.
Shri Somnath Chatterjee and all other hon. Members have requested the Government to expedite the matter. I was present. Madam Gandhi was also present. We had request the Government to expedite the case and see that an amicable solution is found out which is acceptable to all. So, the court will take cognisance of all these issues namely the full bench judgement of 1994 regarding the title etc. So, the whole country knows about it. That is why on behalf of my Telugu Desam Party I also raise this issue on the floor of this House. Sometimes the hon. Speaker gave a ruling by stating that this matter is sub judice. But on the issue of Ayodhya so many cases are pending, and every year we are discussing this issue. I know there is an urgency. But at this crucial juncture, no political party should take advantage of this situation. From the beginning TDP is telling that the religion should not be taken advantage of by any political party, be it the BJP, the Congress or any other party. That is why we have to abide by the court’s verdict. We have to follow the court’s verdict. If the court verdict comes, and if we do not accept it, then that is wrong. The Government should obey and accept the verdict.
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : It is very good you are telling. Will you on the floor accept the statement made by the Prime Minister in Himachal Pradesh? Do you accept?
SHRI K. YERRANNAIDU : Shri Priya Ranjan Dasmunsi, so many people are talking every day, every minute. I need not have to give answer.… (Interruptions)
I belong to one political party. The whole country knows about the philosophy of TDP. If an organisation or a person talks against our Party that does not mean I have to keep on giving answers to them everyday.
Finally, the Government of India, the constitutionally elected State Governments will take everything into consideration before taking a decision. If court gives an order against any organisation, how can that organisation come into the picture? The Government will take steps. We would not keep quiet. The Government is supreme. The Government shall act according to the verdict of the court and not beyond that or otherwise by mutual agreement. If both parties sit together and comes to a consensus or an understanding, we will accept that.
There are only two solutions to the Ayodhya issue and there is no third solution. Up to that all the political parties should respect the verdict of the court. We should not talk about Ayodhya; we should not talk about religion if we have faith in secularism.
Thank you, Sir. Thank you very much.
MR. SPEAKER: We extend the time of the House till the debate is over which includes the reply by the hon. Minister with the consent of the Members.
श्री राजो सिंह (बेगूसराय):अध्यक्ष महोदय, आप समय फिक्स कर दीजिए, नहीं तो यह बहुत समय तक चलता रहेगा।
श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) :अध्यक्ष महोदय, हिंदुस्तान में अयोध्या में प्रभु रामचंद्र जी का जन्म हुआ था, इसलिए अयोध्या एक तीर्थ क्षेत्र बन गया। ईसा मसीह का जन्म बैथलेहम में हुआ था। भगवान महावीर का जन्म वैशाली में हुआ था।
18.00 hrs. बुद्ध का जन्म लुम्बिनी, नेपाल में हुआ था। …( व्यवधान)अध्यक्ष महोदय, यह हमारी श्रद्धा है लेकिन श्रद्धा ही नहीं बल्कि इस संबंध में मैं कुछ साक्ष्य रखना चाहता हूँ क्योंकि इतिहास सुबूतों पर आधारित होता है। लोकशाही ने हमें अपने धर्म के प्रति श्रद्धा रखने का अधिकार दिया है। श्री एच.आर.नेवेल नाम के ब्रटिश आई.ए.एस. अधिकारी ने लखनऊ गैज़ेटियर में लिखा है कि वहां प्रभु रामचन्द्र का मंदिर था। १५२८ में उस मंदिर को तोड़कर बाबरी ढांचा बनाया गया। वह उन्होंने कहा था, किसी हिन्दुस्तानी आदमी ने नहीं कहा था। वहां से लेकर अब तक संघर्ष जारी है। इस पर १ लाख ७९ हजार लोगों ने अभी तक बलिदान किया है।
अयोध्या से छ: किलोमीटर दूर देवीनाथ पांडे नाम का व्यक्ति रहता था। उसने ७० हजार की सेना साथ में ली और मीर बाकी के साथ संघर्ष किया। उसमें वह मारे गए और पांच दिन तक वह लड़ाई चली। उसके बाद ८० हजार की सेना महावत सिंह लेकर आए।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : प्लीज़ आप लोग बैठिये। आप लोग आपस में बातें मत करिये।
श्री मोहन रावले : महावत सिंह ८० हजार की सेना लाए। …( व्यवधान)
श्री सईदुज्जमा:अध्यक्ष महोदय, आपने कहा था कि प्रधान मंत्री के स्टेटमेंट और कोर्ट में सरकार के जाने के बारे में बात होगी। यहां किस युग की बात की जा रही है?…( व्यवधान)
इश्यू पर न बोलकर ये मामले को गंभीर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। …( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : ७० हजार की देवीनाथ पांडे की सेना थी और ८० हजार की सेना लेकर महावत सिंह ने मीर बाकी की सेना के साथ लड़ाई की। वे सब लोग मारे गए। बाबर की आत्मकथा तुजकी-बाबरी में यह लिखा गया है। वहां राजा रणविजय और उसकी वीर पत्नी जयकुमारी के नेतृत्व में लड़ाई हुई। २५हजार सेना उनके साथ थी और रानी जयकुमारी ने तीन हजार महिलाओं की पलटन वहां खड़ी की थी। मीर बकी वहां से भाग गया था लेकिन दुर्भाग्य से राजा रणविजय उसमें वीरगति को प्राप्त हुए। रानी जयकुमारी ने पुन: मुगल सेना पर हमला किया। उस वक्त बाबर की मृत्यु हुई थी। रानी जयकुमारी ने दस बार संघर्ष किया और इस संघर्ष का उल्लेख अकबराने दरबारी अकबरी में मिलता है। हुमायूँ के काल में रानी जयकुमारी ने रामजन्मभूमि को मुक्त कराया था और वह दो साल तक उनके कब्ज़े में रही। उसके बाद दिल्ली से सेना मंगाकर रानी जयकुमारी की सेना पर हमला किया गया और रानी जयकुमारी भी वीरगति को प्राप्त हुईं। बाद में सम्राट अकबर के समय हिन्दुओं ने २० बार हमले किये। बाद में अकबर ने मस्जिद में एक चबूतरा बनाकर उसमें प्रभु राम की मूर्ति की स्थापना की और आदेश दिया कि हिन्दुओं द्वारा वहां पूजा अर्चना करने पर किसी तरह की बाधा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने हिन्दू भावनाओं का आदर किया। उसके बाद जहांगीर के राज में पूजा पाठ चलता रहा। बाद में औरंगजेब ने अयोध्या में जो राम चबूतरा था उसको तथा मंदिर को ध्वस्त करने के लिए सेना भेज दी। रात में सरयू नदी पार करने के समय दस हजार साधुओं ने मुगलों के साथ संघर्ष किया। रामदास स्वामी के शिष्य बाबा वैष्णव दास के नेतृत्व में संघर्ष हुआ। ऐसा औरंगजेब ने खुद आलमगीरनामा में उल्लेख किया है। औरंगजेब ने वहां जाकर राम चबूतरा तुड़वा दिया।
प्रभु रामचन्द्र जी का जन्म अयोध्या में एक ही जगह हुआ। दुर्भाग्य की बात है कि जब स्वतंत्रता मिली तब हमारे हिन्दुस्तान में ८२ प्रतिशत हिन्दू थे और तब भी हमें राम मंदिर के लिए संघर्ष करना पड़ता था। हमें ऐसा लगा था जैसे सोमनाथ का मंदिर मोहम्मद गजनी ने तोड़ा था। हमारे हिन्दुओं के तीन हजार मंदिर तोड़े। मस्जिद को भी मोहम्मद गजनी ने तोड़ा था, उसके टुकड़े-टुकड़े किए थे। हिन्दुस्तान में कांग्रेस का राज था और उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधान मंत्री थे और डा. राजेन्द्र प्रसाद जी राष्ट्रपति थे। उन्होंने मंत्रिमंडल की सहमति के बाद उसका पुनर्निर्माण किया और हमें राम मंदिर मिला। उसके बाद उमेश चंद्र पांडेय नाम के एक वकील कोर्ट में गए। उन्होंने २१ जनवरी, ८६ को एक प्रार्थना-पत्र दिया। स्वतंत्रता के बाद मंदिर में ताला लग गया, लेकिन उसके बाद भी १९४९ से पूजा होती थी और कोर्ट के आदेश से होती थी। उस मंदिर में पुजारी पूजा करता था। कोर्ट की अनुमति से वहां पूजा होती थी, लेकिन वह मंदिर खुला नहीं था। एक फरवरी, ८६ को मंदिर खुला। उन्होंने उसका कहना माना और उस वक्त साधु-संतों ने भी दो दिन का अल्टीमेटम दिया था। जिला जज ने वहां ताला खोलने के लिए निर्देश दिया था और यह हुआ था कि पूजा में किसी प्रकार की बाधा नहीं होनी चाहिए। जिस बात के लिए, पूजा स्थल के लिए ३७ साल तक संघर्ष करते रहे और वह १९८६ में खोला गया। आठ दिन में फैसला लिया गया और उसके बाद ताला खुल गया।
महोदय, जब वहां नवाब का राज शुरू हुआ तो अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिम्परा के राजा राजकुमार सिंह ने नवाब के साथ संघर्ष किया और १८५६ और ५७ में इस संघर्ष में सभी राजा तथा रजवाड़े एक हो गए। उन्होंने नवाबी सेना को विध्वंस किया। राम चबूतरे का पुन: निर्माण किया और वहां एक छोटा सा मंदिर बनाया। फैजाबाद जिले के गैजेटियर में इसका वर्णन किया गया है। १८५७ के क्रांति युद्ध में हिन्दू-मुस्लिम के बीच में जो समझदारी की हवा चल रही थी, उसे क्रांन्ति नेता अयोध्या के नवाब अमीर अली को अंग्रेजों के साथ लड़ने के लिए हिन्दू साधु-संतों ने छोटे-छोटे राजाओं तथा रजवाड़ों ने सहयोग दिया था और हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करते हुए अयोध्या के मुसलमानों की तरफ से अमीर अली ने रामजन्म भूमि हिन्दुओं को देकर ३३१ वर्ष पुरानी अपनी गलती दूर की।
मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि इन ऐतिहासिक तथ्यों को ध्यान में रखा जाए और परम्परा, इतिहास, धार्मिक ग्रंथों, शिला खेलों, सिक्खों, मुद्रा, ताम्रपटों, रामायण कालीन अवशेष, राजवाड़ा मंदिर अवशेष, रामजन्म भूमि मंदिर का उल्लेख, तीर्थ क्षेत्र का उल्लेख, रामजन्म भूमि मंदिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद ढांचा बनाने का उल्लेख, मंदिर की मुक्ति के लिए लड़ाई का उल्लेख, विदेशी प्रवासियों द्वारा किए गए वर्णन का उल्लेख, फारसी, हिन्दी और संस्कृत में किए गए उल्लेख को ध्यान में रखना चाहिए। श्रद्धा की भावनाओं के साथ-साथ इन सभी तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए। हिन्दुओं ने मंदिर टूटने के बाद उस स्थान पर पूजा करना कभी नहीं छोड़ा। उसी स्थान पर पुन: मंदिर बनाने के प्रयास सतत् किए जा रहे हैं। हिन्दुस्तान में जो हिन्दू हैं, उनकी भावनाओं का आदर करना चाहिए और वहां जो मंदिर है उसके लिए मैं सभी मुसलमान भाईयों से अपील करता हूं कि वहां कभी भी नमाज़ नहीं पढ़ी गई। मुसलमानों ने यह जगह १९३५ में छोड़ दी थी। उसमें वे नमाज़ भी नहीं पढ़ते थे। इस तथाकथित बाबरी मस्जिद में आवश्यक मीनार भी नहीं है। हाथ-पांव धोने या नमाज से पहले वजू करने के लिए पानी का टेंक भी नही है। जन्म स्थल को कभी कोई बदल नहीं सकता, उनके जन्म स्थान पर ही मंदिर है। हमारी भावनाओं का आदर सभी को करना चाहिए, आज जो चर्चा चल रही है उस चर्चा में मुसलमानों को दिलदार होकर उसका आदर करन चाहिए। मैं साधु-संतों और विपक्ष के सभी माननीय सदस्यों से अपील करता हूं कि वे सदभाव का वातावरण रखें। राव जी जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने कहा था कि हम अयोध्या में, उसी जगह पर बाबरी मस्जिद बनाएंगे।
लेकिन आज पता नहीं कांग्रेस की क्या व्याख्या है ? कुछ दिन पहले यानी २६ फरवरी को हिमाचल प्रदेश में इलैक्शन हुए, उस समय इन्होंने अपनी व्याख्या बदल दी। उन्होंने कहा कि वहां अयोध्या का मंदिर होना चाहिए। मैं पूछना चाहता हूं कि इस बारे में आपकी क्या भावना है ?मैं शिवराज पाटिल जी से और यहां बैठे कांग्रेसी भाइयों से पूछना चाहता हूं कि आपकी इस बारे में क्या राय है?वहां मंदिर बनना चाहिए या नहीं बनना चाहिए ? आपको दोहरी नीति नहीं अपनानी चाहिए। कांग्रेस के भूतपूर्व प्रधान मंत्री…( व्यवधान)
स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी ने वहां जाकर पूजा की थी। उन्होंने इलैक्शन की शुरुआत वहीं से की थी। इसका मतलब यह हुआ कि वह भी मानते थे कि वहां राम मंदिर था। …( व्यवधान)उन्होंने पूजा की थी, यह उस समय के सारे अखबारों में छपा था। …( व्यवधान)अभी तो बेचारे राजीव जी नहीं हैं। वहां शिलान्यास की अनुमति भी उन्होंने ही दी थी। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या आपने वह अनुमति नहीं दी थी ?
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल (कानपुर) मैं प्रतिवर्ष अयोध्या जाकर पूजा करता हूं लेकिन मैं हनुमानगढ़ी में करता हूं। जहां का मामला कोर्ट में लंबित है वहां मैं पूजा नहीं करता हूं। अगर कोर्ट फैसला दे देगी तो वहां भी करूंगा।…( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने मंदिर में जाकर पूजा की थी। वहां राम जी का जन्म हुआ था।…( व्यवधान)
श्री राजो सिंह : स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने पूजा की थी, क्या यह आपने देखा था ? क्या आप उस समय मौजूद थे ? …( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : आप चाहें तो मैं अखबार लाकर दिखा दूंगा। …( व्यवधान)
वहां राजीव गांधी जी गये थे, यह हम साबित कर दें तो क्या आप कहेंगे कि वहां मंदिर होना चाहिए ?आज जैसे आम लोग बोलते हैं, शिवसेना कहती है कि वहां मंदिर होना चाहिए वैसे आप भी कहेंगे कि वहां मंदिर होना चाहिए। …( व्यवधान)क्या आपकी हिम्मत है ? …( व्यवधान)
सरदार बूटा सिंह (जालौर):आप उनसे कहिये कि मैं एक मिनट के लिए कुछ कहना चाहता हूं। …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : रावले जी, आप खड़े रहेंगे या बैठेंगे। वैसे आप चाहें तो खड़े भी रह सकते हैं और बैठ भी सकते हैं। आप बैठेंगे तो मैं उनको बोलने की इजाजत दूंगा।
...( व्यवधान)
सरदार बूटा सिंह : मेरा इतना कहना है कि प्रचार के लिए विश्व हिन्दू परिषद या शिव सेना जो जी में आये, वह कहे लेकिन सच यह है कि राजीव गांधी जी ने उस गली में न कभी पूजा की और न वह उसमें शमिल हुए। …( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : वहां शिलान्यास की अऩुमति किसने दी थी, क्या कांग्रेस सरकार ने नहीं दी थी ? …( व्यवधान)
सरदार बूटा सिंह :जो हुआ है, उसके लिए मैं स्पष्टीकरण देने के लिए तैयार हूं। मगर यह बात गलत है। …( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : वहां कभी नमाज नहीं पढ़ी गयी थी। वहां वजू के लिए होद भी नहीं है। जो लोग मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं, मूर्ति पूजा की अवमानना करते हैं, मेरा उनसे कहना है कि वहां हिन्दुओं का मंदिर होने के चिहन अंकित हैं। बाबर ने हिन्दुओं की भावना का अपमान किया है। बाबरनामा में इसका उल्लेख है। हमारा कहना है कि राम जन्म की एक ही जगह है और इसी जगह पर राम मंदिर बनना चाहिए। यह हिन्दुओं के आत्मगौरव का प्रश्न है। भूतकाल में जो अन्याय हुआ, उसका निराकरण हम करना चाहते हैं।
बाबरनामा में इसका उल्लेख है कि हजरत फजल अब्बास मूसा की इजाजत से मंदिर तोड़कर उसी सामान से वहां मस्जिद बनाई गई और यही इरादा बाबर के सेनापति मीरबाकी का था। …( व्यवधान)
सरदार बूटा सिंह :इतिहास का स्टूडैंट होने के नाते मैंने कोर्स में बाबरनामा पढ़ा है। उसमें कहीं भी अयोध्या का जिक्र नहीं है। …( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : हम आपको बता देंगे कि वह कहां है। …( व्यवधान)
इसमें आश्चर्यजनक बात यह थी कि जब मन्दिर के साहित्य से वे मन्दिर बनाते थे तो दिन भर बनाया गया ढांचा रात को अपने-आप गिर जाता था। मीरबाकी ने यह बात बाबर को लिखकर भेजी थी और बाबर ने स्वयं अयोध्या में आकर इसे अपनी आंखों से देखा था। उसने एक पांच सूत्री मसौदा तैयार किया जिसमें लिखा था कि वहां साधु-संतों को पूजा-पाठ करने की अऩुमति है। उसने खुद यह अनुमति दी थी और उसके सेनापति मीरबाकी ने उसे माना था। मैं एक सवाल सदन से पूछना चाहता हूं कि कांग्रेस के…( व्यवधान)
अघ्यक्ष महोदय : यह प्रश्न काल नहीं है इसलिए आप प्रश्न कैसे पूछ सकते हैं ?
...( व्यवधान)
उनका कहना है कि कोर्ट की बात आप कर रहे हैं।…( व्यवधान)मैं सदन से पूछना चाहता हूं और विशेषत:कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि अगर कोर्ट का वर्डिक्ट ऐसा आ गया कि समझो वहां मन्दिर बनाना है तो क्या आप उसे मानेंगे?
श्री शिवराज वि.पाटील (लातूर) : सर, ये बार-बार हमसे पूछते हैं। मैं इनका जवाब दे दूं। डॉक में आप हैं। हम लोग नहीं हैं। आपको जवाब देना है और हमने कह दिया है कि कोर्ट जो कहेगा, वह सब पर बंधनकारक रहेगा। देश में जितने मन्दिर बनाने हैं, आप बनाइए। एक नहीं हजारों मन्दिर बनाइए लेकिन मन्दिर बनाकर किसी का दिल मत तोड़िए।…( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:अगर आपके फेवर में फैसला नहीं आयातो आप क्या करेंगे?…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : जिन लोगों ने आपसे प्रश्न पूछा है, आप उनका जवाब दीजिए कि कोर्ट का जवाब आपके खिलाफ आएगा तो आप मान्य करेंगे कि नहीं करेंगे?
…( व्यवधान)
श्री प्रियरंजन दासमुंशी: मोहन रावले जी, आप सुनना चाहते थे। हम कोर्ट का आदेश मानेंगे, जो भी फैसला हो लेकिन मैं आपसे आग्रह करना चाहता हूं कि फैसला अगर आपके खिलाफ हुआ तो आप मुम्बई बंद तो नहीं करोगे?…( व्यवधान)
श्री प्रकाश परांजपे : शाहबानो केस का फैसला आने के बाद आपने जो सदन में किया था, हम भी कोर्ट का फैसला यदि खिलाफ आएगा तो वही हम सदन में करेंगे।…( व्यवधान)
श्री मोहन रावले : शाहबानो केस के समय यही वर्डिक्ट आया था और शाहबानो को पैसा देने के लिए कोर्ट ने कहा था लेकिन राजीव गांधी जो तत्कालीन प्रधान मंत्री थे, महिलाएं आकर उनसे मिलीं। एक महिला किसी की बहन होती है, किसी की बेटी होती है औऱ किसी की मां होती है लेकिन तलाक-तलाक कहकर उसका अपमान किया जाता है तलाक दिया जाता है। तो कोर्ट ने ऐसा फैसला शाहबानो के पक्ष में दिया था लेकिन दुर्भाग्य की बात है, जिस राजीव गांधी ने कहा था कि मैं शाहबानो की तरफ से हूं, उसी शाहबानो के केस का वर्डिक्ट इसी सदन ने उल्टा किया।…( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:इसका जवाब भी अभी दे दिया जाए।…( व्यवधान)
श्री प्रकाश परांजपे : आप मुस्लिमों के लिए बहुत बोलते हैं लेकिन एक महिला का आपने अपमान किया। एक महिला को आपने पैरों के नीचे कुचल डाला।…( व्यवधान)
MR. SPEAKER: There should not be any disturbance in the House.
… (Interruptions)
अध्यक्ष महोदय : प्रकाश परांजपे जी, आप बैठिए।
श्री मोहन रावले : हमारे आदरणीय श्री बाला साहैब ठाकरे जी ने साफ-साफ कहा है कि राम मन्दिर बनना चाहिए। शिव सेना के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उद्धव जी ठाकरे जी ने भी कहा है राम मंदिर होना ही चाहिए । बाबर का पक्ष लेने वाले ये कौन होते हैं? …( व्यवधान)
…………….* MR. SPEAKER: It should not go in the record.
… (Interruptions)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : That is the language they are using. … (Interruptions)
* Expunged by ordered by chair MR. SPEAKER: I have removed it from the record.
… (Interruptions)
श्री मोहन रावले : हिन्दुओं के तीन हजार मन्दिर तोड़े गये। तालिबान में बुद्ध मन्दिर तोड़ा गया। किसके कारण मन्दिर तोड़ा गया?
जो प्रवृत्ति थी, जो टेंडेंसी थी, उसी ने राम मंदिर को तोड़ा और उसी टेंडेंसी ने बुद्ध मंदिर को तोड़ा, तब ये लोग नहीं चिल्लाए और इनको कोई दुख नहीं हुआ।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : सुरेश जाधव जी आप क्यों बीच में बोल रहे हैं।
श्री मोहन रावले :, प्रभु रामचन्द्र जी, जो मर्यादा पुरूषोत्तम राम जी के नाम से जाने जाते हैं। वे एक संयमी नेता थे, जिनके लिए सभी लोगों के दिलों में अच्छी भावना है। उनका मंदिर जब तोड़ा गया, तो यह उनके साथ अन्याय हुआ, जबकि वे खुद न्यायी थे, जिनकी पूरी दुनिया में सराहना होती है। जब वह ढांचा तोड़ा गया, तो हिन्दुस्तान में एक ही नेता ऐसा था, जिसने यह कहा कि जिसने भी यह ढांचा तोड़ा है, उसका मैं सम्मान करता हूं। यह नेता हैं शिव सेना प्रमुख माननीय बाला साहेब जी ठाकरे। पोलैंड में जब एक चर्च को तोड़कर उसकी जगह मस्जिद बनाई गई, तो जब वापिस रशिया से उसका कब्जा लिया गया, तो उस मस्जिद को तोड़कर फिर से चर्च बनाया गया। इसी तरह जब हिटलर पहले युद्ध में हार गया था तो जर्मनी के अपमान का प्रतीक एक स्तम्भ फ्रांस में पैरिस में लगाया गया था। लेकिन जैसे ही हिटलर ने दूसरे युद्ध में वहां कब्जा किया तो उस अपमान के प्रतीक स्तम्भ को तुड़वा दिया था। यह स्वाभिमान की बात होती है, आत्म गौरव की बात होती है। इसलिए मैं विनती करना चाहता हूं कि प्रधान मंत्री जी ने जो बयान दिया है, उसका हम समर्थन करते हैं। उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है। कोर्ट में इतना समय जाने के बाद जिसको न्याय नहीं मिला, सात दिन में राम मंदिर खुलवाने के लिए न्याय मिले तो कुछ भी गलत नहीं है। प्रधान मंत्री जी ने कहा कि हम कोर्ट में जाएंगे, तो उन्होंने यह नहीं कहा था कि हम दबाव डालेंगे। लेकिन प्रधान मंत्री जी ने कहा कि कोर्ट का जो भी निर्णय होगा, उसको हम मानेंगे। हम भी उसको मानेंगे। लेकिन क्या आप लोग भी मानेंगे?मैं समाजवादी पार्टी से पूछना चाहता हूं, अभी मुलायम सिंह जी यहां नहीं हैं, क्या वे भी उसको मानेंगे ? इसके साथ ही मैं कम्युनिस्ट पार्टी से, कांग्रेस पार्टी से और बहुजन समाजवादी पार्टी से भी पूछना चाहता हूं कि क्या वे भी इसको मानेंगे ? मैं शिव सेना पार्टी की ओर से कहना चाहता हूं कि वहां मंदिर बनना चाहिए। इतना ही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
MR. SPEAKER: Shri Rashid Alvi will speak now.
Before you start your speech, I have to announce that there are about 20 Members to speak on this issue. Therefore, everybody should speak only for 10 minutes so that we can complete the debate at least by 10 o’clock.
श्री राशिद अलवी (अमरोहा):स्पीकर साहब, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। अयोध्या के विषय पर इस हाउस में यह कोई पहली बार चर्चा नहीं की जा रही है। इस १३वीं लोक सभा के अंदर शायद ही कोई ऐसा सत्र होगा, जिसमें बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि की बात न की गई हो। लेकिन अफसोस की बात है कि उस हाउस के अंदर इतने तमाम डिसकशन के बाद आज तक कोई नतीजा नहीं निकला है।
मैं बहुत तवज्जुम में हूं, जो तकरीरें मैंने सुनी। मैं पहले सोच रहा था कि मुख्तसर अल्फाज में अपनी बात कह दूं, लेकिन तकरीरें सुनने के बाद मेरा मन बदला और मैंने सोचा कि कुछ बातों का जवाब मुझे देना चाहिए। अगर मैं अपनी बात विनय कटियार जी की तरह १५२८ से शुरू करूं, जब बाबरी मस्जिद बनी थी, तब से शुरू करूंगा तो बहुत वक्त लगेगा। १५२८ में बाबरी मस्जिद बनी थी और २२ दिसम्बर, १९४९ के अंदर पहली बार वहां लार्ड राम का स्टेच्यू रखा गया।
अभी मेरे मित्र स्वामी जी चले गये। उन्होंने कहा था कि अगर उस मस्जिद के अंदर कभी भी नमाज पढ़ी गयी हो तो मैं उसी बुनियाद पर मैं फैसला करने को तैयार हूं। मैं १५२८ से न चलकर स्वामी जी की तकरीर से चलता हूं। सन् १९९४ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अंदर जस्टिस भरूचा ने पेज ६८५, पैराग्राफ १०५ पर कहा है क "The dispute structure was used by the Muslims for offering prayers until the night of 22-23 December, 1949."
जस्टिस भरूचा ने कहा कि सन् १९४९ तक बाबरी मस्जिद के अंदर पांचों वक्तों की नमाज होती थी। जो वाकयात हैं वे उसके बाद के वाकयात हैं। इसी जजमेंट का पैराग्राफ ५६ यहां पर पैश किया गया है। अगर मैं उस जजमेंट को पढ़ दूंगा तो बहुत से लोगों को दु:ख होगा। पैराग्राफ ५६ के पेज ६७१ पर कहा गया है क "For the demolition of the Mosque on 6th December, 1992, some miscreants who cannot be identified and equated with the Hindu community and, therefore, the act of vandalism by the miscreants cannot be treated as an act of the entire Hindu community.
A strong reaction against and condemnation by the Hindus of the demolition of the structure in general bears testimony of this fact of reject of the Bhartiya Janata Party at the hustings in the subsequent election in Uttar Pradesh."अध्यक्ष महोदय : इसमें दु:ख की क्या बात है?
श्री राशिद अलवी : सर, मैं १९९४ का जजमेंट पढ़ रहा हूं। इसमें कहा गया है क "The miscreants who demolished the Mosque had no religion, caste or creed, except the character of a criminal."
This is the judgment of 1994. … (Interruptions)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : They are now being tried by the Raebareli Court. … (Interruptions)
SHRI KHARABELA SWAIN (BALASORE): From that point of view, I am also a criminal.
श्री राशिद अलवी : अगर आप क्रिमनल हैं तो बहुत अच्छा है। It is part of the record of this Lok Sabha that you are a criminal. When you yourself are admitting it, what can I do? I am sorry to say this. … (Interruptions)
SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA): You are a Member of this House, so how can you be a criminal?
श्री राशिद अलवी : जो काम सियासतदानों का होता है वह आज सुप्रीमकोर्ट कर रहा है। इस जजमेंट में बार-बार याद दिलाने की कोशिश की गयी है कि सारे मजहब बराबर हैं। हिंदू-मुस्लिम इख्तलाफ की राजनीति नहीं की जा सकती है। गांधी जी के "ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम"को इसमें कोट किया गया है। गुरू गोविंद सिंह जी के कोटेशन की चर्चा के अंदर जाएं, जिसमें कहा गया है कि आप चाहे मंदिर, गुरूद्वारे, मस्जिद या गिरजाघर में जाए, वहां पर सारे लोग भगवान के आगे झुकते हैं, प्रार्थना करते हैं। आज जो काम सियासतदानों का है उसे सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद भी कोई नतीजा नहीं निकल रहा है। हमारे मित्र विनय कटियार जी ने कहा था कि अरब के अंदर पांच सहाबी थे, फ्रैंड थें। उनके मसाजिद को गिराकर वहां सड़क बना दी गयी। मैं विनय कटियार जी आपको बताना चाहता हूं कि १५ दिन पहले मैं सऊदी अरब में था। इस सरकार के मंत्री माननीय शाहनवाज जी भी उस जगह गये। वहां पर जो पांच मसाजिद थीं वे सड़क बनाने के लिए नहीं गिराई गयीं, बल्कि बड़ी मस्जिद बनाने के लिए गिराई गयीं।
श्री विनय कटियार : आपने उस समय भी यह विवाद खड़ा किया था। हमारी बात को आपने ध्यान से नहीं सुना है। मैंने कहा था कि मौलाना रसूल ने सात मस्जिदों का निर्माण कराया था। उनमें से चार मस्जिदें तोड़ी गईं और वहां से हटाई गईं। तीन मस्जिदें आज भी विद्यमान हैं। उस संदर्भ में मैंने कहा था कि अगर वहां पर मौलाना साहब के द्वारा बनाई गई मस्जिद हटाई जा सकती है, तो अयोध्या के अन्दर, जहां पर मंदिर और मस्जिद का विवाद चल रहा है, उसमें मुस्लिम भाइयों को सहयोग करना चाहिए। बाबर तो तातारी था, कोई हिन्दुस्तानी नहीं था। मंगोलियम भी इस देश में नहीं रहते हैं। इसलिए उस संदर्भ में मैंने यह बात कही थी। दूसरी बात जो आपने कही है, वह यह है कि …( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Are you yielding?
SHRI RASHID ALVI : I am not yielding.
अध्यक्ष महोदय : श्री कटियार जी, जब तक आप बैठेंगे नहीं, तब तक वे कैसे बोल सकते हैं।
श्री विनय कटियार : आप वहां हज करने के लिए और यह प्रमाणित हो गया, ऐसा नहीं है। वहां से चार मस्जिदें हटाई गईं और उन चारों मस्जिदों के नाम मैंने गिनाए। उस स्थान पर सड़क चौड़ी करने का काम किया गया। रसूल साहब द्वारा बनाई गई मस्जिदो को हटाया गया…( व्यवधान)
श्री राशिद अलवी : मुझे अपनी बात पूरी करने दीजिए।
अध्यक्ष महोदय : मैंने आपको इजाजत दी है।
SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Are you going to follow any line of the Arabian countries?
श्री राशिद अलवी : मैं यह कहना चाहता हूं, विनय कटियार जी इतिहास को ठीक करें। वे सातों मस्जिदें मो. प्राफिट साहब ने बनाई थीं। मो. प्राफिट साहब जब लड़ाई लड़ने लगे, इतिहास में आता है, वह जंग-ए-औत कहलाता है। …( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : ऐसा नहीं है कि आप मुसलमान हैं, तो ज्यादा जानते हैं और मैं हिन्दू हूं, तो नहीं जानता हूं। मौलाना साहब के सात साथी थे। वहां एक मस्जिद तार के फूस की बनी थी। उसमें पूजा को लेकर युद्ध हुआ और मौलाना साहब दुखी हो गए, तो उन्होंने सातों के लिए अलग मस्जिदें बनवाईं और कहा कि आप जाकर अब नमाज पढि़ए। आप गलत व्याख्या मत करिए।
श्री राशिद अलवी : परेशानी यह है कि हिन्दुइज्म के बारे में जानते हैं और मुस्लिम इतिहास के बारे में भी ज्यादा जानते हैं। जंग-ए-औत की जब लड़ाई लड़ रहे थे, तो कैम्प्स में …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आप किसी का नाम लिए बिना अपनी बात कहिए।
श्री राशिद अलवी : वहां छोटी-छोटी मस्जिदें बनवाई गईं और पूरी दुनिया के लोग नमाज पढ़ने के लिए जाते थे और वे सात जगह नमाज पढ़ते थे। पहले एक मस्जिद में पढ़ते थे और फिर दूसरी जगह पढ़ते थे। उनके स्थान पर एक बड़ी मस्जिद बनाने का काम किया है, ताकि लोग एक जगह नमाज़ पढ़ सकें।
दूसरी बात, विनय कटियार जी, इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती है और सऊदी अरब का हिन्दुस्तान के मुसलमानों को कुछ लेना-देना नहीं है। सऊदी अरब में बादशाहत है और वे जो कुछ करना चाहें, कर सकते हैं।
श्री विनय कटियार : बाबर तो तातारी और हमलावर था …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आपको नाम नहीं लेना है। वैसे विनय कटियार जी ऐसा नहीं कह रहे हैं। He is not saying that you have said it.
...( व्यवधान)
श्री राशिद अलवी : सऊदी अरब के अन्दर डैमोक्रेसी नहीं है, वहां बादशाहत है। बादशाह जो कुछ करना चाहता है, वह कर सकता है। हिन्दुस्तान के मुसलमानों का सऊदी अरब से सिर्फ इतना ताल्लुक है कि वे हज करने जाता है। वहां के सिस्टम से, वहां के बादशाह और तौर-तरीकों से हिन्दुस्तान के मुसलमानों को कुछ लेना-देना नहीं है। मैं बार-बार आपसे कहना चाहता हूं कि आप इस तरह की मिसालें न लोक सभा में दीजिए और न मुसलमानों को दीजिए कि सऊदी अरब में ऐसा हो रहा है और हिन्दुस्तान का मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर रहा है। यह जुबान छोड़ दीजिए कि हिन्दुस्तान में मुसलमान हमारी सरकार के समय में सबसे ज्यादा महफूज है।
अध्यक्ष महोदय : उन्होंने ऐसा नहीं कहा है। आप ऐसा क्यों कह रहे है।
श्री राशिद अलवी : जितना मुल्क विनय कटियार का है, उससे ज्यादा राशिद अलवी का है।
अध्यक्ष महोदय : जो उन्होंने नेहीं कहा है, वह आप क्यों कह रहे हैं।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:हमारे यहां लोकतांत्रिक सिस्टम है।…( व्यवधान)मुसलमान पहले हिन्दुस्तानी है।…( व्यवधान)ऐसी बातें कह कर यह दंगे भड़काने का काम कर रहे हैं। आप हिन्दुस्तान की बात करिए। हिन्दुस्तान का एक-एक मुसलमान और उनके पुरखे हिन्दुस्तान में पैदा हुए हैं। कोई सऊदी अरेबिया में पैदा नहीं हुआ …( व्यवधान)
श्री राशिद अलवी :हमें सऊदी अरेबिया से कोई लेना-देना नहीं है। हिन्दुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है। …( व्यवधान)
SHRI E. AHAMED : Sir, I am on a point of order.
MR. SPEAKER: Shri Rashid Alvi, please take your seat. He is on a point of order.
SHRI E. AHAMED : Sir, I would ask only one question.
MR. SPEAKER: Shri E. Ahamed, you have to quote the rule under which you are raising your point of order.
SHRI E. AHAMED : Sir, when the Prophet of Islam who is deeply respected by more than one billion people, has been misinterpreted by him and the hon. Member is making some wrong impression about him, would it be permissible in the House.… (Interruptions)…I am not speaking about an ordinary man.… (Interruptions)… He is speaking about the Prophet.… (Interruptions)
I would only like to ask that when a Member is misleading the House on historical facts, would it be permissible? This is my question.
Firstly, a Member does not yield to my question; secondly he is bringing up the historical fact incorrectly; and he is misinterpreting it and misleading the House on historical facts. Would it be permissible in the House?… (Interruptions)
MR. SPEAKER: The only remedy is this. Shri Rashid Alvi has been permitted; and while speaking, he can reply to him. There is nothing wrong in it.
श्री विनय कटियार : अध्यक्ष महोदय, मैंने मोहम्मद साहब की कोई चर्चा नहीं की। ऐसा कह कर यह देश को क्या संदेश दे रहे हैं? …( व्यवधान)मैंने मस्जिद के बारे में चर्चा की और पूजा स्थल बनाने के बारे में चर्चा की। यह कोई गलत बात नहीं है। वहां पूजा स्थल बनना चाहिए। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? ऐसी चर्चा करके गलत संदेश जाएगा। …( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:जो इतिहास कहता है उसे मानना पड़ेगा। …( व्यवधान)
MR. SPEAKER: I will not allow any other hon. Member to disturb him till he concludes his speech.
श्री राशिद अलवी :अध्यक्ष महोदय, हिन्दुस्तान ने आजादी बड़ी मुश्किल से हासिल की। सिर्फ मस्जिद और मंदिर के झगड़े से आजादी को गंवाया नहीं जा सकता है। हिन्दुस्तान की आजादी के लिए बुजुर्गों ने अपने जिस्म की रगों में बहने वाले खून को बहाया है और उसके अन्दर हिन्दू और मुसलमान सब शामिल थे। खूनी दरवाजा जो बहादुरशाह जफर मार्ग पर बना है वह इसलिए कहलाता है कि जामा मस्जिद इलाके से बुजुर्गों को लाकर फांसी दी जाती थी।
चूंकि वे हिन्दुस्तान की आजादी चाहते थे। दिल्ली में महरौली के पास कुतुब मीनार के पीछे पेड इस बात का गवाह हैं कि उन लोगों को पकड़ पकड़ कर फांसी पर चढ़ा दिया गया क्योंकि वे हिन्दुस्तान की आजादी चाहते थे। हमारे बुजुर्गों ने हिन्दुस्तान के लिये लड़ाई लड़ी। देवबंद मदरसे के मौलवी मौलाना मोइनुल हसन, मौलाना हसन अहमद मदनी जैसे लोगों की फहरिस्त लबी है लेकिन मौलाना ओबोदुल्लाह सिन्धी , जिनको आज की तारीख में कोई जानता नहीं, रेशमी रूमाल की तहरीक चलाई। वे लोग हिन्दुस्तान की आजादी चाहते थे। वे अंग्रेजों को भगाने में अफगानिस्तान के जंगलों में मारे-मारे फिरते रहे। उन्हें नहीं पता था कि आजाद होने के बाद हिन्दुस्तान दो हिस्सों में बंट जायेगा और मन्दिर-मस्जिद की लड़ाई के अंदर बंट जायेगा। बाबर के बारे में जो गलतफहमी है, वह दूर किये देता हैं। हिन्दुस्तान के मसलमानों को बाबर से कुछ लेना-देना नहीं है। बार बार कहा जा रहा है कि बाबर की औलादें। हिन्दुस्तान के मुसलमाऩों का बाबर से कोई वास्ता नहीं । यदि कटियार जी अपने पैसों से कोई मस्जिद बनवा दें तो वह मस्जिद भी रैस्पैक्टेबल होगा जितनी बाबरी मस्जिद है। मस्जिद मस्जिद रहती है क्योंकि बाबर ने बाबरी मस्जिद बनवाई, यह उस जमाने की थी। अयोध्या या दिल्ली की मस्जिद हो या कहीं की मस्जिद हो, किस ने बनवाई है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बाबर को हिन्दुस्तान के मुसलमानों से केवल इतना लेना है कि उन्होंने और उसकी औलादों ने हिन्दुस्तान के अंदर राज किया। उनके बारे में किसकी क्या राय है, वह अलग हो सकती है। बाबरी मस्जिद डिमौलिशन के बाद संसद के दोनों हाउसेज़ में यूनानिमसली एक रिजोल्यूशन पास किया गया। । इससे मुनासिब मौका और कोई नहीं हो सकता, जब कि मैं दो लाइनें आपके सामने न रख दूं।
"This House strongly and unequivocally condemns the demolition of the Babri Masjid at Ayodhya by and at the instigation of forces represented among others, by VHP, RSS and the Bajrang Dal, which has caused communal violence in the country. Such act of vandalism was carried not only in violation of the orders of the Supreme Court, but amounted to an attack on the secular foundations of our country."
श्री विनय कटियार : मैं उस समय जेल में था…( व्यवधान)
SHRI RASHID ALVI (AMROHA): Sir, I am not yielding. It is not possible for me to yield like this. … (Interruptions)
श्री विनय कटियार : मैं उस समय जेल में ता. मैंने इसे कंडम किया था…( व्यवधान)
श्री राशिद अलवी :कटियार जी, मुझे पांच मिनट बोलने दीजिये । मैं अपनी बात समप्त कर लूं, तब आप बोलियेगा।…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : अध्यक्ष जी, मैं उस समय जेल में था। उस समय हम लोगों को बंद करके यह प्रस्ताव पास किया गया यदि यहां होता तो पूरे विरोध के साथ कहता…( व्यवधान)
अध्यक्ष जी, वी.एच.पी., बजरंग दल का नाम लिया गया है और जिस आधार पर इन पर कांग्रेस गवर्नमेंट ने प्रतिबंध लगाया था लेकिन बाहरी कमीशन ने हमें, वी.एच.पी., आर.एस.एस. और बजरंग दल को मुक्त किया…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : कटियार जी. आप इतना कह सकते थे कि आप जेल में थे, भाषण क्यों करते हैं?
श्री राशिद अलवी : अध्यक्ष जी, यह दोनों हाउसेज का रिजोल्यूशन था।…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : हम इस का विरोध कर रहे हैं…( व्यवधान)हमारे संगठन का नाम जबरदस्ती डाल दें तो मैं इसका विरोध ही करूंगा।
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : This Resolution was passed by the Parliament when the present Prime Minister was in the House. He can ask him to amend that Resolution now. … (Interruptions)
श्री बसुदेव आचार्य :अगर आप जेल में थे तो आपकी पार्टी बी.जे.पी. के बाकी सदस्य तो यहां थे, वे उस समय सहमत थे… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Please sit down.
… (Interruptions)
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, a unanimous Resolution was passed in this House. Why is he opposing it now? … (Interruptions)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : If you want to amend the Resolution, you may ask the Prime Minister to bring an amendment. He was there in the House at that time.… (Interruptions)
श्री विनय कटियार : अदालत ने हमें निर्दोष साबित कर दिया। उसके बाद आपने कमीशन बनाया था, हमने नहीं बनाया। आपने बजरंग दल, आर.एस.एस. का नाम लिया। जब अदालत ने पूरे संगठन को निर्दोष साबित कर दिया तो इनका नाम लेने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। किसी संगठन के पीछे इस तरह से पड़ना उचित नहीं है।
MR. SPEAKER: Your allotted time will be over in two minutes. Please conclude.
… (Interruptions)
SHRI RASHID ALVI : Sir, this is the text of the Resolution which was unanimously passed by both the Houses.… (Interruptions)
श्री बसुदेव आचार्य : क्या उचित नहीं है। वह यूनानीमस रिजोलूशन था।…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : मैं विरोध करता हूं।…( व्यवधान)
श्री बसुदेव आचार्य : आपके प्रधान मंत्री सहमत थे।
श्री राशिद अलवी : मैं उस वक्त मैम्बर नहीं था। लेकिन इस हाउस के ऊपर डिपैंड करता है कि अपने द्वारा पास किये रिजोलूशन को किस तरह से लेता है।
अध्यक्ष महोदय, कल मैंने आज तक चैनल में सरकार के मंत्री श्री शाहनवाज का इंटरव्यू, श्री प्रभु चावला ने लिया, देखा था। कटियार जी, उन्होंने बहुत सारी अच्छी बातें कहीं। श्री शाहनवाज को मैं बड़ा एप्रीशिएट करता हूं वह बहुत अच्छे-अच्छे काम करते हैं। लेकिन मुझे बड़ी तकलीफ हुई जब श्री शाहनवाज ने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद जब सारे मुसलमानों के बारे में इस तरीके की जबान बोलती है तो मेरी गरदन शर्म से झुक जाती है। वह इस सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। वह इंटरव्यू में कह रहे थे कि वी.एच.पी. सारे मुसलमानों के बारे में जिस तरीके के एलीगेशंस लगाती है, मैं उसका जवाब भी नहीं दे सकता हूं, मेरी गरदन शर्म से झुक जाती है। मैं अल्फाज एक्जैक्टली इनवर्टेड कोमाज में नहीं दे सकता, लेकिन उसका मतलब इसी तरीके का था। जो विनय कटियार जी यहां कह रहे हैं, मैं कहना चाहता हूं कि चंद फायदों के लिए इस मुल्क को तोड़ने का काम मत कीजिए। इलैक्शन आते हैं और चले जाते हैं। इक्तदार आता है और बदल जाता है। जो दायें हाथ पर लोग बैठे हैं, ये चालीस साल तक इक्तदार में रहे हैं। लेकिन अपनी गलतियों की वजह से आज ये वहां बैठे हैं। आपको इस देश के लोगों ने इसलिए नहीं चुना था कि आप अलहदा रास्ते पर चलेंगे। आप देश को ठीक करने का काम करेंगे। कभी इक्तदार किसी के लिए परमानैन्ट नहीं होता है। यह देश एक सेक्युलर देश है और इसके सेक्युलरिज्म को अगर हम मजबूत नहीं करेंगे तो हम कांस्टीटयूशन के प्रति वफादार नहीं होंगे। हमारी वफादारी तभी होगी जब इस मुल्क के कांस्टीट््यूशन को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने १५ अगस्त, १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी की मशरिख की जब पहली किरण निकली थी, उससे पहले उन्होंने कहा था कि इस मुल्क के अंदर हिन्दू और मुसलमानों को एक नजर से देखा जायेगा। इस मुल्क के हर आदमी के लिए एक कानून होगा। इस मुल्क में १३-१४ करोड़ मुसलमानों की जो भी तादाद है, उस बड़ी तादाद को नजरअंदाज करके आगे नहीं चला जा सकता।
अध्यक्ष महोदय, प्रेसीडैन्ट एड्रैस में सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला होगा, वह सरकार को मान्य होगा। प्रेसीडैन्ट एड्रैस में कहा गया है कि या तो म्युचुअल एग्रीमैन्ट के साथ कुछ होना चाहिए या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हिसाब से होना चाहिए। वे तमाम लोग, जो इस बात को बोलते हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं मानते, वे इस देश को दोस्त नहीं हो सकते। मैं अपनी पार्टी बी.एस.पी. की तरफ से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, उसे उत्तर प्रदेश की सरकार किसी भी सर्कम्साटांसेज में इम्पलीमैन्ट करेगी। उसके खिलाफ जाने वालों को बख्शा नहीं जायेगा। लेकिन मैं जाति तौर पर, राशिद अलवी की कैपेसिटी में एक मशविरा देना चाहता हूं कि अगर इस मामले को खत्म करना है तो इस देश के अंदर रेफरेंडम करा लीजिए और उसमें मुसलमानों को अलहदा कर दीजिए। अगर मुसलमानों को वोटिंग राइट देंगे तो फिर देश में कम्युनल सिचुएशन हो जायेगी। आप हिन्दुओं के अंदर रेफरेंडम कराकर फैसला करा लीजिए। अगर वे राम मंदिर बनवाना चाहते हैं तो इसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं होगा। …( व्यवधान)मैं यील्ड नहीं कर रहा हूं, आप बैठ जाइये, मेरे बाद बोलिये।
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम एक बात कहना चाहते हैं कि इन्होंने कहा है कि उत्तर प्रदेश की सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अक्षरश: लागू करेगी। अगर सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर बनवाने के संबंध में निर्णय दिया तो इनकी सरकार क्या करेगी और अगर नहीं बनवाने के संबंध में निर्णय दिया तो जब बी.जे.पी. आपसे समर्थन वापस ले लेगी तो उस समय इनकी सरकार क्या करेगी, जरा बताइये।
SHRI RASHID ALVI : I am not yielding.… (Interruptions) Actually, my friend is a very frustrated man. He always creates problem. He is unable to understand what I am saying.
कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पाबंद हैं। अगर यह भी आपकी समझ में नहीं आता है तो आपसे हाथ जोड़ता हूँ।
स्पीकर साहब, इससे ज्यादा मैं कुछ कहना नहीं चाहता हूँ। मैं यही कहना चाहता हूँ कि जो भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला होगा, उस फैसले को हम सबको मानना चाहिए। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
अध्यक्ष महोदय : श्रीमती कृष्णा बोस। उसके बाद श्री देवेगौडा जी बोलेंगे।
SHRIMATI KRISHNA BOSE (JADAVPUR): Mr. Speaker, Sir, I rise to take part in this debate with anguish in my heart. I have been listening to the allegations and counter allegations that went on for a long time. I have listened to the different historical interpretations from different sides, and also the legal squabbles that went on. It hurts when you have to sit through and listen to all this because instead of concentrating on the real problems of our country, we are discussing this. What are the problems? The problems are poverty, illiteracy, and disease. We are frittering away our time on, I do not know, some futile debate. What is the need of the hour now? The need of the hour is to have in our national life, peace, unity, and good sense. We should all see to it that this is prevailed now. However, before I go any further, I would like to reiterate my Party’s stand on this. As part of the NDA, we are bound by the Common Minimum Agenda. Any deviation from that is not acceptable to us. I also reiterate that we renew our commitment to abide by the final verdict of the Court, whatever that verdict be and I can see that all of you are saying that. So, what is the quarrel about? All of you are saying that.
After having said that, I just wanted to raise one or two points. Is this all about a few acres of land and some bricks and mortar or are some real issues involved in it? There are some real issues involved in it. Nobody mentioned it but one real issue is democracy. In democracy, majoritarianism is not defined by religion or by any other thing. Religious majoritarianism is a dangerous thing for any country. Majorities have to be earned and have to be won by good programmes, good governance, and good projects. As a partner of the NDA, I would like to see NDA earn majority that way and not in any other way.
Sir, apart from that, I am a fiercely secular person in public life. But I am also a Hindu - a devout Hindu, I claim, than many other people who are now striding on the stage as Hindus. I have learnt my Hinduism from Swami Vivekanada and from Shri Aurbindo. I would like to remind the House of what they taught us. I am a Hindu and I want you to listen to that. I would quote just two lines from Swami Vivekananda and I would like my colleagues to listen to that carefully. As you know, he said that all religions are true. He spoke about universal religion. He said: I shall go to the Mosque of the Mohammedan. I repeat-
"I shall go to the Mosque of the Mohammedan; I shall enter the Christian’s church and kneel before the crucifix; I shall enter the Buddhist temple where I shall take refuge in Buddha and his law; and I shall go into the forest and sit down in meditation with the Hindu who is trying to see the light which enlightens the heart of everyone."
Sir, this is Hinduism. Hinduism is a very great philosophy. There is no place for hatred there. After reading the Upanishada, the great German philosopher, Schopenhaur said that the Upanishadas would be the solace of his life and it would also be the solace of his death. What a great thing to have been said after reading the Upanishadas! I would, therefore, like all of you to rise to the occasion and condemn any spread of hatred in the name of religion and Hinduism.
Sir, another point that I would like to make is that India has a composite culture. We have seen the rise and fall of many empires, namely the Hindu empire, the Mughal empire and the British empire. What did Shri Aurobindo – whom we all revere – say about this composite culture? I invite all of you to listen to his historical assessment of the Mughal empire. He said and I quote:
"The Mughal empire was a magnificent construction. An immense amount of political genius and talent was employed in its creation and maintenance. It was as splendid, powerful and beneficient and it may be added that in spite of the fanatical zeal of Aurangzeb, it was infinitely more liberal, tolerant in religion than any medieval or contemporary European kingdom or empire and India under the Mughal rule stood high in military and political strength, economic opulence and in the brilliance of its art and culture. "
This quotation is from the "Spirit end Form of Indian Polity" by Shri Aurobindo. This is what he had said. He also wrote another book in defence of Indian art where he said that how worldly he appreciated the beauty and art of the mosques and tombs of India. I am not very sure that he would have been happy with what happened to a particular mosque in our country.
Sir, I am very much concerned that this is a blot to the good name of Hinduism and to the good name of India. We should try somehow to stop this. Let us go back to our real task of fighting poverty, illiteracy and disease. Let us build hundreds of schools and hospitals. I may tell my colleagues on this side that these are the real temples for Shri Rama. He will reside in these temples. He will bless us all. If an edifice is built, the foundation of which will be on bloodshed, on violence and on hatred, then Shri Rama will refuse to live in that temple. This is my view.
Sir, somebody just mentioned about India’s struggle for Independence and reminded us to think about the Satyagraha under Mahatma Gandhi, to think about the Indian National Army under Netaji Subhas Bose. The Hindus, the Muslims, the Sikhs and the Christians, all rose to an ideal to liberate India from the foreign rule and they all were fighting together shoulder to shoulder. Their sacrifice should not go in vain. We have inherited that Independence from them. We must remember that all of us – the Hindus, the Muslims, the Sikhs and the Christians – would have to live in India. There is no point in quarrelling on such a poisonous sort of a conflict all the time. I would like to call upon all of you in the name of Mahatma Gandhi and in the name of Netaji Subhas Bose to rise above this petty thing and think of India. India has a great potential. We would be one of the great economic powers soon. Let us rise above this and think of a greater and bigger vision for India. Mr. Speaker, Sir, I have done.
19.00 hrs. SHRI H.D. DEVE GOWDA (KANAKPURA): Mr. Speaker, I do not wish to take much time of the House. You have fixed ten minutes for me and I will try to conclude my speech within the time allotted to me.
This issue arose because the hon. Law Minister approached the Supreme Court for vacation of the stay order on the undisputed land. Otherwise, this issue would not have been taken up for discussion in this House today. Time and again we are going on discussing the Ayodhya issue, several Members have mentioned. The only reason why this has come up today is because the Government itself has gone before the Supreme Court asking it to vacate the stay on the undisputed land and that is the bone of contention now.
I would like to go back to what the hon. Prime Minister himself said in this House sometime back. I have much respect for him; he is an elderly Parliamentarian; we have got high respect for him. The Prime Minister is the Prime Minister, whether you agree or not. He is the Prime Minister of the nation. In the very same House what he has said shows who is going to now betray or break the promise made to the nation through this House. He has said:
"Many issues have been raised. The Leader of the Opposition and other Members have levelled charges that the Ruling Party has some hidden agenda. I do not know what they want to say. Our agenda is open and clear. It is a national agenda and we are committed to it. We are not concerned with any other agenda. Till this Government is in power and I am the Prime Minister, I assure you that the Government will function according to the national agenda only."
I do not go beyond that. That is why I said that he is the Prime Minister of the nation.
I am not going to quarrel on political considerations. There is no dispute on that. When he has given an assurance through this House to the whole nation, he has to adhere to the promise that he has made. That is what I would like to press here now. What made him or his Government to approach the Supreme Court to vacate the stay order on the undisputed land?
There was the Gujarat incident. In fact, on 28th February last year when I came here in a by-election, on the very same day, this unhappy incident took place in Gujarat. Subsequently a number of statements have been made on several occasions both by the Prime Minister and the Deputy Prime Minister. I do not want to go on reading those statements. Today if anybody wants to go through the statements without mixing politics, it is not going to bring any credit to the Government – let me honestly speak this out. You may rule for another one and a half years because in NDA, some of our friends are helpless. I can understand their political compulsions and there is no question of disrespecting them. There are so many compulsions. You may rule, as I said, for another one and a half years. Do not be under the impression that every State has got Narendra Modis and every State has got Sabarmati-like train incidents. This is a great country and it would take all these things in its stride. I am not bothered about it.
The moot point is that today the Prime Minister is sandwiched between some of the organisations which my friends have mentioned. I do not want to take their names. We have elaborately discussed about them when the discussion on Gujarat situation took place. On the 21st and 22nd of this month, Dharam Sansad was scheduled to meet. Before that the Government of India approached the Supreme Court. We can understand its compulsion.
What are the utterances by the various leaders of the RSS, the Vishwa Hindu Parishad and the Bajrang Dal after the Gujarat elections? Ultimately, the Prime Minister was forced to ask his Cabinet colleague to approach the Supreme Court. He did not do it without the knowledge of the Prime Minister. Is this going to be an issue which helps the Prime Minister? The credibility and respectability which he has earned as Mr. Vajpayee in the last 50 years and as the Leader of Opposition are torn into pieces today. This office is not permanent. I have highest regard for him, for his age and for his service to the nation as the Leader of Opposition. He has led several delegations on behalf of this country when Pandit Nehru and when Shrimati Indira Gandhi were there. I have got highest regard for him. But today, he wants to break his promise which he has given to the nation through this House. I am sorry for this. He may complete his full term of one-and-a-half years more or let him come to power for another term also. I am not a competitor. I know my strength. But this promise is made by the Prime Minister of the country.
What is the national agenda of the Government? You have declared it. Why do you want to break it? If you have urged the court for speedy disposal, we have no objection. Ultimately, we have to accept whatever decision will be given by the court. Nobody is going to dispute it. But why do you want to create this problem? Even after the assurance made by the other contending parties, we will accept whatever decision is given by the court. What made you people to go before the Supreme Court? It is because you have some political mileage in Gujarat. That made you to go before the Supreme Court.
19.07 hrs. (Mr. Deputy-Speaker in the Chair) Do not be under the impression that this country is going to fall in line with Gujarat. Each State has got its own political set up. The popular votes which you have got with your NDA agenda come to about 23 per cent. The BJP has got only 23 per cent votes. Almost all our friends know this and there is nothing new about it. Today, if you want to take advantage of the political equations in various States and dump the NDA partners, a time will come when they will rise and revolt. They are ready to settle their politics. I have got firm belief in some of my friends who worked with me. I do not want to make a lengthy speech.
I request the hon. Prime Minister to think on this issue. Even today, I have got faith that the Prime Minister will realise the mistake they have committed and will withdraw the application moved before the Supreme Court for the vacation of the undisputed land.
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:उपाध्यक्ष महोदय, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। दो बजे से इंतजार करते-करते …( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हमें अध्यक्ष जी ने कहा था कि श्री देवेगौड़ा जी के बाद हमारा नम्बर है। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : अध्यक्ष जी के हाथ का लिखा हुआ मैंने पढ़ा है।
...( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: उपाध्यक्ष महोदय, जिस अयोध्या के मुद्दे पर आज चर्चा हो रही है। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपके ऐसा बोलने से मेरे जजमैंट में थोड़ा रिफलेक्शन होता है। आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। यदि आपका नाम होता तो क्या मैं इनको फ्लोर दे दूंगा?आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए।
...( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : अब आपको हर बात पर गुस्सा आ जाये तो इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है। …( व्यवधान)अध्यक्ष जी ने जो कहा था, मैंने वही कहा है। अब इसमें गुस्सा होने की क्या बात है ? …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : गुस्से की बात नहीं है।
...( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : आपको इस तरह से गुस्सा आता रहेगा तब तो चकित्सक को दिखाना चाहिए। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : यह ठीक नही है। आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए।
...( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: इस चर्चा की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि हममारी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह अनुरोध किया,…( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : जब पार्टी की संख्या के हिसाब से भी चलें तो आप देख लीजिए कि हमारा नम्बर छूट गया है। समता पार्टा का नम्बर छूट गया है। आखिर किसी नॉम्र्स पर तो चलिएगा। आपको गुस्सा आता है तो सदस्यों को भी आ सकता है। यहां पर आप सदस्यों की संख्या देख लीजिए और समता पार्टी से कम सदस्यों को बुलवाया गया है कि नहीं। आखिर यह क्या है? …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : मैं तो डेढ़ घंटा पहले बैठा था और फिर अभी आया हूं।
श्री प्रभुनाथ सिंह : आपको गुस्सा आता है तो सदस्य तो बैठे रहते हैं, उनको भी गुस्सा आ सकता है। हमने कौन सा अपराध कर दिया?…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : अगर मैंने इनको बुलाया है तो भी क्या आपका ऐसा बोलना ठीक है? Is it not a reflection that I have discriminated against you?
…( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: इस बहस की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि अयोध्या मुद्दे पर बहस कराने की सरकार ने सुप्राम कोर्ट में यह अर्जी लगाई कि विवादित भूमि पर स्टेटस-को की जो स्थिति है, उसको समाप्त कर दिया जाए। इस तरह की अर्जी लगाने की क्या आवश्यकता थी? किन परिस्थितियों में यह रिक्वेस्ट कोर्ट से की गई? हमारे बहुत सारे मित्र कल तक यह कहते थे कि कोर्ट में अर्जी लगाई गई कि जल्दी से जल्दी फैसला किया जाए तोक्या इस तरह की अर्जी लगाना कोई पाप था? मामला जल्दी निपटे और जल्दी फैसला आए, इससे किसी को कोई गुरेज नहीं हो सकता। कांग्रेस भी यही चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट से और हाइकोर्ट से अयोध्या के मामले पर जल्दी से जल्दी फैसला आ जाए लेकिन देश को गुमराह करने वाली बातें जब कही जाती हैं और इस बात को छिपाया गया कि प्रतिबंधित भूमि पर स्टेटस-को को समाप्त करने के लिए अर्जी लगाई गई और इस बात को छिपाकर केवल इतना हिस्सा कहा गया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह कहने के लिए गई कि जल्दी से जल्दी इस मामले पर फैसला किया जाए और इस केस को एक्सपेडाइट किया जाए। आज हमारे बहुत सारे साथियों ने यह स्वीकार किया और इस मुद्दे पर बहस की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि सरकार ने यह कहा कि इस मामले पर जो प्रतिबंधित भूमि है, उसके स्टेटस-को को समाप्त कर दिया जाए। हालांकि हम समझते हैं कि सरकार जिस तरह से दबाव में है, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और आरएसएस का जो दबाब सरकार के ऊपर ह तथा हिमाचल प्रदेश में आसन्न हार के खतरे का दबाब सरकार के ऊपर है। इन सारी चीजों ने मिलकर सरकार को मजबूर किया कि एक असंवैधानिक कदम सुप्रीम कोर्ट के पास जाकर सरकार ने उठाने की कोशिश की। इस संबंध में सोमनाथ दादा ने बहुत कुछ कहा है और खासकर जयपाल रेड्डी साहब ने अपना पूरा लेक्चर ही उसी संवैधानिक पहलुओं के ऊपर दे दिया।…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : फिर तो आपको बोलने की जरूरत नहीं है।…( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:बोलने की जरूरत है क्योंकि विनय कटियार जी और आप लोग भी बहुत सारी बातें ऐसी-ऐसी बोलते हैं, जैसे आज आपने उठाया और आज तो आपने कम उठाया। जहां हिन्दू भाइयों का समूह होता है वहां बड़े फख्र के साथ कहते हैं कि सऊदी अरब में ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि भारत के मुसलमान सऊदी अरब से माइग्रेट होकर आए हैं।
कटियार साहब शत-प्रतिशत भारत का मुसलमान और उसके पुरखे भारतवर्ष में पैदा हुए हैं, किसी दूसरे देश में पैदा नहीं हुए हैं। आप इस तरह से हिन्दुओं के बीच में चर्चा करते हैं कि सऊदी अरब में, अफगानिस्तान में, कतर में और फलां देश में ऐसा होता है, इसका क्या मतलब है ? मैं अपने मित्र को बधाई दूंगा, जिन्होंने स्थिति को बहुत साफ किया।…( व्यवधान) वे भाग जाएंगे तो उत्तर प्रदेश में आपकी सरकार चली जाएगी और यहां भी खतरे पड़ जाएगी। वे यहीं कहीं कोने में बैठे होंगे। इस तरह की बातों को कहकर हिन्दुओं को जो गुमराह करने की कोशिश की जाती है, उसका कुछ न कुछ खुलासा तो होता ही रहना चाहिए। हमारे देश में दुर्भाग्य है कि जिस पार्टी की सरकार है, उसकी हमदर्दी ऐसे लोगों के साथ है। मैं कहता हूं कि यह नूरा कुश्ती लड़ते रहते हैं। १९९९ का चुनाव हुआ, तो अयोध्या इश्यू से कोई मतलब नहीं था। वहां मंदिर बनाएंगे या नहीं, इससे इनका कोई ताल्लुक नहीं था। उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव जैसे ही आहूत होने को हुए, अयोध्या में शिलादान का आयोजन शुरू हो गया। कभी हमने सुना भी नहीं था कि शिलादान कार्यक्रम भी होता है। लेकिन हमारे विश्व हिन्दू परिषद के साथियों ने, भारतीय जनता पार्टी के अभेद्य मित्रों ने अयोध्या में शिलादान कार्यक्रम किया। खैर वह जैसे-तैसे करके टला। उसके बाद जब उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव हुए तो भारतीय जनता पार्टी को यह लगा कि शिलादान से कोई बात नहीं बनी, हमारा उल्लू शिलादान से सीधा नहीं होगा। शायद उनको यह भी जानकारी हुई होगी कि शिलादान कार्यक्रम में जिस तरह के बयान इलैक्ट्रानिक मीडिया से आए हैं, उन्होंने हिन्दुओं का सिर ऊंचा नहीं किया है, बल्कि नीचा किया है। आज जब साधु-संतों पर अंगुली उठाई जाती है तो आपको एतराज होता है। साधु-संतों को हम भी मानते हैं, सारे हिन्दू उनको मानते हैं।
श्री विनय कटियार : शिलादान चुनाव के बाद हुआ।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: लेकिन जब साधु-संत इलैक्ट्रानिक मीडिया में यह कहें कि सुप्रीम कोर्ट से हमें क्या लेनादेना। सुप्रीम कोर्ट कौन होता है, अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हमारे पक्ष मे होगा तो ति उसको मानेंगे, अगर विपक्ष में होगा तो नहीं मानेंगे। यह इन महान साधु-संतों ने कहा। हमारे पास इसकी वीडियो टेप मौजूद है।
योगी आदित्यनाथ: शाहबानो के मामले में आपने क्या किया था। आपने भी तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया था।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: मैंने विनय कटियार जी के लिए कहा था। मैंने जब वे बोल रहे थे, तो उनसे कहा था कि वे मेरे भाषण के दौरान मौजूद रहें, क्योंकि मैं उनके सवालों का जवाब दूंगा। वे बजरंग दल के अध्यक्ष रह चुके हैं और आज भगवा ब्रिगेड के अध्यक्ष हैं। इसलिए मैंने उनसे कहा था कि आप मौजूद रहें।
उपाध्यक्ष महोदय, विनय कटियार साहब हमारे कानपुर में पले हैं और वहीं इन्होंने पढ़ाई की है। यह हमारे अभिन्न मित्र हैं। जब साधु-संतों का कमेंट इस तरह से देश के कोने-कोने में पहुंचा कि सुप्रीम कोर्ट कौन होता है हमारे मामले में टांग अड़ाने वाला और सुप्रीम कोर्ट का फैसला हमारे पक्ष में होगा तो मानेंगे, विपक्ष में होगा तो नहीं मानेंगे, तो ऐसे साधु-संतों को हमें कितना रिगार्ड देना चाहिए, विनय कटियार जी हमें बता दें।
श्री विनय कटियार : वह तो संतों का मामला था।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: यह मामले की बात नहीं है, आप बताइए कि क्या रिगार्ड दें। अब आप पलट रहे हैं।…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : यह अब यह तो नहीं हो सकता कि आप हमें ही हर चीज के लिए कटघरे में खड़ा करें।…( व्यवधान) आप बताएं कि जब श्रीमती इंदिरा गांधी के सम्बन्ध में कोर्ट का निर्णय आया,…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Except the speech of Shri Shriprakash Jaiswal, nothing will go on record. Both cannot go on record.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Shriprakash Jaiswal, are you yielding to him?
… (Interruptions)
* Not Recorded MR. DEPUTY-SPEAKER: Except Shri Shriprakash Jaiswal’s speech, nothing will go on record. Both cannot go on record. That is against the rules. First, he should yield. Are you yielding to him?
(Interruptions) … *उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठिये, इन्हें बोलने दीजिए।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: सर, जब ये खड़े होकर रैफरेंस कोई और देने लगेंगे, इसमें मैं क्या कर सकता हूं। हम तो दुनिया के सबसे उदार हिंदू धर्म की बात कर रहे हैं और ये राजनीतिज्ञों की बात करने लगे। …( व्यवधान)गुजरात से जब माननीय लाल कृष्ण आडवाणी जी ने अपने रथ-यात्रा प्रारम्भ की थी तो देश के सारे राजनीतिज्ञ दलों ने चेतावनी दी थी कि इसका भारत की जनता के मन पर बड़ा गलत असर पड़ेगा, देश का साम्प्रदायिक सद्भाव नष्ट होगा। लेकिन आडवाणी जी नहीं माने। नतीजा यह हुआ कि पूरे उत्तरी भारत में साम्प्रदायिक सद्भाव को नष्ट करने की कोशिश की गयी, सैंकड़ों की जाने गयीं, हजारों लोग हताहत हुए और अरबों रुपये की सम्पत्ति का नुकसान हुआ। कल्याण केवल भारतीय जनता पार्टी का हुआ जिसकी सीटें तीन से बढ़कर १८० हो गयीं। जब फिर ये १८० से तीन सीटों पर आने लगते हैं तो फिर इसी तरह का एजेंडा ये उठाने लगते हैं। हिमाचल प्रदेश में २६ तारीख को चुनाव था और दिल्ली में २३-२४ तारीख को धर्म-संसद आयोजित की गयी, क्योंकि अयोध्या में धर्म-संसद होती तो उसका मैसेज हिमाचल में न जाता। गुजरात में जब ये तहसील स्तर पर, ताल्लुका स्तर पर और हरेक स्तर पर चुनाव हारने लगे तो ये किसी मुद्दे की तलाश कर रहे थे। दुर्भाग्य से कुछ वहशियों ने, राष्ट्र-विरोधी तत्वों ने गोधरा का कांड कर दिया। उससे उपजी वैमनस्या को दबाने के बजाए गुजरात के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में दो महीने तक दंगे करवाये गये और हजारों लोगों को कत्ल करवा दिया गया। इसलिए करवाया गया जिससे भारतीय जनता पार्टी की जमानत जो जब्त होने वाली थी वह बच जाए और भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आ जाए। उसी के कारण भारतीय जनता पार्टी वहां जीत गयी। जितने वोट आपको बाई-इलेक्शन में मिलते थे, जितने वोट वहां आपको ६ महीने में मिले हैं।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:गुजरात के चुनाव परिणाम इस बात को सिद्ध करते हैं कि तीन दिशाओं में कांग्रेस गुजरात में आगे रही और काफी सीटों से आगे रही। केवल मध्य गुजरात जहां दंगे हुए वहां कांग्रेस हारी, वहां उसे तीन सीटें मिलीं। दूसरी जगह उसे २८ सीटें मिलीं। इससे साबित होता है क * Not Recorded अगर गुजरात में दंगे न हुए होते तो कांग्रेस वहां दो-तिहाई बहुमत से जीतती। ६ से ८ महीने के बाद दूसरे सूबों में चुनाव होने हैं।
सौभाग्य से ऐसे सूबों में चुनाव होने हैं, जहां भारतीय जनता पार्टी का थोड़ा बहुत अस्तित्व है, चाहे राजस्थान हो, मध्य प्रदेश हो या छत्तीसगढ़ हो। उसकी व्यूह रचना अभी से शुरु कर दी गई है और पूरे देश को यह संकेत दे दिया गया है कि हम मंदिर बनवाना चाहते हैं, लेकिन हमारे हाथ बन्धे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हमें इजाजत नहीं दी है। यही सोचकर सुप्रीम कोर्ट में एक एप्लीकेशन को मूव किया गया, जिससे सारे देश को यह संदेश जाए, देश के सारे साधू-संतों को यह सन्देश जाए कि सरकार मंदिर बनवाना चाहती है और सरकार प्रतिबंधित जमीन को भी मुक्त करवाना चाहती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मुक्त नही किया, हम क्या करें।
महोदय, दो-तीन बातें और कहना चाहता हूं। विश्व हिन्दू परिषद के लोग अभी तक इस बात को कहते थे कि शाहबानों के केस में भारत के संविधान में संशोधन किया जा सकता है, तो अयोध्या के केस में भारत के संविधान में संशोधन क्यों नहीं किया जा सकता है। आज तो हमारे परममित्र श्री विनय कटियार जी ने संसद में यह बात कही दी है। आपने यह बात कह दी है कि जब शाहबानों के केस में संशोधन हो सकता है, तो यहां क्यों नहीं। भूतपूर्व प्रधान मंत्री, स्व. राजीव गांधी जब शाहबानो के केस में भारत के संविधान में संशोधन कर सकते हैं, तो अयोध्या के मंदिर निर्माण के मामले में आज संसद संशोधन क्यों नहीं कर सकती है। …( व्यवधान)आपने कहा है या अन्य किसी माननीय सदस्य ने कहा है। शाहबानो के केस को अयोध्या केस से मिलान करना देश की जनता को भ्रमित करना है। शाहबानो का केस देश के एक सम्प्रदाय का मामला था, उनका निजी मामला था और उस सम्प्रदाय के शतप्रतिशत लोगों संविधान में संशोधन करना चाहते थे और उससे किसी दूसरी धर्म की भावनाओं को आहत होने का प्रश्न नहीं था, चाहे वह हिन्दू हो, सिक्ख हो या ईसाई हो। इन लोगों को इस केस से दूर-दूर तक सरोकार नहीं था, लेकिन अयोध्या के मामले में सीधे-सीधे हमारे मुस्लिम भाइयों का संबंध है। इसलिए यह कैसे तर्क दिया जा सकता है कि शाहबानो के केस में संविधान में संशोधन हो सकता है और अयोध्या के मामले में संविधान में संशोधन क्यों नहीं हो सकता है। लेकिन ये लोग मुंह-मियां मिट्ठू बनते हैं और इस तरह की बातें कह कर तालियां पिटवाते हैं।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) …* * Not Recorded श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:यह कोई ऐसा मामला नहीं है, जिसमें दूसरे धर्म के लोगों का वास्ता नहीं है। सीधे-सीधे मुस्लिम भाइयों से जुड़ा हुआ मामला है। अगर शाहबानो का केस किसी दूसरे धर्म का मामला होता, तो संविधान में संशोधन नहीं हो सकता था। हरगिज नहीं हो सकता था। दूसरी बात यह है कि शाहबानो का केस में शतप्रतिशत मुसलमान संशोधन चाहता था। अयोध्या के केस में किसी ने यह बात कह दी कि मुस्लिम भाइयों से वोट न डलवाए जायें और मैनडेट ले लिया जाए, तो ९० प्रतिशत हिन्दू भाई यही चाहेंगे कि जो भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला हो, हम उसे मानेंगे, मनमानी हम नहीं करेंगे। इसलिए शाहबानो के केस से मिलान करना, इस देश की जनता को भ्रमित करना है और उनके सामने सऊदी अरब तथा बाबर की बात कहना शुरु कर दिया है। इस तरह से आप हिन्दू भाइयो के सामने ये बातें कहकर हिन्दुओं को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं।
एक विश्व हिन्दू परिषद के नेता है। वह इस मुद्दे को बहुत ज्यादा उठाते हैं। कभी शास्त्रार्थ कोई वास्तविक हिन्दू पंडित करे तब उनको एक-एक बात का जवाब मिलेगा। वह हजारों की भीड़ में हिन्दू भाइयों के सामने खड़े होकर भाषण देते हैं और उनसे तालियां मारने के लिए कहते हैं, चले जाते हैं। आम हिन्दू समझता ही नहीं कि वह क्या कह गए? वे सोचते हैं कि शाहबानो के मामले में संविधान संशोधन हो गया इसमें क्यों नहीं होता है। यह उन्हें बताया ही नहीं जाता कि उस केस में क्या था, वह किस धर्म का मामला था और दूसरा धर्म उससे प्रभावित नहीं होता है।
श्री खारबेल स्वाइं : इनको मालूम है और हमें मालूम नहीं है, ऐसा यह कैसे कह सकते हैं?…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Swain, you are a senior Member, you know the rules. Unless he yields to you, how can you speak like this?
… (Interruptions)
श्री विनय कटियार: सुप्रीम कोर्ट का फैसला धर्म का फैसला नहीं था। यह गलत व्याख्या कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय धर्म के आधार पर नहीं था। इन्दिरा गंधी के केस में कोर्ट ने जो निर्णय दिया, उसे इन्होंने बदला। बूटा सिंह जी को छोड़ कर यह हमेशा कोर्ट का अपमान करते रहे हैं।…( व्यवधान)
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:महोदय, मैं यूपी से आता हूं और अयोध्या यूपी का मामला है। हमारी बहुत बड़ी पार्टी है और पार्टी ने अकेले मुझे बोलने के लिए यूपी से अधिकृत किया है।
गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान इन्होंने बार-बार कहा कि अगर भारतीय जनता पार्टी गुजरात में चुनाव जीतती है तो हिन्दुस्तान की तमाम अवाम को खुशी होगी और यदि चुनाव हारती है तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति मियां मुशर्रफ को खुशी होगी। सच्चाई क्या है? देश का दुश्मन नम्बर एक कौन है, दुश्मन नम्बर एक की भावना क्या है? दुश्मन नम्बर एक की भावना होती है कि हम दुश्मन का बाल बांका यूं नहीं कर पा रहे हैं तो वह अन्दरूनी टकरार से टूट जाए। ऐसे में दुश्मन खुश होते हैं। बीजेपी के गुजरात में जीतने की जितनी खुशी मियां मुशर्रफ को हुई है, शायद दुनिया के किसी व्यक्ति को हुई हो। वह चाहते हैं कि हिन्दुस्तान में धर्म के नाम पर बंटवारा हो और बंटवारे की बुनियाद तैयार हो। बीजेपी के नेता और मुख्यमंत्री कहते थे कि बीजेपी के हारने पर सबसे ज्यादा खुशी मियां मुशर्रफ को होगी और उसके जीतने की खुशी हिन्दुस्तान की अवाम को होगी। सच्चाई यह है कि बीजेपी के जीतने की सबसे ज्यादा खुशी मियां मुशर्रफ को हुई है और बीजेपी के जीतने का सबसे ज्यादा दुख हिन्दुस्तान के अवाम को हुआ है। इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए।
दो रोज बाद हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे आएंगे। तब पता चल जाएगा कि किस को दुख हुआ और किस को खुशी हुई? एक बार आपका जादू चला है। आपने गुजरात में दंगे करवाए और देश के दूसरे हिस्सों में भी दंगे करवाने की कोशिश की गई। इसका हिन्दुस्तान की जनता खुद ही जवाब देगी।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम को हम मानते हैं। इस धरती पर राम पैदा हुए। अयोध्या में राम पैदा हुए।
श्री अरुण जेटली : आप इसे स्वीकार करते हैं।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल: बिल्कुल स्वीकार करते हैं। आप वकील हैं। अयोध्या में राम पैदा हुए, हम इस बात को बिल्कुल मानते हैं लेकिन जहां बतला रहे हैं इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगी।
अयोध्या में ५० किलोमीटर के ऐरिया में पैदा हुये न कि ६२ बीघे जमीन के अंदर पैदा हुये। हम मानते हैं कि वे अयोध्या में पैदा हुये। अगर आप वहां किसी जमीन पर मंदिर बनाना चाहें तो हमें भी कार-सेवा के लिये बुला लीजिये। हम उस निर्माण कार्य में योगदान देंगे लेकिन जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं हो जाता, तब तक आपका यह धर्म है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम, जिन्हें पुरुषों में उत्तम कहा जाता है, जो सारी दुनिया के लिये मिसाल हैं और जिनके समय में हजारों साल पहले अयोध्या में लोकतंत्र अस्तित्व में आया, हम उस भगवान श्रीराम को मानते हैं। वही सही स्वरूप श्रीराम हैं। अगर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के नाम पर हम हिन्दुस्तान में खून-खराबा करके अपनी लिये सत्ता की बात करते हैं तो हम श्रीराम के भक्त नहीं हैं, हम उनके दुश्मन कहलायेंगें।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं इन्हीं तथाकथित रामभक्तों से अनुरोध करूंगा कि राम के नाम पर खून-खराबा न करें। अगर इन लोगों को संघर्ष करना है तो देश की अर्थ-व्यवस्था को सही रास्ते पर लाने के लिये काम करें। यदि निगाह डालेंगे तो मालूम होगा कि आज देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हैं। ऐसी कई मिलें जो करोड़ों रुपये का मुनाफा कमा रही हैं, उनका वनिवेश किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की कई कताई मिलें हैं जिनमें से आधी से ज्यादा बंद हैं। बेरोजगारी का आलम यह है कि यदि २-४ सालों में उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं किया गया, किसी समय भी वहां हिंसा भड़क सकती है। अगर देश की समस्याओं का समाधान करना है तो किसानों की समस्याओं का समाधान करें। राम अपने आप में कोई समस्या नहीं है, राम के लिये आप लोग समस्या बने हुये हैं। आप राम को स्वतंत्र कीजिये, उनकी कृपा होगी तो देश की सारी समस्याओं का अंत होगा। उन्हें साधू-संतों की आवश्यकता नहीं होगी…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except what Shri Shriprakash Jaiswal says.
(Interruptions) … * श्री श्रीप्रकाश जायसवाल:राम की मर्यादा की रक्षा की जाये, हिन्दुस्तान में राजनीति का अखाड़ा न बनायें, राम के नाम की दुकान न खोलें, राम के नाम पर कुर्सी प्राप्त करने की कोशिश न करें, सरकार बनाने की कोशिश न की जाये और हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुसलमान भाइयों को लड़ाकर हिन्दुस्तान का दूसरा बटवारा का बीज न पैदा किया जाये।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Members are informed that arrangement for food items has been made at Snack Bar in the Central Hall for Members, Media persons and staff connected with the business in the House. These items would be available from 8.30 p.m. onwards.
Now, Shri A.K.S. Vijayan.
* Not Recorded SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I rise to clarify the stand of my DMK Party on this Ayodhya issue. Our leader, Dr. Kalaignar had, time and again, stated that the decision of the Supreme Court of India alone shall be final and binding on the people who are interested in this issue.
Sir, I reiterate the stand of our leader and state that the parties to the issue shall wait for the verdict of the Supreme Court and accept it totally, without any reservation.
The Union Government had petitioned the Supreme Court for an early disposal of the matter and the Supreme Court was pleased to hear the matter on 6th March, 2003.
At this juncture, I would only request the parties concerned, not to aggravate the situation by making provocative statements and speeches in public, which may lead to unnecessary and unwanted law and order problems.
Sir, this is a country which is run by a well established constitutional law, and not by the dictums of religion. The law of the land is supreme, and the Supreme Court of India is the competent body to decide law in any matter, including the one in question.
I, therefore, state that the order of the Supreme Court should be treated as final and binding, and shall be respected and accepted by all those who are parties to the issue and also by the Government of India. Any stand contrary to the order of the Supreme Court shall lead to a constitutional crisis, and it is the duty of the Government of India to ensure that the order of the Supreme Court is carried out strictly without any violation.
श्रीमती कान्ति सिंह (बिक्रमगंज):उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। मैं कहना चाहती हूं कि अयोध्या के मामले पर एक बार नहीं, अनेकों बार सदन में चर्चा हो चुकी है। मैं समझती हूं कि यह बहुत गंभीर और संवेदनशील मामला है। लेकिन मैं सदन में दोनों पक्षों के लोगों को देख रही हूं कि वे आरोप-प्रत्यारोप की बातें कर रहे हैं कि उनके समय में क्या हुआ था और उनकी सरकार में क्या हुआ था। लेकिन वास्तविकता क्या है, इस समस्या का समाधान कैसे होगा, इस पर किसी का ध्यान नहीं है। हम इतिहास की बातें करते हैं। लेकिन आज मौजूदा परिवेश में धर्म ऐसी चीज है, जिसके लिए हम अपने मन में आस्था रखते हैं। जैसे धर्म व्यक्ति की मानसिक अभिव्यक्ति है। जिसकी बाहय अभिव्यक्ति पूजा, अर्चना, व्रत, स्नानादि आदि कर्मों से होती है। परंतु अत:करण की शुद्धि के लिए व्यक्ति ध्यान, साधना, श्रद्धा, व्रत आदि का सहारा लेता है। लेकिन आज धर्म के नाम पर जिस तरह से विवाद हो रहे हैं, ये उचित नहीं हैं। इसमे सबसे बड़ी बात यह है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, उस पर हम किस तरह से बहस कर रहे हैं। अगर किसी व्यक्ति के मामले में हम मंत्रियों को कोई पत्र लिखते हैं तो वे कहते हैं कि यह मामला कोर्ट में लम्बित है, इसलिए इस पर विचार नहीं किया जा सकता। मुझे ११ साल सदन में हो गये हैं, इन ११ सालों में मैंने देखा है कि हर बार सदन में अयोध्या का मसला उठाया जाता है। लेकिन इस पर यह नहीं कहा जाता कि इस पर विवाद नहीं होना चाहिए, इस पर बहस नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह मामला कोर्ट में लम्बित है। इसमें प्रमुख चीज यह है कि यह मुद्दा बार-बार क्यों उठ रहा है।
उपाध्यक्ष महोदय, अभी माननीय प्रधान मंत्री जी श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिमाचल प्रदेश में जो बातें कहीं कि वहां पर कुछ पुरातत्व के ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं। हम समझते हैं कि एक आम नागरिक के दिमाग में यही आता है कि कोर्ट को प्रभावित करने के लिए देश के प्रधान मंत्री इस तरह की बातें कर रहे हैं। इन सबका क्या अर्थ है। प्रधान मंत्री जी ऐसा चाहते हैं और दोबारा कोर्ट में जाकर विवादित स्थल पर पूजा करने के लिए स्वीकृति लेने की याचिका दायर करने का क्या तात्पर्य है। यहां विपक्षी पार्टियां कहती हैं कि हमारा एक एजेंडा है, हम एक एजेंडा पर चलते हैं, हम कॉमन मनिमम प्रोग्राम के तहत चलते हैं।
लेकिन पता नहीं, इन्हें कब समझ में आएगा कि सरकार की मंशा क्या है। जब सरकार की मंशा स्वच्छ रहती है, कोर्ट में मामला लंबित है तो फिर केस दोबारा दायर करने की क्या आवश्यकता थी। …( व्यवधान)
इसलिए जब विश्व हिन्दू परिषद् ने २३ फरवरी तक मंदिर निर्माण की अनुमति नहीं मिलने पर आंदोलन छेड़ने की धमकी दी तो उसे तुष्ट करने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से यह याचिका दायर की गई। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण की अनुमति मिलेगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है लेकिन याचिका दायर करके उन्होंने अपनी मंशा को साफ तरीके से बताने का काम किया है कि वहां पर हम मंदिर निर्माण करना चाहते हैं। साथ ही विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण तोगड़िया ने अयोध्या के मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई छेड़ने की जो चेतावनी देते हुए अयोध्या की विवादित भूमि भी रामजन्मभूमि न्यास को सौंपे जाने की मांग करके एक तरह से टकराव पैदा करने की बात की जा रही है। बार-बार इस तरह से धर्म संसद की बात की जाती है जबकि सर्वोच्च सदन यह संसद है। उसके बावजूद भी धर्म संसद बनाने की बात क्यों हो रही है? सरकार में रहने वाले लोग हैं, विश्व हिन्दू परिषद् के लोग हैं, बजरंग दल हैं, धर्म संसद है और सरकार है। इन तमाम लोगों की आपसी मिलीभगत की वजह से ऐसी बात की जा रही है। हमारे विपक्ष के अनेक माननीय सदस्यों ने इस तरह की बातों का उल्लेख किया है। माननीय सोमनाथ जी ने बिल्कुल स्पष्ट तरीके से बताने का काम किया कि क्या इनकी साजिश है। अन्य सदस्यों ने भी बार-बार इस ओर इंगित किया है। इसलिए इंगित किया है कि जनभावनाएं किस तरह से उठ रही हैं, किस तरह से लोगों के मन में भय व्याप्त है कि पता नहीं क्या होने जा रहा है, जबकि कोर्ट में मामला लंबित है, तो हम इस पर बहस क्यों करेंगे। इस संबंध में मैं कहना चाहती हूँ कि :
" पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार, तासे तो चक्की भली, पीस खाय संसार। "
उपाध्यक्ष महोदय, मैं एक बात बताना चाहती हूँ कि १९९० में आडवाणी जी ने जो कि आज उप प्रधान मंत्री हैं, उन्होंने एक राम रथ लेकर चलने का काम किया था। अनेक राज्यों से गुज़रने के दौरान किसी राज्य के मुख्य मंत्री या सत्ताधारी लोगों ने उस राम रथा को रोकने का काम नहीं किया, लेकिन आदरणीय लालू प्रसाय यादव जी की सरकार बिहार में थी तो आडवाणी जी के राम रथ को, जो बनावटी राम रथ था, उसको पकड़कर बंद करने का काम किया। आज भी ये लोग साजिश कर रहे हैं। १९९० के बाद से सामाजिक न्याय की सरकार बिहार में बनी। मैं गर्व के साथ कहना चाहती हूँ कि जब से हमारी सरकार बनी, चाहे लालू जी हों या माननीय राबड़ी देवी जी हों, उनकी सरकार में एक बार भी सांप्रदायिक दंगा बिहार में नहीं हुआ।…( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : ९० दंगे हुए हैं। …( व्यवधान)
श्रीमती कान्ति सिंह:आज स्थिति यह है कि जगह-जगह पर विश्व हिन्दू परिषद् के लोग काम कर रहे हैं। कहीं मस्जिदों पर कुछ गलत लिख देते हैं, कहीं मंदिरों में मांस फेंकने का काम कर रहे हैं और साजिश कर रहे हैं कि बिहार की सरकार को भी सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंका जाए। मैं इन लोगों से पूछना चाहती हूँ कि :
" तोड़ते हो क्यों घर की उन दरो-दीवारों को जहां खुदा रहते हैं, अगर हिम्मत है तो मुक्त करा लो मानसरोवर को जहां शिवशंकर रहते हैं।"
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करती हूँ।
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का समय दिया। आज की चर्चा इस बात पर चल रही है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय में गई, उसे जाना चाहिए या नहीं और गई तो क्यों गई। हम बहुत कम दिनों से इस सदन के सदस्य हैं, लेकिन हम जब सदस्य नहीं भी थे तो भी हम मीडिया के माध्यम से सदन के समाचार बराबर सुनते थे। यह विषय इस सदन में आम चर्चा का विषय बना हुआ है। भले ही उसका कुछ रिजल्ट निकले या न निकले, मगर हम कुछ सवालों पर चर्चा जरूर करते हैं। जब बाढ़ का समय आता है तो बाढ़ पर करतें हैं, थोड़े दिनों के बाद सुखाड़, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं पर करते हैं तथा वनिवेश पर भी करते हैं। जब छ: दिसम्बर आता है तो हम लोग कर्मकांड करते हैं। जैसे देहातों में बरसी मनाते हैं, हम यह मानते हैं। हम हिन्दू परिवार से आते हैं और हम लोगों में जब कोई पूर्वज मर जाता है तो उसकी साल में एक बार बरसी की जाती है। ऐसा कोई हिन्दू परिवार नहीं होगा, जिसने डायरी में अपने ५०सौ पीढ़ी के पूर्वजों का नाम लिख कर रखा हो। जब किसी का पिता मर जाता है तो पुत्र उसकी बरसी मनाता है। मेरा कहने का मतलब यह है कि एक पीढ़ी से ज्यादा नहीं चलता है। लेकिन इस सदन में जब छ: दिसम्बर आता है तो जरूर अयोध्या की बरसी मनाने के लिए एक कार्य-स्थगन प्रस्ताव आता है। उधर के माननीय सदस्य कहेंगे कि आज लोक सभा की कार्यवाही नहीं चलेगी और इधर से जय श्रीराम का नारा लगेगा।
उपाध्यक्ष जी, हम जानते हैं कि जो बरसी मनाई जाती है और जय श्रीराम का नारा लगाया जाता है, उससे इस सदन से हम देश को क्या संदेश देते हैं। क्या हम इस सदन से यह संदेश नहीं देते कि हिन्दुओं और मुसलमानों की जो भावना सोई रहती है, उसे भी हम एक बार जगा कर, हिन्दू और मुसलमानों के विवाद में इस देश को झोंकने का काम नहीं करते? क्या इस पवित्र सदन से हम यही संदेश प्रतिवर्ष देश की जनता को देते रहेंगे, जिससे एक साम्प्रदायिक तनाव इस देश में बना रहे। यहां इस समय सोमनाथ दा बैठे नहीं हैं। वे कह रहे थे कि राजनीतिक भ्रष्टाचार है, इस ढंग से करने से वोट की राजनीति है। हम यह जानना चाहते हैं कि छ:दिसम्बर को विपक्ष की तरफ जो बरसी मनाई जाती है, वह किस चीज की राजनीति होती है। राजनीतिक और राजनीतिज्ञ लोग जो हैं वे इस मुद्दे को जिन्दा करके रखे हुए हैं। इस देश की जनता में, खास कर अयोध्या के हिन्दू और मुसलमानों में भी विवाद नहीं है।
महोदय, एक लेख निकला था। हमने अखबार में पढ़ा था, हमें उसका नाम याद नहीं। हम विनय कटियार जी से पूछ रहे थे कि हिन्दुस्तान के एक बहुत बड़े शायर मुसलमान परिवार के थे। उनके संबंध में उनकी जीवनी निकली थी। बचपन में एक बार उनका पेशाब बंद हो गया, उनके इस रास्ते में दर्द हो गई। तब हिन्दू परिवार की एक महिला ने कहा कि सीता रसोई से खाना बना कर खिलाए तो यह ठीक हो जाएगा। उस मुसलमान की औरत ने कहा कि हम रसोई में कैसे जा सकते हैं तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा पुत्र मेरे पुत्र के समान है, हम सीता रसोई से खाना बना कर लाते हैं, उसे आप अपने पुत्र को खिलाएं तो उसकी बीमारी ठीक हो जाएगी। हिन्दू की औरत अपना पुत्र समझ कर वहां खाना बना कर ले आई और उन्हें खिलाया तो उसकी बीमारी ठीक हो गई। यह उनकी जीवनी में है। अयोध्या में हिन्दू और मुसलमानों में कहां विवाद है, विवाद तो राजनीतिज्ञ लोग कर रहे हैं और करा रहे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, स्वामी जी यहां इस समय नहीं हैं, वे चले गए हैं। वे तथ्यों के आधार पर साक्ष्य दे रहे थे कि वहां राम मंदिर बनना चाहिए, क्योंकि वहां राम का जन्म हुआ था।
विनय कटियार जी बैठे हुए हैं, ये इतिहास का पुलिन्दा लाये थे, देश और दुनिया का का ये सदन के सामने तथ्य बता रहे थे। सोमनाथ चटर्जी जी भी वरिष्ठ वकील हैं, उन्होंने बहुत से तथ्यों के आधार पर पक्ष और विपक्ष की बात रखी, लेकिन हम यह जानना चाहते हैं कि अगर कांग्रेसी हुकूमत में ताला खोलने का काम नहीं किया गया होता तो शायद यह विवाद इतना नहीं बढ़ता, यदि राजीव गांधी जी के जमाने में वहां शिलान्यास नहीं किया गया होता तो यह विवाद इतना नहीं बढ़ता। आखिर इस विवाद को बढ़ाने में भूमिका किसकी है, यह विवाद बढ़ने का कारण क्या था। उस दिन भी उन लोगों ने ताला खोला और शिलान्यास किया तो उसके पीछे उनकी वोट की राजनीति छिपी हुई थी और वोट की राजनीति के चलते ही यह काम किया गया।
आदरणीय चन्द्रशेखर जी भाषण दे रहे थे, उन्होंने कुछ सवाल खड़े किये थे, यहां कानून मंत्री बैठे हुए हैं, हम चाहेंगे कि उनके सवालों का जवाब वे अपने जवाब में दें। उन्होंने सवाल खड़ा किया था, प्रधानमंत्री जी ने भी कई बार कहा है कि चन्द्रशेखर जी की सरकार रहती तो कुछ दिनों में यह मामला समाप्त हो जाता। उसमें तीन लोगों का नाम आया, जैसा कि चन्द्रशेखर जी ने बताया, आदरणीय भैरोंसिंह शेखावत जी, जो आज भारत के उपराष्ट्रपति हैं। आदरणीय मुलायम सिंह जी, जो आपके सामने मौजूद हैं, बैठे हुए हैं और शरद पवार जी अभी मौजूद नहीं हैं। हम यह जानना चाहते हैं कि यदि यह सरकार चाहती है कि यह मामला, यह विवाद सुलट जाये तो इन तीनों आदमियों से क्या बात की और बात नहीं की तो इसका क्या कारण है। अगर किसी मंत्रालय में इससे सम्बन्धित पंजिका पड़ी हुई है तो क्या सरकार ने इसका अध्ययन किया?अगर अध्ययन नहीं किया तो इसका कारण क्या है? हम चाहेंगे कि कानून मंत्री इस बिन्दु पर बिल्कुल साफ-सुथरे तरीके से सदन को अवगत करायें। दूसरा सवाल हम यह बताना चाहते हैं, माननीय मुलायम सिंह जी कह रहे थे और अन्य लोगों ने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने जो हिमाचल प्रदेश में भाषण दिया, वह न्यायालय को प्रभावित करने के लिए था। हम नहीं जानते कि भारत की न्यायपालिका कितनी कमजोर है या कितनी मजबूत है। हो सकता है कि वह भाषण से प्रभावित होती हो या नहीं होती हो।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हम तो मंदिर बनाना चाहते हैं, न्यायालय अवरोध बनता है, बयान देने का यह कारण था।…( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम यह कहना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री जी का हिमाचल प्रदेश में जो भाषण हुआ तो उससे न्यायालय प्रभावित होता है, लेकिन अगर विपक्ष की नेता और अन्य लोग इस सवाल पर बोलते हैं तो उससे न्यायालय पर प्रभाव पड़ता है कि नहीं?चन्द्रशेखर जी ने ठीक कहा था कि अगर इस सवाल को, विवाद को समाप्त करना चाहते हो तो भाषणबाजी बन्द करो, इस पर बहस बन्द करो। इस पर बहस बन्द होनी चाहिए। अगर देश में अमन-चैन रखना है तो देश में अमन-चैन को रखने के लिए इस पर भाषणबाजी और बहसबाजी बन्द होनी चाहिए, चाहे इधर के लोग भाषण देते हों और बहस करते हों, चाहे उदर के लोग बहस करते हों, भाषण देते हों।…( व्यवधान)
हम ज्यादा समय नहीं लेंगे, हम दो-चार मिनट के लिए बोल रहे हैं। हम एक बात यह भी बताना चाहते हैं कि यहां के न्यायपालिका में प्रमाणित हो चुका है कि कभी-कभी न्यायपालिका प्रभावित भी होती है। उदाहरण के तौर पर हम यह बताना चाहते हैं कि उस समय बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र थे,…( व्यवधान) यदि सच है तो हम सदन में नहीं कहेंगे तो कहां कहेंगे, क्या बन्द कोठरी में कहेंगे। अगर ज्यूडीशियरी गलत काम करेगी तो कहां कहेंगे, यह सर्वोच्च सदन है, इस सदन से बढ़कर कुछ नहीं होता है। उनके मामले में तीन आदमियों की सर्वोच्च न्यायालय में बेंच बनी हुई थी, उनमें से एक जज, जिन्होंने जजमेंट दिया, एक हफ्ते के बाद राज्यसभा में सदस्य बनाये गये। हम यह जानना चाहते हैं कि प्रभावित करने का दूसरा कारण क्या हो सकता है। वह कांग्रेस की हुकूमत थी और कांग्रेस की हुकूमत में ऐसा होता आया है, इसलिए संदेह किया जा सकता है कि न्यायपालिका के लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इन सब सवालों पर गम्भीरता से सोचना चाहिए।
एक बात हम और कहना चाहते हैं। जो इधर से तर्क आ रहा है, हम उससे सहमत नहीं हैं कि मंदिर यहीं बने। देश में और दुनिया में लोग कहते हैं कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। हमारा धार्मिक ग्रन्थ रामायण भी कहती है कि अयोध्या में राम का जन्म हुआ था। विनय कटियार जी कहते हैं कि राम का जन्म यहां हुआ था। ये उंगली से ऐसे बताते हैं, जैसे उनका जन्म हुआ था तो ये लोग नाल काटने के लिए वहां बैठे हुए थे। अयोध्या में जन्म हुआ था और यह भी सत्य है कि यदि अयोध्या में राम का जन्म हुआ था को बिना विवाद के, निर्विवाद तरीके से कोई रास्ता निकालकर अयोध्या में मंदिर बनना चाहिए। अगर अयोध्या में मंदिर नहीं बनेगा तो पाकिस्तान में तो नहीं बन सकता।
20.00 hrs. श्री मुलायम सिंह यादव :वह कहां बनना चाहिए? …( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : जहां निर्विवाद जगह है, वहां मंदिर बनना चाहिए।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except what Shri Prabhunath Singh speaks.
(Interruptions) …* श्री प्रभुनाथ सिंह : उपाध्यक्ष जी, धर्म की जहां तक बात चलती है, तो हम मानते हैं कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है। हमें हिन्दुत्व की विशालता को समझना पड़ेगा। हिन्दुत्व की विशालता में कहीं भी साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की बात नहीं है। भगवान कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कर दिया है कि धर्म कर्म पर आधारित होता है। धर्म कहीं मंदिर और मस्जिद से नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अगर किसी का वृद्ध पिता एक-एक बूंद पानी के बिना तड़पता हो और अपने पिता की प्राण रक्षा के लिए कोई पुत्र एक-एक बूंद पानी उसके मुंह में डालता हो और बगल की पड़ोसन के घर में कोई किसी अबला का कोई बलात्कार या अपहरण करता हो तो ऐसी स्थिति में वह अबला यदि अपनी सुरक्षा के लिए चीत्कार कर रही है तो उस व्यक्ति को तय करना पडेगा कि इस समय उसका क्या फर्ज बनता है। वह पिता को एक-एक बूंद पानी देकर प्राण बचाना या तलवार उठाकर अबला की लाज बचाना, वही उसका कर्म होगा और उसी कर्म में उसका धर्म भी होगा।
हम यह बताना चाहते हैं कि कहीं मंदिर और मस्जिद धर्म से जुडा हुआ सवाल नहीं है।हम आपसे एक निवेदन करना चाहेंगे कि जो लोग सदन के अंदर या बाहर किसी भी दल से या किसी भी संगठन से * Not Recorded जुड़े हुए लोग हैं, वह ऐसा बयान देते हैं जिससे साम्प्रदायिक तनाव फैलता है तो उन पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। …( व्यवधान)हम यह पूछना चाहते हैं कि मीडिया में श्री तोगङिया का बयान बार-बार आता है। उनका बयान कहीं से भी देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बहाल करने के लायक नहीं होता। सब लोग उस पर चर्चा करते हैं लेकिन हम के लोगों से एक निवेदन करना चाहते हैं कि श्री तोगड़िया के बयान पर कभी-कभी अखबार में चर्चा आ जाती है लेकिन जब यहीं पर इमाम बुखारी का बयान आया कि हम आई.एस.आई. के एजेंट हैं, मुलायम सिंह जी किसी नेता का बयान नहीं आया कि उन पर कार्रवाई होनी चाहिए।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :आप लोग गलत कहते हो। मुलायम सिंह वह है जिनकी हैसियत हिन्दुस्तान में किसी की नहीं है। मैंने इमाम साहब के बारे में कहा है, बोला है। …( व्यवधान)आपने नहीं सुना होगा लेकिन जेटली साहब के साथ-साथ बहुत लोग जानते हैं। …( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम आपको बधाई देते हैं। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :जो भी सत्ता पक्ष हो। चाहे वहे हिन्दू हो, मुसलान हो या ईसाई है, मुलायम सिंह उसके खिलाफ है। …( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम आपको बधाई देते हैं। आपसे ऐसी उम्मीद इस देश की जनता भी रखती है। हम यह बताना चाहते हैं कि देश के नेता जो लोग दुरंगी भाषा बोलते हैं यानी एक तरफ तोगड़िया के बयान पर आपत्ति और दूसरी तरफ इमाम बुखारी के बयान पर चुप्पी, ये दोनों बयान एक साथ नहीं चल सकते। अब हम समता पार्टी की एक नीयत बताकर अपनी बात समाप्त करेंगे। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हम जानते हैं कि क्या होता है? सरकार आपकी है, ताकत आपकी है। आपने आज तक क्या किया है ? हम पर क्यों आरोप लगाते हैं। जिनकी सरकार है, वह जिम्मेदार हैं। विश्व हिन्दू के सदस्य क्या बोल गये? समाजवादी पार्टी, वामपंथी दल का मुसलमानों से महाभारत होगा। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपने यील्ड किया है। मैंने उनको इजाजत नहीं दी है।
...( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम ज्यादा से ज्यादा दो मिनट में अपनी बात समाप्त करेंगे।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : बहुत लोग बोलने वाले हैं। इस तरह तो ११ या १२ बज जायेंगे।
...( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम दो मिनट में अपनी बात समाप्त कर देंगे। हम आपके माध्यम से सरकार से निवेदन करना चाहते हैं कि इस मामले का निपटारा करने के लिए अगर कहीं बैठकर बात करने से नहीं हो रहा हो तो सरकार को न्यायालय में पहल करनी चाहिए कि इस मामले का निपटारा जल्दी से जल्दी हो ताकि इस देश का विवाद समाप्त हो सके। इसी के साथ यहां श्री जयपाल रेड्डी जी बैठे हुए हैं। जब ये बोल रहे थे तब हम हंस रहे थे। ये हमारे सम्मानित नेता हैं और जनता दल परिवार के सदस्य रहे हैं लेकिन अब वह वहां के प्रवक्ता हो गये हैं। यह अपनी बात कभी नहीं कहते। जो दूसरे कहते हैं, उसे ही यह कहने का काम कर रहे हैं। हम इनका बड़ा सम्मान करते हैं लेकिन यह जिस जमात में हैं, उस जमात से अगर नैतिकता की बात आती है तो हमको लगता है कि अब नैतिकता की परिभाषा बदलनी होगी।
कांग्रेस की तरफ से नैतिकता की बात सुनकरशर्म भी शर्माने लगती है। इसलिए यह कहना चाहते हैं कि कांग्रेस के लोग अगर नैतिकता की बात न ही करें तो वह देश के लिए ज्यादा अच्छा होगा। समता पार्टी की नीयत बताकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। समता पार्टी स्पष्ट रूप से चाहती है कि इस देश में साम्प्रदायिक सौहार्द्र बना रहे और जो एनडीए का एजेंडा है, उस पर सरकार चले लेकिन अगर एनडीए के एजेंडा से सरकार जरा भी दाये-बाएं चलेगी जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ेगा तो फिर इसको स्वीकार करने के लिए हम तैयार नहीं हैं।…( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):यह गलत बात है। आपके लोग पत्तल चाट रहे हैं और सब सह रहे हैं।…( व्यवधान)
श्री अरुण कुमार (जहानाबाद):अभी मुंगेर में तीन मुसलमानों की हत्या हुई है। उस पर कार्यवाही भी की गई है। …( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record, except the speech of Shri Prabhunath Singh.
(Interruptions) …* उपाध्यक्ष महोदय : अभी बहुत सारे सदस्य बोलने के लिए रहते हैं। अब आप अपनी बात समाप्त करिए।
…( व्यवधान)
* Not Recorded श्री प्रभुनाथ सिंह : आप कहें तो हम अभी बैठ जाते हैं।अभी कुछ खास नहीं है। आपको धन्यवाद देकर हम बैठ जाते हैं।
योगी आदित्यनाथ:मैं आपको सबसे पहले धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस महत्वपूर्ण विषय पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। आज चर्चा प्रारम्भ हई है और यह चर्चा मुख्य रूप से तीन बिन्दुओं पर केन्द्रित होनी चाहिए थी।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : सब पार्टीज का टाइम खत्म हो चुका है।
…( व्यवधान)
योगी आदित्यनाथ: उनमें से एक बिन्दु यह था कि सरकार कोर्ट क्यों गई? दूसरा, महामहिम राष्ट्रपति जी के भाषण में अयोध्या का जिक्र क्यों हुआ और तीसरे, हिमाचल प्रदेश मे माननीय प्रधान मंत्री जी द्वारा दिया गया भाषण का जिक्र था। इसको लेकर १८ से लेकर अब तक बहुत बार संसद की कार्यवाही को भंग करने का प्रयास किया गया, कार्यवाही में व्यवधान डालने का प्रयास किया गया औऱ जब सरकार ने उस चर्चा को स्वीकार किया तो जब विपक्ष चर्चा से भागी थी तो विपक्ष के चर्चा से भागने से ही स्वयं अंदाजा लगाया जा सकता था कि केवल अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए, अयोध्या के मुद्दे को ये लोग उलझाना चाहते हैं, सर्वसम्मति बनाने के लिए नहीं चाहते हैं। प्रश्न उठता है कि बार-बार अयोध्या का मुद्दा ही क्यों उठता है? हर व्यक्ति जानता है कि अयोध्या हिन्दुओं की पवित्र स्थली है। हमारे शास्त्रों में सात पवित्र नगरो के नाम दिये हैं उनमें अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, अवन्तिका, पुरी, द्वारावतीचेव सप्तेता मोक्षदायिका। सात पवित्र नगरियां हैं जो व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने के लिए और जिनके दर्शन मात्र से, उनकी यात्रा करने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त हो जाता है, ऐसा हमारा विश्वास है, हमारी मान्यताएं हैं कि व्यक्ति को उनके दर्शन मात्र से मोक्ष मिल जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की पूर्ति वहां से होती है और उनमें सबसे पहला नाम अयोध्या का आता है और अयोध्या की पहचान राम जन्मभूमि के मन्दिर से है। आज इस पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। मैं दो बजे से जब से चर्चा प्रारम्भ हुई है, तभी से ही मैं यहां पर बैठा हूं. सुन रहा हूं।…( व्यवधान)हमारे विनय कटियार जी ने मक्का की कुछ मस्जिदों के बारे में चर्चा की थी।
यानी वहां की मस्जिदों की चर्चा होने से कुछ सदस्य उत्तेजित होते थे। अगर वहां के बारे में सही तथ्य पेश किए जाते हैं, तो उससे उत्तेजित होने की कोई बात नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब बार-बार अयोध्या के मुद्दे को, राम जन्म भूमि के मुद्दे को यहां उठाकर करके इस देश के हिन्दुओं की भावना के साथ जिस तरह से खिलवाड़ किया जाता है, क्या उस समय यहां बैठे हुए माननीय सदस्यों ने इसके बारे में सोचा है। आज भगवान राम की तुलना एक विदेशी आक्रान्ता बाबर से की जा रही है। भगवान राम के जन्म स्थल की तुलना की जाती है। भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए रामेश्वरम् के पास धुनषकोटि से लंका के लिए जो सेतुबंध का निर्माण किया था, उसको अमेरिका की नासा ने भी स्वीकार किया है। यह बात समाचार पत्रों में छपी है और इस बात को स्वीकार किया गया है कि आज से साढ़े १७ लाख वर्ष पहले वे वहां गए थे। उस समय से वे सारे के सार प्रमाण हमारे पास हैं। चाहे वाल्मीकि रामायण हो, चाहे उसके उपरांत साहित्यिक प्रमाण हों, चाहे शास्त्रीय प्रमाण हों, वे सब हमारे पास मौजूद हैं। वहां की भौगोलिक स्थिति के बारे में बताया गया है, यह नासा ने कहा है और साढ़े १७ लाख वर्ष पहले इसकी स्थिति के बारे में बताया है।
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, I would like to say for the sake of record that this is not true. NASA has contradicted it.
योगी आदित्यनाथ:यही नहीं, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में और उसके उपरांत समय-समय पर रामायण का जो वभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है, वभिन्न कवियों ने राम की गाथा गाई है, उनमें अयोध्या का जिक्र हुआ है, राम जन्म भूमि का जिक्र हुआ है। उसके बाद भी अयोध्या में सबसे पहला आक्रमण दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी में सालार मसूद के द्वारा हुआ था। हर व्यक्ति जानता है कि सालार मसूद ने सबसे पहले अयोध्या में भगवान श्रीराम के ऐतिहासिक मंदिर को तोड़ा था, जो जन्म भूमि में स्थित था। उसके बाद गढ़वार के महाराजा ने वहां पर मंदिर का निर्माण किया था, जिसे १५२८ में बाबर के एक सिपहसालार मीर बाकी के द्वारा तोड़ा गया था। वहां के ऐतिहासिक प्रमाण, वहां के पुरातात्विक प्रमाण, वर्तमान में जीपीआर का जो सर्वे हुआ है, ये सब इस बात के सबूत हैं। इस बात को कोई झुठला नहीं सकता। हम आपसे अनुरोध करेंगे कि संसद के पटल पर उस रिपोर्ट को मंगाया जाना चाहिए। इस तरह से जो प्रमाण मिले हैं, उस विवादित और अविवादित भूमि का प्रश्न आया है। जिस धर्म संसद की बात यहां उठाई गई है, उस धर्म संसद ने यह मांग की थी अयोध्या के बारे में, वहां दो प्रकार की भूमि है, एक विवादित और दूसरी अविवादित। विवादित भूमि जो केवल ६० बाई ४० का चबूतरा है, जिसमें राम लला विराजमान हैं और जहां कोर्ट के आदेश पर हिन्दू पूजन और दर्शन करते हैं, उसको विवादित बना दिया गया। एक वह है जो अविवादित है, जो ६७ एकड़ अविवादित भूमि है, उसको वापस लेने की मांग इस देश के धर्माचार्य कर रहे हैं। यह समझ में नहीं आता है कि अयोध्या में राम जन्म भूमि का मुद्दा जब आता है, तो बाबर को अपना आदर्श मानकर माननीय सदन के कुछ माननीय सदस्य क्यों चल पड़ते हैं। क्या इस देश का आदर्श बाबर हो सकता है, बाबर एक बर्बर आक्रांता था, दुष्ट था। बाबर का कोई स्मारक अयोध्या तो क्या भारत के अंदर हमें स्वीकार नहीं होगा, इस बात के बारे में हम भी आज कह सकते हैं। औरंगजेब ने क्या किया था, उसने वही किया था, बार-बार हिन्दुओं के स्थानों को तोड़ा था। किसी ने राम जन्म भूमि का मंदिर तोड़ा, तो किसी ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्म भूमि का मंदिर तोड़ा और किसी ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़ा। यही नहीं, कुतुब मीनार के पास जो मस्जिद खड़ी हुई है, वहां पर आज भी पुरातात्विक विभाग की ओर से बोर्ड लगा हुआ है। उसमें लिखा है कि उस क्षेत्र के २७ हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़कर उस मलबे से इस मस्जिद का निर्माण किया गया है। कौन नहीं जानता है कि एक इस्लाम का स्वरूप वह था जो केरल के तट पर आया था और केरल के राजाओं ने वहां इस्लाम के अनुयायियों को मस्जिद बनाने के लिए मुफ्त में जगह दी थी। दूसरा इस्लाम का स्वरूप वह था जब १०२६ में सोमनाथ मंदिर को तोड़ने से लेकर…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आदित्यनाथ जी, एक मिनट। इनका पाइंट आफ आर्डर है।
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, I am on a point of order.
MR. DEPUTY-SPEAKER: What is your point of order?
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, we have allowed the standards to relax so much this evening, I am really surprised. He is making sweeping allegations against one religion altogether. How can such things be allowed to go on record?
SHRI BASU DEB ACHARIA : Yes, Sir, it is very unfair.
SHRI S. JAIPAL REDDY : Will you kindly give instructions to expunge them from the records?
MR. DEPUTY-SPEAKER: I will look into it. Whatever is not allowable, I will expunge.
… (Interruptions)
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, he should not be allowed to raise it.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I will look into the records and if there is anything objectionable, I will expunge it.
… (Interruptions)
योगी आदित्यनाथ:महोदय, मैं किसी धर्म के बारे में नहीं कह रहा हूं। जो सच्चाई और तथ्य हैं मैं उन तथ्यों को यहां पर रख रहा हूं। …( व्यवधान)मैं किसी इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश नहीं कर रहा हूं। जो हमारी संस्कृति के साथ, हमारी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया था, मैं उन्हीं बातों को रख रहा हूं।…( व्यवधान)जब केरल के तट पर इस देश के हिंदू राजाओं ने उन्हें मुफ्त में जमीन देकर मस्जिद निर्माण का काम स्वयं किया था। दूसरा स्वरूप वह भी आया था जो दसवीं शताब्दी से इस देश में प्रारम्भ हुआ था। …( व्यवधान)महोदय, हम इस्लाम के उस स्वरूप को स्वीकार करते हैं जिसने इस देश में शरण लेकर यहां की मान्यताओं के अनुसार चलना प्रारम्भ किया था। लेकिन दसवीं शताब्दी के बाद मौहम्मद गजनवी के रूप में या गौरी, खिलजी, बाबर और औरंगजेब के रूप में जो स्वरूप आया था वह हमें कतई पसंद नहीं है। उसके खिलाफ आज भारत का धर्माचार्य, विश्व-हिंदू-परिषद, बजरंग दल या आरएसएस कहता है तो गलत नहीं कहता है। वे राष्ट्रवाद की बात कहते हैं। महोदय, जिस हिंदुत्व की ये बात करते हैं, उसकी परिभाषा हमारे शास्त्रों में की गयी है। " आ सिंधु-सिंधु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका, पितृ-भू पुण्य भूश्चैव स: वे हिंदू रति स्मृत" । यानि सिंधु नदी से लेकर समुद्र पर्यन्त तक का भू-भाग जिसे वहां के नागरिक अपनी मातृ-भूमि पितृ-भूमि एवं पुण्य भूमि मानते हैं वही हिंदू है। हिंदू की परिभाषा कैसे बुरी है। अगर देश के मुसलमानों ने देश में जन्म लिया है और भारत माता को माता कहने में उसे परेशानी होती है, इसे अपनी मातृभूमि और पितृभूमि नहीं मानता है तो चाहे वह इस्लाम का, चाहे ईसाइयत का अनुयायी हो या स्वयं हिंदू हो, क्या उसे इस देश में रहने का अधिकार होना चाहिए। आज यह प्रश्न हमारे सामने है। हम हिंदुत्व का प्रश्न लेकर सामने आये हैं। जब हिंदू संगठन इसी बात को कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं। हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है, यह एक संस्कृति है। इसमें न जाने कितने मत और संप्रदाय हुए होंगे और आज भी हैं। लेकिन जो इस भूमि को माता मानता है, पुण्य भूमि मानता है उसे इस देश का नागरिक होने का अधिकार है। …( व्यवधान)अगर इंग्लैंड का निवासी सब कुछ होते हुए वह वहां का नागरिक है और पंथनिरपेक्ष होने का प्रयास करता है तो कोई बुराई नहीं है। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।
योगी आदित्यनाथ: हिंदू इस देश में बहुसंख्यक है, इसी कारण यह देश पंथ-निरपेक्ष है। अगर हिंदू यहां अल्पसंख्यक होता तो बंगला देश और पाकिस्तान में जो कुछ हुआ है, वही यहां होता। कश्मीर से जिस तरह से हिंदू भगाये गये, फिर सिखों की सामूहिक हत्याएं हुईं और आज बौद्ध काटे जा रहे हैं।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।
योगी आदित्यनाथ: अभी तो मैंने अपनी पूरी बात और तथ्य नहीं रखे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : १५ लोगों ने अभी और बोलना है।
SHRI E. AHAMED : Sir, it is not their monopoly. This is our country also… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I have already told that if there is anything objectionable, I will expunge it.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, please do not disturb him. Let him continue.
… (Interruptions)
SHRI E. AHAMED : Sir, he is misinterpreting the historical facts… (Interruptions)
योगी आदित्यनाथ:इस देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं। इसीलिए यह देश पंथ-निरपेक्ष है। अगर हिंदू साम्प्रदायिक होता, कट्टर होता, तो इस देश से इस्लाम के आताताइयों को देश से बाहर कर दिया गया होता।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except the speech of Yogi Aditya Nath.
(Interruptions) …*SHRI E. AHAMED : Sir, I am on a point of order… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Yogi Aditya Nath, you have to conclude now.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: You are not hearing me. He has raised a point of order.
… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : आप मुझे भी नहीं सुनेंगे। उन्होने व्यवस्था का प्रश्न उठाया है।
श्री विनय कटियार : उनका व्यवस्था का प्रश्न क्या है।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : व्यवस्था का प्रश्न है कि किसी भी सदस्य को दंगा फैलाने वाला भाषण नहीं देना चाहिए। …( व्यवधान)
* Not Recorded … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Let me understand. Please tell me under what rule?
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I am asking him under what rule he is raising the point of order. You are not understanding it.
… (Interruptions)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :प्रोसीडिंग्स देखा जाए। एक जाति के लोगों को चैलेंज करेंगे। …( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Under what rule you are raising it?
… (Interruptions)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :ये इर्रेलेवेंट बात कैसे बोल सकते हैं। ये धर्म संसद है या भारत की संसद है। धर्म संसद में जो दंगा फैलाने की बात बोलते हैं, वही बात यहां बोल रहे हैं। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : मैंने कहा है, जो भी आब्जैक्शनेबल होगा, वह मैं निकाल दूंगा।
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप मुझे भी नहीं सुन रहे हैं। मैंने दरख्वास्त किया है कि जो व्यवस्था का प्रश्न है, उसे मैंने रूल आउट किया है।
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Whatever is objectionable, I will expunge it.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: You are not listening to me. I am on my legs. Please sit down.
… (Interruptions)
योगी आदित्यनाथ :महोदय, किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : अगर ये कालनैमी है, तो हमें हनुमान बनना पड़ेगा।…( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :महोदय, गाधी तन्य मन चिन्ता व्यापी, हरि विष्णु न निश्चर पाती।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I do not know how to control the House.
… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : इतना सीरियस डिबेट चल रहा है, आप हंस रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ: महोदय, मैं उनकी बात पर हंस रहा हूं।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : छोटी-छोटी पार्टियों को छोड़कर सभी पार्टियों को दिया जाने वाला समय समाप्त हो गया है। दस मिनट से ज्यादा समय किसी को नहीं मिलेगा। अब आपको कनक्ल्युड करना ही है। आपको १५ मिनट का समय दिया जा चुका है।
योगी आदित्यनाथ: महोदय, मैं कनक्ल्युड कर रहा हूं। …( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Yogi Aditya Nath, please conclude; otherwise, I will say that nothing will go on record; and I will call the next speaker.
… (Interruptions)
SHRI E. AHAMED : Sir, I am on a point of order. … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Under what rule?
… (Interruptions)
SHRI E. AHAMED: It is under rule 380. It says:
"If the Speaker is of opinion that words have been used in debate which are defamatory or indecent or unparliamentary or undignified, he may, in his discretion, order that such words be expunged from the proceedings of the House."
… (Interruptions)MR. DEPUTY-SPEAKER: Will you please hear me? I will go through his speech and whatever objectionable is there, I will expunge that under Rule 380. I have already given the ruling.
… (Interruptions)
श्री मुलायम सिंह यादव :अब रिप्लाई करवा दीजिए क्योंकि हमें जाना है। हम मंत्री जी का जवाब सुनना चाहते हैं।
योगी आदित्यनाथ: उपाध्यक्ष महोदय, १५२८ से लेकर १९३४ तक ७६ बार हिन्दुओं ने राम जन्म भूमि के लिए संघर्ष किया, आन्दोलन किया। ७७वीं बार ६ दिसम्बर १९९२ को गुलामी के उस ढांचे को गिरा दिया। साढ़े तीन लाख से ज्यादा हिन्दू शहीद हुए। हम इतनी संख्या में शहीद हुए हिन्दुओं को वैसे ही जाने नहीं देंगे। अयोध्या में राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त हो। …( व्यवधान)अयोध्या में राम मंदिर का राजनीतिकरण कांग्रेस ने किया और उसके लिए वह दोषी है। १९८६ और १९८९ में कांग्रेस के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री थे। मुलायम सिंह जी ने जो बातें यहां रखीं मैं उसके बारे में कुछ कह दूं।
उपाध्यक्ष महोदय: उनके बारे में नहीं, सबजैक्ट के बारे में कहिए।
योगी आदित्यनाथ: वह लोकतंत्र के बहुत हितैषी बन जाते हैं। पता नहीं कैसे हितैषी हो गए? …( व्यवधान) * MR. DEPUTY-SPEAKER: That will not go on record.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: I have already expunged that.
… (Interruptions)
योगी आदित्यनाथ:भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Whatever Yogi Aditya Nath is saying, will not go on record now.
(Interruptions) … * श्री मुलायम संह यादव :मैं कोई भाषण नहीं दूंगा क्योंकि मुझ पर आरोप लगाए गए हैं, मैं उन्हें साफ करना चाहता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय: मैंने सारा एक्सपंज कर दिया है।
श्री मुलायम सिंह यादव : मैंने हिन्दुओं को नहीं पिटवाया है, अपराधियों को पिटवाया है।
...( व्यवधान)...* * Not Recorded श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:उपाध्यक्ष महोदय, इस सर्वोच्च सदन में अयोध्या के मुद्दे पर इससे पहले भी कई बार चर्चा हो चुकी है। अयोध्या का मामला आज न्यायालय में लम्बित है और यही चर्चा का मुख्य मुद्दा है। मैं मुलायम सिंह जी और सोमनाथ दादा का भाषण सुन रहा था। मैं इनके प्रति बहुत आदर का भाव रखता हूं लेकिन उन्होंने हमारी तरफ इशारा किया। मैं इसका खुलासा करना चाहता हूं। मुलायम सिंह जी और सोमनाथ दादा ने हम लोगों की निष्ठा की तरफ इशारा किया। यहां तक कि मुलायम सिंह जी ने पिछलग्गू शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि घटक दल पिछलग्गू की तरह क्यों हैं?
श्री मुलायम सिंह यादव : मैंने अपने पुराने साथियों के बारे में कहा और उन्हें सावधान किया कि वे इनके साथ क्यों बैठे हैं।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: मुझे अपना नजरिया साफ करने दिया जाए।एनडीए का जो साझा कार्यक्रम है उसके अन्दर न मन्दिर, न ही धारा ३७० और न ही कॉमन सविल कोड जैसे मुद्दे हैं। हम ऐसे मुद्दों के लिए बाध्य नहीं हैं चाहे वे सत्ता पक्ष के माननीय सदस्य हों या बजरंग दल के विनय कटियार जी हों या आदित्यनाथ जी हों। हम उनका समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : संघ परिवार के कुछ नेता प्रधान मंत्री जी से मिले थे और उनसे कहा गया कि मेरा समर्थन करना उनकी मजबूरी है, परवाह मत करो, जो चाहे करो, अपना एजेंडा लागू करो। इस बात को मैंने और सोमनाथ दादा ने यहां कहा। आडवाणी जी ने खुले आम इस बात को कहा।
हमारी रथ यात्रा और अयोध्या के कारण आज सत्ता में बैठे हुये हैं। यह उन्होंने खुल्लम-खुला कहा था। क्योंकि देवेन्द्र जी, आपकी मजबूरी थी, उसे बतायें।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: उपाध्यक्ष जी, पूरे देश में मैंडेट हो जाये। इसलिये कह रहा हूं कि एन.डी.ए. का एग्रीड एजेंडा हैं जिसमें कॉमन सविल कोड, धारा ३७० और मन्दिर-मस्जिद नहीं हैं। आज मुद्दे से बाहर बात हो रही है क्योंकि मामला न्यायालय में है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो अर्ज़ी दी है, उस संबंध मे घटक दलों को विश्वास में लिया जाना चाहिये था। हमारे साथी श्री येरननायडू ने भी इस बात का जिक्र किया कि उनके राज्य के मुख्य मंत्री ने साफ कहा है कि उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया, ऐसा समाचार-पत्रों में आया है। इसलिये मैं अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हूं कि सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी देने से पहले घटक दलों को इस मुद्दे पर विश्वास में लिया जाना चाहिये था। कानून मंत्री बहुत बड़े विद्वान हैं, वे अभी नहीं बैठे हैं। वे आस्तिक को नास्तिक और नास्तिक को आस्तिक बनाने वाले हैं। इनकी जबान में फोर्स है, ताकत है। यह उनकी चातुर्य कला है जो हम लोगो में नहीं है क्योकि हम गांव के किसान हैं, और सीधी बात करेंगे।
उपाध्यक्ष जी, मैं इसलिये बताना चाहता हूं कि सरकार ने हम लोगों को विश्वास में नहीं लिया। हम लोग सरकार के साथ इस मुद्दे पर नहीं हैं। क्योकि यह पूरे देश का संवेदनशील मामला है, इसलिये सरकार को घटक दलों को विश्वास में लेना चाहिये था। जिस तरह से .यह मामला बनाया जा रहा है, उससे सरकार की तरफ से जो अर्जी कोर्ट में दी गई है, और हम लोगों को विश्वास में नहीं लिया गया, हम लोग प्रोटेस्ट कर रहे हैं। अयोध्या का मुद्दा धार्मिक कम, राजनैतिक ज्यादा रहा है। यदि मुद्दा धार्मिक रहता तो किसी को विरोध नहीं होता। मैं आज भी इस बात को कहता हूं कि हमारी बात किसी को पसंद नहीं, फिर भी मैं साफ कहना चाहता हूं कि लोगों ने इसे राजनैतिक मुद्दा बना दिया है। इन लोगों को न्यायालय के फैसले का इंतजार करना चाहिये, क्यों जल्दबाजी कर रहे हैं?
20.33 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) जब ये संविधान, संसद को मानते हैं तो फिर क्यों नहीं सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानते हैं? इन लोगों को न्यायालय के फैसले को मानना चाहिये, उसका सम्मान करना चाहिये, यह मेरा स्टैंड है।
सभापति महोदय, आज इस देश में ऐसी ताकतें उभरकर सामने आ रही हैं जिन्हें ‘नयू फौर्सेज’ का नाम दिया गया है। मेरे कहने से कटियार जी को तकलीफ होगी। ६ मार्च को फैसला होने वाला है और कोर्ट कोई न कोई फैसला देने वाली है लेकिन इस बीच में इतना बड़ा तूफान उठाने की क्या जरूरत थी। देश में मन्दिर मस्जिद मुद्दा उठाकर उसे राजनैतिक रंग देना या हिन्दू राष्ट्र की मांग उठाना आत्मघाती काम है। इससे अन्य धर्म के लोगों का ध्राुवीकरण होगा। जहां तक हिन्दू धर्म की बात की जाती है, यह कोई धर्म नहीं अपितु एक संस्कृति है जो हमारी हजारों सालों की धरोहर है। ये लोग इस संस्कृति का पोस्टमार्टम कर रहे हैं। इससे अन्य धर्मों का ध्राुवीकरण होगा। इससे राष्ट्र के विघटन की शुरुआत होगी। क्या आप चाहते हैं कि आई.एस.आई. जैसी कैटेगरी की खुफिया एजेंसी धार्मिक आधार पर हिन्दुस्तान को बांट जाये, यह आई.एस.आई. की मानसिकता है। यह बिना पैसे के आई.एस.आई. का कमाल हो जायेगा।
में जो चीज नहीं भड़का सकी, इस कम्युनल पोलटिक्स से पाकिस्तान का मनोबल बढ़ेगा, हमारे देश के दुश्मनों का मनोबल बढ़ेगा। देश में जितना साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत होगा, उतना ही देश का दुश्मन कमजोर होगा, उसका मनोबल टूटेगा। यह मैं राष्ट्रीय एकता के हित में कह रहा हूं। राष्ट्र की एकता, सम्प्रभुता और जो हमारा लोकतंत्र, हमारी जम्हूरियत है, उसमें यह मेरी मान्यता है। इसीलिए मैंने निवेदन किया कि वे ऐसी ताकतें कौन है जो यहां उपद्रव मचा रही हैं। क्या ऐसी ताकतों को सरकार चिहनित नहीं कर सकती, क्योंकि सरकार का स्टैंड है कि न्यायालय की बात माननी चाहिए। माननीय प्रधान मंत्री जी ने भी कहा है कि न्यायालय का जो निर्णय होगा, वह मान्य होगा। उन्होंने आधी बात बोली है, इसलिए आप लोगों को आपत्ति है। उन्होंने शिमला में कुछ तथ्य की बात भी बोली है, जो पेपर में निकला है, उसकी सफाई सरकार देगी। सदन में सरकार मौजूद है, वह अपनी बात स्पष्ट करे, जहां धुंध है, कुहासा है, वह साफ हो। तथ्य की बात क्यों दी, उससे न्यायालय प्रभावित होगा। लेकिन उन्होंने जो बात न्यायालय वाली कही है, जो आधा पोर्शन कहा है, वह बिल्कुल सही है। उस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जो ऐसी ताकतें हैं जो धर्म संसद का निर्माण करती हैं, उस धर्म संसद में क्या-क्या पास हुआ है - उसमें हिन्दू राष्ट्र की मांग पास हुई है। यदि केन्द्र सरकार हमारी बात नहीं मानती है तो वह गद्दी छोड़े, यह पास हुआ है। सेक्युलरवाद को उखाड़ फेंकना है, यह पास हुआ है। इस देश में जो प्रोग्रेसिव ताकत या सोशलिस्ट फोर्स है, उससे भी पूरा महाभारत हम करेंगे, यह भी इसमें पास हुआ है।
सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: सभापति महोदय, मैंने अभी बोलना शुरू किया है। आप घंटी बजा देते हैं। मैं एक बात कहता हूं और यह दर्ज कर लिया जाए कि यदि इस देश में बहुसंख्यकों की भावनाओं को भड़काकर उन्हें हमलावर बना दिया जायेगा तो इस देश में न पलटन, न फौज, न पुलिस कोई काम नहीं आयेगी। जिस तरह गुजरात में कोई काम नहीं आई थीं। बहुसंख्यक हमलावर कैसे हो सकते हैं। जिस दिन इस देश में बहुसंख्यक हमलावर हो जायेंगें, उस दिन फौज, कानून-व्यवस्था आदि कुछ काम नहीं करेंगी।
सभापति महोदय, सदन में जो अयोध्या मुद्दे की चर्चा हो रही है, उस पर इससे अलग विशेष चर्चा करनी हो तो पूरी बहस होनी चाहिए। देश में बहुसंख्यकों को हमलावर बनाने वाली जो ताकतें हैं, उन्हें मानने को बाध्य करना चाहिए। इस देश के लोकतंत्र के हित में, इस देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत को अक्ष्क्षुण रखने के लिए, इस देश की सम्प्रभुता को बनाये रखने के लिए यह बहुत जरूरी है। मेरा कहना है कि देश में अयोध्या के सवाल पर बहुत जल्दबाजी की जा रही है। यदि आंतरिक मामलो को हम इतना उपद्रवी बना देंगे, इतने लोगों को भावनाओं को भड़का देंगे तो इसे हम क्या कहें, यह देश के अंदर सुपर आतंकवाद हो जायेगा। आतंकवादियों का मुकाबला करना है, उससे समूचा सदन एकमत है, पूरा देश एकमत है।
सभापति महोदय, हमारे मित्र हिन्दू संस्कृति की बहुत चर्चा कर रहे थे। हिन्दू संस्कृति के बारे में कहा गया कि हजारों साधु और संतों की उपस्थिति में संसद मार्ग चलने की बात की गई। जो बातें वहां की गईं, वे हमें मालूम हैं। हम लोगों ने स्कूल में पढ़ा है, हम लोगों की जो पढ़ाई हुई है, आपकी पढ़ाई भी उसी स्कूल में हुई होगी। जो हमने पढ़ा है -
" सिंहन की नहीं लेहड़ी, हंसों की नहीं पांत लालन की नहीं बोरियां साधु न चले जमात"
ये जमात में साधु कहां से आ गये, इतनी भीड़ कहां से आ गई, हमें समझ में नहीं आ रहा है। साधु शब्द का अर्थ हम लोग यही समझते है कि ‘स’ का अर्थ है शुभ, अच्छाई और ‘धु’शब्द का अर्थ ध्राुवीकरण, धुरी यानी समाज को जोड़ने का काम। समाज को तोड़ने, भड़काऊ भाषण देने का काम साधु, संतों का नहीं हो सकता। इसलिए मैं हिन्दू संस्कृति के विषय में कहना चाहता हूं…( व्यवधान)
सभापति महोदय : इस पर कहा है -
"साधु कहावन कठिन है लंबा पेड़ खजूर, चढ़े तो चाखे प्रेम रस, गिरे तो चकनाचूर "
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:हमारे हिन्दू संस्कृति के ग्रंथों में जहां संस्कृति की बात होती है, वहां भाईचारा, करुणा, प्यार, मोहब्बत, बंधुत्व, उदारता और इंसानियत की बात होती है। स्वामी चिन्मयानन्द जी कह रहे थे : " सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुखभाग्भवेत्। "
हमारी संस्कृति में भी सर्वधर्म समभाव की बात कही गई है। इसका मतलब यह है कि हम किसी से बैर नहीं करेंगे।
सभापति महोदय : यह भी कहा गया है - " सियाराम मय सब जग जानी। "
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: इतना ही नहीं, हमारी संसद की दीवारों पर भी लिखा हुआ है :
" अयं निज: परोवेति गणना: लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। "
क्या हिन्दू संस्कृति का यह दर्शन बदल गया है, क्या हिन्दू संस्कृति का यह दर्शन नाज़ी दर्शन में बदल गया है? जो लोग हिन्दू दर्शन की चर्चा करते हैं, हम उनसे यह सवाल करना चाहते हैं।…( व्यवधान)
जो हिन्दू संस्कृति पीठ है इस देश में, अभी आदित्यनाथ जी सदन में नहीं हैं, सदन में वे द्वारकापीठ की, पुरी पीठ की और कांची पीठ की चर्चा कर रहे थे। लेकिन इन लोगों ने क्या कहा है? इन्होंने कहा है कि दोनों समुदायों की वार्ता से यह मामला हल होना चाहिए, हिंसा और आंदोलन से हल नहीं होना चाहिए, यह शंकराचार्य ने कहा है - चाहे द्वारकापीठ के शंकराचार्य हों, पुरी के शंकराचार्य हों या कांची के शंकराचार्य हों। क्या शंकराचार्य से बडा इनका संगठन है? ये हिन्दू की बात करते हैं। सभापति जी, अब समय नहीं है नहीं तो मैं विस्तार से बताता कि किस तरह से ये लोग वार्ता के वातावरण को खराब कर रहे हैं। जब वातावरण खराब कर रहे हैं तो हल कैसे होगा?
सभापति जी, हम विज्ञान के विद्यार्थी हैं इसलिए विज्ञान की बात कहेंगे। विज्ञान ने भी मानव जाति को, सभी धर्मावलंबियों को चार कैटैगरीज़ में रखा है। ब्लड ग्रुप ए, बी, एबी और ओ। इस तरह से खंड खंड करके सीढ़ी लगाकर नहीं रखा है। आखिर जल्दबाज़ी क्यों है और इसका कारण क्या है। इसका कारण यह है कि फज़िक्स में हमने गुड कंडक्टर औऱ बैड कंडक्टर के बारे में पढ़ा था। गुड कंडक्टर लोहे की छड़ है। एक किनारा गरम करें तो दूसरा छोर भी गरम हो जाएगा। लेकिन बैड कंडक्टर सूखी लकड़ी है। एक छोर पर गरम करिये तो दूसरे छोर पर तापक्रम नहीं आएगा। जो सूखी हुई लकड़ी है, जो बैड कंडक्टर है, वह गरीबी, भ्रष्टाचार, देश की आर्थिक स्थिति, देश में पेयजल का संकट, देश में आवास की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था, सड़क, बिजली, पानी, बाढ़, सुखाढ़, किसानों की हालत, गांवों की हालत, यह सूखी लकड़ी की तरह है। इस पर बहस करें तो देश में फैलती नहीं है। लेकिन जो गुड कंडक्टर है, जाति, मज़हब और धर्म, ये गुड कंडक्टर हैं। इसलिए हमारे मित्र शॉर्ट कट पोलटिक्स के लिए यह मामला उठा रहे हैं। इसका समाधान करने की उनकी मंशा नहीं है। हम उन मित्रों से अपील करना चाहते हैं कि शॉर्ट कट पोलटिक्स छोड़ दीजिए। रातोंरात किसी समुदाय के नेता बन जाते हैं, रातोंरात उनसे वोट ले लेते हैं। क्या यह मुद्दा वोट की मशीन है? एक प्रतिशत कट्टरपंथी, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान हों, उन्होंने इस देश के ९९ प्रतिशत धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखने वाले, शांति और जम्हूरियत में विश्वास रखने वाले लोगों के अमन-चैन में खलल पहुँचाया है। हम ऐसी ताकतों की निन्दा करते हैं। ऐसी ताकतों को निश्चित रूप से देश से उखाड़कर फेंक देना चाहिए और इस मामले में न्यायालय पर भरोसा करना चाहिए और न्यायालय के निर्णय का इंतज़ार करना चाहिए।
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद) : सभापति महोदय, वक्ताओं की सूची लंबी है और जिस तरह से बहस चल रही है, उसका अंत पूरी रात में होने वाला नहीं है। आपसे हमारा विनम्र आग्रह है कि अभी तक काफी सार्थक चर्चा हमारे मित्रों ने की है। कानून मंत्री यहां विद्यमान हैं। उनका जवाब अब हो जाना चाहिए। अब इसमें विलंब करना ठीक नहीं है। इसको लंबा खींचना किसी भी कीमत पर न्यायसंगत नहीं है।
कानून मंत्री यहां बैठे हैं। आप मेहरबानी करके उन्हें निर्देशित कीजिए कि वे जवाब देने की कोशिश करें, वरना हमें कोरम का सवाल उठाना पड़ेगा।…( व्यवधान)
20.46 hrs. (Mr. Deputy-Speaker in the Chair) SHRI G.M. BANATWALLA (PONNANI): Sir, this is an attempt to scuttle the debate. Everyone of us will have to be heard.
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, हमारा आपसे विनम्र आग्रह है,…( व्यवधान)
श्री जे.एस.बराड़:सुमन जी, हमारी तरफ से कुछ माननीय सदस्य बोलने वाले शेष रहते हैं। शायद हमारे दो आदमी रहते हैं, अभी हमने एक नाम काट दिया है। इसलिए आप ऐसे जल्दी मत ाीजिए।…( व्यवधान)
SHRI G.M. BANATWALLA : We must be heard, Sir.
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, इस तरह रात भर डिबेट खत्म नहीं होगी।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष जी, यह बात सही है कि कुछ लोग बोलना चाहते हैं, लेकिन इस सवाल पर काफी सार्थक चर्चा हो चुकी है। यहां कानूम मंत्री बैठे हैं, हमारा आपके मार्फत विनम्र आग्रह है कि सरकार जवाब दे वरना पूरी रात इस पर चर्चा होगी।…( व्यवधान)हमें कोरम का सवाल उठाना पड़ेगा।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : सुमन जी, यहां खाने का प्रबंध किया गया है। कई माननीय सदस्य छोटी-छोटी पार्टियों के हैं। अभी प्रसन्ना कुमार जी का भाषण होना है।
श्री चन्द्रकांत खैरे : बनातवाल जी की बात सुन ली जाए, उसके बाद मंत्री जी बोलें।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: There are only seven more Members to speak. Please do not waste the time of the House. You may take five minutes each. Mr. Prabodh Panda may speak now.
… (Interruptions)श्री रामजीलाल सुमन : महोदय, आपने खाने का इंतजाम किया है, लेकिन खाना खाने वाले हैं कहां?…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप खाना खाकर आइए।
…( व्यवधान)MR. DEPUTY-SPEAKER: This is not the way.
… (Interruptions)
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष जी, आपने भोजन का इंतजाम किया है, इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपा कर आप सब माननीय सदस्य जरा बैठ जाइए। सात माननीय सदस्य और बोलने वाले हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : जब उधर से तीन माननीय सदस्य लगातार बोलते रहे तब आप क्यों नहीं बोलें। यह क्या हुआ?जब एक ही पक्ष के तीन मेम्बर लगातार बोले तो आपको ख़ड़ा होना चाहिए था।
श्री जे.एस.बराड़: हमारा नम्बर इनके बाद था, It is the decision of the Chair. But we would like to participate in the discussion…… (Interruptions)
श्री रामजीलाल सुमन : हमें कोरम का सवाल उठाना पड़ेगा।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Do not raise question of the quorum. Otherwise, it will create problems.
… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : अभी सात माननीय सदस्य और बोलने वाले हैं।
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष जी, आप समय-सीमा तय कर दीजिए।…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हमारी जिम्मेदारी है कि हम इनका उत्तर सुनें, लेकिन हम यह भी कहेंगे कि जब तीन माननीय सदस्य उधर से लगातार बोल रहे थे, तब कोई भी खड़ा नहीं हुआ।…( व्यवधान)इनका नम्बर आ जाना चाहिए था।…( व्यवधान)
श्री रामजीलाल सुमन : महोदय, कोई सीमा तय होनी चाहिए। मैं समझता हूं कि अधिक से अधिक आधा घंटे चलाइए और उसके बाद मंत्री जी का जवाब हो जाए।
उपाध्यक्ष महोदय : दस मिनट इस बात में चले गए हैं।
SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Sir, I thank you as you have allowed me to speak and continue the House till the discussion is over. The hon. Speaker has already told that each and every Member will be allowed to speak…… (Interruptions) I raised my hand at that time…… (Interruptions)
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष जी, मैं आपसे यही निवेदन कर रहा हूं कि जहां आपने खाने का इंतजाम कराया है, बहुत-बहुत धन्यवाद, लेकिन इस समय सदन में ५० लोग भी उपस्थित नहीं हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : आप वह मामला मत उठाइये।
SHRI PRABODH PANDA : This is not the first time that we are discussing this particular issue. The issue of Ayodhya has come in this House again and again. But the doubt in my mind is as to how far the Government has realised the situation; as to what would be the fate of this discussion; and how this discussion would be useful to the Government.
Many things have been said about Hindu religion. Let me start my deliberation quoting what Swami Vivekananda said about Hinduism. He said:
"The word ‘Hindu’ requires a littile explanation in connection with what I mean by Vedantism. This word ‘Hindu’ was the name that the ancient Persians used to apply to the river Sindhu. Now this word ‘Hindu’ as applied to the inhabitants of the other side of the Indus, whatever might have been its meaning in ancient times, has lost all its force in modern times; for all the people that live on this side of the Indus no longer belong to one religion. There are the Hindus proper, the Mohammedans, the Parsees, the Christians, the Buddhists, and Jains. This word ‘Hindu’ in its literal sense ought to include all these; but as signifying the religion. It is very hard, therefore, to find any common name for our religion."This is the version of the great Swami Vivekananda.
My point is this. We are talking about Hindutva. It is different from Hinduism. Hinduism is not Hindutva. We are going to discuss here about the present situation in regard to Ayodhya. This Government has demonstrated an unwanted haste in moving the petition before the Supreme Court seeking recall of the Supreme Court’s March, 2002 Order. It appeared in the Press that in the application, the words ‘continuing state of uncertainty’ have been mentioned. Who is responsible for this ‘uncertainty’? Nobody is responsible other than the Government itself, the Vishwa Hindu Parishad and members of the Sangh Parivar. Hon. Members have raised many points here.
After the discussion, the hon. Law Minister will try to convince us basing his argument on some technicalities and based on some legal points. But my point is that this is not just the question of legality and this is not just the question of technicality. This is the question of secularism, secular fabric of our country and secular structure of our country. So, this is very much concerned with that.
In regard to Ayodhya issue, today we are facing problems related to land, related to divisive and communal outfits and, above all, related to secular fabric of our national structure. Our country is not a theocratic country. Our State is not a theocratic State. Many things have been said about Pakistan and Arabian countries. We are not in a position to toe the line of Arabian countries and Pakistan. We are a secular country. So, we are not here just to alternate it or just to follow the line which has been pursued by the theocratic States.
About Ayodhya, it is argued that Ayodhya is the birthplace of Purushotham Rama. Yes, Sir, it has already been mentioned in the Ramayana. The important point is that the Ramayana is not a history but it is a great epic. In spite of that, a large section of the people in the country believes that Ayodhya is the birthplace of Purushotham Rama. There are so many gods and deities in the HinduPuranas. I think there are 33 crore gods and deities in the Hindu Puranas. Do we believe that theory? The Law Minister or the Home Minister may be knowing the birth places of all the 33 crore gods and deities mentioned in our Puranas. So, my point is that the Ramayana should be considered as a great epic. It is not a history.
So many things were told about religion. I am not going into religion now. I am not a religious person. It is told:
"Sarvatra Sukhino Santu Sarve Santu Niramaya. "
My friends, what do you mean by Sarvatra? Why do you like to confine them within a particular community? It is told about Ramathat He is supposed to be the Almighty God; He is Omnipotent, Omniscient and an all-pervading person. That being so, why should you try to confine Him to a particular place? It has already been invented that the Garbhgriha of Ramlala is there; Sita’s Rasoi is there. I am not going into the details of it now.
MR. DEPUTY-SPEKAER: The next speaker is Shri J.S. Brar.
SHRI RAMJI LAL SUMAN : Sir, is he the last speaker? I would request that Shri Brar should be the last speaker.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: You are wasting the time of the House. Shri Panda, please try to conclude.
SHRI PRABODH PANDA : My point is that a solution should come out of this. We should try to have a consensus. There should not be any hurry. Nothing should be done hurriedly. The petition, which has been moved in the Supreme Court, should be withdrawn. We should admit that the Prime Minister spoke like a spokesman of the Sangh Parivar. He did not speak like a Prime Minister. That is why, I just cannot uphold the comments he made during the election campaign in Himachal Pradesh. As I said earlier, my point is that the petition should be withdrawn.
I make my last point now. It has already been said about so many rulers in the past, so many past happenings. Are we in a position to review all the good deeds and misdeeds committed by them since the inception of the Indian civilization? Are we in a position to review what other rulers have done, what the other religious people have done? Are we in a position to review everything since the inception of the Indian civilization? So, you have got to accept a particular date. The date is the date of Independence. The date is the date when the Constitution has come into being. That should be the basis. Based on that, we should try to solve everything with regard to this problem which is before us.
With these words, I conclude. Thank you very much.
श्री जे.एस.बराड़:उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका बहुत आभार व्यक्त करता हूं क्योंकि माननीय मुलायम सिंह जी मुझसे प्यार से नाराज हो रहे थे। सही मायने में…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हम नाराज नहीं हो रहे थे। उधर से चार वक्ता इकट्ठे बोले। मैं कह रहा था कि आपको बोलना था तो आप खड़े होते। हमने सोचा कि अब कोई बोलने वाला नहीं है इसलिए मैंने कोरम के बारे में कहा। उन्होंने कहा कि कोरम नहीं है। …( व्यवधान)
श्री जे.एस.बराड़:उपाध्यक्ष महोदय, सारे स्वामी सदन से उठकर चले गये हैं। …( व्यवधान)
सत्ता पक्ष की ओर से मैं दो बोलने वाले स्पीकर्स की तकरीर पर टिप्पणी करना चाहता हूं--एक स्वामी चिन्मयानंद जी और दूसरा आदित्यनाथ। ये दोनों सदन से उठकर चले गये हैं। अब डिबेट के अंतिम चरणों में जब सारा रस खत्म हो चुका है, तो मैं बोल रहा हूँ ।
21.00 hrs. मैं आपकी इजाजत से केवल प्वाइंट्स ही बोलूंगा और जितना वक्त आपने मुझे दिया है, उसमें मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। वैसे सारी बात का सारांश मैं भाजपा सत्ता पक्ष, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, आरएसएस और संघ परिवार से इस बहुत कठिनाई भरे मोड़ में यह कहना चाहता हूं जो किसी ने कहा है और यह इनके ऊपर लागू होता है:
देखो, ओ दीवानो, तुम यह काम न करो, राम का नाम बदनाम न करो।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का सत्कार करो लेकिन हम इस ट्रैप में आने वाले नहीं हैं। क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम का धर्म एक तरफ है और राम का जो राजनीतिकरण किया गया है, वह दूसरी तरफ है। मैं अब पहला मोड़ इस डिबेट का जो अभी तक बात नहीं कही गई है, वह मैं कहना चाहूंगा, जैसे ब्रटिश एम्पायर का केन्द्रीय बिन्दु डिवाइड एंड रूल रहा तो मेरे पास सनसनीखेज दस्तावेज है।
"It is noteworthy that when the Hindus and the Muslims of Ayodhya led by Raja Debi Baksh Singh, Amir Ali and Ram Charan Das worked out an agreement settling the dispute and a land in the open yard of the Masjid was handed over for erecting a platform known as Ram Chabutra, the British were dismayed and deeply worried by this demonstration of unity between the two communities. The Sultannabad Gazetteer records this anguish in the comments of Col. Martin who observed, "We, the British, had been deeply worried by the decision, that is, the settlement of dispute between Hindus and Muslims. We had apprehended that the British Raj in India will come to an end.""
अब ५६ वर्ष बीत जाने के बाद भाजपाकी यही नीति है। मैं भी दसवीं लोक सभा का सदस्य था। मैंने यहां से अपोजीशन बेंचेज से माननीय एल.के.आडवाणी साहब और श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के भाषण सुने और इस टिप्पणी पर जो उन्होंने की। जेटली साहब के लिए यह सोचनीय बात होगी जो मैं कहने जा रहा हूं और जो १९९४ में जस्टिस एस.पी.भरूचा ने कहा:
"Ayodhya is a storm that will pass. The dignity and honour of the Supreme Court cannot be compromised."
यह उन्होंने डिसेंट फोर्म में मैजोरिटी जजमेंट के खिलाफ कही, इससे ज्यादा और महत्वपूर्ण बात नहीं हो सकती कि सुप्रीम कोर्ट की डिगनिटी के साथ जो खिलवाड़ करेगा, क्योंकि कम्प्रोमाइस करने के जो प्रयास हो रहे हैं, उनका हम विरोध करते हैं। यह बात भी पहले नहीं आई है जो मैं टिप्पणी करना चाहता हूं। यह मैंने नहीं कही, यह हमारे माननीय नेता सोनिया गांधी ने नहीं कही, यह शिवराज पाटिल साहब और हमारे सीनियर कुलीग जयपाल रेड्डी साहब ने भी नहीं कही। लेकिन ९५ वर्षीय वृद्ध रामचंद्र परमहंस ने यह ऐलान किया कि २५ मार्च को मन्दिर के निर्माण का काम आरम्भ कर दिया जाएगा औऱ साध्वी रितम्बरा ने जो धर्म संसद अभी हुई है, उसमें रामचंद्र परमहंस जी के बारे में यह कहा:
जिन पर यह गुमान था कि वे हंस हैं, वे बगुले निकले, हमको भी कौवों से बगुले बनाने आते हैं।
राज घर्म, धर्म निष्ठा और न्याय निष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जिन्दगी का सारांश है जो एक-दूसरे को प्यार और भावना सिखाता है, वह इस बात से कितना बड़ा नुकसान हुआ है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं। मैं यह बात जरूर कहना चाहूंगा, तोगडिया साहब के बयान का जिक्र हुआ है। उन्होंने कहा है--
"If we do not act, Hindus will be unsafe. There will be 10 Pakistans in India. We will have to fight a new Mahabharat. "
जेटली साहब, महाभारत के बारे में आपके नेता, हमारे सत्कारित प्रधान मंत्री जी ने जो ५१ कविताएं लिखी हैं, उनमें एक कविता में उन्होंने कहा है --
कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है दोनों ओर शकुनियों का फैला कूट जाल है।
मैं एक अन्य मुद्दे पर आना चाहता हूं। हम इसमें पार्टी हैं इसलिए कि हम माइक्रोस्कोपिक माइनोरिटी हैं। आर.एस.एस. के सर संघचालक सुदर्शन साहब अमृतसर में गए थे। ५५ बरस बीत जाने के बाद, जो स्ट्रगल वहां के लोगों ने की, जिसका जिक्र गुरू रवीन्द्र नाथ टैगोर जी ने भी किया है कि हिन्दू, मुसलमानों, सिखों और दलितों आदि ने जो इकट्ठे होकर लड़ाई लड़ी, वहां जाकर वे कहते हैं कि हम केवल अपने समाज के लोगों का ऑनर करने जा रहे हैं। क्या इससे धर्मनिरपेक्षता मजबूत होती है और क्या इससे धर्म बनता है। जिसने सरबंस लुटाया इस देश की खातिर, उन गुरू गोविंद साहब ने और उनके पिता गुरू तेगबहादुर ने जो सबसे बड़ी युनिक शहादत दी, उनका फरमान है कि हिन्दू-तुर्क कोऊ, राफजी इमामसाफी, मानस की जात सब एक ही पहचानबो। वे मानस की जात की बात करते हैं और ये एक फिरके की, एक धर्म की बात करते हैं। इस तरह से पंजाब के पानी में आग लगाने से देश का बहुत बड़ा नुकसान होगा। यह बात मैं इस पार्टी के नेताओं को बताना चाहता हूं। अगर श्रीमती सोनिया गांधी, जो इस देश की नेता हैं, जिनके परिवार ने इतनी बड़ी कुर्बानियां दी हैं, वे मंदिर में जाती हैं तो भाजपा वाले कहते हैं वे मंदिर क्यों जाती हैं। अगर वे रघुनाथ मंदिर में मत्था टेकने जाती हैं, तो विश्व हिन्दू परिषद वाले कहते हैं कि क्यों जाती हैं। वे अक्षरधाम में, जहां इतनी बड़ी ट्रेजिडी आतंकवाद की हुई, जो उनके लिए जेहाद था, वहां सबसे पहले वे कमेंट करने के लिए जाती हैं तो कहते हैं कि क्यों गईं। विपक्ष की नेता होने के नाते वे श्रीनगर में जाकर भाषण देती हैं तो उसके ऊपर भी टिप्पणी हुई।
मैं एक और सनसनीखेज रिपोर्ट सदन के पटल पर रखना चाहता हूं। मुलायम सिंह जी आप देश के नेता हैं, आपके लिए हमारे मन में बहुत आदर है।
"Police Constable Mata Prasad filed the report on 23rd December, 1949 at the Police Station that Ramadas, Ram Shakal Das, with 50-60 persons, defiled the masjid by putting idols inside it. It is false to say that these idols were there from time immemorial."
यह सही मानो में २३ दिसम्बर, १९४९ को मर्यादा पुरूषोत्तम राम जी की प्रतिमा वहां आटोमेटिकली नहीं आ गई। यह एफ.आई.आर. की रिपोर्ट है कि कैसे वहां उनका प्रवेश हुआ। इसके बावजूद मर्यादा पुरूषोत्तम राम महाराज जी का मंदिर बने, सारा देश चाहता है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन सही मानो में मुझे रावण महाराज के समय रानी मंदोदरी की एक बात याद आ रही है, वह मैं जरूर एक मिनट में कहना चाहूंगा। यहां पर मेरी बहन सुषमा स्वराज जी नहीं हैं, अगर होतीं तो उनको अच्छी लगती। अगर बाबर की हम निंदा करते हैं, सबसे पहले, "Guru Nanak stood against the might of Babar in Punjab."
एमनाबाद की जेल में रखा गया। उनको कहा गया कि चक्की पीसो। उन्होंने पाप की जंज में काबिलों जाया, चोरी मंगे कन्न मिला लो, वह नानक जो हिन्दू-मुसलमानों के एक कॉमन फिगर थे, उन्हें वहां गिरफ्तार किया।
मैं मंदोदरी की बात कर रहा था। वे रावण को, अपने पति को समझाने लगी। वह बहुत मनोहर बोल बोली। उसने रावण के चरण पर सिर रखकर अंचल पसारा। यह रामचरित मानस में तुलसी दास जी की वाणी है। उसने कहा कि बैर उससे करना चाहिए, जिसको बल और बुद्धि से जीता जा सके। मंदोदरी कह रही है कि जितना सूर्य और जुगुनू में अंतर है, उतना मर्यादा पुरूषोतम राम और आप में है। इस देश की आस्था टौलरेंस है, जिसके लिए मैं सरकार से विनती करना चाहता हूं। अब जैसा कहा गया है कि नव-महाभारत होगी। उसका नतीजा क्या होगा? इस देश का पहले ६ देशों में नम्बर आ रहा है और २१वीं सदी में कोलम्बिया शटल से कल्पना चावला की शहादत का बखान क्या धर्म के नाते होता है, क्या वह हिंदुस्तानी के नाते होता है। यह बात मैं सरकार से कहना चाहता हूं।
माननीय गोलवरकर साहब को मैंने पढ़ा और उसकी कॉपी की। वे कहते हैं कि "All those not belonging to the national, that is, Hindu Race, religion, culture and language, naturally fall out of pale of real national life…Those only are nationalist patriots, who, with the aspiration to glorify the Hindu race and nation next to their heart, are prompted into activity and strive to achieve that goal. All others are either traitors and even enemy to the national cause or to take a charitable view idiots."
आपने सत्ता का पांच बरस का आनंद लिया है। लेकिन अगर आप तोग़ड़िया साहब को और बजरंग दल की गलत नीतियों को नहीं रोकेंगे तो how can you justify a struggle? जो पंजाब के लोगों ने १२ साल आतंकवाद के खिलाफ लड़ी। उनके खिलाफ टाडा, पोटो और अन्य कई कानून लगे। अगर देश का कानून एक है और अगर श्री एल. के आडवाणी साहब में दम है तो ९ सितम्बर १९९७ "Special judge orders framing of charges against all accused including Advani." किस शक्ति के कारण ये यहां बैठे हैं। मैंने आडवाणी साहब को नोट लिखते माननीय अटल बिहारी साहब के सामने देखा। उन्होंने कहा कि जब तक उनके खिलाफ चार्जेज हैं मैं सदन में उतनी देर नहीं आऊंगा जब तक चार्जेज से बरी नहीं हो जाऊंगा। ये सारी की सारी कार्यवाही देश को बांटने के लिए, देश को तोड़ने के लिए देश को कमजोर करने के लिए है। Or there is a serious thinking even in their allies in Punjab, in Akali Party. वे कह रहे हैं कि अगर अक्लियतों का इस प्रकार मलियामेट भाजपा की नीतियों ने करना है तो इनके साथ बैठना और सरकार चलाना, विश्वभर में उसका क्या प्रभाव जाता है, उसके चर्चे वहां हो रहे हैं।
महोदय, मैं दो-तीन बातें और कहना चाहता हूं।
"VHP honours Dara mother, chief guest says who’s she?
VHP’s Vishnu Hari Dalmia today honoured Raj Rani, the mother of Graham Staines murder accused Dara Singh, and Dharmrakshak Shri Dara Sena president Mukesh Jain at a function organised to celebrate the birthday of former BJP MP B.L. Sharma ‘Prem’ "ग्राहम स्टेन्स के दो बच्चे थे। गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के चार बच्चों की कुर्बानियों की तस्वीरें देश के घर-घर में हैं। उनका क्या दोष था? दो बच्चे जो सात और नौ बरस के थे, उनका क्या दोष था? वे लोग लैप्रोसी के रोग से पीड़ित लोगों की सेवा करते थे, लेकिन उनको जला दिया गया । वीएचपी जो उनका अंग है, वे दिल्ली में आकर ऑनर करते हैं। यह कितने शर्म की बात है।
अंत में, मैं ज्यादा समय न लेते हुए एक बात और कहना चाहता हूं। टालरेंस होनी चाहिए, विरोधी की बाद में अगर दम है, तो उसको सुनने के लिए हौंसला और तौफिक होनी चाहिए। बाबर के खिलाफ पंजाब में सबसे पहले लड़ाई लड़ी गई। मैं एक बात और रिकार्ड में लाना चाहता हूं। Who can deny that Tuzk Babri, translated in Persian as Babar Nama (1589) and in English (1921-22) is a world classic? बाबर की विद्वत्तता के ऊपर कोई टिप्पणी नहीं हो सकती है। उसने जुल्म किए, कत्ले आम हुआ, पंजाब को १५ बार खत्म किया गया और हरमिन्दर साहब जी से साथ भी हुआ, गायों के सिर काटे गए और आदमियों का लहू फैंका गया, He was not only a poet of great gifts he was equally great prose writer of style. मेरे कहने का मतलब है कि विरोधी भी अगर विरोध करते हैं, उनमें अगर ९० अवगुण होते हैं और दस गुण होते हैं, तो बाबर की औलाद के नारे लगाए जाते हैं। जेटली जी, सत्ता मिल सकती है और आपका चेहरा तो देश के भविष्य का चेहरा है। आज की पीढ़ी आपकी हमसफर है, लेकिन जो हिडन एजेंडा है, उसको त्याग दीजिए।
इन्ही शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
…( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :अगर कानून मंत्री जी इजाजत दें, तो मैं जाना चाहता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय : इजाजत हमसे लीजिए, उनसे क्यों पूछ रहे हैं।
SHRI G.M. BANATWALLA : Thank you, Mr. Deputy Speaker, Sir, it is shocking that the Government has deemed it fit to approach the Supreme Court to vacate the stay order relating to any religious activity or transfer of any portion of the acquired land in Ayodhya. It is deplorable that the Government has deemed it fit to espouse the cause of the Vishwa Hindu Parishad and the Sangh Pariwar and to jettison the principle of neutrality.
Sir, it is imperative of secular polity that the Government must be neutral in religious matters and the Government must refrain from promotion of any particular religion. But here, in violation of all these principles we find the Government moving forward with its petition to the Supreme Court. The Prime Minister of India, Shri Atal Bihari Vajpayee describes construction of temple on the Babri Masjid site as a national sentiment.
Later, during his speech in Himachal Pradesh, he even goes to the extent of saying that there is conclusive evidence of an earlier temple at the site of Babri Masjid. Sir, this is trying to influence the Courts.
The Deputy Prime Minister describes the attempt to have a temple at the site of Masjid as a symbol of cultural nationalism. He has even gone to the length of declaring preparedness to bring legislation to hand over the entire acquired land, both the disputed Babri Masjid land and the so-called undisputed land, through legislation, for construction of mandir, though he may have added a political rider that this would be done if the Congress Party agreed. Sir, I must say that it is abundantly clear that the Parliament cannot pass a legislation in a matter which is before the Supreme Court, before the Lucknow Bench of the Allahabad High Court, and in a matter which is a dispute on property rights. Through legislation, we cannot settle a property right dispute. That will be usurping the functions of the Judiciary upsetting, usurping and wrecking the respective constitutional functions of the Judiciary and the Legislature.
Mr. Deputy-Speaker, Sir, let it be clearly understood that the Government’s attitude on Ayodhya issue is subversive of all sound principles of constitutional governance, brazen violation of the basic features of the Constitution, destructive of secular polity, sabotage of the democratic foundations of the country, and an unabashed attempt to raise a fascist communal raj. All this is highly dangerous for the entire nation.
Sir, there is a continuous misleading propaganda that what the Vishwa Hindu Parishad, the Ram Janmabhoomi Nyas and the Dharma Sansad want is only the undisputed land, which is their own. And it is from there that they want to start and commence the construction of the temple.
Sir, this is misleading the nation. In the first place, it must be understood that the blueprint on which the construction of the temple is to start includes also the disputed Babri Masjid and, therefore, lacks in legal validity totally.
Sir, it must also be clearly understood that what is called the undisputed land includes considerable wakf land. These wakf land in the undisputed land cover 23 Nazul plots spreading over 12 revenue plots.
They include four mosques on plots No. 580, 590, 593 and 595. … (Interruptions) Sir, I do not yield. I have no time.
MR. DEPUTY-SPEAKER: He has not yielded.
SHRI G.M. BANATWALLA : They include four other mosques on plots No. 580, 590, 593 and 595. … (Interruptions) They include 13 Muslim graveyards. … (Interruptions) Sir, you call the House to order. I have not yielded. My time is being usurped here.
श्री विनय कटियार : उपाध्यक्ष महोदय, जो इन्होंने कहा है (Interruptions) … * उपाध्यक्ष महोदय : आपका रिकार्ड में नहीं जायेगा। आपको नियम के अंतर्गत कोई विषय उठाना चाहिये। मैं ऐसे कैसे अलाऊ करूं?
SHRI G.M. BANATWALLA: Mr. Deputy-Speaker, Sir, they include 13 graveyards on plots No. 580, 581, 582, 588, 590, 593, 594, 595, 606, 607, 619, 620.… (Interruptions) They include a famous Dargah known as Khawaja Hatti Ki Mazar on plot No.625.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record because he is not yielding. That is all I can say.
(Interruptions) …* SHRI G.M. BANATWALLA : There are other plots also owned by the Wakf Board, namely, Wakj Ahade Shahi on plot No.588, on whichShilanyas was also performed.… (Interruptions) The land may be undisputed but it does not belong to the Hindus or to the Vishwa Hindu Parishad. It does not belong to the Ram Janmabhoomi Nyas. … (Interruptions) Sir, there is also the undisputed land which belongs to various Hindu Temple Trusts. … (Interruptions)
SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): Do you not allow the Members to speak even in the House? What do you mean by this?
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I have already told that when the hon. Member is not yielding, whatever he has uttered is not going on record.
(Interruptions) … * SHRI G.M. BANATWALLA : Mr. Deputy-Speaker, Sir, the undisputed land includes plots of Temple Trusts. … (Interruptions)
SHRI SHIVRAJ V. PATIL : He is disturbing. This is what we are objecting to.
* Not Recorded MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Vinay Katiyar, please do not disturb now. You hear him.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) …* SHRI G.M. BANATWALLA : It may be undisputed land but it does not belong to the Vishwa Hindu Parishad or to the Ram Janmabhoomi Nyas. The land belongs to several Temple Trusts but not to the Vishwa Hindu Parishad.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing is going on record except the speech of Shri Banatwalla.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: This is not the proper way.
SHRI G.M. BANATWALLA : Sir, I should be given protection.
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : श्री कटियार, जो भी मामला उठाना हो, उसका कोई कायदा होता है। अगर आपको आपत्ति है तो कोई तरकीब से उठाना होता है। नियमों के मुताबिक माननीय सदस्य को पहले यील्ड करना होगा। जब वे यील्ड नहीं कर रहे तो मैं आपको इजाजत कैसे दे सकता हूं? आपको व्यवस्था का प्रश्न उठाना है, क्या कोई अनपार्लियामेटरी वड्र्स हैं। ऐसा नहीं होगा कि आप जब चाहें खड़े होकर बोलते रहें।
।श्री विनय कटियार : अध्यक्ष महोदय, ये हाउस को मिसलीड कर रहे हैं (Interruptions) … * SHRI G.M. BANATWALLA : No, Sir, I have not yielded. I should be given my fair chance.
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी रैमेडी दूर हो सकती है लेकिन नियम के मुताबिक, मैं आपको अलाऊ नहीं कर रहा हूं।
* Not Recorded Sir, the undisputed land includes several temple trust properties, which may be undisputed but which do not belong to the Vishwa Hindu Parishad or the Ram Janmabhoomi Nyas. Those temple trusts fiercely and strongly contest any intervention or any interference by the Vishwa Hindu Parishad. For example, there is the Panch Ramanand Nirmohi Akhada at Ayodhya, which, by a suit in the court, has challenged the interference of the Vishwa Hindu Parishad. I have a list of eight such temple trusts which have their property in the undisputed land. Those undisputed properties belong to them but not to the Vishwa Hindu Parishad or the Ram Janmabhoomi Nyas. Those temple trusts contest the interference of the Vishwa Hindu Parishad or the Ram Janmabhoomi Nyas. There are a lot of other properties there. … (Interruptions)
श्री विनय कटियार : सर, यह हमें गाली देने का फोरम हो गया।
उपाध्यक्ष महोदय : अगर ऐसा होगा तो हम एक्सपंज करेंगे।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri G.M. Banatwalla, please conclude now.
SHRI G.M. BANATWALLA : How can I conclude now? All my time was taken up by him. Please give me a few minutes to conclude.
Even after the final determination of the suit, no land could be transferred to the Vishwa Hindu Parishad or the Ram Janmabhoomi Nyas in terms of sub-section (1) of section 6 (a) of the Acquisition of Certain Areas at Ayodhya Act, 1993. It says that after final adjudication and after final determination of all the title suits, the surplus land could be given to a trust or a body founded after the commencement of the Act. The Vishwa Hindu Parishad and the Ram Janmabhoomi Nyas were founded before the Government enacted this legislation. … (Interruptions)
They are only defiling the atmosphere of the nation. They hold no locus standi. Even the temple trusts on the undisputed land challenge their interference.
The Vishwa Hindu Parishad and those of the Ram Janmabhoomi movement do not accept the authority of the court. It is abhorring that the Government has chosen to stand in the Supreme Court as a proxy for the Vishwa Hindu Parishad. It is abhorring that the Government is hand in glove with those who have a dark record, with questionable motives and methods and with a woeful lack of credibility. Since the Government is hand in glove with them, these forces are repeatedly violating even the written undertaking given to the Supreme Court. … (Interruptions) The Government is hand in glove with those accused of the heinous crime of the demolition of the Babri Masjid, with those who are guilty of contempt of the court, with those who have no respect for the rule of law or to the Judiciary and those who continuously violate the apex court’s order. … (Interruptions)
Today, there is a conspiracy to start construction and so surround the Babri Masjid’s disputed area that later on it would become impossible to implement the court verdict.
I have no misgivings whatsoever that better counsel would prevail upon this Government. I have no such misgivings but the need is for the Government to withdraw its petition.
That is the need of the hour and that need needs to be fulfilled. The need is to take a firm and stern action against those challenging the entire system or else the enlightened people of India will certainly give a befitting reply to those who are ruling at present.
DR. PRASANNA KUMAR PATASANI (BHUBANESWAR): Mr. Deputy Speaker Sir, I thank you very much for giving me an opportunity, at this late hour, to participate in the discussion.
Sir, those who are presently involved in politics are moving within the political arena being barricaded by goondas, by hooligans, by police and Black Cats and we are accepting them. Then, what is the difficulty to accept BJP, who are moving with sanyasis, sadhus and sants? That is why, I honour BJP Party also.
Let me prove what the secularism is. My Lord Jagannath, the Lord of the Universe, is also a secular God. He is wearing lungi and his face is half-Moon and laughing. Muslims are also wearinglungis and are worshipping the half- Moon. So, my lord isMusalman. Likewise, Lord Jagannath goes in a rath at the time ofRath Yatra in a great way being worshipped by lakhs and lakhs of people. He is crowned with a Tahia, ie. "flower crown" and that is bound around the waist through rope. It appears like a cross. So, we can say that the Lord is converted into Jesus Christ. The cross symbolises Christianity. So, our Lord Jagannath is a secular Lord like Lord Hanuman. As I worship Lord Hanuman, Muslims are worshipping the vacuum state and that is called `Pawan’, the `wind’.
According to quantum physics, the state of least excitation, that is the zero entropy where mind goes to attain zero state of consciousness, the transdental consciousness, is called vacuum. So, that vacuum state is the field of all the possibilities and the home of all knowledge. We can attain that Shunya, Mahashunya, that is cosmos, and the cosmos can be transferred into cosmic one while somebody is enchanting the holy mantras. So, Muslims are enchanting to the vacuum state and that vacuum state is also pawan, unseen, that is, to be realised within. Pawan is the Father of Lord Hanuman. The Lord Hanuman, that is, Pawanputra is Sultan, Rehman and Musalman. The same Lord Hanuman crucified his own body to exhibit his own Guru Rama by piercing the heart, to exhibit his Gurudev, the great `Rama’. Similarly, the God is worshipped as Christian. So, Hanuman is a secular God; is a God for Hindus, for Muslims and for Christians.
Now, I want to say something about trishul,that is, crystal. If you put on the side of the crystal the rod and add above the trishul half-moon (ardh chandra and a dot), it is known in Urdu as `Allah’. So, trishul is a symbol of secularism. It is worshipped by every religion. वह अल्लाह बन जाता है। त्रिशूल भी अल्लाह हो जाता है, त्रिशूल भी क्रिश्चियन हो जाता है। Likewise, on the one hand, our hon. Prime Minister, Shri Atal Bihari Vajpayee, is a leader of secularism because he knows the art as to how to honour the Opposition Leader, Shrimati Sonia Gandhi, and on the other hand, he knows the art as to how to honour our President, Dr. A.P. J. Abdul Kalam. So, our hon. Prime Minister is a leader of secularism. In the secular country India, Bharat (Bha) means Alok, where one who is engaged to get that enlightenment, one who is engaged in sadhna, one who is engaged in tapasya; and one who is engaged in dhyana, and all these equal to Bharat. Bharat means Bhaat and Bhaat means rice, which is culturing the art of love and the art of agriculture.
Where there is no war, we can name it Ayodhya. `अ’ means anadi, ‘अ’ means anant, `अ’ means akhand, unbounded, unfathomable, unlimited and most of eternal. `ज’ means janani, my motherland, ` ज’ means yuddh, war. Where there is Ayodhya, there is no war. `ज’ means jyotirmay. One can attain enlightenment. ` ध्य’ means dhyanam, meditation. जहां मोहब्बत हुई, वहां युद्ध नहीं हुआ। Where there is union with the absolute, where the knowledge is structuring consciousness, within that stage of consciousness, the impulse of creative intelligence may reside. That inside is called Ayodhya. Ayodhya is the heart of the country. "ध"मतलब ध्यान होता है और जहां ध्यान होता है, उसे अयोध्या कहा जाता है। जहां निरंतर योग होता है, उसे अयोध्या कहा जाता है और जहां अध्यात्म के लिए युद्ध होता है, उसे अयोध्या कहा जाता है। Hindu is one who knows the art of tolerance. He is the best Hindu who knows the art of honouring the Muslims. He is the best Hindu who knows the art of honouring the Christians, who knows the art of honouring all the castes and creeds. The same Hindu is the shwas of the humanity. The heart of Ayodhya is Ram. Ram is suraj. `म’ means motherland and ` भ’ means Bharat, ` भ’ means "ह"का मतलब हिमालय और इंदु का मतबल कुमारीका होता है। जो आलोक खंड में रत, साधना में रत है, उसे भारतवर्ष कहा जाता है, अयोध्या कहा जाता है। Now, I come to the enchanting of Ram mantra. The mantra that somebody is enchanting, that name, the Ram Mantra is containing a pocketful of cosmic vibrations. So, this is the vibration for a temple and for that temple to be located in Ayodhya. अयोध्या में टेम्पल नहीं होगा तो क्या लंदन या पाकिस्तान में होगा।
Shri Narasimha Rao failed to check up the demolition. Shri Narasimha Rao failed to protect the temple. They are trying to construct the temple. When the demolition could not be checked up, how can construction be checked up? It is the law of nature and it happened according to the law of the nature. Whatever be the law of nature, one should abide by it. There is a law of nature and if you try to break it, you will be meeting natural calamities. Everyday, a person releases strain, stress and fatigue and it is absorbed in the cosmos. This cosmos is playing like a blotting paper. Likewise, if the laws of nature are broken, it may result in famine, flood and war. To check up war, let us plunge into a war for religion so that there should be a temple. Nearby that temple, you can construct a church. Nearby that temple, you can construct a mosque – there is no problem - to protect humanity. Let us protect humanity. Let us save our country. Let us wait for the verdict of the court. I will honour it.
श्री जोवाकिम बखला (अलीपुरद्वारस):उपाध्यक्ष महोदय, अयोध्या मुद्दा बहुत संवेदनशील विषय है। इसके पहले भी इस पर बहुत बार यहां चर्चा हुई है और आज एक बार फिर हम इस संवेदनशील विषय पर बहस कर रहे हैं।
महोदय, मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि यह जो संवेदनशील अयोध्या के विवाद का मुद्दा है, उस पर उच्चतम न्यायालय के पास अर्जी देकर सरकार की ओर से जो प्रयास किया गया है, सर्वप्रथम मैं उसकी निन्दा करता हूं। सरकार के सहयोगी दल, यानी घटक दलों ने भी अपनी-अपनी बातें कहने की कोशिश की है। मुझे उम्मीद थी कि घटक दलों की जो भूमिका सत्ता पक्ष के लिए होनी चाहिए थी, वह भूमिका घटक दल अदा की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जिन वक्ताओं ने घटक दलों की ओर से यहां अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की कोशिश की, उनमें से कुछ वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहने का प्रयास किया कि सत्ता पक्ष की जो मंशा हे, उनके साथ उनकी ओपनियन अलग है।
जो घटक दल इस तरह के विचार रखते हैं, उन घटक दलों से मैं निवेदन करता हूं कि आप अपने विचारों को और गम्भीरता से, और शक्तिशाली रूप में रखें ताकि जिस नीयत से यह सरकार देश को धर्म के नाम पर बांटने का प्रयास कर रही है, उस सरकार की हम लोग निन्दा कर सकें।
इस मुद्दे का फैसला उच्चतम न्यायालय के माध्यम से होना चाहिए, इसमें कोई दो राय हमारे बीच में नहीं हैं, ऐसा मेरा सुझाव है। लेकिन मुझे लगता है कि धर्म का जो मुद्दा है, यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है, इसीलिए शायद आम जनता में इसका प्रभाव बहुत ज्यादा और बहुत सहज ढंग से होने की संभावना है और इसीलिए शायद सत्ता पक्ष, विशेषकर वाजपेयी जी ने नेतृत्व में जो भाजपा की सरकार है, वह धर्म के नाम पर सस्ती राजनीति करना चाहती है। मैं इसकी निन्दा करना चाहता हूं। मैं नहीं जानता कि किस परिस्थिति में वह ऐसा कर रही है। शायद आर.एस.एस., बजरंग दल या विश्व हिन्दू परिषद के दबाव में ही माननीय प्रधानमंत्री जी ने हिमाचल प्रदेश में अपने वक्तव्य में जिस तरह की बात कही, वह काफी निन्दनीय है। इस तरह की बात उन्हें नहीं कहनी चाहिए थी। हमारे देश में सभी धर्मों का सम्मान होना चाहिए। हमारे देश का चरित्र धर्मनिरपेक्षता का है, सैकुलर करैक्टर के कारण हमें अपने देश पर गर्व होता है, हम अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन तब दुख लगता है, जब सत्ता पक्ष के लोग सस्ती राजनीति के लिए इसे हथियार बनाने का प्रयास करते हैं। मैं समझता हूं कि यह बहुत ही निन्दनीय काम है। इस कार्य में हमें बाधा पहुंचानी चाहिए, हमें इसका विरोध करना चाहिए।
हमारे देश में क्या अन्य समस्याएं नहीं हैं, गरीब लोगों की समस्याएं नहीं हैं, किसानों की समस्याएं क्या नहीं हैं, मजदूरों की समस्याएं क्या नहीं हैं, गांवों में पीने के पानी का प्रबन्ध क्या हम लोग करने में सफल हुए हैं? इन समस्याओं को कितनी गम्भीरता से यह सरकार लेती है, मुझे उनकी नीयत पर संदेह है, मुझे उनकी मंशा पर संदेह है, इसलिए मैं आगाह करना चाहता हूं कि कहीं ऐसा न हो कि धीरे-धीरे आर्थिक गुलामी की जंजीर में हमारा देश, हमारी आम जनता जकड़ न जाये। जिस अर्थनीति की बात यह सरकार चला रही है, जिस तरह की नीति यह बनाने का प्रयास कर रही है, उससे मुझे लगता है कि किसी के दबाव में यह सरकार जरूर है। हमारे देश में जहां तक धर्म का सवाल है, हमारे देश में जहां सम्प्रदाय का सवाल है, हम तो सब को एक साथ मिलकर चलने के आदी हैं। हमें जिस तरह बगीचे में वभिन्न तरह के फूल होते हैं और उसके कारण से बगीचे का सौन्दर्य बढ़ जाता है, इसी तरह हम लोगों को समझना चाहिए कि हमारा देश महान है। हमारे भारत देश में वभिन्न जातियों के लोग हैं, वभिन्न सम्प्रदाय के लोग हैं, वभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग हैं, लेकिन मुझे बहुत दुख होता है, जिस तरह से सत्ता पक्ष के कुछ वक्ताओं ने अपनी बातें यहां कहने की कोशिश की, जिस तरह से एक विशेष धर्म के पक्ष में वकालत करने की कोशिश की। मुझे लगता है कि यह निन्दनीय है। इस मानसिकता से ऊपर उठने की आवश्यकता है, इस संकीर्णता से ऊपर उठने की आवश्यकता है। जब तक हमारी मानसिकता इस संकीर्णता को सजाए रखेगी, तब तक हम इस देश का विकास नहीं कर पाएंगे, तब तक हम इस देश में एक दूसरे को बांटने का काम करेंगे। इसलिए आइये, हम लोग एक साथ मिलकर इस देश के मुद्दों पर गम्भीरता से विचार करें, न कि धर्म के नाम पर कहां मंदिर बने, कहां गिरजा बने, उस पर अपना समय बर्बाद करें। यह फैसला उच्चतम न्यायालय के ऊपर छोड़ देना चाहिए। उच्चतम न्यायालय का जब फैसला आयेगा, तब हमें उस फैसले को मानने के लिए तैयार होना चाहिए।
यही निवेदन करते हुए और आपका धन्यवाद करते हुए मैं अपना वक्तव्य समाप्त करना चाहता हूं।
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी का जवाब करा दीजिए। …( व्यवधान)
श्री बसुदेव आचार्य : आप मंत्री जी रिप्लाई अभी करा दीजिए। …( व्यवधान)
SHRI ALI MOHD. NAIK (ANANTNAG): Mr. Deputy-Speaker, Sir, as far as Jammu and Kashmir National Conference is concerned, we are supporting the NDA Government on the basis of the Common Agenda. अगर काँमन एजेंड़े से बाहर यह गवर्नमैंट कोई फैसला लेती है तो नैशनल कांफ्रेस उस फैसले के साथ नहीं हो सकती। …( व्यवधान)फैसला नहीं ले चुकी। सवाल यह है कि इस वक्त जो बहस चल रही है, वह यह है कि हुकूमत को विवादित जमीन के बारे में सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए था या नहीं ? यह बुनियादी मुद्दा है। इसमें हिन्दुस्तान के मुसलमान या अरब के मुसलमान का सवाल नहीं है।
The basic point is, I am against what the Government has done. I am against that. That is the basic point. The Government should have consulted its alliance partners before going to the Supreme Court. It is so important a matter that the Government should not only have consulted the alliance partners but also have taken into confidence the leaders of all opposition parties. अगर सुप्रीम कोर्ट में जाने से यह मसला हल होता है तो ओपोजिशन के यहां जितने भी बुजर्ग लीडर्स हैं, उनको भी विश्वास में लेना चाहिए।
अब सवाल यह नहीं कि बाबरी मस्जिद कैसे गिरी और कौन इसके लिए जिम्मेदार है। उस वक्त कांग्रेस की हुकूमत मरकज में थी और बी.जे.पी. की हुकूमत वहां यू.पी. में थी। इसका डिसक्रेडिट दोनों को जाता है लेकिन इस वक्त यह सवाल नहीं है। सवाल यह है कि इस मसले को कैसे हल किया जाये। जहां तक इस्लाम का बेसिक प्रिंसीपल है। The basic principle of Islam is, once a mosque, always a mosque. अगर मुसलमान की मस्जिद मुसलमान किसी और काम के लिए इस्तेमाल करेगा तोतत वह मजहब के मुताबिक नहीं हो सकता।…( व्यवधान)इसमें मेरी गुजारिश है कि इस मसले को हर करने के दो ही तरीके हैं। …( व्यवधान) There should be a discussion between Muslims and Hindus and whatever emerges out of that should be acceptable to both the parties. Or else, this matter should be referred to the Supreme Court. We must wait for the judgement of the Supreme Court. That should be final.
मुल्क के अंदर जो लोग मजहब के नाम पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं और जो कहते हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट को मानने वाले नहीं हैं, मैं समझता हूं क there is no difference between those people who use that language and the militants. Those who say that they would not abide by the judgement of the Supreme Court should be arrested under POTA. … (Interruptions)
SHRI E. AHAMED : Sir, I request that the discussion be postponed till Monday. I think there is no quorum in the House. How can we proceed? We can adjourn the discussion till Monday.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The hon. Member is not yielding.
SHRI ALI MOHD. NAIK : Sir, with these words, I would say that the matter should be resolved either through a consensus among all parties, or all the parties must wait for the final judgement of the hon. Supreme Court and other courts. Till then, nothing should be done.
SHRI E. AHAMED : Sir, how can the Minister reply to the discussion in an empty House?
MR. DEPUTY-SPEAKER: There are only two more Members to speak. Let us complete this tonight.
SHRI E. AHAMED : Sir, I am of the view that since this is a very serious and sensitive issue, the Minister should reply to a full House. I think there is not even quorum in the House now. It would be in the fitness of things if the hon. Deputy-Speaker adjourns the discussion till Monday.
श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, आप मंत्री जी का उत्तर सोमवार को करा दीजिए।…( व्यवधान)
श्री चन्द्रकांत खैरे : उपाध्यक्ष महोदय, हम दस बजे से यहां बैठे हैं। …( व्यवधान)
श्री रामजीलाल सुमन : आप अकेले बैठे हैं तो क्या फर्क पड़ता है। …( व्यवधान)
श्री चन्द्रकांत खैरे : कभी-कभी मंत्री और दो-तीन सदस्य ही हाउस में होते हैं तब भी मंत्री जी उत्तर देते हैं।…( व्यवधान)
आज यह मुद्दा क्यों उठा रहे हैं।
श्री रामजी लाल सुमन: यह बहुत गम्भीर सवाल है। जब सदन में अधिकांश सदस्य उपस्थित हों, कोरम पूरा हो, तब मंत्री जी का जवाब होना चाहिए। सरकार खुद इस सवाल पर गम्भीर नहीं है। इसलिए उपाध्यक्ष महोदय आपसे आग्रह है कि सोमवार को मंत्री जी का जवाब करा दें।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please do not raise this.
… (Interruptions)
श्री रामजी लाल सुमन:सोमवार को सदन में कोई जवाब नहीं है। इसलिए आप मंत्री जी का जवाब करा दें। इस समय शायद सदन में कोरम नहीं है। सोमवार को पूरा सदन इनकी बात गम्भीरता से सुन सकेगा। हालांकि सरकार इस मामले में गम्भीर नहीं है। इसलिए हमारा विनम्र आग्रह है कि कोरम के अभाव में सदन को स्थगित करें और सोमवार को जवाब हो जाए।
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, the reply can be given on Monday… (Interruptions)
SHRI KHARABELA SWAIN : Next week is very hectic. There is no time.… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : अभी दो सदस्य और हैं। एक आप हैं और दूसरे रामदास जी आठवले हैं।
श्री बसुदेव आचार्य : सोमवार को रिप्लाई देना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आपने आज का तय किया है।
श्री बसुदेव आचार्य : कैसे खत्म होगा, हाउस में कोरम नहीं है।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Let us have some consensus.
SHRI SHIVRAJ V. PATIL : As far as we are concerned, we are willing to hear the hon. Minister even today. But Shri Mulayam Singh Yadav has left. Maybe he wanted to hear the Minister. So, if we have the reply of the hon. Minister in the afternoon of Monday for about 15 minutes or half-an-hour, it will help. If the Minister is free on Monday, the reply can be given on Monday. Otherwise, whatever you decide, we will abide by it.… (Interruptions)
SHRI ARUN JAITLEY: Now, two more speakers are there. After they finish, I can reply. Within 10 minutes, I will finish my reply.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Or let us hear the hon. Minister straightaway.
SHRI AMAR ROY PRADHAN (COOCHBEHAR): No, Sir. You have already called my name, and I am here. So, I should speak SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, let us have the reply on Monday.… (Interruptions)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF LABOUR (SHRI VIJAY GOEL): Sir, we may allow both the remaining speakers to speak by giving them two minutes each. Then, the hon. Minister can reply to the debate.
SHRI BASU DEB ACHARIA : No.… (Interruptions)
श्री रामजी लाल सुमन:सरकार खुद इस मामले में गम्भीर नहीं है। अगर वह गम्भीर होती तो इनकी हाजिरी ज्यादा होती, लेकिन आप देख लें इस समय शायद कोरम का अभाव है। यह गम्भीर मामला है इसलिए सोमवार को मंत्री जी का जवाब होना चाहिए।
श्री अरूण जेटली : सरकार पूरी गम्भीर है। आप लोग इसको आज ही समाप्त करें।
श्री चन्द्रकांत खैरे : जिन्होंने इस बहस नोटिस दिया था और शुरूआत की थी, उनको पूरी चर्चा होने तक रुकना चाहिए था, लेकिन वे चले गए हैं। बी.ए.सी. की मीटिंग में तय हुआ था कि आज ही मंत्री जी का भी जवाब होगा।
उपाध्यक्ष महोदय : अमर राय प्रधान जी को मैंने बुलाया है।
श्री अमर राय प्रधान :उपाध्यक्ष महोदय, देश आज गम्भीर संकट से गुजर रहा है। इस देश में देखने में आया है कि २० करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।
22.00 hrs. इस देश के १० करोड़ नौजवान बेकार घूम रहे हैं। गरीब लोग भूख से मर रहे हैं। आज हालत यह है कि बेरोजगार और गरीब लोग अस्पतालों में जाकर खून बेचकर अपना गुजारा कर रहे हैं। लेकिन आप लोगों के पास राम मंदिर का केवल एक ही मुद्दा है। राम मंदिर को छोड़कर आपके पास कोई मुद्दा नहीं है।
उपाध्यक्ष महोदय, आज साधु-संत लोग जिस ढंग की भाषा बोल रहे हैं, विश्व-हिंदू-परिषद के लोगों के नेतृत्व में जिस तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं और वहां पर साम्प्रदायिक भाषण कर रहे हैं उससे हमें लग रहा है कि यह देश फिर १९४७ की राह पर जा रहा है। विनय कटियार जी ने भारत की सभ्यता, संस्कृति पर भाषण दिया। आप भारत की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास के बारे में क्या जानते हैं? हम लोग भारत की सभ्यता और संस्कृति के बारे में बोल सकते हैं क्योंकि हम लोग आदिवासी अनार्य प्राचीन इंडिया के आदमी हैं। आप अपने को आर्य कहते है आप तो भारत के बाहर से आये हुए लोग हैं। अगर आप इतिहास की बात करोगे तो आपको तो इस देश से मुगल और पठान के साथ निकाल देना चाहिए। आपने तो इतिहास को काफी खत्म कर दिया।
उपाध्यक्ष जी, देश का जब विभाजन हुआ, उस समय और उसके बाद भी कितने मंदिरों और मस्जिदों को गिराया गया, ध्वस्त किया गया। बिहार में, बंगाल में, उत्तर प्रदेश में कितनी ही मस्जिदों का विध्वंस किया गया है।…( व्यवधान)क्या आप इतिहास को दोहराना चाहते हैं, वहीं विध्वंस फिर चाहते हैं। लगता है कि आपके मन में यही है कि देश का बंटवारा फिर दुबारा होना चाहिए। हिंदू कहते हैं कि देश का विभाजन मुस्लिम-लीग ने किया, उन्होंने नहीं किया। जेटली साहब आप इतिहास बताइये। सन् १९४७ के जून महीने में डाक्टर मूंजे के साथ वीर सावरकर और मुखर्जी साहब रहे। उन्होंने निर्णय लिया कि देश के विभाजन के अलावा कोई रास्ता नहीं है। कांग्रेस, आरएसएस और मुस्लिम लीग सभी ने समर्थन किया था। क्या आप फिर चाहते हैं कि देश का विभाजन हो जाए।
इस देश में १५ करोड़ लोग मुस्लिम हैं। क्या आप जानते हैं कि इस देश में २ करोड़ लोग ईसाई हैं और बहुत बड़ी संख्या में दूसरे धर्म के लोग भी यहां रहते हैं। अगर वे लोग भी अपने हितों के लिए बोलेंगे कि हमें भी एक अलग देश चाहिए तो क्या होगा। उधर आपके खिलाफ अमरीका और ब्रिटेन हैं।
यह बहुत दुख की बात है। आपने हिन्दू सभ्यता पर भाषण दिया है, हमने मन से मान लिया है कि हमारा देश धर्म-निरपेक्ष है। इस देश की रक्षा मन और दिल से करनी चाहिए। हिमाचल प्रदेश के चुनाव में प्रधान मंत्री जी ने सिंगापुर जाने से पहले भाषण दिया। ऐसा लग रहा था कि कोई वीएचपी का सदस्य भाषण दे रहा है। विवादित और अविवादित क्षेत्र का शोर है और कहा जा रहा है कि कोर्ट जो निर्णय देगा, उसको मानेंगे। उधर वीएचपी ने कहा है, जल्दी से जल्दी मंदिर खड़ा करो और सुप्रीम कोर्ट में एक पैटिशन डाल दी गई। ऐसी स्थिति में देश का विभाजन हो जाएगा। बीजेपी और सहयोगी दल जिस तरह से काम कर रहे हैं, उससे देश विभाजन की ओर जा रहा है। यह हमारी बात नहीं है, देश के आम आदमी की बात है, देश के सौ करोड़ लोगों की बात है। हम सब को मिलकर चलना चाहिए और देश को धर्म-निरपेक्ष रहना चाहिए।
इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।
श्री रामदास आठवले : उपाध्यक्ष महोदय, हिन्दू और मुसलमानों को आपस में लड़ाकर अटल जी आप क्या पाओगे।
मंदिर और मस्जिद का मसला हल करने के लिए, आप अयोध्या कब जाओगे।
वीएचपी, बजरंगदल और संघ परिवार को सैक्युलर रास्ते पर कब लाओगे ।
नहीं तो आने वाले चुनाव में आप सत्ता से बाहर जाओगे।
उपाध्यक्ष महोदय, बहुत ही गम्भीर विषय पर हम सदन में चर्चा कर रहे हैं और यह चर्चा कई सालों से चल रही है। हमारे साथी विनय कटियार जी और मोहन रावले जी ने राम जन्म भूमि के बारे में कहा है। मेरा कहना यह है कि वह राम स्थल नहीं है । आपको राम में श्रद्धा है और हमारी भी श्रद्धा थी । अगर आपके पास कोई प्रूफ होगा कि वह राम स्थल है, तो मैं अपनी मैम्बरशिप से रिजाइन करने के लिए तैयार हूं। राम का जन्म अगर उसी स्थल पर हुआ होगा, जैसा आपने बताया है, तो आप लोग क्या उस समय सोए हुए थे। बाबर आ गया और राम मंदिर तोड़ने की प्रक्रिया शुरु हो गई। जितनी आवाज आप आज उठा रहे हो, उस वक्त तो आपने सपोर्ट करने का काम किया। मुगल आए, हिन्दुओं ने सपोर्ट करने का प्रयत्न किया, तो उन्होंने अपना राज चल्लोाा।
15 अगस्त १९४७ को देश को आजादी मिली और २६ जनवरी १९५० को बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व में संविधान बना। उस वक्त यदि राम मंदिर होगा तो हम उसका समर्थन करेंगे और यदि उस समय मस्जिद होगी तो भारतीय संविधान के मुताबिक उसे तोड़ने का अधिकार नहीं होगा। देश के मुसलमान मंदिर तोड़ने की बात करेंगे तो भी हम भी उसका विरोध करने वाले हैं। मस्जिद तोड़ कर राम मंदिर बनाने के प्रस्ताव का हम पूरा विरोध करते हैं।
बाबा साहेब अम्बेडकर जी ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं होना चाहिए। हम सब को मिल कर रहना चाहिए। हिन्दू दूसरे धर्म के मानने वालों को डिस्टर्ब कर सकते हैं और वे मुसलमानों को स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसा अम्बेडकर जी ने प्रस्ताव रखा था।
श्री चन्द्रकांत खैरे : डा. अम्बेडकर जी ने कहा था कि अगर बायफरकेशन हो गया तो पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र होगा। हिन्दुस्तान में हिन्दू रहने चाहिए और हिन्दुस्तान के जितने मुसलमान हैं, उन्हें पाकिस्तान रहना चाहिए। …( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले :अम्बेडकर जी ने ऐसा नहीं कहा था। उन्होंने कहा था कि मैजोरटी वाले हिन्दू लोग यहां के मुसलमानों को तकलीफ दे सकते हैं। यहां हम आपकी भावना समझते हैं लेकिन आपको भी दूसरों की भावना समझनी चाहिए। यदि आपको राज चलाना है, देश मजबूत करना है तो यहां के मुसलमानों को समझने की आवश्यकता है। यहां के मुसलमान हिन्दू थे, हम भी हिन्दू थे, यह भी हिन्दू थे, सब हिन्दू थे। कुछ लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़ कर दूसरा धर्म अपना लिया। बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद, आरएसएस, शिव सेना वाले अपने आप को हिन्दू बताते हैं लेकिन वे मूल हिन्दू नहीं हैं। आज का हिन्दू धर्म मनु स्मृति पर आधारित है, जो विषमता फैलाता है, आदमी-आदमी में झगड़ा करवाता है। यह सही हिन्दू धर्म नहीं है। इसलिए आप असली हिन्दू नहीं हैं। …( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : मैं अम्बेडकर जी की पुस्तक के खंड १५ का उल्लेख करना चाहता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय: आठवले जी, क्या आप यिल्ड कर रहे हैं?
श्री विनय कटियार : इन्होंने बाबा अम्बेडकर की चर्चा की और बार-बार बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद का नाम लिया इसलिए मैं केवल एक लाइन पढ़ कर सुनाना चाहता हूं। इसमें लिखा है " मगर जिस बात को दिमाग में रखना महत्वपूर्ण है वह यह है कि अपने सभी विवादों और संघर्षों के बावजूद एक सामूहिक उद्देश्य से प्रेरित थे हिन्दू धर्म का विध्वंस"यह भीमराव अम्बेडकर जी ने लिखा है।पेज नम्बर ३९ में यह लिखा है।…( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले : अम्बेडकर जी ने जरूर बुद्धिज्म को स्वीकार किया होगा लेकिन देश को मजबूत बनाने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए हिन्दू लोग साथ रहें। सभी धर्म के लोगों को समान न्याय देने की सैकुलर बात भारतीय संविधान में आई है। हम आपकी भावना समझते हैं।
लेकिन आप लोगों को दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखने की आवश्यकता है। इसलिये हमारा प्रस्ताव है कि आप लोगों को उस जगह पर राम मन्दिर बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये। कटियार जी, अगर अयोध्या में राम मन्दिर बनाना है तो हम आपके साथ आते हैं लेकिन जहां आपने बाबरी मस्जिद गिराई है, वहां मन्दिर बनाना चाहते हैं…( व्यवधान)
श्री विनय कटियार : उपाध्यक्ष महोदय, १५२८ से लगातार संघर्ष होता रहा, वहां मस्जिद है नहीं, माननीय सदस्य गलत कह रहे हैं…( व्यवधान)डा. अम्बेडकर ने भी कहा था कि राम मन्दिर बाबर ने तोड़ा था…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Katiyar, please sit down.
श्री रामदास आठवले :अगर बाबर ने राम मन्दिर तोड़ा होगा तो रामभक्तों ने बुद्ध मंदिर तोड़ा है। अगर आप इतिहास देखें, तिरुपति जाते हैं या पंढरपुर जाते हैं, बुद्ध मन्दिरों को आप लोगों ने तोड़ा है। क्या हम इस बात का दावा करें?…( व्यवधान)
श्री चन्द्रकांत खैरे : अफगानिस्तान में बुद्ध की मूर्तियां तोड़ी गईं, क्या वे हिन्दूओं ने तोड़ीं? तालिबान द्वारा .यह किया गया…( व्यवधान)यह सब वहां हो रहा है।
MR. DEPUTY-SPEAKER: If there is anything objectionable, I will expunge it.
श्री रामदास आठवले :अफगानिस्तान में जब बुद्ध मूर्तियां तोड़ी गई, उस समय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी। हमने पार्लियामेंट में कहा था कि तालिबान द्वारा बुद्ध मूर्तियां तोड़ी जा रही है, आप उस पर हमला करो, उन्हें सबक सिखाओ। जब तक आप सबक नहीं सिखाओगे, तब तक तालिबान मूर्तियां तोड़ते रहेंगे। आपकी सरकार थी, आपकी सरकार को जवाब दने की आवश्यकता नहीं थी, सेना भेजने की आवश्यकता थी, बुद्ध मूर्तियों को सुरक्षा देने के लिये युद्ध की आवश्यकता थी मगर तब सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। इसका मतलब यह है कि अगर बाबर ने राम मन्दिर तोड़ा लेकिन जब देश को आजादी मिली, वहां मस्जिद थी और १९४९ में रात के समय उस जगह पर मूर्तियां रखी गई। तब से कोर्ट में केस चल रहा है। आप लोग बोल रहे हैं कि कोर्ट का जल्दी जजमेंट होना चाहिये। मै आप लोगों से एक बात यह जरूर कहना चाहूंगा कि कोर्ट का फैसला आप लोगों को मानना होगा, अगर आपको राज चलाना है। माननीय कानून मंत्री जी बैठे हुये हैं, उन्हें कानून सिखाने का प्रयत्न करना होगा। क्या वी.एच.पी. या साधू-संतों से राज्य चलेगा, उन लोगों को कानून सिखाओ। यहां कानून का राज चलेगा। इसलिये हम निवेदन करना चाहते हैं कि सब को कोर्ट का फैसला मानना होगा। कटियार जी, क्या आप तैयार हैं? मगर प्रधान मंत्री जी बतायें कि उन्हें कोर्ट का फैसला मंजूर होगा। उन्होंने हिमाचल प्रदेश जाकर जो आवाज उठाई थी कि उस जगह पर राम मन्दिर होने का प्रमाण है तो वे कोर्ट में दिखायें। यहां बताने की आवश्यकता नहीं है। आप लोगों को कोर्ट का फैसला मानना होगा। अगर वे हिन्दू लोगों का आदर करते हैं तो हम लोगों को मुसलमानों का भी आदर करना चाहिये अगर हमारा विरोध करते रहेंगे…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude now.
श्री रामदास आठवले :समझने वाले ९० प्रतिशत लोग हिन्दू हैं लेकिन इन लोगों में ऐसे कौन हैं? हम इस देश में सैकुलरिज्म को मज़बूत करना चाहते हैं. जिस जगह मस्जिद है, अगर मन्दिर का झगड़ा होता है तो वहां बुद्ध विहार बनाना चाहिये । इससे सैकुलर इंडिया मज़बूत होगा। इसलिए हमारा प्रस्ताव है कि वहां जाकर मन्दिर बनाने का प्रयत्न मत करो अन्यथा हम लोग वहां आ जायेंगे। आप लोगों ने वहां मस्जिद तोड़ी है, इसलिये हम लोग वहां जायेंगे और मन्दिर की जगह मस्जिद का सृजन करेंगे।
सरदार बूटा सिंह (जालौर): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस सदन में कुछ कहना चाहूंगा कि जब-जब भी अयोध्या का मामला सदन के अंदर या बाहर उठा है, उसमें हमेशा व्यक्तिगत रूप से मेरे नाम की और उस वक्त की सरकार की चर्चा की गई है।
तरह-तरह से उसकी व्याख्या करके सत्तापक्ष के लोग यही कहते आये हैं कि जो कुछ भी हुआ वह कांग्रेस ने किया। मैं वह तथ्य सदन के सामने पेश करना चाहता हूं, ताकि हमेशा के लिए यह फैसला हो जाए कि किन परिस्थितियों में क्या-क्या हुआ। मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लूंगा, मैं केवल इतना कहूंगा कि इनके द्वारा लोगो को गुमराह करने का प्रयास किस हद तक जा पहुंचा हुआ है।
उपाध्यक्ष महोदय, अयोध्या का मसला आज का नहीं है। श्री रामदास आठवले और बहुत सारे माननीय सदस्यों ने इसकी पृष्ठभूमि और इतिहास के बारे मे कहा है। बाबर का हमला १५२६ में हुआ। बाबर इस देश पर पहले भी हमला कर चुका था, उसके बाद वह काबिज हो गया। उस वक्त देखना पड़ेगा कि अवध का राजा कौन था और अयोध्या की भूमि किसने तश्तरी पर रखकर उस वक्त के मुगल सम्राट को दी। मैं नहीं कहता कि वह हिन्दू था। मगर सामंत हमेशा अपनी जान की रक्षा के लिए हमलावर के सामने सब कुछ पेश कर देते थे और उस समय अयोध्या भी पेश की गई थी। उनका कभी जिक्र नहीं हुआ। एक इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते श्री अरूण जी जानते होंगें कि किस प्रकार अयोध्या के ऊपर समझौते के बाद बाबर के अफसर आये और उन्होंने यह सारा कुछ किया। मैं उस इतिहास में आज नहीं जांऊंगा, फिर कभी मौका मिलेगा।
उपाध्यक्ष महोदय, यह विवाद १९४६ से शुरू होता है। १९४६ में वहां के डिस्टि्रक्ट एंड सैशन जज ने फैसला दिया कि यह भूमि एक मस्जिद की भूमि है और सुन्नी और शिया दोनों समुदाय के लोग इसके मालिक हैं। मेरे से पूर्व एक वक्ता ने अभी कहा कि १९४६ में जब जज का फैसला हुआ, उसके बाद यह चर्चा शुरू हुई और बहुत चोरी-छिपे अपराधियों ने राम जी की एक मूर्ति उसके अंदर दाखिल कर दी। राम जी की मूर्ति को दाखिल करने के पश्चात १९४९ में जब यह सब हुआ तो १९५० में सरकार ने इसे अपने अधिकार में ले लिया, चूंकि विवाद बढ़ रहा था। उसके बाद १९६१ में वक्फ बोर्ड ने कचहरी के सामने एक मुकदमा दायर किया कि यह मस्जिद, जिसके अंदर मूर्ति रख दी गई है, यह वापस हमारे समाज को दे दी जाए। १९६१ में यह एप्लीकेशन मूव हुई। उसके बाद इस एप्लीकेशन का परिणाम यह हुआ कि विवाद आगे बढ़ा। १९८४ के आखिर में विश्व हिन्दू परिषद ने इस मोर्चे को अपने हाथ में लिया। दोनों तरफ से विवाद बढ़ गया और १९८५ में एक हिन्दू प्रीस्ट ने फैजाबाद के सब-जज के सामने, वहां मंदिर बनाने और मस्जिद हटाने की एक एप्लीकेशन दे दी, जब कि यह भूमि डिस्टि्रक्ट एंड सैशन जज के सामने विवादग्रस्त है और इसमें वक्फ बोर्ड और एक दूसरी पार्टी है, इसमें तीसरी पार्टी कोई नहीं थी। विश्व हिन्दू परिषद ने जबरदस्ती एक न्यास कायम कर लिया और न्यास कायम करके जबरदस्ती उसमें पार्टी बनने की कोशिश की गई। जब यह मसला बढ़ गया तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी। उस बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने यह घोषणा कर दी कि देश के कोने-कोने से दस्ते लेकर मस्जिद को हासिल करने के लिए लोग पहुंचेंगे, उसके मुकाबले में विश्व हिन्दू परिषद ने भी उसी तरह का प्रचार किया और पूरे देश में आग लग गई। कई जगहों पर भयंकर किस्म के दंगे हुए। उसके बाद यह मसला बढ़ते-बढ़ते यहां तक आ गया कि डिस्टि्रक्ट एंड सैशन जज ने १९८६ में जो जायदाद बंद थी, जिस पर ताला लगा हुआ था, उसका ताला खोलने का आदेश दे दिया। बताइये, इसमें कांग्रेस का कहां रोल था। जो भी साहब बोलते हैं, वे यहां आकर कहते हैं कि कांग्रेस ने यह सब किया। १९८६ तक जो भी कुछ होता रहा वह कोर्ट, कचहरी के हुक्म से होता रहा। १९८६ में जो सिचुएशन आई तब १९८८ में हमने इस मसले को पूरी गंभीरता से लिया।
उस वक्त की हमारी कैबिनेट में निर्णय लिया गया कि सभी लोगों के सहयोग से बातचीत करके इस मसले को निपटाया जाए। एक नहीं, दर्जनों मीटिंग इस पर हुईं। इस सदन के सभी नेताओं को इकट्ठा करके दो-दो, तीन-तीन मीटिंग हुई। राज्य सभा और लोक सभा के सदस्यों को लेकर देश भर के संतों, महंतों, पीरों, फकीरों, मुतवल्लियों को लेकर एक मीटिंगों का सिलसिला शुरू हुआ और हमें उम्मीद की किरण नज़र नहीं आई कि बातचीत के माध्यम से बात आगे बढ़ सकती है। उसी सिलसिले में जब हम सब लोगों से मिल रहे थे तो आर.एस.एस. के उस वक्त के मुखिय़ा… (Not recorded) और विश्व हिन्दू परिषद् के लोग उसी श्रृंखला में मिलने के लिए आए। सभी शंकराचार्यों से मीटिंग हुई और उस समय उन्होंने जो बात कही, उसका उल्लेख मैं करना चाहूँगा।
मैंने उनसे कहा कि मुझे खुशी है कि हम बातचीत के माध्यम से इस मसले का हल निकाल सकते हैं। उसमें अलीमियां और बड़े-बड़े लोग शामिल थे। बालासाहब ने कहा कि हमें यह भी विश्वास है कि आप लोग इसका हल ढूंढ लेंगे मगर हमारा जो राम मन्दिर का प्रश्न है, जो मुद्दा हमने उठाया है, वह मंदिर निर्माण का नहीं है। हम तो वहां जो मस्जिद है, उसको गिराकर इस देश में हिन्दू राष्ट्र कायम करना चाहते हैं, उसके माध्यम से राष्ट्र की राजनीति पर कब्ज़ा करना चाहते हैं और मंदिर उसका एक ज़रिया है। ये व्यक्तिगत बातें हैं। मेरे पास डॉक्यूमेंट्री सुबूत है क्योंकि सारी मीटिंग्ज़ की प्रोसीडिंग्ज़ हमने रखी है। उसी क्रम को लेकर आगे बढ़े। …( व्यवधान)
श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर):आप वह प्रूफ सदन के पटल पर रखिये।…( व्यवधान)
महोदय, जिनका नाम ये ले रहे हैं, वे सदन में अपने बचाव के लिए मौजूद नहीं हैं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please do not mention the name of one who is not here, one who cannot defend himself.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I will expunge anything objectionable.
सरदार बूटा सिंह :१९८९ में जब इलेक्शन अनाउंस हुए और १९८९ के इलेक्शन के वक्त एक मीटिंग इस बात को लेकर हुई कि विवादग्रस्त क्षेत्र में कोर्ट के फैसले के माध्यम से इसको एक्सपीडाइट करवाकर सभी पार्टियों की सहूलियत से इसका फैसला होना चाहिए। बाकायदा जो केसेज़ डिस्टि्रक्ट सेशन जज के सामने ते, उत्तर प्रदेश सरकार बाकायदा एप्लीकेशन मूव करके उन केसेज़ को कंसॉलिडेट करके इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने ले गई और एक स्पेशल बैंच निर्मित हुई। उसी बैंच के सामने जब केस लगा तो उसमें फैसला हुआ कि इस भूमि में विवाद में कौन कौन सा एरिया आता है। तो सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से जो नक्शा दिया गया, वह दो रैक्टेन्गल के रूप में था - ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच। यह विवादग्रस्त कैसे माना गया है। बाद में उन्होंने बाकायदा रेवेन्यू रेकार्ड से खसरा नंबर देखकर बताया कि यह विवादग्रस्त क्षेत्र है।
पूरे देश से शिला पूज पूजकर लाखों की तादाद में अयोध्या की तरफ भेजे जा रहे थे। उन शिराओं के साथ जो प्रचार हो रहा था, बड़ा भयंकर किस्म का सांप्रदायिकता का प्रचार हो रहा था। दूसरी तरफ लोक सभा के इलेक्शन अनाउंस हो चुके थे। हमारी सेन्ट्रल फोर्सेज़ सारी की सारी तैनात हो चुकी थीं। एक भी कांस्टेबल हमारे हाथ में नहीं था कि हम उसको नियंत्रित कर सकते। अयोध्या पर मीटिंग हुई आदरणीय मुख्य मंत्री जी के घर पर। सभी लोगों को उसमें बुलाया गया। विस्फोटक परिस्थिति से निपटने के लिए एक एग्रीमेंट हुआ जिस पर विश्व हिन्दू परिषद् के सभी पदाधिकारियों ने दस्तखत किये जिसमें दोनों चीजों को माना हुआ है। एक तो यह कि जितनी शिलाएं यहां पर आएंगी, उनका कलैक्शन करके एक जगह रखने के लिए डिस्टि्रक्ट अथॉरिटी को सौंप दिया जाएगा। दूसरा यह कि शिला पूजन का मसला विवादग्रस्त क्षेत्र में नहीं होगा। ७ तारीख को इलाहाबाद हाई कोर्ट में विवादग्रस्त क्षेत्र कौन सा है और अविवादित क्षेत्र कौन सा है, इसके लिए क्लैरफिकेटरी ऑर्डर मिला।
इसके लिए क्लेरफिकेटरी आर्डर मिला और उस आर्डर में जिस जगह पर निमोही अखाड़े के महंत थे और उनका झंडा था, वहां इन्होंने शिलान्यास के लिए ईंटें रखी हुई थीं और बाकायदा एक मीटिंग हुई, जिसमें चीफ सैक्रेट्री, उत्तर प्रदेश, रेवेन्यू सैक्रेट्री, इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार और एडवोकेट जनरल, यूपी, ये सब शामिल हुए तथा मैं भी उसमें शामिल हुआ, जिसमें ये फैसले हुए थे। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने दो प्लाट, जो उस वक्त डिस्प्यूटेड थे, उनका जिक्र किया और जिस जगह झंडा था, उसे हाई कोर्ट के प्रतनधि की प्रेजंस में कह दिया गया कि यह अनडिस्प्यूटेड है। मैंने अर्ज किया, दो दिन बाद लोक सभा के वोट पड़ने वाले थे और पूरे देश भर में सारी सेंट्रल फोर्सेस डिप्लायड थी। हमारे पास फोर्स नहीं थीं, जिससे कि हम इसे बचा सकते हैं। उस वक्त अविवादित क्षेत्र में शिला की पांच या सात ईंटें रख कर यह तय हुआ था, विश्व हिन्दू परिषद वाले सभी प्रतनधियों ने कहा था कि आज हम यहां केवल ये ईंटें रख कर, समाप्त करके चले जाएंगे और जब भी कोर्ट का फैसला होगा, उसके अंतर्गत मंदिर का निर्माण होगा या नहीं होगा? ये उस वक्त के तथ्यों के ऊपर है, जो कहानी मैंने आपको बताई है। उसके बाद यह हुआ कि विश्व हिन्दू परिषद ने पांच शिला रख कर चले जाने के बाद, बिना वहां के एक एडीशनल डिस्टि्रक्ट मजिस्ट्रेट के सामने, जिसकी बैकग्राउंड आरएसएस की थी, उसके सामने अर्जी लिख कर यह मनवा लिया कि हम मंदिर के निर्माण की इजाजत नहीं देंगे, उस बात को सारी दुनिया में घुमा दिया। बेगम बेनज़ीर भुट्टो उस वक्त लंदन में थीं, उसने वहां कह दिया कि मस्ज़िद के मीनार टूट गए, जब कि यहां कोई भी मीनार नहीं था, केवल गुंबद थे। इस तरह दुष्प्रचार हुए। एक तरफ पाकिस्तान की तरफ से और दूसरी तरफ विश्व हिन्दू परिषद की तरफ से हुए कि यहां पर हमें मंदिर बनवाने की इजाजत नहीं मिली। इसी प्रचार को लेकर ये सारे इलैक्शन में पोस्टर लगा कर, घुमा दिया। उसके बाद जो नतीजा हुआ वह आपके सामने है।
आज भी परिस्थिति वही है। सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर उस दिन विश्व परिषद का ऑर्डर, उस वक्त विश्व हिन्दू परिषद का एग्रीमैंट इस बात के लिए पूरे राष्ट्र के लिए बाध्य है कि जब तक कचहरी का फैसला हासिल नहीं हो जाता इसके बीच १९९४ की जजमैंट एक बहुत अहम है, माइल स्टोन है। उस जजमैंट में जो उसका स्पष्टीकरण जस्टिस वर्मा ने दिया है उसके बाद कोई स्कोप नहीं रह जाता, न ही इस सरकार के लिए और न ही संगठन के लिए कि वह दोबारा सुप्रींम कोर्ट के उस फैसले में दखल देकर, जो इस वक्त वस्तुस्थिति वहां से ५५ साल से चल रही है उसके अन्दर कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता। इसलिए आज जिस तरफ सरकार ने मुंह मोड़ने की कोशिश की है वह बहुत मत्वपूर्ण है। हम चाहते हैं कि सरकार इस गलत कदम को वापस ले। सरकार के कितने ऐसे मुखौटे हैं जो बोलते हैं। जो एक सच्चा मुखौटा प्रधान मंत्री का है, वह भी कई बातें बोल जाते हैं । हिमाचल का भाषण खास तौर पर इस बात में बहुत महत्वपूर्ण है। उनके मन में कुछ और है और एक्शन में कुछ और है। सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाल कर नया मुद्दा खड़ा करने की कोशिश की है वह देश को खत्म और बरबाद करने की चेष्टा की गई है। मैं आपसे अर्ज करना चाहता हूं कि आज तक मुझे एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला जिसने यह कहा हो कि हम राम मंदिर के निर्माण का विरोध करते हैं। डिस्प्यूट उस जगह है और इस बात का है कि वहां पूजा स्थली को तोड़ कर एक नया मंदिर बनाना चाहते हैं। वहां बिना मस्जिद तोड़े एक शानदार भव्य मंदिर बन रहा था। मगर विश्व हिन्दू परिषद के लोग और समर्थक इसमें बिल्कुल विश्वास नहीं रखते थे इसलिए उन्होंने राजनीति का जाल रच कर आज वही एक पहलू सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़ा किया।
मेरी सदन से करबद्ध प्रार्थना है कि देश को अंधे कुंए में डालने से बचाने के लिए एकमात्र रास्ता है - सर्वोच्च न्यायालय। उपाध्यक्ष महोदय, आपकी कुर्सी पर जो लिखा है - " सत्यमेव जयते, धर्मचक्र प्रवर्तनाय"इसे कायम रखिए वरना देश में जो कुछ आपने बोला है बाबा साहेब का नाम लिया है, मुझे शर्म आती है। दुनिया में जो गाली बाबा अम्बेडकर को कोई नहीं दे सका वह मंत्री जी ने दी है।
वह आपके एक माननीय मंत्री का ८०० पन्ने का पोथा लिखकर, ग्रन्थ लिखकर दी है, आज आप उस बाबा साहेब की बात कर रहे हो, आउट ऑफ कन्टैक्स्ट उनको कोट कर रहे हो। मैं बैकग्राउण्ड में नहीं जाना चाहता कि बाबा साहेब ने क्या कहा, क्या नहीं कहा, वह दुनिया जानती है। इसलिए मेरी आपसे प्रार्थना यह है कि जो कुछ आज तक ५६ वर्षों में कांग्रेस ने किया है, वह अदालत के फैसले का पालन किया होगा। कांग्रेस का इसमें कभी कोई राजनैतिक द्ृष्टिकोण नहीं था। आज तो यहां तक भी कहा गया कि राजीव गांधी ने डिस्प्यूटेड स्थली पर पूजा करके आये। इससे बड़ा झूठ और कोई हो नहीं सकता। हाथी सफेद हो सता है, लेकिन आपका झूठ इतना सफेद है कि हाथी भी उसके सामने शर्मसार है।
मेरी आपसे प्रार्थना है कि हिन्दू मंदिर बने, मगर उन लोगों की सहमति से बने या फिर कचहरी का जो फैसला हो, सब को मान्य हो, सब को सर्वप्रिय हो, उसके मुताबिक हिन्दू मंदिर बने। ये कोई राम के बड़े भक्त नहीं और हम ऐसे नहीं हैं कि जिनको राम के ऊपर आस्था नहीं है। ये केवल लोगों को गुमराह करने के लिए, हमारे समाज को बांटने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, इसे समाप्त करके सही मायने में देश का निर्माण हो।
SHRI ARUN JAITLEY: Mr. Deputy-Speaker, Sir, I am extremely grateful to the hon. Member, Shri Mulayam Singh Yadav, who initiated the discussion.…( व्यवधान)
श्री रामजीलाल सुमन : मंत्री जी, सब लोग अंग्रेजी में बोलते रहे, आप तो अच्छी हिन्दी जानते हैं, आप तो हिन्दी में बोलिये।
श्री अरुण जेटली : उपाध्यक्ष जी, क्योंकि सुमन जी के नाम से प्रस्ताव था और उनका आग्रह था, इसलिए मैं उनके आग्रह के अनुसार मैं हिन्दी में ही बात कहता हूं।
इस पूरी चर्चा का और बहस का जो सन्दर्भ था, वह सन्दर्भ था कि अयोध्या में बनी हुई जो विशेष परिस्थिति है, चार फरवरी को केन्द्रीय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एक एप्लीकेशन दायर की थी, २१ फरवरी को उस एप्लीकेशन की सुनवाई हो गई। उस एप्लीकेशन की सुनवाई के पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय किया कि जो मुकदमा पिछले साल मार्च के महीने में सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई थी, उसकी सुनवाई छ: मार्च से आरम्भ हो जायेगी और अगर किसी वजह से छ: मार्च से उसकी सुनवाई आरम्भ न हो पाये तो जो अन्तरिम निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, २००२ में दिया था, उसके सम्बन्ध में चर्चा हो जायेगी। केन्द्रीय सरकार ने जो याचिका दी थी, जिसका विशेष उद्देश्य यह था कि मुकदमे की सुनवाई शीघ्र हो जाये, उस पर आदेश भी पारित हो चुका है और आदेश पारित होने के बाद में मुख्य याचिका की सुनवाई की तथि भी तय हो चुकी है और आज संसद में इस विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं कि उस एप्लीकेशन, जिस पर आदेश भी पारित हो चुका है और मुकदमा केन्द्रीय सरकार ने दायर नहीं किया था, किसी अन्य व्यक्ति ने किया था। सरकार को उसमें उन्होंने पार्टी बनाया था और सरकार ने यह कहा था कि इसकी शीघ्र सुनवाई हो और जब इन मुकदमे की सुनवाई पिछले वर्ष हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में १३ मार्च को यह कहा कि "Rule returnable after 10 weeks." १३ मार्च, २००२ को यह कहा कि १० सप्ताह के बाद यह दोबारा हमारे सामने हो और इसकी सुनवाई हो। यह भी आदेश दिया कि इसकी सुनवाई पांच जजों के सामने होगी। जब इसकी सुनवाई नहीं हुई तो केन्द्रीय सरकार की याचिका पर २१ फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मैं वे दो पैराग्राफ पढ़ देता हूं:
"The petition was filed for different reliefs on March 13, 2002. The Bench of three Judges, while entertaining the petition, issued notice to the respondents and passed an interim order, which was modified on March 14, 2002. Subsequently, some more parties were impleaded. And on September 24, 2002, rule nisi was issued.
"…It was directed that the case be disposed of by a Bench of five judges. In October 2002, the Union of India filed its counter affidavit. For some reasons the case was not listed for hearing. On 4th February 2003, the Union of India filed an application, inter alia, praying for vacation of the Interim Order passed on 13th, 14th March 2002 and praying for fixing of an early date of hearing of the petition. "
In the counter affidavit filed by the petitioner, it has opposed the vacation of Interim Order, but has agreed on early hearing. It says:
"In the facts and circumstances of the case, we feel it is just and expedient that the case is listed for hearing before a five-judge Bench on 6th March 2003. In case, the petition is adjourned on that day, the Bench will consider the issue of vacation of the Interim Order."
जो एप्लीकेशन सरकार ने दायर की थी, उसके ऊपर निर्देश भी हो चुका है। आज संसद में हम इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं कि यह याचिका सरकार ने क्यों फाइल की ?कुछ लोगों ने यह भी सुझाव दिया कि इस याचिका को वापस ले लेना चाहिए। पहली बार एन.डी.ए. के एजेंड़े में यह बात स्पष्ट रूप से लिखी है कि अयोध्या का जो मसला है, वह यहां बातचीत के माध्यम से हल होगा या न्यायपालिका के माध्यम से हल होगा। कोई भी पार्टी अगर न्यायपालिका के सामने जाये और कहे कि सरकार २००२ के उस मुकदमे में पार्टी है, यह कहे कि इसकी शीघ्र सुनवाई करिये और न्यायपालिका इसके लिए कहे, …( व्यवधान)
SARDAR BUTA SINGH : Sarkar is not a party! SHRI S. JAIPAL REDDY : How is the Government an aggrieved party?
SHRI ARUN JAITLEY: I will certainly deal with this question because there are rights and liabilities of the Government which have been created by the 1994 judgement. Shri Reddy should bear with me since he has raised this. Let me now read to him when I move a little further as to what the 1994 judgement has to say.
"So also the Government who is a party respondent in the case, does not take the position in its own hands. It goes to the court and prays for a relief that through the judicial process you please clarify what the rights are."
Sir, it is a two-page application, which the Government filed. The Government says:
"On 13th March 2002, the Supreme Court said, ‘we will hear the case in ten weeks. It has not been listed. Because of this an uncertainty with regard to certain positions has been created, so please hear the case early or alternatively vacate the Interim Order so that the judgement of 1994 can be implemented’."
This is the first time in the Ayodhaya case when the NDA agenda says and that is the agenda which has been referred to that we will resolve this issue either by negotiations or by judicial process. Moving the court is a shocking exercise, moving the court is a treacherous matter, moving the court is deplorable, moving the court is an act of moral corruption.
इसके लिए न्यायपालिका के सामने जाना कि आप शीघ्र ही इसकी सुनवाई कर लीजिए--यह नैतिक भ्रष्टाचार है, डेप्लोरेबल है, ट्रेचरस है, शाकिंग है। न्यायपालिका के सामने जाकर अगर कोई यह रिलीफ नहीं मांगत तो और कौन सा दूसरा तरीका है जो एन.डी.ए. के एजेंड़ा और सरकार के कमिटमैंट के अनुरूप इस समस्या का समाधान दे सकता है। क्योंकि सरकार की उस एप्लीकेशन पर सुप्रीम कोर्ट ऑर्डर पास कर चुकी है इसलिए इस बहस का फोकस यही था कि सरकार ने यह दरख्वास्त क्यों दायर की ?शायद इस चर्चा के दौरान इतिहास में और तथ्यों के खिलाफ जाकर और मुझे बड़ा वचित्र लगा जब एक माननीय सदस्य ने खड़े होकर कहा कि स्वर्गीय श्री बाला साहब देवरस ने मुझे आकर एक कहानी बताई कि हमारा उद्देश्य क्या है और मेरे पास एक लखित दस्तावेज है। मुझे मालूम नहीं वह उस समय गृह मंत्री थे। वह लखित दस्तावेज उस प्रकार की चर्चा से संबंधित गृह मंत्रालय के पास है या नहीं लेकिन उन सदस्य का कहना है कि मेरे पास इस प्रकार का दस्तावेज है। …( व्यवधान)
सरदार बूटा सिंह :वह मीटिंग में रखा जाता है।यह आपको पता होना चाहिए।…( व्यवधान)
श्री अरुण जेटली : इस प्रकार की बात उन्होंने कही तो मुझे लगता है कि कई बार बहस की दिशा कुछ बदल गयी थी। अयोध्या का विषय, मैं इसके पूरे इतिहास में नहीं जाता लेकिन आज जो विवादित विषय है, उस विषय से संबंधित मूलत: दो मुकदमे चल रहे हैं--एक मुकदमा लखनऊ बैंच इलाहाबाद हाईकोर्ट में है और वह उस विवादित स्थान के संबंध में है जहां पहले एक ढांचा था।
उसका क्षेत्रफल कितना है, मैं इस पूरे इतिहास में नहीं जाता। कुछ सदस्यों ने उसके सम्बन्ध में कुछ कहा। उसमें दोनों जो विवादित पक्ष हैं, उनके अधिकार का प्रश्न है। वह मुकदमा लखनऊ बैंच में, हाई कोर्ट में चल रहा है। मुझे बड़ा वचित्र लगा जब यह कहा गया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एप्लीकेशन क्यों लगाई। लखनऊ बैंच के सामने केन्द्रीय सरकार पार्टी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के सामने हम पार्टी हैं। लेकिन क्योंकि लखनऊ बैंच के सामने वह विवादित स्थल का मामला बहुत वर्षों से, दशकों से चल रहा था, तो जब पिछले वर्ष सर्वदलीय बैठक हुई थी, उसमें सभी दलों ने केन्द्रीय सरकार को कहा कि आप पार्टी नहीं भी हैं, फिर भी आप कोर्ट के सामने जाकर कहें कि इसकी सुनवाई शीघ्र हो। उस सर्वदलीय निर्णय के अनुकूल उस मुकदमे में जो टाइटल सूट है, केन्द्रीय सरकार पार्टी नहीं है, लेकिन सभी पार्टियों के आग्रह के बाद केन्द्रीय सरकार ने एक याचिका दायर की। उसमें कहा कि यह बहुत समय से मुकदमा चल रहा है और समाज के हित में भी यह है कि इसकी वजह से कई प्रश्न उठते हैं, तनाव पैदा होता है इसलिए इसकी शीघ्र सुनवाई हो और डे-टू-डे सुनवाई हो। हाई कोर्ट पहले भी और पार्टीज की इस तरह की दरख्वास्त को मना कर चुका था कि इतना समय लगता है, हमारे पास समय नहीं है। तीन जज उस मुकदमे को सुनते हैं। सरकार की उस याचिका को हाई कोर्ट ने स्वीकार किया और उस वक्त सभी दलों ने कहा कि इसकी डे-टू-डे हियरिंग हो। हाई कोर्ट ने कहा कि हम इसकी डे-टू-डे हियरिंग करेंगे और उसका एवीडेंस रिकार्ड करेंगे। जहां तक मेरी जानकारी है उस दिन से आज तक डे-टु-डे के आधार पर ४२ गवाहों के बयान और जिरह, एक्जामिनेशन, क्रास एक्जामिनेशन हो चुका है। जिस दिन किसी कारण कोर्ट स्वयं न बैठ सके या कोर्ट में छुट्टी रहती है, तो एवीडेंस रिकार्ड करने का अधिकार कमीशन को दे देते हैं और उसकी शीघ्र सुनवाई करने का कोर्ट प्रयास कर रही है और सबने इसकी सराहना की है कि बहुत वर्षों के बाद कोर्ट ने उसकी डे-टू-डे हियरिंग की। यह विषय कम क्षेत्र की भूमि का था, जो टाइटल सूट का एरिया है, जिसको विवादित क्षेत्र कहते हैं। एक अन्य क्षेत्र भी है, उसके बारे में भी जान लें । मुझे याद है कि १९९० में, जयपाल जी को भी याद होगा, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह जी देश के प्रधान मंत्री थे, उस वक्त भी समस्या को हल करने का क्या तरीका है, यह विषय आया था। कुछ दिनों के लिए, शायद दो-तीन दिन के लिए आर्डिनेंस के माध्यम से एक कानून बनाया था, उस वक्त की सरकार ने Ram Janma Bhoomi Babri Masjid (Acquisition of Area)Act, 1990. यह आर्डिनेंस जारी हुआ और दो दिन के बाद इसको वापस ले लिया गया। इस आर्डिनेंस के तहत जो शिडयूल्ड एरिया था, उसको एक्वायर कर लिया और वह केन्द्रीय सरकार के पास रहेगा। उसके आसपास की जमीन जिसकी है, उसका कोई झगड़ा नहीं था। इस एरिया में जो एक्वायर्ड एरिया है, वह लगभग २.७७ एकड़ था। इस आर्डिनेंस से यह २.७७ एकड़, जिसका बार-बार जिक्र आता है, उसमें से पैदा हुआ। यह आर्डिनेंस वापस ले लिया गया। सन् १९९३ में जब नरसिंह राव जी प्रधान मंत्री थे, तो लगभग शब्दश:, वर्बेटम यही कानून दोबारा आया। उसके सब क्लाज, सब एक्ट्स लगभग वही थे। उसके तहत भी एक क्षेत्र को एक्वायर सरकार ने कर लिया। लेकिन इसका जो क्षेत्र था, शिडयूल्ड एरिया का, वह १९९० का २.७७ नहीं था, लेकिन ७१.३६१ एकड़ था। उस विवादित भूमि के आसपास जो ७१ एकड़ भूमि थी, उसको भी सरकार ने इसमें एक्वायर कर लिया और एक्वीजिशन के पीछे कारण यह बताया गया कि जो टाइटल का मुकदमा चल रहा है, जो उस मुकदमे को जीतता है, इसमें से कुछ क्षेत्र उसकी हिफाजत के लिए या उसके इस्तेमाल के लिए, प्रयोग के लिए, उसके बेनफशियल इंजॉयमेंट के लिए एक्वायर्ड होगा। उसी सुरक्षा के लिए इसकी आवश्यकता होगी।
इस आर्डिनेंस को चुनौती दी गयी और इसमें कई संगठनों का, जिसमें राम जन्म भूमि न्यास भी है, कहना था कि बाकी जमीन जो ली गयी है, उसमें से बहुत बड़ा हिस्सा हमारा और अन्य लोगों की भूमि है। मैं उस विवाद में नहीं जाता कि इसके मालिक कौन थे। बनातवाला साहब ने कहा कि इसमें कुछ भूमि वक्फ की है। जिसकी यह जमीन थी, उसके विचार सन् १९९४ के सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के मुताबिक हैं। सुप्रीम कोर्ट में १९९४ में यह विषय गया और पांच जजों की पीठ ने इसकी सुनवाई की। उनका जो मैजोरिटी व्यू था उसकी मैं चार-पांच पक्तियां पढ़ देता हूं। इस जजमेंट का सही अर्थ क्या है, यह एक बहस का विषय आज सुप्रीम कोर्ट के सामने है। जैसा माननीय जयपाल जी ने या माननीय सोमनाथ जी ने कहा, उनकी धारणा मुझसे शायद भिन्न होगी, लेकिन सन् २००२ में जो मुकदमा दायर हुआ, उसमें इस निर्णय का सही अर्थ क्या है? What is the real interpretation of this judgement?
पैरा ४९ में सुप्रीम कोर्ट कहता है कि :
"A narration of the facts indicates that acquisition of properties under this Act affects the rights of both communities and not merely those of the Muslim community. The interest claimed by the Muslim community is only over the disputed site. …. "
बनातवाला साहब, वह इससे मेल नहीं खाता, लेकिन मैं मानता हूं और हो सकता है कि आपकी बात में कुछ वजन हो। It says:
"The interest claimed by Muslims is only with regard to the disputed site, where the mosque stood prior to its demolition. The objection of Hindus to this claim has to be adjudicated. The remaining entire property acquired under this Act is such over which no title is claimed by Muslims. A large part thereof comprises of properties of Hindus of which, title is not even in dispute."
सुप्रीम कोर्ट पैरा ४९ में कहता है कि इसमें मानस भवन, सीता रसोई, ये सब ऐसे क्षेत्र हैं जो मुस्लिम समुदाय की सम्पत्ति नहीं थे, हिंदू समुदाय के थे, कुछ उसके संबंध में टिप्पणियां की गयीं, मैं उसमें नहीं जाता हूं।
SHRI S. JAIPAL REDDY : You want to skip over what is not convenient to you. … (Interruptions)
SHRI ARUN JAITLEY: Shri Jaipal Reddy, I can read the entire judgement. Subsequently, let me just say … (Interruptions) Sir, paragraph 49 says: … (Interruptions)
SHRI E. AHAMED : May I ask a question? Is there any reference in judgement to the fact that undisputed land belong to Vishwa Hindu Parisahd? … (Interruptions) Does it mean that it belongs to Hindu community?
SHRI ARUN JAITLEY: I am not saying to whom it belongs to. … (Interruptions)
Subsequently - Shri Jaipal Reddy is right - Paragraph 49 says: … (Interruptions)
श्री जी.एम.बनातवाला:प्रापर्टी किसी और की है लेकिन कब्जा जमाने के लिए विश्व-हिंदू-परिषद् और राम जन्म भूमि की बात होती है, यह अजीब बात नहीं है।
श्री अरुण जेटली : प्रापर्टी किसकी है यह विषय नहीं है। केन्द्रीय सरकार ने यह याचिका क्यों लगाई, मैं केवल उस तर्क में जा रहा हूं। पैरा ४९ फिर कहता है कि इसके आस-पास की प्रापर्टी को इसलिए एक्वायर किया गया ताकि कल को अगर कोई टाइटल का मुकदमा जीतता है तो उसके अधिकार पर उसका असर न पड़े। He must be able to beneficially enjoy the property. Security, passage – all these must be available. पैरा ५० में कोर्ट कहता है कि जिन लोगों की सम्पत्ति को एक्वायर किया गया, इसकी आवश्यकता नहीं थी। यह पैरा आवश्यक है, इसलिए मैं इसकी चार-पांच पंक्तियां पढ़ता हूं। It says:
"Whoever at a later stage, when the exact area acquired which is needed for achieving the professed purpose of acquisition can be determined, it would not merely be permissible but also desirable that the superfluous area is released from acquisition and reverted to its owners. "
इसलिए बाद की किसी स्थिति में , वह स्थिति कब आयेगी SHRI S. JAIPAL REDDY: It is linked to the final adjudication of the judgement. … (Interruptions)
SHRI ARUN JAITLEY: I have not come to that. I will show it to you that you are not even right on that. Please permit me to read.
"At a later stage, whatever is the area required to protect the disputed area will be given to whoever wins the litigation so that the fruits of litigation can be enjoyed. The balance land which is superfluous land is to be returned to its rightful owners."
If the Nyas feels they are the owners, some land will go back to them. This is what paragraph 50 says. Paragraph 50 also says that in this acquired land, nobody, except the Central Government, has the right to decide this. Shri Jaipal Reddy, which is the later stage? That is the only issue today. Will the later stage come when the title dispute of the property in Lucknow is decided and thereafter you start deciding how much property is required? Or, can you, in anticipation, today also decide a mosque or a temple to be built here? The structure on which it is to be built, which is a disputed area, is known. Who will own the disputed area is only in dispute. How much land is required for its access, protection and enjoyment? You can carve out today and give the balance back. Or, should you have to wait till the suit is decided? That is the only question.
Shri Jaipal Reddy, since you have the benefit of having the judgement, you turn to the last five lines of paragraph 56. If necessary, I may have to repeatedly read it. Now some part of this land has to be returned. The rightful owners are asking the Government, please return our land to us. What does the Government do? The Government can say, ‘I will flout the 1994 judgement’, or the Government will say, ‘I will comply with the 1994 judgement’. Now I am just reading the last five lines of paragraph 56.
"The embargo on transfer till adjudication and in terms thereof to be read in section 6(1) relates only to the disputed area while transfer of any part of excess area, retention of which till adjudication of the dispute relating to the disputed area may not be necessary, is not inhibited till then. Since the acquisition of excess area is absolute subject to the duty to restore it to the owner, its retention is found to be unnecessary as indicated."
Therefore, paragraph 56 says, when it is to be returned. The embargo on transfer to the winner of the title case, till adjudication, is restricted to the disputed area and the transfer of the surplus area, which is to be returned back, is not inhibited till the title suit is decided.
SHRI S. JAIPAL REDDY : Will you kindly read paragraph 57?
SHRI ARUN JAITLEY: I can read it. Please permit me. I may be wrong. After all, Shri Jaipal Reddy is an authority on English language. The meaning of it is very clear. In my view, paragraph 56 clearly lays down--and this was also the Attorney-General’s view--that the transfer of superfluous land does not have to wait till adjudication. Let me concede to you the right. Somebody else may think that the contrary view is correct. Now, what is the interpretation of this 1994 judgement? Will you have to wait till adjudication for returning? After all, it is also a serious matter. I say it is a serious matter because there may be a view that somebody may come up and say like this later. Let me assume that VHP and Nyashave nothing to do with it, but there is a Sita rasoi in this land. The owner of that property may come up and say: ‘मुझे मेरी सम्पत्ति वापिस मिले। ५० एकड़ जमीन के झगड़े का निर्णय किसके पक्ष में होता है, कुछ पता नहीं है। मानस भवन मेरा धार्मिक स्थान है, उसे वापिस किया जाए। जब तक ५० एकड़ जमीन का निर्णय नहीं होता है, तब तक मैं उसकी प्रतीक्षा नहीं कर सकता हूं।’ १९९४ के निर्णय के तहत केन्द्रीय सरकार की कुछ जिम्मेदारी है। यह संभव है, जिसको हम आज पढ़ रहे हैं, कल कोई दूसरी प्रतक्रिया दे। यह विषय सुप्रीम कोर्ट के सामने है। सन् २००२ में याचिका दायर हुई। उस जमीन को प्रोटैक्ट करना है, बचाना है, क्योंकि उस पर लाखों-करोड़ों रुपया खर्च हुआ है। हम इसके रिसीवर हैं, इसलिए इसका प्रशासन हमारे पास है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने सन् २००२ में इस याचिक को एडमिट किया।
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, I cannot allow it to go unchallenged. I think the interpretation of the Minister is biased and motivated.
23.00 hrs. I think, having stuck its nose out in such a position, your party has no option but to say that my interpretation is bad; but this is not the forum for that. My objection is, this is precisely the issue on which the Supreme Court would decide, on the 6th March, whether your interpretation is correct or the contrary is correct. How can you pre-empt that decision by saying that it is treacherous for the Central Government to tell the Court to please decide it expeditiously? Is it shocking for anybody to move the Court to decide any matter expeditiously? Is it that the Court must not move and this dispute must go on?
If you would excuse me for saying so, some people have repeatedly made an accusation against the Government and my party that we have a vested interest in prolonging this dispute. My submission is, you have a vested interest in prolonging this dispute. Those who oppose this judicial expedition have a vested interest that this dispute must prolong. The Government is interested in an expeditious disposal of the process and that is why we moved the Court. … (Interruptions)
: You have yourself agreed that all the parties are due to see that the process of settlement at the Lucknow Bench of the Allahabad High Court was expedited.
SHRI ARUN JAITLEY: Oh, I see! I did not know, you have double standards with regard to expedition. So, the expedition in Lucknow must take place but in Delhi the delay is all right! SHRI S. JAIPAL REDDY : There is no issue pending in the Supreme Court.
SHRI ARUN JAITLEY: Shri Jaipal Reddy, I am afraid, I cannot add to your ignorance. There is a writ petition pending in the Supreme Court. … (Interruptions)
SHRI S. JAIPAL REDDY : It is not a writ petition filed against you.
SHRI ARUN JAITLEY: That is a writ petition filed against the Union of India that the Union of India must not act against the 1994 judgement. That is the writ petition. The Union of India is a respondent. The order is against the Union of India. The Union of India is impressed by one party to implement the judgement. The other party says, ‘Do not implement the Judgement.’ The Union of India does what is the most honourable thing under the circumstances and so requests the Judiciary to clarify it by an expeditious disposal and explain what the legal situation is. … (Interruptions)
Sir, I am not yielding to Shri Ahamed. … (Interruptions)
SHRI E. AHAMED : When the parties are at liberty to go to the Court for claiming their property, why did the Government move as a proxy for another party?
SHRI ARUN JAITLEY: It is apparently my inability to explain.
The parties to the title suit are only in Lucknow. The Delhi writ petition is a writ against the State. That is against the Union of India where the Union of India, the State of Uttar Pradesh and some private parties are respondents. The relief is claimed against the Union of India. The relief is claimed against the Union of India, which has told the Court that this issue is continuing and people are making claims. In fact, our application to the Court says precisely this: ‘March last year, you said, you would hear it after ten weeks. Ten weeks have passed and so please fix up a date for hearing this matter.’ After all, what the Union of India has done is to go to a higher judicial forum and ask for adjudication. Today, why did the Government ask for this? … (Interruptions)
SHRI S. JAIPAL REDDY : You sought a relief.
SHRI ARUN JAITLEY: We sought a relief because under the 1994 judgement there are certain obligations imposed upon the Union of India to act in a particular manner.
The Union of India is very clear on this. The Union of India would comply only with the court order in this matter. Whatever the Court decides in the Lucknow matter with regard to the disputed area, the Government would follow. Whatever the Court decides in Delhi in the Supreme Court with regard to the residual matters, the Government of India would enforce those directions.
I repeat, as far as the Union Government is concerned, out commitment is as per the NDA agenda that it has to be either by negotiations or by a judicial settlement. There are currently no negotiations that are on. Therefore, as for a judicial settlement, we are endeavouring, pursuant to an all-party decision, to get the case in Lucknow expedited. We have made an attempt, in our own humility to get the petition in Delhi expedited. We shall comply only with the Court orders as and when they are passed, irrespective of what the Court orders are, and really the Court has already passed an order on our application and said: ‘We are prepared to have a hearing on this matter on the 6th March.’ So, I would like to know from the people who have brought up this discussion before this House, what is the relevance of this discussion now. Is there any relevance when the Court has already passed an order on the application of the Union of India? Therefore, may I inform hon. Members that it is a genuine and bona fide effort by the Government for expedition and request that nothing more to our desire to have this dispute expeditiously settled through a judicial process must be read into?
With these words, I thank you for giving me this opportunity.
SHRI S. JAIPAL REDDY : Sir, let me put on record that we are not totally satisfied with the reply of the hon. Minister. … (Interruptions)
श्री रामजीलाल सुमन: उपाध्यक्ष महोदय, हम भी जवाब से असंतुष्ट हैं, इसलिये सदन से वॉक आउट करते हैं। . … (व्यवधान)
23.05 hrs (At this stage, Shri Shivraj V. Patil and some other hon. Members left the House.) MR. DEPUTY SPEAKER : The House now stands adjoun till tommrow 11.00 a.m. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Friday, February 28, 2003/Phalguna 9, 1924 (Saka).
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