Lok Sabha Debates
Discussion On The Constitution (Ninetieth Amendment) Bill, 2000 (Amendment Of ... on 9 May, 2000
Title: Discussion on the Constitution (Ninetieth Amendment) Bill, 2000 (Amendment of article 16).(Not concluded) THE MINISTER OF STATE OF THE MINISTRY OF SMALL SCALE INDUSTRIES, AGRO AND RURAL INDUSTRIES, MINISTER OF STATE IN THE DEPARTMENT OF PERSONNEL AND TRAINING, DEPARTMENT OF PENSIONS AND PENSIONERS WELFARE OF THE MINISTRY OF PERSONNEL, PUBLIC GRIEVANCES AND PENSIONS AND MINISTER OF STATE IN THE DEPARTMENTS OF ATOMIC ENERGY AND SPACE (SHRIMATI VASUNDHARA RAJE): Mr. Speaker, Sir, I beg to move:
"That the Bill further to amend the Constitution of India, be taken into consideration. "
Sir, the Constitution (Ninetieth Amendment) Bill, 2000 was introduced in this House yesterday, the 8th May, 2000. Under this Bill, it is proposed to incorporate clause 4B under article 16 of the Constitution with a view to enable the State to provide that 50 per cent limit on reservation shall exclude the "Backlog Vacancies". I may mention, Sir, that the proposed amendment has become necessary as it had become difficult to fill the "Backlog Vacancies" consequent on the issue of an Office Memorandum dated August 29, 1997, in implementation of the Supreme Court judgement in the Indra Sawhney case.
The Bill seeks to enable the State to overcome the adverse effect of the aforesaid Office Memorandum dated August 29, 1997 and to restore the position as existed prior to that date. The exclusion of the backlog from 50 per cent ceiling on reserved vacancies to be filled in a year would help in accelerating recruitment to the various posts for Scheduled Castes and Scheduled Tribes. It would also speed up the process of reaching the prescribed percentages for these categories in the cadres where there is a backlog.
Sir, with these words, I commend the Bill for the consideration of the House.
MR. SPEAKER: Motion moved:
"That the Bill further to amend the Constitution of India, be taken into consideration. "
Hon, Members, voting on this Bill is at 8 p.m. … (Interruptions)
संचार मंत्री (श्री राम विलास पासवान) : महोदय, इस बिल में सारे सदन की भावना नहित है। सदन में सदस्य उपस्थित हैं, आप इसको बिना डिसकशन पास करवा दीजिए। …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव (संभल) : हमारा निवेदन है कि इस बिल का वोटिंग समय ८.३० बजे कर दिया जाए। …( व्यवधान)
श्री राम विलास पासवान : महोदय, इस बिल पर डिसकशन की जरूरत नहीं है। …( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Please understand that it has already been decided that the two Constitution Amendment Bills would be passed today itself.
… (Interruptions)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): Sir, we will cooperate with you. We only wanted to know at what time the voting is taking place so that our Members will be there.
MR. SPEAKER: It is at 8 p.m. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: This is a Constitutional Amendment Bill. So, the presence and voting of the Members is also an important thing. Please take your seats.
सरदार बुटा सिंह (जालौर) : महोदय, सदन में सरकार द्वारा ९०वां संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया है, बुनियादी तौर पर, सैद्धान्तिक तौर पर हम इस बिल का समर्थन करते हैं, लेकिन इस बिल का समर्थन करते हुए हम प्रधान मंत्रीजी को बधाई देने में असमर्थ हैं। यह इसलिए कि प्रधान मंत्री जी ने इसी सदन के अन्दर तीन बार सदन को वचन दिया था कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए जो आरक्षण नीति है, उस नीति में डिपार्टमेंट आफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने जनवरी, १९९७ से लेकर अगस्त, १९९७ तक, पांच अर्द्ध सरकारी पत्र जो जारी किए हैं, उनकी समाप्ति नहीं की है। साथ ही संविधान के अन्दर जो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के जो मौलिक अधिकार है, उनकी अवहेलना की है। इसलिए जब तक प्रधान मंत्री जी १९९७ से पहले की आरक्षण नीति को समाप्त नहीं करते और उन पांच अर्द्ध सरकारी पत्रों को वापिस नहीं करते, तब तक आरक्षण नीति विकलांग रहेगी। आपको मालूम है, यह कोई दल का मुद्दा नहीं है।
18.00 hrs. यह राष्ट्रीय मुद्दा है। इसमें सभी दलों के आदरणीय सासंदों ने हिस्सा लिया। १९९६ में सुप्रीम कोर्ट के सामने जब यह चर्चा चली तब से लेकर शेडयूल्ड कास्ट्स शेडयूल्ड ट्राइब्स पार्लियामैंट्री फोरम ने प्रधान मंत्री को विस्तारपूर्वक एक ज्ञापन दिया। इसके बाद एक-एक करके पांच निर्णय हो गए। एस.सी.एस.टी पार्लियामैंट्री फोरम जिस में पक्ष और विपक्ष सभी दलों के लोग थे, १९९७ में उस समय के प्रधान मंत्री को एक विस्तारपूर्वक मैमोरंडम दिया लेकिन उनका प्रधान मंत्री पद छीन गया। दूसरी बार जब गुजराल साहब आए तो उन्हें भी पूरा ज्ञापन दिया गया। मैं इस तरफ पासवान जी का ध्यान दिलाऊंगा। उस समय पासवान जी मंत्रिमंडल में थे। उस मैमोरंडम को लेकर पासवान जी ने कोशिश की और एक अध्यादेश तैयार किया। बदकिस्मती से वह अध्यादेश कैबिनेट से पारित नहीं हो सका। फिर सरकार टूट गई। १९९८ में वाजपेयी जी प्रधान मंत्री बने तो एस.सी एस.टी. पार्लियामैंट्री फोरम में सौ से ऊपर सासंदों ने इसी प्रकार का मैमोरंडम तैयार किया। उसमें बताया गया कि आरक्षण नीति में डिपार्टमैंट ऑफ पर्सोनल ने किस तरह जड़ें काट दी हैं? वह मैमोरंडम १९९८ में वाजपेयी जी को दिया गया। उनसे समय लेकर प्रधान मंत्री के निवास स्थान पर बहुत बड़ी मीटिंग भी हुई। उसमें सभी दलों के नेता शामिल हुए थे। प्रधान मंत्री जी ने तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री श्री मदन लाल खुराना को भी बुलाया। वे उस मीटिंग में स्वयं उपस्थित थे। उन्होंने बड़े ध्यान से हमारी बात सुनी। यह शायद पहली बार था कि इस सदन का अध्यक्ष एक डैपुटेशन में जाकर प्रधान मंत्री जी से आग्रह करे कि जितने अर्द्ध सरकारी पत्र जारी किए गए, वे संविधान के खिलाफ हैं और इनके माध्यम से शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स के लोगों की आरक्षण नीति बिल्कुल खत्म होगी। प्रधान मंत्री जी ने हम से वायदा किया लेकिन वह वायदा कार्यान्वित नहीं हो सका। मैं उसमें जाना नहीं चाहता। हम चाहते हैं कि सब के समर्थन से यह पारित हो। हम इसमें कटाक्ष नहीं करना चाहते। मैं सभी दलों की ओर से कोशिश करूंगा कि वे उसे लेकर इस सदन में आएं। इसके बाद गर्मी बढ़ गई। हमने १७-१८ मार्च को प्रधान मंत्री जी से कहा कि आपने सॉलेम एश्योरेंस तीन बार सदन के अन्दर और बाहर दिया, कृपया इन सभी अर्द्ध सरकारी पत्रों को वापस लेकर १९९७ से पहले की आरक्षण नीति को पुन: लागू करें।
१८०३ बजे(श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा पीठासीन हुईं) बदकिस्मती से प्रधान मंत्री कर नहीं पाए और उनकी सरकार चली गई। नई सरकार बनने के बाद वधि मंत्री श्री राम जेठमलानी पॉलटिकल रिजर्वेशन दस साल बढाने के लिए एक संशोधन बिल लाए। उसमें सभी दलों ने उनका साथ दिया। मैंने स्वयं अपने भाषण में जेठमलानी जी से पूछा कि आप उन चीजों के बारे में क्या करेंगे जिस में डी.ओ.पी. ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हम कुछ नहीं कर सकते। आप रिकॉर्ड चैक कर लीजिए। जेठमलानी जी ने कहा कि आपने याद करवा कर अच्छा किया। हम कोशिश करेंगे। यदि संविधान में तबदीली करनी होगी तो उसे भी करेंगे और जितने अर्द्ध सरकारी पत्रों का बुरा असर हुआ है, उसे खत्म करेंगे। जेठमलानी जी के वायदा करने के बाद तीन दिन का एक सेमिनार हुआ। उसमें प्रधान मंत्री गए। उसमें सभी दलों के लोग शामिल हुए। उस सेमिनार में एक एग्रीड डेक्लरेशन पास हुआ। उसमें सभी बड़े-बड़े दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। उसमें पासवान जी, बहन मायावती आदि सभी लोगों ने दस्तखत करके ४५ प्वाइंट्स का डेक्लरेशन दिया।
मैंने सामाजिक न्याय मंत्री को चिट्ठी लिखी कि जो नेशनल कांफ्रेंस ने डेक्लरेशन भेजा है, उसका स्टेटस बताइये। मैंने जब इस बारे में श्री जेठमलानी जी से बात की तो उन्होंने कहा कि वे इसके इंचार्ज नहीं हैं। जबकि उन्होंने सदन में कहा था कि वे करेंगे। मैं मानता हूं कि यह विभाग की बात है। अब यह विभाग करे या वह विभाग करे, मैं इसमें पड़ना नहीं चाहता लेकिन जब मैंने उनसे पूछा कि सभी दलों और सारे नेताओं द्वारा दस्तख्त किया गया डेक्लेरेशन आया है , इसका स्टेटस क्या है, क्या सरकार ने मान्यता दे दी है, यदि दे दी है तो फौलो अप करने के लिये क्या एक्शन हुआ है? लेकिन इसका कोई उत्तर मुझे नहीं मिला है। मैंने दो दिन पहले माननीय प्रधानमंत्री जी को चिट्ठी लिखी है लेकिन उसका भी कोई उत्तर नही मिला। हां, मंत्री महोदया के दफ्तर से उत्तर आय़ा है कि जिस जिस विभाग के...
श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला): सभापति महोदय, मेरा पाइंट ऑफ ऑर्डर है। मै माननीय सदस्य से पूछना चाहता हूं कि उस तीन दिन के सेमिनार में वे क्यों नहीं गये?
श्री बूटा सिंह (जालौर): सभापति महोदय, मैं आज पॉज़टिव बोल रहा हूं, ये मुझे न छेड़ें तो ठीक होगा। मैं उनको बताना चाहता हूं कि मैं उस सेमिनार में इसलिये नहीं आया क्योंकि श्रीमती मेनका गांधी ने बाबा साहेब अम्बेडकर का अपमान किया था और श्री अरुण शौरी ने बाबा साहेब अम्बेडकर को गाली दी है। मगर फिर भी मैं इस विधेयक का समर्थन करना चाहता हूं। मैं आपके सामने सम्पूर्ण तथ्य रख रहा हूं। यदि कोई तथ्य में कमी हो और आप कहेंगे तो मैं बैठ जाऊंगा।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप लोग क्यों डिस्टर्ब कर रहे हैं। यदि आप लोगों को बिल पास करवाना है तो आप बैठिये।
श्री रतन लाल कटारिया : सभापति महोदय, हम तो इनको धन्यवाद दे रहे हैं कि ये अच्छे काम के लिये समर्थन कर रहे हैं।
श्री रतिलाल कालीदास वर्मा (धंधुका): सभापति जी, हम तो श्री बूटा सिंह जी को समर्थन दे रहे हैं।
सभापति महोदय : आपके क्लैरफिकेशन की कोई जरूरत नहीं। मंत्री महोदय खुद उत्तर दे देंगे।
श्री बूटा सिंह : सभापति महोदय, मैं इस बिल का विरोध नहीं कर रहा हूं। यदि इतिहास को सही प्रस्तुत न किया जाये तो यह सदन और माननीय सदस्यों के साथ अन्याय होगा। इसके लिये मैंने पहले प्रधानमंत्री जी को लिखा है। यदि आप उन सब चीजों की मंजूरी दे देते हैं तो इससे ज्यादा खुशी की बात क्या होगी। हम आपके सदैव ऋणी रहेंगे। जैसा माननीय सदस्य़ ने पूछा तो उसके एवज में मैंने यह बात बताई। आज हम लोग आपको समर्थन देने के लिये तैयार हैं।
सभापति महोदय, सरकार जो संशोधन लाई है, वह बहुत थोड़ा और देर से लाई है। यदि मैं इस बिल में पेश की गई त्रुटियों को बताऊं तो आप मेरी गलती नही समझेंगे। आपने इस बिल के एम्स एंड आब्जैक्टिव्स मे बैकलाग को भरने के लिये लिखा है:
"Prior to August 29, 1997, the vacancies reserved for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, which could not be filled up by direct recruitment on account of non-availability of the candidates belonging to the Scheduled Castes or the Scheduled Tribes, were treated as "Backlog Vacancies".
हम इसको मानते हैं लेकिन इसका उपयोग बिल की बॉडी में नही है। जो बिल आपने प्रस्तुत किया है, उसमें बैकलाग नहीं है बल्कि उसमें शब्द ""अनफिल्ड वैकेन्सीज़ट है। इसे अरुण जी जानते है कि जब कानून में किसी शब्द का अर्थ ढूंढा जाता है तो डिक्शनरी मदद नहीं करती है। कानून में जो लिखा हुआ है, वह अर्थ लिया जाता है। बैकलॉग का अर्थ अनफिल्ड वैकेन्सीज़ नहीं है। मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता लेकिन इतनी प्रार्थना करूंगा कि आपने इसके एम्स एंड आब्जैक्टिव्स में बैकलॉग शब्द मेंशन किया है, कृपया आर्टिकल ४बी की जो पहली लाइन है, उसमें भी शब्द अनफिल्ड बैकलॉग कर दीजिये। यह संशोधन आपका है, हम अपनी ओर से कोई संशोधन नहीं दे रहे हैं क्योंकि श्री जेठमलानी जी जानते हैं कि यदि कानून में गधे को गाय कह दिया जाये तो कचहरी उसे गाय मानेगी, गधा नहीं कहेगी। मैं श्री अरूण जी को यह वर्बल तज़वीज़ दे रहा हूं, कोई अमेंडमेंट नहीं दे रहा हूं। आप मेहरबानी करके इसके एम्स एंड आब्जैक्टिव्स में जिस बैकलॉग शब्द का इस्तेमाल किया गया है, उसे बिल के संशोधन की बॉडी में शामिल कर दें।
हमारा कोई झगड़ा नहीं है। दूसरी तरफ रिजर्वेशन पालिसी की जो क्षति हुई है वह एक आस्पेक्ट में नहीं है। सरकार की तरफ से जो अर्द्ध सरकारी पत्र पूरे देश में राज्य सरकारों, केन्द्र सरकार के पब्लिक अंडरटेकिंग्स और जितने सरकार द्वारा संचालित इंस्टीट््यूशंस, यूनिवर्सिटीज और कालेजेज आदि में बांटा गया, उसने बहुत नुकसान किया है। प्रधान मंत्री जी आपका पहला अर्द्ध सरकारी पत्र, जब मैं आपका कहता हूं तब मैं आपकी सरकार की बात नहीं कर रहा हूं, भारत सरकार का पहला अर्द्ध सरकारी पत्र जो ३० जनवरी, को महात्मा गांधी के शहीदी दिवस पर भारत सरकार ने जारी किया था, उससे जितने भी अनुसूचित जाति के अफसर पदोन्नति पर चले गये थे, उनकी पदोन्नति छीन ली जिन्हें बाकायदा सन् १९५७ के बाद रूल्स के मुताबिक, कांस्टीटयूशन के अंतर्गत पदोन्नति मिली थी, उनकी पदोन्नति वापस हो गई। दो जुलाई को जो आपने अर्द्ध सरकारी पत्र भेजा, जिसमें रोस्टर के कुछ रिजर्व प्वाइंट्स थे फिर उनके साथ गड़बड़ी की गई। सन् १९५७ के पहले जो रोस्टर था, उसे बदलकर बहुत बड़ा रोस्टर बना दिया गया, जब १३ पोस्ट्स काउंट होंगी तो उसमें एक भी शेडयूल्ड कास्ट नहीं बढ़ेगा। पहले दस में दो आ जाते थे। यह भी एक बहुत बड़ी क्षति हुई। Thirdly, in the letter dated 22nd July, you had stated about loss of promotion opportunities and you had withdrawn all the earlier concessions of relaxation. सारे रिलेक्सेशन और कंसेशंस जो रखे जाते थे, जिससे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के प्रोमोशन होते थे, उनमें उन्हें नम्बरों में छूट दी जाती थी और उनके लिए बहुत से रास्ते ढीले कर दिये जाते थे, ताकि इन्हें पूरा रिप्रेजेन्टेशन मिले, इन्हें पदोन्नति दी जाए। इस अर्द्ध सरकारी पत्र ने सारे कंसेशंस छीन लिये, जो कांस्टीटयूशन के मुताबिक मिले हुए हैं, वे किसी दल या सरकार के दिये हुए नहीं हैं। भारत सरकार ने कांस्टीटयूशन को इम्पलीमेंट करते हुए ये कंसेशंस रखे थे। फिर आपने १३ अगस्त, १९९७ को पत्र लिखा, जिसमें आपने कहा -
"Reservation not extended to all classes and classes of posts, including promotions and selections in Group ‘A’, despite an enabling provision in the Constitution." This is also against the Article 16 (4) and 16 (4)(A) of the Constitution.
आखिर में, जिसके लिए आज आप सदन के सामने आये हैं, वह २९ अगस्त, १९९७ को जो शार्टफाल थी, जिसे देखा जाए यह शार्टफाल तीन साल तक चलती थी, इसका ब्रीफ इतिहास मैं आपको दो लाइनों में बताता हूं -
The rule regarding carry forward has also undergone changes in these years. In 1952, the unfilled reserved vacancies for the Scheduled Castes were required to be carried forward just for one year. Two years later, it was extended from one year to two years and another provision was made, I think, in 1989 to extend it to three years.
इसका मतलब यह हुआ कि तीन साल तक सरकार के जिस-जिस विभाग में पोस्ट्स नहीं भरी गईं, उन्हें डीरिजर्व करने से पहले तीन साल अकुमुलेट करके चलाना पड़ता था। तीन साल बाद तक, जब उनकी पूर्ति नहीं हो पाती थी तो यह मामला मंत्री के अधिकार से डीरिजर्व होता है, मगर डी.ओ.पी.टी. ने जो अर्द्ध सरकारी पत्र भेजा है, इसने सब कुछ खत्म कर दिया है और साथ में यह जोड़ दिया कि एक साल में केवल ५० प्रतिशत तक ही पोस्ट्स भरी जायेंगी, चाहे वह बैकलॉग की हों या नई पोस्ट्स हों। आप ५० प्रतिशत से ऊपर नहीं जा सकते। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि Unfortunately, the Mandal Commission case was taken up by the Supreme Court. उसमें सुप्रीम कोर्ट ने ५० प्रतिशत का प्रतिबंध लगा दिया। आप जानते हैं कि देश में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की जनसंख्या २२.५ प्रतिशत है और बैकवर्ड क्लास के लोगों को मिलाकर ४९.५ प्रतिशत है, उसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह कह दिया कि हम इसमें ५० प्रतिशत नहीं लगा सकते, इसलिए बैकलॉग खत्म कर दिया।
क्योंकि ५० प्रतिशत के अंतर्गत केवल चालू साल की पोस्टों को ही भरा जाएगा, उसे नल्लीफाइ करने के लिए आप आगे आए हैं, मैं इसका स्वागत करता हूं। मैं आपके माध्यम से आदरणीय प्रधान मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि इस पॉलिसी की ज़ड़ें काटी गई हैं उन पांच अर्द्ध सरकारी पत्रों से -- एक-एक अर्द्ध सरकारी पत्र से अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के लोगों को मिले हुए आरक्षण को, वह भी जो फंडामेंटल राइट्स में है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर आर्टिकल १६(४) ए को काटा कि यह मूलभूत अधिकार नहीं है। जेठमलानी जी किस स्ट्रैच ऑफ इमैजिनेशन से आप इस नतीजे पर पहुंचे कि article 16(1), (2), (3) (4) is a Fundamental Right but (4A) is not a Fundamental Right.
य़ह शरीर बूटा सिंह है लेकिन यह अंगुली बूटा सिंह नहीं है। आज तक हमने ऐसी इंटरप्रिटेशन कानून की नहीं देखी। नेशनल कमीशन फॉर शेडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्ज ने जो काम ५० साल में नहीं किया, वह एक बार में इन्होंने किया कि इन पांचों अर्द्ध सरकारी पत्रों को लेकर एक स्पेशल रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजी है जिसके प्रोविजन निहायत मुश्किल हालात में, इमरजेन्सी में हैं। वह रिपोर्ट इस सदन में आई। उस रिपोर्ट पर जो ऐक्शन टेकन पत्र सरकार की ओर से यहां रखा गया उसको आप पढ़ेंगे तो उसमें सरकार ने एक बहुत बड़ा कम्बल ओढ़ लिया कि एक-एक अर्द्ध सरकारी पत्र सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के मुताबिक है। यह भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के मुताबिक है और उसमें एक नयी टर्म इजाद हो गई सरकार की ओर से कि सुप्रीम कोर्ट का हुक्म लॉ ऑफ दि लैन्ड होता है, यानी, सुप्रीम कोर्ट के डिसीजन को चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि यह लॉ ऑफ दि लैन्ड हो गया। मैं पूछता हूं आदरणीय प्रधान मंत्री जी से कि when the law of the land, as declared by the Supreme Court, comes in clash with the provisions of the statute, Shri Ram Jethmalani, who will prevail?
…( व्यवधान)
वधि, न्याय और कंपनी कार्य मंत्री (श्री राम जेठमलानी) : मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं, आप ख्वामख्वाह क्यों बहस बढ़ा रहे हैं?
सरदार बूटा सिंह (जालौर) : मैं आपको बताना चाहता हूं, when the law of the land comes in conflict with the provisions of the Constitution, the statute prevails. This is the golden principle in the Constitutional Law. मगर इन पांचों अर्द्ध सरकारी पत्रों को डिपार्टमेंट ऑफ पर्सोनल ने एक ब्लैन्केट के रूप में ओढ़ लिया और सभी के साथ लिख दिया कि चूंकि यह सुप्रीम कोर्ट का डिसीज़न है, हम इसमें कुछ नहीं कर सकते, इससे पता चलता है कि नौकरशाही की नीयत कितनी खराब है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसले दलितों के पक्ष में दिये, वह लॉ ऑफ दि लैन्ड नहीं बने और सुप्रीम कोर्ट के जो फैसले दलितों के खिलाफ गए, वह लॉ ऑफ दि लैन्ड कहकर सरकार ने हमारे ऊपर लागू किये। It is high time और यह मसला इस संशोधन से खत्म होने वाला नहीं है क्योंकि बड़े व्यापक इश्यू इसमें इनवॉल्व हो चुके हैं। हमने पूरे देश में भ्रमण किया है। कॉनफैडरेशन ऑफ शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्ज इंप्लॉइज़ ऐसोसियेशन, जिसके अध्यक्ष राम विलास जी हैं, उनके साथ मैंने सभी प्रांतों का दौरा किया है। मैं राम विलास जी से कहूंगा कि वह अपना कमिटमेंट महसूस करें और प्रधान मंत्री जी को राय दें कि अगर एक संशोधन जो लॉ ऑफ दि लैन्ड बनकर हमारे रास्ते में आया था, अगर उसको खत्म करवा सकते हैं तो बाकी के जो चार संशोधन हैं, जिनको लॉ ऑफ द लैन्ड कहकर डी.ओ.पी.टी. ने लागू किया है, उनको भी एक साथ वापस कर दीजिए। इसी बीच में हमारे कांग्रेस दल की आदरणीय नेता और विपक्ष की नेता ने विस्तारपूर्वक एक चिट्ठी प्रधान मंत्री जी को इस विषय पर लिखी। …( व्यवधान)
श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज) : इतना गंभीर मुद्दा है और विपक्ष की नेता लापता हैं।…( व्यवधान)
सरदार बूटा सिंह : उसमें उन्होंने सारे मुद्दे उठाए हैं और इन सारे मुद्दों को उठाते हुए उन्होंने कहा है कि आदरणीय प्रधान मंत्री जी, आपने एक बार नहीं तीन बार आश्वासन इस सदन को दिया है।
सभापति महोदया, मेरा आपके माध्यम से प्रधान मंत्री जी से निवेदन है कि जो आश्वासन सरकार ने दिया है, उसे वे कार्यान्वित करें। अफसोस की बात है कि वे आश्वासन अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। प्रधान मंत्री जी आज यहां बैठे हैं, इस बात की हमें बहुत खुशी है क्योंकि उनकी उपस्थिति के कारण इन सारे मुद्दों पर सरकार पूरी गंभीरता के साथ फैसला करेगी। हमारे दल के जितने भी सांसद हैं, उन सभी ने मिलकर १९९७, १९९८, १९९९ और सन् २००० में जितने भी मैमोरेंडम सरकार को दिए हैं, वे सब हमने इनीशिएटिव लेकर सभी दलों के सांसदों से दस्तखत करा के दिए। उन पर आपने धीरज के साथ, गंभीरता के साथ विचार किया होगा, लेकिन हमें उनके बारे में कोई सूचना नहीं मिली। इसलिए हम आपसे करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि यह दलितों की बात है। इसलिए आप भी उतनी ही द्ृढ़ता के साथ इनको लागू कीजिए जितनी द्ृढ़ता के साथ बाबा साहब अम्बेडकर ने इन प्रावधानों को संविधान में रखा। तब हम समझेंगे कि आप दलितों, आदिवासियों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का हित करना चाहते हैं और उनका भला चाहते हैं।
सभापति महोदया, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग हजारों वर्षों से उपेक्षित रहे हैं। उनका कैसे शोषण हुआ, वह भी एक बहुत बड़ा वचित्र मसला है। इसलिए हम आपके माध्यम से केवल इतना ही निवेदन करना चाहते हैं कि इन पांचों अर्धशासकीय पत्रों को खत्म कर दिया जाए। इसके साथ-साथ मैं एक निवेदन और करना चाहता हूं कि कुछ इधर और कुछ उधर के माननीय सांसदों ने इसके ऊपर तीन बिल दिए हैं जिनमें से दो बिल मंजूर हो चुके हैं और वे प्राईवेट मैंबर बिल के रूप में इस सदन में आने वाले हैं। वे दो बिल कांग्रेस के माननीय सदस्य श्री राष्ट्रपाल एवं श्री सुशील शिन्दे जी के हैं। मेरा आपके माध्यम से सरकार से निवेदन है कि वे दोनों बिल बहुत ही अच्छी तरह से ड्राफ्ट किए हुए हैं, बहुत अनुभवी व्यक्तियों की तरफ से अच्छे ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं, वे दोनों बिल अगले सत्र में आप प्राइवेट मैम्बर बिल के रूप में नहीं बल्कि सरकारी बिलों के रूप में लाएं, तब हम आपका पूरी तरह से साथ देंगे।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से सदन में कहना चाहता हूं कि जैसा सरकार ने हमें आश्वासन दिया है और कहा है कि जो हम चाहते हैं वैसा ही सरकार कर देती है, उसके अनुसार हमें पूरा विश्वास है कि आप हमारी बातों पर पूरा गौर करेंगे और जैसा हमने चाहा है, पाचों अर्धशासकीय पत्रों को खत्म कर देंगे। तब हम मानेंगे कि आप दलितों, आदिवासियों, अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के हमदर्द हैं और उनके मसले को पार्टी से ऊपर उठकर राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में देखते और तय करते हैं। इससे पूरे सदन का आपको समर्थन मिलेगा और हम भी आपके साथ होंगे।
सभापति महोदय, अन्त में मैं अपनी बात समाप्त करते हुए प्रधान मंत्री जी से एक निवेदन और करना चाहता हूं कि अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड की ओर से वहां की सरकारों ने उन्हें ज्ञापन दिए हैं जिनमें विशेषरूप से उल्लेख किया गया है चूंकि वहां अनुसूचति जाति के लोगों की संख्या बिलकुल नहीं है इसलिए वहां इस प्रावधान को लागू न किया जाए, इसके साथ-साथ वहां की सरकारों ने जो-जो बिन्दु अपने ज्ञापनों में उठाए हैं, मुझे उम्मीद है कि उन पर भी आप गंभीरता से विचार करेंगे।
श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर): सभापति महोदया, जो संविधान (इक्यासीवां संशोधन) विधेयक, २००० (अनुच्छेद १६ का संशोधन) प्रस्तुत हुआ है, मैं उसका समर्थन करता हूं और अटल जी की सरकार को इस बात के लिए बधाई देना चाहता हूं कि १९९७ में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों के आरक्षण के संबंध में न्यायालयों के निर्णय के तारतम्य में तत्कालीन सरकार ने जो पांच शासनादेश निकाले थे, उनके कारण इन लोगों के प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लग गई थी। इसके साथ ही साथ जो पिछला बैकलॉग था और उसको लेकर जो अगले साल भरती होने की कार्रवाई होती थी और वह संख्या यदि ५० प्रतिशत से अधिक हो जाती थी, तो उस पर भी रोक लग गई थी। इससे ऐसा लगता था कि देश में १९९७ का वर्ष, गुजराल साहब और देवेगौड़ा साहब की सरकारों का समय, अनुसूचित जाति, जनजाति और दलित वर्ग के लोगों को न्याय दिलाने में सफल नहीं हो पाया। ।
सारे देश में अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़े वर्ग के लोगों में चिन्ता और आक्रोश व्याप्त हो गया था। उस समय से सरकार से लगातार यह मांग की जाती रही है कि न्यायालय के निर्णय के कारण जो आदेश जारी हुए हैं, उन्हें सरकार वापस ले और दलित वर्ग के लोगों को नौकरियों में आरक्षण, प्रमोशन में आरक्षण तथा ५० परसेंट से अधिक बैकलॉग हो गया है, उसको भी भरने की अनुमति दी जाये। अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग ने भी एक स्पेशल रिपोर्ट महामहिम राष्ट्रपति जी के माध्यम से सरकार के पास भेजी है। तत्कालीन सरकार ने क्या किया, क्या नहीं किया, उसके बारे में मैं कुछ कहना नहीं चाहता परन्तु अटल जी की सरकार ने उस पर विचार-विमर्श किया और विचार-विमर्श करने के बाद यह संशोधन विधेयक पस्तुत किया है। इस संशोधन विधेयक के माध्यम से ५० परसेंट से अधिक भर्तियों पर जो रोक लगी हुई थी, उसमें अब ५० परसेंट से अधिक भर्ती हो सकेगी, इस तरह का प्रावधान है।
इसके साथ ही साथ मैं सरकार को इस बात के लिए भी बधाई देना चाहूंगा कि प्रमोशन में आरक्षण पर जो रोक लगी थी, उस पर भी संविधान संशोधन विधेयक २२ दिसम्बर को राज्य सभा में प्रस्तुत कर दिया गया है, जो वर्तमान में गृह विभाग की स्थायी समति के समक्ष विचाराधीन है। अटल जी की सरकार से हमको उम्मीद है, हम विश्वास करते हैं कि स्थायी समति का प्रतिवेदन आते ही उस विधेयक को भी इस संसद मे पास करा कर प्रमोशन में आरक्षण की जो रुकावट आ गयी है. उसको भी दूर करके दलित वर्ग के लोगों को न्याय प्रदान करेगी।
मैं इस पर बहुत ज्यादा नहीं कहना चाहता। अभी बूटा सिंह जी ने, जो पांच ज्ञापन जारी किये थे, एक-एक ज्ञापन के बारे में विस्तार से बता दिया है। इसलिए मैं उनको फिर से दोहरा कर समय बर्बाद नहीं करना चाहूंगा। मैं सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि दलित वर्ग के प्रति संविधान निर्माताओं का जो उद्देश्य था, उसकी पूर्ति के लिए समय-समय पर न्यायालयों में कुछ प्रकरण आते हैं और न्यायालय अपने ढंग से व्याख्या करके उसमें निर्णय देते हैं। इस प्रकार के निर्णय अगर भविष्य में दोबारा हुए तो एक बार नहीं अनेक बार संशोधन होते रहेंगे। आप कोई ऐसी स्थायी व्यवस्था कर दें जिससे अपने ढंग से व्याख्या करके फिर से इस प्रकार की कोई गड़बड़ी हमारे सामने नहीं आये।
भारत के संविधान के अनुच्छेद ३१ (ख) में एक प्रावधान है। उस प्रावधान के अन्तर्गत ऐसा कानून बनाया जाये जिससे अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़े वर्ग की सेवा नौकरियों और आरक्षण में है, उसको नौंवी अनुसूची में डाल दिया जाये। अगर कोई न्यायालय किसी अनुच्छेद या संविधान के नियम की व्याख्या करता है और वह विपरीत होता है तो वह तब तक लागू नहीं होगा जब तक सरकार और उस एक्ट की मंशा के खिलाफ नहीं हो। इस प्रकार का प्रावधान किया जाना बहुत जरूरी है।
इस संबंध में मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि जो पिछला बैकलॉग है, वह कैरी फारवर्ड होकर अगले वर्ष में आता है। यदि वह ५० परसेंट से ज्यादा है तो भर्ती करने की छूट इस संविधान संशोधन के माध्यम से हमको मिलेगी। परन्तु राज्यों में अनुसूचित जाति-जनजाति और दलित वर्ग के लोगों की संख्या कम-ज्यादा है। कुछ राज्य ऐसे हैं जहां इनकी संख्या ५० प्रतिशत से ज्यादा है। वहां अगर ऐसा हुआ तो जो पिछला बैकलॉग है, केवल वही भरा जायेगा और उनकी संख्या के मान से अनुसूचित जाति-जनजाति या ओ.बी.सी. के लोगों को आरक्षण की सुविधा नहीं मिलेगी। मैं सोचता हूं कि संविधान की जो मंशा है, उस मंशा के अनुसार हम लोगों को आरक्षण नहीं दे पायेंगे। जब हम वह आरक्षण नहीं दे पायेंगे तो निश्चित रूप से वे लोग अपनी पीड़ा सरकार के सामने व्यक्त करेंगे। हम देखते हैं कि पिछले साल डेढ़ साल के दौरान अनेक स्थानों पर ये जो ज्ञापन जारी कर दिये थे और उसके कारण दलितों के अधिकारों का हनन हो रहा था, उसके खिलाफ आंदोलन हुए, तोड़ फोड़ हुई। महाराष्ट्र में हुई है। कुछ राजनीति दलों ने भी तारतम्य आंदोलन करके तोड़-फोड़ की गतवधियों में अपने आपको सहभागी किया है भविष्य में इस प्रकार नहीं हो सके, ऐसा प्रयास करने के लिए कोई कानूनी प्रावधान कर दिया जाए।
मैं इस अवसर पर एक निवेदन और करना चाहता हूं कि आज सारे देश में निजीकरण का वातावरण है। राष्ट्रीयकृत कारखाने या संस्थाएं कम होते जा रहे हैं। निजीकरण के क्षेत्र में कारोबार बढ़ता जा रहा है और वहां आरक्षण की सुविधा नहीं मिलती। इस कारण भी वर्तमान समय में दलित वर्ग के लोगों को नौकरी और नौकरी करके खाने-कमाने का अवसर कम मिल रहा है। इस दिशा में भी सरकार को विचार करना चाहिए।
मैं इस अवसर पर इससे अधिक कुछ कहने के बजाए इस विधेयक का समर्थन करता हूं। धन्यवाद।
SHRI P.H. PANDIYAN (TIRUNELVELI): Madam Chairman, I rise to support the Bill, and express my views on this Bill. This Amendment is brought to fill up the backlog of vacancies, and it is virtually implementing the Supreme Court’s judgement in Indra Sawhney case. In the Indra Sawhney case, the Supreme Court has limited the reservation to 50 per cent. But one should know that even in the Supreme Court, there is no reservation. Today, there is no Scheduled Caste or Scheduled Tribe judge in the Supreme Court. There will not be any legal luminary in the community in the whole of India. In AIR 1997 Supreme Court 2324, Justices K. Ramaswamy and G.B. Pattanaik, while delivering the judgement on reservation, have said that ‘single promotional post for Scheduled Caste and Scheduled Tribe can be reserved. Carry forward rule and roster can also be applied to such posts.’ It was a Bench of two Judges. It was passed in 1997.
In 1999, there was also another Bench. It was a Bench of three judges. Justices Sujata V. Manohar, K. Venkataswami and M. Jagannadha Rao have said ‘single post of Head of Section, promotion of a person belonging to Scheduled Caste to the said post in supersession of the seniormost eligible person by applying the roster relating to reservation is held impermissible.’ So, this judgement was reversed by plus one vote. Shri K. Ramaswamy is a learned judge belonging to the Scheduled Caste community. His judgement was overruled. Recently, last month, I saw it in the newspaper that the judgement of the Madras High Court judge who belongs to the Scheduled Caste community, was challenged by the Government. Instead of setting aside the judgement, what did the Supreme Court do? The Supreme Court erased the judgement. They have not set aside the judgement. The Supreme Court declared that this judgement should be erased. That judgement was erased last month. So, I would say let the Supreme Court, before advising this sovereign body to amend the Constitution in pursuance of their judgement in Indra Sawhney case, must first follow the principle of article 16(4). There shall be equality of opportunity in matters of public employment. It includes the Executive, Legislature and Judiciary.
But the Constitution does not apply to the judiciary, though they take oath that they would uphold the Constitution and the law. Here the Ministers take oath, they bear true faith and allegiance to the Constitution. The President and the Governor take oath that they would defend the Constitution and the law. But the High Court and the Supreme Court Judges have taken oath to uphold the Constitution and the law. Instead of upholding article l6(4) do they apply that l6(4) to their house? They have not applied to their house. There is a Chief Justice in the Chennai High Court.
MR. CHAIRMAN : Do not go into naming the Judges.
SHRI P.H.PANDIYAN : All right. He has to be appointed to the highest court. He is a Chief Justice. He is fit enough to hold the position of a Chief Justice. But if he is appointed he will be here for l0 years. Because he is 55 years of age. He is not promoted. He has to wait for others to be promoted.. He will be lastly promoted so that he can be in the Supreme Court for two or three years. He cannot become a Chief Justice. We have high constitutional functionaries in India belonging to the Scheduled Caste community in the Supreme Court who are giving assent to the Constitution amendment. So, that principle should not be forgotten at this juncture. And the Supreme Court in 1998 – I quote -- AIR 1990(4) SCE page l, in a Constitution Bench judgement in a service law case, they have said that reservations, concessions, Scheduled Caste, Scheduled Tribe and OBEs, single post cadre reservation held cannot be applied through roster or otherwise. This applies to other facts also. This is because one hundred per cent reservation is not permissible. A contrary view was taken in some of the earlier cases dealing with plurality of posts, roster, necessary for reservation and reservations were not applicable.
I am stating this just to ask the Government through you Chairman, that this Constitution amendment even if it is passed, if there is a single post what will the Government do? They have to follow this judgement. A Scheduled Caste person cannot be appointed even if this Constitution amendment is carried out. Bentham had said. Shri Jethmalani, a leading lawyer would know, "Justice painted blind to the weaker side, it should be inclined to the weaker side. To what extent till date these weaker sections enjoy the constitutional protection of l6(4)? It has run into a backlog for no fault of their own. There was no proper representation. So, this Constitution amendment is a cure at least now for the SC/ST community to get their share.
Then there was a reference in the recent case, i.e. Legislature versus Judiciary reported in SCE 2000 this year, Volume I, page 68 wherein they have said that there should be a broad interpretation of article l6, including l6(4)and carry forward rule that was once held unconstitutional. Now it is constitutional. Shirr Jethmalani may know, before Indra Sawhney’s case, Devadasan’s case was there where this case of Scheduled Caste or Scheduled Tribe or other Adivasi community did not enjoy this type of protection.
So, I would appeal to the Government to protect the interests of the Scheduled Castes and Scheduled Tribe communities.
On the basis of Indra Sawhney case, you must evolve a consensus for future implementation of programme of recruitment of Scheduled Caste and Scheduled Tribe candidates. Then, why not this Government appoint suitable candidates belonging to Scheduled Castes and Scheduled Tribes as Ambassadors and as some other constitutional functionaries? You can uplift them. Every community is exploiting their votes. Even the leaders of that community have exploited their votes. They are not spared by anybody. They can be easily carried away.
Even during the last General Elections, I was able to see that if there were good vote-catchers, they carried these people along with them. A person belonging to that community has also misled that community. So, I would say that these people do not have any protection except the Constitution, though we are answerable and accountable to the Constitution.
I have taken interest. Shri Buta Singh has to take an interest. I do not enjoy any privilege of talking for this community. ( Interruptions.) But I must say that as a neutral Member of Parliament, these people should be protected on all sides. The Scheduled Castes and Scheduled Tribes Atrocities Act is not going to guide them and is not going to improve their position. It is being exploited. The people belonging to other castes are also suffering from the execution of this Scheduled Castes and Scheduled Tribes Atrocities Act. There are false cases foisted on the upper class community by these people at the instance of some other people. I know that.
The Supreme Court has said that this is Constitutional. Hon. Prime Minister is here. He is present in the House because he is interested in this community. This community represents the largest population in India. They are deciding the fate of some Government. They have a number of Ministerial berths in every Government. So, I would appeal to the hon. Prime Minister to preserve, protect, and hold them in his arms and fulfil their aspirations.
SHRI RAJAIAH MALYALA (SIDDIPET): Madam, Chairperson, this is a very good opportunity for me to discuss about this Bill.
Madam, first of all, I support this Bill introduced in view of the Supreme Court’s judgment not to exceed 50 per cent reservation in backlog vacancies. The ceiling imposed by the Supreme Court must be removed. For that purpose, this Bill is introduced to amend the article 16. I am sure that by this Bill, lakhs of people, youths and educated who are coming from the schools and colleges will get the opportunity.
I thank the Government for taking this step, even though it is late because many people could not get jobs or financial assistance to improve their financial status to come up above poverty line. The Government says that there are many backlog vacancies which are not filled up. Here I want to say that even when reservation was made for these poor people, it was not implemented properly. If it had been implemented properly, the backlog vacancies would have been very less. If we take Judiciary or Faculty of Universities, the quota filled up is very low because the Supreme Court judgement is like that. Where will these poor people go to appeal against their grievances?
Recently there was a long discussion in the Parliament about the five Office Memoranda which were issued by the Government and which affected the rights of the Scheduled Caste and Scheduled Tribe employees provided by the Constitution. In that discussion, it was requested to withdraw all the Office Memoranda, but still nothing has happened. It is very essential to do that. If we go on amending the Constitution, it will be very difficult to do that. Today, the Apex Court, that is, the Supreme Court has given this ruling and, therefore, this Amendment is required. Tomorrow another judgement may come. Then how many times are we going to amend the Constitution? So, I request the Government that this Reservation Act should be put in the Ninth Schedule so that no legal complications arise and no one can challenges it in a court of law.
I, however, appreciate the efforts of the Prime minister. He said, he wanted to bring the down-trodden people above the poverty line. The Prime Minister has recently announced reservation in promotions in toto. I hope it will be carried out. I request the Prime Minister to advise his colleagues to fill up the backlog of vacancies and help these poor people.
There is an apprehension that day by day the rights of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes are being hit a lot. So, that apprehension should be removed and the Government should assure these poor people to bring them above the poverty line. It is my sincere request to the Government.
Recently, in Andhra Pradesh, under the leadership of Shri Chandrababu Naidu we have filled up some backlog vacancies. There are many youths who are jobless and they must be provided jobs.
Shri Buta Singh has told many things about reservation and the difficulties being faced by the poor people.
I hope that this Government will definitely help the poor people belonging to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes and OBCs.
Thank you very much.
MR. CHAIRMAN : There are another 22 speakers to go. I would, therefore, request the hon. Members to cooperate and try and be as brief as possible.
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): Madam, we can continue upto 8 p.m. and then continue tomorrow.
MR. CHAIRMAN : You will have to sit much later than 8 p.m. to finish this.
THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF INFORMATION TECHNOLOGY (SHRI PRAMOD MAHAJAN): Madam, I would suggest from the Government side that let us complete the discussion today … (Interruptions) Shri Ambedkar, please listen till some suggestion is made and then you can react when I sit.
Madam, this is a Constitution Amendment Bill. You need a requisite strength to be brought into the House at the time of the voting. If we continue the discussion tomorrow, then nobody knows how long will the discussion go.
MR. CHAIRMAN : You fix the time for voting.
SHRI PRAMOD MAHAJAN : Hon. Speaker may fix it tomorrow. Immediately after the Question Hour tomorrow one can get a reply and have voting. Today we can sit late upto whatever time we want to and everybody can speak on the issue. That is my suggestion. Now, Shri Ambedkar has to say something.
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : This is an important issue where after a long time an issue concerning the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes is being discussed in the House. I do not think that in the last session it has been discussed or even in the previous 12th Lok Sabha also it was discussed. This is an important issue. I think due importance should be given to this. If due importance is to be given, we do not have any major issue to be discussed tomorrow except the hijacking issue, therefore, my request is that this discussion be continued upto 8 p.m. and then after the Question Hour we can continue with this discussion and then voting can take place at 4 p.m. tomorrow. This is my suggestion.
MR. CHAIRMAN : Hon. Speaker can decide and communicate to us.
SHRI PRAMOD MAHAJAN : But let us decide and everybody should know. I submit that there is a discussion under Rule 193 to be taken up at 4 p.m. tomorrow. After lunch break, people do not come to the House to the number you need. You need more than 300 people to be present. My request would be that let us discuss it today and complete the speeches, and tomorrow at 12 noon there will be a reply and immediately after that, we can have voting. During the Question Hour a number of Members would be there and at 1230 hours we can have voting. Madam, you can take the sense of the House on this. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : We have got about 22 speakers still to speak. I feel that if we sit late, even till 10 p.m., and the hon. Minister is prepared to give you dinner, I think we can complete the speeches today so that the hon. Minister can reply tomorrow after the Question Hour and then we can have voting. If that is the consensus we can proceed.
SEVERAL HON. MEMBERS : Yes.
श्री सुकदेव पासवान (अररिया) : महोदया, बहुत सारे मेम्बर्स बोलने वाले हैं इसलिए दस बजे तक संभव नहीं हो सकता।... (व्यवधान)
सभापति महोदया : सब को बोलने दीजिए, संभव हो सकता है।
SHRI A.C. JOS (TRICHUR): Madam, what is the decision?
MR. CHAIRMAN : The decision is that we will sit late and finish the discussion today and immediately after the Question Hour tomorrow, the hon. Minister will reply and we will have voting after that, before the lunch break.
Now Shri Rupchand Murmu to speak.
... (व्यवधान)
श्री रूपचन्द मुर्मू (झाड़ग्राम) : सभापति महोदया, यह जो अमेंडमेंट बिल सरकार लाई है, मैं इस बिल का अपनी और अपनी पार्टी की तरफ से समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं आशा करता हूं कि इस बिल को सभी सदस्य सर्वसम्मति से पारित करेंगे ताकि एस.सी., एस.टी. की रिक्तियों को भरने के लिए जो अड़चन आई है वह दूर हो सके। प्रमोशन में जो रिजर्वेशन है, उसमें भी जो कानूनी अड़चन है, उसे भी सरकार दूर करने की कोशिश करेगी।
१८५४बजे(श्री बसुदेव आचार्य पीठासीन हुए) महोदय, एस.सी., एस.टी. की रिक्तियां काफी जगह भारी संख्या में ऐसे ही पड़ी हुई हैं, इसका कारण यह बताया जाता है कि एस.सी., एस.टी. के सुटेबल केंडीडेट नहीं मिलते हैं।
मैं यह मानता हूं कि नौकरियों में जो ए,बी,सी और डी ग्रेड हैं, उनमें से ए और बी में तो बैकलॉग हो सकता है लेकिन जो सी और डी ग्रेड हैं उनमें कैसे हो सकता है। उसमें भी डी ग्रेड में जो काम होता है वह तो चपरासी या झाड़ू लगाने वाले का काम होता है, उसमें भी बैकलॉग है। इससे साबित हो जाता है कि एससीएसटी, आदिवासी और दलितों के लिए सरकार ने इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया है। आजादी के ५० साल बीत जाने के बाद भी किसी सरकार ने इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया है। इसमें भी आदिवासियों के लिए जो किया है वह संतोषजनक नहीं है। जब तक दलितों और आदिवासियों के सभी परिवारों को शक्षित नहीं किया जाता, उनके शिक्षा के स्तर को ऊंचा नहीं उठाया जाता तब तक आरक्षण अर्थहीन होगा।
संविधान के निर्माताओं ने दलितों और आदिवासियों को उचित स्थान दिलाने के लिए बहुत सोचा है और इनके लिए संविधान में प्रावधान भी रखा है, लेकिन आज हम क्या देख रहे हैं कि आदिवासी और दलित लोग गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवनयापन करने के लिए विवश हैं। शिक्षा तथा आर्थिक क्षेत्र में वे समाज में सबसे नीचे हैं। उनका सपना आजादी के ५० सालों बाद भी पूरा नहीं हुआ है। इसके कारणों को आज हमें ढूंढ़ना पड़ेगा। हमें आदिवासी और दलित लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाने का काम करना होगा तथा साथ ही हमें उन्हें शक्षित भी बनाना होगा। हमारे भाई वामपंथी बार-बार कहते हैं कि इस समस्या का समाधान भूमि-सुधार से होगा। भूमि-सुधार केरल में हुआ है, पश्चिम बंगाल में हुआ है और उसके बाद वहां पर दलितों और आदिवासियों के जीवन में परिवर्तन आया है और आज उनके पास पैसा भी है।
यह सरकार तो भूमि-सुधार के खिलाफ है और भूमि-सुधार की बात ये नहीं करते हैं। हम सरकार से अपील करेंगे कि जल्द से जल्द भूमि-सुधार होना चाहिए। मंडल आयोग ने भी भूमि-सुधार के बारे में रिपोर्ट दी है। जब तक ३२-३३ प्रतिशत आदिवासी और दलित लोगों को समाज में आप उचित स्थान नहीं देंगे तब तक समाज का संपूर्ण विकास नहीं हो सकता है। मैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना चाहता हूं:-
" नीचे जा रे रेखे छो, से तुम्हारे टानि बे जे नीचे, पश्चाते रेखे छो जा रे, से तुम्हारे टानि छे पश्चाते"
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं।
श्रीमती जस कौर मीणा (सवाई माधोपुर) : माननीय सभापति जी, मैं सरकार द्वारा प्रस्तुत संविधान संशोधन विधेयक, इक्यासीवें संशोधन का हार्दिक स्वागत करती हूं और पुरजोर समर्थन करती हूं। इस संविधान संशोधन के साहसपूर्वक सदन में रखे जाने के लिए मैं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को और माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को साधुवाद और धन्यवाद देना चाहती हूं।
19.00 hrs. जिन्होने दलित वर्ग की मनोभावना को समझ कर, उनकी नौकरियों में स्थिति को सुनिश्चित करने के लिए और आरक्षण का पूर्ण लाभ देने के लिए इस विधेयक को पेश किया। अनुसूचित जाति और जन जाति के साथ-साथ मैं यह बात भी कहूंगी कि आज आजादी के ५० वर्ष हो गए हैं लेकिन इसके बाद भी उनके साथ निम्न स्तर का व्यवहार होता है। यह व्यवहार राजस्थान में और भी चरम सीमा पर है। आज भी वहां दुल्हे को घोड़ी से उतार दिया जाता है। शेक्षिक द्ृष्टि से देखें तो उनके साथ इतना भारी अंतर है कि एक तरफ कम्प्यूटर का युग है और दूसरी तरफ बी.ए. पास हमारे दलित वर्ग के लोग, अनुसूचित जाति और जन जाति के लोग नौकरियों के लिए भी पिछड़ रहे हैं। जब कम्प्यूटर की शिक्षा अन्य वर्ग में चरम सीमा पर होगी उस समय अनुसूचित जाति और जन जाति का बी.ए.और एम.ए. पास भाई निरक्षर कहलाएगा क्योंकि दौड़ में उनके बराबर पहुंच नहीं पाएगा। बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान में जो तोहफा आरक्षण के नाम पर एस.सी. एस.टी को दिया था और यह कल्पना की थी कि वे आर्थिक, सामाजिक और शेक्षिक द्ृष्टि से ऊंचे उठ कर समाज की मुख्य धारा से जुडेंगे लेकिन ५० वर्ष की यात्रा में मात्र कल्पना ही हाथ लगी। आज हम इस स्थिति में हैं कि जो संविधान के अनुच्छेद १६ के खंड चार और चार(क) के अधीन किए गए आरक्षण के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय ने २९ अगस्त १९९७ को जो फैसला दिया, उसके बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के अभ्यार्थियों में निराशा व्याप्त हुई। बाबा साहेब अम्बेडकर जी द्वारा दिए वरदान पर जो ग्रहण लगा, उसे मद्देनजर रखते हुए और दलितों की भावना को मद्देनजर रखते हुए माननीय वाजपेयी जी ने हमें इस निर्णय के विरुद्ध आज यह विधेयक प्रस्तुत कर आशा की सांस ली। मैं केन्द्र सरकार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहूंगी कि अनुच्छेद १६ का संशोधन विधेयक पेश कर नियुक्ति में रोस्टर व्यवस्था और बैकलॉग को भरने हेतु जो ५० प्रतिशत की सीमा से आगे भी जाना है, उसे पूर्णत: और कठोरता से लागू कराएं और यह १९९७ से जो प्रभावित हुआ है, उसे भी लागू कराएं।
अभी पिछली १२-१३ फरवरी को अनुसूचित जाति और जनजाति की स्थाई समति गुजरात के अहमदाबाद, बड़ोदरा और आनन्द शहरों तथा मुम्बई, बंगलौर तीन राज्यों में गई तो चौंकाने वाली स्थिति देखी। मैं उसे संक्षेप में आपके ध्यान में लाना चाहूंगी। वहां देखा कि अनुसूचित जाति और जन जाति के लिए जो रोस्टर रजिस्टर है, वह अपूर्ण है। जब बाध्य करके मांगा गया तो स्थिति पाई कि उसे लीड पेंसिल से रेखांकित किया जाता है। ऐसी स्थिति में यह स्वत: स्पष्ट था कि उसे लीड पेंसिल से रेखांकित उस समय कर लिया जब समति पहुंची बाद में उसे रबड़ से मिटा दिया जाएगा। इन संभावनाओं के रहते भले ही हमारी व्यवस्था कितनी ही उच्च कोटि की क्यों न हो जब तक अपराधी और इस व्यवस्था को लागू न करने वालों के विरुद्ध कठोर कानून साथ-साथ नहीं होगी तब तक अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण का पूर्ण लाभ मिलना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में यह रिपोर्ट जिस में कुछ विभागों की हमने जांच की थी, उनमे से अधिकांश विभाग इस स्थिति में थे। रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या १४ पर यह सम्पूर्ण विवरण संक्षेप में दर्शाया गया है। मैं उसी को आपके सामने रखते हुए अपील करती हूं कि इस तरह की व्यवस्था और कमी को दूर करके कानून में प्रावधान करेंगे।
इसके साथ ही मैं यह निवेदन करना चाहूंगी कि जिस तरह से आज अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नाम पर वोटों की राजनीति हो रही है और यह भ्रान्तियां फैलाई जा रही हैं कि बी.जे.पी. की सरकार या बी.जे.पी. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति तथा दलितों की विरोधी है, आज यह प्रस्ताव इस सदन में प्रस्तुत करना इस बात को साबित करता है कि माननीय वाजपेयी जी के नेतृत्व मे यह सरकार दलितों और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हितों की रक्षा करने के लिये सबसे पहले और आगे आई है।
सभापति महोदय, मैं आज यह कह सकती हूं कि मैं अनुसूचित जन जाति से हूं और मैंने खुद नज़दीक से देखा है कि नियुक्तियों में किस तरह से रोस्टर व्यवस्था को लागू किया जाता है। आज राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारों ने एक अलग रास्ता अपना लिया है कि जितने भी रिक्त पद हैं और रोस्टर के आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को मिलने हैं, उन सभी पदों को समाप्त करके ठेका पद्धति लागू कर दी है। इस रोस्टर के चलते अनूसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के जिन लोगों ने बड़ी मुश्किल से बी.ए. पास किया होगा या प्रशिक्षण लिय़ा होगा, उन अभ्यर्थियों को ठेका में कोई नहीं लेगा अगर यह आरक्षण लागू नहीं होगा।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से एक और निवेदन करना चाहूंगी कि जिन राज्य सरकारों ने यह ठेका प्रणाली लागू कर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हितों पर कुठाराघात किया है, उस पर रोक लगावें। आज जो रिक्त पद हैं, उसकी पूर्ति के लिये वधिवत् व्यवस्था हो। हमारा रोस्टर कैरी फार्वर्ड होकर नहीं चलता है, इसको पूरी तरह से लागू किया जाये ताकि सारे रिक्त पद भरे जायें।
सभापति महोदय, समय की कमी के कारण अंत में एक और बिन्दु को बताकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगी कि जो रोस्टर व्यवस्था है, वह भिन्न भिन्न राज्यों में अलग अलग है। उनमें तीन वर्ष के रोस्टर पाइंट के आधार पर रिक्तियां तय होती हैं। वहां अधिकांश रिक्तियां अनुसूचित जाति एवं. अनुसूचित जनजाति की होती हैं लेकिन नियुक्ति अधिकारी और वहां की सरकार उन पदों को भरती नहीं हैं। इस तरह से एक वर्ष का रोस्टर अंक लैप्स हो जाता है, उसमें अगले वर्ष का जोड़ लेते हैं। जो रोस्टर अंक जिस वर्ष का लैप्स हुआ हो, वह संख्या में अधिक होता है और जो जोड़ने वाला वर्ष होता है , उसकी संख्या कम होती है। इस तरह से जो बहुतायत पद हैं, बाहुल्य पद हैं, उन्हें धोखे से लैप्स किया जाता है जिससे कि हम कानून की परधि में अपना हक नहीं मांग सकें। ऐसी परिस्थिति में यह कहूंगी कि इस रोस्टर पाइंट को कतई लैप्स न होने दिया जाये, चाहे ५ वर्ष तक हो, ६ वर्ष तक हो, जब तक योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध न हों , उनके लिये स्पेशल शैक्षिक व्यवस्था की जाये और उसी स्तर पर लाकर उन्हीं के पदों में से भरा जाये। संविधान के अनुच्छेद ३१ बी के अंतर्गत नौंवें शेडयूल में जोड़ा जाये ताकि हमारे सम्पूर्ण हित सुरक्षित हो सके।
श्री माणिकराव होडल्या गावीत (नन्दुरबार): सभापति महोदय, मैं संविधान ( नब्बेवां संशोधन) विधेयक, २००० का समर्थन करने के लिये खड़ा हुआ हूं। संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर और उनके साथियों ने संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के हितों को सुरक्षित रखने का प्रावधान किया है ताकि जो आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ें हैं, उनको आरक्षण दिया जा सके। उन लोगों के लिये सरकारी नौकरियो में आरक्षण का प्रावधान किया गया है। आज देश में दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों पर जो अत्याचार हो रहे हैं, यह बड़े दुख की बात है।
मुझे यह भी दुख के साथ कहना पड़ता है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग चाहे वे पढ़े-लिखे हों या जो जंगलों में रहते हैं, पिछड़े हैं, अशक्षित हैं, जिन्हें पूरी शिक्षा नहीं मिली है, हजारों सालों से उनके ऊपर हमारे देश में बहुत घोर अन्याय हो रहा है। जैसा कि १९ अगस्त,१९९७ को भारत के उच्चतम न्यायालय ने किसी एक व्यक्ति के आवेदन पर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को नौकरियों में प्रोमोशन पर रोक लगाने का निर्णय दिया। संविधान निर्माताओं ने संविधान में इन अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर नौकरियों में प्रोमोशन में आरक्षण देने का प्रावधान किया है। हमारे देश की संसद सर्वसुप्रीम है फिर भी यदि कोई व्यक्ति हमारे भारत के उच्चतम न्यायालय में आवेदन देता है तो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर उसका पूरा असर पड़ता है और हमारी सरकार भी मान लेती है और इस फैसले के हिसाब से अनुसूचित जाति और जनजाति का जो आरक्षण है, उस पर रोक लगा दी जाती है। ऐसे निर्णय से हजारों सालों से इस देश में जो आदिवासी, दलित और पिछड़े लोग हैं, उन पर अन्याय और अत्याचार होता है। हमारे कांग्रेस दल की नेता श्रीमती सोनिया गांधी ने इस सत्र में माननीय प्रधान मंत्री जी और सरकार से अनुसूचित जाति और जनजाति के विरोध में जो निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया है, इस मुद्दे पर संविधान में संशोधन करने की मांग की थी तथा देश के अनेकों अनुसूचित जातियों, जनजातियों के संगठनों ने तथा संसद सदस्यों को फोरम ने भी यह मांग की थी कि अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारियों और कर्मचारियों को इस आदेश से नुकसान हुआ है, उनके प्रोमोशन में आरक्षण रोक दिया गया है तथा बैकलाग नहीं भरा जा रहा है। बैकलाग भरने की बात तो दूर रही जो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को जो प्रोमोशन मिल रहा था, वह भी इस आदेश के बाद रोक दिया गया। जो रोस्टर लगाया गया है, वह रोस्टर पहले ४० प्वाइंट अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारियों और कर्मचारियों पर लागू होता था।
उसके बाद सरकार ने उस जगह २०० पॉइंट का रोस्टर लागू कर दिया। यह भी हमारे कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ अन्याय है। कितने लोगों को प्रमोशन में रिज़र्वेशन मिलेगा तब हमारे किसी कर्मचारी या अधिकारी का नंबर आएगा। अभी तक के दिये गये भारत सरकार के आदेश रद्द होने चाहिए और पूर्ववत् १९९७ से पहले, जहां से रोक लगाई है, वहां से आज तक का जो बैकलॉग है, प्रमोशन में रिज़र्वेशन है, वह भी उनको मिलना चाहिए। अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण समति का मैं सदस्य हूं। अभी-अभी मेरी बहन मीणा जी पढ़ रही थीं और यह सही है कि भारत सरकार के बहुत से विभागों में अनुसूचित जाति और जनजाति के रिज़र्वेशन का कोई उल्लेख नहीं होता है। उनको मालूम नहीं है कि हमें रोस्टर रखना है। जब समति विभाग को वजिट करती है तो वे कहते हैं कि हम इसके आगे रोस्टर मेनटेन करेंगे, हमें अभी मालूम हुआ कि रिज़र्वेशन है। इस कमी की तरफ भी मंत्री महोदय को ध्यान देना चाहिए। संविधान में यह बहुत छोटा संशोधन जो मंत्री महोदया लाई हैं। एक प्राइवेट मैम्बर्स बिल हमारे साथी शिन्दे जी ने पेश किया है, उसको उसी रूप में सरकार अगर मान ले तो उसमें बहुत सुविधा होगी और सरकार को भी उसमें मदद हो सकती है। इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से विनती करूंगा कि जो शिन्दे जी प्राइवेट मेम्बर्स बिल लाए हैं, वह भी स्पीकर साहब मान लें, उससे भी हमें सहूलियत हो सकती है।
श्री आनन्दराव विठोबा अडसुल (बुलढाना) : सभापति महोदय, ९०वें संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन में बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। अटल जी और उनके नेतृत्व में काम करने वाली एनडीए की सरकार को मैं धन्यवाद देता हूं और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की तरफ से उनका आभार भी प्रकट करता हूं। बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों को हमेशा बहुत से लोग जातिवादी बोलते हैं लेकिन यह बिल लाकर सरकार ने ऐसा बोलने वालों के मुँह पर तमाचा मारा है, यह कहना गलत नहीं होगा। ५० साल में जो काम नहीं हुआ वह काम आज हो रहा है। स्वाधीनता के बाद ५२ वर्षों में से ४५ साल कांग्रेस की सरकार देश में रही और हमेशा उन्होंने अनुसूचित जातियों और जनजातियों तथा माइनॉरिटीज़ को बोला कि हम आपके लिए यह करेंगे, वह करेंगे, लेकिन खाली दिखावा ही किया। मैं महाराष्ट्र से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से लोक सभा का प्रतनधित्व करता हूं और महाराष्ट्र की १५० कोआपरेटिव बैंक और ६ स्टेट लैवल की कर्मचारी एसोसियेशन्स का नेता भी हूं।
सभापति महोदय, मुझे २० साल तक कोआपरेटिव सैक्टर में काम करने का अनुभव है। मैंने महाराष्ट्र में देखा है कि को-आपरेटिव सैक्टर में रिजर्वेशन पर जानबूझकर अमल नहीं होता है। वहां पर ज्यादातर कांग्रेस के लोगों का मैनेजमेंट है।
श्री सुशील कुमार शिन्दे (शोलापुर): अडसूल जी, कोआपरेटिव सैक्टर में रिजर्वेशन नहीं है। वहां भी रिजर्वेशन हो, यही तो हम चाहते हैं। इसी के बारे में मैंने प्राइवेट मैम्बर बिल दिया है। मैं आपकी जानकारी को दुरुस्त कर रहा हूं। हम लोग इसकी डिमांड कर रहे हैं।
श्री आनन्दराव विठोबा अडसुल : सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से श्री शिन्दे साहब को बताना चाहता हूं कि पूरे देश के हर राज्य में हर डिस्टि्रक्ट में सोश्यल वैलफेयर डिपार्टमेंट है जहां अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों का एम्पलायमेंट के लिए नाम भी रजिस्टर्ड होता है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग वहां अपना नाम रजिस्टर्ड कराते हैं। उनका रिकार्ड देख लीजिए कि कितने लोगों को कॉल गई और कितने लोगों को नियुक्ति मिली। १०-१० और १५-१५ सालों तक उन्हें कॉल लैटर तक नहीं जाती है।
सभापति महोदय, अभी बहिन जी ने बताया कि कैसे रोस्टर नहीं बनाया जाता। मैं ११वीं लोक सभा का सदस्य था, मुझे अनुभव है कि गलत रोस्टर बनाए जाते हैं क्योंकि मैं संसद की अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण समति का सदस्य था। रोस्टर बनाने का दिखावा किया जाता है। पकड़े जाने पर उन्हें कोई पनिशमेंट नहीं मिलता। उन्हें पनिश करने के लिए कोई प्रावधान नहीं है। यदि कहीं प्रावधान है, तो उस पर अमल नहीं होता है। मुझे ऐसा एक भी केस नजर नहीं आया जहां प्रावधान के हिसाब से रोस्टर पर अमल न करने के लिए किसी को दंडित किया गया हो।
सभापति महोदय, यह साहस भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने दिखाया है कि सुप्रीमकोर्ट ने नवंबर, १९९७ में निर्णय दिया कि ५० प्रतिशत से ज्यादा रिजर्वेशन नहीं होगा। जब कोर्ट ने यह निर्णय दिया, तो उससे पहले बैकलॉग कैसे जमा हो गया। मैं कहना चाहता हूं कि रिजर्वेशन पर अमल नहीं किया गया। इसलिए बैकलॉग जमा हो गया। सुप्रीमकोर्ट का निर्णय आने के बाद भी यदि यह सरकार बोलती कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं, यह तो सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है, तो कुछ नहीं होता। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने यह साहस दिखाया कि हम केवल कुछ वर्गों का ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश का नेतृत्व करते हैं और जो यह संशोधन विधेयक आया है उससे सुप्रीकोर्ट का निर्णय भी बाजू हो जाएगा तथा अनुसूचित जाति के लोगों को इससे फायदा होगा।
सभापति महोदय, मेरा निवेदन है कि यह तो आपने अच्छा किया कि संविधान संशोधन लाए, लेकिन इसके साथ-साथ कानून बनने के बाद उस पर अमल होता है या नहीं, इस बात को भी देखा जाना चाहिए। कानून तो बहुत बनते हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं होता। जब तक हम अमल न करने वाले को पनिशमेंट देने का प्रावधान नहीं करेंगे, तब तक कानून पर अमल नहीं होगा और ऐसे ही चलता रहेगा।
सभापति महोदय, अन्त में, मैं संशोधन विधेयक का समर्थन करते हुए, समय देने के लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।
कुमारी मायावती (अकबरपुर): माननीय सभापति महोदय, भारत सरकार की ओर से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों का नौकरियों में आरक्षण का बैकलॉग भरने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक कल लोक सभा में पेश हुआ जिस पर आज जर्चा हो रही है। मैं इस विधेयक पर बोलने के लिए खड़ी हुई हूं। इस विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति जातियों के आरक्षण कोटे का बचा हुआ कोटा अगले साल भरा जा सकता है।
इस संशोधन के बाद ५० प्रतिशत आरक्षण की सीमा पूरी करने के लिए यदि उस साल उम्मीदवार नहीं मिलते तो बची हुई सीटों को अगले साल भरने का रास्ता साफ हो जायेगा। इस विधेयक का मैं समर्थन करती हूं। सरकार को यह विधेयक २९ अगस्त १९९७ के सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के मद्देनजर लाना पड़ा जिसमें न्यायालय ने आरक्षण की सीमा एक साल में ५० प्रतिशत से अधिक भरने से इंकार कर दिया था। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि कानून के अनुसार कुल सीटों के आधे से अधिक सीटों को आरक्षित घोषित नहीं किया जा सकता। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं और न ही आप सहमत हैं इसलिए आप यह संशोधन विधेयक लेकर आये हैं। इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद २९ अगस्त १९९७ से पूर्व की स्थिति बहाल हो जायेगी।
१९२६ बजे(उपाध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए) हमारे कानून मंत्री जी कांस्टीट््यूशन के काफी एक्सपर्ट हैं, टोप के वकील हैं। जहां तक ओवरऑल रिजर्वेशन का सवाल है तो हमारे संविधान में ऐसा प्रोविजन नहीं है कि हम ५० प्रतिशत से ऊपर रिजर्वेशन दे सकें। लेकिन जब बैकलॉग का सवाल आता है तब उसमें ५० प्रतिशत की पाबंदी नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के उस जजमैंट को लेकर संसद के अंदर और बाहर काफी हो-हल्ला हुआ। वभिन्न पार्टियों में शैडयूल्ड कॉस्ट्स और शैडयूल्ड ट्राईब्स से संबंधित जितने मैम्बर ऑफ पार्लियामैंट हैं, उनकी और समाज की भावना को समझ कर आप यह संशोधन विधेयक लाये हैं। इस विधेयक का हमारी पार्टी समर्थन करती है।
इसके साथ-साथ मैं आपके माध्यम से कानून मंत्री जी से यह भी रिक्वैस्ट करूंगी कि शैडयूल्ड कॉस्ट्स और शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों के लिए प्रमोशन में आरक्षण कीे व्यवस्था से संबंधित भी एक बिल लोक सभा में लाने की कोशिश करें। सरकारी नौकरियों में, प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के निर्देश पर, १ अक्टूबर १९९६ को राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार ने समाप्त कर दी थी।
हमारी पार्टी ने उसे पुन: बहाल करने की अपील आपसे की थी और इस संबंध में पिछले सत्र के दौरान आपकी सरकार, खास तौर से सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने २२ दिसम्बर, १९९९ को लोक सभा में यह घोषणा की थी कि मंत्रिमंडल ने केन्द्र सरकार की नौकरियों में शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राईब्स के कर्मचारियों के लिए प्रमोशन में आरक्षण की पुरानी व्यवस्था बहाल करने का संविधान में संशोधन विधेयक पारित कर दिया है और इसे जल्दी ही लोक सभा में लाया जाएगा। मैं यह समझती हूं कि इसके लिए भी काफी समय हो गया है। आप इसे भी जल्दी से जल्दी लाने की कोशिश करेंगे। इसके साथ-साथ आप सरकार की ओर से यह भी व्यवस्था करेंगे, यह भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती है क्योंकि अक्सर देखने में यह आया है कि राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के जो वभिन्न डिपार्टमैंट हैं, उनमें शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राईब्स का कोटा पूरा नहीं होता। आप यह अमैंडमैंट विधेयक लाए हैं, इसका हम समर्थन करते हैं लेकिन जब तक सरकार बैकलॉग को पूरा करवाने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाएगी तब तक इस विधेयक का कोई फायदा नहीं होगा। आपकी जिम्मेदारी बनती है कि भारत सरकार की ओर से रिजर्वेशन कोटे को इम्प्लीमैंट करवाने के लिए प्रदेश की सरकारों और सैंटर को ऐसा निर्देश दें कि जिन प्रदेश सरकारों या केन्द्र सरकार के डिफरैंट डिपार्टमैंट्स के संबंधित अधिकारी रिजर्वेशन कोटे को पूरा नहीं करवाएंगे, जबकि उम्मीदवार एवेलेबल हों, उन अधिकारियों के खिलाफ सरकार सख्त से सख्त कार्यवाही करेगी। मैं समझती हूं कि यदि आपने ऐसा कोई कठोर कानून बना दिया और उसे इम्प्लीमैंट करवा दिया तो बैकलॉग नहीं रहेगा। इसकी तरफ भी आपको ध्यान देने की जरूरत है। मुझे इस बात का विश्वास है कि सख्ती के बिना कोई कार्य नहीं होगा।
जब मैं उत्तर प्रदेश में दो बार मुख्य मंत्री बनी थी, स्टेट के अंतर्गत जो सरकारी नौकरियां आती थीं, हमारी सरकार ने उनमें रिजर्वेशन कोटे के बैकलॉग को पूरा करवाने के लिए टाइम बाउंड प्रोग्राम रखा कि इतने महीने के अंदर आरक्षण कोटा पूरा करना है। जो अधिकारी आरक्षण कोटा पूरा नहीं करेंगे, उनके खिलाफ सरकार सख्त से सख्त कार्यवाही करेगी। उसका असर यह हुआ कि हर डिपार्टमैंट में जो संबंधित अधिकारी बैठे हुए थे, उनको छांट-छांटकर बैकलॉग की सीटें निकालनी पड़ीं और उन्हें पूरा करना पड़ा। बिना कठोर कदम उठाए बैकलॉग पूरा नहीं होगा। इसे इम्प्लीमैंट कराने की तरफ भी आप जरूर ध्यान देंगे। इसके साथ-साथ जिन क्षेत्रों में शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों के लिए रिजर्वेशन जैसे ज्यूडीशियरी, राज्य सभा, विधान परिषद, प्राईवेट सैक्टर, कोआपरेटिव्ज , में नहीं है, उन क्षेत्रों में भी आप उसकी व्यवस्था करवाएंगे। इसके अतरिक्त महिला आरक्षण बिल की काफी चर्चा है और इस संबंध में वभिन्न पार्टियों की महिलाएं माननीय प्रधानमंत्री जी से आज मिलीं।
उन्होंने कहा कि महिला रिजर्वेशन बिल के ऊपर बहस कराकर इसे भी पारित कराया जाये। मेरी आपसे यह रिक्वैस्ट है कि आप माननीय प्रधान मंत्री जी से बात करें कि हम महिलाओं के रिजर्वेशन के खिलाफ नहीं हैं। महिलाओं को ३३ प्रतिशत रिजर्वेशन मिलना चाहिए। हम तो चाहेंगे कि आबादी के हिसाब से जब महिलाओं की आबादी ५० परसेंट है तो उनको ५० परसेंट भी मिले, हम तो इसके हक में हैं। लेकिन जितना आप देना चाहते हैं, आप दें। लेकिन महिला आरक्षण बिल में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यक समाज से सम्बन्धित सिख, मुसलमान, ईसाई, पारसी, बुद्धिस्ट समाज की महिलाओं को भी अलग से रिजर्वेशन की व्यवस्था होनी चाहिए, ऐसी मेरी सरकार से रिक्वैस्ट है। फिर माननीय उपाध्यक्ष जी बार-बार घंटी बजाकर मुझे इशारा करेंगे, उससे पहले मैं एक ही बात और कहना चाहती हूं कि यह जो बार-बार रिजर्वेशन से सम्बन्धित एमेंडमेंट बिल लोक सभा में लाना पड़ रहा है, इसके बारे में मेरा आपको यही कहना है कि हमें इसका कोई परमानेंट सोल्यूशन ढूंढना चाहिए। अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण के लिए जो पुरानी आरक्षण नीति है, उसको ध्यान में रखते हुए, जब से यह आरक्षण नीति लागू हुई है, उसके बाद से जितनी भी सरकारें बनी हैं, उन सरकारों ने या अदालत ने जो भी आरक्षण के मामले में दखलंदाजी देकर आरक्षण को निष्प्रभावी बनाया है, उनको पुरानी आरक्षण नीति के तहत बहाल कराकर फिर इसको भारतीय संविधान की नवीं सूची में लिया जाये, ताकि भविष्य में न तो केन्द्र की सरकार, न सूबों की सरकार और न अदालतें इसमें दखलंदाजी दे सकें, ऐसी मेरी आपसे रिक्वैस्ट है। मैं ज्यादा लम्बी-चौड़ी बात नहीं कहना चाहती।
अन्त में मैं आपके माध्यम से माननीय कानून मंत्री जी एक रिक्वैस्ट और करना चाहती हूं। पहले के तीन दिन के अधिवेशन को बुलायाथा उसे ध्यान में रखा जाये। आपने तीन दिन का अधिवेशन पार्लियामेंट अनेक्सी में बुलाया था, जिसका उद्घाटन माननीय प्रधान मंत्री जी ने किया था और आप तीनों दिन उस अधिवेशन में मौजूद थे। तीन दिन के अधिवेशन के बाद जो कुछ वहां चर्चा हुई, शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स के डवलपमेंट के बारे में, उसकी एक ड्राफ्ट कमेटी बनी थी, जिसमें ७-८ मैम्बर रखे गये थे, उसमें मुझे भी रखा गया था। तीन दिन का जो डिस्कशन था, उसका निचोड़ उस ड्राफ्ट कमेटी ने राइटिंग में आपके पास दिया है, इसलिए उनके डवलपमेंट को ध्यान में रखते हुए जो ड्राफ्ट कमेटी ने तीन दिन का निचोड़ दिया है, उसको भी इम्प्लीमेंट करायें। ड्राफ्ट कमेटी ने जो रिपोर्ट दी है, उसको लोक सभा में भी रखा जाये। लोक सभा और राज्य सभा के मैम्बरों को भी उसे दिया जाये ताकि यह तो मालूम पड़ जाये कि ड्राफ्ट कमेटी ने क्या दियाहै और आप भी बतायें कि आप उसमें क्या कर रहे हैं। इसके कहने से काम नहीं चलेगा, उसको पूरा करना होगा। मैं समझती हूं कि यदि आपकी नीयत ठीक है…( व्यवधान)
वधि, न्याय और कंपनी कार्य मंत्री (श्री राम जेठमलानी) : तभी तो आपको उस कमेटी में रखा है, आप क्या कर रही हैं ?
कुमारी मायावती (अकबरपुर) : आपने तो सुझाव मांगे थे। मैं तो उधर नहीं बैठी हूं, मैं तो विपक्ष में बैठी हूं, इसको लागू तो आपको करना है, सरकार को लागू करना है। हमने सुझाव दे दिये हैं, आप उनको लागू करायें। लागू कराने के मामले में हम आपका पूरा समर्थन करेंगे। मुझे लगता है कि पूरा विपक्ष समर्थन करेगा। मैंने जो मुद्दे रखे हैं, इनको ध्यान में रखते हुए हमारी पार्टी फिर से इस विधेयक का समर्थन करती है। धन्यवाद।
THE MINISTER OF LAW, JUSTICE AND COMPANY AFFAIRS (SHRI RAM JETHMALANI): May I just take half-a-minute to remove the misunderstanding that is there? The Supreme Court’s judgement against reservation in promotion has already been nullified by an amendment of the Constitution by enacting article 16(4)(A). Now, the validity of that amendment is itself under challenge in the Supreme Court. We are fighting it out and I have given instructions to the Attorney General to bring the matter to a very early hearing so that the validity of that amendment is sustained by the Supreme Court. But pending the judgement of the Supreme Court, we have allowed reservation in promotion to continue in spite of the fact that the Supreme Court had directed that it should be stopped in November 1997. Today, there is reservation in promotions so far as the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes are concerned.
SARDAR BUTA SINGH : There is no reservation. We had introduced a Bill in the Rajya Sabha. That Bill has not come to this House. Unless both the Houses of Parliament have passed it, it cannot be implemented. In the meantime, the Government has gone to the Supreme Court.… (Interruptions)
It is inoperative.… (Interruptions)
SHRI RAM JETHMALANI: I am only talking about the promotion. I will deal with the rest of the points tomorrow.
श्रीमती संतोष चौधरी (फिल्लौर) : जिन ऑफिसर्स को रिवर्ट किया गया है, उसके बारे में क्या कहना चाहेंगे ?
उपाध्यक्ष महोदय : वह रिप्लाई में आ जाएगा।
SHRI RAM JETHMALANI: I will deal with these points tomorrow.
डा. संजय पासवान (नवादा) : उपाध्य़क्ष महोदय, आपने मुझे इस बिल पर बोलने का मौका दिया, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं कानून मंत्री जेठमलानी जी और कार्मिक राज्य मंत्री बहन वसुंधरा राजे जी को भी धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने अथक प्रयास के बाद इस बिल को समय पर पेश किया। मैं इस बिल के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। सरकार की मंशा क्या है, यह इस बिल के प्रदर्शित हो रही है। जिस काम को १९९७ में पांच आफिस मेमोरंडम के द्वारा जिस ढंग से दलित, आदिवासियों के इतिहास को काले पन्ने से लिखा गया था, उसको अब इस सरकार ने स्वर्णिम पन्ने से लिखने का काम किया है। हम बार-बार सरकार को धन्यवाद देना चाहते हैं कि यह एक शुरूआत हुई है और पांच आफिस मेमोरंडम में से एक मेमोरंडम को आज खत्म करने का काम संविधान में संशोधन करके किया जा रहा है। इससे बहुत दूरगामी प्रभाव और लाभ एस.सी. और एस.टी. के लोगों को मिलने वाला है। सही मायने में अभी हमारे पांडियान साहब बोल रहे थे। उन्होंने अधूरे मन से इस बिल का समर्थन किया है। मैं आप सब सदस्यों से कहना चाहता हूं, it should be out of conviction and not out of compassion. यह कोई दया का भाव नहीं है, बल्कि हक की बात है। इस बिल के द्वारा संविधान में संशोधन हो जाने से हो सकता है बहुत से लोग खुश नहीं होंगे। तब भी मैं चाहता हूं कि तमाम लोगों को खुश होना चाहिए। आज जो यह काम होने जा रहा है, इस सरकार ने सकारात्मक चेहरा दिखाया है और मंत्री जी ने अथक प्रयास किया है। इससे जो लाभ मिलने में अड़चनें हैं, वे दूर होंगी।
सरकार किसी की भी हो, आपको आश्चर्य होगा कि सबसे पहलो जब कोर्ट में केस फाइल हुआ था तो पंजाब में हुआ था, जहां बूटा सिंह जी अभी जिस पार्टी में हैं, उस दल की सरकार थी। इसको लागू किया लालू जी ने जो सामाजिक न्याय के मसीहा बनते हैं। सबसे पहले बिहार आदि राज्यों में इसे लागू किया गया। उसके चलते कितने लोग शहीद हुए, यह हम सभी जानते हैं। आज जो यह कदम उठाया गया है माननीय वाजपेयी के नेतृत्व में, यह एक क्रांतिकारी कदम है। हम सब लोग इसका स्वागत करते हैं। जो १९९७ में काला वर्ष दलित समाज के लिए बन गया था, अब २००० का वर्ष स्वर्णिम वर्ष होगा। यह साल अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए नया साल और उपलब्धि का साल होगा। किसी व्यक्ति ने, किसी कोर्ट ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि विदेशों में जिन स्वीपर्स को डेपुटेशन पर भेजा जाता है, जो वहां काम कर रहे हैं, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन स्वीपर्स में से ९० प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो एस.सी., एस.टी. के नहीं हैं। मगर उस तरफ किसी कोर्ट या व्यक्ति का ध्यान नहीं गया। इस देश में जो स्वीपर्स काम कर रहे हैं, उनमें से ९५ प्रतिशत एस.सी. और एस.टी. के लोग हैं। जहां कुछ मिलने वाला होता है या जहां लाभ की बात होती है या जब विदेश जाने की बात होती है तो सवर्ण जाति के लोग वहां चले जाते हैं।
इसीलिए कोर्ट का ध्यान उस ओर जाना चाहिए। कोर्ट का ध्यान निष्पक्ष हो। आगे आने वाले समय में भी इस अमेंडमेंट के बाद भी हमें आंशिक विश्वास हो रहा है, पूरा विश्वास नहीं है कि लागू कैसे हो पाएगा ? जो लागू करने वाली एजेंसियां हैं, उनको ईमानदार होना चहिए, ट्रांसपेरेंट होना चाहिए ताकि जो कार्यान्वयन और क्रियान्वयन के पहलू हैं, उनका सही तरीके से पालन हो सके तब कहीं जाकर जो अमेंडमेंट किया गया है, उसके सही नतीजे मिल सकेंगे। इसलिए मैं चाहता हूं कि जो नैक्सस है, जो ब्यूरोक्रेसी का कमिटमेंट है, जो बायस्ड ब्यूरोक्रेसी है, जो सुप्रीम कोर्ट का बायस्ड द्ृष्टिकोण है, जब तक हम उस पर हमला नहीं करेंगे क्योंकि आज एस.सी.एस.टी. के अधिकारों को खाने का काम किया गया है, कल सारा समाज खाएगा, इसिलए हमें एलर्ट होना चाहिए कि जो ज्यूडशियरी है, जो ब्यूरोक्रेसी है, उससे कैसे बचा जाये ? ब्यूरोक्रेसी और ज्यूडशियरी से कैसे इस देश को औऱ इस समाज को बचाया जाये ? ब्यूरोक्रेसी के माध्यम से समाज का कोई नुकसान नहीं हो, दलित का कोई नुकसान नहीं हो, यह ध्यान देने की आवश्यकता है। माननीय मंत्री जी ने यह क्रांतिकारी कदम उठाया है, हम उसका स्वागत करते हैं औऱ उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में जो चारों ऑफिस मैमोरेंडम हैं, वे भी स्क्रैप होंगे और स्क्रैप होने के साथ-साथ उसमें भी यदि अमेंडमेंट की आवश्यकता पड़ेगी तो करना चाहिए और यह करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। हम चाहते हैं कि आगे आने वाले समय में कोई व्यवधान, कोई अवरोध इस संबंध में खड़ा नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Mr. Deputy-Speaker Sir, thank you for giving me this opportunity.
Our Party has taken the stand to support the Constitution (Ninetieth Amendment) Bill. This Bill concerns 25 per cent of the country""s population, that is, not less than 25 crores of people. It is based on the ideology of Mahatma Gandhi. At the time of the freedom struggle, in the 1923 Congress Session at Lahore, Mahatma Gandhi moved a resolution to exhort Congressmen that it was not only their duty to oust the British from the country, but the main ideology of the Congress Party was to give social justice and equality to the poor people of this country, irrespective of their caste and creed. He said, the last citizen of India should be given justice, equality in the economic, social and educational spheres. That was the main thrust of the freedom movement in this country. On that line, irrespective of their religion, whether they belonged to Hindu, Muslim or Christian community, they all cooperated with Gandhiji and under his leadership India got the freedom.
What was the main point that Gandhiji suggested to the first Prime Minister of India, Pandit Jawaharlal Nehru? He suggested that our ideology, our thinking and our Constitution should be secular. The main fabrics of our Constitution must be secularism and social justice. That is the way Gandhiji guided Pandit Nehru and Pandit Nehru appointed Babasaheb Ambedkar as the Chairman of the Drafting Committee of the Constitution.
In this regard, the Congress Party has taken very constructive steps to give equal status and social justice to the citizens in every corner of the country. In this way, the Indian National Congress was so concerned in this matter. Time and again, the members of the SCs/STs forum had been requesting the hon. Prime Minister on this point. We submitted a memorandum regarding the official memorandum issued by the DOPT of the Government of India. The Prime Minister himself told on the floor of the House that he is concerned with this matter. So, he has assured that he will consider the points submitted by the Members of Parliament representing the SCs and STs. After that, the National Scheduled Castes and Scheduled Tribes Conference was organised by the Government of India in which all parties participated. The Law Minister who is a senior leader is also so much concerned with the weaker sections of the society. He has explained and assured that he will take care of these points. He is taking efforts on these lines. But the 88th Constitution Amendment has become infructuous. He could not produce any result out of it. We do not know whether the Parliament is supreme or the Supreme Court is supreme. Before I came here, I had been a practising advocate in the High Court. I told Shri Ram Jethmalani to handle this situation properly. I was deeply hurt when Shri Pandiyan told that the judgement given by a SC judge in Tamil Nadu case has been totally vanished. Normally, the practice in the court is that it will be set aside. But it was not so in this case. I was wondering as to what it meant. I was thinking whether the Supreme Court is going on the caste lines. This is the way the Supreme Court is functioning. What is the duty of the Members of Parliament who represent 100 crores of people of this country? They have been totally hurt. The Supreme Court should be bound by whatever Parliament decides. We are functioning within the framework of the Constitution. We are not bypassing the Constitution. You know it very well. Decisions are not taken by a single person or the Government here. For example, we have passed the Eighty-Ninth Constitution Amendment Bill. We are totally concerned with it. We are unanimous on the points concerning the people of the country, to whichever party we may belong. In this regard, the well experienced advocate and the hon. Law Minister should come with a proper legislation to control the Supreme Court. Otherwise, we cannot work. I would not like to mention any names. The other day, a public litigation petition was filed on the MPLAD funds. That is before the court. Is this the way we have to work? Are we able to work in this position? What is the responsibility of the Parliament? This is the question. It is allowing the Supreme Court to do it. We cannot work in this way. We have to take note of these things very seriously. We really appreciate that the Government, with all the efforts made by the SC and ST Forum, has introduced this Bill. We were not able to move the amendments earlier. Shri Buta Singh and other senior colleagues have mentioned about some amendments….… (Interruptions)
The then Prime Minister Shri Rajiv Gandhi took this matter very seriously. He directed the authorities to fill up the backlog within a year. But it has not been completed even after ten years. I would request the hon. Minister to substitute the word "backlog" for the words "separate class of" in lines 8 and 9. I hope that in the reply, the hon. Minister will incorporate this.
This is the only one point that I have mentioned. I told the hon. Minister of State Shrimati Vasundhara Raje about it. She has also agreed to it. This is the only thing that we have said. Further, in Clause 3, I would request the hon. Minister to substitute the word "filling" for the word "considering" in line 6. It reads:
"4(B) Nothing in this article shall prevent the State from considering any unfilled vacancies of a year which are reserved for being filled up in that year…"
This is the only change that we have requested. They have to consider this. We hope that they will consider it.
Sir, I do not want to take much of the time of the House. All my senior colleagues like Sardar Buta Singh have mentioned about it and we are supporting it.
There is another important thing. Shri Sushil Kumar Shinde has moved a Private Member’s Bill. It contains all these things. They have to take this into consideration. It has already been registered and numbered. Bill No.73 of 2000 is enough. If the Government agrees to it, it is enough. We are unanimous on this issue. I would request the Government to adopt this measure.
SHRI SUSHIL KUMAR SHINDE (SOLAPUR): Mr. Minister, we congratulate you.
SHRI K.H. MUNIYAPPA : Mr. Minister, in the National Conference on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, we had a threadbare discussion. I saw you there. You made a very good speech. But on the implementation side, there is a little bit of lapse. I do not know why it is happening. We have made a draft. Seven or eight Members including Shri Ram Vilas Paswan were there. All the political parties including the BJP were there. But the result of it has not come out so far. We would like to know about that.
There is another important point which I would like to make here. The All India Congress Committee President, Shrimati Sonia Gandhi has written a letter regarding the reservation matter to the hon. Prime Minister. Mr. Deputy-speaker, Sir, if you permit me, I would read only two paragraphs. It says:
"I am writing this about the distortion and dilution in the implementation of the reservation policy arising out of the five Office Memoranda (OM) issued by the Department of Personnel and Training (DoPT) between 30.01.1997 and 29.08.1997. As you know, reservation in the services under "the State" as defined in article 12 of the Constitution, is one of the most important instruments of social justice. It is therefore absolutely necessary to create a built-in mechanism to ensure total and complete compliance with the policy of reservation."
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Muniyappa, you can just lay it on the Table of the House. You can give it to them.
SHRI K.H. MUNIYAPPA : I would mention only one important thing. It is said:
"Members of Parliament, rising above party affiliations, including a few who are members of your present Cabinet, raised this issue on several occasions in the Parliament. The National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes had also submitted a Special Report to the President of India on January 22, 1998 on the same subject. The Commission later took up its recommendation with you and the DoPT. Despite your assurance to the Lok Sabha on March 18, 1999 that "in view of the various representations received from several quarters and the debate in the House, the Government has already started the process of reviewing these memoranda," nothing substantial has been done to implement this assurance for almost a year.
Another similar assurance was repeated by you in the Lok Sabha on February 22, 1999, when you said that your "Government is committed to protect the interests of the SC and ST employees, and will take all possible steps for their upliftment." Since then, the Government has merely introduced the Constitution (Eighty Eighth Amendment) Bill, 1999, in the Rajya Sabha to amend article 335 by adding a proviso to restore the relaxation that was withdrawn by the OM dated 22.07.1997… "
So, these are the things we are concerned with. The Congress Party is also concerned with these things. Shrimati Sonia Gandhi has also written a letter to the hon. Prime Minister.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Muniyappa, you can just lay it on the Table of the House. You just give it to them. They can take it.
… (Interruptions)
SHRI K.H. MUNIYAPPA : I have not read it out fully. I was not allowed to read it.
MR. DEPUTY-SPEAKER: That is why, in the initial stage itself, I said that you can lay it on the Table of the House.
SHRI K.H. MUNIYAPPA : All right, Sir. You would agree that this Amendment does not, in any way, undo the grave injustice done by these OMs There has already been an unreasonable and inexplicable delay on part of the Government in this context; and the SC and ST employees continue to suffer the adverse consequences of these OMs.
The Congress Party is unequivocally and totally committed to extending our support to any legislation that would help in resolving this issue. I have publicly made this commitment on several occasions.
I would therefore request you to immediately initiate measures for introducing the necessary amendments in our Constitution to expeditiously and satisfactorily resolve this issue."
श्री महेन्द्र बैठा (बगहा) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं इस बिल का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। जब मंडल आयोग लागू हुआ तो उसके लागू होने के खिलाफ कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट चले गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मंडल आयोग को एप्रूव किया, लेकिन उसने एससी, एसटी के खिलाफ कुछ आदेश दे दिए। उसी के अंतर्गत, उसी को आधार मान कर मंत्रालय द्वारा पांच आदेश इश्यु हुए, जो एससी, एसटी के रिजर्वेशन को इफेक्ट करते हैं। हमने कई बार डिसकशन किया, प्राइम मनिस्टर साहब ने पार्लियामेंट में एश्योरेंस भी दिया कि इसमें अमेंडमेंट किया जाएगा।
20.00 hrs. केन्द्र सरकार द्वारा जो पांच आदेश जारी हुए, उन्हीं के खिलाफ अमेंडमेंट लाने की जरूरत पड़ी है। पहले बैकलॉग बनता था और उसका धीरे-धीरे पालन होता था। उसको सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया है। इसका रजिस्टर बनता था, उसके अनुसार बहाली होती थी, उसको भी सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया है। टैक्नीकल शिक्षा के लिए भी रिजर्वेशन था, उसको भी सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया है। इसी तरह से एससीएसटी के जितने भी हक थे वह मारे गये हैं। इसी में प्रधान मंत्री जी और कानून मंत्री जी की कृपा से यह संशोधन लागू हुआ। केवल पांच आदेश जो लॉ ऑफिसर द्वारा लागू किये गये थे, उन्हीं को विदड्रॉ कर दिया जाता है तो यह तो पहले जैसा ही हो जायेगा।
इसके अलावा न्यायपालिका और प्राइवेट सैक्टर में रिजर्वेशन नहीं है। इस बिल के द्वारा इसको चालू किया जाये, रैस्टोर किया जाए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री रामसागर रावत (बाराबंकी) : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, सत्ता पक्ष की ओर से एससीएसटी तथा अन्य कमजोर वर्गों के आरक्षण को पूरा कराने के लिए जो संविधान संशोधन विधेयक लाया गया है और श्रीमन् आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया है उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं।
मान्यवर, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आज आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं। उन वर्गों के लिए हमारे संविधान में साफ-साफ व्यवस्था की गयी है कि उन्हें विशेष अवसर देकर समाज के अन्य वर्गों के बराबर खड़ा करने की कोशिश की जायेगी। यह वचनबद्धता थी लेकिन उसमें लीकेज़ हुई। आज हम फिर से एक संकल्प दोहराने के लिए लोक सभा में चर्चा कर रहे हैं।
मान्यवर, आरक्षण की नीति को जिस मंशा से बनाया गया था उसे पूरा करने में सरकार के अधिकारियों ने और जो इस दिशा में कार्य करने वाली संस्थाएं हैं उन्होंने उसे ठीक से लागू नहीं किया। अगर उनकी मंशा साफ होती तो चतुर्थ श्रेणी के पानी पिलाने वाले, सफाई करने का काम करने वाले जो पद हैं, जिनमें पढ़ाई-लिखाई की कोई आवश्यकता नहीं है, कम से कम उन श्रेणी के पदों को तो पूरी तरह से भरा जा सकता था। लेकिन आज स्थिति क्या है? लेकिन आज सरकारी संस्थाओं में, या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाओं में चाहे टैक्नीकल श्रेणी के पद हों या दूसरी श्रेणी के हों, उनमें पूरी तरह से आरक्षण नीति का पालन नहीं हुआ है। इसलिए मान्यवर, यह जो संकल्प लाया गया है, इस पर माननीय बूटा सिंह जी ने ठीक ही आशंका जाहिर की है कि जब तक अधिकारियों की नीयत साफ नहीं होगी और पवित्र मन से हम संकल्प नहीं लेंगे और इसे लागू करने की कोशिश नहीं करेंगे, तब तक यह नीति पूरी होने वाली नहीं है। जो विशेष अवसर की बात कही जाती है, वे अवसर मिल नहीं पायेंगे।
मैं देखता हूं कि अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को २० हजार रुपये में आवास बनवाने की बात कही जाती है कि वह बनवाकर देंगे।
उत्तरप्रदेश में जहां बी.जे.पी. की सरकार है, वहां २० हजार रुपए में से पांच हजार रुपए रिश्वत के चले जाते हैं। वह पैसा जब तक जमा नहीं किया जाता तब तक आवास नहीं मिलता। इसके साथ टॉयलट बनाना कम्पलसरी कर दिया गया है। इसका कोई मतलब नहीं है। शेष १२ हजार रुपए में मकान बन नहीं पाता। नौकरी के अतरिक्त जो सुविधाएं दी जाती हैं, उनमें भी ढील बरती जाती है। राजीव जी ने एक बार हाउस में कहा था और दिल से स्वीकार किया था कि गरीबों को दिए जाने वाला पैसा उन तक नहीं पहुंचता। वह २० परसैंट ही पहुंच पाता है। बनवासी सेवा आश्रम के नाम से आप जान जाएंगे कि जो पिछड़े इलाकों में रहने वाले आदिवासी हैं, उनके लिए आश्रम चलाया जा रहा है। उसमें उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार का अनुदान जाता है। तिवारी जी इस बात को जानते होंगे क्योंकि वे वहां के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। मैं उनके नेतृत्व में मैम्बर रहा हूं। यह कहा गया कि अनुसूचित जाति के लोग जब प्रशक्षित हो जाएंगे उन्हें उद्योग खोलने के लिए सहायता दी जाएंगी। नाम तो उनका है लेकिन उन्हें उसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है। मैं दुखी मन से इस बात को कह रहा हूं। सबल जाति के लोग इसका लाभ उठा रहे हैं।
आरक्षण के अतरिक्त जो दूसरी सुविधाएं उन्हें दी जाती हैं चाहे बैंकों से ऋण मिलने की बात हो या खेती में ईंजन की बात हो, अनुसूचित जाति के नाम से बहुत से ईंजन निकाले गए हैं लेकिन सबल लोग उनके खेत में खड़े हैं। बार-बार ऐसे बिल लाए जा रहे हैं और नीति बनाई जा रही है । कानून मंत्री जी एक संकल्प ला रहे हैं और कह रहे हैं कि जो आरक्षण पूरा नहीं हुआ, उसे पूरा किया जाएगा। अगर इसकी व्यवस्था नहीं की गई तो रिक्तता बनी रहेगी। कहा जाता है कि रिक्तता इस साल पूरी नहीं हुई तो अगले साल पूरी कर देंगे लेकिन उन खाली स्थानों को फिर भी नहीं भरा जाता। यदि आपकी मंशा साफ नहीं होगी तो वह रिक्तता कभी पूरी होने वाली नहीं है। मैं इसलिए इस बात को बार-बार दोहराता हूं। यदि आजादी के बाद ठीक से काम होता तो आज अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की यह हालत नहीं होती। शिक्षा के क्षेत्र में अनूसूचित जाति और जनजाति के कितने लोगों को अवसर दिए गए? क्या उनका स्तर उठा है? उनको कितने साधन दिए गए? उनको इसका कितना लाभ मिला? उनकी आर्थिक दशा में कोई सुधार नहीं हुआ है - चाहे ए श्रेणी हो, बी श्रेणी हो या चतुर्थ श्रेणी हो, जब तक सरकार की मंशा साफ नहीं होगी, नीति बनाने से और बार-बार संसद में संकल्प लाने से कुछ होने वाला नहीं है। मैं इस बिल का समर्थन तो कर रहा हूं क्योंकि यह कल्याणकारी बिल है लेकिन सुझाव देना चाहता हूं कि उन लोगों को जो सुविधाएं दी जाती हैं, वे पवित्र मन से दी जाएं। ये सुविधाएं देने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है। बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री शीशराम सिंह रवि (बिजनौर) : उपाध्यक्ष महोदय, मुझे ९०वें संशोधन विधेयक पर बोलने का मौका दिया। मैं इसके लिए आपका आभारी हूं। मैं ९०वें संशोधन विधेयक का समर्थन करता हूं। पांच बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण विधेयक दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाने का कार्य हुआ। उसमें १९८०, १९९० और १९९९ में तीनों बार गठबंधन की सरकार में माननीय वाजपेयी जी रहे। उनकी इसमें अहम भूमिका रही। इससे लगता है कि वास्तव में भारतीय जनता पार्टी ही दलितों की सही रूप से हितैषी है। देश में लागू आरक्षण नीति के मौजूद प्रावधानों के अनुसार सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति के लिए १५ प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के लिए साढ़े सात प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। इसके अतरिक्त अन्य पिछड़ी जातियों के लिए ८ अगस्त १९९३ से सभी सीधी भर्तियों में २७ प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
२७ अगस्त, १९९७ से पहले तक लागू आरक्षण नीति के अनुसार उपयुक्त उम्मीदवार न मिलने के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रिक्त रह जाने वाले पदों को बकाया रिक्तियों के रूप में रखा जाता था लेकिन आरक्षण पदों में भर्ती के समय कुल ५० प्रतिशत सीमा लागू करते समय चालू वर्ष की रिक्तियों व पिछली बकाया रिक्तियों पर विचार किया जाता था। पिछली बकाया रिक्तियों को अलग वर्ग में मानकर आरक्षण की ५० प्रतिशत सीमा से अलग रखा जाता था। इस व्यवस्था के अंतर्गत पिछली बकाया रिक्तियां या तो बाद के वर्षों में नियमित भर्ती के साथ ली जाती थीं या उनकी भर्ती के लिये विशेष अभियान चलाया जाता था। ये पिछली रिक्तियां सभी आरक्षित वर्ग ५० प्रतिशत की सीमा अथवा अलग से भरी जाती थीं। सरकारी नौकरी और सरकार के उपक्रम, बीमा निगम एवं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को बेहतर प्रतनधित्व देने के लिये पहली बार १९८९ में, उसके बाद १९९०, तीसरी बार १९९१, फिर १९९३, १९९५, १९९६ में विशेष अभियान चलाया गया परन्तु सुप्रीम कोर्ट के फैसले से १९९७ में इन रिक्त पदों पर ५० प्रतिशत से अधिक सीमा का उल्लंघन करने पर पाबंदी लगा दी गई जिससे सुप्रीम कोर्ट ने एक कानून पास कर दिया। इससे उच्च पदों पर प्रतिबंध लगाया गया और जो आरक्षण में पदोन्नति करने का विषय था उस पर भी प्रतिबंध लग गया। इस सीमा को ५० प्रतिशत से ६० प्रतिशत किया जाना चाहिये क्योंकि इस समय नई जनगणना के आधार पर ३० करोड़ जनसंख्या अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की हो जायेगी।
उपाध्यक्ष महोदय, इसी के साथ इस देश में सवर्ण जाति के गरीब तबके के लोग हैं, उनको १० प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिये। इनमें जो सवर्ण जाति के गरीब पंडित हैं, उसे कहीं न कहीं आरक्षण दिये जाने की बात कही जा रही है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिये, सरकार को कर्मचारियों को पदोन्नति देने के लिये एक विधेयक लाना चाहिये ताकि पदोन्नति में कोई रुकावट न आये। इस देश के जो २० करोड़ लोग दलित हैं, उनकी सरकार को चिन्ता करना चाहिये। सरकार में जो क्लास-१,२,३ के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के जो अधिकारी हैं, उनकी संतानों को आरक्षण से वंचित कर देना चाहिये क्योंकि गरीब का बेटा गरीबी में पढ़ रहा है, वह प्राइमरी स्कूल में पढ़ता है जबकि अमीर का बेटा डाक्टर है, इंजीनियर है और आफिसर है…( व्यवधान) क्योंकि मैं गरीबी से निकल कर आया हूं, इसलिये गरीबों की बात जरूर कहूंगा। अनुसूचित जाति का आदमी इस श्रेणी की आखिरी पंक्ति में आता है और इसकी चिन्ता करनी चाहिये। इस बात में कोई संदेह नहीं कि आरक्षण की नीति समाज के दलित वर्ग को ध्यान में रख कर लागू की गई है जिसकी संख्या इस देश में ३० प्रतिशत है। इस देश में जनसंख्या के अनुपात में ये लोग सरकारी नौकरियों में कुल ३० लाख हैं और तकनीकी तथा प्रशासनिक पदों पर इनकी संख्या केवल एक लाख हो सकती है। पूर् देश में न्यायाधीशों, डाक्टर्स, इंजीनियर्स जैस पदों पर इन लोगों की नियुक्ति की जानी चाहिये। इसके साथ ही दलित समाज में जिन जातियों को इसका लाभ मिला है, वे अनुपात में कम हैं और ज्यादा कब्जा उच्च जाति के लोंगों ने जमाया हुआ है। वहां व्यक्तिगत अधिकार का आरक्षण समझ कर उसका उपयोग किया गया है। यही नहीं, उन्होने आगे चल कर इसका लाभ अपने आसपास के लोगों या रिश्तेदारों को दिलाने के लिये तो प्रयोग किया परन्तु आम गरीब आदमी, जो दलित हैं, उस गरीब तक पहुंचाने की कोई कोशिश नही की। अभी केवल प्रथम श्रेणी ""क"" में केवल ११.५ प्रतिशत की भर्ती हुई है।
जनजाति में केवल ३.५७ प्रतिशत की हुई है। ‘ख’ श्रेणी में ११.९८ और अनुसूचित जनजाति में २.६५, ‘ग’ श्रेणी में १५.२४ और जनजाति में ५.८५ की भर्ती हुई है। जो बैकलॉग है इसे भरवाने के लिए माननीय भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा यह विधेयक लाकर दलितों के प्रति अपना मन साफ करके दिखाया है। इसके लिए मैं भारतीय जनता पार्टी और गठबंधन की सरकार का बहुत आभारी हूं और साथ ही यह भी बताना चाहता हूं कि पुराना इतिहास इस बात का गवाह है कि यदि हम देखें कि जब भारत में हिंदुओं का राज्य था, उस समय छूआछूत नहीं थी। होली, दीवाली, गंगा स्नान आदि सारे त्यौहार हिंदू रीति-रिवास के अनुसार मनाये जाते थे और यह इस बात का सबूत है …( व्यवधान) आप पूरे देश में जाकर देखिये कि गंगा के किनारे पर कहीं भी इस तरह से घाट नहीं बने हैं कि यह पंडितों का घाट है, यह ठाकुरों का घाट है और यह दलितों का घाट है। वहां समाजवाद था। इस बीच में करीब पौने दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों का राज रहा, कुछ समय तक मुगलों का राज रहा, उन्होंने हिंदुओं के पूरे संविधान को बदलने की कोशिश की और दलितों के साथ जो अत्याचार किये वे अंग्रेजों ने किये। यदि अंग्रेज और मुगल दलितों के इतने ही वफादार थे तो कन्याकुमारी से कश्मीर तक एक भी दलित की रियासत क्यों नहीं है। अन्य लोगों की रियासतें क्यों हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर जो दलितों के सबसे बड़े मसीहा माने जाते हैं, उन्होंने देशभक्ति की भावना को जगाते हुए, उस समय जब धर्म परिवर्तन की बात चल रही थी तो उन्होंने बौध धर्म स्वीकार किया। यदि वह ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते तो हिंदुस्तान में मैं समझता हूं कि भारत माता के प्रति वफादार लोगों में कमी आ जाती। इस तरह से उनमें राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति की पूरी भावना थी। मैं एक मिसाल और देना चाहता हूं। इस देश में आपको इतिहास पढ़ना पड़ेगा, उसमें यह लिखा है कि परम संत गुरू रविदास जी, जिन्होंने आज से ६३० वर्ष पहले इस देश में जन्म लिया और बाद में मुगलों ने अपने शासन में उन्हें बनारस से ले जाकर दिल्ली में बंद कर दिया। परंतु उन्होंने वैदिक धर्म को स्वीकार किया। उन्होंने हिंदुओं के लिए काम किया, उन्होंने मुस्लिम धर्म को स्वीकार नहीं किया। इसलिए मैं ऐसा महसूस करता हूं कि भारतीय जनता पार्टी असली रूप में दलितों की हितैषी है और बहुजन समाज पार्टी या अन्य पार्टी के लोग गलत प्रचार कर रहे हैं। इस बात को छिपाया नहीं जा सकता, इस बात का इतिहास गवाह है। इसके साथ मैं पुन: बताना चाहता हूं कि दलितों की हितैषी भारतीय जनता पार्टी है और आने वाला चुनाव इस बात को सिद्ध कर देगा कि दलित भारतीय जनता पार्टी के साथ होगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री प्रियरंजन दासमुन्शी (रायगंज) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्य की जानकारी के लिए इतिहास की कहानी बताना चाहता हूं, कलकत्ता में दक्षिणेश्वर का जो मंदिर गंगा किनारे पर बना है, चूंकि वह मंदिर एक मछुआरे के द्वारा बनाया गया था। रानी राजमणि को पहले दिन प्रसाद नहीं दिया गया, चूंकि वह मंदिर मछुआरे ने बनाया था, उस समय में इतना जात-पांत थी।…( व्यवधान)
श्री शीशराम सिंह रवि (बिजनौर) : ४५ साल तक कांग्रेस ने राज किया, दलितों को क्या दे दिया …( व्यवधान) यह बैकलॉग उन्हीं का है।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कुछ भी रिकार्ड पर नहीं जायेगा।
..( व्यवधान)... *
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* Not recorded श्री सुकदेव पासवान (अररिया) : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मैं संविधान के ९०वे संशोधन विधेयक, २००० के विषय में बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के क्रियान्वयन करने के लिए एक शासकीय ज्ञापन १९ अगस्त, १९९७ को जारी किया गया, जिसमें उपबंध किया गया है कि ५० प्रतिशत की सीमा और पिछली संचित रिक्तियों के विशेष भर्ती अभियान को रोक दिया गया है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि देश में एस.सी. और एस.टी. के लिए आरक्षित रिक्तियां अभ्यर्थियों की अनुपलब्धता के कारण सीधी भर्ती द्वारा नहीं भरी जा सकी थीं और प्रत्येक वर्ष ५० प्रतिशत की अधिकतम सीमा से अधिक नहीं होगी। आज़ादी के ५२ वर्षों के बाद भी ऐसी स्थिति बनी हुई है कि सही मायनों में आरक्षण नहीं मिल रहा है। हम लोग ग्रामीण इलाकों से आते हैं और अभी भी गांवों में अनुसूचित जाति और जनजाति के केवल ३०-४० प्रतिशत बच्चे ही स्कूल जा पाते हैं। देश के लिए और लोकसभा के लिए यह बहुत ही विचारणीय विषय है।
सभापति महोदय, केन्द्र सरकार को निश्चित रूप से चाहिए कि प्रथम कक्षा से बी.ए. तक शिक्षा एस.सी. और एस.टी. के बच्चों के लिए अनिवार्य हो। आज़ादी के ५२ वर्षों के बाद भी अनुसूचित जाति और जनजातियों में शिक्षा का अभाव है। जब गांवों में हम जाते हैं तो देखते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के बच्चे स्कूल जाने के बदले मवेशी चराते मिलते हैं। आर्थिक द्ृष्टिकोण से, शैक्षिक द्ृष्टिकोण से और सामाजिक द्ृष्टिकोण से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग बहुत पिछड़े हुए हैं। जब तक केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा इन पर पूर्ण ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक उनका उत्थान नहीं होगा। ५२ वर्ष की आज़ादी के बाद भी जह यह हालत है तो हमें लगता है कि सौ या दो सौ वर्षों बाद भी हम अनुसूचित जाति और जनजातियों को शक्षित नहीं बना पाएंगे। इसलिए उनकी अनिवार्य शिक्षा पर सरकार को बल देना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर आये दिन अत्याचार होते हैं। ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहां से इस बारे में खबरें न आती हों कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों का उत्पीङन होता है या उनकी हत्याएं होती हैं, लेकिन उस पर हम गंभीरता से विचार नहीं कर पाते हैं। आखिर अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर ही ऐसा क्यों होता है और जो धनी लोग हैं, उन लोगों पर इस प्रकार के अत्याचार या दुराचार क्यों नहीं होते हैं, यह सोचने की बात है। आज जो स्थिति बनी हुई है, उसमें इतने वर्षों की आज़ादी के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में या लोअर कोट्र्स में अनुसूचित जाति और जनजाति के जजों की संख्या आरक्षण के अनुसार नहीं है। इसलिए न्यायालयों में आरक्षण का जो कोटा है, उसको शीघ्र पूरा करना चाहिए। अभी मायावती जी ने कहा और मैंने भी कई बार लोक सभा में इस बात को उठाया है कि जिस तरह से लोक सभा और विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण है, उसी प्रकार राज्य सभा और विधान परिषदों में भी अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। निश्चित रूप से सरकार को इस पर गहन विचार करना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, अगर आरक्षण नहीं होता, तो एस.सी.और एस.टी. के लोग लोक सभा में नहीं पहुंच पाते। मैं कहना चाहता हूं कि ऐसे बहुत कम लोग हैं जो जनरल सीट से चुनकर आते हैं। हम सभी जानते हैं कि एक या दो बार मुश्किल से जीत कर आए, अन्यथा सभी दलों के बड़े-बड़े नेता आरक्षण के माध्यम से ही लोक सभा में चुनकर आते रहे हैं।…( व्यवधान)
कुमारी मायावती : उपाध्यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्य के ध्यान में लाना चाहती हूं कि माननीय कांशी राम जी, जो हमारी पार्टी के अध्यक्ष हैं, वे दो बार जनरल सीट से चुनकर आए हैं और आप भी जनरल सीट से चुनकर आए हैं।
श्री सुकदेव पासवान : उपाध्यक्ष महोदय, मायावती जी जो कह रही हैं, वह अपवाद हो सकता है। उसको जनरल-वे में नहीं लिया जा सकता है।…( व्यवधान)
श्री रामानन्द सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय सदस्य को बताना चाहता हूं कि अपवाद तो यह भी है कि बाबा साहब अम्बेडकर रिजर्व सीट से हारे थे। यह देश का करैक्टर है। मैं उसके बारे में बता रहा हूं। … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: What is this going on?
श्री रामानन्द सिंह (सतना): मायावती जी, आपको जानकारी नहीं है। मैं बाबा साहब अम्बेडकर का आपसे ज्यादा भक्त हूं। जब पं.जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देकर रिपब्लिकन पार्टी की ओर से सुरक्षित क्षेत्र की सीट से चुनाव लड़ा जिससे वे हार गए।… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: We do not have time now.
...( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) … * MR. DEPUTY-SPEAKER: You do not cross talk please. Nothing will go on record.
(Interruptions) … * श्री सुकदेव पासवान : उपाध्यक्ष महोदय, मैं यही कहना चाह रहा हूं कि सही मायने में आजादी के बाद से एस.सी.एस.टी. पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उनके ऊपर भी हमें गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि केन्द्र सरकार या राज्य सरकार के पास ऐसा कोई ठोस कानून नहीं है जिसके तहत, हरिजन की ओर यदि कोई आंख उठाकर भी देखे, तो उसको दंडित कर सकें।
कुमारी मायावती : उपाध्यक्ष महोदय, यदि आपकी परमीशन हो, तो मैं एक निवेदन करना चाहती हू।
उपाध्यक्ष महोदय : इसमें मेरी अनुमति की जरूरत नहीं है। यदि मैम्बर आपको यील्ड करना चाहते हैं, तो आप कह सकती है।
कुमारी मायावती : उपाध्यक्ष महोदय, मैं अपने भाई से रिक्वैस्ट करना चाहती हूं कि जो `हरिजन` शब्द है, वह अनकांस्टीक्यूशनल है। इसलिए उसको कार्रवाई से निकाल दिया जाए।
श्री सुकदेव पासवान : उपाध्यक्ष महोदय, मैं तो हमेशा एस.सी. एवं एस.टी. बोलता हूं। यदि गलती से यह निकल गया हो, तो मुझे उम्मीद है कि वे उसे अन्यथा नहीं लेंगी।
मेरा कहना यह है कि केन्द्र सरकार द्ृढ़ता से ऐसा कानून बनाए जिससे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के किसी भी व्यक्ति के ऊपर किसी भी प्रकार की घटना न हो और उस कानून को द्ृढ़ता से लागू किया जाए।
उपाध्यक्ष महोदय, जिस तरह से प्राइवेट सैक्टर पूरे हिन्दुस्तान में बढ़ रहा है और पनप रहा है उसमें भी एस.सी.एस.टी. के लोगों को केन्द्र व राज्य सरकारों की तरह आरक्षण मिलना चाहिए।
* Not recorded उसी प्रकार प्राइवेट कारखानों में, उद्योगों में एस.सी./ एस.टी. के लड़कों को आरक्षण मिलना चाहिए।
अंत में मैं कहना चाहूंगा कि केन्द्र सरकार से संबंधित सभी विभागों में एस.सी/ एस.टी. के बैकलॉग के बारे में हमने कई बार आवाज उठाई। मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि केन्द्र सरकार के सभी विभागों में एस.सी./ एस.टी. का बैकलॉग पूरा नहीं है। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : मिस्टर शिंदे, आपको क्या हो गया है?
श्री सुशील कुमार शिंदे : प्रधान मंत्री जी ने जो किया है, उसके बारे में भी बताना चाहिए। मैं सिर्फ उसकी याद दिला रहा हूं और कुछ नहीं कह रहा हूं। …( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त करिये।
श्री सुकदेव पासवान : कानून मंत्री महोदय इस तरह का कानून बनायें, राज्य सरकार से रिपोर्ट मंगाये कि उनके प्रदेश में किसी भी विभाग में एस.सी./ एस.टी. का बैकलॉग है या नहीं। यदि है तो वे उसे समय सीमा के अंदर उसे पूरा करने के लिए वचनबद्ध हैं।
अंत में मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि भारत की आबादी १०० करोड़ है जिसमें से ३० करोड़ एस.सी/ एस.टी. के लोग हैं। जब तक समाज का अंतिम तबके का आदमी मजबूत नहीं होगा, शक्षित नहीं होगा तब तक हिन्दुस्तान मजबूत नहीं हो सकता। मैं केन्द्र सरकार से मांग करना चाहता हूं कि समाज के दबे-कुचले लोगों को हर तरह की सहायता देकर मजबूत करने की व्यवस्था करें। धन्यवाद।
SHRI A. KRISHNASWAMY (Sriperumbudur): Mr. Speaker, Sir, on behalf of the DMK Party I support this Bill. The House is very well aware that our DMK Dravida movement is the pioneer movement in India for the people of Scheduled Castes, scheduled Tribes and backward classes. From the period of EVR Periyar and our leader Anna and our respected leader Kalaingar we have struggled and still fight for the downtrodden people in Tamil Nadu. In this election we tied relationship with the BJP.
At the time of the elections in Tamil Nadu, the Opposition parties criticised our party because of the policies and principles which were different from the BJP. They said that this was an unholy alliance. We said at the time of alliance that we would make it a holy alliance. All the speculations have failed by bringing this amendment.
From the DMK Government, right from the beginning of 1967 our party has been struggling for the SC-ST people. There was a reservation of l6 percentage for SC-ST people in Tamil Nadu. After the DMK came to power it was increased to l8 per cent. In the year 1989 one more percentage was increased for Scheduled Tribes in Tamil Nadu. Now our leader is giving equal share to the SC-ST people in all the Government key posts. One Chief Secretary was appointed in Tamil Nadu. He belongs to the Scheduled Caste community and also, the TNPC Chairman and Chennai City Police Commissioner belong to the SC community. In 1989 we promoted an IGP of the State from the SC community to the post of DGP.
In the Government and in the public sector undertakings, we promote the Scheduled Castes and Scheduled Tribes community in Tamil Nadu. Dr. Ambedkar’s speech in the Constituent Assembly about fifty years ago is worth mentioning. He said on January 26, 1950:
"We are going to enter into a life of contradictions. In politics, we will have equality, and in social and economic lives, we will have inequality. We must remove this at the earliest possible moment or else, those who suffer from inequality will blow up the structure of political democracy".
During the election, everybody from other camp said that BJP is against the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, Backward Classes and OBCs. But the first thing when the NDA Government came to power, within hundred days, is that they extended the reservation for ten years. That itself proved that BJP also is in favour of upgrading Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The backlog problem had been agitating the large number of Scheduled Caste and Scheduled Tribe employees throughout India.
At that time, when all the people agitated in Tamil Nadu, our beloved leader, Dr.Kalaingar Karunanidhi, Chief Minister of Tamil Nadu, made a plea and wrote a letter to the hon. Prime Minister in the month of November, 1999, to amend the Constitution for safeguarding the interests of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. Seeing that letter, our hon. Prime Minister honoured and obliged. On 5th December, 1999, he promised in the meeting regarding Scheduled Castes and Scheduled Tribes that he would bring the Constitution (Amendment) Bill, and he would do favour for the Scheduled Caste and Scheduled Tribe people. So, he introduced this Bill today. We are very much proud of him.
We welcome this amendment. At the same time, we are not fully happy because,right from the beginning, we are asking for 69 per cent reservation in educational institutions, and provision of job opportunities. For improving the lot in the private sector, we appeal to this Government that in all the private sector units also this reservation policy should be adopted. In the aided-colleges also, this reservation policy should be implemented. The Government can direct the aided-colleges to fulfil their reservation policy through UGC, otherwise the Government should take steps to stop giving grants to these colleges. As far as schools are concerned, the State Governments should be directed to implement the reservation policy in management schools also.
Sir, we cannot often amend the Constitution. So, to avoid the intervention of the court, our hon. Minister of Law, and Senior Counsel, Shri Ram Jethmalani, should find a permanent solution to avoid intervention of the courts in the reservation policy.
Sir, on behalf of the DMK Party, we welcome and support the Bill.
Sir, with these few words, I would like to thank you for giving me an opportunity to participate in the discussion.
श्रीमती संतोष चौधरी (फिल्लौर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व गरीब लोग आरक्षण के मुद्दे को लेकर या उनके ऊपर जो अत्याचार किये जा रहे हैं, उनको सामने रखते हुए बहुत ही चिन्तित हैं और समूचे सदन के लिए यह एक चिन्ता का विषय है, सभी पार्टियों के लिए भी है।…( व्यवधान) मैं यह कहना चाहती हूं कि एक तो महिला बोल रही है और आप बीच में व्यवधान डाल रहे हैं। यहां पर भी तो यह बात हो रही है, जो अनुसूचित जाति के साथ होता है, वही महिलाओं के साथ होता है।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri RatilalVarma, your name is not included in the list submitted by your party. Even then - because I know you have some difficulty; you met with an accident - since you want to speak, I will definitely accommodate you. But do not pass such sarcastic remarks. It is unfair on your part.
श्रीमती संतोष चौधरी : उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह कह रही हूं कि आज सम्पूर्ण हिन्दुस्तान के अनुसूचित जाति एवम् अनुसूचित जनजाति के लोग इस कारण से बहुत ही चिन्तित हैं कि जब हिन्दुस्तान आजादी की स्वर्ण जयन्ती मना रहा है, उस पर करोड़ों रुपया खर्च किया जा रहा है और हिन्दुस्तान की संसद की गरिमा को बढ़ाने वाले वे गरीब लोग हैं, जो अपने वोट को पूर्ण रूप से इस्तेमाल करके हम लोगों को यहां पर बैठाते हैं। आज जब स्वर्ण जयन्ती मनाई जा रही है तो यह ईनाम दिया गया कि उनके नौकरियों में आरक्षण को वापस ले लिया गया। उनके साथ अत्याचार बढ़ गये और इन्हीं सब कारणों को लेकर चिन्ता का कारण बनते हुए सत्ता पक्ष की ओर से जो विधेयक यहां पर पेश किया गया है, उसका हमारी पार्टी ने समर्थन किया है और उसी समर्थन के रूप में मैं भी आपके समर्थन में खड़ी हूं।
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PETROLEUM AND NATURAL GAS AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI SANTOSH KUMAR GANGWAR): Sir, I want to make an announcement that dinner is ready in room No.70.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The Minister of Parliamentary Affairs is making the announcement that dinner is ready. Hon. Members can go in small batches for taking food. You may continue your speech, Shrimati Santosh Choudhary.
श्रीमती संतोष चौधरी : उपाध्यक्ष महोदय, जब हिन्दुस्तान के भाग्य निर्माताओं ने संविधान का निर्माण किया था, उस समय यह स्वप्न भी नहीं लिया था कि आज हिन्दुस्तान में इतने स्वार्थी लोग आ जाएंगे, जो अपने स्वार्थ के लिए उन गरीबों पर अत्याचार करेंगे, जिसके बारे में अभी हमारे एक माननीय सदस्य ने यह कहा कि ४५ वर्ष कांग्रेस ने शासन किया है तो उन्होंने गरीबों को क्या दिया है। उनका यह प्रश्न था। मैं यह कहना चाहती हूं कि कांग्रेस की सरकार ने क्या नहीं दिया, सब कुछ दिया। पहले सड़कें नहीं थीं, स्कूल नहीं थे, हस्पताल नहीं थे, शिक्षा का कोई भी ऐसा तरीका नहीं था कि बच्चे शक्षित हो सकें। कांग्रेस सरकार ने सब कुछ देते हुए बच्चों को वजीफे देकर इस काबिल बना दिया कि वे आज सरकारी नौकरी पर बैठे हुए हैं, डिप्टी कमिश्नर हैं, एस.डी.एम. हैं और बड़े-बड़े ओहदों पर हैं। उन्होंने सब कुछ दिया, लेकिन मानसिकता की कमी होने के कारण आज हम उस ५० वर्ष में धरती के समतल पर बैठ गये हैं। किसी ने यह नहीं सोचा कि इन गरीब लोगों के बारे में हमें आगे क्या करना है।
मुझे पंजाब लोक सेवा आयोग में १२ वर्ष कार्य करने का अवसर प्रदान हुआ है। आज जो यहां पर संशोधन लाया गया है, बैकलॉग की आपूर्ति के बारे में, इसमें मैं यह कहना चाहती हूं कि छ: वर्ष मैं लोक सेवा आयोग की सदस्य के रूप में कार्य करती रही और छ: वर्ष वहां पर अध्यक्ष के रूप में मुझे कार्य करने का अवसर मिला और वह अवसर मुझे कांग्रेस पार्टी ने दिया, श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जो हिन्दुस्तान के दलितों को, माइनोरिटीज़ को, सब को गले से लगाकर चलती थीं।
उन्होंने यह मौका मुझे दिया और वह भी एक अनुसूचित जाति से सम्बन्ध रखने वाली महिला को दिया। उस समय हिन्दुस्तान में मैं अकेली महिला थी जब पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन की सदस्य बनी। छ: साल के बाद जब मुझे उसका अध्यक्ष बनने का मौका दिया गया तो उस समय भी मैं हिन्दुस्तान की अकेली महिला थी, जो अनुसूचित जाति से सम्बन्ध रखती थी। मैं यहां केवल यही बताना चाहती हूं आज बैकलॉग के बारे में बात कही गई--
"Prior to August 29, 1997 the vacancies reserved for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes which could not be filled by the direct recruitment on account of non-availability of the candidates belonging to the S.C. and S.T."
नॉन-अवेलबलिटी शब्द को मैं यहां सारे सदन को बताना चाहती हूं, जिसे सुनकर आप अचम्भित हो जाएंगे। कई राज्यों में हमारे गरीब लोगों के बच्चे बड़ी मुश्किल से शिक्षा लेकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन वास्तविकता मानसिकता की है। जब मुझे पब्लिक सर्विस कमीशन में जाने का मौका मिला तो मैंने बड़े नजदीक से देखा और परखा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ क्या होता है। वास्तविकता यह थी कि पहले एडहॉक पर सरकार में उन पोस्टों पर जनरल केंडीडेट बैठ कर काम करते रहते हैं। बड़ी मुश्किल से सरकार रिक्वीजिशन कमीशन को भेजती है। जब रिक्वीजिशन आती है तो उस केस को दबा दिया दिया जाता है। पता लगने के बाद उसको एडवर्टाइज किया जाता है और एप्लीकेशन आती हैं। आप हैरान होंगे यह जानकर कि एप्लीकेशन में उन लोगों को रिजेक्ट कर दिया जाता है किसी न किसी कारण से। चाहे अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र न होने की वजह से या बैकवर्ड क्लास का प्रमाण पत्र न होने की वजह से, जबकि उनके पास यह प्रमाण पत्र होता है। जब वे केंडीडेट इंटरव्यू के लिए आते हैं, वहां पर जो एक्सपर्ट आता है वह किसी अनुसूचित जाति या जनजाति से सम्बन्ध नहीं रखता, उसको कोई दर्द नहीं है, उसको उनके दर्द का कोई आभास नहीं होता। इसलिए जो ए,बी,सी और डी केटेगरीज हैं, उन सब केंडीडेट को डी केटेगरी देकर अनफिट कर दिया जाता है। वे बच्चे कहां जाएंगे, इसकी कोई सुध नहीं लेता। यह मैंने खुद देखा और तीन महीने देख कर मुझे देवी का रूप धारण करना पड़ा। जब तक १२ वर्ष मैं वहां रही, एक भी पोस्ट खाली नहीं जाने दी। जब उधर से केंडीडेट सलेक्ट होकर जाता है, उसको लैटर आफ एपायंटमेंट नहीं मिलता। वह पोस्ट में गायब हो जाता है। अगर खुशकिस्मती से मिल जाता है तो उसको मैडिकल में फेल कर दिया जाता है। अगर उसमें वह पास हो जाता है तो उसकी पोस्िंटग इतनी दूर कर दी जाती है कि उसे एक प्रकार का मेंटल टार्चर दिया जाता है। वह परेशान होकर, जिसके परिवार को दो रोटी भी खाने को नहीं मिलती, इतनी दूर मजबूर होकर जाता है। इसी व्यवस्था के चलते यह बैकलॉग इकट्ठा हो गया है। इसका यही कारण है कि हमें अपनी मानसिकता ठीक करनी पड़ेगी।
२०४९ बजे(डा. रघुवंश प्रसाद सिंह - पीठासीन हुए) आज आप देखें कि ऊंची पदवियों पर कितने मुख्य सचिव, कितने डिप्टी कमिश्नर और कितने लोग पब्लिक सर्विस कमीशन में अनुसूचित जाति और जनजाति के हिन्दुस्तान में हैं। कोई भी एपाइंटिंग अथोरिटी हो, कोई भी रिक्रूटमेंट एजेंसी हो, अनुसूचित जाति और जनजाति के कितने लोग वहां बैठे हैं, यह आप स्वयं देख सकते हैं। आज इसी कारण से हमारे लोगों के साथ जो अत्याचार हो रहा है, मैंने बहुत नजदीक से देखा है कि एक हाथ से हमें देते हैं और दूसरे हाथ से उनको प्रताड़ित किया जाता है।
अभी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन में कुछ वेकेंसीज निकलीं। जब उनके लिए प्रिलीमिनरी एक्जामिनेशन के लिए एप्लीकेशन फार्म भरा गया तो उसमें पहले लिखा था कि do you belong to the Scheduled Caste or Scheduled Tribe? उम्मीदवार अगर वह होता है तो हां लिख देता है। उनको पहली ही बार में रिजेक्ट कर दिया जाता है, जबकि यह प्रावधान नहीं होना चाहिए। मेन में पास करके आए, पहली बार परफार्मा बना है यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन का, वहां किसलिए यह पूछा जाता है कि आप अनुसूचित जाति या जनजाति से सम्बन्ध रखते हैं या बैकवर्ड क्लास से हैं ?
मेन एग्जाम में उसे कुछ प्रैफरेंस मिलती है। उस समय यह प्रश्न पूछना चाहिए और अब की बार यही हुआ है। मैं जानती हूं कि हमारे सत्ता पक्ष में कुछ भाई यहां बैठे हुए हैं और वे चाहे यहां बहुत बातें कह रहे हैं कि हमारी सरकार ने यह किया है लेकिन उनका दम भी यहां बैठे हुए काफी घुट रहा है क्योंकि सरकार द्वारा कुछ ऐसे फैसले ले लिये गये हैं जो बहुत गलत हैं और जो एस.सी.एस.टी. के विरोध में है। अभी कुछ दिन पहले यू.पी.एस.सी. से कुछ बच्चे सलैक्ट हो गये, एग्जाम हुआ, इंटरव्यू हुआ और उनका सलैक्शन हो गया लेकिन अपॉइन्टमेंट नहीं दिया गया। अपॉइंटमेंट इस कारण नहीं दिया गया कि वैकेंसीज नहीं हैं। अगर वैकेंसीज नहीं हैं तो एडवर्टाइज ही क्यों किया गया था ? उन बच्चों का एग्जाम ही क्यों लिया गया? उन्होंने अपने पैसे खर्च किये होंगे और यह मामला कोर्ट में है। माननीय मंत्री जी को पता होगा कि यह केस ऑलरेडी कोर्ट में गया हुआ है औऱ जो बच्चे पैसे खर्च कर सकते थे, उनके लिए कोर्ट की तरफ से ऑर्डर आ रहे हैं लेकिन सारे लोग तो कोर्ट में नहीं जा सकते हैं। मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि ये सब चीजें देखकर, चाहे इंजीनियरिंग कॉलेज का मामला हो या सर्विसेज का मामला हो, वहां हैड ऑफ डिपार्टमेंट एस.सी.एस.टी. के लोगों को जब तक नहीं लगाएंगे तब तक बैक-लॉग खत्म नहीं होगा । चाहे यहां पर कानून पास कर दिया जाए लेकिन हैड ऑफ डिपार्टमेंट के पद पर नहीं बिठाया जायेगा तब तक बैकलाग समाप्त नहीं होगा। आपने घंटी बजा दी है, इसलिए अनुशासन में रहते हुए मैं अपनी बात दो पंक्तियां कहते हुए समाप्त करती हूं :-
" कांटों को मत निकाल चमन से ए बागवा, हम भी गुलों के साथ खिले हैं बहार में। "
२०५२ बजे श्री रतिलाल कालिदास वर्मा (धन्धुका) : सभापति महोदय, इस संशोधन विधेयक का समर्थन करते हुए मेरा यह कहना है कि यह संशोधन क्यों लाना पड़ा ? इसकी इस समय क्या जरूरत थी ? हम अपने आप को समाज के रक्षक मानते हैं , समाज के लीडर और समाज के प्रतनधि मानते हैं लेकिन जब पहला अध्यादेश दलित समाज के खिलाफ, एस.सी. के खिलाफ हुआ तब सब लोग इकट्ठे क्यों नहीं हुए? आज हम सब पक्षपात को भूलकर इकट्ठा होकर समर्थन कर रहे हैं और एक होकर बोल रहे हैं लेकिन जब दूसरा, तीसरा, चौथा और पांचवा अध्यादेश निकला तब इकट्ठा हुए होते तो कितना अच्छा रहता। लेकिन "अब पछताये होय क्या जब चड़िया चुग गई खेत। " अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, सहयोगी दलों की सरकार है और और मैं सहयोगी दल औऱ विपक्ष का अभिनंदन करता हूं कि आज इस मुद्दे पर सब लोग इकट्टा हुए हैं, एक हुए हैं। अगर यही एकता शुरूआत में समाज में जनजाति के सभी सांसदों ने उसी दिन ही दिखाई होती तो आज यह दिन नहीं आता। आज जो हम रो रहे हैं, वह रोने का दिन नहीं आता। जितने अधिकारियों को प्रमोशन और रिजर्वेशन में नुकसान हुआ है, क्या हम उसकी भरपाई कर पाएंगे ? क्या हम उन्हें आश्वासन दे पाएंगे ? तेरहवीं लोक सभा में यह काम होने वाला है। मैंने पिछली बार भी यह बात उठाई थी। जिन अधिकारियों के मन में एस.सी.एस.टी. के प्रति प्रेम है, यदि ऐसे अधिकारियों के हाथ में सत्ता आती है तो हमें न्याय मिलेगा और यदि ऐसे अधिकारियों के हाथ में सत्ता नहीं रहेगी तो हम भले ही कानून कितेने भी अच्छे बनाये लेकिन दलित औऱ पिछड़ी हुई जातियों के प्रति अन्याय ही होता रहेगा।
उनके दिमाग के अन्दर एक भावना बैठी हुई है कि समाज के अन्दर आगे बढ़े। आरक्षण की बात देवेगौड़ा जी ने की, लेकिन वे आज यहां सदन में उपस्थित नहीं है। आरक्षण की बात गुजराल जी ने की, लेकिन वे सदन में उपस्थित नहीं है। उस वक्त भी सांसदों ने मेरी बात पर आपत्ति की थी, मैंने कहा था -
अरे ओ, प्रधान मंत्री गुजराल, अनामत के नाम पर दलितों के खींच निकाले बाल, उनको कर दिया है बेहाल, लेकिन भाजपा की है सरकार, वह जरूर करेगी दलितों पर निहाल।
मैंने देवेगौड़ी जी के लिए कहा था -
अरे ओ, प्रधान मंत्री देवेगौड़ा, दलितों के नाम पर बीच में बनकर पड़े हो रोड़ा, लेकिन अटल जी का है दिल है बहुत बड़ा, वे जरूर हटायेंगे, बीच में पड़ा रोड़ा, अरे ओ, प्रधान मंत्री देवेगौड़ा।
इस दिशा में थोड़ा काम हुआ है, मैं यह नहीं कहता हूं कि कुछ नहीं हुआ है। अटल जी से सभी सांसद मिले थे। एससी और एसटी फोरम भी मिला था। इससे पहले लोकसभा के बाहर धरना भी हुआ था। वहां हम भी उपस्थित थे। मैं कहना चाहता हूं कि आने वाले दिनों में दलित समाज या आदिवासी समाज के किसी भी कर्मचारी के ऊपर अन्याय न हो, इसके लिए कानून बनाना पड़ेगा। मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि लोग कोर्ट में चले जाते हैं, स्टे ले लेते हैं और फिर काम में रुकावट आ जाती है। दलित समाज में ऐसा कौन है, जो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट तक जाए। ऐसे कौन से कैपेबल लोग हैं, जो अंतिम क्षण तक लड़ेंगे। वास्तविकता यह है कि वे बात को मन में रख कर बैठ जाते हैं। कानून ऐसा बनाया जाए, जो नौवी सूची में डाला जाए, जिससे कोई भी आदमी दलितों, जनजातियों के हितों को कोर्ट में ले जाकर रुकावट न डाल सके। इस विषय पर हमारी बहनों ने भी बहुत सी बातें कही हैं। मैं किसी पार्टी की बात नहीं कह रहा हूं। देश को आजाद हुए पचास साल हो गए हैं। इन पचास सालों की आजादी के बाद भी आज भी दलितों की समाज में वही स्थिति है, आज भी वे झौपड़ी में रहते हैं, आज भी वे घोड़े पर नहीं बैठ सकते हैं, आज भी वे मंदिर में नहीं जा सकते हैं, आज भी वे एक साथ नहीं बैठ सकते हैं, आज भी वे सम्मान की जिन्दगी नहीं जी सकते हैं। हम भले ही एक दूसरे दलों की बात कहें कि हमने यह किया और उन्होंने यह किया। मैं नौवीं लोक सभा से प्रतनधित्व कर रहा हूं। भारत की पचासवीं वर्षगांठ पर दो दिन सदन में बहस हुई और उसमें एक ही सार निकला कि पचास साल की आजादी में हमें जो कुछ करना चाहिए था, वह हमने नहीं किया। आज भी वही स्थिति है, जो पहले थी। जो देश हमारे साथ आजाद हुए थे, वे तो कहीं के कहीं पहुंच गए। वहां भी पिछड़ी जातियां होगीं, बैकवर्ड लोग होंगे, लेकिन वहां पर हमारे जैसी परेशानियां नहीं हैं, हमारे जैसी शिकायतें नहीं है, हमारे जैसा कदाचार नहीं है, हमारे जैसा बलात्कार नहीं है। अब समय की मांग है और समय की मांग को देखते हुए, मैं सभी दलों के सासंदों का अभिवादन करता हूं, इस विषय पर हम अपने दल से ऊपर उठकर एक साथ हो जाते हैं और संघर्ष करते हैं तथा प्रधान मंत्री जी को आवेदन देने के लिए साथ हो जाते हैं। इस माहौल को बनाना पड़ेगा। हम ब्यूरोक्रेट्स की बात कहते हैं, ब्यूरोक्रेट्स बनाने वाले हम ही लोग हैं, हम लोग ही उनको चीफ सैक्रेटरी बनाते हैं, सैक्रेटरी बनाते हैं, अगर ऐसा लगता है कि वे ठीक काम नहीं कर रहे हैं, तो ऐसे ब्युरोक्रेट्स को घर बैठे ही पगार देना अच्छा है, न कि उनको नौकरी पर रखा जाए।
अंत में, मैं इतना ही कहूंगा कि दलित अब समाज में शोषण को बर्दाश्त नहीं करेगा। इस स्थिति की अब हद आ गई है, वह जागरुक हो गया है और वह समझदार हो गया है। वह अपने सम्मान को समझने लगा है और किसी के सामने झुकना नहीं चाहता है। वह सम्मान के साथ जीना चाहता है।
आपने मुझे समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद।
21.00 hrs श्री मुलायम सिंह यादव (संभल) : महोदय, यह जो संविधान संशोधन प्रस्ताव आया है, मैं उसका समर्थन करता हूं। मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहता, सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं। ५० साल से लगातार कई बार दस-दस साल का संविधान संशोधन हुआ, तब पूरा नहीं तो कुछ हद तक आरक्षण मिला, लेकिन इसका जो असली लक्ष्य था वह कामयाब नहीं हुआ। कानून मंत्री जी हम आपसे यह जरूर कहेंगे कि जब आप उत्तर देंगे तो हम आपसे यह जरूर सुनना चाहेंगे कि आखिर ५० साल के बाद अभी तक उच्च मानसिकता का बदलाव क्यों नहीं हुआ, असली सवाल यह है, उस उच्च मानसिकता को कैसे बदलेंगे ?
महोदय, कितनी दुर्भाग्यपूर्ण और अशोभनीय बात है कि जब हमारे देश के राष्ट्रपति फ्रांस में गए तो यह छपा, यह प्रचार हुआ कि अछूत राष्ट्रपति फ्रांस के अंदर आया है। उच्च मानसिकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह मिला कि आज देश के अंदर उच्च मानसिकता कितनी व्याप्त है। फ्रांस में स्थित दूतावास ने ऐतराज किया और प्रतक्रिया जाहिर की, लेकिन हमारे देश के उच्च पदों पर बैठे किसी व्यक्ति ने नहीं की। फ्रांस में हमारे देश के राष्ट्रपति को अछूत कह कर अखबारों के माध्यम से सम्बोधित किया तो उच्च मानसिकता के उच्च पदों पर बैठे लोगों ने क्यों एतराज नहीं किया, प्रतक्रिया जाहिर क्यों नहीं की, यह सवाल है। हम इस संविधान संशोधन का समर्थन करेंगे, लेकिन हमारे देश के राष्ट्रपति जी का अछूत कह कर जो अपमान हुआ, उसके लिए आप क्या कर रहे हैं? हमें इतना ही कहना है और हम आपका उत्तर जरूर सुनेंगे कि आप क्या कर रहे हैं। क्या उच्च मानसिकता को बदलेंगे? राष्ट्रपति जी को अछूत कहा गया तो दूतावास ने प्रतक्रिया जाहिर की, लेकिन उच्च पदों पर बैठे हमारे नेताओं ने, समाज में बैठे लोगों ने प्रतक्रिया जाहिर क्यों नहीं की, इसका हम आपसे उत्तर चाहेंगे। वैसे हम इसका समर्थन कर रहे हैं और सारी बातें हमारे मित्रों ने कही हैं। हमारा सवाल यह है कि इस मानसिकता को बदलना पङेगा। कौन छोटा, कौन बड़ा, कौन अछूत, इस भेदभाव को मिटाना पड़ेगा। जब यह भेदभाव मिटेगा तो हम समझेंगे कि जो संविधान संशोधन हो रहा है वह अपने लक्ष्य में कामयाब हुआ है। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक हम इसे मानते नहीं हैं- चाहे विधायक, मनिस्टर बना दीजिए, कितनी ही नौकरियां दे दीजिए। यह जो हमारे देश की छोटा मानने वाली मानसिकता है, यह खराब है, इसका मैं विरोध करता हूं, इसके लिए आप क्या करेंगे, यह मेरा सवाल है। इतना ही मैं कहना चाहता हूं।
(इति) श्री सालखन मुर्मू (मयूरभंज) : महोदय, मैं इस बिल का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं सबसे पहले प्रधानमंत्री, श्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके सहयोगी मंत्रियों को धन्यवाद देना चाहूंगा, उन्होंने इस बिल को लाने का एक अच्छा उदाहरण पेश किया है। एससी, एसटी रिजर्वेशन और बैकलॉग आदि में जो बाधाएं थीं, उन्हें दूर करने की दिशा में निश्चित रूप से यह एक साहसिक कदम है। प्रधानमंत्री जी इसलिए भी धन्यवाद के पात्र हैं कि इस बार उन्होंने एसटी मंत्रालय का, आदिवासी मंत्रालय का गठन किया है और केबिनेट रेंक के मंत्री के रूप में श्री जुआल ओराम को मंत्री बनाया है, इसके साथ ही उन्होंने आठ एससी, एसटी वालों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया है।
महोदय, मैं इस बिल के विषय में यह बात रखना चाहूंगा। आज हम यह बिल लाने के लिए मजबूर हैं, जिस पर यहां बहस हो रही है, मेरी समझ में इसके पीछे तीन कारण हैं। पहला यह है कि जो इम्प्लीमेंटिंग एजेंसियां हैं, डिपार्टमेंट्स हैं या जो आफिसर्स हैं उनके कारण से आज बैकलॉग है और कल भी ऐसा ही हो सकता है, यदि हम इन एजेंसियों को ठीक नहीं करेंगे।
दूसरा कारण न्यायपालिका का नकारात्मक दखल है। यह बड़े दु:ख की बात है कि सुप्रीम कोर्ट में एक भी एससीएसटी का आदमी नहीं हो सकता है। ऐसे भी उदाहरण है जब सुप्रीम कोर्ट में किसी को जस्टिस के पद पर लाना था तो तीन-तीन चीफ जस्टिस पैनल में थे लेकिन एक को भी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के लिए कंसीडर नहीं किया गया। यह मानसिकता बताती है कि वहां एससीएसटी के लोग जा नहीं पाएंगे।
हम लोग बारहवीं लोक सभा में और इस बार भी एससीएसटी की वैलफेयर कमेटी की तरफ से अनेक पब्लिक सैक्टर अंडरटेकिग्स में और वभिन्न विभागों में परीक्षा के लिए गये। हमें यह बात समझ में आती है और ऐसे अनेक उदाहरण भी हैं कि डीओपीटी में जो ऑफिसर्स आते हैं उनका नजरिया भी एससीएसटी के बिल्कुल विपरीत होता है। कोर्ट में जो एससीएसटी के विपरीत फैसले होते हैं तो वे पहले ही तैयार होकर उनको इम्प्लीमेंट करने के लिए खड़े हो जाते हैं। लेकिन जो सकारात्मक निर्णय होते हैं उनके लिए चुप बैठ जाते हैं। नकारात्मक यदि करना है तो कोर्ट से जजमेंट बाहर भी नहीं निकलता है कि आदेश जारी कर देते हैं कि इसको लागू करो, ताकि एससीएसटी के खिलाफ इसकी कार्यवाही जारी हो जाये। इनकी मानसिकता एससीएसटी के खिलाफ होने से ऐसा होता आ रहा है।
मैं एक-दो उदाहरण और देना चाहता हूं। आज आईएएस और आईपीएस जैसे पदों के लिए एससीएसटी के लोग मिल रहे हैं लेकिन असिस्टेंट, ड्राईवर और स्वीपर जैसे पदों के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। वहां पर बैकलॉग अभी भी है। यह विश्वास करने लायक बात ही नहीं है क्योंकि जब लाखों एससीएसटी इस देश में बेकार घूम रहे हैं तो बैकलॉग क्यों है। इसके पीछे भी वही मानसिकता है। रेलवे विभाग का भी मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं। हमारे संसदीय क्षेत्र से अनेक पत्र लोगों के आते हैं कि हमने परीक्षा पास कर ली, लेकिन मैडीकल के लिए पत्र देरी से मिला या मैडीकल में फैल कर दिया या नियुक्ति पत्र मिलने में देर हो गयी, जिसके कारण मैं वहां जा नहीं सका। वभिन्न कारणों से लोगों को नियुक्ति नहीं दी जाती है। हमें यह स्पष्ट समझ में आता है।
इंडियन आईल कोरपोरेशन एक पब्लिक अंडरटेकिंग है। अनेक पत्र हमारे पास आये कि चूंकि हम लोग एससीएसटी हैं और हमारा कोई वहां पर बोर्ड में एम.डी. या डायरेक्टर नहीं है तो तरक्की में बहुत कठिनाई है। बाकी के लोगों की तरक्की होना लाजिमी है। इस तरह से इनके साथ अन्याय होता है। जो ऑफिसर्स या इम्प्लीमेंटिंग एजेंसी हैं उनका नकारात्मक रवैया रहता है जिसके कारण प्रमोशन में भी कठिनाई होती है, बैकलॉग में भी कठिनाई होती है। ऐसा नहीं है कि लोग उपलब्ध नहीं है लेकिन उसके पीछे ऐसी मानसिकता है।
मैं एक सुझाव इसके बारे में देना चाहता हूं। माननीय मायावती जी ने भी सुझाव दिया था कि ऐसी मानसिकता वाले अफसरों और विभागों को चिन्हित करना होगा और इनको दंडनीय प्रक्रिया में शामिल करना होगा। यदि जानबूझकर ये लोग ऐसा करते हैं तो उनके ऊपर भी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो बार-बार ऐसा ही होता रहेगा और बैकलॉग बना रहेगा जिससे एससीएसटी नौकरी नहीं पा सकेंगे और तरक्की में भी उनको कठिनाई होगी। दूसरा सुझाव मेरा यह है कि हमने कमेटी ऑन वैलफेयर ऑफ एससीएसटी के मार्फत जो एग्जामिनेशन मों आते हैं, अनेक पब्लिक सैक्टर में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और उनके जो एससीएसटी वैलफेयर एसोशिएशन के लोग हैं, उनसे बातचीत की है।
वहां एक चीज यह समझ में आई कि ट्रेड यूनियन के नेता को मैनेजमैंट की तरफ से पूरी मान्यता मिली है, पूरी सुविधा मिली है। वे जो भी बात रखते हैं,उसे मैनेजमैंट के लोग मान लेते हैं। चूंकि ये चोरी करते हैं और वे भी चोरी करते हैं लेकिन एस.सी. एस.टी वैलफेयर एसोसिएशन का जो गठन होता है, उसे मैनेजमैंट वाले न ऑफिस देते हैं, न मान्यता देते हैं और न उनकी बात सुनते हैं। नाम का ढकोसला है। इससे काम नहीं सुलझेंगे। एस.सी. एस.टी, वैलफेयर एसोसिएशन को मान्यता मिलनी चाहिए। उनको प्रतनधित्व का लीगल स्टैडिंग स्टेटस मिलना चाहिए ताकि उनकी शिकायतों और ग्रीवेंसेज पर मैनजमैंट वाले और संबंधित विभाग के लोग ध्यान दें।
जूडशियरी के बारे में थोड़ी बात कही गई। मुलायम सिंह जी ने महामहिम राष्ट्रपति जी के बारे में कहा। मैं उनका रैफ्रेस लेकर केवल इतना कहना चाहता हूं कि उनके मन में कितनी पीड़ा है? उन्होंने उस पीड़ा को जग जाहिर किया कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रिजर्वेशन होना चाहिए। इस पर अनेक तरह की प्रतक्रियाएं हुई लेकिन यह सोचने और विचार करने की बात है कि भारतवर्ष के महामहिम राष्ट्रति जो विद्वान हैं, जिन का अपना व्यक्तित्व है, उनको भी यह महसूस हो रहा है कि जब तक वहां ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जाएगी वहां अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा। इस गम्भीर मुद्दे पर विचार करने की जरूरत है।
रिजर्वेशन और बैकलॉग में जो ५० प्रतिशत रोक या बंधन है, इससे दो चीजें सामने आती हैं। इम्पलीमेटेशन में भी दो बातें आती हैं। अभी सविल सर्विस आदि में या दूसरी कम्पीटेटिव एग्जामिनेशन में अच्छे मेधावी कैंडिडेट मैरिट लिस्ट में चले जाते हैं और एस.सी एस.टी. कैंडिडेट्स जनरल कैटेगिरी के कैडिडेट्स से कभी अच्छा भी करते हैं। चूंकि इन्हें ५० परसैंट से नीचे रखना है, उन्हें मैरिट का लाभ न देकर फिर उस कैटेगिरी में भेज दिया जाता है। इससे दूसरा पहलू यह उभर कर आता है कि बहुसंख्यक लोगों के लिए जगह कम रखनी हैं और कम लोगों के लिए ज्यादा जगह रिजर्व करके रखनी है। यह खतरनाक टैडेंसी है। इस बात पर गहराई से सोचना चाहिए कि कम लोग ज्यादा रिजर्वेशन इनडायरैक्टली लेना चाहते हैं और ज्यादा लोगों का जो वाजिब हक है, वह देना नहीं चाहते।
मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेज जो सरकारी सहयोग से बनते हैं उन्हें सरकारी मान्यता दी जाती है। वहां और प्राइवेट इंडस्ट्रीज में बिल्कुल रिजर्वेशन का प्रावधान नहीं है। यह दुख की बात है। वह होना चाहिए। पोस्ट ग्रेजुएशन में जुडशियरी का यह इंटरवैंशन कि उनकी वहां एडमिशन नहीं हो सकती है, यह भी बिल्कुल नकारात्मक और बेबुनियाद डसिजन है। एडमिशन होने से कोई पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री प्राप्त नहीं पा सकता। उसे परीक्षा देनी पड़ती है। यदि उनकी एडमिशन नहीं होगी तो वह आगे कैसे ऊंची शिक्षा प्राप्त करेंगे?
आदिवासियों की अपनी भाषाएं हैं। उन भाषाओं में एक भी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं की गई। जब तक रिजर्वेशन नहीं होगा यह नहीं होगा। वे जब तक अपनी भाषाओं से पढ़ेंगे-लिखेंगे नहीं, उनके बीच में शिक्षा के प्रति लगाव नहीं होगा। इससे उनका विकास नहीं होगा। आदिवासी भाषाएं जैसे संथाल, मुंडा, हो, उरा इत्यादि को भी मान्यता मिलनी चाहिए। नहीं तो ये आदिवासी और अनुसूचित जनजाति के लोग शिक्षा और विकास के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
सभापति जी, एक सुझाव यह देना चाहता हूं कि पीछे जब सासंदों का तीन दिवसीय सम्मेलन हुआ था, मैंने वहां भी यह सुझाव दिया था कि भारत सरकार की तरफ से सभी जिलों में एस.सी.एस.टी. के बच्चों के लिये सैनिक स्कूल जैसे स्कूल खोले जायें जहां शिक्षा की अलग व्यवस्था होनी चाहिये ताकि वे आगे बढ़ सकें, कम्पीटीशन में सफल हो सकें। यदि यह व्यवस्था कारगर ढंग से कर सकें तो निश्चित रूप से आने वाले समय में बैकलॉग नहीं रहेगा और हर तरफ परीक्षा में हमारे एस.सी.एस.टी. के लोग अच्छा कर सकते हैं। झारखंड या वनांचल प्रदेश के गठन के बारे में भी एस.सी.एस.टी. का मामला जुड़ा हुआ है। झारखंड प्रदेश की मांग उस समय से की जा रही है जब उनकी आबादी ६० प्रतिशत थी लेकिन ५० साल के बाद आज उनकी जनसंख्या ३० प्रतिशत इसलिये रह गई है क्योंकि बाहर के लोग वहां आकर बस गये हैं। खदान और कल कारखानों के कारण आदिवासी बेघर हो गये हैं। इसलिये सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुये कहूंगा कि नये प्रदेश का जलद गठन हो । सरकार की तरफ से इन लोगों के लिये जो कार्य किया जा रहा है, वह सराहनीय है और इसके लिये सरकार को बधाई देते हुये अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री भेरू लाल मीणा (सलूम्बर): सभापति महोदय, मैं संविधान (नब्बेवां संशोधन) विधेयक, २००० का समर्थन करता हूं ओर इस पर अपने विचार रखना चाहूंगा।
सभी माननीय सदस्यों ने यह कहा कि इम्पलीमेंटेशन में कमी है जिसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिये। मैं सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस संशोधन को लेकर आयी है। जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों में अशान्ति फैला दी थी कि उन लोगों को बैकलाग नहीं मिलेगा, पदोन्नति में काफी नुकसान हुआ है। आप सभी जानते है कि जिन विद्वान लोगों ने यह सविधान बनाया , उस समय यह विचार आया कि पिछड़े वर्ग के लोगों को कैसे आगे बढ़ाया जाये। सामान्य वर्ग के लोग पहले से ही सभ्य हैं और पिछड़े वर्ग के लोग उनकी बराबरी नहीं कर सकते। इस लोकतंत्र में सब को समान रूप से अधिकार दिये जायें, ऐसा प्रावधान संविधन में किया गया। उन लोगों की सुऱक्षा के लिये नौकरियों और राजनीति में आरक्षण किया गया । यह सभी जानते हैं कि इन लोगो को आरक्षण देते समय मन में अनेक भ्रान्तियां उत्पन्न हुई क्योंकि मन में और बात है और मुंह पर और बात आ जाती है। चाहे कितने वर्ष हो जायें, १०० साल ही क्यों न हो जायें, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा सभ्य समाज के लोगों में फर्क रहेगा। मान लीजिये यह आरक्षण नहीं होता तो मैं इस लोकसभा में कभी न आता बल्कि किसी उच्च जाति का आदमी आया होता। इसलिये आरक्षण देकर एक अच्छा रास्ता अपनाया। जहां कहीं भी जाते हैं तो यही चर्चा होती रहती है कि सरकारी नौकरियो में तो आरक्षण की व्यवस्था है लेकिन पब्लिक अंडरटेकिंग्स में यह नहीं और इसलिये निजीकरण के बाद कहीं भी आरक्षण के तौर पर किसी की भर्ती नहीं की जाती है।
जो इन सरकारी उपक्रमों और सरकारी दफ्तरों में भर्ती होती है, उसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर बहुत बड़ा असंतोष पैदा हुआ है। इस मामले पर सभी सदस्यों ने अपने-अपने विचार रखे हैं, लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि वास्तव में इनके प्रति क्या भावना है। हम लोग इन्हें दूसरों की बराबरी में लाना चाहते हैं, लेकिन बराबरी में नहीं आ सकते, उनमे जीवन-स्तर का फर्क रहेगा, लेकिन मानवता के नाते हमें सबको समान समझना चाहिए। जो लोग सम्पन्न हैं, अच्छी नौकरियों पर हैं, वे जो अपने मुंह से बात कहते हैं, उसमें उन्हें प्रैक्टीकल होना चाहिए। मेरा अनुरोध है कि इस प्रावधान को जब इम्पलीमैंट किया जाए, उसे ईमानदारी से इम्पलीमेंट करना चाहिए। जो अधिकारी भेदभाव से या अलग तरीके से इन्हें पीछे रखना चाहते हैं, उन्हें सजा देने का प्रावधान करना चाहिए और ऐसी सजा देनी चाहिए, ताकि वे ऐसा काम फिर न कर सकें।
सभापति महोदय, जब मैं एम.एल.ए. था, उस वक्त से मैंने आवाज उठाई क्योंकि मेरा अनुभव है कि अगर कोई चपरासी भी होगा तो कलक्टर के चैम्बर में जाने का अवसर दे देगा, यदि कोई दूसरा होगा तो वह जाने नहीं देगा। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि यदि उच्च पदों पर शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स के लोग नहीं होंगे तो इनका उद्धार नहीं हो सकता। मैं अधिक समय न लेते हुए सरकार को निश्चित रूप से इसके लिए बधाई दूंगा और वधि मंत्री जी से मेरा निवेदन है कि आप जो विधेयक लाये हैं उसे आप सही तरीके से इम्पलीमेंट कराने के लिए सख्ती से कार्रवाई करें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं। जयहिन्द।…( व्यवधान)
श्री रामानन्द सिंह (सतना) : सभापति महोदय, आप मुझे पांच मिनट बोलने का समय दीजिए, चूंकि हरिजन शब्द को लेकर गांधी जी पर आक्षेप हुआ है, मैं उस पर स्थिति स्पष्ट करना चाहूंगा।
श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) : माननीय सभापति जी, मैं श्रीमती वसुन्धरा राजे द्वारा रखे गये इस संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं इस सरकार को बधाई देना चाहता हूं कि माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में बनी नेशनल डेमोक्रेटिक अलाइंस की सरकार यह संविधान संशोधन बिल सदन में लाई है। इसके पीछे भारत के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं उनके सहयोगियों की जो विजन है, गरीबों की प्रति जो उनकी तड़प है, वह साफ झलकती है। मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि जिस समय साधुपुर और देवली में दलितों के ऊपर अत्याचार हुए, उस समय वर्तमान प्रधान मंत्री श्री वाजपेयी जी किस तरह से देवली से साधुपुर तक पैदल गये और दलितों के दुखों को सुना - यह हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास में एक मिसाल है।
आज भारतीय जनता पार्टी के बारे में तरह-तरह का कुप्रचार किया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी दलित विरोधी है, आरक्षण विरोधी है, यह दलितों के हकों को छीनना चाहती है। मैं भारतीय जनता पार्टी के विजन और कमिटमैंट को इस महान सदन के अंदर क्लियर करना चाहूंगा कि भारतीय जनता पार्टी १९८० में बनी। केरल में जब हमारी पार्टी का अधिवेशन हुआ तो उस अधिवेशन में इस प्रकार का प्रस्ताव पास किया गया कि आरक्षण पर व्हाइट पेपर जारी किया जाए। इसके पश्चात आगरा में भारतीय जनता पार्टी का महाधिवेशन हुआ। उस महाधिवेशन में भी भारतीय जनता पार्टी ने आरक्षण के प्रति अपने कमिटमैंट को दोहराया। उसके पश्चात् बंगलौर में १९९३ में हमने सामाजिक समरसता के माध्यम से इस देश के अंदर दलितों के लिए कल्याणकारी कदम उठाकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपने को साकार करना चाहा, जो सपना उन्होंने देखा था। उन्होंने कहा था कि इस देश के अंदर जब तक गरीब व्यक्ति के पांव में बिवाई पड़ी हुई है, जो समाज के अंतिम छोर पर खड़ा है, जब तक हम उस व्यक्ति के पांव की बिवाई न मिटा दें, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे।
आज उस विज़न के साथ हमें काम करने का मौका मिला तो प्रधान मंत्री श्रीमान् अटल बिहारी वाजपेयी जी इस प्रकार का संशोधन सदन में लाए। प्रधान मंत्री जी ने जो तीन दिन का सभी दलों के अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों का अधिवेशन हुआ, उसमें अपनी पार्टी और एन.डी.ए. के कमिटमेंट को दोहराया कि हम जो भी विसंगतियां हैं, उनको दूर करेंगे और आज बड़ी विडम्बना की बात है कि जो लोग गरीबों के हितों का बाहर ढिंढोरा पीटते थे, सामाजिक न्याय के पहरेदार बनते थे, जब उनके हाथ में सत्ता आई और जब उनके सिर पर प्रधान मंत्री का मुकुट विराजमान था तो उनके समय में ही पांच-पांच ओ.एम. आए जिनसे गरीबों का अधिकार छीना गया। आज मैं किसी पार्टी विशेष के ऊपर छींटाकशी न करते हुए यह कहना चाहूंगा कि आखिर क्या कारण है कि ५२ साल की आज़ादी के बाद आज हमें संशोधन लाना पड़ा और आज किस तरह से दलितों का हक छीन लिया जाता है। सभापति जी, जो अधिकारी इंटरव्यू लेते हैं, वह केवलमात्र एक बात इंटरव्यू में कह देते हैं कि `no suitable candidate is available’ और इस नॉट सूटेबल का बहाना बनाकर एक षडयंत्र रचा जाता है जिससे दलितों का आरक्षण छीन लिया जाता है। उसी का परिणाम है कि आज़ादी के ५२ वर्षों के बाद भी आज देश में ढाई लाख रिक्तियों का बैकलॉग है जो दलितों से किसी न किसी षडयंत्र के द्वारा छीन लिया जाता है। मैं माननीय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को, माननीय जेठमलानी जी को और बहन वसुन्धरा जी को बधाई देना चाहता हूं कि वे इस महान सदन में यह बिल लाए। इस बिल के पारित होने के बाद दलितों को उनका हक मिलेगा। यहां पर ओ.एम. की बात भी की गई है। आहिस्ता-आहिस्ता मैं यह भी प्रार्थना करूंगा कि उन सब ओ.एम. के बारे में जिस तरह से राज्य सभा के अंदर कानून लाया गया, उसके ऊपर भी एक संविधान संशोधन विधेयक लाकर हम बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के उस सपने को पूरा करें जो सपना उन्होंने देखा था और २६ जनवरी, १९५० को देश का संविधान बनने से पहले उन्होंने कहा था कि "Today, we, the people of India, have got political freedom but we will have to attain the economic freedom for the poor people of this country. "
आज वह सपना पूरा करने का समय आ गया है। इसलिए मैं इस बिल का समर्थन करते हुए इस सरकार को बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं।
SHRI G.M. BANATWALLA (PONNANI): Mr. Chairman, Sir, certain judicial pronouncements have created several difficulties with respect to our reservation system. These judicial pronouncements have not merely created difficulties but have in fact impaired and fractured the reservation system which is the corner stone of any effective policy with respect to social justice.
Sir, this Bill is the need of the hour. There can be no two opinions about that but unfortunately this Bill meets the rigours of the judicial pronouncements only partially. Several other aspects have been left out and excluded. Unfortunately, this Bill does not meet the rigours of judicial pronouncements fully. Here, Sir, I may also say that the hon. Member from Jalore has referred to two Bills moved by two Private Members.
He restricted himself to only two Private Members’ Bills. I have to draw the attention of the Government to the two Bills that have been introduced by me also with the leave of this House here. The Government ought to have considered all these aspects with respect to the reservation and the present Bill ought to have been a comprehensive Bill to meet the situation though these matters brook no delay. That has also to be understood.
Mr. Chairman, Sir, in Indra Sawhney and others versus the Government of India and others AIR 1993 SC 477 the Supreme Court (i) has limited the total reservation under article 16(4) to 50 per cent; (ii) has put certain sectors of employment like teachers, medicines and so on outside the purview of reservation; and (iii) has introduced the economic criterion and held that the so called creamy layer among the backward classes must be excluded from the reservation.
Now, apart from these points, there are several other points. But the present Bill addresses itself only to one question of excluding the filling up of the backlog vacancies from the limit of 50 per cent. Well and good as far as the backlog vacancies are concerned. But this partial response to the legal difficulties have created several other problems. This partial response really makes matters worse. In trying to put the backlog vacancies outside the limit of 50 per cent, you are accepting, and not merely accepting but giving the Constitutional sanctity to this concept of overall 50 per cent limitation. What is the effect?
MR. CHAIRMAN: Please conclude.
SHRI G.M. BANATWALLA : Sir, I will have to explain this point which I am making. I had given two amendments on this particular subject which unfortunately became inadmissible. There is some other amendment which I would like to explain. At the time of moving the amendment, I will not claim the right to speak at that time.
Sir, virtually this Government and this Constitution amendment say that the question of reservation under article 16(4) shall not exceed 50 per cent and then it says that this limit of 50 per cent will not apply to the question of reservation. Look at the Bill. The relevant Clause says that any unfilled vacancies of a particular year shall not be considered together with the vacancies of the year in which they are being filled up for determining the ceiling of 50 per cent of total number of vacancies of that year. Therefore, now this concept of 50 per cent limitation has been for the first time being introduced through this Bill and is being given the necessary Constitutional sanctity. I would say that this is the betrayal of the nation.
If you had come forward with a comprehensive Bill, this difficulty would not have been there. Of course, it is a good thing as far as the backlog is concerned that backlog should not be subject to any restriction or any maximum limit. There is no doubt about it. But, because of the partial response, this particular betrayal of the nation has taken place.
I can read out the Agenda of the NDA Government called the National Agenda for Governance. The relevant clause says that the Government will come forward to protect the extent of reservation in the States. The Prime Minister has assured that several times. I can refer to the statements of the Communications Minister and various other Ministers who have said that the extent of reservation in the States would be protected. Tamil Nadu has 69 per cent of the seats reserved. Similar is the case with other States also. Tamil Nadu passed a Bill on reservation. The Bill was given assent by the President. We have, with the Seventy-sixth Constitution (Amendment) Act, put that Tamil Nadu Act on the Ninth Schedule so that 69 per cent limit for reservation is protected. But, today everything goes down because you are accepting the 50 per cent outer limit to say that this limit will not apply to the backlog vacancies. Of course, you ought to say that the limit would not apply to backlog vacancies. But you ought to have been careful to find out the legal and constitutional formulae not to enshrine the concept of 50 per cent limit with constitutional sanctity. This is a betrayal of the nation.
Even the aspirations of the Scheduled Castes are not being met. What do the Scheduled Castes want? They have said that with the increase in the population, their proportion must increase. You cannot now increase it because you are thinking of a total limit of 50 per cent. So, even the aspirations of the Scheduled Castes have not been met.
Then there is the question of giving reservation to the Muslims. But, if you have accepted 50 per cent as the outer limit, how will you meet the aspirations of the Scheduled Castes for raising their reservation because of the increase in their population and how then will you be able to respond to the aspirations of the Muslims for reservation because the present reservations have already reached the limit of 49.5 per cent? Therefore, these difficulties have arisen.
Then there is the question of the economic criterion. It is alien to the Constitution. I will not go into the entire discussion about this economic criterion. Justice Pandiyan himself in the case said that the economic criterion ought not to apply to article 16(4) of the Constitution. He said certain things; I have got no time to refer to them. Even Justice Sawant has said that the so called forward in the backward class are not competent to compete even with the weakest of the forward class, with the result that the so called creamy layer will remain high and dry - neither here nor there. Even when the so-called creamy layer is included in the backward class reservation, the quotas are not filled up. Therefore, there is need to see that the economic criterion does not apply.
I will not take much of your time because there are others to speak. But, I must say in the end that the aspirations of even the Scheduled Castes and Scheduled Tribes have not been met by this Bill.
These are some unfortunate aspects while moving towards a good objective. If we are being told, "All right, those matters are under consideration and a Constitution (Amendment) Bill will come", then I would say that such an ad hoc attitude towards Constitution and the ad hocism on matters which are constitutional is a very unsatisfactory thing. I would conclude by saying that the reservation policy needs to be fully revived from the punctures that have been made by the Supreme Court. The Government has committed itself to the nation and those commitments will have to be fulfilled. The Muslims are required to be given reservations. Justification is already given in the figures and observations made in the Report of the Gopal Singh High Powered Panel on the Minorities.
With these words, I request the Government to give a fresh thought and see that the various aspects concerning the reservations receive attention and necessary action is taken without any delay whatsoever. These are matters that do require the attention of the Government. Otherwise, I would say that there is a betrayal of the nation in various other aspects.
श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) : सभापति महोदय, मैं आदरणीय डा. बाबा साहेब अम्बेडकर, यहां के सभी सांसद, आदरणीय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी और दलित जनता का आदर करते हुए शिव सेना की तरफ से अपनी राय यहां रखना चाहता हूं। डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा था कि आरक्षण सिर्फ १५ वर्ष तक होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि आप पढि़ये और पढ़कर अपना हक प्राप्त कीजिए। लेकिन आज दुर्भाग्य से सब लोग राजनीति से डरते हैं। अगर किसी में बोलने की हिम्मत हो तो भी वह बोल नहीं पाता। मैं शिव सेना की भूमिका यहां रखना चाहता हूं। …( व्यवधान) मैं शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे जी की बात यहां रखना चाहता हूं। …( व्यवधान) ऐसा कुछ नहीं है। मैंने सुना है, उन्होंने कुछ विरोध नहीं किया। …( व्यवधान) शिव सेना दलितों के खिलाफ नहीं है। जब भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना का राज महाराष्ट्र में था तब ज्यादा से ज्यादा दलित शिव सेना के थे। …( व्यवधान) यह तो मान लीजिए। अगर इनको सचमुच हमदर्दी होगी तो संसद के उच्च स्थान के लिए जब बालयोगी जी ने इलैक्शन लड़वाया था तो आपने विरोध क्यों किया था? तब दलितों का प्यार कहां गया था? एक दलित व्यक्ति उच्च स्थान पर बैठे, उस पर आपको कोई दिलचस्पी नहीं थी। सब राजनीति कर रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि किसी भी जाति, धर्म के आधार पर प्रमोशन या नौकरी नहीं मिलनी चाहिए, गरीबी के आधार पर मिलनी चाहिए। दलित व्यक्ति गरीब भी हो सकता है। मैं सबका सम्मान करते हुए यह बात कहना चाहता हूं।
आदरणीय बहन चौधरी जी यहां नहीं हैं। उन्होंने कहा था कि अगर एस.सी. करके किसी को नौकरी नहीं दी जाती तो उसके ऊपर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अगर किसी दलित महिला के ऊपर अत्याचार हुआ हो तो उसे महिला करके देखा जाना चाहिए और अत्याचार करने वाले पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, यह शिव सेना की भूमिका है। लड़का अपनी मेहनत से पढ़ता है, अपनी बुद्धि खर्च करता है और जब वह पढ़कर नौकरी के लिए जाता है, तो उसे रिजर्वेशन होने के नाते कोई नौकरी नहीं मिलती। यदि किसी के दिल में यह भावना होगी कि मुझे प्रमोशन मिलने वाला है तो मैं काम क्यों करूं, इससे ऐफीशैंसी नष्ट होती है, एडमनिस्ट्रेटिव कैपेसिटी नष्ट होगी।
लोगों के दिलों में यह भावना नहीं होनी चाहिए। उसकी कैपेसिटी होनी चाहिए, उसे अगर उसे प्रमोशन नहीं मिलेगा, उसे नौकरी नहीं मिलेगी तो उसमें अलग भावना पैदा हो सकती है और उससे दंगा हो सकता है, यह बात मैं आपके सामने रखना चाहता हूं। गरीबी को मद्देनजर रखते हुए आरक्षण होना चाहिए और मैरिट एक क्राइटीरिया होना चाहिए, मैं दलित लोगों का आदर करके बोलना चाहता हूं, एस.सी. एस.टी. के लोगों का आदर करके बोलना चाहता हूं कि अगर मैडिकल में जाते हैं या इंजीनियरिंग में एडमीशन लेकर चले जाते हैं, अगर मैरिट के बिना एस.सी. एस.टी के लड़के को एडमीशन मिल जाता है। अगर उसमें बौद्धक कूवत नहीं होती, बौद्धक क्षमता नहीं होती तो बेचारा फेल हो जाता है। मैं उन बच्चों का आदर करता हूं लेकिन इससे जो सीट होती है, वह ऐसे ही निकल जाती है। …( व्यवधान)
श्री प्रकाश यशवंत अम्बेडकर (अकोला) : महाराष्ट्र में कितने बच्चे हैं, यह बता दीजिए, आप दलितों की बात समझा सकते हैं, लेकिन इतना बताइये कि महाराष्ट्र में ओ.बी.सी. के कितने बच्चे मैडीकल और इंजीनियरिंग में हैं। आरक्षण मिलने के बाद भी आज १२ टका रिजर्वेशन भी कम्पलीट नहीं हो सका है। आप क्या बता रहे हैं, आपने सत्ता में रहकर सही करने की बात कही है।
श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) : जब उनकी बारी आयेगी तो अपनी बात वे रख सकते हैं।
श्री प्रकाश यशवंत अम्बेडकर : आपको मैं सही बात बता रहा हूं, आप सत्ता में थे, तब बताइये कितने ओ.बी.सी. के बच्चे वहां पर मैडीकल और इंजीनियरिंग में थे ? वहां वे 12 परसेंट के ऊपर नहीं थे, जिनके बल पर आप सत्ता में आये थे।…( व्यवधान) आप बताइये।
श्री मोहन रावले : महाराष्ट्र में जब हमारा राज था तब उनकी रक्षा की गई है। हमारे राज में उनकी रक्षा की गई है। हमारी पार्टी शिवसेना की भूमिका मैं यहां रखना चाहता हूं।
सभापति महोदय : बोलने में बाधा नहीं डालें।
श्री मोहन रावले : अभी मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, नहीं तो मैं बता सकता था। हमारी भूतपूर्व सरकार से लाकर मैं आंकड़े बता सकता हूं। अभी मेरे पास आंकड़े कैसे हो सकते हैं। लेकिन मुझे इतना पता है कि हमारे राज में इनकी रक्षा की गई, इनका सम्मान किया गया। मैंने बार-बार आपको लिखकर दिया था कि हमारी पार्टी की मीटिंग है, इसलिए मैंने रिक्वैस्ट की कि मुझे बाहर जाने की अनुमति दें। सात बजे से हमारी मीटिंग शुरू हो गई है, इसलिए मैं ज्यादा बात रखना नहीं चाहता। जो बैकलॉग है, वह बैकलॉग गरीबी के आधार पर भरना चाहिए। गरीब गरीब होता है, उसके सामने पेट का सवाल होता है। अमीर और गरीब, ये दो जाति इस देश में गिनी जानी चाहिए, वह काउंट करनी चाहिए तो सब को न्याय मिल सकता है। डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने तो कहा था कि पढ़कर आप अपना हक प्राप्त कर लो। अगर आप सही मायने में बाबा साहेब अम्बेडकर का सम्मान करते हो तो उन्होंने क्या यह कहा था कि भीख मांगो या लाचार हो ? उनकी ऐसी भावना नहीं थी। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं। जिस क्षेत्र से बाबा साहेब अम्बेडकर ने चुनाव लड़ा था, उसी क्षेत्र से मैं चुनकर आया हूं। उस वक्त इन कांग्रेस वालों ने मेरा विरोध किया था। जो बाबा साहेब अम्बेडकर इतने महान थे, मैं कहता हूं कि उनको भारत रत्न से बढ़कर पदवी दी जानी चाहिए, यह मेरी भावना है।
आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसलिए मैं आपका आभार प्रकट करना चाहता हूं।
श्री जोवाकिम बखला (अलीपुरद्वारस) : माननीय सभापति महोदय, आपने मुजे इस चर्चा में भाग लेने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
आरक्षण सम्बन्धी संशोधन विधेयक, जो चर्चा के रूप में लाया गया है, यह विधेयक चूंकि लाया गया है, इसलिए मैं हमारी पार्टी आर.एस.पी. की ओर से इसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं जानता हूं कि बहुत दिनों से हमारे माननीय सासदगण एस.सी. एस.टी. फोरम के माध्यम से इस सरकार का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते रहे, ज्ञापन दिये गये, आन्दोलन किये गये, तब अन्त में यह संशोधन विदेयक इस सदन में लाया गया, इसलिए स्वाभाविक रूप से मैं इसका समर्थन करना चाहता हूं। विशेषकर कार्मिक एवं प्रशासनिक विभाग के जो पांच आदेश प्रस्तुत किये गये हैं, जिन आदेशों के कारण अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को सेवा में पदोन्नति मिलनी चाहिए थी, सेवा में भर्ती होने के बाद जो मौका प्रदान करना चाहिए था, यह प्रावधान रहते हुए भी उसमें रोक लगा दी गई थी। व्याख्या दी गई कि उच्चतम न्यायालय को निर्देश है। न्यायपालिका को सामने रख कर इस तरह के कारनामे किए गए। मैं बड़े दुखी मन से यह कहना चाहता हूं कि यह जो समय बर्बाद हुआ, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के इन आदेशों के इश्यू होने के कारण जिनको पदोन्नति नहीं मिली, जो बैकलॉग था वह पूरा नहीं हुआ। इसके पूरा न होने की वजह से हमारे देश के अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के जो नवयुवक थे, उनको नौकरी नहीं मिली। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, मैं इसमें बहस नहीं करना चाहता। हम लोग हालांकि जानते हैं कि यह सदन सर्वोपरि है, व्यवहार में देखा गया है कि बार-बार कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने न्यायपालिका को सामने लाकर न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने का मौका दिया है।
सभापति महोदय, मैं पूछना चाहता हूं आपके माध्यम से सरकार से कि क्या न्यायपालिका का हस्तक्षेप आरक्षण में होना चाहिए था, अगर नहीं होना चाहिए था तो यह संविधान विधेयक इसके पहले क्यों नहीं लाया गया। अनुसूचित जाति और जनजाति के बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। अगर इस बेरोजगारी को हटाना है, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को मुख्य धारा में लाना है तो जो बैकलॉग है, उसे यथाशीघ्र पूरा करने की आवश्यकता है।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से जानना चाहूंगा कि यह जो संशोधन विधेयक यहां लाया गया है, यह विधेयक पारित होने के बाद क्या आप कोई समय सीमा निर्धारित करेंगे कि उसके अंदर इस बैकलॉग को पूरा करने की कोशिश सरकार करेगी ? मैं जानता हूं कि जो आदेश दिया गया है, जो कार्यालय ज्ञापन दिया गया है उनका न्यायपालिका के माध्यम से सरासर अन्याय हुआ है। सदन के द्वारा ऐसा कानून बनाना चाहिए ताकि न्यायपालिका भविष्य में आरक्षण के मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप न कर सके।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देता हूं और अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।
श्री पुन्नू लाल मोहले (बिलासपुर) : सभापति महोदय, मैं आरक्षण से सम्बन्धित इस विधेयक का समर्थन करता हूं। मैं आपका ध्यान मध्य प्रदेश की विधान सभा की ओर दिलाना चाहता हूं। १९८५ से १९९५ तक जब मैं वहां विधायक था तो वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। मुझे अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण समति का सभापति बनाया गया था। मैंने अपने कार्यकाल के दौरान देखा कि जो रिक्तियां थी, सामान्य प्रशासन से मंगाई जाती थीं। रिक्त पदों के बारे में सामान्य प्रशासन के सचिवों द्वारा समय पर उपलब्ध नहीं कराया जाता था। उन्हें बार-बार बाध्य किया जाता, सभा के समय उन्हें इंगित करने पर वे समय मांगते। ऐसी परिस्थिति में हम कहते कि जब आरक्षण के पदों की पूर्ति के लिए जो रिक्त पद हैं, वे समय पर नहीं दिए जा सके तो फिर १०-१५ वर्षों के कार्यकाल में उन पदों की पूर्ति सम्भव नहीं।
रिक्त पदों की जानकारी नहीं दी जाती है। ऐसी परिस्थिति में हम नहीं समझते हैं कि वहां रिक्त पदों की पूर्ति होगी। इन बिन्दुओं पर जब हम लोग उनको इंगित करते हैं, तो पता चलता है कि रिक्त पदों की पूर्ति के लिए प्रक्रिया बनी, विज्ञापन दिया गया, कैंडिडेट्स आए, लेकिन योग्य नहीं पाए गए। इसके अलावा अगर योग्य पाए गए, तो उनको समय पर प्रमाण-पत्र नहीं दिया गया। साथ ही समय पर उनकी उपस्थिति, अगर पास हो गए, तो लिस्ट में उनका नाम दर्ज न होने के कारण उन्हें नौकरी में नहीं लिया गया। इन परिस्थितियों के देखते हुए, मैं यह कहना चाहूंगा कि १९९७ में कानून लागू कर दिया गया, लेकिन क्या यह दूसरे लोगों पर भी लागू किया गया। यह दूसरी बात है, अगर ये पचास प्रतिशत से ज्यादा होते हैं, तो ऐसी परिस्थिति में सभी पदों को रोकना जायज होता है। इन पदों की पूर्ति की संभावनाओं पर विचार करते हुए, संशोधन लाया गया कि पचास प्रतिशत से ज्यादा हों, तो ऐसी स्थिति हो सकती है। क्या इसके लिए नियम-प्रक्रिया की आवश्यकता है। यदि कोई व्यक्ति कपड़ा खरीदने जाता है, तो उसकी कितने दिन की गारन्टी है। इसलिए नौकरियों में प्रवेश के लिए, पदो की पूर्ति के लिए, ऐसे कानून की आवश्यकता है, जिसमें समय सीमा की गारन्टी हो। इसलिए हम केन्द्रीय सरकार से मांग करना चाहेंगे कि सभी राज्य सरकारों को पूछा जाए कि कितने पद रिक्त हैं और इन पदों की पूर्ति कब होगी ? मैं आपको मध्य प्रदेश का ही एक और उदाहरण देना चाहता हूं। वहां एक वर्ष में १६ हजार पदों को मध्य प्रदेश की सरकार ने समाप्त कर दिया। इन पदों में कितने पद अनुसूचित जाति के होंगे, कितने पद पिछड़े वर्ग के होंगे, इसकी जिम्मेदारी क्या वहां की सरकार की नहीं है। मैं चाहता हूं कि सरकार इस बारे में कमेटी बनाकर एन्क्वायरी कराए। क्या ऐसे पदों की पूर्ति के लिए सरकार कोई कानून बनाना चाहती है। मैं यह भी कहना चाहता हूं, एक साल के अन्दर जितने प्रमोशन की वजह से पद खाली हुए हैं, उनकी पूर्ति कैसे होगी। साथ ही जो अधिकारी या कर्मचारी विभागीय भर्ती करते हैं, उनके ऊपर नियम लागू किया जाए और साथ ही साल भर या छ: महीने की सीमा बनाई जाए और इस सीमा में जो अधिकारी रिक्त पदों की भर्ती नहीं करते हैं, उन्हें सजा दी जाए या ससपैंड किया जाए या टर्मिनेट किया जाए, तब जाकर उनको पता चलेगा। केवल कानून बनाने से कुछ नहीं होता है, क्योंकि अमल करने वाले दूसरे लोग हैं। लोक सभा में तो कानून पारित कर दिया गया, क्या राज्य सरकार उसको मानने के लिए बाध्य है ? क्या केन्द्रीय सरकार इस दिशा में कोई मोनिटरिंग कराएगी ? इन सब बिन्दुओं पर हम चर्चा में भाग ले रहे हैं, क्या इसमें जनप्रतनधियों की भागीदारी होना आवश्यक है, क्या राज्य सरकार की भागीदारी होना आवश्यक है, क्या अधिकारियों की भागीदारी होना आवश्यक है, इन परिस्थितियों पर हमें विचार करने की आवश्यकता है।
महोदय, हमें एक दूसरे पहलू की ओर भी देखना चाहिए। बैंकिंग सेवाओं, सैनिक प्रशास, एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइन्स, को-आपरेटिव्स, सोसायटीज और प्राइवेट उद्योगों में आरक्षित पदों की पूर्ति के बारे में भी सोचना चाहिए। हमारे एक भाई ने आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण की बात कही, मैं कहना चाहता हूं कि यह स्थिति भी क्या आरक्षण पर लागू होगी, सामान्य वर्ग पर भी लागू होनी चाहिए। यह स्थिति अनुसूचित जाति और जनजाति व पिछड़े वर्ग पर ही लागू हो, बड़े लोगों पर लागू नहीं होनी चाहिए। सभी लोगों पर लागू होनी चाहिए, क्योंकि सभी लोग नौकरी के लिए पात्रता रखते हैं। सभी सदस्य आरक्षण नियम पर बोल रहे हैं, इस वर्ग की बात कह रहे हैं, लेकिन उनको भी अपने आपमें झांक कर देखना चाहिए कि क्या वे लोग ऐसा नहीं करते हैं। अपने विचारों को यहां रखने के लिए सिर्फ वे इस तरह की बात कहते हैं।
22.00 hrs. यह बात शायद हमारे गले तक नहीं उतरती। मैं इन बातों को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार से मांग करूंगा, भविष्य में इस तरह और भी प्रमोशन के बिल आने वाले हैं, अच्छा होता अगर दोनों बिल एक साथ आते। प्रमोशन के मामले में बाध्यता की गई है, प्रमोशन के मामले में बाध्यता करने से हमारे जो प्रमोशन के पात्र अधिकारी और कर्मचारी हैं उनकी डिमोशऩ हो चुकी है उनकी जगह अन्य लोग प्रमोशन पा चुके हैं। जब ऐसा विधेयक आएगा तो क्या उस समय हमारे जो अनुसूचित जाति, जनजाति या पिछड़े वर्ग के लोग प्रमोशन के पात्र हैं, उन्हें इसमें प्राथमिकता दी जाएगी, यह चिन्तनीय विषय है। इस विषय को भी जोड़ा जाए, जिससे सामान्य वर्ग में, पिछङे वर्ग और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों में टकराव की स्थिति न आए। इसके लिए कोई ऐसी प्रक्रिया बननी चाहिए, जिससे लोगों में सामंजस्य स्थापित हो और वे आगे बढ़ें। इतना ही कह कर मैं इस बिल का समर्थन करता हूं।
2201 hours (SHRI P.H. Pandiyan in the Chair) SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): Sir, the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes have now become a matter of issue between a chessboard and an ideological battle between the Supreme Court’s various Benches that have been coming. In fact, as far back as in 1963, a decision was given regarding the word ‘appointment’ which included promotion also. This decision was overruled in the Mandal Commission case. Today, to overcome that decision, we have again amended the Constitution and added article 16(4A). The hon. Minister of Law, while intervening, had mentioned that this matter is still pending before the Supreme Court. I do agree with it. But at the same time, this article has been referred to right from 1963 in Mr. Balaji versus the State of Mysore in which the decision has been of the Supreme Court that these are enabling provisions. Since they are enabling provisions, they do not confer the Fundamental Rights. This decision was reaffirmed in the revision case of Ajit Singh versus the Union Government of India as late as in 1999 wherein they have said that the amended article 16(4A) neither creates a right in favour of the Scheduled Castes nor does it cast a duty upon the Central Government to give them the benefits of what they are giving. This is the kind of analogy which has been followed by the Supreme Court right from 1963.
I will not take a long time. The matter is now being referred to by the Constitution (Amendment) Bill, I think, clause (4B) to article 16. I would like to refer to one of the memoranda that was issued by the Government of India. The memorandum says that for the purpose of determining the ceiling of 50 per cent of reservation, the reservations against vacancies and backlog vacancies are to be treated as two different groups. It was also laid down that the instructions to the effect that not more than 50 per cent of vacancies could be reserved for Scheduled Castes and Scheduled Tribes, the physically handicapped would apply in respect of current vacancies only arising in the year and would not apply to cases of backlog vacancies reserved for Scheduled Castes and Scheduled Tribes which would continue to be fulfilled without any restriction. This was the gist of the Official Memorandum that was issued on 25th April, 1989.
This Official Memorandum was again a subject of discussion in the Mandal Commission case wherein the following ruling has been given:
"The Supreme Court in its judgement, in the case of Indra Sawhney Vs. Union of India validated the carry forward rule under which reservations are carried forward for year to year. "
This is most important.
"However, while doing so, the Court also directed that the application of this rule, in whatever manner it was operated, should not be in a breach of 50 per cent of the rule. In other words, the judgement laid down that the number of vacancies to be filled on the basis of reservation in the year, including carry forward and direct recruitment, should not be more than 50 per cent."
Sir, this is already a judgement which has been given by the hon. Supreme Court. May I ask the hon. Law Minister what new has been added, to the constitutional amendment that is being made over here by Clause 4(b) to what was already there in the 24th April 1989 Official Memorandum? The same thing is being copied again and being put forward as the constitutional amendment which he is bringing about when only the courts have ruled. They have already given an opinion that these are only enabling provisions and these enabling provisions do not create any right nor do they create a duty upon the Government to give them reservation. May I know from the hon. Minister in what manner are they going to protect the whole system of reservation?
Sir, there is another aspect in which this whole thing has to be looked into.
THE MINISTER OF LAW, JUSTICE AND COMPANY AFFAIRS (SHRI RAM JETHMALANI): I wish I could ask him some questions.
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): He is welcome.
As far as this issue of reservation goes, the rulings that have been given by the hon. Supreme Court, they have never treated reservation as a fundamental right. They have already made this an exception and this exception they have made saying that this is a discretion. It is now a duty cast upon the Government that if this reservation has to be protected, then instead of making this reservation as a sub-Clause, it should become a main Clause. Then I think, the Supreme Court will not have a chance to interpret in the way in which it is interpreting it. Unless this is done, I do not feel that even this amendment which is being carried out, will protect the rights of the people. It is only with the intention, as the hon. Minister has said, that we have given a commitment to the people at large who are affected by reservation. It is only with that intention that is being carried out. I may inform the House that till today when we talk of atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes, it was a class of common man. The class with which we are dealing today is a class which is the opinion making class in the country. It understands its rights; it understands its duties; it understands what the Government""s intentions are and if this constitutional amendment does not satisfy it then let me inform the House that we are not able to control this 12 per cent of the society even after the demolition of Babri Masjid. We are still not able to control it.
Neither we have addressed that issue nor have we sought anything to be addressed. We are bringing another interest into this country.
It is only when the opinion-making class of each community gets disturbed, then they think in different terms of getting their own security. Sir, I wish that the hon. Minister would satisfy -- when there is already a ruling of the Supreme Court, as I mentioned in the Revision Application on Article 16 (4A), wherein they said that it was just an enabling provision -- as to how this enabling provision can protect the rights of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes.
Sir, let me come to the other aspect of the whole issue.
MR. CHAIRMAN : Kindly conclude. There are ten more Members who would like to speak on this Bill.
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : I will take just one more minute.
There is another issue. What are we testing here? … (Interruptions)
SHRI RAM JETHMALANI: Are you supporting this Bill?
SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : After listening to you, I will decide. … (Interruptions)
SHRI RAM JETHMALANI: Thank God! SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR : There is another issue. What really are we testing? People talk of merits. What are we really testing in this country? Are we testing his mugging power or are we testing his intelligence? Sir, according to me, what we are testing is that we are testing his mugging power and we are not testing his intelligence at all. Therefore, this point also should be made clear that in a system where mugging is tested and not the intelligence, the question of reservation and the question of bias against these people have to be taken into account.
With these words, I conclude my speech.
श्री राम सिंह राठवा (छोटा उदयपुर) : आदरणीय सभापति महोदय, संविधान संशोधन विधेयक २००० के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। वैसे बहुत सारी बातें हमारे सम्माननीय सदस्यों ने कही हैं। आफिस में वरिष्ठ अधिकारी हरिजनों, आदिवासियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोगों को तंग करके मनमानी करते हैं। मुझे लगता है कि इस बिल के आने के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को न्याय मिलेगा।
मुझे एक अनुभव हुआ। मेरे एक सहध्यायी ने कालेज में एडमिशन ली। वह ग्रेजुएशन तक स्कॉलर रहा। वह जब ग्रेजुएशन में पास हुआ तो फस्र्ट क्लास लिया। पोस्ट ग्रेजुएशन में फस्र्ट क्लास लिया। जब उसी यूनिवर्सिटी में आरक्षित जगह के लिए विज्ञापन निकला तो मेरे उसी मित्र का इंटरव्यू हुआ। उसे कहा गया कि वह कैपेबल नहीं है। इस तरह पहली बार उसे पोस्ट से निकाल दिया। दूसरी बार उसी जगह के लिए विज्ञापन निकला। फिर से वही लड़का आया। फिर यही बहाना बनाया कि आप कैपेबल नहीं हैं। तीसरी बार हुआ तो फिर कहा गया कि आप ठीक नहीं है। जो यूनिवर्सिटी में स्कॉलर रहा है, फस्र्ट क्लास पास है, पोस्ट ग्रेजुएशन में पास होते हुए भी उसे पोस्ट के लिए लड़ना पड़ता है।
आज तक जो हुआ है या जो इस तरह की जितनी भी जगहें थीं, बहानेबाज़ी करके उन्हें भरा नहीं गया। मैं मानता हूं कि ऐसी जितनी भी आरक्षित जगहें हैं, उन्हें भरने के लिये हमारे कानून मंत्री एक विधेयक लेकर आयेगे। हालांकि यहां कई माननीय सदस्यों ने अपने सुझाव दिये हैं, मेरे द्वारा दिये गये सुझावों पर यह सरकार विचार करेगी। मैं इस विधेयक का समर्थन करते हुये अपनी बात समाप्त करता हूं।
(इति) SHRI BIR SINGH MAHATO (PURULIA): Mr. Chairman, Sir, I rise to support this Constitution (Eighty-first Amendment) Act, 2000. This Amendment helps the States to fill up the backlog of vacancies and to hold Special Recruitment Drives.
Previously, the Government had undertaken Special Recruitment Drives for filling up the backlog slots from 1990 to 1996. That process had to be stopped following the DoPT’s OM of 29th August, 1997. This Amendment enables the States to restore the position as was prevalent before 29th August, 1997.
Sir, 75 per cent of the Dalit population lives in the rural areas. Among them, 50 per cent are landless agricultural labourers and the remaining 25 per cent lives in the urban areas. The majority of them are employed as contract labourers or organised labourers. Out of the total 138 million Dalit population, a mere 0.8 per cent is employed in the Government service and the PSUs. A large number of Tribal people are living in the forest areas. They transform barren lands into cultivable lands but the land records are not in their names. Therefore, there is a need to review the National Forest Policy for giving right to the Vanavasi people. Due to the defect in implementing the policy, the benefits are limited only to the thousand families of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes but there are crores of families who do not reap the benefits of the reservation quota. Therefore, an independent body should be formed so that on the basis of our experience over the last 50 years, the most oppressed and the depressed sections who were not getting the benefits during the last 50 years, should also get the benefit. Some mechanism should be found.
In the case of OBCs, the Supreme Court has emphasised on the creamy layer. In the case of Scheduled Castes and Scheduled Tribes also, this system should be employed so that the thousands of crores of unemployed Scheduled Caste and Scheduled Tribe youths would get the benefits.
There are also other aspects. The country needs land reforms, development in all other fields and promotional measures to emancipate all those people who are living below the poverty line. Therefore, a comprehensive Bill is needed for the development of the country.
( ends ) श्री मानसिंह पटेल (मांडवी) : माननीय अध्यक्ष जी, सदन में संविधान संशोधन करने के लिए जो विधेयक लाया गया है, मैं उसका समर्थन करता हूं और हमारे विद्वान कानून मंत्री माननीय जेठमलानी जी और वसुन्धरा राजे जी को धन्यवाद देता हूं।
वैसे तो आज़ादी मिलने के समय हमारे महान विद्वानों ने सोचा होगा कि स्वराष्ट्र के पिछड़े हुए लोग, अनुसूचित जाति और जनजाति तथा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का विकास आरक्षण के जरिए दस सालों में हो जाएगा और इतने समय में उनकी आर्थिक नीतियों से उनका बौद्धिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास हो जाएगा, लेकिन उसके बाद दस साल की अवधि बढ़ाते बढ़ाते ४० साल के बाद भी, १३वीं लोक सभा में इस सरकार ने और दस साल के लिए आरक्षण बढ़ा दिया। मैं समझता हूं कि चार बार अवधि बढ़ाने की यह वजह थी कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों का विकास हम नहीं कर पाए। १३वीं लोक सभा में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली गठबंधन की सरकार ने इस आरक्षण को दस साल के लिए और बढ़ाया और साथ में सम्प्रति में सांपत समय न्यायालयों ने जो जजमेंट दिया, उसकी वजह से इस देश के कई लोगों को, आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों को नौकरियों में बढोतरियो में और बैकलॉग में नुकसान पहुंचा। यह सब नुकसान सालों से होता रहा है। वह किस तरह से बंद किया जाए, इसी के लिए यह संशोधन पेश किया गया है। हम इसकी व्यवस्था करेंगे, खामियां दूर करेगें ऐसा वायदा हमारे प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के एम.पीज़ के सम्मेलन में कहा था।
इस राष्ट्र के पिछड़े हुए लोगों को संदेश दिया था कि इन जातियों के लिए आरक्षण बढ़ाने के साथ-साथ जो नुकसान हो रहा है, वह बन्द होना चाहिए। इसलिए आज जो विधेयक आया है उससे लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की पहले जो टीका हो रही थी कि यह तो सवर्णों की पार्टी है और इसमें आदिवासी व हरिजनों का कोई स्थान नहीं है, वह टीका गलत साबित हुई और इस विधेयक से शुरूआत हुई है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पिछड़े हुए लोगों को किस तरह से आर्थिक क्षेत्र में, शैक्षणिक क्षेत्र में बढ़ावा दिया जाए। यह विधेयक विद्वान कानून मंत्री लाए हैं। मैं समझता हूं कि वे इस कानून को इस प्रकार से समृद्ध करेंगे जिससे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग लाभान्वित होंगे और उन्हें आरक्षण मिलेगा।
सभापति महोदय, अन्त में, मैं फिर देश के कानून मंत्री एवं प्रधान मंत्री जी को इस संविधान संशोधन विधेयक को लाने के लिए धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं और आपका बहुत-बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।
SHRI PRAVIN RASHTRAPAL (PATAN): Sir, I will be clearing certain confusions created by the hon. Members during the course of the debate on reservation which is a fundamental right of dalits in this country.
The House must know that reservation came into being on account of a Pact signed by Dr. B.R. Ambedkar on the one side and Mahatma Gandhi on the other side in the year 1932 when Mahatma Gandhi was in Yeravada jail. Dr. Ambedkar had demanded separate electorate. The Father of the Nation went on fast. He wanted that the demand of separate electorate by Dr. Ambedkar should be withdrawn. In the initial stage, Dr. Ambedkar refused. The life of the Father of Nation was in risk. There were requests made by all freedom fighters of this country, including Pandit Jawahar Lal Nehru, Pandit Madan Mohan Malviya, Dr. Rajendra Prasad and all other great leaders of this country. Dr. Ambedkar bowed down to their requests just to save the life of Mahatma Gandhi. A Pact was signed between two nationalities. On the one side, it was dalit nationalities – we were 7 crores in those days, today we are 25 crores, the biggest minority in the world—and on the other side, it was non-dalit nationalities headed by Mahatma Gandhi. The scheme was introduced in that year. What was the scheme? The scheme was political reservation with time-limit.
My hon. Members of Parliament also do not know that there is no time-limit for reservation in services. Time-limit is there only in political reservations in Parliament and State Assemblies. As far as relaxation in Government services under article 335, as protected by articles 15, 16, 16(4) and 16(4) (a) is concerned, there is no time-limit for the relaxation granted in reservation in Government services and the relaxation granted for the educational benefits. This scheme came in 1950, when Dr. Ambedkar got an opportunity to frame the Constitution of India. So, it was specifically put by article 335.
Now, the words used in article 335 is `adequate representation’ will be granted. The Constitution has never laid down percentage. The percentage was introduced by the Executive, namely, bureaucracy. Parliament was never taken into confidence. I want to know as to who decided the percentage that there should be a reservation of 15 per cent for Scheduled Castes and seven or eight per cent for Scheduled Tribes.
Whenever the population is increasing, the reservation is increased. That proves that the Supreme Court of this country has no power to fix percentage; percentage can be decided only by the Indian Parliament. Shri Jethmalani, the hon. Minister is present here. I want his specific view on this. I also want to know from him, what was the case of Indira Sawhney. Reservation for Scheduled Castes is one thing, reservation for Scheduled Tribes is another thing, reservation for Anglo-Indians is third thing and reservation of OBCs is fourth thing. Reservation for OBCs came only because of Mandal Commission. Indira Sawhney approached the Supreme Court not against the reservation for Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The petitioner was not the affected party. It was a Public Interest Litigation by an advocate. She was neither a Government employee nor a public servant. However, the petition was welcomed by the Supreme Court. The Supreme Court has no business to talk about fixing the ceiling on reservation for Scheduled Castes/Scheduled Tribes because the petitioner has never asked relief on that count. The protest was against reservation for OBCs. As a result, we, the 25 crore people belonging to Scheduled Castes and Scheduled Tribes are not accepting the Supreme Court judgement, fixing the limit of 50 per cent. Tomorrow, my population will be 20 per cent and the Scheduled Tribes population will be 15 per cent. The OBCs population is already 54 per cent. It is brought to 27 per cent only because of this incorrect judgement by the Indian Supreme Court. I want to know from the learned jurist, Shri Jethmalani, can the Supreme Court fix the percentage as fifty? Is the Supreme Court above the Indian Parliament? … (Interruptions)
SHRI RAM JETHMALANI: Will you kindly yield for a second? I want to tell you my position since you have asked that question:
"Mr. Jethmalani is strongly articulated that the observation in Balaji that reservation under article 16(4) should not be beyond 50 per cent, is an arbiter dictum and it is not law declared. Therefore, according to him, this observation should not be followed by any court. He continued to state that unfortunately some of the subsequent decisions have mistakenly held as if the question of permissible limit has been settled in Balaji while, in fact, the view expressed was only arbiter dictum."
"According to him, the policy of reservation is in the nature of affirmative action, firstly, to eliminate the past inhuman discrimination and, secondly, to ameliorate the sufferings and reverse the genetic damage, so that the people belonging to upward classes can be uplifted. When this is the main objective of clause (4) of article 16, any limitation on reservation would defeat the very purpose of this article falling under the Fundamental Rights and, therefore, reservation, if the circumstances so warrant, can go even to 100 per cent."
This is Jethmalani’s view and this view was opposed by the lawyers appearing for your people on that side. I have failed, they have succeeded. I do not want to raise these political contentions. Therefore, do not pour salt over raw wounds.
SHRI PRAVIN RASHTRAPAL (PATAN): Thank you very much. I wanted this to come on record. I want that this should be followed by the Government of India, particularly by the Department of Personnel, which is bent upon damaging the constitutional rights of the Dalits. Today, we are talking only of five DoPT Circulars.
SHRI RAM JETHMALANI: I admire people who are concerned with the Scheduled Castes, but I hate crocodile tears.
SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : I am not shedding crocodile tears.
SHRI RAM JETHMALANI: I am not talking about you.
SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Thank you very much for the clarification. I want that the view expressed by hon. Shri Jethmalani should be the view of the Government of India. The Prime Minister has assured this Parliament on three occasions - in the previous Lok Sabha on 5th December and 22nd December, and at the time of the Dalit sammelan on 5th April – that he will see that all disabilities arising out of the five DoPT Circulars will be undone by bringing suitable amendments. Today we are bringing only part of the amendments. So, I am requesting the hon. DoPT Minister that let there be a comprehensive Bill.
I also submit that I have introduced Bill Nos. 14, 24 and 29 in this House. I will request the hon. Minister of Law and Justice also to kindly refer to my Bills, Bill Nos. 14, 24 and 29 along with the Bill introduced by Shri Sushil Kumar Shinde and other colleagues.
I am coming to my final suggestion. Here we are talking about five circulars of DOPT. I have got a sixth circular issued by the DOPT on 9.10.1999. I would draw the attention of the hon. Minister of Personnel in particular. The DOPT’s Circular no. 14014/6/94 dated 9.10.1999 was the sixth circular issued by the DOPT, Government of India against the interests of the S.C. and S.T. It is very serious as compared to the other five. The DOPT has introduced caste system from the backdoor while deciding the policy of compassionate recruitment in Government Departments. The DOPT Circular says that when a man belonging to the Scheduled Caste or the Scheduled Tribe dies, his child can be recruited only if there is a vacancy of Scheduled Caste in the roster. I am reading the operative part of that Circular of DOPT It says :
"Compassionate appointment can be made upto a maximum of 5 per cent vacancies falling under direct recruitment…"
So, there is a ceiling of 5 per cent. You cannot make recruitment more than 5 per cent. This is very important. I want the attention of both the hon. Ministers. It says :
"…in any Group ‘C’ or ‘D’ post."
That means they will give jobs only in Groups ‘C’ and ‘D’. The circular says:
"The appointing authority may hold back upto 5 per cent of vacancies in the aforesaid categories to be filled by direct recruitment through Staff Selection Commission or otherwise so as to fill such vacancies by appointment on compassionate grounds. A person selected for appointment on compassionate grounds should be adjusted in the recruitment roster against the appropriate category, namely S.C./S.T./O.B.C./General depending upon the category to which he belongs."
According to the Hindu mythology, I get caste on my birth. Once I die, I do not belong to any caste. I am extremely sorry that the Government of India is not aware of this Circular issued by the Department of Personnel. You cannot introduce caste system for compassionate appointment. When Mr. ‘A’ dies, he dies in harness. The economic criteria should be taken as to what is the pension his family is getting, what is the size of the family etc. If a man dies, and he belonged to a poor class and he had five children, of whom two are Matriculates, one is a Graduate, at least one of them should be recruited. He need not wait for the vacancy in the post-based roster.
Now, I am coming to that problem of post-based roster also. It is inter-connected. I will not take much of your time. Then I will complete my speech.
I want that the Government of India should decide that when they switch over from vacancy-based roster to post-based roster, on that day all backlog vacancies should be filled in first. If you do not fill up all backlog vacancies, the Government of India cannot switch over from vacancy-based roster to post-based roster. That is my suggestion.
Finally, I will request that articles 15 and 16 are within the Chapter covering fundamental rights and hence constitutional rights cannot be challenged. It should go in all schemes of reservations. This may kindly be taken to the Ninth Schedule. Let there be a Reservation Act. At least the State Governments of Kerala and Orissa, according to my information, have got the Reservation Acts. . The Central Government should incorporate all items pertaining to reservation for Scheduled Castes and Scheduled Tribes in one Act and judiciary should not be allowed to touch it if these items are included in the Ninth Schedule.
Vacancy-based roster should be restored. Seniority from the date of appointment should be there. This is a very simple principle all over the world that the seniority should be from the date of appointment. Reservation in higher education must continue. The rule of 50 per cent cannot be applied to the backlog vacancies.
What the hon. Member Shri G.M. Banatwalla has pointed out is totally right. If this amendment is passed as it is, it means that the Government of India is accepting the 50 per cent limit. I would request the hon. Minister of Law and Justice to look into that aspect and suitably amend the Reservation Act.
Even if this amendment is passed, what will happen to the posts already not filled by the Government of India on account of DoPT circular issued in the year 1997 till the date of this amendment. I want a categorical reply on this count.
I am supporting this Bill only because it is only 10 per cent relief. The DoPT Circular has done one hundred per cent damage to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. I once again ask the Government of India that as assured by the Prime Minister, why the Government of India is not bringing a comprehensive Bill restoring seniority, restoring relaxation in promotion, restoring relaxation in higher education, particularly, in MBBS and all technical courses. I would request the hon. Minister of Law and Justice to do the needful.
Finally, I would request the hon. Minister to refer to the Office Memorandum issued by the Ministry of Social Justice and Empowerment on 25.1.2000. This is an Office Memorandum wherein a draft prepared by the Convention of Members of Parliament is circulated. The draft is signed by Shri K.H. Muniappa, Shri Ram Vilas Paswan, Shri Karia Munda, Shri Ratilal K. Verma, Kumari Mayawati, Shri Amar Roy Pradhan, Shri Dilip Singh Bhuria and myself. We were the members. It is circulated to all the Ministries. I want to know from all the Ministers what action they have taken after the receipt of this Circular. The DoPT itself was required to take certain action. The Ministry of Law & Justice was also required to take certain action. The circular was issued in the month of January, 2000 and we are in the month of May now. No action has been taken by any Department on the circular issued by the Ministry of Social Justice and Empowerment. So, I would request that all the Government Departments may be directed to implement the Circular and take necessary action on that count.
Thank you very much.
श्री वीरेन्द्र कुमार (सागर) : सभापति महोदय, मैं संविधान के ८१वें संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।
हमारे समाज के शोषित, पीड़ित और उपेक्षित समाज तथा अनुसूचित जाति और जनजाति के बन्धुओं के साथ, जो सदियों से अन्याय का शिकार होते आए हैं, २७ अगस्त, १९९७ को सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के द्वारा पुन: एक अन्याय के शिकार हुए। इस अन्याय के खिलाफ तब ले लेकर आज तक लगातार आवाज उठाई जाती रही है, लेकिन जिस द्ृढ़ इच्छा और संकल्पशक्ति के साथ भारतीय जनता पार्टी इस विधेयक को लाई व सदन के सभी माननीय सदस्यों ने और विपक्ष के माननीय सदस्यों ने भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हमारे समाज के इन बन्धुओं को न्याय दिलाने के लिए जिस एकजुटता का परिचय दिया, वह भी अपने आपमें काफी प्रशंसनीय है। वास्तव में हमारे समाज के इन बन्धुओं के लिए आरक्षण की सुविधा का लाभ जिस भावना को लेकर दिया गया था, यह सुविधा प्रदान की गई थी, आजादी के ५१ वर्षों के पश्चात भी हमारा वह समाज, जब हम अपने शहरों में या गांवों में देखते हैं कि इस समाज के बन्धु दूरस्थ गंदी बस्तियों में और मौहल्लों में आज भी जिस प्रकार से रह रहे हैं, हमारे देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा, अनुसूचित जाति के बन्धु, इन मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। रोजगार कार्यालयों में अनुसूचित जाति और जनजाति के जब विद्यार्थी जाते हैं, वहां पंजीयन कराते हैं तो उनको कभी समय पर नहीं बुलाया जाता है, उनको इंटरव्यू के लिए सूचना नहीं दी जाती है। प्रमोशन में भी जो हमारे अनुसूचित जाति व जनजाति के बन्धु सर्विस कर रहे हैं, जब उनके प्रमोशन का समय आता है तो उनकी सी.आर. खराब कर दी जाती है, उनकी कान्फीडैन्श्यल रिपोर्टों को तरह-तरह से खराब करके यह कोशिश की जाती है कि उनको प्रमोशन की सुविधा का लाभ न मिल पाये और वे अपने स्थान पर बने रहें। उनको प्रमोशन के लाभ से वंचित रखा जाता है। आज भी हम देखते हैं कि यद्यपि हमारा देश आगे बढ़ रहा है, ५० वर्षों में हम काफी आगे बढ़े, लेकिन जब हम अपने अनुसूचित जाति और जनजाति के बन्धुओं के विकास पर अगर द्ृष्टि डालते हैं तो जहां हमारा देश आज बहुत आगे बढ़ा है, वहीं उस विकास की तुलना में हमारे देश की आबादी का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अपनी सुविधाओं के लिए लड़ रहा है।
आरक्षण की सुविधा प्राप्त करने के लिए लड़ाई लड़ी है। गगनचुम्बी इमारतें हमारे देश के विकास का माडल नहीं हो सकतीं। लम्बी चमचमाती सड़कों पर आयातित कारों से झांकते अलसेशियन कुत्ते हमारे देश के विकास का माडल नहीं हो सकते। हमारी बस्तियों में रहने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के बंधु, छोटी-छोटी झोंपड़ियों में रहने वाले तपेदिक से बढ़ती हुई संख्या हमारे देश का माडल नहीं हो सकती। हमारे देश में सबसे अंतिम पंक्ति का व्यक्ति, उसको रहने के लिए मकान, पहनने को कपड़ा और खाने को रोटी तथा अस्वस्थ रहने पर दवा की सुविधा उपलब्ध न हो, तब तक हम नहीं मान सकते कि हमारे समाज में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का विकास हुआ है। आरक्षण की सुविधा जिस भावना से प्रदान की गई थी, सब समाज को लेकर आगे बढ़ते जाना, इस आरक्षण की सुविधा को तब तक बरकरार रखना चाहिए जब तक हमारे समाज के इन बंधुओं का आर्थिक और सामाजिक स्तर समाज के दूसरे लोगों की तरह नहीं हो जाता।
सभापति महोदय, आपने मुझे समय दिया उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं और इस बिल का समर्थन करते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूं।
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली) : सभापति महोदय, संविधान का ९०वां संशोधन हमें मिला था। जो आरक्षण में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से गड़बड़ हुई है, उसको दुरुस्त किया जाए, इस बाबत यह था। फिर संशोधन आ गया कि ९०वां संशोधन नहीं है, यह ८१वां संशोधन है। हम नहीं जानते कि ९०वें संशोधन से नौ नम्बर कैसे कम हो गए। क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए यह फायदेमंद है इसलिए घटा दिया ? यह हमें लखित में आया है। सभापति महोदय, उधर से अनुसूचित जाति और जनजाति के अच्छे बोलने वाले सदस्य हैं। लेकिन कभी उनको मौका नहीं दिया गया। माननीय संसदीय कार्य मंत्री जी ने इस बिल के बारे में अपने सदस्यों को खूब समझा-बुझा कर कहा कि इसका खूब समर्थन करो, खूब धन्यवाद दो और गठबंधन की सरकार तथा प्रधान मंत्री जी का धन्यवाद करो। यह उन्होंने अपने सदस्यों को सिखाने का काम किया है।
मेरा इस संशोधन बिल के बारे में कहना है कि यह आरक्षण कोई कृपा नहीं है। भीख नहीं, भागीदारी, सत्ता में हिस्सेदारी है। संविधान में आरक्षण का सिद्दांत बना है। प्रधान मंत्री जी ने कौन सी कृपा की जिसका ये लोग इतना प्रचार कर रहे हैं, यह हमें मालूम नहीं है। यह भी सिखाया गया है लोगों में जो यह धारणा फैली है कि भाजपा हरिजन विरोधी है, आरक्षण विरोधी है इसलिए सब लोग इसका समर्थन करें और कहें कि ऐसा नहीं है और हमारी सरकार ने यह बड़ा भारी कानून लाने का काम किया है। यह कानून तो सहज में आया था। १२वीं लोक सभा दो दिन तक इस सवाल को लेकर बाधित रही थी। दिल्ली में बड़ा भारी सम्मेलन हुआ। मुम्बई में हुआ, जिसमें भूतपूर्व प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह जी को भी बुलाया गया था। अनुसूचित जाति और जनजाति के जो सरकारी कर्मचारी हैं, उन्होंने बड़ा भारी सम्मेलन किया। कुल मिलाकर इतना बड़ा दबाव पड़ा, सारे दलों के अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों ने एकजुटता का प्रदर्शन किया और सरकार के पास कोई और चारा नहीं रहा।
१९९५ में पांच कानून लाए, क्यों नहीं आरक्षण के सम्बन्ध में काम्प्रेहेंसिव बिल लाया गया। इन्होंने दावा किया है कि डी.ओ.पी.टी. का २९.८.१९९७ वाला जो आदेश है, उसके प्रभाव को खत्म करने के लिए यह संविधान संशोधन विधेयक लाए हैं। बाकी जो चार आरक्षण के खिलाफ डी.ओ.पी.टी. आर्डर हैं, ३०.७.१९९७, २.७.१९९७, २२.७.१९९७ और १३.८.१९९७ का जो डी.ओ.पी.टी. के आर्डर हैं, उनके लिए कुछ नहीं है। केवल एक जो आर्डर निकला है, उसको समाप्त करने के लिए यह संशोधन विधेयक लाए हैं। लेकिन चार जो आरक्षण के खिलाफ हैं, इनमें कैसे सुधार होगा ? इन्होंने इस बिल के बारे में अपने सब सदस्यों को सिखा दिया कि खूब धन्यवाद करो। मैं कहना चाहता हूं कि इस तरह से गरीबों का कल्याण नहीं होगा। जो वंचित हैं, उपेक्षित रहे हैं, उनको राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान हुआ था।
नहीं होगा। जो वंचित हैं, उपेक्षित रहे हैं, उनको राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान हुआ था।
2250 बजे (उपाध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए) महोदय, मंडल आयोग हुआ था, देश भर में मंडल का वातावरण हुआ था तो उसके खिलाफ कमंडल शुरू हुआ। देश भर में रथ दौड़ाने का काम हुआ। आज हम देखते हैं कि मंडल वाले लोग श्री शरद यादव और पासवान जी थे।... (व्यवधान) हम देख रहे हैं कि इससे कोई भला नहीं होने वाला है। यह जो आंशिक संशोधन आया, यह सवाल क्यों नहीं उठना चाहिए कि पांच कानून आरक्षण और प्रमोशन के खिलाफ पारित हुए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से १९९७ में आर्डर निकले। एक आर्डर के संशोधन के लिए संविधान संशोधन और बाकी चार आर्डर खत्म करने के लिए कौन सा कानून लाए हैं, इसके लिए कोई कानून नहीं आया। सब लोग पछता रहे हैं और इसी में सरकार को वाहवाही दे रहे हैं। इसलिए "भीख नहीं, भागीदारी, सत्ता में हिस्सेदारी," यह संविधान का आरक्षण का सिद्धांत है, यह कोई कृपा नहीं कर रहे हैं। सरकार ने लाचार होकर इसे लाने का काम किया है। यह जो आंशिक संशोधन लाए हैं, उसका हम समर्थन कर रहे हैं, लेकिन बाकी जो नहीं आया है, उसके लिए हम सरकार को चार्ज कर रहे हैं। अभी भी आपके ऊपर से कलंक नहीं हटने वाला है, आप आरक्षण विरोधी हैं। आप एससी, एसटी को पसन्द नहीं करते हैं।…( व्यवधान) आप यथास्थितिवादी, प्रतक्रियावादी और साम्प्रदायिक है, यह कलंक मिटने वाला नहीं है।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कौन प्रतक्रियावादी हैं?
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : भाजपा के लोग हैं। उधर से सब लोग यही बोल रहे हैं कि ऐसा कानून हो गया कि हमारे ऊपर जो कलंक है कि हम लोग गरीब विरोधी, आरक्षण विरोधी हैं, ऐसा नहीं है। उन सब माननीय सदस्यों को संसदीय कार्य मंत्री जी ने सिखाया है कि यही बोलना है। भाजपा के लोग देश भर में कहते हैं कि यथास्थितिवादी लोग हैं, ये आदिवासी, हरिजन का कल्याण नहीं देख सकते, नहीं बर्दाश्त कर सकते, इसलिए यही बोलना है, इस कानून से यह साबित होता है कि हम ही यह कानून लाए हैं।
…( व्य वधान) सारे एससीएसटी के लोगों ने काफी संघर्ष किया है। …( व्यवधान)
संसदीय कार्य मंत्री तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री (श्री प्रमोद महाजन) : रघुवंश प्रसाद जी, आप फिर वही बात को रिपीट कर रहे हैं। आपने कहा कि हम मजबूरी से लाए हैं, हम मजबूरी से समर्थन कर रहे हैं।
…( व्यवधान)
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : नहीं, मजबूरी से कैसे कर रहे हैं।... (व्यवधान) आप लोग अपना कलंक मिटा रहे हैं।... (व्यवधान)
श्री प्रमोद महाजन : आप सब मजबूरी में यहां बैठे हैं, जरा जल्दी खत्म करिए।... (व्यवधान)
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, इनका जो मूल चरित्र है वह इस आरक्षण कानून को लाने से बदलने वाला नहीं है और न ही सुधार होने वाला है, यही हमारा कहना है। इसमें हम देख रहे हैं कि सारे लोग संतुष्ट हैं, जिन्होंने इस बहस में भाग लिया है। सब लोगों ने यह आशंका जाहिर की है कि जब ये पांच आर्डर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक उनके खिलाफ निकले हैं तो उस फैसले को खत्म करने के लिए और निष्प्रभावी करने के लिए एक कांप्प्रीहैंसिव बिल लाना चाहिए था, जिससे एससी, एसटी का भला हो सके, तभी इनका कल्याण होगा, अन्यथा इनका कलंक अभी तक बना हुआ है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री किशन लाल दिलेर (हाथरस) : उपाध्यक्ष महोदय, यह जो बिल लाया गया है, मैं इसका समर्थन करता हूं। वर्तमान सरकार की विपक्ष के माननीय सदस्यों ने काफी बदनामी की है और बड़ा ही शोरशराबा किया है। जैसे अभी माननीय सदस्य बता रहे थे कि ये दलित विरोधी हैं, आरक्षण विरोधी हैं और ये आरक्षण को खत्म कर देंगे, बड़े-बड़े बवंड़र बने हुए हैं। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली सरकार का साहस देखिए कि उन्होंने उल्टा करके दिखा दिया, और दस वर्ष के लिए आरक्षण बढ़ा दिया। इस बिल को भी आपके सामने पेश कर दिया और जो कमी है वह भी आगे पूरी हो जाएगी, आप इंतजार करिए।
मेरा मतलब तो यह है कि आपकी पिछली सरकारों ने आरक्षण में प्रमोशन को बंद कराया, तब आप कुछ नहीं करा पाये। इस सरकार की हिम्मत तो देखिये, माननीय श्री अटल बिहारी जी की हिम्मत देखिये। " हिम्मत जहां में देखिये नक्शे नगीन है, हिम्मत नहीं है पास तो कौड़ी के तीन हैं। " इस सरकार की हिम्मत देखिये, लेकिन आप बदनाम कर रहे थे। मान्यवर, आरक्षण के ऊपर सब लोग बोल रहे थे लेकिन इस विषय में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि अनेक प्रकार से अनेक लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि आजादी के ५० वर्ष बीत जाने के बाद भी यह सोचें कि गरीब कौन हैं? सरकारों ने लोगों को खुश करने के लिए कानून बनाए, लेकिन जिन गरीब लोगों को आरक्षण का लाभ पहुंचना चाहिए था उनको आज तक वह लाभ नहीं पहुंचा है। देश के नेताओं को इस बात का ध्यान होगा कि गरीबों में भी गरीब वर्ग सफाई कर्मचारी वर्ग है। मैं इस बात को डंके की चोट पर कहता हूं कि उन सफाई कर्मचारियों के वर्ग तक आरक्षण का लाभ नहीं पहुंचा है। टाउन एरिया में. नगरपालिकाओं में सफाई कर्मचारियों को ८-१० महीनों तक वेतन नहीं मिलता है। मैं माननीय वधि मंत्री जी का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि आप न्यायकारी हैं, आप ही बताएं कि इस समाज को क्या लाभ अभी तक मिला है। इस समाज की तरफ न्याय की द्ृष्टि से किसी ने नहीं देखा है। इस समाज के लोगों को आज अपना जीवनयापन करना मुश्किल हो रहा है। बिना तनख्वाह के कैसे वे अपने बच्चों के पढ़ाएं, कैसे उनके बच्चे शक्षित हों। आज इस वर्ग के लिए यह चिंता की बात है। आज शक्षित लोग आरक्षण का लाभ उठाते हैं। मैं आपके माध्यम से वर्तमान सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि सफाई कर्मचारियों के वेतन के लिए राज्य सरकारों को आदेश दें कि वे समय से उनका वेतन दिलवाएं या उनको राज्य सरकार के कर्मचारी घोषित कर दिया जाये, जिससे ये तबाही से बच सकें और अपने बच्चों को शक्षित कर सकें।
इनकी समस्याओं के समाधान के लिए पिछली सरकार ने सफाई कर्मचारी आयोग बनाया और आज भी वह चल रहा है। उसमें जो मैम्बर होते हैं वे दूसरे वर्ग के लोग ही मैम्बर होते हैं। सफाई कर्मचारी उसमें भागीदार नहीं होते हैं। जो लोग मैम्बर होते हैं वे उनके काम को जानते नहीं हैं, उनकी स्थिति को पहचानते नहीं हैं। जब आयोग में हालत यह है तो सफाई कर्मचारियों की समस्याओं का निदान कैसे होगा, उनकी समस्याओं को कौन देखेगा। मेरा सुझाव है कि सफाई कर्मचारी आयोग में भी बाल्मीकी समाज के लोग रखे जाएं जो उनकी समस्याओं का निदान कराएं। मेरा आपसे निवेदन है कि सफाई कर्मचारी वर्ग की समस्याओं को ठीक से सुलझाया जाए।
23.00 hrs. माननीय मंत्री जी हमारी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। मैं वधि मंत्री जी से विशेष रूप से निवेदन करूंगा कि जब हमारी सरकार ने एक न्यायसंगत समाज बनाने का निश्चय किया है, सामाजिक स्तर के न्याय की द्ृष्टि से आप किस तरफ देख रहे हैं? मैं आज एक वर्ग की वकालत इसलिए कर रहा हूं क्योंकि उस वर्ग की तरफ किसी ने नजर उठाकर नहीं देखी। मैं जहां आरक्षण का समर्थन कर रहा हूं, वहीं चाहता हूं कि आप इस वर्ग को भी न्याय दें। आप इनकी तनख्वाह और आर्थिक स्थिति की तरफ देखें। यदि उन्हें सही लाभ देना है तो जैसे पंजाब और हरियाणा में इस वर्ग के लिए कोटा निर्धारित हो गया है, क्या हमारी सरकार पूरे हिन्दुस्तान में इसे लागू करेगी? यह आवाज केरल से भी उठी है। फोरम में भी यह प्रस्ताव आया है। इस वर्ग की तरफ पूरा लाभ नहीं पहुंच पाता है, इसलिए इनका कोटा निर्धारित हो जाए तो सरकार की बहुत कृपा होगी। मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं और इस बिल का समर्थन करता हूं।
DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Hon. Chairman, Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to say a few words on this Constitution (Ninetieth Amendment) Bill, 2000. I rise to support this Bill.
As per the Poona Pact, reservation is not a charity. It is a fundamental right of dalits, it is according to the father of the Constitution, Dr. B. R. Ambedkar. Hon. Prime Minister, on 6th December 1999 made an assurance and I would like to quote only two points.
"In respect of the following two aspects, the proposals of Constitution Amendments are at the final stage of consideration; one, relaxing the existing requirements by prescribing lower qualifying marks and standards for promotion in respect of Scheduled Castes and Scheduled Tribes employment and two, clearing backlog of jobs through special recruitment in respect of Scheduled Castes and Scheduled Tribes quota. "
I want to have a clarification from the hon. Law Minister. During the three-day Convention of Scheduled Castes and Scheduled Tribes, the hon. Minister was present on all the three days. He was attentive enough and he gave a patient hearing to the critical analysis of points put forth during that Convention. In that Convention, I was mentioning about clearing the backlog of vacancies of Scheduled Castes and Scheduled Tribes who constitute one-third of the Indian population. Without updating the census, how is reservation in proportion to the population possible? I want to know this from the hon. Law Minister during the reply. What are the steps that have been taken to update the census? Is there any time limit fixed to update this?
Without doing that, making all these amendments will only go to cold storage. If there is no political will and if there is no genetic transformation of the minds of the people as well as of the Ministers and the people in the ruling party, the status quo will only be maintained. I am sure that this Government is committed to do something for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, about whom we are now discussing through these amendments.
From Ninth Plan onwards, there is a relevant and comprehensive planning for Scheduled Castes and Scheduled Tribes. A memorandum was submitted to hon. Prime Minister by Sardar Buta Singh on 17.12.1996. I would like to know from the hon. Law Minister whether any action has been taken on that memorandum. The draft committee submitted a report during the Convention held in 5th December, 1999. My colleagues have pointed out about the proposals made by the Draft Committee. The Government should place a report on the Table of both the Houses as to what action has been taken on that proposals so that all of us would know the policies of the Government in regard to those recommendations.
I also urge upon the Government that unless we set up a separate employment exchange for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, proper placement of candidates is not possible. I am concerned with two articles as far as this subject is concerned. One is article 46 which enjoins the State to promote with special care the economic interest, in particular of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. It says, the Government shall protect them from social injustice. Fifty-three years after Independence, I could see no improvement. I would like to know from the hon.Law Minister the steps taken to heal the wounds inflicted on this community for all these 53 years after Independence. I would like to refer to article 335 which mandates that the claims of Scheduled Castes and Scheduled Tribes shall be taken into consideration consistently and efficiently by the administration in making appointments.
I would like the hon. Law Minister to give pointed reply to all these questions. As far as filling up the vacancies in higher posts is concerned, the Supreme Court of India has mentioned about `merit’. It says, the appointment should be based on the merit. I would like to know from the hon. Minister as to what is the yardstick to measure `merit’ or how you will define `merit’. How reservation policy can be implemented on `merit’?
In this debate, I would like to say that in 1994, when Dr. Jayalalitha was the Chief Minister of Tamil Nadu a Bill was passed by the Tamil Nadu Assembly to provide reservation for OBCs, Scheduled Castes and Scheduled Tribes and minorities to the extent of 69 per cent and it was sent to the Government of India. I urge upon the Government to sympathetically consider this issue. This should be brought into force so that socio-political and empowerment of poor and downtrodden will be achieved.
Last but not least, I would like to say that a Bill to provide 33 per cent reservation for women was introduced in this House. It should come up for discussion. We should not worry about the result. Even if it is defeated, we the women Members of Parliament, on behalf of 50 crores of women of this country, would accept that result. But hon. Minister and the hon. Prime Minister should come forward for the discussion of this Bill in the current Session itself.
श्री दलपत सिंह परस्ते (शहडोल): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे संविधान (नब्बेवां संशोधन) विधेयक, २००० पर बोलने का अवसर प्रदान किया।
यह साहसपूर्ण ९०वां संविधान संशोधन लाकर कानून मंत्री जी और संबंधित मंत्री ने सिद्ध कर दिया है कि भारतीय जनता पार्टी पर जो कलंक लगाया जाता था कि वह आदिवासी और हरिजन विरोधी है, वह सरासर गलत सिद्ध हुआ है। मैं आरोप लगाना चाहता हूं इस सदन के माध्यम से कि आदिवासियों का जितना शोषण पिछली सरकारों द्वारा हुआ, वह आदिवासियों की निष्ठा के कारण हुआ। मैं एक ही उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा कि जहां मैं इस बिल का समर्थन करता हूं लेकिन इस बिल को बृहद् रूप में सदन में लाना चाहिए। आदिवासियों के लिए हिन्दुस्तान के सदन में हमने शराब में छूट दी लेकिन कानून में आदिवासियों को छूट नहीं है। इसके लिए आवश्यक संशोधन होना चाहिए। जब तक इसमें संशोधन नहीं होगा, हम अच्छे लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ सकते। एक तरफ हम मदहोश हैं, हमें होश नहीं है, पढ़ नहीं पाते और बहाना लगाया जाता है कि आदिवासियों और हरिजनों में योग्य व्यक्ति नहीं मिलते जिस आधार पर उन्हें नौकरियों से वंचित कर दिया जाता है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। मैं कहना चाहता हूं इस सदन के माध्यम से कि भविष्य में संविधान में बृहत् संशोधन करके, इनकी उच्च शिक्षा पर भी ध्यान दिया जाए जिससे हम उस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकें जो सदन की इच्छा है। मैं इन्हीं बातों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव) : उपाध्यक्ष जी, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूं। अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन विधेयक, जो कानून मंत्री जी और संबंधित मंत्री जी लाए हैं, मैं उस पर अपने विचार प्रकट करना चाहता हूं। अनुसूचित जातियां और जनजातियां सदियों से देश के साथ रही हैं और देश विघटन की बात कभी इनके मन में नहीं आई। हम लोग हमेशा देश के साथ रहे। " जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है।" हम लोग ऐसा मानने वाले हैं कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। बाबा साहब अंबेडकर ने भी यही सोचा था। हिन्दू धर्म में तो वे नहीं रहे लेकिन नज़दीक का बौद्ध धर्म उन्होंने अपनाया। विघटन के बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा। एक बार मोरारजी भाई के पास मैं गया। गुजरात में आरक्षण के बारे में बड़ा झगड़ा चल रहा था। जब उनसे पूछा गया कि आपकी राय क्या है, तो उन्होंने बोला कि जब तक सामान्य आदमी पिछड़ी जाति के लोग अपने पाँव पर खड़े नहीं होंगे, तब तक उनको आरक्षण देना चाहिए। आदिम जाति के लिए आरक्षण नहीं है। जैसे एक शरीर होता है और अद्धार्ंगी वायु होती है तो सब शरीर काम में नहीं आता है। वैसे ही उन्होंने बोला कि आदिम जाति का सवाल नहीं है, यह राष्ट्रीय सवाल है।
उपाध्यक्ष महोदय, राष्ट्र के हित का सवाल है। यदि सब घटक बलवान हो जाएं, तो राष्ट्र बलवान होता है। यदि एक घटक कमजोर होता है, तो देश कमजोर हो जाता है। मेरे मित्र मंत्री महोदय बहुत अच्छे हैं और पेट में कुछ नहीं रखते हैं। साफ-साफ बोलते हैं। उन्होंने कहा कि हर समाज में गरीब लोग हैं, लेकिन एक बात सच है कि एकादशी और त्रयोदशी आदिमजाति और जनजातियों के घर में मनाई जाती हैं, यानी दो दिन व्रत रखा जाता है, वे दो दिन खाना नहीं खाते हैं, लेकिन अन्य जातियों में केवल एकादशी का व्रत रखा जाता है। वहां द्वादशी या त्रयोदशी नहीं होती है। यदि एक अंधा, एक जंगली, एक मुसलमान, एक मारवाड़ी, एक मराठा, एक आदिम जाति का व्यक्ति, इन सबको इकट्ठा करो और कहो कि तुम दैनिक कर्म से निवृत्त होकर आओ, तो महोदय, आदिमजाति का अनुसूचित जनजाति का आदमी सफाई करने के लिए पत्थर का प्रयोग करेगा, लेकिन अन्य लोग पत्थर से सफाई नहीं करेंगे। इस प्रकार से महोदय, यह मूल रूप से फर्क है आदिमजाति, जनजाति और अनुसूचित जाति में तथा दूसरे समाजे के लोगों में। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि सामाजिक आधार पर यह सुविधा होनी चाहिए और गरीबों की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं मंत्री जी से बार-बार प्रार्थना करना चाहता हूं कि वे गरीब की ओर देखें। यदि गरीब के हाथ में सत्ता नहीं आएगी, यदि गरीब को नौकरी नहीं मिलेगी तो वह क्या करेगा? तमाम लोग झुग्गी-झोंपड़ी वाले बन जाएंगे और छोटे लोग बड़े बन जाएंगे, लेकिन गरीब आदमी की सुविधा को कोई नहीं देखेगा, उसे कोई सुविधा नहीं देगा, यह ठीक नहीं होगा। मैं मंत्री महोदय और पंथ प्रधान को भी धन्यवाद देना चाहता हूं। मैं मेनका गांधी जी को भी धन्यवाद देना चाहता हूं, वसुन्धरा राजे को भी धन्यवाद देना चाहता हूं कि वे हमारे तीन दिन के सम्मेलन में उपस्थित हुए और वहां तीन बार वे बैठे।
उपाध्यक्ष महोदय, महात्मा गांधी जी ने अंग्रेजों से झगड़ा किया एक बात स्पष्ट है कि हमें स्वराज्य मिला। जलियांवाला कांड हो गया, फिर भी सैनिकों ने अंग्रेजों का हुक्म नहीं माना। उस वक्त अंग्रेज भाग गए। महात्मा गांधी जी ने स्वयं कहा कि अंग्रेजों को भगाने के लिए पिछड़ी और आदिम जातियों के लोगों के साथ-साथ सभी देशवासियों ने मिलकर काम किया, लेकिन आजादी के बाद देश में आदिमजाति के लोगों की भागीदारी नहीं होना, यह ठीक नहीं है। इसी भागीदारी को बरकरार रखने के लिए मंत्री महोदय यह संशोधन लाए हैं। मगर जो संशोधन लाया गया है, वह भी अधूरा है। इसलिए मेरी विनती है कि सभी जगह, चाहे कार्पोरेशन हों, सरकारी नौकरी हों, सहकारिता क्षेत्र हो और निजी उद्योगधंधों हों, सभी जगह आरक्षण होना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, आपके माध्यम से मेरी मंत्री जी से प्रार्थना है,…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: एक मंत्री जी से या दोनों मंत्रियों से प्रार्थना है?
श्री हरिभाऊ शंकर महाले : उपाध्यक्ष महोदय, दोनों मंत्रियों से प्रार्थना है कि जो विधेयक आया है वह अधूरा विधेयक है। एक सम्यक विधेयक लाया जाए। यह तो एक प्रकार से लक्ष्मण रेखा की तरह है, लेकिन इससे आगे भी उनको सुविधा प्रदान करने के लिए सोचें, ऐसी मेरी विनती है। आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी (कोकराझार) : उपाध्यक्ष महोदय, आपने भारतीय संविधान के ९०वैं संशोधन विधेय , २००० पर बोलने का मौका देने के लिए मैं आपका आभारी हूं। लेकिन मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान की नैशनल डैमोक्रेटिक ऐलायंस सरकार जो विधेयक लाई है, उसे पूरे दिल से नहीं लाई है, अधूरे दिल से लाई है। इसलिए मैं भी इस विधेयक की आधे दिल से ताईद करता हूं। आधे दिल से हमारे ट्राईबल और जनजाति के लोगों के दिल में लगी हुई असंतुष्टता की आग को प्रकट करने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं क्योंकि इस विधेयक में शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राईब्स और ओ.बी.सी. लोगों के लिए एक सीलिंग ४९.५ प्रतिशत की बना दी गई। हिन्दुस्तान के हायर कोर्ट की तरफ से एक स्टैंडिंग आर्डर पहले से ही दिया जा चुका है कि हिन्दुस्तान में सर्विस में ५० प्रतिशत से ज्यादा रिजर्वेशन की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए, नहीं की जा सकती। यदि फारवर्ड कम्युनिटीज के लोगों की आबादी बढ़ सकती है तो क्या हमारे हिन्दुस्तान में रहने वाले शैडयूल्ड कास्ट््स, शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों की प्रजनन शक्ति नहीं है, क्या उन लोगों की आबादी नहीं बढ़ सकती? जरूर बढ़ती है। १९७१ के सैन्सस के मुताबिक ४९.५ प्रतिशत किया गया। I would like to tell that this is a very very detrimental policy of freezing the very constitutional provision in relation to the reservation quota for the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and OBCs.
मैं दूसरे मुद्दे के बारे में कहना चाहता हूं। There are some political parties and some groups which have been trying to include more number of communities, tribes and castes in the list of Scheduled Castes and Scheduled Tribes. If these new tribes, castes and communities are to be included in the list of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, what concession can you give them? उन लोगों को क्या देंगे। १० आदमियों को खाने के लिए एक किलो चावल दिया गया। यदि १०० आदमियों को खाने के लिए भी एक किलो चावल दिया जाएगा तो हमला होगा। इसलिए मेरी विनती है कि जो ४९.५ प्रतिशत रखा गया है, इसे बदलना चाहिए। शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों के लिए वर्तमान में जो १० प्रतिशत है, उसे बढ़ा कर १५ प्रतिशत करना चाहिए, शैडयूल्ट कास्ट्स के लोगों के लिए १५ प्रतिशत से बढ़ाकर २० प्रतिशत करना चाहिए, ओ.बी.सी. के लोगों के लिए २७ प्रतिशत से बढ़ाकर ३० प्रतिशत करना चाहिए। Otherwise you cannot bring any sort of sense in the lives of the tribal people, Scheduled Castes people and backward community people. So, I cannot support this Bill with full heart. Nothing should be done half-heartedly as it is a piecemeal solution. वे डी.ओ.पी.टी. के बारे में क्या बात करते हैं। वह शेर है, भालू है, क्या है? उससे क्यों डरते हैं ? It is the Parliament which can make any sort of rule. लेकिन आज हिन्दुस्तान में क्या हो रहा है। इस वक्त मुझे बाबा साहेब अम्बेडकर की एक वाणी याद आ रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान में जितने शैडयूल्ड कास्ट््स, शैडयूल्ड ट्राईब्स और तीसरे वर्ग के लोगों के अधिकार हैं, those rights are not based on the kindness and pity of some advanced people. इसलिए उन्होंने बोला Political power is the main key by which we can open each and every lock.
I would like to appeal to the Government of India that whatever political powers are required to be granted to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, should be granted to them. Here, I would like to mention again about the very situation that is mounting in Assam. आसाम सरकार ने क्या किया। १९७८ में शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों की सर्विस में रिजर्वेशन का जो एक्ट बनाया, वहां शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों के लिए साढ़े सात प्रतिशत था, उसे ढाई प्रतिशत और बढ़ाकर १० प्रतिशत किया। शैडयूल्ड ट्राईब्स हिल्स के लिए ५ प्रतिशत, शैडयूल्ड कास्ट्स के लिए साढ़े सात प्रतिशत, ओ.बी.सी. के लिए २७ प्रतिशत। यह ४९.५ प्रतिशत हो गया। कुछ लोगों को ट्राईबल किया जाए, शैडयूल्ड कास्ट्स किया जाए तो उनको कहां से मौका दिया जाए।
It is a very serious and vital concern. This is not only my own problem but the problem of the nation as a whole. Then, what has happened? Kokrajhar is the only reserved parliamentary constituency for the plains tribal people. In 1951, what happened to the Representation of Peoples Act? पीपल्स रिप्रैजैन्टेटिव्ज एक्ट में सैक्शन ४, सब क्लॉज ‘बी’ घुसा दिया। कौन्सटीटयूशन के प्रिंसिपल के खिलाफ बाहर से गए हुए लोगों को भी उस कौन्सटीटूऐंसी में से इलैक्शन करवाने के लिए कौन्टैस्ट करने का मौका दिया गया। In Assam, there are only three reserved parliamentary constituencies. One is the Kokrajhar parliamentary constituency, the other one is the Diphu parliamentary constituency meant only for the hill tribal people and the third is reserved for the Scheduled Castes. शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राईब्स के लोगों की आबादी भी बढ़ती जा रही है।
But if you keep going on restricting the number in the quota, then how can you expect that there will be some improvement in the conditions of the people belonging to the tribals, Scheduled Castes and Scheduled Tribes? Apart from this, I do have a lot of points to be raised but due to lack of time, I am not able to raise those points. In the days to come, the Government of India should come with a very comprehensive Bill so that the interests of the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and the backward classes can be protected as per the commitments made by the Government. That is why, I would like to appeal to the Government that political power should be accorded to the people belonging to the backward classes. In this connection, I would also appeal to the Government to concede to our longstanding, genuine and legitimate Bodoland demand without any further delay on the lines of Uttarakhand, Chhatisgarh and Vananchal. This is the one and only appropriate solution on the part of the Government of India to accord justice to us.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The list of speakers is exhausted. The reply will be given tomorrow immediately after the Question Hour.
The House stands adjourned to meet again at 11 a.m. tomorrow.
2329 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Wednesday, May 10, 2000/Vaisakha 20, 1922 (Saka).
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