Lok Sabha Debates
Discussion Regarding Problems Being Faced By Farmers Raised By Shri Ramji Lal ... on 26 April, 2001
14.20 hrs. Title: Discussion regarding problems being faced by farmers raised by Shri Ramji Lal Suman on 12 March, 2001 (Concluded).
MR. SPEAKER: The time allotted for this discussion is two hours.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): अध्यक्ष महोदय, १३ तारीख को हमें पुकारा गया था। हम किसान के सवाल पर बोलने के लिए खड़े हुए थे लेकिन उसी बीच इतना करप्शन वाला तहलका कांड हो गया और हम लोग मांग करने लगे कि यह करप्ट और कम्युनल सरकार जानी चाहिए। अभी वह लड़ाई चल रही है। विपक्ष में एकता न होने के चलते अभी भी ये लोग सत्ता में बने हुए हैं। देश भर में सभी तरह के किसान अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं। सदन के सभी माननीय सदस्य इस बात से सहमत हैं। केरल का नारियल का किसान हो या पंजाब, हरियाणा, बिहार या उत्तर प्रदेश के धान के किसान हों या गेहूं पैदा करने वाले किसान हों या महाराष्ट्र के प्याज पैदा करने वाले किसान हों या दूध, तिलहन, दलहन, गन्ना उत्पादक किसान, सभी अभूतपूर्व संकट में हैं और हम सभी माननीय सदस्य इस बात से सहमत हैं कि किसान संकट में हैं लेकिन जब पार्टीबंदी होती है तो बात दूसरी करते हैं। अभी कल ही वित्त मंत्री जी जवाब दे रहे थे और ऐसा वर्णन कर रहे थे जैसे किसान खुशहाल हो। वही क्रैडिट कार्ड की गिनती करा रहे थे कि एक करोड़ से ज्यादा क्रैडिट कार्ड बना दिये लेकिन सरकार के ये सभी दावे छलपूर्ण और धोखाधड़ी वाले हैं।
१४.२१ बजे(श्रीमती मारग्रेट आल्वा पीठासीन हुई) इसीलिए इनके राज्य में किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। बिना रिकार्ड के लोग कहते हैं कि देश भर के वभिन्न राज्यों में दस हजार किसानों ने आत्महत्या की। रिकार्ड में कम लाते हैं। पंजाब और हरियाणा की सरकार ने कहा कि आत्महत्या करने वाले एक किसान को ढ़ाई हजार मुआवजा दे दो। भारत सरकार ने क्या किया है कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं, भारत सरकार ने क्या कार्रवाई की है? मैं जानना चाहता हूं। सारे किसान दुखी हैं लेकिन मुझे आश्चर्य और गुस्सा तब होता जब सरकार की ओर से पाखंडपूर्ण बयान होता। प्रधान मंत्री जी ने कहा कि अब धान और गेहूं की खेती किसान कम करें और तिलहन और दलहन की खेती और फल और सब्जी की खेती करें। यह पाखंड वाला बयान निकम्मी हुकूमत का ही हो सकता है जो किसान के साथ भेदभाव वाला व्यवहार करने को तैयार है। छल, धोखा और फरेब वाला बयान है। असली समस्या का हल नहीं करने वाला बयान और किसानों के साथ दुश्मनी वाला यह बयान है। किसानों के बारे में हमने हर तरह के सवाल उठाये हैं। एडजर्नमेंट मोशन, कभी १९३ और अन्य कानून के तहत अनेक बार बहस हुई लेकिन इनसे किसानों का कष्ट कम नहीं हुआ बल्कि किसानों का कष्ट बढ़ रहा है। क्या कारण है? उसमें क्या बचा है?इसका क्या इलाज है, यह बहस का विषय है। सब इस बात से सहमत हैं कि किसान अभूतपूर्व संकट में हैं। उनकी लागत ज्यादा हो रही है। डीजल का खर्चा बढ़ने से कृषि में लगने लायक जो मशीनें हैं, उनके दाम बढ़ने से, बिजली, मजदूरी का दाम बढ़ने से, पेस्टीसाइड्स, दवाओं का दाम बढ़ने से, खाद और सिंचाई का दाम बढ़ने से लागत ज्यादा हो रही है लेकिन सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य कम तय करती है और वह भी किसान को नहीं मिलता। किसान अपना अनाज जलाने को मजबूर हैं।
जालंधर में किसानों द्वारा आलू सड़क पर फैंक दिया गया । हापुड़ में भी आलू फैंक दिया गया। प्याज के मामले में महाराष्ट्र में किसान-किसान त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और आधी कीमत पर उत्पादन को बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं या फैंक रहे हैं । सरकार की नीति किसान विरोधी है । इनका आचरण-व्यवहार किसान विरोधी है और हमको लगता है, अज्ञानता के भी ये लोग शिकार हैं, तो किसानों की समस्याओं का कैसे समाधान करेंगे । हम सवाल उठा रहे हैं और जवाब कृषि मंत्री देंगे, जबकि कृषि मंत्री जी को रेल चलाने में ज्यादा रुचि है, लेकिन ये किसान के बारे में जवाब देंगे । …( व्यवधान )चूंकि इनको रेल चलाने में ज्यादा रुचि है, ऐसा अखबारों में आ रहा है, कृषि विभाग किसी दूसरे व्यक्ति के पास चला जाएगा ।
कृषि मंत्री और रेल मंत्री (श्री नीतीश कुमार) : आप इधर आ जाइए ।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : उधर नरक में आ जायें । हम किसान विरोधियों के साथ नहीं जा सकते हैं । आप सभी को विदा करके वहां आयेंगे ।
माननीय कृषि मंत्री जी बिहार से आते हैं और दावा करते हैं कि वे किसानों के लिए काम करते हैं। …( व्यवधान )पशुपालन वाले किसान भी त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और आपके राज में तो पशुधन विभाग ही खत्म है । इस विभाग को कोई देखने वाला नहीं है, कोई पूछने वाला नहीं है और कोई चर्चा करने वाला नहीं है, जबकि जीडीपी में ३१ प्रतिशत कन्ट्रीब्यूशन कृषि उत्पाद का आता है और ९ प्रतिशत पशुपालन से आता है । यह क्षेत्र सबसे उपेक्षित माना जाता है । मैं भी दावे के साथ कह सकता हूं, जब तक पशु-पालन और पशुधन का विकास नहीं होगा, हिन्दुस्तान से कोई भी गरीबी और बेराजगारी खत्म नहीं कर सकता है । एक समस्या और है, हम सवाल पूछेंगे और कृषि मंत्री जी कह देंगे कि सवाल फूड विभाग से संबंधित है । इस समस्या की वजह से कृषि विभाग से किसान की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है । WTO का संबंध कामर्स से हैं, लेबर विभाग से संबंध है, पानी की समस्या सिंचाई विभाग से संबंधित है और अन्य समस्यायें वभिन्न विभागों से संबंधित है - यानि १०-१२ विभागों से संबंधित मामलों का जवाब कृषि मंत्री जी देंगे । वर्ष १९९९ में आन्ध्रा प्रदेश में धान का उत्पादन १६७ लाख टन, पंजाब में १४९ लाख टन, हरियाणा में ४१ लाख टन, बिहार में १२३ लाख टन हुआ है । FCI ने दान की उगाही पंजाब में २७ लाख टन, बिहार में २७ हजार टन दिखायी गई है । बिहार में २७ हजार टन धान की उगाही १९९७-९८ में हुई थी । आपके राज में तो ८ हजार टन उगाही हुई है, जो नगण्य है । इसका जवाब आपके पास नहीं है।
नि:सहाय होने के अलावा इनके पास कोई जवाब नहीं है ।
जहां तक मक्का की बात है, मक्का चार राज्यों में पैदा होती है - मध्य प्रदेश १३ लाख टन, बिहार १६ लाख टन, आन्ध्रा प्रदेश १६ लाख टन और कर्नाटक १६ लाख टन । प्रोक्योरमेंट मध्य प्रदेश में १६ हजार टन, आन्ध्रा प्रदेश में ३७ हजार टन और कर्नाटक में ८९ हजार टन और बिहार में मक्का का प्रोक्योरमेंट शून्य है - क्यों? बिहार के किसानों के साथ बेइमानी हो रही है, मैं पूछना चाहता हूं …( व्यवधान )
श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर): यह राज्य सरकार का काम है ।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : राज्य सरकार का काम है, इसीलिए मैंने कहा कि किसानों की समस्याओं का समाधान इनकी अज्ञानता के कारण भी नहीं हो रहा है । FCIके गठन में देश का हजारों करोड़ रुपया लगा हुआ है ।
भारत सरकार का काम एम.एस.पी तय करना है और उसको मुहैया कराना भी है। मैं पूछना चाहता हूं कि एफ.सी.आई भारत सरकार का उपक्रम है या बिहार सरकार का है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में सरप्लस गेहूं का उत्पादन होता है। पांच राज्यों में तो गेहूं का प्रोक्युरमेंट चल रहा है लेकिन बिहार में वह नहीं हो रहा है। इसलिए एफ.सी.आई या तो बिका हुआ है या बिहार सरकार से, वहां की जनता और किसानों से इसकी दुश्मनी है। हमारे पास लखित प्रमाण हैं जिनको कोई झूठा साबित नहीं कर सकता। यह दुश्मनी इस साल से खत्म होगी, ऐसा मुझे लगता नहीं है। गेहूं और मक्का का एक छटांक भी प्रोक्युरमेंट नहीं हुआ, धान का जरूर आठ हजार ठन हुआ है। संसद की कार्यवाही रुकी, बिहार में इस पर आंदोलन हुआ, लेकिन इस सरकार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है, ऐसा मुझे लगता है। बिहार के सांसद जो उस तरफ बैठे हुए हैं वे किसानों की भलाई के लिए क्या कर रहे हैं, इसका वे जवाब दें।
किसान का संबंध अनेक विभागों से हैं और अगर ये जवाब भी देंगे तो इधर-उधर की बातें ही करेंगे। प्रोक्युरमेंट तो इनके विभाग का मामला है नहीं, तो ये क्या जवाब देंगे।
डीजल की कीमत साल में तीन-तीन बार ये बढ़ा देते हैं। खाद की कीमत बढ़ाते हैं तो क्या श्री यशवन्त सिन्हा जी सब्सिडी घटा देंगे? यह इनके बस में नहीं है। हमने सवाल उठाया है कि एक संसदीय समति बनाई जाए। लेकिन संसदीय समति के नाम से यह सरकार भागती है। जैसे पेट्रोल देख करके कुत्ता भागता है, वैसे ही यह सरकार जे.पी.सी या संसदीय समति के नाम से भागती है। बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। …( व्यवधान )यह एक मुहावरा है - यह कोई विषय नहीं है।
सभापति महोदय, हमने बार-बार मांग की है कि किसानों की समस्याओं पर एक समति बने। जैसे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की समस्याओं के विषय पर एक संसदीय समति है वैसे ही किसानों की समस्याओं पर एक संसदीय समति बने, जो सभी विभागों से तालमेल रखे कि कैसे किसानों की समस्याओं का समाधान हो सकता है तथा उसकी मॉनटिरिंग करे, उसकी छानबीन करे। संसदीय कार्य मंत्री जी ने भी कहा कि हमें कोई एतराज नहीं है फिर पता नहीं कौनसी किसान विरोधी लॉबी है जो इसे रोक रही है। हम सभी लोग मिलकर समति बना सकते हैं। समति क्यों नहीं बन रही है सरकार इसका स्पैसफिक जवाब दे। जब १५० कमेटियां बनी हुई हैं तो किसानों के लिए एक कैबिनेट स्तर की इक्नौमिक कमेटी ऑन एग्रीकल्चरल अफैयर्स क्यों नहीं आप बनाते हैं। प्रधान मंत्री जी की अध्यक्षता में वह कमेटी बने और सभी मंत्री उसमें सदस्य रहें। अगर आप एक पैसा भर भी किसानों के प्रति हमदर्दी रखते हैं तो उसको बनाइये। लेकिन हमें आप पर भरोसा नहीं है।
सभापति महोदय, महाभारत में भीष्म पितामह बाण-शैय्या या पर थे।
जब वह ज्ञान का उपदेश दे रहे थे तो द्रोपदी हंस पड़ी। उन्होंने कहा कि जब मैं ज्ञान का उपदेश कर रहा हूं तो पुत्रवधु होकर क्यों हंस रही हो। द्रोपदी ने कहा कि जिस समय मेरा भरी सभा में चीर हरण हो रहा था उस समय आपके ज्ञान का उपदेश कहां गया था। भीष्म पितामह ने कहा कि मैंने उस समय दुर्योधन का अन्न खाया था, इसलिए जैसा अन्न खाएंगे वैसे मन होगा। उन्होंने कहा कि बाण लगने से अब मेरा सारा विषाक्त खून बह गया है और शुद्ध खून शरीर में दौड़ने लगा है इसलिए मैं ज्ञान का उपदेश कर रहा हूं। हमें आपके ऊपर भरोसा नहीं है। आप किसानों के बल पर यहां नहीं आए हैं। आप पूंजीपतियों, कालाबाजारी करने वालों और मल्टीनेशनल के बल पर यहां आए हैं। इसलिए हम आप से यह अपेक्षा नहीं करते कि आप किसानों की समस्याओं का समाधन कर सकेंगे। भीष्म पितामह की तरह कालाबाजार करने वालों का खून जब आपके दिल से हट जाएगा तब आप किसान के बारे में सोच और समझ सकते हैं।
मेरी मांग है कि इसके लिए संसदीय समति का गठन किया जाए और कैबिनेट कमेटी ऑफ फार्मर्स या एग्रीकल्चर का गठन होना चाहिए। आपने अनकों कमेटियों का गठन किया लेकिन इस काम के लिए एक भी कमेटी का गठन क्यों नहीं किया? किसान जिस की लॉबी नहीं है, वे छोटे-मोटे आन्दोलन करते हैं। उनका कभी राष्ट्र व्यापी आन्दोलन नहीं हुआ। इसलिए आप बिना किसी चिन्ता के बैठे हैं।
आपने डबल्यूटीओ में एग्रीकल्चर को शामिल कर दिया। उसमें टि्रप्पस, टि्रम्मस, गैट आदि फैक्टर्स रखे लेकिन इसमें एग्रीकल्चर को शामिल करने की जरूरत नहीं थी। जब डबल्यूटीओ की बैठक चल रही थी उस समय वहां बाहर आन्दोलन हुआ कि लेबर और एनवायरनमैंट को इसमें क्यों शामिल किया जा रहा है? ऐसे में उसे शामिल नहीं किया गया। आप भी हिम्मत करके लोकमत तैयार करें और एग्रीकल्चर को डबल्यूटीओ. से हटाएं। डबल्यूटीओ के समझौते से किसान आतंकित हैं। मेरे पास ७१५ चीजों की सूची है जो बाहर से आएंगी। खाद्य तेल, दालचीनी, उर्वरक, कागज, कच्चा रबड़, हल्दी, धनिया, तेल, आटा, लौंग, तेज पत्ता, इलायची, राई आदि चीजें बाहर से आएगी। ऐसे में किसान का क्या होगा? हमें आपके ऊपर कोई भरोसा नहीं है। यहां पहले ही छोटे उद्योग धंधे चौपट हैं। अब किसान भी चौपट होने जा रहा है। उनके उत्पादित सामान का क्या होगा? उसे कौन पूछेगा?
आपने कहा कि हम सबसिडी कम करना चाहते हैं। आज गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को आठ रुपए किलो में गेहूं मिल रहा है। आपने कहा कि इस पर साढ़े चार रुपए किलो सबसिडी घटाना चाहते हैं। ऐसा करके आप गरीबों का पेट काट रहे हैं। आप ट्रेडर्स को सबसिडी क्यों दे रहे हैं? आप कहते हैं कि वे उसे विदेश भेजेंगे। उनके लिए सबसिडी कहां से आएगी? आपने किसान की खाद पर सबसिडी काटी और गरीबों की सबसिडी काटी।
महोदया, सरकार ने ५-६ सौ रुपये क्िंवटल के दाम पर गेहूं खरीदा और बीपीएल के लिये ९ रुपये किलो बेच रहे हैं लेकिन जब डांट-फटकार पड़ी तो आठ आने किलो कम करके ८.५० रुपये प्रति किलो कर दिया। हमें इसमें यह नज़र नहीं आता कि ५-६ रुपये खरीद कर ८.५० रुपये के भाव बेचने से कौन सी इकोनोमी मिलती है। विदेश में ४.१० रुपये किलो बेच रहे हैं और व्यापारी को ४.१५ रुपये दिया जा रहा है।
श्री खारबेल स्वाइं (बालासोर): एफ.सी.आई. के आफिसर को २० हजार रुपये तनख्वाह मिलती है और इसलिये इतना खर्चा हो जाता है। मेरे पास आंकड़े हैं।
कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : आप सदन को क्यों गुमराह कर रहे हैं? आप मजदूर विरोधी बात मत करें।…* *Expunged as ordered by the Chair.
श्री खारबेल स्वाइं (बालासोर): क्या किसानों ने आपको वोट दिया है, हमें नहीं दिया है?…( व्यवधान )
सभापति महोदय : स्वाइं जी, उत्तर देने के लिये मंत्री जी बैठे हुये हैं, आप बीच में क्यों खड़ें हो गये? आप बैठिये। आप बीच में डिस्टर्ब मत करें। मैं आपको भी बोलने के लिये चांस दूंगी।
रघुवंश जी, आपकी पार्टी के लिये पांच मिनट थे लेकिन आपको मैंने २० मिनट दिये हैं। आप एक मिनट में समाप्त कीजिये।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति जी, मैं क्या करूं, श्री स्वांई जी बीच में खड़े हो गये और उन्होंने सवाल उठाया।
सभापति महोदय : आप उन्हें उत्तर मत दीजिये। आप अपनी बात खत्म कीजिये।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति जी, एफ.सी.आई. बी.पी.एल. को ४.५० रुपये, ए.पी.एल. को ८.५० रुपये और ट्रेडर्स द्वारा विदेश भेजने के नाम पर ४.१५ रुपये, यह कौन सी बुद्धि की बात हुई? इसमें कौन सा इक्नामिक्स है, कौन सी प्रोग्रेसिव है। आपने सबसिडी घटानी है लेकिन इससे बढ़कर पूंजीपति और ट्रेडर्स का.…* श्री अशोक प्रधान (खुर्जा): सभापति महोदय, माननीय सदस्य असंसदीय शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं।
सभापति महोदय : अगर अनपार्लियामेंटरी शब्द कहें हैं तो मैं रिकार्ड देखूंगी और उसे हटा दूंगी। रघुवंश बाबू, मैं अगला स्पीकर बुला रही हूं। आप बैठ जायें। मैंने आपको बार बार टाइम दिया है लेकिन दूसरे माननीय सदस्य की बात सुनकर फिर शुरु कर रहे हैं। आप चेयर को अड्रेस करके अपनी बात जल्दी समाप्त कीजिये।
श्री अशोक प्रधान : सभापति महोदय़, रघुवंश बाबू को साथ वाले सदस्य उकसा रहे हैं।
सभापति महोदय : रघुवंश बाबू, आपको एक मिनट में खत्म करना है।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति महोदय, गन्ना किसान मर रहा है लेकिन मिल मालिक से ६५ प्रतिशत से लेवी घटाकर ४० प्रतिशत कर रहे हैं। इससे उन्हें १५०० करोड़ रुपये का मुनाफा होगा और ए.पी.एल. की चीनी खत्म हो गई। मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि मिल मालिकों को १५०० करोड़ का फायदा हुआ आप बता दें कि कितना करोड़ रुपया आपने खाया?
*Expunged as ordeered by the chair.
आम उपभोक्ता पर इतने करोड़ को बोझ बढ़ा, इन्होंने लेवी खत्म की, इसलिए मैं देख रहा हूं कि हरेक स्तर पर आम उपभोक्ता के खिलाफ, किसानों के खिलाफ, आम जनता के खिलाफ पूंजीपति, भ्रष्ट और मल्टीनेशनल कंपनियों के मनमाफिक फैसले हो रहे हैं। इसलिए यह जन-विरोधी और किसान विरोधी हैं। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
सभापति महोदय : मुझे लगता है कि आपका चेयर पर ही बैठना अच्छा है।
श्री अशोक प्रधान : सभापति महोदय, रघुवंश प्रसाद जी का चैक अप करा दीजिए, नहीं तो किसी दिन सारे सदन को बहुत चिंता हो जायेगी।
सभापति महोदय : जब यह चेयर में बैठते हैं तो बड़ी खामोशी से बैठते हैं।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति महोदय, ये सिम्पैथी रखते हैं, हमारा भाषण जमाने के लिए टोका-टाकी करते हैं।
SHRI ANADI SAHU (BERHAMPUR, ORISSA): Madam Chairperson, when I stand here to speak after Dr. Raghuvansh Prasad Singh, I shiver because of the hammer and tongs approach of Dr. Raghuvansh Prasad Singh – a saintly appearance with a barbed tongue; and he is incongruity personified.
When I am speaking on the farmers, I think I would harp upon the incongruities that we have been facing in this country, so far as the plight of the farmers is concerned. I fully agree with Shri Ramjilal Suman, Shri Sahib Singh and Shri Satyavrat Chaturvedi – all the three of them are absent today – for having shown concern for the plight of the farmers in this country. But let us not forget that if I have a hammer, I should not think that everybody is a nail, as Dr. Raghuvansh Prasad Singh might have thought about it. All are not nails and one should not have a hammer to hit upon everybody, at every moment, at every opportunity.
The plight of the farmers is really very difficult in India. I would start with the basic requirements the farmer had and the planners thought of. I am not going into different approaches of Parties and all those things. What has been thought of for the farmers over the years? The concern is that the imbalances that have to be corrected so that the farmer could have a better life in society.
So, when we thought of imbalances, we thought of removing the imbalances so far as the commodity is concerned, so far as regional imbalances are concerned and so far as trade difficulties are concerned.
The commodity imbalance refers to production of crop. We had the Green Revolution where importance was given to five main crops – rice, wheat, Bajra, Maize and Jawar. Everybody knows that the Green Revolution has been a success. But the success has had difficulties for us. Too much has been creating problem for us. So, the commodity approach and the Green Revolution have created problem for us in the sense that we have had, in 1999, about 208 million MT of foodgrains. Where to keep and how to utilise it? Last year, because of the vagaries of the nature, I think, three million MT was less. But still, we have had difficulties so far as the commodity balancing is concerned.
Now the basic necessity is to have a commodity balance. We had corrected the imbalance. Now we have to have a balance, and for that balance, let us see how the present Government has been tackling the problem. It has been tackling the problem to see that the farmer gets the due for his produce. Dr. Raghuvansh Prasad Singh was mentioning about the plight of the farmers and the distress sale. I fully agree with him. In his State, in my State and in many other States, there has been distress sale of paddy. It has been creating problem for us. But the Government of India, from time to time, has been fixing the minimum support price of agricultural produce. There is a High Power Committee – CACPR or something like that.
It decides during the Rabi season and during the Kharif season as to what should be the price of commodities and the incentive level is taken into account to fix the price. Incentive level means what the farmer could expect for his produce so as to see that he is able to make both ends meet. So, whenever the Minimum Support Price is fixed, this is taken into account. Last year, the MSP for various agricultural commodities was increased between Rs. 10 and Rs. 110. This year also, it has been increased. Shri Yashwant Sinha, in his statement on the Finance Bill, was telling yesterday as to how much money had been given to farmers last time. But whatever it is, the commodity imbalance has to be corrected now. It is absolutely necessary. The farmer has to go in for different crops.
The second thing is regional imbalance. I am coming to Bihar without any acrimony to anyone. Bihar is having regional imbalance so far as unresponsive administration is concerned. The administration is not responsive to the plight of the people living there. We may say many things, but the unresponsive administration is the main cause for the plight of the farmers in Bihar. There are many other things also. Take the case of Orissa. There, connectivity is the main factor. In Chhattisagarh also, connectivity is the main factor due to which the farmer is not able to send his articles outside for sale.
The third thing about imbalance is trade. Whenever we produce a little, whenever the farmer is able to produce a little, he should be able to sell it in a proper manner to the Government, to private parties and to other people so as to ensure that his produce does not go waste. In order to ensure that he is able to sell the excess foodgrains that he has produced, of late, for the last two years, the Government of India has been giving incentives by way of cold storage, by way of godowns and by way of many other things, and for those incentives also, some sort of tax holiday is being given. There is flow of credit to the people for setting up godowns.
You would kindly agree with me that the cooperative credit system has been a failure in India, and because it has been a failure in India, the farmer has to sell his produce in distress at a lower price. Had the cooperative credit system been good, had it been able to get good flow of credit, he could have utilised or he could have kept his articles for some time. I am giving an instance of maize which is being produced in my constituency Berhampur in Orissa. There are refugees from Tibet. They also produce maize. The tribals in my constituency also produce maize. The Tibetan refugees do not sell their maize immediately after production. They keep it for three or four months because they get all the incentives that are required for them. So, they keep it for three to four months and sell it for Rs. 650 per quintal at an appropriate moment, whereas a tribal has to sell it immediately because he is living hand to mouth and gets Rs. 300 per quintal or a maximum of Rs. 350 per quintal. That is the imbalance which has been creating problem for us. That has engaged the attention of the Government in different ways. That is why, for a good productivity system, the Government of India has started indicating as to what would be the future course of action.
Dr. Raghuvansh Prasad Singh, would you mind sitting here and listening to me?
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :हमारी जो तीन मांगें हैं, उनकी सहमति कर दीजिए।
श्री अनादि साहू : बिल्कुल, हम इनडायरैक्टली सहमत होंगे, डायरैक्टली सहमत नहीं होंगे।
सभापति महोदय (श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा): आप अगर चेयर को ऐड्रैस करेंगे तो उससे डिट्रैक्ट नहीं होंगे।
SHRI ANADI SAHU : Madam, thank you for the reprimand.
What I have been saying is that it has engaged the attention of the Government of India and that is why, the National Agriculture Policy has come. What is the Agriculture Policy which has been indicated a number of times? The able and efficient Minister had indicated earlier also as to what are the five or six points which are there in the Agriculture Policy. There is mentioned a growth rate in excess of four per cent. That is most important. A growth rate that is based on efficient use of resources, and conservation of soil, water and biodiversity; Growth with equity, that is, growth which is wide-spread across the regions, and farmers. The regional imbalance, as I was telling earlier, has to be corrected now. Growth that is demand-driven and caters to domestic markets; And the last but not the least is sustainable, technologically, environmentally and economically viable growth.These are the few things which have been, as I was telling earlier, hammered into us by concrete steps in the National Agricultural Policy. Whenever we think of these policies, as I was telling you earlier, the productivity factors that have to be taken into account for the farmers of India are: (i) the system identification, and (ii) diversification.
You have heard yesterday Shri Yashwant Sinha telling about the land use, land development, and all those matters related to land, that is, diversification, the system identification and value additions. I indicated that the system identification is most important. In what manner we can produce foodgrains at a cheaper rate, and the farmers should be able to sell it at a higher rate, that is the basic requirement. Whenever we think of system identification etc., we are thinking of subsidies, the fertiliser subsidies. The Rs. 13,000 crore food subsidy indirectly helps the farmer because his produce, wheat or rice, has to be sold immediately. That way, he does not have the distress sale.
Now, most important is whenever we are thinking of diversification, I am reminded of an old English rhyme. The old English rhyme says:
"Old McDonald had a farm Yeah, yeah, ho A quack, quack here A quack, quack there A quack, quack everywhere Old McDonald had a farm Yeah, yeah, ho A mow, mow here A mow, mow there A mow, mow everywhere Old McDonald had a farm Yeah, yeah ho A neigh, neigh here A neigh, neigh there A neigh, neigh everywhere"
Meaning thereby that in his farm, he had a flock of ducks; in his farm, he had cattle; in his farm, he had horses. Now, there is no necessity of horse-power. There is necessity of implements -- mechanical implements or any sort of agricultural implements -- for the farmers. For agricultural implements, you have said that lots of incentives have been given by the Government to ensure that the farmer is able to buy tractors, tillers and all other required machinery at a cheaper rate. I think, 25 per cent subsidy is being given to him in many aspects and, at the same time, for quack, quack and mow and mow, the animal husbandry and dairying facilities are being extended by the Agriculture Ministry in a very liberal way. Things are being bought so that the old McDonald of the Scottish origin could be an old Indian farmer with mow, mow, with quack, quack and with all other things that are necessary to have diversification. Not only protection of cereals will help him, but also he must have fish farming, horticulture and so many other things. That is why, it has engaged the attention of the Government to make it a unified process of production so as to ensure that the farmer does not have any economic disadvantage vis-à-vis the other persons who are in the urban area or other persons who are taking to different types of activities.
I hope, I am not extending the time, Madam. Please give me another five or six minutes.
MR. CHAIRMAN : I can give you only two more minutes because there are many speakers from your side.
SHRI ANADI SAHU : That is too less a time, Madam.
We are thinking of subsidies. The fertiliser subsidy, it has been, seen does not go to the farmer. It has also engaged the attention of the Ministry of Fertilisers and Chemicals. They have come out with a paper wherein, within a period of five years, it would be phased out so that the subsidy goes to the farmer directly. They are working on it to ensure that the subsidy level for the farmer is given.
So far as the seeds are concerned, the seeds which are required for the farmer are being subsidised, and Corporations are being set up. The Agriculture Ministry’s Annual Report indicates a very good idea as to how seeds are to be given at different places. Lots of incentives are being given to the producers or the breeders; and the foundation and certified seeds are being taken up.
15.00 hrs. But as I said, flow of credit is most important for the farmers. Unless there is a flow of credit, the farmers would not be able to survive the difficult situation that they are facing… (Interruptions)
श्री अशोक प्रधान (खुर्जा): आपने माऊ-माऊ की तो परिभाषा बता दी, नै-नै की भी बता दें।
श्री अनादि साहू (बहरामपुर, उड़ीसा) : हॉर्स की साउंड नाऊ-नाऊ होती है।
MR. CHAIRMAN : It sounds like a nursery class! SHRI ANADI SAHU : Madam, so far as the flow of credit is concerned, you would kindly see from the annual Report of the Ministry of Agriculture that the credit flow last year was to the tune of Rs. 22,032 crore, whereas the credit flow this year has been to the tune of Rs. 41,764 crore. This has been done to ensure that the farmers get good amount of money from different banks. The Kisan Credit Cards have been introduced. The Insurance sector has also been opened up so that the vagaries of nature do not play truant on the farmers whenever they go to field for cultivation or for taking up some other activities. So, one could find that step by step the farmer is being helped by the present Government under the able leadership of Shri Atal Bihari Vajpayee and our very efficient Minister of Agriculture, Shri Nitish Kumar. These are being done to ensure that the farmers do not have any difficulty.
Madam, Shri Raghuvansh Prasad Singh was mentioning about the WTO. WTO is being thought of to be a `ghost’. A `ghost’ does not exist but we think it is a ghost. In the WTO regime, a WTO compatible price mechanism is being worked out by the Government India. I hope, Shri Raghuvans Prasad Singh will go through the price mechanism that is being thought of by Government of India to ensure that the subsidy component is WTO compatible. When we are thinking of the WTO, when we are thinking of the tariff restrictions we are putting on others, it would create a balanced level-playing field for our farmers too. We should not get worked up on that issue. It would take a few months to work out in a proper manner as to how we can tackle the WTO regime in a very efficient manner. We have some difficulties in selling our produce immediately but we should not have a cynical approach to it and in the near future, with our policy being concrete, we would overcome this difficulty.
श्री जे.एस. बराड़ (फरीदकोट): सभापति महोदया, २१वीं सदी के आरम्भ का इतिहास इस देश का जब लिखा जाएगा, तो जिस प्रकार से इस देश में किसानों की उपेक्षा हुई है, सारे देश में किसानों में त्राहि-त्राहि मची हुई है, एन.डी.ए. की हुकूमत की लापरवाही का जिक्र उस इतिहास में लिखा जाएगा। इस इतिहास में वह कलंक इस हुकूमत पर लगेगा, जिन्होंने किसानों की, जो देश के गरीब किसान हैं, उनकी हालत चिंताजनक अपनी लापरवाही से बना दी है। मुझे आपकी हाजिरी में हिन्दी के एक महान शायर दुष्यंत कुमार जी की वे पंक्तियां याद आ रही हैं, जो शायद किसानों की हालत को ही देखते हुए संसद के इसी गुम्बद में गूंज रही हों । मैं उनको दोहराना चाहता हूं— यारो अब तो इस तालाब का पानी बदल डालो, अब तो मछलियां भी तिलमिलाने लगी हैं।
देश में किसानों की ऐसी ही हालत हो गई है। मैं आंकड़ों से बात करूंगा और संजीदा बात करूंगा, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
इससे सारे देश में चिंता है, किसानों में चिंता है। यह इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट है। नीतीश कुमार जी, हमारे माननीय कृषि मंत्री जी इस समय सदन में हाजिर नहीं हैं जो बहुत गर्व करते हैं कि अब किसानों की हालत में बहुत सुधार हो गया है। हमारे माननीय वित्त मंत्री जी बजट पेश करते समय बहुत गर्व कर रहे थे लेकिन सही मायनों में आर्थिक सुधारों से पहले १९८० से लेकर १९९१ तक जो फूड ग्रेन्स आउटपुट अनाज का हुआ, उसमें १९९१ से लेकर २००० तक, अब तक फूडग्रेन्स प्रोडक्शन २३९ मलियन टन होना था लेकिन वह घटकर २०० मलियन टन रह गया है। इसके आगे दालों की बात आती है। बड़ा गर्व करते हैं कि बड़ी प्रोग्रैस हुई है लेकिन प्री-रिफॉर्म पीरियड (१९८०-१९९१) में हम ३९ प्रतिशत आगे बढ़े लेकिन अब उससे घटकर इस पीरियड में हम १८.६ प्रतिशत पर आ गये हैं। इससे और ज्यादा शर्म की बात नहीं हो सकती। ऑयलसीड्स की जो रिकार्डेड ग्रोथ है, वह लास्ट डिकेड में २५.५ प्रतिशत थी और अगर उसी रफ्तार से बढ़ती तो ३० मलियन टन होनी थी लेकिन वह घटकर १८.६ प्रतिशत रह गई। यह चिंता का विषय है और शूगरकेन प्रोडक्शन और अन्य कैश क्रॉप्स में बहुत बड़ी कमी आई है।
१५.०६ बजे(श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव पीठासीन हुए) सभापति महोदय, आप देश के ऐसे प्रांत, बिहार से आते हैं कि जिसकी देश में हमेशा ही चर्चा रहती है। विश्व व्यापार संगठन के मामले में सरकार को किसानों की कितनी चिंता है, इस पर पहले ही टिप्पणी हो रही है लेकिन एक बहाना जो हमारे लायक मित्र भाजपा में हैं, उनके पास है और वह यह तर्क देते हैं कि १९९२ में नरसिंह राव जी की सरकार ने विश्व व्यापार संगठन के समझौते पर दस्तखत किये थे। हमें गर्व है कि हम उस समय अलग-थलग नहीं हो सकते थे लेकिन आज की खबर जो आई है. मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं और जिससे मेरा सिर शर्म से झुक जाता है कि आप जैसा आदमी जो किसानों का दर्द मन में रखता है, यह खबर आने के बाद एक मिनट भी आपको कोई अधिकार नहीं बनता कि आप इस ओहदे पर विराजमान हों। आज के ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ने बताया है क: "Petty politics behind WTO appointment bungle." खबर में यह भी लिखा गया है क "After having scuttled the appointment of Hardeep Puri," खबर में लिखा गया है कि हरदीपपुरी जिनको प्रधान मंत्री और कैबिनेट के फैसले से एम्बैसडर, जेनेवा, डब्ल्यू.टी.ओ. हैडक्वार्टर में हैं, नियुक्त किया गया था, वह "India’s Deputy High Commissioner, an acknowledged expert on trade issues, to this position, the Commerce Ministry has decided to break all rules by giving the present incumbent S. Narayan an unprecedented fourth extension." आपकी सरकार ने उन्हें चौथी एक्सटेंशन दी है। जब आप सत्ता में आये थे तो कहा करते थे कि रेयरेस्ट ऑफ रेअर केसेज में एक्सटेंशन देंगे। क्या इससे जो लायक ऑफिसर हैं, जिनको आपने अपॉइन्ट किया, इससे उनके मन पर क्या गुजरती है, इस बात पर भी आपको विचार करना चाहिए। मैं माननीय मंत्री जी से विनती करूंगा कि इनका नोटिस लीजिए और इस फैसले को बदलवाकर जो सही हकदार ऑफिसर है, उनको वहां भेजा जाये। इसमें यह भी लिखा है कि पुरी की एपॉइन्टमेंट को रदद् करने के लिए प्राइम मनिस्टर और प्रेसीडेंशियल एसेंट जो मिला हुआ था, वह कौमर्स मनिस्टर मुरासोली मारन ने रूल्स को री-राइट कर दिया है। अन्दरूनी भेदभाव के कारण एडमनिस्ट्रेटिव रूल्स की जो धज्जियां उड़ाई गई हैं, इससे बड़ी दुखपूर्ण बात और कोई नहीं हो सकती। चूंकि समय कम है, इसलिए मैं आंकड़े नहीं दे रहा हूं। मैं केवल एक पैराग्राफ, जो लेटेस्ट विश्व व्यापार संगठन की रिपोर्ट है, जो एग्रीकल्चरल एग्रीमेंट के ऊपर है, उसको पढ़कर सुनाऊंगा। माननीय कृषि मंत्री जी जब पिछली बार बोले थे तो उनकी बातों से मैं बहुत प्रभावित था लेकिन अब यह रिकार्ड सामने है।
"Unfortunately, after five years of implementation of the expected market, excess opportunities have not materialised. The FAO has reported upon the whole view. Studies reported improvement in agricultural exports in the post QR period. "
Hon. Krishi Mantri ji, the typical finding was that "there was a little change in the volume exported or in diversification of products and destination.
Thereafter, it is also written, and I quote:
"According to the statistics, the share of developing countries in world’s agricultural exports remains low "
Mr. Chairman, Sir, from 31.7 per cent in 1972, it fell to 25.4 per cent in 1992 before increasing to 30.7 per cent in 1996-97.
This is the figure, Nitish Kumar-ji, which is smaller than the figure of 25 years earlier. यह २५ साल पहले की फिगर है । इसके ऊपर आपको ध्यान देने की जरूरत है । लेकिनWTO , जनेवा, में एम्बैसडर्स द्वारा फैसले लिए जायेंगे, तो इससे बड़ी लज्जा की और कोई बात नहीं हो सकती है ।
महोदय, सदन में भाजपा के सांसद मौजूद है । मैं फैज़ अहमद फैज़, जो मशहूर शायर है, का एक शेर कहना चाहता हूं । उन्होंने लिखा है -
बोल यह थोड़ा वक्त बहुत है, जिसमें जुबां की मौत से पहले ।
बोल के सच जिन्दा है अब तक, जो कहना है, वह कह ले ।
हमारी पार्टी पर बड़े-बड़े इल्जाम लगाए जाते हैं, लेकिन ग्रीन रिवोल्यूशन देश में हमारे वक्त में आया और किसानों को उनके उत्पादन के भाव मिले । इस बात को वित्त मंत्री, श्री य़शवंत सिन्हा, ने भी माना है कि यह काम हमारी सरकार नहीं कर सकती थी । उन्होंने खुद बोलते हुए, इस बात को कहा है । महोदय, मैं कहना चाहता हूं, विनती करना चाहता हूं कि FCI को डिसबैंड करने की चर्चा पंजाब और हरियाणा के किसानों में है । FCI में बहुत बड़ा स्कैन्डल है । आपको शायद मालूम होगा, अन्नपूर्णा प्रधान मंत्री योजना के तहत ७०० करोड़ रुपए का माल बाहर की बाहर बड़े-बड़े व्य़ापारियों द्वारा, जो एक्सपोर्ट करते हैं, पहुंच जाता है । इस संबंध में मैं दो सौ संसद सदस्यों के दस्तखत करवा कर एक मैमोरेंडम आने वाले दिनों में आपको देने वाला हूं इस आशा के साथ कि आप इसकी जांच करायेंगे । इससे संबंधित आज के अखबार इकोनोमिक्स टाइम्स में जो खबर छपी है, उसको भी मैं पढ़कर सुनाना चाहता हूं।
"Worst harvest in USA may open new lands for Indian Wheat."
It is further said that, "Chicago price which was earlier at the lowest, 2.20 dollar per bushel is today 2.66 per bushel."
हमारे किसान जो गेहूं पैदा करते हैं, उनको किस प्रकार सहूलियतें दी जायें, ताकि वह पैसा कमा सकें, इसके ऊपर मैं एक टिप्पणी करना चाहता हूं । हमारे माननीय सदस्य, रघुवंश प्रसाद जी, कह रहे थे कि इस संबंध में मंत्रियों की एक कमेटी बनानी चाहिए । मैं सदन की जानकारी के लिए सदन की कृषि स्थायी समति के सभापति, श्री एस.एस.पलानिमनिक्कम, की रिपोर्ट के दो शब्द पढ़ना चाहता हूं । रिपोर्ट में लिखा है -
"The Committee was distressed to find that allocation for the Department of Agriculture and Cooperation, as percentage of Central Plan Outlay has been continuously declining. "
Mr. Chairman, Sir, what are they doing. It has been continuously declining. As against the percentage share of 1.87 per cent in 1999-00 and 1.66 in 2000-01, the share of the Department of Agriculture and Cooperation in 2001-02 was only 1.51 per cent.
इससे बड़ी शर्म और लज्जा की बात नहीं हो सकती कि जिस देश में ७० प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हों और उसके लिए बनी स्टैंडिंग कमेटी अपनी रिपोर्ट दे तो उस पर भी अमल न हो। संसदीय प्रणाली और उसकी मर्यादा की इससे बड़ी अवहेलना नहीं हो सकती। आने वाले समय में आपको कोई सख्त कदम इसके लिए उठाना होगा। आखिरी टिप्पणी है "The Committee was constrained to note that an important scheme of revamping of co-operative sector has still not been approved by the Planning Commission."
आप क्या कर रहे हैं? अगर प्लानिंग कमीशन इसको अप्रुव नहीं कर रहा है तो आप क्या कर रहे हैं। आप तो किसानों के हित की बात करते हैं। आपकी नियत खराब नहीं है, मैं इस पर कोई टिप्पणी करना नहीं चाहता हूं। लेकिन धीरे-धीरे प्रोग्राम्स चलाए जाते हैं यह बात आपके सामने है। आपको स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर ध्यान देना चाहिए।
वल्र्ड बैंक का प्रैशर हो या कोई और प्रेशर हो, जब सब्सिडी घटाने की बात की जाती है तो कहा जाता है कि इससे आने वाले दिनों में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में लाभ होगा। लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूं कि धान और गेहूं की कटाई के समय तीस लाख के लगभग प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से पंजाब में आते हैं और अगर धान की खरीद में एक-एक महीना देरी की जाएगी तो गरीब किसान उन गरीब मजदूरों को वेतन कैसे देगा। इस बात की ओर भी आपको ध्यान देना होगा। एफ.सी.आई की परचेज उन्हीं दोनों राज्यों के लिए खतरनाक हो रही है जो देश के खाद्यान्न भंडार में ७० प्रतिशत योगदान देते हैं।
सभापति जी, गऊ-रक्षा के हित में बात करने वाले माननीय प्रधान मंत्री जी और गृह मंत्री जी के लिए आज एक खबर आई है। मैं एक बात बताना चाहता हूं लेकिन भाषण के लिए नहीं बल्कि रिकार्ड के लिए बताना चाहता हूं। आज सुबह ६.५० मिनट पर लोधी गार्डन के बाहर माननीय श्री जगप्रवेश चंद जी, भू. पू. मुख्य कार्यकारी पार्षद दिल्ली जोकि एक प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता हैं और जिनकी किताब" How to win Election" बड़ी प्रसिद्ध हुई वे वहां बैठे थे। नेसले कंपनी के दूध के पैकेट वहां २५ रुपये किलो में मिल रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि आप यह क्या पढ़ रहे हैं तो उन्होंने कहा कि इसमें लिखा है कि इस दूध में कोई बैक्टेरिया नहीं और शूगर कंटैंट लोगों के पीने के मुताबिक हैं। वे वहां काउंटर लगाकर अधिक से अधिक कमाना चाहते हैं। मेरे मित्र सईदुज्जमा जी चले गये हैं। वे कह रहे थे कि राजस्थान और गुजरात में सूखे के कारण और पानी की कमी के कारण लोग अपना पशुधन बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं और दूसरी तरफ " फुट और माउथ"बीमारी के बारे में हमारे कृषि मंत्री जी क्या कर रहे हैं यह मैं पूछना चाहता हूं। राजस्थान और हरियाणा में यह बीमारी फैल गयी है और हमारा मांस जोर्डन, इजिप्ट और सऊदी अरब कंट्री लेने से मना कर दिया है क्योंकि यहां यह बीमारी फैल गयी है। पहले तो सूखे के कारण उनका माल बिक नहीं रहा है और अगर उनका पशुधन इस बीमारी से मर गया तो उनका क्या होगा? युनाइटेड किंगडम में"More than 2,70,000 animals had been slaughtered up to the 21st March." अगर यह बीमारी भारत में आ गयी तो हमारे पशुधन का क्या होगा? इस पर आपको गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है।
मैं आपके सम्मुख एक और बात भी लाना चाहता हूं। यह पार्टी से ऊपर उठकर बात है। स्वर्गीय चौधरी देवी लाल जी किसी भी पार्टी में रहे हों, वे किसानों के एक बहुत बड़े लीडर थे। वे किसी वक्त पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।
किसी वक्त उन्होंने बहुत बड़े कांग्रेस के लीडर की हैसियत से काम किया। वह आज हमारे बीच नहीं हैं। मैं इस बात पर दुख प्रकट करता हूं। सर छोटू राम और चौधरी चरण सिंह किसानों के बहुत बड़े नेता थे। इसके बाद देश के किसानो को बहुत बढि़या लीडर चौधरी देवीलाल मिले। आज वह हमारे बीच नहीं हैं। मैं उनके निधन पर अपनी पार्टी और दूसरे सभी लोगों की तरफ से दुख प्रकट करता हूं।
क्या आपने किसी ऐसे प्रदेश के को वजिट किया जहां किसानों ने आत्महत्या की? पंजाब में ७०० किसानों ने आत्महत्या की। ७०० जवान कारगिल युद्ध में शहीद हुए । जो देश " जय जवान जय किसान"का नारा देता है, आज उस देश में किसान और जवान परेशान हैं। कम से कम जिन प्रदेशों में सूखा पड़ा है, आप उनकी सहायता करें। वित्त मंत्री इस बारे में क्या कर रहे हैं? मैं कृषि मंत्री से विनती करूंगा कि समय की जरूरत है कि आप इस सैशन के बाद घर-घर जाकर उन लोगों का हाल सुनें जो मुसीबत और पीड. का शिकार हैं । "हड्ड बीती जग बीती" आप उनके घर जाकर उनके साथ बैठ कर अफसोस प्रकट करें। आत्महत्या से निपटने के लिए क्या करना है, इस बारे में एक कॉम्प्रीहैंसिव पालिसी बनाएं। इस काम में आपको आगे आना चाहिए।
अब मैं क्रॉप इंश्योरेंस की आपके चरणों में विनती करना चाहता हूं। मुझे अफसोस होता है जब आप कहते हैं कि भाजपा ने देश को एग्रीकल्चर पॉलिसी दी। बलराम जाखड़ साहब ने भी एग्रीकल्चर पालिसी दी थी । एग्रीकल्चर में जो इनक्लाब आया वह कांग्रेस पार्टी की देन है । आपने समय की जरूरत के मुताबिक कृषि नीति दी। संविधान के मुताबिकRight to reside anywhere by adopting choice occupation. It is given under Article 19(1)(e) and (g). It is deprivation of protection to a farmer to buy land anywhere. किसी प्रदेश का किसान किसी जगह जाकर जमीन ले सकता है। यह कॉन्स्टीटयूशनल राइट है लेकिन कई प्रदेशों ने यह पाबंदी लगाई है। पंजाब में कम से कम १५-२० लाख प्रवासी मजदूर आकर बसते हैं और वे प्यार से रहते हैं। उनमें आपस में भाईचारा है। यदि पंजाब के किसी किसान को कहें You have no right whatsoever to purchase land in other States. मैं समझता हूं कि इससे ज्यादा ज्यादती की कोई बात नहीं होगी। आशा है आप इस पर गौर करेंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका आभार प्रकट करता हूं कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया।
डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया (दमोह) : सभापति महोदय, बहुत महत्वपूर्ण विषय पर सदन में चर्चा हो रही है। किसान वास्तव में देश का भगवान है लेकिन उसकी सदा से उपेक्षा होती आई है और वह सदा से दुखी रहा है। इस चर्चा को पार्टी और राजनीति से ऊपर उठ कर करने की आवश्यकता है। किसान की हालत द्रोपदी जैसी है। जब जिस का दाव लगा, उसने चीर हरण करने की कोशिश की। सब को मिल कर इस बात पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। हमें विश्वास है कि नीतीश कुमार जी किसान की इज्जत बचाने के लिए नए कानून बनाएंगे क्योंकि डबल्यूटीओ के कारण उनके सामने एक बड़ा संकट आ गया है। वह उन्हें इससे उबारने का प्रयत्न करेंगे। हमें पता लगा है कि आप एक नया कानून प्रोटैक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी ऐंड फार्मर्स राइट्स बिल द्वारा नई कृषि नीति बना कर उनकी सुरक्षा करने का प्रयत्न करेंगे।
हमारे देश में किसान भगवान भरोसे खेती करते हैं। उसकी जितनी सम्पत्ति बिखरी पड़ी है, चाहे वह खेत हो, खलिहान हो,सब भगवान पर आश्रित रहता है। कभी वर्षा आती है, अतिवृष्टि होती है, कभी सुखाड़ पड़ जाता है और प्राकृतिक आपदा के कारण उसकी सारी फसलें नष्ट हो जाती हैं लेकिन उसे मुआवजा आज तक नहीं मिला है। हमें इस बात की प्रसन्नता है कि अब फसल बीमा योजना लागू करने की कोशिश की गई है। लेकिन राज्य सरकारों ने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। उदाहरण के तौर पर मध्य प्रदेश में आज तक कृषि बीमा योजना लागू नहीं की गई। यदि कहीं लागू भी की गई है तो किसान ने जो कर्ज ले रखा है, उसका बीमा किया गया है, फसल का बीमा नहीं किया गया है। मैं इसमें एक सुझाव देना चाहता हूं कि जब भी फसल का बीमा किया जाये तो जो उसने फसल बोई है, उसका बीमा किया जाये न कि किसी तहसील, जिला को ईकाई मानकर किया जाये, तब कहीं जाकर किसान को फायदा मिल सकता है।
सभापति महोदय, हमने "जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान" का नारा दिया है और आज वैज्ञानिक युग है। हमारे देश में वभिन्न यूनिवर्सिटीज और अनुसंधान केन्द्रो में खेती से संबंधित नई नई खोजें होती रहती हैं जिसका लाभ किसानों को मिलना चाहिये लेकिन वह सैंटर की वस्तु बनकर रह जाता है और किसानों तक वह तकनीक नहीं पहुंच पाती है। किसान को नये बीज, नई पद्धति या उसका कैसे उपयोग करना है, यह जानकारी किसानों तक नहीं पहुंच पाती है। खेती से संबंधित अधिकारी गांवों में जाकर उन योजनाओं को नहीं देखते हैं। इसलिये भी वह तकनीक किसानों तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके लिये हमें विशेष चिन्ता करने की आवश्यकता है।
जो साहित्य हमने पढ़ा है, उसमें विद्वानों ने कहा है कि किसान कर्जे में पैदा होता है, कर्जे में बढ़ता है और फिर कर्जे में ही उसकी इहलीला समाप्त हो जाती है। इसलिये पहले जब मालगुजारी का समय था, प्राइवेट मनीलैंडर्स के कर्जे से किसान दब गया था, उनसे मुक्ति प्रदान करने के लिये बैंकिंग प्रथा शुरु की गई थी जो आज के जमाने में किसानों के लिये हितकारी नहीं है। इसलिये मैं चाहूंगा कि यह सहज, सरल और कम ब्याज की होनी चाहिये ताकि किसानों को कम ब्याज पर खेती के लिये ऋण मिल सके।
सभापति जी, हमारे देश में भू-विकास बैंक हैं लेकिन किसानों की परिभाषा में उन्हें भू-विनाश बैंक या लूट बैंक कहा जाता है। क्योंकि वे रिजर्व बैंक या राष्ट्रीयकृत बैंक से प्राप्त पैसे को ज्यादा ब्याज पर किसानों को ऋण देकर उन्हें लूटते हैं।
भू विकास बैंक से जिन लोगों ने जहां भी कर्ज लिया हैं उनकी सारी जमीनें चली गई हैं, उनके ट्रैक्टर्स बिक गये हैं। उन्होने जो डीजल पम्प्स और इलैक्टि्रक पम्प्स सिंचाई के लिए खरीदे थे, वे बिक गये हैं। मैं माननीय वित्त मंत्री जी को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने बैंको को यह आदेश करके एक समझौता योजना चलाई, जिसमें उन्होंने मूलधन के ऊपर समझौता करने की कोशिश की और इसमें हमारे किसानों की लाखों रूपये की बचत हुई है। उन्होंने यह योजना लगभग दो महीने चलाकर किसानों को राहत प्रदान की है। मैं समझता हूं कि किसानों के लिए जो ऋण की वर्तमान व्यवस्था है, उसके ऊपर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। किसानों को यदि सस्ता ऋण, कम ब्याज पर ऋण मुहैया कराया जायेगा तो निश्चित रूप से वे अपनी खेती को अच्छा बना सकते हैं।
सभापति महोदय, मैं एक दूसरी बात कहना चाहता हूं कल हमारे वित्त मंत्री जी बता रहे थे कि हमने किसानों की फसल का समर्थन मूल्य बढ़ाय़ा है, मैं इस बात के लिए उन्हें बधाई दूंगा। लेकिन यदि वह एक बात और बताते तो हमें और ज्यादा प्रसन्नता होती। आपने किसानों का समर्थन मूल्य बढ़ाया है, लेकिन किसानों की खेती में जितना इनपुट्स लगता है, उसका फसल पैदा करने में कितना खर्चा होता है, यदि उसे उसका लाभकारी मूल्य मिले और इस हिसाब से समर्थन मूल्य दिया जाए तब हम किसानों का ज्यादा हित कर सकते हैं। माननीय अटल जी ने क्रैडिट कार्ड और फसल बीमा योजना की घोषणा करके किसानों के हित में बहुत महान काम किया है। लेकिन इसमें राज्य सरकारों के ऊपर नजर रखने की आवश्यकता है कि वे इस योजना को जल्दी से जल्दी लागू करे, ताकि किसानों के लाभ मिल सके।
इस वर्ष सूखे के कारण फसलें नष्ट और बरबाद हुई हैं। पिछले वर्ष अतिवृष्टि के कारण फसलें बरबाद हुई थीं। लेकिन फसल बीमा योजना लागू न होने के कारण उन्हें किसी प्रकार का मुआवजा नहीं मिला। आज किसान बहुत ज्यादा कर्जे में है। कई जगहों पर हमारे सामने आत्महत्याओं के मामले भी आये हैं। इन स्थितियों को रोकने के लिए हमें किसानो के ऊपर विशेष रूप से ध्यान देना पड़ेगा।
सभापति महोदय, एक चीज मैं और कहना चाहता हूं कि जो लोग यहां बैठे हुए हैं, निश्चित रूप से उनमें आधे से ज्यादा किसान होंगे, खेती से जुड़े हुए लोग यहां विराजमान हैं, लेकिन पार्टी और अनुशासन के कारण हम मुखर होकर किसानों की बातें नहीं करते हैं। यही कारण आज किसानों के सबसे पीछे होने का है। इसलिए मेरा सदन के माध्यम से सुझाव है कि किसानों की एक एसोसिएशन बननी चाहिए, जो विशेष रूप से किसानों के कल्याण की बात करे। निडर होकर, निष्पक्ष होकर राजनीतिक परिवेश से ऊपर उठकर किसानों के हित में जब सब मिलकर चिंतन करेंगे तब हम किसानो का भला कर पायेंगे, नहीं तो भाषण चलते रहेंगे, ऐसी चर्चाएं सदन में हमेशा होती रहेंगी और उनका परिणाम कभी कुछ नहीं निकलेगा।
सभापति महोदय, किसानों को सिंचाई के लिए ट्रैक्टर्स और जनरेटर्स की आवश्यकता होती है। निश्चित रूप से इनके ऊपर डयूटी घटाई जानी चाहिए और राज्य सरकारों को निर्देश भी जारी किये जाएं, ताकि किसानों को लाभ मिल सके। इसके साथ ही मैं निवेदन करना चाहता हूं कि जब किसानों के पास फसल आती है और ईश्वर की कृपा से जब उसके पास इफरात में फसल आती है तो उसके भंडारण का कोई प्रबंध नहीं है, जबकि फसल के भंडारण की व्यवस्था बहुत आवश्यक है। जो सब्जी-भाजी के किसान है, जो ऐसी फसलें पैदा करते हैं जो जल्दी नष्ट हो जाती हैं, उन्हें कोल्ड स्टोरेज और भंडारण की आवश्यकता होती है। मुझे मालूम है कि नई कृषि नीति में आदरणीय नीतीश कुमार जी ने भंडारण व्यवस्था के लिए विशेष ध्यान दिया है। इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं।
मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि जो बातें हमने कही हैं उन पर यदि आप विशेष ध्यान देंगे तो निश्चित रूप से हम किसानों के साथ न्याय कर सकेंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे बोलने का समय दिया।
श्रीमती प्रभा राव (वर्धा): आदरणीय सभापति महोदय, यह ऐसा विषय हमारे सामने उपस्थित हुआ है कि एक अत्यंत गंभीर माहौल में इस पर चर्चा होनी चाहिए, और आपने इस विषय पर मुझे बोलने की अनुमति दी, इसके लिए मैं आपकी आभारी हूं।
सब जानते हैं कि हमारे देश में १९९१ में जो सेन्सस हुआ था उसके अनुसार ७४ प्रतिशत जनता ग्रामीण इलाकों में रहती है और खेती के ऊपर निर्भर है। हो सकता है यह संख्या अब ७० प्रतिशत तक नीचे आ गई हो, कुछ लोग शहरों में बसे हों, मगर तो भी जहां ७४ प्रतिशत जनता रहती है, वहां के लिए जो भी कायदे-कानून बनाने की जरूरत है, क्या उसी तरफ हमारी सरकार जा रही है यह हमें देखना चाहिए। अगर नहीं जा रही है तो उसकी कोई कमियां हैं तो वे क्या हैं और कैसे उनको दूर करना चाहिए यह कुछ सुझाव भी मैं देना चाहती हूं। मैं आंकड़े तो साथ नहीं लाई हूं मगर एक किसान हूं। किसान होने के नाते जो मेरा अनुभव है, उसके आधार पर मैं कुछ बातें कहना चाहती हूं।
पहली बात यह है कि हमने पहले कभी भी अपने देश में नहीं सुना था कि किसानों ने आत्महत्याएं की हों, जितना पिछले तीन-चार सालों से हम सुन रहे हैं। आप जानते हैं कि हर स्टेट में, महाराष्ट्र हो, पंजाब हो, आंध्रा प्रदेश हो, कर्नाटक हो, किसान जहां पर बहुत सुखी रहता था, ऐसे राज्यों में भी किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। इसमें कहां किसकी पार्टी है यह नहीं सोचना चाहिए। मैं समझती हूं कि किसानों की कोई पार्टी नहीं है। किसान की पार्टी स्वयं किसान है और उसकी तरफ उसी नज़र से हमें देखना चाहिए। जैसे हमारे भाई ने अभी यहां पर कहा, उनसे मैं सहमत हूं। हालांकि उन्होंने उस तरफ से बात की, मगर जब तक किसानों के प्रश्नों की ओर हम एक नज़र से नहीं देखेंगे, हम उनकी हालत में सुधार नहीं ला पाएंगे।
माननीय सदस्य डॉ. रघुवंश जी ने जो बात कही, मैं उनकी बात से भी सहमत हूं कि सरकार के विभागों में जितने भी कृषि से संबंधित हैं, उनकी जब तक हम एक कमेटी नहीं बनाएंगे और कृषि में जो कमियां हैं, उन कमियों को दूर करने के लिए जो सुझाव दिए गए हैं, जैसे अभी कृषि मंत्रालय से संबंधित स्थायी समति की डिमांड फॉर ग्रांट्स की १३वीं रिपोर्ट आई है, उसमें कुछ सुझाव दिए गए हैं, उनको अमल में नहीं लाएंगे, तब तक स्थिति में सुधार नहीं होगा। सुझाव आते रहेंगे, कमेटियां बैठती रहेंगी, चर्चाएं यहां भी होती रहेंगी, मगर हमें किस ढंग से आगे बढ़ना है यह तय करना होगा नहीं तो हम अपने किसानों को सुख नहीं दे पाएंगे।
सभापति महोदय, जैसा कहा जाता है और यह सही है कि जल ही जीवन है, अगर जल जीवन नहीं होता तो हर देश की सभ्यता नदियों के किनारे से नहीं उभरतीं और जब नदियों के किनारों से सभ्यताएं उभरी हैं तब भी हम पानी का उपयोग पूरे देश के हर क्षेत्र में नहीं कर पा रहे हैं। उसके लिए हमें क्या करना चाहिए इस पर विचार करने की जरूरत है।
१५.३९ बजे (अध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए) हो सकता है कि यह मामला सिंचाई विभाग से संबंधित हो मगर उनको यह समझना पड़ेगा कि जहां बरसात के बाद बाढ़ से कई राज्यों में बहुत ज्यादा तबाही होती है, उसको हल करने के लिए हमें यह सोचना चाहिए कि जिस प्रकार से हमने इलेक्टि्रसिटी के लिए ग्रिड बनाए हैं ऐसे ही हमारे एक बहुत बड़े साइंटिस्ट थे श्री विश्वेश्वरैया जिन्होंने कहा था कि नेशनल वाटर ग्रिड भी पूरे देश में बनना चाहिए।
उन्होंने कहा था कि वाटर ग्रिड भी हमें पूरे देश के अन्दर बनाना चाहिए। क्या इस दिशा में हमने कुछ स्टैप्स उठाये हैं?अगर नहीं उठाये तो हमें उठाने की प्रायरटी देखनी चाहिए, ऐसा मैं सुझाव देना चाहती हूं। अगर वाटर ग्रिड करें तो मेरे ख्याल से जो सूखा पड़ता है, जैसे राजस्थान में ३-४ सालों से वहां पर ड्राउट आ रहा है, गुजरात में आ रहा है, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ में आ रहा है और महाराष्ट्र जैसे राज्य के कुछ हिस्सों में ड्राउट आ रहा है। अगर यह वाटर ग्रिड होता तो शायद हम लोग पानी इन इलाकों में भी दे सकते थे और वहां की ड्राउट की समस्या को हल करने में मदद होती। इस दिशा में क्या हम स्टैप्स उठा सकते हैं, यह सरकार सोचे, ऐसा मैं उनके सामने सुझाव रखना चाहती हूं।
दूसरी बात यह है कि आज किसानों के लिए जो भी सुविधाएं उपलब्ध की गई हैं, क्या वे सही मायनों में उसके पास पहुंचती हैं, क्या वे उसको मिलती हैं। अगर हम एक उदाहरण इलैक्टि्रफिकेशन का लें तो बिजली की हर राज्य में बहुत प्राब्लम है। किसान के इर्रीगेशन के लिए इलैक्टि्रसिटी तो चाहिए ही। हम लोग यह देख रहे हैं कि इलैक्टि्रसिटी का सिर्फ खम्भा है, इलैक्टि्रस्टी के खम्भे के ऊपर शायद तार भी हो, मगर जो मोटर चलती है, जो इंजन चलता है, उसके लिए न बिजली वहां पहुंचती है। वह बीच में रुक जाती है और रुकने के बाद मोटर जलती है तो उसका इर्रीगेशन रुक जाता है। ऐसी परिस्थिति हर राज्य में आती है। हर राज्य का बिजली बोर्ड इसके लिए जिम्मेदार है, ऐसा मैं नहीं समझती। वह तो जिम्मेदार है ही, मगर क्या हम इसमें सुधार नहीं ला सकेंगे, ऐसा मैं सुझाव देना चाहती थी।
दूसरे मुझे यह भी कहना था कि जैसी प्राब्लम अभी बाहर के देशों से हमारे देश के अन्दर जो चीजें लाते हैं, जो हमारे देश के किसान उत्पादन करते हैं, उसके बारे में यह सोचना जरूरी हो गया है। इसलिए जरूरी हुआ है कि जैसे सब्सिडी विथड्रा कर ली। अगर सब्सिडी विथड्रा कर लेते हैं तो किसान जो इनपुट्स डालता है, क्या उनकी कीमतें कम हुई हैं, नहीं हुई हैं। जब तक इन कीमतों को हम सब्सिडाइज नहीं करेंगे, कम नहीं करेंगे या फिर उसके उत्पादन का उसको जो मूल्य मिलना चाहिए, सब्सिडी के जरिये वह मूल्य नहीं देंगे, तब तक किसान के जीवन में हम लोग कोई भी प्रगति नहीं कर सकेंगे। इसलिए बाहर की हमारी जो नीति हमने तय की, हमने यह देखा है कि हमारे देश में हमारे लिए कौन-कौन सी चीजें कितने अंश में लगती हैं। उसके बाद जो जमीन है, हमारा जो मौसम है, उसके जरिये हम क्या उत्पादित करके बाहर भेज सकते हैं। जैसे खेती के साथ में हम सप्लीमेंटरी उत्पादन बढ़ाने के लिए जैसे डेयरी है, पोल्ट्री है, हार्टीकल्चर है, सुगंधित द्रव्यों के प्लांट्स हैं, मेडीसनल प्लांट्स हैं, जिनका आयुर्वेद में उपयोग होता है और जो चीजें उपयोगी हो सकती हैं। उसके अन्दर मछली और कुक्कुट पालन होता है, सैरीकल्चर होता है। क्या इन सब चीजों के लिए हमने किसान की कुछ मदद की है। जो भी मदद की है, वह इतनी कम मात्रा में है कि उसके कुछ उपयोग लेकर अपने जीवन को अच्छा नहीं कर सकता है।
श्री माधवराव सिंधिया (गुना) : इस साल के बजट में और पिछले साल के बजट में सभी हैड्स में कटौती की है, जिसके बारे में आपने कहा है।
श्रीमती प्रभा राव : हमारे भाई ने अभी यही कहा। स्टेटिस्टिक्स तो मैं नहीं दे रही हूं, लेकिन एग्रीकल्चर कमेटी ने जो भी सुझाव दिये हैं, जहां उन्होंने बढ़ोतरी करने का सुझाव दिया, वहां बढ़ोतरी नहीं हुई है, मगर कटौती हुई है। ऐसा हर क्षेत्र में दिखाई देता है। अध्यक्ष जी, मैं आपसे बहुत नम्रता से यह निवेदन करना चाहती हूं कि हम लोग डाइवर्सीफिकेशन की तरफ भी ख्याल करना पड़ेगा। हम लोगों को सबसे ज्यादा ख्याल मार्केटिंग की तरफ देना पड़ेगा और प्रोसेसिंग करके उसके बाद एक्सपोर्ट की तरफ देना पड़ेगा। ये तीन-चार मुद्दों पर जब तक आप किसान की तरफ देखकर हमारे देश की जो स्थिति है, उसको लागू करके हमारी पॉलिसी तय नहीं करेंगे, तब तक हमारे किसी भी क्षेत्र के किसान प्रगति नहीं कर सकेंगे, ऐसा बहुत दुर्भाग्य से मैं बोलना चाहती हूं।
मैं एक और भी बात आपको बताना चाहती हूं, उसके बाद मैं अपना भाषण समाप्त करूंगी। हमारे यहां एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटीज हैं, वहां रिसर्च होती है। अभी एक भाई ने कहा कि रिसर्च कहीं भी जाती नहीं है। मैंने ऐसा सुना है कि आई.सी.ए.आर. में जो एक्सटेंशन वर्क होता था और किसान के खेतों में जो एक्सपेरीमेंट्स लेकर गांव वाले और किसानों को जो बताया जाता था, वह अब बन्द कर दिया है। वह न टी.वी. पर आयेगा, न चैनलों पर आयेगा, न उसकी चर्चा होगी, न लोग उसे देखेंगे। फिर लोग कैसे समझेंगे कि कैसी रिसर्च हुई और उसका क्या परिणाम हुआ। ये चीजें जब तक हम नहीं सोचेंगे, एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटीज बनेंगी, वहां रिसर्च होगी, वहां जो काम करने वाले अधिकारी हैं, उनकी पगार दी जायेगी, लेकिन उससे किसान का क्या फायदा होगा और कहां तक होगा, वह कुछ भी नहीं होगा। आज एक्सटेंशन वर्क करने की जरूरत है, ऐसा मैं समझती हूं। इसलिए मैं सुझाव देती हूं कि सरकार इस तरफ भी ध्यान दे और एक्सटेंशन वर्क रिसर्च के बाद होकर उसका परिणाम हमारे किसानों को जरूर फायदेमंद बने।
मैं एक और बात भी कहना चाहूंगी कि जो हमारी नेशनल इनकम में, जी.डी.पी. में एड करते हैं, उसमें तीन मुद्दे आते हैं। एक एग्रीकल्चर, एक इंडस्ट्री और एक सर्विस आता है। जब तक हम फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर एग्रीकल्चर के लिए इंडस्ट्री की तरह से नहीं करेंगे, तब तक हमारा किसान ऊपर नहीं उठ सकेगा। जब इंडस्ट्री डूबने को आती है तो हर तरीके से उसको फाइनेंस करके खड़ा किया जाता है, मगर किसान गरीब है, उसकी आवाज कोई नहीं सुनता है। जब उसको फाइनेंसिंग करना है तो उसका सब कुछ नीलाम होता है, उसकी गिरवी रखी जमीन भी नीलाम होती है, यह फर्क क्यों है, इसका विचार सरकार को करना होगा, यह मैं कहना चाहती हूं। वल्र्ड के अन्दर वैबसाइट इसका जो नेटवर्क है, उसी वैबसाइट का उपयोग करके हमारे किसानों का उत्पादन बाहर भेजने के लिए आगे किस वस्तु का उत्पादन करना उनके लिए फायदेमंद हो सकता है, इसका अभ्यास करने की बहुत जरूरत है। इस जरिये से हमारे किसानों की मदद करने की बहुत जरूरत है।
इतना ही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।
15.52 hrs. SHRI A. BRAHMANAIAH (MACHILIPATNAM): Mr. Speaker, Sir, I thank you for the opportunity given to me to speak about the problems that are faced by the Indian farming community. After 52 years of Independence, the agriculture sector continues to remain as the main sector of the country and contributes more than 35 per cent to the country’s total GDP. Even today, more than 60 per cent of our population is depending on agriculture and agro-based industries. But, for the last two years, the growth rate of agricultural products has not increased to even one per cent due to lack of sufficient funds to the agriculture sector and due to some other calamities like cyclone, drought. Due to natural calamities, in States like Orissa, Rajasthan, Andhra Pradesh, farmers are not getting remunerative prices or the Minimum Support Price for their produce.
Take, for example, paddy or wheat or oilseeds or commercial crops like tobacco, cotton, chillies and copra. I am not going to criticise the present Government or the previous Government.
15.54 hrs (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) In the First Five Year Plan, topmost priority was given to the agricultural sector. But in the successive Five Year Plans, allocation of funds to agricultural sector had been reduced.
I want to bring, through you, to the notice of this august House, and to the notice of the Agriculture Minister that farmers are facing a number of problems. Everyone is well aware of the same. But I would like to bring to his notice four or five problems.
As I mentioned, in Andhra Pradesh, the farming community, especially the paddy producers, is not at all getting the minimum support price at present. Unexpected heavy rainfall from 13th to 16th of April has led to major damage to the paddy crop. The FCI is not coming forward to purchase paddy from the ryots. Our Chief Minister, Shri Nara Chandrababu Naidu has requested, through his letters a number of times our Agriculture and Civil Supplies Ministers to come forward to purchase paddy from the ryots at a remunerative price. The Government is also extending maximum support but because of various reasons, millers are also not coming forward to procure paddy. At this juncture, it is very important to safeguard the farming community by providing minimum support price. As a matter of fact, it is not limited to paddy crop.
Yesterday, our Parliamentary Party Leader, Shri Yerrannaidu, and some other Members met the hon. Prime Minister and informed him that sufficient godowns are not available to store plenty of paddy stocks in Andhra Pradesh. We requested the Prime Minister, and as already promised by the Government, nearly 20 lakh tonnes of rice is to be exported to other countries. The procured paddy or rice has to be stored in Andhra Pradesh. The rate was fixed at Rs.675 per quintal, whereas some other countries are offering below that price. That is the reason why not a single tonne of rice has been exported to other countries. In this connection, I would request the Government to come forward to reduce the price so that we can export our targeted quantity of rice to other countries.
The farming community is facing another problem. In the recent Budget, 2000-2001, the procurement policy has been adopted and introduced by the Government. In future, the State Government has to make procurement and the Central Government can only allot some funds. But there are no infrastructural facilities in the States to store the procured paddy. At this juncture, it is not at all good to tell the States to take the responsibility or put the burden on the States to procure or distribute or store. Because of globalisation, the WTO Agreement, and liberalisation, the farming community is facing a number of problems. So, I would request the hon. Ministers for Agriculture and Civil Supplies that the Central Government should continue with the responsibility of procurement.
16.00 hrs. Sir, the farmers of our country are facing another problem due to reduction of subsidy given to fertilisers. In the last year’s Budget, the Government has reduced subsidy given to fertilisers. Due to reduction of subsidy to fertilisers, many fertiliser units have been closed down. So, in future, we have to depend upon foreign fertiliser units to get fertilisers. It will hamper the interests of Indian farmers and they have to pay a higher price to get fertilisers. This has to be reconsidered and we have to, once again, increase the subsidy given to fertiliser industry.
In this connection, I would like to give some details as to how other countries are giving subsidy to their farmers. The United States of America is providing a subsidy US $ 2,000 per hectare, Japan is providing US $ 700 per hectare, and European countries are providing US $ 11,000 per hectare whereas our country is providing only US $ 17.8 per hectare. If such a low amount of subsidy is given to agriculture in our country, how can our farmers face the challenges thrown by globalisation, liberal economic policies and WTO? So, we have to increase the subsidy provided to agriculture in our country. Otherwise, the farmers in our country, who have no infrastructure facilities, who do not have enough subsidy or new technological methods like biotechnology, will not be in a position to compete with the farmers in other countries where they are getting thousands of dollars as subsidy towards agriculture.
Sir, I would like to bring another issue to the notice of the Government and that is regarding palmoline oil. In our State of Andhra Pradesh, we have encouraged the farmers and we have given subsidy to them. Although the import duty on palmoline has been enhanced upto 75 per cent, the farmers are not getting the benefits, because the companies are not giving them remunerative price. So, the hon. Chief Minister of Andhra Pradesh has introduced market intervention scheme last year to help the farmers. Last year, our Government has purchased 65,000 metric tonne palmoline oil and this year the Government wants to purchase 1,05,000 metric tonne of palmoline oil. So, we have requested the hon. Prime Minister yesterday that through the market intervention scheme, 50 per cent should be procured by the Central Government and the rest 50 per cent should be procured by the State Government. This is very much essential. When large quantity of palmoline oil is imported into our country, we have to protect our farmers. So, this matter should also be taken into consideration.
Now, I would like to spell out the following measures which have to be implemented to protect Indian farmers.
First, new and innovative scientific methods should be introduced in agriculture. The results of biotechnology should go to the farmers. Then only we can face the challenges thrown by WTO Agreement.
Secondly, we should expand the mechanism for dissemination of scientific knowledge to the farming community.
Thirdly, developing quality high-yielding varieties of seeds and closing down of public sector seed production agencies which are wreaking with corruption; fourthly, inauguration of a new era for seed production at the village level; fifthly, establishment of independent institutions having accountability; sixthly, bringing changes in the statutes relating to seeds and pesticides.
The other step needed is the establishment of farmers’ clubs or societies by taking four or five villages as a unit for providing access to agricultural tools and modern farming equipment.
Early completion of pending irrigation projects is required. To ensure this, an action plan needs to be prepared and published.
We should encourage the farmers to introduce changes in their cropping pattern linked to the availability of water for irrigation and also to give a go-by to single crop system by substitution and also by inter-cropping practices.
Last but not least, the Government has to accord recognition to agriculture as an industry and also allow freedom to the farming community to determine and control the price structure of their produce.
I also want to bring to your notice the issue of crop insurance. We have already introduced crop insurance scheme at the village level. But, at present, it is not at all suitable. If we introduce crop insurance at the level of survey numbers, it will be more useful to the farmers. So, through you, I request the Government to study the crop insurance policy and introduce it in such a manner so that it is based on survey numbers. Then only, the farmers can get the benefit. Whenever there is flood, drought or some other natural calamity, he can get benefit from the crop insurance. Then, something would be given to the farmers. Otherwise, if we introduce it at the village level, it would not be useful. It is our practical experience.
With these few words, I express my thanks to the Chair. Once again, I request you to, safeguard the interests of the farmers. While we are facing WTO or globalisation, our Government has to come forward to protect the interests of farmers.
श्री चन्द्र भूषण सिंह (फर्रुखाबाद): सभापति जी, आपने मुझे किसानों की परेशानियों के संबंध में बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। इंडिया टूडे पत्रिका की हैड-लाइन खबर में लिखा है कि "खेती करे सो मरे"। गिरती कीमतें, स्थिर उपज और गिरते लाभ के कारण आज खेती गंभीर संकट में है। हिंदुस्तान में पिछले १२ साल से मानसून अच्छी हुई है लेकिन उसके बावजूद किसान की स्थिति खराब हुई है। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि जहां ७० प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर करती है वहां ऐसी हालत आज है। कुल जीडीपी का ३५ प्रतिशत और एम्प्लॉयमेंट का ६५ प्रतिशत खेती के सैक्टर से आता है, फिर भी भारत का किसान असहाय और गरीब है।
६० के दशक में हिन्दुस्तान में पैदावार इतनी कम थी कि आयातित गेहूं और चावल मंगाना पड़ता था। उस समय देशवासियों को भोजन नहीं मिलता था। ७० का दशक आते-आते नए बीज आए, फर्टिलाइजर का इस्तेमाल हुआ और देश आत्मनिर्भर हो गया। ८० के दशक में सरकार का नियंत्रण शुरु हुआ। सबसिडी बढ़ाई गई, प्रोडक्शन बढ़ा लेकिन सरकार ने कोई ऐसी नीति नहीं बनाई जिससे कनजम्शन के बाद का गेहूं इस्तेमाल होता। नतीजा क्या हुआ? कीमतें गिरनी शुरु हो गई। ९० का दशक आते पीडीएस और खुले बाजार में मिलने वाली चीजों की कीमत में दो से ढ़ाई गुना का फर्क था। नतीजा यह हुआ कि जिंसों की कीमतों में गिरावट आई और किसान को अपनी चीजों का वाजिब मूल्य १९९० से मिलना कम हुआ। नतीजा यह हुआ कि उसका मोह खेती के प्रति कम हुआ। पिछले तीन-चार साल से एग्रीकल्चर का प्रोडक्शन लगातार स्थिर है। उसमें किसी किस्म का कोई इजाफा नहीं हुआ। अब एक नई व्यवस्था विदेशी कम्पनियों द्वारा चलने जा रही है और इसका प्रचार-प्रसार जोरों पर है। आर्गेनिक फूड के नाम पर एक व्यवस्था दी जा रही है। हिन्दुस्तान के ५ से १० परसैंट लोग उस फूड को खाना चाहते हैं। इसमें किसी किस्म का कैमिकल या फर्टिलाइजर इस्तेमाल नहीं होता है और उसे खाने से कोई बीमारी नहीं होती है। इसका नतीजा यह होगा कि हमारा प्रोडक्शन फॉल आउट होगा और हम विदेशों के ऊपर निर्भर करेंगे। आर्गेनिक फूड का नारा दिया जा रहा है।
हिन्दुस्तान का किसान वर्ग ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण है जिस के ऊपर प्रकृति का प्रकोप रहता है। कभी ज्यादा पानी पड़ता है, कभी सूखा पड़ता है और कभी भूकम्प का असर होता है। हिन्दस्तान की सबसे पवित्र नदी गंगा मानी जाती है लेकिन यदि उसके पानी को फसल में इस्तेमाल किया जाए तो सारी फसल चौपट हो जाती है क्योंकि उसमें कैमिकल्स हैं। उसका पानी गंदा और काला है। यदि उसे किसी फसल में इस्तेमाल किया जाए तो उसको नुकसान होता है। जहां नहरों का पानी इस्तेमाल होता है और पानी का लैवल ठीक है तो टयूबवैल ठीक काम करते हैं। ऐसी बहुत सी जगह हैं जहां टयूबवैल लगाए गए लेकिन लगातार पानी कम बरसने से पानी का स्तर कम होता गया। जहां डीजल का १० हॉर्स पावर का ईंजन पानी खींचता था आज वहां १५ हॉर्स पावर का ईंजन लगाना पड़ रहा है। डीजल की कंजम्शन ज्यादा होने से कॉस्ट ऑफ एक्सपैंडिचर ज्यादा होगा। पहले बिजली आती नहीं थी। मैं विशेष कर अपने प्रदेश उत्तर प्रदेश की बात कर रहा हूं। वहां किसानों को बिजली नहीं मिलती है। यदि मिलती है तो २२० वॉल्टेज के ऊपर नहीं मिलती। इससे आए दिन मोटरें जल जाती हैं और वे पानी पूरा नहीं दे पातीं।
कल वित्त मंत्री जी कह रहे थे कि हम किसानों को क्रैडिट कार्ड बांट रहे हैं। अच्छी बात है। जो सरकार अच्छा काम करे उसकी निश्चित रूप से सराहना करनी चाहिए। मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि क्रैडिट कार्ड का अभी तक किसानों को उत्तर प्रदेश में बहुत लाभ नहीं मिला है। आज भी बीच के दलाल वहां मौजूद हैं। उन्हें आज भी पैसा साधारण तरीके से उपलब्ध नहीं हो रहा है। यदि उपलब्ध हो गए तो डीजल, फर्टिलाइजर, पैस्टीसाइड्स, इनसैक्टिसाइड्स जब वे लेने जाते हैं तो डीलर उन्हें डुप्लीकेट सामान देता है। ईंजन पर आईएसआई की मोहर लगी होती है लेकिन लोकल ईंजन सप्लाई किया जाता है क्योंकि वे उधार में उसे लेते हैं।
उसका नतीजा यह होता है कि वह इंजिन काम नहीं करता। किसान फर्टिलाइजर, इनसैक्टिसाइड्स, डीजल इस्तेमाल करता है लेकिन एक भी चीज उसे शुद्ध नहीं मिलती है। इन चीजों के इस्तेमाल से खेती का लागत मूल्य बढ़ जाता है।
सभापति महोदय, सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य ६१० रुपये क्िंवटल घोषित किया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उत्तर पदेश की मंडियों में आज भी गेहूं ४९०-५०० रुपये क्िंवटल बिक रहा है और सरकारी खरीद अभी तक शुरु नहीं की गई है। किसान को उसके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। यहां पर कई वक्ताओं ने कहा कि पिछली बार आलू की पैदावार बहुत अच्छी हुई थी। आलू सड़ गया लेकिन किसानों को भाव नहीं मिला। मुझे केरल जाने का अवसर मिला जहा रबड़ का भाव ६५-७० रुपये था लेकिन २० रुपये के भाव पर भी कोई खरीद नहीं सका। यही स्थिति नारियल की रही। नारियल का भी भाव नहीं मिला। मैं पूरे देश की बात इसलिये कर रहा हूं क्योंकि सरकार कहती है कि नई कृषि नीति बनाई गई है। कांग्रेस की तरफ से भी कहा गया कि डा. बलराम जाखड़ के समय में कृषि नीति बनाई गई थी। वह अखबारों में बनी। यह कागजों में बनी, उसके इंपलीमैंटेशन का क्या हुआ? उससे किसानों को क्या फायदा हुआ, इसकी जानकारी हमें अभी तक नहीं मिली है?
सभापति महोदय, किसान ऐसी बहुत सी चीजों का उत्पादन करता है जो कामनली ८० परसेंट पैरिशेबल होती हैं। जब कोल्ड स्टोरेज की बात आती है, क्या सरकार ने इस बात पर विचार किया कि आलू के स्टोरेज के लिये जो तापमान चाहिये, वह टमाटर के लिये नहीं हो सकता है, सेब के लिये नहीं हो सकता, हल्दी, इमली के लिये नहीं हो सकता। क्या सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था करने की बात की है कि अलग-अलग चीजों के स्टोरेज के लिये अलग-अलग वेयर हाउसेस चाहिये।
सभापति जी, माननीय प्रधानमंत्री जी ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत १५०० तक की आबादी वाले गावों को सड़क से जोड़ने की बात की है। यह एक अच्छा प्रोग्राम है। अगर ऐसा हो जाये तो हिन्दुस्तान के किसानों को इससे लाभ होगा। लेकिन आज की स्थिति में किसान जो अपना जिन्स पैदा करता है, उसे शहर की मंडी तक ले जाने के लिये जितना खर्चा होता है, उससे उसका लागत मूल्य नहीं निकलता है। इसलिये मैं सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि इस ग्राम सड़क योजना का जल्दी से जल्दी इंपलीमेंटेशन हो, नई सड़कें आयें ताकि किसानों को लाभ मिल सके।
सभापति महोदय, मैं आपके सामने एक अहम मुद्दा रखना चाहता हूं। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि हमारे देश की ३५ प्रतिशत जी.डी.पी. कृषि से आती है लेकिन उसके रिसर्च पर मात्र एक परसेंट खर्च हो रहा है। अमरीका और कनाडा जैसे विकसित देशों में तीन-साढ़े तीन प्रतिशत कृषि के रिसर्च तथा डेवलेपमेंट पर खर्च होता है। आज डब्लयू.टी.ओ. के तहत क्या होने जा रहा है? मुझे जानकारी है कि वभिन्न मल्टी नैशनल्स कम्पनी बीज पैदा करने वाली हैं और वे अपने रिसर्च सैंटर पंजाब, कर्नाटक में इस्टैबलिश करने की बात कर रहे हैं। हिन्दुस्तान में वे सुविधाएं आज भी उपलब्ध नहीं हैं। पहले विदेशों से बीज आता था जो हिन्दुस्तान की क्लाइमेटिक कंडीशन्स के हिसाब से सूट नहीं करता था। अगर आप सीड्स रिसर्च सैंटर खोल देंगे, हमारे पास पैसा होगा जो हमारे प्रखर बुद्धि के वैज्ञानिक हैं उन्हें ज्यादा से ज्यादा पैसा देकर अपने रिसर्च सैंटर्स में लगा देंगे तो वे हमारे लिए अच्छे बीज पैदा कर सकते हैं। वे हर राज्य की जलवायु के हिसाब से बीज तैयार कर देंगे। यदि विदेशी कम्पनियां इस प्रकार के बीज पैदा करेंगी तो वे अपनी कीमत पर बेचेंगी उससे किसानों को फायदा नहीं होने वाला है। यदि हमारे देश के वैज्ञानिकों को अनुसंधान कार्य के लिए सिर्फ एक प्रतिशत खर्चा देंगे तो वे अच्छी क्वालिटी के बीज कैसे पैदा कर सकते हैं और उनसे आप कैसे आशा कर सकते हैं कि वे किसानों के लिए नई तकनीक बना कर देंगे। इसलिए मेरा निवेदन है कि रिसर्च कार्यों पर सरकार को पैसा बढ़ाना चाहिए ताकि हमारे वैज्ञानिक भी नये सीड दे सकें।
सभापति महोदय, मैं डब्ल्यू.टी.ओ. के संबंध में भी थोडी चर्चा करना चाहता हूं। जैसा सभी जानते हैं कि १९९४ में इस पर दस्तखत हुए थे। डब्ल्यू.टी.ओ. की सबसे बड़ी उलझन क्या हुई, अमेरिका, चाइना, कनाडा या जो भी बड़े देश थे, उन्होंने डब्ल्यू.टी.ओ. का मुद्दा अपनी पार्लियामैंट में डिस्कस करने के बाद अपने हिसाब से बनाया और अपने हिसाब से उसके कायदे-कानून इम्पलीमैंट करवाये। लेकिन हिदुस्तान में क्या हुआ, बगैर किसी डिस्कशन के एग्रीमैंट पर दस्तखत कर दिये गये जिससे आज हमारी परेशानियां बढ़ रही हैं और उन्ही परेशानियों के तहत पूरी जनता में और इस हाउस में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। १९९४ से लेकर २००१ में हम आ गये, यदि डब्ल्यू.टी.ओ. लागू करना था तो सरकार ने क्या प्रयास किया कि हम कम्पीटीटिवली और क्वालीटेटिवली अपने किसानो को यह समझाते कि हमें विश्व बाजार में आना है, हमें अच्छी क्वालिटी भी देनी है और कम कीमत में देनी है, ज्यादा पैदावार करनी है। लेकिन सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया। यदि वह ऐसा करती तो हमारे किसान का मानसिक स्तर इस बात के लिए तैयार होता कि हम विश्व व्यापार में जा रहे हैं और हमें इन सारी चीजों को देखना चाहिए।
सभापति महोदय, बात आती है डब्ल्यू.टी.ओ. में हिन्दुस्तान से सामान जाने की। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदुस्तान की कोई भी चीज चाहे एनीमल का मांस हो या चाहे कोई भी प्रोडक्ट हो, ऐसा नहीं है कि जिसमें कोई बीमारी न हो। पहली ही बार में पूरा कन्साइनमैंट लौटा दिया जाता है। हां, ऐसे देश आपका माल लेने के लिए तैयार हैं जिनके पास पैसा नहीं है। अब इसकी वजह क्या है। मैं अभी पिछले दिनो पढ़ रहा था कि यदि किसानो को अपने खेतों को बीमारी-रहित करना है तो उसे ५६०० रुपये एक एकड़ मे खर्चा आयेगा फिर उसका खेत बीमारी से मुक्ति पा जायेगा। ५६०० रुपये एक एकड़ पर कौन खर्च कर सकेगा। लागत लगाने के लिए उसके पास पैसा नहीं है, जिन्स की उसे कीमत नही मिलती है, ५६०० रुपये लगाकर पहले वह जमीन की बीमारी दूर करे, खुद की बीमारी उसकी दूर नहीं होती, इसलिए वे बेचारे आत्महत्या कर रहे हैं, मर रहे हैं। वे जमीन की बीमारी कैसे दूर कर सकेंगे। इसका नतीजा क्या होता है। सभापति महोदय, अभी विगत दिनों में आलू के एक्सपोर्ट की बात थी। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने यह बात कही थी कि हम आलू एक्सपोर्ट करेंगे। उन्होंने एक क्िंवटल भी एक्सपोर्ट नहीं किया, लेकिन उन्होंने बात बड़े जोर से कही थी। आपका आलू विदेश में कैसे जायेगा, उसमें इतनी परसेंटेज कारबोहाइड्रेट है और इतनी परसेंटेज पानी की है। आपका आलू कोई पूछने वाला नहीं है। क्या सरकार ने कभी कोई ऐसा एक्सटेंसिव प्रोग्राम चलाया या कोई ऐसी वैरायटी इन्ट्रोडयूस की जिसमें कारबोहाइड्रेट और वाटर की परसेन्टेज कम हो। ऐसा कुछ नहीं किया, सारा का सारा आलू या तो वायरल इनफैक्टिड है या बैक्टीरियल इनफैक्टिड है। इसका मतलब यह हुआ कि जहां हमे दाम मिलने वाले हैं उन देशों में यह आलू नहीं जायेगा। मेरा आपसे सिर्फ एक ही निवेदन है कि गेहूं की बात कीजिए, चावल की बात कीजिए, परंतु क्वालीटेटिवली हम अभी भी अपने को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पाये हैं। क्योंकि हिंदुस्तान के सामने पहले खाद्य समस्या था। ग्रीन रिवोल्यूशन के नाम पर किसान ने मेहनत करके देश को समृद्ध बनाया है, देश को इस काबिल बनाया है कि हम सभी देशवासियों को खाना देने में सक्षम हुए हैं, लेकिन आज उसकी कोई सुनने वाला नहीं है। क्योंकि सरकार भी ऐसा देखती है कि अब तो विदेशों से सारी चीजें आ ही जायेंगी।
यह बात भी उठी थी कि डम्िंपग के लिए कोई बार कमेटी बनाई जायेगी। वह बार कमेटी कहां गई जब अभी चाइना का सारा सामान हिंदुस्तान में डम्प हो गया। हिंद्स्तान का एडमनिस्ट्रेशन क्या कर रहा था। हमारी सरकार कहां सोई हुई थी। चाइना के सामान में सबसे सस्ते रेट पर पेंसिल सैल जिसकी कीमत भारत में साढ़े सात रुपये थी, आज वह डेढ़ रुपये में मिलता है। हिंदुस्तानी में चाइनीज साइकिल साढ़े चार सौ रुपये में मिलती है। आज इन चीजों से बाजार भरा पड़ा है, लेकिन कोई खरीदार नहीं है। क्या वजह है? ये सब ऐसी चीजें हैं, जिनकी तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिए। समय रहते आपको इस पर ध्यान देना चाहिए। मेरा निश्चित ही ऐसा मानना है कि अभी भी वक्त है कि इस स्थिति को आप संभाल सकते हैं।
सभापति महोदय, मैं सब्सिडी के बारे में थोड़ी सी चर्चा करना चाहूंगा। महोदय, मैं पांच मिनट में समाप्त कर दूंगा, आप घंटी न बजायें वरना मैं डर जाऊंगा। सब्सिडी के नाम पर जो भी अमरीका या कनाडा चीजें हन एक्सपोर्ट करेंगे और वहां से जो चीजें बाहर भेजेंगे उस पर उन्होंने २४५ परसेन्ट सब्सिडी दी हुई है।
यहां की स्थिति क्या है? यहां आज भी ऐक्सपोर्ट के नाम पर छूट देने के लिए ये तैयार नहीं हैं फिरे कैसे विश्व बाज़ार की प्रतियोगिता में आप टिक पाएंगे? जब तक सरकार इन सारी चीजों में सहायता नहीं देगी, विश्व बाज़ार में आप टिक नहीं पाएंगे। डैवलपिंग कंट्रीज़ में शुरूआती दौर में अमेरिका १ हैक्टैयर जमीन पर २००० डॉलर की सब्सिडी देता है और हिन्दुस्तान में १ हैक्टेयर में १७.५ डॉलर देने में भी लाले पड़े हुए हैं। ऐग्रीकल्चर प्रोडक्शन इस साल भी अगर कम हुआ तो समझ लीजिए कि आर्थिक गुलामी की ओर हमारे पैर अग्रसर हैं और यदि समय रहते इस पर गौर न किया तो हमारी गुलामी ऐसी गुलामी होगी कि २०० साल में हम अंग्रेजों से तो स्वतंत्र हो गए लेकिन इस आर्थिक परतंत्रता से आपको मुक्ति नहीं मिलेगी।
लागत की बात आती है। सरकार की नीति बन गई कि दो प्रतिशत इंप्लॉइज़ कम करेंगे। बहुत अच्छा हुआ क्योंकि सिर्फ नौकरियों पर यदि मुनस्सर रहकर जिया जाए तो संभव नहीं है और किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है कि सभी लोगों को वह नौकरी दे सके। लेकिन आप कैसे कंपीटीशन करेंगे। ब्राजील में १ मलियन टन शक्कर तैयार करने के लिए मात्र २३६ आदमी लगते हैं। उसमें सिक्यूरिटी भी है और सारे काम करने वाले लोग हैं। हिन्दुस्तान में १ मलियन टन शक्कर पैदा करने के लिए दस हजार व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। आप कहां स्टैन्ड करेंगे? कौन सी व्यवस्था आप बनाएंगे? हमारे आपके सामने रोज उदाहरण आते हैं। पेप्सी कोला जब हिन्दुस्तान में आया तो तीन रुपये में एक बोतल मिलती थी। उसने जितनी सॉफ्ट डिं्रक कंपनियां थीं उनको एक के सौ रुपये देकर खरीद लिया। आज दस रुपये में वह पैप्सी कोला मिलती है। आगे स्थिति क्या होगी कि यदि आप खरीदने के काबिल हुए और सौ रुपये में भी वह बेचेंगे तो आपकी मजबूरी होगी और आप खरीदेंगे। एन.टी.सी. के सारे कारखाने बंद हो रहे हैं, छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं, ऐग्रो बेस्ड इंडस्ट्रीज़ बंद हो रही हैं। सरकार का उस तरफ ध्यान नहीं है। मैं निवेदन करता हूं कि सरकार को इस पर सचेत होना चाहिए और हमारे किसानों की स्थिति पर गौर करना चाहिए। अभी बरार साहब कह रहे थे कि जितने लोग कारगिल में मरे हैं, उससे दोगुने आत्महत्या कर चुके हैं। यही स्थिति आंध्रा प्रदेश और अन्य राज्यों की है। इन परिस्थितियों से बचने के लिए यदि किसान को जिन्दा रखना है तो सरकार को मदद करनी होगी और सरकार को मदद करनी चाहिए।
SHRI A.P. JITHENDER REDDY (MAHABUBNAGAR): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for providing me an opportunity to participate in the discussion. A lengthy discussion has taken place till now, for the past three hours, about the problems faced by the farmers.
Sir, as we all know, agriculture is the mainstay of our economy as it provides livelihood to most of our people. It is heartening to hear from the hon. President’s Address that India had record foodgrains harvest of 209 million tonnes last year. Our buffer stock has crossed an all time high of 40 million tonnes. It is further heartening to note that India has become the largest producer of milk and the second largest producer of rice, wheat, fruits and vegetables in the world. Our beloved country also happens to be the world’s fifth largest producer of eggs and sixth largest producer of fish.
Sir, with this bright picture of the agriculture sector in mind, for which our farmers deserve highest commendation, the poor plight of farmers continues. In the words of Dr. M.S. Swaminathan, farm scientist "though India is a grain-surplus country and has over 45 million tonnes of wheat and rice in its godowns, over 250 million children, women and men go to bed partially hungry everyday". From being food secure, India needs to become livelihood secure and that is the biggest challenge facing the country today.
The results of the 55th Round of the National Sample Survey Organisation released recently reveal that over 26 crore of the country’s population live below the poverty line. In terms of percentage, 26.10 per cent of the Indian population live below the poverty line. More recently, considerable concern has been expressed on whether the Indian agriculture would be adversely affected by a flood of subsidised imports under the WTO regime which will be able to enter our market when Quantitative Restrictions (QRs) are removed with effect from 1st April, 2001. There is an apprehension among the farmers that after the removal of QRs on various agro items, they will not be able to compete with their imports that will be much cheaper than the present rates prevalent in the domestic market.
Now, coming my State of Andhra Pradesh, I would like to submit that ten districts of the Telengana region of the State are declared as drought-prone areas. The entire region is hit by drought every year. Agriculture is dependent only on lift irrigation. Lift irrigation is not properly given and electricity supply is not proper. There is a lot of voltage fluctuation and the farmers face a lot of problems due to this when the yield is coming in.
The Telengana region does not have proper water, proper lift irrigation system and today there is no adequate supply of power. The region is facing today a very bad situation. There are no alternative crops which are being suggested to the farmers. Everybody knows that when there is no adequate water supply, paddy should not be grown. They should come out with alternate crops. There are so many research centres which have been financed by the Government and there are NGOs which are moving around with so many schemes. But nobody comes to the rescue of the farmer.
The farmers in Andhra Pradesh are also suffering with the abnormal power tariff which has been imposed on them. The commercial products like tobacco, turmeric, groundnut, sunflower, horticulture etc. are not being undertaken although researches have shown that there is profit in this. This is due to the high tariff of electricity.
The situation is so bleak today that no farmer is encouraging his son to do farming. They are not allowing their sons to take up the profession which their forefathers have left for themselves. There are a lot of farmers who are migrating to the neighbouring districts in search of jobs. They are going to other places in other States and are working on the projects there, leaving behind their profession.
I would like to share my experience with regard to the problems of farmers of my constituency in Mahaboobnagar district, Andhra Pradesh.
Mahabubnagar is the largest district in Andhra Pradesh where 80 per cent of the population depends on agriculture and a majority of them are below the poverty line. As I myself belong to the farmer class, I have seen them from close quarters.
Sir, enquiries have been made. They invest about Rs. 14,000 on one acre of land. After investing Rs. 14,000 on one acre of land, they wait for the yields. There is no proper supply of water. There is no proper irrigation system for them. There is no proper supply of electricity. No proper fertilisers are given to them. At the end of the day, the farmer, who has invested Rs. 14,000 on one acre of land, stands back and waits, with the loans which he has accumulated, for the yield. The money is being brought on loan and at the end of the day, he does not get anything from the yield. Thus, either he has to sell his land or he has to commit suicide. Sir, you know that the cotton farmers had committed suicides and they still linger in our memories. A lot of farmers have committed suicides. The groundnut farmers had committed suicides. The cotton farmers had committed suicides. Now, I think, it is the turn of the paddy growers this time.
All the 64 Mandals in Mahabubnagar district have been declared as drought prone areas. Fortunately, last year, there had been good rains. The farmers were happy thinking that such good rains had come and they could again go back to their old profession. So, they again went to the moneylenders, took the loans and sowed the seeds. There was a very good yield which had come out. They had bought the pesticides and were giving the last touches to the yield so that some insects did not infect the crop, but unfortunately, they did not know that there was a very big insect coming, that is, WTO. After all this, they have taken their yields to the market and the rate which was given to them was only Rs. 540 per quintal. With this amount, they could not even pay the interest on the loan which they had brought in. This again brought them back to square one.
Mr. Chairman Sir, I can see that there is a lot of money which is being earmarked for training programmes for the farmers. I fail to understand what kind of training is being given to them when they cannot be cautioned about the WTO and cannot be advised about alternative crops. My concern is that farmers have to be enlightened on WTO and various other crops which will fetch them some money. Research should be carried on and farmers should be advised on what would probably fetch them good returns for their toil. This is one part of the sufferings of the farmers in the villages.
Secondly, I would like to highlight the poor sanitary conditions in the villages. When you go to a village, you can find only shit everywhere. There are no hygienic conditions in the villages. There is no person to look after these people. Today, we are talking of the hi-tech information technology all over the world, but we are forgetting our poor farmers, who are actually the backbone of the country.
I know that the Government is taking good steps. To reduce the impact of WTO, they have made efforts and they have taken a number of steps. They have introduced heavy import duties on certain agricultural products. As a matter of fact, duties have been revised upward to safeguard the interests of the domestic farmers, time and again.
For example, the basic customs duty on refined edible oil was increased from 15 per cent to 25 per cent in December 1999, and a further ten per cent increase in basic customs duty had been effected from July 2000. On 6th March, the hon. Prime Minister has committed to the farmers, in a large gathering of farmers at Kurukshetra, that the interests of the farmers would be protected.
I am also glad that the Budget 2001-2002 has given some incentives to the farmers like the Kisan Credit Cards, coverage of life insurance etc. However, there is not much to feel comfortable about it, as there is a lot more to be done to the poor farmers.
I would like to mention about coverage of life insurance. Today, not even 25 per cent of the farmers have received their insurance. Seventy-five per cent of the farmers are still moving around the DM offices, around the MRO offices for collecting the amounts. When this particular scheme has been introduced, I request the Government to also see that it goes to the end-users and not to the middlemen. Basically, we should not forget that without kisans, our country is not there. Keeping in view the importance of the farmers, while whatever facilities we are providing to the other different sectors, we should not forget the farmers.
I conclude by saying that the farmers are the backbone of the country and, therefore, they should not be neglected. Thank you.
श्री तिलकधारी प्रसाद सिंह (कोडरमा): सभापति जी, कई बार से किसानों की चर्चा होती आ रही है। हम सब किसान हैं, गांव की समस्याओं से अवगत हैं, पर फलाफल की चर्चा कभी हो नहीं पाती। कितनी ही घोषणाएं सरकार करती आ रही है, पर सरजमी पर कोई बात नहीं उतरती है।
अभी माननीय वित्त मंत्री जी ने किसानों के लिए करेडिट कार्ड की बात कही, फसल बीमे की बात कही, यह पहले से भी चला आ रहा है, पर जो तजुर्बा मुझे है, सारे सदन को भी है कि इसको जहां पर पहुंचना चाहिए, जिसको इसका लाभ होना चाहिए, वहां अभी तक कुछ नहीं हो पा रहा है और जो व्यवस्था है, उस व्यवस्था से उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि जिसके लिए आपने व्यवस्था की, आप वहां तक उसे पहुंचा पायें। किसानों की मुख्य समस्याएं सिंचाई और बिजली की हैं। सिंचाई के लिए कुएं चाहिए, चैक डैम चाहिए, तालाब चाहिए और उसके लिए बिजली चाहिए। ये दोनों महत्वपूर्ण बातें हैं, जो कहीं उपलब्ध नहीं हो रही हैं। किसान चाहते हैं कि मुझे कुआं मिले, चैकडैम मिले, तालाब मिले, पर इसके लिए बजट में कोई व्यवस्था नहीं है। डायरैक्ट कुआं देने के लिए, तालाब देने के लिए पहले व्यवस्था थी, मलियन वैल्स के माध्यम से किसान को कुआं उपलब्ध किया जाता था, पर पिछले साल अप्रैल से इस योजना को स्वर्ण ग्राम योजना में परिवर्तित कर दिया गया और कहा गया कि कामर्शियल बैंक के माध्यम से पावर्टी के नीचे जो किसान हैं, वभिन्न कैटेगरीज के, उनको कर्ज दिया जायेगा और उसी के अनुरूप उनको अनुदान दिया जायेगा। पर आप रिव्यू करेंगे, गांव में देखेंगे तो आपने कामर्शियल बैंक को जो टार्गेट दिया, किसी ने इस टार्गेट को पूरा करने की कोशिश नहीं की।
उनकी उपलब्धियां नगण्य हैं। इसलिए इन बिन्दुओं पर जैसा कि सभापति जी आपने कहा चर्चा से क्या होगा, सही बात है। यहां पर चार घंटे, आठ घंटे या दो दिन तक बहस होगी, फिर मंत्री जी उत्तर दे देंगे और बात खत्म हो जाएगी। आपने जैसा सुझाव दिया कि किसान की समस्या कई विभागों से सम्बन्धित है। वित्त विभाग से भी सम्बन्धित है, बिजली विभाग से भी सम्बन्धित है, खाद विभाग से भी सम्बन्धित है, तेल के लिए पैट्रोलियम विभाग से भी सम्बन्धित है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि किसान की समस्या ठीक ढंग से हल हो तो सरकार को ग्रुप आफ मनिस्टर्स की कमेटी बनानी चाहिए और एक संसदीय समति का गठन किया जाना चाहिए। अभी क्या होता है कि कृषि मंत्री जी के पास किसान की समस्याएं आती हैं तो ये वित्त विभाग को या फर्टिलाइजर विभाग के पास भेज देते हैं। वहां से जवाब आता है और निर्णय होता है तो संसद का दूसरा सत्र आ जाता है और फिर किसान की समया पर हम लोग चर्चा करते हैं। कारगर ढंग से काम हो, जैसा आपने सुझाव दिया मंत्रियों के ग्रुप की समति का और संसदीय समति के गठन का, उससे मैं भी सहमत हूं और मैं समझता हूं सारा सदन सहमत होगा। इससे किसान की समस्याएं दूर हो सकेंगी। जैसे आप यहां से अपनी वभिन्न योजनाओं के लिए फंड देते हैं, उसका सही उपयोग हो रहा है या नहीं, यह चीज ये समतियां अच्छी तरह से देख सकती हैं।
किसानों के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई सरकारों ने घोषणा की कि उनके दस हजार रुपए तक के ऋण माफ कर दिए जाएंगे, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं हुआ। किसान जब इसके लिए पूछने जाता है कि क्या मेरा कर्जा माफ हो गया तो उसे उसके ऋण के बारे में चक्रवृद्धि ब्याज लगाकर कई गुणा रकम अदायगी का पत्र दे दिया जाता है, जिसे वह अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर भी नहीं चुका पाएगा। इसलिए सरकार इस बात पर रिव्यू करे कि जो यह घोषणा की गई थी, उसमें क्या कमी रह गई और कैसे वह दूर की जा सकती है।
बिहार और झारखंड में काफी गर्मी पड़ रही है। किसान को सिंचाई की तो बात छोड़िए, पीने के लिए भी पानी नहीं मिल रहा है। ग्रामीण विकास विभाग से जो योजनाएं जाती हैं, फंड जाता है लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हो रहा है। आपने स्टोरेज की बात कही, लेकिन आज भी किसान को अपना माल रखने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। किसान अपनी उपज को मार्केट में कैसे ले जाए, सड़कें नहीं हैं। सरकार को धन्यवाद दिया जा सकता है कि उसने ग्रामीण सड़क योजना शुरू करने की बात कही है। लेकिन मार्च तक उसकी क्या रूपरेखा होगी, यह भी पता नहीं चल पाया है। दो महीने के बाद मानसून शुरू होगा, फिर कैसे आप गांवों में सड़कों का निर्माण करेंगे।
किसान की हर तरफ से हालत दयनीय हो रही है। इसलिए मेरा मंत्री जी से निवेदन है कि उसकी समस्याओं का समाधान करने के लिए आप मंत्रियों की एक समति और एक संसदीय समति बनाएं, जो उस पर विचार करे। आप जितने भी आंकड़े देंगे, उससे कुछ नहीं होगा। हम लोग बिहार से, झारखंड से आते हैं, वहां किसानों की अपनी समस्याएं हैं। मेरे क्षेत्र कोडरमा में लोग कुओं की मांग कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इसे पूरा कर दो तो हमारा काम बन जाएगा। लेकिन सरकार कुओं के निर्माण की जगह कृषि विज्ञान केन्द्र खोलने की बात करती है। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि झारखंड में कितने ऐसे कृषि विज्ञान केन्द्र खोले गएहैं ?कहा जाता है कि किसानों को ट्रेनिंग दी जाएगी, लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।
इसलिए मैं अधिक समय न लेकर इतना ही निवेदन करूंगा कि किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए आप ग्रुप आफ मनिस्टर्स की समति और एक संसदीय समति का गठन करें, जिससे यहां रोज-रोज किसानों पर चर्चा करने की जरूरत न पड़े।
श्री अरुण कुमार (जहानाबाद): सभापति महोदय, आपने कृषि पर चर्चा हेतु मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। आज पूरे जोर शोर से किसानों और गांवों के बारे में चर्चा हो रही है। कई बार यहां चर्चा हुई और आज भी काफी विस्तार से किसानों के सवाल पर आंकड़ों के साथ बड़े वैज्ञानिक तरीके से चीजों को माननीय सदस्यों ने रखने का काम किया है। मैं कुछ सवालों की ओर माननीय मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा कि चर्चा इस पर चाहे जितनी हो, निस्चित तौर से जब हम कृषि नीति पर चर्चा करते हैं, किसानों के बारे में चर्चा करते हैं तो गांवों के सम्पूर्ण विकास की चर्चा करनी होगी। सिर्फ कृषि से जुड़े किसान के उत्पाद से ही उसका मतलब नहीं रह जाता।
आज की जो स्थिति रही है, इसमें निश्चित तौर से कहीं न कहीं हमारी नीतियां कमजोर रही हैं। कहीं इच्छा शक्ति की भी कमी रही है। जब तक गांवों को केन्द्र में रखकर हमारी योजनाएं नहीं बनतीं और वह चाहे ब्यूरोक्रेसी के दबाव में हो या और किसी दबाव में हो, आजादी के बाद जो गांवों की रूपरेखा और गांवों की मजबूती के लिए जो संकल्प शक्ति होनी चाहिए थी, उसका अभाव देखा गया है। कुसमरिया जी ने कहा कि हम दलगत बंधनों से बंधकर किसानों के मूल सवाल पर एक रस्मी तौर पर चर्चा करते हैं। कई स्टैप्स लिये गये हैं। आजादी के लम्बे अर्से के बाद राष्ट्रीय कृषि नीति बनी। हम इसके लिए सरकार को बधाई देना चाहते हैं लेकिन पचास साल हो गये हैं। ५२ वर्ष में राष्ट्रीय कृषि नीति का निर्माण हुआ, यह भी अपने आप में एक उदाहरण है कि किसानों की उपेक्षा हुई है, गांवों की उपेक्षा हुई है। आज हम माननीय मंत्री जी से निवेदन करना चाहेंगे कि किसान एक ऐसा संवर्ग है कि जब वह ऋण लेता है और उस कर्जे की अदायगी वह नही कर पाता है तो वह जेल जाता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रटिश काल में जो कानून बना था, उसमें किसान शोषण का सबसे बड़ा केन्द्र था और आजादी के लम्बे अर्से के बाद भी आज वही कानून बना हुआ है। यदि किसान कर्जे की एवज में जेल जाएगा तो जेल में हुए खर्चे को उस कर्जे में जोड़ दिया जाता है। एक तरफ जघन्य अपराध में अपराधी यदि जाते हैं ,स्कैम करने वाले जाते हैं तो उनको सुविधाएं देने के लिए जेल मैनुअल है और उनको सुविधाएं दी जाती हैं लेकिन किसान सबसे ज्यादा उपेक्षित है, इसलिए इस काले कानून को निश्चित तौर पर समाप्त किया जाना चाहिए - यह अपने आपमें एक कलंक है ।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार को इस बात के लिए बधाई देना चाहता हूं कि देश में इस वक्त निश्चित तौर पर वैज्ञानिक क्रान्ति हुई है । हमारे कृषि मंत्री किसान परिवार से आते हैं और उन्हें किसान की पीड़ा का अनुभव है । उन्होंने इस दिशा में कई प्रयास किए हैं, जैसे दुनिया के बाजार में भारतीय किसानों की शक्ति बढ़े । लेकिन इस दिशा में जो भी प्रयास किए गए हैं, वे ऊंट में मुंह में जीरे के समान है । वास्तविक स्थिति यह है कि किसान और मजदूर तबाही के कगार पर खड़े हैं और खास कर बिहार के किसानों की बहुत ही दुर्दशा है । कारण यह कि राज्य सरकार को कोई चिन्ता नहीं है और विकास के नाम पर जो ढांचा तैयार किया गया है, उससे बिहार के किसानों के विकास की सम्पूर्ण संरचना ध्वस्त हो गई है । ऐसी परिस्थिति में, लगभग एक करोड़ मजदूर और किसान, बिहार से बाहर जिल्लत की जिन्दगी जी रहे हैं, जद्दोजहद की जिन्दगी जी रहे हैं। बंटवारे के बाद किसानों की परेशानियां बढ़ी हैं, वहां संसाधन नहीं है, इसलिए निश्चित तौर पर सम्पूर्ण और समेकित विकास के लिए योजनायें बननी चाहिए । माननीय सदस्य, श्री तिलकधारी प्रसाद सिंह, ने सुझाव दिया है कि ग्रुप आफ मनिस्टर्स की एक टीम बनानी चाहिए। यह सत्य है और इसके बिना गांव का विकास संभव नहीं है । गांवों में साक्षरता अभियान के नाम पर हजारों करोड़ रुपए भेजे जा रहे हैं, लेकिन अब तक साक्षर किसको बनाया गया है। यदि हम वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करेंगे, तो पायेंगे कि निश्चित तौर पर कागजी कार्यवाही हुई है । इसलिए डीआरडीए, इंदिरा आवास और जलप्रबन्धन आदि योजनाओं पर पुनर्विचार करना होगा । जलप्रबन्धन योजना एक पारम्परिक योजना थी, यह योजना भी ध्वस्त हो गई है । इसी प्रकार चक डैम और पुल-पुलिया भी कागज पर ही बनाए गए हैं । जिनके पास साधन है, उनको ही सुविधायें मिल जाती हैं । इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि गांवों के विकास की योजनायें बनानी चाहिए । स्वास्थ्य, खेती और शिक्षा से संबंधित योजनायें बनानी चाहिए । एक तरफ किसानों की समस्यायें हैं और दूसरी तरफ बड़े घरानों पर बैंकों का जो १८ हजार करोड़ रुपया बकाया है , 17.00 hrs. उसकी वसूली के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया है। बैंक किसानों के विकास के लिए खोले गये लेकिन वहीं बैंक आज भूमि लूट बैंक के रूप में साबित हो रहे हैं। जितनी भी योजनाएं वभिन्न माध्यमों से चलाई जा रही हैं उनमें बैकों की जो भूमिका है उसकी अगर जांच कराई जाए, उसका सर्वे कराया जाए तो निश्चित रूप से आप पाएंगे कि बैंक टैम्पो, गाड़ी और ट्रक खरीदने को प्रोत्साहित करते नजर आयेंगे लेकिन गाय-भेंस की खरीद के लिए पैसा देने में इतना दौड़ाएंगे कि किसान इनके खरीदने का विचार ही छोड़ देता है। ऐसी बैंक के पदाधिकारियों की मानसिकता है और यह मनोवृति किसान विरोधी है। बैंकों में १८ हजार करोड़ रुपये का घपला हुआ, इस पर तो कोई जोर नहीं चला, शोर नहीं हुआ लेकिन किसान के प्रति जो मानसिकता है वह खतरनाक है। इसलिए किसान की समृद्धि और विकास की जब हम चर्चा करते हैं तो हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि किसान और गांव ही हमारी ऊर्जा और ताकत के रुाोत है। चाहे वह राष्ट्र की शक्ति के रूप में हमें वह दिखे या जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के रूप में हमें दिखे। हमें समझना होगा कि गांव ही हमारी शक्ति के रुाोत हैं। आज गांव की और किसान की ताकत को तोड़ने में विकृत मानसिकता हावी है और वह विकृत मानसिकता हमारी परम्परा और विकास के रास्ते में, हमारी संस्कृति के विकास के रास्ते में बाधक है, यह हमें समझना होगा।
पिछले पचास वर्षों में हमारी संस्कृति के विकास के लिए, परम्परा के विकास के लिए जितना हमें करना चाहिए था वह हमने नहीं किया। मेरा निवेदन है कि गांव में शिक्षा और प्रबंधन का विकास हो और किसान को उसके उत्पाद का समर्थन मूल्य नहीं बल्कि लाभकारी मूल्य मिले। खेत के प्रबंधन और उत्पाद मूल्यों में कैसे संतुलन हो यह हमें देखना होगा। जब तक गांव को ताकतवर बनाकर उसे शहरी अपसंस्कृति के खतरों से नहीं बचाया जाएगा, तब तक देश शक्तिशाली नहीं होगा। शहर के एक पुल को बनाने में करोड़ों रुपया लगाया जा रहा है लेकिन गांव से जिला मुख्यालय जाना हो तो आपको ७०-८० किलोमीटर का चक्कर लगाकर जाना पड़ता है। किसान के लिए वहां कुछ नहीं किया जा रहा है। उसको सुगम रास्ता मिले, इसका प्रबंध आज तक नहीं हो सका है।
गांव की संस्कृति भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा से अभी तक जुड़ी हुई है और गांव से ही भारतीय मूल्यों की और भारत की संस्कृति की रक्षा हो सकती है, भारत मजबूत हो सकता है। लेकिन आज गांव के लोग बदहाली, अशिक्षा और फटेहाली की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं और अपने को शहरों में आकर बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इस समस्या पर हमें समेकित रूप से विचार करना होगा।
एफसीआई पर अभी चर्चा हो रही थी। वहां गड़बड़ी हो सकती है। यह बात ठीक है कि उसमें असंतुलन है। कई राज्यों में स्टोरेज क्षमता है और कई राज्य इस में बड़े उपेक्षित हैं। यह प्राइवेट एजेंसियों को देकर किसानों का शोषण नहीं होना चाहिए। यह एक बहुत बड़ा संकट है। यदि सरकार में द्ृढ़ इच्छा शक्ति होगी तो निश्चित रूप से हम ऐसा प्रबन्धन कर सकेंगे जिससे किसानों पर होने वाले शोषण को रोक सकेंगे। आज किसान अनाज, फल और टमाटर पैदा करता है। बिहार में रोहतास और औरंगाबाद के इलाके में जी.टी रोड पर इतना टमाटर होता है कि कभी किसान उन्हें खेतों में ही छोड़ देता है। प्रबन्धन के अभाव में ऐसी स्थिति पैदा होती है।
राष्ट्रीय कृषि नीति के बारे में मैं धन्यवाद देते हुए एक चीज जो मेरे मन में है, उसकी सफाई माननीय मंत्री जी से चाहूंगा। जमीन की जोत किस की होनी चाहिए? वैसे तो वह उसकी निजी जमीन है लेकिन कारपोरेट हाउस को जमीन न जाए, इस बात का आप ध्यान रखें। यदि वह कारपोरेट हाउस को जमीन जाएगी तो किसान किसान नहीं रहेगा, उसका चरित्र नहीं रहेगा। किसान का मतलब अदम्य साहस के साथ विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करने वाला आदमी है। यह मानव जाति की एक अमूल्य धरोहर है। विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस से लड़ने वाला गांव में रहने वाला किसान होता है। यदि कारपोरेट हाउस में जमीन जाएगी तो उससे एक विकट परिस्थिति पैदा होगी। हमारी संस्कृति से सम्पूर्ण विश्व को मानवता की प्रेरणा मिलती है, ताकत मिलती है। कारपोरेट हाउस में जाने से उसके ऊपर भी खतरा उत्पन्न होगा। मंत्री जी इस बारे में स्पष्टीकरण दे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री सुबोध राय (भागलपुर): सभापति महोदय, मैं बहुत संक्षेप में अपनी बात कहना चाहता हूं। बहुत से माननीय सदस्यों ने किसानों की स्थिति के बारे में सही तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए उनकी दुर्दशा, दुर्गति पर चर्चा की है। मैं उससे अपनी सहमति जाहिर करता हूं। उन्होंने सरकार को जो सुझाव दिए, उनके प्रति भी अपनी सहमति जाहिर करते हुए अपील करना चाहता हूं कि किसानों की स्थिति में सुधार लाने के लिए मंत्री जी अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए उन सुझावों पर अमल करें। जिन राज्यों में किसानों ने आत्महत्या की है, उनके कारणों को देखते हुए उनके निदान के लिए सदन की संयुक्त जांच समति का गठन किया जाए।
जब अनेक घोटालों के बारे में जे.पी.सी. का गठन हो सकता है तो जिसकी बुनियाद पर यह देश और हम सब खड़े हुये हैं, उनके कल्याण के लिये कोई स्पष्ट नीति क्यों बन नहीं सकती ? आज देश में "जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान" का नारा लगा रहे हैं, तब किसानों की नींव को हिला देने वाली घटनायें हो रही हैं, ऐसे में किसानों द्वारा आत्महत्या करना कोई साधारण बात नहीं है। किसान अनेक प्रकार की विपत्तियों का मारा हुआ है और जब लोग जय किसान का नारा लगाते हैं तो उनकी नीतियों का प्रहार इन किसानों पर होता है। उस स्थिति में हताश और निराश किसान के पास अपने गले में फांसी लगा लेने के सिवा इस दुनिया से कूच करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं रहता। इन सब बातों की जांच स्पष्ट रूप से होनी चाहिये। उससे प्रकट हो जायेगा कि केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार का किसानों के प्रति क्या रवैया है? चाहे बाढ़ हो, चाहे सुखाड़ हो या प्राकृतिक विपदा हो या बैंक से कर्जे लेने और उसकी वसूली का सवाल हो, उसके लिये सरकार द्वारा अनेकों नीतियां बनाई गई हैं। उनमें से कई नीतियां वर्षों से चल रही हैं, घोषणाओं की किताबें भरी पड़ी हैं और यहां तक कि लाइब्रेरी में तरह तरह की जानकारी पटी पड़ी है। मुझे डा. इकबाल की बात याद आती है:
जब अमल ही नही तो कुरान में क्या रखा है, अगरचे लाख सीने से लगा रखा है।
सभापति महोदय, सरकार ने किसानों के हित में घोषणायें की हैं, नारे लगाये हैं, भाषण दिये हैं लेकिन किसान आज भी उपेक्षित है और आत्महत्या कर रहा है। आज पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार और सभी राज्यों के किसान पूछते हैं। सरकार ने देश की वास्तविक स्थितियों को अनदेखा करके डब्लयू.टी.ओ. के सामने आत्म-समर्पण किया है और हमारे कृषि क्षेत्र को पूरी तरह से उनके मुंह में धकेल दिया है। किसानों के साथ इतना बड़ा विश्वासघात कभी होगा, ऐसा देश के उन दीवानों ने कभी नहीं सोचा था जिन्होंने फांसी के तख्ते को चूम लिया था और गोलियां खाई थीं। वे अपनी शहादत देकर इस दुनिया से कूच करते समय कह गये:
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं, दरो-दीवार से माता को नमन करते हैं।
उन्होने यह नहीं सोचा था कि आजादी के बाद हमारे देश में ऐसे शासक पैदा हो जायेंगे जो देशभक्ति का ऐसा नकाब लगा लेंगे कि अपने ही देश के लोगों को उन्हीं लोगों के हवाले कर देंगे जिनके खिलाफ गोली खाकर शहीद हुये या आजादी की लड़ाई मे अपना खून बहाया। ऐसा स्थिति में हमारे देश के किसानों ने उनके खिलाफ संघर्ष किया जो आजादी के दुश्मन थे, उस वक्त अंग्रेजों की दलाली करते थे, चाटुकारिता करते थे, जो बड़े राज-रजवाड़े थे, ज़मींदार या बड़े बड़े पूंजीपति और व्यापारी थे, नौकरशाह थे, उनके खिलाफ संघर्ष हुआ था। आज जरूरत थी कि उससे सबक लेकर उन शहीदों की शहादत का सम्मान करते हुए इस तरह की नीतियां बनाई जातीं कि हमारा मुल्क आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ता। लेकिन हम आज कारपोरेट सैक्टर की ओर जा रहे हैं। आज कारपोरेट सैक्टर को मौका दिया जा रहा है। हमारी आजादी की लड़ाई इसलिए थी कि सामन्तवाद पूरी तरह से समाप्त होना चाहिए, भूमि सुधार होना चाहिए, जोतने वालों को जमीन मिलनी चाहिए। इससे हमारी कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होने वाली थीं। लेकिन आजादी के पचास साल के बाद आज कारपोरेट सैक्टर, बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल्स कम्पनियों, बड़े-बड़े रैकेटीयर्स, घोटालेबाजों, बड़े-बड़े माफियाओं को बुलाकर बड़े-बड़े भूखंड दान देने की बातें हो रही हैं और दूसरी ओर हमारे भूमिहीन किसानों और हमारे लाखों-करोङों खेतिहर मजदूरों को गांव छोड़ने के लिए, इलाका छोड़ने के लिए और अपने दाना-पानी का इंतजाम दूसरी जगह करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह बहुत ही भयानक स्थिति है। इसलिए हमारे गांवों में आज दरिद्रता बढ़ती जी रही है। गांवों में सड़कें नहीं हैं, मकान नहीं हैं, शौचालय नहीं हैं, स्वच्छता की व्यवस्था नहीं है, चकित्सालयों और विद्यालयों की व्यवस्था नहीं है। सिंचाई के साधनों का अभाव है, बिजली का अभाव है। आज इन सबकी जरूरत है, इनसे आज गांव ज्यादा विकसित और समृद्ध हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में आज उचित होगा कि केन्द्र सरकार राज्यों के साथ सहयोग करके इनकी व्यवस्था करे, इस पर दोनों में टकराव नहीं होना चाहिए।
१७.१७ बजे (उपाध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए) यह दोष देने से कि बिहार के किसानों का अनाज किसने नहीं खरीदा और किसने नहीं खरीदने दिया - इससे काम चलने वाला नहीं है। इसमें केन्द्र सरकार को अपनी भूमिका निभानी है, राज्य सरकारों को भी अपनी भूमिका और कर्तव्य से भागना नहीं है। दोनों सरकारों की अपनी अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं, अलग-अलग भूमिकाएं है, अलग-अलग कर्तव्यपरायणता है। संविधान दोनों के लिए है। इसलिए किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। जब राजनीति से ऊपर उठने की बात होती है तो उसमें दोषारोपण करके नहीं बल्कि समस्या के निदान में कहां गड़बड़ी हुई है, कहां गल्ती हुई है, उस भूल का सुधार किया जाना चाहिए। यदि उससे लाभ हो तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन यह बात नहीं चलनी चाहिए कि हमने जो कह दिया वही ब्रहमा की लकीर है। यदि हम इस मानसिकता से काम करेंगे तो किसानों की समस्या निश्चित रूप से हल होगी। राज्य और केन्द्र दोनों मिलकर हमारे देश के किसानों की वास्तविक स्थिति जो मांग करती है, वह पूरी करेंगे। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।
श्री जसवंत सिंह बिश्नोई (जोधपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज सदन में तीन घंटे से बहुत ही महत्वपूर्ण विषय किसानों की समस्याओं पर चर्चा हो रही है। आपने मुझे बोलने का समय दिया इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं। महोदय, आजादी के ५३ वर्ष बाद अगर हम इतिहास देखें तो पिछले पचास वर्षों तक केन्द्र में बहुत कम सरकारें रही जिन्होंने किसानों के बारे में सोचा।
आखिर किसानों की समस्याएं क्या है - अगर आज़ादी के बाद केन्द्र में आने वाली सरकार गांव और ढाणी के बारे में सोचतीं तो किसान जिन समस्याओं को लेकर आज आंदोलित है या जिन समस्याओं की वजह से आत्महत्याएं करता है - वह स्थिति पैदा न होती।
उपाध्यक्ष महोदय, किसानों की पैदावार का मूल्य कम होता जा रहा है और जो चीजें किसान खरीदता है उसके भाव इतने बढ़ गए हैं कि किसान उनको खरीद नहीं सकता। जिस समय किसान के गेहूं, बाजरा, ज्वार, मूंग आदि का भाव रुपये दो रुपये किलो था, उस समय ट्रैक्टर की कीमत १५-२० हजार रुपये थी। आज वही ट्रैक्टर किसान खरीदता है तो उसकी कीमत ३ लाख रुपये है और ट्रैक्टर का सामान और खेती के अन्य औजार खरीदता है तो ट्रैक्टर उसको ५ लाख रुपये में पड़ता है और अनाज का भाव ३-४ रुपये किलो है। किसान जिस चीज को खरीदता है उसके भाव ३०-४० गुना बढ़ गए हैं जबकि किसान की उपज का भाव उस अनुपात में नहीं बढ़ा। आज का किसान बिजली भी नहीं खरीद सकता। किसान को जो डीजल गांवों में मिलता है वह भी शुद्ध नहीं मिलता। जिसे ट्रैक्टर में डाले, पंपिंग सैट में डाले तो ४-६ महीने में इंजन ठीक कराना पड़ता है। कैरोसीन और डीजल के भावों में इतना अंतर आ गया है कि विक्रेता डीजल में कैरोसीन की मिलावट करते हैं जिस कारण किसान के ट्रैक्टर खराब हो जाते हैं और चार-छ: महीने बाद उसको १०-२० हजार रुपये लगाने पड़ते हैं। किसान को ऐसा डीजल मिलना चाहिए कि पांच-छ: वर्ष तक उसको ट्रैक्टर में एक रुपया भी नहीं लगाना पड़े, ऐसी व्यवस्था पहले थी, लेकिन आज स्थिति यह नहीं है। इसलिए इस मिलावट को रोकने का प्रयास भी सरकार को करना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, आज लहसुन बाहर से आ रहा है, खाद्य तेल बाहर से आ रहा है। मेरे यहां जोधपुर में जहां किसान लहसुन पैदा करता है, कई खेतों में चार-पांच रुपये किलो लहसुन पैदा हो रहा है और वही लहसुन बाज़ार में लाता है तो ढाई-तीन रुपये किलो बाहर से आया हुआ लहसुन मिलता है। किसानों को मजबूर होकर लहसुन को जलाना पड़ रहा है, उसके पास और कोई रास्ता नहीं है। खाद्य तेल बाहर से आ रहा है। जो किसान आज से तीन वर्ष पहले २५०० रुपये प्रति क्िंवटल में सरसों बेचता था, राई बेचता था, आज उसकी कीमत ११००-९०० रुपये है। खाद्य तेल की जितनी मिलें राजस्थान में थीं, वे बंद हो चुकी हैं। पूरे देश में यही हाल होगा। राजस्थान में किसानों ने इस बार राइड़ा बोना भी बंद कर दिया। तेल बाहर से आएगा तो डयूटी लगेगी लेकिन उससे भी फर्क पड़ने वाला नहीं है। जो खाद्य तेल की मिलें थीं, वे बंद हो गईं और उनके मजदूर बेकार हो गए, सामान खराब हो गया। आने वाले समय में अगर देश को तेल की आवश्यकता होगी तो एक दिन में मिलें तैयार नहीं हो सकती हैं, एक दिन में किसान सरसों पैदा नहीं कर सकता है। इसलिए किस तरह से किसान इनको पैदा कर सके, किस तरह मिलें चलें और मज़दूरों को काम मिले उस पर विचार करने की आवश्यकता है।
उपाध्यक्ष महोदय, यहां पर अगर हम देखें पिछले तीन वर्षों में राजस्थान की चर्चा करना चाहूंगा कि वहां भयंकर अकाल पड़ रहा है और हालत यह है कि पशुधन और चारे की व्यवस्था नहीं है। किसान की चारा खरीदने की स्थिति नहीं है। हरियाणा और पंजाब से कुछ चारा मुफ्त आया है इसलिए कुछ किसानों ने अपने पशुधन को बचा लिया लेकिन चार-पांच दिन पहले उन इलाकों में बारिश आ गई और चारा-तुड़ी खराब हो गई। आने वाले समय में राजस्थान के पशुधन को बचाना मुश्किल होगा। देश में अगर पांच करोड़ भेड़ें हैं तो उनमें से ढाई करोड़ भेड़ें सिर्फ राजस्थान में हैं और पश्चिमी राजस्थान में हैं। आज हालत यह है कि राजस्थान की भेड़ें जो मध्य प्रदेश जा रही थीं उन्होंने चराई की कीमत बढ़ा दी। आज दो करोड़ भेड़ों के साथ मध्य प्रदेश और राजस्थान के बॉर्डर पर गड़रिये सामान लिए बैठे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, राजस्थान में पशुपालन करने वालों की हालत बहुत खराब है। गांवों में पशु चकित्सालयों की आवश्यकता है, लेकिन वहां अस्पताल नहीं हैं। अस्पताल बड़े-बड़े शहरों में हैं जहां गांव का किसान अपने पशुओं का इलाज नहीं करा सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि एक ब्लाक में एक पड़ा पशु अस्पताल होना चाहिए जिससे कोई भी किसान ब्लाक में जाकर अपने पशुओं का इलाज करा सके और अपने पशुधन को बचा सके। बडे-बड़े शहरों में बड़े-बड़े पशु अस्पताल हैं जहां शहर के लोगों के कुत्ते और बिल्लियों का इलाज होता है। किसान की गाय या भैंस यदि १०-१५ हजार रुपए की भी हो, तो भी उसका वहां इलाज नहीं कराया जा सकता है क्योंकि किसान अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाता। यदि किसान की गाय या भैंस बीमार है, तो उसे १-१५ मिनट के अंदर ही डाक्टर की आवश्यकता होती है, जो उन्हें नहीं मिल पाती है और तुरन्त इलाज के अभाव में किसान की गाय या भैंस मर जाती है।
उपाध्यक्ष महोदय, पूरे राजस्थान में बिजली के भाव बढ़ गए और भाव बढ़ाने के बाद भी जब किसान को बिजली की आवश्यकता पड़ी तब बिजली पूरी नहीं दी जिससे अकाल की स्थिति पैदा हो गई। अकाल दो तरह का होता है। एक अकाल तो वह यदि वर्षा नहीं हुई, तो अकाल पड़ गया। दूसरा अकाल वह है जो मानव द्वारा कृत्रिम रूप से पैदा किया जाता है। दूसरे प्रकार का अकला राजस्थान में पड़ा है। इसमें भगवान की कोई गलती नहीं, इसमें राजस्थान सरकार की गलती से नुकसान हुआ है। जब किसान अपने खेतों को बो रहा था, तब तो १०-१० और १२-१२ घंटे बिजली दी गई और जब किसान की फसल पक कर तैयार हो गई और जब कटाई का वक्त आया, तो किसान को बिजली दो-दो घंटे ही दी गई। इससे किसान की खड़ी फसल खेत में सूख गई। बिजली की कटौती और अभाव के कारण वह अपनी तैयार फसल को नहीं काट सका। इसलिए मेरा आपके माध्यम से सुझाव है कि यदि किसान को शुरू में चार या पांच घंटे बिजली बुवाई के वक्त दी जाए, तो उतने ही समय तक बिजली कटाई के वक्त भी दी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि जब तक किसान की फसल कट कर खलिहान के माध्यम से घर तक नहीं पहुंच जाती है तब तक उसे बिजली दिया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। किसान का बुवाई में खर्च होता है, उसके बाद खाद आदि में बहुत धन खर्च होता है और फसल कटने के समय बिजली न मिलने से उसकी फसल चौपट हो जाती है। इस प्रकार मानव द्वारा निर्मित अकाल नहीं पैदा किया जाना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि केन्द्र सरकार की राज्यों में अनेक प्रकार की योजनाएं चलती हैं। आई.आर.डी.पी. के अन्तर्गत परिवारों का चयन किया जाता है जिसमें गरीबों को दलिया दिया जाता है। साक्षरता कार्यक्रम है जिसमें सरकार करोड़ों रुपए खर्च करती है। मैं बताना चाहता हूं कि सबसे ज्यादा जरूरत राजस्थान में पानी की है। वैसे अब पंजाब और हरियाणा में भी पानी की समस्या आएगी क्योंकि गंगा जी की तलहटी में पानी नीचे जा रहा है, पानी की कमी हो रही है। इसलिए मेरा सरकार से निवेदन है कि जो पानी के पुराने रुाोत हैं उन्हें बचाने के लिए विशेष प्रयास करने की जरूरत है। राज्य सरकारों के पास उन रुाोतों को बचाने के लिए संसाधन नहीं है। इसलिए केन्द्र सरकार को इस संबंध में विशेष पग उठाकर राज्यों को पुराने रुाोतों को बचाने के लिए सहायता देनी चाहिए ताकि वे उनको बचा सकें, डिवेलप कर सकें और पानी को रोक सकें। राजस्थान में तीन करोड़ लोग और चार करोड़ पशु पानी की कमी से प्रभावित हैं। वहां पानी न मनुष्यों के लिए और न पशुओं के लिए।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं राजस्थान के अपने क्षेत्र जोधपुर के बारे में बताना चाहता हू किं जोधपुर जिले के लिए केन्द्र सरकार ने पहली, दूसरी और तीसरी कक्षा तक साक्षरता के कार्यक्रम पर तीन करोड़ रुपए अकेले एक जिले में खर्च कर दिए लेकिन उसका कोई सुपरिणाम नहीं निकला। यदि केन्द्र सरकार ने यह धनराशि तालाबों की रक्षा करने पर खर्च की होती, तो राजस्थान के जोधपुर जिले के किसानों को फायदा होता और देश तरक्की करता, लेकिन केन्द्र सरकार तालाबों के पानी को रोकने, पुराने रुाोतों को डिवेलप करने और अनाईकट पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। यह ठीक नहीं है। भविष्य में पानी का संकट पूरे देश पर आने वाला है। इसलिए उसे अभी से इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
उपाध्यक्ष महोदय, अन्त में, मैं राजस्थान के बारे में यह कहते हुए अपनी बात समाप्त करूंगा कि जो किसान कहता है, वह राजस्थान के मुख्य मंत्री की समझ में नहीं आता, सरकार को कहते हैं, तो सरकार उसको नहीं समझती। किसान मन मार कर बैठ जाता है। यह हालत राजस्थान के किसान की हो रही है। राजस्थान में पानी की विकट समस्या है और किसान बहुत मुसीबत में हैं। राजस्थान के किसान शूरवीर हैं। राजस्थान के जवानों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए हैं। राजस्थान के किसान कभी भी आत्महत्या नहीं करेंगे। वे चाहे कितनी भी मुसीबत में हों, लेकिन कभी आत्महत्या नहीं करेंगे, हालांकि हालात ऐसे बन गए हैं खासतौर से पश्चिमी राजस्थान में जहां किसान बहुत संकट में हैं। राजस्थान में १४ डैजर्ट डिस्टि्रक्ट हैं।
जहां गांव बहुत दूर हैं, बिजली की व्यवस्था भी नहीं हो सकती, पानी भी नहीं जा सकता, देश के दूसरे हिस्सों में जो नियम लागू होते हैं, वे नियम लागू नहीं हो सकते - इसलिए डैजर्ट डिस्टि्रक्ट के लिए अलग से योजना बननी चाहिए, यही मैं खास तौर से निवेदन करना चाहूंगा। बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री अवतार सिंह भडाना (मेरठ) : उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे किसानों के मामले में बोलने का समय दिया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। किसानों के हालात के बारे में बहुत लम्बी चर्चा हुई। हाउस के माननीय सदस्यों ने यहां बहुत सी बातें कही हैं। मैं समझता हूं कि किसानों के हित में सबने जो सुझाव दिए हैं, मैं भी अपने आपको उनसे जोड़ते हुए सिर्फ यही प्रार्थना करना चाहता हूं कि मौजूदा सरकार को यह चाहिए कि वह किसानों के बारे में सोचे। माननीय सदस्यों को भी इस बात पर विचार करना चाहिए। कई बार कुछ प्रदेशों और पार्टियों पर इस चर्चा को ले जाया जाता है। हम किसानों के दर्द, किसानों की समस्याओं पर हर चीज से ऊपर उठ कर विचार करें , किसानों के लिए कोई नीति बने जिससे किसान बच सके। मैं समझता हूं कि ५३ साल की आजादी में किसानों के लिए न जाने कितने माननीय सदस्यों ने इस हाउस में बहुत सी बातें रखीं लेकिन उन पर कुछ नहीं हुआ। आज हम फिर से ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हुए हैं जहां इस देश के लिए एक खतरा बनने जा रहा है। अगर इस देश का किसान बर्बाद हो जाएगा तो यह देश भी नहीं बचेगा। आज देश के किसानों को मारने का काम हमारी मौजूदा सरकार ने किया है। किसानों के लिए कोई नीति बने। आज हम दुनिया की दौड़ में कैसे चल सकते हैं, दुनिया के उन देशों के साथ कैसे चल सकते हैं जिन देशों में किसानों को काफी सबसिडी मिलती है। आज जो भी सरकार है, उसने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। सही बात तो यह है कि किसानों की नीति बनाते समय, अगर किसान के दुख-दर्द को जानने वाला किसान का बेटा किसान की नीति बनाए तो जरूर उसके हित में कोई नीति बन सकती है।
हमारे नीतीश कुमार जी किसान परिवार से हैं। यह जरूर है कि हर किसान के बेटे को किसान का दर्द मालूम होता है। लेकिन इस सरकार ने किसान के हित में कुछ भी करने की चाहत रखी हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। अनेक किसान नेताओं ने कोशिश की होगी लेकिन यहां पार नहीं पड़ती, ऐसा मुझे लगता है। अगर इस हाउस में भी किसान के लिए एकजुट होकर कोई नीति बनाई जाए तो किसान का भला हो सकता है। कोई भी सरकार किसान के हित में नीति बनाने को तैयार नहीं है। इस बात को सब जानते हैं कि आज हमारा किसान जो पैदावार करता है, उसे रखने की जगह नहीं है। किसान को उसकी फसल का पैसा नहीं मिल रहा है। ६१० रुपये गेहूं की बात करके, आज चाहे गन्ने की बात हो या चावल की, सरकार ने कहीं भी कोई प्रबन्ध नहीं किया है।
आने वाले समय में जिस तरीके से विदेशों से सामान यहां आयेगा, चौधरी साहब, आप किसान के बेटे हैं तो जरा सुन लीजिए, आ जाइये - आपकी सरकार में कितना दर्द किसान के प्रति है कि आप किसान होकर पीछे जाकर बैठ गये हैं। चौधरी साहब अगर आप इसी तरह से हाउस में बैठे रहे तो किसान ऐसे ही पिटता रहेगा, किसान ऐसे ही मरता रहेगा।…( व्यवधान )
श्री अशोक प्रधान (खुर्जा): तो क्या हाउस के बाहर चले जायें?
श्री अवतार सिंह भडाना: आप मत बोलिये, आप चुप रहिये। वे बैठे हैं, वे जवाब देंगे।…( व्यवधान )नहीं, हाउस से बाहर की बात नहीं है। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि इस हाउस में लोग किसानों के दर्द का मजाक उड़ाने के लिए आते हैं। आज दिल्ली में किसानों के साथ क्या हो रहा है। आज उत्तर प्रदेश में गन्ने की मिलें बन्द पड़ी हैं, गन्ने का पेमेण्ट नहीं हो रहा है, किसानों का पैसा नहीं मिल रहा है। ७०-७५ फीसदी इस देश के किसान की फसल का जब पैसा मिलता है…( व्यवधान )
SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I am on a point of order.
MR. DEPUTY-SPEAKER: What is your point of order?
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : I would just like to know your ruling. The hon. Member mentioned that hon. Members come to the House to make fun of farmers.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He is not yielding.
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, the hon. Member said that all the hon. Members are present in the august House to make fun of farmers. Will that find a place in the proceedings? I would like to know about it from the Chair.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Did he say that hon. Members come to the House to make fun of farmers?
… (Interruptions)
श्री बिक्रम केशरी देव: आपने बोला कि यहां मैम्बर किसानों का मजाक उड़ाने के लिए आते हैं। आपने यह बोला, यह प्रोसीडिंग्स का भाग है।…( व्यवधान )
श्री अवतार सिंह भडाना: माननीय सदस्य को सुनने का अन्तर है। मैंने कहा है कि किसानों के हित की या किसानों के बारे में जब चर्चा हो, उस पर किसानों का मजाक कुछ चन्द लोग करते है। इसलिए वे सीरियसली किसान के बारे में सोचने की जरूरत समझें - मैंने यह कहा है, माननीय सदस्य को सुनने का अन्तर है।
श्री बिक्रम केशरी देव: अन्तर नहीं है।
श्री अवतार सिंह भडाना: या हो सकता है कि आप किसान के दर्द को न समझते हों।
MR. DEPUTY-SPEAKER: He has already explained it.
… (Interruptions)
डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया (दमोह) : आपने कहा कि किसान का मजाक करने के लिए यहां संसद में लोग आते हैं।…( व्यवधान )
श्री अवतार सिंह भडाना: मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जब किसान के इश्यू पर या किसान के विषय में चर्चा हो या किसान से जुड़े हुए…( व्यवधान )
MR. DEPUTY-SPEAKER: In the light of his explanation, it may be recorded.
श्री अवतार सिंह भडाना: किसान के प्रति चर्चा होते समय कृषि मंत्री ही नहीं, बल्कि जो किसान से जुड़े हुए अन्य डिपार्टमेंट्स हैं, चाहे फाइनेंस मनिस्टर हो, चाहे इर्रीगेशन या पावर मनिस्टर हों, क्योंकि यह किसान से जुड़ा हुआ मुद्दा है, वे यहां रहें। आज जहां उत्तर प्रदेश के किसान की हालत यह है कि एक तरफ इस सरकार में हजारों करोड़ रुपया कुछेक बड़े परिवारों के, धनी परिवारों के पास बकाया है, उनके वारंट जारी नहीं होते, बल्कि उनका नाम भी बताने को सरकार बाध्य नहीं है। दूसरी तरफ किसानों पर ५-५ हजार रुपये के ऋणों को लेकर किसानों की बेइज्जती करके उनकी भैंस, उनकी गाय, उनके पशु और उनके ट्रैक्टर कुर्क किये जा रहे हैं।…( व्यवधान )मैंने वैस्टर्न उत्तर प्रदेश के मेरठ के अपने क्षेत्र में दो-दो हजार रुपये के ऋण को लेकर हजारों किसानों की बेइज्जती होते हुए देखी है, वहां के तहसीलदार उनको लॉक अप में बन्द कर रहे हैं। एक तरफ इस देश का हजारों करोड़ रुपया बड़े-बड़े लोगों के पास बकाया है, चाहे बिजली डिपार्टमेंट का हो, अनेक प्रकार का धन बकाया है। लेकिन अगर किसान पर पांच हजार रुपये बकाया हों तो उसके लिए कोई ऐसा कानून बने कि उनकी ऐसी बेइज्जती न की जाये। आज किसान का पैसा समय पर नहीं मिलता है।
जब तक गन्ने की पेमेंट नहीं होगी, किसान कैसे कर्जे को वापस कर पाएगा। एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार पर गन्ने का बकाया है, दूसरी तरफ वहां की सरकार वहां के किसानों को लॉकअप में बंद करके बेइज्जत कर रही है। जब तक किसान को अपनी फसल की पेमेंट नहीं मिलती, गन्ने की पेमेंट नहीं मिलती, तब तक वह अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकता, उनके लिए वर्दी नहीं सिला सकता और अपनी बेटी के हाथ पीले नहीं कर सकता। अगर आप किसानों के प्रति हमदर्दी रखते हैं तो किसानों के लिए कारगर नीति बनाएं, जिससे देश भी मजबूत बने। हमने सुना था कि हिन्दुस्तान में एक ईस्ट इंडिया कम्पनी आई थी, उसने २०० साल तक देश को गुलाम बनाए रखा। लेकिन आज अनेक ईस्ट कम्पनीज देश में आ रही हैं, पता नहीं कितने हजार साल तक देश को गुलामी में रखेंगी।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि किसानों के लिए वह ऐसी नीति बनाए, जिससे वे बच सकें। मैंने दो-तीन बातें पिछली बार भी कही थीं, अब फिर कहना चाहता हूं। हमारे यहां डी.सी.एम. ग्रुप ने वैस्टर्न यू.पी. में मऊ में एक मिल लगाई है, लेकिन वह सिर्फ कागजों में लगी हुई है, मौके पर मौजूद नहीं है। वहां का किसान भटक रहा है कि अपना गन्ना कहां ले जाए। दूसरी तरफ दौराला और मवाना मिल में किसानों के साथ अन्याय किया जा रहा है, उनको पेमेंट नहीं की जा रही है। मेरी मंत्री जी से प्रार्थना है कि जो मिल कागजों में ही लगी हुई है, उसकी वे जांच कराएं और किसानों को जमीन जो कौड़ियों के भाव ली है, अगर वहां कोई मिल नहीं है, वह चालू नहीं हुई है और वे चालू नहीं करते हैं तो वह जमीन किसानों को वापस दी जाए, ताकि वे फिर से वहां काश्त कर सकें।
श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव): उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य श्री रामजी लाल सुमन जो प्रस्ताव लाए हैं, सदन में उस पर बहस हो रही है। भारतवर्ष का आत्मसम्मान बढ़ाने के लिए अनेक संस्थाओं ने योगदान दिया है। उसमें सबसे ज्यादा योगदान किसान का है। लेकिन किसान का आत्मसम्मान रखने के लिए, उसकी रक्षा करने के लिए भारत सरकार कुछ नहीं कर रही है, यह दुख की बात है। बीमा फसल योजना की बहुत प्रशंसा होती है। उधर के लोग बोलते हैं कि हमारे पंत प्रधान श्री वाजपेयी ने यह योजना चालू की है। वे उनका नाम लेते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, लेकिन वहां अधिकतर लोग लोकशाही से आए हैं और उधर बैठे हैं। कभी हम भी उधर बैठते थे। बीमा फसल योजना के बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूं। आदमी का बीमा होता है, अगर वह एक किस्त दे दे और उसकी मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार को मुआवजा मिलता है। लेकिन बीमा फसल योजना में यह बात नहीं है। चालू बरस में महाराष्ट्र में अकाल पड़ा है। अनाज की और अन्य फसलें नष्ट हो गई हैं। किसान इधर-उधर भटक रहे हैं। मेरी प्रार्थना है कि मंत्री जी एक टीम महाराष्ट्र भेजें जो देखे कि किसान की क्या समस्या है। लेकिन मेरी बात को सुना नहीं जाता है, जबकि वे एक किसान के बेटे हैं, फिर भी कोई सुनवाई नहीं होती। बीमा फसल योजना में प्रावधान है कि यह तब लागू होगी, अगर तीन बरस तक अकाल पड़े -
यह कैसे हो सकता है? यह बीमा पॉलिसी है जो कर्जे के ऊपर है। मेरी विनती है कि यह बीमा पॉलिसी, जो फसल का नुकसान होता है, उसके ऊपर होनी चाहिए, उनके ऊपर कर्जे के ऊपर नहीं चाहिए और एक वर्ष में जो नुकसान हो जाएगा, दो वर्ष में हो जाएगा, तीन वर्ष में हो जाएगा, करोड़ों रुपये हमारी सहकारी संस्थाओं ने बीमा पॉलिसी के बारे में भर दिया है लेकिन एक नया पैसा नहीं मिला है। यह दुर्भाग्य की बात है, यह ठीक नहीं है। माननीय मंत्री जी कृषि नीति लेकर आये हैं, यह ठीक बात है। लेकिन कांग्रेस वालों के ऊपर हमेशा उंगली दिखाते हैं। मैं कहूंगा कि भारतीय जनता पार्टी तृतीय का चांद, चौथे का चांद और पांचवें का चांद है लेकिन यह पूर्णिमा का चांद बन जाते हैं, यह ठीक नहीं है। देवेगौड़ा जी के बारे में बोलते हैं कि वे द्वितीय का चांद निकले। शेर जंगल का राजा होता है, इधर-उधर देखता है, सबको देखता है लेकिन देवेगौड़ा जी ने तो केवल कांग्रेसी पॉलिसी ठीक नहीं है, इसलिए उन्होंने किसान के लिए अच्छी तरह से पॉलिसी निकाली। गैस और खाद के बारे में पॉलिसी निकाली। आप भी उसमें शामिल थे। देवेगौड़ा जी किसान के बारे में कांग्रेस के लिए कैसे बन गये? आपके लिए क्यों नहीं बने? यह तो अन्त: करण चाहिए। इनकी नीति ठीक है लेकिन नीयत ठीक नहीं है। यहीं गड़बड़ी होती है।
उपाध्यक्ष महोदय : अब समाप्त करिए। आपने पहले कहा था कि संक्षेप में बोलेंगे। अब समाप्त करिए।
श्री हरीभाऊ शंकर महाले: यह नीयत का सवाल है। ये लोग कभी-कभी बोलते हैं कि सब्सिडी बंद करनी है। अमरीका बड़ा देश है लेकिन हमारे देश की आबादी सौ करोड़ हो गई है। इसमें से तीस करोड़ ऐसे आदमी हैं जिनकी २०० रुपये महीना चाय पीने की शक्ति है। यह अमरीका ने देखा है इसलिए वह कहता है कि चलो हिन्दुस्तान में पैसा लूटने के लिए चलो क्योंकि तीस करोड़ लोगों की अच्छी आमदनी है और बाकी ७० करोड़ लोग, अगर सस्ता भी होता है तो उनकी क्रय शक्ति कहां है? यहां ज्यादा अनाज होते हुए भी किसान भूखे मर रहे हैं।…( व्यवधान )मेरी विनती है कि इस बारे में सोचना चाहिए और प्याज के बारे में भी सोचना चाहिए।
SHRI Y.S. VIVEKANANDA REDDY (CUDDAPAH): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I thank you for giving me this opportunity to participate in this discussion. When we talk about the plight of the farmers in this country, I would like to submit that the farmers, in general, want that the WTO Agreement should be scrapped.
We have to see that the farmers get remunerative prices. When the minimum support price is to be decided, there should be a committee constituted from among the farming community. That committee should have Members and also representatives of the farmers for fixing the remunerative prices for their produce. It is a natural demand of the farming community when they know about the cost of production and the remunerative price that they want.
The immediate problem in Andhra Pradesh is to provide minimum support price for paddy and other agricultural commodities. The Central Government has to intervene through the FCI to procure the produce from Rabi crops in a big way. The minimum support price for groundnut should be around Rs. 1,500; for sunflower, Rs. 1,500; for cotton, Rs. 2,600 and for red gram, Rs. 2,000 per quintal.
Hundreds and thousands of farmers have been committing suicides. All those bereaved families have to be immediately sanctionedex gratia payment.
I come from Rayalaseema. Cuddapah is my constituency. These areas are always drought-prone. I would request the Government, through you, that the definitions of ‘famine’ and ‘drought’ have to be liberally amended. To have a permanent solution and to mitigate the problems, we demand that the pending projects, like Galerugari and the Tungabhadra parallel canal, be completed early.
Employment opportunities have to be provided to the agricultural labourers by providing food for work and other drought relief work. All debts of the farmers have to be scrapped. They are to be provided fresh loans. Free and uninterrupted power supply has to be provided to the farmers in the drought-prone areas.
There is a very unfortunate situation. Our farming community is in great distress. The farmer is born in debt, grown in debt and dying in debt. Hundreds of farmers are committing suicides. It is shocking for the country. Maybe the Chief Minister of Andhra Pradesh wants in his ‘Vision-2020’ that dependence on agriculture has to be brought down from 70 per cent to around 40 or 50 per cent.
The Government over there and the Central Government, may be heading towards achieving total dependency in agriculture by forcing the farming community to commit suicide. Needless to say that irrigation is very important to agriculture. Since my childhood, I have been hearing of the National Water Grid. I do not know why the Central Government could not take it up when they can take up National Power Grid, or when they can take up National Road Network. I need not say that this facilitates drought proofing of our drought prone areas and mitigate the sufferings of the flood prone or the cyclone prone areas.
Sir, it is very unfortunate that the farming community is in an agitating mood, though they are unorganised. They are so depressed to see that the Government in Andhra Pradesh and the Central Government are deciding their destiny. They are writing their dying declarations. I think, the hon. Minister of Agriculture should coordinate with the Department of Irrigation and maybe they have to come out strongly to help the farming community. I would like to know, how long this discrimination and regional imbalances are to be debated and when they are to be balanced.
I think, the Central Government has to come in a big way to help the farmers in general.
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज किसानों के सवाल पर यहां चर्चा चल रही है जो हमारे लिए खुशी और स्वाभिमान की बात है। हमारे देश के ७० प्रतिशत लोग गांवों पर निर्भर करते हैं। आज देश के १०० करोड़ से ज्यादा लोगों का किसान पेट भरता है। ऐसे किसानों को ताकत देने के बारे में हमारी सरकार को भी कुछ सोचना चाहिए। हमारे माननीय नीतीश कुमार जी नयी पॉलिसी लेकर आये हैं लेकिन किसानों को आज तक किसी भी पॉलिसी से फायदा नहीं मिला है। आपकी पॉलिसी आने से किसान खुशहाल हो जाएगा - ऐसी बात नहीं है।
18.00 hrs. सरकार पालिसी लाती है - कांग्रेस पार्टी भी पालिसी लाई और आप भी पालिसी ला रहे हैं - कांग्रेस ने ५० साल में बहुत अच्छा काम किया लेकिन तीन साल में आप लोगों ने पूरी बरबादी करने का प्रयत्न किया। किसानों के लिए केवल नीति लाने से काम नहीं चलेगा। नीतीश कुमार जी, आपका नारा"जय जवान जय किसान, जय विज्ञान"है। कांग्रेस का नारा " जय जवान जय किसान"था। आप विज्ञान लाकर तीन साल में तहलका तक पहुंच गए - यही आपका विज्ञान है। राजीव जी विज्ञान की तरफ आगे बढ़े लेकिन उनका नारा था "जय जवान जय किसान"उन्होंने विज्ञान आपके लिए छोड़ दिया। आप डेढ़ साल में यहां तक ही पहुंचे हैं। यदि पांच साल रहे तो देश का क्या करेंगे इसका पता नहीं? आप किसानों की जान नहीं बचा रहे हैं। यदि आपने किसानों के सवालों पर ध्यान नहीं दिया तो हम आपकी सत्ता की शान बरबाद कर देंगे। जब अन्धेरा होता है तब तारे उजाले में डूब जाते हैं। जब उजाला होता है तब तारे अंधेरे में डूब जाते हैं। वाह-वाह बोलो।…( व्यवधान )जब किसान अंधेरे में रहता है तब आप सत्ता के उजाले में होते हैं और जब किसान उजाले में रहता है तब आप अंधेरे में डूब जाते हैं।
श्री पवन कुमार बंसल (चंडीगढ़) : बहुत बढि़या बात कही है।
श्री रामदास आठवले : किसानों को पूरी ताकत देने के लिए जो योजनाएं आपने बनाई हैं उन्हें किसानों तक पहुंचाने का काम आपको करना है लेकिन बीच में जो नौकरशाही है, वह कुछ यहां और कुछ वहां पहुंचाने का काम करती है इसलिए गड़बड़ी होती है। फंड किसानों तक पहुंचने चाहिए। आपको खेत मजदूरों के बारे में भी विचार करना चाहिए। खेत मजदूर छोटे-छोटे किसानों के खेतों में काम करते हैं लेकिन वे उन्हें मजदूरी नहीं दे पाते। ५० परसैंट मजदूरी सरकार उन्हें दे सकती है। खेत मजदूरों को मजबूत करने की जरूरत है। आप खेत मजदूरों के सवालों पर ध्यान दें। महंगाई के अनुसार उनके वेजिस में बढ़ोत्तरी करने की जरूरत है। किसान इतना पैसा खेत मजदूरों को मजदूरी में दे नहीं सकता। सरकार को इसमें सहायता करनी चाहिए।
महाराष्ट्र के गवर्नर डा. पी.सी. एलैग्जैंडर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। उन्होंने कहा कि हमारे यहां काफी सरप्लस लैंड है जिसे भूमिहीन लोगों को बांटा जाए। पर-फैमिली चार एकड़ भूमि भूमिहीन लोगों को दी जाए। जमीन बांटने का काम आपको करना है। यदि आप किसानों को ताकत देंगे तो आपको ताकत मिलेगी। जब तक आप किसानों को ताकत नहीं देते तब तक आपकी खटिया खड़ी करने के लिए किसानों को एक साथ लाने का हमारा प्रयास है। किसानों को न्याय देना होगा। आप उन्हें जरूर न्याय देंगे ऐसा हमें विश्वास है लेकिन आप कब तक रहेंगे इसका विश्वास नहीं है।
इसलिये आप कैसा न्याय देंगे, मुझे मालूम नहीं। आप किसान परिवार से आते हैं और मैं खेत-मजदूर परिवार से हूं। हम दोनों एक साथ रहते तो अच्छा होता लेकिन आप उधर चले गये और हम इधर हैं। हम दोनों को एक साथ आने की आवश्यकता है। लेकिन आपको एक न एक दिन हमारे साथ आना ही है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि वे किसानों के साथ न्याय करने का प्रयत्न करें।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Is it the pleasure of the House to extend the time of the House till the reply of the hon. Minister?
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The time of the House is extended.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: No. I have already called the hon. Minister.
… (Interruptions)
SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Sir, since you have extended the time, please allow me. I have to make only two points. I have given the notice.… (Interruptions)
THE MINISTER OF AGRICULTURE AND MINISTER OF RAILWAYS(SHRI NITISH KUMAR): You may ask some questions later on.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: After the reply, both of you can seek some clarifications.
कृषि मंत्री तथा रेल मंत्री (श्री नीतीश कुमार) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं सबसे पहले उन सभी माननीय सदस्यों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने किसानों की स्थिति पर हुई इस चर्चा में भाग लिया है। किसानों की समस्याओं पर मार्च महीने में चर्चा आरम्भ हुई थी और आज उसका समापन हो रहा है। पिछले सत्र में भी किसानों की स्थिति पर इस सदन ने चिन्ता प्रकट की थी।
उपाध्यक्ष महोदय, अगर हम दलगत भाव से ऊपर उठकर सोचें तो शायद उनके पक्ष में हम ज्यादा कारगर ढंग से काम कर सकेंगे और नीतियो पर ठीक ढंग से अमल भी हो पायेगा। लेकिन कई बार यह देखा जाता है कि किसानों का मसला राजनैतिक रूप धारण कर लेता है और राजनीति पर किसानों के हितों की बलि चढ़ा दी जाती है। वैसे कृषि क्षेत्र इतना व्यापक है और हमारा देश इतना विशाल है कि इसमें वभिन्न प्रकार की जलवायु है, एग्रो-क्लाइमेटिक कंडीशन्स के हिसाब से हमारे देश में आज भी मोटे तौर पर माना जाता है कि यहां ६५ प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। हमारे देश में कई प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं, कुछ खाने के लिये फसलें उगाई जाती हैं, कुछ उद्योग को कच्चा माल देने के लिये फसलें उगाई जाती हैं। इस प्रकार अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग प्रकार की फसलें होती हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, कृषि बहुत ही व्यापक विषेय है। जिस प्रकार जमीन से खेती होती है, उसी प्रकार जल में भी खेती होती है। पशु-पालन इसके साथ जुड़ा हुआ है। जब हम खेती की बात करते हैं तो केवल अनाज की बात नहीं होती, फल-सब्जी की बात भी होती है, मसालों की भी बात होती है। इस तरह हर क्षेत्र की अलग-अलग समस्यायें हैं। स्वाभाविक है कि इस सदन में माननीय सदस्य अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहते हैं। यह उचित भी है। सदन देश की सबसे बड़ी पंचायत है। यहां लोग चुनकर आये हैं। सच पूछा जाये तो इस सदन की बनावट ऐसी है जहां ७० प्रतिशत से ज्यादा लोग देहात से चुनकर आये हैं। उन्हें चुनने वाले लोग भी देहात के रहने वाले होते हैं। उसका एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर होता है। यदि उनकी समस्याओं को यहां नहीं रखेंगे तो वे अपने निर्वाचकों के साथ न्याय नहीं करेंगे। इसलिये यह सवाल उठता है कि सरकार के लिये कृषि महत्व का विषय है। देश के कुल उत्पादन में कृषि का बहुत बड़ा योगदान है। इसलिये कोई भी सरकार कृषि की उपेक्षा नहीं कर सकती।
लेकिन जब हम राजनीति में चले जाते हैं तो स्वाभाविक है कि बहस के सिलसिले में जरूर एक-दूसरे की बातों की काट करते हैं। लेकिन मैं आज किसी की बात काटने के सिलसिले में कोई बात नहीं कहना चाहता हूं। मैं सदन को और सदन के माध्यम से देश के किसानों और देश की जनता को आश्वस्त करना चाहता हूं कि आज जो चिंता लोगों के मन में हैं, उसमें सबसे बड़ी चिंता विश्व व्यापार संगठन को लेकर है। पिछली बार भी हमने इस बात पर चर्चा की थी, लेकिन वह चर्चा एक हाई प्रोफाइल डिबेट थी। बड़े-बड़े लोगों ने उसमें हिस्सा लिया था और पता नहीं हिस्सा लेने के बाद लोग उसे याद रख पाये या नहीं रख पाये। लेकिन इस बार की चर्चा में भाग लेने वाले लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि सचमुच वे अपने अनुभव के आधार पर कुछ बातें रखना चाहते हैं। इसलिए सबसे पहले मैं इस चिंता को दूर करना चाहता हूं कि विश्व व्यापार संगठन के चलते देश के किसानों के हितों पर कोई आंच नहीं आने दी जायेगी। मैं इतना जरूर आश्वस्त करना चाहता हूं कि विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत या गैट समझौते के अंतर्गत जो कई समझौते हुए थे, उनमें कृषि पर भी एक समझौता"एग्रीमैन्ट ऑन एग्रीकल्चर" हुआ था। उस एग्रीमैंन्ट ऑन एग्रीकल्चर समझौते का रिव्यू चल रहा है। उस समझौते में इस बात की व्यवस्था थी कि एक समीक्षा होगी, उसकी अब समीक्षा चल रही है और बातचीत हो रही है। उसमें भारत ने अपना पक्ष रखा है और मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत ने अपने देश के किसानों के हित में और दुनिया के विकासशील मुल्कों के किसानों के हित में जो अपना पक्ष रखा है, वहां उसे व्यापक समर्थन मिला है। जो समीक्षा की बातचीत चल रही है उसमें विकसित देश ही कई हिस्सों में बंटे हुए हैं। हालांकि उनका जो बंटवारा है, हम उससे खुश नहीं होना चाहते, क्योंकि जो विकसित देश हैं वे एक-दूसरे के साथ समझौता करके, आपसी लेनदेन के सहारे विकासशील मुल्कों में फूट डालकर हम पर कोई बात न थोप दें। इसलिए हमें हर स्तर पर सचेत रहना है और हमारे काबिल निगोशिएटर्स वहां जा रहे हैं। मुझे आपको बताते हुए प्रसन्नता है कि जो समझौते चल रहे हैं उसमें वाणिज्य मंत्रालय के साथ-साथ कृषि मंत्रालय का भी योगदान है।
उपाध्यक्ष महोदय, बराड़ साहब ने कुछ चीजों के सिलसिले में .यहां चर्चा की है, मैं अलग से उन्हें एक्सप्लेन कर सकता हूं। लेकिन मैं इतना आश्वस्त करना चाहता हूं कि देश के वाणिज्य मंत्री श्री मुरासोली मारन ने जब अपनी भूमिका ली थी, जब"एग्रीमैंट ऑन एग्रीकल्चर" पर भारत का पक्ष रखना था और आप जानते हैं कि इस मामले में जो सम्बद्ध विभाग है वह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय है, उन्होंने अपने अधिकारियों से कह दिया था कि जिस कागज पर कृषि मंत्री का दस्तखत होगा, उसी पर वह दस्तखत करेंगे। उन्होंने ऐसी भूमिका ली थी । एग्रीमैंट ऑन एग्रीकल्चर के जो भी कागज तैयार हुए उसमें कृषि मंत्रालय ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसकी चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं। लेकिन आज मैं उस बात को दोहराना चाहता हूं कि उस कागज को तैयार करने के पहले हमने देश भर के सभी राज्य सरकारों के कृषि और खाद्य मंत्रियों को यहां बुलाया और सम्बद्ध कागजात मुख्य मंत्रियों को भेज दिये। जो भी बैठके हुई, उनमें उनकी राय ली गई। देश के जितने प्रतिष्ठित किसान संगठन हैं उनकी राय ली गई और इस मसले में जिनकी दिलचस्पी है उन गैर सरकारी संगठनों, स्वंयसेवी संगठनों और विशेषज्ञों की राय ली गई और जितने राजनीतिक दल है, उन्हें आमंत्रित किया गया, उनके किसान संगठनों को भी आमंत्रित किया गया। उन्होंने उसमें हिस्सा लिया और अपनी राय़ दी। इतना सब कुछ करने के बाद हमने चार भूतपूर्व प्रधान मंत्रियों की भी राय ली और तब जो दस्तावेज तैयार हुआ, उसे अंतिम रूप दिया गया। उस पर कैबिनेट ने अपनी मोहर लगाई। डब्ल्यू.टी.ओ. से संबंधित जो कैबिनेट कमेटी है, उसने अपनी मोहर लगाई। हमने अपना प्रेजेन्टेशन वहां दिया है, जिसका मैंने उल्लेख किया जिसे वहां व्यापक समर्थन मिला है। हम मजबूती से निगोशिएट कर रहे हैं। हम झुकने वाले नहीं है।
उपाध्यक्ष महोदय, लेकिन आज जो बाजार खुला है, बाजार खुलने के पीछे जो कारण है, वे आप भी जानते हैं। बाजार खुला है, लेकिन इस बाजार खुलने से हमें बहुत घबराने की जरूरत नहीं है। हमें सचेत रहना चाहिए और सचेत रहने के लिए हम लोगो ने इंतजाम कर रखा है। हर चीज और खासकर सैन्सिटिव आइटम्स पर नजर रखी जा रही है। हमारी यह कोशिश होगी कि कोई भी मुल्क हमारे देश में कोई सस्ती एग्रीकल्चर प्रोडयूस या कोई दूसरी प्रोडयूस डम्प न कर दे।
अगर वैसा करेगा और जब हम देखेंगे कि हमारे यहां आयातित वस्तुओं की बाढ़ आ रही है, वैसी स्थिति में हम और कदम उठाएंगे। आज हमने कस्टम्स डयूटी बढ़ाई है, उसके अलावा भी जो कदम उठाए जा सकते हैं, इंपोर्ट डयूटी को बाउंड रेट और सीमा के अंदर बढ़ाएंगे, डम्िंपग के खिलाफ मीज़र्स लिये जा सकते और गैट समझौते में जो हमारे पास सेफगार्ड मैकेनिज्म है, हमको सुरक्षा के जो उपाय दिए गए हैं, उन कदमों को उठाएंगे। जो भी जरूरी कदम होगा उठाएंगे, लेकिन देश के किसानों के हितों की रक्षा करेंगे इतना मैं सदन को आश्वस्त करना चाहता हूं।
आज बाज़ार खुला है, हमें इसका विश्लेषण करना चाहिए। आज हम हर चीज को समझ लेते हैं और बहुत ही सामान्य किस्म की व्याख्या कर लेते हैं। अगर कोई संकट कृषि के क्षेत्र में पैदा होता है तो बड़ी आसानी से हम उसको टाल जाते हैं और कहते हैं कि WTOके चलते है WTO के चलते कोई संकट आएगा तो उसका हल हम निकाल सकेंगे। इसलिए जिसको कहते हैं कि बिल्कुल सामान्य व्याख्या है, जनरलाइजेशन की जो प्रवृत्ति चली है, हर चीज में उसको देख लें, उससे काम नहीं चलने वाला है। समस्याएं और गंभीर हैं। WTO के चलते अगर कोई समस्या पैदा होगी तो उसके उपाय हैं और वे कदम हमने उठाए हैं। वित्त मंत्री जी ने इस बार के बजट में प्रावधान किया है। खाने का तेल बड़ी मात्रा में आ रहा है, उस पर उन्होंने फिर से कस्टम्स डयूटी को बढ़ाया है। पिछले साल चिन्ता होती थी कि चावल आ रहा है या गेहूं आ जाएगा। उसका निदान भी हमने निकाल लिया जिसमें परंपरागत तौर पर बेचने वाले अनाज पर आयात शुक्ल को बढ़ा दिया गया। गेहूं में ५० प्रतिशत आयात शुल्क बढ़ाया गया और चावल की वभिन्न किस्मों में ७० से ८० प्रतिशत आयात शुल्क बढ़ाया गया।
दूध के बारे में सब जगह चर्चा होती है कि दूध बाहर से आ रहा है। अभी बरार साहब बोल रहे थे। वे मेरे मित्र हैं और काबिल सदस्य हैं और किसानों के प्रति उनके मन में जो दर्द है, मैं उनकी भावनाओं की कद्र करता हूं। उन्होंने नैस्ले का उदाहरण दिया। कंपनी कोई भी हो, मल्टीनेशनल हो या कोई भी हो, वह मार्केटिंग कर रही है, हमारे ही किसानों से वे दूध लेते हैं। उनको जो मिल्क शैड का एरिया दिया गया है, जो दूध का इलाका दिया गया है, उन्हीं इलाकों से दूध की खरीद वे करते हैं और जो दूध पैदा करने वाले, या पशुपालन करने वाले या इसी काम में लगे हुए किसान हैं, उन्हीं को बाज़ार मिलता है। वे मार्केटिंग करते हैं। आज तो मार्केटिंग का ही जमाना है। अगर हम अपने प्रोडयूस की मार्केटिंग ठीक से करेंगे तो लोग आकर्षित होंगे। आणन्द से जो कुछ होता है, उसकी मार्केटिंग की क्षमता कम नहीं है, लेकिन यह अलग विषय है, मगर यह बाहर का आया हुआ दूध नहीं है। लेकिन बाहर से कोई दूध आएगा तो उसके लिए हमने पहले कदम उठा लिया है। पिछले साल जब दूध का पाउडर आ रहा था क्योंकि उस पर आयात शुल्क नहीं था, अलग से गैट के अंतर्गत ही आर्टिकल २८ के तहत हमने अलग से समझौता किया और जो शून्य प्रतिशत था, उसको बढ़ाकर ६० प्रतिशत किया और उसके बाद दूध के पाउडर का आयात उस ढंग से रोका गया। हमारे पास आंकड़े हैं। आपकी इजाज़त होगी तो मैं आंकड़े पेश करूंगा कि कितना दूध का पाउडर आया और कितना क्या आया। बीच में कई जगहों पर संकट आया, अखबारों में खबरें छपीं कि लिक्विड मिल्क आ रहा है। हमने उस पर नज़र दौड़ाई। हमने अपने मंत्रालय में मीटिंग की और लोगों को खुद हमने बाज़ार में भेजा और टैट्रा पैक में बाहर का दूध मिला। ६५ रुपये में एक लीटर दूध हमने अपने मंत्रालय में मँगवाया जिसमें १.५ प्रतिशत फैट था। विश्लेषण किया तो पाया कि कई नियमों का उल्लंघन हो रहा है। तत्काल कार्रवाई की गई और नए आदेश निकाले गए कि किसी को कोई चीज बेचनी है तो हमारे जो कानून हैं उनका पालन करना पड़ेगा, इस देश की भाषा में लिखना पड़ेगा, कन्टेन्ट लिखना पड़ेगा, दाम लिखना पड़ेगा, कई ऐसी व्यवस्थाएं जो हमारे देश में की गई हैं, उनका पालन करना पड़ेगा। इस प्रकार से जहां कहीं कोई कमी है उसको हमने दूर किया है। कस्टम्स को इस मामले में सचेत किया गया ताकि इस ढंग का माल कोई न भेजे। हमने गहराई में जाने की कोशिश की, मामले की तह में जाने की कोशिश की कि कहां से आया। सभी चीजों की जांच-परख करने के बाद जहां-कहीं कुछ लीकेज की गुंजाइश थी, उसको दुरुस्त करने की कोशिश की।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं इतना जरूर आश्वस्त करना चाहता हूं कि अगर हम प्रचार करें, बड़े पैमाने पर प्रचार हो जाए, तो वह अलग विषय है। हम सब राजनीति में हैं और अलग-अलग राजनीतिक दलों से संबंधित हैं। हम सभी वोट मांगते हैं और चुनाव लड़ते हैं। देश के वभिन्न हिस्सों में चुनाव होते रहते हैं। राजनीति के कारण चुनाव प्रचार करते हैं और यदि वे राजनीति के चलते ऐसा प्रचार करते हैं, तो वे कर सकते हैं, लेकिन सचाई वह नहीं है जो वे प्रचार कर रहे हैं। सचाई उससे बिलकुल अलग है।
उपाध्यक्ष महोदय, डॉ. रघुवंश बाबू को चिन्ता हो रही है। हम उनको जरूर आश्वस्त करना चाहते हैं कि हमारी सरकार पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए बहुत प्रयास कर रही हैं। वे देवेगौड़ा मंत्रिमंडल में पशुपालन मंत्री रहे हैं, वे अच्छी तरह से जानते होंगे कि इंटीग्रेटेड डिवेलपमेंट प्रोजैक्ट, ऑपरेशन फ्लड एरिया का काम १९९६ में पूरा हो गया। जो इलाके आपरेशन फ्लड से छूट गए या कवर नहीं हुए उनके लिए वह प्रोग्राम चलाया जा रहा है। उसमें और सुधार लाया गया है और उन इलाकों को कवर करने की कोशिश हो रही है जो छूट गए हैं। वहां के गांव-गांव में कोआपरेटिव बनाकर किसानों को मार्केटिंग की सुविधा दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं और ऐसी व्यवस्था की जा रही है।
उपाध्यक्ष महोदय, यही नहीं, बल्कि नस्ल सुधार का एक अभियान चलाया जा रहा है। हम उसको एक बड़ा रूप देने जा रहे हैं। नैशनल ब्रीडिंग प्रोग्राम फॉर कैटल एंड बफेलो को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी है। अब आदमी को आर्टीफीशियल इनसैमीनेशन सेंटर पर नहीं जाना पड़ेगा बल्कि लोगों को थोड़ा प्रशिक्षण देकर एक किट दी जाएगी और वे गांवों में उचित समय पर पहुंचेंगे और वहां किसानों की मदद करेंगे। इनसैमीनेशन रेट जानवरों के मामले में फेल हो रहा है। उसकी अच्छी व्यवस्था हम इस स्कीम के माध्यम से करने की कोशिश कर रहे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, बराड़ साहब ने फुट एंड माउथ डिसीज की चर्चा की। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान का यह दावा नहीं है कि भारत से यह बीमारी समाप्त हो गई। यह दावा इंगलैंड और अन्य देशों का था। उनके दावे के बाद, जब वहां वह बीमारी पाई गई,. तो पूरी दुनिया का ध्यान उनकी तरफ गया और उनके देश में हंगामा मच गया। अब मैं उस बात को कहना नहीं चाहता हूं क्योंकि वह दूसरे देश का सवाल है। उस देश का अपना नियम एवं संप्रभुता है। वे जो चाहें करने में स्वतंत्र हैं, लेकिन मेरी अपनी व्यक्तिगत राय है कि जो वहां किया गया कि जिस जानवर को यह बीमारी अत्यधिक थी उसको जला दिया गया, यह ठीक नहीं है। खैर, हम क्या कर सकते हैं, यह उनकी अपनी पालिसी है। उनकी सावरेनटी है। हम अपने देश में इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। न हमारे यहां की जनता इस बात को पसंद करेगी कि जिस जानवर को बीमारी हो, उसे जिन्दा जला दिया जाए। यह तो वही बात हो गई कि किसी आदमी को बीमारी है, उसे मार दिया जाए। यह भी कोई बात हुई। यदि आदमी बीमार है, तो उसका इलाज किया जाए, न कि उसे मारा जाए। रैंडर पैस्ट डिजीज का अपने देश से उन्मूलन करने का हमने दावा किया है और उसका हमने अपने देश से उन्मूलन कर दिया है, लेकिन हमने फुट एंड माउथ डिजीज का उन्मूलन अपने देश से करने का दावा नहीं किया है। केन्द्र सरकार इस बीमारी का उन्मूलन करने के लिए राज्य सरकारों को सहायता देती है। बीमारी पर काबू पाना एवं इसका उन्मूलन करना सरकार की नीति है। हम इसमें राज्य सरकारों की मदद करते हैं। राज्य सरकारें भी खर्च के अपने हिस्से का शेयर वहन करती हैं और किसान को भी खर्च का हिस्सा शेयर करना पड़ता है।
उपाध्यक्ष महोदय, सरकार का विचार है कि देश में डिजीज फ्री जोन्स बनाए जाएं। कुछ इलाके ऐसे घोषित कर दिए जाएं कि वहां जानवरों को किसी प्रकार का रोग नहीं है। हम उस तरफ जाना चाहते हैं। वह निर्णय की प्रक्रिया से गुजर रहा है। यह सिर्फ हमारे ही मंत्रालय से संबंधित नहीं है बल्कि इसमें और विभाग और मंत्रालय भी जुड़े हैं, प्लानिंग कमीशन से लेकर हर विभाग से मंजूरी लेनी होगी। इसलिए उसमें काम चल रहा है। हमारे मंत्रालय का विचार है कि फुट एंड माउथ डिजीज के उन्मूलन के लिए एक पोलियो पल्स अभियान की तरह अभियान चलाया जाए। हम इस बारे में पहले से प्रयास कर रहे हैं और शीघ्र इस बारे में निर्णय हो जाएगा, लेकिन हमारी समस्या यह है कि अखबारों में उन्हीं घटनाओं को प्रमुखता से छापा जाता है जब वे घटनाएं दूसरे मुल्कों में घट जाती हैं। वह समस्या उनकी अपनी समस्या है।
उन्होंने दावा कर रखा था। इसीलिए किसी के बारे में यह कहना कि कोई रोग बिल्कुल समाप्त हो गया, वह वापिस नहीं आयेगा - वापिस होकर कोई रोग आ सकता है - यह इसका प्रमाण है। इसके बाद यह खोजा जा रहा है कि कहां से यह रोग चला है, कहां से यह चीज चली आ रही है। इसके बाद कई प्रकार के लोग वक्तव्य देते रहेंगे। बीच में यह आ गया कि १० साल पहले हिन्दुस्तान से कोई रोग चला गया। हमारे वैज्ञानिक उसका जवाब देने में सक्षम हैं। अब यह कहा जायेगा कि दूसरे मुल्कों में इसके बारे में रोक लगाई जा रही है। हमारा जो भी व्यापार दूसरे देशों से है, वह खुला व्यापार है। हम कोई चीज छिपाते नहीं हैं। जो बात हमारे देश मे है, वह किसी से छिपी नहीं है। हमारा इतना बड़ा मुल्क है। हमारे यहां लोकतंत्र है। हमारे यहां वाणी की स्वतंत्रता है, लिखने की स्वतंत्रता है। कभी-कभी तो कोई लेख इतना घातक बन जाता है, इसे हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है। सोयाबीन के मामले में हमने अमरीका का पेस्ट रिस्क एनालेसिस देखा।, जो नैशनल ब्यूरो आफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सिस, आई.सी.ए.आर. का एक इंस्टीटयूशन है - वहां हमने देखा था। १५ पौधों पर हमने पेस्ट रिस्क एनालेसिस किया है। सोयाबीन पर उन्होंने भारत का एनालेसिस किया है। हम स्पिलिट सोयाबीन मांगाते हैं, होल सोयाबीन हम अपने देश में लाने की इजाजत नहीं देते। दूसरे मुल्कों के लोग इसकी व्याख्या करते हैं। हमारे देश की वस्तुओं के बारे में पेस्ट रिस्क एनालेसिस करते हैं। उसमें उन्होंने क्या आधार लिया है ?अपने देश के एक व्यक्ति ने एक लेख लिखा, उसे आधार बनाया गया है कि यह रोग आपके देश में है। अब इसे कैसे रोक सकते हैं ? क्या लिखा जा रहा है और क्या कहा जा रहा है। किस साक्ष्य के आधार पर दुनिया में क्या कहा जायेगा? आज रघुवंश जी जो भाषण दे रहे थे, इसको साक्ष्य बनाकर किस ढंग से हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया जायेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। इसलिए सब लोगों को कुछ बातों पर गौर करना चाहिए। इसके लिए हमें अलग से बैठना चाहिए। यह तो लिबरेलाइज्ड रिज़ीम है। मेरी निजी राय कुछ भी हो सकती है लेकिन यह पहले से चला आ रहा है और इस सरकार ने भी इसे अपनाया है। हम उससे अलग कोई बात नहीं कर रहे। लेकिन नये दौर में नये ढंग से सोचना होगा। अब सिर्फ आरोप लगाने के लिए कह देंगे कि इस कीमत पर आप दे रहे हो तो रघुवंश बाबू, हो सकता है कि उसका इस्तेमाल कहीं हो जाये।
आज हम किसानों की मदद कैसे करें? अगर हमारे यहां जरूरत से ज्यादा कोई चीज हो जाती है तो हम उस चीज को बाहर भेजेंगे। एक तरफ हम चाहते हैं कि हमारी पहुंच दुनिया के बाजार में हो। जब इंटरनैशनल मार्केट रेट पर हम कोई चीज बेचें - उससे कम हमारा दाम होगा, उसकी कीमत कम होगी तभी हम बेच पायेंगे।…( व्यवधान )आप बाद में पूछ लीजिएगा क्योंकि अभी तारतम्य बिगड़ जायेगा। हम कुछ जानकारी के तौर पर कहना चाहेंगे। अगर वह चीज हम बाहर भेज रहे हैं तो हमें खुशी होनी चाहिए। अगर कोई चीज बाहर जायेगी तब जाकर किसानों को उसकी कीमत मिलेगी। प्रोक्योरमैंट पूरा नहीं होता, हम इससे बिल्कुल सहमत हैं। हर जगह कहां प्रोक्योरमैंट हुआ है ? सरकार की पालिसी है,. प्राइस सपोर्ट स्कीम है। गवर्नमैंट का दावा है कि प्राइस नीचे जायेगा तो हम प्रोक्योरमैंट करेंगे लेकिन पूरे तौर पर अमल नहीं हो पाया। यह बात अपनी जगह दुरस्त है। उसके लिए हम बहस कर सकते हैं कि उसमें कहां क्या दोष है ? इन्फ्रास्ट्रक्चर हमारे पास पूरा नहीं है। जो एजैंसी प्रोक्योरमैंट की है, उनमें आपस में कोआरडिनेशन नहीं हुआ। यह एक अलग विषय है। उस पर हम आज नही जाना चाहते। हमारे जो साथी मंत्री हैं, वे उस पर ध्यान देंगे। हमारे मंत्रालय ने जो महसूस किया है, उससे भी हम अवगत कराते रहते हैं। लेकिन वह एक अलग विषय है। प्रोक्योरमैंट की एक सीमा है। आपके पास ४ करोड़ ७४ लाख टन कैपेसिटी है। पिछली बार हमने कहा था कि उसकी भंडारण क्षमता केन्द्र सरकार ले ले, राज्य सरकार ले ले। उत्पादन २० करोड़ ८८ लाख टन हुआ। सब कुछ प्रोक्योर नहीं होता। मार्केट में चीजों की कीमत होनी चाहिए और किसानों को कीमत मिलनी चाहिए। प्रोक्योरमैंट का एक तरीका है। प्राइस सपोर्ट स्कीम इसलिए चलाई जाती है ताकि उनकी हम मदद कर सकें। यह कभी नहीं हो सकता कि जो कुछ भी किसान पैदा करें, वे सब खरीद लिया जाये। उसकी कीमत कैसे बढ़ेगी ? कीमत तब बढ़ेगी जबकि बाजार हो। बाजार देश के अंदर अगर पूरा नहीं रहा तो देश के बाहर बाजार तलाशें। अगर बाहर भेज रहे हैं तो बाहर के रेट पर हमें कम्पीटेटिव होना होगा। आज अगर गोदाम में रख लें और उसको दो साल, तीन साल तक रखें, यदि वह बाहर नहीं निकलेगा तो पता नहीं उसके बाद वह खाने लायक रहेगा या नहीं। फिर गोदाम में रखेंगे तो अगले साल जो खरीदना है, उसे कहां रखेंगे क्योकि रातोंरात कोल्ड स्टोरेज नहीं पैदा होगा। सरकार ने रूरल गोडाउन के लिए नीति बनाई है। कोल्ड स्टोरेज की जो स्कीम थी, वह बड़ी सफल स्कीम है। १२ लाख टन का हमारा टारगेट था, उससे हम एक्सीड कर गये हैं। नौंवी पंचवर्षीय योजना में कोल्ड स्टोरेज के लिए जिसमें हम सबसिडी देते हैं, वह बैक-एन्डेड कैपिटल सब्सिडी स्कीम है।
उस स्कीम को रूरल गोडाउन्स के लिए एक्सटैंड किया जा रहा है। इस बार बजट में प्रस्ताव है, वित्त मंत्री जी ने ऱख दिया है। उसके लिए स्कीम बनेगी और रूरल गोडाउन बनाया जाएगा लेकिन वह रातों-रात नहीं बनेगा। प्राइवेट सैक्टर को भी कहा जा रहा है कि बड़े गोदाम बनाएं, साइलोस बनाएं। जो हमारी भंडारण क्षमता है, उसे ध्यान में रखते हुए अगर उस भंडारण से अनाज निकले और उचित जगह पर जाए - फिर उसे बाजार मिले। दूसरा क्रटसिज़्म होता है कि गोडाउन्स में अनाज पड़ा हुआ है और लोग भूखे सो रहे हैं। यह बिल्कुल सामान्य ढंग की बात कह दी जाती है। गोदामों में जो अनाज पड़ा है, वह कीमत देकर खरीदा गया है और भूखे कोई सो रहा है तो गरीबी उन्मूलन के दूसरे कार्यक्रम हैं। दोनों को इस तरह मिला दिया जाता है जो सुनने में अचानक बहुत ठीक लगता है लेकिन इसके बीच का जो इकोनौमिक्स है, उसे अज्ञानतावश या जान-बूझ कर समझने की कोशिश नहीं की जाती। सरकार ने फूड फॉर वर्क प्रोग्राम चलाया - जो सूखा प्रबल क्षेत्र हैं, जहां ड्राउट है, वहां मुफ्त में अनाज दिया जा रहा है ताकि राज्य वहां फूड फॉर वर्क कार्यक्रम चलाएं। कल वित्त मंत्री जी ने कहा कि इसे दूसरे राज्यों मे एक्सटैंड करने के बारे में सोच रहे हैं। लोगों को काम दीजिए और काम देने के लिए अनाज की जो जरूरत है, उसे यहां से लीजिए - इस तरह की योजना बन रही है। वित्त मंत्री जी ने कहा कि हम गोदाम खोलने के लिए तैयार हैं, इससे बढकर कोई बात नहीं हो सकती। लेकिन देश में दोनों बातें चली जाती हैं। अगर हम बाहर भेजें तो इंटरनैशनल मार्किट में उसे कम्पीटिटीव बनाना होगा। देश के अंदर गोदाम खोल कर किसी को नहीं बांटा जा सकता, उसे किसी न किसी योजना के तहत दिया जाएगा क्योंकि यह जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स का पैसा देश के खजाने में आ रहा है। किसी भी सरकार को उस पैसे को लुटाने का अधिकार नहीं है। कोई न कोई नीति बना कर सरकार चल सकती है, संसद की मोहर लगा कर चल सकती है। इसलिए ऐसे ही अज्ञानताभरा तर्क दे दिया जाए - उससे काम नहीं चलने वाला है। इसलिए सरकार उस दिशा में भी प्रयत्नशील है। बाहर से क्या आ रहा है? हमारा निर्यात बढ़ रहा है। हम आपको आंकड़ों में नहीं ले जाना चाहते थे लेकिन आपकी आश्वस्ति के लिए इतना जरूर कहेंगे कि आप चिन्तामुक्त हों इसलिए मैं आंकड़े देना चाहता हूं, इसलिए नहीं कि इसके बाद आप कुछ न बोलें, जितनी मर्जी हो उतना बोलें, किसी को बोलने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन मन में शान्ति हो जाए, इसलिए मैं इस आंकड़े को दे रहा हूं।
यह हमारे डी.जी.सी.आई. एंड एस मनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स की फिगर है, सरकारी आंकड़ों में इसे उद्धृत किया जाता है। अप्रैल १९९९ से जनवरी २००० में टोटल ऐग्रीकल्चर इम्पोर्ट कितना हुआ और अप्रैल २००० से जनवरी २००१ के बीच में कितना इम्पोर्ट हुआ - यह दो साल के नौ-नौ महीने के आंकड़े हैं। अप्रैल १९९९ से जनवरी २००० के बीच में टोटल ऐग्रीकल्चर इम्पोर्ट यदि करोड़ रुपये में देखें तो १३,७९९ करोड़ ५३ लाख रुपये का ऐग्रीकल्चर इम्पोर्ट हुआ। अप्रैल २००० से जनवरी २००१ तक १०,४५२.७२ करोड़ रुपए - यानी इम्पोर्ट घट गया। अब एक्सपोर्ट देखें। इस बीच हमारा जो एक्सपोर्ट हुआ, उसका हम बार-बार उल्लेख नहीं करना चाहते। अप्रैल १९९९ से जनवरी २००० के बीच में कुल एक्सपोर्ट की वैल्यू २००५८ करोड़ २९ लाख रुपये है और अप्रैल २००० से जनवरी २००१ में २१,४१३ करोड़ ४१ लाख रुपये का एक्सपोर्ट हुआ। इसका मतलब है कि हमारा एक्सपोर्ट बढ़ रहा है, इम्पोर्ट घट रहा है। इसलिए आपको ज्यादा चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन हमेशा सचेत रहने की जरूरत है, नजर रखने की जरूरत है। कॉमर्स मनिस्टर ने ऐलान किया है और एक तरह से वार रूम बना दिया, कौन्स्टैंट मौनीटरिंग के लिए कि कौन चीज कितनी मात्रा में आ रही है उस पर नजर रखें। जैसे ही कोई चीज ज्यादा आ रही है, तत्काल कदम बढाएं, या क्या करना है इम्पोर्ट में, इम्पोर्ट डयूटी बढ़ाने की जरूरत है बाउंड रेट के अन्तर्गत। हमने कोशिश की है और आपको निश्चिन्त करना चाहते हैं कि इस सबकी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है।
डेरी प्रोडक्ट्स वगैरह के क्षेत्र में आप सब लोग इम्पोर्ट के बारे में हमेशा चिन्तित रहते होंगे। हम एक ही फिगर देना चाहते हैं, ज्यादा फिगर नहीं देंगे कयोंकि बार-बार मिल्क और क्रीम की चर्चा होती है। अप्रैल १९९९ से जनवरी २००० में कितनी क्वान्टिटी थी -
१८.४२ हजार टन यानी १८,४२० टन का इस बीच में इम्पोर्ट हुआ था। उसकी कीमत कितनी थी, १०४.६८ करोड रुपये। यह अप्रैल, २००० से जनवरी, २००१ में कितना इम्पोर्ट हुआ है, १०८० टन और कीमत कितनी है, ६.०१ करोड़ रुपये। यह हालत है, लेकिन चारों तरफ चर्चा है कि दूध आ रहा है, किसान बर्बाद हो जायेगा। खैर, बोलने से हम मनाही नहीं कर रहे हैं, जिसको जो मर्जी वह बोले, लेकिन दिल में जरूर चैन रखिये, आश्वस्त रहिये और इतना हम जरूर आपको आश्वस्त करना चाहते हैं, बाद में बाकी चीज आपको बता देंगे।…( व्यवधान )
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी। आप पूरी बात आप सुनिये। हमारे यहां दूध नहीं खरीद रहे हैं और आप कागज पढ़ रहे हैं। …( व्यवधान )
श्री नीतीश कुमार : जो कुछ भी है, हम आपको ये आंकड़े दे रहे हैं और मैंऩे एक घटना का भी उल्लेख किया है कि बाहर से मंगवाकर जो हमने कदम उठाया है, हम सदन का ज्यादा समय नहीं लेना चाहते हैं, वरना दूध के जो एक-एक आर्डर्स इश्यू हुए हैं…( व्यवधान )
कुंवर अखिलेश सिंह: मैं आपके आंकड़ों और वाक चातुर्य पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा हूं।
श्री नीतीश कुमार : हम पहले ही कह चुके हैं। हमको वाक चातुर्य में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसके लिए पब्लिक मीटिंग का फोरम है, वहां हम वाक चातुर्य कर लेंगे, लेकिन यहां सदन सर्वोच्च है, यहां सच्चाई को बता देना चाहिए। विश्लेषण करने के लिए आप स्वतंत्र हैं, उसमें कुछ नहीं है।
कुंवर अखिलेश सिंह: मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय : पूरा कवर कर लें, उसके बाद पूछना।
श्री नीतीश कुमार : हम आपको बाद में एक-एक प्रश्न का जवाब दे देंगे, इसलिए कि कुछ पाइंट्स को हम कवर कर लेना चाहते हैं। अभी भड़ाना साहब बोलकर चले गये। उन्होंने कहा था कि किस तरह से किसानों का और हमारे साथियों ने भी कहा था, श्री अरुण जी ने भी कहा था कि किस ढंग से किसानों से कर्ज की वसूली होती है यानी कई जगह पर किसानों को गिरफ्तार किया जाता है और गिरफ्तार करने के बाद उनको जेल में डाला जाता है और जेल में जो उन पर खर्च होता है, उसको उनके कर्जे की राशि में जोड़ दिया जाता है। ऐसा कहीं नहीं होता है। अगर इंडस्ट्री में कोई डिफाल्टर है तो इस ढंग का व्यवहार उसके साथ नहीं हो सकता, लेकिन कृषि के क्षेत्र में वह किसानों के साथ हो रहा है। हम भी कृषि क्षेत्र का ही प्रतनधित्व करते हैं, देहाती क्षेत्र से ही आते हैं, इसलिए थोड़ी बहुत जानकारी हमको भी है। इसलिए हमने अपनी तरफ से सारे मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा। अगस्त, २००० में ही हमने सारे मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा और कहा, अगर आप इजाजत दे दें तो हम इसको पढ़ दें, लेकिन अगर पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम इसे सदन के पटल पर रखना चाहते हैं।
कुंवर अखिलेश सिंह: उसका अनुपालन होना चाहिए।
श्री नीतीश कुमार : अब सुन लीजिए।
"After every harvest, recovery complaint is lodged by the banks. In case of default the amount involved is declared as arrears of land revenue and sale certificates are issued by the State authorities. The properties mortgaged are attached and sold off for realisation of the loan amount. In addition, there is a provision of arrest and detention of the defaulter in the State Acts and this provision is resorted to quite frequently. The cost of proceedings and detention charges are also added to the loan amount. This draconian law is a legacy of the British rule which does not fit in the democratic system of our country."यह मैंने लिखा है और सभी मुख्यमंत्रियों को आग्रह किया है।
कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : इसके लिए तो आपको बधाई, लेकिन राज्य आपके ही पत्र का आदर नहीं कर रहे हैं।
श्री नीतीश कुमार : मैंने अपनी तरफ से कहा है और अखिलेश जी ठीक कह रहे हैं कि इसका रैस्पोंस नहीं है। हम चाहते हैं, अभी मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन होने वाला है, हम मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में भी इस सवाल को रखना चाहते हैं। उसमें भी हम उनको कहना चाहते हैं कि जरा इस कानून पर तो नजर डालिये। यह अंग्रेजों का बनाया हुआ कानून है, इसको कभी तो बदलेंगे। इस तरह से किसान को बेइज्जत करेंगे, कोई कर्ज नहीं चुकता कर पा रहा है, तो उसके लिए और तरीके हो सकते हैं। एक आदमी के लिए दो सजा, अगर किसी को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया तो वही काफी है। आपने उसको सजा दे दी, वह सजा नहीं हुई, उल्टे वह जेल में रहा तो उसके ऊपर जो खर्च हुआ, उसको भी मूलधन में जोड़ दिया। यह क्या अन्याय है?
इस तरह का अन्याय चला आ रहा है, इसको दुरुस्त किया जाना चाहिए। इसके लिए हम आग्रह करेंगे कि सब लोगों को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि इस तरह के कानून को मिटा दिया जाए, अगर वह कर्ज अदा नहीं कर पाता है तो उसको इस तरह से अपमानित न किया जाए। उसके लिए कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन यह तरीका नहीं होना चाहिए। अगर यही तरीका है तो सभी प्रकार के कर्जों की वसूली के लिए यह कानून लागू करना चाहिए, चाहे वह इंडस्ट्री में हो या अन्य कहीं हो। कहां एक तरफ ऩॉन-फार्मिंग एसेट्स होती है, कानून बना हुआ है, वह बचाता है कि आप उसका नाम नहीं बता सकते और कहां किसान को पकड़ कर उसको बेइज्जत किया जाता है। इसलिए दलगत भावना से ऊपर उठ कर हम सब लोगों को मन बनाना चाहिए। कुछ बातें दबी रहती हैं। यह अच्छा होता है कि इन विषयों पर चर्चा होती है और ये दबी हुई बातें उभरती हैं। जब उभरती हैं तो कुछ न कुछ रास्ता निकलता है। यह नहीं है कि सदन में कही गई बातें बेकार चली जाती हैं। हमारे कुछ सदस्य निराश होते हैं कि हम हर बार इस पर चर्चा करते हैं। जब भी हम चर्चा करते हैं, उसका प्रभाव होता है। सदन में कोई चर्चा होती है तो सरकार में जो ढिलाई होती है, उसमें चुस्ती आती है। यह संसदीय लोकतंत्र की खासियत है। आप यह न समझें कि चर्चा होती है, उसका प्रभाव नहीं होता, उसका असर पड़ता है इसलिए सदन में चर्चा होनी चाहिए। अगर कोई अर्द्धसत्य हो, ठीक जानकारी न हो, उसका उल्लेख होता है और कम से कम सच्चाई सामने आ जाती है।
हमारे साथी सुबोध राय जी बोल रहे थे, उन्होंने भूमि सुधार की बात की। नेशनल एग्रीकल्चर पालिसी इसी सदन में मैंने जुलाई २००० में रखी थी। १९९० से कृषि नीति पर काम हो रहा था। जब राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार थी, उसमें मधु दण्डवते जी वित्त मंत्री थे। उन्होंने अपने बजट भाषण में कहा था कि देश में राष्ट्रीय कृषि नीति होनी चाहिए। कौन कहता है कि नीति नहीं है, नीतियां रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर समेकित कृषि नीति नहीं रही है। कई सरकारें आईं, सबने काम किया। इस सदन में कई ड्राफ्ट रखे गए। बलराम जाखड़ जी के समय भी रखे गए। मैं कृषि सम्बन्धी स्थाई संसदीय समति का सभापति रहा हूं, मैंने अपनी समति में इस पर चर्चा करके रिपोर्ट दी है। कई बार इस सदन में चर्चा हुई, राज्य सरकारों के साथ भी हुई। कई ड्राफ्ट बनाए, लेकिन अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। क्या इतना भी श्रेय नहीं देंगे एक गरीब घर में पैदा हुए इनसान को, जो देहात के क्षेत्र से प्रतनधित्व करने वाला व्यक्ति है, दस साल तक जिसको अंतिम रूप नहीं दिया जा सका, उसने इसको इस सरकार में अंतिम रूप दिलाया। यह छोटा सा श्रेय भी नहीं दे रहे, मैं श्रेय की बात नहीं करता, यह हमारा दायित्व था। श्री वाजपेयी ने जब हमसे कहा कि आप कृषि मंत्रालय देखो तो उसी दिन मैंने सोच लिया था कि कृषि नीति को अंतिम रूप देंगे। मुझे प्रसन्नता है कि कृषि नीति को अंतिम रूप दिया गया है। स्टेंडिंग कमेटी इस पर चर्चा कर रही है। आपने भूमि सुधार की बात की। कृषि नीति के पैराग्राफ ३५ को आप देख लीजिए, मैं उसको उद्धृत करना चाहता हूं --
"Indian agriculture is characterized by pre-dominance of small and marginal farmers. Institutional Reforms will be so pursued as to channelise their energies for achieving greater productivity and production.
The approach to rural development and land reforms will focus on the following areas:- Consolidation of holdings all over the country; Redistribution of ceiling surplus lands and waste lands among landless farmers, unemployed youth with initial start up capital;..."हम लोगों ने अपनी पालिसी में भूमि सुधार को शामिल किया है। मैं उद्धृत करना चाहता हूं -- "Tenancy reforms to recognize the rights of the tenants and share cropers;"जिसके लिए कितने ही लाल झंडे लेकर आप लोगों ने आंदोलन किया है, यह हमारी कृषि नीति में है। थोड़ी सी प्रशंसा तो कर देते। इसके बाद एक और बात है, जिसको लेकर सारे देश में बावेला मचा हुआ है। उसको भी मैं उद्धृत करना चाहता हूं-- "Development of lease markets for increasing the size of the holdings by making a legal provision for giving private lands on lease for cultivation and agree-business."इसको लेकर विवाद हुआ कि मल्टी नेशनल कम्पनीज सारे किसानों की जमीन ले लेगी। मैं इसमें स्पष्टीकरण देना चाहता हूं कि सीलिंग जो बनी हुई है, उसके बाहर होल्िंडग ले जाने का हमारा कोई विचार नहीं है। सीलिंग लॉ को इन्फोर्स करना राज्य का काम है। हम यहां से नहीं कह रहे कि उसको खत्म करो। सीलिंग लॉज़ के अंतर्गत जो सीलिंग है, उसके अंतर्गत लैंडिंग होल्िंडग के साइज को बढ़ा सकते हैं, लीज पर दे सकते हो, ले सकते हो। आज एक बीघा जमीन वाला किसान खेती नहीं कर पा रहा, वह दूसरे को दे रहा है। उसका भी अधिकार बरकरार रहता है। इस तरह से होल्िंडग का साइज बढ़ा कर नई टेक्नोलॉजी को एडाप्ट करें। इसका मकसद कभी यह नहीं है कि कारपोरेट फार्मिंग होगी और वे यहां आकर अनाज पैदा करेंगे। वे दूसरे काम के लिए आएंगे। इसलिए मैं इसको स्पष्ट कर देना चाहता हूं।
कभी न कभी इसकी क्लेरफिकेशन की जरूरत पड़ती है। अगर पॉलिसी पर चर्चा होती तो उसी दरमियान हम उसकी सीलिंग के अन्तर्गत ही क्लेरफिकेशन करते। होल्िंडग के साइज को बढ़ाने की बात का उद्देश्य इसमें है। इसके बाद है: "Updating and improving of land records, computerisation and issue of land passbooks to farmers."हर किसान को उसकी जमीन की पासबुक मिले। आज कर्ज लेने के लिए किसान को कितना तंग होना पड़ता है, वह जब जमीन बेचता है या खरीदता है तो उस समय उसे कितना तंग होना पड़ता है। यह पासबुक किसान को दी जायेगी तो जब वह जमीन बेचे तो उसमें से उतर जाएगा और खरीदे तो चढ़ जाएगा और वह पासबुक लेकर जा सकता है और बैंक को कह सकता है कि हमारी यह होल्िंडग है, हमारी यह हैसियत है और हमें इतना कर्ज मिलना चाहिए, इसी के आधार पर कर्ज दो। इसलिए जमीन का पैसा किसान को मिलना चाहिए और जब उसके पास पासबुक होगी तो जितने देवी-देवताओं के नाम कई जगह जमीनें हैं, कुत्ता-बिल्ली के नाम जमीनें हैं, छुपाई हुई जमीनें हैं, सीलिंग से फालतू चुराकर रखी गई जमीनें हैं, तभी वे जमीनें निकलेंगी और वे जमीनें लैंडलैस किसानों में बांटी जा सकती हैं। सबको पासबुक देने के पीछे यही उद्देश्य है। इसके बाद है: "Recognition of women’s rights in land." महिलाओं का अधिकार जमीन में होना चाहिए, उन्हें मालिकाना हक मिलना चाहिए, बराबरी का हक मिलना चाहिए। यह लैंड रिफॉर्म पॉलिसी है, यह एग्रीकल्चर पॉलिसी है। हम लैंड रिफॉम्र्स को नहीं छोड़ना चाहते हैं। हम लैंड रिफॉम्र्स देश में सख्ती से लागू करना चाहते हैं। यह हमारा उद्देश्य है, यह नेशनल पॉलिसी है, इसलिए इस मामले में हम जरूर आश्वस्त करना चाहते हैं। कई सवाल इस बीच में उठे हैं, कुछ बातें भी कही गईं। इसमें कई विषय आ जाते हैं। इसमें प्रोक्योरमेंट का विषय भी आ जाता है। इसके बारे में हमने कहा कि अब प्रोक्योरमेंट का काम एफ.सी.आई. स्टेट एजेंसी के सहयोग से करती है खासकर खाद्यान्न का और बाकी दलहन, तिलहन के प्रोक्योरमेंट के लिए एजेंसी‘नैफेड’ है। अगर आप कहेंगे तो नैफेड के द्वारा जो प्रोक्योरमेंट किया गया है, उसके फिगर्स हम आपके सामने रख सकते हैं कि कितना ज्यादा प्रोक्योरमेंट हम लगातार करते चले जा रहे हैं। लेकिन यदि आप चाहेंगे तो हम आपको ऑयलसीड्स के फिगर्स दे सकते हैं, हमारे पास हैं। १९९९-२००० में तक सोयाबीन का प्रोक्योरमेंट हुआ पांच लाख एक हजार टन का हुआ। उसकी कीमत ४३९.२३ करोड़ रुपये प्रोक्योरमेंट सोयाबीन की हुई। सनफ्लॉवर का प्रोक्योरमेंट ४६००० मीटि्रक टन हुआ २०००-२००१ में । ग्राउंड नट का २९००० मीटि्रक टन प्रोक्योरमेंट हुआ। २०००-२००१ में सोयाबीन का प्रोक्योरमेंट ५४,६६० मीटि्रक टन हुआ है। मस्टर्ड सीड्स का दो लाख पैंतालीस हजार एक मीटि्रक टन हुआ। सनफ्लॉवर सीड्स का प्रोक्योरमेंट ४६००० टन का हुआ है। कोपरे की परचेज दो लाख २५ हजार २८७ मीटि्रक टन हुई है। इसकी कीमत ७६५ करोड़ रुपये की आंकी गई है। ग्राउंड नट का २०००-२००१ में प्रोक्योरमेंट २८,९८२ मीटि्रक टन हुआ है। ३७ करोड़ ८० लाख रुपये का प्रोक्योरमेंट हुआ है। जितना भी जहां संभव है, जो दलहनी, तिलहनी फसलें हैं, इनका प्रोक्योरमेंट किया गया है। अभी पिछली बार जब चर्चा शुरू हुई और अगर मैं गलत नाम नहीं ले रहा हूं तो प्रभा राव जी ने कहा था कि डाइवर्सफिकेशन होना चाहिए। बहुत ठीक बात कही थी। प्रधान मंत्री जी ने आग्रह किया था कि डाइवर्सफिकेशन होना चाहिए। अब जो बहुत ज्यादा गेहूं चावल क्रॉपिंग पैटर्न हो रही है। उससे कुछ जमीन के कुछ हिस्सों को डाइवर्सिफाइ करना चाहिए। यह १२ मार्च से चर्चा शुरू हुई तो कई लोगों ने आलोचना कर डाली। हम चाहेंगे कि आपने जो बात कही है, उसे अपने साथियों को भी अवगत करा दें कि डाइवर्सफिकेशन कितना जरूरी है। एक तरफ गेहूं और चावल रखने की जगह नहीं है। किसानों को सब जगह ठीक कीमत नहीं मिल पा रही है। यह समस्या है। यह समस्या उन राज्यों में पैदा हुई है जहां सरप्लस प्रोडक्शन शुरू हो रहा है। वहां प्रोक्योरमेंट तक नहीं हुआ है। प्रोक्योरमेंट न होने के कारण किसानों में बैचेनी है।
अगर एक हिस्सा डाइवर्सिफाई करें, तो बहुत उपाय निकल सकते हैं । आज दलहन में डैफसियेंसी है, तिलहन में डैफसियेंसी है, अगर एक हिस्सा होर्टिकल्चर प्रोडयुस की तरफ जाए, तो उससे किसानों को कीमत मिलेगी और चीजों को रखने की समस्या भी नहीं आएगी । इसलिए डाइवर्सफिकेशन को भी हम लोगों को ध्यान में रखना चाहिए और डाइवर्सफिकेशन करना चाहिए । डाइवर्सफिकेशन तभी होगा, जब कीमत मिलेगी । इसलिए रबी की फसल में जब प्राइस पालिसी सरकार ने एनाउन्स की तो हमने गेहूं के किसानों के लिए गेहूं की कीमत बढ़ाई और कीमत ५८० रुपए प्रति क्िंवटल से ६१० रुपए प्रति क्िंवटल कीमत बढ़ाई ।
जब १२ मार्च को यह चर्चा शुरू हुई थी, तब यहां पर आशंका व्यक्त की गई थी कि गेहू का मनिमम प्रोक्योरमेंट प्राइस घटा दिया जाए । उनको निराशा हाथ लगी होगी, जब गेहूं की कीमत ५८० रुपए प्रति क्िंवटल से ६१० रुपए प्रति क्िंवटल बढ़ाई गई । हम लोगों ने यह फैसला लिया कि जो कोरम सिरीयल्स हैं, जैसे पलसैस, आयल सीड्स आदि, उनकी कीमत ज्यादा बढ़ानी चाहिए, ताकि किसान उस ओर जायें । किसान दलहन, तिलहन, आयल सीड्स, पलसैस मार्जिनल लाइन पर उपजाते हैं और रेन-फैड एरिया में ज्यादा उपजाते हैं और उसमें भी ज्यादा पूंजी नहीं लगाना चाहते हैं । इसलिए उनको उतनी कीमत नहीं मिलती है और नतीजा यह होता है कि हम एक तरफ आत्म-निर्भर नहीं होते हैं और दूसरी तरफ समस्या पैदा हो जाती है । इसलिए हमने रबी की फसल पर प्राइस-पालिसी बनाई और गेहूं की कीमत बढ़ाई । इसके अलावा, बारले यानि जौ की कीमत भी ५०० रुपए प्रति क्िंवटल कर दी । स्मरण के आधार पर, सब्जैक्ट-टू-करैक्शन, पहले कीमत ४३० रुपए प्रति क्िंवटल थी, जिसको बढ़ाकर ५०० रुपए प्रति क्िंवटल किया गया । इसी तरह से चने की कीमत भी १०१५ रुपए प्रति क्िंवटल से बढ़ाकर ११०० रुपए प्रति क्िंवटल की गई ।
कुंवर अखिलेश सिंह: मार्केट बहुत ज्यादा है ।
श्री नीतीश कुमार : प्राइस पालिसी का मतलब यही है कि किसान उस ओर जायें । क्राप के बीच में जो इन्टर-से-पैरिटी है, उसको हम इस ढंग से निर्धारित करें कि किसान उस ओर आकर्षित हो । इसीलिए मैंने इस संबंध में आंकड़े पहले प्रस्तुत कर दिए हैं । इसके बादजूद भी जहां-जहां जरूरत पड़ी है, प्रोक्योरमेंट किया जा रहा है । किसानों को जब कीमत मिलेगी, तो वे उस और डाइवर्सिफाई करेंगे ।
दूसरी बात, प्रोसैसिंग से संबंधित है । फ्रूट्स और सब्जियों में हम दूसरे नम्बर पर आ गए हैं । हमारे यहां १.८ प्रतिशत फ्रूट्स और सब्जियों का प्रौसैसिंग होता है और ९८ प्रतिशत फ्रैश तौर पर मार्केटिंग होता है। अगर इस प्रोसैसिंग को दस प्रतिशत के लैवल पर ले जायें, तो मात्र ७ प्रतिशत वैल्यु एडिशन बढ़कर किसानों को ३५ परसेंट कीमत ज्यादा मिलेगी और कन्ज्युमर को कम कीमत देनी पड़ेगी । आज अपने देश में किसानों को एक मिलता है, तो कन्ज्युमर को पांच देना पड़ता है । ऐसी स्थिति में न किसानों को कम कीमत मिलेगी और न कन्ज्युमर्स को ज्यादा कीमत देनी पड़ेगी और दोनों के बीच में अन्तर घटेगा । प्रोसैसिंग होगा, तो वैल्यु एडिशन होगा और किसानों को ज्यादा कीमत मिलेगी । इसलिए इस बार जब नीति निर्धारित की गई और मंत्रालय ने जब फूड प्रोसैसिंग पालिसी बनाई और उसको लागू कराने की हम लोगों ने मांग की, तो महसूस किया गया कि इनको एक्साइज में एग्जैम्पशन दिया जाए । मुझे खुशी है कि हमारे वित्त मंत्री जी ने एग्जैम्पशन दिया है । जब एक्साइज में एग्जैम्पशन मिल गया, तो फिर सैल्स टैक्स में भी एग्जैम्पशन मिलना चाहिए । सैल्स टैक्स चूंकि राज्यों का विषय है, इसलिए हमने उनके साथ मीटिंग की और य़ह तय किया किसी एक कमोडिटी के बारे में विशेष रुख नहीं रखेंगे । उनके यहां इस संबंध में स्टैंडिंग कमेटी है, बात को वहां तक ले जाया गया, ताकि कन्सैसस बनें और सैल्स टैक्स में उनको रियायत मिले । एक तरफ एक्साइज में रियायत मिले और दूसरी तरफ सैल्स टैक्स में रियायत, तो यूनिट ज्यादा लगेंगे और दो परसेंट प्रोसैसिंग लैवल को दस परसेंट करने के लिए दस साल का लक्ष्य रखा गया । इस प्रकार दस साल में इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें १.४० लाख करोड़ रुपए इन्वैस्टमेंट के लिए चाहिए । जब इतने लैवल पर प्रोसैसिंग होगा, तो उससे तीन करोड़ रोजगार के अवसर पैदा होंगे यानि तीन करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा । इससे ज्यादा किसी दूसरे क्षेत्र में इतने रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो सकते हैं । बड़ी-बड़ी कम्पनियां मार्केट करें, लेकिन हमारे यहां जो छोटे-छोटे किसान हैं, उनके लिए जो फूड-प्रोसैसिंग के लिए पालिसी ला रहे हैं, उसमें एग्रीकल्चर के साथ पालिसी स्थापित करते हुए, यह कहा जा रहा है कि हमारे यहा एन्कर इन्डस्ट्रीज हों ।
किसी एक क्षेत्र में कोई एक एंकरिंग इंडस्ट्री हो और बाकी सब उससे जुड़ी हुई हों, नीचे तक उसकी नैटवर्किंग बने, ताकि गांव में जो छोटा व्यक्ति हो, उसको उसका लाभ मिले। उसे हम इसी साल में बनाना चाहते हैं। उनको मार्किट मिले और उनको बाहर जाने की छूट हो। महाराष्ट्र के लासन गांव में मैं गया था। वहां आज यह स्थिति है कि अगर वहां प्याज होती है तो वे तुरंत फैक्स कर देते हैं। हालांकि यह कॉमर्स मनिस्टरी करती है लेकिन वे तुरंत फैक्स करते हैं कि एक पोर्ट पर थोड़ा काम रुका हुआ है और हम लोग तुरंत हस्तक्षेप करते हैं ताकि प्याज का एक्सपोर्ट हो ताकि यहां के किसानों को कीमत मिले। ये चीजें ऐसी हैं जिनका एक्सपोर्ट करते रहना चाहिए। यदि देश में कभी इनकी कमी भी हो तो भी उसका सामना करना चाहिए। सन् १९९८ जैसे आंसू बहाने से काम नहीं चलेगा। अगर एक बार बाजार से अपना स्थान समाप्त होता है तो दुबारा स्थान प्राप्त करने में मुश्किलें आती हैं। इसलिए किसानों के हक में यह बात है कि अगर एक्सपोर्ट होती है तो होने देना चाहिए। अगर देश में उसकी कमी हो जाए तो उस कमी को झेलिये। यह नहीं होना चाहिए कि एक दम टीन की तरह गरम हों और एक दम टीन की तरह ठंडे हो जाएं। इन सब बातों पर एकमत होना चाहिए। पक्ष और विपक्ष सब में एका होना चाहिए। इसलिए हमने निर्णय लिया है कि ये जो कृषि संबंधी मुद्दे हैं इनको आर्टिकूलेट किया जाना चाहिए। कृषि मंत्रालय आर्टिकूलेट करता है। इसलिए हमने निर्णय किया है कि कृषि मंत्री की अध्यक्षता में हम एक किसानों की सलाहकार समति बनाएंगे। जितने किसानों के नेता हैं, शुभचिंतक हैं, संगठन हैं, हम चाहते हैं कि उन सभी को इसमें शामिल किया जाए।
हमारे यहां खरीफ और रबी के दो मौसम हैं। ज्यादा नहीं तो खरीफ से पहले और रबी से पहले और बजट से भी पहले इसको लागू किया जाए। इसको लागू करने से किसानों के मुद्दे सामने आयेंगे और उनको सरकार के अंदर भी आर्टिकूलेट किया जा सकता है ताकि उनको नीति का समर्थन मिल सके। एक तो हमारे विचार हैं और कुछ दूसरे विचार हैं। इन पर पहले भी सदन में चर्चा हुई है। हमें और सरकार को कोई एतराज नहीं है अगर ऐसी कमेटी बनती है जैसे एससी और एसटी की समस्याओं के लिए बनी है। सभी सदस्यों को लेकर अगर ऐसी कमेटी बनती है तो यह प्रसन्नता की बात होगी और हम लोग उसके हक में हैं और यह कमेटी स्पीकर साहब के हाथ में है। एक तो सरकारी स्तर पर किसानों के साथ मिलकर निर्णय करने के लिए, उनके व्यूज को आर्टिकूलेट करने के लिए और दूसरा सदन के बाहर स्थाई तौर पर एक ऐसी व्यवस्था हो और उस दिशा में हम नाम तक तय कर रहे हैं तथा चारों तरफ से फीड-बैक ले रहे हैं ताकि कोई इलाका अछूता न रहे, कोई महत्व की फसल छूट न जाए। अगर कोई ऐसी कमेटी होगी तो हम सरकार में भी अपनी बात रख सकेंगे।
दूसरा, अगर संसद के अंदर सभी पक्ष के लोगों को मिलाकर कोई इस तरह की कमेटी बनती है तो उसके लिए चेयर की तरफ से फैसला आना होगा। उस पर सरकार को कोई एतराज नहीं है। यह बात भी सही है कि हमने कृषि नीति तो ला दी और इसको अमल में लाने के लिए हमने कमेटी बनाई और सब इंडस्ट्री, डिपार्टमेंट उसमें आये। माननीय रघुवंश बाबू बोल रहे थे कि १३-१४ डिपार्टमेंट इसमें हैं, लेकिन कृषि नीति से १८ मंत्रालयों का संबंध है। कृषि मंत्रालय में चार विभाग हैं तो शेष १४ विभाग तो बाहर हैं। इसके इम्प्लीमेंटेशन के लिए ऑफिसर लेवल पर मींटग होती है। हमने लैंड-रिफोर्म की बात की तो राज्यों को इसके लिए तैयार कराना है कि इतना सब कुछ करिये। उसके लिए रूरल डेवलेपमेंट मनिस्ट्री को पहल करनी होगी। इसी तरह से अगर हम पानी का सवाल लेते हैं तो वाटर रिसोर्सेज की बात आ जाएगी। बिजली की बात होगी तो पावर मनिस्ट्री की बात आ जाएगी। खाद्यान्न प्रोक्यूरमेंट की बात होगी तो फूड मनिस्ट्री की बात आ जायेगी। इस तरह से अलग-अलग मनिस्ट्रीज का इससे संबंध होता है। वित्त मंत्रालय का सबसे संबंध है,
19.00 hrs. और उसके लैवल पर बात हो रही है। आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि पूरी स्थिति को देखते हुए प्रधान मंत्री जी ने एक ग्रुप ऑफ मनिस्टर्स बनाया। उसमें डिप्टी चेयरमैन प्लानिंग कमीशन भी हैं। कृषि मंत्री के अलावा खाद्य मंत्री, रूरल डैवलपमैंट मंत्री को लेकर एक ग्रुप ऑफ मनिस्टर्स बनाया गया है ताकि कृषि संबंधी मसलों को देखा जा सके। यह पहला कदम है जिससे लोगों के बीच में समन्वय स्थापित किया जा रहा है। इसलिए मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं कि यहां सरकार की तरफ से कृषि मंत्री के नाते जवाब दे रहा हूं। उससे संबंधित या अन्य दूसरे विभाग से संबंधित जो बातें यहां रखी हैं उस पर कोई बात रखी जा रही है तो उसका कोई मतलब नहीं है। उसका मतलब है और मैं पूरी गम्भीरता और जिम्मेदारी के साथ इन बातों को रख रहा हूं। मुझे बहुत प्रसन्नता है कि माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में किसानों की समस्या और कृषि क्षेत्र के सभी मसलों पर बहुत गम्भीर चिन्तन और मनन किया जाता है और कृषि क्षेत्र को हर सम्भव सहायता दी जा रही है।
यहां सबसिडी का मसला कई सदस्यों ने उठाया। मैं आपका ज्यादा वक्त नहीं लूंगा लेकिन यह ऐसा मसला है जिसे कई सदस्यों ने उठाया और कहा कि सबसिडी को घटाया जा रहा है। खाद पर सबसिडी नहीं घटी है और न ही कुल मिला कर एग्रीकल्चर सैक्टर में सबसिडी घट रही है। वह बढ़ती जा रही है। राज सहायता बढ़नी भी चाहिए। चाहे यूरिया को ले या दूसरी खाद को लें। दोनों में सबसिडी बढ़ रही है। आपके मिजाज से ऐसा लग रहा है कि आप चाह रहे हैं कि यह जल्दी डिबेट खत्म हो। कुल मिला कर सबसिडी की राशि बढ़ती जा जा रही है। कल वित्त मंत्री ने कहा कि वह क्रेडिट कार्ड से ज्यादा से ज्यादा किसानों को कवर करना चाहते हैं। इस बार क्रेडिट देने का लक्ष्य ६४ हजार करोड़ रुपए है। प्रभा राव जी ने कहा कि रिसर्च इंस्टीटयूशन में रिसर्च होता है लेकिन वह किसानों तक नहीं पहुंचता है। आईसीएआर ने कोई फ्रंट लाइन डैमनस्ट्रेशन बंद नहीं किया है बल्कि उसे और प्रभावी बनाया गया है। इंस्टीटयूशन विलेज लिंकेज प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं। हर इंस्टीटयूशन के साथ विलेजेस को लिंक किया जा रहा है जिससे वे डायरैक्ट एक्सटैंशन का काम करें। हालांकि आईसीएआर का एक्सटैंशन का काम नहीं है। वह राज्य सरकारों का काम है। रिसर्च और प्रोडक्शन के बीच में एक्सटैंशन का जो लिंक है, वह कमजोर है। उसे देखते हुए मैंने महसूस किया कि जहां एक तरफ हजारों एग्रीकल्चर ग्रेजुएट शिक्षा प्राप्त करके बेकार हैं, वहीं दूसरी तरफ किसानों को आधुनिक जानकारी और अच्छी प्रेक्टिस की जानकारी नहीं मिलती है। उन्हें तमाम कानूनों के बावजूद नकली किस्म के इनपुट्स मिलते हैं।
यहां किसानों के आत्महत्या की बात कही गई। इसका कई बार विश्लेषण हुआ तो पाया गया कि इनपुट्स की गड़बड़ी के चलते उनकी फसल बरबाद हो गई। उसे ध्यान में रखते हुए हमने सोचा कि जिस प्रकार बीमार आदमी के इलाज के लिए डाक्टर या क्लीनिक होता है उसी तरह कृषि क्षेत्र में फसलों की बीमारी और कमी दूर करने के लिए कृषि क्लीनिक होने चाहिए। हमने एग्री क्लीनिक की बात की। ग्रेजुएट्स को ज्यादा ट्रेनिंग देकर एक पैकेज तैयार किया गया। उसमें उनकी जो इच्छा होगी, वे प्रेक्टिस को एडॉप्ट करेंगे और एग्री क्लीनिक खोलेंगे। मुझे प्रसन्नता है कि वित्त मंत्री जी ने इसे अपने बजट भाषण में इसे समाविष्ट किया और कहा कि एग्री क्लीनिक खोले जाएंगे। इसके लिए बैंक उन्हें कर्जा देंगे।
यहां आत्महत्या की बात आई और फसल बीमा की बात आई। क्रॉप इंश्योरेंस स्कीम को व्यापक बना कर नेशनल एग्रीकल्चर इंश्योरेंस स्कीम लागू की जाएगी। पहले यह लोनी फार्मर्स के लिए अवेलेबल था। वह उनके लिए आज भी है। जो किसान कर्ज नहीं लेते उनके लिए यह स्कीम उपलब्ध नहीं थी। अब नेशनल एग्रीकल्चर इंश्योरेंस स्कीम में नॉन लोनी फार्मर्स भी कवर होंगे। हम इसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार कर रहे हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इसे लें। उसमें समीक्षा करने का प्रावधान है। दो-तीन साल के बाद इसकी समीक्षा करने का प्रावधान था। मुझे बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि मैंने एक साल में उसकी समीक्षा की। राज्य सरकारों के सहयोग से इसे लागू किया जाता है। चूंकि वे लॉस शेयर करते हैं जिसे लॉस असैसमैंट यूनिट कहा जाता है, एरिया यूनिट एप्रोच होता है, वे जिला या ताल्लुक हैं। मुझे लगा कि जब तक इसे पंचायत के स्तर पर नहीं ले जायेंगे, तब तक उतना प्रभावी नहीं हो पायेगा। इसका लाभ किसानों को उस तरह से नहीं मिल पाया। यह संभव है कि यदि एक ताल्लुक को एक यूनिट बनाते हैं तो हो सकता है कि पांच पंचायत को नुकसान हुआ हो और पांच को नुकसान नहीं हुआ हो। हो सकता है कि एक सीमा के अंदर नुकसान नहीं हुआ हो तो किसी को उसका लाभ नहीं मिलेगा। इसलिये हमने कहा कि हम इसकी समुचित समीक्षा करेंगे। समीक्षा के बाद पायलट स्कीम लागू की गई है। हर राज्य एक जिला पंचायत स्तर तक बीमा योजना को लागू कर देगा और उसका परीक्षण हो रहा है। चूंकि यील्ड डॉटा आवश्यक है और किसी चीज के लिये यील्ड डॉटा की जरूरत होती है, लेकिन वह अवेलेबल नहीं था। इसके लिये स्टैटस्टिक्स इंस्टीटयुशन्स से राय ली गई है और एक फार्मूला बनाया गया। उसमें जी.आई.सी. की और सब लोगों की सहमति हुई तब उसे परीक्षण के तौर पर लागू किया जा रहा है ताकि उसके जो रिजल्ट्स आयेंगे, उसके आधार पर देश भर में राज्य सरकारो के साथ मिलकर लागू करा सकें, तब सही मायने में लोगों को बीमा मिलेगा। इनपुट गड़बड़ मिलता है, सीड कभी ठीक नहीं मिलता है। हम उसे सदन में चर्चा के लिये ला रहे हैं । प्रोटैक्शन आफ वैराइटीज एंड फार्मर्स राइट बिल में इस बात का प्रावधान किया गया है कि अगर कोई प्लांटिंग मैटीरियल उन कंडीशन्स में सफल नहीं होता है तो किसानों को उससे हर्जाना मांगने का अधिकार होगा और प्लांटिंग मैटीरियल का व्यवसाय करने वाले को कम्पनसेट करना होगा। उसी तरह से सीड्स एक्ट में परिवर्तन करना चाहूंगा। यह एक पुराना एक्ट है और उसपर तैयारी चल रही है ताकि किसानों को उत्तम किस्म का बीज मिले और बीज के कारोबार का गोरखधंधा नहीं कर पायें। आज किसान परेशान होते हैं। अगर एग्रीकल्चर क्लीनिक होगा तो इनपुट्स की इसमें टैस्िंटग की व्यवस्था होगी। अगर किसान चाहेंगे तो अपने पैस्टीसाइड्स फर्टिलाइजर, माइक्रो-न्यूटिं्रट्स सबकी टैस्िंटग करा पायेंगे। तब उसको सही इनपुट्स मिलेगा, सही सलाह मिलेगी। आज कई जगहों पर दुखद आत्महत्याओं की घटनायें घट रही हैं, उन पर पाबंदी लग जायेगी। हम आंसू बहा सकते हैं लेकिन हमें कदम उठाना होगा। सत्ता में कोई रहे। अगर किसानों की दुर्दशा होगी, अगर किसान कष्ट को नहीं झेल पायेंगे। वह उसको बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। वह अपमान नहीं झेल पाता है। जब उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आती है तो वह उसे कभी कभी झेल नहीं पाता है और आत्महत्या कर लेता है। हमें इस समस्या को समझना होगा। इसके लिये क्या किया जाना चाहिये, इस ओर हमें कदम बढ़ाना होगा।
उपाध्यक्ष महोदय, इंश्योरेंस बढ़ाने के लिये इनपुट्स क्वालिटी का मिले, सीड्स के मामले में जो दिक्कत है, उसे देखते हुये हमने अपनी समझ से उसे दुरुस्त करने के लिये कदम उठाया है। जब चर्चा होती है तो नये विचार आते हैं जिसे ध्यान में रखकर नये कदम बढ़ाये जाते हैं। इसलिये माननीय सदस्यों ने कृषि क्षेत्र की स्थिति में सुधार लाने के लिये जो सुझाव दिये हैं, उन सार्थक सुझावों पर गौर करेगे। उन सुझावों को ध्यान मे रखते हुये कैसे बेहतर से बेहतर रणनीति अपनाई जाये ताकि हमारी एग्रीकल्चर ग्रोथ में वृद्धि हो। हमने नेशनल एग्रीकल्चर पॉलिसी में कहा है कि हम यह ग्रोथ ४ परसेंट से ज्यादा हासिल करना चाहते हैं। हमने न केवल अपनी १०० करोड़ से ज्यादा आबादी को खिलाना है बल्कि उन्हें पौष्टिक भोजन भी देना है। हमें न केवल दुनिया के बाजार में अपनी पहुंच बनानी है बल्कि अपना एक स्थान भी बनाना है ताकि हम किसानों की माली हालत में सुधार ला सकें। जब किसान की माली हालत सुधरेगी, तो देश की माली हालत भी सुधरेगी। इसलिये इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिये हम कृत संकल्प हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी ने लक्ष्य निर्धारित किया है कि इस दशक में हम फूड प्रोडक्शन को दुगना करना चाहते हैं। इस संबंध में जो सुझाव आते हैं, उन सुझावों पर गौर करके एक जनमत बनाकर अधिक से अधिक इस क्षेत्र में निवेश हो सके, इस ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इस क्षेत्र में व्यापक समर्थन मिला है।
उपाध्यक्ष महोदय, कृषि क्षेत्र में इनवैस्टमेंट का ऐसा विषय है, यदि इसे लिया जाये तो विस्तृत डिसकशन हो सकती है। कैपिटल इनवैस्टमेंट की एक बात अछूती रह गई है जिस पर हम कुछ कहना चाहते थे लेकिन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत हम पब्लिक सैक्टर को बढ़ायेंगे। यदि टाइम बाउंड इरिगेशन के प्रोजैक्ट्स पूरे किये जायें तो इस सिलसिले में पब्लिक इन्वैस्टमेंट बढ़ा सकते हैं। इसी प्रकार वाटरशैड मैनेजमेंट के जरिये कई कदम उठा सकते हैं। हमें प्रयत्न करना होगा कि कैपिटल इनवैस्टमेंट बढ़े लेकिन इनवैस्टमेंट इन एग्रीकल्चर या पूंजी निर्माण एक ऐसा शब्द है जिस पर यकीन किया जा सकता है। सरकार जितने प्रोग्राम चलाती हैं, ये कैपिटल फारमेशन में नहीं माने जाते हैं। केन्द्र सरकार हर वर्ष राज्य सरकारों को हजारों करोड़ रुपया खर्च करने के लिये देती है जिसे इनवैस्टमेंट में शामिल नहीं किया जाता है।
जो यह ६४ हजार करोड़ रुपया क्रैडिट में जायेगा वह कृषि क्षेत्र में इनवैस्टमैंट में नहीं आता, वह कैपिटल फोरमेशन में नहीं आता। उसमें स्थाई किस्म की चीजें आती हैं जिनका इस्तेमाल किसान साल दर साल कर सकें, वैसी चीजें इसमें आती हैं। जो कोई स्ट्रक्चर निर्मित हो जाता है, वैसी चीजें भी आती हैं। इसलिए कुल मिलाकर एग्रीकल्चर सैक्टर में कैपिटल फोरमेशन भी हो, इसके लिए किसानों के हक में टम्र्स ऑफ ट्रेड हो जाए, किसानों को ज्यादा मिले इसके लिए कदम उठाये जा रहे हैं और इन सब चीजों के लिए जरूरत है इसके लिए देश में सर्वानुमति बने। मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि सभी दलों के लोगों ने इस पर चिंता व्यक्त की है। जो विपक्ष में बैठे हैं उनका धर्म है सरकार पर आक्षेप लगाना, वे आक्षेप लगाये। अगर वे सरकार पर आक्षेप नहीं लगायेंगे तो उन पर आरोप लगेगा कि ये लोग मिल गये। अगर आक्षेप लगाना है और उससे संतोष होता है तो वे आक्षेप लगायेंगे। लेकिन आपने कृषि के प्रति चिंता व्यक्त की, किसानों के हक में कई बातें कही हैं। इन सबसे सरकार को बल मिलेगा और कृषि क्षेत्र को आगे पहुंचाने में ताकत मिलेगी। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आप सभी को धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the hon. Minister has dealt with the subject in depth. He has agreed to give some clarifications to points raised by some Members. So, in short, you may please ask them. I will start calling the names of Members from this side. The hon. Minister may kindly take note of all these points. श्री पप्पू यादव आप यदि कुछ पूछना चाहते हैं तो केवल स्पष्टीकरण करें और किसी चीज की जरूरत नहीं है।
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (पूर्णिया): उपाध्यक्ष महोदय, माननीय कृषि मंत्री जी की काबलियत और ईमानदारी पर पूरे देश को गर्व है, इसमें किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि हिंदुस्तान को आजाद हुए ५३ साल हो गये हैं और इस बीच देश में कितनी सरकारें आईं, कितनी नीतियां बनीं और कितने कृषि मंत्री और प्रधान मंत्री आये और चले गये, लेकिन ऐसे कौन से कारण हैं कि हर बार हर साल नई नीति बनती है, नई बातें आती हैं। किसान जहां ५३ साल पहले खड़ा था, आज उस मोड़ से भी नीचे आ चुका है।
उपाध्यक्ष महोदय : आप स्पष्टीकरण पूछिये, आपको लम्बा भाषण नहीं करना है. अब साढ़े सात बज गये हैं।
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : सर, मैं स्पष्टीकरण ही पूछ रहा हूं। इन्होंने जितनी बातें कही हैं, मैं उनसे पूर्ण रूप से सहमत हूं। इनके शब्दों पर मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन जितनी बातें इन्होंने कही हैं, क्या ये गावों में लागू होंगी। क्या इसी तरीके की परिभाषा और शब्दों का उच्चारण लोकतांत्रिक देश के सबसे बड़े सदन में चलता रहेगा। क्या सौ साल बाद भी हम इसी तरह से करते रहेंगे। जहां तक सीलिंग एक्ट का सवाल है, हम कृषि मंत्री जी से आग्रह करेंगे, हमारे वामपंथी साथियों ने जिन बातों को उठाया है कि इस देश में चंद मुट्ठी भर लोग हैं जिन पर कड़े नियम पालन के तहत सीलिंग एक्ट लागू होना चाहिए। लेकिन जो बड़े-बड़े लोग हैं, सीलिंग में आने वाले बड़े मगरमच्छ हैं, उन पर देश में कोई कानून लागू नहीं होता है।
उपाध्यक्ष महोदय : पप्पू यादव, मंत्री जी ने सब बातों का खुलासा किया है। आप सिर्फ स्पष्टीकरण पूछिये। अब साढ़े सात बज गये हैं।
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : सीलिंग एक्ट उन पर लागू होता है जिनके घर में पांच बेटियां और पांच बेटे हैं। जो दस बीघे या बीस बीघे वाला या उससे भी नीचे का किसान है, सीलिग एक्ट उन पर लागू होता है। जो किसान अपना पेट तक नहीं भर पाते हैं, उन पर कानून लागू होता है।
उपाध्यक्ष महोदय : आप इतना लम्बा भाषण कर रहे है, आप केवल स्पष्टीकरण पूछिये।
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : सर, मेरा स्पष्टीकरण भी यही है कि सीलिग एक्ट कानून को सख्ती से कैसे लागू किया जाए। दूसरे इन्होंने जो खाद और बीज की बात कही है। आज खाद में मिलावट पाई जाती हैं और वह भी समय पर उपलब्ध नहीं होती है। बीज किसानों को कभी भी सही रूप में उपलब्ध नहीं होता है। मैं जिस प्रदेश से आता हूं वहां सही रूप से किसानों को बीज उपलब्ध नहीं होता है। इस पर सरकार या हमारे कृषि मंत्री जी किस तरह से ध्यान दे रहे हैं।…( व्यवधान )
उपाध्यक्ष महोदय : आप स्पष्टीकरण नहीं पूछ रहे हैं भाषण कर रहे हैं।
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I have to put an end to such things.
… (Interruptions)
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि संपूर्ण व्यवस्था जो गड़बड़ है, उस पर इनको ध्यान देना चाहिए ताकि देश की कृषि नीति को संपूर्ण रूप से लागू किया जा सके।
उपाध्यक्ष महोदय : ठीक है, सरकार इस पर ध्यान देगी।
कुंवर अखिलेश सिंह: मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि अभी रघुवंश जी ने अपने उद्बोधन भाषण में कहा कि ४.१५ रुपये की दर से हम विदेशों को गेहूं दे रहे हैं। सरकार ने ५.८० रुपये की दर से पिछले साल गेहूं खरीदा था। उसके भंडारण पर कितना खर्च हुआ है … ( व्यवधान )
SHRI NITISH KUMAR: Anybody will use all of your speech against our national interest. Please keep it in mind.
कुंवर अखिलेश सिंह: मैं यही जानना चाहता हूं कि इस पर जितना रुपया सरकार खर्च कर रही है क्या वही रुपया सरकार किसानों की उत्पादन लागत को घटाने के लिए खर्च करके उत्पादन लागत घटाएगी? आज किसानों के दिमाग में बात आ रही है कि उत्पादन बढ़ाएं तो उसका कोई लाभ नहीं होगा। दूसरा सवाल है कि जो गेहूं की खरीद की समस्या है क्या सरकार किसानों के घटते बाज़ार मूल्य को द्ृष्टि में रखते हुए किसानों के गेहूं को समर्थन मूल्य पर खरीदने के समुचित उपाय करेगी?
SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): I want to draw the attention of the hon. Minister of Agriculture to three aspects. First, I come to price protection. I am quoting this as an example. Of course, it applies to all the States. In Karnataka, the price given to the farmer for potato was Rs.360 per quintal. When the Chief Minister Shri S.M. Krishna fixed it, when the price of potato was Rs.200 in the market, it has immediately risen to Rs.400 even in Chennai, Bangalore and other places. Based on this, the Government again provided Rs.200 crore in the Budget for the produces like jowar, maize, potato and whatever it may be. I would like to know from the hon. Minister whether the Government of India could give equal money and financial assistance to the States to protect the price of the produces of the farmers.
Secondly, whatever credit facility is given by the commercial banks or cooperative banks or NABARD, the interest should not exceed the principal amount. Earlier, the Government of India’s order was there. Mr. Minister, can you issue a direction saying that the interest amount should not exceed the principal amount – whether it is in respect of big farmer or small farmer?… (Interruptions)
Thirdly, while doing the agriculture work, when an agriculture labour dies, Rs.10,000 is given. Can you increase the amount to Rs.25,000?
SHRIMATI PRABHA RAU (WARDHA): I would like to know from the hon. Minister whether the Government is thinking of creating the National Water Grid for irrigation purpose. Is there any such possibility with the Government now?
SHRI K.A. SANGTAM (NAGALAND): Sir, of course, I am in the Consultative Committee. But I want to make just one point. Mr. Minister, Animal Husbandry and Aqua-culture are part of your Ministry. Can you not bring the Coffee Board and the Tea Board under your regime because you have more experts in regard to particular plants and all those agricultural produces? Instead of giving the whole thing to the Commerce Ministry, you can keep the commerce aspect on their side. Why do you not keep the production aspect on your side? This is what I want to know.
श्री जे.एस.बराड़ (फरीदकोट) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं सीधे दो सैकिंड में अपनी बात समाप्त करूंगा। मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहता हूं। मैं सिर्फ तीन बातें पूछना चाहता हूं जिन्हें मंत्री जी बहुत खूबसूरती से टाल गए। आपके माध्यम से मैं उनका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि तीन मुख्य मंत्रियों - आंध्रा प्रदेश के श्री चन्द्र बाबू नायडू, पंजाब के श्री प्रकाश सिंह बादल एवं हरियाणा के श्री ओम प्रकाश चौटाला, तीनों आपको सपोर्ट करते हैं। मैं उनके बयान कोट नहीं करना चाहता क्योंकि टाइम नहीं है, तीनों ने विश्व व्यापार समझौते को मौत के वारंट का नाम दिया है। आपने कहा कि आपने सभी मुख्य मंत्रियों की सहमति ली, मैं पूछना चाहता हूं कि क्या उन्होंने भी उसके बारे में आपको मुकम्मल सहमति दी थी? यह बात मैं इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि वे तीनों ही डब्ल्यू.टी.ओ. एग्रीमेंट का पूर्ण रूप से विरोध कर रहे हैं। अब यह बात अलग है कि पब्लिक में वे विरोध कर रहे हैं और आपको सहमति दे दी हो। इसलिए कृपया मुझे इसका स्पष्टीकरण चाहिए।
दूसरी बात आपने नैस्ले के बारे में कही कि किसानों को मार्केट मिल रहा है और डॉमैस्टिक किसान को भाव मिल रहा है। चूंकि नैस्ले की कंपनी मेरे लोक सभा क्षेत्र मोगा में है। इसलिए मैं आपको बताना चाहता हूं कि किसानों से वह कंपनी ८ रुपए प्रति लीटर दूध खरीद रही है और २७ रुपए प्रति लीटर बेच रही है। क्या आप इसको ही भाव मिलना कहते हैं? आपसे यह विनती करना चाहता हूं कि जैसा आपने कहा कि मुरासोली मारान साहब की एग्रीकल्चर कार्यक्रम के साथ मुकम्मल सहमति है, मैं आपके सामने कोट करना चाहता हूं, यह आर्टीकल किसी ने वैसे ही नहीं लिखा है, इसमें कहा गया है - It is very important and I quote the name of the person. … (Interruptions)
"Shri Maran then denied that he had given assent to Shri Puri, who was appointed as Ambassador to Geneva, and he wrote to the Prime Minister that in appointing Shri Puri, the Prime Minister was indicating his lack of thrust in the Cabinet colleague, who was answerable on WTO." … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: What is it about?
SHRI J.S. BRAR : This is about the WTO Ambassador. डब्ल्यू.टी.ओ. का एम्बैसेडर जेनेवा में अपाइंट होना है। आपकी कैबीनेट और प्राइम मनिस्टर का नाम लिया है। आप भले ही इसका कोई जवाब मत दीजिए, लेकिन आपने एपाइंटमेंट में पांच बार एक्सटेंशन दी है।
SHRI NITISH KUMAR: These postings are not discussed in the House. … (Interruptions)
SHRI J.S. BRAR : It is not about posting. … (Interruptions)
SHRI NITISH KUMAR: It has never been the practice of the House to discuss postings. … (Interruptions)
श्री जे.एस.बराड़: उपाध्यक्ष महोदय, चूंकि मंत्री जी ने मेरा नाम लिया है और मेरा नाम लेकर फुट एंड माउथ डिजीज के बारे में कहा है, मैं आपके सामने इंडियन कौसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च, जो आपके ही महकमे के अंडर है, उसकी वैटरिनरी की एक बड़ी इंस्टीटयूट इज्जतनगर (बरेली) में है, उसने क्या लिखा है उसकी ओर आकर्षित करना चाहता हूं-
"Dr. M.P. Yadav, director of the Indian Veterinary Research Institute, Izzatnagar. Native Indian breeds are more or less resistant to FMD. The disease affects productivity and is not generally fatal. However, the virus…"
वायरस के बारे में उन्होंने जिक्र करके कहा है-
"Exports of meat and milk products to western countries require a certificate. "जो इसका होना चाहिए-
"With the ban by the Arab countries, India’s meat exports have fallen from 30,000 tonnes in February, 2001 to 15,000 tonnes."
१५ हजार टन की कमी आई है। इसलिए मैं आपके विनती करना चाहता हूं कि जो सर्टफिकेट होना चाहिए, उसके बारे में आपके महकमे की यह राय है।
उपाध्यक्ष महोदय, वे लोग जो पशुओं को जलाते हैं, उनकी मैं बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि मैं तो आपको वार्निंग दे रहा हूं, आगाह कर रहा हूं। …( व्यवधान )
श्री सुबोध राय (भागलपुर): उपाध्यक्ष महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि डियारा लैंड और टाल लैंड के विकास की क्या सरकार की कोई योजना है ?
श्री नामदेव हरबाजी दिवाथे (चिमूर) : उपाध्यक्ष महोदय, किसानों के ऊपर जो कर्जा होता है, उसकी अदायगी नहीं करने पर उसको जेल में जाना पड़ता है। जेल में रहने पर उसके ऊपर सरकार को जो खर्च करना होता है, वह धन उस किसान के कर्ज में जमा होता है, यह नियम किस साल का बना हुआ है, यह मैं जानना चाहता हूं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) * MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Minister, you can answer to whatever is relevant.
(Interruptions)
SHRI NITISH KUMAR: What do you want? I can send you the entire National Crop Agriculture Insurance Scheme. … (Interruptions)
SHRI Y.S. VIVEKANANDA REDDY (CUDDAPAH): Mr. Deputy-Speaker, Sir, under Crop Insurance Scheme, for computation of loss they are taking the average yield of the preceding three years. … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Vivekananda Reddy, you have already spoken about it. Please take your seat now.
Mr. Minister, you can reply now.
श्री नीतीश कुमार : उपाध्यक्ष महोदय, बराड़ साहब ने जो बात कही है, शायद मेरी चूक है कि जब हमने वह बात कही तब हम आपको पूरी तरह समझा नहीं सके। …( व्यवधान )
श्री जे.एस.बराड़: हमारी गलती है। …( व्यवधान )
श्री नीतीश कुमार : उपाध्यक्ष महोदय, डब्ल्यू.टी.ओ. एग्रीमैंट पहले का है। इसे कोई आज की सरकार ने नहीं किया। एग्रीमैंट ऑन एग्रीकल्चर पर मेनडेटेड रिव्यू चल रहा है। उसमें भारत को अपना पक्ष क्या रखना चाहिए, उसमें मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन हमने नहीं कहा। हमने मुख्यमंत्रियों को खबर दी और राज्यों के कृषि और खाद्य मंत्रियों के सम्मेलन में भी उस पर चर्चा करके सबकी राय ली। भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों से भी चर्चा की और सबको मिलाकर जो डाकूमैंट बना, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई है। हम नेगोसियेशन में अपना प्रपोजल रख रहे हैं। आपने कोट कर दिया कि तीन मुख्यमंत्रियों की राय ऐसी है। …( व्यवधान )हमारी आपकी राय भी हो सकती है। …( व्यवधान )आप पूरी बात सुन लें तब बोलें। इससे उसका कोई मतभेद *Not Recorded.
नहीं है। एक तरफ डब्ल्यू.टी.ओ. एग्रीमैंट ऑन एग्रीकल्चर होना चाहिए या नहीं होना चाहिए औऱ यह एग्रीमैंट ठीक है या गलत है - यह एक अलग राय है। सरकार के नाते हम पहले की सरकार के समझौते से बंधे हुए हैं। चूंकि सरकार जब अंतर्राष्ट्रीय करार करती है तो उससे पूरा राष्ट्र बंधता है। इसलिए सरकार के नाते हम उससे बंधे हुए हैं। लेकिन उसके अलावा उस पर कोई रिव्यू होता है तो वह अपनी बात है। हम बता रहे हैं कि जो रिव्यू चल रहा है उसमें कोई एग्रीमैंट नया नहीं कर रहे हैं। पुराने एग्रीमैंट का रिव्यू चल रहा है। उसमें अपना पक्ष कोई रखे, इसके लिए एक नैशनल कान्सेन्सस हमारी सरकार ने बनाया जिसको हमने रखा है। इसको व्यापक समर्थन मिला, इसका हमने उल्लेख किया। दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है। डब्ल्यू.टी.ओ. का इम्पैक्ट एग्रीक्लचर सैक्टर पर क्या पड़ेगा, इसके बारे में चर्चा करने के लिए भी मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया गया है। …( व्यवधान )आप पूरी बात तो सुन नहीं रहे हैं। …( व्यवधान )
श्री जे.एस.बराड़: पीपल मूवमैंट की बात तीनों मुख्यमंत्री कर रहे हैं। …( व्यवधान )
श्री नीतीश कुमार : ठीक है। आप उनसे पूछिये। आपको हम वही तो बतायेंगे कि तीन मुख्यमंत्रियों का नहीं, देश भर के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन है। एग्रीक्लचर रिलेटिड इश्यूज, फूड प्रोक्योरमैंट के बारे में जो फाइनेंस मनिस्टर ने प्रपोजल दिये हैं, फूड इक्नोमिक के बारे में जो बातें कही हैं और डब्ल्यू.टी.ओ. का इम्पैक्ट किस पर है, इसके बारे सारा एजेंडा बनाकर मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन अभी २३ अप्रैल को था लेकिन वह नहीं हुआ। अब उसकी डेट २१ मई निर्धारित हुई है। आपको पता है कि कई राज्यों में चुनाव वगैरह हैं इसलिए वह सम्मेलन २१ मई को होगा। इसमें इन सब विषयों पर चर्चा होगी। आज की परिस्थिति का हमने उल्लेख किया। आप बार-बार एक पोस्िंटग के बारे में कह रहे हैं। सदन में एग्जीक्यूटिव डिसीजन, पोस्िंटग वगैरह के बारे में कोई सवाल या चर्चा नहीं होती। यह हमेशा गवर्नमैंट का प्रेरोगेटिव है।
श्री जे.एस.बराड़: माननीय मंत्री जी, विश्व व्यापार संगठन एक सेंसटिव मामला है… ( व्यवधान )यह हमारा अधिकार है। …( व्यवधान )
श्री नीतीश कुमार : ठीक है। आप नीति पर चर्चा कराइये। पोस्िंटग पर क्या चर्चा करना चाहते हैं।
…( व्यवधान )आप अपने रूल्स को देख लीजिए। …( व्यवधान )
श्री जे.एस.बराड़: आप यह बात गलत कह रहे हैं।…( व्यवधान )
श्री नीतीश कुमार : हम गलत कह रहे हैं तो अपने को सुधार लेंगे। …( व्यवधान )बराड़ साहब, आप भी इस सदन में हैं और हम भी इस सदन में हैं। लेकिन पोस्िंटग की चर्चा सदन में नहीं हो सकती।… ( व्यवधान )
श्री जे.एस.बराड़: सवाल यह है क जिसको पी.एम.ओ. ने एप्वाइंट किया, उसके ऊपर दोबारा प्रश्नचिहन लगा है। …( व्यवधान )
MR. DEPUTY-SPEAKER: Whatever it may be, we should discuss about postings in the House. Please take your seat.
कुंवर अखिलेश सिंह: उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी ने गेहूं की खरीद के बारे में कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया इसलिए मैं और हमारी पार्टी सदन से बहिर्गमन करती है। …( व्यवधान )
( तत्पश्चात् कुंवर अखिलेश सिंह ने सदन से बहिर्गमन किया।) डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी ने प्रोक्योरमैंट के बारे में कोई आश्वासन नहीं दिया इसलिए उसके खिलाफ मैं सदन से बहिर्गमन करता हूं। …( व्यवधान )
(तत्पश्चात् डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने सदन से बहिर्गमन किया।) 19.29 hrs The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Friday, April 27, 2001/Vaisakha 7, 1923 (Saka).