Lok Sabha Debates
The Scheduled Castes And Scheduled Tribes (Prevention Of Atrocities) Amendment ... on 4 August, 2015
Sixteenth Loksabha an> Title: The scheduled castes and scheduled tribes (prevention of atrocities) Amendment Bill, 2014. (motion adopted) सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (श्री थावर चंद गहलोत) : सभापति महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं :
“कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए।” सभापति महोदय, यह कानून वाऩ 1989 से बना हुआ है और कानून लागू भी है, बहुत बार ऐसी घटना होने की जानकारी मिलती है कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोगों के साथ अन्याय-अत्याचार की घटनाएं होती रहती हैं। कोर्ट में केसेज चलते हैं, कन्विक्शन रेट भी बहुत कम है और उसके कारण ऐसा महसूस किया जाने लगा कि वाऩ 1989 के कानून में कुछ सुधार करने की आवश्यकता है। बिल पर विचार-विमर्श किया गया, वाऩ 2013 में यह बिल लोक सभा में प्रस्तुत हुआ, किन्तु उस समय चर्चा में नहीं आ सका और पारित नहीं हो सका। उसके बाद वाऩ 2014 में फिर से इस बिल को प्रस्तुत किया गया। यह बिल संसदीय स्थायी समिति के पास भी गया, संसदीय स्थायी समिति ने उस पर गंभीरता से विचार करके अपना प्रतिवेदन भी दिया। इस बिल में सामान्यतया कुछ नई परिभाााएं शामिल की गयी हैं, मौजूदा धाराओं की शब्दावली में कुछ परिवर्तन किया गया है, पुनर्वास के क्षेत्र को विस्तारित करने की बात कही गयी है, संस्थागत सुदृढीकरण की बात भी इसमें कही गयी है, अपील के संबंध में नियमों में कुछ सुधार करने की बात कही गयी है, पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों को सुदृढ़ करने की कोशिश की गयी है, निरोधक उपायों को भी सुदृढ़ करने का इसमें प्रावधान है। मैं मानता हूं कि यह बिल पारित होने के बाद जब कानून बनेगा तो देशहित में होगा, जनहित में होगा, छुआछूत का जो वातावरण आज यदा-कदा दिखाई देता है, उसे समाप्त करने की दिशा में कारगर सिद्ध होगा। इस देश में समरसता की महती आवश्यकता है और समरसता के लिए कानूनी प्रावधान भी होना चाहिए और साथ ही समन्वय का वातावरण भी बनना चाहिए, तभी समरसता आ सकती है। इन उद्देश्यों को लेकर इस बिल में प्रावधान किए गए हैं। मैं इस अवसर पर इससे ज्यादा कुछ कहूं, उसकी आवश्यकता नहीं है। विचार-विमर्श के बाद अंत में जब जवाब देना होगा, उस समय अगर कोई बात आएगी तो उसके संबंध में मैं जानकारी दूंगा।
HON. CHAIRPERSON: Motion moved:
“That the Bill to amend the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989, be taken into consideration.” श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला) : धन्यवाद सभापति महोदय।
महोदय, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2014 जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का संशोधन करने के लिए लाया गया है, बहुत ही स्वागतयोग्य है। हालांकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2013, जिसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में संशोधन करने के लिए 12 दिसम्बर, 2013 को संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोक सभा में पुरःस्थापित किया गया था, तथापि इस पर चर्चा नहीं हो सकी थी। आज इस पर चर्चा हो रही है और आपने मुझे इस अवसर पर बोलने का अवसर दिया है, इसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। साथ ही, मैं माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावर चन्द गहलोत जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने इस बिल को आज प्रस्तुत किया है और आज इस पर चर्चा हो रही है।
मोदी जी ने शुरू में ही कहा था कि हमारी सरकार गरीबों की सरकार होगी। वह इस बात का उल्लेख जनता के बीच में चुनावों के समय करते थे और फिर सरकार बनने के बाद भी कहते हैं कि हमारी सरकार गरीबों के हित के बारे में काम करेगी। उसी बात को दृिट में रखते हुए यह बिल यहां पेश किया गया है। गरीबों को ध्यान में रखकर ही इस सरकार की नीतियां बन रही हैं और कार्यक्रम आगे बढ़ाए जा रहे हैं। मोदी जी की मौजूदा सरकार इस बिल को लेकर आई है, यह उस वर्ग के लिए है जो इस देश की 25 प्रतिशत आबादी है और जो हजारों वााॉ से पीड़ित रही है। खासकर अस्पृश्यता का वातावरण इस देश में बना रहा और हमारे समाज में इसे एक कलंक कहा जा सकता है। उसे समाप्त करने के लिए यह बिल 2013 में लाया गया था, जो 1989 का अनुसूचित जाति और जनजाति पर हो रहे अत्याचारों को रोकने से सम्बन्धित है। यह जो बिल यहां कानून बनने के लिए पेश किया गया है, मैं समझता हूं कि यह सामयिक भी है और जरूरी भी है।
आज इस बात का हमें खेद है कि सामने की बैंचों पर जो लोग इस देश में 50-60 साल तक राज करते रहे, जिन्होंने दलितों की वजह से अपनी कुर्सियां बचाए रखीं और प्रधान मंत्री तथा मुख्य मंत्री बने, उस कांग्रेस पार्टी ने लगातार इन वर्गों का प्रयोग अपने हित में किया और काम उनके लिए कुछ भी नहीं किया। दलितों के लिए केवल मात्र इतना किया कि उन्हें वोटों की राजनीति बनाए रखा। आज इस विधेयक पर सदन में चर्चा हो रही है, जिसे पिछली सरकार 2013 में नहीं ला सकी थी। जब आज यह बिल सदन में आया है चर्चा के लिए तो हमारे सामने की बैंचें खाली हैं। वे लोग नहीं चाहते कि देश की 25 प्रतिशत आबादी जो दलित वर्ग की है, जिन पर लगातार अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं, उनके बारे में चर्चा हो और कोई ठोस कानून उनके हितों के लिए लाया जा सके। मैं समझता हूं कि वे हाउस में नहीं हैं, जिस प्रकार से वे सदन में व्यवधान डालते रहे, जनता उसे अच्छी तरह समझ चुकी है। प्रधान मंत्री जी और इस सरकार ने जो यह बिल पेश किया है, उसमें वे योगदान नहीं करना चाहते, ऐसा मेरा मानना है।
यह जो कानून है, इसकी आवश्यकता थी। मोदी जी की सरकार गरीबों की है और इस देश में अधिकांश गरीब अनुसूचित जाति एवम् जनजाति वर्ग के लोग हैं। जब हमारे प्रधान मंत्री जी जन-धन योजना लाए तो उन्होंने हिन्दुस्तान की जनता को फाइनेंशियली इंक्लूजन की बात की थी कि हर व्यक्ति का बैंक में एकाउंट हो और उसे वह आपरेट करे, जिससे जितनी भी सरकारी योजनाएं हैं, उसके माध्यम से उसे उनका लाभ मिल सके। यह एक आधार है, जो आर्थिक तौर पर गरीब हैं, वंचित हैं, दलित हैं, उन्हें बैंकों के साथ जोड़ने का। वे लोग अगर एकाउंट खोलेंगे तो निश्चित रूप से अनुसूचित जाति एवम् जनजाति वालों को जो इतने वााॉ से समाज में उपेक्षित और वंचित रहे हैं, सीधे-सीधे लाभ मिलेगा। अगर 15-17 करोड़ लोगों ने जीरो पैसे पर एकाउंट खोले हैं तो उसका विश्लेाण किया जाए तो हम पाएंगे कि उनमें से 60 प्रतिशत से ज्यादा लोग अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के हैं। इससे साफ पता चलता है कि हमारे प्रधान मंत्री जी गरीबों, दलितों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोगों के हितों के बारे कितनी चिंता करते हैं।
सुरक्षा बीमा योजना की बात होती है तो इस योजना के तहत 12 रुपए में बीमा हो रहा है यानि एक रुपया एक महीने का जमा कराएंगे तो आपका बीमा हो जाएगा। अगर दुर्भाग्यवश कोई घटना आपके साथ घटित हो तो दो लाख रुपए का बीमा जो होगा, वह मिलेगा। इसी तरह पेंशन योजना चलाई गई है और मुद्रा बैंक की बात कही गई है। इसके लिए मैं प्रधान मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने यह बहुत ही अच्छी बात की है। उन्होंने मुद्रा बैंक की स्थापना कर देश में छः करोड़ लोगों की पहचान की है। ये वे लोग हैं जो देश के 12 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं। उनके लिए बैंक सुविधा की व्यवस्था नहीं है। वे गरीब, पिछड़े और दलित वर्ग से हैं या गांवों में मिट्टी से बर्तन बनाते हैं, जूते बनाते हैं और छोटा-मोटा काम करते हैं। अब इन लोगों को मुद्रा बैंक से, जिसके लिए 20 करोड़ रुपए का कोा बनाया गया है, ऋण आदि की व्यवस्था होगी।
मैं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद करना चाहता हूं, सरकार का धन्यवाद करना चाहता हूं, हमारे मंत्री श्री थावरचंद गहलोत का धन्यवाद करना चाहता हूं कि इस प्रकार की योजनाएं लाकर दलितों को आर्थिक तौर से सबल बनाने और समाज को वे कुछ दे सकें और केवल मात्र आरक्षण पर ही निर्भर न रहें, वे आर्थिक तौर से भी मजबूत हों, इस प्रकार की नीतियां हमारी एनडीए की सरकार, माननीय मोदी जी की सरकार लायी है, इसके लिए मैं उनका बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहता हूं।
मैं इस विधेयक के कुछ प्रावधानों पर चर्चा करने से पूर्व हमारे देश के प्रांतों में इस वर्ग के साथ हो रही कुछ घटनाओं को सदन में रखना चाहता हूं। देश में इसके लिए कड़े से कड़ा कानून बनाया गया है। Protection of civil rights Act, 1955 जो कि अनटचेबिलिटी को दूर करने के लिए उसमें ऑफेंस डिक्लेयर किया गया। उसके बाद वाऩ 1989 में विधेयक लाया गया और उसमें कठोर प्रावधानों को रखा गया, लेकिन फिर भी हम रोज अखबारों में देखते हैं और आठ-दस खबरें दलितों पर अत्याचार की होती हैं, महिलाओं पर अत्याचार की होती हैं। असमाजिक तत्व अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के खिलाफ लगातार जो घटनाएं बढ़ रही हैं, मैं समझता हूं कि उसमें यह विधेयक लाभकारी होगा। अगर हम नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देखें तो जो प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज़ हैं, दलितों पर एट्रोसिटीज़ के मामलों को अगर देखें तो वे लगातार बढ़ रहे हैं और इसी वजह से मैं समझता हूं कि यह कानून लाया जा रहा है। अगर हम वाऩ 2011 का आंकड़ा लें तो इसमें 39401 दलितों पर अत्याचार के मामले दर्ज हुए। वाऩ 2012 में ये बढ़कर 39512 हो गए और इसी तरह वाऩ 2013 में आंकड़ों में उछाल आया और 46114 हो गए तथा इसी प्रकार से आगे बढ़ते जा रहे हैं। हम यह देखें कि अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार के मामलों में अगर पहले दस राज्यों को लिया जाए तो हम देखते हैं कि राजस्थान पहले स्थान पर है। वहां दिनों-दिन दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं और इसका प्रतिशत 53 है। बिहार में 40.6 प्रतिशत है, ओडिशा में 36.1 प्रतिशत है, गुजरात में 29.2 प्रतिशत है, मध्य प्रदेश में 26 प्रतिशत है, केरल में 24.9 प्रतिशत है, झारखंड में 24.5 प्रतिशत है, कर्नाटक में 24.5, आंध्र प्रदेश में 23.6 और उत्तर प्रदेश में 17.1 प्रतिशत है। ये आंकड़े एनसीआरबी के हैं। इसी प्रकार से अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के लिए पहले दस राज्यों को देखें तो केरल में सबसे ज्यादा अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के मामले सामने आए हैं, जो कि 27.8 प्रतिशत है। राजस्थान में 17.9, कर्नाटक में 12.6, आंध्र प्रदेश में 11.4, मध्य प्रदेश में 8.5, ओडिशा में 8.3, सिक्किम में 8.2, बिहार में 6.8, गोवा में 6.7 और झारखंड में 4.6 प्रतिशत है। इस प्रकार अगर हम इसका विशलेाण करते हैं तो लगातार ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसे रोकने के लिए जरूरत है कि कोई कठोर कानून लाया जाए, ताकि समाज में जो असामाजिक तत्व हैं, जो लगातार गरीब लोगों को, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोगों को टार्गेट बनाते हैं। साथ ही मैं कहना चाहता हूं कि रेट ऑफ कनविक्शन कम होता जा रहा है। न्यायालय में दोा सिद्धि के मामले समाप्त हो जाते हैं। न्यायालयों में कितने सारे मामले अनुसूचित जाति और जनजाति के लम्बित पड़े हैं, जो मैं इस सदन के सामने रखना चाहता हूं। वाऩ 20011 में दोा सिद्धि से 30 प्रतिशत मामले समाप्त हुए, जबकि वाऩ 2012 में 23.8 प्रतिशत है। इसी प्रकार से वाऩ 2013 का आंकड़ा 22.8 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंधित न्यायालयों में लम्बित मामले वाऩ 2011 में 79.9 प्रतिशत थे। 2012 में 83.1 और 2013 में यह बढ़कर 84.1 परसैन्ट हो गये, यानी लगातार ये बढ़ रहे हैं। इसी तरह से दलित महिलाओं पर लगातार अत्याचार बढ़ रहे हैं। अगर हम 2009 का आंकड़ा लें तो 1346 मामले हैं, 2010 में 1557, 2011 में 1576 हैं, इस तरह ये आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर अत्याचार लगातार बढ़ रहे हैं और उनके साथ जो न्याय होना चाहिए, वह न्याय उन्हें नहीं मिल रहा है।
महोदय, आज मंत्री जी सरकार की तरफ से जो विधेयक लाये हैं, वह इसलिए भी आया है, क्योंकि आज दलितों को सार्वजनिक स्थलों पर पानी नहीं पीने दिया जाता है। आज उन्हें सहभोज करने की इजाजत नहीं है। श्मशान घाटों पर उनके शवों का दाह-संस्कार नहीं करने दिया जाता है। शादी में घोड़े पर बैठने नहीं दिया जाता है, दूल्हे को सेहरा नहीं लगाने दिया जाता है। दूल्हा घोड़े पर बैठकर नहीं जा सकता है। महिलाओं को नंगा करके खुलेआम घुमाया जा रहा है। दलित महिलाओं के साथ गैंगरेप की घटनाएं दिनों-दिन बढ़ रही हैं और मैं यहां तक कहता हूं कि अभी अखबारों में छपा कि शेडय़ूल्ड कास्ट के एक बच्चे की परछाई पड़ गई तो उसे प्रताड़ित किया गया। मैं कुछ खबरे, कुछ हैडिंग्स जो आज अखबारों में आ रहे हैं, वे मैं संसद के समक्ष रखना चाहता हूं कि आज ये खबरें हम पढ़ते हैं तो उनसे समाज में क्या मैसेज जा रहा है। Dalit youth killed for talking to upper caste girl. यह पुणे का मामला है। पांच साल का बच्चा कहीं पेशाब कर रहा था तो उसके प्राइवेट पार्ट को काट दिया गया, क्योंकि वहां किसी एक अपर कास्ट के आदमी की मिल थी, जहां वह पेशाब कर रहा था। उसी के साथ Two cousins in Badaun raped and killed when they left home at night to go for toilet. Dalit forced to eat human excreta. यह कितनी खतरनाक बात है कि आदमी के एक्सक्रेटा को फोर्सफुल्ली किसी को खिलाया जा रहा है।
एक मामला मैं आपके ध्यान में और लाना चाहता हूं कि एक प्राइमरी स्कूल मेघवालों की ढाणी, यह बीकानेर का मामला है। हमारे श्री अर्जुन मेघवाल जी वहां से आते हैं। वहां स्कूल में कुल 25 बच्चे हैं, जिनमें से 20 बच्चे दलित हैं और दलितों के टीचर को पनिश कर दिया गया, क्योंकि drinking water for teacher की मटकी को उसने टच कर दिया, इसलिए उसे पनिश कर दिया गया। इस प्रकार के मामले आज देश में देखे जाते हैं, इसीलिए आज यह विधेयक लाया जा रहा है। इसी तरह से अम्बेडकर जी पर आधारित रिंगटोन ऱखने पर दलित की हत्या कर दी गई। मैं समझता हूं कि जो ऐसे मामले हैं, इस विधेयक के लाने से जरूर लाभ होगा और जो प्रतिक्रियात्मक रुकावटें हमारे 1989 के विधेयक में आ रही थीं, उसमें प्रोसीजरल हर्डल दूर हो सकेगी और जो डिले इन ट्रायल्स था, जो कन्विक्शन रेट था, वह पूरा हो सकेगा। मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि विशेा न्यायालय धारा 14 में लाये जा रहे हैं और एक्सक्लूसिव स्पेशल कोर्ट्स की स्थापना की जा रही है। इसके अलावा एक्सक्लूसिव स्पेशल पब्लिक प्रोसीक्यूटर्स को नियुक्त किया जा सकेगा। एक नया अध्याय 4क इसमें इंट्रोडय़ूस हो रहा है। ओवरऑल मैं कह सकता हूं कि सरकार सामयिक तरीके से इस विधेयक को लाई है और इस विधेयक के पारित होने से हमारे समाज में दलितों पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उसमें रुकावट आयेगी।
अंत में मैं माननीय प्रधान मंत्री, श्री मोदी जी, अपने मंत्री जी और अपनी सरकार को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं कि दलित समुदाय की अनुसूचित जाति और जनजाति की जो एक लांग अवेटिड डिमांड थी, वह पूर्ण हो सकेगी और समाज में जो गलत काम करने वाले लोग हैं, उन्हें कठोर दंड भी मिलेगा और जो लोग परेशानी में आते हैं, उन्हें न्याय भी मिलेगा।
आपने मुझे बोलने का पूरा समय दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं।
DR. K. GOPAL (NAGAPATTINAM): Hon. Chairman, Sir, Vanakkam! I extend my regards and respects to my beloved leader hon. Chief Minister of Tamil Nadu Dr. Puratchi Thalaivi Amma for allowing me to speak on ‘The Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Amendment Bill, 2014’.
The Father of our nation Mahatma Gandhi said, “My fight against untouchability is a fight against the impure in humanity”. The central feature of caste discrimination is the concept of ‘untouchability’ based on the notion that certain caste groups are considered ‘impure’, compared to other caste groups, leading to denial of human dignity.
Article 17 of the Constitution outlaws the practice of ‘untouchability’. However, despite legal and constitutional provisions as well as affirmative schemes, SCs and STs continue to face untouchability as well as social, economic and institutional deprivations.
The Constitution of India vide Article 15 lays down that no citizen shall be subjected to any disability or restriction on the grounds of religion, race, caste, sex, or place of birth. It also guarantees that every citizen shall have equality of status and opportunity.
The present Bill replaces the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Amendment Ordinance, 2014 and seeks to amend the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989. The Act prohibits the commission of offences against members of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes and establishes special courts for the trial of such offences and the rehabilitation of victims.
The term ‘atrocity’ was not defined until the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act was passed by Parliament in 1989. In legal parlance, the Act understands the term to mean an offence punishable under sections 3(1) and (2).
In specific terms, 'atrocity' is an expression commonly used to refer to crimes against Scheduled Castes and Scheduled Tribes in India. It denotes the quality of being shockingly cruel and inhumane, whereas the term ‘crime’ relates to an act punishable by law. It implies any offence under the Indian Penal Code committed against SCs by non-SC persons, or against STs by non-ST persons. Caste consideration, as a motive, is not necessary to make such an offence in case of atrocities. It signifies crimes which give suffering in one form or the other that should be included for reporting. This is based on the assumption that caste considerations are really the root cause of the crime, even though caste considerations may not be the main motive for the crime.
People belonging to Scheduled Castes and Scheduled Tribes face persistent discrimination and serious crimes are committed against them ranging from abuse on caste name, murders, rapes, arson, social and economic boycotts, naked parading of SC women, and use of force to drink urine and eat human excreta. There are various types of discrimination against SCs and STs ranging from denial of entry into non-Dalit houses and places of worship, prohibitions against food sharing, denial of access to cremation and burial grounds, denial of access to water facilities, ban on marriage processions, etc. As per Crime Statistics of India, every 18 minutes a crime is committed against SCs; every day, 27 atrocities are committed against them, which include three rapes, 11 assaults and 13 murders; every week, five of their homes are burnt and six persons are kidnapped or abducted.
The following cases of discrimination against known public figures illustrate the gravity of the problem. In November 2011, a Judge of a High Court stated that he had been humiliated by fellow judges due to his caste since 2001. In June 2011, the Chairperson of the National Commission for Scheduled Castes – himself a Dalit – was denied entry into a Hindu Temple. In July 2011, a Dalit Member of a Legislative Assembly was allegedly not allowed to eat food along with his colleagues at an official meeting.
The Act lists 22 offences relating to various patterns of behaviours inflicting criminal offences for shattering the self-respect and esteem of SCs and STs, denial of economic, democratic and social rights, discrimination, exploitation and abuse of the legal process, etc. As the Act outlines actions by non-SCs and non-STs against SCs or STs to be treated as offences, the Bill amends certain existing categories and adds new categories of actions to be treated as offences. Forcing a Scheduled Caste or Scheduled Tribe individual to vote or not to vote for a particular candidate in a manner that is against the law is an offence under the Act. The Bill adds that impeding certain activities related to voting will also be considered an offence. Wrongfully occupying land belonging to SCs or STs is an offence under the Act. The definition for the term ‘wrongful’ in this context has been included in the Bill which was not done under the 1989 Act.
The UN Special Rapporteur on violence against women noted that “Dalit women face targeted violence, even rape and death, from State actors and powerful members of dominant castes who employ these methods to inflict political lessons and crush dissent within the community”. Assaulting or sexually exploiting an SC or ST woman is an offence under the Act.
The Bill adds that: (a) intentionally touching an SC or ST woman in a sexual manner without her consent, or (b) using words, acts or gestures of a sexual nature, or (c) dedicating an SC or ST woman as a devadasi to a temple, or any similar practice will also be considered an offence. Consent is defined as a voluntary agreement through verbal or non-verbal communication.
To empower the nation, we need to empower women. There should be Special Courts for women. Atrocities against women belonging to a Scheduled Caste or Scheduled Tribe should be tried by special courts for women with women judges and women public prosecutors preferably belonging to Scheduled Caste or Scheduled Tribe community. All Women police stations in Tamil Nadu-first of its kind in the world- are the brain child of Hon. Chief Minister of Tamil Nadu Dr. Puratchi Thalaivi Amma. These All Women Police stations provide assistance and redress the grievances of all women, especially SCs and STs. All other States of the country can try to follow this method to provide protection to Women.
New offences added under the Bill include: (a) garlanding with footwear, (b) compelling to dispose or carry human or animal carcasses, or do manual scavenging, (c) abusing SCs or STs by caste name in public, (d) attempting to promote feelings of ill-will against SCs or STs or disrespecting any deceased person held in high esteem, and (e) imposing or threatening social or economic boycott.
I understand that preventing SCs or STs from undertaking the following activities will be considered an offence: (a) using common property resources, (c) entering any place of worship that is open to the public, and (d) entering an education or health institution.
The Standing Committee of Parliament had recommended that the following acts may be made punishable offences: (i) registration of false cases under the Act, (ii) acquiring false Scheduled Caste and Scheduled Tribe certificates and claiming reservation benefits in jobs, admissions, etc., and (iii) entering into an inter-caste marriage to procure the Scheduled Caste or Scheduled Tribe status so as to acquire land or fight elections.
With regard to false and malicious complaints filed under the Act, the Committee noted that relevant provisions of the Indian Penal Code, 1860 are insufficient, and a provision addressing this problem should be included within the Act. The Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013 provides for a similar clause. I urge that these recommendations of the Standing Committee be included in the Bill.
In most cases, unwillingness to file a First Information Report (FIR) under the Act comes from caste-bias. Upper caste policemen are reluctant to file cases against fellow caste-members because of the severity of the penalties imposed by the Act; most offences are non-bailable and carry minimum punishments of five years imprisonment. The Act specifies that a non SC or ST public servant who neglects his duties relating to SCs or STs shall be punishable with imprisonment for a term of six months to one year. The Bill specifies the duties, including: (a) registering a complaint or FIR, (b) reading out information given orally, before taking the signature of the informant and giving a copy of this information to the informant, etc. Under the Act, a Court of Session at the district level is deemed a Special Court to provide speedy trials for offences. A Special Public Prosecutor is appointed to conduct cases in this court. The Bill substitutes this provision and specifies that an Exclusive Special Court must be established at the district level to try offences under the Bill. In districts with fewer cases, a Special Court may be established to try offences. Justice delayed is justice denied. There should be less pendency of cases in Courts.
Adequate number of courts must be established to ensure that cases are disposed of within two months. Appeals of these courts shall lie with the High Court, and must be disposed of within three months. A Public Prosecutor and exclusive Public Prosecutor shall be appointed for every Special Court and exclusive Special Court respectively.
The Bill further adds a chapter on the rights of victims and witnesses. It shall be the duty of the State to make arrangements for the protection of victims, their dependents and witnesses. The State government shall specify a scheme to ensure the implementation of rights of victims and witnesses. The courts established under the Bill may take measures such as (i) concealing the names of witnesses, (ii) taking immediate action in respect of any complaint relating to harassment of a victim, informant or witness, etc. Any such complaint shall be tried separately from the main case and be concluded within two months.
Hon. Chairman, moreover there should not be any discrimination amongst people belonging to Scheduled Castes. As demanded by Hon. Chief Minister of Tamil Nadu Puratchi Thalaivi Amma, I request the Hon. Union Minister for Social Justice and Empowerment to treat Scheduled Caste Christians at par with Hindus, Sikhs or Buddhists and include them in the SC list. The Tamil Nadu Government led by Hon. Puratchi Thalaivi Amma is committed for the cause of protection of people belonging to Scheduled Castes and Tribes.
Tamil Nadu Government has been implementing several welfare programmes meant for Scheduled Castes and Tribes, particularly women. Steps like grant of Rs.1004 crore as loan assistance with a subsidy of Rs.370 crore for Self Employment Ventures through TAHDCO, Rs. 262 crore loan assistance with subsidy of Rs.116 crore to 6528 Self-Help Groups consisting of 78339 women members and Rs. 200 crore fund allocation for Integrated Tribal Development Programme are some of the pioneering steps, aimed for the empowerment of SCs and STs, taken by Tamil Nadu government under the able guidance of Hon. Chief Minister, Dr. Puratchi Thalaivi Amma. A bigger obstacle faces victims who actually manage to lodge a complaint. Failure to follow through with cases is alarmingly apparent at the lowest echelons of the judicial system.
16.59 hrs (Shri Anandrao Adsul in the Chair) Seeking justice through the special laws is not an easy task, since it demands adherence to a number of procedures on the part of the victims, accused, police, the special public prosecutor and others concerned at every stage of the case, which often turn out to be very costly, tiresome and time-consuming, particularly for the victims. Invariably, it is during this time the accused indulges in a number of mischievous activities including bribing the police, tampering the evidences, pressurising the victims for an out of court settlement of the case and threatening the victims and their witnesses etc. If they have to pursue the case despite all these, it would be at the cost of their "means of sustenance, dignity, peaceful living, and sometimes their life itself". The law enforcement agencies, the police and the judiciary should be free from caste prejudices to address this perennial social problem.
17.00 hrs The present Bill is committed to protect basic human rights and principles of justice, equality, liberty, and fraternity. Among the Dalit community and its supporters and sympathizers, Dr. Ambedkar’s statement resounds louder today than ever -- “My final words of advice to you are, educate, agitate and organize; have faith in yourself". For ours is a battle not for wealth nor for power. It is battle for freedom. It is the battle of reclamation of human personality.
श्री बलभद्र माझी (नबरंगपुर):सभापति महोदय, बहुत-बहुत धन्यवाद कि इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण विधेयक के ऊपर बोलने के लिए मुझे मौका दिया।
जब रिजर्वेशन लागू हुआ, जब 1950 में संविधान बना, तब से रिजर्वेशन हरिजनों और आदिवासियों के लिए लागू हुआ। रिजर्वेशन लागू करने का मकसद क्या था, यह रिजर्वेशन सिर्फ नौकरी के लिए नहीं था, क्योंकि, आज के दिन अगर हम देखते हैं तो सभी स्टेट गवर्नमेंट्स के पियोन से लेकर सैण्ट्रल गवर्नमेंट के कैबिनेट सैक्रेटरी तक नौकरियां सिर्फ पांच करोड़ होती हैं। आज की आबादी के हिसाब से लगभग चार प्रतिशत लोग ही नौकरी कर सकते हैं। वही बात हरिजनों और आदिवासियों के लिए भी लागू होती है। अतएव सिर्फ नौकरी में रिजर्वेशन रखकर आदिवासियों और हरिजनों का कल्याण करने के लिए कतई हमारे संविधान के रचयिता लोगों ने नहीं सोचा था। रिजर्वेशन के पीछे मकसद यह था कि कुछ सालों बाद आदिवासी हरिजन, जो और जातियों से कई हिसाब से पीछे हैं, वे लोग सामाजिक तौर पर, आर्थिक तौर पर, सांस्कृतिक तौर पर और शिक्षागत तौर पर, इन चार तौर पर बराबर हो जायें। रिजर्वेशन रखकर आज लगभग 65 साल हो गये, लेकिन आज जैसा हमारे पहले वक्ता ने बोला कि दिनों-दिन एट्रोसिटीज़, अत्याचार आदिवासी हरिजनों के ऊपर बढ़ता जा रहा है। यह अत्याचार प्रिवेंशन कानून पहली बार 1989 में आया। इसका मतलब यह है कि पहले अत्याचार था भी तो उस मात्रा में नहीं था, लेकिन जैसे-जैसे दिन बढ़ते गये, यह अत्याचार और बढ़ता गया। इसका मतलब क्या है, इसके पीछे क्या कारण हो सकता है कि रिजर्वेशन के चलते और जातियों में एक दुर्भावना पैदा हुई कि एक विशेा वर्ग को इतने सालों से रिजर्वेशन दिया जा रहा है, यह एक मेन मुद्दा अत्याचार का, एट्रोसिटी का है। जब तक हम बाकी जो डिस्पैरिटी है, बाकी जो विामता है, आर्थिक अवस्था में, शिक्षागत अवस्था में, सांस्कृतिक स्तर में, सामाजिक स्तर में, इन चारों स्तरों में जब तक हम बराबरी लाने का प्रयास नहीं करेंगे तो न यह रिजर्वेशन कभी खत्म होगा, न यह अत्याचार कभी खत्म होगा, चाहे आप कितने भी कानून बनायें। कानून में परिवर्तन लाने के लिए मंत्री महोदय ने जो प्रयास किया है, सरकार ने जो प्रयास किया है, यह सराहनीय है। लेकिन मैं समझता हूं कि यह पर्याप्त नहीं है, क्योंकि, इस कानून को अगर हम अच्छे ढंग से पढ़ लें तो इसमें सिर्फ सामाजिक चिन्ताधारा को ही लगाया गया है। किसी ने साला बोल दिया, किसी ने जाति से कुछ बोल दिया, किसी ने किसी को खींच दिया, किसी को पकड़ लिया, किसी को कुछ कर लिया, इस ढंग के बहुत सारे इसमें प्रावधान हैं, जो विशेा करके 99 परसेंट सामाजिक व्यवहार को इंडिकेट करते हैं, बाकी जैसे अत्याचार और भी हैं, यह इसमें शामिल ही नहीं हुआ है, जैसे अभी इंस्टीटय़ूशनल अत्याचार भी होता है। कैसे, अभी कुछ दिन पहले आई.आई.टी. रुड़की में कुछ छात्रों को इंस्टीटय़ूशन से बाहर कर दिया गया। किसलिए, कि बच्चे कम से कम 50 प्रतिशत मार्क्स नहीं लाये, जबकि उनमें से काफी बच्चे पास हुए थे। उसके बाद भी उन 73 बच्चों को निकाल दिया गया। उनमें साधारण वर्ग के भी कुछ बच्चे थे, कुछ ओ.बी.सी. वर्ग के भी थे, लेकिन ज्यादातर एस.सी. एस.टी. के थे। पास होने के बाद भी उनको कालेज से निकाल दिया गया। यह क्या अत्याचार नहीं है? यह प्रावधान इस कानून में जरूर लाना चाहिए था। जब हम लोग स्वाधीन हुए, तब हो सकता है कि आदिवासियों की साक्षरता एक, दो या तीन परसेंट रही होगी। पर, आज तो स्थिति बदली है। आदिवासी में करीब 35-40औ लोग शिक्षित हो चुके है और हालत यह है कि कई विभागों में पिउन का पद भी खाली पड़ा है। मैं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण संबंधी स्थायी समिति में हूं। हमने जितने विभागों का उस कमेटी में रिव्यू किया है, सभी विभागों में एस.सी., एस.टी. के खाली पद हैं। यहां तक कि पिउन के पोस्ट भी खाली पड़े हैं। उसके बारे में पूछने पर जवाब यह मिलता है कि उसके लिए एलिजिबल कैंडीडेट नहीं मिले। पिउन के लिए भी एलिजिबल कैंडीडेट नहीं हैं। यह जो इंस्टीटय़ुशनल अत्याचार है, उसका समाधान इस कानून में नहीं है। इससे न ही उस व्यव्ति को नुकसान हुआ, बल्कि देश भी उसकी सेवा से वंचित रहा।
उसी हिसाब से, बहुत सारे शिक्षा संस्थानों की सीट्स में भी यह स्थिति है। जैसे मैं एम.सी.आई. का उदाहरण देता हूं। उसके लिए हम एक साल से लड़ाई लड़ रहे हैं। उसमें सुप्रीम कोर्ट ने जजमेंट दिया है कि अगर आदिवासी हरिजन बच्चे 35औ तक मार्क्स रखते हैं, तो उन्हें इंट्रैंस में कंसीडर किया जा सकता है। आदिवासी, हरिजनों की सीटों को भरने के लिए उसे और भी रिलैक्स कर सकते हैं, लेकिन एम.सी.आई. उसको मानने के लिए तैयार ही नहीं है। किसी वज़ह से कई स्कूलों और कॉलेजों में आदिवासी, हरिजनों की सीटें खाली हैं। क्या यह अत्याचार नहीं है? चाहे हम जितना भी कानून बना लें, पर जब तक यह इंस्टीटय़ुशनल अत्याचार खत्म नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं होगा। हम आर्थिक रूप से, शैक्षिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से पैरामीटर की बात कर रहे हैं। सामाजिक रूप से तो हम कभी बराबर हो ही नहीं सकते। जहां तक हम शिक्षा में और अधिक बराबर नहीं होते हैं।
महोदय, कई ज़गहों पर, जैसे मेरे राज्य में आदिवासी लोग अपनी ज़मीन को मौर्टगेज करके अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बैंक लोन नहीं ले सकते हैं। न ही आदिवासी अपनी ज़मीन बेच सकते हैं। यह कानून वाऩ 1956 में बना है। यह हो सकता है कि उस समय आदिवासी लोग पढ़े-लिखे नहीं थे और उन्हें अपने अधिकारों के बारे में समझ नहीं थी। पर, वह कानून आज भी है कि आदिवासी लोग अपनी ज़मीन न किसी को बेच सकते हैं, न ही अपनी ज़मीन को मौर्टगेज रख सकते हैं और न ही उस ज़मीन पर लोन लेकर कोई उद्योग लगा सकता है या कोई बिजनेस कर सकता है। वे आदिवासी लोग ओडीशा को छोड़ कर किसी दूसरे ज़गहों पर जाकर बस जाएं तो भी वे अपनी ज़मीन को बेच नहीं सकते हैं। यह विशेाकर ट्राइबल सब-प्लान एरिया में है। क्या यह अत्याचार नहीं है? सरकार भी हम लोगों पर अत्याचार कर रही है। जब इस तरह का अत्याचार चलता रहेगा, तो आदिवासी, हरिजनों का कभी कल्याण ही नहीं हो सकता है। इस कानून को बदलने के पहले सरकार बाकी कानूनों को भी बदले। तब ही आदिवासी, हरिजनों का कल्याण हो सकता है। इसके लिए मेरा निवेदन है।
महोदय, इस कानून में है कि आदिवासी, हरिजन अगर कोई केस लड़ता रहेगा, तो उसे आर्थिक रूप से सहायता दी जाएगी। पर, वह सहायता कितनी दी जाएगी, वह लिखा नहीं है। किसी को जेल भेजने के बाद उस पर फाइन भी किया जाएगा। पर, वह फाइन की मात्रा कितनी होगी, उसके बारे में कुछ लिखा नहीं है। अगर किसी को फाइन कर रहे हैं तो उस फाइन की मात्रा इतनी हो कि उसे थोड़ी चुभे कि उस पर फाइन लगा है। जैसे स्विट्ज़रलैण्ड में अगर कोई ट्राफिक उल्लंघन का जुर्म करता है तो उसके एजुकेशन और इकोनॉमिक स्टैण्डर्ड के हिसाब से उस पर जुर्माना लगाया जाता है, ताकि उसे चुभे। ऐसा नहीं है कि अगर हम करोड़पति हैं तो एक हजार रुपये देकर बेल लेकर चल दिए और कोई गरीब आदमी है तो ऐसे ही पड़ा रहे। इसलिए यह जो आर्थिक रूप से फाइन लगाने की बात की गयी है तो उसकी परिभााा को भी थोड़ा बदलें कि किसे कितनी फाइन लगायी जानी चाहिए।
महोदय, इस कानून में यह भी है कि लोगों ने इसे विलफुल (जानबूझकर) किया है या नहीं किया है। इसका मतलब उन्होंने ऐसा जान-बूझकर किया है या नहीं। यह कौन प्रमाणित करेगा कि इन्होंने ऐसा जान-बूझकर किया है या नहीं? यह प्रमाणित करना बहुत मुश्किल है। कल कोई केस आएगा तो यह कहा जाएगा कि पहले इसे प्रमाणित करें कि इसने यह गलती जान-बूझकर की है। इस टाइप की कुछ चीज़ें हैं, जिन्हें यहां से हटाना जरूरी है।
महोदय, हमारे कुछ और माननीय सदस्य भी कह रहे थे कि इसका मतलब यह नहीं है कि समाज में सिर्फ आदिवासी और हरिजन ही अत्याचार के शिकार हो रहे हैं, प्रताड़ित हो रहे हैं, बल्कि यह भी है कि कुछ आदिवासी और हरिजन लोग इस प्रिवेंशन कानून को लेकर गलत केस भी करते हैं। उस तरह के केस न हों, उसके लिए भी कुछ प्रावधान इसमें होना चाहिए कि अगर कोई गलत केस कर रहा है तो उसके खिलाफ भी कोई एक्शन किया जाए।...(व्यवधान)
मैं आदिवासी हूं और मुझे यह कहने में कोई शर्म नहीं है।...(व्यवधान) इसका मतलब क्या कोई गलत केस करेगा?...(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप लोग आपस में बात मत करिए।
…( व्यवधान)
श्री बलभद्र माझी : महोदय, मैं आदिवासी हूं।...(व्यवधान) मैं भी केस कर सकता हूं।...(व्यवधान)
महोदय, इन्हें चुप कराइए।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : इसे रिकॉर्ड में न लीजिए।
… (Interruptions)… श्री बलभद्र माझी: अगर मेरा कहा कुछ गलत है, तो उसे निकाल दीजिए, एक्सपंज कर दीजिए। आप उसमें से निकाल सकते हैं। ...(व्यवधान) आप ऐसा समझें तो ...(व्यवधान) लेकिन यह नहीं होना चाहिए कि कोई गलत केस करे। ...(व्यवधान)
माननीय सभापति : यह ठीक नहीं है।
…( व्यवधान)
माननीय सभापति : यह नहीं चलेगा, आप बैठिए।
…( व्यवधान)
श्री विनोद कुमार सोनकर (कौशाम्बी) : कार्रवाई से हरिजन शब्द निकाला जाए। ...(व्यवधान)
श्री तथागत सत्पथी (धेंकानाल) : क्यों निकाला जाए? ...(व्यवधान) आप आसन पर बैठ जाइए। ...(व्यवधान) वह सही बोल रहे हैं। ...(व्यवधान)
श्री विनोद कुमार सोनकर : यह सही नहीं बोल रहे हैं।
माननीय सभापति : ठीक है, हम देखेंगे। प्लीज आप बैठिए।
…(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप बैठिए, हम देख लेंगे।
…(व्यवधान)
श्री बलभद्र माझी : महोदय, मेरा यह निवेदन है कि इसके साथ-साथ बाकी जो प्रावधान हैं, उनको मेरे सुझाव के साथ ग्रहण करते हुए यह भी प्रावधान कानून में रखा जाए कि अगर कोई गलत केस करता है तो उसे भी पनिशमेंट देने का प्रावधान होना चाहिए। गलत केस आने के भी बहुत सारे उदाहरण हैं। ...(व्यवधान) इतना कहकर मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं। धन्यवाद।
SHRI MALYADRI SRIRAM (BAPATLA): Sir, I would thank you for giving me this opportunity to speak on this Bill.
Sir, even after 67 or 68 years of Independence, India is not free from the atrocities against the Dalits. Even now, atrocities, discrimination and deprivation are going on against the Dalits. I do not know how many years it will take to have an instance-free society in India.
Sir, it is true that atrocities have been happening all over India for the last 60 to 70 years. Though several laws have been enacted – the Prevention of Atrocities Act, 1989 has been enacted – yet, even after that also, atrocities against the Dalits, especially the Scheduled Caste and Scheduled Tribe communities have not come down. I thank the NDA Government for introducing some amendments at least now. Especially, my sincere thanks are due to the hon. Minister of Social Justice and Empowerment to push through this Bill.
It is a very long-pending demand from the communities which are very backward, which require the support of the Government for their development. The Dalits continue to face oppression. Governments may come and go, leaders can rise and fall. Promises can be made and broken. Issues can emerge and fade. But one thing constant in Independent India is the unbelievable degree of oppression encountered by the Dalit community.
While the system of reservation has helped to some extent in providing opportunities for the Dalits in education and employment but social relations are still stuck in a time warp.
A brutal assault on the Dalits such as the shocking instance of a Dalit youth being murdered because he is having an Ambedkar ring-tone on his mobile phone has appeared recently. It happened in Maharashtra. In this context, I just want to bring to your kind notice two instances which happened in Andhra Pradesh, one in 1985 and another in 1992. Judgments have been rendered by the lower courts and higher courts after 30 years. In one court, the hon. Judge let off the culprits by saying: “It is true that 7 to 8 people have been murdered but the prosecution could not establish who has committed the murder.” This is the way the courts are also acting.
In another case, even after 30 years, it has not reached the finality. Even the ... are also against the Dalits’ interests of this country. Therefore, I want to bring to your attention the distressing rise in the incidents of atrocities against Dalits across the country.
Besides public damning, awareness campaigns and threats of punitive action, nothing substantial so far has been initiated to erase caste discrimination. I do not mind even referring to the case of discrimination. Some of the people, who have been suppressed and oppressed are thinking of going to some other faith also. I think the society has to seriously think of the reason behind this. Why are people trying to change their faith? I request my brethren and colleagues in this august House to consider this.
A comprehensive review of the effectiveness of the machinery for ensuring safety and security of SCs and STs should be taken up. There should be an effective control of crimes committed against them in the country. Day by day a number of cases of atrocities against members of SCs registered under the SCs and STs Prevention of Atrocities Act, 1989 are increasing. I urge upon the Union Government to make earnest efforts towards effective implementation and further strengthening of Prevention of Atrocities Act.
Several factors like land disputes, land alienation, indebtedness, non-payment of minimum wages and non-economic causes like caste prejudices, deep rooted social resentments, etc. may manifest in offences of atrocities.
The Prevention of Atrocities Act was enacted and brought into force in early 1990s with a view to preventing atrocities against the members of SCs and STs and the provisions of the Act are implemented by the State Governments.
I would like to request the Central Government to monitor its functions and periodically strengthen the Act by setting up Special Police Stations, SCs and STs Protection Cells. Efforts should be made for setting up exclusive Special Courts; relief and rehabilitation should be provide to the victims affected by atrocities.
Therefore, I urge the Union Government to launch the awareness generation programme among the vulnerable sections of the society and open legal recourse to SCs and STs and to identify the atrocity-prone areas for taking preventive measures.
I wish to bring it to the notice that the Central Government has also been advising them from time to time to implement the Prevention of Atrocities Act in letter and spirit with specific emphasis on sensitization and training of the police personnel, law enforcement agencies, and to minimize delays in investigation of cases of atrocities against the SCs and STs, and to improve the quality of investigation, setting up of exclusive special courts for speedy trial of cases under the Act, and review of cases ending in acquittal. In most of the cases, investigations are not properly taken up. The SHOs should be made very responsible and Inquiring Officer should be at the level of DSP so that the percentage of successful cases is high. Unfortunately, the success rate in regard of these cases is negligible. So, I demand a fair and impartial enquiry in the case so that guilty are punished as per law. While stressing the importance, institutional machinery charged with the welfare and protection of Dalits should be strengthened and made accountable.
The august House and the Ministry should be seriously concerned about the rising crimes against women belonging to the SCs and STs. Keeping in view the fact that the SC and ST women are quite often subjected to sexual harassment and given pain and trauma, and they suffer. Thereafter, due to pressure, fear and shyness, these women also remain diffident and hesitant while deposing before the court proceedings which are conducted mostly in a male dominated atmosphere. This is more pronounced in the rural areas. The Committee are of the firm view that the need of the hour is to address this vital issue by setting up special courts for them with women judges and women public prosecutors, preferably belonging to the SCs and STs community.
Some of the provisions which have been added are really good. Action should be taken under the Act against registration of false cases. The relief and rehabilitation provided to the affected persons should be enhanced. The Government of India is thus making earnest efforts towards effective implementation and further strengthening of the Prevention of Atrocities Act, 2014.
Issues raised by me are important. Hence, I strongly urge the hon. Minister to come forward and take up issues, and make an assurance to the hon. House. With these words, I conclude, Sir.
SHRI VARAPRASAD RAO VELAGAPALLI (TIRUPATI): Mr. Chairman, Sir, I thank you for very much for giving me this opportunity. I also would like to congratulate the present Government and the previous Government for bringing this amendment which is very much needed to bring in social equality. But the unfortunate thing is, irrespective of the number of Acts, all over the country the atrocities against Dalits are increasing day-by-day and, in fact, the atrocities are worsening.
The recent very unfortunate development is, the Backward Classes who have been suppressed for several decades, now they are the main perpetrators of committing atrocities on poor Dalits. These atrocities are committed frequently in States like Uttar Pradesh, Bihar, Rajasthan, Madhya Pradesh and Mahrashtra. So, I would request the leaders of Backward Classes in these States to make an appeal to their communities not to commit atrocities against Dalits. My appeal to them is to treat these Dalits also with human dignity.
Then, any number of Acts will not serve any purpose unless the police are also properly sensitized. To stop the atrocities against women, several States in our country have started Police Stations exclusively run by women. Similarly, if there is really political will to stop the atrocities against Dalits, the only way is to start Police Stations exclusively manned by the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, only then the atrocities can be contained. Otherwise, the main culprits here are the police because they do not register cases, do not bring the witnesses, there is inordinate delay and they resort to compromises and collude with other communities. Therefore, I am of the strong view that wherever the number of cases is more, the Special Courts as well as the Special Police Stations should be manned exclusively by Dalits.
Sir, several Members who have spoken before me have mentioned about some worst incidents of atrocities against Dalits. It is extremely unfortunate and it is unpalatable to repeat those things. But still for the benefit of all the Members here, I want to mention them here. Some of the instances are as follows. A minor Dalit girl was beaten up because her shadow has fallen on a man of other community. The Scheduled Castes cannot share food in Madhya Pradesh. They cannot even look into the eyes of other community people. Thirteen families were socially boycotted in Maharashtra. A Dality youth was brutally killed just because he played in the Ambedkar Tournament in Maharashtra. Five Dalit women were stripped and paraded in Uttar Pradesh. A Dalit groom was attacked for riding a horse. A Dalit boy was burnt to death. Three members of a Dalit family were killed and dumped in a dry well. No hair cut is done for Dalits in Karnataka villages. Dalits were forced to eat human excreta. Dalits were punished for drinking water meant for the teachers.
So, wherever there is a leakage in the system, particularly at the courts and police stations, unless it is plugged, any number of Acts will not bring justice to Dalits. I would like to reiterate to the hon. Minister here that after nearly 70 years of Independence, if we really want to treat these poor people with human dignity, the only way is that the Special Courts and the Special Police Stations should be manned by the people from these communities. Otherwise there is no solution to this problem.
Sir, we have a proper legal system in the country. But unfortunately the legal system meant for the poor is working separately. If it works in close coordination with the Department of Social Justice and Empowerment, the legal aid which is available to the poor could be made use of. I would like to submit here that 93 per cent of the people who are hanged to death are from the Dalit community. The only reason for this is that they are not able to engage a proper advocate.
Although, for the namesake we have the legal aid system in the country, it is not effective for the simple reason that dalits are not able to engage a proper advocate. Therefore, I would submit to the hon. Minister here that special courts should be there, the police stations should be manned by them, and the legal aid system should be linked with the departments so that it would be effective. Whenever there is a death penalty or life imprisonment, proper and good advocates should be given to them for legal advice.
I do not know why SC/ST officers were excluded from this for their negligence. Along with the non-dalits, if there is negligence by SC/ST officers of not doing their duty, they should also be equally punished for the simple reason that there is every possibility that they may collude with the people. There is a possibility that they might take a bribe and ignore this kind of activities. Therefore, along with the non-dalits, dalit officers should also be punished for negligence. In extreme cases of inhumanness, just as we are punishing with death penalty for atrocities against women – this is also involved with the human dignity – I am also of the strong opinion that whenever there is an extreme inhuman atrocity against dalits, the exemplary punishment including death penalty should be given. That is only the solution; otherwise, atrocity will continue to be unabated. Unfortunately, they are being treated as third-class citizens here. Therefore, I am of this opinion that some of these suggestions could also be taken into consideration so that the dalits could also live with dignity in the country. Thank you very much.
श्री रत्न लाल कटारिया (अम्बाला) : महोदय, मैं भारत के लाल जननायक नरेन्द्र मोदी जी और आरदणीय थावर चंद गहलोत जी को बधाई देना चाहता हूं। आज सारा राट्र बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर की 125वीं जयंती मना रहा है और उस अवसर पर दलितों की रक्षा के लिए, उनके ऊपर उत्याचार को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण बिल इस महान सदन में लाया गया है, मैं इस बिल का स्वागत करता हूं। 68 साल की आजादी के बाद बार-बार यह मांग क्यों उठती है, क्यों दलितों के ऊपर अत्याचार दिन-प्रति-दिन बढ़ते जा रहे हैं, उनकी महिलाओं को बलात्कार का निशाना बनाया जा रहा है? उनकी प्रोपर्टी को नट किया जा रहा है, उनको मेनटली टार्चर किया जा रहा है। अभी दो-तीन साल पहले दिल्ली से एक चिंगारी उठी, वह मेरी बेटी, वह मेरी बहन, निर्भया के गैंग रेप के बाद देश में एक बहुत बड़ी बहस चली और उस बहस में यह निकाऩ निकल आया कि महिलाओं के ऊपर रेप का संबंध अधिकतर मनुय की मेनटलिटी से है। अगर हम उस अत्याचार को कम करना चाहते हैं तो हमें इंसान की मेनटलिटी को बदलना होगा। आज 68 साल की आजादी के बाद दबंग लोग दलितों को अपने पांव के नीचे क्यों कुचलना चाहते हैं। क्या भगवान ने उनको इंसान नहीं बनाया है, ये लोग इन्हें रेंग-रेंग कर चलने पर क्यों मजबूर करते हैं? एक दलित का लड़का दुल्हा के रूप में घोड़े के ऊपर चढ़ कर घुड़चढ़ी की रस्म अदा करे यह भी इन्हें नहीं भाता और इनके पेट में दर्द शुरू हो जाता है। क्या बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के नाम पर अपने मोबाइल का रिंगटोन लगाने से ही किसी के दिलो दिमाग पर पहाड़ टूट पड़ता है जिससे वह उस बच्चे की निर्मम हत्या कर देता है। यह वही मेन्टैलिटी है। आज 68 साल बाद उस मेन्टैलिटी को बदलने की जरूरत है।
सभापति महोदय, प्रधान मंत्री जी ने एक बहुत लंबी सोच के तहत हिन्दुस्तान में एक स्वच्छता अभियान चलाया। यह न केवल स्वच्छता अभियान है, बल्कि इसका संबंध गरीबों पर होने वाले अत्याचारों को भी कम करना है। हम देखते हैं कि हिन्दुस्तान में आज भी 60-65 प्रतिशत महिलाएं रात्रि के समय या सूर्य निकलने से पहले जब शौच के लिए जाती हैं तब ये रेप के दरिंदे सक्रिय हो जाते हैं और उनकी अस्मत को लूटते हैं। आज इस ओर भी बहुत सख्त कानून बनाये जाने की जरूरत है।
सभापति महोदय, इस बिल में कहा गया है कि एक्सक्लूसिव, स्पेशल कोर्ट्स बनायी जायें। मैं माननीय मंत्री जी का ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहूंगा कि हिन्दुस्तान 125 करोड़ से ऊपर की आबादी वाला देश है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में एक भी शैडय़ूल कास्ट का जज नहीं है। इस देश की विभिन्न हाई कोर्ट्स में एक भी दलित चीफ जस्टिस नहीं है। यह क्या इंडिकेट करता है? मैं भारत माता के लाल प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से इस प्रजातंत्र के मंदिर के माध्यम से, इस महान सदन के माध्यम से प्रार्थना करना चाहूंगा कि यूपीए शासन के दस वााॉ मे हमारे ऊपर जो मेन्टली टार्चर हुआ है, एट्रोसिटीज हुई हैं, उन सबका निराकरण करने के लिए भारत सरकार तुरंत कदम उठाये। इन सब बातों का संबंध मान और मर्यादा से होता है, डिग्निटी से होता है। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने जीवन भर संघाऩ किया और इन दबे-कुचले लोगों की आवाज को उठाया। वे एक बहुत बड़ा कारवां अपने पीछे छोड़कर चले गये थे। आज इस महान सदन में जो हमारे जन-प्रतिनिधि बैठे हैं, उस कारवां को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम सब पर आयी है। दलितों के ऊपर जो अत्याचार हो रहे हैं, जिसमें कन्विक्शन रेट 25 परसेंट, यानी बड़ी मुश्किल से कन्विक्शन हो पाती है और जो 75 परसेंट कातिल हैं, जो अत्याचारी हैं, वे बचकर निकल जाते हैं। इस दृिट से भी कानून के शिंकजे को और सख्त बनाना होगा। हर रोज सेक्सुअल हरासमैंट के केस आते हैं। मेन्टैलिटी का इस बात से भी पता चलता है कि आपने किसी को किस नीयत से छुआ है। इसके ऊपर भी सख्त कानून बनने चाहिए और अत्याचारों की परिभााा को स्पट तौर से कहा जाना चाहिए। ...(व्यवधान) उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में दलित महिलाओं को सरेआम से नंगा करके घुमाया गया। क्या सभ्य देश को यह अच्छा लगता है कि किसी एक वर्ग की महिलाओं को नंगा करके घुमाया जाये? ...(व्यवधान)
माननीय सभापति : ये बातें हो चुकी हैं, इसलिए कृपया करके आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
श्री रत्न लाल कटारिया (अम्बाला) : सभापति महोदय, मैं हरियाणा प्रदेश से आता हूं। वहां पर एक ... शासन था, दस साल तक कांग्रेस का शासन रहा। मिर्चपुर की घटना मेरे हरियाणा प्रदेश में कांग्रेस के शासन काल में हुई थी, जहां पर दलितों को जिंदा जला दिया गया था। इससे पूरी दुनिया में भारत का सिर झुक गया था, नीचा हुआ था। ...(व्यवधान) मैं आपसे प्रार्थना करना चाहता हूं और आदरणीय थावर चंद गेहलोत जी को बधाई भी देना चाहता हूं कि इस विाय में सख्त से सख्त कानून बनाकर हमारे इस दलित समाज को राहत प्रदान की जाये। बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री अरविंद सावंत (मुम्बई दक्षिण) : माननीय सभापति जी, आज एक अच्छे कानून का प्रावधान लोकसभा सदन में हो रहा है। मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो बहुत दर्द होता है। दर्द इस बात का है कि सभापति जी, आप और हम राजनीति में जिस दिन से आए, शिवसेना में गए। हमारे नेता वंदनीय शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे जी ने हमारी कच्ची मिट्टी पर संस्कार दिए, वह संस्कार जाति निर्मूलन का था। जब शिव सेना का निर्माण हुआ तो उन्होंने कहा था कि 80 प्रतिशत सामाजिक कारण हैं और 20 प्रतिशत राजनैतिक कारण हैं, जब चुनाव हों तब राजनीति करो। उन्होंने उस वक्त 80 प्रतिशत सामाजिक नीति पर मराठी में कहा था-
ब्राहमण ब्राहमणेतर, मराठा मराठेतर, इाहाण्णव कुली, ब्याण्णव कुली उच्च नीच दलित दलितेतर, कोंकणी ये सारे जाति भेद निकालकर एक हो जाओ।
मैंने पहले मराठी में बोला है ताकि गहराई से पता चल जाए। इसका मतलब है कि सारे भेद से निकलकर मराठी इकट्ठे हो जाओ तब तुम्हें न्याय मिलेगा और हम यही संस्कार लेकर हम बड़े हुए। बालासाहब ने अपनी जिंदगी में किसी की जाति नहीं पूछी। आपको याद होगा जब मंडल आयोग आया तो इस देश में किसी ने विरोध किया तो बालासाहब ठाकरे जी ने किया, हमारे आदरणीय नेता ने किया, इसलिए किया क्योंकि जाति की दीवारें टूटनी चाहिए। लेकिन इसे तोड़ने के बजाय हमने इसे ज्यादा दृढ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे दोस्त यहां बैठे थे, हम बात कर रहे थे कि हमने स्कूल में पास बैठे दोस्त से कभी नहीं पूछा कि तेरी जात क्या है। अब पता चला जब चुनाव का समय आया। चुनाव के समय में आरक्षण आया तब बाला साहब जी को पूछना पड़ा कि तेरी क्या जात है, मेयर बनाना है। विधान सभा या जिला परिाद का चुनाव आया, तब पूछना पड़ता था, तब वे कहते थे कि किसी को यह पूछने में बहुत दर्द होता है। यहां जितने भी महाराट्र के सदस्य हैं, उनसे पूछ लीजिए कि उन्हें यह पूछने में कितना दर्द होता था। हम इस संस्कार के साथ आगे आए हैं।
महोदय, यह ठीक है कि इस कानून में "स्पेशल कोर्ट का" प्रावधान किया गया। स्वतंत्रता पूर्व तिलक जी और अगरकर जी की लड़ाई होती रही क्योंकि तिलक जी कहते थे कि इस देश को स्वतंत्रता की जरूरत है जबकि अगरकर जी कहते थे कि देश को समाज सुधार की जरूरत है। पहले स्वतंत्रता लेंगे और फिर समाज सुधार करेंगे, इसमें उनकी लड़ाई होती रहती थी और आज हम लोकसभा में स्वतंत्रता मिलने के 60 वाऩ बाद दलित भाइयों के लिए स्पेशल कोर्ट का प्रावधान कर रहे हैं। क्या सामाजिक सुधार हुआ? मैं इससे ज्यादा व्यथित हूं। मेरे दोस्त कह रहे थे कि स्पेशल कोर्ट बनाओ, दलित पुलिस लगाओ, अगर दलित पुलिस सही काम नहीं करती है दलित पुलिस को कानून में सजा दो। मेरा कहना है कि मानसिकता सही होनी चाहिए। डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की मां के संस्कार थे, वह अपने मायके नहीं गई क्योंकि उनका मायका रईस था। वह कहती थी कि नहीं जाऊंगी, एक दिन ऐसा आएगा कि मैं सोने की रस्सी पर कपड़े सुखाउंगी। यह बात अंदर से आती है कि मुझे कुछ करना है। दलितों के संबंध में महाराट्र में बहुत प्रगति है। मुझे बहुत दर्द होता है बुरी चीजें जैसे अत्याचार हुआ, ब्लात्कार हुआ, अखबार और मीडिया में पहले पेज पर होती हैं। यह घटना दुर्भाग्यपूर्ण होती है लेकिन इसे इतना बढ़ावा दिया जाता है ताकि लोगों के मन में कभी जाति के आधार पर, कभी प्रांत के आधार पर, कभी धर्म के आधार पर और जहर फैलाया जाए। गुनाहगार तो गुनाहगार है चाहे वह किसी भी जाति का हो, धर्म का हो। उसे सजा देनी चाहिए, कड़ी सजा देनी चाहिए। अभी यहां जो कहा जा रहा था, मुझे बुरा लग रहा था। अभी हाल ही में घटना हुई, छोटी बच्चियां जो कलियों की तरह फल रही हैं, उन पर अत्याचार हो रहे हैं। मुझे सुनकर दर्द होता कि तीन-चार वाऩ की बच्ची पर अत्याचार हो रहा है, 70 वाऩ की मां पर अत्याचार हो रहा है। यह कौन सी मानसिकता है? ये चीजें सोशल मीडिया की वजह से हो रही हैं। कल कोर्ट में "पॉर्न" और "गे" के बारे में बात होने लगी थी। हमें कहां गे के बारे में पता था? क्या हमें बचपन में गे सोसाइटी के बारे में मालूम था? अब तो इसकी सोसाइटी हो गई है।
महोदय, मेरी बिल्डिंग में पंजाबी सिख लोग रहते थे, जब बच्चा पैदा होता था तो कुछ लोग नाचने आते थे, मैं क्षमा चाहता हूं, उनको महाराट्र में हिजड़ा कहा जाता है। यह संसदीय है या नहीं, अगर नहीं है तो निकाल दो। वे नाचने के लिए आते थे। बाकी हम जानते थे कि गे सोसाइटी क्या होती है। इसके जरिए जो बुराइयां हैं, वे गांव तक जाती हैं। अभी मेरे एक दोस्त बता रहे थे, इजरायल में किसी का खून हुआ तो छोटी सी न्यूज आ जाती है लेकिन किसी ने संशोधन किया तो पहले पेज पर न्यूज आएगी। हमारे यहां वह नहीं होता। मैं इसीलिए व्यथित हूं कि कानूनन प्रावधान करने के बावजूद क्या अत्याचार रुकने वाले हैं? इसका डिसएडवांटेज भी लिया जाता है। किसी को बोलो तो वह कहता है कि, अच्छा, मुझे बोला। अब मैं तुझे बताता हूं। अरे, क्या पता, तेरी जात क्या है? हमने महाराट्र सदन में रोटी नहीं खिलाई थी, पता नहीं था कि कौन है तो फिर पन्द्रह दिन बाद तक न्यूज आती रही कि रोटी खिलाई। वह रमजान का समय था। वह मुसलमान था। अरे, हमें क्या मालूम। होटल में खाना खाने के लिए जाते हैं, अगर बाल मिला तो भी हम उठाकर कहते हैं कि इसमें बाल मिल गया। क्या हमें मालूम है कि होटल का मालिक मुसलमान है या हिन्दू है? उस मामले को तुरंत ही रंग दिया गया कि मुसलमान को रोटी खिलाने की कोशिश की गई जबकि रमजान का समय था। ऐसा क्यों करते हो? इसलिए रोक लगाते समय पहले इस पर रोक लगाने की आवश्यकता है।
मैं एक उदाहरण देता हूं। नगर जिले में एक हादसा हुआ। हमारी दलित महिला पर अत्याचार हुआ। खून भी हुआ। अखबारों में 8-10 दिन न्यूज चलती रही। दलितों के सारे नेता वहां भी जाते रहे। रोज टी.वी. अखबार में आता रहा लेकिन जिस दिन गुनहगार पकड़ा गया, उन्हीं के परिवार का आदमी था। अब क्या करोगे? अब किस पर अत्याचार का आरोप लगाओगे? दिलीप गांधी जी बैठे हैं, तब तक अत्याचार की बात चलती रही। समाज में ज़हर फैलाया जाता है।...(व्यवधान) दिलीप गांधी जी यहां बैठे हैं। वह नगर जिले के हैं। उनसे आप पूछिए। इसलिए मैं कानून का स्वागत करता हूं लेकिन इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए। कहीं पर हम संस्कार में कम हो रहे हैं। दलितों को अगर ऊपर लाना है तो सिर्फ नौकरियों में आरक्षण दे दो, प्रमोशन के लिए क्यों भागते हो? Do not teach the child to eat the fish; teach the child to catch the fish. बच्चे को मच्छी पकड़ना सिखाओ। फिर खाना सिखाओ। पकड़ना सिखाने के लिए उसको पढ़ाओ। बेटी पढ़ाओ, बेटी को सिखाओ, वैसे ही मैं भी बात कर रहा हूं। Do not teach the child to eat the fish; teach the child the catch the fish. इस माध्यम से कानून का स्वागत करते समय मैं एक चीज की मांग करता हूं कि हम दलितों के संबंध में कानून लेकर आए हैं। बच्चों को शिक्षा मिले लेकिन नहीं मिल रही है। हमारे मुसलमान समाज की भी वही समस्या है। शिक्षा से वे दूर हैं। एजुकेशन में जिस दिन आएंगे, सारी चीजें भूल जाएंगे। इसलिए मैं इस बिल का स्वागत करते समय कानून का कोई नाजायज फायदा तो नहीं लेगा, इस बात को भी देखना चाहिए। इसका भी उसमें प्रावधान होना चाहिए कि यदि किसी ने अत्याचार के बारे में गलत शिकायत की तो गलत शिकायत करने वाले को भी सजा होनी चाहिए क्योंकि समाज में जाति पांति के आधार पर वह दीवारें खड़ा कर रहा है। इस बिल का स्वागत करते समय एक बात और कहूंगा कि दलित भाइयों के लिए ऊंची शिक्षा कैसे मिले, इसके लिए हमारी सरकार कोशिश करती रहे। धन्यवाद।
डॉ. किरिट पी. सोलंकी (अहमदाबाद) : माननीय सभापति जी, आपने मुझे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक 2014 पर बोलने की अनुमति दी है। इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं हमारे प्रधान मंत्री जी, हमारी सरकार एवं हमारे विद्वान मंत्री श्री थावरचंद गेहलोत जी का बहुत बहुत अभिनंदन एवं बधाई देता हूं।
महोदय, मैं हमारे प्रधानमंत्री, हमारी सरकार और हमारे विद्वान मंत्री श्री थावर चंद गहलोत का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और बधाई देता हूं। चूंकि बाबा साहब अम्बेडकर की 125वीं जयंती चल रही है और जो अधिनियम वाऩ 1989 में बना था, उसमें जिस तरह से प्रावधान थे, उस तरह से वह सफल नहीं हुआ था। कब से वह अधिनियम लम्बित था और हमारी सरकार ने आर्डिनेंस 2014 में लाकर आज सदन में पारित करने के लिए पेश किया है, मैं इसके लिए गर्व महसूस कर रहा हूं। बाबा साहब अम्बेडकर को सच्ची श्रृद्धांजलि हमारी सरकार द्वारा दी गई है, इसके लिए मैं प्रधानमंत्री और सरकार का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। जहां तक दलित लोगों का सवाल है, ये लोग अस्पृश्यता का भोग बनते आ रहे हैं। आज के समय में अस्पृश्यता कम हुई होगी, मगर इसकी जगह आज " मैंटल अनटचेबिलिटी " ने ले ली है। मैं समझता हूं कि मैंटल अनटचेबिलिटी शारीरिक अनटचेबिलिटी से भी ज्यादा भयानक है और इसका निवारण हम नहीं कर सकते हैं। हमारी पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक बैंगलूरू में सम्पन्न हुई है। हमारे राट्रीय अध्यक्ष ने घोाणा की है कि आज भी लोग सिर पर मैला उठाते हैं, यह हमारे लिए नेशनल शेम का विाय है। हमें इस प्रथा को समाप्त करना है और एक अभियान के तहत हम इस प्रथा को समाप्त करने का काम करेंगे। हमारे राट्रीय अध्यक्ष ने तो यहां तक कहा है कि इस कार्य में हमारे एससी और एसटी कार्यकर्ता सम्मिलित नहीं होंगे बल्कि इस कार्य में अपर कास्ट के लोग शामिल होंगे। कानून बनाने से ज्यादा जरूरी जनआंदोलन चलाना जरूरी है। लोगों की सोच को बदलने के लिए हमारी सरकार जो काम कर रही है, उसके लिए मैं बहुत गर्व महसूस करता हूं। बाबा साहब अम्बेडकर ने केवल दलितों के लिए ही नहीं किया है बल्कि उन्होंने महिलाओं के लिए भी किया है। हमारे जो पड़ोसी देश हैं चाहे पाकिस्तान हो, मालद्वीप हो, श्रीलंका हो कहीं भी लोकतंत्र नाम की चीज बची नहीं है। आज लोकतंत्र की सबसे ज्यादा जड़े भारत में मजबूत हुई हैं। अगर इसके लिए किसी को श्रेय दिया जाना चाहिए तो बाबा साहब अम्बेडकर को दिया जाना चाहिए। भारत के आजाद होने के बाद बाबा साहब ने संविधान दिया फिर भी उन्हें उतना सम्मान नहीं मिला जितना कि मिलना चाहिए था। मैं गर्व महसूस करता हूं कि जिस विचारधारा से हम जुड़े हुए हैं, हमारे प्रधानमंत्री जी ने बाबा साहब के स्मारक का शिलान्यास किया है। इसके लिए भारतीय जनता पार्टी की एक लम्बी सोच है। कानून बनाना और लोगों की सोच बदलना तथा दलितों को कैसे सामाजिक न्याय दिया जाए, इस दिशा में हमारी सरकार काम कर रही है। दलितों के लिए वाऩ 1989 के बाद अत्याचार कानून बनाया गया, अगर आप आंकड़े देखें तो लगभग 75-80 परसेंट से भी ज्यादा है लेकिन किसी को सजा नहीं मिली है। इस कानून का सही ढंग से इम्प्लीमेंटेशन नहीं हुआ है। इसकी जो जांच प्रक्रिया है चाहे वह एफआईआर का रजिस्ट्रेशन हो, चाहे इसमें पोस्टमार्टम करने की बात हो, हर जगह दलितों के साथ अन्याय किया जाता रहा है। मेरा सरकार से निवेदन है कि जो पोस्ट-मॉर्टम होता है, उसमें एक पैनल पोस्ट-मॉर्टम की तरह पोस्ट-मॉर्टम किया जाना चाहिए। जिस प्रकार यदि कहीं पर युवा महिला की डेथ होती है, तो पैनल पोस्ट-मॉर्टम होता है, दो-तीन डॉक्टर मिलकर पोस्ट-मॉर्टम करते हैं, इसी तरह से इसमें प्रावधान करना चाहिए।
जहाँ तक केस रजिस्ट्रेशन का सवाल है, उसमें एस.पी. लेवल के अधिकारी उसे करते हैं। उसमें भी पैनल होना चाहिए। अभी-अभी पिछली लोक सभा में जो कॉमनवेल्थ घोटाला हुआ था, उसमें एक ऐसी बात हुई थी कि दलितों के स्पेशल कंपोनेंट प्लान का 700 करोड़ रुपया घोटाले के रूप में ट्रांसफर किया गया था। सरकार से मेरा निवेदन है कि जो अधिकारी ऐसा करता है, उस पर एट्रोसिटी ऐक्ट लागू करना चाहिए और कड़े से कड़ा कदम उठाना चाहिए। सरकार इस बिल को लेकर आयी है, तो मैं इस बिल का पुरज़ोर समर्थन करता हूँ और मैं आशा करता हूँ कि पूरा सदन एकजुट होकर इस बिल का समर्थन करेंगे।
साध्वी सावित्री बाई फूले (बहराइच) : माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार विधेयक पर बोलने का अवसर दिया है, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करती हूँ।
सदन की शुरुआत होने से पहले, राट्रीय गीत से सदन की कार्यवाही की शुरुआत होती है, तो इतिहास याद आता है कि हमारा भारत देश साढ़े छः सौ सालों तक मुगलों का गुलाम था तथा डेढ़ सौ सालों तक अंगरेज़ों का गुलाम था। इस गुलामी से छुटकारा दिलाने के लिए तमाम वर्गों के लोगों ने आपस में सुर में सुर मिलाकर भाईचारा बनाकर भारत माता के नारे को बुलंदी पर पहुंचाने के लिए भारत माता के वीर सपूतों तथा वीर महिलाओं ने अपना बलिदान देकर देश को आज़ाद कराने का काम किया था। उनके साथ-साथ देश के तमाम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े समाज के लोगों ने भी अपना बलिदान देकर देश को आज़ाद कराने का काम किया था। उनको भी आशा थी कि हमारा देश स्वतंत्र होगा, तो हम भी स्वतंत्र होंगे। हमको दो जून की रोटी मिलेगी, तन पर कपड़ा होगा, रहने के लिए मकान होगा, खेती के लिए जमीन होगी, पढ़ने के लिए स्कूल होगा और दवा के लिए अस्पताल होगा। लेकिन, बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आज़ादी के 68 वााॉ के बाद भी आज भी 30 प्रतिशत लोग गुलामी की जंज़ीरों में जकड़े हुए हैं। उनकी दशा और दिशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
हमारे देश में 55 वााॉ तक कांग्रेस पार्टी ने राज किया है। लेकिन, कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में देश में हमारे समाज के लोगों की बहुत दुर्दशा हुई है। मैं आपको बताना चाहती हूँ कि तमाम सरकारें आयीं और गयीं, लेकिन दलितों पर अत्याचार, शोाण, बलात्कार, सामूहिक हत्याएँ, आगजनी आदि की घटनाएँ होती रही हैं तथा आज भी हो रही हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं कमजोर वर्गों की दशा जस की तस है। अत्याचार को समाप्त करने के लिए भारत सरकार द्वारा तमाम कानून बनाकर राज्य सरकारों को भेजा जाता है। किन्तु राज्य सरकारों की दलितों के प्रति साफ मानसिकता नहीं है। इसलिए कानून जस की तस धरी की धरी रह जाती है। इस संबंध में मैं कुछ उदाहरण बताना चाहती हूँ। महाराट्र के अहमद नगर जिले में तीन दलित परिवारों की हत्या करके शव को सूखे कुएं में डाल दिया गया, अमृतसर में पैसे के लेन-देन के लिए दलित को पिंजरे में बंद करके उसी में कुत्ता छोड़ दिया गया, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक बाल्मीकि को पूजा करने से मंदिर से भगा दिया गया, उत्तर प्रदेश में बागपत में एक दलित के शव को दबंगों द्वारा श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी जी द्वारा डॉक्टर राम मनोहर लोहिया जी की प्रतिमा पर माला पहनाने पर मूर्ति की धुलाई की गयी, मध्य प्रदेश के कुँवरपुर गांव में दलित महिला को गोबर खिलाया गया, राजस्थान के जलेसर तहसील के गांव सिकन्दरपुर में एक दलित लड़की के साथ दुकर्म करके हत्या कर दी गयी। मध्य प्रदेश के रतलाम के नेगरूण गांव में दलितों की बारात पर पथराव किया गया क्योंकि दूल्हा घोड़ी पर सवार था। महाराट्र कि शिरडी नगर में युवा दलित होटल में बैठा था, उसके मोबाइल पर बाबा अम्बेडकर साहब की टोन बजी तो आठ लोगों ने पवन कुमार को मोटरसाइकिल से जंगल में ले जाकर उसकी हत्या कर दी। महाराट्र के उस्मानाबाद में दलितों को नल से पानी लेने से मना कर दिया गया, आज वे लोग दो किलोमीटर दूर से पानी लेने जाते हैं। राजस्थान के सीकर जिले के दातारामगढ़ गांव में जमीन के मामले में दलितों का पूरा गांव जला दिया गया। राजस्थान के नागौर जिले के ही डांगावास गांव में जमीन के मामले में तीन दलितों को गोली मार दी गयी और एक महिला की आंख में लकड़ी भोंक दी गयी। राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में ही पांच दलितों की जमीन विवाद को लेकर हत्या कर दी गयी। बिहार के सासाराम के मोहनपुर में खेत में बकरी के जाने की वजह से दलित को जिन्दा जलाया गया। बिहार के गया जिले के पुरागांव में तीन सौ दलित परिवार दबंगों के डर से गांव छोड़कर चले गए। हरियाणा के हिसार जिले के भगाना गांव की चार दलित लड़कियों को घसीटकर कार में डाल दिया गया और दो दिनों तक दर्जन भर लोग बलात्कार करते रहे। हरियाणा के जींद जिले के रैवासा गांव में बच्ची को दूध पिला रही महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। हरियाणा के हिसार जिले के गांव ढोवी में एक दलित युवा की हत्या करके शव को पानी की टंकी में डाल दिया गया। हरियाणा के रोहतक जिले के मदीना गांव में दो दलितों की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। मैं कहां तक प्रमाण दूं।
मैं कहना चाहती हूं कि हमारा देश आजाद हो गया, आजादी के बाद हमारे देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार पैंतालीस-पचास साल तक रही है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के लोगों ने हमारे अनुसूचित जाति के लोगों को, अनुसूचित जनजाति के लोगों को क्या दिया है - भेड़ पालन के नाम पर कर्ज, बकरी पालन के नाम पर कर्ज, सुअर पालन के नाम पर कर्ज, मुर्गी पालन के नाम पर कर्ज, गधा पालन के नाम पर कर्ज देकर उनका वोट लेती रही और उनके साथ धोखा करती रही। मैं बताना चाहती हूं कि हमारे अनुसूचित जाति के लोगों की दशा और दिशा में आज भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, आज भी वे लोग मरे जानवरों का चमड़ा छीलकर, गन्दी नालियों की सफाई करके, गन्दे कपड़े धुलकरके, दूसरों की गुलामी करके अपनी दो जून की रोटी चलाने के लिए मजबूर हैं। कांग्रेस पार्टी की सरकार में जिस तरीके से देश में हमारे अनुसूचित जाति के लोगों के साथ, बहन-बेटियों के साथ अत्याचार हुए हैं, अनुसूचित जाति के लोगों के साथ जो अत्याचार हुए हैं, उनके गांव के गांव फूंक दिए जाते थे, सामूहिक बलात्कार होते थे, सामूहिक हत्याएं होती थीं और सरकार मूकदर्शक बनकर देखती रहती थी।
सभापति महोदय, मैं कहना चाहती हूं कि बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने यदि भारतीय संविधान में हमारे लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं की होती तो आज अनुसूचित जाति के लोगों को न नौकरी में, न शिक्षा में, न राजनीति में आगे बढने का मौका मिलता। यदि उनको यह मौका मिला है तो यह बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी की बदौलत मिला है। आज मुझे भारत की सबसे बड़ी पंचायत में बोलने का जो अवसर मिला है, यह बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी की बदौलत मिला है। इसलिए बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी के कृत्यों का नमन करते हुए मैं कहना चाहती हूं कि बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने भारत के संविधान में वाऩ 1950 में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। उस समय अनुसूचित जाति के लोगों की पापुलेशन बहुत कम थी, लेकिन आज की तारीख में अनुसूचित जातियों की पापुलेशन काफी बढ़ चुकी है, आज उस अनुपात में अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण नहीं मिल रहा है। आज की तारीख में भी, बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी द्वारा बनाए गए भारतीय संविधान में आरक्षण की जो व्यवस्था दी गयी है, चाहे वह नौकरी हो, चाहे वह किसी भी पद पर हो, आज भी उनके साथ धोखा करने का प्रयास किया जा रहा है। आज अनुसूचित जाति के लोग नौकरी से वंचित हैं। तमाम ऐसी जगहें हैं, जिस पर आज भी अनुसूचित जाति के लोग नहीं पहुंच सके हैं।
ऐसी स्थिति में आज मैं इस सदन के माध्यम से मांग करती हूं कि भारतीय संविधान में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने अनुसूचित जाति के लिए, अनुसूचित जनजाति के लिए, अन्य सताए गए समाज के लोगों के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था की है, उस व्यवस्था को पूरे तरीके से लागू किया जाए। जब तक पूरे तरीके से उस व्यवस्था को लागू नहीं करेंगे, तब तक अनुसूचित जाति के लोगों का मान, सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा नहीं हो सकती है।
मैं कहना चाहती हूं कि अनुसूचित जाति समाज के लोगों को आजादी के 68 साल बीत जाने के बाद यह लगा कि हमें भी सम्मान चाहिए, हमें भी घर चाहिए, हमें भी रोटी चाहिए, हमें भी व्यवस्था चाहिए तो माननीय नरेन्द्र भाई मोदी जी का इस देश में उदय हुआ।
18.00 hrs जब मोदी जी इस देश का नेतृत्व करने के लिए हर राज्य और हर जिले में तथा गांव-गांव जाते थे तो लोगों से कहते थे कि हमारी सरकार जो होगी वह दलितों की, गरीबों की सरकार होगी। हम जब सरकार में आएंगे तो सब बेघरों को घर देंगे, सबका विकास करेंगे और सबको साथ लेकर चलेंगे। इसीलिए उन्होंने ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा दिया था। तब चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों ने विश्वास करके वोट दिया, जिसके परिणामस्वरूप केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है। श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है। चाहे जन-धन योजना हो या बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना हो, इस तरह की कई योजनाओं को शुरू करके उन्होंने हम लोगों को लाभ देने का काम किया है। हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी और मंत्री थावर चंद जी की मैं आभारी हूं, जिन्होंने अनुसूचित जाति का सम्मान करने और उन्हें सुरक्षा देने के बारे में चिंता करके उस पर कार्य करने का प्रयास किया है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं सभापति जी आपको भी धन्यवाद देती हूं कि आपने मुझे बोलने का समय दिया और इस विधेयक का समर्थन करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।
माननीय सभापति : अभी छः बज रहे हैं, इस बिल पर तीन-चार और सदस्यों को बोलना है, फिर मंत्री जी जवाब देंगे। उसके बाद हम शून्य काल लेंगे। अगर सदन की अनुमति हो तो सदन का समय एक घंटा बढ़ा दिया जाए।
कई माननीय सदस्य: ठीक है।
श्री अजय मिश्रा टेनी (खीरी) : माननीय सभापति जी, हमारे कई साथियों ने हमारे देश में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की जो स्थिति है, उस पर विस्तार से अपनी बातों को रखा है। हमारे मंत्री थावर चंद जी जो विधेयक यहां लाए हैं, मैं उसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। बहुत सारी घटनाओं को बताते हुए कई वक्ताओं ने अपनी बातों को कहा है। लेकिन इन सारी बातों के साथ-साथ हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत एक बहुत बड़ा देश है। यहां पर विभिन्न प्रकार की संस्कृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक स्थितियां हैं। जब तक हम समाज की कमजोरियों पर पूरी तरह से विजय प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हमारा देश आगे नहीं बढ़ सकता।
इस समय जो सरकार है, इस सरकार ने ऐसी बहुत सी चीजों यानि कमजोरियों को चिन्हित किया है, चाहे उत्तर-पूर्व का क्षेत्र हो या जम्मू-कश्मीर का क्षेत्र हो। उसके साथ ही साथ जो हमारे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग हैं, जो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और अन्य मामलों में भी पिछड़े हुए हैं, उन्हें देश की मुख्य धारा में लाने की बात इस सरकार ने कही है, क्योंकि यह किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है। उसी जिम्मेदारी के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक यहां पेश किया गया है।
कई वक्ताओं ने कई घटनाओं का वर्णन यहां किया है। इन घटनाओं का घटना हमारी मानसिक स्थिति को भी दर्शाता है। मानसिक स्थिति शिक्षा और सामाजिक संस्कारों का पूरी तरह से प्राप्त न होने के कारण प्रभावित होती है। मैं कहना चाहता हूं कि देश में जो भी कानून बनाए जाते हैं, उनमें कुछ न कुछ खामियां रह जाती हैं। इस कमी को दूर करने के लिए ही यह संशोधन विधेयक यहां पेश किया गया है।
ऐसी कई बातें हैं, जिनके द्वारा हम अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को देश की मुख्य धारा में ला सकते हैं, पर जरूरत है प्रयास करने की और कानून को सही ढंग से लागू करने की। हम यह भी नहीं कहते कि कोई परिवर्तन नहीं हुए हैं, आज़ादी के बाद बहुत सारी परिस्थितियों में परिवर्तन आया है। जिसके चलते कई अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग समाज में बड़े-बड़े स्थानों पर बैठे हैं। मैं यह भी चाहूंगा कि क्रिमीलेयर के जो लोग हैं, संविधान और कानून तो अपना काम करेगा ही, लेकिन अनुसूचित जाति के भाइयों में भी जो लोग क्रीमी लेयर में आ चुके हैं, वह आरक्षण का लाभ न लेना और अपने दूसरे भाई जो नीचे हैं, उनको ऊपर लाना, ये सारे प्रयास उन लोगों को करने चाहिए, जिससे ये स्थितियां सुधरेंगी।
मैं अपने क्षेत्र की कुछ बातें यहां रखना चाहता हूं। अभी सावित्री बाई फूले बोल रही थीं। इनका क्षेत्र बहराइच है और मेरा लखीमपुर है। यह क्षेत्र जंगल से घिरा हुआ है। जिसमें बहुत सारे ऐसे गांव हैं, जो जंगल में बसे हुए हैं। वहां के कुछ लोगों को जनजाति का दर्जा प्राप्त है। लेकिन अभी बहुत सारे ऐसे समाज हैं जो आर्थिक रूप से, शैक्षणिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से जनजाति के दायरे में आने चाहिए, लेकिन वे नहीं आ पा रहे हैं। वोठ और गुर्छिया जातियां लखीमपुर और बहराइच में है। मैंने उनके बारे में पूर्व में भी निवेदन किया था। उन जातियों के बारे में भारत सरकार के जनजाति आयोग के समक्ष 19.08.2013 में एक प्रत्यावेदन प्रस्तुत किया गया था। निदेशक जनजाति कार्य मंत्रालय भारत सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश को भेजा गया था, अपनी संस्तुति करने के लिए। लेकिन मैं पहले भी कह चुका हूं कि राजनैतिक कारणों से प्रदेशों की सरकारें ऐसी संस्तुतियां नहीं करती हैं, वह केवल राजनैतिक लाभ के लिए ही संस्तुतियां करती हैं। मेरा आपसे यह निवेदन है कि कानून में यह संशोधन किया जाए कि ऐसी जितनी भी जातियां हैं जो आर्थिक और शैक्षिक रूप से जनजाति के दायरे में आने योग्य हैं, अगर प्रदेश की सरकार उनकी संस्तुति नहीं करती है तो भारत सरकार स्वयं संज्ञान लेकर ऐसी जातियों को जनजाति का दर्जा दे, यह मेरा आपसे निवेदन है। उसके साथ-साथ मेरा आपसे यह भी निवेदन है कि मुझे अभी-अभी व्हट्स-एप के द्वारा सूचना मिली है जो मेरे जिले संबंधित है और जनजाति के लोगों से संबंधित है। इसमें मुझे यह मिला है कि जंगल से हटाए जांएगे 1899 घर। यह हो रहा है। लखीमपुर जिले में ऐसे 5-6 गांव हैं, सूरमा और कांपटांडा जैसे कुछ गांव हैं, जहां थारू जनजाति के लोग रह रहे हैं। उनको वहां से विस्थापित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह तय किया है कि वहां से बाहर जमीन खरीद कर उन जनजाति के लोगों को अपने गांवों से, जहां वह पचासों सालों से रह रहे थे, उनको हटाने का काम किया जा रहा है। इसके साथ मैं अपने क्षेत्र के गांव कांपटांडा की ओर ले जाना चाहता हूं। जहां जंगल का क्षेत्र होने के कारण जंगल के अधिकारी कोई भी विकास का काम नहीं होने दे रहे हैं। सड़के, बिजली और पीने का साफ पानी नहीं है। हद तो यह है कि उनके यहां अगर कोई शादी ब्याह होता है तो बारात जाने के लिए उनको गाड़ी भी ले जाने नहीं देते हैं। गाड़ी ले जाने के लिए 1600 रुपये उनसे लिया जाता है। मेरा आपसे निवेदन है कि संशोधन करके वोठ, गुर्छिया जैसी जातियां जो मेरे जिले की हैं। कांपटांडा और सूरमा जो गांव हैं, उनको राजस्व गांव का दर्जा दिया जाए और राजस्व गांव का दर्जा देकर जो विकास कार्य हो सकते हैं, उन कामों को करने का काम किया जाए।
इसके अलावा मैं माननीय मंत्री जी से एक विशेा अनुरोध करना चाहता हूं कि हमारा जो जंगल का क्षेत्र है, वहां बहुत सारे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग रहते हैं। रेलवे का ब्रॉड गैज कनवर्जन का एक बड़ा काम होने जा रहा है। मैलानी और बहराइच स्टेशन के बीच एक बड़ा जंगल का क्षेत्र है। लेकिन वन विभाग के द्वारा एनओसी न देने के कारण वहां रेल लाइन का ब्रॉड गैज में कनवर्जन नहीं हो पा रहा है, जिससे रेल की यात्रा धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि अगर हम ऐसी जातियों को समाज की मुख्य धारा में लाना चाहते हैं तो उनको शिक्षा और परिवहन की सुविधा उपलब्ध करायी जाए। इसमें माननीय मंत्री जी हस्तक्षेप करेंगे तो निश्चित रूप से हम लोगों को इसका परिणाम मिलेगा। मेरा आपसे पुनः निवेदन है कि विधेयक में संशोधन करके ऐसी जातियों को जो पात्रता रखती हैं, लेकिन उनको अनुसूचित जाति और जनजाति का दर्जा नहीं मिल पा रहा है, उनके लिए भारत सरकार सीधे-सीधे संज्ञान ले और वोठ और गुर्छिया जाति को जनजाति का दर्जा दे।
DR. RAVINDRA BABU (AMALAPURAM): Sir, I thank you for giving me this opportunity. It is such an important Bill. It is very unfortunate that even now in India when we are talking about computers, super conduction, bullet trains and airports; we are still talking about atrocities. What are these atrocities? Why are these atrocities there on Scheduled Castes and Scheduled Tribes? What is their fault? Are they not human beings? Are they not born to their mother and father? Are they born with any other animal? Why are they ill-treated? Why are they being killed, raped and discriminated? This is not the solution. Any Act will never offer any solution. This will never end as long as we do not diagnose the disease. The disease is the deep-seated prejudice in the minds of the people. Caste is such a peculiar thing that it is available only in India. It is not available anywhere in the world. कास्ट सिस्टम कहीं भी नहीं है। पता नहीं अपने देश में यह कैंसर कैसे आ गया है, यह कैंसर कौन लेकर आया है, इस कैंसर को कैसे खत्म करना है, इसका इलाज कैसे करना है। एट्रोसिटीज एक्ट की वजह से इस कैंसर का निर्मूलन कभी नहीं हो सकता। कैंसर नहीं आना चाहिए, लेकिन आने के बाद जो एक्ट लाया जा रहा है, यह इसका ट्रीटमैन्ट है। लेकिन बार-बार यह कैंसर क्यों आ रहा है। Why this cancer is affecting the body of Indian polity? It is because there is a deep-seated prejudice in the minds of the people. Therefore Dr. Ambedkar said that political freedom is meaningless unless you get social freedom, unless the people of India feel proud of being Indian. I should feel that I belong to India. I should not feel that I belong to a Dalit caste. I should not feel ashamed of my caste or my birth. It is the birth which determines the caste, not the profession.
Sir, there is apartheid in South Africa where there is racial discrimination against which Gandhiji fought. In America also, there are blacks who are racially discriminated. We can understand this because they are discriminated on the basis of colour of their skin or their profession. But here, all Indians look the same. Still, we discriminate on the ground of caste because one is born in a Scheduled Caste family and not because of any fault.
There is reservation provided to Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The reservation should be made an Act. Atrocities Act is on one side, but reservation should be made an Act. We are thankful to the Government, we are thankful to the Indian system. People are so gracious that they have allowed the Scheduled Castes and Scheduled Tribes by giving them some reservation at the entry level allowing five years relaxation. I earnestly urge the Government of India to give five years extension to Scheduled Castes and Scheduled Tribes at the time of retirement also so that all officers belonging to Scheduled Castes and Scheduled Tribes may be available to become empanelled as Secretary level officers. My colleague already said that there are no judges from Scheduled Castes and Scheduled Tribes in High Courts or Supreme Court because the entry is very late. Therefore five years extension should be given for retirement. Thank you.
श्री नाना पटोले (भंडारा-गोंदिया) : सभापति महोदय, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक, 2014 पर अपना मत रखते हुए मैं कहना चाहता हूं कि विशेाकर जब हमारे देश का संविधान बना तो देश में जो पिछड़ी जातियां थीं, उन पिछड़ी जातियों को मुख्य धारा में लाने के लिए जो आरक्षण की व्यवस्था निर्माण की गई थी, पिछले 68 सालों में आज भी वे जातियां मुख्य धारा में नहीं आईं और उसी का परिणाम है कि हम लोगों को पिछड़ी जातियों को न्याय देने के लिए कड़ा से कड़ा कानून बनाने का काम करना पड़ता है, ऐसा प्रावधान लाना पड़ता है।
महोदय, आर्टिकल 340, 341 और 342 इन तीनों आर्टिकल से पिछड़ी जातियों को एजूकेशनली और फाइनेंशियली मुख्य धारा में लाने की व्यवस्था की गई। परंतु क्या इतने सालों में आज भी संविधान की उस धारा के आधार पर ये जातियां मुख्य प्रवाह में आई हैं? मैं सरकार से सवाल करना चाहता हूं कि इतने सालों में डा.बाबासाहेब अम्बेडकर ने जो संविधान बनाया, उसका उपयोग पिछड़ी जातियों के उत्थान में नहीं हुआ और उसके परिणामस्वरूप एट्रोसिटीज जैसे कानून को लाना पड़ता है। आज जो पिछड़ी जातियां हैं, उनमें शेडय़ूल्ड कास्ट्स, शेडय़ूल्ड ट्राइब्स, ओबीसी, डीएनटी आदि जातियां, जो समूहों में रहती हैं, उन समूहों को आपस में लड़ाया जाता है। आज यहां कई माननीय सदस्यों ने कहा कि एट्रोसिटीज एक्ट का मिसयूज किया जाता है। आज भी देश में जिनती एट्रोसिटीज़ के गुनाह दाखिल हुए थे, उसमें से कितनों को हमने शिक्षा दी? उसमें से अगर एवरेज़ में देखा जाए तो 95औ लोग बेगुनाह निकले। सभापति महोदय, जिन लोगों पर गुनाह दाखिल किया गया, वह नॉन-बेलेबल ऑफेंस रहता है। उन लोगों की क्या स्थिति रहती है, उनके ऊपर क्या अन्याय होता है? बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि सौ लोग होंगे और उसमें 99औ प्रतिशत लोग अगर दोााळ हैं और एक निर्दोा हो तो एक निर्दोा को सजा नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस कानून के माध्यम से हम लोग निर्दोा लोगों के ऊपर गुनाह दाखिल करते हैं। कानून में एक प्रावधान करने की गरज है। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री महोदय को बताना चाहूंगा कि जो इसका मिसयूज़ किरेगा तो उसके ऊपर भी गुनाह दाखिल करने की व्यवस्था इस कानून में होनी चाहिए। मैं यह मांग यहां पर करता हूँ।
सभापति महोदय, गुनहगार की कोई जात नहीं होती है। उसको हम जात के आधार पर तौलते जाएंगे तो निश्चित रूप से इस कानून का असर नहीं होगा। निश्चित रूप से पिछड़ी जातियों के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए उस तरह के प्रावधान करने का समय अब आ गया है। हम लोग अगर यह नहीं करेंगे तो हम आपस में लोगों को लड़ाते रहेंगे और उससे हमारा देश टूटता जाएगा। मैं इस बिल के माध्यम से इतना ही कहूँगा कि गलत मिसयूज़ करने वालों पर इसके ऊपर कार्यवाही करने की व्यवस्था, इस कानून के माध्यम से होनी चाहिए। शेडय़ुल्ड कास्ट, शेडय़ुल्ड ट्राइब्स और ओबीसी, आज ओबीसी की व्यवस्था क्या हुई है? हम लोग न तो उनको आरक्षण देते हैं, न उसकी एजुकेशन की व्यवस्था का निर्माण करते हैं, न नौकरी में उनका रिज़र्वेशन है, न उनको हम मौका देते हैं और एससी, एसटी और ओबीसी की लड़ाई ग्रामीण और शहरी भागों में देखने को मिलती है। मैं इस माध्यम से इतना ही कहूंगा कि ओबीसी के लिए भी एक कानून बनाया जाए, जिसके माध्यम से उनके एजुकेशन और रिज़र्वेशन की भी सब व्यवस्था वहां निर्माण की जाएं। मैं बताता हूँ कि जिस दिन शेडय़ुल्ड कास्ट के लोगों को और शेडय़ुल्ड ट्राईब के लोगों को हम एजुकेशनल मज़बूत करेंगे, उनको मुख्य धारा में लाएंगे तो इस कानून की गरज नहीं पड़ेगी और इसके आधार पर निश्चित रूप से यह व्यवस्था सरकार निर्माण करे। इस कानून में थोड़े संशोधन किए जाएं, और निश्चित रूप से इस कानून का मैं समर्थन करता हूँ और एक अच्छा कानून इस देश में बने, इतनी ही मांग करता हूँ।
श्रीमती रमा देवी (शिवहर): सभापति महोदय, आदरणीय थावर चंद गहलोत जी के प्रस्ताव का मैं अभिनंदन करती हूँ। वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अत्याचार के निवारण के लिए जो संशोधन लाए हैं, वे बहुत ही जरूरी संशोधन हैं। आज हम लोग सोचते हैं कि आजादी के बाद क्या हो रहा है। इतने वााॉ के बाद भी इन लोगों पर अत्याचार हो रहा है। इन लोगों पर जिस तरह के कट होते हैं, हम लोग जा कर देखते हैं कि इनको घर का अधिकार नहीं मिलता है, जो अनाज का अधिकार है, वह नहीं मिलता है। इन लोगों को किस तरह दबाया जाता है, आज इन सारी स्थितियों को देखने के लिए मैं खड़ी हूँ। प्रत्येक वर्ग में जो गरीब वर्ग के लोग हैं, वे समझिए कि अनुसूचित जाति और जनजाति की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मैं सभी जाति वर्ग की तुलना इसलिए कह रही हूँ कि अगर किसी वर्ग की महिला आती है, तो उनको नीची दृिट से देखा जाता है। उन पर किस तरह की लांछनाएं लगाई जाती हैं और किस तरह दबा कर रखा जाता है। आज मैं सदन में खड़ी हूँ। मैं इसलिए बोलना चाहती हूँ कि कितनी बार मैं इस चीज़ को रखना चाहती हूँ कि चाहे कोई विाय हो, मुझे बोलने का मौका नहीं मिलता है। मैं मुख्य सचेतक जी का अभिनंदन करती हूँ कि कभी-कभी तकलीफ होती है कि अगर बोलने के लिए हम खड़े होते हैं, हम सांसद हैं, हम किसी को सांस देने के लिए आए हैं, सांस छीनने के लिए नहीं आए हैं। हम अंदर की भावना को रखने के लिए आए हैं। जब हम नहीं रखेंगे, जब हम नहीं बोल पाएंगे तो यहां पर बैठ कर हम क्या करेंगे? हम जिस परिस्थिति को झेलते हैं, उससे बड़ी तकलीफ होती है।
सावित्री बाई फूले ने बहुत सारी बातों को रखा है, जिनमें बिहार और यूपी की परिस्थिति दर्शायी है, मैं उनको दिल से स्वीकार करती हूँ। आज बिहार में क्या परिस्थिति है, वहाँ किस तरह लोग जी रहे हैं, यह भी हमने देखा है। कांग्रेस पार्टी की जो पिछली सरकार थी, उसने कैसे लोगों को जीवित रखा, उसने किस तरह से दलितों को छोटा-छोटा उपहार देकर उसका वोट लेने का काम किया और उसे गरीब रखने का काम किया। आज जो परिस्थिति है, जहाँ तक भी हम देखते हैं, किसानों की भी बुरी हालत हो गई है। हमारे अनुसूचित जाति, जनजाति के लोग जब खेतों में काम करने जाते हैं तो उनके साथ कैसा व्यवहार होता है, यह भी हमने देखा है। किस तरीके से उनके अधिकारों को छीनने का काम होता है। हम चाहते हैं कि हमारी महिलाओं के साथ जो अन्याय हो रहा है, जनजातियों के साथ जो अन्याय हो रहा है, उन्हें न्याय मिले। परिस्थिति ऐसी आती है कि केस होता है, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं होती है। बहुत देर हो जाती है, समझ में नहीं आता है कि हम कहाँ तक किस बात को कहें? हमारे ऊपर भी हरिजन एक्ट लगाया गया। ऐसी स्थिति को सांसद होते हुए भी मुझे झेलना पड़ा। आज की परिस्थिति को देखते हुए, मैं धन्यवाद देना चाहती हूँ मंत्री जी को कि वे इसे लाए हैं, इसका निवारण करने के लिए इसे लाए हैं, उस चीज को करने के लिए आगे बढ़ें। बाबा भीमराव अंबेडकर जी ने जो कानून बनाया, उनके बनाये कानून के तहत ही हम लोग यहाँ खड़े हैं। अगर वे कानून नहीं बनाते तो हमें यहाँ खड़े होने का अधिकार नहीं होता। जिस परिस्थिति से हम लोग लड़ाई लड़े हैं, हम कहना चाहेंगे-
"मजबूर की मजबूरियों को सोचकर देखो और प्रेम की इन झोपड़ियों को बीच में खोजकर देखो, अगर इंसानियत को फिर से धरती पर बुलाते हो, किसी रोते हुए के आंसू को पोछकर देखो।।"
तब जाकर यह नियम कानून आपका बरकरार रहेगा। नियम बनते रहेंगे, उसका पालन अगर नहीं होता है, तो रमा देवी ऐसी आग में तड़पती रहती है, बोलती रहती है, लेकिन असर नहीं पड़ता है। हम चाहते हैं कि दुरूपयोग होने वाले जितने एक्ट हैं, जो आदमी गलत केस करते हैं, उन पर भी केस हो, जाँच सही हो, नहीं तो आज जो बिहार सरकार में हो रहा है, उससे हम लोग बहुत पीड़ित हैं। हम लोग सोचते हैं कि क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है? जब हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आए, गरीबों को, पिछड़ों को, दलितों को, आदिवासियों को जो हिम्मत मिली है, उनको लगता है कि उनका अधिकार वापस आएगा, इसीलिए हमेंइतने बहुमत के साथ सरकार बनाने का मौका मिला है। आज जो लोग चिल्ला रहे हैं कि इनका अधिकार कैसे मिल जाएगा और अच्छे दिन कैसे आ जाएंगे? अच्छे दिन नहीं आए, ऐसा बोलकर इन पार्टियों ने, कांग्रेस पार्टी एक हल्ला बोलकर तमाशा बनाए हुए है और इतने दिनों से सदन को नहीं चलने दे रही है। हम समझते हैं कि करोड़ों रूपए प्रतिदिन खर्च होते हैं। जिस स्थिति में हमें अच्छे दिन लाने हैं, जो अनुसूचित जनजाति हैं, अनुसूचित जाति हैं, दलित हैं, आदिवासी हैं, उनके अच्छे दिन आएं, उनको पीने का पानी मिले, उनको जनवितरण की दुकान से अनाज सही मिले, उनका जो घर बनने का काम है, वह हो और जो एपीएल, बीपीएल की गड़बड़ियां हैं, उसे ठीक करने का मौका मिले। अब बिहार सरकार देखती है कि किसी तरह से वोट ले लें और दलित, महादलित करके वोट को बाँटते हैं। हम लोग तो जानते भी नहीं हैं कि कौन-कौन जाति का है और वहाँ जाति की प्रथा बहुत जड़ पकड़े हुई है। वहीं नहीं हर जगह ऐसा है और वो लोग चाहते हैं कि ये लोग इसी तरह से गरीब बने रहें।
माननीय सभापति : कृपया, कंक्ल्यूड कीजिए।
श्रीमती रमा देवी : मैं कंक्ल्यूड कर रही हूँ। मुझे बोलने का बहुत कम समय मिलता है। मैं एक शायरी कहकर अपनी बात समाप्त करूँगी।
"कि आंधियों को जिद है जहाँ बिजलियाँ गिराने की, मुझे भी जिद है वहीं आशियां बनाने की।।
हिम्मत और हौसला बुलंद है, मैं खड़ी हँ, अभी गिरी नहीं हूँ, अभी बाकी है और मैं हारी भी नहीं हूँ, इसलिए मैं उस काम को करने आई हूँ, करके जाऊंगी, चाहे कितनी भी बाधाएं आएंगी, कितना भी संघाऩ करना पड़ेगा, मैं संघाऩ करूंगी और उस स्थान पर पहुँचाऊंगी जिन्होंने बहुत वााॉ से पीड़ा झेली है, बहुत वााॉ से उनका अधिकार छीना गया है। मैं चाहती हूँ कि मैं उस चीज को स्थापित करके जाऊँ। इसी के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद। जय हिन्द, जय भारत।
डॉ. यशवंत सिंह (नगीना): माननीय सभापति जी, मैं माननीय मंत्री जी को इस संशोधन विधेयक को लाने के लिए बधाई देता हूँ। महोदय, आज मुझे पहली बार बोलने का मौका मिला है, इसलिए मुझे पाँच मिनट के बजाय छः-सात मिनट दे दिए जाएँ, मैं छः-सात मिनट में अपनी बात पूरी करूँगा। ...(व्यवधान)
महोदय, 1947 से पहले जो आज़ादी की लड़ाई हुई थी, जहाँ पूरा देश आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, तो कुछ लोग असमानता से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे। परम पूजनीय बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने कहा था कि मैं उन सबकी लड़ाई लड़ रहा हूँ, जो न सिर्फ गुलाम हैं, बल्कि गुलामों के द्वारा भी गुलाम बनाए जाते हैं। इस देश की बड़ी विचित्र सी स्थिति है। जो व्यक्ति यहाँ पर ज्यादा से ज्यादा काम करता है, कटकारी और दुर्गन्ध वाला काम करता है, उसको सबसे कम वेतन मिलता है। एक सफाई कर्मचारी जो सुबह चार बजे से शुरू हो जाता है और सबसे अधिक मेहनत करता है, दुर्गन्ध के बीच रहता है, उसे स्थायी नौकरी नहीं मिलती। ठेका प्रथा में उसके सभी अधिकारों का हनन कर लिया जाता है। सरकार भी उसके बच्चों का ख्याल नहीं रखती। अगर बीमार हो जाए तो चिकित्सा सुविधाएँ भी उसको नहीं मिल पातीं। लेकिन जो व्यक्ति बड़े-बड़े पदों पर सरकारी नौकरियों में हैं, उनके परिवार वालों को भी मुफ्त चिकित्सा सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं। एक मज़दूर जो सारे दिन मेहनत करके बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्ज़ बनाता है, अपनी जान का जोखिम उठाता है, उस व्यक्ति को इस देश में सिर ढकने के लिए एक छत नहीं मिल पाती। जो लोग खाना नहीं खा पाते, उन्हें ड्राई फ्रूट्स का नाश्ता इस देश में मिलता है। लेकिन जो भूखा है, उसे इस देश में दो जून की रोटी तक प्राप्त नहीं हो पाती। यहाँ पर मंदिरों में भगवान को छप्पन भोग लगाए जाते हैं, टनों दूध से उन मूर्तियों को नहलाया जाता है पर मंदिर के सामने बैठा हुआ गरीब और दलित भूख के मारे दम तोड़ देता है। बड़ी विचित्र स्थिति इस देश की है। दलित इन सब पीड़ाओं को रोज़ सहन करता है। इसका मतलब यह नहीं कि दलित समाज के पास बुद्धि की की कमी है, इसका मतलब यह भी नहीं कि दलित समाज के लोगों के पास किसी क्षमता की कमी है। अगर कमी है तो इस देश के सभ्य समाज के द्वारा उनके अधिकारों के हनन के द्वारा उत्पन्न होने वाली स्थिति से उनके पास संसाधनों की कमी है।
महोदय, अगर हम देखें तो दलित समाज, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से बड़ा शायद ही कोई बिल्डर इस देश में होगा, शायद ही कोई बड़ा उद्योगपति इस देश में होगा, शायद ही कोई बड़ी शिक्षण संस्था का मालिक इस देश में होगा, शायद ही कोई बड़ा ठेकेदार इस देश में होगा और इस देश के उन 9000 परिवारों में से जो इस देश की 70 प्रतिशत संपत्ति पर अपना अधिकार रखते हैं, अनुसूचित जाति का एक भी व्यक्ति नहीं होता। यह सब दलितों को उनके अधिकार न मिलने के कारण है। महोदय, ऐसा नहीं कि अनुसूचित जाति या जनजाति का व्यक्ति अपने आपको आगे बढ़ाना नहीं चाहता, परंतु उसके साथ कदम-कदम पर अन्याय होता है, उसके अधिकारों का हनन होता है, उसे गरीब बनाए रखने के लिए ाडय़ंत्र रचे जाते हैं चाहे वह सरकारी स्तर पर हों या सामाजिक स्तर पर। उदाहरण के तौर पर अगर हम बैंकों के द्वारा लोन देने वाली प्रक्रिया को देखें तो बैंकों द्वारा दिए जाने वाले लोन का 0.04 परसेंट से भी कम इस समाज के लोगों को दिया जाता है। तरह-तरह के बहाने बनाकर इस समाज के लोगों को लोन से वंचित रखा जाता है जिससे वे अपने उद्योग स्थापित नहीं कर पाते। ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई जाती कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को कोई अलग योजना बनाकर बड़े उद्योग स्थापित करने के लिए लोन की सुविधा दिलाई जाए।
महोदय, यहाँ मुझे यह कहते हुए गुरेज़ नहीं कि सरकार की नीतियाँ अभी तक दलितों के पक्ष में नहीं रही हैं। जो भी योजनाएँ चलाई गई हैं, उनका स्वरूप ऐसा रखा गया है कि उनमें भ्रटाचार पूरी तरह से घर कर गया है। आज चाहे प्राइवेट शिक्षण प्रणाली के कारण सरकारी स्कूल सिर्फ एस.सी. एस.टी. के संस्थान बनकर रह गये हैं, जिसके कारण वहां पढ़ाने वालों की रुचि समाप्त हो गई है और वहां का शिक्षा का स्तर निरन्तर गिरता चला जा रहा है। प्राइवेट कम्पनियों में भी जो नौकरियां दी जाती हैं, उनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का रिप्रेजेण्टेशन बहुत कम है, क्योंकि, उसमें तो नाम के आगे और नाम के पीछे लगने वाले सरनेम को देख कर ही रोजगार दिया जाता है।
मैं यहां भी कहना चाहता हूं कि सरकारी नौकरियों में जो अभी तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की नौकरियों का जो आरक्षण नहीं भरा गया है, यह भी एक साजिश के तहत है। इसको भी एट्रोसिटीज़ के अन्दर लाना जरूरी है कि जो नोट सुटेबल बताकर लोगों को सरकारी नौकरियों का रिप्रेजेण्टेशन न देकर वंचित रखा जाता है, इसको भी एट्रोसिटीज़ एक्ट के अन्तर्गत लाना बहुत जरूरी है। हम दलित एवं पिछड़े समाज के लोग बहुत मजबूत मिट्टी के बने हुए हैं, जो हर कट सहन कर लेते हैं, परन्तु दिल तो जब दुखता है, जब हमारे बराबरी के सामाजिक अधिकारों का हनन होता है। उदाहरण के तौर पर मध्य प्रदेश में एक दलित महिला को इसलिए बुरी तरह से पीटा जाता है, क्योंकि उसकी परछाई दबंगों के ऊपर पड़ जाती है। पुलिस रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। महाराट्र में दलितों को मजबूरन गांव छोड़कर जाने के लिए विवश कर दिया जाता है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ...(व्यवधान)
श्री अरविंद सावंत (मुम्बई दक्षिण) : पाइंट ऑफ ऑर्डर। अगर यह बात गलत है तो मैं कार्रवाई से निकलवाने के लिए कहता हूं, लेकिन मैं इनको प्रूफ दूंगा। आपसे बाद में बात करूंगा।...(व्यवधान) मैं आपके साथ खड़ा होकर बात करूंगा कि किसको बाहर निकाला, बताओ।
डॉ. यशवंत सिंह : डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी के गाने की रिंगटोन मोबाइल पर लगाने पर दलित को पीट-पीट कर मार दिया जाता है। ऐसी एक घटना नहीं, ऐसी बहुत सारी घटनाएं हैं, जिसमें दलित महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया जाता है।
माननीय सभापति : ऐसी घटनाएं बहुत आई हैं, अभी बन्द करो।
डॉ. यशवंत सिंह : महोदय, हद तो तब हो जाती है, जब माननीय न्यायालय द्वारा भी बिहार में रणवीर सेना द्वारा मारे गये 23 लोगों के हत्यारों को बरी कर दिया जाता है और यह इसलिए किया जाता है, क्योंकि, कोई गवाह नहीं मिलता। ...(व्यवधान)
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (श्री थावर चंद गहलोत) : माननीय सभापति महोदय, अभी तक 14 माननीय सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। मैं आभारी हूं, आदरणीय वीरेन्द्र कश्यप जी का, डॉ. गोपाल जी का, बलभद्र जी का, मलायाद्री जी का, वी.रामा प्रसाद जी का, रतन लाल कटारिया जी का, अभिजीत जी का, किरीट सोलंकी जी का, साध्वी सावित्री जी का, अजय मिश्रा जी का, पी.वी. रविन्द्रन जी का, नाना पटोले जी का, रमादेवी जी का, अरविन्द सावन्त जी का और डॉ. यशवन्त सिंह जी का। मैं बहुत ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता महसूस नहीं करता हूं, जो कुछ बिन्दु आये हैं, उनके बारे में संक्षिप्त में अपनी बात कहूंगा। सरकार ने पिछले एक वाऩ में अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के लोगों के साथ जो अत्याचार होते हैं, बहुत सारी घटनाएं होती हैं, वे नहीं हों, इस दृिटकोण को ध्यान में रखकर के एक नहीं, अनेक प्रयास किये हैं। जैसे हाथ से मैला ढोने वाली प्रथा को पूरी तरह से समाप्त करने का एक एक्ट लागू किया है और उस एक्ट पर अमल कर दिया है। हमें जैसे ही पता लगता है कि हाथ से मैला ढोने वाली प्रथा के अन्तर्गत कोई सफाई कर्मचारी काम में लगा है, उसको उससे मुक्त कराते हैं। चालीस हजार रुपये एकमुश्त उसको आर्थिक सहायता देते हैं और 6 महीने की ट्रेनिंग देते हैं। ट्रेनिंग के दौरान उनको मानदेय भी देते हैं और ट्रेनिंग के बाद में स्वावलम्बी बनाने की दृिट से अनुसूचित जाति सफाई कर्मचारी वित्त विकास निगम की ओर से सस्ते ब्याज पर ऋण सुविधा भी उपलब्ध कराते हैं। पहले जो लोग परमानेंट थे, उनको काम पर रखने की भी हम कार्रवाई करते हैं। जो महिलाएं सफाई कर्मचारी के परिवार से संबंधित हैं, ऐसी 250 महिलाओं को कॉमर्शियल ड्राइविंग लाइसेंस देने की दृिट से मोटर मैकेनिक और ड्राइविंग का काम सिखाने के लिए हमने एक कैम्प आयोजित किया है। वह तीन महीने से चल रहा है। अगर माननीय सदस्यगण वहां जाकर उसे देखेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें खुशी होगी। कुल मिलाकर, पहले जो अन्याय, अत्याचार होता था, उसको परिवर्तित करके ठीक करने की दिशा में यह कदम है। लोगों की मानसिक परिस्थिति और मानसिकता को परिवर्तित करके ‘हम सब एक हैं’ ऐसा भाव, और सबके प्रति हमारा जो कर्तव्य बोध है, उसका अहसास कराने की दृिट से अम्बेडकर जी की 125वीं वाऩगांठ को साल भर मनाने की दृिट से हमने एक कार्य-योजना बनाई है।
देश के माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छता अभियान प्रारंभ किया है। यह स्वच्छता अभियान निश्चित रूप से सफाई कर्मचारियों के हित संरक्षण की दृिट से उपयोगी है।
कुछ माननीय सदस्यों ने कहा है कि असत्य प्रकरण दर्ज कराने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। भारत की जो दंड प्रक्रिया संहिता है, उसमें आई.पी.सी. की अनेक ऐसी धाराएं हैं कि अगर कोई गलत शिकायत करता है तो उसके खिलाफ न्यायालय को कार्रवाई करने का अधिकार है और अनेक अवसरों पर इस प्रकार की कार्रवाई हुई भी है। इसलिए इसके लिए अलग-से कुछ संशोधन लाने की या इसके लिए अलग-से कुछ प्रयास करने की आवश्यकता मैं महसूस नहीं करता हूं।
महोदय, यहां रिक्त आरक्षित पदों की भी बात आई है। भारत सरकार ने यह निर्णय लिया है और इसके लिए एक कमेटी भी बनी है कि जितने भी आरक्षित पद रिक्त हैं, उसके लिए विशेा अभियान चलाकर उन्हें भरने की कार्रवाई की जाएगी।
महोदय, विशेा थाने और विशेा न्यायालय स्थापित करने की भी बात आई है। वर्तमान में जो प्रोवीजन है, उसमें ऑलरेडी यह प्रावधान है। वाऩ 1995 में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से संबंधित जो कानून बने थे, उसमें इसका उल्लेख है। जहां तक विशेा न्यायालय बनाने की बात है तो आज भी इसके लिए प्रावधान है। संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के यहां आवेदन करने पर, उनसे अनुरोध करने पर वे विशेा न्यायालय की अनुमति देते हैं। विशेाकर, प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए जिला मुख्यालयों पर अलग-से विशेा न्यायालय स्थापित किए जाते हैं और वकील की भी सहायता दी जाती है। इस प्रकार, कुल मिलाकर पहले से ही बहुत सारे प्रावधान विद्यमान हैं। अभी यह जो हम बिल लाए हैं, इसमें भी हमने बहुत सारे प्रावधान किए हैं।
महोदय, हम जो-जो प्रावधान इस कानून में जोड़ रहे हैं, मैं सोचता हूं कि इस बिल के पास होने के बाद उस कानून का युक्तियुक्तकरण भी हो जाएगा। इसके लिए उचित प्रावधान होने के कारण कुछ अंकुश इससे भी लगेगा। लोगों की मानसिकता को परिवर्तित करके अमन-चैन का वातावरण बनाने की दृिट से हम सब एक परिवार के सदस्य हैं, और परिवार के सदस्य के रूप में दूसरे परिवार के सदस्य के प्रति हमारा जो कर्तव्य-बोध है, उसका अहसास कराने की दृिट से भी हमने अनेक कार्य-योजनाएं बनाई हैं। हम उन सब कार्य-योजनाओं पर अमल करने का काम कर रहे हैं।
महोदय, मैं इससे ज्यादा कुछ कहूं, इसकी आवश्यकता मैं महसूस नहीं करता हूं। मैं माननीय सदस्यों से अनुरोध करना चाहूंगा कि इस विधेयक को पारित करने में अपना योगदान दें।
HON. CHAIRPERSON : The question is:
“That the Bill to amend the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 be taken into consideration.” The motion was adopted.
HON. CHAIRPERSON: Now, the House will take up clause-by-clause consideration of the Bill.
The question is:
“That clause 2 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 2 was added to the Bill.
Clause 3 Amendment of Section 2 HON. CHAIRPERSON: Now, Dr. A. Sampath to move the amendment Nos. 30 and 31. He is not present.
Shri N.K. Premachandran to move amendment Nos. 38 and 39. He is not present.
The question is:
“That clause 3 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 3 was added to the Bill.
Clause 4 Amendment of Section 3 HON. CHAIRPERSON: Shri Adhir Ranjan Chowdhury to move Amendment No.3. He is not present.
Shri B. Vinod Kumar to move Amendment Nos. 12, 13 and 14. He is not present.
Shri Jitendra Chaudhury to move Amendment No. 28. He is not present.
Dr. A. Sampath to move Amendment Nos. 32 and 33. He is not present.
Shri Balabhadra Majhi to move Amendment No. 35. He is not present.
Shri N.K. Premachandran to move Amendment No.40. He is not present.
The question is:
“That clause 4 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 4 was added to the Bill.
Clause 5 Substitution of new Section for Section 4
HON. CHAIRPERSON: Shri B. Vinod Kumar to move Amendment No.15. He is not present.
Dr. Shashi tharoor to move Amendment Nos. 18 and 19. He is not present.
Shri Balabhadra Majhi to move Amendment No. 36. He is not present.
Shri N.K. Premachandran to move Amendment No.41. He is not present.
The question is:
“That clause 5 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 5 was added to the Bill.
Clauses 6 and 7 were added to the Bill.
Clause 8 Substitution of new Section for Section 14 HON. CHAIRPERSON: Shri Rabindra Kumar Jena to move Amendment Nos. 10 and 11. He is not present.
Shri B. Vinod Kumar to move Amendment Nos. 16 and 17. He is not present.
Dr. Shashi Tharoor to move Amendment Nos.20 and 21. He is not present.
Shri Balabhadra Majhi to move Amendment Nos. 37 and 46. He is not present.
The question is:
That Clause 8 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 8 was added to the Bill.
Clause 9 was added to the Bill.
Clause 10 Substitution of new Section for Section 15 HON. CHAIRPERSON: Dr. Shashi Tharoor to move Amendment No.22. He is not present.
Dr. A. Sampath to move Amendment No.34. He is not present.
Shri N.K. Premachandran to move Amendment No.42. He is not present.
The question is:
“That clause 10 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 10 was added to the Bill.
Clause 11 Insertion of new Chapter IV A HON. CHAIRPERSON: Shri Jitendra Chaudhury to move Amendment No.29. He is not present.
Shri N.K. Premachandran to move Amendment Nos. 43, 44 and 45. He is not present.
Shri Balabhadra Majhi to move Amendment No. 47. Are you moving your amendment? He is not moving.
The question is:
“That clause 11 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 11 was added to the Bill.
Clause 12 was added to the Bill.
Clause 13 Ordinance 1 of 2014 HON. CHAIRPERSON: Shri Adhir Ranjan Chowdhury to move Amendment Nos. 4 and 5. He is not present.
The question is:
“That clause 13 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 13 was added to the Bill.
Clause 1 Short title and commencement HON. CHAIRPERSON: Hon. Minister, to move amendment No.2. संशोधन किया गया :
“कि पृठ 1, पंक्ति 3, में“2014” के स्थान पर “2015” प्रतिस्थापित किया जाए। (2) (श्री थावर चंद गहलोत) HON. CHAIRPERSON: The question is:
“That Clause 1, as amended, stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 1, as amended, was added to the Bill.
Enacting Formula HON. CHAIRPERSON: Hon. Minister, to move amendment No.1.
संशोधन किया गया :
“कि पृठ 1, पंक्ति 1, में“पैसठवें” के स्थान पर “ छियासठवें” प्रतिस्थापित किया जाए।” (1) (श्री थावर चंद गहलोत) HON. CHAIRPERSON: The question is:
“That Enacting Formula, as amended, stand part of the Bill.” The motion was adopted.
The Enacting Formula, as amended, was added to the Bill.
The Title was added to the Bill.
HON. CHAIRPERSON: The Minister may now move that the Bill, as amended, be passed.
श्री थावर चंद गहलोत : मैं प्रस्ताव करता हूं :
“कि विधेयक को संशोधित रूप में पारित किया जाये।” HON. CHAIRPERSON: The question is:
“That the Bill, as amended, be passed.” The motion was adopted.
HON. CHAIRPERSON : Now, we take up `Zero Hour’. Each Member would get two minutes to speak.