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Lok Sabha Debates

Outcome Of The Round Table Conference Held Between The Prime Minister, Various ... on 21 March, 2006

> Title : Outcome of the Round Table Conference held between the Prime Minister, various political parties and Kashmiri leaders on 25.2.2006 to  promote peace in Jammu And Kashmir.

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the House will take up item number 35 – Discussion under Rule 193.   The time allotted by the Business Advisory Committee is two hours.

            I would request Chaudhary Lal Singh to initiate the discussion.

… (Interruptions)

चौधरी लाल सिंह (उधमपुर): माननीय उपाध्यक्ष महोदय, आप की इजाजत से डिस्कशन अंडर रूल १९३ पर मुझे चर्चा करने का मौका मिला, इसके लिए मैं आपको दिल की गहराई से शुक्रिया अदा करता हूं और यह कहना चाहूंगा कि यह मसला हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी, चेयरपर्सन मैडम सोनिया गांधी जी, जिनकी मेहरबानी से हमारी यूपीए सरकार ने आज जो डिसीजन लिया और जम्मू-कश्मीर में पीस प्रासेज का दौर शुरू किया है। रियासत में शांति बहाली की बातें चल रही हैं। मैं समझता हूं कि यह सबसे बड़ा सर्वप्रिय और मुबारक का काम है। मैं होम मनिस्टर साहब को इस बात के लिए मुबारकबाद देना चाहूंगा कि उन्होंने राउंड टेबल कांफ्रेंस में जिस तरह से रियासत जम्मू कश्मीर के संबंध में ध्यान दिया। …( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: I need complete silence in the House.

… (Interruptions)

चौधरी लाल सिंह : वजीरे- दाखिला ने पेन और तकलीफ इस मसले को ठीक करने के लिए उठायी है। लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि वर्ष १९४७ से ही यह शुरू नहीं हुआ। मुझे इस बात का फक्र है कि मेरे स्टेट जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह को जब सन् १९३१ में गोलमेज कांफ्रेस में ब्रटिश गवर्नमेंट ने बुलाया था। उसमें उन्होंने कहा कि सबसे पहले मैं हिंदुस्तानी हूं, एक इंडियन हूं, उसके बाद महाराजा हूं। मैं कहना चाहता हूं कि उस बात से, उस दिन से हिंदुस्तानी बनने की सजा जो उस महाराजा ने काटी, उसके बाद रियासत जम्मू-कश्मीर में भी अंग्रेजों ने उसी दिन डिवाइड एंड रूल की पालिसी के मुताबिक सन् १९३१ में कुछ लीडर्स बनाए। जिन्होंने कम्युनलवाद, इंबैलेंस और उस स्टेट में जो भाईचारा था, उसको डिस्टर्ब किया। यह बड़ी दुखदायी बात है।जो आज तक जारी है।इसलिए मैं कहूंगा कि इस स्टेट को पहले हमें समझना है कि यह सन् १९४७ के पहले क्या था?  कौन सी चीजें कौन से एरिया के कारण यूनाइटिड थी और उसकी आइडैंट्टी क्या थी? इस स्टेट में गिलगिट, ब्लूचिस्तान, हूंडा, असगरतू, मुजफ्फराबाद, कश्मीर वैली, लद्दाख, जम्मू रीजन्स इमोशनली यूनाइटिड थे।  १८४६ में गुलाब सिंह के साथ अमृतसर ट्रीटी हुई थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी और महाराजा गुलाब सिंह के बीच जो ट्रीटी हुई, उसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर स्टेट जिस तरीके से बनायी गई, मैं उसे बता रहा था कि यह स्टेट डिफरेंट लैंग्वेजेस की है। यहां पहाड़ी, गुर्जरी, डोगरी, कश्मीरी, बालती लद्दाखी स्पीकिंग के लोग हैं। बहुत सी लैंग्वेंजेस होने के कारण इसे इमोशनली युनाइट किया गया। महाराजा गुलाब सिंह ने कश्मीर वैली अंग्रेजों से ७५ लाख रुपए में खरीदी थी। वह आज भी उनके नाम से चल रही है। १९३१ के बाद क्या हुआ? मौकापरस्त लोगों ने मुस्लिम और इस्लामिक तरीके से लड़ाने की कोशिश की। उन्होंने हिन्दू, मुसलमान, सिख लोगों के बीच फसाद कराने की कोशिश की, जिस का रिजल्ट १९४७ में देखने को मिला। यह बहुत दुख की बात है कि दो कंट्रीज बन गई। उसके बीच में तीसरा बीज बोया गया। पाकिस्तान ने हमलावर भेजे और हमला करवाया जिससे कश्मीर, जम्मू का कुछ एरिया यानी वन थर्ड जम्मू-कश्मीर का एरिया कैप्चर कर लिया गया। २० अक्तूबर १९४७ को महाराजा हरि सिंह ने हिन्दुस्तान के साथ इन्स्ट्रूमैंट ऐक्सेशन किया। हिन्दुस्तान की फौजे जम्मू-कश्मीर में गईं। जब जम्मू-कश्मीर में फौजें गईं तो फौजें आगे बढ़ रही थीं। इसके आगे फिर देखने की बात है। अफसोस की बात है कि उस जमाने की गवर्नमैंट को मिसलीड किया गया। हमारी फौजें कहीं दूसरी जगह जाकर रुकवा दीं। उसे रुकवाने का कारण यह था कि वे कुछ लोगों का डौमिनेशन चाहते थे। वह इलाका निकालने से कुछ नहीं हो सकता था। हम इसका आज भी खामियाजा भुगत रहे हैं। जो पहाड़ी स्पीकिंग एरियाज हैं, जिस मैक्सिमम एरिया को पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है, हम उसे गुलाम कश्मीर कहते हैं, वह आज भी पाक ऑक्यूपाइड है। वे २४ सीटें आज भी हमारी असैम्बली में खाली पड़ी हैं। बाहर के लोग माइग्रेट होकर जम्मू-कश्मीर आए। आपको हैरानगी होगी कि सारे सो-कॉल्ड पॉलटशियन्स ने रातों-रात ट्रकों में बैठा और उठा करके सिखों और कुछ दूसरे लोगों को कश्मीर से बाहर निकाल कर जम्मू भेज दिया। वे जम्मू-कश्मीर के होते हुए भी आज भी माइग्रेंट्स हैं, रिफ्यूजी हैं लेकिन उनको रिफ्यूजियों का भी अधिकार नहीं मिल पाया है। अफसोस की बात है कि जो रिफ्यूजी पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आए, उनको पूरी फैसलिटीज मिलीं। उनको एजुकेशन मिली, जमीन मिली, दुकानें मिलीं, बिजनेस मिला लेकिन जो लोग वैस्ट पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर में आए, उनको न हक मिला, न रिसपैक्ट मिली, न घर मिला। वे आज भी हवा में लटके पड़े हैं। ८० हजार के करीब तीन जैनरेशन हो गई।

उन्हें न तो जम्मू-कश्मीर के राशन डिपो से राशन मिलता है, न आई.एम.आई. का मकान मिलता है, न उन्हें असैम्बली में वोट डालने का अधिकार है और न ही पंचायत के वोट डालने का अधिकार है। वे सिर्फ पार्लियामेंट के लिए वोट डालते हैं। हम पचास-साठ सालों से उनसे वोट लेते हैं और उन्हें बेवकूफ बनाते हैं और कहते हैं कि वोट डालो, हम आपकी बात करेंगे लेकिन उनके मसले का कुछ नहीं हुआ है। वर्ष १९४८ को श्री नेहरू जी और शेख साहब ने क्या किया था, जब लोग पाकिस्तान से आए तब उन्होंने कहा - आप जम्मू ठहर जाओ, जैसे जम्मू के लोग रह रहे हैं, जैसे जम्मू-कश्मीर के लोग रह रहे हैं, आपको वैसे ही अधिकार देंगे। उनकी श्योरिटी और गारंटी के साथ वे वहां टिक गए। लेकिन अफसोस की बात है कि आज तक उन लोगों का कुछ नहीं हो पाया है। आज भी उनके बच्चे अनपढ़ मिलेंगे, वे लोग बगैर नौकरी के मिलेंगे, उनके परिवार का एक भी आदमी नौकर नहीं है, not a single man from among 80,000 people. इसी प्रकार से आधे मलियन लोग पी.ओ.के. से आए। अफसोस की बात है कि उन बेचारे गरीबों का कुसूर यह था कि वे जम्मू-कश्मीर के ही लोग थे क्योंकि आज भी मुज्जफराबाद को जम्मू-कश्मीर में ही गिना जा रहा है। आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि आज भी पी.ओ.के के लोग, जो वहां रह रहे हैं, अपने आपको आज भी पाकिस्तानी कंसीडर नहीं करते हैं। आप पूछ कर देख लें वे कंसीडर नहीं करते हैं। जब मैं वहां मनिस्टर था, ये भी मनिस्टर थे, हमारे साथी जो वहां फाइनेंस मनिस्टर थे, उन्हें एक चिट्ठी आई, उसमें कहा गया था का कि हमारे जंगल काटे जा रहे हैं क्योंकि वे आज भी नहीं मानते कि वे जम्मू-कश्मीर के ही मनिस्टर हैं इसलिए वे कुचले गए। यह बहुत बड़ी बात है कि बहुत से मौकापरस्त लीडर्स हैं। मुझे खुशी है कि मेरी पार्टी ने हमेशा जम्मू-कश्मीर के साथ रियायत करने की कोशिश की है। लेकिन हमें दु:ख है कि हमारे सो-कॉल्ड लीडर्स, कुर्सी पर ऐसे पॉलटशिएन्स आए, चाहे वे जिस भी पार्टी के थे, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। आज वहां की पिक्चर साफ रखने का सवाल है। मेरा मकसद है कि जम्मू-कश्मीर की पिक्चर धुंधली न दिखे। कुछ लीडर्स, जो प्राइम मनिस्टर, जम्मू-कश्मीर का वजीर-ए-आजम बनना चाहते थे, जब वे कुर्सी पर आए, उस समय हिंदुस्तान जिंदाबाद हो गया और जब वे कुर्सी से चले गए तो ऑटोनोमी हो गया। उसके बाद फिर लीडर्स के पास कुर्सी आ गई। हिंदुस्तान के होम मनिस्टर , हिंदुस्तान के फाइनेंस मनिस्ट और हिंदुस्तान के प्रेजीडेंट बनने वाले थे, वहां जाकर जहर घोलते हैं, We know well. यह वहां का मुस्लिम जानता है, वहां का कश्मीरी जानता है, वहां का हिंदू जानता है और वहां का सिख जानता है। This is the height.  आज वे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर को डमलिट्राइज कर दो। जम्मू-कश्मीर में कहा गया कि आर्मी हिंदुस्तान की होगी, खुद लिखकर दिया। जब वहां हिंदुस्तान की आर्मी और एन.एस.जी. के कमाण्डो, ब्लैक बैल्ट कमांडो घूम रहे हैं, उनके साए में रह रहे हैं, वे लोग कह रहे हैं कि लोगों को मलिट्री न मिले हमें मिले, हमें चैम्बर भी मिले, हमें पूरी फैसलिटी मिले, हमारे घर में भी गार्ड दो और बाहर भी गार्ड दो ताकि जगह-जगह हमारी बातें चलें। लेकिन जब इन लोगों की बारी आती तब डमलिट्राइज करने की बात कहते हैं। They are representing only militants. उन्हें खुश करने की बात कहते हैं। आप परसों की होम मनिस्टर की स्पीच उठा कर देखें, मैं इसे नॉलेज में लाना चाहता हूं, १६ तारीख की स्पीच मंगवाइए। एक लीडर यहां बैठते हैं, वे स्पीच कर रहे है कि हिदुंस्तान ने दिया तिरंगा, हिंदुस्तान ने दिया जन-गण-मन, हिंदुस्तान ने दी आर्मी और हिंदुस्तान ने छीना पानी और दिया पाकिस्तान को। अगर आपको कोई बचा सकता है तो सिर्फ सैल्फ रूल बचा सकता है। This is the height. आप किन लोगों के साथ बैठते हैं? कौन लोग हैं जो मरवाना चाहते हैं? They are the exploiters.  ७० हजार कश्मीरी, हिंदू, मुस्लिम, सिख मरवा दिए, लेकिन अब तक उनको … * नहीं आई, क्या और मरवाना चाहते हैं? मेरी रिक्वेस्ट है कि वर्ष १९३१ का जो सीन हुआ, जो हमारी बातें आगे आईं, जो इस देश में हुआ, २० अक्टूबर, १९४७ को ऐसी बातों के बारे में कोशिश की गई…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  इस लफ्ज को डिलीट कर दें।

...( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Chaudhary Lal Singh, I know what is to be expunged, and what is not to be expunged.

CHAUDHARY LAL SINGH : Sir, you are the custodian of the words used by me too.

MD. SALIM (CALCUTTA  – NORTH EAST): Sir, please ask the hon. Member to come to the issue of Round Table Conference.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Chaudhary Lal Singh, please conclude your speech now.

चौधरी लाल सिंह : सर, मैं कंक्लूड तभी करूंगा, जब थोड़ा रह जायेगा। आप यह देखें कि पाकिस्तान ने कुछ लीडर्स से मिलकर, जिसे वह आजाद कश्मीर कहता है और हम गुलाम कश्मील कहते हैं, वह वाकई गुलाम है, उसने उस कश्मीर में बेस कैम्प बनाया है। क्यों बनाया है? ताकि वह दुनिया को बता सके कि ये कश्मीरी लोग हैं, देखों ये खुद तैयारी कर रहे हैं और जम्मू-कश्मीर तथा हिन्दुस्तान के खिलाफ लड़ रहे हैं।

* Not Recorded वे बेस कैम्प जम्मू-कश्मीर और हिन्दुस्तान को कंफ्यूज करने के लिए नहीं चल रहे हैं। अब वह आगे बढ़ना चाहता है। उसकी ख्वाहिश है कि वह जम्मू-कश्मीर को कैप्चर करे।

महोदय, कल जो सरकार में थे, आज उन्होंने कहना शुरू किया है। परवेज मुशर्रफ ने सैल्फ रूल कहा तो जम्मू-कश्मीर में एक पार्टी उठी और उसने भी सैल्फ रूल कहा। यह क्या हुआ? आपने भी सैल्फ रूल कहा। आप पी.ओ.के. में पूछों कि क्या वहां सैल्फ रूल है? उन पहाड़ी लोगों से और जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों से पूछो, जो वहां रह रहे हैं। आप उनकी पोजीशन देखें। They are more frustrated than the people of Jammu and Kashmir. वे कहते हैं सैल्फ रूल और हमारे वाले भी उसकी नकल करके सैल्फ रूल कहते हैं। ये बातें सोचने की है। हिन्दुस्तान की बहुत सी स्टेट्स में ४५ परसैन्ट वोट्स पड़ते हैं। जम्मू-कश्मीर में भी ४५ परसैन्ट वोट्स पड़े। फिर ऐसी कौन सी बात है कि वहां सैल्फ रूल नहीं है। कौन सी ऐसी बात है कि वहां वोट्स नहीं पड़ रहे हैं। कौन सी ऐसी बात है कि वहां लोगों को पूछा नहीं जा रहा है। मैं कहता हूं कि जितना डेमोक्रेटिक राइट्स जम्मू-कश्मीर को दिये गये, उन्हें चंद लोगों ने बर्बाद कर दिया। वहां जितना पैसा जाता है और वहां कुछ लोगों ने खाने का इतना मुंह खोल रखा है। मैं समझता हूं कि उन्हें सीना पड़ेगा। …( व्यवधान) 

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर) : कांग्रेस के लोग अब जान गये हैं।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Hon. Members, please do not give any running commentary in the House.

चौधरी लाल सिंह : आप देखें कि जो हमारे पहाड़ी स्पीकिंग लोग हैं, जो एल.ओ.सी. पर राजौरी से उरी, पुंछ, करनाल और कुपवाड़ा एक टोटल बैल्ट है, इसमें जो एरिया पड़ता है, वह कश्मीरी नहीं है। पहले आप अपना कंफ्यूजन दूर करें। First of all you must clear the confusion with regard to this issue. There were only 20 per cent Kashmiri speaking people in Jammu and Kashmir before 1947 and even after 1947. यह बात कंफ्यूज करने की है। यह बात किसी को फंडामैन्टल टीका लगाने की और किसी को जहर भरने वाली है। मैं आपको बताता हूं कि अभी वहां जो झंडा फहराया गया। हमारे ऑनरेबल प्राइम मनिस्टर, डा.मनमोहन सिंह वहां गये थे। जब उन्होंने वह रास्ता खोला और प्रधान मंत्री जी ने श्रीनगर में इनऑगुरेशन किया, जहां ब्रिज बना है। उस ब्रिज के पार पाकिस्तान के झंडे लगे थे। वहां पाकिस्तान झंडे नहीं लगा सकता। I am saying this because that area belongs to Jammu and Kashmir, and that area belongs to the Government of India. लेकिन हिंदुस्तान की तरफ क्या लगा था। अफसोस की बात है कि इधर परवेज मुशर्रफ का बहुत बड़ा होर्डिंग लगा था, उसके साथ सी.एम. का होर्डिंग लगा था और उसके बाद हमारे प्रधान मंत्री जी का होर्डिंग लगा था। लेकिन वहां हमारा तिरंगा झंडा नहीं लगा था। यही सब चीजें हैं, जो वहां कंफ्यूज कर रही हैं। यही वे सब क्रिएट कर रहे हैं। आप देखें कि वहां जो होर्डिंग लगते हैं, जैसे आप वहां जाते हैं तो पहले पी.एम. या होम मनिस्टर का शुरूआती पोस्टर लगा होगा। लेकिन जब आप जाओगे तो इनका किसी का पोस्टर नहीं होगा। ये सब बातें सोचने की है।

  इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि लोगों की विचारधारा कैसे बदली जा रही है। यहां तक कहा गया कि मदरसे चलाने से एजुकेशन मिलती है। मैं पूछना चाहता हूं कि जम्मू कश्मीर और हिन्दुस्तान के दूसरे मदरसों में कोई फर्क है? You must see and check their activities, which are anti-India and anti-people of Jammu and Kashmir.उसे कंट्रोल करिये।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude now because I have a long list of speakers.

चौधरी लाल सिंह :मैं कनकलूड कर रहा हूं। यह बहुत बड़ी बात है कि उस समय के ऑनरेबल प्राइम मनिस्टर श्री चन्द्रशेखर जी, गूजरों की आबादी में गये थे, गदियों के पास गये, उन्हें शेडयूल्ड ट्राइब्ज़ का दर्जा दिया। यह बहुत ही बढि़या बात हुई थी। उन लोगों को लगा कि उन्हें पूछा गया है। वे बड़े ही मिकदार लोग हैं लेकिन उस समय एक झटका लगा कजो पहाड़ी बोलने वाले लोग थे, उन्हें इग्नोर कर दिया गया। उनके लिये रिकमैंडेशन्स लगातार आती रही हैं लेकिन न जाने कहां रुक जाती है? उनमें हिन्दू-मुसलमान-सिख सभी हैं जो पहाड़ी लैंग्वेज़ बोलने वाले हैं। मेरे कहने का मतलब यह है क यदि पहाड़ी बोलने वाले लोगों को स्पेशल स्टेट देते तो यह बात लिखकर ले लो कि आजाद कश्मीर वाले लोग समझते कि हम उनके रिश्तेदार हैं। इससे एक बेहतर हवा जायेगी। वे हमारी तरफ देख रहे हैं। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि यह बहुत ही मुबारक बात है । सरकार ने ८वीं शेडूल में डोगरी भाषा को रखा है, इससे गूजरी और पहाड़ी लैंग्वेज की स्ट्रेंथ बढ़ी है। आपकी फिज़ा में बहुत ही फर्क आया है।

उपाध्यक्ष जी, १९४७ से लेकर १९६५, १९७१, १९८९ तथा जब १९९९ में कारगिल हुआ, उस समय भी माइग्रेंट्स आये। हमारे कई लोग माइग्रेट हुये हैं। जम्मू कश्मीर में, छम्ब और बटाला के अंदर माइग्रेंट्स हुये हैं। जब क्रॉस फायरिंग होती है या शैलिंग होती है तो उस से लोग मरते हैं। हमारे कॉमन मनिमम प्रोग्राम में लिखा हुआ है कि वे सैटल हुये थे। मैं यही कहना चाहता हूं कि जितनी जल्दी हो सके, उनके लिये करिये। हम लोगों ने यह भी कहा था क उन्हें सेफर प्लेस पर ५-५ मरले जमीन दीजिये और मेरा विश्वास है कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया को इस मुतलिक फैसला करके देनी चाहिये। इस काम को जल्दी करा देने से उनके हक की बात पूरी हो जायेगी।

उपाध्यक्ष जी, आज जम्मू कश्मीर में दो कैपिटल बने हुये १५० साल हो गये हैं । एक जम्मू और दूसरी श्रीनगर। आपको जानकर हैरानी होगी कि कश्मीर का अपना अलग रेडियो स्टेशन और टी.वी. सैंटर है। वह अपने रेडियो स्टेशन से अपना नाम कहता है लेकिन जम्मू का रेडियो स्टेशन अलग है, वह कभी अपना नाम अलग से नहीं कहता है। जब महाराजा जम्मू से वहां गये थे तो वह कैपिटल बनी थी। मेरे कहना है कि इस तरह का कनफ्यूज़न बाहर निकालिये। जो देशभक्त लोग हैं, उन्हें स्ट्रैंथ दें। आपको किसी की परवाह करने की जरूरत नहीं है। आप इन ‘सो काल्ड’ लोगों को प्यार से दबका कर, जो काम कराना चाहें, वह हो सकता है यह सरकार की पौलिसी भी है।

उपाध्यक्ष जी, कश्मीर का तीन हिस्सों का पहाड़ी इलाका है। जम्मू का पहाड़ी इलाका टोटली बाहर है। वहां की सरकार ने एक वज़ीर कमीशन बनाया था। कश्मीर को तीन हिस्सों बांटने के वक्त जब इंसाफ की बारी आई तो उसने जम्मू के लिये तीन जिले और एक जिला वैली के लिये रिकमैंड किया। मैंने इस बात को बार-बार कहा है। केवल डोडा-कठुआ जिला १००० वर्ग किलोमीटर के बराबर है। जितना लदाख का एरिया है, उतना हिमाचल प्रदेश है।

17.00 hrs. जितना बड़ा हिमाचल प्रदेश है, उतना ही लद्दाख का क्षेत्र है। आप हैरान होंगे कि तीन डिस्टि्रक्ट्स के लिए कहा, लेकिन नहीं बनाए क्योंकि उनका एक बनता है। आप पॉपुलेशन देखिये, एरिया देखिये, माइग्रेशन देखिये, सब जम्मू में सैटल हुए हैं। इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। आप कंप्रीहैन्सिव सैटलमैंट करिये, चाहे पीओके के लोग हैं, कश्मीरी पंडित हैं, मुस्लिम हैं, सिख हैं, जो भी माइग्रेट होकर आए हैं, उनका कंप्रीहैन्सिव सैटलमैंट करना पड़ेगा। राजौरी, पुंछ और भदरवाह के जो पहाड़ी बोलने वाले लोग हैं, उनको स्टेटस देना बहुत ज़रूरी है। आपको याद होगा कि १९७१ में मरहूम श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के साथ एक अकार्ड किया था जिसका आज तक पता नहीं चला। उस समय पाकिस्तान की ९२००० फौज हमारे कब्जे में थी और मैडम ने सब कुछ कर लिया था। फिर १९७५ में इंदिरा शेख अकार्ड हुआ, जिसमें स्टेट और सैन्टर के रिलेशंस तय किये गये। मेरे कहने का मकसद है कि स्टेट और सैन्टर के रिलेशंस को कायम रखने के लिए जो इंदिरा-शेख अकार्ड हुआ, उसकी तरफ ध्यान देना पड़ेगा। अंत में दो तीन बातें और कहकर अपनी बात खत्म करूंगा।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude now.  You have taken more than half an hour.

चौधरी लाल सिंह : मैं खत्म कर रहा हूं।

उपाध्यक्ष महोदय, आपको सब कुछ याद है। हिन्दुस्तान में चाहे जिसकी भी सरकार रही हो, कभी किसी सरकार ने पाकिस्तान या जिस किसी देश से भी हमारी लड़ाई हुई, तो एक इंच ज़मीन भी नहीं जाने दी। कारगिल के एक पत्थर के लिए कितने लोग शहीद करवा दिये। क्या हम ग्लोरियस कश्मीर ऐसे ही बरबाद हो जाने दें - आपको इसे समझना पड़ेगा। आज वहां आग लगाकर, पुल उड़ाकर, बिल्िंडग्ज़ जलाकर, एजुकेशन को डिसटर्ब करके, जम्मू कश्मीर के शरीफ कश्मीरी चेहरे, जो हमेशा हंसते रहते थे, आज वे बुझे रहते हैं। वहां सबसे ज्यादा डैफ एंड डंब बच्चे पैदा हुए हैं। कहीं ब्लास्ट हो रहा है, कहीं गोलियां चल रही हैं। आज जो बच्चे १८-२० साल के हो गए हैं, उनको पता नहीं कि उन्होंने अपनी जिन्दगी में क्या देखा - यह सबसे महत्वपूर्ण इश्यू है। आप देखें कि जब वे बच्चे सड़क पार करते हैं तो ऐसे देखते हैं कि कहीं से कोई गाड़ी न आ जाए। They are confused due to militancy.  वहां कोई मलिटैन्सी को सपोर्ट नहीं करता, लोग सिर्फ दबाव में हैं। कुछ लोग पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर, एक बड़ा ग्रुप बनाकर आए। उन गुंडों का मन करता है कि जब हम किसी को लीडर बनाते हैं तो क्यों न खुद ही बन जाएं। वे लोग कौन हैं? वे हुर्रियत कान्फ्रैन्स के लोग हैं। डाउनटाउन कश्मीर के ही गुंडों ने इकट्ठे होकर हुर्रियत कॉनफ्रैन्स बना दी। वे कहते हैं कि उनका ही ठेका है। जम्मू के लोग उनको नहीं जानते, लद्दाख के लोग नहीं जानते, कश्मीर के लोग भी नहीं जानते। वे कहते हैं कि हमें इस्लामिक कंट्री बना दीजिए, वहां सैक्यूलरिज़्म खत्म कर दो, इसकी तबाही कर दो और इसीलिए वे मीटिंग अटैन्ड करने की कोशिश करते हैं। मुझे खुशी है कि जो कोशिशें माननीय प्रधान मंत्री जी और मैडम सोनिया गांधी जी के द्वारा हो रही हैं और जिसका क्रियान्वयन होम मनिस्टर साहब कर रहे हैं, मैं यकीन से कहता हूं कि कोई किसी की परवाह किये बिना कितनी बड़ी स्पीच करता है, कितनी अंग्रेज़ी बोलता है, कितना विदेश में पढ़ा है, सारे मलिटैन्ट्स के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं और वहां वाले इन्होंने मार दिये हैं। सबकी शादियां विदेशों में जाकर करते हैं और हम इनको शादी की मुबारकबाद देते हैं कि आपने पाकिस्तान के फलां बंदे के साथ शादी करवा दी, अगर हम इसे डिसकरेज नहीं करेंगे तो उनका हौसला बढ़ता रहेगा। Fundamentalists should be crushed.  हमें इस देश को यूनाइट करना है। इसके लिए कोई कंप्रोमाइज़ करने की ज़रूरत नहीं है। इसके लिए कोई समझौता करने की जरूरत नहीं है। कोई भी, कभी भी उठकर कुछ भी लिख देता है - कभी लिख दिया जाता है कि महाराणा प्रताप सिंह नहीं थे, राजा रामचंद्र नहीं थे, कृष्ण भगवान नहीं थे, कोई कहता है कि श्री राजीव गांधी ने यह कर दिया - लेकिन किसी की भी आज तक चमड़ी नहीं उधेड़ी गई है। जब भी किसी का मन करता है, कुछ भी लिख देता है। जो मर्जी खबरनामा बन जाता है। लेकिन आज भी वहां के लोगों का विश्वास है तो सिर्फ लोकतंत्र पर है। मैं कह सकता हूं कि हमारे सांसद, एमएलएज या सरपंच से आज भी लोग अपने काम करवाने की कोशिश करते हैं। सवाल यह है कि आप लोगों ने वहां जो नुमाइंदे भेजे है, ब्यूरोक्रेट्स हैं या दूसरे विभाग में हैं, उनकी तरफ ध्यान देने की जरूरत है। लोगों का एक्सप्लाएटेशन बढ़ा है। महोदय, बात कहां की कहां चली जाती है।

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात जल्दी समाप्त कीजिए।

चौधरी लाल सिंह : आखिर में मैं कहना चाहता हूं कि हमें जम्मू-कश्मीर को यूनाइट करना पड़ेगा। पीओके के लोग हमारे भाई हैं। वे तकलीफ में हैं। यह तकलीफ चौधरी लाल सिंह के दिल में है, जम्मू-कश्मीर के हर वाशिंदे, हर बच्चे को तकलीफ है। पीओके के लोग मर रहे हैं। हमारे भाइयों को आजाद कराइए। कोई एग्जाइल में है, मेहरबानी करके इन्हें बचाइए। पाकिस्तान किस बाग की मूली है, जो हमसे बात कर सके और हमारी स्टेट को कुचलने की कोशिश कर सके। हमारी जो मिल्ट्री है, पेरामिल्टरी फोर्सिस हैं, आर्मी है, आप उन्हें एन्करेज कीजिए, डिस्करेज नहीं। आप उन्हें कहते हैं कि कुछ मत करो। फौज ने सारी फेंसिंग तोड़ कर दीवारें बना दी हैं। आजकल बड़ी-बड़ी दीवारों के अंदर फौज रहती है। अगर फौज दीवारों में रहेगी, तो अवाम का क्या होगा? इसलिए यह बात सोचिए कि फौज क्यों दीवारों के अंदर है। इसका भी एक कारण है। वे बातें आपको सुननी पड़ेंगी।

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

चौधरी लाल सिंह : मेरी एक प्रार्थना है और मुझे इस बात की खुशी है कि यूपीए सरकार के नेतृत्व में हमारी तीनों शक्तियां बहुत अच्छा काम कर रही हैं। मैं आपको मुबारकबाद भी देना चाहता हूं क्योंकि पहली बार जम्मू-कश्मीर के लोगों को लगा कि हमारे पास हिंदुस्तानी चीफ मनिस्टर है। लोग कहते हैं कि शुक्र है कि हिंदुस्तानी चीफ मनिस्टर है। लोगों को बहुत अच्छा लग रहा है। मैं कहना चाहता हूं क जल्दी ही सारा मसला ठीक हो जाएगा। आप किसी बात की परवाह मत कीजिए। होम मनिस्टर साहब, सारे जम्मू-कश्मीर के लोग आपके साथ हैं, लेकिन हमारे जिन लोगों ने जम्मू-कश्मीर के लिए कुर्बानियां दी हैं, उनके लिए आप कुछ नहीं करते हैं। जो एसपीओज़ है, बीडीसी हैं, उन्हें कुछ नहीं दे रहे हैं। उन्होंने अपने बच्चे मरवा दिए, एसपीओज़, जिन्होंने देश के लिए कुर्बानियां दीं, एसपीओ पुलिस वाला होता है, जिसे कांस्टेबल कहते हैं, उसे सिर्फ १५०० रुपए तनख्वाह मिलती है, कभी मिलती है और कभी नहीं भी मिलती। बीडीसी जो बंदूक उठाकर आतंकवादियों से लड़ता है, आज उसके बच्चे मर रहे हैं। उनके लिए विशेष भर्ती अभियान चलाना चाहिए। आप कृषि पर भी ध्यान करें। पाकिस्तान क्या करेगा, अगर हम अपने पानी का इस्तेमाल अपनी मर्जी से करें। पाकिस्तान कौन है? हमारा पानी है, हिंदुस्तान का पानी है। पाकिस्तान बीच में कहां से आ गया? पहाड़ हमारे हैं, पानी हमारा है। वह कहता है कि वक्त गुजर गया। पहले कहते थे कि हमें बिजली बनानी नहीं आती। अब बिजली बनानी आती है। हम अपना पानी लेंगे और पूरे हिंदुस्तान में पानी देंगे। बाद में पानी पाकिस्तान जाएगा।

 

श्री अविनाश राय खन्ना (होशियारपुर) : महोदय, आपने बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रखने का मुझे मौका दिया है। मैं चौधरी लाल सिंह को बहुत-बहुत बधाई देता हूं ।

            उपाध्यक्ष महोदय, उन्होंने बड़े जोर-शोर से और बढि़या ढंग से कश्मीर की बेसिक समस्या को, कश्मीर के आम लोगों की समस्या को, जम्मू-कश्मीर प्रदेश की समस्या को सदन में रखने का काम किया है। आप जानते हैं कि पंजाब और कश्मीर का सम्बन्ध क्या है। हम दोनों पड़ोसी राज्य हैं। कश्मीर में अगर कोई घटना होती है, तो पंजाब सबसे पहले उसके बारे में जानता है। इनकी नब्ज, पहनावा, बोली, भाषा, रहन-सहन सब पंजाब से मिलते हैं, इसलिए हम जम्मू-कश्मीर को अच्छी तरह से जानते हैं।

महोदय, आज जब मुझे अपनी पार्टी की ओर से सबसे पहले बोलने के लिए कहा गया, तभी मैं समझ गया कि मुझे सबसे पहले बोलने का मौका क्यों दिया जा रहा है। महोदय, मैं बताना चाहता हूं कि जब कश्मीर के लोगों पर अत्याचार हो रहे थे, जब उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया जा रहा था, तो कश्मीर के लोगों ने कहा कि पंजाब में जाकर गुरू तेग बहादुर सिंह जी से इस बारे में कहा जाए और उनसे मदद प्राप्त की जाए। तब कश्मीर के लोग, पंजाब में हमारे नौवें गुरू तेग बहादुर जी के पास आए और उनके सामने अपनी समस्या रखी कि कश्मीर में हमारा जबर्दस्ती धर्म-परिवर्तन किया जा रहा है तथा निवेदन किया कि हमारी मदद की जाए, उन्होंने कहा कि आज इस देश को किसी महान् व्यक्ति की शहादत की जरूरत है। उनके एक नौ वर्षीय पुत्र गुरू गोविन्द सिंह थे, जिनका बचपन का नाम गुरू गोविन्द राय था। जब उन्हें यह बात पता लगी, तो उन्होंने कहा कि पिताजी आपसे अच्छा और महान् व्यक्ति इस जगत में और कौन हो सकता है। उसके बाद, हम सब जानते हैं कि गुरू तेग बहादुर जी ने कश्मीरियों के लिए, दिल्ली के चान्दनी चौक में अपना बलिदान दिया था।

महोदय, पंजाबी में एक कहावत है कि कुडुम कुपत्त भले हो जाए, लेकिन ग्वांडी कुपत्त नहीं होना चाहिए। हम दोनों पड़ोसी एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं और समझते हैं। कश्मीर में भूचाल आया, तो मैं खुद पंजाब से राहत-सामग्री लेकर मदद करने के लिए कश्मीर गया, लेकिन हमें बॉर्डर पर रोक दिया गया। हमसे कहा गया कि हमारी सरकार ने मदद के लिए सामग्री लाने पर रोक लगाई है, इसलिए हम इसे बिना टैक्स के बॉर्डर क्रॉस नहीं करने देंगे। टैक्स चुकाओ और ले जाओ। हमारे पार्टी के बड़े नेताओं ने जब बात की, तब कहीं जाकर हमें राहत सामग्री के साथ बॉर्डर क्रॉस करने दिया गया। हमारे मन में था कि हम कश्मीर के लोगों की इस विपत्ति के समय में सहायता करें, इसीलिए हम वहां गए।

महोदय, अगर हम हिन्दुस्तान को पूरी दुनिया के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो दुनिया में जितनी भी इंटरनल और एक्सटर्नल टैररिज्म में एक्सपर्ट लोग हैं या सिक्योरिटी एजेंसियां हैं, उनके अनुसार जो मोस्ट अफैक्टेड कंट्री है, वह इंडिया है। हिन्दुस्तान में १९९४ से लेकर २००५ तक, कम से कम ५० हजार लोगों की जानें टैररिज्म ने ली हैं। मैं साउथ एशिया टैररिज्म पोर्टल पर सर्च कर रहा था, तो मैंने देखा कि की इसी प्रकार का सर्वेक्षण करने वाली एक संस्था एस.ए.टी.पी. है। उसने एक सर्वे कर के बताया है कि हिन्दुस्तान में १९९४ से लेकर जून, २००५ तक टैररिज्म की घटनाओं में २३९५५ टैररिस्ट्स, १९६६२ सवलियन और ७३२० सिक्योरिटी फोर्सेस के लोग मारे गए हैं। बहुत से अन्य देशों में भी यह समस्या हैं, जिनमें यू.एस.ए., यू.के., इजरायल और श्रीलंका आदि शामिल हैं, लेकिन सबसे ज्यादा टैररिज्म की समस्या भारत में है और भारत में भी जम्मू-कश्मीर में है। हमारे सिक्योरिटी एनैलिस्ट, श्री उदय भास्कर ने पाइंट आउट किया है कि टैररिस्ट्स इंसीडेंट्स दुनिया में सबसे ज्यादा हिन्दुस्तान में हुए हैं। लंदन की इंटरनैशनल सिक्योरिटी इंस्टीटयूट ने रिसर्च स्टडी कर के बताया है कि १८ हजार के करीब पोटेंश्यल टैररिस्ट्स हैं, जिनकी टैररिज्म फैलाने में कमांड है और वे दुनिया के ६० देशों में टैररिज्म एक्टीविटीज बढ़ाने में लगे हुए हैं। वे भारत में कितने हैं, हम सब यह जानते हैं।

अभी लाल सिंह जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा कश्मीर के बारे में उठाया। मैंने इनसे भी बात की थी, इनके साथ मदन लाल जी बैठे हैं, उनसे भी बात की थी। इनको मैंने पत्र भी लिखे थे और वह मैटर मैंने नियम ३७७ में भी उठाया और उसका जवाब भी आया। माननीय होम मनिस्टर यहां बैठे हैं, मैं इनसे निवेदन करूंगा कि जम्मू-कश्मीर के उन लोगों को, जो जम्मू में अभी भी रिफ्यूजी बनकर बैठे हैं, आज देश के ५९ साल आजादी के हो गये हैं, अभी भी वे लोग असेम्बली में वोट नहीं डाल सकते। अगर वे वोट नहीं डाल सकते, न वे पंच बन सकते हैं, न सरपंच बन सकते हैं, न ब्लाक समति के मैंबर बन सकते हैं, न एम.एल.ए. बन सकते हैं, अगर वे नहीं बन सकते तो फिर उनको कौन पूछेगा? यहां तक कि जब मैं वहां उनकी कांफ्रेंस में गया तो लोगों ने बताया कि उनका जो अपना काम था, कई बार वे रेहड़ी लगाकर भी कर लेते थे, लेकिन आज सरकार ने उनसे पूछना शुरू कर दिया है कि अगर आपके पास स्टेट सबजैक्ट है, आपके पास राइट टू वोट है, आप जम्मू-कश्मीर के नागरिक हैं, तब तो आप रेहड़ी लगा सकते हैं, नहीं तो न तो आपके बच्चों को गवर्नमेंट स्कूल में एडमीशन मिलेगा, न गवर्नमेंट कालेज में एडमीशन मिलेगा तो वे सपना भी नहीं ले सकते कि वे मैडीकल कालेज में जायें या इंजीनियरिंग कालेज में जायें। लाल सिंह जी ने सच कहा है कि उनके एक लाख परिवार हैं, एक लाख परिवार का मतलब चौथी पीढ़ी आज आ चुकी है। ३-४ लाख लोगों के पास स्टेट सबजैक्ट नहीं है, आज वे जम्मू-कश्मीर में राइट टू वोट के लिए लड़ रहे हैं ताकि वे विधान सभा में वोट डाल सकें और अपने को रिप्रेजेण्ट कर सकें, उनको वोट का राइट नहीं है। इसलिए सारे हिन्दुस्तान के जितने पाकिस्तान से लोग आये थे, उनको राइट टू वोट है, क्या यह हयूमन वायलेशन नहीं है, क्या यह माइनोरिटी के खिलाफ एक वायलेशन नहीं है। क्या ये १० लोग बैठे हैं, उनके खिलाफ वायलेशन नहीं है? मैं आपसे निवेदन करूंगा कि उन लोगों के मामले में आप इण्टरवीन करिये। लाल सिंह जी, वहां आपकी सरकार है, आप इण्टरवीन करिये और कम से कम उन लोगों को राइट टू वोट दीजिए, स्टेट सबजैक्ट बनाइये।

अफसोस की बात है कि १२० दिन से वे लोग जंतर-मंतर के ऊपर बैठकर धरना दे रहे हैं, लेकिन किसी भी नेता ने जाकर उनसे नहीं पूछा कि आपका समस्या क्या है, हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं।…( व्यवधान) इसीलिए आपने यह मुद्दा उठाया, मैं आपको धन्यवाद देता हूं। कृपया उनकी बात को ध्यान में रखते हुए उनको राइट टू वोट जरूर दिया जाये।

मैं आपके नोटिस में एक और बात लाना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं के बहुत से धार्मिक स्थान हैं, उनमें से एक श्री अमरनाथ जी है। जब अमरनाथ जी की यात्रा शुरू होती है, सिर्फ दो महीने की वह यात्रा है, वह जून में शुरू होगी और अगस्त में खत्म हो जायेगी, लेकिन यात्रियों के साथ कई बार जो व्यवहार होता है, वह निन्दनीय है। मैं आपसे निवेदन करूंगा, क्योंकि पंजाब से बहुत सारे लोग वहां लंगर लगाने जाते हैं तो क्या किया जाता है कि आप हर साल आओ और लंगर की परमीशन लो। एक आदमी मालेरकोटला से श्रीनगर जायेगा, वहां आफिसर नहीं मिलेगा तो वापस आयेगा। दूसरी बार फिर बुलाएंगे तो कृपया एक प्रबन्ध कीजिए कि जो परमानेण्ट सही मायने में लंगर लगाते हैं, उन लोगों को हर साल परमीशन लेने की जरूरत न पड़े, इससे एक बहुत बढि़या मैसेज हिन्दू समाज में जायेगा, क्योंकि वे लोग भावना से जाते हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं, क्योंकि मैं हर साल उस यात्रा में जाता हूं और एक आम यात्री बनकर जाता हूं तो मैं समझता हूं कि वहां यात्रा में जाते हुए लोग क्या-क्या डिफीकल्टीज़ फेस करते हैं। अभी सरकार ने फैसला किया है कि जो लंगर लगाने वाले लोग थे, वे अपने लंगरों में जो यात्री आते थे या जो डोनर्स थे, उनको वे रहने के लिए रात को स्थान दे देते थे, लेकिन वहां की सरकार ने स्टि्रक्टली उनको कहा कि नहीं, आप लोगों को अपने इन टेंट्स में नहीं ठहराएंगे। ये टेंट्स में ठहरेंगे तो उन लोगों के टेंट्स में ठहरेंगे, जिन्होंने वहां बहुत से पैसे लेकर टेंट्स लगा रखे हैं। मैं आपसे निवेदन करता हूं कि एक तो उनको लंगर की परमीशन कम से कम पांच वर्ष के लिए परमानेंट दी जाये। दूसरी बात, मैं खुद लंगर कमेटी का मैम्बर हूं। जब हम हिसाब लगाते हैं तो ४-४ लाख रुपया हमारा ट्रांसपोर्टेशन पर हर साल खर्च होता है, जो हम टेंट वगैरह लेकर जाते हैं। हम लोग २०-२०, २५-२५ ट्रक लेकर जाते हैं, इसलिए कृपया हमें श्रीनगर में कोई परमानेंट प्लेस दे दीजिए, जहां पर जो लोग सीरियसली सेवा करते हैं, वे अपना सामान वहां रख सकें। इससे भी एक बहुत बड़ा मैसेज सब लोगों में जायेगा।

दूसरी बात यह है कि कश्मीर से लगभग ५५,४७६ कश्मीरी पंडित परिवार आतंकवाद के कारण पलायन कर गए, जिनमें से २०००० के करीब परिवार दिल्ली में आ गए हैं। कश्मीर पर जो भी शांति वार्ता होती है, उसमें आप उन लोगों को तो शामिल करते हैं, जिन्होंने बंदूक उठाई है, लेकिन उन लोगों को शामिल नहीं करते हैं, जिन्होंने गोली खाई है। उन लोगों को आप नजरअंदाज करते हैं। दर्द किनके मन में ज्यादा है - जिन्होंने गोली खाई है या जिन्होंने गोली मारी है। जम्मू-कश्मीर को तोड़ने के लिए हर रोज नई-नई बातें होती हैं। जम्मू-कश्मीर इस देश का सिर है। अगर वह सिर शान से ऊंचा रहेगा और किसी के आगे नहीं झुकेगा, तो पूरा देश शान से रह सकता है। आपके साथ सारा देश है। जम्मू-कश्मीर के साथ कोई भी समझौता गिरकर हमें नहीं होना चाहिए। आप सख्ती से स्टैंड लीजिए, सारा देश आपके साथ खड़ा है। यदि आपने एक बार कड़ा स्टैंड ले लिया कि हम जम्मू-कश्मीर को बचाएंगे और जो हमारे पास से चला गया है, उसे वापिस ले कर आएंगे, इसका आपको बहुत श्रेय जाएगा और दुनिया आपको याद रखेगी कि आपने ऐसा काम कर दिया जो ५९ साल की आजादी के बाद कोई सरकार आज तक नहीं कर सकी। आप हौसला रखिए, मजबूती से यह काम कीजिए। यह काम हौसले से ही हो सकता है। जो यह कहते हैं कि यहां से मिलट्री को हटा दो, उनसे आप बात मत कीजिए, यदि मिलट्री को हटाना ही है तो उन लोगों से पूछिए जो वहां बिना सिक्योरिटी के गांवों में रहते हैं। आप उनसे कहिए कि सिक्योरिटी फोर्सिस अपना काम करेगी और लोगों की रक्षा करेगी, लेकिन जिन लोगों को गलत मारा जाता है, उन्हें नहीं मारा जाए। जब कोई आतंकवादी मारा जाता है तो हयूमन राइट्स के लोग खड़े हो जाते हैं कि अन्याय हो रहा है, लेकिन जब आम आदमी मरता है तो उन लोगों के मुंह पर ताले लग जाते हैं। आपको उन लोगों से भी बात करनी होगी ताकि सिक्योरिटी फोर्सिस अपना काम ठीक से कर सकें। इस तरह के बयानों पर पाबंदी लगनी चाहिए, ताकि सिक्योरिटी फोर्सिस का मनोबल न गिरे।

मैं एक और बात आपके ध्यान में लाना चाहता हूं। मैं एक समाचार पत्र पढ़ रहा था मैं किसी पार्टी को ब्लेम नहीं करना चाहता हूं, दो आतंकवादी जिनके नाम अताउर्रहमान और सदाबक्श अली थे, वे दोनों पाकिस्तान से संबंधित थे, उन्होंने पैनिट्रेट करके नेशनल कांफ्रेस की युवा शाखा का आइडेंटिटी कार्ड लिया हुआ था। इसी तरह से श्रीनगर का भी मामला है, जहां एक आतंकवादी प्रकोष्ठ का सदस्य वहां की युवा कांग्रेस से जुड़ा हुआ था और वह सरकारी आवास में भी रह रहा था। उसके पास भी एक आइडेंटिटी कार्ड था। मेरा निवेदन है कि सभी पार्टीज़ को चाहिए कि ऐसे लोगों को पार्टी का सदस्य बनाने से पहले उनकी पहचान कर ले, ताकि वह पार्टी और देश का नाम बदनाम न करने पाए। आतंकवादियों के पास आइडेंटिटी कार्ड होने से लगता है कि कहीं इन्होंने अपनी नीति तो नहीं बदल ली है कि वे किसी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता बनकर, आपका संरक्षण ले कर, देश के खिलाफ काम करें। इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है और मैं चाहूंगा कि आप इन बातों को ध्यान में रखें।

महोदय, मुझे लगभग हर साल वहां जाने का मौका मिलता है। लोग वहां की सिक्योरिटी फोर्सिस की और उनके व्यवहार की प्रशंसा करते हैं। जब लोग जम्मू-कश्मीर से आते हैं तो उनके मन में यह बात होती है कि अगर वहां सेना नहीं होती, तो जम्मू-कश्मीर का क्या हाल होता, यह परमात्मा ही जानता है। यह ठीक है कि घुसपैठ रोकने और आतंकवादियों को मारने का काम सेना कर रही है, लेकिन वहां के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने का काम भी सेना कर रही है। लोगों से तालमेल करके उनके मन में देश के प्रति प्यार पैदा करने का काम भी सेना कर रही है। सेना जम्मू-कश्मीर में तीन तरह की नीति पर काम कर रही है। यदि इस तरह के कोई तीन प्वायंट प्लानिंग में हैं, तो इसे और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि पंजाब में हमने देखा है कि आतंकवाद तब खत्म हुआ था, जब पंजाब के लोगों ने चाहा था कि आतंकवाद खत्म होना चाहिए। इसी तरह कश्मीर के लोगों को भी बताना होगा कि हम उनके सच्चे साथी हैं। सरहद पार बैठे हुए लोग उनके सच्चे साथी नहीं हैं। उसके लिए बहुत प्रचार की जरूरत है। सभी पोलटिकल पार्टीज के लोगों को यह काम करने की जरूरत है। मैं एक छोटी सी बात और बताना चाहूंगा। अगर कश्मीर के बारे मे देखा जाये तो वहां सब कुछ होने के बावजूद, नैशनल सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़े आये हैं कि हिन्दुस्तान के शहरों में कश्मीरी लोगों के पास सबसे ज्यादा जमीन-जायदाद है। गांवों में वे लोग पंजाब, हरियाणा के बाद तीसरे नम्बर पर हैं। आप देखिए कि कश्मीर के पास कितना पोटेंशियल है। हिन्दुस्तान में अगर कोई भी टूरिस्ट आता है, तो वह अपनी यात्रा को तब तक सफल नहीं मानता जब तक वह कश्मीर में न जाये। अगर हम कश्मीर को इतना महान मानते हैं, उसके लिए वहां से आतंकवाद निकले, लोग शांति से रहें, सुख से रहें, इसके लिए हमें एक प्लानिंग करके कश्मीर को आतंकवाद मुक्त बनाना होगा। साथ ही साथ भारत की एकता और अखंडता को हमें कायम रखना होगा ताकि कोई यह न सोचे, यह न कहे कि भारत की सरकार ने झुककर कम्प्रोमाइज किया है। हम कम्प्रोमाइज करेंगे, अगर हमें गोली का जवाब देना पड़ा, तो हम गोली से उसका जवाब देंगे, अगर हमें प्यार से कोई बात करनी है, तो हम प्यार से करेंगे लेकिन अगर हमने हथियार डाल दिये तो समझ लीजिए कि हमने कश्मीर को नष्ष्ट कर दिया।

उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं माननीय गृह मंत्री जी से कहूंगा कि जब वे इस डिबेट का जवाब दें, तब धरने पर बैठे हुए लोगों के बारे में भी चंद शब्द कहें। इतना कहते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

मोहम्मद सलीम (कलकत्ता-उत्तर पूर्व) : उपाध्यक्ष महोदय, चौधरी लाल सिंह जी ने जो मुद्दा उठाया है, उसका विषय है --

“Outcome of the Round Table Conference held between the Prime Minister, various political parties and Kashmiri leaders on 25.2.2006 to promote peace in Jammu and Kashmir.”    I will restrict myself to the topic of discussion.  We are not discussing the whole gamut of the Kashmiri problem.  The House has repeatedly discussed it and we are not discussing other things which have already been mentioned by some of my colleagues.  I will restrict myself to the topic under discussion.  प्रधान मंत्री जी केराउंड टेबल डिसकशन में जो ओपनिंग रिमाक्र्स थे, उसी से मैं अपनी बात शुरू करूंगा। This Round Table is about sharing ideas.  वैसे हम सब जानते हैं कि राउंड टेबल डिसकशन में कोई भाषण नहीं दिया जाता। उसमें न ऑडिएंस होती है और न ही कोई स्पीच होती है। उसमें सभी लोग अपनी-अपनी बातों को शेयर करना चाहते हैं। But, as I said, I want to quote from the speech of the Prime Minister in the Round Table Conference. “A process is to start once this Round Table ends.” चौधरी लाल सिंह जी ने आज यही विषय चुना है कि उससे नतीजा क्या निकला?  चूंकि हम समझते हैं और शुरू से हमारी पार्टी यही बात कहती रही है कि कश्मीर का जो मामला है. वह गोली से नहीं बल्कि बोली से हल होगा - चाहे मलिटेंटसी की गोली हो, सिक्योरिटी फोर्सेज की गोली हो या सीमा के आर-पार की गोलियां हों। वे कई राउंड चल चुकी हैं। उसमें हजारों मासूम लोगों की जानें गयी हैं। बहुत से लोगों ने मुल्क की हिफाजत के लिए कुर्बानियां दी हैं, शहादत दी हैं। वहां हमारी और दूसरी पोलटिकल पार्टीज के नौजवान साथियों को भी इस हालत का शिकार होना पड़ा है। इसलिए हम समझते हैं कि जैसे गोली कई राउंड चली हैं, उसी तरह बोली भी कई राउंड चलेगी। ऐसा नहीं है कि एक राउंड टेबल पर डिसकशन हो गया और हम होम मनिस्टर साहब से पूछें कि इसका क्या नतीजा निकला ?  इस राउंड टेबल डिसकशन का भी प्रौसेस चलना चाहिए। हमारी समझ है कि इस राउंड टेबल डिसकशन से पहले बहुत सा होम वर्क, ग्राउंड वर्क करने की जरूरत है। मुझे अफसोस है, मैं ताकीद करता हूं कि राउंड टेबल डिसकशन जो २५, फरवरी को नई दिल्ली में बुलाई गयी थी, उसकी कामयाबी के लिए जो होम वर्क, ग्राउंड वर्क हमें करना चाहिए था, उसमें कुछ हद तक खामी थी जिसकी वजह से जो आइडियाज शेयर करने की बात है, हम जिनके साथ कर शेयर रहे हैं, चूंकि कश्मीर का मामला उलझा हुआ मामला है। It is complex.  The problem is also very complex.  It requires some multi-pronged and multi-layered approach. एक रोज में एक बात नहीं होगी। इसलिए पहले तो हम आइडियाज शेयर करेंगे। मकसद यह था कि हमारी मेन स्ट्रीम में इलेक्टेड पोलटिक्स है, उसके बाहर के जो लोग हैं, उनको साथ में किस तरह से बुलाएं ? जो इलेक्टेड असैम्बली है, अगर मेनस्ट्रीम पोलटिकल प्रोसैस की बात है, There is an elected Assembly. इलेक्टेड असैम्बली में ऑटोनॉमी रिजोल्यूशन पास हुआ। खुद एनडीए के हिस्सेदार जिनकी वहां हुकूमत थी, आपके घटक थे लेकिन वे उस समय बात करने के लिए तैयार नहीं हुए। कश्मीर के लोग यह देखें। यह तो राउंड टेबल है, मेनस्ट्रीम में जो पोलटिकल प्रोसैस है कि जो उनके साथ हैं और जो उनके साथ नहीं हैं, उनको भी हम साथ में लाना चाहते हैं, उनकी बात भी हम शेयर करना चाहते हैं। चूंकि यह बात सदन में हो गई है, हम केवल यह कह दें कि बाकी सब लोग बेकार हैं, हुर्रियत बेकार है, ऐसे नहीं होगा।

हमारी यह समझ है कि जो सेपरेटिस्ट भी हैं, जो मलिटेंट्स भी हैं, हम शुरू से यह बात कहते आए हैं कि वामपंथी लोगों के अंदर भी अलग-अलग लेयर है। हम एक ब्रश से पेंट नहीं कर सकते। उनके अंदर भी कुछ हार्ड आइडियाज के विचार के हैं और कुछ मॉडरेट्स हैं। हम पहले यह कहते थे तो मजाक समझा जाता था लेकिन आज हकीकत में देख रहे हैं। लेकिन हमें उन्हें इस बातचीत में शामिल करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। अगर हम उनको भी इन्वाइट करते हैं क्योंकि दुनिया के कभी इस्लामाबाद में, कभी लंदन में, कभी अमेरिका में एक के बाद एक डॉयलॉग होते हैं तो वे उनमें हिस्सेदारी करते हैं और जब नई दिल्ली में यह मौका मिला तो वे कहते हैं कि हमारी बात कोई सुनने वाला नहीं है। लाल सिंह जी कश्मीरियों को कहते हैं कि भारत सरकार हमारी बात नहीं सुनती। जब प्रधान मंत्री जी ने यह दावत दी तो उन्हें हिस्सेदारी करनी चाहिए थी। उनके लिए यह अच्छा मौका था जो उन्होंने छोड़ा। लेकिन यह प्रोसैस कभी खत्म नहीं होती। It is a protracted process. This protracted process of dialogue should be on. उसमें उन पर भी दबाव होना चाहिए और उसके लिए वहां जम्मू-कश्मीर में मूवमेंट होना चाहिए। It is not just a question of lectures or theatrics.  It is a serious political process.  चूंकि हम मलिटेंसी का मुकाबला करते हैं और बंदूक और औजार लेकर जो लोग आते हैं चाहे सीमा के उस पार से लेकर आएं, हमारी सिक्योरिटी फोर्सेज उनका मुकाबला कर सकती हैं लेकिन the mind behind the machine, the mind behind the arms and ammunitions,  उनका कौन मुकाबला करेगा ? हम चाहे धर्म की मिलावट साथ में लेकर बातचीत करें लेकिन वहां के नौजवानों के अंदर कुछ ऐसे विचार पैदा किये जाएं जिससे कि वे यह समझें कि पोलटिकल प्रोसैस के जरिए ही यह लड़ाई लड़ी जा सकती है। It should be backed by them. दोनों को हम कम नहीं कर रहे हैं लेकिन यहां पर हमारा कंफ्यूजन यह है कि हम पूरी एडमनिस्ट्रेटिव मशीनरी ब्यूरोक्रेट्स, एडवाइजर्स और जो सिक्योरिटी फोर्सेज है, उनके ऊपर लेबर करके कश्मीर के मामले का हल करते हैं तो हमें बार-बार फेलियर का सामना करना पड़ रहा है और यदि ऐसा ही रहा तो आगे भी करना पड़ेगा। It is a political process. वहां इलेक्टेड गवर्नमेंट है। हमारे यहां पहले कैबिनेट के मनिस्टर श्री गुलाम नबी आजाद साहब थे। I can quote Shri Ghulam Nabi Azad. He said:    “Invitation to this Round Table is not exclusive.  It should be inclusive. ”  इस मुल्क में जो भी लोग हुकूमत के साथ बात करने के लिए तैयार हैं, नई दिल्ली के साथ बात करने के लिए तैयार है, हमें उन्हें दावत देनी चाहिए। सिर्फ दावत देने से नही कि एक जूनियर लैवल के आई.बी. ऑफिसर से हिंट मिला और उन्होंने कहा कि आप आ जाओ। ऐसा भी नहीं होना चाहिए। इसीलिए मैं पोलटिकल प्रोसैस कह रहा हूं। मैं खासकर माननीय गृह मंत्री जी से कह रहा हूं। अगर माननीय प्रधान मंत्री जी दावत दे रहे हैं और उससे वे इंकार करते हैं तो सीरियसनैस से दावत होनी चाहिए थी। उस तरह से उस प्रोसैस को फोलो करना चाहिए था। How do you rope them in? Invite them.  Take them along.  We want all of them to be on board, not automatically.

गृह मंत्री (श्री शिवराज वि. पाटील) : कैसे ? किस तरह से करनी चाहिए ?…( व्यवधान)  

मोहम्मद सलीम : मैं इसी विष्षय पर बोल रहा हूं, आप बाद में जवाब दें। …( व्यवधान)  पोलटिकल प्रोसैस का मतलब है कि आप इसमें पोलटिकल पर्सनैलिटीज को शामिल करें। पिछली सरकार ने भी यही किया था। उन्होंने इसे नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर के ऊपर नहीं छोड़ा था और यूपीए सरकार भी इसे सिक्योरिटी एडवाइजर के ऊपर नहीं छोड़ सकती है।…( व्यवधान)   चूंकि आप डिटेल्स मांग रहे हैं, उदाहरण के लिए मैं कहना चाहता हूं कि प्राइम मनिस्टर साहब वहां गए हैं, कई बार गए हैं, यह एक अच्छी बात है, यह अच्छा संकेत है कि वह वहां गए और उन्होंने २४०० करोड़ रूपए का इकोनोमिक पैकेज घोषित किया था। यह कोई भाषणबाजी नहीं थी। उस वक्त के चीफ मनिस्टर ने भी यह बात कही कि उनको मॉनीटर किया गया, उनको वहां तक ले जाया गया। इसका स्वागत है।  इससे वहां के लोगों को एक संदेश जाता है, इससे परेशानीतो हल नहीं होती है, लेकिन माहौल क्लियर होता है। जब आप उसकी इम्प्लीमेंटेशन और मानीटरिंग के लिए पीएमओ में एक काउंसिल - इकोनोमिक एडवाइजरी काउंसिल फार जम्मू एण्ड कश्मीर - बना सकते हैं, तो क्या आप पोलटिकल डायलॉग प्रोसैस को अनलीश करने के लिए, उसे खींच कर आगे ले जाने के लिए, चूंकि प्रधानमंत्री जी खुद कह रहे हैं कि this process should continue. It should not end with Round Table, तो आप अपने लोगों को लेकर, एक्सपट्र्स को लेकर एक काउंसिल क्यों नहीं बना सकते हैं? अगर फारूक अब्दुल्ला साहब, जम्मू-कश्मीर के फॉर्मर चीफ मनिस्टर, वहां नहीं आते हैं, तो देखना पड़ेगा कि वह क्यों नहीं आते हैं। हुर्रियत के लोग, जो अलग से आकर मिलते हैं, फॉर्मर मलिटेंट्स आकर मिलते हैं, प्राइम मनिस्टर से मिले हैं, लेकिन जब राउण्ड टेबल डिस्कशन हो रहा है, तो वे नहीं आए? ऐसा क्यों है, मैं इसका कोई रेडीमेड जवाब तो नहीं दे सकता हूँ। मंत्री जी को इसका जवाब स्वयं ढूंढना होगा कि आखिर ऐसा क्यों है कि वे लोग जनवरी में आकर अकेले में मिलते हैं, लेकिन राउण्ड टेबल डिस्कसन में क्यों नहीं आते हैं? ऐसे लोगों को बातचीत में लेना पड़ेगा। मैं लाल सिंह जी की बात पर ही कह रहा हूँ जो कह रहे थे कि जो लोग नहीं आए, उनको छोड़िए। हमारे यहां भी हार्ड लाइनर्स हैं, जो कहते हैं कि हम अपने तरीके से कर लेंगे। ऐसे नहीं होता है। यह जो काम्पलेक्स्ड प्राब्लम है, उसे हल करने के लिए हमें उनकी फीलिंग्स को एस्वेज करना होगा।प्राइम मनिस्टर खुद वहां गए हैं। मैंने यह बात तफसील से इसलिए कही है क्योंकि राउण्ड टेबल की कामयाबी के लिए यह आवश्यक है। हालांकि कामयाबी शब्द को मैं उस तरह से प्रयोग नहीं कर सकता हूँ, जिस तरह से उम्मीद थी। कश्मीर के सम्बन्ध में जब कोई इस तरह का कदम उठाया जाता है, तो उससे एक उम्मीद तो पैदा होती है, लेकिन अन्तत: वह मायूसी में तब्दील हो जाती है, जो खतरनाक है। इसलिए मैं समझता हूँ कि यह प्रासैस चलनी चाहिए। इसके लिए हम पहले भी कहते रहे हैं और फिर कह रहे हैं कि broaden this dialogue process. We have to broaden this dialogue process. प्रधानमंत्री जी ने भी यही कहा था और यही राउण्ड टेबल का मकसद भी है।

कश्मीर के लोगों को हिन्दुस्तान की ओर से, इकोनोमिक पैकेज के साथ ही, पोलटिकल मैसेज भी यही है। अगर सेकुलर, मजबूत, अमन वाली इण्डिया है, जहां हर धर्म, मजहब और सूबे के लोग एक साथ रहना पसन्द करते हैं और तरक्की की राह पर चल रहे हैं तो कश्मीर में कश्मीरी मलिटेंट्स का और उनके मददगारों का कैम्पेन ही खत्म हो जाता है।लेकिन अगर यहां पर तनाव होता है, लोग कहते हैं कि यहां सभी लोग एक ही रंग के हों, बाकी नहीं होंगे, तो उसका गलत मैसेज जाता है। सेकुलर इण्डिया, डेमोक्रेटिक इण्डिया, इकोनोमिकली प्रोग्रेसिंग इण्डिया ही हमारा यूएसपी है। हमारा जैसा फेडरल स्ट्रक्चर है, हम जैसा डिसेन्ट्रलाइजेशन कर रहे हैं, उसमें उनको जिस तरह से अथारिटी मिलती है, उसका एक अच्छा संदेश जाता है। हम देखते हैं कि पार्लियामेंट में हंगामा हो जाता है। जब कोई पोलटिकल पार्टी सरकार में होती है तो एक तरह से बात करती है और जब वे सरकार से निकल जाते हैं तो अलग तरह की बात करने लगते हैं। जब हम पाकिस्तान से बात कर सकते हैं, तो क्या हम अपने कश्मीरियों से बात नहीं कर सकते हैं?हमने उस वक्त भी यह बात कही थी जब आपकी सरकार थी और आज भी हम वही बात कह रहे हैं कि केवल थिएटि्रक बयान देने से काम नहीं होता है। हमें उनके साथ बात-चीत जारी रखनी होगी। आपको खुश होना चाहिए कि यह प्रोसैस एनडीए के समय में शुरू हुई थी और हमने भी उसे सीमित नहीं किया है। यह काम एक दिन में नहीं होता है। यह एक लम्बा सफर है और हमें उसे तय करना है। मैं समझता हूँ कि आज यूपीए सरकार के आने से मुल्क में बड़ा साजगार माहौल बना है, लोगों में भरोसा आया है।कश्मीर के लोगों को प्रधानमंत्री जी ने और यूपीए सरकार ने जो मैसेज दिया है, उससे एक अच्छा माहौल बना है और कश्मीर में जो हार्डलाइनर्स हैं, जो हिन्दुस्तान से एकता नहीं चाहते हैं, उनको आइसोलेट करने की प्रोसैस भी चलनी चाहिए, जो हिन्दुस्तान के साथ नहीं रहना चाहते हैं। इसके साथ ही आटोनॉमी, आर्टिकल ३७० आदि बातें आ रही हैं। आपका कहना है कि हम आटोनॉमी देना चाहते हैं। “I have to make a road map.”  We have to make others understand it.  जब हम डायलाग में जाते हैं, You have to prepare yourself. Do not say the process is with us.  इससे वे क्या समझ रहे हैं, सबकी अंडरस्टेंडिंग होती है। भारत सरकारचाहे एनडीए सरकार हो या यूपीए सरकार, यह देखा जाना चाहिए कि हम कितनी आटोनॉमी देना चाहते हैं, यह साफ होना चाहिए और डायलाग प्रोसेस के अंदर होना चाहिए कि वे कितनी चाहते हैं। इस तरह से अगर हम एक जगह पर जाते हैं, जहां दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें वाली बात होती है, तब एक मीटिंग पाइंट होता है। यह एक डैमोक्रेटिक प्रोसेस है, इसे जारी रहना चाहिए। यह एक पोलटिकल प्रोसेस है। Involvement of the politicians, involvement of the political mind, involvement of the political will is a must. यह होना चाहिए। सिर्फ आप इसे सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दा समझेंगे, तो सही नहीं होगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह प्रोसेस आगे बढ़ेगा और यूपीए सरकार इसे आगे बढ़ाएगी। लेकिन हमारी मांग है कि आप इसे आगे बढ़ाते हुए मेजर पोलटिकल इनीशियएटिव्स समझें, और इसके बीच-बीच में गैप नहीं होना चाहिए, कंटीन्यूअस रहना चाहिए। प्रधान मंत्री जी खुद करें, जरूरत पड़े तो श्रीनगर में होना चाहिए और अगर जरूरत पड़े तो इस्लामाबाद में हो, वहां होना चाहिए। हम उम्मीद कर रहे हैं कि वार्ता का अगला दौर जरूर होगा और कहीं भी हो, वह होना चाहिए। इसके अलावा जो बाकी लोग छूट गए हैं, उन्हें भी साथ लेकर, सबको साथ लेकर आगे बढ़ें। It should be inclusive of all.

                                                                                                                                                                                                                                                                       

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) : माननीय उपाध्यक्ष जी, मैं चौधरी लाल सिंह जी द्वारा नियम १९३ के अंतर्गत शुरू की गई चर्चा में भाग लेने के लिए खड़ा हुआ हूं। जम्मू-कश्मीर में शांति को बढ़ावा देने के लिए २५ फरवरी, २००६ को माननीय प्रधान मंत्री जी ने वभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ दिल्ली में गोलमेज बैठक बुलाई थी। हम उस पर चर्चा कर रहे हैं। मैं भाई लाल सिंह जी को बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने अपने भाष्षण के दौरान अपने की बात कही, जो दिल में दर्द था जम्मू-कश्मीर के बारे में और उसके प्रति वह कितने चिंतित हैं, यह उन्होंने विस्तार से यहां रखा।

17.42 hrs.                           (Dr. Satyanarayan Jatiya in the Chair) उस सम्मेलन में करीब ४० या ५० समूहों के लोग थे, जिसमें बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध लोग भी थे और जम्मू, कशमीर, लद्दाख, कारगिल के प्रतनधि भी थे। इसके साथ ही उस सम्मेलन में कश्मीरी पंडित, गुर्जर और कुछ पहाड़ी लोग भी थे। जैसा माननीय सदस्य ने कहा कि कुछ अलगाववादी नेता इस सम्मेलन में नहीं आए। उस बारे में सलीम साहब ने बड़े विस्तार से कहा। मैं सुझाव के तौर पर यही कहूंगा कि अगर प्रधान मंत्री जी के सम्मेलन में वे नहीं आए, तो कम से कम गृह मंत्री जी या गृह राज्य मंत्री जी वहां जाकर उनसे वार्ता करें। प्रधान मंत्री जी वहां कई बार गए हैं इसलिए वार्ता का सिलसिला जो शुरू हुआ था किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए, बात को अंजाम देने के लिए, वार्ता की उस मुख्य धारा में उन्हें जोड़ने के लिए हमें उनसे भी बात करनी चाहिए। मेरे खयाल से तब जाकर सफलता मिलेगी। अचानक वभिन्न समूहों या दलों को बुला लिया, तो कई बातें ऐसी होती हैं जो अलगाववादी जानते हैं, लेकिन उनके नेता कह नहीं पाते। वे इसलिए कह नहीं पाते कि पता नहीं क्या होगा, लोग क्या सोचेंगे। इसलिए उनके दिल में क्या है, वे इस तरह से कह नहीं पाते। अत: उनको धीरे-धीरे वार्ता की मुख्य धारा में लाना चाहिए।

जहां तक जम्मू-कश्मीर की समस्या है, यह कोई छोटी समस्या नहीं है। यह एक बड़ी और राष्ष्ट्रीय समस्या है। यह राष्ट्र का विषय भी है। कश्मीर भारतवर्ष का अभिन्न अंग रहा है। हमारे पूर्वजों ने इसे अपने खून से सींचा है और इतनी जल्दी कश्मीर को नहीं छोड़ सकते। लेकिन हमें पहचान बनानी पड़ेगी कि कौन से वे लोग हैं, जो हिन्दुस्तान की मुख्य धारा में हैं और कश्मीर के विकास के लिए या उसकी समस्या के लिए चिंतित हैं। उनकी ओर हमें ध्यान देना पड़ेगा।

इस सम्मेलन में वभिन्न नेताओं के विचारों और सुझावों को प्रधान मंत्री जी ने बड़ी उत्सुकता और बेसब्री से इंतजार करके सुना और चाहा कि वे अपनी समस्या बताएं । उसी तरह से यूपीए सरकार के एजेंडे में भी जम्मू-कश्मीर समस्या का समाधान पहले स्थान पर है और सरकार उसके लिए चिंतित भी है। वहां सामाजिक सौहार्द्र बनाने की जरुरत है। वहां बहुत से अलगाववादी नेता हैं जो देश की मुख्यधारा से अलग हटे हुए हैं, उन्हें भी मुख्यधारा में लाने की बात है। हमारे प्रधान मंत्री माननीय मनमोहन सिंह जी बधाई के पात्र हैं, उन्होंने कई बार वहां का दौरा किया है और वहां के विकास के लिए करोड़ों रुपये का पैकेज भी दिया है। वहां का प्राथमिक विकास और उत्थान की बात की गयी है और आर्थिक सलाहकार परिषद् का गठन किया गया है।

कश्मीर में भूकम्प आया तो उनके पुनर्वास और राहत की बात को हमारे प्रधान मंत्री जी गंभीरता से ले रहे हैं। माननीय लालसिंह जी चिंतित रहते हैं कि यूपीए सरकार ने एक लाख मकान बनाने की बात कही है तो कुछ मकान तो जरुर दें, ताकि जो लोग भूकम्प-पीड़ित हैं, जिनके सिर पर छत नहीं है उनको आवास मिले और वे महसूस कर सकें कि हिंदुस्तान की सरकार ने उनके लिए कुछ किया है।

वहां पर कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी घटी हैं। हमारे ४ नवयुवक सुरक्षा-बलों के हाथों मारे गये। वहां प्रदर्शन हुआ। ऐसी न जाने कितनी घटनाएं घटी हैं जिनमें हजारों लोग मारे गये हैं। जब मुख्यधारा से जुड़े हुए लोग मारे जाते हैं तो सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए और इस बात की भी कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

जम्मू-कश्मीर में हमें एकता और संपन्नता का माहौल बनाना चाहिए। कश्मीर की अपनी सभ्यता और संस्कृति है जो हिंदुस्तान से मिली-जुली है। उनको घावों पर मलहम लगाने की आज जरुरत है।

हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी श्रीनगर भी गये थे और उन्होंने वहां के विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ भी वार्ता की और उनको भी मुख्यधारा में लाने का काम किया। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में शांति, संपन्नता और खुशहाली आये और वहां के युवकों की ताकत से कश्मीर का निर्माण हो, जिससे लगे कि कश्मीर भी अपनी एकता से शांति के माहौल को निर्मित करने के लिए कुछ कर रहा है।

कई बार देखा गया है कि लेह-कारगिल-कठुआ और सौपोर के विचार अलग-अलग हैं और वहां कुछ लोग ऐसे हैं जो घुसपैंठ करते हैं। जैसे माननीय लालसिंह जी ने कहा कि कुछ लोग इधर से उधर और उधर से इधर की जय-जयकार करते हैं। लखनपुर से कारगिल और कठुआ तक के सभी लोग एक हैं। जम्मू-कश्मीर में आजादी के समय तमाम लोग हिंदुस्तान से पाकिस्तान गये और पाकिस्तान से यहां आये। वहां उन्हें पाकिस्तान की सरकार ने रहने की जगह दे दी, मालिकाना हक दे दिया, लेकिन वहां से जो लोग इधर आये, आज आजादी के ५८ सालों के बाद भी वे जिन इमारतों में रह रहे हैं उन पर उन्हें मालिकाना हक नहीं दे पाये हैं।

जब भी पश्चिमी देशों से राष्ट्राध्यक्ष आते हैं तो घाटी में अशांति की घटनाएं घटती हैं। ऐसा लगता है कि उनके जरिए विश्व को यह संदेश देने की कोशिश की जाती है, कि कश्मीर में सामान्य स्थिति नहीं है। इस ओर भी हमें विशेष ध्यान देना पड़ेगा। खासकर इस सदन में जब यह चर्चा हो रही है, तो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हमें कश्मीर की समस्याओं की तरफ, हर दल के लोगों को सोचना पड़ेगा और आगे आना पड़ेगा कि किस तरह से वहां अमन, चैन और शांति हो और कश्मीर को हम एक शांत कश्मीर बना सकें।

इन शब्दों के साथ, महोदय मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।

श्री रघुनाथ झा (बेतिया) : सभापति महोदय, सबसे पहले मैं भाई लाल सिंह चौधरी जी को बधाई देना चाहता हूं कि आज सदन के सामने, आजादी से लेकर आज तक जिस तरह कश्मीर समस्या हमारे सामने आई है, और माननीय प्रधानमंत्री जी ने वहां शांति, अमन ओर विकास के लिए गोलमेज कांफ्रेंस आयोजित की, इस संबंध में उत्पन्न स्थिति के बारे नियम १९३ के तहत चर्चा की इन्होंने शुरूआत की, उसके लिए मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूं। हम लोग बाहर से सुनते हैं और देखते हैं, लेकिन भाई लाल सिंह और उनके साथी जो वहां के निवासी हैं, उस इलाके के रहने वाले हैं, उन्हें इन समस्याओं को झेलना पड़ता है, इसलिए उन्होंने अपने दिल के दर्द को बखूबी इस सदन के समक्ष प्रस्तुत करने का काम किया है।

जब देश आजाद हुआ था, देश के पांच सौ से अधिक राजे-रजवाड़े इंडियन यूनियन में अपना विलय कर रहे थे और उसी समय कश्मीर का भी हिंदुस्तान में परिस्थितिवश विलय हुआ। विलय होने के बाद इस देश ने, संसद ने और देश के रहनुमाओं ने कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इस बारे में कोई चर्चा हम नहीं कर सकते। इसके ऊपर अगर कोई सवाल उठेगा, तो हम उसे मानने के लिए तैयार नहीं है। हां, जो कश्मीर पाकिस्तानियों के कब्जे में है, उसके बारे में आज चर्चा होनी चाहिए। महोदय, मैं जानना चाहता हूं कि आज देश की आजादी से लेकर ५८ सालों तक, क्या देश ने इस दिशा में कोशिश नहीं की? सभी सरकारों ने अपने-अपने स्तर से कश्मीर के साथ अच्छा संबंध बने, वहां मलिटेंसी खत्म हो, विकास की दौड़ में वह आगे आये, इसके लिए उन्होंने प्रयास किए, लेकिन आज जो कश्मीर में अलगाववादी लोग हैं, क्या वे अपने मन से इस चीज को कर रहे हैं? क्या हम वास्तविकता से इन्कार करके, देश के इस सबसे बड़े सदन में उसकी चर्चा कर रहे हैं? वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तान के इशारे पर और पाकिस्तान के उकसावे पर ये सारी घटनाएं कश्मीर में हो रही हैं।इसके लिए अगर आप सिर्फ बात करना चाहते हैं, तो आप बात करिए। हर समय बातें होती रही हैं। हम बात के प्रोसेस के खिलाफ नहीं हैं।हमारे साथी ने भी इस प्रश्न को उठाया, हम लोग लेफ्ट पार्टी के लोगों को भी जानते हैं और जिस वार्ता को प्रधानमंत्री जी इनीशिएट करें, उसमें अलगाववादी शक्ति प्रधानमंत्री जी के बुलावे पर नहीं आए, और पाकिस्तान में जाकर बात करें - क्या यह संभव है? मुझे अफसोस है कि प्रधानमंत्री जी की गोलमेज कांफ्रेंस में सेल्फ रूल या स्वायत्तता का प्रश्न उठा।किन लोगों ने इसे उठाया - जो कभी हमारे साथ बैठकर सरकार के हिस्सेदार थे, और कभी आपकी कृपा पर, आपके समर्थन पर वहां के मुख्यमंत्री बनते हैं। अगर वे केंद्र में मंत्री रहते हैं, तो उनकी बोली दूसरी रहती है और जब वे यहां नहीं होते, तो उनकी बोली दूसरी हो जाती है। इस तरह की बातें मुनासिब नहीं हैं और कश्मीर समस्या का हल इससे नहीं निकलेगा। बहुत मार्मिक ढंग से उन्होंने इसकी चर्चा की।क्या कसूर है सिख भाइयों का, जो ५०-५५ साल पहले इस देश में आए, सन् १९४७ के बाद इस देश में आए? क्या कसूर है कि १४ वर्षों से कश्मीरी पंडित जम्मू-कश्मीर में पड़े हुए हैं।उन्हें न नागरिकता मिल रही है, न रहने के लिए घर मिल रहा है, न नौकरी मिल रही है, न शिक्षा मिल रही है। हम यहां उपदेश दे रहे हैं। हम वहां वैष्ष्णो माता के दर्शन करने जाते हैं, तो बहुत से लोगों के साथ मुलाकात और वार्ता होती है। वे किस परिस्थिति में गुजर रहे हैं - इसका हमें और देश की सरकार को अन्दाज लगाना चाहिए। वे बाहर के लोग नहीं हैं, बल्कि कश्मीर वैली से आए हैं। किसी कारण से उनकी सारी जमीन ले ली गई, उनके खेत-खलिहानों और घरों पर कब्जा कर लिया। आज वे जम्मू में पड़े हैं। क्या आप उन्हें सुविधाएं नहीं दे सकते, उनके बाल-बच्चों को नौकरी नहीं दे सकते? आप किस बात के लिए डर रहे हैं, हम यह बात जानना चाहते हैं? यह मुनासिब बात है कि उन्हें हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। सरकार ने उन्हें ऐसी परिस्थिति से गुजरने को मजबूर किया, हम इसके लिए केन्द्र सरकार को दोषी मानते हैं। आजादी के बाद भी इतने दिनों से ये लोग मारे-मारे फिर रहे हैं। उनको ताकत नहीं मिली है, नागरिकता नहीं मिली है, घर नहीं मिला है, उनके बाल-बच्चों को नौकरी नहीं मिली है, तो सरकार को उनकी सहायता करनी चाहिए - चाहे वे कश्मीरी पंडित हों या दूसरे लोग हों। आज वे बहुत खराब स्थिति से गुजर रहे हैं।

मैं कुछ दिन पहले वैष्ष्णो माता के दर्शन करने गया था और जब वहां से लौट रहा था तो मुझे अपने इलाके का मलिट्री का बड़ा अफसर, जो छुट्टी में घर जा रहा था, मिला। मेरा उसके साथ परिचय हुआ। इधर-उधर की बात होने के बाद, कश्मीर के ऊपर बात शुरू हो गई। वह कहने लगा कि स्वायत्तता की बात सुन रहे हैं, बॉर्डर खोले जा रहे हैं और रोड चालू हो रही है जो बड़ी खुशी की बात है, लेकिन वह कहने लगा कि वहां लोग किस तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उन पर क्या गुजर रही है, क्या इसका अन्दाजा है? क्या हजारों-लाखों लोगों ने इसीलिए कुर्बानी दी थी, क्या ५५ वर्ष तक हमें मरवाएंगे, कटवाएंगे और अब हम उन्हीं लोगों के साथ समझौता कर रहे हैं।

हमारे मित्र शैलेन्द्र जी यहां भाषण कर रहे थे। अगर सिक्योरटी फोर्सिज की गोली से कोई निर्दोष्ष व्यक्ति मारा जाता है या कोई आतंकवादी मारा जाता है, तो सिक्योरटी फोर्स का जवान सस्पैंड हो जाता है, फिर उसका डिसमिसल हो जाता है, उसके ऊपर धारा ३०२ का मुकदमा भी चलता है, लेकिन आतंकवादियों की गोली से कोई मारा जाता है तो उनको किसी तरह की सुविधा नहीं मिलती है। अगर दो तरह की नीति हमारी सरकार चलाएगी तो क्या हमारे देश की एकता और अखंडता रह सकती है?

            मैं अधिक समय न लेते हुए निवेदन करना चाहता हूं कि आज हमें कश्मीर की हकीकत और स्थिति को समझने का काम करना चाहिए। वार्ता हो, कोई हर्ज नहीं, समझौता हो, कोई हर्ज नहीं, हम भी चाहते हैं, मैं राजनीतिक चर्चा में नहीं जाना चाहता हूं कि किस परिस्थिति के कारण कश्मीर में ऐसी स्थिति बनी है?

हमारे साथी ने ठीक कहा कि जिस समय बंगलादेश की लड़ाई हुई थी तो एक लाख के आसपास पाकिस्तानी सैनिक हमारे कब्जे में थे। यदि उस समय द्ृढ़ता दिखायी गई होती तो शायद गुलाम कश्मीर हमारे यहां होता और यह विवाद सदा के लिए समाप्त हो जाता। मैं दुराग्रह की द्ृष्ष्िट से नहीं कह रहा हूं। जब तक गुलाम कश्मीर का मामला तय नहीं होगा तब तक भारत में अमन-चैन नहीं आने वाला है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपनी बात समाप्त करता हूं।

सभापति महोदय :  श्री मदन लाल शर्मा अब अपनी चर्चा आधे मिनट के लिए शुरू करें। वह कल उसे जारी रख सकते हैं।

श्री मदन लाल शर्मा (जम्मू) : आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं। इसके साथ, जैसा आपने फरमाया है, लेकिन मुझे कम से कम दस मिनट तो चाहिए।…( व्यवधान) 

सभापति महोदय : आप अपना भाषण कल जारी रख सकते हैं।

श्री मदन लाल शर्मा : अभी छ: बज गए हैं।

सभापति महोदय : अभी एक मिनट बाकी है।

श्री मदन लाल शर्मा : चौधरी लाल सिंह जी, मेरे कुलीग हैं…( व्यवधान) 

सभापति महोदय : आप अपना भाषण कल जारी रखें।

अब सदन की कार्यवाही बुधवार, दिनांक २२.०३.०६ प्रात: ११ बजे तक के लिए स्थगित की जाती है।

18.00 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the clock on Wednesday, March 22, 2006/Chaitra 1, 1928 (Saka)

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