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Lok Sabha Debates

Discussion Regarding Financial Package For The State Of Bihar. (Concluded). on 16 May, 2002

16.25 hrs.   Title: Discussion regarding financial package for the State of Bihar. (Concluded).

   

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):सभापति महोदय, मैं आपको, इस सदन और इस सदन के माननीय सदस्यों को बिहार की ८ करोड़, ३० लाख ५५ हजार जनता की ओर से इस अहम सवाल पर नियम १९३ के अधीन चर्चा के लिए बधाई देता हूं कि बिहार का आर्थिक संकट, बिहार का पिछड़ापन और बिहार की समस्या पर सदन का बहुमूल्य समय चर्चा के लिए दिया जा रहा है।

महोदय, बिहार का गौरवशाली इतिहास है। आदिकाल, वैदिक काल और पौराणिक काल - सभी कालों में बिहार के गौरवशाली इतिहास का जिक्र है। भगवान राम और श्रीकृष्ण के महाभारत में बिहार का जिक्र है। मगध के समय में जब हिन्दुस्तान की राजधानी पाटलिपुत्र थी, हिन्दुस्तान दुनिया के देशों में पहले स्थान पर था। भगवान महावीर का जन्म बिहार में हुआ और अहिंसा व शांति का सन्देश वैशाली से चला। भगवान बुद्ध की कर्म भूमि बिहार है। जब ज्ञान कहीं नहीं मिला, तो बोधगया से उनको ज्ञान मिला। लिच्छवी गणतन्त्र जनतन्त्र की जननी है, जहां पर जनतन्त्र का जन्म हुआ। हमने अब्राहम लिंकन से डैमोक्रेसी नहीं सिखी है, बल्कि हमारे पुरखों ने जम्हूरियत, डैमोक्रेसी को पैदा किया है। आज से २६०० बरस पहले, भगवान बुद्ध ने वैशाली में कहा था - नियम बनाकर शासन करते हैं। कानून का राज है। वैशाली के संबंध में राष्ट्रकवि दिनकर की कुछ पंक्तियों को मैं उद्धृत करना चाहता हूं -

"वैशाली जन का प्रतिपालक, गण का आदि विधाता, जिसे खोजता देश आज, उस प्रजातन्त्र की माता।
रुको पथिक एक क्षण, मिट्टी को शीश नवाओ, राज्य सद्धियों की समाधि पर, फूल चढ़ाते जाओ।"
 

 महोदय, बिहार में जनतन्त्र का जन्म हुआ।…( व्यवधान)इतिहास जानना जरूरी है। जौ कौमें इतिहास को याद करके काम करती है, वे कभी गुलाम नहीं हो सकती है। यह मेरा द्ृढ़ निश्चय और विश्वास है। सम्राट चन्द्रगुप्त, सम्राट अशोक और गुरुगोविन्द सिंह का वहां जन्म हुआ। तमाम धर्मों का वहां संगम है। १८५७ में बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में अग्रेजी सल्तनत से पहली लड़ाई वहां लड़ी गई, जिसमें अंग्रेजों को पराजय मिली। २३ अप्रैल को बाबू कुवंर सिंह के नाम से विजय दिवस मनाया जाता है। …( व्यवधान)नालन्दा विक्रमशीला विश्वविद्यालय में दुनिया से लोग ज्ञान हासिल करने के लिए आते थे। …( व्यवधान)सवाल उठ रहा है कि बिहार की हालत क्यों खराब हुई। बिहार और झारखण्ड आजादी के समय एक था और हिन्दुस्तान में बिहार का स्थान तीसरा था। …( व्यवधान)गुड गवर्नेंस में बिहार एक उदाहरण था और पर-कैपिटा इनकम के हिसाब से बिहार का स्थान तीसरा था। …( व्यवधान)मैं सभी आंकड़े बता रहा हूं। क्षण भर में दिमाग घूम जाएगा और अंधकार दूर हो जाएगा। प्रथम पंचवर्षीय योजना में पर कैपिटा इन्वैस्टमेंट २५ रुपए हैं और द्वितीय पंचवर्षीय योजना में ४० रुपए हैं, जबकि अन्य राज्यों में पर कैपिटा इन्वैस्टमेंट ५० रुपए है।

थर्ड फाइव ईयर प्लान में ६७ रुपए बिहार में, जबकि ९० रुपए देश भर के सभी राज्यों में ।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Do not disturb him. Let him speak.

   

… (Interruptions)

 

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :महोदय,तीन वर्ष का एनुअल प्लान बना, जिसमें ४१ रुपए बिहार में और ६० रुपए नेशनल एवरेज का सभी राज्यों में है। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में ८१ रुपए पर-केपिटा इनवेस्टमेंट हमारे बिहार में जब कि और देश भर के तमाम राज्यों में नेशनल एवरेज़ १४१ रुपए था। पांचवी पंचवर्षीय योजना में बिहार में १४० रुपए पर-केपिटा इनवेस्टमेंट है, जबकि नेशनल एवरेज़ देश भर के तमाम राज्यों में २३२ रुपए था। फलस्वरूप आधारभूत संरचना और समाज-सेवा में जहां बिहार तीसरे स्थान पर था, वहीं प्रथम पंचवर्षीय योजना में नौवे स्थान पर चला गया। दूसरी पंचवर्षीय योजना में १३वें स्थान पर, तीसरी पंचवर्षीय योजना में १६वें स्थान पर और चौथी पंचवर्षीय योजना में २२वें स्थान पर चला गया। आज वह सबसे नीचे हैं। जनसंख्या वृद्धि में राष्ट्रीय औसत १९९१-२००१ में २१.३४ प्रतिशत था और बिहार में २८.४३ प्रतिशत था।…( व्यवधान)

महोदय, बिहार की आबादी का घनत्व एक स्कवेयर किलोमीटर में ८८० है। देश भर में सबसे ज्यादा घनत्व इस समय बिहार में हैं। हम दुनिया में दूसरे स्थान पर थे, बंटवारे के बाद दूसरे से चौथे पर नहीं गए बल्कि तीसरे पर गए हैं।

MR. CHAIRMAN: Please do not interrupt him. Let him speak.

   

… (Interruptions)

 

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :महोदय,बिहार बाढ़, सुखाड़, जल-जमाव एवं प्राकृतिक आपदा से तबाह हुआ। सारा खान-खनिज बिहार में था। कोयला, अभ्रक, लौहा, तांबा, एल्युमीनियम, ग्रेनाइट आदि रहने के बावजूद भी सवाल उठेगा। विशेषज्ञ, बुद्धिजीवी लोग और जो अंधकार में हैं वे जानना चाहेंगे कि सारी सम्पत्ति बिहार में थी, फिर बिहार क्यों पीछे चला गया। फ्रेट इक्वलाइजेशन पालिसी की वजह से तमाम खान-खनिज उद्योग रहने के बावजूद भी बिहार आगे नहीं गया, पीछे चला गया। यह ठीक है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में राजेन्द्र बाबू, जगजीवन बाबू और सभी बड़े-बड़े महान लोग हुए हैं, लेकिन उनमें रीज़नलिज़्म नहीं था। उन्होंने हिन्दुस्तान को अपना देश समझा, इस वजह से निश्चय ही बिहार पीछे चला गया।

महोदय, योजना आयोग ने एक कमेटी बैठाई थी - डा. मज़ूमदार कमेटी। जिन लोगों को भ्रम है कि किस कारण से बिहार पीछे चला गया, इस कमेटी की रिपोर्ट उसकी साक्ष्य है। मैं उसमें ज्यादा समय नहीं लेना चाहूंगा। बिहार के संबंध में Industrial Development Imperative for Bihar and Jharkhand, इस पर भी एक रिपोर्ट तैयार हुई है। इंडस्ट्रीज़ कमीशन बना है, इसमें मैं दो पंक्तियां पढ़ना चाहता हूं। बिहार इंडस्ट्रीज़ कमीशन की क्या रिपोर्ट है, जिसके अध्यक्ष टाटा के डा. जमशेद जे. इरानी थे।

16.34 hrs. (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) "Bihar is not just a State but rather a state of mind; it is like a hat that has lost its shape because everybody likes to wear it. When it comes to Bihar, it is more a matter of attitudes, opinions and impressions than of facts which often get exaggerated."

 फिर आगे कहा गया है "Much like the mythical bird phoenix, Bihar is bound to rise from its own ashes. As Bihar and Jharkhand begin the journey to redeem their pristine glory, the formation of the Bihar Industries Commission, along with the other Commissions on Finance, Infrastructure etc., becomes the first significant step in the direction."

 बिहार की लोग हंसी उड़ाते हैं, उस पर सवाल उठाते हैं लेकिन हमारे यहां के नौजवान आईएएस, आईपीएस में फस्र्ट आ रहे हैं, हरेक परीक्षा में सफल हो रहे हैं क्योंकि वहां की मिट्टी में मेघा है। हमारे बिहार के श्रमिक मेहनत करके उत्पादन करते हैं और अगर हमारे बिहार के श्रमिक मेहनत करना छोड़ देंगे तो हिंदुस्तान के कारखाने ठप्प हो जाएंगे। हमारे छात्र चाहे हिंदुस्तान में हों या विदेश में, फस्र्ट आते हैं। चाहे दिल्ली विश्वविद्यालय हो, जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी हो, हमारे छात्रों के बारे में कहा जाता है कि फस्र्ट आते हैं। यह बिहार की मिट्टी की खूबी है और बिहार का वर्तमान भी है।

एक त्रासदी बिहार के साथ है कि बीसवीं सदी में बिहार का बंटवारा तीन बार हुआ। पहली बार ग्रेट बंगाल से १९१२ में, फिर उससे उड़ीसा १९३७ में अलग हुआ और १५ नवम्बर, २००० को झारखंड अलग हुआ। अंग्रेजी सल्तनत ने कहा कि नहीं बंटना चाहिए, जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा जी के कार्यकाल में कहा गया कि नहीं बंटना चाहिए लेकिन एक समय आया कि राजनैतिक कारणों से बिहार का बंटवारा हो गया।…( व्यवधान)दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही।…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : आपने बिहार विधान सभा में इसे पास करवाया…( व्यवधान)

सभापति महोदय : रघुवंश प्रसाद सिंह जी के अलावा किसी की कोई बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

   

...( व्यवधान)...*   डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :विपक्ष की नेता श्रीमती सोनिया गांधी जी, स्वर्गीय माधवराव सिंधिया जी व सभी विपक्ष के लोग वोट में खिलाफ खड़े हुए थे और ये लोग भी खड़े हुए थे। आपको पता है कि एक महीना महाभारत की लड़ाई हुई थी और दुर्योधन की सभा में चीर हरण हुआ था…( व्यवधान)कायर लोग नहीं बोल सके थे। वही परिस्थिति थी महोदय। सभी बिहार के योद्धा उधर खड़े हो गये कि बिहार बंटना चाहिए और हमारा अमेंडमेंट खारिज होना चाहिए।…( व्यवधान)यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी। बिहार विभाजन के बाद आर्थिक परिस्थिति क्या हुई, इसको भी समझना जरूरी है। आठ करोड़ तीस लाख की आबादी बिहार में और दो करोड़ उनसठ लाख आबादी झारखंड में गयी। एक-चौथाई आमदनी बिहार में और तीन-चौथाई आमदनी झारखंड में चली गयी। जो सेंटर का कर्जा है बिहार पर वह ३७ हजार करोड़ रुपये है, जिसमें से तीन-चौथाई कर्जा बिहार पर और एक-चौथाई कर्जा झारखंड पर। सूद वगैरह मिलाकर बिहार को २०००-२००१ में २३०० करोड़ रुपया और सन २००१-२००२ में २७०० करोड़ रुपया सरकार को देना पड़ा। पूंजी का सारा निवेश झारखंड में चला गया।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बीच में टोका-टाकी न करें।

श्री प्रकाश परांजपे (ठाणे): महाराष्ट्र अच्छा हो गया, गुजरात अच्छा हो गया, चैन्नई अच्छा हो गया - उसकी वजह क्या है? आपके प्रदेश के गरीब रहने की वजह क्या है, वह बताएं?

सभापति महोदय : रघुवंश बाबू की बात छोड़ कर दूसरी कोई बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।

...( व्यवधान)...* * Not Recorded डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :कोई दूसरा मौका आएगा तो इस बारे में तय हो जाएगा। आप इस समय मुझे डिस्टर्ब न करें।

सभापति महोदय: आप आसन के सम्मुख मुखातिब होकर आपनी बात कहें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यह बिहार की जनता का सवाल है और उनके जीवन-मरण का सवाल है। …( व्यवधान)हम विरोध करने से पीछे हटने वाले नहीं हैं। मेरा विषय छूट न जाए और समय घट न जाए इसलिए प्रार्थना करना चाहता हूं कि आप मुझे छेड़ने की कष्ट न करें। …( व्यवधान)

सभापति महोदय: सदन में शांति बनाए रखें। रघुवंश बाबू, आप चेयर की तरफ मुखातिब होकर अपनी बात कहें। आप क्रॉस टॉक में क्यों फंस जाते हैं जबकि आप बहुत अच्छा बोल रहे हैं।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम डाक्टर लोहिया वाली पाठशाला में पढ़े हैं इसलिए हल्की-फुल्की बातों से डरने वाले नहीं हैं और बीच में होने वाली छेड़ाखानी से भी विचलित होने वाले नहीं हैं। हम उसी राह पर चलेंगे जिस पर चलना है। भारत सरकार ने तीन चौथाई बिहार को और एक चौथाई झारखंड को देने का फैसला किया जबकि बिहार की आर्थिक स्थिति खराब है। बिहार के बंटवारे के बाद क्या हुआ? जितनी भी खनिज सम्पदा थी, वह सारी झारखंड चली गई। टाटा, टिस्को, टैल्को, बोकारो, एचईसी, मेकोन आरआईटी, बीआईटी, आईएसएम, सिंदरी, इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, झुमरीतल्लैया ये सब झारखंड चले गए और बिहार खाली हो गया। बिहार के पास बाढ़, सुखाड़ और बालू बचा।

आज बिहार की क्या दशा है? मैं आर्थिक सूचक के बारे में संक्षेप में बताना चाहता हूं। एरिया ९४१९३ स्क्वेअर किलोमीटर जबकि पापूलेशन ८ करोड़ ३० लाख है। डैनसिटी ८८० पर-स्कवेअर किलोमीटर, शहरीकरण १०.२६ परसैंट जबकि देश की २५.७ परसैंट, पर-कैपिटा इनकम ३८३५ जबकि नेशनल एवरेज १६२२३ पर-कैपिटा, ग्रोथ रेट आठ हजार और बिहार यहां माइनस में चला गया। ०.१४ स्टेट डोमैस्टिक प्रोडक्ट्स रहे और नौवें प्लान में वह ८ परसैंट था। देश का जीडीपी ६ परसैंट लेकिन बिहार का जीडीपी नौवीं योजना में एक परसैंट अंकित हुआ। आज बिहार की हंसी उड़ायी जाती है। बिहार की गरीब जनता, मजदूर ओर किसानों ने पेट काट कर बैंकों में ३७ हजार करोड़ रुपए जमा किए लेकिन आपने बिहार को भूखा-नंगा किया। आप बिहार को गरीब, दरिद्र कहते हैं जबकि हम लोगों ने ३७ हजार करोड़ रुपए जमा किया। आन्ध्रा प्रदेश विकसित राज्य है। उसने २६ हजार करोड़ रुपए जमा किए। मैं दूसरे राज्यों का नहीं बताऊंगा लेकिन बिहार का क्रेडिट डिपाजिट रेशियो २१ से २३ परसैंट है लेकिन अन्य राज्यों का ७०, ८० और ९० परसैंट है। हमारा जो पैसा बैंकों में जमा है, वह देश के दूसरे राज्यों में लग रहा है।

इनवैस्टमेंट हो रहा है लेकिन बिहार गरीब का गरीब है। देश का लिट्रेसी रेट ६५ परसेंट है जबकि बिहार का ४७ परसेंट है। जब नेशनल ऐवरेज बिलो पावर्टी लाइन ३७ परसेंट था, तब बिहार का ५४ परसेंट था। अब जबकि नेशनल ऐवरेज २७ परसेंट है तो बिहार का ४४ परसेंट हो रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों में यह रेट ४० परसेंट से नीचे है। कहीं-कहीं तो २५-२० परसेंट ही है।

सभापति महोदय, बिहार में पतरातू, सुवर्ण रेखा और तेलूघाट थर्मल पॉवर प्रोजैक्ट्स झारखंड में चले गये। बरौनी और मुज़फ्फरपुर में छोटे थर्मल पॉवर प्रोजैक्ट्स रह गये हैं जिनसे केवल ५४० मेगावाट बिजली मिलती है जबकि १४०० मेगावाट वाले पॉवर प्रोजैक्ट्स झारखंड में चले गये हैं। जहां तक नेशनल विद्युतीकरण का सवाल है, नेशनल ऐवरेज ३५ परसेंट है लेकिन बिहार में यह मात्र ६ परसेंट है। बिहार राज्य देश के अन्य राज्यों से काफी नीचे है। इसी प्रकार बिहार में ३० हजार गांव बिना सड़क के हैं जबकि आन्ध्रा प्रदेश में केवल १५००० गांव बाकी हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत आन्ध्रा प्रदेश को १९७ करोड़ रुपया दिया गया जबकि बिहार को १५० करोड़ रुपया मिला है। यहां सरकार दावा करती है कि २००७ तक सभी गांवों का विद्युतीकरण हो जायेगा और सभी गांवों में सड़क पहुंच जायेगी। जिस राज्य में ज्यादा गांव बचे हुये है, उसे कम रुपया और जिसके यहां कम गांव बचे हुये है, उसे ज्यादा रुपया मिल रहा है। यह कैसा न्याय है?

सभापति महोदय़, इसी प्रकार टेलीफोन के मामले में नेशनल ऐवरेज ३.७ प्रतिशत घनत्व है जबकि बिहार में केवल ०.९ प्रतिशत है। सड़क, टेलीफोन के अलावा रेल में बिहार बहुत पीछे छूट गया है। इन्ही बातों को देखते हुये २८ नवम्बर, २००० को बिहार से लोक सभा और राज्य सभा के सभी पार्टियों के सांसदों ने एक ज्ञापन प्रधानमंत्री जी को दिया था । उसके पहले हम सभी सांसदों ने एक बैठक की थी। उसमें एक कोर कमेटी बनी जिसके अध्यक्ष श्री नीतीश कुमार थे। लेकिन आज डेढ़ साल से ज्यादा हो गया, उस कोर कमेटी की कोई बैठक नहीं हुई है। बिहार पीछे था, और आज भी पीछे है। वहां विकास के काम रुक गये हैं, उसका विनाश हो गया है, उस पर राजनीति हावी हो गई है। इस कारण एक बैठक श्री नीतीश जी के यहां हुई थी। उस समय श्री यशवंत सिन्हा जी ने कहा था कि बिहार राज्य के सभी सांसदों, बिहार सरकार और केन्द्र सरकार- इन तीनों के बीच एक बैठक होगी। इसके लिये तथि भी तय हो गई। वह तारीख फिर बदली गई लेकिन राजनीति हावी रही। वह काम आगे नहीं बढ़ सका। हम लोगों ने प्रधानमंत्री जी को ज्ञापन दिया। ज्ञापन दिये दो साल होने को आये लेकिन उस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। ज्ञापन में कहा गया था कि बिहार सरकार पर जितना कर्जा है, उसे माफ किया जाये। कर्जा लेकर जो पूंजी निवेश किया गया, वह सब झारखंड में चला गया। जितने उद्योग-धंधे, इंस्टीटयूशन्स थे, वे सब झारखंड में चले गये। बिहार पर तीन चौथाई बोझ बढ़ गया। आठवीं पंचवर्षीय योजना में बिहार के लिये १२ हजार करोड़ रुपया रखा गया लेकिन बाद में योजना को छोटा आकार दे दिया गया और केवल ५ हजार करोड़ रुपया खर्च किया।

बाकी रुपया खर्च नहीं हुआ। इसी प्रकार जो पर कैपिटा इनवैस्टमैन्ट होना चाहिए, वहां उतना पैसा इनवैस्ट नहीं हुआ। इसके कई कारण हैं। लेकिन वहां पैसा खर्च नहीं हुआ। हमारा पैसा कहां चला गया। अष्टम योजना १२०० करोड़ रुपये की थी, लेकिन उसमें से केवल पांच हजार करोड़ रुपया खर्च हुआ। नौवीं योजना १४ हजार करोड़ रुपये की थी, लेकिन उसमें से केवल १० हजार करोड़ रुपया खर्च हुआ। चार हजार करोड़ रुपया उसमें से खर्च नहीं हुआ। केन्द्रीय योजना और केन्द्र प्रायोजित योजना की मद में आठवीं और नौवीं पंच वर्षीय योजनाओं में सात हजार करोड़ रुपया मिलना चाहिए था, लेकिन हमें वह राशि नहीं मिली अथवा नगण्य राशि मिली है। अनेक केन्द्रीय योजनाओं और केन्द्र प्रायोजित योजनाओं में बिहार वंचित रहा है। मैं आपको आगे उदाहरण देकर बताऊंगा।

सभापति महोदय, देश में कर्जा माफी के पूर्वोदाहरण हैं। इससे पहले अन्य राज्यों का भी कर्जा माफ हुआ है। हमने वित्त विभाग के साथ लिखा-पढ़ी की थी। उसने कहा कि वित्त आयोग ये सब काम करता है, लेकिन ११वें वित्त आयोग की रिपोर्ट आई तो उसमें बिहार के बंटवारे का मामला नहीं आया, इस वजह से वित्त आयोग इस पर विचार नहीं कर सका। चूंकि उसके सामने यह मामला नहीं आया, इसलिए हमारा कर्जा माफी का मामला बनता है। इसलिए बिहार का सारा कर्जा माफ किया जाए। इसका प्रस्ताव हमने दिया है।

उसी प्रकार से उसमें मांग नम्बर दो में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की गई है। राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देने का मामला नेशनल डेवलपमैन्ट काउंसिल की मीटिंग में तय होता है। उसके कोई हार्ड एंड फास्ट रूल्स स्टेटयूट नहीं हैं। कोई नियम-कायदे नहीं हैं। केवल नॉम्र्स रखे गये हैं - सीमावर्ती इलाका हो, प्रति व्यक्ति आय में निम्न हो, ट्राइबल आबादी हो, पहाड़ी क्षेत्र हो, आदि। पांच शर्तें पूरी होने पर एन.डी.सी. विशेष राज्य का दर्जा देती है। लेकिन अभी जो नया उत्तरांचल राज्य बना है, उसे झटपट विशेष राज्य का दर्जा दे दिया, लेकिन बिहार को इन्होंने अभी तक विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया। ये बिहार के साथ भेदभाव कर रहे हैं। बिहार को भी विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। चूंकि बिहार में बॉर्डर इलाका है, बिहार का ७०९ किलोमीटर लम्बा क्षेत्र नेपाल के साथ अंतर्राष्ट्रीय बॉर्डर है। बंग्लादेश के साथ हम सीधे नहीं जुड़े हुए हैं, लेकिन हम उसके बहुत करीब हैं। इसलिए उसका भी वहां सीमावर्ती वाला मामला बनता है।

बिहार प्राकृतिक रूप से डिसएडवांटेजियस है। उसके २७ जिलों में हर साल बाढ़ आती है। सात-आठ जिलों में सुखाड़ रहता है। ६५ लाख हैक्टेअर जमीन हमेशा बाढ़ग्रस्त रहती है। नेपाल के पहाड़ो से होकर आने वाली नदियों से जो बाढ़ आती है, वह बिहार को बर्बाद करती है। बिहार की फसलें, सड़कें, स्कूल, कालेज, मैदान, सरकारी सम्पत्ति, जनता की सम्पत्ति, गरीबों के घर आदि बह जाते हैं। गरीब मारे जाते हैं, उनके जानवर मारे जाते हैं। इस तरह से प्राकृतिक रूप से असीमित नुकसान बिहार में होता है। जितनी भी विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त स्टेट्स हैं, उनमें प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार सबसे नीचे आता है। विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त राज्यों में शायद दो-तीन राज्यों में प्रति व्यक्ति आय बिहार से कम होगी। अन्यथा विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त किये हुए राज्यों में सभी राज्यों की प्रति व्यक्ति आय बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आय से ज्यादा है। ट्राइबल आबादी वाला मामला भी वहां है। हमारे यहां १५ से २० प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं। ५५ से ६० प्रतिशत पिछड़ी तथा अति पिछड़ी जातियों के लोग रहते हैं। इसलिए जिन्हें ट्राइबल आबादी कहा गया है, जो ज्यादा पीछे छूट गये हैं, उसमें भी बिहार इस कंडीशन को फुलफिल करता है। पहाड़ी क्षेत्र जो नेपाल से निकलता है, वह पांचवां आइटम है, उसमें भी बिहार के बारे में विचार किया जा सकता है और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जा सकता है। जब प्रधान मंत्री जी बिहार रेल पुल के शिलान्यास में गये थे तो वहां के मुख्य मंत्री ने गांधी मैदान की ऐतिहासिक सभा में मांग की थी। मेरे ख्याल से उस पर विचार होना चाहिए और शायद वह विचार करेंगे।

इस तरह से विभाजन के बाद भी विशेष परिस्थिति हुई, इसीलिए उनको विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। जिस समय बंटवारा हो रहा था, कोई पार्टी ऐसी नहीं है जिसने कमिट न किया हो कि आर्थिक पैकेज देंगे और कहा कि जितनी क्षति है, उसकी पूर्ति होगी। भाजपा के लोग, समता पार्टी के लोग, कांग्रेस के लोग, और भी जितनी पार्टियां हैं, सभी पार्टियों के लोगों ने अपने घोषणापत्र में यह कहा। यहां तक कि विधानमंडल से सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित होकर आया। जब राष्ट्रपति जी द्वारा बिहार रीऑर्गनाइजेशन बिल भेजा गया तब उसमें विधानमंडल द्वारा कहा गया कि १,७९,९०० करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज बिहार को मिलना चाहिए। उसके पहले जब स्वर्गीय राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे, उनके शासन में भी उन्होंने ऐलान किया था कि ५००० करोड़ रुपये का स्पैशल पैकेज बिहार को देंगे। वह भी अभी बकाया है। लोग कहते हैं कि गवर्नमेंट कंटीन्यूअस प्रोसेस है, लेकिन उस समय का कमिटमेंट भी पूरा नहीं हुआ। प्रधान मंत्री जी ने भी ऐलान किया था विशेष पैकेज का। यहां गृह मंत्री ने भी विधेयक के समय कहा था कि योजना आयोग में सैल बनेगा और विशेष पैकेज मिलेगा। पैकेज क्यों मिलना चाहिए? सभी लोगों का कमिटमेंट है कि भरपाई करेंगे। पैकेज में क्या मिला? १५ नवंबर २००० को बिहार बंटा है।

सभापति महोदय : कितना समय लेंगे चूँकि और भी माननीय सदस्य बोलने वाले हैं।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : अब लक्ष्य पर आ गए हैं।

श्री अनंत गंगाराम गीते: कम बोलेंगे तो पैकेज ज्यादा मिलेगा।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : ऐसा हो जाए तो हम अभी बैठ जाएं।

सभापति महोदय, केन्द्र सरकार की बिहार सरकार के साथ खींचतान चल रही है और वह बिहार के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है, उसकी उपेक्षा कर रही है, यह सवाल आज उठता है। केन्द्र सरकार में जब सवाल उठता है तो कहते हैं कि राज्य पैसा खर्च नहीं करती, हिसाब नहीं देती। राज्य सरकार को कहते हैं तो वह भारत सरकार की कमी बताती है। इन दोनों सरकारों की खींचतान के चलते जनता पर मार पड़ रही है। जो ८करोड़ २०लाख मेहनतकश लोग हैं, जो किसान और सभी तरह के लोग हैं, वह भी मार खा रहे हैं और उनका बड़ा भारी अहित हो रहा है। इन दोनों के झगड़े में दोनों सरकारें बताती हैं एक दूसरे की ढिलाई, और उसमें हो रही है जनता की पिसाई। जब खर्च का हिसाब है तो हम क्यों खर्च का हिसाब मांगने जाएं? कर्ज़ा माफ कर दीजिए, विशेष राज्य का दर्जा दीजिए, उसमें कहां खर्च की जरूरत है, हिसाब लेने-देने की, एफशियेन्सी की, लेकिन मदद करना कोई चाहे तब।

महोदय, ३३५ करोड़ रुपये का ट्रांसमिशन का प्रोजेक्ट आया है। पावर ग्रिड कार्पोरेशन उसे करने के लिए तैयार है। वह पैकेज तय करवा दीजिए क्योंकि उस सैक्टर में सरप्लस बिजली है। यदि ट्रांसमिशन लाइन दुरुस्त हो जाए तो २४ घंटे बिजली मिल सकती है। वह पैकेज दिलवा दीजिए। उसमें तो हिसाब लेना-देना नहीं है। भारत सरकार का संस्थान है और उसके लिए भारत सरकार पैसा दे दे, पैकेज का कमिटमेंट तो है ही। लेकिन ये सब बहाने हैं। मैं बता रहा हूँ भेद खोलकर।

नेपाल से आने वाली नदियों से जो बरबादी होती है, उसमें १० लाख हैक्टेयर में जल जमाव हो रहा है। आठ जिलों में सुखाड़ है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की एक सेन कमेटी गई थी। उसने कहा था कि बाढ़, जल-जमाव और सुखाड़ की जो बिहार में समस्या है, वह राज्य सरकार के बस में नहीं है। राज्य सरकार की हालत वैसी नहीं है कि बाढ़ और सुखाड़ तथा जल-जमाव की समस्या का समाधान कर सके। इसलिए वह रिपोर्ट खोजी जाए, दिखवाई जाए और सेन कमेटी की रिपोर्ट लागू होनी चाहिए जिसमें यह है कि सभी सेन्ट्रल सेक्टर में भारत सरकार और नेपाल समझौता करे और भारत-नेपाल समझौते के मुताबिक बाढ़ नियंत्रण का काम, जल-जमाव से जल निकासी का काम और सुखाड़ में सिंचाई का काम और जो हमारी परियोजनाएं हैं, वह सब परियोजनाओं को बढ़ाया जाए, मंजूर किया जाए और केन्द्रीय सरकार उसमें सारा खर्च दे।

       

17.00 hrs. महोदय, गंडक फेज-दो, कोसी फेज-दो, बागमती गंडक पर हाई डैम, गंगा के तट के कटाव पर रोक व तटबंध बनाना, लघु सिंचाई विभाग से ऊसर भूमि विकास की योजना आई हुई है। वह योजना आयोग में लंबित है, कृषि विभाग में लंबित है, वह क्यों क्लीयर नहीं की गई। सोलर टयूब योजना, राजकीय नलकूप योजना क्यों नहीं क्लीयर की गईं। मुजफ्फरपुर-बरौनी थर्मल पावर योजना का आधुनिकीकरण एवं विकास हेतु बिहार सरकार को पैसा चाहिए। उसके पास पैसा नहीं है। उसे केन्द्र सरकार केन्द्रीय उपक्रम थर्मल पावर कोर्पोरेशन के माध्यम से क्यों नहीं कराती है। नवी नगर थर्मल पावर परियोजना भारत सरकार की उपेक्षा के कारण रुकी हुई है। ३३५ करोड़ रुपए की पावर ग्रिड कार्पोरेशन की ट्रांसमीशन लाइन की परियोजना केन्द्र सरकार की उपेक्षा के कारण रुकी पड़ी है।

महोदय, विद्युतीकरण के बारे में भारत सरकार ने कहा है कि सन् २००७ तक देश के सभी ग्रामों को विद्युतीकृत कर दिया जाएगा। जो क्षेत्र शुरू से विद्युतीकरण में पिछड़ गए हैं, विशेषकर बिहार के गांवों को विद्युतीकृत करने का जिम्मा केन्द्र सरकार को लेना चाहिए। पन बिजली के क्षेत्र में बिहार में अपार संभावनाएं हैं। कनबन पनविद्युत परियोजना भारत सरकार की ढिलाई के कारण पीछे छूट गई है। बिहार में बहने वाली नदियों पर पन बिजली परियोजनाएं बनाने की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन भारत सरकार उसको नहीं मान रही है।

महोदय, पर्यटन के क्षेत्र में बिहार में अपार संभावनाएं हैं। बिहार में टूरिज्म की बहुत पोटैंश्यलिटी है। भारत सरकार और वित्त मंत्री ने बजट भाषण में कहा है कि छ: पर्यटक सर्किटों को विकसित किया जाएगा। बुद्ध सर्किट का जो अपूर्ण कार्य है उसे पूरा किया जाए। भगवान महावीर का जन्म एवं निर्वाण भी बिहार में ही हुआ। महावीर सर्किट बनाया जाए। रामायण सर्किट बनाया जाए। मां सीता का जन्म सीतामढ़ी में हुआ। महात्मा गांधी जब बिहार गए, उससे पहले वे मोहनदास कर्मचन्द गांधी थे। बिहार के चम्पारण में जाने के बाद वे महात्मा गांधी बन गए। बिहार की मिट्टी की यह खूबी है कि मोहनदास कर्मचन्द गांधी को महात्मा गांधी बना दिया। महात्मा गांधी सर्किट को पूरा किया जाए। सूफी सर्किट बनाया जाए। बिहार में बिहार शरीफ, फुलवारी शरीफ, काशी की मजार, इन पर लाखों लाख आदमी जुटते हैं। इसलिए सूफी सर्किट बनाया जाए।

महोदय, पानी बिहार में काफी है, लेकिन बिहार के लोग आंध्रा प्रदेश् की मछली खाते हैं। वहां अंडा व मुर्गी पंजाब और हरियाणा से जाता है। वहां मछली का प्रबन्ध होना चाहिए जिससे मत्स्य पालन हो सके, वहां डेयरी का इंतजाम होना चाहिए, एयर कार्गो का इंतजाम होना चाहिए, नागरिक उड्डयन मंत्री यहां बैठे हैं, वे इस तरफ ध्यान दें।

वहां अस्पतालों की बहुत खराब हालत है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसा एक उच्च कोटि का अनुसंधान संस्थान एवं अस्पताल बिहार में स्थापित होना चाहिए। पटना मैडीकल कालेज एवं अस्पताल, मुजफ्फरपुर मैडीकल कालेज एवं अस्पताल, दरभंगा मैडीकल कॉलेज एवं अस्पताल और नालंदा मैडीकल कॉलेज एवं अस्पताल का विकास किया जाए।

महोदय, इन सभी के बाद आर्थिक पैकेज की डिमांड है। उसकी मांग हम कर रहे हैं। कर्जा माफ करने की मांग हम कर रहे हैं। बिहार के साथ पैसे के मामले में धोखाधड़ी वाला व्यवहार हो रहा है। इसलिए मैं संक्षेप में कहना चाहता हूं कि दशम वित्त आयोग ने पंचायत के माध्यम से १२५ करोड़ रुपए देने की अनुशंसा की और भारत सरकार ने उसे स्वीकृति प्रदान की। एक साल का यानी प्रथम वर्ष का रुपया मिला भी, लेकिन चार वर्ष का पैसा रोक कर रखा है। फिर ११वें वित्त आयोग ने रिपोर्ट दी, उसने अनुशंसा की। दोनों की अनुशंसा हुई। सरकार ने भी उस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया। ११वें वित्त आयोग की रिपोर्ट की मंजूरी के बाद भी हमें बकाया रुपया अभी तक नहीं मिला। माननीय मंत्री जी ने कॉल अटेंशन का जवाब देते हुए कहा कि यह छोड़ने वाला नहीं है, फंसा देगा। मैं फिर कहता हूं कि माननीय वित्त मंत्री ने हाउस को मिसलीड किया है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : उसे भी आप नियम के तहत ला सकते हैं। आप तो जानकार आदमी हैं इसलिए आप अपना विषय समाप्त करिये।

   

...( व्यवधान)

 

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति जी, वित्त आयोग की गाइडलाइन्स में जो लिखा है, मैं उसे पढ़ रहा हूं। उसमें कहा गया है कि:

"The grant shall be given only in respect of elected local bodies, wherever such elections are mandatory under the Constitution. In case where elected local bodies are not in place, the Central Government shall hold the share of such bodies in Trust on a non-lapsable basis during 2000-05. "

 आपने कैसे कह दिया कि बिहार का लैप्स हो गया। गाइडलाइन्स कहती है कि यह धनराशि नॉन लैप्सेबल है। सैंट्रल गवर्नमैंट उसको दबाकर रखेगी। जब चुनाव हो जायेगा तब दे देगी लेकिन ११वें वित्त आयोग ने प्रथम वर्ष का पैसा रोक रखा है। वह कहते हैं कि लैप्स हो गया है। दसवें वित्त आयोग ने बिहार के इन चार वर्षों का ६०० करोड़ रुपया रोक रखा है, जबकि ११वां वित्त आयोग कहता है कि आर्थिक पैकेज दिलायेंगे। यह छल और धोखाधड़ी है। मैं इसे छोड़ने वाला नहीं हूं। इसके लिए मैं प्रविलेज मामला लाऊंगा। बिहार के साथ अन्याय हो रहा है। …( व्यवधान)नौंवी पंचवर्षीय योजना में पांच हजार करोड़ रुपये सैंट्रली स्पोंसर्ड स्कीम में खर्च हुए। देश भर के सभी राज्यों को उसका १०वां हिस्सा मिलता है। उसके हिसाब से बिहार को ५०० करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे लेकिन हमें केवल ५० करोड़ रुपये मिले। यह उस १०वें हिस्से का भी १०वां हिस्सा बिहार को मिला है। हमें प्रति वर्ष जहां १०० करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे, वहां हमें तीन या चार करोड़ रुपये ही मिले हैं।

नौंवी पंचवर्षीय योजना में देश भर में पीने के पानी पर ६५०० करोड़ रुपये खर्च हुए। देश भर के सभी राज्यों को पैसा मिला। बिहार को कम से कम ५००-६०० करोड़ रुपये नौंवी पंचवर्षीय योजना में मिलने चाहिये थे लेकिन हमें केवल इन पांच वर्षों में ३५-४० करोड़ रुपये ही मिले। इस तरह से हिस्सामारी हो रही है। हमको ५०-१०० करोड रुपये का पैकेज दिखाया जा रहा है। लेकिन हमें हमारा हिस्सा नहीं मिल रहा है। …( व्यवधान)

नौंवी पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत मनिमम नीड प्रोग्राम में बिहार को नौ करोड़ रुपये मिले जबकि झारखंड को २८ करोड़ रुपये मिले। मैं पूछना चाहता हूं कि यह धनराशि आबादी के हिसाब से मिली है या किस हिसाब से मिली है। हमने पहले भी यह सवाल उठाया था लेकिन सरकार निरुत्तर रही क्योंकि बिहार के साथ बेईमानी हुई है, उसकी अनदेखी हुई है।

सभापति महोदय : रघुवंश जी, आपको बोलते हुए ४५ मिनट हो गये हैं। बहुत से माननीय सदस्य बोलने वाले हैं इसलिए अब आप अपना भाषण समाप्त करिये। ...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति महोदय, बिहार के साथ अन्याय हुआ। …( व्यवधान)नॉन बैंकिंग इंस्टीटयूशन में गरीब लोगों के १० हजार करोड़ रुपये लूटे गये। यूनाइटेड फ्रंट गवर्नमैंट के समय में देश भर के पिछड़े राज्यों को चुना गया जिसमें से बिहार भी था लेकिन अब उसका पैसा रोक दिया गया है। इतना भारी अन्याय और दुश्मनी बिहार के साथ हो रही है। बिहार का किसान इतना अनाज पैदा करता है। आप स्वयं भी सवाल उठाते रहते हैं कि प्रोक्योरमैंट नहीं हुआ। बिहार ने , ४० लाख टन धान और ४७-५० लाख टन गेहूं पैदा किया लेकिन प्रोक्योरमैंट नगण्य हुआ। किसान के साथ धोखाधड़ी हुई। जो बंटवारा हुआ। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : राधा मोहन जी, आप अपना भाषण शुरू कीजिए।

   

...( व्यवधान)

 

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति जी, कैलेमिटी रिलीफ फंड का जो बंटवारा हुआ, वह आबादी के आधार पर कर दिया गया। भारत सरकार ने सुखाड़, बाढ़, प्राकृतिक आपदा आबादी के हिसाब से बेईमानी करके झारखंड को दे दिया। बिहार री-आर्गनाइजेशन एक्ट में लिखा है कि बिहार से जो बाहर की सम्पत्ति होगी, बिहार विभाजन के बाद जो बिहार बचा है, उसकी रहेगी लेकिन उस एक्ट के खिलाफ भी भारत सरकार ने पंचायती करके फैसला दे दिया कि बिहार भवन झारखंड को दिया जायेगा। अगर भारत सरकार को झारखंड देना है तो वे बड़ा भारी झारखंड भवन बना दे। लेकिन बिहार का हिस्सा क्यों मारने का काम किया जा रहा है ? …( व्यवधान)

अंत में मैं कहना चाहता हूं कि दसवीं पंचवर्षीय योजना में जो भी उपबंध हुए हैं, सैंट्रली स्पोंसर्ड स्कीम्स, सैंट्रल स्कीम का, सैंट्रल एसिस्टैंन्स आदि सभी तरह का - अब लों नसानी, अब ना नसैहों - …( व्यवधान)माननीय सदस्य को बताया जाये और हम लोग भी राज्य सरकार से मिलेंगे कि समय पर खर्च हो, पहले हमारा जो हिस्सा नहीं मिल रहा है, वह मिले। उसके बाद पैकेज मिले। केन्द्र का बिहार पर जो कर्जा है, वह माफ किया जाये और उसे विशेष राज्य का दर्जा दिया जाये। पंचायती राज में उसका भुगतान हो, ट्रांसमिशन लाइन प्रोजैक्ट तुरंत मंजूर किया जाये। सड़क, बाढ. ...( व्यवधान)

अंत में मैं कहना चाहता हूं कि जब पांडवों को दुर्योधन ने हिस्सा नहीं दिया तब उन्होंने कहा ---

न्याय करो तो आधा दो उसमें भी कहीं बाधा हो तो दे दो केवल पांच ग्राम रखो पनी धरती तमाम हम उसी में खुशी से खाएंगे परिजन सहित खुशी मनाएंगे।

फिर भी जब उन्होंने उनका हिस्सा देना स्वीकार नहीं किया तो कहा ---

याचना नहीं अब रण होगा जीवन जय या मरण होगा।

इसी तरह जब हम लोगों का भी हिस्सा नहीं मिलेगा तो हम लोग---

दिल्ली छोड़ चले करके गर्जन घनघोर चले कि याचना नहीं अब रण होगा जीवन जय या मरण होगा।

राष्ट्र कवि दिनकर ने कहा है ---

शूरमा नहीं विचलित होते क्षण एक नहीं धीरज खोते कांटों में राह बनाते हैं कष्टों को गले लगाते हैं नींद कहां उनकी आंखों में जो धुन के मतवाले हैं गति की त्रिशाख और बढ़ती जब पड़ते पग में छाले हैं।

अंत में ---

देखें इस भारत में कौन बड़ा वीर बलिदानी है किसकी धमनी में खून और किसकी धमनी में पानी है जात तोड़ सब पात तोड़ जब फौज यह हल्ला बोलेगा मांगेगा नहीं, जो चाहेगा सो ले लेगा।

इसलिए जब बिहार जागता है और उठ खड़ा होता है तो दिल्ली धराशायी होती है। जब तक हमारा हिस्सा नहीं मिलेगा तब तक मैं इन सवालों को उठाता रहूंगा, नहीं तो इस सरकार को जाना होगा।

इन्हीं शब्दों के साथ धन्यवाद।

श्री राधा मोहन सिंह (मोतिहारी):सभापति महोदय, सम्माननीय रघुवंश बाबू ने जिस गौरवशाली और वैभवशाली बिहार की अतीत की चर्चा यहां की, वह बिहार पिछले दस वर्षों में रघुवंश बाबू के नेतृत्व में आज जिस स्थिति में पहुंचा है, सचमुच उन्होंने बड़ी ईमानदारी के साथ उसकी चर्चा की है। हम अपनी ओर से कुछ नहीं कहेंगे। नौवीं पंचवर्षीय योजना के अंतिम साल २००१-०२ की योजना समीक्षा और प्रारूप के लिए, पटना में आपको स्मरण होगा २१ और २२ मई को एक बैठक हुई थी। योजना आयोग का नेतृत्व श्री पी.पी.एस. थॉमस कर रहे थे और बिहार सरकार की कमान विकास आयुक्त श्री पी. सिन्हा ने संभाल रखी थी। मैं चाहूंगा कि रघुवंश बाबू इसे जरूर सुनें। दो दिनों की बहस के बाद जो बातें सामने आईं, मैं उसको पढ़ कर सुना रहा हू। पहली बात थी कि बिहार राज्य में योजना विकास की प्रगति सभी राज्यों से कम है। दूसरी बात थी कि बिहार की वास्तविक योजना का आकार करीब १३०० करोड़ के आस-पास होगा जो भारत के सभी ऊपर नामित १३ राज्यों की उपलब्ध धनराशि से कम है। १९९८-९९ में राज्यवार प्रति व्यक्ति योजनागत व्यय बिहार में २३३ रुपये है जबकि आसाम में ५०० रुपये और उड़ीसा में ६९७ रुपये रहा। तीसरी बात आई थी कि २०००-२००१ में ग्रामीण विकास के लिए भारत सरकार से जितना पैसा प्राप्त हुआ, उसमें से ४३४ करोड़ ९ लाख रुपये खर्च नहीं किए जा सके। पिछले दस सालों में वृहत और मध्यम सिंचाई की एक भी योजना बिहार में पूर्ण नहीं की जा सकी है। बिहार में बिजली उत्पादन की क्षमता १५ से २० प्रतिशत रही जबकि अन्य राज्यों का औसत ६७ प्रतिशत है। बिहार रोड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन की मात्र सौ बसे हैं और कर्मचारियों की संख्या ७,००० है। रोड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन का अभी तक का घाटा ६०० करोड़ रुपये का है। बिहार में ५० लाख परिवार अभी गृह विहीन हैं और प्रत्येक साल गृह विहीनों की संख्या बढ़ती जा रही है।

यह मैं अपनी बात नहीं कह रहा हूं, यह सरकारी जवाब है, जिसमें बिहार सरकार के विकास आयुक्त श्री पी. सिन्हा थे।…( व्यवधान)

एक माननीय सदस्य : यह तो सभी जानते हैं।

श्री राधा मोहन सिंह: यह तो सभी जानते हैं और वे जो बोले, वह सब नहीं जानते थे क्या?रघुवंश बाबू जब बोल रहे थे तो सब अनजान लोग बैठे हैं क्या? …( व्यवधान)

सभापति महोदय : कोई माननीय सदस्य बीच में टोका-टाकी न करें। राधा मोहन सिंह जी, आप आसन की तरफ देखकर अपनी बात कहें।

   

श्री राधा मोहन सिंह: बिहार में जनसंख्या वृद्धि दर १९८१-९१ में २३.३८ प्रतिशत थी तो १९९१-२००१ में बढ़कर २८.४३ प्रतिशत हो गई। अब बिहार राज्य की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है। उसी रिपोर्ट में आगे कहा है कि राष्ट्र के जी.डी.पी. विकास दर ६.५ परसेंट की है, जिसकी तुलना में राज्य सरकार की मौजूदा विकास दर एक परसेंट है। राष्ट्र की ४७ परसेंट आबादी गरीबी की रेखा के नीचे की तुलना में इस राज्य में आम तौर पर ५४ प्रतिशत गरीबी है। इस राज्य की प्रति व्यक्ति निवल घरेलू उत्पाद दर २१९७ रुपये है, जबकि झारखण्ड के लिए यह आंकड़ा ४१६५ रुपये है। बिहार में बढ़ते हुए वित्तीय घाटे के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारकों में से जो उन्होंने खुद दिया है, सभी स्तर पर सरकार का बड़ा स्वरूप, ब्लॉक स्तर से मंत्रालय और उसके विभागों तक भारी भरकम मंत्रालयों, विभागों और उनके कार्यालयों के कारण बहुत अधिक व्यय है। साथ ही सरकार में नौकरशाही कार्यक्षमता और अनुशासनहीनता, गैरजिम्मेदाराना व्यवहार जैसी प्रवृत्तियां बढ़ी हैं और इसके लिए आवश्यक है कि सरकार की मशीनरी का आकार छोटा किया जाये।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप राज्य वित्त आयोग की रिपोर्ट पढ़ रहे हैं क्या?

श्री राधा मोहन सिंह:मैं यह बताना चाहता हूं कि बिहार सरकार की कुल आमदनी का ८० प्रतिशत हिस्सा या तो केन्द्र द्वारा राज्यों को दिया जाने वाला अंशदान है, या बाजार से लिया गया कर्जा है और इस सारी स्थिति के सम्बन्ध में विचार करने के लिए आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए बिहार की सरकार ने ही, …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप उद्धृत कर सकते हैं, लेकिन लाइन दर लाइन नहीं पढ़ सकते हैं।

   

...( व्यवधान)

 

सभापति महोदय : मंडल जी, आप बैठ जाइये। आप सदन में अनावश्यक बात बोलते हैं। आपको आसन के प्रति ऐसा बोलने का हक नहीं है। आप सदन की संचालन नियमावली पढि़ये।

श्री राधा मोहन सिंह: बिहार में बुनियादी आर्थिक सुधार के लिए, निवेश का वातावरण तैयार करने और आधारभूत संरचना की निर्माण करने तथा प्राथमिक खर्च में कटौती करने के लिए श्री ईरानी, डी.पी. यादव और एस.सी. झा की अध्यक्षता में तीन आयोग बनाये गये। तीनों आयोगों की जो रिपोर्ट है, वह सरकार के अन्दर फाइल में बिल्कुल बन्द है। हम बिहार के लिए जो पैकेज की मांग करते हैं या देते हैं, हम तो सरकारी पक्ष के हैं, लेकिन अभी सरकार कुछ विशेष अनुदान बिहार को देती है या जो मांग रहे हैं तो मांगने वाले और देने वाले, दोनों को विचार करना पड़ेगा कि हमने जो पहले दिया, उसका क्या हुआ? माननीय रघुवंश बाबू को नहीं जाना चाहिए।

बिहार लगातार प्रगति के दौर में पिछड़ रहा है और अभी बिहार की लगभग ५५ प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे है। ऐसी स्थिति में बिहार सरकार के वभिन्न विभागों द्वारा साल दर साल नियोजित राशि खर्च न पाने और वित्तीय वर्ष के अन्त में सरेण्डर हो जाने, इस पर निश्चित रूप से विचार करना पड़ेगा। यदि सरकार कुछ देना चाहती है तो उसे और जो लेना चाहते हैं, उनको भी इस पर विचार करना पड़ेगा। मैं जो बातें कह रहा हूं, मैं अपनी बात नहीं कह रहा हूं। अभी पटना उच्च न्यायालय की खण्डपीठ के सामने बिहार के वित्त आयुक्त ने एक लोकहित याचिका के दरम्यान शपथ-पत्र दाखिल किया है। उसमें उन्होंने स्वीकार किया है कि पिछले पांच से दस सालों के अन्दर नौ सरकारी विभागों ने लगभग ७०० करोड़ रुपये सरैण्डर किये। बाकी विभागों के आंकड़े उस समय तक उपलब्ध नहीं थे। मैं सदन के सामने कह रहा हूं कि निश्चित रूप से मांगने वाले को और देने वालों को भी इस पर विचार करना चाहिए कि ७०० करोड़ रुपये जो सरैण्डर किये, उनका उपयोग क्यों नहीं हुआ? यदि ईरानी कमेटी की रिपोर्ट और डी.पी. यादव ने जो लिखा है, जिसके अन्दर योजना आयोग के अधिकारी और विकास आयुक्त ने मिलकर जो रिपोर्ट दी है, पहले हम उसको लागू करने का तो विचार करें। इसके अलावा जैसे हमने अनुदान के रूप में बिहार के अन्दर किसानों के लिए दिया, इस पर बहुत हल्ला हुआ।

इस सदन के अंदर बहुत हंगामा हुआ कि भारत सरकार बिहार के धान उत्पादक किसानों की चिंता नहीं कर रही है। आप भी वहां के कई क्रय केन्द्रों में गये थे और मुझे भी जाने का मौका मिला। बिहार के अंदर ५० करोड़ रुपये के चावल खरीदे गये। भारत सरकार ने एफसीआई का केन्द्र खोला। वहां स्टॉफ में दो लोग रखे और बिहार सरकार को कहा कि आप किसानों से चावल खरीदकर लाइए और पचास करोड़ रुपया जो भारत सरकार का निर्धारित मूल्य है, वह हम आपके माध्यम से किसानों को देते हैं। बिहार सरकार ने कुछ पैक्स की बात कही। कलैक्टर ने एफसीआई के पास पैक्स की सूची भेजी और डीसीओ ने सर्टफिकेट भी दे दिया कि यह पैक्स चावल आपको देगा। पैक्स के सैक्रेटरी होते हैं, मैनेजर सरकार के होते हैं, सहायक निबन्धक एवं डी.सी.ओ. राज्य सरकार के होते है । इन लोगों ने मिल मालिकों से चावल खरीदकर भारत सरकार द्वारा दिये गये पचास करोड़ रुपये जो किसानों को सब्सिडी के रूप में मिलने थे, वह पैसा बिहार सरकार ने दलालों को दे दिया, व्यावसायियों को दे दिया। उत्तर प्रदेश के अंदर से चावल खरीद-खरीद कर पैक्स के नाम पर जमा किया।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : कांति सिंह जी, आप बैठ जाइए।

श्री राधा मोहन सिंह: मैं उदाहरण देकर बता रहा हूं कि कैसे खरीद होती है।…( व्यवधान)

मैं गोपालगंज गया था और वह जिला बाढ़ से प्रभावित हुआ था। गोपालगंज जिले का आधे से ज्यादा प्रखंड जिसमें एक पंचायत ऐसी थी जहां रिलीफ के समय २०० क्िंवटल चावल बांटे गये थे। एक किलो धान पंचायत में नहीं हुआ लेकिन उस पंचायत के पैड्स के सैक्रेटरी को वहां का डीसीओ, कलैक्टर सर्टफिकेट देता है यह २०० क्िंवटल चावल यहा के किसानों से खरीदकर ले जा रहे हैं, एक मुहर लगाता है और हमारे एफसीआई के मैनेजर को खरीदना पड़ता है, उसका घेराव होता है और इस प्रकार से पूरे बिहार में किसानों को दिये जाने वाले चावल के दाम पर जो सब्सिडी का पैसा था, बिहार सरकार ने उस पैसे को दलालों को दे दिया और फिर पैकेज की मांग कर रहे हैं, विशेष अनुदान की मांग की जा रही है। जो दिया वह तो किसानों तक पहुंचने नहीं दिया और मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि यही हाल इस गेहूं खरीदने में होगा कि ये इनके फर्जी टैक्स हैं कि हम किसानों को यह पैसा नहीं दे सके। अभी-अभी बिजली के संबंध में बात हो रही थी। अभी मई के प्रारम्भ में ही बिजली मंत्री यहां आये थे। भारत सरकार के बिजली मंत्री के साथ बैठक हुई थी और उस बैठक में यह बात आई थी कि यहां पर बिहार के अंदर चालू वित्त वर्ष में ६८७३ गांवों को ऊर्जान्वित करना है जिसमें १७४४ गांव नये गांव हैं और ५१३२ गांवों को पुनर्वासन योजना के अंतर्गत ऊर्जान्वित करना है और इस कार्यक्रम के लिए उन्होंने १९० करोड़ रुपेय की मांग की थी जबकि भारत सरकार पहले ही इसके ऊपर लगभग ३४ करोड़ रुपये से ज्यादा दे चुकी है और बाकी भी देने के लिए बैठी है लेकिन इसके पहले जो ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए जो जवाहर रोजगार योजना, ग्राम समृद्धि योजना के अंदर जो पैसा गया है, हरिजन बस्तियों के लिए जो गया था, उस पैसे का उपयोग क्या बिहार में हो रहा है? मैं अपनी बात नहीं कह रहा हूं। यह बिहार का हिन्दुस्तान अखबार है और बिहार सरकार के बिजली मंत्री क्या कहते हैं, रघुवंश बाबू रहते तो मैं उनको सुनाता लेकिन कांति सिहं जी आप उन तक यह संदेश जरूर पहुंचाइएगा। तारीख २२ मार्च के ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में बिहार के बिजली मंत्री ने यह स्वीकार किया है कि बिजली की चोरी से हर साल राज्य सरकार को २००० करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। अभी राज्य के बीस बिजली इंजीनियर्स के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाये तो बिजली की चोरी रुक गाएगी लेकिन मंत्री जी ने यह नहीं बताया कि उन इंजीनियर्स पर केस करने में कौन सी बातें बाधक हैं जिनको कई दूसरे लोग जानते हैं औऱ बिजली मंत्री भी जानते हैं कि कौन सी बातें बाधक हैं और वे यह भी जानते हैं कि कैसे २००० करोड़ रुपये की हर साल बचत हो सकती है लेकिन उन बीस इंजीनियर्स के सामने वे लाचार हैं। कौन उन्हें लाचार बना रहा है और वे ऐसा बिहार और बिजली बोर्ड चला रहे हैं जहां हर साल २००० करोड़ रुपये की लूट हो रही है। यह बिहार की गरीब जनता के प्रति अक्षम्य अपराध है। मंत्री जी सब कुछ जानते हुए भी इस्तीफा नहीं देते तो इसका मतलब क्या लगाया जाये? मतलब समझने को वे स्वतंत्र हैं पर ऐसी बातों की चिंता भी किसको है?चलिए, शकील अहमद साहब ने इस सच्चाई को स्वीकार तो कर लिया। दूसरे किसी मंत्री में इतनी हिम्मत भी नहीं है।

यह खबर २२ अप्रैल के हिन्दुस्तान अखबार में है।

महोदय, बिहार में बिजली उत्पादन के लिए पैकेज की मांग की जा रही थी और सड़क के बारे में भी बात कही गई। जब हम सड़क के बारे में चर्चा करते हैं, तो हमें और आपको एक बात पर जरूर ध्यान देना होगा। नेशनल हाई-वे के लिए भारत सरकार राशि आबंटित करती है, लेकिन राज्य सरकार की सड़क की क्या हालत है, इस पर भी आपको ध्यान देना होगा। देश के अन्दर राजमार्गों की लम्बाई प्रतिवर्ष बढ़ रही है। हर राज्य में पीडब्ल्युडी द्वारा सड़क की लम्बाई बढ़ रही है। आपको सुनकर आश्चर्य होगा, राजद की सरकार के आने से पहले राज्य में २२१८ किलोमीटर नेशनल हाई-वे था और जब माननीय राजनाथ सिंह जी इस विभाग के मंत्री बनें, उसके बाद से ३३०१ किलोमीटर लम्बाई बिहार में हो गई, यानि एक हजार किलोमीटर की वृद्धि हुई। पीडब्ल्युडी रोड के मामले में आन्ध्रा प्रदेश में ८८०६ किलोमीटर सड़क है, गुजरात में १९,७६१ किलोमीटर, कर्नाटक में ११,३९५ किलोमीटर, मध्य प्रदेश में ११,७८९ किलोमीटर, महाराष्ट्र में ३२,३५९ किलोमीटर, राजस्थान में १०४७ किलोमीटर, उत्तर प्रदेश में ९,६४७ किलोमीटर, उड़ीसा में ४,५८४ किलोमीटर और बिहार में मात्र ४०९२ किलोमीटर सड़क है। चार्ट के अनुसार हर राज्य में सड़क की लम्बाई बढ़ी है। बिहार में १९९०-९१ में सड़क की लम्बाई ४१९२ किलोमीटर थी और १९९६-९७ में वह ४०९२ किलोमीटर रह गई अर्थात् बिहार ही एक ऐसा राज्य है, जहां एक सौ किलोमीटर सड़क में कमी आई है। पिछले दस वर्षों में बिहार एक इंच भी सड़क का निर्माण नहीं कर सके हैं। रघुवंश प्रसाद जी ने ईमानदारी के साथ बिहार की स्थिति का वर्णन किया है। उनकी ईमानदारी पर सन्देह नहीं किया जा सकता है, परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। मैं सदन को बताना चाहता हूं कि प्रधान मंत्री सड़क परियोजना के लिए सन् २०००-२००१ में १५० करोड़ रुपए और सन् २००१-२००२ में ३०० करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया, लेकिन इंच भी सड़क कहीं पर भी नहीं बनी है। इसमें भारत सरकार की क्या जिम्मेदारी है, वह अलग विषय है। बिहार राज्य की सरकार माननीय लालू जी चलाते हैं और वे निश्चित रूप से गरीबों के प्रति उनकी हमदर्दी है, प्यार है और वे चाहतेहैं कि बिहार का विकास हो, लेकिन उनके इर्द-गिर्द जो लोग रहते हैं, वे उनको सही जानकारी या सुझाव नहीं देते हैं।

   

१७.२८ hrs. (Dr. Laxminarayan Pandeya in the Chair) मैं सदन को एक जानकारी देना चाहता हूं। लालू जी चुनाव प्रचार के दिनों में कहीं जा रहे थे और रास्ते में रोड बन रहा था। उनके साथ एक-दो सासंद भी थे। लालू जी ने पूछा, क्या हमारे यहां प्रधान मंत्री सड़क योजना पर कार्य शुरु हो गया है? उनके साथ जो सांसद महोदय चल रहे थे, उन्होंने कहा - हां, शुरु हो गया है। लेकिन दस दिन के बाद जब पदाधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें वे सांसद भी मौजूद थे, उन्होंने कहा कि हमारे यहां बिहार में प्रधान मंत्री सड़क योजना पर काम नहीं हो रहा है। फिर लालू जी ने उसी सांसद महोदय से पूछा कि तुम कह रहे थे कि प्रधान मंत्री सड़क योजना पर काम शुरु हो गया है। …( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह (आरा):मैं भी सांसद हूं। मेरे क्षेत्र में प्रधान मंत्री सड़क योजना के अन्दर पांच किलोमीटर सड़क बनी है। …( व्यवधान)

श्री राधा मोहन सिंह:अभी टैंडर फाइनल नही हुए हैं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप आसन की ओर देखिए।

   

…( व्यवधान)

 

सभापति महोदय : राधा मोहन जी के अलावा किसी भी बात का उल्लेख रिकार्ड में नहीं किया जाएगा।

श्री राधा मोहन सिंह: महोदय, ४५० करोड़ रुपए का उपयोग बिहार में नही हुआ है।

बिहार के अंदर जो केन्द्र प्रायोजित अन्न की योजनाएं हैं, उन योजनाओं के संबंध में मैं सदन के सामने बताना चाहूंगा कि बिहार की कैसी शर्मनाक स्थिति है। फरवरी २००१-२००२ के दौरान, फरवरी, २००२ तक अंत्योदय अन्न योजना सहित गरीबी रेखा के नीचे के अधीन खाद्यान्नों का आबंटन बिहार के लिए चावल ६५३.५३ टन हुआ, जिसमें मात्र ९०.६८ हजार टन का उठान हुआ। मुफ्त में चावल, गरीबों के लिए चावल दो-तीन रुपए किलो और इस चावल का ६५३.५३ हजार टन आबंटन हुआ और मात्र ९०.६९ हजार टन का उठान हुआ, यह २००१-२००२ में था। गेहूं का आबंटन ११६०.२५ हजार टन हुआ, जिसमें ३१८.१० हजार टन उठान हुआ, चावल १३.८८ प्रतिशत एवं गेहूं २७.४२ प्रतिशत का उठान हुआ, जबकि तमाम राज्यों में गेहूं एवं चावल का ५० प्रतिशत से ९८ प्रतिशत से कम कहीं उठान नही हुआ है। …( व्यवधान)

महोदय, मैं उदाहरण के लिए बताना चाहूंगा कि आंध्रा प्रदेश में चावल का उठान ६५.४२ प्रतिशत, अरूणाचल प्रदेश में ९८.४१ प्रतिशत, असम में ७७.८१ प्रतिशत और बिहार में मात्र १३.८८ प्रतिशत हुआ। इन्हें कौन सा पैकेज मिला। छत्तीसगढ़ में ५५ प्रतिशत उठान हुआ, दिल्ली में ८१ प्रतिशत, गोवा में ५७ प्रतिशत, गुजरात में ५६ प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में ५७ प्रतिशत, झारखंड में ४० प्रतिशत उठान हुआ। इसके उठान के लिए पैसा नहीं है। अनाज, चावल आदि के लिए पैसा नहीं है। यह हालत बिहार की है। केन्द्र सरकार ने इंदिरा आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना, ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम, ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम, जवाहर ग्राम समृद्धि योजना, राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना, अन्नपूर्णा योजना, अंत्योदय योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना तथा सुनिश्चित रोजगार योजना आदि के तहत हजारों-करोड़ों रुपए उपलब्ध कराए हैं, जिसमें केन्द्र सरकार का अंशदान ८० प्रतिशत तथा बिहार सरकार का २० प्रतिशत है। गत वित्तीय वर्ष में बिहार को दिया गया। इसकी ७० प्रतिशत ही राशि बिहार सरकार उपयोग कर सकी। कुछ योजनाओं की इंदिरा आवास योजना की उपलब्धि मात्र ५९ प्रतिशत रही। ये लोग बाढ़-सुखाड़ की बातें करते हैं। सुखाड़ोन्मुख कार्यक्रम की उपलब्धि मात्र ४० प्रतिशत रही है। ...( व्यवधान)

महोदय, सीएजी रिपोर्ट आई थी। अभी रघुवंश बाबू बाढ़ एवं सुखाड़ की बहुत चर्चा कर रहे थे कि बाढ़ और सुखाड़ के लिए केन्द्र सरकार क्या करती है। सीएजी रिपोर्ट में साफ लिखा है - Of the Rs.7 crore obtained during 1999-2000 from the Prime Minister’s Relief Fund, Rs.2.18 crore remained unutilised and was retained in the bank account by the Department.

रुपए पड़े हैं, लेकिन उनका खर्च नहीं हुआ। हम जब प्रधानमंत्री जी के यहां मांगने के लिए गए थे, उसके पहले भी बहुत पैसे गए हैं। वे पैसे कहां खर्च हुए, इसकी कोई रिपोर्ट नहीं आई। हमारे बहुत से सांसद वहां गए थे, उन्होंने अधिकारियों को बुलाया, हम कोई उत्तर देने लायक नहीं थे। जिस बिहार का इतना बड़ा अतीत है। निश्चित रूप से दस वर्षों के अंदर वहां जो कुछ हुआ है, उसके कारण हमें अपना सिर झुकाना पड़ता है। सारे अधिकारियों के सामने हम उत्तर देने के लायक नहीं थे।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Dr. Raghuvansh Prasad Singh! He is not yielding.

श्री राधा मोहन सिंह:महोदय, शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति और भी ज्यादा खराब है। केन्द्र सरकार के ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के तहत मिले पैसों का उपयोग पिछले १२ वर्षों में सिर्फ १४ प्रतिशत हुआ है। बिहार इस देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां कि साक्षरता दर ५० प्रतिशत के नीचे है। इस योजना के तहत १९८७ से १९९४ के बीच केन्द्र ने ४२१ करोड़ रुपए मुहैया कराए, जबकि १९९९ के अंत तक मात्र सात करोड़ रुपया खर्च किया गया। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ऑपरेशन ब्लैक-बोर्ड के तहत १९८७ से १९९४ के बीच ४२१ करोड़ रुपया बिहार सरकार को मुहैय्या कराया गया लेकिन उसमें से केवल ६० करोड़ रुपया ही १९९९ के अंत तक खर्च हुआ। जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत ४३५ करोड़ रुपया उपलब्ध कराया गया जिसमें से अभी तक १०५ करोड़ रपुया ही खर्च हुआ है, जबकि इसको २००३ तक खर्च करना है। इसी तरह से प्राथमिक विद्यालयों में केन्द्रीय सहायता से निर्मित होने वाले भवनों और शौचालयों की गति भी शौचनीय है। मिड-डे मील की योजना भी ठप्प है जबकि यह मुफ्त में उन्हें दिया जा रहा है लेकिन उसको स्कूल तक पहुंचाने के लिए भी सरकार के पास पैसा नहीं है।

महोदय, द्वितीय वर्ष २०००-२००१ में केन्द्र सरकार द्वारा २९ करोड़ रुपया उपलब्ध कराया गया था। बिहार में लघु-सिंचाई योजनाओं के लिए द्वितीय वर्ष में उपलब्ध कराये गये ५५ करोड़ रुपये की राशि भी बिहार सरकार उपयोग नहीं कर पाई। बिहार में दलहन और तिलहन की उपज बढ़ाने के लिए असीम संभावनाएं हैं। केन्द्र सरकार ने कुछ इलाकों की पहचान की थी औंर बिहार की इसी क्षमता को मद्देनजर रखकर १०४ करोड़ रुपया और ८३ करोड़ रुपया बिहार सरकार के पिछले वित्तीय वर्ष में उपलब्ध कराया गया था लेकिन इसका भी उपयोग बिहार सरकार नहीं कर पाई। इसी प्रकार टाइगर प्रोजैक्ट के लिए उपलब्ध कराई गयी ५५ करोड़ रुपये की राशि का भी उपयोग नहीं हो सका। गत द्वितीय वर्ष में केन्द्रीय प्रायोजित योजना में ७०० करोड़ रुपये की राशि जिसकी चर्चा मैंने पहले की, उसको भी सरैंडर किया गया।

चारा घोटाला, अलकतरा घोटाला जो हुआ, उसकी चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।…( व्यवधान)बिहार की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए, चीनी मिलों के पुनरुद्धार के लिए भारत सरकार ६०० करोड़ रुपया मुहैय्या करा रही है और उसके लिए एक सलाहकार भी नियुक्त किया गया है…( व्यवधान)बिहार की हालत सचमुच भयावह है…( व्यवधान)रघुवंश बाबू विद्वान हैं, प्रोफैसर हैं। उनको ध्यान में रखना चाहिए कि प्रो. ल्यूड्स ने कहा था कि कोई भी अविकसित देश या राज्य हो, उसे ध्यान में रखना चाहिए कि आर्थिक विकास के तीन तात्कालिक कारण हैं। बचत का प्रयत्न, ज्ञान का संचय और पूंजी का संचय। माननीय रघुवंश जी का अखबारों में बयान आया है और वे बड़ी ईमानदारी से बोलते हैं। उन्होंने कहा है कि बिहार के अंदर योजना के पैसों को सब अधिकारी लूट रहे हैं। लेकिन एक बात उन्होंने नहीं कही कि नेताओं के संरक्षण में लूट रहे हैं। निश्चित रूप से रघुवंश बाबू के इन विचारों से मैं समहत हूं। उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा कि बिहार में कुछ बचा नहीं है और आगे बोले कि बाढ़, सुखाड़, आलू, बालू, भालू, लालू - यही बचे हैं। बिहार पिछले दस वर्षों के अंदर विनाश के कगार पर पहुंच गया है। मैं भारत सरकार के माननीय मंत्री जी से निवेदन करुंगा कि जिन पैसों का उपयोग बिहार नहीं कर पा रहा है और जो पैसे बिहार द्वारा सरैंडर किये जा रहे हैं, उनके लिए भारत सरकार विचार करे। मेरा तो सुझाव होगा कि जो पैसे बिहार सरकार खर्च नहीं कर पा रही है उन पैसों को सांसदों के जिम्मे करिये क्योंकि सांसद महोदय भी अपनी राशि बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। बिहार के सारे सांसद उसकी अनुशंसा करें और उसमें अपना भी कुछ पैसा लगा दें जिससे उनकी भी इसमें भागीदारी हो। दूसरा मेरा सुझाव होगा…( व्यवधान)जो सरकार द्वारा नियुक्त श्री जे.ईरानी आयोग, श्री एम.सी.झा आयोग और श्री डी.पी.आयोग - कांग्रेस के साथ मिलीजुली सरकार ने तीन आयोग बनाये थे।

बिहार को यदि बचाना है तो वहां की राज्य सरकार द्वारा नियुक्त श्री जे. इरानी आयोग, श्री एस.सी. झा आयोग तथा श्री डी.पी. यादव आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों को अविलम्ब लागू किया जाए। ये सिफारिशें आज बिहार सरकार की अलमारी में धूल फांक रही हैं। उन सिफारिशों को निकाल कर उन्हें लागू किया जाए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

SHRIMATI SHYAMA SINGH (AURANGABAD, BIHAR): Sir, how much time I will get from the Chair?

MR. CHAIRMAN : About 25 minutes.

SHRIMATI SHYAMA SINGH : Mr. Chairman, Sir, with a deep sense of despair I rise in this august House to speak on a very important subject which I suppose concerns teaming millions of people in this country, especially from the State of Bihar from where I come, where the State has been thrown into a great turmoil due to a lot of crises natural and unnatural over a period of many years.

Bihar was once a very historical State. It had a hallowed history. It was Bihar that gave the world its first republic. It was in Bihar that Chandragupta Maurya and Ashoka ruled. It was again in Bihar that Mahatma Gandhi started on his salt Satyagraha and he worked for the labourers in the plantations of the Indigo in the West Champaran areas of Bihar; and supported by leaders, in Bihar, he was able to get his demands met. Bihar was on the roads to a lot of progress.

Unfortunately in the last few years, we have seen Bihar getting into a lot of crises natural and unnatural. It is a matter of great concern because I find that the people in Bihar are extremely innovative; they are very intelligent; they have a lot of industrious labour in them; they work in factories; they work overtime as autorickshaw drivers; they work as security personnel; they are very good at work in the farms. In fact, most of the labourers supplied by Bihar are working in Punjab which has made Punjab very prosperous. Why then is Bihar in such a distressed condition? There must be very very valid reasons for it.

I will come straight to the subject now – the economic package for Bihar. During the discussion on the States’ Reorganisation Bill, in this House, an assurance was given by the NDA Government that Bihar will get a very special economic package. It has been 22 months since that announcement was made on the floor of the House. Could I ask the Government what steps they have taken during the last 22 months to see that even a Cell was constituted? Members from all sides, cutting across party lines, were a part of that assembly where they were deciding on the economic package for Bihar. What have they done in these last 22 months? I insist that they will push these things forward for the simple reason that we feel that we owe a lot of responsibility to a State that we belong to. After all, the sufferings of the people have to be eliminated by some way or the other.

When we talk of Bihar, people either ridicule it or they have some cynicism in their voices. I wonder why. Bihar was one of the richest States in the country. It had all the natural resources at its command. It had all the facilities. It had human resource. It had everything that makes a State very prosperous.

As far as learning was concerned, Dr. Raghuvansh Prasad Singh dwelt at great length about all the stalwarts that Bihar produced. He talked about the freedom fighters who took part in the freedom movement, about the natural resources, having harnessed a lot of minerals, coal, electricity, etc. All of a sudden, we still feel that we are in a state of utter crisis. For these things, I do not think that I am here to blame either the Central Government or the State Government. The point is that we are in a state of crisis and we have to be bailed out by the Government that is in power here.

Coming to the point, there are four important points to which I would like to draw the attention of the hon. Minister, who presently is not here. Bihar today stands at crossroads. On the Index of human development released by the Planning Commission recently, it ranks at the bottom; on the Index of poverty, the percentage of people below the poverty line is at its highest in India; on the Index of energy availability, the per capita consumption is perhaps the lowest in the country.

What is the future of the 80 million people who are still left behind after the bifurcation of the State? Any Bihar Package must address these concerns. It must bring Bihar back to the mainstream of the developed States.

It is unfortunate that even though the Cabinet had approved a Bihar Package long ago, no package has been announced so far. The Cabinet had also decided that a Cell under the Deputy Chairman, Planning Commission would monitor the package. We have not been informed of any such Cell having been formally constituted or ever met.

We hear alarming reports that this year’s annual package might not exceed Rs.1,000 crore. This is a pittance. The Bihar Assembly had asked for a package of Rs.1,50,000 crore and the Bihar Government had submitted projects worth Rs.1,00,000 crore. We demand a package which is reasonable to redress Bihar’s development process.

The package must comprise six core elements. Most important is the power sector. It must improve Bihar’s energy availability. The North Bihar area has no transmission and distribution system worth the name. The result is, even the small amount of energy available from Chukkla Power Station and Central utilities, cannot be effectively utilised. The package must finance credible transmission and distribution network.

Furthermore, after the separation of Bihar, most power stations have gone away to Jharkhand. The package must revive for seed money to NTPC and other Central utilities for undertaking construction of new thermal power stations, particularly for expansion of Muzaffarpur and Nabhi Nagar. Power availability must be substantially augmented.

Sir, in this connection, I would like to inform the august House that way back in 1989, when Shri Rajiv Gandhi was our Prime Minister, seeing the conditions prevailing in the State of Bihar, he announced a package programme for Bihar. This package included the Super Thermal Power Station at Nabhi Nagar, which happens to be in my parliamentary constituency of Aurangabad. As we all know – all of you must have read it in the newspapers - Aurangabad is a naxalite-prone area. PWG and Ranvir Sena work there. Bihar has all kinds of difficult situations. We have no connectivity by roads and the rural area stands totally isolated. In this background, the Super Thermal Power Station was essential for the South-Central Bihar. It would have brought not only relief but also employment for the people of that area. It is unfortunate that due to partisan or whatever reasons, the Government found it fit to shelve that programme. It required 24 requisites, which we had fulfilled. The market feasibility was also worked out but one fine morning we found the Prime Minister inaugurating a new thermal station at Barh, which happens to be the constituency of Shri Nitish Kumar. It sounds very well because it is a part of development of the State of Bihar and I quite endorse it but not at the cost of a project which was already in the pipeline.

I would, therefore, request the hon. Minister to kindly look into this matter seriously and ensure that either the NTPC or any other agency delivers us this station at Nabhi Nagar in Aurangabad. This will go a long way in alleviating the sufferings of the people of that area. It will also generate employment opportunities which are very much needed for the development of that State.

We have no connectivity through roads. All our talks about agriculture, looking after the needs of the farmers, subsidy given to the farmers, etc. come to naught since we have no roads in Bihar. This has been the major problem of the State for the last 20 years. In the last few years, we have found that whereas development has taken place across the States throughout the country, Bihar has been a neglected zone. Since now the Minister is present in the House, I would request her to constitute a group of people who could go and see for themselves under what abject conditions the people of that area are living. I would be failing in my duty if I do not bring to the notice of the House the lack of a well-developed transport system in the State. Our life depends on that because 80 per cent of the people of Bihar are engaged in farming.

The farmers find it of great hardship to operate during the monsoon and when they want to sell their grains. There are no roads. Therefore, the aspect of road connectivity about which the Prime Minister had also assured us in his economic package should be implemented as fast as possible.

Sir, the third and very important point is about irrigation capability. Sir, Bihar, as you know, is very rich as far as irrigation is concerned. It could have been harnessed properly. In the last few years, there have been floods galore. People have been rendered homeless. Almost half of Bihar that is present at the moment after the separation of Jharkhand, is totally flood-prone. Lots and lots of people are rendered homeless for almost six months of the year. You can imagine the situation when the population exodus has to take place at such a rapidity. When floods come, they have no protection over their heads or on the land. Therefore, I think, it is in the fitness of things that the Minister must focus attention on either constituting the flood protection or flood control schemes and anything that could help to see that the floods are controlled. It may be a project which will entail a lot of cost but then, at least, it will save people from the kind of trauma that they go through every year.

श्री रामजीलाल सुमन : सभापति जी, यह इतना गम्भीर मामला है और रूलिंग पार्टी बी.जे.पी. के एम.पीज. यहां नहीं है। इस समय सदन में सिर्फ ३० सांसद मौजूद हैं। सदन में कोरम ही नहीं है।…( व्यवधान)

श्री कीर्ति झा आज़ाद (दरभंगा) : इसमें समस्या वाली क्या बात है…( व्यवधान)बहस चल रही है, सब बैठे हुए हैं…( व्यवधान)आप क्यों परेशान हैं…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : क्या बिना कोरम के हाउस चलेगा।…( व्यवधान)सरकार की तरफ से कुछ गंभीरता होनी चाहिए। आपकी पार्टी के बिहार के कितने सांसद यहां हैं…( व्यवधान)

श्री कीर्ति झा आज़ाद : आपको सिर्फ गुजरात दिखाई देता है…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : सभापति जी, जब कोरम ही पूरा नहीं है तो हाउस कैसे चलेगा।

श्री कीर्ति झा आज़ाद : बिहार का मामला है, आप बिना मतलब बीच में खड़े हो जाते हैं।

श्री रामजीलाल सुमन : यह इतना महत्वपूर्ण मामला है…( व्यवधान)

सभापति महोदय : मि. सुमन, मुझे पता है यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है।…( व्यवधान)

               

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :सभापति जी, ...* एक भी यहां मुस्तैद नहीं है। यहां केवल ३० सांसद बैठे हैं…( व्यवधान)कोरम के लिए ५४ सांसद चाहिए।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: The concerned Minister is here and Shri Ram Naik is also here.

   

… (Interruptions)

 

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :...* … (Interruptions)

सभापति महोदय : यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है, कृपया इसे गंभीरता से लीजिए।

   

…( व्यवधान)

 

सभापति महोदय : प्रभुनाथ जी, एक महिला सदस्या बोल रही हैं, उसमें आप व्यवधान पैदा कर रहे हैं॥ SHRIMATI SHYAMA SINGH : Sir, I would like the Minister to pay special attention to improve the irrigation capability. The package must finance modernisation and upgradation of the existing waterways which had gone into disuse. It must utilise the abundance of water available in North Bihar for a massive programme started by NABARD. The programme announced last year did not take off the ground. South Bihar must have a string of water harvesting and water shedding programme. There must be marketing outlets for enabling agro-processing and marketing of agricultural products.

As I said earlier in my speech, the road connectivity is very important. In the economic package that has been announced on the floor of this House, the road connectivity is an important aspect of that.

सभापति महोदय : अभी रघुवंश बाबू ने बीच में कुछ बात कही थी, जो मैं देखूंगा। अगर उसमें कुछ असंसदीय बात होगी तो उसे रिकार्ड से निकाल दिया जायेगा।

* Expunged as ordered by the chair         SHRIMATI SHYAMA SINGH : The package must upgrade human resource development process. The universities in Delhi and various parts of the country are flooded with students who are coming from Bihar. We have a large bank of human resource. What happens to them? They go to Punjab and they go across all the States in the country but they are not utilised in Bihar. How is it possible for the people who live in Bihar not to be doing a bit of work but when they come to Delhi they shine on the top like a horizon? Sir, I am proud to inform that the person who has topped the Indian Administrative Service Examination also belongs to Bihar.

In fact, we should congratulate him. The person who has topped in the Civil Services examination this year is Mr. Alok Nath Jha from Bihar. Therefore, it is all the more necessary that the human resource must be properly utilised. Universities in Delhi and various other parts of the country are flooded with students migrating from Bihar. After partition of Bihar, it does not have a single IIT. There must be at least two IITs and engineering institutes must be upgraded to become centres of technical excellence. The demographic compulsions of Bihar must be harnessed to include the technical and human resource capability for enabling it to derive appropriate benefits available in the Internet age.

My next point is that the package cannot be left only to Government. The development of Bihar is not a political issue. It cuts across party lines. I would suggest the constitution of an All Party Standing Committee on Bihar development which can periodically meet and review the progress and the implementation of this economic package. I suggest to the Minister that she must call everybody from our Party, from her Party and across all party lines all Members of Parliament from Bihar. They all must meet and a Standing Committee must be constituted to monitor the economic package which has been announced on the floor of this House.

Finally, if there are weaknesses in the implementation, some other strategy must be devised. We have to find a strategy which bypasses implementation difficulties of State Governments. Wherever possible, these projects are implemented through Central Administrative Agencies or in a manner where objective decision making takes priority.

Time is running out. For over three years, the Government has done nothing. What I have said is the minimum that needs to be done if we are to have a semblance of fair play and impartiality in the State of Bihar. The 80 million people of Bihar cannot receive a raw deal. They are awaiting the outcome of Government’s decision on the package with hope and expectations. We should not let them down.

   

श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज):सभापति महोदय, यह सदन बिहार की बदहाली, गरीबी, बेबसी, लाचारी और बीमारी के संबंध में महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहा है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक जितनी भी सरकारें केन्द्र में बनीं, उन सरकारों ने बिहार के साथ भेदभाव किया, बिहार के साथ अनदेखी की, न्याय नहीं किया और जान-बूझकर बिहार को गरीबी के, बेबसी के, लाचारी के समुद्र में धकेलने का काम किया।

महोदय, जब देश आज़ाद हुआ था, देश में संसद बनी थी और देश की राजधानी में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग का निर्माण किया था। योजना आयोग का उद्घाटन करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि योजना आयोग का काम जहां देश का तीव्रता से विकास करने के लिए योजना की रूपरेखा तैयार करना है, वहीं देश में जो रीजनल इम्बैलेन्सेज़ हैं, जो क्षेत्रीय असमानताएँ हैं, उस खाई को पाटने का काम योजना आयोग करेगा। हमारे मित्र राधामोहन जी यहां नहीं हैं। सरकार का उत्तर तो उन्होंने ही दे दिया, मंत्री महोदया क्या उत्तर देंगी, हम नहीं जानते। प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर आज तक की योजनाओं में बिहार को प्रति व्यक्ति कितना धन मिला है दूसरे राज्यों की तुलना में, उसको अगर आप देखें तो कोई भी न्यायप्रिय आदमी जिसका इन चीजों से संबंध हो, वह कहेगा कि बिहार के साथ भेदभाव हुआ है।

महोदय, हमारे यहां बिहार में एक धरती के लाल, गरीबों के मसीहा, जननायक कर्पूरी ठाकुर बिहार के सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन के स्तम्भ रहे हैं।

18.00 hrs. सभापति महोदय, हम लोगों का सौभाग्य रहा है कि श्री कर्पूरी ठाकुर को बिहार विधान सभा में पक्ष और विपक्ष के रूप में, सरकार के मंत्री के रूप में और मुख्य मंत्री के रूप में उन्हें सुनने का अवसर मिला है। वे हर समय, बजट भाषण के समय कहा करते थे कि बिहार और विशेष कर उत्तर बिहार के संबंध में, उस समय झारखंड नहीं बना था, नेपाल से निकलने वाली नदियों से जो प्रति वर्ष नुकसान होता है, उससे बचाव का कोई स्थाई समाधान जब तक नहीं निकाला जाएगा तब तक बिहार की तरक्की और विकास नहीं हो सकता है।

महोदय, हर साल सड़क, अस्पताल, मकान बनते हैं, खेती होती है, फसल लगती है और फिर बाढ़ आती है और सबको अपने साथ बहा कर ले जाती है। सारे मकान, अस्पताल, स्कूल, खेत और जमीन सब बरबाद हो जाते हैं और उसकी भरपाई कोई नहीं करता। यदि बिहार की सरकार अपने पूरे संसाधन झोंक कर करना भी चाहे, तो संविधान के अनुसार ऐसा नहीं कर सकती है क्योंकि पूरे राज्य के विकास का पैसा केवल उत्तर बिहार पर व्यय नहीं कर सकती है। राधा मोहन जी जैसा कह रहे थे, यदि बिहार सरकार के सारे रिसोर्सेस को भी लगा दें, तो भी उसकी भरपाई नहीं हो सकती है। चूंकि नेपाल एक स्वतंत्र एवं सम्प्रभू गणराज्य है, इसलिए बिहार सरकार उससे बात नहीं कर सकती है। उससे भारत सरकार ही बात करे कि बिहार से उद्गम होने वाली नदियों में आने वाली बाढ़ से जो नुकसान होता है, उसे बांध बनाकर रोके अथवा बिहार में होने वाले नुकसान की क्षतिपूर्ति करे। यदि नेपाल सरकार ऐसा नहीं करती है, तो भारत सरकार को बिहार में आने वाली बाढ़ों के कारण होने वाली क्षति की भरपाई करनी चाहिए।

महोदय, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यह बर्बादी अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान मंत्री बनने के बाद होनी प्रारंभ हुई है। यह तो वर्ष १९५१ से ही हो रही है। उस समय से जितनी भी केन्द्र में सरकारें रहीं हैं सभी ने हमारे साथ भेदभाव किया है। उड़ीसा में तूफान आया, यह खुशी की बात है कि सारे देश ने, सारे राज्यों ने मदद की और भारत सरकार ने उसकी भरपाई की, लेकिन जब बिहार में बाढ़ आती है और सब कुछ बह जाता है, तो न तो भारत सरकार भरपाई करती है और न कोई राज्य सरकार सहायता देती है। हम जानना चाहते हैं कि इसमें बिहार के लोगों की क्या गलती है। इसलिए जब तक आप नेपाल से निकलने वाली नदियों में आने वाली बाढ़ को रोकने के संबंध में बात नहीं करते, तब तक बिहार की तबाही होती रहेगी। मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से मांग करता हूं कि बिहार में हर साल बाढ़ से होने वाली क्षति की भरपाई केन्द्र सरकार करे।

महोदय, आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां हम एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप नहीं लगाते, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। यह सवाल बिहार के जनजीवन के साथ, हमारी जिंदगी के साथ जुड़ा हुआ है। भारत सरकार की योजनाओं को बिहार सरकार क्यों इम्पलीमेंट नहीं करती, यह बिहार सरकार की कमजोरी है। मैं आज भारत सरकार से कहना चाहता हूं कि हमारा जो हिस्सा मारा जा रहा है, उस पर बहस करने के लिए मैं यहां खड़ा हुआ हूं। हमें हमारा हिस्सा मिलना चाहिए। पंचायत चुनाव का हमारा हिस्सा आपने रोक रखा है। पंचायत का चुनाव हो गया है। इसके ऊपर इस सदन में बार-बार चर्चा हुई है, सभी पक्षों के लोगों ने कहा है कि बिहार में पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण उसका जो पैसा तब नहीं दिया गया था, वह बकाया पैसा अब मिलना चाहिए, लेकिन आपने नहीं दिया।

महोदय, बिहार बंटा, झारखंड बना - इसके लिए केवल भारत सरकार जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए हम सब लोग भी जिम्मेदार हैं। हम सब ने ही बिहार विधान सभा से सर्वसम्मत प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा था कि झारखंड राज्य अलग बनाया जाए। इसलिए इस हेतु हम सब भागीदार हैं, लेकिन जब बिहार के बंटवारे पर इस सदन में चर्चा हो रही थी, तो माननीय गृह मंत्री सदन में मौजूद थे। उन्होंने वहां खड़े होकर कहा कि एक राज्य समृद्ध हो जाए और एक राज्य दरिद्र रहे, ऐसा नहीं होगी। अब हम उनसे पूछना चाहते हैं कि हमें दरिद्रता से उबारने का कौन सा उपाय है, हमें दरिद्रता से निकालने का कौन सा उपाय है, क्या बिहार के रिसोर्सेस बिहार को इस बेबसी से पार करा सकते हैं ? हमारी रायल्टी समाप्त हो गई, सारे उद्योग धंधे झारखंड में चले गए, जो बड़े-बड़े शिक्षा संस्थान थे वगैरह सब झारखंड में चले गए, जो आय के साधन प्रदेश के संसाधन थे, वे सब झारखंड में चले गए।

हमारा बंटवारा हुआ लेकिन हमें प्रसन्नता है कि वह राज्य विकसित है। वह राज्य और आगे बढ़े। हमें उससे कोई झगड़ा नहीं है लेकिन आपका जो फर्ज था, आपने जो वहां खड़े होकर कहा था कि योजना आयोग में एक डेडीकेटिड सेल बनायेंगे, उस डेडीकेटिड सेल की क्या फक्शनिंग होगी?हम जानना चाहते हैं कडेडीकेटिड सेल ने अभी तक क्या कुछ किया है और कितने दिन में डेडीकेटिड सेल का फैसला होगा? योजना आयोग ने हमारी तरक्की के लिए, विकास के लिए कौन सा काम किया है ? हम बिहार की पुनर्गाथा का बखान नहीं करना चाहता क्योंकि सारी दुनिया उसे जानती है। लेकिन बिहार जब अंगड़ाई लेता है तो उसका परिणाम बहुत भयंकर होता है, इसे भी सारी दुनिया जानती है।

बिहार में नक्सलवादी आंदोलन हुआ। इसके साथ-साथ बहुत सारी चीजें हो रही हैं। हम भले ही गाली देने के नाम पर कह दें कि राज्य सरकार इसके लिए जिम्मेदार है क्योंकि जो काम राज्य सरकार को करना चाहिए था, उसमें भी राज्य सरकार नकारा साबित हुई है। भारत सरकार से जो पैसा जाता है, उसके खर्च का यूटीलाइजेशन सर्टफिकेट भी वह नहीं दे सकती।

अभी रघुवंश बाबू ने बिजली के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि बिजली मंत्री आये थे। सब लोगों को बुलाया गया था। बिहार सरकार को एक पेपर गारंटी देनी थी लेकिन वह पेपर गारंटी भी नहीं दे रही। हमारा कहना है कि जो काम भारत सरकार को करना है, अगर वह उस काम को न करे तो यह सचमुच एक चिंता की बात है।

माननीय मंत्री जी से सारे सांसद मिले थे। हमें अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि बिहार के विकास में हम सब बाधक हैं। अगर बहुत बड़ा कारण नहीं होता, हम इसी सदन में देखते हैं कि छोटे-छोटे सवाल पर हमारे आंध्रा प्रदेश के भाई, केरल के भाई या दूसरी सब जगह के भाई दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर इस सदन में प्रधान मंत्री जी से लेकर सबके सामने उस सवाल को रखने का काम करते हैं। जब हम इस सदन में खड़े होते हैं, जिस बिहार में हमने जन्म लिया, जहां हम मरेंगे, जिसके विकास की जवाबदेही हमारे ऊपर है और जहां की जनता ने हमें चुनकर भेजा है, उसके लिए हम कुछ नहीं करेंगे तो यह अच्छी बात नहीं है।

अभी रघुवंश बाबू ने आंकड़े पढ़कर सुनाए हैं। मैं उस बात को दोहराना नहीं चाहता लेकिन उन्होंने जिन बातों को कहा है, उसका हम समर्थन करते हैं। हम रघुवंश बाबू जी से भी कहेंगे कि वे बिहार सरकार को प्रधान मंत्री सड़क योजना के बारे में कहें कि उसके लिए जो पैसा जा रहा है, उसको देखें। हो सकता है कि श्री राम प्रसाद जी के क्षेत्र में पांच किलोमीटर सड़क बनी हो और रघुवंश बाबू के क्षेत्र में न बनी हो। हमारे क्षेत्र में अभी शुरू ही नहीं हुई। इसके लिए सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया जाना चाहिए। गोपालगंज जहां मुख्यमंत्री का घर है, उसके बारे में कोई विवाद नहीं है लेकिन तीन-तीन किश्त का पैसा दिया गया है फिर भी वह सड़क नहीं बन रही। रोड का क्षेत्र हो, नैशनल हाईवे का क्षेत्र हो या दूसरी चीजों के क्षेत्र हों, हम कहना चाहते हैं कि उनके लिए बिहार को जो पैसा नहीं मिल पाया है, वह पैसा मिले। जो स्वीकृत स्कीमें हैं, उनको चालू किया जाये।

हम एन.डी.ए. के लोग हैं। यहां माननीय मंत्री जी बैठे हुए हैं। हम कहना चाहते हैं कि बिहार की जनता ने आपके साथ भेदभाव नहीं किया है। आप मुझे क्षमा करेंगे, प्रधान मंत्री जी जिस राज्य से चुनकर आये हैं, हमारे बहुत से मित्र यहां बैठे हैं, उत्तर प्रदेश ने आपको जो समर्थन नहीं दिया, अगर वही समर्थन बिहार भी आपको नहीं देता तो शायद हम ट्रेजरी बेंचिस में न बैठ होते और आप उस पद पर न बैठे होते।

इसलिए हम आपसे निवेदन करना चाहते हैं कि आप बिहार का हिस्सा देने का काम करें।

श्री सुबोध राय (भागलपुर):सभापति जी, मैं आदरणीय रघुवंश बाबू और रघुनाथ झा जी का बहुत आभारी हूं क्योंकि उन्होंने बिहार के बहुत बड़े सवाल को, जो जनता से सीधा जुड़ा हुआ सवाल है, उसे यहां रखने का प्रयास किया।

उन्होंने बिहार के हितों के संबंध में बहुत जोरदार ढंग से केन्द्र सरकार से मांग करने की बात की है। यह सभी को जानकारी है कि जिस दिन बिहार का बंटवारा हो रहा था, उस दिन हमारे गृह मंत्री जी ने इस बात का आश्वासन दिया था कि बिहार के हितों को अनदेखा नहीं किया जाएगा। जहां तक बिहार के विकास का सवाल है, प्लानिंग कमीशन के माध्यम से उनके तमाम हितों की पूर्ति की जाएगी। इसी को आधार बनाते हुए बिहार के सभी सांसदों ने मिल कर, जिसमें सब पार्टी के लोग थे, सभी इलाकों के लोग थे, प्रधान मंत्री जी को एक साथ जाकर ज्ञापन दिया था। प्रधान मंत्री जी ने भी उस दिन खुशी जाहिर की थी कि यह एक मौका है जब बिहार के सारे सांसद एक होकर अपने सवालों को उठा रहे हैं। मुझे ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता जिस वजह से आज इस सवाल पर दूसरे लोग भिन्न विचार रखने की बात कर रहे हैं। बिहार विधान सभा ने जिस दिन पुनर्गठन विधेयक का समर्थन किया था, उस दिन सर्वसम्मति से बिहार के विभाजन का सवाल उठा था। दूसरा सवाल था कि हमारे राज्य में एक लाख ८९ हजार करोड़ रुपये मांगे गए थे। यह स्पष्ट था जो बिहार विधान सभा के प्रस्ताव में शामिल था। यहां सिर्फ हमारी अकेली पार्टी थी, जिसने विभाजन का पूरे तौर पर विरोध किया था और कहा था कि यह पूरा धोखा है और इस धोखे में नहीं पड़ना चाहिए। इसका परिणाम बिहार की जनता और नेताओं को भुगतना पड़ेगा। आज डेढ़ साल बाद स्थिति साफ हो रही है और देखा जा रहा है कि हम किस तरह से ठगे और छले गए हैं। बिहार की जनता के लिए आज जो बातें की जा रही है, उसके साथ ऐसी राजनीति की जाती है, ऐसा रुख अख्तियार किया जाता है जिससे साफ जाहिर होता है कि बिहार का स्थान जैसे भारत के नक्शे से बाहर है। इस तरह सौतेलापन और उपेक्षा का जो रुख अख्तियार किया जाता है, उससे बिहार की जनता ही आहत नहीं होती बल्कि पूरी जनतांत्रिक प्रणाली, संसदीय प्रणाली को ही बहुत गंभीर आघात पहुंचाने की बात हो रही है।

इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि जिस मानसिकता के साथ हम लोगों ने भारत के प्रधान मंत्री जी को ज्ञापन दिया था, वह ज्ञापन रघुवंश बाबू ने तैयार नहीं किया था, वह सुबोध राय या कम्युनिस्ट पार्टी ने तैयार नहीं किया था. वह ज्ञापन श्री नीतीश कुमार, जो भारत के तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री थे, जिनको कोर कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था, उनके नेतृत्व में सबने अपनी-अपनी बातें कहीं थीं जो सर्वसम्मति से तय हुई थीं। इसलिए वह सबका मिला-जुला ज्ञापन है, किसी को उससे बाहर जाने की बात नहीं करनी चाहिए। बिहार का विकास कैसे होगा, नेपाल से बात करने का सवाल, पूरे उत्तर बिहार को बाढ़ से मुक्त करने का सवाल, वहां के विकास का सवाल, बिहार की जनता के रेल के विकास के सवाल, उद्योगों के विकास का सवाल, कृषि के विकास का सवाल, शिक्षा का सवाल आदि तमाम तरह की समस्याओं को उसमें रखने का पूरा प्रयास किया गया। जब यह नहीं हुआ तो पिछले साल बिहार की मुख्य़ मंत्री के नेतृत्व में बिहार विधान सभा के कई नेताओं, जिनमें मैं भी शामिल था, लालू प्रसाद जी भी थे, प्रधान मंत्री जी के निवास स्थान जाकर एक ज्ञापन दिया और स्मरण कराया कि बिहार को पैकेज मिलना चाहिए। बिहार में चीनी मिलें बंद हैं, बिहार में सिंचाई की बड़ी-बड़ी परियोजनाएं रुकी हैं जिसमें एक बड़ी परियोजना बटेश्वर गंगा पम्प नहर योजना २५० करोड़ रुपये की शामिल है। आप बताइए क्या बिहार सरकार उसे पूरा कर सकती है। तमाम चीनी मिलें बंद हैं, कपड़ा मिलें बंद हैं, जूट मिलें बंद हैं, १५-१६,००० फैक्टि्रयां, बरौनी खाद कारखाना, जो बड़ा पावर सैक्टर है, वहां हजारों मजदूर आज पावर की कमी के चलते पीड़ित हैं, चूंकि ट्रांसमीशन लाइन कमजोर है, पूरी तरह से बिजली लोगों को सप्लाई नहीं की जा सकती है। आज बिहार में १२-१४ लाख बुनकर बेकार हैं। सिर्फ हमारे लोक सभा क्षेत्र में १० हजार पावरलूम वर्षों से ठप्प पड़े हुए हैं। बुनकरों की हालत यह है कि वे कभी सूरत, कभी मेरठ और कभी दूसरे राज्यों में जाकर काम खोजते हैं। भागलपुर का जो सिल्क सिटी का नाम था, करोड़ों रुपये का सिल्क का निर्यात वहां से विदेशों को होता था, जो सबसे उत्तम श्रेणी का सिल्क है, वह आज बन्द है। आज हजारों लोग इसके कारण दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। आज किसान तबाह है, नौजवान तबाह है, महिलाएं तबाह हैं। आज पूरा बिहार एक भयंकर स्थिति से गुजर रहा है, इसीलिए हम तो यह मांग करेंगे कि जो बातें की गई हैं, उनको पूरा किया जाना चाहिए।

हमने कुछ ही दिन पहले अपने क्षेत्र में विक्रमशिला का जो प्राचीन विश्वविद्यालय है, उसके सौन्दर्यीकरण के लिए भारत सरकार का जो पैट्रोलियम और गैस मंत्रालय है, उन्होंने एक प्रोजैक्ट तैयार किया है, उन्होंने इंडियन ऑयल कारपोरेशन को यह जिम्मेदारी दी है और उसके माध्यम से यह काम होगा। मैंने आदरणीय राम नाईक जी को अपने उस प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के सौन्दर्यीकरण के लिए एक प्रस्ताव भेजा है और अनुरोध किया है कि अगर यह काम हो जाता है, नालन्दा का काम हो जाता है और हमारे जो प्राचीन बड़े-बड़े इलाके हैं, उनके बारे में चिन्ता की है। रघुवंश बाबू ने और अभी रघुनाथ झा जी ने भी कहा है कि वे सारी जो गौरवपूर्ण परम्परा वाली चीजें हैं, अगर उनका पुनरुद्धार होता है तो पर्यटन के मामले में बिहार का विकास होगा, उद्योग के मामले में बिहार का विकास होगा और इस तरह से बड़े पैमाने पर हमारा काम होगा।

अभी-अभी विद्युत मंत्रालय की ओर से कहलगांव क्षेत्र में १३२० मैगावाट का सैकिण्ड फेज का प्रोजैक्ट लगाने की जो योजना है, उसके बारे में विद्युत मंत्रालय की ओर से आदरणीय सुरेश प्रभु जी ने एक सराहनीय कदम उठाया है। हमने मांग की है कि उसको समयबद्ध योजना के मुताबिक पूरा करना चाहिए और उससे पूरे बिहार और दूसरे राज्यों में जो बिजली की समस्या है, उसको पूरा किया जाना चाहिए, लेकिन उसके साथ-साथ बिहार के और कहलगांव के जिन लोगों की जमीन गई है, वहां के किसान आज तरस रहे हैं, उनको मुआवजा नहीं मिला, उनके बेटों को नौकरी नहीं मिली। आज सारे देश के हिस्सों में जहां बिजली उत्पादन हो रहा है और अनेकों जगहों में बिजली पैदा करके भेज रहे हैं, लेकिन वहीं के लोग अंधकार में जीने के लिए और विकास की मार को झेलते हुए तमाम तरह से आज जो बदतर स्थिति है, उसमें जीने के लिए मजबूर हैं, इसलिए हमने मांग की है…( व्यवधान)

सभापति महोदय : कृपया समाप्त करें। आपके दल के और भी माननीय सदस्य बोलने वाले हैं।

श्री सुबोध राय : मैं बहुत जल्दी समाप्त करूंगा। हमने केन्द्रीय सरकार से मांग की है कि जो ऐसी बड़ी-बड़ी योजनाएं हैं, खास तौर से कहलगांव में और वहां के ४० किलोमीटर एरिया को पूरा कमाण्ड एरिया घोषित करके किसानो को, बुनकरों को और तमाम लोगों को बिजली की गारण्टी देनी चाहिए। बिहार के मामले में जो तमाम बाकी योजनाएं हैं, जैसे पहरवा में रेल के दोहरीकरण का सवाल है, दुर्गावती जलाशय योजना का सवाल है, उसके आधुनिकीकरण का सवाल है, कदवां सिंचाई योजना का सवाल है।

सभापति महोदय : सुबोध राय जी, अगर आपने अपना भाषण समाप्त नहीं किया तो आपके दल के दूसरे सदस्य नहीं बोल पाएंगे।

श्री सुबोध राय : मुझे एक ही बात कहनी है। मैं माननीय सदस्यों से भी अनुरोध कर रहा हूं कि नेपाल से उत्तरी बिहार के लोग तबाह हैं, लेकिन आज जब काफी बारिश होती है तो झारखण्ड से तमाम नदियां निकलती हैं, उससे जो बाढ़ आती है, उसके चलते हमें दक्षिण बिहार या जो केन्द्रीय बिहार है, उसके इलाके आज पूरी तरह से प्रभावित हुए हैं और १०० करोड़ रुपये का नुकसान भागलपुर एवं मुंगेर के लोगों को बर्दाश्त करना पड़ा है।

किसानों के खेतों में रेगिस्तान बन गया है, वे बालू से भर गये हैं। इसलिए मैंने निवेदन किया कि इन तमाम कार्यों को करने के लिए केन्द्रीय सरकार को बिहार सरकार को जो पैकेज देना है, उसे देने में कोई राजनीति और कोई संकुचित भावना का शिकार हुए बगैर वह पैकेज देने का फैसला तुरंत सरकार को करना चाहिए।

श्री कीर्ति झा आज़ाद :स्ाभापति महोदय, मैं रघुवंश जी और रघुनाथ झा जी जो विषय लेकर आये हैं, मैं उसके समर्थन में खड़ा हूं कि जो बिहार को पैकेज मिलना चाहिए, वह अवश्य मिलना चाहिए।

सभापति महोदय : प्रभुनाथ जी, आपका नाम है। जब आपकी बारी आएगी, तब आप बोलिएगा।

श्री प्रभुनाथ सिंह : बारी कब आएगी?बारी जल्दी बुला दीजिए।…( व्यवधान)

श्री कीर्ति झा आज़ाद :लेकिन जब मैं पिछले साल के कुछ आंकड़े उठाकर देखता हूं तो मन में यही आता है कि जहां १,८०,००० करोड़ रुपये का पैकेज मांगा गया है, जहां पर हम ग्रामीण मंत्रालय विभाग की वभिन्न योजनाएं जिनमें लगभग ७५० करोड़ रुपये खर्ज नहीं कर पाये हैं, वहीं दूसरी ओर शहरी विकास मंत्रालय के कुछ आंकड़े हैं जिनमें हमने लगभग यूटिलाइजेशन सर्टफिकेट ७ करोड़ रुपये का नहीं दिया है, ऐसे अनेक हैं। मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता। रघुवंश बाबू जी ने कुछ अपनी ओर से आंकड़े दिये हैं जो वे सही समझते हैं और कुछ हमारे राधा मोहन सिंह जी ने दिये हैं जो वे उनको उचित समझते हैं लेकिन मैं यह जानना चाहता हूं कि बिहार का विभाजन ३१ दिसम्बर २००० को हुआ। उसके पहले झारखंड बिहार का ही एक भाग था और जितनी भी वहां पर चीजें थीं, वे सब कुछ मिनरल इत्यादि बिहार में था लेकिन क्या विभाजन से पहले वहां सड़कें खराब नहीं थीं, क्या विभाजन से पहले पानी भी नहीं था, स्कूल नहीं था, नल नहीं था, क्या वह बाढ़ और सुखाड़ से ग्रसित नहीं रहा है? क्या यह ३१ दिसम्बर २००० के बाद हुआ है? क्या बंटवारे के बाद की यह स्थिति है? क्या १९५२ से जब से यह हमारी पार्लियामेंट बैठी, क्या तब से लेकर आज तक पचास वर्षों के अंदर बाढ़ नहीं आती है? क्या प्रत्येक वर्ष टूटफूट नहीं होती?क्या प्रत्येक वर्ष लोग बीमारी से ग्रसित नहीं होते? क्या सब कुछ हालत खराब नहीं होती?इन पचास सालों के अंदर कांग्रेस की सरकार अधिकतर रही। बाढ़ आती रही और कांग्रेस की सरकार शासन में थी जो आज राष्ट्रीय जनता दल को समर्थन दे रही है जिसके समर्थन में बैठकर वहां सरकार चल रही है। उस समय क्यों नहीं किसी ने सोचा? इस सरकार को, १३वीं लोक सभा को चलते हुए लगभग ढ़ाई वर्ष हो गये हैं, इससे पहले वह योजना क्यों नहीं आई?कर्पूरी ठाकुर जी ने १९७१ में जिस समय यहां पर वे जनता पार्टी की तरफ से मुख्य मंत्री बने थे, उन्होंने हाई-डैम बनाने की परियोजना के बारे में सोचा था लेकिन उसके बारे भी आज तक कोई बात नहीं हुई। इस विषय को लेकर हम वहां के सांसद प्रधान मंत्री जी से मिले थे कि बाढ़ के कारण बहुत समस्याएं आती हैं।

रघुवंश बाबू जी से सैन्ट्रल हॉल में मेरी बात हुई थी। मैं उनका बहुत आदर करता हूं क्योंकि जिस प्रकार से उन्होंने सपने देखे हैं कि किस प्रकार का बिहार होना चाहिए, वैसे ही मैं भी सोचता हूं। लेकिन मुझे यह देखकर खेद होता है कि कोई भी इन समस्याओं का स्थायी समाधान ढ़ूढ़ने के बारे में नहीं सोचता कि स्थायी समाधान कैसे हो। सब यही सोचते हैं कि रिलीफ का पैकेज मिलना चाहिए, ३०० करोड़ रिलाफ मिले, ६०० करोड़ रिलीफ मिले। रिलीफ तो पचास साल से मिल रहा है। अगर हम स्थायी समाधान के बारे में नहीं सोचेंगे तो अगले पचास साल तक रिलीफ मिलता रहेगा। रिलीफ कब तक लेंगे? यह कटोरा लेकर घूमने की आदत कब तक बनाकर रखेंगे?आज इस प्रकार की परिस्थिति हो चुकी है। उत्तरांचल के क्षेत्र में चले जाइए, आप देखिएगा कि जब कभी भी बाढ़ आती है, पांच महीने तक लगातार पानी में डूबा रहता है। मवेशी की स्थिति यह रहती है कि सड़क पर रहते हैं और साथ में आदमी भी सड़क पर रहते हैं। जब बाढ़ आती है तो कई लोगों के पास छोटे-छोटे टीले बच जाते हैं, उसके आसपास लोग रहते हैं तो सोचिए कि शौच भी कैसे जाते होंगे? तो इस प्रकार की स्थिति हो जाती है। कोई पेड़ पर चड़ा है या पानी में कूद जाता है या जो सड़क पर पहुंच चुका होता है, वह सड़क पर ही रहता है।

सभापति महोदय : इस विषय पर दो घन्टे का समय निर्धारित किया गया था और ६ बजकर २५ मिनट पर दो घन्टे पूरे हो गए हैं। सदन की सहमति हो, तो एक घन्टे का समय बढ़ा दिया जाए।

श्री प्रभुनाथ सिंह : बिहार पर सभी सदस्यों को बोलने का समय दिया जाए और दो घन्टे का समय बढ़ाया जाए।

सभापति महोदय : सदन की सहमति से एक घन्टे का समय बढ़ाया जाता है। लेकिन सभी माननीय सदस्यों से निवेदन है कि वे संक्षेप में अपनी बात कहें।

श्री कीर्ति झा आज़ाद : सभापति महोदय, एक बार रघुवंश प्रसाद जी ने वित्त मंत्री के समक्ष एक प्रश्न किया था। उस प्रश्न पर माननीय वित्त मंत्री जी ने कहा था कि बिहार जैसा अमीर स्टेट पूरे हिन्दुस्तान में नहीं है। लेकिन जो पैसा दिया जाता है, उसका हिसाब नहीं मिलता। युटिलाइजेशन सर्टफिकेट नहीं मिलता है। आप बताइए, जब सात-आठ सौ या एक हजार करोड़ रुपए का सर्टफिकेशन राज्य सरकार द्वारा नहीं दिया जाता है, तो १८० हजार करोड़ रुपए बिहार सरकार किस प्रकार खर्च करेगी, यह बात समझ में नही आती है।

महोदय, बिहार में पीने का पानी नहीं है। बिजली परियोजना के बारे में बात करते हैं, क्योंकि वहां पर बिजली नहीं है। बिजली एनटीपीसी और आरईसी के पास बहुत है। राज्य सरकार का उत्तरदायित्व है कि गांव के ग्रामीण इलाकों में सही ट्रांसमीशन और डिस्ट्रीब्यूशन करे । बिहार में बिजली का उत्पादन तो हो रहा है, बिजली बिहार में बन रही है, लेकिन वह आन्ध्रा प्रदेश को बेची जा रही है, क्योंकि वहां बिजली लेने वाला कोई नहीं है। वहां डिस्ट्रीब्यूशन की व्यवस्था नहीं की गई। मैं पूछना चाहता हूं, क्या बिहार का जब से विभाजन हुआ है, तब से ये समस्यायें आई हैं? इन समस्याओं को शुरु से क्यों नहीं समझा गया? मैं कहना चाहूंगा कि बिहार को पैकेज मिलना चाहिए, लेकिन यह जरूर विचार करना चाहिए कि वह खर्च कौन करेगा। मैं तो कहूंगा कि केन्द्र सरकार किसी एजेंसी के द्वारा उस पैसे को खर्च करवाए, क्योंकि आवश्यकता है। सरकार को इस दिशा में विचार करना चाहिए।

महोदय, हमारे क्षेत्र में प्राइमरी स्कूलों को देखने के लिए पिछली बार डैलीगेशन गया था। कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सभा के सदस्य थे, जो अब सदस्य नहीं है, वे संयोजक थे और साथ में श्रीमती श्यामा सिंह, जो औरंगाबाद से बिहार की सांसद हैं, भी थीं। हम सब लोग प्राइमरी स्कूलों की स्थिति देखने गए थे। हमने भवनहीन स्कूल तो सुने थे, जहां विद्यार्थी आते हैं, लेकिन अध्यापक पढ़ाने के लिए नहीं आते हैं। यह बड़ी हास्यास्पद बात है, वहां हमें भूमिहीन स्कूलों के बारे में बताया गया और ८२ स्कूल वहां पर चल रहे थे। मैं डिस्टि्रक्ट क्लैक्टर से कहा कि ऐसे स्कूल धऱती या पाताल में तो होंगे नहीं, आकाश में ही होंगे। मैंने कहा कि मैं सासंद हूं, वहां हमें पूरी लिस्ट दी गई कि उन स्कूलों में कौन-कौन से टीचर आते हैं और कौन-कौन से बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। इसकी जिक्र एचआरडी मंत्रालय की रिपोर्ट में है। इसके बाद हम चरवाह स्कूलों को देखने के लिए गए। वहां चरवाह तो नहीं थे, लेकिन बच्चे चर रहे थे। इस बारे में जितनी जिम्मेदार राज्य सरकार है, उतनी जिम्मेदार केन्द्रीय सरकार भी है। हम राजनीतिक लाभ लेने के लिए एक दूसरे पर छींटाकशी करते हैं। मैं इसको उचित नहीं समझता हूं। हम दिल्ली शहर को छोड़कर, सुख-सुविधाओं को छोड़ कर बिहार गए। हम जो गायत्री मंत्र रोज बोलते हैं, वह विश्वामित्र ने वहीं पर दिया।…( व्यवधान)पिता जी होंगे, मैं अपने पिता जी के कारण यहां खड़ा नहीं हूं। मुझे उनसे कुछ लेना-देना नहीं है। मैं यहां अपनी सामर्थ से खड़ा हूं। मैं बिहारी हूं, यह कहने में मुझे गर्व और खुशी होती है। जो सही बात है, उसको सामने रखना चाहिए। …( व्यवधान)मैं बिहार इसलिए गया ताकि मैं राज्य की सेवा कर सकूं।

वहां की हालत देखकर मुझे खुद ग्लानि होती है। मेरे क्षेत्र में जितने गांव हैं उनमें से मैं ज्यादातर गांवों में घूम चुका हूं। हम पहले जिस प्रकार की स्थिति बचपन में सुनते थे, आज भी वही दिखाई देती है।

महोदय, झारखंड का बंटवारा होने के बाद स्थिति ऐसी नहीं हुई है, उसके पहले से स्थिति ऐसी थी। आज भी वहां गाड़ी नहीं पहुंचती है। मुझे अपने क्षेत्र में कई जगहों पर जाना पड़ता है। कई पंचायतें ऐसी हैं, जो बीच में नहर से कटी एवं टूटी हुई हैं और बीच में कोई न कोई नेपाली नदी आ गई है, जो बीच में हमारी उस पंचायत तक पहुंचने में समस्या खड़ी करती है। मैं ऐसी-ऐसी जगहों पर गया हूं, जहां आज तक कोई नहीं पहुंचा है। वहां जाकर लोगों से मिला हूं, उन्हें स्पष्ट बताने का प्रयास करता हूं। वे हमसे पूछते हैं कि आपने हमारे लिए क्या किया तो उन्हें जवाब देना कठिन होता है। अखबारों में पढ़ते हैं और देखते भी हैं कि केन्द्र सरकार राज्य सरकार को गाली दे रही है और राज्य सरकार केन्द्र सरकार को दे रही है। हम जब तक आपस में बैठ कर इस पर ठीक से विचार नहीं करेंगे तब तक कुछ नहीं हो पाएगा।

महोदय, अभी एक माननीय सदस्य ने यहां बहुत अच्छी बात की कि १९९४-९५ से चीनी मिलें बंद हैं। हमारे यहां रैय्याम, लोहट और सकरी में तीन चीनी मिले हैं। रैय्याम की चीनी स्पेशली जर्मनी जाया करती थी। वह चीनी मिल राज्य सरकार द्वारा बंद करवा दी गई। आज तक उसका किसानों को करोड़ों-अरबों रुपए का मुआवजा नहीं मिला। अशोक पेपर मिल है, जिसमें अदालत की अवमानना बिहार सरकार ने की। उनसे कहा गया कि उन्हें बिजली एवं पानी मुहैया किए जाएं, जिससे कि वह प्रोपरली चला सकें, लेकिन उन्हें बिजली एवं पानी मुहैया नहीं कराया गया। आज इन सभी जगहों पर लोग दुखी हैं। लोग कहते हैं कि नलकूप होना चाहिए, हां यह जरूर लगना चाहिए, लेकिन जहां बिजली नहीं दे पा रहे वहां नलकूप कैसे चलेंगे। किसानों की बात जरूर करते हैं। नलकूप को बिजली देने के लिए आज हमारे पास डिस्ट्रीब्यूशन या ट्रांसमिशन लाईन नहीं है। ये लाइनें कहां से आएंगी, जब पूरी बिजली नहीं मिलती है।

१८.३३ hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) महोदय, मैं यहां इसलिए खड़ा हुआ हूं, मुझे बड़ी प्रसन्नता है। महोदय, आप मेरी आवाज को पूरी तरह सुनिएगा। आज जिस प्रकार बिहार की परिस्थिति है, गरीबी है। पिछले दो वर्षों में विभाजन के बाद अवश्य स्थिति ज्यादा खराब हुई है, लेकिन आप केवल इस बात को ही नहीं ले सकते। आज जो प्रस्ताव आया है, उसका मैं जरूर समर्थन करता हूं, लेकिन मन में सिर्फ एक ही बात है कि यह पैसा किस प्रकार से कहां, कैसे लगे। पहले एक बार १९९४-९५ में भी पैसा आया था। उस समय बड़े जोर से शोर मचा था कि पैसा आया है। उस समय ठेकेदार भागने शुरू हो गए, सब जगह लोग भागने लगे और पता लगा कि एक महीने तक जो ठेकेदार एस्टीमेट बना रहे थे कि क्या-क्या मिलना चाहिए, कहां-कैसे क्या करेंगे, उसका एस्टीमेट बना रहे थे, तब तक पता लगा कि एक महीने के अंदर पैसा खत्म हो गया। उन्होंने कहा कि जो पैसा आया था, उसका उपयोग भी कर लिया गया। वह पैसा कहां गया, उसका मालूम नहीं। इसलिए मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि आज जो प्रस्ताव आया है, इसके ऊपर पूरे तरीके से विचार होना चाहिए और सीरियसली एवं गंभीरता से विचार होना चाहिए। इस पैसे का सदुपयोग हो, दुरुपयोग न हो। जो पैसे का यूटिलाइज़ किया गया है, उसका कम से कम यूटिलाइजेशन सर्टफिकेट दें। लगभग ढाई-तीन हजार रुपए का यूटिलाइजेशन बिहार सरकार की ओर से नहीं किया है, उसका यूटिलाइजेशन इस साल या अगले साल तक करने का प्रयास किया जाए, जिससे कि हम अपनी मांग पैकेज पर भरपूर तरीके से कर सकें।

श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद):सभापति महोदय, हम बिहार के लिए विशेष आर्थिक पैकेज देने पर चर्चा कर रहे हैं। आपने चर्चा आरम्भ की, उसके बाद सत्ता पक्ष के राधा मोहन जी बोले। ऐसा लगने लगा कि बहस सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित रहने वाली है। मैं रघुनाथ झा का धन्यवाद ज्ञापन करता हूं कि उन्होंने इस बहस को सार्थक दिशा में ले जाने का काम किया।

महोदय, यह बात सही है कि स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी के बाद तक बिहार का एक गौरवमय इतिहास रहा है। महात्मा गांधी जी गुजरात में पैदा हुए लेकिन उनकी कर्मस्थली बिहार रही। …( व्यवधान)आजाद हिंदुस्तान में लोकतंत्र की लड़ाई जयप्रकाश जी के नेतृत्व में लड़ी गयी और उसका भी प्रारम्भ बिहार से हुआ। मैं उस आंदोलन में एक कार्यकर्ता था। आज बिहार में बेबसी है, लाचारी है, पिछड़ापन है और पूरा सदन इस सवाल पर एक है। जब यहां राज्यों के बंटवारे पर चर्चा हो रही थी तो कुछ लोग बहुत उतावले थे। समाजवादी पार्टी सिद्धांतत: उस समय राज्यों के बंटवारे के खिलाफ थी क्योंकि राज्यों के बंटवारे का सवाल सीमित नहीं है। पूरे हिंदुस्तान में वभिन्न अंचलों से अलग-अलग राज्यों की मांग हो रही थी। इसलिए उचित था कि राज्यों के पुनर्गठन का आयोग बन जाता और उस आयोग की सिफारिशें आने के बाद जहां आवश्यक हो वहां नये राज्य की संरचना की जाती। हमारा मानना था कि नये राज्यों के बनने से समस्याएं और पैदा होंगी तथा अतरिक्त आर्थिक भार देश पर पड़ेगा और एक अलग स्थिति सारे देश में पैदा होगी। लेकिन उस समय लोग बहुत जल्दी में थे। जब बिहार से झारखंड अलग हो गया तो आय के जो रुाोत थे जिन पर बिहार की आर्थिक व्यवस्था कायम थी उसका ७०-८० प्रतिशत हिस्सा झारखंड में चला गया। खान, खनिज और कोयला झारखंड में चला गया। यह बात नहीं है कि हिंदुस्तान में आजादी के बाद दौलत नहीं बढ़ी हो। लेकिन दौलत वहीं जाकर कैद हो गयी जहां पहले से दौलत थी। आजादी से पहले बिहार की आर्थिक हालत ठीक थी लेकिन अब बिहार की माली हालत खराब हुई है। पहली से लेकर दसवीं पंचवर्षीय योजना तक कितनी दौलत बिहार को मिली, मैं इस बहस में जाना नहीं चाहता हूं। लेकिन विकास के नाम पर क्षेत्रीय असंतुलन और बढ़ गया है और जिन राज्यों की माली हालत पहले से ठीक थी उनकी हालत और भी ज्यादा अच्छी हो गयी है। मैं आपके माध्यम से यह निवेदन करना चाहता हूं कि बिहार की आठ करोड़ और झारखंड की दो करोड़ आबादी पर जो सरकारी बोझा डाला गया है, वह न्यायसंगत नहीं है और सरकार को इस मामले में विचार करना चाहिए। बिहार की कुछ स्थाई समस्याएं हैं। जब कभी बारिश होती है और अंतर्राष्ट्रीय नदियों से पानी बिहार में आता है तब संसद का कोई भी सत्र ऐसा नहीं होता है जब हम उस पर चर्चा न करते हों।

सभापति महोदय, आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम बाढ़ का कोई स्थाई हल नहीं निकाल पाए हैं और उस पर हुई बहस का कोई सार्थक हल नहीं निकलता है। नेपाल की नदियों से हर वर्ष बिहार को जो हानि होती है वह होती रहेगी जब तक कि उसका कोई स्थाई हल हम नहीं निकालते, उसका मुकम्मल इंतजाम हम नहीं करते। आज आवश्यकता इस बात की है कि उसका कोई स्थाई बंदोबस्त भारत सरकार करे। आज कुछ कागजों में मैंने देखा कि ५० लाख परिवारों के पास बिहार में रहने के लिए घर नहीं हैं, और यह संख्या और बढ़ेगी। बिहार का हाल ठीक हो और भारत सरकार के अलावा अमीर लोग बिहार की तरफ आकर्षित हों - यह देखना होगा। आज बिहार में जैसा वातावरण है क्या वहां कोई निवेश करेगा, खर्चा करेगा ? नही, वह पहले यही देखेगा कि वहां बिजली की हालत ठीक है या नहीं, सड़क की हालत ठीक है या नहीं, उद्योग लगाने के लिए वातावरण ठीक है या नहीं, आज की परिस्थिति में मैं समझता हूं कि बिहार की हालत और ज्यादा खराब हो गई है। बिहार को आर्थिक पैकेज दिया जाए, मैं नहीं समझता कि इसमें कोई मतभेद है। मुझे बेहद प्रसन्नता है कि जब देश के ऐसे बड़े सवाल आते हैं तो उसमें हम प्रार्थना करते हैं कि आसन की तरफ से सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया जाए। इस सदन में पहली बार हम ऐसे सवाल पर चर्चा कर रहे हैं। इस बारे में सभी पार्टियों की एक राय है। आज बिहार के सभी लोग एक साथ बैठे हैं। बिहार के ५० सासंदों ने जो वभिन्न दलों से थे, उन्होंने नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में प्रधान मंत्री को एक ज्ञापन दिया। आज सवाल केवल ५० सांसदों का नहीं है, इस सदन के ५४५ सांसद आज पूरी तरह से बिहार के साथ हैं और वे यह मांग करते हैं कि बिहार को विशेष आर्थिक पेकेज दिया जाए। यह बहुत गम्भीर मामला है। भारत सरकार के गृह मंत्री और प्रधान मंत्री का हम अत्यधिक सम्मान करते हैं लेकिन यदि सदन में कहीं वायदा खिलाफी हो, तो मैं नहीं समझता इससे खराब दूसरी कोई बात हो सकती है। राज्यों के बंटवारे के समय मैंने गृह मंत्री जी का भाषण सुना था। उन्होंने कहा था कि जो राज्य अलग हो रहे हैं, उन्हें विशेष दर्जा दिया जाएगा। हमें नहीं लगता कि हमारे मन में कहीं कोई बात थी। उत्तरांचल अलग हुआ और उसे विशेष राज्य का दर्जा दे दिया। प्रधान मंत्री जी से बात करने के बाद नीतीश कुमार जी ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की उसकी कटिंग मेरे पास हैं। नीतीश कुमार जी ने कहा कि हमें क्या-क्या करना है उसे चिन्हित कर लिया है और प्रधान मंत्री से मिलने के बाद उनका रवैया सकारात्मक था। गृह मंत्री का इस बारे में कमिटमैंट था। बिहार के सभी सांसद एक साथ थे और पूरा सदन एक साथ था फिर कौन सा ऐसा कारण था जिससे बिहार को आर्थिक पैकेज नहीं मिल रहा है। बिहार का कोई मामूली सवाल नहीं है। बिहार के लोगों की मदद करना, गरीबों की मदद करना, पिछड़े क्षेत्रों की मदद करना, गरीब राज्यों की मदद करना भारत सरकार का राष्ट्रीय धर्म है।

अभी यहां चार मंत्री बैठे थे लेकिन अब केवल वसुन्धरा जी रह गई हैं। शाहनवाज जी भी यहां बैठे हैं वह बिहार से हैं। वह प्रधान मंत्री और गृह मंत्री तक हमारी बात पहुंचा दें कि बिहार को आर्थिक पैकेज देने का मामला बिहार की चार दीवारी तक सीमित नहीं है, यह देश का मामला है, सभी सांसद पूरी तरह बिहार के साथ हैं। इस कारण प्रधान मंत्री बिहार के लोगों की आर्थिक मदद करने में देरी नहीं करें, यही मुझे कहना था।

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर) :सभापति महोदय, बिहार को आर्थिक पैकेज देने के सवाल पर आपने नियम १९३ के अधीन चर्चा को यहां प्रस्तुत किया इसलिए मैं आपके प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं। मैं इस अवसर पर रघुनाथ झा जी को भी बधाई देना चाहता हूं। उन्होंने इस बहस को पटरी पर लाने का काम किया। आज पूरे सदन ने यह महसूस किया कि दलों के दलदल में या दलों की सीमाओं में रह कर हम बिहार के साथ न्याय नहीं कर सकते। बिहार के हित को देखते हुए यह बहस हो। इस चर्चा के माध्यम से सीधा सवाल यह है कि बिहार को आर्थिक पैकेज और विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए। आज बिहार की वित्तीय स्थिति क्या है? वित्त आयोग द्वारा सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी गई उसमें साफ कहा गया है कि बिहार की अर्थव्यवस्था विभाजन के बाद लड़खड़ा गई है।

इसका मतलब यह है कि बिहार आर्थिक रूप से टूट चुका है। अभी माननीय सदस्य कह रहे थे कि पूरे देश की जी.डी.पी. ६.५ प्रतिशत है जबकि बिहार की १.० प्रतिशत है। १९९६-९७ में लाकडावाला एक्सपर्ट ग्रुप ने नेशनल सर्वे किया था जिसके अनुसार देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का प्रतिशत ३५.९७ था । जब वर्ष २००२ का बजट प्रस्तुत किया गया, तब सरकार द्वारा कहा गया था कि यह १० प्रतिशत कम हो गया है। ठीक है, यह आंकड़ों का जाल है लेकिन मेरी समझ में ये आंकड़े नहीं आ रहे हैं। यदि ऐसा मान भी लिया जाय़े तो भी मालूम होगा कि बिहार राज्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों में उड़ीसा राज्य से भी नीचे चला गया है। मैं इसके कारणों में नहीं जाना चाहता लेकिन मैं यह जरूर बताना चाहूंगा कि प्रतिवर्ष बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या एक-डेढ़ प्रतिशत बढ़ रही है। जैसे अभी कहा गया कि नेशनल ऐवरेज २७ प्रतिशत है जबकि बिहार का ४४ प्रतिशत है। १९९७-९८ में बिहार में ५६ प्रतिशत था और यदि १० प्रतिशत घट भी जाता है तब भी यह ४६ प्रतिशत रहता है, जो लोग गरीबी रेखा से नीचे का जीवन बसर कर रहे हैं। बिहार में गरीब फटेहाली, आर्थिक बदहाली की स्थिति में जीवन यापन कर रहे हैं। आज इस बात पर चर्चा हो रही है कि कैसे बिहार की स्थिति बदले, कैसे उसका चित्र बदले।

सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कुछ बातें आपके सामने रख रहा हूं। आप जानते हैं कि सीतामढ़ी, गोपालगंज और मोतिहारी में ३० लाख के लगभग खेतिहर मजदूर हैं जिनमें से अधिकतर उत्तर बिहार छोड़कर दूसरे प्रान्तों में अपने जीविकोपार्जन के लिये गये हुये हैं क्योंकि बिहार में रोजगार के कोई साधन नहीं हैं। खेतिहर मजदूरों को कोई रोजगार नहीं मिल रहा क्योंकि कोई उद्योग-धंधे या कल-कारखाने वहां नहीं हैं। खेतिहर मजदूरों का पलायन एक दिन में नहीं हुआ। यह संख्या सालों-साल से बढ़ रही है। यह एक राष्ट्रीय समस्या है। मैं इस बात का जिक्र करना चाहता हूं कि बिहार की कृषि स्थिति पर इसका कुप्रभाव पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि यदि खेतिहर मजदूर बाहर चला जायेगा तो वहां कृषि कार्य कौन देखेगा? सच्चाई तो यह है कि जो छोटे किसान हैं, जिनके पास १०-१५ एकड़ जमीन हैं, उनके द्वारा खोजने पर भी खेतिहर मजदूर नहीं मिलता। क्योंकि वहां रोजगार का कोई साधन नहीं, इसलिये सारे खेतिहर मजदूर बाहर रोजी कमाने के लिये चले गये।

सभापति महोदय, बिहार में क्रेडिट लमिटेड के बारे में राधा मोहन जी ने चर्चा की। मैं उसमें नही जाना चाहता लेकिन आप सम्पूर्ण देश का रेशियो देख लीजिये। अकेले बिहार के बैंकों में जो पैसा जमा होता है, उसमें कहीं १० प्रतिशत, कहीं १५ प्रतिशत, कहीं १८ या १९ प्रतिशत का रेशियो है। रिजर्व बैंक की गाइडलाइन्स हैं कि जिन ग्रामीण इलाकों के लोग ३५-४० प्रतिशत रुपया बैंकों में जमा करते हैं, उनका पैसा वहां इनवैस्ट होना चाहिये लेकिन यह पैसा देश के बड़े-बड़े शहरों जैसे मुम्बई, कोलकाता आदि में इनवैस्ट हो रहा है।

मैं राज्यों की बात नहीं कर रहा हूं। बड़े-बड़े शहरों में पैसा इनवैस्ट होता है। बिहार में सी.डी. की यह हालत है। …( व्यवधान)आप कलकत्ता की ११ परसेन्ट बता रहे हैं।

सभापति महोदय, जहां तक बाढ़ का सवाल है। बिहार में छ: महीने बाढ़ और छ: महीने सुखाड़ रहता है। उत्तर बिहार जो एक फ्लड प्रोन एरिया है, वहां छ: महीने बाढ़ और छ: महीने सुखाड़ की स्थिति उत्पन्न रहती है। नेपाल से आने वाली नदियां कोसी, भूतहीबलान, कमलाबलान, अदवाड़ा समूह, गंडक आदि जितनी नदियां नेपाल से आती हैं, वे खासकर उत्तर बिहार में तूफान मचाती हैं और एक ऐसी परिस्थिति पैदा कर देती हैं कि वहां तबाही मच जाती है। वहां का सारा इंफ्रास्ट्रक्चर स्कूल, कालेज, सड़कें तथा आधारभूत संरचनाएं आदि सब ध्वस्त हो जाती हैं तथा करोड़ों रुपये की फसले बर्बाद हो जाती है। इन नदियों से आने वाली बाढ़ के समाधान के लिए एक बार अध्ययन हुआ था तथा चर्चा भी हुई थी। जापान से भी एक टीम आई थी। अभी हमने सुना है कि योजना आयोग में एक यूनिट स्थापित हुई है। जिसमें पुनर्गठऩ आयोग के समय कहा गया था कि योजना आयोग ने बिहार में विशेष व्यवस्था के लिए एक यूनिट स्थापित की है। वह यूनिट क्या कर रही है। उसे दो साल हो गये हैं। मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि यदि यूनिट दो साल से नहीं चल रही है तो वह कहां रुकी हुई है। यह न चलती है न बढ़ती है, न कुछ सामने ही आ रहा है। आखिर यूनिट क्या कर रही है। क्या यूनिट अचल हो गई है, चल नहीं रही है। कहीं कोई प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। यह यूनिट क्या कर रही है। उस समय अध्ययन करके १२५० करोड़ रुपये का ऐस्टीमेट बनाया गया था। कोसी को कंट्रोल करने के लिए बराह क्षेत्र में एक हाई लैवल डैम बनाया जाए। शीशापानी में यह भी प्रस्ताव किया गया था कि कमला के बराह क्षेत्र में इसका जो अदवाड़ा समूह नूनथर में हैं, यह नेपाल में पड़ने वाला स्थान है, यह बराह क्षेत्र में है। नेपाल का जो जल अधिग्रहण क्षेत्र हैं, वाटर एनकैचमैन्ट एरिया है, यहां हाई लैवल मल्टी परपज डैम बनने से तीन हजार मेगावाट पनबिजली पैदा होगी। वहां पनबिजली बहुत जरूरी है। वहां इससे सस्ती दर पर पनबिजली मिल सकती है। उससे बिहार पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल आदि को बिजली दे सकता है। बराह क्षेत्र में केवल एक नदी पर हाई लैवल डैम बनने से तीन हजार मेगावाट बिजली पैदा हो सकती है। लेकिन इस पनबिजली का प्लान स्वीकृत नहीं हो रहा है। ऊंट के मुंह में जीरा - थोड़ा कुछ आप कह दीजिए कि यूनिट बना दी है, इतना पैसा आपको दे रहे हैं। लेकिन इससे बिहार का कुछ होने वाला नहीं है। इससे बिहार का भाग्य और तस्वीर बदलने वाली नहीं है।

सभापति महोदय, अब मैं किसानों के सवाल पर आता हूं। बिहार का बंटवारा हुआ, झारखंड अलग हो गया। उसके बाद बिहार में क्या बचा है। सभापति जी, जब आप एक मैम्बर की हैसियत से बोल रहे थे, तथा माननीय रघुनाथ झा बोल रहे थे, तब आप ठीक ही कह रहे थे कि अब बिहार में क्या बचा है - बालू और ऊसर जमीन तथा जो जमीन बची हुई है वहां जल जमाव की समस्या है। उस जमीन का कितना एरिया वाटर लॉगिंग से भरा हुआ है। इसके बाद धान और गेहू की जो मुख्य फसलें है, कुछ मोटा अनाज भी हो जाता है। यह बिहार की हालत है। इस साल थोड़ी सी प्रगति हुई है, एक लाख तीस हजार मीट्रीक टन धान इस बार एफ.सी.आई. के माध्यम से खरीदा गया है। बिहार के जो वभिन्न ७१५ क्रय केन्द्र है, उनके जरिये यह खरीदा गया है। अभी मेरी चौबे जी से बात हो रही थी वह कह रहे थे कि ५० परसेन्ट बिचौलियों के माध्यम से खरीदा गया है। जिसमें डिस्ट्रैस सेल पर किसानों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। डिस्ट्रैस सेल का मतलब है कि उन्हें समर्थन मूल्य नहीं मिल पाया, जो एम.एस.पी. भारत सरकार ने ५३० रुपये क्िंवटल धान का दाम तय किया था। जो उत्तम किस्म का धान है उसका मूल्य ५६० रुपये क्िंवटल तय हुआ था। लेकिन किसान को वह मूल्य प्राप्त नहीं हो सका। किसान को उसका लागत मूल्य भी नहीं मिल सका। बिचौलियों के द्वारा किसानों का शोषण हुआ। एक बार मात्र २६ हजार मीटि्रक टन हुआ था और पिछले साल लगभग ८६०० मीटि्रक टन धान का प्रोक्योरमैन्ट हुआ था।

धान और चावल का सब मिलाकर इस साल बहुत जोर लगाने पर इतना उत्पादन हुआ है। सभापति जी, आप भी और राधामोहन सिंह जी भी समति के मैम्बर हैं। समति ने कई स्थानों का दौरा किया और मैंने खुद कई सेन्टरों पर दौरा किया और कुछ क्रय केन्द्रों पर स्टडी की। सब मिलाकर कुछ जोर लगाने पर मात्र १लाख३० हजार मीटि्रक टन धान और चावल दोनों मिलाकर खरीद होनी चाहिए ताकि वहां के गरीब किसान और गांवों के गरीब लोगों की जेब में पैसा जा सके। उनकी आर्थिक स्थिति कुछ सुधर सके। कम से कम १० लाख मीटि्रक टन खरीद अकेले बिहार में होनी चाहिए। चावल और धान के इतने प्रोक्योरमेंट से २० हजार करोड़ रुपये का फायदा बिहार को हो सकता है। दूसरे राज्यों का मैं विरोध नहीं करता हूँ - पंजाब, हरियाणा, आंध्रा प्रदेश और सब जगह वैसा प्रोक्योरमेंट हो, लेकिन बिहार में प्रोक्योरमेंट का रेशियो बढ़ाने से किसनों की माली हालत सुधर सकती है, आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है।

सभापति जी, अभी रघुनाथ जी ने बहुत अच्छे रूप में, नट-शैल में इस बहस को पटरी पर लाने का काम किया है, इसलिए मैं उसे आगे नहीं ले जाना चाहता। जो बिहार पैकेज का सवाल है, उस पर दो बातें कहना चाहता हूँ। आर्थिक पैकेज और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग है, आपने खुद बताया था कि क्या-क्या कंडीशनैलिटीज़ हैं, मैं उसके विस्तार में नहीं जाना चाहता हूँ, लेकिन सभी जो शर्तें हो सकती हैं बिहार को विशेष दर्जा मिलने और वह पहाड़ी इलाके से लेकर नेपाल बॉर्डर से लेकर, बंगाल की खाड़ी तक गरीबी के मापदंड को देखते हुए, बाढ़ के उपद्रव को देखते हुए, जिस तरह से बाढ़ की विनाश-लीला वहां होती है, प्राकृतिक आपदा का जिस तरह से हमला होता है, इन सारी चीजों को देखा जाए तो पूरा बिहार एक विशेष राज्य का दर्जा पाने का हकदार है। इसलिए मैं बिहार के हक में कह रहा हूँ। यह पार्टी का सवाल नहीं है।

झा जी ने ठीक कहा था कि जहां से हम आते हैं उस मिट्टी की अपनी गौरवशाली परंपरा है। आज़ादी के समय से आज तक की लड़ाई को देखा जाए तो मैं कहना चाहूंगा कि बिहार में सहिष्णुता है लेकिन जब बिहार पर हमला होता है, जब बिहार अपने स्वरूप में जाग जाएगा तो बड़ा तूफान उठ सकता है। इसलिए बिहार के तूफान शक्ति को देखते हुए सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

विधानमंडल से प्रस्ताव पास हुआ और उसने विशेष आर्थिक पैकेज मांगा। यहां हमने २८ नवंबर २००० को मैमोरंडम दिया लेकिन उसका क्या हुआ? आज सीरियसनैस देखी जाए -सदन में ही देख लीजिए कि क्या गंभीरता है। यह बहस सरकार को गंभीरता से लेनी चाहिए। मुझे खेद है, तकलीफ है और मैं कहना चाहता हूँ कि बिहार के हर मंत्री को यहां उपस्थित रहना चाहिए था। यह बिहार के भाग्य का सवाल है, किसी दल का सवाल नहीं है। हम बिहार को रिप्रेजेन्ट करते हैं और इस सर्वोच्च सदन में बिहार के हक के लिए किसी सीमा तक जा सकते हैं, दल की सीमाओं को तोड़कर बिहार के व्यापक हित में हमें अपनी बात दर्ज करानी है। हमें बिहार का हक लेना है। इसके लिए हमें कई तरह से लड़ाई करनी है। मैंने इसलिए इस बात का जिक्र किया कि योजना आयोग में क्या होगा। मंत्री महोदया बैठी हुई हैं। वे कहेंगी कि ठीक है, आप लोग विचार कर लीजिए, सब लोग बैठ लीजिए, हम तैयार हैं। क्या चीज तैयार है? योजना आयोग में मूल बात कैसे तय होती है? प्राकृतिक आपदाओं में आपने जिक्र किया कि आबादी के आधार पर राहत दी जाती है।On the basis of the damage जो राज्य का पैकेज है, वह आधार नहीं बनता है। उसमें नाइंसाफी बिहार के साथ होती है और गाडगिल फार्मूला जो आज तक ट्रेडीशनली चला आ रहा है, वह क्या कहता है? वह कहता है किOn the basis of the internal resources of the concerning State ,किसी राज्य के प्लान का आकार होगा।

19.00 hrs. सभापति महोदय, इस प्रकार से बिहार का विकास सात जन्मों तक नहीं होने वाला है। गाडगिल फार्मूले के चलते बिहार का कैसे उत्तरोत्तर उद्धार होने वाला है। यह गाडगिल फार्मूला तो बिहार के लिए ऐसे है जैसे आइरन गेट में फिल्टर लगा दिया जाए। बिहार की सारी तरक्की और विकास इस फार्मूले के कारण रुका हुआ है। बिहार का विकास तब तक नहीं होगा जब तक कि on the basis of needs of the State, on the basis of poverty in the State and on the basis of population in the State. राज्य की जो जरूरत है, उसके ऊपर जब तक विचार नहीं किया जाएगा, राज्य के पिछड़ेपन पर, राज्य की आबादी पर, राज्य में बाढ़ की विभीषिका पर, राज्य की आवश्यकता पर जब तक विचार नहीं किया जाएगा, जब तक राज्य के प्लान का आकार नहीं बढ़ाया जाएगा, तब तक गाडगिल फार्मूले से बिहार को कोई फायदा नहीं होने वाला है। इस प्रकार से उसके इंटरनल रिसोर्स बढ़ने वाले नहीं हैं। हम इंटरनल रिसोर्स कैसे बढ़ाएं, क्या बालू में इंटरनल रिसोर्स बढ़ाएं। जब शराब बिकती थी, उससे राज्य को राजस्व मिलता था, उद्योगों से जो राजस्व मिलता था वह भी नहीं मिल रहा है, खनिजों की जो रायल्टी मिलती थी, वह भी नहीं मिल रही है। सब कुछ झारखंड में चला गया है। बिहार संसाधन बढ़ाए तो कैसे और कहां से बढ़ाए?

महोदय, बिहार की आबादी ८,२८,७९,००० है झारखंड की २,६९,०२,०००। बिहार की प्रति व्यक्ति आमदनी रु.४,५०० है और झारखंड की प्रति व्यक्ति आमदनी रु.७,००० है। बिहार में ३७ जिले हैं और झारखंड में १८ जिले हैं। लोक सभा की सीट बिहार से ४० हैं और १४ झारखंड से हैं। बिहार में २४३ विधान सभा सीटें हैं और झारखंड में ८१ सीटें हैं। सड़क बनाने के लिए काम आने वाला या अन्य कोई खनिज पदार्थ बिहार में नहीं है। सब झारखंड में चले गए हैं। झारखंड में कोयले के राष्ट्रीय उत्पादन के अनुसार ३२.४ प्रतिशत कोयले का उत्पादन होता है। पूरे देश के लोहे का लगभग २३.३ प्रतिशत, पूरे देश के अभ्रक का ४६.६ प्रतिशत उत्पादन झारखंड में होता है। लाल स्टोन, ग्रेफाइट, एसबैस्टस आदि जितने भी खनिज हैं, वे सब झारखंड में पैदा होते हैं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि अभी लगभग कुल राजस्व का १५०० करोड़ रुपए का घाटा बिहार को है और झारखंड को घाटा नहीं है। जो घन मिला वह बिहार को १९८५ करोड़ मिला और झारखंड को २२१५ करोड़ रुपए मिले। इसी प्रकार केन्द्र सरकार का जो बिहार पर कर्जा है वह २३००० करोड़ रुपए का है और झारखंड पर ८००० करोड़ रुपए का है। बिहार के कर्जे को माफ करने के बारे में सरकार क्या सोच रही है। यह ठीक है कि योजना आयोग में बिहार की इस समस्या के ऊपर एक सैल बना दिया गया है, लेकिन मैं मंत्री महोदया से जानना चाहता हूं कि बिहार पर जो २३ हजार करोड़ रुपए का केन्द्र सरकार का कर्ज है उसे माफ करने के लिए क्या सरकार विचार कर रही है ?

महोदय, मेरा निवेदन है कि विशेष परिस्थितियों में गाडगिल फार्मूले की शर्तों को भी बिहार में शथिल कर के बिहार को सहायता करनी चाहिए। यदि आप बिहार के पिछड़ेपन को, गरीबी को, बदहाली को बदलना चाहते हैं, तो आपकोon the basis of needs of the State, on the basis of poverty in the State and on the basis of population in the State. इस आधार पर गाडगिल फार्मूले को लागू करना होगा, तभी हमारे प्लैन का पैसा बिहार को मिल पाएगा।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं पुरजोर मांग करता हूं कि शेष बिहार की आर्थिक पैकेज की जो जरूरत है, उतना धन बिहार को देने का काम हो और विशेष राज्य का दर्जा बिहार को दिया जाए। चूंकि यहां कांति जी बैठी हैं, इसलिए मैं उनसे कहना चाहता हूं। वैसे तो सभापति महोदय, मैं आपसे कहता, लेकिन आप तो आसन पर विराजमान हैं। इसलिए मैं कांति सिहं जी से कहना चाहता हूं कि वे राज्य सरकार को सलाह दें कि वह केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को पूरी तरह से लागू करे। इस बारे में रघुनाथ झा जी ने भी कहा था, वे अपनी बात बहुत कुशलता से कह चुके हैं। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आप सदन में चाहे कितने हाथ-पैर मारिए, लेकिन सदन में हाथ-पैर पटकने से काम नहीं चलेगा, जरा प्रदेश सरकार के खर्च और यूटिलाइजेशन को देखिए कि आपकी कितनी क्षमता है। आज स्थिति यह है कि बिहार सरकार ३ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर पा रही है। इसलिए मैं आपके माध्यम से बिहार सरकार को सलाह देना चाहता हूं कि बिहार सरकार अपनी क्षमता बढ़ाए। आर्थिक पैकेज का अनुपालन तभी होगा जब बिहार सरकार अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाए। तभी आम जनता की बदहाली दूर करने के लिए काम हो सकेगा।

इसलिए यूटीलाइजेशन पर जोर दीजिए और खर्च की सीमा को आप बढ़ाइये। इसके लिए जो भी इन्फ्रास्ट्रक्टर बनाना है, जो भी आधारभूत संरचना तैयार करनी है, उसे करिये तभी आप उसका लाभ ले पायेंगी। यह मैं राज्य सरकार से प्रतनधि से यहां कहना चाहता हूं क्योंकि सामयिक रूप से हमने इस विषय पर यहां चर्चा की है। सिंचाई के संदर्भ में मैं कोई जिक्र नहीं करना चाहता क्योंकि बहुत से मैम्बर्स उस पर बोलेंगे।

इन्ही शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री बसुदेव आचार्य (बांकुरा):सभापति जी, आपने जो सवाल उठाया, उसके लिए हम आपके आभारी हैं क्योंकि बिहार का सवाल दलों का सवाल नहीं है। यह सवाल बिहार की आठ करोड़ आबादी से संबंधित है। जब बिहार का बंटवारा हुआ तब हमारी पार्टी और हमने उसका विरोध किया था। उस समय हमने कहा था कि यह जो बंटवारा हो रहा है, री-आर्गनाइजेशन हो रहा है, पुनर्गठन हो रहा है, उसके पीछे मकसद क्या है ?

हमारा पुरुलिया जिला पहले बिहार में था। हमने अपनी इंटरमीडिएट से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई बिहार में ही की है। हमने इंटरमीडिएट छपरा से की, ग्रेजुशन झरिया से और पोस्ट ग्रेजुएशन रांची से की। उस समय जब बंटवारा हुआ, री-आर्गनाइजेशन कमीशन बना था, उस समय हमारी मांग थी कि वहां पर हमारे जिले में जो आबादी थी, वह बंगला भाषा बोलती थी। उस समय भाषा का आंदोलन हुआ था। इस आंदोलन के कारण मानभूम जिला जो बिहार का सबसे धनी जिला था, उसका बंटवारा हो गया। उसका एक हिस्सा बंगाल में चला गया। हम लोग सन् १९५६ में बंगाल में चले गये। उस समय उसका बेसिस भाषा थी। इस वक्त जो री-आर्गनाइजेशन हुआ, उसका क्या बेसिस था यह सवाल हमने गृह मंत्री जी से पूछा था कि क्या कारण है जो आप इसका बंटवारा कर रहे हैं, री-आर्गनाइजेशन कर रहे हैं, झारखंड को अलग कर रहे हैं लेकिन वे उसका कोई जवाब नहीं दे सके। हमने उस समय पूछा था कि क्या इसका कारण भाषा है लेकिन कुछ कारण नहीं था। केवल राजनीति ही उसका कारण था। इसी कारण आज यह हालत हो गयी। उस समय हमें आश्वासन दिया गया। यह एक दल की मांग न होकर सभी दलों की मांग थी, सदन की मांग थी कि ठीक है, आप बंटवारा करें लेकिन बिहार की उपेक्षा न करें। इसके कारण जितने उद्योग बिहार में थे, वे सब झारखंड में चले गये। कोयला खदान सब झारखंड इलाके में चली गयीं। बिहार सरकार को पहले जो रायल्टी डेढ़ हजार करोड़ रुपये की मिलती थी, वह भी झारखंड में चली गयी। स्टील इंडस्ट्री भी झारखंड में चली गयी। माइका माइन्स झारखंड में चली गयी। आज वह भी बंद होने वाली है। सब कुछ झारखंड में चला गया। बिहार में क्या बचा ?

हमने आज ही कालिंग अटैंशन में बरौनी खाद कारखाने के बारे में सवाल उठाया था। यह केवल बंगाल का सवाल नहीं है, बिहार का सवाल नहीं है, पूरे पूर्वी भारत का सवाल है। गोरखपुर कारखाना बंद है और बरौनी कारखाने में उत्पादन नहीं हो रहा है। इसे तीन-चार साल हो गये हैं। सिंदरी जो हमारे देश का प्रथम राष्ट्रीयकृत उद्योग है, वह भी बंद होने के कगार में आ गया है। मंत्री जी जब बरौनी कारखाने के बारे में जवाब दे रहे थे तब हमने कहा था कि आप साफ-साफ बोलो, सदन को बताओ कि आप क्या सिद्धांत लेने जा रहे हो।

क्या बरौनी और दुर्गापुर को बचाने के लिए कोई प्रस्ताव बी.आई.एफ.आर. के पास रखेंगे? जवाब नहीं मिला, कहा कि हम सिद्धान्त लेंगे। सिद्धान्त तो बंद करने का भी हो सकता है। आज बरौनी बंद है। बिहार के किसानों को खाद कहां से मिलेगी। हमने पूछा कि अगर बिहार के किसानों को हजीरा से खाद मंगवानी पड़ेगी तो क्या भाव होगा। यह कहा गया कि भाव एक ही होगा। लेकिन उसे लाने में जो खर्च होगा, उसका क्या होगा। आज बंगाल के किसानों का भी सवाल है और बिहार के किसानो का भी सवाल है। उसे बचाने के लिए सरकार के पास कोई उपाय नहीं है। भारत वैगन मुज़फ्फरपुर और मोकामा में, वह भी बंद होने के कगार पर खड़ा हुआ है। उनको कपैसिटी नहीं मिल रही है। यहां सिर्फ पैसे का सवाल नहीं है। आपने बिहार के उन्नयन के लिए जो सवाल उठाया, आपने जितने आंकड़े दिए हैं, फ्रेट इक्विलाइजेशन का सवाल बंगाल का भी था। एक समय था जब बिहार और बंगाल पहले, दूसरे नम्बर पर था, वह कैसे धीरे-धीरे नीचे आ गया। बिहार से कोयला महाराष्ट्र, तमिलनाडू जाएगा, एक ही फ्रेट होगा। बिहार से इस्पात दूसरे प्रान्त में जाएगा, एक रेट होगा लेकिन बिहार के उद्योगों के लिए जब दूसरे प्रान्त से रॉ मैटीरियल आएगा तो उसके लिए ज्यादा फ्रेट देना पड़ेगा। यह है फ्रेट इक्विलाइजेशन। इसे हटाने के लिए हमने बहुत कोशिश की थी, तब बाद में इसे थोड़ा सा फेज़-आउट किया गया। क्या इसके लिए बिहार जिम्मेदार है? बिहार पावर्टी, लिट्रेसी, इम्प्लाटमैंट, उद्योग आदि हर मामले में पीछे हट रहा है, इसका मूल कारण क्षेत्रीय असमानता है। हमारा जो फैडरल स्ट्रक्चर है, हर राज्य को मदद देकर उसे ऊपर उठाया जा सके, उसमें कमियां हैं। हमने एक सवाल पूछा था, यह बिहार का सवाल नहीं था, उत्तर पूर्व प्रान्त का सवाल था कि नार्थ-ईस्टर्न रीजन में में सी.डी. रेशियो दस साल पहले २२ फीसदी था। जवाब मिला कि वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, रेलवे नहीं है। अगर इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं होगा, इंडस्टि्रयलाइजेशन नहीं होगा तो इन्वैस्टमैंट कौन करेगा। इसके लिए कौन सोचेगा? केन्द्र सरकार को सोचना पड़ेगा, कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे। ऐसे नहीं कि एक साल हमने ५० करोड़ रुपये, ६० करोड़ रुपये दे दिए, ठोस कदम उठाने पड़ेंगे। बिहार के सिर पर २३,००० करोड़ रुपये का कर्जा है। क्या इसे राइट ऑफ नहीं किया जा सकता? इसमें क्या दिक्कत है? बंटवारा हो गया। जितनी प्राकृतिक सम्पदा, खनिज सम्पदा थी, सब उधर चली गई और वहां सिर्फ बालू और बाढ़ रह गई, बाढ़ भी अंतर्राष्ट्रीय। नेपाल से जो पानी आता है, उसे रोकने की क्या व्यवस्था है। क्या यह राज्य सरकार के लिए संभव है? रघुनाथ झा जी ने ठीक कहा कि यह राज्य सरकार के लिए संभव नहीं है। उनके जितने रिसोर्सेज़ हैं, अगर उन सबको मोबीलाइज़ किया जाए, तब भी संभव नहीं है। यह केन्द्र की जिम्मेदारी है। हम इसका विरोध नहीं करते, ठीक है, आंध्रा प्रदेश को दस लाख टन चावल दे दिया, गेहूं दे दिया, ऐसे ही मुफ्त ले जाएं क्योंकि सरकार उनके समर्थन पर निर्भर कर रही है, लेकिन बिहार के बारे में भी सोचना पड़ेगा। बिहार का स्पैशल इकोनौमिक पैकेज, हम ऐसा नहीं कहते कि सरकार एक लाख ८९ हजार करोड़ रुपये दे दे।

हम कहते हैं कि इण्डस्टि्रयलाइजेशन के लिए, एम्पलायमेंट के लिए, सिंचाई के लिए, बाढ़ को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम ले। बाढ़ से हर साल जो बिहार की क्षति होती है, उसके कैसे रोका जाये, उसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए। यह क्या केवल राज्य सरकार का ही दायित्व है, क्या केन्द्र सरकार का कोई दायित्व नहीं है? हम चाहेंगे कि बिहार की समस्या का समाधान करने के लिए केन्द्रीय सरकार कुछ ठोस कदम ले। स्पेशल इकोनोमिक पैकेज देने में और विशेष राज्य का दर्जा देने में क्या मुश्किल है। अगर उत्तरांचल को दिया जा सकता है, अगर उत्तर पूर्वी राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया जा सकता है, उनकी समस्या है, हम जानते हैं, इसलिए उन राज्यों के लिए परियोजना का १० फीसदी खर्चा उत्तर पूर्वी राज्यों में होगा तो क्या यह बिहार के लिए नहीं हो सकता है। कहा गया कि पंचायत का चुनाव नहीं हुआ, इसलिए दसवें वित्त आयोग का पैसा नहीं मिलेगा। वहां चुनाव तो हो गये, पंचायत का चुनाव होने में कुछ अड़चन हुई थी, लेकिन बाद में चुनाव हो गये। जब चुनाव हुए तो बिहार के लिए जो दसवें वित्त आयोग ने सिफारिश की थी, वह पैसा कहां गया। वित्त मंत्री का कहना है कि वह लैप्स हो गया। उन्होंने एक साल का दिया है, चार साल का नहीं दिया। ११वें वित्त आयोग का एक साल का पैसा नहीं दिया तो क्या यह बिहार के प्रति अन्याय नहीं है? इसको हम मानते हैं कि यह बिहार के साथ घोर अन्याय है। हमारी मांग है कि जो सर्वदलीय प्रतनधिमंडल प्रधानमंत्री से मिला था, कोर कमेटी का गठन हुआ था, उसके बाद एक साल ३-४ महीने हो गये, उसमें क्या काम हुआ, आज मंत्री महोदय बता दें कि उस कोर कमेटी ने क्या सिफारिश की थी और उसके ऊपर सरकार ने क्या कार्रवाई की। सरकार क्या सोच रही है, इसमें सोच-विचार के लिए क्या है। बिहार के बारे में ऐसा नहीं कि यह पैसा दिया, पिछली बार जब यह सवाल उठाया था और जो जवाब दिया था। हम लोग वह जवाब नहीं चाहते। हम लोग चाहते हैं कि कुठ ठोस कदम आप लें।

हमारा यह भी प्रस्ताव है कि सदन में एक प्रस्ताव पारित हो कि बिहार के बंटवारे के बाद हर तरह से जो क्षति हुई है, इसको ठीक करने के लिए विशेष राज्य का दर्जा दिया जाये। बिहार के उन्नयन के लिए स्पेशल इकोनोमिक पैकेज की हाउस में घोषणा की जाये। हम चाहते हैं कि यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से इस सदन में पारित हो जाये।

हम विशेषकर आपको धन्यवाद देकर कि इस सवाल को आपने सदन में आज उठाया है, यह सवाल खाली किसी एक दल का सवाल नहीं है, यह किसी के खिलाफ कोई समालोचना के लिए भी नहीं है, लेकिन बिहार की यह समस्या जायज है और यह आठ करोड़ आबादी का सवाल है। हमारी मांग है, हम चाहेंगे कि सदन इस पर विचार करे और एक सर्वसम्मत प्रस्ताव इस सदन में पास हो जाये। यही कहते हुए मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।

श्री नवल किशोर राय (सीतामढ़ी): सभापति महोदय, हम लोग नोटिस देते हैं, उसके बाद हमारा नाम एक, दो, तीन या चार नम्बर पर आता है, फिर बोलने में उस नोटिस देने का कोई महत्व है या नहीं?हमारा नाम चौथे नम्बर पर आया था, लेकिन बोलने में हमारा नम्बर नहीं आया है।

सभापति महोदय : आपका नाम है।

श्री नवल किशोर राय: तो फिर आसन का निर्णय क्या है? हम लोगों को अवसर मिलेगा या नहीं मिलेगा?

सभापति महोदय : सबको अवसर मिलेगा।

श्री लाल मुनी चौबे (बक्सर) : सभापति जी, बिहार के बारे में सारी बातें कम से कम आ गई हैं इसलिए लोग ऊबे हुए हैं। बिहार के बारे में आपको जानकारी है, हमें जानकारी है और आचार्य जी जो जा रहे हैं, उनको भी जानकारी है। इसके अलावा जितने लोग सदन में बैठे हुए हैं, सबको इस बात की जानकारी है कि बिहार कभी राजा रहा है। राजा भी दधीचि की तरह रहा है, जो मांगों ले जाओ। राजा ही नहीं रहा, तब यह सूफी संत हो गया, भिखारी की तरह हो गया। इस बात को आप जानते हैं, कुछ और लोग भी जानते हैं। बिहार के लोग शुरू से ही स्वतंत्रता के बाद से ही सर्वोच्च श्रेणी में थे। देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू हुए। एक-एक जिले से तीन-तीन केबिनेट मंत्री होते थे। बाबू जगजीवन राम, राम सेवक सिंह जी और बलिराम भगत जी। लेकिन इन लोगों ने भी संतों की तरह सारे देश पर ध्यान दिया, बिहार को पीछे रखा। पहले तुम खाओ, बाद में जो बचेगा, वह हम देखेंगे, इस बात पर चलते रहे। देश में सारी चीजों का विकास हुआ, लेकिन बिहार में उस विकास की छाया तक नहीं पड़ी। हम लोग अब तक संत और सूफी बने हुए हैं। देश ठीक रहे, लगता है राष्ट्रीयता की सम्पूर्ण जिम्मेदारी बिहार पर है। बाकी लोग जितना पैकेज मांग लें, जितना धन मांग लें, उनको दिया जाता है, लेकिन बिहार के लिए कुछ नहीं होता है। आज हम भारी संकट में हैं। आप भी इसकी पीड़ा महसूस कर रहे हैं, मैं भी कर रहा हूं, क्योंकि घर की पीड़ा सबकी एक समान है। चौका-चूल्हा जैसा आपका है, वैसा ही मेरा है, वैसा ही वहां के आदिवासियों और कतवारु लोगों का भी है। अगर आपने आज इस बहस को लाइन पर ला दिया, सच्चाई पर ला दिया है, व्यापक बना दिया है, तो रघुवंश बाबू को मैं धन्यवाद देता हूं।

अब सवाल यह उठता है कि बिहार में बचा क्या है, बहुत लम्बी लड़ाई के बाद अब क्या दान हमसे चाहते हैं। हमारे पास क्या नहीं है, हमारे पास खनिज है, लोहा है, अभ्रक है, ताम्बा है, बेरियम है, थेरियम है, यूरेनियम है, लेकिन बिहार की यह सम्पदा किसके लिए है, देश के लिए है, भारत माता के लिए और इन सपूतों के लिए है। लेकिन हम अपने घर में ही इससे अछूते हैं, हमारे पास कुछ नहीं बचा है। किसके आगे हम रोएं, यह समझ में नहीं आता। एक आदमी ने कहा कि बिहार इतना स्वाभिमानी भी है कि जब चाहेगा तो पूरी धरती डोलेगी। यह कहानी नहीं है, सच्चाई है जो १९७४ में शुरू हुई थी। क्या हम उस राह को पकड़ें?क्या हम न बोलें तो हमारी स्थिति को आप नहीं समझेंगे ?क्या हम चुपचाप आपकी बातों को स्वीकार करते जाएं ? इसका यह अर्थ कभी नहीं होगा, एक किवदंती है, जो लगता है अब प्रासंगिक नहीं है कि "मौनम् स्वीकृतम",यह अब १६ आने सही नहीं है। मौन स्वीकृति नहीं होती है कि मैंने स्वीकार किया। न हम आज चुप हैं, न बिहार का कोई दल चुप है। सारे एक तरह से भिखारी बनकर एक लाइन में खड़े हैं और कटोरा उठाकर जयप्रकाश जी की तरह १९६७ में जिस तरह भीख मांगी थी, आज हम कटोरा उठाकर इस सदन में भीख मांगते हैं।

हम भिखारी नहीं हैं। …( व्यवधान)मैं यह कह रहा हूं कि ५४ साल में हमारी जो स्थिति बनी है, यह केन्द्र देखता रहा कि उत्तर बिहार बाढ़ में डूब रहा है, दक्षिण बिहार अकाल में गया और हम लड़ते रहे, मांगते रहे लेकिन हमारी किसी ने नहीं सुनी। १९७४ में जयप्रकाश जी ने सुनी। कर्पूरी ठाकुर जी ने सुनी और सारा देश उठ खड़ा हुआ। जयप्रकाश जी के आहवान पर जब लोग आंदोलन के लालच से दौड़े और भारी क्रांति हुई तो कुछ लोग यह सोचकर कि हमारी पार्टी कैसे बढ़ेगी, कहां जाएं, इस लालच में सारे लोग इकट्ठे होकर चरखा समति का चक्कर काटने लगे। वे अपना दल बढ़ाने के लिए आगे बढ़े, बिहार के लिए आगे नहीं बढ़े। बिहार में जो कुछ हो रहा था, उससे बिहार को बचाने के लिए वे आगे नहीं दौड़े बल्कि अपना दल बढ़ाने के लिए आगे आए। मैं जानना चाहता हूं कि क्या बिहार में सड़क, स्कूल, पुल, अस्पताल बने या सिंचाई योजनाएं बनीं?विकास तो इसी को कहते हैं। फर्टिलाइजर में देश के तीस करोड़ लोगों को जहां अन्न नहीं मिलता था, क्या फर्टिलाइजर आया? आज १०४ करोड़ लोगों को खिला रहे हैं, सरप्लस अन्न देश में पड़ा हुआ है। अगर बिजली २२ घंटे आ जाती तो हमारी बेकारी मिट जाती। रघुनाथ जी, इतना ही नहीं किया है, हम लोग नेपाल गये। उस समय वहां के प्रधान मंत्री श्री जी.पी.कोइराला जी थे। हमने उनसे कहा कि बिजली दीजिए। उन्होंने कहा कि आप अपनी केन्द्रीय सरकार से कहलवाइए। हमारे पास बहुत बिजली है। बिजली सस्ती है। हाइडेल बिजली सबसे सस्ती है। साढ़े सात रुपया प्रति यूनिट नैफ्ता से बिजली बनती है, गैस से बनती है, कोयला से बनती है लेकिन पानी से जो बिजली बनती है, वह सबसे सस्ती है। आप अपनी केन्द्र की सरकार से कहलवाएं, हम बिजली देने के लिए तैयार हैं। लेकिन आपके कहने से क्या होगा?क्या मैं बिजली पैदा करके नेपाल को आग लगाऊंगा?यह जी.पी. कोइराला जी का जवाब था। बिहार में बिजली की घोषणा हो गई थी और बिहार में ६८००० गांव हैं। ४८००० गांव इलैक्ट्रीफाइड हैं। जब छानबीन की गई तो पता चला कि ४८००० गांव में विद्युतीकरण हो चुका है जिसमें २०००० डी-इलैक्ट्रीफाइड हो चुके हैं और १४००० गांव ऐसे हैं जहां बिजली नहीं लगी है लेकिन रिकार्ड में बिजली लग चुकी है। १४००० गांव बचे तो उनमें ५००० गांवों में बिजली नहीं है और एनटीपीसी का उस पर ५५०० करोड़ रुपया बाकी है। बिजली की यह हमारी हालत है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पैकेज जो सरकार दे रही है, सरकार ने सुधार का काम किया है। सुरेश प्रभु जी ने कुछ अच्छे कदम उठाए हैं, उनके कदमों को सबने सराहा है और मैं भी सराहता हूं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। लेकिन ऐसा नहीं है कि कुछ मिल जाये। हिसाब-किताब हो कि इतना पैकेज मिले कि हम विकास की राह पकड़ लें। अगर हमें यह दिया गया कि इतना हम आपके लिए देते हैं, ठीक है तो यह ठीक नहीं होगा। इतना दें कि हम विकास की राह पर खड़े हो जाएं और आगे कदम बढ़ाएं। मैं यह भी कहूंगा कि यह २३०० करोड़ रुपया कभी माफ नहीं होना चाहिए। भविष्य के लिए कह रहा हूं। इसमें बिहार का विरोध नहीं है। मेरी बात दूर तक अहित में नहीं है। सरकार इतना दे कि उससे हम पैदा करें और इनका कर्ज लौटा दें नहीं तो अन्य प्रदेश भी कहेंगे कि मेरा माफ करो, मेरा माफ करो और बिहार उदाहरण बन जाये।…( व्यवधान)

श्री रघुनाथ झा : मैं अपने मित्र चौबे जी से कहना चाहता हूं कि पंजाब इस देश में सबसे बड़ा विकसित राज्य है। पंजाब राज्य का भी कर्जा माफ हो गया। इसलिए बिहार उदाहरण बनने नहीं जा रहा है, पंजाब तो पहले से ही उदाहरण है। गुजराल साहब वहां का कर्जा माफ करके आए थे।

श्री लाल मुनी चौबे: इस देश में एक तरह की सरकारें नहीं बनीं हैं। यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह कौन सी नीतियों को अपनाती है। हर सरकार की भिन्न-भिन्न नीतियां होती हैं। मैं समझता हूं कि अगर बिहार के लोगों को एतराज है, तो मैं अपने शब्द वापिस लेता हूं, लेकिन मन से वापिस नहीं लूंगा। कारण यह कि आदत नहीं पड़नी चाहिए। लोग कर्जा लेकर लौटाते नहीं है। को-आपरेटिव में लोग ट्रैक्टर लेते हैं और इंतजार करते हैं कि कर्जा माफ हो जाए। मैं इस विषय में उलझना नहीं चाहता हूं। जो सही बात है, वही कहना चाहता हूं। लोगों ने कहा है कि गरीब बिहार छोड़ कर भाग रहे हैं। खाने, पीने या छप्पर न होने की वजह से और लू-जाड़े में मरने वालों की संख्या बिहार में कम नहीं है। भारी संख्या में लोग मर रहे हैं और ५४ सालों से मर रहे हैं। इसके लिए कोई सरकार दोषी नहीं है, अगर कोई दोषी हैं, तो यह व्यवस्था दोषी है। यह व्यवस्था की देन है। तुलसीदास जी ने लिखा है - "बारि मथे बरु होय घृत, सिकता से बरु तेल। " यह संभव है, पानी को मथने से घी निकल सकता है और बालू को मथने से तेल भी निकल सकता है, लेकिन यह संभव नहीं है कि हमारे होश में बिहार की गरीबी दूर हो जाए। बिहार विकास की राह पर चले, यह दिखाई नहीं देता है। भुभूक्षित: किन्नकरोति पापम् - भूखा क्या पाप नहीं कर सकता है। विकास की राह पर अगर बिहार निकल पड़ा, तो विकास रुकेगा नहीं और व्यवस्था छिन्न-भिन्न होगी तथा आचार्य जी की राह पकड़ लेगी। सब कुछ बिहार में चला गया है, बिहार में कुछ नहीं है। जिस रायल्टी के लिए १९८७-८८ और १९९० में लड़ाई लड़ी गई, लेकिन अब दूसरे राज्य का हिस्सा हो गई। अब रायल्टी झारखण्ड में जाएगी। बिहार की क्या दुर्दशा हो रही है। बिहार की दुर्दशा के बारे में आप सब जानते हैं। सभापति जी, इस वक्त आप आसन पर हैं। बिहार को आप किसी की मर्जी पर कैसे छोड़ सकते हैं। मैं समझता हूं कि सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव सदन में पारित हो चुका है, लेकिन गवाह के लिए सदस्य नहीं हैं, ये दीवारें हैं, आपकी कुर्सी है - धर्म चक्रप्रवर्तनाय: - यहां सदस्य कौन हैं। नियम के अनुसार प्रस्ताव पारित हो जाएगा, लेकिन सदन में कितने सदस्य हैं? इतना बड़ा दर्द और ५४२ सदस्यों में से ४२ सदस्य भी इस समय सदन में नहीं है। बिहार की पीड़ा, बिहार पर बहस - यहां उपस्थित लोगों की संख्या बताती हैं कि बिहार की समस्या से कितने लोग पीड़ित हैं। कारण कि मैं भी भूल गया हूं, ये भी भूल गए हैं और तमाम लोग भूल गए हैं, लेकिन पीड़ा याद आती है। जब हम बाहर निकलते हैं, तो समय की गरमी और फिर छाया चाहिए। सिद्धान्तों में विरोध हो सकता है, लेकिन बरगद की छाया में कुछ लोग चले जाते हैं और उसके पहले जब गर्मी लगती है, तब वैसी स्थिति नहीं होती है।

हम लोग उसी पीड़ा में हैं। एयर कंडीशन खराब हो गया है, मैटाडोर पर जाते हैं उसमें गर्मी होती है। जो कोमल लोग दुर्भाग्य से चले जाते हैं, उनकी हालत बिगड़ जाती है। वे कहते हैं कि राम-राम छोड़ो। वे लोग गर्मी सहन नहीं कर पाते। हम लोग यहां गाड़ी की मांग नहीं कर रहे हैं, हम अपने बिहार की पीड़ा की मांग कर रहे हैं। हम लोग इस आग में झुलस रहे हैं, इसलिए सिद्धांत, विचार, फिलोस्फी आदि सब छोड़ कर हम यहां अड़े हुए हैं कि बिहार को पैकेज दिया जाए। सदन में सर्वसम्मति हो गई है। हम सर्वसम्मति से कहेंगे, चूंकि आज सर्वसम्मति होने वाली है, इसलिए इसे दर्ज किया जाए।

महोदय, नियम १९३ के अंतर्गत बहस में सर्वसम्मति से बिहार को पर्याप्त पैकेज देने के लिए, विशेष दर्जा देने के लिए बहस की गई और इस सदन ने सर्वसम्मति से उसे पारित किया - आज यह हो जाएगा। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि वर्तमान सरकार को जो भी ज्ञापन बिहार के सांसदों की तरफ से दिया गया। हम लोग दो-तीन बार बिहार के बारे में मिले। सरकार का आश्वासन पोजटिव एवं घनात्मक था। जिनकी बात पर विश्वास किया जाएगा, जिनकी बात पर आज युद्ध छिड़ सकता है, ऐसे लोगों ने कहा। हम इस आशा में हैं कि इस पैकेज के बाद बिहार विकास की राह पकड़ लेगा।…( व्यवधान)मंत्री जी चाहें तो आज ही इसकी घोषणा कर सकती हैं, अगर आज कर दें तो हमें प्रसन्नता होगी। यह भी जवाब आ सकता है कि परामर्श करके इस पर घोषणा करूंगी। अगर आज ही घोषणा कर दें तो इससे बढि़या कोई बात नहीं। सरकार की तरफ से घोषणा हो, समयबद्ध कार्यक्रम की तरह नहीं, कि इतने दिनों में हो जाएगा, इस पर समय और बढ़ाओ। लोगों ने भाषण दे दिए, मैं सब की राय जानना चाहती हूं। इसके लिए एक घंटा और बढ़ाओ, हर बार समय बढ़ा दीजिए, ऐसा नहीं होना चाहिए। आज इस पर परामर्श लेना होगा कि कितनी राशि होगी, इस पर मंत्री जी तैयार होकर आए होंगे तो अच्छा होगा और अगर नहीं आए हैं तो यही कहेंगे कि ठीक है परामर्श करके घोषणा की जाएगी। मैं चाहता हूं कि इसकी घोषणा हो, कल हो पाएगी या नहीं, यह मैं नहीं जानता, लेकिन जल्दी हो और अगर न हो सके तो बाद में ब्रौडकास्िंटग से हो। बिहार में कितना पैकेज दिया गया और सात दिन के अंदर करें तो इनकी बहुत ही बड़ी कृपा होगी, क्योंकि हम भूखे हैं, चिल्ला रहे हैं। अपनी बात को कह रहे हैं। भूखों की आवाज कितनी सुनी जा रही है, बिहार की जनता बाग-बाग हो जाएगी और मान लेगी कि हमें ५४ साल में राहत मिली है तो आज मिली है। आज जो सरकार है, जो मेरी आवाज से पीड़ित एवं द्रवित हुई है। आज हम निर्धन नहीं, दरिद्र होकर बोल रहे हैं, निर्धन नहीं रह गए हैं, दरिद्र हैं और हमारी दरिद्रता का यह अभिशाप यह सरकार छुड़ा दे।

यहां दो मंत्री बैठे हैं, मैं आग्रह करूंगा कि ये घोषणा करें और अभी न कर सकें तो सात दिन में अपना प्रभाव इस सरकार पर छोड़ें कि आप सात दिन में घोषणा करें, अगर आठ दिन में भी हो जाए तो कोई एतराज नहीं है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : सभापति महोदय, आज बिहार को आर्थिक पैकेज के सवाल पर आपने जो चर्चा उठाई है उसके लिए मैं सबसे पहले आपको धन्यवाद देता हूं। आपने बहुत महत्वपूर्ण सवाल सदन में उठाया है, जिस पर हम लोगों को भी विचार व्यक्त करने का अवसर मिला है।

सभापति जी, बिहार की चर्चा वभिन्न रूपों में इस सदन में होती रहती है और जब भी कोई चर्चा होती है तो हम लोग आपस में उलझते रहते हैं। लेकिन आज एक ऐसा अवसर है जब हम बिहार पर चर्चा खुले दिल से और दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर कर रहे हैं और हमें कल का बिहार और आज का बिहार साफ नजर आ रहा है। कल के बिहार में हम खुशहाल थे और आज के बिहार में हम पीड़ा से पीड़ित हैं। पीड़ा के कारण क्या हैं यह ढूंढने में हमें समय लगेगा।…( व्यवधान)बिहार एक ऐसा राज्य हैं जहां जाने के लिए ऋषि-मुनि, दैवी-देवता भी तरसते रहे हैं। मैं वहां के धार्मिक स्थानों का वर्णन करना नहीं चाहता हूं लेकिन ऋषि-मुनियों की वहां एक कतार है। लेकिन शुरू से ही बिहार को दबाया गया है और उसका कारण हमारी काल-प्रमुखता रही। हम शुरू से ही स्वभिमानी रहे हैं और हमारे तेवरों में शुरू से ही यह मानसिकता रही कि हम गुलामी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे और हमने शुरू से ही गुलामी के खिलाफ बगावत की और बगावत का झंडा उठाया। बिहार ही नहीं देश का बच्चा-बच्चा उस बात को भूल नहीं सकता जब आरा के जगदीशपुर गांव से बाबू कुंवरसिंह जी की तलवार ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाये थे। इसी तरह से जब गांधी जी के नेतृत्व में लड़ाई हुई तो गांधी जी को बिहार के चम्पारण की पवित्र भूमि अपने आंदोलन की शुरूआत करने के लिए दिखाई दी। बिहार के लोगों को उन्होंने परखा और उन्होंने महसूस किया कि इस लड़ाई का प्रारम्भ अगर हम बिहार से करेंगे तो हमें सफलता मिलेगी। गांधी जी के नेतृत्व में जब जयप्रकाश नारायण जी और राजेन्द्र बाबू जैसे लोग शरीक हुए, उसी समय से अंग्रेजों की आंख में बिहार खटकता रहा और एक साजिश के तहत अंग्रेजों द्वारा बिहार को काटकर आर्थिक रूप से छोटा किया गया। आजादी के बाद जो सरकार स्वतंत्र देश में बनी, सच पूछिये तो वह भी अंग्रेजों की राह पर ही चलती रही। जिस ढंग से अंग्रेजों ने बिहार को आर्थिक रूप से काट-छांट कर छोटा किया, उसी ढंग से कांग्रेस की हुकूमत भी बिहार के साथ अन्याय करती रही। आज हम बिहार की पीड़ा से परेशान हैं और जिस दिन बिहार का बंटवारा हो रहा था उस दिन हम चिल्ला-चिल्ला कर उसका विरोध कर रहे थे। माननीय देवेन्द्र प्रसाद यादव जी हमारी बात के साक्षी हैं और वह स्वयं भी मजबूती के साथ बंटवारे का विरोध कर रहे थे। लेकिन बिहार विधान सभा से एक राजनैतिक साजिश के तरह प्रस्ताव पारित किया गया। अपनी कुर्सी बचाने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया। दिल्ली में पहले से ही बंटवारा तय था। उसमें कोई कहे कि हम बिहार के हित में काम कर रहे थे, तो चाहे कांग्रेस के लोग हों या भारतीय जनता पार्टी के लोग हों, बिहार की जनता यह मानने के लिए तैयार नहीं है।

सभी ने मिल कर बिहार का अहित किया। राज्य के बंटवारे के लिए वैसी परिस्थिति नहीं थी कि बिहार का बंटवारा किया जाता। हमारा ह्ृदय शरीर से बाहर निकल गया।

लाल मुनी जी यहां बैठे हैं। वह कह रहे थे कि कर्जा माफी के सवाल से वह सहमत नहीं हैं। एक लाख दस हजार करोड़ रुपया बड़े-बड़े उद्योगपतियों के यहां कर्जा पड़ा है जिसे सरकार वसूल नहीं कर रही है और अपने को असहाय महसूस करती है। बिहार के मात्र ३० हजार करोड़ रुपए का सवाल है। यहां बिहार के भाग्य का सवाल है और बिहार की नई पीढ़ी के उत्थान का सवाल है।

श्री लाल मुनी चौबे: मैंने पैसे छोड़ देने का विरोध किया था। मैंने कहा था कि जो पैसा छोड़ा गया है उसे उद्योगपतियों से वसूल किया जाए।

श्री प्रभुनाथ सिंह : आज हम में क्षमता है। बिहार के मजदूर देश के वभिन्न हिस्सों में जाकर कपड़े की मिलों में कपड़ा बनाने का काम करते हैं। बंगाल के सारे उद्योग धंधे बंद हो रहे हैं। यदि बंगाल की जनसंख्या को आबादी के हिसाब से देखा जाए तो उसमें हमारी अच्छी हिस्सेदारी है। गुजरात में जहां मजदूरों की जरूरत है, वहां बिहार के मजदूर अपनी मेहनत से कपड़ा तैयार करते हैं। हम अपने परिश्रम से देश और दुनिया को कपड़ा पहनाते हैं लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज हमारी स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही है। हम शरीर ढकने के लिए वस्त्र की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं। बिहार के मजदूर परिश्रम से बड़ी-बड़ी बिल्िंडगें खड़ी करते हैं लेकिन बिहार में देखें तो वहां के लोगों को रहने के लिए झोंपड़ी नसीब नहीं है। इसके पीछे क्या कारण है जिससे वे बाहर जाकर मजदूरी करने पर मजबूर हो रहे हैं।

आज हम बिहार सरकार के बारे में चर्चा कर रहे हैं। मैं बिहार सरकार पर छींटाकशी नहीं करना चाहता, लेकिन जहां अपनी कमजोरी है वह महसूस करनी चाहिए। यदि उसे महसूस नहीं करेंगे तो मिल- जुल कर सही रास्ते पर ले जाने में सक्षम नहीं होंगे।

राधा मोहन सिंह जी और अन्य सदस्यों ने यहां चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि हम केन्द्र से मिलने वाले पैसे को खर्च नहीं कर पाए। आखिर इसका क्या कारण है? मैंने बहुत से अखबारों में पढ़ा है कि पैसा डाइवर्ट कर दिया जाता है। हमें कोई न कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे जो पैसा यहां से मिलता है वह खर्च किया जा सके। अभी १५० करोड़ रुपया प्रधान मंत्री सड़क योजना का बिहार में लगभग १०-११ महीने से पड़ा है। देश के दूसरे प्रान्तों को दो-दो किश्तें चली गई हैं और कहीं-कहीं तीसरी किश्त चली गई है। तीसरी सूची पूरे देश की आ चुकी है लेकिन बिहार को एक किश्त अभी गई है। अफसोस इस बात का है कि वह रुपया अभी तक खर्च नहीं हो सका है। कहीं-कहीं इसकी शुरुआत हुई है। टेंडर फाइनल किए गए। ६ महीने से ज्यादा समय हो गया है और वे टैंडर रद्द भी हो गए होंगे। अभी तक बिहार में टैंडर फाइनल नहीं हुए हैं इसलिए पैसा खर्चा नहीं हो रहा है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

एक बार पटना उच्च न्यायालय में एक जन-हित याचिका दायर हुई थी।

जिस समय नीतीश कुमार जी सरफेस ट्रांसपोर्ट विभाग के मंत्री थे, उस समय बिहार के लिये पैसा गया था लेकिन बिहार राज्य ने वह पैसा खर्च नहीं किया। उच्च न्यायालय, पटना ने एक पी.आई.एल. पर आदेश दिया कि अगर सरकार पैसा नहीं खर्च कर सकती तो केन्द्रीय सरकार किसी दूसरी एजेंसी से काम कराये। पता नहीं, उस आदेश पर अमल हुआ या नहीं लेकिन मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि यदि बिहार सरकार पैसा खर्च करने में सक्षम नहीं, इसलिये बिहार का विकास अवरुद्ध कर दिया जाये या उसका आवंटन रोक दिया जाये, यह मुनासिब नहीं होगा। बिहार सरकार जितना खर्च करने में सक्षम हो, वह करे। लेकिन बिहार का विकास हो, वहां अस्पताल बने, सडक का निर्माण हो, ये सारे काम होने चाहिये। हां, यह जरूर है कि कहीं-कहीं कठिनाई हो रही है तभी हम लोग आर्थिक पैकेज की मांग कर रहे हैं।

सभापति महोदय, जहां तक हमारी जानकारी है, वह सही या नहीं, लेकिन रक्षा मंत्रालय ने गोपालगंज में एक सैनिक स्कूल खोलने का प्रस्ताव किया है और यह काफी समय से पैंडिंग है।

श्री रघुनाथ झा : डेढ़ साल से गोपालगंज और नालंदा दो जगहों के लिये स्वीकृति हुई है लेकिन काम शुरु नहीं हुआ है।

श्री प्रभुनाथ सिंह : सभापति जी, केन्द्र सरकार बिहार सरकार को पैसा दे रही है और हम लोग लेने के लिये तैयार नहीं है। राज्य सरकार जमीन देने में असमर्थ है। क्या हम इसे पैकेज नहीं मानते? इसी तरह मसरख में एक केन्द्रीय विद्यालय का प्रस्ताव लम्बित है। हमने यहां लालू जी से कहा कि जमीन के अभाव में यह केन्द्रीय विद्यालय नही खुल रहा है। सरकार के पास जमीन पड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि जल्दी करा देंगे लेकिन अभी तक जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई है। क्या बिहार शिक्षा में प्रगति नहीं कर पायेगा? केन्द्र सरकार योजना दे रही है लेकिन बिहार सरकार पूरा नहीं कर पा रही है।

सभापति महोदय, महाराजगंज में ग्रिड कारपोरेशन का एक विद्युत प्रोजैक्ट स्वीकृत हुआ है लेकिन पटना विद्युत परिसर से अनापत्ति प्रमाण-पत्र पिछले १० महीने से नहीं आया है। हमने विद्युत मंत्री को पत्र लिखा और फोन से बात की। आपको स्मरण होगा कि बिहार निवास पर एक मीटिंग रखी गई थी जिसमें बिहार के सभी सासंद गये थे। आप भी उस मीटिंग में थे। हमने निवेदन किया तो कहा गया कि एक हफ्ते में एन.ओ.सी. आ जायेगा। आज न जाने कितने हफ्ते बीत गये, हमें याद नहीं। श्री चौबे जी ने विद्युत के बारे में काफी चर्चा की। ग्रिड कारपोरेशन की तरफ से ३६५ करोड़ रुपये की एक योजना उत्तर बिहार के लिये प्रस्तावित है। इसके लिये बिहार सरकार को एक एग्रीमेंट करना था। एक बैठक में इस बारे में चर्चा की गई थी। हमने विद्युत मंत्री जी से आग्रह किया था कि एग्रीमेंट करके आश्वासन दिया जाये। उस मीटिंग में ग्रिड कारपोरेशन के चेयरमैन भी आये हुये थे। आप भी उस बैठक में मौजूद थे लेकिन मंत्री जी ने कोई आश्वासन नहीं दिया। मंत्री जी ने कहा कि वे पटना में जाकर बात करेंगे लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। फिर हम किस पैकेज की मांग कर रहे हैं? आखिर पैकेज का मतलब नकद पैसा तो नहीं होता है। इसका मतलब तो योजना से होता है। जो योजना पहले से स्वीकृत है और केन्द्र सरकार पैसा देने के लिये तैयार है लेकिन हम लोग लेने के लिये तैयार नहीं हैं।

सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से निवेदन करूंगा कि केन्द्र सरकार जो योजना दे रही है, राज्य सरकार को उस का खर्च करना चाहिये। जिस योजना में जमीन देने का सवाल है, राज्य सरकार उस जमीन की व्यवस्था करे। यदि राज्य सरकार पैसा खर्च करने में सक्षम नहीं होती तो केन्द्र सरकार दूसरी एजेंसी से काम कराये। राज्य का विकास कीजिये, उसे अवरुद्ध करने का अधिकार केन्द्र सरकार को नहीं है। जिस समय बिहार राज्य का बटवारा हो रहा था, हमने उसका विरोध किया था। हमने गृह मंत्री जी से अकेले में मुलाकात की थी।

उन्होंने कहा था कि हम बिहार के लिए कुछ करेंगे और विशेष रूप में करेंगे। आप इसका विरोध मत कीजिए। अपने भाषण में उन्होंने आश्वासन दिया था कि प्लानिंग कमीशन में अलग से यूनिट बनाई गई है। दो वर्ष बीत गये, उस यूनिट का क्या हुआ, वहां से क्या रिपोर्ट आई है, अभी तक शून्य। वह यूनिट क्या कर रही है। अगर वह यूनिट कुछ नहीं कर रही है तो हम कहते हैं कि राज्य का बंटवारा करते समय सदन में जो कहा गया था, वह बिहार के साथ धोखा किया गया है। माननीय रघुनाथ झा ने ठीक ही कहा कि बिहार की मिट्टी की बनावट अजीब है। बिहार को दबाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। बिहार से जब चिंगारी निकलती है तो ज्वालामुखी बन जाती है। बिहार के लोग आज पीड़ित हैं, परेशान है। बिहार आज पूरी ताकत के साथ सरकार को समर्थन दे रहा है। आज बिहार के ४० सांसदों में से ३४ सांसद सरकार के साथ खड़े हैं। सरकार के साथ ३४ सांसद होने का बद सरकार ने बिहारवासियों को सदन के माध्यम से जो आश्वासन दिया था, वह आज तक पूरा नहीं हुआ है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता। मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहूंगा कि राज्य के बंटवारे का समय जो आश्वासन गृह मंत्री जी ने सदन में दिया था, वह अविलम्ब पूरा किया जाए।

सभापति महोदय, चर्चा चल रही थी कि नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में यहां बैठक हुई थी।…( व्यवधान)

श्री प्रियरंजन दासमुंशी (रायगंज) : अगर चंद्रबाबू नायडू होते तो पैकेज लेकर छोड़ते। यह दुर्भाग्य की बात है कि ३४ सदस्यों का मत होने के बाद भी सरकार कुछ नहीं कर रही है।

श्री प्रभुनाथ सिंह : क्या करें प्रियरंजन जी, हम लोग परेशान है।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: मैंने आपको दुख देने के लिए नहीं कहा।

श्री प्रभुनाथ सिंह : हम उसे दुख नहीं मानते…( व्यवधान)सभापति महोदय, हम कोई चर्चा नहीं करना चाहते थे, लेकिन प्रियरंजन जी ने कह दिया है तो मैं एक बात कह देना चाहता हूं कि बिहार की दुर्दशा में प्रियरंजन जी आप भी कम जिम्मेदार नहीं है। सबसे ज्यादा जिम्मेदार आप लोग हैं। चूंकि आज जो सरकार राज्य में चल रही है, प्रियरंजन जी, बाहर से पैसे तब जाते हैं जब वहां वधि व्यवस्था सुधरी हुई हो, वहां की वधि व्यवस्था ठीक-ठाक रहती हो। लेकिन आप जिस सरकार को समर्थन दे रहे हैं, आप थोक के भाव में नरसंहार करवा रहे हैं। कभी हरिजनों का और कभी किसी जाति का वहां नरसंहार होता है। चूंकि आप नरसंहार करवा रहे हैं, इसलिए वहां कोई बाहर का व्यक्ति पूंजी लगाने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए बिहार दिन-प्रतदिन कंगाल होता जा रहा है। बिहार की दुर्दशा में आप लोग शामिल हैं और सिर्फ आप लोग शामिल ही नहीं हैं, आप अपनी भी दुर्दशा बिहार में करवा रहे हैं तथा जो स्थिति आप पैदा कर रहे हैं, उसके लिए आने वाला समय आपको बतायेगा…( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये।

श्री प्रभुनाथ सिंह : सभापति महोदय, मैं अपनी बात एक मिनट में समाप्त कर दूंगा। दासमुंशी जी ने कहा है, इसलिए हमने उन्हें बताया है कि वह बिहार में अपना खाता बंद करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इसलिए हम कहेंगे कि आप भी सतर्क हो जाइये और जल्दी ही वहां की सरकार से समर्थन वापस ले लीजिए। कोई नया समीकरण बनेगा तो हम लोग देखेंगे।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: आप जिस दिन फैसला लेंगे कि इस सरकार से समर्थन वापस ले रहे हैं, उसी दिन शाम को आपके साथ हाथ मिलाकर हम भी समर्थन वापस ले लेंगे। पहले आप फैसला कर लीजिए। आपके साथ अभी यह मेरा कांट्रैक्ट हो चुका है। आप पहले फैसला कीजिए।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप कंक्लूड कीजिए।

श्री प्रभुनाथ सिंह : हम अंतिम बात कहकर अपनी बात समाप्त कर रहे हैं। आज हम चाहेंगे कि इस सदन से तीन प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हों। हम चाहते हैं कि बिहार सरकार का जो कर्ज का रुपया पड़ा हुआ है, वह माफ किया जाए। इसके इस देश में उदाहरण है। राष्ट्रीय जनता दल से राज्य सभा के सदस्य गुजराल साहब जब देश के प्रधान मंत्री बने थे तो उन्होंने पंजाब जो देश का सबसे खुशहाल प्रांत है, उसका जितना पैसा बकाया था, सब माफ कर दिया था। जब कि आज जो स्थिति बिहार की है, वैसी स्थिति पंजाब की नहीं थी। बिहार की स्थिति आज बद से बदतर हो गई है।

20.00 hrs. हम चाहेंगे कि सर्वसम्मति से प्रस्ताव इस सदन से पारित हो कि बिहार पर जो कर्ज़ है, उसे माफ कर दिया जाए। हम चाहेंगे कि जब राज्य की बदहाली को दूर करना है, उसमें सदन भी सहमत है और यदि सरकार की मानसिक स्थिति यह है कि बिहार की स्थिति सुद्ृढ़ करनी चाहिए तो बिहार को जब तक विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जाएगा, तब तक उसकी स्थिति सुधरने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसलिए दूसरा प्रस्ताव यह भी सर्वसम्मति से पास किया जाए कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए। इसके साथ ही जो आर्थिक पैकेज का सवाल है, वह कितने का हो, क्या बिहार सरकार ने प्रारूप उसका भेजा है, हमें जानकारी नहीं है। लेकिन सुना है कि प्लानिंग कमीशन में एक मीटिंग होने वाली है जिसमें बिहार के सभी सांसदों को बुलाया जा रहा है। यदि यह सही है तो हम चाहेंगे कि राज्य सरकार के प्रतनधि के रूप में कांति जी बैठी हुई हैं, और आप अभी आसन पर हैं, हम चाहेंगे कि हमें भी उस प्रस्ताव की एक कापी दिलवाई जाए ताकि उस बैठक में यदि हम रहें तो राज्य सरकार के प्रस्ताव को देखकर, राज्य सरकार को जितना ज्यादा से ज्यादा आर्थिक पैकेज हो सके, वह दिलाने के लिए हम बात करें। साथ ही एक प्रस्ताव और हम चाहते हैं कि अगर राज्य सरकार पैसे को सही समय से खर्च नहीं करती है तो वैसी स्थिति में दूसरी एजेन्सियों से खर्च कराकर राज्य का विकास किया जाए, यह भी सर्वसम्मति से प्रस्ताव किया जाए।

अंत में प्रियरंजन दासमुंशी जी से कहना चाहूंगा कि जिस दिन आप निर्णय करेंगे और बिहार सरकार से समर्थन वापस लेंगे, उसके २० दिनों के अंदर हम केन्द्र सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे और आपसे दोस्ताना संबंध बनाएंगे। यदि हमारी पार्टी सहमत नहीं हुई तो भी बहुमत में आपके साथ रहेंगे।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: मैं लखनऊ की भाषा में कहूँगा कि पहले आप।

सभापति महोदय : बहस की निर्धारित अवधि समाप्त हो चुकी है। यदि सदन सहमत हो तो सदन का समय बहस खत्म होने तक बढ़ा दिया जाए।

कई माननीय सदस्य : हाँ, हाँ।

सभापति महोदय : सभा की सहमति है, अत: सदन का समय बहस की समाप्ति तक बढ़ाया जाता है।

20.03 hrs. श्रीमती कान्ति सिंह (बिक्रमगंज):सभापति महोदय, नियम १९३ के तहत बिहार को स्पेशल पैकेज देने के लिए आप तथा रघुनाथ जी जो प्रस्ताव लाए हैं, मैं उसके लिए आपका धन्यवाद करती हूँ। चाहे सत्ता पक्ष वाले हों या विपक्ष में बैठने वाले हों, आज बिहार के बारे में जब भी चर्चा होती है तो उसे एक बीमारू राज्य कहकर संबोधित किया जाता है। यह बीमारू राज्य की स्थिति जो बिहार की है, वह झारखंड राज्य बनने से पहले नहीं थी। बिहार से जो भाड़ा सामान्यीकरण आदि बात को लेकर जितनी भी विकास की धाराएं बहीं, वह दूसरे राज्यों में बहीं।

सभापति जी, पहले बिहार की यह स्थिति नहीं थी, लेकिन बिहार के विभाजन ने, इस क्षेत्र के विकास से जुड़े हुए अनेकों मुद्दे खड़े किए हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बिहार एक विकसित राज्य था, लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और आज बिहार आर्थिक विकास की सीढ़ी पर सबसे नीचे आ गया। आज हम ऐसी जगह पर हैं, जहां आर्थिक और सामाजिक ढांचा बिगड़ गया है। इस असंतुलन को ठीक करना नितान्त आवश्यक है। यदि बिहार की और उपेक्षा की गई तो यह देश की अखंडता पर प्रश्नचिहन खड़ा कर देगा।

महोदय, आपने भी सदन में बहुत आंकड़े प्रस्तुत किए कि किस तरह से बिहार की उपेक्षा हुई है। जहां तक बिहार का विकास की द्ृष्टि से पीछे जाने की बात की जा रही है, माननीय रघुनाथ झा और राधा मोहन जी ने अनके कारणों का जिक्र करते हुए बताया कि बिहार की बदहाली का क्या कारण है। मैं उनसे कहना चाहती हूं कि बिहार का जब बंटवारा हुआ था, तो इसी सदन के सारे दल के लोगों ने, सत्ता दल के हमारे गृह मंत्री, लाल कृष्ण आडवाणी जी ने आश्वासन दिया था कि विशेष पैकेज दिया जाएगा। इसी आश्वासन पर सदन ने बिहार विभाजन के जो मुद्दे आए थे, उस समय सारे लोगों ने एक ही सवाल खड़ा किया कि बिहार सरकार को विकास के लिए विशेष आर्थिक पैकेज मिलना चाहिए। ऐसा आश्वासन के मिलने के बाद ही बिहार के विभाजन के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया, लेकिन आश्वासन मिले दो साल बीतने जा रहे हैं, परन्तु आज तक पैकेज के नाम पर कुछ भी नहीं दिया गया है।

माननीय प्रभुनाथ सिंह जी ने कहा कि आर्थिक पैकेज क्यों दिया जाए। मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि हिमालय से निकलने वाली नदियों से उत्तरी बिहार में जो बाढ़ें आया करती हैं, उनसे कोसी और गंडक क्षेत्र के जरिये पूरे बिहार में तबाही मच जाती है। आपात-कालीन स्थिति जैसे गुजरात में हुई, उड़ीसा में हुई, उससे निपटने के लिए आर्थिक पैकेज दिया गया, लेकिन बिहार में बाढ़ आती है, तबाही होती है, तो कुछ नहीं दिया जाता है। ऐसा सौतेला व्यवहार और भेदभाव केन्द्र सरकार द्वारा बिहार के साथ क्यों किया जाता है?

महोदय, बिहार में हर वर्ष बाढ़ आती है। पिछली बार भी आई, लेकिन केन्द्र सरकार ने बजाय आर्थिक पैकेज देने के चावल दिया और पूरे देश में प्रचार कर दिया कि हमने बिहार सरकार के बाढ़ पीड़ितों को सहायत देने के लिए लाखों टन चावल दिया है। मैं बताना चाहती हूं कि बाढ़ पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए वह चावल नहीं दिया गया, बल्कि काम के बदले अनाज कार्यक्रम के अन्तर्गत वह दिया गया था। उसकी भी क्वालिटी ऐसी थी कि उस चावल को आदमी तो क्या जानवर भी सूंघने को तैयार नहीं होत् थे। फिर बिहार सरकार के ऊपर केन्द्र सरकार ने आरोप लगाया और प्रचार किया कि बिहार सरकार ने चावल नहीं उठाया। आप ही बताइए ऐसे खराब किस्म के चावल को जिसे जानवर भी खाने की बात तो छोड़िए सूंधने के लिए तैयार नहीं, उसे यहां से उठाकर बिहार ले जाकर क्या किया जाए। मैं पूछना चाहती हूं कि बाढ़ पीड़ितों की तत्काल सहायता के लिए भारत सरकार ने क्या किया ? बिहार को विषेश आर्थिक पैकेज देने के लिए कुछ नहीं किया गया बल्कि केन्द्र सरकार ने बिहार में हल्ला मचा दिया कि हमने लाखों टन चावल दिया, लेकिन बिहार सरकार ने उसे उठाया नहीं। मैं केन्द्र सरकार पर आरोप लगाना चाहती हूं कि उसने पूरे बिहार की जनता को गुमराह करने का काम किया, यानी बिहार की जनता को ठगने का काम किया। केन्द्र सरकार की ओर से ऐसा दर्शाया गया कि वह तो बिहार की सहायता करना चाहती है, लेकिन बिहार सरकार कुछ नहीं कर रही है। केन्द्र सरकार तो हर बार सहायता देती है, लेकिन बिहार सरकार केन्द्र सरकार द्वारा सहायता के रूप में दिए गए अनाज को उठाती ही नहीं है। मैं फिर दोहराना चाहती हूं कि बाढ़ पीड़ितों की तत्काल सहायता के लिए केन्द्र सरकार ने क्या किया?मैं कहना चाहती हूं कि बिहार हर बार बाढ़ से ग्रस्त हो जाता है। इसलिए बिहार सरकार इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा समझती है।

इसलिए मेरा कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय मामला होने के कारण केन्द्र सरकार द्वारा इसमें पहल की जाये।

जब बाढ़ पर बहस होती है तब बार-बार कहा जाता है कि केन्द्र सरकार नेपाल सरकार के साथ पहल करेगी लेकिन वह किस तरह की पहल कर रही है और कहां तक उसमें कामयाबी हासिल हुई है, उसके बारे में हमें आज तक कोई जानकारी हासिल नहीं हुई। अगर बाढ़ से मुक्ति दिलाने की बात है तो हमारी बिहार सरकार ने भी इसके लिए बहुत सी परियोजनाएं बताई हैं जैसे कोसी उच्च बांध परियोजना, कमला बांध परियोजना, बागमती बांध परियोजना आदि अन्य परियोजनाएं हैं जिनका अगर निर्माण किया जाये तो वहां बाढ़ से निजात पाई जा सकती है। बाढ़ से निजात पाने के साथ-साथ इससे बिजली और सिंचाई के नये रुाोत भी सृजित किये जा सकते हैं इसलिए विशेष पैकेज की बात की जा रही है।

जब से झारखंड और बिहार का बंटवारा हुआ है तब से हम इसके लिए मांग करते आ रहे हैं। बिहार बंटवारा होने के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला उद्योग का आता है। वहां एक मात्र कृषि उद्योग ही बचा है। कृषि पर आधारित जो भी उद्योग लग सकते हैं, वे वहां पर हैं। हमारे यहां इस बार अप्रत्याशित अनाज पैदा हुआ है। वहां अनाज का उत्पादन इतना ज्यादा हुआ है कि पूरे बिहार को ही नहीं बल्कि बाहर के राज्यों को भी बैठकर खिलाया जा सकता है। किसानों के उत्पादन का जो मूल्य केन्द्र सरकार ने निर्धारित किया है, उस समर्थन मूल्य पर किसानों को कोई राशि उपलब्ध नहीं हो रही है। बड़े-बड़े जो भू-माफिया हैं या मिल-मालिक हैं, उन्हें उसका फायदा होता है। केन्द्र सरकार एफ.सी.आई. के माध्यम से धान की खरीददारी की बात करती है।

अभी देवेन्द्र प्रसाद जी ने कहा कि हम लोगों ने बहुत जगह जाकर तहकीकात की है। मैं कहना चाहती हूं कि कितनी मात्रा में वहां धान या चावल की बिक्री हुई है ? हमारे जो किसान भाई हैं, वे उससे अपना पेट भी नहीं भर सकते। उस स्थिति में उन्हें कोई पैसा उपलब्ध नहीं हो पाता है।

20.12 hrs. (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) हमारे यहां एक कदावन जलाशय परियोजना है। अगर उस परियोजना को बनाया जायेगा तो मैं समझती हूं कि लाखों हैक्टेयर जमीन पर सिंचाई की जा सकती है। लेकिन आज जो स्थिति पूरे देश के किसानों की है, वही हालत बिहार के किसानों की हो गई है। हमारे यहां एक लघु जल विद्युत परियोजना के लिए पांच करोड़ रुपये मंगावाट से बिजली पैदा की जा सकती है। इसके अलावा हमारे यहां नहरों की स्थिति बहुत अच्छी है जिससे विद्युत जल परियोजना का निर्माण कराया जा सकता है। हमें जो जानकारी प्राप्त हुई है, उसके हिसाब से केन्द्र सरकार पहाड़ी इलाकों में विद्युत परियोजनाओं के लिए पैसा दे रही है लेकिन जहां पर आसान तरीके से नहरों के माध्यम से विद्युत जल परियोजना तैयार की जा सकती है, वहां के लिए कोई राशि केन्द्र सरकार नहीं दे रही है। जबकि हमारे यहां की योजना इस तरह से तैयार की गई है जिससे ७२ मेगावाट विद्युत उत्पादन संभव हो सकेगा। लेकिन उसमें केन्द्र सरकार की सहायता की आवश्यकता पड़ेगी।

हमारे यहां अमझोर में पी.पी.सी.एल. है, जहां काफी फास्फेट जमीन के नीचे पड़ा हुआ है। मात्र ९० करोड़ रुपये की लागत से उसका पुनरुद्धार किया जा सकता है। वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर नये तरीके से बन चुके हैं लेकिन केन्द्र सरकार कोई पैसा नहीं दे रही है। कहा जाता है कि केन्द्र सरकार एक विशेष पैकेज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पुनरुद्धार के लिए दे रही है।

हमारे यहां डालमिया नगर फैक्ट्री है, लोग बिहार की और फैक्टि्रयों के बारे में जानते हों या नहीं लेकिन डालमिया फैक्ट्री के बारे में सब लोग जानते हैं। आज वह भी मृतप्राय: पड़ी हुई है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं लेकिन उसके पुनरुद्धार के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। पैकेज की जो स्थिति है, इस सदन के सभी सदस्यों ने कहा कि बिहार को विशेष पैकेज मिलना चाहिए। वहां गरीबी है, बेरोजगारी हो गई है, कोई उद्योग-धंधे नहीं लग रहे हैं। पहले बहुत सी चीनी मिलें थीं लेकिन वे भी रुग्ण हो गई हैं, उनका भी पुनरुद्धार होना चाहिए। बिहार बीमारू प्रदेश है और वैसी हालत में गरीबी है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप कनक्लूड कीजिए।

श्रीमती कान्ति सिंह: मैं बहुत कम बोलना चाहती थी क्योंकि माननीय रघुवंश जी ने पूरी बात कह दी है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आपकी सारी बातें आ गई हैं, इसलिए अब कनक्लूड कीजिए।

श्रीमती कान्ति सिंह: इस सदन के सभी दल के सदस्यों ने भी कहा कि वहां गरीबी है, आबादी के हिसाब से, गरीबी के आधार पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का कार्य किया जाए, साथ ही विशेष पैकेज देने का कार्य भी किया जाए ताकि वहां पुनरुद्धार हो और वहां के लोगों को गरीबी से छुटकारा मिल सके।

मैं ऋण के बारे में भी कहना चाहती हूं कि प्रधान मंत्री जी ने जैसे पंजाब का कर्जा माफ किया था जबकि वहां बहुत खुशहाली है, उसी तरह बिहार की स्थिति को देखते हुए वहां का ऋण माफ किया जाना चाहिए। मैं समझती हूं कि बिहार की दुर्दशा को देखते हुए, बिहार के ८ करोड़, ३० लाख, ५५ हजार लोगों के साथ यह सरकार न्याय करेगी, इस उम्मीद के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूं। ।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी (रायगंज) : आदरणीयसभापति महोदय, मैं बहुत संक्षेप में अपना वक्तव्य पेश करूंगा। वैसे कांग्रेस पार्टी की ओर से, प्रतिपक्ष की नेत्री सोनिया जी की ओर से, रघुवंश बाबू के प्रस्ताव के माध्यम से सदन में जिस विषय पर बहस हो रही है, जिसमें बाकी सदस्यों ने भी भाग लिया है, हम इसका पूरा समर्थन करते हैं और इसके साथ अपनी भावना भी जोड़ना चाहते हैं। बिहार हिन्दुस्तान के नक्शे में एक प्रान्त है लेकिन उसे प्रान्त नाम से कहना भी उसे छोटा करना होगा। बिहार एक माननिक हिन्दुस्तान है। आजादी की लड़ाई, पुरानी सभ्यता की लड़ाई से लेकर जो वर्णन रघुवंश बाबू ने किया, उनके साथ एक भारतीय होने के नाते मुझे गौरव होता है। बिहार हिन्दुस्तान के नक्शे में एक जगह है जिसने देश की आजादी की लड़ाई को दिशा दी, सभ्यता का पहला दीप जलाया।

जब मैं यूथ कांग्रेस में होता था और बिहार का दौरा करता था तो मुझे आश्चर्य होता था कि पूरे देश के इतने सारे इतिहास की खोज एक बिहार में है लेकिन हम लोगों ने इसका कितना अनादर किया। जब बिहार के लोग बंगाल में काम के लिए जाते हैं, अभी भी हैं, उनके साथ मेरा बहुत नजदीक का रिश्ता है क्योंकि बिहार और बंगाल नाम के लिए दो प्रान्त हैं लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक और आचार-व्यवहार सब एक परिवार जैसा है। उस परिवार की भावना में कभी कोई कमी नहीं रही। आज भी जब गांव से लोग आते हैं और कहते हैं कि सूखा पड़ गया है, बाढ़ आ गई है, तकलीफ हो रही है तो हम लोग उनके दुख को अपना दुख मान कर महसूस करते हैं लेकिन जब सुख देने का प्रयास करते हैं तो कमजोरी के लिए हमें अफसोस भी होता है।

मैं आपके द्वारा मंत्री जी के सामने तीन सुझाव रखना चाहता हूं। इसमें हम कोई राजनीति नहीं करना चाहते क्योंकि हम लोगों ने ज्यादा देर राज किया। हमारे राज में जरूर कुछ कमी रह गई होगी जिसके कारण बिहार में कुछ कष्ट है, हमने जरूर कुछ अच्छा काम किया होगा जिसकी वजह से बिहार प्रान्त ने कुछ अच्छा किया है। मैं सुझाव देना चाहता हूं कि प्रधान मंत्री जी, गृह मंत्री जी खास तौर से सदन के अर्थ मंत्री ने झारखंड प्रान्त बनने के समय जो आश्वासन दिया था, उस आश्वासन को लेकर मैं पोलीटिक्स नहीं करना चाहता, इतना ही दोहराना चाहता हूं कि बिहार की चीफ मनिस्टर, बिहार के प्रतिपक्ष के नेता, बिहार की सारी पोलीटिकल पार्टियों के लीडर्स, सबको आप बुलाएं, पैकेज के बहुत मायने होते हैं।

अभी सब न करके खास तौर से दसवीं योजना में झारखण्ड बनने के बाद बिहार की तरक्की के लिए आर्थिक द्ृष्टिकोण से किस-किस प्रियौरिटी सैक्टर में पैसा ज्यादा देना चाहिए, उसके ऊपर निश्चित निर्णय दसवीं योजना लागू होने से पहले होना चाहिए। जहां तक मैं समझता हूं, सबसे पहले बिहार की दो चीजों के ऊपर सरकार को ध्यान देना चाहिए। एक चीज है, बाढ़ के प्रकोप से बिहार को बचाना और इंडो नेपाल नदी योजना में चाहे विश्व बैंक का पैसा लाना हो, चाहे बाहर की टैक्नीक लानी हो, कुछ भी लायें, लेकिन बिहार को पहले इस प्रकोप से बचायें। दूसरे बिहार के हर गांव में वार फुटिंग प्रोग्राम बिजली पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री की तरफ से, कैबिनेट की तरफ से लागू हो जाये। उसके लिए अगर बिहार को बाकी प्रान्तों से कुछ ज्यादा पैसा भी देना पड़े तो मैं अपनी पार्टी की ओर से आपको आश्वासन दे सकता हूं कि अगर ऐसा कोई प्रस्ताव आयेगा तो सदन में हमारी पार्टी की तरफ से हम लोग उसका समर्थन करेंगे।

हमारा तीसरा सुझाव है कि झारखंड तो बन चुका है, यह रियलिटी है, अब उसके ऊपर दोषारोपण न करके बिहार में जो कुछ कमी रह गई है, चाहे इंडस्ट्री के बारे में हो, चाहे सड़के के बारे में हो, चाहे एजुकेशन के बारे में हो, उसके ऊपर सरकार तुरन्त निर्णय ले कि पांच साल के अन्दर, दसवीं पंचवर्षीय योजना के अन्दर क्या हम उसको अपने पैरों पर खड़ा कर सकते हैं या नहीं। मेरी बात के लिए मुझे दोष मत दीजिए, लेकिन अगर सरकार की ओर से कुछ काम होता है, उसमें सैण्ट्रल गवर्नमेंट सोचती है कि उसके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है तो सैण्ट्रल गवर्नमेंट खुद ऐसा कुछ काम कर सकती है, जिससे परियोजना के पैसे के द्वारा बिहार की कुछ तरक्की कर सकते हैं। लेकिन देश में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है कि सैण्ट्रल गवर्नमेंट अपनी मशीनरी से काम कराये, चाहे किसी भी प्रान्त में हो। आपको स्टेट की सहायता लेना जरूरी है, आवश्यक है।

सभापति महोदय, मैं आपके सामने आपसे दोबारा अनुरोध करूंगा कि इस बहस के खत्म होने के बाद इस बहस से बहस न हो जाये। मानसून सैशन शुरू होने से पहले हम सरकार से यह आग्रह करते हैं कि सरकार की तरफ से इस बहस के ऊपर न्याय करने के लिए सरकार अपनी योजना बिहार के बारे में बताये। मैं योजना पेश करने के समय प्रतिपक्ष पार्टी की ओर से आश्वासन देता हूं कि हमारी पार्टी की तरफ से सरकार को पूरा सहयोग होगा। अगर उसके लिए पांच पैसा बंगाल को कम मिलेगा तो हम लोग हल्ला नहीं करेंगे, क्योंकि हम चाहते हैं कि बिहार एक ऐसा प्रान्त है, प्रभुनाथ सिंह जी ने बिल्कुल सही कहा, सब लोग समझते हैं कि ये लोग कास्ट फाइट करते हैं, फलां काम करते हैं, बिहार एक थर्ड क्लास स्टेट है, ऐसी बात जो लोग बाहर करते हैं, वे बिहार को बेइज्जत करते हैं। ऐसी बात नहीं है। बिहार के अन्दर जो सामाजिक शोषण सदियों से हो रहा है, बिहार के अन्दर जो भेदभाव की भावना है, जो बिहार के लड़के बाहर जाते हैं, उनको जिस ढंग से सोशली ट्रीट करने की एक रस्म इस देश में बन गई है, उससे बिहार के दिल पर जो घाव लगा है, उस घाव पर मरहम लगाने के लिए पूरे सदन को सोचना है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं, मैंने खेलकूद की दुनिया में देखा, मैंने तकनीक की दुनिया में देखा, मैं जब एक महीने स्टडी करने के लिए अमेरिका गया था तो मैंने देखा, मुझे २१ कम्प्यूटर इंजीनियर और दो साइंटिस्ट मिले थे, उनमें से पांच लड़के बिहार के थे। सारे लड़के मुझसे दुख प्रकट कर रहे थे कि हमारे प्रान्त के बारे में लोग मजाक करते हैं, जबकि हम लोग उसी बिहार के एक गांव से आये हैं। वे नालन्दा के लड़के थे। उनमें से एक नवादा का था। मैं आपके द्वारा यह कहना चाहता हूं कि अगर सचमुच चिंगारी बिहार से आती है तो हिन्दुस्तान में ज्वालामुखी होगा। इसका नतीजा १९४२ का मूवमेंट है, इसकी मिसाल चम्पारण का मूवमेंट है। इसकी मिसाल मैंने खुद जयप्रकाश नारायण जी के आन्दोलन में देखी, जब मैं यूथ कांग्रेस का प्रेसीडेंट था तो मैंने बिहार का दौरा करके इन्दिरा जी को रिपोर्ट दी थी कि इन्दिरा जी, जयप्रकाश जी का हाथ छूने के लिए बिहार के नौजवान तड़प रहे हैं। मैंने खुद अपनी आंखों से देखकर आकर रिपोर्ट दी कि नौजवानों में नफरत की भावना वहां की सरकार के खिलाफ, बन्दोबस्तों के खिलाफ इतनी पैदा हो गई है, वे समझते हैं कि हमें जयप्रकाश जी दिशा दे सकते हैं, इसलिए मुझ लगता है कि परिवर्तन आ रहा है। भले ही मेरी बात संजय गांधी को पसन्द नहीं आई, लेकिन मैंने उस दिन यह रिपोर्ट पेश की थी कि यह सिगनल बिहार से आ रहा है। अगर बिहार को उस दिन जयप्रकाश जी दिशा नहीं दिखाते तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज उस कुर्सी पर अटल जी भी नहीं पहुंच सकते थे।

इसलिए बिहार के बारे में पार्टी द्ृष्टिकोण से हटकर सोचना चाहिए। झारखंड बनने केे बाद बिहार को जो चोट पहुंची है, वह भाषण से हम नहीं महसूस कर सकते। जब वहां के गांव के लोग हमारे प्रांत में आते हैं और कहते हैं तो मैं समझता हूं। इसलिए मैं आग्रह करूंगा कि आज की बहस के बाद आप भले ही उत्तर न दें, प्रधान मंत्री जी के द्वारा मानसून सैशन के पहले दिन इस बारे में अंतिम निर्णय आए। उसका हम पूरे तौर पर सहयोग करेंगे।

डॉ. संजय पासवान (नवादा):सभापति जी, सबसे पहले मैं रघुवंश जी को बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने सदन में बिहार पैकेज के बारे में विशेष चर्चा की शुरूआत की। हम लोग कोई राहत या भीख नहीं मांग रहे हैं, बल्कि यह बिहार का वाजिब हक है। सरकार की भी नेकनीयती लगती है, इसकी स्पष्ट मिसाल है कि जो योजना आयोग की रिपोर्ट आई है, उसमें इस बात का उल्लेख है कि बिहार और उत्तर प्रदेश आज भी सर्वाधिक पिछड़े हुए राज्य हैं। यह यथार्थ भी है। योजना आयोग की हयूमन डवलपमेंट रिपोर्ट जो आई है उसमें बिहार, उत्तर प्रदेश और नार्थ बंगाल को सबसे पिछड़ा हुआ इलाका माना गया है। ११वें वित्त आयोग ने भी इस चीज को मार्क किया है कि बिहार और बंगाल बहुत पिछड़े हुए हैं। मैं नहीं समझता कि हमें ऐसा लगे कि इस चीज को देखते हुए भी केन्द्र का मूड कुछ न देने का हो। इस देश के जो अन्य विकसित प्रदेश हैं। उनके मुख्य मंत्री, वहां की सरकार किस ढंग से यहां लॉबी करके, एक समूह बनाकर, अपने सांसदों को जानकारी से लैस करके केन्द्र के मंत्रालयों में, निगमों में या निकायों में लॉबिंग कर रही है, इस पर भी ध्यान देना चाहिए। मैं जानना चाहूंगा कि बिहार सरकार ने इस तरह से काम करने में क्या रुचि दिखाई है, यह भी हमें पता लगना चाहिए। इसमें मैं कोई राजनीति नहीं लाना चाहता। लेकिन मैं जानना चाहूंगा कि कितना प्रयास वहां की सरकार द्वारा किया जा रहा है। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो होना चाहिए। अगर केन्द्र सरकार में भी नेकनीयती का अभाव है तो उसको दूर करने का प्रयास करना चाहिए। बिहार लैंड रिसोर्सेज, वाटर रिसोर्सेज और हयूमन रिसोर्सेज में बहुत उन्त है। हमारे यहां उत्तरी बिहार में नदिया हैं, जिनमें साल भर पानी रहता है। इसके विपरीत दक्षिण बिहार में नदियों में तीन-चार महीने ही पानी रहता है। इसलिए जहां जल का अभाव है और जहां जल काफी है, उससे भी कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं। जहां जल ज्यादा है वहां बाढ़ की समस्या हर साल आती है और जहां जल का अभाव है, वहां सूखे की समस्या से वहां के लोगों को जूझना पड़ता है। इसलिए हम कैसे जल प्रबंधन करे, इस पर विचार करना चाहिए। इस सम्बन्ध में अगर ढंग से नीति बनाने की आवश्यकता है।

अब सारा उत्तर बिहार बाढ़ की चपेट में आने वाला है। वहां के लोग इससे प्रभावित होंगे, उसका क्या निदान है, इस पर ध्यान दिया जाए। यहां सभी सदस्यों ने राय व्यक्त की है कि उसका उपाय होना चाहिए। चाहे नेपाल से बातचीत करके हो, चाहे योजना आयोग के द्वारा हो, उसका निदान होना चाहिए।

दूसरी बात यह है कि जो मध्य बिहार है, वहां १८ सिंचाई परियोजनाएं चालू थीं, लेकिन अब वे बंद हैं। उनको कैसे चालू किया जाए, यह देखने की आवश्यकता है। हम चाहते हैं कि उत्तर बिहार में जल का प्रभाव ज्यादा है, उसको कैसे कम किया जाए और जहां जल का अभाव है, वहां कैसे जल को लाया जाए, जिससे खेतों की सिंचाई हो सके, इस चीज पर ध्यान देना चाहिए।

आज बिहार का सौभाग्य है कि सदन बिहार के बारे में चर्चा कर रहा है। आज ही आप सबने अखबारों में पढ़ा होगा कि आई.ए.एस. की परीक्षा में जिस लड़के ने टॉप किया है, वह बिहार का ही है। पिछले दस वर्षों में बिहार से चार विद्यार्थियों ने टॉप किया है। इसके बावजूद कुछ कमियां हैं, त्रुटियां हैं, वहां माहौल नहीं है, लेकिन कुछ अच्छा काम भी हो रहा है। इसलिए हम योजना आयोग को और ११वें वित्त आयोग को भी धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने गरीब राज्यों के हित में जो निर्णय किए हैं, वे आगे भी जारी रहेंगे और किसी विकसित राज्य के दबाव में न आकर जो डयू गरीब राज्यों का है, वह मिलता रहेगा।

इसके साथ-साथ हम कहना चाहते हैं कि जो न्यूनतम मिलना चाहिए, वह अब मिल रहा है और उसे अगर पैकेज मान लें तो वह अच्छी बात नहीं है। यह पैकेज विशेष तौर से रुटीन ढंग से मिलता है। उसके अलावा और क्या व्यवस्था हो सकती है, इसके बारे में सोचने की आवश्यकता है। मैं सरकार को बधाई देना चाहता हूं क्योंकि सरकार ने अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए, प्लानिंग कमीशन ने एक विशेष सैल खोला है। यह सैल ठीक ढंग से काम करे तो बिहार का कल्याण निश्चित रूप से होगा।

अब गंगा नदी जो यू.पी. में है, उस पर १४ पुल बने हुए हैं और बिहार में तीन बने हैं जबकि बिहार में नदी की लम्बाई यू.पी. से अधिक है। इसलिए गंगा नदीं के पुलों की संख्या बढ़नी चाहिए। मुंगेर का पुल जो काफी सालों से लम्बित है, उसका काम शुरू होना चाहिए। माननीय मंत्री जी ने आश्वासन दिया है, हम चाहते हैं कि उस पर काम शुरु होना चाहिए। दुनिया भर में ऑरगेनिक फॉर्मिंग के बारे में चर्चा हो रही है। ऑरगेनिक फॉर्मिंग के लिए बिहार की जमीन सबसे अधिक उपयुक्त मानी गयी है। यदि विशेष प्रयास किये जायें तो दुनिया भर में जो ऑरगेनिक फॉर्मिंग की बात हो रही है, बिना खाद के बिना पैस्टीसाइड के, उसके लिए भी बिहार की जमीन सबसे अधिक उपयुक्त मानी गई है। साथ-साथ उत्तर बिहार में एचएफसी है और दक्षिण बिहार में पीपीसीएल है, ये दोनों बीमार पड़ी हुई हैं। इस पर भी चर्चा हो चुकी है और मंत्री जी ने आश्वासन दिया है लेकिन हम विशेष रूप से आग्रह करेंगे कि एचएफसी जिसका प्लांट बरौनी में है और पीपीसीएल जो रोहतास जिले में है, इन दोनों का रिवाइवल और विकास किया जाये। सरकार को इस पर विशेष रूप से विचार करने की आवश्यकता है। साथ-साथ जो राशि जाती हैं, उसका कैसे अनुश्रवण हो, उसके लिए भी हम चाहते हैं कि ज्वाइंट कमेटी बने जिसमें सभी दलों के सांसद शामिल हों तब जाकर राज्य का कल्याण और विकास करने में हम सफल हो पाएंगे। हम चाहते हैं कि राज्य का विजन भी क्लिअर होना चाहिए और सरकार की इंटेंशन भी साफ होनी चाहिए तथा विकास करने में सरकार को आगे आना चाहिए। बिहार को जो पैकेज दिया जा रहा है, वह जायज है। १९९५ में भारत सरकार ने सबसे पिछड़े जिले १०० जिले चिन्हित किये थे। संयोग से उनमें ३९ जिले बिहार के थे। प्लानिंग कमीशन में पता नहीं किस कारण से यह पेंडिंग पड़ी हुई है। जो सौ सबसे अधिक पिछड़े जिलों की बात की गई है, उनमें ३९ जिले बिहार के हैं, हम चाहते हैं कि उनको शामिल करके बिहार का विकास किया जाए।

श्री नवल किशोर राय (सीतामढ़ी):सभापति महोदय, आज बिहार के लिए सौभाग्य की बात है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिला औऱ आर्थिक पैकेज मिला। इस बात पर माननीय श्री रघुवंश बाबू ने बहस प्रारम्भ की और इस पर चर्चा हो रही है और चारों तरफ के सांसद एकमत हैं कि कम से कम इस बात पर बिहार को विशेष पैकेज मिले। मै यह कहना चाहता हूं कि पचास वर्ष में हमने आज़ादी की स्वर्ण जयन्ती मना ली है। संसद की शुरूआत की भी स्वर्ण जयन्ती मना ली है और इस समय जो चर्चा हो रही है, कतिपय माननीय सांसदों ने एक तरह से अपने भाषण में राज्य के कार्यों पर या केन्द्र सरकार के द्वारा की गई बिहार की उपेक्षा पर एक-दूसरे पर आरोप थोपने का प्रयत्न किया है। मैं कहना चाहूंगा कि निश्चित तौर पर बिहार की उपेक्षा हुई है।

लेकिन यह समय राजनीति करने का नहीं है। जहां तक मेरा मानना है, इस सदन के सभी दलों के सदस्य पिछले ५० सालों में राज्य और केन्द्र में कभी-न-कभी सत्ता में रहे हैं, इसलिए सभी के द्वारा उपेक्षा हुई है। ४० सालों से वहां कांग्रेस की सरकार रही है, श्री प्रियरंजन दास मुंशी जी अभी अपने विचार सदन में रख कर गए हैं और अन्य दलों के सदस्य जिन्होंने चर्चा में भाग लिया, वे कभी-न-कभी सत्ता में रहे हैं और सभी के द्वारा उपेक्षा की गई है और उसी उपेक्षा के कारण बिहार की यह हालत है।

महोदय, बिहार के लिए विशेष पैकेज की चर्चा है और कई तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। राज्य के बंटवारे के समय प्रस्ताव आया था कि १८० हजार करोड़ रुपए बिहार को दिए जायेंगे। इस सदन में भी चर्चा हुई और उस सदन में भी गृह मंत्री जी ने कहा कि हम इसको देखेंगे। इसके लिए योजना आयोग में विशेष सैल बनाया गया और योजना आयोग द्वारा मानव संसाधन रिपोर्ट तैयार कराई गई और उस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर दर्शाया गया कि बिहार को विशेष दर्जा देने की जरूरत है, क्योंकि वहां पर पिछड़ापन है और बुनियादी ढांचा भी नहीं है। सड़क नहीं है, स्कूल नहीं है तथा शिक्षा का उचित प्रबन्ध नहीं है। अच्छे अस्पतालों की व्यवस्था नहीं है और विद्युत की भी कमी है। जब युनाइटेड फ्रन्ट की सरकार थी, उस समय आप भी मंत्री थे, तब एक सर्वे कराया गया था। उस सर्वे के अनुसार १०० जिलों को रेखांकित किया गया था, बिहार और झारखण्ड को मिलाकर, कि ३९ जिले ऐसे हैं, जो सर्वाधिक पिछड़े हैं। इनमें से ३६-३७ जिले ऐसे हैं, जो बिहार के हैं, लेकिन उस रिपोर्ट पर कोई निर्णय केन्द्रीय सरकार द्वारा नहीं लिया जा रहा है। ग्यारहवें वित्त आयोग की मंशा है और सरकार की मंशा है तथा सभी सदस्य एक राय के हैं कि बिहार को विशेष दर्जा देने की आवश्यकता है।

इसके अलावा २३ हजार करोड़ रुपए ऋण को माफ करने की बात सभी माननीय सदस्यों ने कही है। बिहार को पिछले ५० सालों में अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने दिया गया है, इसलिए अब उसको खड़ा करने की जरूरत है और मैं इसका समर्थन करता हूं। हम आशा करते हैं कि भारत सरकार इस विषय पर जल्दी निर्णय लेगी और आज सदन में मंत्री जी स्पष्ट घोषणा करेंगी, जैसा कि प्रियरंजन दासमुंशी जी ने कहा है कि मानसून सत्र से पहले, १८० हजार करोड़ रुपए का जो प्रस्ताव है, उसे पूरा करने की दिशा में कदम उठाया जाएगा। मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि जो संसद सदस्यों को कोर-ग्रुप बना था, नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में, सर्वदलीय राय से लम्बित योजनाओं के बारे में, चाहे सीता-सर्किट का सवाल हो, जिसमें रामायण के शब्द जुड़े हैं, गांधी सर्किट के सवाल पर, बुद्धिष्ट सर्किट के सवाल पर, इन सर्किटों के विकास के अलावा रेल परियोजनायें जो लम्बित पड़ी है, नेशनल हाईवे की जो योजनायें लम्बित पड़ी है, गंगा नदीं पर पुल बनाने का सवाल हो या अन्य जगहों पर बड़े पुल बनाने का सवाल हो, इन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।

नेपाल से आयातित पानी की वजह से हर साल राज्य में बाढ़ आ जाती है। मैं आपके माध्मय से सरकार से जानना चाहता हूं, जब मंत्री जी उत्तर दें, तो बतायें कि बागमती, अदवाड़ा, कमला बलान, बेतिया, कोसी नदी पर डैम बनाने के सवाल पर नेपाल से आश्वासन पाते हैं और सरकार द्वारा कहा गया कि वार्ता चल रही है। बाद में पता लगा कि सचिव स्तर की समति बनाई गई है और उसमे बिहार सरकार के जल संसाधन सचिव भी सदस्य हैं। हम मंत्री महोदय से जानना चाहते हैं कि इस दिशा में क्या प्रगति हुई है। आप पैकेज की राशि की घोषणा न करें, लेकिन आप नेपाल से हर साल की बाढ़ से निदान की घोषणा करें और समयबद्ध कार्यक्रम बतायें। यदि आप नेपाल की बाढ़ से निदान नहीं कर सकते हैं, तो हर साल जो इस बाढ़ से क्षति होती है, उस क्षति की भरपाई की घोषणा करें । इस बाढ़ से जितनी क्षति होगी, जितनी सड़कों और रेल लाइनों का नुकसान होगा, उतनी राशि आप हर साल राज्य सरकार को देंगे। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि नेपाल से आयातित बाढ़ के सवाल पर एकमुश्त फैसला लेने की जरूरत है।

इसके ठीक विपरीत यहां एक मौजू विषय है। कई वक्ताओं ने राज्य सरकारों के बारे में चर्चा की है, इसे छुए बिना भी मैं नहीं रह सकता। निश्चित रूप से वर्तमान सरकार ने कई नई योजनाएं देने का काम किया है। जैसे एनएच के क्षेत्र में पिछले दिनों एक हजार से अधिक किलोमीटर भारत सरकार ने एनएच बढ़ाने का काम किया है। रेल लाईन भी नई स्वीकृत की गई है, पहले हिस्सा नहीं मिलता था, लेकिन उसे अंजाम देने की जरूरत है।…( व्यवधान)

महोदय, सभी माननीय सदस्य बहुत देर तक बोले हैं। हमारा भी हक है, हम भी मेहनत करके नोटिस देते हैं। इस प्रकार से सदन में नहीं चलना चाहिए कि कोई माननीय सदस्य सर्वाधिक समय ले, हम भी मेहनत करके नोटिस देते हैं और जब हमारा नाम आता है तो हमें इस प्रकार से बार-बार टोका जाता है। यह उचित नहीं है। इसे भी मैं यहां रेखांकित करना चाहता हूं। मुझे भी अपनी बात कहने का मौका दिया जाए। यहां जिस प्रकार से राज्यों के बारे में चर्चा चल रही है। इस बार ७५० करोड़ रुपए लेप्स हो गए हैं। ग्रामीण विकास में पैसे खर्च नहीं हुए। एनएच में भारत सरकार की पिछले वित्तीय वर्ष के योजना मद में और गैर योजना मद में १०५ करोड़ रुपए की राशि थी, उसमें से मात्र ५० करोड़ रुपए खर्च हुए और ५५ करोड़ रुपए खर्च नहीं हो पाए। हमने जब खंडूरी जी से चर्चा की तो उन्होंने मुझे एक परिपत्र दिखाया कि भारत सरकार में यह नियम है कि इस वर्ष जितनी राशि खर्च होगी, अगले वर्ष उसकी सवा गुना ही दी जाएगी। ५० करोड़ रुपए पिछले साल खर्च हुए और ५५ करोड़ रह गए, इसलिए ५० करोड़ के सवा गुना ही दिए जाएंगे, यानी साढ़े छ:-सात करोड़ या दस करोड़ और दिए जाएंगे। पिछले साल का जो ५०-५५ करोड़ बाकी हैं, वे भी इस साल की राशि में जोड़ दिए जाएंगे। सड़कें और एनएच बना दिए गए, लेकिन वहां काम नहीं हो रहा है।

महोदय, प्रभुनाथ सिंह जी ने कहा कि हाईकोर्ट ने डिसीज़न दिया था कि भारत सरकार सीधे-सीधे एनएच का काम कराए, लेकिन उन्होंने आधी बात कही। उस समय हाईकोर्ट के निर्देश को केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को प्रचालित किया था लेकिन १८ राज्यों ने विरोध किया कि यह राज्यों का विषय है, इसलिए वहां काम नहीं हो पा रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना की भी चर्चा हुई है। दो-ढाई हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष ग्रामीण विकास में या अन्य जगहों में पैसे खर्च नहीं हो पाते हैं।…( व्यवधान)

महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार से यह भी कहना चाहता हूं कि आप पैकेज दें, विशेष दर्जा दें, ऋण की माफी कर दें, सर्किट बना दें, बाढ़ का निदान करा दें, लेकिन यह भी सुनिश्चित करें कि काम समय पर हो और सही स्थान पर हो। धान, गेहूं और चावल के लिए सही प्रबंध करें ताकि यह बिचौलिए के पास न चला जाए। इसके लिए आप एक सैल बनाएं, जिसकी भारत सरकार के स्तर पर मोनिटरिंग हो। केन्द्र सरकार और राज्य सरकार मिल कर इस काम को करे। उसमें माननीय विधायक और सांसद भी शामिल हों, तभी इसकी फायदा होगा। मुझे आशा है कि जो पैकेज दिया जाएगा और विकास के लिए जो योजना ली जाएगी, उसकी मोनिटरिंग की भी सही व्यवस्था हो। रघुवंश बाबू को मैं धन्यवाद दूंगा, जिन्होंने चर्चा प्रारम्भ की और उनसे अनुरोध करूंगा कि जिस प्रकार बिहार सरकार के कार्यक्रम के बारे में कभी-कभी बोलते हैं, उसी प्रकार से पैसा भी खर्च हो जाए। केरल, कर्नाटक और आंध्रा प्रदेश की तरह सुनिश्चित रोजगार जैसी योजनाओं में भी चार किश्त हम ले पाए, दो किश्त में बिहार केवल रह गया और वह भी खर्च न हो - इसे भी दुरुस्त करने के लिए उन्हें आगे आना चाहिए। हम सभी बिहार के सांसद उन्हें सहयोग करेंगे।

महोदय, मैं एक बार फिर भारत सरकार से अनुरोध करता हूं कि बिहार को विशेष पैकेज दिया जाए और पैकेज की घोषणा हो। बिहार राज्य को आर्थिक पैकेज मिले और विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए। वहां परिस्थिति काफी खराब है। उनका २३,००० करोड़ रुपए का ऋण माफ किया जाए और उसकी मोनिटरिंग के लिए भारत सरकार सीधे-सीधे सांसदों और विधायकों को साथ लेकर, एक सैल बना कर मोनिटरिंग करे ताकि सब काम समय पर ठीक से हो सके। ऐसा न हो जैसे हमारे यहां बागमती योजना बनी।…( व्यवधान)३२ करोड़ रुपए की योजना थी। उसमें ५० साल में २०० करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन योजना पूरी नहीं हुई, ऐसा भी नहीं होना चाहिए। समय-सीमा में मोनिटरिंग सेल का गठन करके भारत सरकार सांसदों को विश्वास में लेकर उन योजनाओं को पूरा करने का काम करें।

श्री ब्रहमानन्द मंडल (मुंगेर):अध्यक्ष महोदय, रघुवंश बाबू और माननीय रघुनाथ झा जी की तरफ से बिहार को वित्तीय पैकेज देने के संबंध में यह चर्चा हो रही है। माननीय रघुवंश बाबू ने इस चर्चा को शुरू किया है। मैं अपनी ओर से और अपनी पार्टी की ओर से इसका समर्थन करता हूं। जब कुछ माननीय सांसदों ने व्यवधान डाला तो माननीय रघुवंश बाबू ने अपने भाषण में एक बात कही कि बिहार और हम दोनों एक ही रास्ते पर चल रहे हैं, आगे भी चलते रहेंगे और विचलित नहीं होने वाले हैं। मेरा कहना यह है कि बिहार जिस रास्ते पर चल रहा है उसके कारण हम द्वितीय स्थान से सबसे नीचे चले गये हैं और कितना नीचे आयेंगे। इसलिए उस रास्ते को बदलने की जरुरत है क्योंकि उस रास्ते पर चलने से हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। अगर माननीय रघुवंश बाबू ने यह बात सिर्फ अपने भाषण के सिलसिले में कही है कि हमारा भाषण उसी तरह से चलता रहेगा तो मुझे उस बारे में कुछ नहीं कहना है। …( व्यवधान)हमारे माननीय सांसदों ने जिन बातों की चर्चा यहां की हैं मैं उन बातों को यहां नहीं दोहराऊंगा। बिहार के सांसदों की तरफ से माननीय नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में एक पैकेज तैयार किया गया और उसमें सभी लोगों से सुझाव मांगे गये थे। वह पैकेज माननीय प्रधान मंत्री जी को दिया गया था, इस बात को सभी जानते हैं। इस तरह से ये दो पैकेज बिहार के बारे में हैं। उन पर चर्चा भी यहां हुई है। बिहार सरकार का पैकेज एक लाख अस्सी हजार रुपये का है और माननीय नीतीश कुमार जी का जो पैकेज है उसमें योजनाओं के नाम हैं। जिन योजनाओं की चर्चा दोनों पैकेज में हैं उनमें से कुछ ऐसी योजनाएं हैं जो पहले से स्वीकृत हैं और लम्बित योजनाएं हैं और उनके लिए पैसे की मांग है। इसलिए उनको पैकेज नहीं कहा जा सकता।

सभापति जी, मेरा कहना यह है कि बिहार को पैकेज नयी योजनाओं का मिलना चाहिए और उसमें ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे बिहार समृद्ध हो जाए। बिहार के बारे में जो पहली बात होती है वह बिहार के दर्द की बात बहुत होती है कि बिहार की हालत अलग होने से पहले क्या थी और अब क्या है - यह हम देख ही रहे हैं। पहला बिंदु जो मैं कहना चाहता हूं वह यह है कि क्या बचे हुए बिहार में खनिज सम्पदा है या नहीं है? मैं कहता हूं कि खनिज सम्पदा वहां है और उस खनिज सम्पदा का पता लगाया जाना चाहिए या नहीं लगाया जाना चाहिए - यह भी पैकेज में होना चाहिए। भागलपुर, बांका, जमूई, मुंगेर और लखीसराय की पहाड़ियों में अपार खनिज सम्पदा छिपी हुई है और उसकी पुष्टि भी हुई है।

       

आज से पांच महीने पहले मैं राम विलास जी से मिला था जब वह खान मंत्री थे लेकिन अब वह इस्तीफा देकर चले गए हैं। मैंने रवि शंकर प्रसाद जी को भी लिखा था कि वह इसका सर्वे करा लें। झारखंड के अलग होने का हम बहुत रोना रोते हैं और कहते हैं कि बिहार में कुछ नहीं है। इसका सर्वे ऑफ इंडिया ने सर्वे कराया, ऐसी अखबारों में बातें आ रही हैं। सिर्फ मूंगेर में खड़कपुर में सौ मीटर नीचे क्वार्टड पाया गया जो सीसा बनाने के काम आता है। इसकी भारत में ही नहीं दुनिया के बाजारों में मांग और जरूरत है। इसके होने से बिहार समृद्ध हो सकता है और देश इंटरनेशनल मार्किट में इस सामान को ले जा सकता है। इसे करना है या नहीं करना है, पैकेज में यह बात होनी चाहिए। जमुई जिले में करमटिया में स्वर्ण भंडार है। इस बारे में बिहार सरकार ने बहुत पहले एक प्रपोजल दिया था। जब इसकी जांच की गई तो उसकी ऊपरी सतह पर १.७ खनिज में सोना पाया गया था। दुनिया में जितनी भी सोने की खानें हैं, वहां पांच सौ से लेकर एक हजार मीटर नीचे के खनिज को लिया जाता है और पहले उसे टैस्ट किया जाता है कि इसमें कितना खनिज है, तब समझा जाता है कि वह लाभकारी है या नहीं? बिहार सरकार के पास इतने साधन नहीं हैं जबकि केन्द्र सरकार के पास साधन हैं। सर्वे ऑफ इंडिया ने पाया कि वहां स्वर्ण भंडार हैं। कहा जाता है कि किसी खनिज में २.५ सोना पाया जाता है तो वह लाभकारी होता है। करमटिया में ५ से ७ परसैंट से अधिक सोना पाया जाएगा, पैकेज में यह बात होनी चाहिए। इसका न सिर्फ सर्वे और उत्खनन हो बल्कि वहां धन लगा कर काम होना चाहिए। हिन्दुस्तान में जहां-जहां स्वर्ण भंडार हैं वे बंद हो रहे हैं। मैं यहां तक कह सकता हूं कि दक्षिण अफ्रीका से भी ज्यादा लाभकारी खान अगर कहीं हो सकती है तो करमटिया में हो सकती है। इस तरह से वहां के ४-५ जिलों में खनिज सम्पदा की अपार संभावनाएं हैं। भारत सरकार को यह अपने हाथ में लेना चाहिए। इससे न केवल बिहार समृद्ध होगा बल्कि देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

एक बात की चर्चा रघुनाथ झा जी ने की, मैं उसमें थोड़ी बात जोड़ना चाहता हूं जो उत्तर बिहार के संबंध में है। भारत सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नेपाल सरकार के साथ बहुउद्देश्यीय योजना बनाने की बात उठानी चाहिए और इस संबंध में राजनीति से ऊपर उठ कर नेपाल सरकार से बात करनी चाहिए। इससे हम बिजली प्राप्त कर सकते हैं। कहा गया है कि उत्तरी बिहार में प्रतिवर्ष पानी बह जाता है और वह पूरे बिहार के इनफ्रास्ट्रक्चर को बरबाद कर देता है। इस पानी से प्रति वर्ष ४० हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। इस पर लगभग एक लाख ६० हजार करोड़ रुपया लग सकता है। यह काम बिहार सरकार नहीं कर सकती है लेकिन भारत सरकार की तरफ की एक नीति बननी चाहिए जिससे नेपाल सरकार के साथ इस संबंध में बात की जा सके। उनसे बांध बनाने के बारे में बात की जा सकती है। इससे ग्रामीण स्तर का इनफ्रास्ट्रक्चर बच सकता है, सिंचाई का काम हो सकता है और बिजली का काम भी हो सकता है। यह एक बहुउद्देश्यीय योजना बन सकती है।

जब हम पंजाब और हरियाणा की बात करते हैं तो वस्तु स्थिति भूल जाते हैं। इनका भी बंटवारा हुआ था। हम केवल यह बात करते हैं कि हरियाणा और पंजाब में उपजाऊ जमीन है लेकिन पंजाब में पहले इतनी उपजाऊ जमीन नहीं थी। बंटवारे के नाम पर हम रोना रोते हैं। मैं पिछले दिनों भटिंडा गया था। भटिंडा बालू पर बसा है लेकिन आज वह भी सम्पन्न है। भारत सरकार को इस पर थोड़ा ध्यान देना चाहिए। हरित क्रांति की वजह से पंजाब और हरियाणा में खुशहाली आई। वहां बिहार से भी बहुत अच्छी जमीन है और खुशहाली है, जबकि वहां मिनरल्स नहीं थे। हमारे यहां मिनरल्स सब से ज्यादा हैं और जमीन भी ज्यादा है, फिर क्यों ऐसा हुआ? क्या हमारे यहां की कोई योजना उस में नहीं जा सकती? फिर उस पर पक्ष और विपक्ष की बात हो जायेगी। सब कुछ होना चाहिये, ऐसा नहीं है। मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं कि गंगा नहर योजना फेज़-२ में केन्द्र सरकार अब तक ४८ करोड़ रुपया खर्च कर चुकी है लेकिन उसमें से एक बूंद भी पानी हमें नहीं मिला है। इसके लिये कौन दोषी है,- हम या यह केन्द्र सरकार? मैं कोई तारीफ नहीं कर रहा हूं लेकिन क्या यह सच नहीं कि बिहार सरकार को पैकेज मिला है?…( व्यवधान)नालंदा और बाढ़ में विद्युत परियोजना के लिये जितना पैसा दिया गया, उसमें कितना खर्च किया गया…( व्यवधान)अभी १४ तारीख को प्रधानमंत्री जी ने संबंधित मंत्रियों को बुलाया था। उस मीटिंग में हम लोग भी गये थे। उन्होंने कहा कि मुंगेर की परियोजनाओं के लिये भारत सरकार ने ९२१ करोड़ रुपया दिया है। यदि भारत सरकार इस तरह की सहायता कर रही है तो सब को मानना पड़ेगा कि भारत सरकार ने यह काम किया है। सरकार को गाली देने से कुछ नहीं होगा। यदि आज बिहार फटेहाल स्थिति में है, ज्यादा से ज्यादा लोग गरीब होते जा रहे हैं, अगर बिहार बर्बादी के कगार पर है, इसके लिये केन्द्र सरकार दोषी नहीं, हम सब दोषी हैं, क्योंकि हमने किस तरह की कार्य संस्कृति बिहार में विकसित की है। उसे बदलने के लिये हम कुछ करते हैं या नहीं। यदि बिहार को पैकेज मिल भी गया तो सारे का सारा पैकेज उसमें नष्ट हो जायेगा।

सभापति महोदय, गृह मंत्री जी यहां नहीं बैठे हैं लेकिन गृह मंत्रालय को सोचना चाहिये कि जब बिहार सरकार की कार्य संस्कृति नष्ट हो चुकी है, उसे सही रास्ते पर कैसे लाया जाये, किस तरह से वहां की योजनाओं को समय पर पूरा किया जाये जिससे बिहार की जनता को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके। इसलिये मैं आपसे कहना चाहता हूं कि बिहार की सारी समस्याओं पर विचार करने के बाद, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बिहार सरकार द्वारा जो तीन मांगे रखी गई हैं, वे न्यायोचित हैं। केन्द्र सरकार का जितना ऋण बिहार सरकार पर बाकी है, उसे माफ किया जाये। यह मांग बेवजह नहीं की जा रही कि बिहार सरकार नहीं दे सकती। उसके पास देने के लिये कुछ भी नहीं है। बिहार के लिये विशेष पैकेज मिलना चाहिये। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिये क्योंकि भारत सरकार के पास ही जोर है कि किस तरह से बिहार को हिन्दुस्तान के नक्शे पर लाया जा सकता है जो वषों से गायब रहा है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।

   

श्री राम प्रसाद सिंह (आरा):सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद ज्ञापित करता हूं कि आपने मुझे डा. रघुवंश प्रसाद सिंह द्वारा नियम १९३ के अधीन बिहार को स्पेशल पैकेज देने, ऋण माफी और बहुत सारी विद्युत तथा सिंचाई परियोजनाओं के लिये आर्थिक पैकेज देने की मांग संबंधित विषय पर बोलने का समय दिया।

सभापति महोदय, अभी हमारे कई विद्वान साथियों ने बताया कि बिहार गरीबी में सब राज्यों से नीचे है, विकास में नीचे है और शिक्षा में भी नीचे है। खनिज सम्पदा झारखंड में चली गई। जितने उद्योग धंधे हैं, वे सब मृतप्राय हो गये हैं। यह बहस का विषय नही, यह केन्द्र सरकार से मांगने का विषय है।

21.00 hrs. माननीय ब्रहमानंद जी ने खनिज सम्पदा और सर्वे की बात कही, वह सही है। लेकिन सर्वे कौन करायेगा। सर्वे केन्द्र सरकार कराती है। इतना ही नहीं, हमारे यहां एक रोहतास जिला है, जिसमें फास्फेट लगभग सौ बलियन मूल्य के आसपास है, जो वर्षों तक चलेगा और केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में उससे फास्फेट प्राप्त होता है। उससे बहुत अच्छी खाद बनती है। बिहार में केन्द्र चालित एक ही परियोजना थी…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप रिपीट मत करिये, किसी नये बिन्दु पर बोलिये।

श्री राम प्रसाद सिंह : मैं रिपीट नहीं करूंगा। उस परियोजना को कौन चालू करेगा। हमने फाइनेन्स मनिस्टर से बात की। हमने प्रधान मंत्री जी से मिलकर अपना रोना रोया। आपको शंका रहती है कि बिहार सरकार पैसा खर्च नहीं करती है। मैं इस बारे में कहना चाहता हूं कि आप आंकड़े मंगाकर देख लीजिए। जब भी हमें पैसा दिया जाता है वह फरवरी और मार्च के अंत में दिया जाता है, जब वषार्ंत होता है और कोई योजना बनाकर हम उस पैसे को खर्च नहीं कर सकते। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जब भी केन्द्र सरकार का पैसा गया है, वह वर्ष के अंत में ही गया है। आप बिना कारण के सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं। पहली पंच वर्षीय योजना में, चाहे कांग्रेस का शासन हो, १९६७ में बी.जे.पी. के लोग भी सरकार में सम्मिलित थे, क्या आप सब लोग दोषी नहीं हैं। आज दल बदलकर हम चाहे कांग्रेस से भागकर चले जाएं, लेकिन सबके माथे पर उसका दोष है। दस वर्षों से वहां लालू जी की सरकार बनी है। हमने बिहार में विकास दर को बढ़ाया था, हमने लोगों में अवेयरनैस जगाई थी, जब हम लोग आर्थिक मोर्चे पर लड़ने के लिए तैयार हुए तो हमें तरह-तरह के केसिज में फंसा दिया गया, हमें तबाह किया गया। हम कहना चाहते हैं कि बिहार सरकार को शंका की द्ृष्टि से न देखा जाए। हमें समय पर पैसा दिया जाए। यदि हम खर्च न करें तो हम पर पाबंदी लगा दी जाए।

रघुवंश बाबू ने यहां जो मांगे की हैं, उनके साथ मैं एक बात और जोड़ना चाहता हूं कि बिहार में सिंचाई की व्यवस्था ठीक की जाए। कितने मेगावाट बिजली के लिए आपने पैसा खर्च किया था, लेकिन केवल दो यूनिटें ही चालू की गईं। पतरातू जैसी बिजली परियोजना आज हमारे पास नहीं है। हमारे पास अब मात्र १६०० मेगावाट उत्पादन का काम होता है, जो भारत सरकार का काम है। हमें पूरा पैसा कहां दिया गया। हमारी शुगर मिलें बंद हैं…( व्यवधान)

सभापति महोदय : श्री मंजय लाल। राम प्रसाद जी, आप अपना आसन ग्रहण कीजिए, मैंने मंजय लाल जी को बुलाया है।

श्री राम प्रसाद सिंह : मैं समाप्त कर रहा हूं। मैं कहना चाहता हूं कि बिहार सरकार को शंका की द्ृष्टि से न देखा जाए और हमें समय पर पैकेज दिया जाए। ६०८ करोड़ रुपया पंचायतों का बकाया है, जो दिया जाए तथा बिहार में सिंचाई और हॉर्टीकल्चर को बढ़ावा दिया जाए।…( व्यवधान)आप बीच में क्यों इंटरवीन कर रहे हैं। हम अपनी बात जरूर कहेंगे। सभापति जी मैं आपका आदर करता हूं। रघुवंश बाबू ने जो मांगे सदन में उठाई हैं, सारे सदन ने एक स्वर से उनका समर्थन किया है। सदन इसे बहुमत से पास करे। इसके साथ ही मैं माननीय मंत्री जी से कहूंगा कि आप बिहार को बचाइये, उसकी रक्षा कीजिए, उसकी गरीबी दूर कीजिए, बिहार को स्पेशल पैकेज प्रदान कीजिए और उसे आपदाग्रस्त राज्य घोषित कीजिए। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

   

श्री मंजय लाल (समस्तीपुर):सभापति महोदय, मैं माननीय सांसद रघुवंश प्रसाद जी को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने नियम १९३ के तहत इस चर्चा को आरम्भ किया। महोदय, जब देश आजाद हुआ था तो उस समय प्रति व्यक्ति आमदनी की दर में बिहार का स्थान सातवां था और ५४ वर्ष की आजादी के बाद हमारा स्थान सबसे नीचे हो गया। जब हम लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, उस वक्त हम लोगों ने यह नहीं सोचा था कि ५४ वर्ष की आजादी के बाद हमारे बिहार की ऐसी परिस्थिति हो जायेगी।

आज हम एक दूसरे पर छींटाकशी करते हैं। राज्य सरकार कहती है कि केन्द्रीय सरकार की वजह से ऐसा हो रहा है और केन्द्रीय सरकार कहती है कि राज्य सरकार की वजह से ऐसा हो रहा है। मैं इस संबंध में कहना चाहता हूँ कि आज बिहार में जाइए तो खेतों में सिंचाई नहीं है, स्कूलों में पढ़ाई नहीं है और नौजवानों की कमाई नहीं है, बिजली नहीं है। सड़कों पर चलिये तो गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा है पता नहीं चलता। हम एक दूसरे पर छींटाकशी करेंगे तो स्थिति नहीं सुधरेगी। आज हमारी स्थिति ऐसी हो गई है कि विशेष पैकेज की बात गृह मंत्री जी ने कही थी, वह पैकेज बिहार को देना चाहिए अगर बिहार का विकास करना चाहते हैं और विशेष दर्जा देकर जैसे दूसरे राज्यों का विकास किया जाता है, वैसा करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो बिहार हमेशा परिवर्तन के चिराग लेकर आगे बढ़ता रहा है और अगर ऐसा हुआ तो वह राज्य और केन्द्र के लिए अच्छा नहीं होगा। इसलिए मैं आग्रह करता हूँ और मांग करता हूँ कि बिहार को एक विशेष पैकेज दिया जाए और विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए।

श्रीमती रेनु कुमारी (खगड़िया) :सभापति महोदय, बहुत ही कम शब्दों में मैं अपनी बात रखूंगी क्योंकि समय बहुत हो गया है। सदन में बिहार की चर्चा जो सदस्य लाए हैं मैं उन सबको धन्यवाद देती हूँ लेकिन आज गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी का बिहार याचना के लिए खड़ा है, इस पर मुझे एक शेर याद आ रहा है:

"मुझे तो अपनों ने लूटा, गैरों में दम कहां था मेरी कश्ती तो वहां डूबी जहां पानी कम था। "
 

 सभापति महोदय, बिहार को १०-१२ वर्षों से जिस तरह से लूटा गया है, खसोटा गया है, घोटाले के माध्यम से, अपहरण के माध्यम से, बलात्कार के माध्यम से …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आर्थिक पैकेज पर बोलिये।

श्रीमती रेनु कुमारी: समय नहीं है इसलिए मैं विवाद में नहीं पड़ना चाहती हूँ। मैं कहना चाहती हूँ कि बिहार में शिक्षा की व्यवस्था नहीं है,…( व्यवधान)

सभापति महोदय : रेनु कुमारी जी की बात के अलावा किसी माननीय सदस्य की बात रेकार्ड पर नहीं जाएगी।

   

...( व्यवधान)..*.

 

श्रीमती रेनु कुमारी: महोदय, जिस दिन बिहार का बंटवारा हुआ, मैंने सरकार के पक्ष में वोट दिया था लेकिन मेरी आत्मा रो रही थी क्योंकि बिहार बंटने के बाद वहां उद्योग धंधे खत्म हो गए, शिक्षा खत्म हो गई है और सब जानते हैं कि बिहार में ये समस्याएं हैं। बिजली की समस्या है, कृषि व्यवस्था ठप्प हो रही है, कानून व्यवस्था तो ठप्प है ही। मैं उसी संदर्भ में बताना चाहती हूँ कि मेरे ऊपर ही तीन बार हमले हुए, हमारी पार्टी के नेताओं ने इसी सदन में मामला उठाया लेकिन बिहार में हमारी सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई। केन्द्र सरकार ने भी हमारी सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की।

सभापति महोदय : आप विषय पर बोलिये।

श्रीमती रेनु कुमारी: मैं यह सब इसलिए कहना चाहती हूँ कि बिहार में हमारी सरकार नहीं है। मैं पैकेज पर ही बोलूंगी।…( व्यवधान)आप सीनियर मेम्बर होकर क्या बात करते हैं? गजब की बात करते हैं…( व्यवधान)

* Not Recorded सभापति महोदय : राम प्रसाद जी आप बैठिये। बिना अनुमति के आप नहीं बोल सकते। आप बैठ जाइए। आपकी बात रिकार्ड पर नहीं जा रही है।

   

...( व्यवधान)...*   श्रीमती रेनु कुमारी:बिहार के सांसदों ने जो पैकेज की बात की है, मैं मंत्री महोदया से आग्रह करूंगी कि उसे एक बार पलटकर देखें कि उसमें किन किन चीजों की मांग की गई है। मैं दोहराना नहीं चाहता हूँ। चाहे बाढ़ हो, सुखाड़ हो, बिजली की समस्या हो या उद्योग धंधे हों, मेरे पूर्व वक्ता जो बोल चुके हैं, मैं उनसे अपने आपको संबद्ध करना चाहती हूं और एक बात कहना चाहती हूँ कि अन्य प्रदेशों के मुख्य मंत्री यहां आकर प्रधान मंत्री जी से मिलते हैं, कृषि मंत्री और रेल मंत्री तथा अन्य मंत्रियों से मिलते हैं लेकिन बिहार का दुर्भाग्य है कि हमारी मुख्य मंत्री महोदया का पैर दिल्ली में नहीं उतरता है। …( व्यवधान)एक बात और कहना चाहूंगी कि हम लोगों के सामने क्या समस्याएं आती हैं। मैं चाहती हूँ कि बिहार को पैकेज मिले। मैंने दसवें वित्त कमीशन पर हुई बहस के दौरान कहा था कि पैसा सरकार खर्च नहीं करती है तो उसको पैसा क्या मिलेगा, लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि बिहार की हालत को देखकर उसे पैकेज मिलना चाहिए।

सभापति महोदय, पैकेज चाहे किसी रूप में मिले, चाहे योजना के रूप में मिले या पैसे के रूप में, विशेष पैकेज केन्द्र सरकार की ओर प्रदेश सरकार को मिलना चाहिए, लेकिन मैं यह कहना चाहती हूं कि संविधान के अनुसार जो एक नियम है कि प्रदेश के विकास के लिए केन्द्र सरकार से धन तभी दिया जाएगा जब प्रदेश सरकार उसके लिए प्रस्ताव प्रेषित करे, इससे मैं सहमत नहीं हूं। मैं बताना चाहती हूं कि केन्द्र सरकार के मंत्रियों के पास जब भी मैं किसी मांग को लेकर गई, चाहे वह रोड की हो या रेल की या किसी अन्य विकास कार्य की, हमेशा मुझे केन्द्रीय मंत्रियों ने यही कहा कि आप प्रदेश सरकार की ओर से प्रस्ताव भिजवाइए। अब जैसा कि केन्द्र सरकार को मालूम ही है कि बिहार में ऐसी निकम्मी सरकार है कि उसका कोई मंत्री किसी भी प्रकार का प्रस्ताव भेजने को ही तैयार ही नहीं है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय, मैं भी बिहार की ही हूं। इसलिए मेरी इस बात पर किसी को नाराज नहीं होना चाहिए बल्कि सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। मेरी प्रार्थना है कि हर विकास कार्य के लिए केन्द्र द्वारा यह कहना कि प्रदेश सरकार से प्रस्ताव भिजवाइए, ठीक नहीं है। मेरा निवेदन है कि इस शर्त को समाप्त किया जाना चाहिए, तभी देश और देश के पिछड़े प्रदेश तरक्की कर सकेंगे।

* Not Recorded सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से आज प्रधान मंत्री जी, केन्द्र सरकार और यहां उपस्थित मंत्री महोदया से मांग करती हूं कि केन्द्र सरकार की ओर से निश्चित रूप से बिहार सरकार को पैकेज दिया जाए, लेकिन इसके साथ एक शर्त और जोड़ दी जाए कि प्रदेश सरकार निश्चित समय-सीमा में विकास कार्य कर उसके यूटिलाइजेशन सर्टफिकेट केन्द्र सरकार को भेजे। यदि प्रदेश सरकार ऐसा करने में सक्षम नहीं हो, तो भारत सरकार अपनी एजेंसी प्रदेश में भेजकर वहां विकास कार्य करेगी। मेरी मांग है कि केन्द्र सरकार, जो बिहार के सांसद हैं, उनकी एक कमेटी बनाए जो वहां हो रहे विकास कार्यों की मानिटरिंग करे और नियमानुसार हर महीने, हर तीन महीने और छ: महीने बाद विकास कार्यों की प्रगति रिपोर्ट केन्द्र सरकार मंगवाए। चूंकि समय नहीं है, इसलिए मैं अपनी बात समाप्त करते हुए, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपका धन्यवाद करती हूं।

SHRIMATI VASUNDHARA RAJE:

(THE MINISTER OF STATE OF THE MINISTRY OF SMALL SCALE INDUSTRIES, MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PERSONNEL, PUBLIC GRIEVANCES AND PENSIONS, MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE DEPARTMENTS OF ATOMIC ENERGY AND SPACE) : Sir, the House has witnessed an extremely simulating debate over the last five and a half hours. I was told that it was a Short Duration Discussion but it stretched into nearly 5 to 6 hours’ debate. Sir, right through it, I see across the board a deep concern for the State of Bihar and that is cutting across all party lines. I have to thank the Members for having put in their very valuable inputs and suggestions about the various problems and prospects that are disturbing Bihar today. Finally, I am grateful to all those Members who have participated in the discussion and it looks like everybody tried to participate in this debate.
Sir, I will confine myself very quickly to the replies which will cover I think in toto most of those issues which have been raised by various hon. Members. Let us divide the proposals into two issues. The Government is very concerned about the State of not only Bihar but about other States also where there have been problems of development. But particularly for Bihar, there has been a dedicated cell which has been put together in the Planning Commission so that the implementation of the proposals which have been sent by the Bihar Government can be monitored. The Bihar Government has sent certain proposals and we have sent them on to the concerned Ministries with the request that there should be an appropriate action. As everybody understands and knows over here that there is a way in which all of these issues are structured. The things will come up in the State of Bihar. They will have to go to the concerned Ministries and then the Commission would go back to the State of Bihar where we will all have to work together. The progress is definitely followed up and the reminders have been sent. We have some recent success which I would like to quickly enumerate.
Every Member here has spoken about the flood problem and has also spoken about the problem with Nepal. We have pursued very strongly the issue of construction of dam in that country so that some mitigation of the problem of the flood in Bihar can happen. I am happy to say to you that very recently some action has been taken. As far as flood control is concerned, an inspection report for the Sapta Kosi High Dam, a multi-purpose project and Sun Kosi Storage-cum-Diversion Scheme have been finalised in 2001. The DPRs for these multi-purpose projects are now being taken up. Similarly, the development of the National Highway in the State at a cost of over Rs.156 crore have been planned for 2002-03. In addition, the work of making four lane of 197 kilometres of NH-2 and 517 kilometres of NH-28, 31, and 57 are being taken up in Bihar by the National Highways Authority.
Yes is the concern for projects like those of railway lines, new lines for gauge conversion and for doubling of track. These have been taken up in the State. Shri Nitish Kumar himself is a part of the State of Bihar and has shown concern. As on date, a total of Rs.3300 crore worth projects are on hand in Bihar.
Sanctions have been given now by the Planning Commission for the electrification projects. A number of hon. Members present here today have spoken about the lack of electricity and the importance of being able to put up new projects. Sanctions have been given by the Planning Commission for Muzaffarpur TPS Stage II of 2X250 MW and the State can now take up the project. In the Central Sector Kahalgaon Stage-II of 1320 MW has received clearance of CEA and further action being taken on this issue. Similarly, Barh has been given clearance by the Cabinet as a mega project. NTPC has submitted the feasibility report to CEA for techno-economic clearance. The project can now be taken up for implementation after tying up all the various clearances.
The Ministry of Communications had envisaged complete coverage of all villages in the State of Bihar by December 2002. I just checked with the hon. Minister and he said he would be able to stick to the deadline. Similarly, during the Ninth Plan 44 tourism projects with a central financial component of a little over Rs.912 crore have been sanctioned for Bihar and a development plan with focus on tourism and conservation for Bodh Gaya is under preparation. Patna Airport has been upgraded recently at a cost of Rs.10.3 crore and the work is going on to develop Gaya Airport at a cost of 18.5 crore. This is supposed to have been completed by March 2002. There may be a little time over run, but it will be completed very shortly. Similarly, the Cargo area in Patna has been sanctioned at a cost of Rs.11 crore.
A number of hon. Members have spoken about the concern for the procurement of foodgrains by the State of Bihar. I checked with the Minister concerned also. As far as we are concerned, procurement operations in the State has been stepped up by that Ministry. Procurement of both wheat and rice in 2001-02 is higher than that of last year. Similarly, Rabi procurement of wheat is still going on. Additional Central Assistance of Rs.150 crore has been sanctioned in Bihar for the last two years. The Planning Commission has commissioned this Report which I mentioned to you of the State Development Report for Bihar through the Institute of Human Development, New Delhi. The Planning Commission is also considering a special basket of new projects for Bihar. The Planning Commission and the Ministry of Agriculture have taken the initiative to implement this very large programme, what they call, Shallow Tubewells, in the State and subsidy has already been sanctioned for more than one lakh of such irrigation structures and pumpsets.
Some problems have come up recently and they were being discussed at a high level meeting which was taken up by the Deputy Chairman on the 15th May 2002. Central support to the State has also been substantially increased under the Eleventh Finance Commission award. From 1.2.2001 the Ways and Means limits have been enhanced and similarly the period of continuous overdraft which entails the suspension of payment has also been increased by a few days. The basic per capita Normal Central Assistance has also been increased from Rs.169 crore for undivided Bihar to Rs.194 crore for the divided Bihar.
I have to thank all the non. Members for their participation in this enlightening debate. Almost all of them have said that we have to cut across the party lines and we have to be able to see that these projects are implemented in Bihar. I have to say that there has been a substantial non-utilisation of funds which have been allocated by the Centre to Bihar under various Central Sector Schemes. I quickly go through them.
Today the utilisation of funds has been only in the range of 65-75 per cent and for the country as a whole it is around 90 per cent. For States like Andhra Pradesh, Karnataka and Rajasthan, it is in the range of 93-95 per cent and sometimes this is even going up to over 100 per cent. Madhya Pradesh and Himachal Pradesh have exceeded their approved plan outlays. The Report of C&AG for 1998-99 shows that against the total provision of Rs.706.77 crores for Centrally sponsored schemes, the expenditure was Rs.260 crore and almost Rs.446 crore went as savings.
Similarly, in the rural development sector, the State Government has lost a huge amount because they have not been able to provide a matching grant which was supposed to be given by the State, or because of large opening balance at the beginning of the year which has led to a shortfall in releases. So we have had problems in Central releases under poverty alleviation programmes. This is also true for schemes such as SGSY, JJSY, JRY, EAS, IAY, DPAP, IRDP, PMGY and PMGSY and other schemes in this sector. In the irrigation sector alone, the under-utilisation in the last five years has been to the tune of Rs. 400 crore.
The approved Plan size for the State for 2001-02 was Rs. 2644 crores. The State Government revised the Plan size subsequently to only Rs.1665 crore. So, the expected expenditure will now be only Rs. 1484 crore. This highlights the fact that Bihar, with the lowest per capita Plan expenditure in the entire country, is not being able to utilise even its due allocations.
The Planning Commission has been requesting and is carrying on requesting the State of Bihar to provide it with information regarding the loss of revenue which has resulted as a result of the separation from Jharkhand. We say that if you are able to provide us the information, maybe, we will start working on that. But a detailed study of its financial resources needs to be carried out by Bihar and so far, no information has been made available to the Planning Commission. So, we have not been able to make progress in this direction.
Regarding governance and law and order issues of Bihar, we were talking about bringing in any kind of investments or bringing in industry in the State of Bihar. That will be impossible if the infrastructure facilities are not able available and also if the law and order situation is such that it does not encourage people from outside to come to that State. Unless this situation is rectified, we will be hard-pressed to bring in that kind of investment in that State. Here, I feel that we need to fully tap the available funds, for example, for the Centrally-sponsored schemes, Rural Infrastructural Development Fund of NABARD, Life Insurance Corporation, HUDCO, Rural Electrification Corporation, Power Finance Corporation as well as multilateral assistance which is being availed of by other States.
We need to be able to look into all these things. I believe that some major initiatives are needed to be taken by the State Government in this direction. So far nothing has happened. If we are able to do it, I believe, there are a lot of funds that we can access. We do not need to look very far. Once we have been able to access those funds, then we can look at the road map and the direction in which we need to go.
In sum, basically, the capacity of the State Government to absorb assistance is under serious question. Provision of funds, whether it is from the Central Government or financing institutions, involve a certain amount of counterpart responsibilities. So, it is important that in some places, you give matching grant and sometimes, you have to have utilisation within a certain period of time. You have to do completion of accounting and auditing and you have to have satisfying monitoring agencies to see that proper utilisation of funds is done and things are taken in the right direction. As far as we are concerned, the Central Government as well as the Planning Commission are committed to solve the problems of Bihar. We will see that no stone is left unturned within the parameters to see that Bihar manages or moves towards development and progress.
Development is not just an outcome of funds. It is also better management and proper functioning of institutions. The issue of governance itself will have to be addressed to by the State itself. It is something which we can be supportive of but the agencies will have to come from within. The decision for planning and development in all the different sectors including allocation of funds for the various schemes and programmes will have to be taken by the State Government. The State of Bihar has to continue to make special efforts to improve its delivery mechanism and monitoring, and evaluation arrangements basically to improve its skills in the project preparations.
A number of hon. Members have given very valuable suggestions about bringing in outside agencies to see that special monitoring of allocation of funds is done. A lot of very interesting ideas have come from various Members and there was a talk of even fixing the Gadgil Formula. Now, as far as this is concerned, it is an old Formula. It is basically meant to ensure equity between the States as well as the Centre and the States. I believe that we will have to stick to certain parameters and work within those parameters to see that Bihar starts to move ahead.
In this regard, very little discretion is available with the Centre. Hence, I would say that the responsibility for lack of development cannot just be passed on to the Centre alone. It is a federal set-up. In this federal set-up, we are going to work together. The State will have to take up its own responsibilities. The Centre will take up the responsibility in exceptional circumstances. The general point that has been made here is that after the division of Bihar, lot of allocations have gone to Jharkhand and as a result of that Bihar has suffered. I have some figures here. As per the latest available estimates of the State Government, and the C&AG, the performance of the State in terms of its own revenue generation, as well as the overall Balance from Current Revenues (BCR) has been much better than originally anticipated. The State Government deserves to be commended for its efforts for keeping the Non-plan Revenue Expenditure in control, which is largely responsible for the improved BCR. It shows that with a little bit of effort, if Bihar can do so better, then, I believe that with a little bit of help from the Central Government and other lending institutions and if the State is able to utilise fully the plan allocations, it would be very easy for it to move ahead.
It is a very large State. It was regarded as a very well run State. Its people are capable and very very hard working. It has rich soil and water resources. I think in a situation like this, there is room for improvement in the areas of agriculture, horticulture and fisheries. We need to be able to exploit fully the basic needs of the farmers, like quality seeds, technology transfer etc. This can be met with the available funds.
I think, at the end of the day, the picture is very clear before us. As far as the Centre is concerned, the Planning Commission is going ahead with some meetings where they will be putting a lot of attention on the development of Bihar. I will certainly convey to the Deputy-Chairman of the Planning Commission the views of all the Members here. There is a need for the Members to meet the Planning Commission to speak about the problems that they have for the improvement of Bihar. We have talked here about the panchayati raj funds and infrastructure availability. This is an interpretation of the Finance Ministry that funds have to be given only to those States where elections have been held. Therefore, the moment the elections were held, those funds were released. The Finance Ministry believes that not only has it released the funds after the elections, it gave a little bit extra also. I think that rather than recriminate with each other, it would be very important for all of us to put our heads together because Bihar is going through tough times. It is very important for all of us to be sympathetically aware that we have to work together to try and bring about a change of fortune of that State. I do not think that there is any time for us to work at the cross purpose, to talk against each other, to sit in Parliament and look at it from a political angle. It is time to bury the hatchet and to really look at it from the point of view of improvement of the State. I believe that every single Member, whether it is Dr. Raghuvansh Prasad Singh, Shri Prabhunath Singh, Shri Raghunath Jha, Shrimati Renuka Kumari, who was very impassioned here, Shri Brahmanand Mandal, and Shri Nawal Kishore Rai, has shown his anguish that he felt towards the State. I really do believe that it was not something meant for Press or for political gains. I believe it came from the heart. I do not believe anyone would have sat for six hours if they did not feel strongly about the State. I can understand the pain and anguish and I will certainly convey it to the right quarters. I do believe that if we work together, we will be able to alleviate the sufferings to a large extent of the State of Bihar.
I thank you all for having spent the kind of time. My thanks especially to Dr. Raghuvansh Prasad Singh who has left no stone unturned. This is the third time that he has brought this issue to the notice of the House. There is not a single party of the Bihar State that has not made itself available to speak about this issue. I have to thank you all for having taken part in this most interesting debate. I must also say that as Minister concerned with this issue, I have been extremely enlightened over the last three Sessions that we have had. Nearly for 12 hours we have discussed this issue. I could learn a lot from it. I think we will be able to sit down to sort out this problem. I crave the indulgence of all the Members. I thank them from the bottom of my heart for the kind of time and efforts that they have given towards this.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :जो महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए थे, एक का भी ठोस आश्वासन नहीं मिला। सरकार का उत्तर घोर असंतोषजनक है। इसीलिए मैं सदन का त्याग करता हूं।
21.30 hrs.     ( तत्पश्चात् डा. रघुवंश प्रसाद सिंह तथा कुछ अन्य माननीय सदस्य सभा भवन से बाहर चले गए।)   श्री प्रभुनाथ सिंह : सारी बहस के बाद तीन बातें सामने आई हैं। एक तो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देना, दूसरा आर्थिक पैकेज देना और तीसरा वहां किसी दूसरी एजेंसी से काम कराना। आपने दूसरी एजेंसी से काम कराने की बात पर तो कुछ कहा है, लेकिन बाकी दो पर कुछ नहीं कहा। मैं मंत्री जी से जानना चाहता हूं, सभापति महोदय : यह परिपाटी नहीं है। Now, the House stands adjouned to meet tommorrow at 11.a.m. 21.31 hrs     The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Friday, May 17, 2002/Vaisakha 27, 1924 (Saka).
 

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