State Consumer Disputes Redressal Commission
Wipro G E Medical vs Naushad Ahmad on 3 August, 2023
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2009/512 ( Date of Filing : 30 Mar 2009 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Wipro G E Medical a ...........Appellant(s) Versus 1. Naushad Ahmad a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Vikas Saxena PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY MEMBER PRESENT: Dated : 03 Aug 2023 Final Order / Judgement (सुरक्षित) राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0, लखनऊ अपील सं0- 512/2009 (जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, आजमगढ़ द्वारा परिवाद सं0- 38/2008 में पारित निर्णय व आदेश दिनांक 27.02.2009 के विरुद्ध) 1.
Manager Wipro Ge Medical Systems Pvt. Ltd., 4 Kadugodi industrial Area, Bangalore.
2. Branch Manager Wipro Ge Medical Systems Pvt. Ltd. First Floor, Chintel House, 16 Station Road Lucknow.
.........Appellants Versus Naushad Ahmed Son of Dost Mohammad, Proprietor of Radiant Sonography X-ray and Pathology/New National X-ray and Sonography, Near Sports Stadium, Arazi Bagh, Azamgarh, Resident Gram Dugdugwa Post Jamalpur, District Azamgarh.
..........Respondent समक्ष:-
मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य।
मा0 श्रीमती सुधा उपाध्याय, सदस्य।
अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित : श्री रोहित वर्मा, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक:- 11.10.2023 मा0 श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उद्घोषित निर्णय
1. परिवाद सं0- 38/2008 नौशाद अहमद बनाम मैनेजर आफ विप्रो जी ई मेडिकल सिस्टम प्रा0लि0 व एक अन्य में जिला उपभोक्ता आयोग, आजमगढ़ द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दि0 27.02.2009 के विरुद्ध यह अपील योजित की गई है।
2. विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने प्रश्नगत निर्णय व आदेश के माध्यम से निम्नलिखित आदेश पारित किया है:-
''परिवादी का परिवाद, विपक्षीगण के विरुद्ध स्वीकार किया जाता है तथा विपक्षीगण को आदेशित किया जाता है कि वह एक माह के अन्दर परिवादी को मु0 38,000/-रू0 परिवाद संस्थित किये जाने की तिथि से अन्तिम भुगतान तक 10 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ, अदा करे।
खर्चा मुकदमा पक्षवार अपना अपना स्वयं वहन करेंगे।
आदेश खुले फोरम में हस्ताक्षरित एवं दिनांकित किया गया तथा पढ़कर सुनाया गया।''
3. प्रत्यर्थी/परिवादी का परिवाद पत्र में संक्षेप में कथन इस प्रकार है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपने व अपने परिवार के जीवकोपार्जन हेतु अपीलार्थीगण/विपक्षीगण से अल्ट्रासाउण्ड मशीन मॉडल नं0 लाजिक 100 एम0पी0 लेने की बात किया, जिसके एवज में प्रत्यर्थी/परिवादी ने मु0 38,000/-रू0 दि0 01.08.2003 को बतौर एडवांस चेक के माध्यम से अपीलार्थी/विपक्षी को दिया, जिसे अपीलार्थी/विपक्षी ने स्वीकार भी कर लिया तथा शेष रकम अपीलाथीगण/विपक्षीगण द्वारा मशीन की डिलेवरी के उपरांत दिया जाता, परन्तु प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा दिया गया मु0 38,000/-रू0 प्राप्त कर लेने के बावजूद भी अपीलार्थीगण/विपक्षीगण द्वारा उक्त अल्ट्रासाउण्ड मशीन की डिलेवरी नहीं की गई, जिससे प्रत्यर्थी/परिवादी को मानसिक, शारीरिक व आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा अपीलार्थीगण/विपक्षीगण को टेलीफोन व शिकायती पत्र द्वारा कई बार सूचित किये जाने के बावजूद भी अपीलार्थीगण/विपक्षीगण द्वारा उक्त मशीन की सप्लाई नहीं की गई, बल्कि एक प्रोफार्मा इनवायस दि0 29.04.2005 अपीलार्थी/विपक्षी की तरफ से भेजा गया, जिसमें अल्ट्रासाउण्ड मशीन कीमत तथा प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा दी गई रकम बतौर एडवांस दर्ज है। उक्त के सम्बन्ध में प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से अपीलार्थीगण/विपक्षीगण को कानूनी नोटिस भी भेजा, परन्तु कोई जवाब नहीं दिया गया, जिससे व्यथित होकर प्रत्यर्थी/परिवादी ने यह परिवाद प्रस्तुत किया है।
4. अपीलार्थीगण/विपक्षीगण ने अपने प्रतिवाद पत्र में प्रत्यर्थी/परिवादी के कथनों को इंकार करते हुये कथन किया है कि परिवाद इस कारण पोषणीय नहीं है कि सर सैय्यद फार्मोकोलाजी इंस्टीट्यूट नेशनल डायग्नोस्टिक सेन्टर आजमगढ़ व्यावसायिक उद्देश्य से चल रहा है। क्रय और विक्रय दो कम्पनियों के मध्य है न कि क्रेता व विक्रेता के मध्य। प्रत्यर्थी/परिवादी को परिवाद संस्थित करने का अधिकार प्राप्त नहीं है, क्योंकि उसके द्वारा अपीलार्थीगण/विपक्षीगण से कभी कोई सौदा नहीं हुआ है। प्रत्यर्थी/परिवादी का यह कथन कि अपीलार्थी/विपक्षी उक्त सेन्टर का प्रोपराइटर है, बिल्कुल गलत और बनावटी है, क्योंकि प्रत्यर्थी/परिवादी पेशे से डॉक्टर नहीं हैं, इस कारण वह किसी मेडिकल सेन्टर का प्रोपराइटर नहीं हो सकता है, जब कि उक्त सौदा इंतेखाब आलम आजमी से हुआ था जोकि मेडिकल सेन्टर के निदेशक हैं। प्रत्यर्थी/परिवादी को यह साबित करने का भार है कि वह मेडिकल सेन्टर के स्वामी व प्रोपराइटर हैं। मेडिकल सेन्टर के निदेशक इंतेखाब आलम आजमी द्वारा लाजिक 100 मशीन का आर्डर दि0 04.07.2003 को बुक किया गया और उन्होंने ही अपीलार्थी/विपक्षी कम्पनी को मु0 38,000/-रू0 दिया। इस आर्डर के दिये जाने के पश्चात दि0 15.11.2003 को निदेशक द्वारा सूचित किया गया कि उक्त सेन्टर का रजिस्ट्रेशन नहीं है इस कारण वह आर्डर कैंसिल कराना चाहते हैं। साथ ही साथ धनराशि वापस करने की मांग की गई। पुन: निदेशक द्वारा दि0 10.01.2004 को यह अवगत कराया गया कि पूर्व आर्डर अल्ट्रासाउण्ड मशीन के लिये बुक किया जाये जिस पर अपीलार्थीगण/विपक्षीगण द्वारा रजिस्ट्रेशन न होने के सम्बन्ध में आपत्ति की गई। तत्पश्चात निदेशक द्वारा दि0 16.01.2004 को सूचित किया गया कि पी0एन0डी0टी0 रजिस्ट्रेशन प्राप्त कर लिया गया है। इस सम्बन्ध में उनके द्वारा दि0 10.02.2004 को फार्म नं0 32 अपीलार्थीगण/विपक्षीगण के पास भेजा गया और अपीलार्थीगण/विपक्षीगण द्वारा आर्डर के अनुपालन में दि0 19.03.2004 को इनवायस नं0- 34500947 भेजा गया। तत्पश्चात पुन: निदेशक द्वारा उपरोक्त आर्डर को कैंसिल करने व अग्रिम धनराशि की वापसी हेतु पत्र लिखा गया। इसके पश्चात पुन: निदेशक ने दि0 14.04.2005 को अपीलार्थी सं0- 1/विपक्षी सं0- 1 को पत्र लिखा कि वह उक्त अल्ट्रासाउण्ड मशीन लेना चाहते हैं उस मशीन की कीमत 3,90,000/-रू0 तय पायी गई, जिसमें से मु0 38,000/-रू0 समायोजित होना था। इसके अनुपालन में अपीलार्थीगण/विपक्षीगण द्वारा दि0 06.06.2005 को इनवायस नं0- 56500058 भेजा गया, परन्तु प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा फार्म नं0- 32 उपलब्ध नहीं कराया गया। अपीलार्थी सं0- 1/विपक्षी सं0- 1 के अभिकर्ता आशीष अग्रवाल ने दि0 24.08.2005 को उक्त मेडिकल सेन्टर को पत्र लिखा कि सात दिन के अन्दर मशीन प्राप्त कर लें, अन्यथा उक्त आर्डर कैंसिल कर दिया जायेगा और जो भी खर्च होगा वह प्रत्यर्थी/परिवादी को अदा करना होगा, परन्तु उक्त मेडिकल सेन्टर द्वारा न तो मशीन ली गई और न ही कोई उत्तर दिया गया। अत: उपरोक्त कारणों से प्रत्यर्थी/परिवादी का परिवाद खारिज किये जाने योग्य है।
5. अपील में मुख्य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि प्रश्नगत निर्णय व आदेश आधारहीन, मनमाना व अवैध है तथा क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर दिया गया है। प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा व्यावसायिक प्रयोग हेतु मशीन खरीदी गई है तथा उसने कहीं भी स्पष्ट नहीं किया है कि उक्त मशीन उसके स्वरोजगार हेतु क्रय की गई है। प्रत्यर्थी/परिवादी चिकित्सक अथवा चिकित्सीय व्यवसाय में नहीं है। इस कारण उसके द्वारा यह मशीन शुद्ध व्यावसायिक उद्देश्य से क्रय की गई है तथा इसको सिद्ध करने का भार प्रत्यर्थी/परिवादी पर ही है कि यह मशीन उसके द्वारा स्वरोजगार हेतु जीवन यापन के उद्देश्य से क्रय की गई। इस कारण प्रत्यर्थी/परिवादी उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आता है और उसका वाद उपभोक्ता आयोग में पोषणीय नहीं है। प्रत्यर्थी/परिवादी की ओर से अपीलार्थीगण/विपक्षीगण से सीधे सम्पर्क नहीं किया गया न ही उसके द्वारा प्रश्नगत मशीन क्रय की गई है। प्रत्यर्थी/परिवादी ने स्वयं को रेडियंट सोनोग्राफी का प्रोपराइटर दर्शाया है और इसी हैसियत से परिवाद योजित किया है, किन्तु उसको दर्शाने के लिए कोई दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।
6. वास्तव में उक्त संस्था के डायरेक्टर श्री इंतेखाब आलम आजमी से पत्र दिनांकित 04.07.2003 के माध्यम से रू0 38,000/- अग्रिम के रूप में उक्त मशीन हेतु दिया था। बाद में पत्र दिनांकित 15.11.2003 के द्वारा इन्होंने यह सूचित किया कि कम्पनी का पी0एन0डी0टी0 पंजीकरण नहीं है। इसलिए मशीन की आवश्यकता नहीं है, किन्तु बाद में पत्र दिनांकित 14.04.2005 के माध्यम से मशीन को खरीदने की इच्छा जाहिर की। यद्यपि इसके पूर्व मार्च 2004 के पत्र के माध्यम से उक्त क्रय को कैंसिल करने की सूचना श्री इंतेखाब आलम आजमी ने दी थी। अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा मा0 सर्वोच्च न्यायालय एवं मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित अनेक निर्णयों को उद्धरित करते हुये यह अभिकथन किया गया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा व्यावसायिक उद्देश्य से मशीन क्रय की गई है। अत: परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पोषणीय नहीं है। प्रत्यर्थी/परिवादी अपना परिवाद सिविल न्यायालय में ला सकता है। इस आधार पर अपील स्वीकार किये जाने एवं प्रश्नगत निर्णय व आदेश अपास्त किये जाने की प्रार्थना की गई है।
7. हमने अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता श्री रोहित वर्मा को सुना। प्रश्नगत निर्णय व आदेश तथा पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिलेखों का सम्यक परीक्षण एवं परिशीलन किया। प्रत्यर्थी की ओर से कोई उपस्थित नहीं है।
8. विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा इस आधार पर परिवाद पोषणीय माना गया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपने परिवाद पत्र में यह कथन किया है कि उसके द्वारा जीविकोपार्जन हेतु यह प्रश्नगत मशीन क्रय की गई है, इसलिए परिवाद पोषणीय है, क्योंकि प्रत्यर्थी/परिवादी उक्त दशा में उपभोक्ता की श्रेणी में आ जाता है।
9. यह पीठ प्रत्यर्थी/परिवादी के उक्त मत से सहमत नहीं है। इस मामले में प्रत्यर्थी/परिवादी नौशाद अहमद ने स्वयं को कम्पनी का प्रोपराइटर बताया है। प्रत्यर्थी/परिवादी नौशाद अहमद द्वारा कहीं भी यह कथन नहीं किया गया है कि वह चिकित्सीय व्यवसाय में है। यदि उसके द्वारा डायग्नोस्टिक की किसी शाखा में शिक्षा प्राप्त की गई होती अथवा वह इस व्यवसाय में होता या व्यवसाय आरम्भ कर रहा होता तो उस दशा में यह माना जा सकता था कि वह जीविकोपार्जन हेतु मशीन क्रय कर रहा है, किन्तु निश्चय ही प्रत्यर्थी/परिवादी नौशाद अहमद उक्त चिकित्सीय केन्द्र का प्रोपराइटर एवं स्वामी दर्शाया गया है, जिसमें चिकित्सीय व्यवसाय एवं मशीन का प्रयोग चिकित्सीय व्यवसाय से सम्बन्धित व्यक्तियों द्वारा किया जाना है एवं जिसका लाभ प्रत्यर्थी/परिवादी को प्राप्त होगा। जैसा स्वयं प्रत्यर्थी/परिवादी के अभिकथनों से ही स्पष्ट है। अत: यह मानना उचित नहीं है कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा यह मशीन स्वरोजगार हेतु जीवन यापन के उद्देश्य से खरीदी गई है, जिससे यह माना जा सके कि प्रत्यर्थी/परिवादी उपभोक्ता की श्रेणी में आता है।
10. इस सम्बन्ध में विभिन्न राज्य आयोगों के निर्णयों का अवलोकन किया गया। राज्य आयोग दिल्ली द्वारा पारित निर्णय डॉ0 प्रदीप दत्ता बनाम मेसर्स लॉरसन एण्ड टोब्रो लि0 प्रकाशित III(1992)C.P.J. 633 में स्वयं चिकित्सक द्वारा अपने चिकित्सालय में अल्ट्रासाउण्ड मशीन लगायी गई। स्वयं चिकित्सक महोदय द्वारा इसका संचालन अथवा प्रयोग नहीं किया जाना था एवं अन्य चिकित्सक/टेक्नीशियन के माध्यम से मशीन का संचालन होना था। राज्य आयोग दिल्ली द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया कि चिकित्सक महोदय का उद्देश्य मशीन के माध्यम से लाभ कमाना है एवं वे उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आते हैं।
11. राज्य आयोग हरियाणा द्वारा पारित निर्णय डॉ0 बी0एस0 सिंगला बनाम चेयरमैन/मैनेजिंग डायरेक्टर इंडकैम ए0टी0एल0 लि0 प्रकाशित I(1993)C.P.J. पृष्ठ 522 में इसी प्रकार के मामले में राज्य आयोग, हरियाणा द्वारा यह माना गया कि अल्ट्रासाउण्ड मशीन चिकित्सालय में लगाने का उद्देश्य मरीजों से धनराशि प्राप्त करके टेक्नीशियन एवं विशेषज्ञ द्वारा लाभ कमाना है और मशीन स्वरोजगार हेतु जीवनयापन के लिए नहीं मानी जा सकती है एवं मशीन को क्रय किये जाने वाला चिकित्सक उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं माना जायेगा।
12. राज्य आयोग, गुजारात के समक्ष मामले डॉ0 प्रदीन बेन कुंदन सिंह परमार व अन्य बनाम इंडकैम ए0टी0एल0 लि0 प्रकाशित II(1997)C.P.J. पृष्ठ 241 में भी राज्य आयोग, गुजरात द्वारा इसी प्रकार के मामले में अल्ट्रासाउण्ड मशीन को स्वरोजगार के उद्देश्य से जीवनयापन हेतु क्रय किया जाना नहीं माना एवं क्रेता चिकित्सक को उपभोक्ता न मानते हुये परिवाद को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के परिधि में नहीं माना गया।
13. मा0 राष्ट्रीय आयोग के समक्ष मामले डॉ0 श्री हरि राव बनाम विप्रो जी मेडिकल सिस्टम व अन्य प्रकाशित III(2011)C.P.J. पृष्ठ 504 (N.C.) में भी चिकित्सक जो रेडियोलॉजिस्ट था उसके द्वारा अपने क्लीनिक में अल्ट्रासाउण्ड मशीन स्थापित की गई। मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा यह माना गया कि इसके लिये पृथक से फीस ली जायेगी। इसलिये मशीन को स्वरोजगार हेतु जीवनयापन के उद्देश्य से क्रय किया गया नहीं माना गया।
14. मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा मा0 सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय चीमा इंजीनियरिंग बनाम राजन सिंह प्रकाशित 1997 वॉल्यूम 1 एस0सी0सी0 पृष्ठ 131 पर आधारित किया गया। मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस निर्णय में यह निर्णीत किया गया जब तक कि साक्ष्य से यह तथ्य साबित न हो कि मशीन का प्रयोग केवल स्वरोजगार हेतु किया जायेगा तब तक कि किसी व्यवसाय में यह अवधारित करना उचित नहीं है कि यह स्वरोजगार हेतु है। इस तथ्य को सिद्ध करने का भार क्रेता पर ही होगा कि उसके द्वारा मशीन का प्रयोग जीवनयापन हेतु स्वरोजगार के लिये किया जा रहा है।
15. प्रस्तुत मामले में मा0 सर्वोच्च न्यायालय का उपरोक्त निर्णय लागू होता है। प्रत्यर्थी/परिवादी ने स्वयं को चिकित्सक अथवा चिकित्सीय व्यवसाय में होना नहीं बताया है, बल्कि स्वयं को व्यावसायिक चिकित्सीय केन्द्र का मालिक दर्शाते हुये मशीन क्रय करना बताया है। साक्ष्य से यह तथ्य साबित नहीं किया गया है कि उक्त मशीन किसी प्रकार प्रत्यर्थी/परिवादी केवल अपने जीवनयापन और स्वरोजगार हेतु प्रयोग करेगा। ऐसी दशा में यह मानना उचित नहीं है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने मशीन व्यावसायिक उद्देश्य से क्रय न करके जीवनयापन हेतु स्वरोजगार के लिये क्रय की है। ऐसी दशा में प्रत्यर्थी/परिवादी को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2(1)डी के अंतर्गत उपभोक्ता मानना उचित नहीं है एवं परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पोषणीय नहीं माना जा सकता है।
16. जहां तक गुण-दोष का प्रश्न है, प्रत्यर्थी/परिवादी नौशाद अहमद ने स्वयं मशीन क्रय करना दर्शाया है, जब कि मशीन की क्रय-विक्रय के संव्यवहार के सभी पत्र जो अभिलेख पर हैं वे या तो सर सैय्यद फार्मोकोलॉजी को सम्बोधित हैं अथवा एक अन्य व्यक्ति इंतेखाब आलम आजमी की ओर से लिखे गये हैं अथवा सम्बोधित किये गये हैं। इस प्रकार समस्त संव्यवहार इंतेखाब आलम आजमी के द्वारा क्रय किया जाना परिलक्षित होता है। केवल प्रश्नगत निर्णय में इस तथ्य का उल्लेख है कि क्रय हेतु जो अग्रिम धनराशि दी गई को चेक पर नौशाद अहमद के हस्ताक्षर थे। इसके अतिरिक्त कोई भी प्रपत्र प्रत्यर्थी/परिवादी की ओर से नहीं दिया गया है जिसमें प्रत्यर्थी/परिवादी नौशाद अहमद द्वारा प्रश्नगत मशीन क्रय किया जाना साबित होता हो। अत: इस आधार पर भी प्रत्यर्थी/परिवादी को अनुतोष प्रदान किया जाना उचित नहीं है।
17. उपरोक्त विवेचन के आधार पर परिवाद पोषणीय न होने के कारण एवं प्रत्यर्थी/परिवादी का हित साबित न होने के आधार पर निरस्त किये जाने योग्य है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने उपरोक्त तथ्यों को नजरंदाज करते हुये प्रश्नगत निर्णय व आदेश पारित किया है। तदनुसार प्रश्नगत निर्णय व आदेश अपास्त किये जाने योग्य एवं अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
18. अपील स्वीकार की जाती है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय व आदेश अपास्त किया जाता है तथा परिवाद निरस्त किया जाता है।
अपील में उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
प्रस्तुत अपील में अपीलार्थीगण द्वारा यदि कोई धनराशि जमा की गई हो तो उक्त जमा धनराशि अर्जित ब्याज सहित अपीलार्थीगण को यथाशीघ्र विधि के अनुसार वापस की जाये।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय व आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(सुधा उपाध्याय) (विकास सक्सेना) सदस्य सदस्य शेर सिंह, आशु0, कोर्ट नं0- 3 [HON'BLE MR. Vikas Saxena] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY] MEMBER