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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion Regardig Consideration Of The Report Of The ... on 10 December, 1998

Title: Further discussion on the motion regardig consideration of the report of the erstwhile commissioner for Scheduled Castes and Scheduled Tribes moved by Shrimati Maneka Gandhi on the 8th December, 1998.

1324 hrs MR. SPEAKER: The House will now take up Item No.11, namely, further discussion on the motion moved by Shrimati Maneka Gandhi on the Report of erstwhile Commissioner for Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

Shrimati Maneka Gandhi may move the Motion.

THE MINISTER OF STATE OF THE MINISTRY OF SOCIAL JUSTICE AND EMPOWERMENT (SHRIMATI MANEKA GANDHI): Sir, I had moved the Motion yesterday. Now it is for the debate to begin.

MR. SPEAKER: When you have moved the Motion, you have to make a speech now.

SHRIMATI MANEKA GANDHI: No, Sir. It is for them to make their speeches. I have moved the Motion. It is for the hon. Members now to make their speeches after which I will reply. I do not want to make a speech now.

MR. SPEAKER: Last time, you had moved the Motion. Now, you have to make a speech. You may say something on the Report and other things.

SHRIMATI MANEKA GANDHI: I will make a speech after the debate. Now it is for the Members to say whatever they want to say and then I will reply to them. I have laid the Report on the Table of the House. And you have given four hours' time for the debate.

MR. SPEAKER: All right. Shri Ajit Jogi.

SHRI BHUBANESWAR KALITA (GUWAHATI): Sir, he is not present now. You may call the next speaker.

> श्री बलीराम कश्यप (बस्तर) : अध्यक्ष महोदय, आपने मुझे २८ जुलाई, १९९८ को लोक सभा के पटल पर रखे गए तात्कालिक अनुसूचित जाति और जनजाति के वर्ष १९८९--९१ के ३०वें प्रतिवेदन पर चर्चा करने के लिए अवसर प्रदान किया है, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं बस्तर से चुनकर आया हूं। मैं आदिवासियों और अनुसूचित जाति के सम्बन्ध में अच्छी तरह से जानता हूं। अनुसूचित जाति और जनजाति का जो प्रतिवेदन डा. ब्रहम देव शर्मा ने लिखा है और प्रस्तुत किया है, मैं उस बारे में अपनी बात कहना चाहता हूं। डा. शर्मा पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे तो आदिवासी क्षेत्र में किसी किस्म का विकास नहीं चाहते थे। हमारे बस्तर जिले में वे १९७२ में कलेकटर थे। उन्होंने बस्तर में जितनी योजनाएं थीं, सबको बंद करवा दिया, केवल लूट के मामले चलने दिए। चाहे एप्रोच रोड का मामला हो या उद्योग का मामला हो, उन्होंने कुछ नहीं किया। इस प्रतिवेदन में उन्होंने कहा है कि मैं १९८९ में इस पद पर आसीन हुआ और पहला वजिट दंतेवाला में किया। उसके बाद बैलाडिला आइरन ओर प्रोजेकट की स्िथति को देखा और नजदीक से देखने के बाद यह कहा कि यहां उद्योग नहीं लगना चाहिए, केवल उत्खनन होना चाहिए। आज उत्खनन होते हुए ४० वर्ष हो गए हैं, लेकिन आदिवासियों का कोई विकास नहीं हुआ। पिछली बार आदिवासी केवल उत्खनन का काम करते थे, आजकल मशीनीकरण होने से वहां कोई आदिवासी वर्कर नहीं है, कयोंकि सारा काम मशीनों से होता है। इस तरह वहां की स्िथति दयनीय है। कोई उद्योग नहीं लगने के कारण बस्तर जिले में बैलाडिला आयरन ओर एम.एम.टी.सी. द्वारा संचालित किया जाता है। वह केवल उसके रखरखाव का काम करता है, बाकी कोई काम नहीं करता। कई लोगों की छंटनी हो गई है और एक भी आदिवासी वर्कर नहीं है। बस्तर के लोग वहां उद्योग की बात करते हैं। मैंने भी कई बार इस मांग को लेकर आंदोलन किया है। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। वे कहते थे कि आदिवासियों को केवल जंगल की जमीन और उसमें महुवा, तेंदू पत्ता और लकड़ी चाहिए। आज वहां यह भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है, अरविंद नेताम और उनकी कम्पनी ने वहां अंधाधुंध लकड़ी की कटाई की इसलिए कर्नाटक की पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर कर दी। उसके कारण जलाऊ लकड़ी की कमी हो गई। बस्तर जैसे घने जंगल वाले इलाके में रायपुर से लकड़ी लाई जाती है। मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है, वहां के लोगों को जलाऊ लकड़ी मिले, इस दृष्िट से उसको वेकेंट करवाएं। जहां तक सिंचाई का सवाल है, उस इलाके में एक से डेढ़ प्रतिशत ही सिंचाई होती है। जितने भी देश में आदिवासी क्षेत्र हैं, वहां सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं है। डा. शर्मा ने जो प्रतिवेदन दिया है उसमें यह लिखा है कि इसमें आदिवासियों का हित नहीं है। आदिवासियों का हित किसमें है, रामायण में कहा गया है- हित-अनहित पशु-पक्षी हि जाना। जब यह बात है तो आदिवासी अपने हित और अहित जान सकते हैं। डा. शर्मा एक आयुकत थे। वे मध्य प्रदेश के अंदर भी दो-तीन साल तक सचिव भी रहे। वे बस्तर तो कया, पूरे हिन्दुस्तान के आदिवासी इलाकों में सड़क इत्यादि की बात बराबर मना करते रहे। बड़े मजे की बात है। १९७७-७८ में उस समय माननीय मोरार जी भाई प्रधान मंत्री थे। उनके समय में मध्य प्रदेश सरकार में मैं आदिम जाति कल्याण मंत्री था। जब मैंने उनसे बात की तब उसके लिए पैसा आबंटित किया गया। माननीय धनिक लाल मंडल जी तत्कालीन ग्ृाह मंत्री थे। उनसे मेरी बात हुई तब कहीं आदिवासी इलाके में सड़क इत्यादि बनाने के लिए प्रावधान किया गया। ये सारी परस्िथतियां हैं, इसलिए यह रिपोर्ट मात्र एक ढ़कोसला है। उस रिपोर्ट के आधार पर आदिवासियों के या अनुसूचित जातियों के जीवन निर्धारण करने का अगर काम है तो मैं नहीं मानता कि इससे बड़ी भूल कुछ और हो सकती है। वहां डा. ब्रहम देव शर्मा आयुकत थे। उस समय यह लिखा करते थे कि इससे आदिवासियों और अनुसूचित जातियों का भला नहीं होगा। दुनिया तरककी पर जा रही है। दुनिया इककीसवीं सदी की ओर जा रही है और हम उन्नीसवीं सदी की ओर जाने की बात यदि दोहराते रहें तो इससे बड़ा नुकसान कुछ नहीं होगा। मैं माननीय मेनका गांधी जी से निवेदन करूंगा कि वह इस रिपोर्ट पर ध्यान न दें और आदिवासी और अनुसूचित जातियों के प्रतनधियों से चर्चा करके एक विशेष प्रोग्राम बनाएं ताकि कुछ कारगर काम हो सके। आज १९८० के आदिवासी जंगल की जमीन एनक़ोच करके बैठे हुए हैं लेकिन सरकार की तरफ से उनको जमीन देने की बात नहीं की गई। १९७८ में माननीय मोरार जी भाई जब प्रधान मंत्री थे तो हमने मध्य प्रदेश के बस्तर जिले में पट्टा वितरण का काम शुरु किया था लेकिन जैसे ही कांग्रेस की सरकार बनी, उसने उस पट्टा वितरण के काम को निरस्त करवा दिया। फिर बी.जे.पी. की सरकार बनी तो हमने भू-स्वामी का हक देकर पट्टा दे दिया और उसके डैवलपमेंट के लिए एक हजार, दो हजार रुपये दिए। आज १९८० तक जिन लोगों ने जंगल की जमीन पर कब्जा कर रखा है, उन लोगों को पट्टा की पात्रता नहीं है। इसलिए पार्िलयामेंट में पिछले सत्र में मैंने प्रश्न किया था तो वन और पर्यावरण मंत्रालय ने यह जवाब दिया था कि पांच राज्यों में १९८० तक जंगल की जमीन में जो एनक़ोचमेंट किया गया था, उनको थोड़ी-थोड़ी जमीन देने की स्वीकृति मिल गई है। वह प्रस्ताव आज भी वन और पर्यावरण मंत्रालय के अधीन लम्िबत है। मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि आदिवासियों के हित में वे सारे प्रकरण वन और पर्यावरण मंत्रालय से मंगवाकर आदिवासियों के हित में व्यवस्थापित करने का कष्ट करें। दूसरी बात, आज जंगल में जो आदिवासी रहते हैं, जमीन नहीं होने के कारण वहां उन्होंने एनक़ोचमेंट कर रखा है। उनको फॉरेस्ट विभाग के कर्मचारी तंग करते हैं। पिछले समय में आज से दस-बारह साल पहले जंगल में जो आदिवासी रहते थे, उनके घर उजाड़ दिए जाते थे, उनको वहां से भागने के लिए मजबूर कर दिया जाता था, उन्हें जेलों में ठूस दिया जाता था। ये सारी परस्िथतियां थीं। पिछले समय में उन्हें जमीन देने के लिए कई जगह- खरगौन, बस्तर और झाबुआं में आंदोलन किये गये। पी.वी.नरसिंह राव तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री थे। उस समय मैंने उन्हें मैमोरेंडम दिया था कि जंगल की जमीन पर जिन लोगों ने कब्जा कर रखा है, आप उनके व्यवस्थापन के लिए आदेश दें। मैंने दो बार उन्हें चिट्ठी लिखी थी। उनकी तरफ से एक बार जवाब आया उसके बाद कोई जवाब भी नहीं आया। मैं हजारों चट्ठियां लिखता रहा, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। आज स्िथति यह है कि चाहे बस्तर का इलाका हो, झाबुआ हो, खरगौन हो, खंडुवा हो या नार्थ-ईस्ट हो - इन स्थानों पर दस करोड़ आदिवासी निवास करते हैं। इनकी माली हालत को देखने से पता लगता है कि उनकी स्िथति हैंड-टु-माउथ जैसी है। मेरे समान आदमी या श्री अजीत जोगी या श्रीमती उषा मीणा हों, हम संसद में आ गए हैं, इसलिए हमारी बात अलग हो सकती है। मैं मूल आदिवासी हूं और थोड़ी शिक्षा ग्रहण करके राजनीति में आ गया हूं, हमने अपने आप को अग्रसर किया है। जो आदिवासी जंगल में रहता है, वह चावल और तुम्बी लेकर घूमता रहता है। अब तो जंगल में शिकार करने की आज्ञा भी नहीं है, कयोंकि वन संरक्षण अधनियम, १९८० के तहत प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि कुछ बातों के लिए आदिवासी लोगों को छूट देनी चाहिए। मैं माननीय मंत्री, श्रीमती मेनका गांधी जी से चाहता हूं कि वे आदिवासी मुखिया, मांझी, MLA और MP की बैठक बुलाकर इस समस्या के बारे में बात करें। जहां तक मालिक मदबुजा का सवाल है, अनेक आदिवासियों की जमीनें रजिस्ट्री करवा ली जाती हैं। चालाक होने के कारण अधिकारियों/कर्मचारियों के मिलकर, पैसा देकर जमीन को रजिस्टर्ड करने की स्वीकृति ले लेते हैं और मालिक मदबुजा लकड़ी काटते हैं। पिछली सरकार में एक केन्द्रीय राज्य मंत्री थे,। तथा अन्यान्य लोगों ने यहां आकर यह गोरखधन्धा किया। जंगल की लकड़ी और मालिक मदबुजा की लकड़ी दोनों काटी। उस पर अब सुप्रीम कोर्ट का स्टे लगा हुआ है। मैं मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि उस स्टे को वेकेट कराया जाए। श्री अजीत जोगी (रायगढ़): आप नाम लेकर न बोलें, तो अच्छा होगा। श्री बलीराम कश्यप : नाम मैं इसलिए ले रहा हूं, कयोंकि उनका प्रकरण हैं। मैं नाम इसलिए भी ले रहा हूं, कयोंकि लोकायुकत के पास मामला पड़ा हुआ है। श्रीमती उषा मीणा (सवाई माधोपुर) : वे एक आदिवासी हैं। श्री बलीराम कश्यप : आदिवासी हैं, तो कया आदिवासी गला काटने के लिए होता है। मैं बलीराम कश्यप आदिवासी हूं, तो कया मैं गला काटने के लिए पैदा हुआ हूं। अगर कोई आदिवासी हैं और वह गला काटता है, तो मैं उसकोआदिवासी नहीं मानता हूं। महोदय, मैं बताना चाहता हूं कि आज मंडला के जंगल में चालीस लाख हैकटेयर जमीन पर बोरर लगा हुआ है और । सरकार ने जंगल को काटने की अनुमति दी है। कल मेरे भाई, श्री फग्गन सिंह कुलस्ते, बोल रहे थे कि यह अनुमति गलत दी गई है। ... की सरकार ने इन क्षेत्रों में अनेक ऐसे काम किए हैं। वस्तर के कलैकटर,। ने पिछले दिनों मुख्य मंत्री के आदेश पर आदिवासियों के खातों में उनकी पत्िनयों के नाम में जुड़वा दिया है, जबकि भूराजस्व संहिता, १९५९ में कोई संशोधन नहीं हुआ है और कलैकटर ने मुख्यमंत्री के मौखिक आदेश पर काम कर दिया है। श्री अजीत जोगी (रायगढ़): महोदय, जो व्यकित यहां पर उपस्िथत नहीं है, उनका नाम नहीं लेना चाहिए। इन्होंने मुख्य मंत्री जी का नाम लिया है। आप कृपया पद कहिए, नाम मत लीजिए। यह नियमानुसार भी है।

* Expunged as ordered by the Chair. श्री बलीराम कश्यप : मुख्य मंत्री ने यह कार्य किया है। मैं जब रायपुर हवाईअड़डे पर उनसे मिला, तो उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की यह मंशा है। मैंने कहा - आपकी सरकार की यह मंशा है, तो भूराजस्व संहिता में अमेंडमेंट कर दीजिए और एक बिल ले आइए। इसमें संशोधन करके ही आप इस काम को कीजिए। यह सब मनमाने तरीके से हो रहा है। यह अलग बात है, माननीय श्री जोगी जी को मुख्य मंत्री का नाम लेने से दुख हुआ, उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। श्री भुवनेश्वर कालिता :यह परम्परा नहीं है। श्री बलीराम कश्यप : मैं जानता हूं, परम्परा नहीं है। मैं बीस साल विधान सभा में रहा हूं, लेकिन मैं इस सदन में पहली बार आया हूं। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि परम्परा कया है और कया परम्परा नहीं है। मैं बताना चाहता हूं कि आदिवासी क्षेत्र में कुल मिलाकर डेढ़ प्रतिशत सिचाई की सुविधा है। मैं डा. बी.डी. शर्मा जी का Shri T. R. Balu : Here I want to quote from Manusmriti for the sake of this august House. The slogans are in Sanskrit and I quote:

"Daivatheenam Jagathsarvam Dhanmantram thu daivatham Brahmanathinam Dhanmantram Brahmana Mamadevatha"

This slogan is in Sanskrit means the entire world is controlled by God, God is controlled by Mantra, and Mantra is controlled by Brahmins, cates. So Brahmins, the so called upper castes are our Gods. This slogan exists in Manu Smriti.

I have narrated what is meant by Brahmins, upper castes. Here I hasten to choose one more Sanskrit slogan from Manusmriti, 2.31 and I quote:

"Mangalyam Brahmanasya Syath Kshatriyasya Palaanvidam Vyasyasya Dhansamyuktham Shudrasya Thu Jukupsitham"

This means, Brahmins, upper castes are noble, Kshatriyas are brave, Vaishyas are rich and Shudras and Panchamas are ugly. It shows their mindset.

This is the way in which Manudharma and Sanatandharma preaches. Why they call it Sanatandharma? Because it is infallible, as they call it. It is just like indelible, infallible and it is existing for ever. Because of this, the Indian Hinduism went into disintegration of harmonising relations of mankind.

Sir, who am I? Who is Shri Ajit Jogi? Who is Shri Raghubans Prasad Singh? We belong to the socalled Shudra community. My blood gets boiled. Who are they to call us Shudras? Who are the upper castes to call us Shudras? Are we sons of prostitutes? The socalled Manudharma calls us as sons of prostitutes.

Sir, will you tolerate all these things? Will anybody in this civilised country who preaches civilisation tolerate all these things? These things have not been accounted for decades together. My Party, which is the self-respect movement, envisages and preaches self-respect for the past 82 years. We fought, we are fighting and we will fight to the end of it till such time the so-called sutra community, the panjama community gets a social freedom.

Sir, economic freedom is not a must; political freedom is not a must but social freedom is a must. That is why, Dr. Kalaingar Karunanidhi, the Chief Minister of Tamil Nadu preaches, acts day in and day out accordingly.

For the information of the august House, I would like to inform that he brought a Scheduled Caste girl; his son got married to a Scheduled Caste girl; he preaches and practises. While he was in the Opposition in the 1950s, the Scheduled Caste labourers, agrarian labourers were fighting for their rights at Nangavaram near Tiruchi. At that time, as a Member of the Legislative Assembly in Tamil Nadu, he went and led the procession, agitated and restored the rights for the Scheduled Caste agrarians. When he came to power in Tamil Nadu, there were a lot of performances.

It is good to narrate all these things for the benefit of this august House. He recommended Shri Varadharajan, when he was the Chief Minister of Tamil Nadu, to be posted as the Justice of Chennai High Court. Afterwards, he had been elevated to the level of the Justice of the Supreme Court. Sir, Dr. Karunanidhi was instrumental in setting up Dr. Ambedkar Arts College at Chennai. During his period only, Dr. Ambedkar Law College was established. Sir, a Law University was established and it was inaugurated by no less a person than the hon. President of India. We were very much proud of it.

Sir, when the agitation in Mumbai was launched on the issue of Marathwada University and that the University should be named after Dr. Ambedkar, a specific movement was launched in Tamil Nadu. Dr. Kalaingar Karunanidhi conducted rallies. He instructed all the men and women of Tamil people to send telegrams to the Governor of Maharashtra to see that the renaming had been done in the name of Dr. Ambedkar. That had been carried out by the present Governor, Dr. Alexander.

Now, Shri Murugaraj, IAS is in the sensitive position. He is in the foremost position. He had been posted as the Chairman of the Tamil Nadu Public Service Commission. Shri Muthusamy, IAS is the Chief Secretary of Tamil Nadu. Shri Kalimuthu, IPS is the Commissioner of City Police, Chennai. Shri Kolappan, IAS is the Commissioner of the City Corporation, Chennai. The Secretary to Labour is Shri Elangovan, IAS. The Commissioner of Labour is Shri Ramaiah, IAS. These are all the various most important and sensitive positions, wherein we want Scheduled Caste and Scheduled Tribe community should have its due share in the administration.

Sir, an innovative scheme has been launched by the Hon'ble Chief Minister some months back to see that the Schedule Castes, the Scheduled Tribes, Other Backward Class and Forward Class people as to cultivate them how to live together. He has launched "Samathuvapuram villages", secular townships throughout the State of Tamil Nadu. (Interruptions). More than hundred such townships are being established in the State of Tamil Nadu. In fact, for your information, I am very glad to express my profound feelings. Even the so-called brahmin community in the district of Vellore have applied and got a place in "Samathuvapuram village". So, forward class, backward class, Scheduled Castes and Scheduled Tribes and all sections of the society live together. This scheme is getting a lot of appreciation from various sections of our people. To create a social awareness, to educate the people how to live harmoniously, this is a better scheme which was launched by our Chief Minister, Dr. Kalaignar Karunanidhi.

Sir, before I conclude, I will be failing in my duty if I do not remind this august House that in 1920, Thanthai Periyar, Shri E.V. Ramasamy had launched an agitation in Vaola, Vo;;age pf Kerala, not in Tamil Nadu, when an educated boy crossed the road where upper caste people were living. he was stopped and beaten. At that time, a lot of agitation took place in Kerala. Then, Thanthai Periyar, Shri E.V. Ramasamy went there. He led the procession. He agitated and won. The D.M.K. is fighting for the sake of oppressed and suppressed class as well as for the particular section of the people. It was fighting, it is fighting and it will always fight to see that our people, the Scheduled Caste and Scheduled Tribe communities, live in peace and in harmonious relationship with other people.

> श्री अजीत जोगी : अध्यक्ष महोदय, सबसे पहले मैं आपको व्यकितगत रूप से धन्यवाद देता हूं कि एक ऐसे अहम मसले पर आपने चर्चा की अनुमति दी है जो है तो बहुत महत्वपूर्ण, पर जिस पर हम लोग इस सदन में बहुत कम चर्चा करते हैं। मैं अपनी बात प्रारंभ करने से पहले गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, जो बड़े भविष्यदृष्टा थे, की कविता की इन पंकितयों की तरफ सदन का ध्यान आकर्िषत करना चाहता हूं। उन्होंने कहा था-- "हे मोर दुर्भागा देश, जादेर करेछो अपमान। अपमाने होते होबे तहा देर सबार समान। जारे तुमीं निचे फेलो, से तुमारे बन्िधवे नीचे, पश्चाते रेखेछो जारे। से तुमारे पश्चाते यनिद्दे। उन्होंने कहा कि जिसका तुम अपमान आज कर रहे हो, समय ऐसा आएगा कि तुमको उससे अपमानित होना पड़ेगा, इसलिए उसका अपमान मत करो।

14.00 hrs. जिसको आज तुम पीछे ढकेल रहे हो, ऐसा समय आयेगा कि वह तुम्हें पीछे ढकेलेगा। जिसको आज तुम नीचे फेंक रहे हो, अगर तुम उसे नीचे फेंकना बंद नहीं करोगे तो ऐसा समय आयेगा कि वह तुम्हें नीचे फेंकेगा। इसलिए इस समाज को इस व्यवस्था को बदलो। किसी को अपने से ऊंचा, किसी को नीचा मत मानो। सबको एक जैसा मानकर इस समाज में ऐसी व्यवस्था बनाओ ताकि सबको समान अवसर मिले। सब एक साथ एक जैसे जी सकें। कविवर रविन्द्र नाथ भविष्यदृष्टा थे इसीलिये मैंने कविवर रविन्द्र नाथ टैगोर की बात की। इसी तरह महात्मा गांधी ने जब आजादी का आंदोलन चलाया तो केवल अंग्रेजों को इस देश से भगाने की बात नहीं थी। उन्होंने ठहरिजन" में लिखा -

"Freedom would not be complete till the curse of untouchability is erased from the face of India." आजादी का कोई मतलब नहीं होगा जब तक हम अस्प्ृाश्यता को, छुआछूत ,को इस देश से खत्म नहीं करेंगे। यही बात प्रात:स्मरणीय, पूजनीय डा.बाबा साहेब अम्बेडकर ने कही, जिन्होंने संविधान बनाया। संविधान को बनाते समय उन्होंने बड़े वशिष्ट प्रावधान किये। पूरा पार्ट ३ ऑफ दि कांस्टीटयूशन, पूरा पार्ट १६ ऑफ दि कांस्टीटयूशन में तीन-चार अनुच्छेद जो एंगो-इंडियन्स से संबंधित हैं, उनको छोड़ दीजिए तो बाकी सारे के सारे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को संरक्षण देने के लिए, उनको आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने प्रावधान किये और हम इस बात पर फक़ कर सकते हैं कि दुनिया में भारत का ही एक ऐसा संविधान है जो अफर्मेटिव एकशन की बात करता है। जो लोग हजारों साल से पीछे रह गये हैं, उनको आगे बढ़ाने के लिए संविधान में सकारात्मक प्रावधान हैं। अध्यक्ष महोदय, सौ मीटर की रेस हो रही है, जिसमें कार्ल लुइस, बेन जॉनसन और मिचेल जैसे धावक दौड़ें और एक ऐसा व्यकित भी दौड़े जिसका एक पैर कटा हुआ है, वह कैसे उनकी बराबरी पर आयेगा। जिनको आपने पांच हजार साल से, दस हजार साल से पढ़ने नहीं दिया, जिनके लिए यह कहा गया कि अगर यह पढ़ेगा तो इसके कान में सीसा घोलकर डाल देना। ऐसा व्यकित उनकी बराबरी पर कैसे आयेगा, जब तक उनको इन सभी प्रावधानों को सामने लाकर आगे बढ़ने का मौका न दिया जाए। इसलिए बाबा साहेब अम्बेडकर और संविधान संसद के उनके तमाम साथियों ने जिन्होंने हमारा संविधान बनाया, ये सारे प्रावधान कर दिये। पार्ट ३ ऑफ दि कांस्टीटयूशन, पार्ट १६ ऑफ दि कांस्टीटयूशन के सारे अनुच्छेदों में यह बात कही गई कि अफर्मेटिव एकशन होगा। परंतु दुख इस बात का है कि जब आज हम आजादी की लड़ाई की महात्मा गांधी की उस भावना को समझते हैं, आज जब हम कविवर रविन्द्र नाथ टैगोर की इन चार पंकितयों में पूरे देश को दी गई चेतावनी देखते हैं, आज जब हम संविधान को पढ़कर देखते हैं तो ५० साल के बाद भी हमने अपने समाज में समरसता, समानता और एक जैसे अवसर उतपन्न नहीं किये हैं। इसीलिए आवश्यक है कि जो एस.सी./एस.टी. आयुकत की रिपोर्ट है, उस पर चर्चा जरूर की जाए। अनुसूचित जाति के संबंध में आयुकत ने अपनी रिपोर्ट में कई बातों का उल्लेख किया है। अध्यक्ष महोदय, आरक्षण को लेकर आज एक बात इस देश में बहुत की जा रही है। लोग कहते हैं कि आरक्षण प्रारम्भ में १० साल के लिए दिया गया था, लेकिन हम उसे आगे बढ़ाते गये, अब ५० साल हो गये हैं, अब इसकी कया जरूरत है। आयुकत ने आरक्षण के आंकड़े दिये हैं, लेकिन मैं इनको पढ़ना नहीं चाहता, मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लेना चाहता। आप आरक्षण के आंकड़े देखिये, मैं आपके माध्यम से पूरे सदन तथा देश को बताना चाहता हूं कि ५० साल तक आरक्षण देने के बाद आज अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की कया स्िथति है। वर्ग-ए यानी जो कलास -१ की सर्िवसेज में केन्द्रीय और राज्यों के स्तर पर हम कहां पहुंचे हुए हैं। हमारा लक्षय है कि १५ प्रतिशत अनूसूचित जातियों के लोगों को और साढ़े सात प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के लोगों को सेवाओं में आरक्षण दिया जायेगा। लेकिन इतना सब ढिंढोरा पीटने के बाद भी वर्ग - ए में अनुसूचित जातियों के लोग आज ८ प्रतिशत है, जबकि लक्षय १५ प्रतिशत रखा गया था। अनुसूचित जनजातियों के लोंगों का प्रतिशत ३ से ४ भी नहीं है जबकि लक्षय ६.५ऽ रखा गया है। अध्यक्ष महोदय, आज स्िथति यह है कि हम इस स्तर पर रुके हुए हैं। यह बात मैं इसलिए कहता हूं कि मैं इस वर्ग का हूं। हमारे लोग आरक्षण लेने के लिए कोई भीख नहीं मांगते हैं, यह हमारा अधिकार है। इसलिए हम कहते हैं कि यदिं हमें योग्य बना दिया जाए, तो हम आरक्षण कभी नहीं मांगेंगे। अपना उदाहरण नहीं देना चाहिए, लेकिन चूंकि बात चली है इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि मुझे ईश्वर ने ऐसे घर में पैदा किया जो पढ़ा-लिखा परिवार है और मेरी शिक्षा की अच्छी व्यवस्था थी। मैं भी पढ़ाई में अच्छा रहा। मैं आई.पी.एस. में आया, मैं आई.ए.एस में आया पर मैंने कभी आरक्षण का लाभ नहीं लिया। मैंने साफ कहा कि मैंने दूसरों के मुकाबले अच्छी शिक्षा प्राप्त की है। इसलिए मुझे आरक्षण की आवश्यकता नहीं है और मैंने कभी आरक्षण का लाभ नहीं लिया, लेकिन देश के करोड़ों मेरे भाई ऐसे हैं जो अनुसूचित जाति और जनजाति के हैं और जिनको अच्छी पढ़ाई की सुविधा नहीं मिली, जिन्हें हजारों वषर्ों तक दबाकर रखा गया, उनके लिए आरक्षण आवश्यक है। वे सब यह कहने के लिए तैयार हैं कि आप हमें दूसरे के समकक्ष ला दीजिए, हम आरक्षण का लाभ बिलकुल नहीं लेंगे। पर आप उनके समकक्ष लाइए तो। जब तक उनको सुविधा नहीं दी जाएगी तब तक वे आगे कैसे बढ़ेंगे? मेरा लड़का अगर दून स्कूल में पढ़ता है और मेरे एक दूसरे आदिवासी भाई का लड़का, जैसे लरंग सहाय जी, सरगुजा में बैठे हुए हैं, बली राम कश्यप जी बस्तर के हैं, अगर उनका लड़का बस्तर के कौंटा में किसी स्कूल में पढ़ रहा है जहां ब्लैक बोर्ड भी नहीं है, जहां एक शिक्षक है और बच्चे बहुत हैं, तो वह कैसे दून स्कूल में पढ़ने वाले की बराबरी कर पाएगा? मैं अभी देखकर आया हूं एक शाला में एक शिक्षक है और १३५ बच्चे हैं। उस बच्चे से यदि आप दून स्कूल, लारेंस स्कूल या ऋषि वैली में पढ़ने वाले बच्चे की बराबरी करेंगे, जहां एक बच्चे के ऊपर पांच-पांच शिक्षक बैठे हैं, उन दोनों की तुलना कैसे हो सकती है। इसीलिए मैं कह रहा था कि कार्ल लुईस को भी आप १०० मीटर की रेस में दौड़ा रहे हैं और एक लंगड़े व्यकित को भी दौड़ा रहे हैं और कह रहे हैं कि उसकी बराबरी कर लो। यह बराबरी कैसे होगी। इसलिए जो लोग आरक्षण का विरोध करना चाहते हैं, उनका वैसा करना ठीक नहीं है। चूंकि यह आवाज बहुत उठी है इसलिए मैं कह रहा हूं कि यह आरक्षण हम भीख के रूप में नहीं मांग रहे हैं बल्िक अपने अधिकार के रूप में मांग रहे हैं। अगर आप नहीं देंगे, इन तमाम लोगों को अगर आप अपने समकक्ष नहीं लाएंगे, तो क़ान्ित होने से, इन्कलाब होने से, खून खराबा होने से, समाज को रोक कैसे सकेंगे? मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि इस तरह की बातें न की जाएं जिससे ये वर्ग यह महसूस करें कि आप हमें अपने आप में आत्मसात नहीं करना चाहते हैं। मैं बड़ी वेदना के साथ कहता हूं कि हमारे वर्ग को आज यह महसूस होता है कि इस देश में दूसरे लोग हमें अपने आप में आत्मसात नहीं करना चाहते हैं। हमको बराबरी का अवसर नहीं देना चाहते हैं। हमको अपने बराबर खड़ा नहीं होने देना चाहते हैं। इसलिए अगर बस्तर में, मंडला में, राजनांदगांव में, आन्ध्रप्रदेश में या महाराष्ट्र में नकसलवाद पनप रहा है, तो उसका कारण है। सहने की एक क्षमता होती है और जब सहनशीलता की वह सीमा लांघ दी जाती है, सहनशीलता समाप्त हो जाती है, तो हमारे लोगों ने हथियार उठा लिए हैं। अगर आप चाहते हैं कि देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रहे, आप चाहते हैं कि भारत मां का स्वरूप एक रहे, तो जिस बात को लेकर महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई लड़ी, जिस बात को लेकर बाबा साहब अंबेडकर ने यह संविधान बनाया, उसको पाने के लिए हम आगे कयों नहीं बढ़ते? मैं यह बात किसी दल की तरफ से नहीं कहना चाहता हूं कयोंकि हम सब कांच के मकान में रह रहे हैं। हमें एक दूसरे पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के भूतपूर्व आयुकत ने अपनी रिपोर्ट जिस पर आज यहां बहस हो रही है, उसमें स्वयं लिखा है कि जब तक सोशल आर्डर चेंज नहीं होगा, जब तब हमारा सामाजिक स्टेटस नहीं बदलेगा, जब तक समाज में परिवर्तन नहीं आएगा। तब तक हम आगे नहीं बढ़ सकेंगे। अध्यक्ष महोदय, ऊंच-नीच की बात कही गई है। जन्म से कोई ऊंच-नीच नहीं होता है। सब लोग धर्म की बात करते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने उपदेश देकर कहा है, उसको कयों नहीं मानते? भगवान कृष्ण ने गीता के १३ वें अध्याय के चौथे श्लोक में कहा है- "चातुर्वर्णा मया स्ृाष्टा, गुणकर्म विभागश: तस्य कर्तारमपि माम् विन्धय ण्यवम भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि चारों वणर्ों की स्ृाष्िट मैंने गुण, और कर्म के आधार पर की है, जन्म के आधार पर नहीं की है। फिर इसको इस देश में नहित स्वाथर्ों ने जन्म के आधार पर कयों बना दिया? यदि गुण और कमर्ों के आधार पर इनकी रचना हुई है, जैसा भगवान कृष्ण ने स्वत: कहा है, तो फिर हम उसको कयों नहीं मानते? फिर ये असमान अवसर लोगों को कयों देते हैं? फिर यह कयों कहते हैं कि जन्म से तू ऊंचा है और तू नीचा है? ऐसी बात हमारे बीच में कयों आती है? महोदय, इतना सब कुछ होने के बाद आज भी मैं अपने अनुसूचित जाति के भाइयों की तरफ से इस देश को अवगत कराना चाहता हूं कि अस्प्ृाष्यता की इतनी बात कहने और देश में अस्प्ृाष्यता खत्म होने के बावजूद देश में न जाने कितने गांव ऐसे हैं, बल्िक मैं यह कहूं कि अधिकांश गांव ऐसे हैं, तो कोई अतिशयोकित नहीं होगी जहां आज भी हमारा भाई शादी के समय घोड़े पर बैठकर नहीं चल सकता। आज भी बहुत से कुएं ऐसे हैं जिसमें हम जाकर पानी नहीं पी सकते। आज भी यह व्यवस्था हमारे गांव में है। जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक समाज एक कैसे होगा? इसको एक करने के लिए, अस्प्ृाष्यता का निवारण करने के लिए मैं केवल यह निवेदन करना चाहता हूं कि यह तमाम कानूनों से संभव नहीं होगा।
1410 hrs. (Shri Basu Deb Acharia in the Chair) मैं सरकार से, मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि एक बात जो आजादी के प्रारम्िभक वषर्ों में चली थी, अब बंद हो गयी है। अस्प्ृाश्यता का, छुआछूत का अगर निवारण करना है, तो वह सरकारी कार्यक़मों के माध्यम से नहीं होगा। जब तक आप ऐसी अशासकीय मानसेवी संस्थाओं को प्रोत्साहन नहीं देंगे, उनको पुरस्कृत नहीं करेंगे जो इस दिशा में आंदोलन चलाती हैं, काम करती हैं, जब तक उनका रिकोग्नेशन नहीं होगा तब तक इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। मैं आरक्षण की बात कर रहा था। इस बारे में एक उदाहरण देना चाहता हूं कि किस तरह से यह व्यवस्था हमारे खिलाफ काम करती जा रही है। जब सवर्ोच्च न्यायालय का यह फैसला आया क There should be no reservation in promotions. तब हम सब लोग चौंके। वैसे ही हम इतने पीछे हैं। अगर आप पदोन्नति में आरक्षण नहीं देंगे तो हमारे आदमी कभी ऊंचे पदों पर नहीं पहुंचेंगे। इस सदन ने एक मत होकर, तब मैं राज्य सभा में था, राज्य सभा तथा लोक सभा में भी एक मत हुआ और हमने संविधान का ७७वां संशोधन पास किया। हमने यह कहा कि चाहे सवर्ोच्च न्यायलय ने जिन परस्िथतियों में, फैसला दिया था जहां अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग पक्षधर ही नहीं थे, मंडल कमीशन पर सवर्ोच्च न्यायलय की तरफ से ठआब्िटर डिकटा" के रूप में फैसला दे रहे थे, जो कि मुख्य विषय नहीं था। उसके बारे में केवल एक आब्जर्वेशन दे दिया गया कि पदोन्नति में आरक्षण नहीं होना चाहिए। हम लोगों ने ७७ वां अमैंडमेंट पारित किया और कहा कि यह नहीं चलेगा पदोन्नति में भी आरक्षण देना पड़ेगा। उसके बाद से हम सब जितने भी अनुसूचित जाति और जनजाति के संसद सदस्य हैं, हमने तीन प्रधानमंत्रियों को पांच जी.ओस. का रेफरैंस देकर लिखा। मंत्री जी को भी बताया कि ७७वें अमैंडमेंट के रूप में हम जो लोगों को देना चाहते थे, वह आपकी कार्यपालिका ने ये गवर्नमैंट आर्डर पारित करके वापिस ले लिया है। वह उल्टा हो गया है। अब इस तरह के गवर्नमैंट आर्डर पास हो गये हैं। यहां पर समय कम हैं, नहीं तो मैं सब जी. ओस. को पढ़ सकता था। इन पांच जी.ओस. के रहते पदोन्नति में कभी आरक्षण नहीं मिलेगा। हम बार-बार कह रहे हैं परन्तु जो नहित स्वार्थ हैं, मैं किसी पर अंगुली नहीं उठाना चाहता परन्तु जो नहित स्वार्थ हैं, जो नहीं चाहते कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आगो बढ़े, उसके बारे में हमने सदनमें, जो कि इस देश की सवर्ोच्च पंचायत है, दोनों सदनों ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण होना चाहिए। इस बारे में लगातार पांच ऐसे गवर्नमैंट आर्डर पारित हुए हैं जिसकी तरफ आपका भी ध्यान बार-बार आकर्िषत किया गया है। हमने लगातार तीन प्रधानमंत्रियों को लिखा है। आदरणीय श्री देवेगौडा जी के पास हम सवा सौ सांसद गये। आदरणीय श्री गुजराल साहब के पास हम सवा सौ सांसद गये। ये सब एक पार्टी के नहीं थे बल्िक सब पार्िटयों के थे। आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के पास भी हम सब गये। हमने उनसे कहा कि सदन इन वगर्ों को जो कुछ देना चाहता है, वह आपके अधिकारी वापिस ले रहे हैं। आप इसके लिए कुछ करिये परन्तु मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज तक हम इस दिशा में कुछ नहीं कर पाये हैं। वह पांच गवर्नमैंट आर्डर अभी तक यथावत हैं। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जब तक यह गवर्नमैंट आर्डर विदड़ा नहीं किये जायेंगे तब तक हमारे लोगों के पदोन्नति में आरक्षण नहीं मिलेगा। हमारे लोग ऊपर नहीं बढ़ पायेंगे। मैं कयों कहता हूं कि सरकारी नौकरी में आरक्षण होना चाहिए? अगर आपने सरकारी नौकरी में आरक्षण दिया है, तो पूरे देश में कितने लोगों को फायदा होता है। बहुत लोगों को फायदा नहीं होता परन्तु इससे एक भावना बनती है। मैं अपना उदाहरण देकर कह सकता हूं कि जब तक मैं आई.ए.एस. में नहीं आया था, आई.पी.एस. में नहीं आया था तब तक गांव में मेरे और मेरे परिवार को किस दृष्िट से देखा जाता था और जिस दिन मैं आई.पी.एस. आफिसर बन गया, आई.ए.एस. बन गया तो उस दिन मुझे और मेरे परिवार को उसी गांव में कैसे देखे जाने लगा, इसमें जमीन आसमान का अंतर हो गया। केवल एक सेवा में आने के बाद इतना बड़ा अंतर आ गया। इसलिए मैं कह रहा हूं कि अच्छी सरकारी नौकरी इस देश में आत्म-सम्मान का प्रतीक बन गयी है। यदि आप हमारे वर्ग के लोगों को सरकारी सेवा में उच्च पदों पर नहीं बिठाएंगे तो उनमें जो अत्म-सम्मान आना चाहिए, वह नहीं आएगा इसलिए हम कह रहे हैं कि यह दीजिए। इससे बहुत ज्यादा लोगों को फायदा नहीं होगा, करोड़ों लोगों में से मुश्िकल से हजार लोग इसमें फायदा उठाएंगे पर उन हजार लोगों के माध्यम से हम अपना आत्म-सम्मान वापिस करते हैं। इसलिए हम कह रहे हैं कि हमें यह अधिकार के रूप में दिया जाना चाहिए। जो आरक्षण का विरोध करते हैं, वे योग्यता की बात करते हैं। वे कहते हैं कि अगर आरक्षण देते रहेंगे तो योग्य लोग नहीं आएंगे, योग्य लोग पीछे हट जाएंगे। मैं अपने दूसरे भाइयों से बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूं कि योग्यता किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं है। अगर आप बहुत योग्य थे, तो मैं अपने अन्य साथियों से यह प्रश्न पूछूं, देश का इतिहास पांच हजार साल का लिखा गया है, पांच हजार साल में से हम साढ़े चार हजार साल तक गुलाम रहे जबकि इस पांच हजार सालों में देश की पूरी व्यवस्था आपके हाथ में रही, हम तो उसमें शूद्र बनकर केवल आपकी सेवा करते रहे। अगर आप इतने योग्य लोग थे, अगर आप सरकार को, समाज को इतनी योग्यता से चला रहे थे तो पांच हजार साल के इतिहास में अधिकांश समय हम गुलाम कयों रहे और किन लोगों के हाथ में गुलाम बने, कोई बहुत ताकतवर आदमी के हाथों गुलाम नहीं बने, मोहम्मद बिन कासिम दस हजार सैनिक लेकर आ गया, दस हजार सैनिक लेकर बाबर आ गया, रौंदता चला गया, मोहम्मद गौरी दस हजार सैनिक लेकर आ गया, पंजाब से घुसा, सोमनाथ तक रौंदता चला गया। यह विशाल देश दस हजार लोगों को नहीं रोक पाया, उनके हाथों गुलाम बन गया, जहां मर्जी पड़ी लूटकर चले गए, अंग्रेज तो यहां व्यापारी बनकर आया फिर भी हमें गुलाम बना लिया। इसे गंभीरता से सोचिए। यदि आप योग्य लोगों के हाथ में देश की व्यवस्था थी तो कैसे दस हजार आदमी आपको रौंदकर चले गए। योग्यता केवल आपका एकाधिकार नहीं है, यह मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहता हूं। आपसे यह निवेदन करना चाहता हूं कि ऐसा कयों संभव हुआ, इसे गंभीरता से सोचिए। यह केवल इसलिए संभव हुआ कयोंकि आपने इस देश की सत्ता से, इस देश के अधिकार से, इस देश के ९० प्रतिशत लोगों को वंचित रखा। उन ९० प्रतिशत लोगों को फर्क नहीं पड़ता कि दिल्ली में राज्य पर कौन बैठा है, लखनऊ में कौन बैठा है, भोपाल में कौन बैठा है, चंडीगढ़ में कौन बैठा है, सौ में से नब्बे लोगों को फर्क नहीं पड़ता, इसलिए उन्होंने कहा कि यह दस हजार लोगों को लेकर आया है, रौदकर चला जाए, कुछ कर ले, हमको कया फर्क पड़ता है। जिस दिन आप सत्ता में सबको समाविष्ट कर लेंगे, जिस दिन आप सत्ता में सबकी सहभागिता कर लेंगे, उस दिन इस देश को कोई गुलाम नहीं बना सकेगा। अगर आप इस देश के ९० प्रतिशत लोगों को सत्ता की सहभागिता से, सत्ता की भागीदारी से बाहर रखेंगे तो यह देश पहले भी गुलाम बना था और भगवान न करे आगे भी गुलाम बनेगा। इसलिए मैं कह रहा हूं किसबको समकक्ष लाने के लिए हम सबको एक होकर, पार्टी की दीवारों से ऊपर उठकर इस बारे में वातावरण बनाना पड़ेगा, समाज बनाना पड़ेगा।
... (व्यवधान) श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज): दूसरे के हक को समाप्त करेंगे। श्री अजीत जोगी : दूसरे का हक बिल्कुल समाप्त नहीं होना चाहिए, सबको समान हक मिलना चाहिए, पर पांच हजार साल से एक वर्ग को इस तरह दबाकर रखा जाए, यह भी नहीं होना चाहिए। यही मानसिकता हमको बदलनी पड़ेगी। अगर हमको और हमारे पूर्वजों की बराबरी का अवसर मिला होता, हमको आपके जैसा अवसर मिला होता तो हम किसी भी चीज की मांग नहीं करते। मैंने अपना उदाहरण देकर कहा, बार-बार दोहराना नहीं चाहता, नहीं तो कहेंगे कि अपनी गवर्ोकित कर रहे हैं। जब मैं आई.ए.एस. में आया तो मैंने आरक्षण का लाभ नहीं लिया, मैंने आई.पी.एस. में आने के लिए आरक्षण का लाभ नहीं लिया, यू.पी.एस.सी. के फार्म में लिख दिया था कि मैं आदिवासी हूं लेकिन मैं इस वर्ग से नहीं आना चाहता, मैं जनरल कैटेगरी से आना चाहता हूं कयोंकि मैं अच्छी शालाओं में पढ़ा, अच्छे कॉलेज में पढ़ा। वैसा ही अवसर मेरे अन्य भाइयों को दे दीजिए, उसी तरह से उनको भी पढ़ा दीजिए, उसी तरह से उनको भी ले आइए, वे भी यह कह देंगे कि हमको आरक्षण नहीं चाहिए। लेकिन जब तक आप समान अवसर नहीं देंगे, आज भी १३५ बच्चों को एक शिक्षक पढ़ा रहा है, मैं इस चुनाव में देखकर आया हूं। अगर यह चलता रहेगा तो वे बराबरी पर कैसे आएंगे।
... (व्यवधान) श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल) : पांच सौ विद्यार्िथयों पर एक टीचर है, यह उदाहरण है।
... (व्यवधान) श्री प्रभुनाथ सिंह : इसके लिए कौन दोषी है।
... (व्यवधान) श्री शैलेन्द्र कुमार :इसके लिए तो गलती हुई लेकिन आप उसे सुधारिए, आप सत्ता में हैं।
... (व्यवधान) सभापति महोदय : शैलेन्द्र जी, ठीक है। श्री अजीत जोगी : महोदय, मैं आज केवल कांग्रेस पार्टी की तरफ से नहीं बोल रहा हूं, यह विषय ऐसा है, जिस पर हम एक सर्वानुमति बनाकर बोलें। यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का विषय किसी एक दल का विषय नहीं है, नहीं तो हम जहां थे, वहीं रहे और रह जाएंगे। फिर इस समाज के लोंगों को नकसलवादी बनने से, देश में बिखराव आने से, अलगाव आने से और देश को टूट जाने से कोई नहीं रोक पाएगा। अगर हम चाहते हैं कि समाज एक रहे, समरसता रहे, समानता रहे, समान अवसर रहें तो हमको इन मौलिक प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार करना पड़ेगा, यह मैं निवेदन कर रहा हूं। कांग्रेस ने कया किया, भारतीय जनता पार्टी ने कया किया, ऐसे भाषण तो हम बहुत देते हैं, अभी इसी चुनाव में हम भाषण देकर जीतकर भी आये हैं, गहलोत जी। आदिवासियों के बारे में एक-दो बातों की ओर आपके माध्यम से मंत्री जी का ध्यान आकर्िषत करना चाहता हूं। आदिवासियों की परस्िथति अनुसूचित जाति के भाईयों की परस्िथति से सर्वथा भिन्न है। हम लोगों पर छुआछूत का कोई असर नहीं, कयोंकि हम लोग जहां रहते हैं, वहां ९०-९५ परसेंट हम ही लोग हैं, दूसरे लोग नहीं हैं। हम जंगल में रहते हैं, वहां हमारे ऊपर छुआछूत का असर नहीं पड़ता है। हमारी समस्याएं बिल्कुल भिन्न हैं और उन भिन्न समस्याओं की तरफ मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्िषत करना चाहता हूं। हमको आप और कुछ मत दीजिए, अगर आदिवासियों को केवल तीन चीजें आप दे देंगे, हम हमेशा कहते हैं, जल, जंगल और जमीन, तीन चीजों पर हमारा अधिकार है। हमें बताया जाता है कि हमारे पूर्वज पहले मैदानी इलाकों में खेती किया करते थे। हमें बताया जाता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता के समय हमारे पूर्वज यहां के मैदानों में बसा करते थे। दूसरे लोग आये, उन्होंने हमको पीछे हटा दिया, हमको हटाते-हटाते दक्षिण में ढकेल दिया । हम मध्य में चले गये। वहां से भी हटा दिया, अब हटते-हटते हम लोग जंगल में पहुंच गये हैं। जंगल में भी आप अपने कल-कारखाने बनाते हुए, बांध बनाते हुए, परियोजना बनाते हुए हमको आगे धकेल रहे हैं। अब हम पहाड़ों की ऊंचाई पर पहुंच गये हैं, अब इससे ऊपर धकेलोगे तो हमारे लिए और कोई जगह नहीं है। इसलिए मेरा निवेदन है कि आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के बारे में जो हम हमेशा से संघर्ष करते रहे हैं, उस बारे में आपको गम्भीरता से ध्यान देना पड़ेगा। कमिश्नर ने अपनी किताब में, अपनी रिपोर्ट में ठलैंड एलीनेशन" के आंकड़े दिये हैं, जो जमीन हमारे पूर्वजों के जमाने से हमारी थी, जिसको दूसरे लोगों ने एक बोतल देशी शराब की देकर या एक मुर्गा देकर या एक बकरा देकर खेत के खेत लिखा लिये, गांव के गांव लिखा लिये, वे हमको कैसे वापस मिलें, इसकी ओर आपको गम्भीरता से विचार करना पड़ेगा। मैं आपको अपना एक छोटा सा अनुभव बताऊं। मैं बहुत दिनों बाद एक गांव गया। वहां के मालगुजार के पुत्र मेरे साथ पढ़ते थे, आदिवासी थे, मेरे समाज के थे। मैंने इच्छा प्रकट की कि उनसे मिलने जाऊं। मैं गया तो मालगुजार की जो बहुत-बड़ी कोठी थी, वह टूटी हुई थी। एक छोटा सा कमरा था, मैं बाहर खड़ा रहा, मैंने कहा कि उनको बुला दीजिए। दयाल सिंह उनका नाम था, आप दयाल सिंह को बुलाइये, मैं उनसे मिलना चाहता हूं, वे मेरे साथ स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन किसी ने उनको नहीं बुलाया तो मैं बहुत देर तक खड़ा रहा। मैं अपनी गाड़ी लेकर गया था, फिर मैं उनको ढूंढते हुए खुद ही अन्दर चला गया। मैंने देखा कि एक व्यकित जो बहुत कमजोर सा था वह मुझे देखकर भागने लगा, वह मुझसे मिलना नहीं चाहता था। मैंने दौड़कर उसको पकड़ा और उससे बातचीत की। उसके मुंह से देसी शराब की महक आ रही थी। मैंने गांव वालों से पूछा कि ये तो २००-२५० एकड़ के मालिक थे, इनकी यह हालत कैसे हो गयी? इनकी पत्नी, इनके बच्चे कहां हैं? लोगों ने मुझे बताया कि इनकी पत्नी दैनिक मजदूरी कमाने के लिए जाती है और जो दैनिक मजदूरी लोक निर्माण विभाग से मिलती है, उससे अपने पति का और अपने एक लड़के का खर्चा चला रही है। मैंने पूछा कि वह जो गांव की २००-२५० एकड़ जमीन इनकी मालगुजारी की थी, उसका कया हुआ तो लोगों ने बताया कि इनको शराब की लत लग गई, ये देसी शराब पीने लगे। लोग इनको शराब पिलाते थे और जमीन लिखाते गये, लिखाते गये। यहां तक कि उनकी पूरी २५० एकड़ जमीन लिखा ली गई। जिस दिन मैं वहां गया था, उनके पास एक एकड़ जमीन भी नहीं बची थी। उनको जो इतना बड़ा मकान था, वह भी गिर गया, उन्होंने वह भी बेच दिया, सब कुछ बेच दिया। हालत यह हो गई कि २५० एकड़ जमीन का किसान, २५० एकड़ जमीन के मालगुजार की पत्नी को दैनिक मजदूरी करनी पड़ रही थी। तब वह जाकर परिवार को पाल रही थी। सभापति महोदय : अब कंकलूड कीजिए। बहुत स्पीकर्स हैं।
MR. CHAIRMAN: Shri Jogi, please conclude now.
SHRI AJIT JOGI : Sir, I am the first speaker.
MR. CHAIRMAN: There are 24 speakers who want to speak on this subject and you have taken almost more than 40 minutes now.
SHRI AJIT JOGI : Sir, have I taken so much time?
MR. CHAIRMAN: Yes.
SHRI AJIT JOGI : Sir, then I will conclude now. मैंने यह उदाहरण इसलिए दिया कि ऐसे उदाहरण तमाम आदिवासी गांव में हैं। जो ढ़ाई सौ, तीन सौ एकड़ के मालिक थे, वे आज नरेनसहाय जी बताएंगे और भी हमारे साथी बताएंगे कि उनके पास एक इंच जमीन भी नहीं बची है। कानून बन गया है कि उनकी जमीन उन्हें वापस दिलाई जाए। मध्य प्रदेश में १७० ठख" नाम का एक कानून बनाया गया है कि उनकी जमीन वापस दिलाई जाए परंतु कोई जमीन वापस नहीं हो रही है। मेरा आपसे निवेदन है कि ऐसे कानून जो आदिवासियों की जमीन पिछले चालीस-पचास वषर्ों में उनसे छीन ली गई है, इसके लिए कानून बने हैं, उन कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाए और उनकी जमीन उन्हें वापस की जाए। जिन प्रदेशों में ऐसे कानून नहीं बने हैं, जैसे केरल में कानून नहीं बना है, वहां के आदिवासियों की जमीन वापस नहीं हो सकती है तो उन प्रदेशों की सरकारों को भारत सरकार निर्देश दे कि वे प्रदेश ऐसे कानून बनाएं। जंगल का पूरा अधिकार आप हमको नहीं दे सकते हैं। हमारे जो पूर्वज थे, उनको जंगल के पूरे अधिकार थे पर वे अब अधिकार आप हमें नहीं दे सकते, ऐसा मैं मानता हूं। जंगल में केवल लघु वन उपज ही आप हमें दे दीजिए तो हमें किसी के सामने जाना नहीं पड़ेगा। केवल उसकी पत्ती, फूल और फल हमें दे दीजिए। यह मैंने एक छोटा सा उदाहरण बताया। तेंदू पत्ता, जिससे बीड़ी बनाई जाती है, मेरे प्रदेश में तेंदू पत्ते का व्यापार व्यापारी लोग किया करते थे। मुझे उसका अध्यक्ष बनाया गया। आदरणीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने निर्देश दिया था कि इस व्यापार से बिचौलियों को हटाया जाए। मुझे उसका अध्यक्ष बनाया गया और मैंने एक नीति बनाई तथा मैंने यह कहा कि इसमें बिचौलिये नहीं रहेंगे। जो हमारी आदिवासी बहिनें पत्ता तोड़ती हैं, वे मजदूर नहीं रहेंगी, वे मालिक हो जाएंगी। पत्ते से जो भी आमदनी होती है, वह आमदनी उन्हें दी जाएगी। १९८८-८९ में मैंने अध्यक्ष के रूप में प्रदेश में यह व्यापार किया और आप सबको चौंकाने वाला एक तथ्य बता रहा हूं कि जब मैंने गणना की तो यह पाया कि तेंदू पत्ता तोड़ने वाली हमारी मां-बहनों को प्रति दिन ग्यारह रुपये मजदूरी मिलती है जबकि उनका पूरा परिवार मेहनत करता है। मेरे पास समय कम है अन्यथा विस्तार में मैं समझा सकता। दूसरी तरफ तेन्दू पत्ता के चालीस बड़े व्यापारियों की मैंने गणना की थी, जो एयर कंडिशंड कमरेया कार से बाहर नहीं जाते, केवल तेंदू पत्ता खरीदते और बेचते हैं। तेंदू पत्ता तोड़ने वाली हमारी मां और बहिनों को ग्यारह रुपये प्रतदिन मजदूरी मिलती है जबकि वे चालीस बडे व्यापारी तेरह लाख रुपए प्रति दिन कमाते हैं।
Rs. 13 lakh per day was the profit of each middlemen! कयोंकि केवल चालीस दिन का धंधा होता है। चार सौ करोड़ रुपये साल का मुनाफा होता है। हमने इन बिचौलियों को हटा कर उस साल पत्ता तोड़ने वाली आदिवासी बहिनों को चार सौ करोड़ रुपया बोनस के रूप में बांटा था। यह केवल एक उदाहरण तेंदू पत्ते का है। इसी तरह से साल का बीज, मोहलाइन, हर्रा, बहेड़ा और चिरौंजी व अन्य वनोपज होती है। चिरौंजी जिसे हमारा आदिवासी गांव में ६ रु. बेचेगा और जहां मेवा बनती है, वहां १५० रु. या २०० रु में बिकता है। केवल ६ रु. की चिरौंजी दो सौ रुपे किलो शहर में लाकर बेचते हैं। इतना बड़ा जो शोषण लघु वन उपज में हैं तो उसे हटाने के लिए मंत्री जी मेनका गांधी जी अगर कुछ करेंगी तो आदिवासी स्यमेव मालामाल हो जाएंगे। एक बात और जिसके लिए मैं संघर्ष करता रहा हूं और आपने सहयोग दिया है। जो हमारे इलाके में खदानें हैं, उनके बारे में है अभी हमारे इलाके देवभोग में हीरा निकल गया और यह बताया गया है कि दुनिया का सबसे सम्ृाद्ध हीर का वहां भंडार है। डी-बिअर्स नाम का एक मल्टी नेशनल कंपनी की उस पर निगाहें लगी हुई हैं पर हमने आंदोलन किये। रमेश बैस जी भी हमारे साथ हो गए थे। हम दोनों आंदोलन में साथ हो गए। हमने उस कंपनी को अभी तक हीरा खदान लेने नहीं दिया है। यह प्रकृति की कैसी विडम्बना है कि जहां पर हीरा पाया जा रहा है यहां रमेश बैस जी बैठे हैं, इनका इलाका है। मैं भी वहा रहा हूं, मैंने उस क्षेत्र की पांच दिनों की पदयात्रा की थी। मैंने सर्वेक्षण कराया कि उस इलाके में जो आदिवासी रहते हैं, उनमें गरीब कमार सबसे पिछड़े आदिवासी हैं। मैंने सर्वेक्षण कराया कि इनमें सबसे पढ़ा-लिखा कौन है तो पता चला कि पचास साल हमें आज़ादी मिले हुए हो गए और अभी तक उनमें केवल दो बच्चे ऐसे मिले जो दसवीं कलास पास थे। उन कमार आदिवासियों के इलाके में जमीन के नीचे हीरा मिला। अब उनको वहां से हटा दिया जाएगा और वहां हीरे की खदानें आएंगी। उससे १०,००० करोड़ रुपए हर साल मिलेंगे और आमदनी होगी लेकिन यह जो आदिवासी हैं, उनका कया होगा, इसकी किसी को चिन्ता नहीं है। आदिवासी इलाके में खदान बनती है, उद्योग बनता है, विद्युत की परियोजनाएं बनती हैं, अगर आप उन्हें विस्थापित करना चाहते हैं तो केवल लुभावनी विस्थापना योजनाओं से काम नहीं चल सकता, कहीं जमीन के बदले पैसा दे दिया, इस तरह आप नहीं लुभा सकते। मेरा कहना है कि आदिवासियों का यह अधिकार है, वे जिस जमीन पर रह रहे हैं अगर वहां आप अपना उद्योग लगा रहे हैं और उसके नीचे आपको हीरा, सोना या चांदी मिल रहा है तो हमें कुछ न कुछ प्रतिशत शेयर उस कम्पनी में से उनको देना चाहिए, उन्हें उसका भागीदार बनाना चाहिए। जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे तब तक स्िथति में सुधार नहीं आएगा। महोदय, मैं आपको बताता हूं कि किस तरह से विस्थापन का दुख होता है। मैं जब सीधी जिले में कलेकटर के रूप में पदस्थ था तो मेरे पास एक आदिवासी आया, जिसने मुझे तीन कागज दिखाए। वह बोला आप आदिवासी हैं इसलिए मैं आपको बता रहा हूं। उसने कहा कि मुझे तहसीलदारों ने तीन बार कागज दिये लेकिन मुझे मिला कुछ भी नहीं। मैंने उसको पढ़ा। सबसे पहले जब सन् १९५० के दशक में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर रिहन्द बांध बना था उसका गांव उसकी डूब में आया और उसे हटाया गया। तहसीलदार ने मुझे एक कागज दे दिया और कहा कि तुम्हें मुआवजा दिया जाएगा। वह चार-पांच बार उसके पास गया लेकिन मुआवजा नहीं मिला और वह अपने आप कहीं जंगल में जाकर बस गया। थोड़े दिनों बाद वह जहां दूसरी जगह जाकर बस गया था । वहां कोयला मिल गया और सिंगरौली कोयला खदान बन गई। उसके बाद उसे वहां से भी हटाया गया और फिर उसे एक कागज दे दिया गया कि तुम्हें इसका इतना मुआवजा दिया जाएगा, वह भी नहीं दिया गया । फिर वह बेचारा कहीं और जाकर बस गया। जहां मैं गया था, जहां सुपर थर्मल पावर स्टेशन बन रहा था वह वहां बसा हुआ था। मैंने कहा कि इस बार तुम्हें मुआवजा मिलेगा। वह अपने घर गया और मुझे वहां से तीन कागज लाकर दिखाए कि ये तीन कागज दिए हैं और कहा कि आप भी एक कागज मुझे देंगे तथा मिलेगा कुछ नहीं। इस तरह से आप एक के बाद एक आदिवासियों को पहली, दूसरी और तीसरी परियोजना के कारण विस्थापित करते जाते हैं और बदले में उन्हें कुछ भी नहीं मिलता है।
... (व्यवधान) महोदय, मैं केवल यह निवेदन करना चाहता हूं कि ये जो मौलिक बातें हैं उनकी तरफ हमें ध्यान देना चाहिए। अगर आदिवासियों को आगे बढ़ाना है तो उनके मौलिक अधिकारों को उन्हें वापस देना पड़ेगा। अगर दलिदों व अनुसूचित जातियों को सब के बराबर लाना है तो उनको बराबर के अवसर देने पड़ेंगे, जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे तब तक हम उन्हें आगे नहीं बढ़ा सकते। किसी ने बिलकुल ठीक कहा है, उन्हीं की पंकितयों को कह कर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा-
  "फूलों की टहनियों पर निशेमन बनाइए, बिजली भी गिरे तो जश्ने- चिरागां मनाइए, इन गरीबों की रगों में मीठा-मीठा दर्द है, उनकी बीमार नकाहतों को जरा गुद-गुदाइए।"

> कुमारी ममता बनर्जी (कलकत्ता दक्षिण) : महोदय, मैं आपकी आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहती हूं कयोंकि शेडयूल्ड कास्टस एवं शेडयूल्ड ट्राइब्ज पर नियम १९३ के अंतर्गत भी चर्चा होनी है, उस चर्चा में हमारी पार्टी के माननीय सदस्य जरूर भाग लेंगे।

... (व्यवधान) महोदय, मैं इसलिए भी ज्यादा नहीं बोलना चाहती हूं कयोंकि जिनकी समस्या हैं उन्हें ज्यादा बोलना चाहिए। मैं यह नहीं समझती हूं कि जात-पांत के आधार पर, चाहे ब्राहम्ण, हिन्दू, क्षत्रीय, मुसलमान, सिख या ईसाई हो, हम ऐसा कभी नहीं सोचते हैं कि कौन बड़ा है, कौन छोटा है, हम यही सोचते हैं कि हम लोग मानव हैं। हमें यह सोचना है कि हमारे पीछे वाला वर्ग उसको रोशनी और दिशा दिखाएगा और यह हमारा फर्ज बनता है। इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि जो १९८९-९० की रिपोर्ट है, वह रिपोर्ट आज पेश हुई है। हम उस पर चर्चा कर रहे हैं। वैसे इस पर बहुत देर हो गई है। १९९२ में नेशनल शेडयूल्ड कास्टस और शेडयूल्ड ट्राइब्स कमीशन बना था। वह काम कर रहा है। हम जब एस.सी. और एस.टी. लोगों के साथ बात करते हैं तो देखते हैं कि उनके दिल में दुख है। उसके साथ सामाजिक अन्याय हो रहा है। संविधान में उनके लिए सेफगार्डस का प्रावधान है लेकिन उसका इम्पलीमैंटेशन प्रभावी ढंग से नहीं होता। अगर इसका इम्पलीमैंटेशन ठीक ढंग से होता तो ऐसी स्िथति पैदा नहीं होती। हमने देखा है कि शिक्षा में आदिवासियों का लो परसैंटेज है। वे शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते। इस कारण उनके घरों में रोशनी नहीं आती और रिजर्वेशन का कोटा पूरा नहीं होता। रिजर्वेशन को पूरा करने के लिए उन्हें शिक्षा देना जरूरी है। उन्हें मीनिमम प्राइमरी एजुकेशन भी नहीं मिल पाती। जोगी जी और इधर से एक भाई ने भी कहा कि डेढ़ सौ विद्यार्िथयों के पीछे एक मास्टर है।

I am citing one example from the 30th Report of the Commission. The Jawaharlal Nehru Technological College of Engineering, Hyderabad has given a report. If you kindly see the report, you will see the branches of computer science, electronics and communications, electrical, civil, mechanical, painting technology, etc in that college. There are so many branches. But if you see the column pertaining to percentage of the Scheduled Tribes from 1987 to 1990, everywhere, it is written `Nil'. That means, nobody was taken from the Scheduled Tribes category रिजर्वेशन की सुविधा होने के बाद भी उसे मौका नहीं मिलता। इसके लिए नेशनल सोशल चैप्टर होना चाहिए। इसमें शेडयूल्ड कास्टस और शेडयूल्ड ट्राइब्स को सोशल जस्िटस देने के लिए कुछ काम हो सकता है। संविधान में एम्पावरमैंट और सेफ गार्डस का स्पैशल प्रावीजन है। डैवलपमैंट प्रोग्राम में इनके इनवाल्वमैंट की बात कही गई है। इनके फंडामैंटल राइटस भी है। जिन्दगी बचाने के लिए, नौकरी में भाग लेने के लिए, समाज में हर जगह इनकी हिस्सेदारी की बात कही गई है लेकिन कुछ भी काम ठीक से नहीं हो रहा है। जोगी जी ने जो बात कही, मैं उसकी प्रशंसा करता हूं। शेडयूल्ड ट्राइब्स एरियाज में कोई इंडस्ट्री बनती है तो हम वैलकम करते हैं।

There is a policy of the Government : `Either one employment or the minimum compensation.' लेकिन वह नहीं मिलता है। जिस के खून से जमीन तैयार होती है, उसका कोई हिस्सा नहीं होता। इससे उसके दिमाग में यही बात आती है कि हम पिछड़े हैं। इस तरफ ध्यान देना चाहिए। गवर्नमैंट पालिसी सख्ती से फॉलो की जानी चाहिए। वह जमीन चाहता है। ऑपरेशन बर्घा थोड़ी सी स्टेटस में हुआ है। वह हमारी स्टेट में भी हुआ है लेकिन इसके तहत जिस को जमीन दी जाती है, उसे परमानैंट पट्टा नहीं मिलता। वह हर साल बदल जाता है। इससे उन लोगों को डर लगता है कि कहीं उन्हें एक साल के बाद निकाल तो नहीं दिया जाएगा। इस बारे में परमानैंट सौल्यूशन निकालने की जरूरत है।

As far as employment is concerned, they are not getting even their certificates at proper time. उन्हें सर्िटफिकेट लेने में बड़ी मुश्िकल होती है। इसका सरकार को कोई आसान प्रोसैस बनाना चाहिए जिससे शेडयूल्ड कास्टस और शेडयूल्ड ट्राइब्स को सर्िटफेकट ठीक से मिल सके।

They do not get certificate at proper time. They have been harassed like anything. They complain to us also, so many times. There are so many vacancies. But they are not being filled up. Sometimes, they say, "Yes, it is not being filled up because they are not getting the people". It is not fair. Sometimes, it is because of negligence that they are facing this problem. एस.सी. एस.टी. कमीशन स्टेट लैवल पर बना है। मेरी सरकार से यह विनती है कि ट्राइबल एरियाज देश में कितने हैं, वह इसका अच्छी तरह से रिव्यू करे। ट्राइबल ऐरियाज़ नार्थ-ईस्ट स्टेटस, वैस्ट बंगाल के हिली ऐरियाज़, राजस्थान और मध्य प्रदेश और तामिलनाडु में बहुत ज्यादा है जिसे सरकार को रिव्यु करना चाहिये। किस ट्राइबल ऐरियाज में ट्राइब्स ज्यादा रहते हैं और किसमें कम रहते हैं, यह सब ऐरिया ट्राइबल कमीशन को डेवलेप करना चाहिये।

In every State, there should be a Tribal Development Commission or something like that. It should be done for the development of the tribal people मंडल कमिशन के मुताबिक ओ.बी.सी. की १७७ कास्टस हैं लेकिन अभी तक यह सब काम पूरा नहीं हुआ है। हमारे स्टेट बंगाल में १७७ में से ८५ कास्टस को शामिल किया हुआ है। इसलिये रिकवैस्ट करना चाहूंगी कि एक मानिटरिंग सिस्टम होना चाहिये कयोंकि सरकार ठीक कर रही है या नहीं, इस सबकी मानिटरिंग करने की जरूरत है। इससे सरकार के पास हर साल फिगर्स हो सकती है कि कया चल रहा है और कया नहीं चल रहा है। इन्िदरा आवास योजना और जवाहर रोज़गार योजना में आदिवासियों को काम नहीं मिलता कयोकि जैसा श्री जोगी जी ने कहा वे पढ़े-लिखे नहीं हैं और वे ३-३ लैटर लेकर उनके पास आये। हमें उन लोगों की मदद करनी चाहिये।

I make a request to the Government. There must be some more schools for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. Their children should be educated in a proper way so that they can have a bright future. अगर यह नहीं हो सकता तो इसका फैसला नहीं हो सकता।

I appeal to the Government that there must be a Scheduled Castes and Scheduled Tribes Development Commission in every district. अगर दिल्ली में होता है और दूसरे स्टेट में बहुत से ऐसे ऐरियाज़ हैं, उसको मालूम नहीं कि हो सकता है या नहीं। यह मालूम है कि नेशनल कमिशन बना है लेकिन माइनरटीज कमिशन नहीं है। श्री अजीत जोगी : यह हो गया है। कुमारी ममता बनर्जी : मैं जो बात कर रही हूं, वह राजनीति से ऊपर उठकर कह रही हूं।

I do not know whether it is a fact or not. There is a feeling that there is no Secretary in the Government of India from the Scheduled Tribes. If it is a fact, then, there are many good officials also who are educated enough like Shri Ajit Jogi. He said that he did not take advantage of the reservation quota. There are individuals who have developed themselves but there has been no development in a collective manner. रिजर्वेशन कोटा की इंडविजुयली या कलैकिटवली मानिटरिंग नहीं हुई है। कहीं- कहीं इंडविजुअली हुई है। यह समाज की कलैकिटव रैस्पांसिबलिटी है।

We were not able to fulfil that collective responsibility. इसलिये मेरा निवेदन है कि कलेकिटव रैस्पांसिबलिटी पूरी करने के लिये सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिये। वैसे इस रिपोर्ट में नया कुछ नहीं है और जो पुरानी रिपोर्ट है, उस पर चर्चा की है। मेरा यह भी कहना है कि ग्रासरूट में एस.सी.एस.टी. के लिये केवल स्टेट कमिशन या नेशनल कमिशन बनाने से काम नहीं चलता। काम तभी होगा जब ग्रासरूट पर इंप्लीमेंटेशन हो।

Please see to it that these development oriented programmes reach the grass-root level so that people get their proper share at the national level. मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि आप यह न सोचें कि हम माइनरटीज में हैं।

Everybody is in a minority in another State. If some people are in a majority in one State, they are in a minority in another.

I would request the Government to strengthen the Minorities Development Commission and also to form a Linguistic Minorities Commission. The linguistic minorities are also feeling that they are isolated. There should be a separate Commission for the Scheduled Castes, a separate Commission for the Scheduled Tribes, a Minorities Commission and a separate Linguistic Minorities Commission. This is my request to the Government.

With these words, we convey our regards to the people belonging to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. एक शेर के साथ मैं कहना चाहती हूं -- "जर्रा-जर्रा बू-ए-उलफाम से खतम बन जाएगा। मिलकर बैठेंगे तो फूलों का चमन बन जाएगा।" हम लोग देश के टुकड़े-टुकड़े नहीं करना चाहते हैं। इसलिए हमें एक साथ बैठकर कोई ऐसा तरीका निकालना चाहिए जिससे जो नैगलेकटेड लोग हैं, उनको पहली जगह देने के लिए हम कुछ कर सकें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका बहुत-बहुत शुक़िया अदा करती हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।

प्रो. जोगेन्द्र कवाडे (चिमूर) : सभापति जी, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के सवाल को अगर ईमानदारी से हल करना है तो सबसे पहली बात यह है कि आरक्षण के लिए कानून बनना चाहिए और हम मंत्री महोदय से निवेदन करेंगे कि अगर यह कानून नहीं बनेगा तो ऐसे ही चलता रहेगा। रिज़र्वेशन ऐकट बनना बहुत ज़रूरी है और उसका ईमानदारी से पालन नहीं करेंगे तो ठीक नहीं होगा। इसमें पनिशमेंट का प्रोविज़न भी होना चाहिए।

MR. CHAIRMAN : Prof. Jogendra Kawade, please take your seat. You can put forth your suggestions when you get a chance to speak. श्री जोगेन्द्र कवाडे : इस देश की अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ अन्याय हो रहा है। इस पर चर्चा करने से कुछ नहीं होगा। सभापति महोदय, आप माफ कीजिए दस घंटे चर्चा हो गई तो कया होता है? चर्चा से कुछ लाभ होने वाला नहीं है। इसके लिए कानून बनना चाहिए।

... (व्यवधान) श्री रामदास आठवले: चर्चा से कुछ निकलने वाला नहीं है। इसके लिए कानून बनना चाहिए।

... (व्यवधान)

  सभापति महोदय : आप बैठिये। श्री जोगेन्द्र कवाडे : रिज़र्वेशन ऐकट बनना चाहिए और मंत्री महोदय को इस बारे में कुछ कहना चाहिए। सभापति महोदय : आठवले जी, आप बैठिये। हमने बाजूबन रियान जी को बुलाया है। आपको जब समय मिलेगा तब बोलियेगा। ाी कांतिलाल भूरिया (झाबुआ) : सभापति जी, माननीय मंत्रियों के बीच में कया चर्चा चल रही है? इतनी गंभीर चर्चा है और मंत्री आपस में बात कर रहे हैं।

...(व्यवधान)

PROF. JOGENDRA KAWADE :Nobody is serious about the issue of Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The Minister is not serious. जहां दलितों की बात होती है, वहां ऐसे ही बात करते रहते हैं।

... (व्यवधान) मेजर जनरल भुवन चन्द्र खण्डूडी, एवीएसएम :आपने पचास सालों में कया किया? श्री रामदास आठवले : ५० साल की बात कयों करते हैं? आप आठ महीने की बात करिये।

... (व्यवधान)

PROF. JOGENDRA KAWADE :Sir, the Minister should take the issue seriously. श्री कांतिलाल भूरिया : मंत्री जी को नोट करना चाहिए कि बड़ी महत्वपूर्ण बातें सदन में हो रही हैं।

... (व्यवधान) सभापति महोदय : भूरिया जी, आप बैठिये। आपको समय मिलेगा तब बोलियेगा। ... (व्यवधान)

>SHRI BAJU BAN RIYAN (TRIPURA EAST): Mr Chairman Sir, I thank you for giving me an opportunity to participate in the discussion on the 30th Report for Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The National Commission for SCs & STs was set up in 1990 by 65th Amendment of the Constitution under article 338. The purpose of the setting up of this Commission was to determine the action plan for the welfare of the SCs & STs.

Sir, this commission collected all the information and various problems pertaining to SCs and STs from all over India and then submitted their report in 1990. After the submission of this report so many Governments have changed but nothing was done to implement the suggestions and recommendations for the ameliorating the conditions of the SCs and STs. Though my party CPM does not agree with all the points submitted in the Report yet we support on the whole the welfare measures to be adopted for the SCs and STs. According to this Report separate State may be carved out for the adivasi dominated area. My party or I cannot support this recommendation. Terrorist movements have been going on in different parts of our country especially North-Eastern part. One of their demand is to set up a separate State for them. I do not want that my country should be divided in this manner. Moreover, I do not believe that setting up a separate small State for the SCs and STs from a big State will be able to solve the problem of these people or this will help to ameliorate either their economic or overall condition. No I just cannot believe this. Our country has been free for 50 years. So many Governments have ruled the country all these years. The Commissioner for SCs & STs and the Commission for SCs & STs have been set up. So many Committees have been constituted to look into the problems of the tribal people. But it is a matter of regret nothing has been done to improve the economic condition of these people. There is no improvement in their condition either economically or in any other matter. ...(Interruptions)...

*Original in Bengali.

Sir, the Commission has prepared the Report on the basis of material and information collected from various parts of the country and submitted it in 1991. So many Governments have changed after the submission of the Report. But unfortunately no appropriate measures have been adopted by various Governments to implement the recommendations and suggestions for the welfare of SCs & STs as envisaged by the Report. As I have already said that my party or I do not support all the recommendations submitted in the Report, viz., to set up small State for tribals in the tribal dominated area. This suggestion will only encourage the separatist terrorist group who are demanding separate State for them. I do not believe that we will be able to improve the lost of SCs & STs by creating separate State.

Sir, it is a matter of regret that after 50 years of independence, after setting up so many Committees and Commissions, nothing has been done to improve the lot of the tribal people. I must say instead of improvement in their prevailing conditions, there is deterioration in their lot. Most of them had their own land before 50 years. They had some means of livelihood. They were self reliant to earn their livelihood. Now after 50 years they have been named for destroying the jungle and woods. It is being alleged that they are ruining the ecological balance. The tribals are held responsible for ruining the ecological balance. I do not believe this allegation. The tribals stay in the jungle for their existence and survival. They fell the trees for fuel and selling the wood. They get a very small amount by selling wood. The forest contractors and the businessmen loot the profit by paying a very small amount to the tribals and deprive them their due share. They do not have any alternative job. There are various jobs for various other sections of the society. The Government has done many things for them. But whatever recommendations have been submitted for their welfare have not been implemented.

They could not realise or enjoy the fruits of the welfare measures adopted by the Government because of non-implementation of these measures. Those who are associated to implement the welfare schemes and projects for the tribals are not discharging their duties and responsibilities in a fruitful manner. The net result is the economic condition of the SCs and STs has been deteriorating day by day 15.00 hrs. Since the inception of our Parliament, we have a Committee for the development of the SCs & STs. It is an elected Committee. This elected Committee has submitted its report after discussing various issues. But whatsoever has been recommended for the developmental schemes and projects for the SCs & STs has not been implemented so far. It is really a sorrowful affair. The report under discussion though may not be adopted by Parliament, after it was sent to the Government, the Government has considered the setting up of Social Justice & Empowerment Department. There were 21 recommendations with separate comments by Social Justice & Empowerment Department and other Departments also. They have suggested to set up another high power Commission under article 339(1) of the Constitution. That Commission will consider many other points. I do not have any objection to set up another Commission. But I want to ask why the Government has so far not implemented the various recommendations for the welfare of the tribal people. There is no paucity of legislation in our country. So much discussions and deliberations have been held for the development of the SCs & STs. The Government could have done so many things for the welfare of the tribals and Scheduled Castes. But they are not doing anything. Because of the treatment, the SCs & STs are not able to progress and are lagging behind the mainstream. I have been elected from Tripura. We have Left Front Government ruling in Tripura. It is for the 4th successive year the Left Front has won. The Government of Tripura has set up District Council for the tribal areas to look after the welfare of the tribals under 6th Schedule of the Constitution. This District Council TTADC (Tripura Tribal Areas Anti District Council) for the tribal areas has been set up only in Tripura after amending the Constitution. This council has been functioning like the State Government. Sir, through you I appeal to Government to set up the District Council like Tripura in other tribal dominated area of our country so as to look after the welfare of the tribal people. Instead of considering to set up separate State for tribal people of the District Council can function properly to look after the developmental schemes for the tribal and SCs. I do not want to say that by constituting District Council in tribal areas will be the only means to achieve the goal of developmental schemes for the SCs & STs. The responsibilities like the administrative and economic power of the council must be enhanced so that it can discharge its duty properly. This can be done by Parliament only by amending the Constitution. The developmental scheme under the State Government can be done by the District Council if their administrative and economic power is enhanced. The District Council set up in our State has been functioning by fund sanctioned by the State Government. The problem of the SCs & STs is not a State subject. The subject of SCs & STs is there in other States. An elected Committee has been set up in Parliament for this purpose so the responsibility of the Centre for the development of the SCs & STs is equally important. The Centre has to come forward to take appropriate measures so that the SCs & STs can prosper economically and otherwise. My demand is the Centre should provide more money to the Council. The money should be provided directly. The matter should be discussed with the Planning Commission and the decision should be taken in this regard. I am saying this becuase before Tripura in Assam we have Karbi Anglong, in Mizoram Chakma, Pawa and Phakev and in North Kachar also District Councils have been set up in 1952. These Councils have been set up right from the day our Constitution was promulgated but these Councils have not been able to fulfil the hopes and aspirations of the tribals. They are not able to implement the welfare measure for their development appropriately. The District Council of Tripura, TTADC has been facing difficulty in discharging their responsibility for implementing the welfare measures for SCs & STs. The functioning of the council depends on the attitude of both the State and Central Government. The elected Committee for the welfare of the SCs & STs of Parliament have been examining the implementation of reservation of SCs & STS in PSUs in the State and the Centre, various Government Departments like Railway etc. They have submitted their report also in this regard. I have been associated with this Committee for many years. We have submitted many reports. But unfortunately no Government or semi-Government organisation has filled up the quota of 7-1/2% for the ST and 15% for the SCs.

I am not considering high posts like class I officer for which one has to be highly qualified. But reserved posts for B Group post or the post of class III employees can be filled up if the Government is sincere and honest in its intention. At least the reserved post for the peon should not remain vacant because one need not be highly qualified for these posts. The Government must adopt sincere approach in this regard. I know that these people cannot be appointed in the post for higher category because they do not get opportunity or facility for higher education. But at least the reserved posts for lower category can be filled up. If we check up we will find neither the Centre nor the State Government have been following the reservation quota even for lower posts. It is only in Tripura ruled by Left Front Government this quotas for the SCs & STs are being filled up. I do not feel this is being followed anywhere in our country. I hold this Government responsible for this. But the party in my right who ruled this country for more than 40 years and the party in my left who are the present ruling party and who are ruling in some more States also, have not implemented the reservation policy for the SCs & STs not only in jobs but in education also. The attitude of the Government has to be changed. The tribal people are quite physically strong. We labour so much. We clean the big industries. We carry the night soil we are keeping the country clean and beautiful and giving the babus comfort. I do not have any objection to it because the tribals are doing these jobs for livelihood. But I want to ask why they won't get the same rights like others enshrined in the Constitution? It depends on the Government. We cannot change the lot of the SCs & STs by setting up Commission after Commission. Any commission however high power cannot deliver any good if it lacks sincere approach and intention.

The population in India has increased. But surprisingly the Adivasi population has come down. Why it is so? Because after a child is born the tribal people are not able to provide healthy diet to the child due to poverty and ignorance. So the rate of child mortality is very high among them. That is why there has been a decline in population.

If the recommendations for the welfare measure are not implemented the lot of the SCs & STs can never be changed. They are the one who suffer from TB, leprosy and dreadful diseases due to lack of healthy diet. The priority for the welfare of these people must be given. If we do not give priority forgetting party affiliation we cannot improve the pathetic condition of the adivasis. People from all walks of life have to come forward to change the condition of these people. If we fail to do that then the situation will further aggravate. The country cannot remain in peace if we allow to aggravate the situation. They have taken weapons in North-Eastern part. The peace loving people of the jungle have taken up arms. They have armed struggle in Andhra Pradesh, Bihar and other places. They know that they have to pay heavy price for taking the help of arms. They have resorted to violent means even. The involvement of ISI and foreign mercenary has been raised in this House a few days back during Question Hour. These foreign elements are taking advantage of their economic condition and trying to destabilise our country. For this we make the tribals responsible. But we must find out why they have resorted to terrorism. So we must change our attitude and try to pin point the real picture. We the tribals are not afraid to do any hardwork. The tribal people are hard working simple and honest in nature. The high casts take advantage of their simplicity and honesty and try to cheat them. But they are trying to survive.

Through you, Sir, I would like to request everybody to come forward to face the challenge of terrorist activities and render help to change and improve the condition of the tribals so that they get enough opportunities like others and become a valuable part of the country and make it prosperous and advanced. Once again I thank you Sir for giving me an opportunity to participate in this important discussion.

15.10 hrs. (Shri Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) > श्री प्रभुदयाल कठेरिया (फिरोजाबाद) : माननीय सभापति महोदय, सबसे पहले मैं सदन को, माननीय अध्यक्ष जी को, सरकार में बैठे हमारे देश के प्रधान मंत्री जी को, सब को हृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं कि १९९०-९१ से जिस रिपोर्ट को अभी तक चूहे कुतर रहे थे, उस पर हमारी सरकार ने, अध्यक्ष जी ने गम्भीरता से विचार करके चर्चा प्रारम्भ कराई है, इसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूं। मेरे कुछ मित्रों ने इस बात को रखा कि श्री बी.डी. शर्मा ने यह रिपोर्ट बनाई थी, मैं विशेषकर उस वर्ग के व्यकित को भी धन्यवाद देना चाहता हूं। मेरे मित्र ने उसकी आलोचना करने का प्रयास किया था, मैं उस बात का कटाक्ष कर रहा हूं कि ब्राहमण वर्ग से होने के कारण भी उनको मैं धन्यवाद देना चाहता हूं। इस वर्ग से न होने के कारण भी उन्होंने इस कमेटी की रिपोर्ट में अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों के बारे में बहुत अच्छी रिकमेंडेशन कीं। उन्होंने अपने जो तजुर्बे किये, जिस तरह से आइडेंटीफिकेशन किया, जो जानकारी ली, जो समाज की पीड़ा थी, वेदना थी, विडम्बना थी, उसकी जानकारी करने के पश्चात् उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। जिस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए, उस प्रकार की व्यवस्था ठीक तरीके से उन्होंने रिपोर्ट के अन्दर उद्धृत की। दुख इस बात का है कि १९८९ से लेकर १९८९ आ गया, सरकारें आईं और सरकारें चली गईं, पर इस रिपोर्ट के प्रति ठीक तरह से व्यवस्था नहीं की गई। हम सदस्यों की यह वेदना भरी बात है। मैं धन्यवाद देने के बाद एक बात और बहुत वेदना के साथ निवेदन करना चाहता हूं कि आजादी को ५० वर्ष गुजरने जा रहे हैं, ५० वर्ष गुजरने के बाद भी हम लिख रहे हैं कि दलित महिला को पंचायती नल से पानी भरने के कारण घर से खींचकर निर्वस्त्र करके गली में घुमाया गया। वाह रे देश के भाग्यविधाताओं, आजादी के बाद दुनिया के देशों में हमारी कया तस्वीर उभरकर आती होगी। आजादी के बाद निर्वस्त्र करके दलित महिला को या दलित व्यकित को घुमाया जाये, यह सिर्फ एक प्रान्त की बात नहीं है। मैं उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद कांस्टीटवेंसी से १५ लाख लोगों का रिप्रेजेंटेशन कर रहा हूं, लोक सभा में मेरा यह थर्ड टर्म है। मैं किसी एक प्रान्त की बात न करके चूंकि मैं मैम्बर पार्िलयामेंट हूं, इसलिए समूचे देश की बात कर रहा हूं। मैं इस बात को कहते हुए कि किसकी सरकार है, किस प्रान्त की है, मैं यह बात नहीं करना चाहता हूं कि किसकी सरकार किस प्रान्त में है। राजस्थान में, उत्तर प्रदेश में, आन्ध्र प्रदेश में, जो २५ प्रान्त हैं, उनमें से कम से कम पांच प्रान्त ऐसे हैं, जिनकी संख्या में जानकारी के तौर पर देना चाहता हूं। सिर्फ १९९५, १९९६ और १९९७ के तीन वषर्ों की रिपोर्ट मैं बता रहा हूं कि १९९५ में ३२,९६४ केस हैं, १९९६ में ३१,४१६, १९९७ में २७,७०८ केस अनुसूचित जाति के ऊपर हैं। अनुसूचित जनजाति के ऊपर १९९५ में ५,४९४ और १९९६ में ४,९७२ केस हैं। यह सारे सदन के लिए तस्वीर है। आज आजादी के बाद दुनिया के देश इस देश के गरीब और कुचले व्यकित के बारे में कया सोच सकते हैं, उनके लिए किस बात की आजादी है? इसके लिए कौन दोषी है, आप समझते हैं कि एक विशेष वर्ग के किसी व्यकित को गाली देकर या किसी ठाकुर को गाली देकर या किसी ब्राहमण को गाली देकर या अन्य लोगों को गाली देकर यह समाज सुधर सकता है? इसकी रैस्पोंसबलिटी किसकी है, इसकी जिम्मेदारी किसकी है, इस सदन में बैठे लोग, जो इस देश के भाग्यविधाता हैं, ५० साल के बाद सबसे बड़ी रैस्पोंसबलिटी इन लोगों की है, ये जो लोकतंत्र के रखवाले हैं, ये लोकतंत्र की धज्िजयां उड़ाते हैं। समाज इतना दोषी नहीं है, बल्िक जो ९० करोड़ का देश ग्रामीण क्षेत्र में रहता है, उतना दोषी नहीं है, जितने ये ब्यूरोक़ेसी में बैठे हुए लोग हैं, जो आजादी के बाद हमें ऐतिहासिक धरोहर में मिले थे। इस बात को ध्यान में रखना है कि जो इतिहास में आजादी के बाद हमको मिले, उनके कारनामों से मात्र ३० परसेंट लोग इस देश के अन्दर हैं, जो वैमनस्यता, जातीयता का जहर घोलकर इस समाज को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। मैं किसी वर्ग विशेष की बात नहीं करना चाहता हूं, हम लोग भी, जिसमें आई.ए.एस., आई.पी.एस. बन गये, मैम्बर पार्िलयामेंट बन गये तो बस हमारा गोरी चमड़ी से मेलजोल हो गया, सफेद बन गये। वे गरीब जो गांवों में रहते हैं, जिनको टाट-पट्टी पर बैठने के लिए विद्यालय में जगह नहीं मिलती, पर ब्राहमण खुद बन जाते हैं और हम पंडित को बुरी बात कहना चाहते हैं। ब्राहमण वे तो हैं ही, लेकिन हम लोग भी हैं, जो उनके साथ जो दुष्टभाव रखते हैं। जिम्मेदारी किसकी है, जिम्मेदारी हम लोगों की है। महोदय, आज जैसा मेरे मित्र ने कहा कि विद्यालयों की यह हालत हमारी शिक्षा के कारण है। बाबा भीमराव अम्बेडकर जी ने कहा था कि शिक्षा सवर्ोपरि है। शिक्षा ज्ञान का मंदिर है। जब तक हमारे नन्हें-मुन्ने बच्चे शिक्षा से वंचित रहेंगे, तब तक इस देश का कल्याण नहीं हो सकता। जब तक हमारे दलित वर्ग के बच्चों में यह भावना रहेगी कि मैं दलित वर्ग से हूं और मुझे ठीक तरह से सम्मान नहीं मिल रहा है, उनका पूर्ण रूप से विकास नहीं हो सकता। लोगो की मानसिकता इस प्रकार की है। दलित वर्ग अगर शक्षित होता तो आज वह इतने बच्चे पैदा नहीं करता। यदि उसको इतना ज्ञान होता कि मुझे कितने बच्चे पैदा करने चाहिए, मैं कितने बच्चे संभाल सकता हूं तो आज देश की इतनी जनसंख्या नहीं बढ़ी होती। यह सब इसलिए हुआ कयोंकि उन्हें शिक्षा नहीं मिली। दुनिया में इतने संविधान हैं लेकिन भारत जैसा संविधान दुनिया के किसी देश में नहीं है। संविधान की जो भी प्रक़िया है कि जिस किसी भी वर्ग का व्यकित जन्म लेता है तो उसे धर्म, जाति इत्यादि की बात समझाई जाती है। लेकिन दलित वर्ग के लोगों को कभी भी संविधान, वेद-शास्त्र, राम, सीता, कृष्ण, शिवजी इत्यादि के बारे में नहीं बताया गया, इसलिए वे नहीं जानते कि ये कौन हैं। इसलिए अगर उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई होती तो आज वे लोग भी समाज में अपनी भूमिका ठीक तरह से निभा सकते। हम सब सांसद हैं, अगर पचास साल की आज़ादी के बाद भी हम सब यही राग अलापते रहे कि आरक्षण पूरा नहीं हुआ, बैक-लॉग पूरा नहीं हुआ। हमारी अस्सी प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, यदि हम यही कहते रहे कि हमारा आरक्षण, बैक-लॉग पूरा नही हो रहा है, हमारे दलित-वर्ग के लोगों की पदोन्नति नहीं हो रही है तो हमारा देश विकास नहीं कर सकता।

... (व्यवधान)मैं पार्टी से ऊपर उठकर बात कर रहा हूं। सबसे ज्यादा आप लोग जिम्मेदार हैं। हम लोगों को सत्ता पर आए हुए अभी मुश्िकल से आठ दिन हुए हैं। जिम्मेदार आप लोग हैं। मैं आपबीती बता रहा हूं कि एक बार मैं एस.सी.एस.टी. का डेलीगेशन लेकर गया था। वहां मैंने अधिकारी-कर्मचारी मैनेजमेंट से बात की। पता चला कि वहां जूनियर इंजीनियर जो दलित वर्ग का था, उसने बताया कि उसे कुर्सी पर बैठने नहीं दिया। हमारे चेयरमैन साहब मौजूद हैं। देश की आज़ादी के बाद यह हालत है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जो लोग सत्ता के नजदीक हैं, जो ब्यूरोक़ेटस हैं, वे इसके लिए जिम्मेदार हैं। हमारे अस्सी प्रतिशत अनपढ़ लोग जो गांव में रहते हैं, उनको इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सबसे ज्यादा चिंता का विषय जो बना हुआ है वह यह है कि यह जातीयता का ज़हर हमारे समाज को निगल रहा है। यह जातीयता का ज़हर हमारे राजनीतिज्ञों ने बोया है। चाहे कोई भी पार्टी हो, सारी पार्टीज ने एजेंडा बना लिया है कि वह फलां वर्ग का व्यकित है चाहे उसकी योग्यता हो या नहीं हो, उसे फलां पद दिया जाएगा। यह जातीयता का ज़हर यदि बना रहा तो देश का भला नहीं हो सकता, देश छिन्न-भिन्न हो जाएगा। आज कुछ लोग लुभावने भाषण देकर फतवा जारी करके इस व्यवस्था को तोड़ना चाहते हैं। आज आप थाने मे जाकर देख लीजिए। अगर कोई एस.सी. या एस.टी. का व्यकित एस.एच.ओ. है या इंस्पेकटर है और अगर कहीं पंडित जी उसके लट्ठ के नीचे आ गए तो उनको वह सारी व्यवस्था बता देगा।

... (व्यवधान)इसी तरह से यदि सम्ृाद्ध जाति का कोई व्यकित एस.एच.ओ. या इंस्पेकटर है और एस.सी. का कोई व्यकित उसके नीचे आ गया तो वह उसे अच्छी तरह से सारी व्यवस्था बता देगा। यह जातीयता का ज़हर यदि पुलिस प्रशासन में फैल गया तो हम लोगों के लिए बहुत घातक होगा। अगर हमारी सरकार आ गई, हम उसके साथ भी अन्याय कर रहे हैं। किसी भी पार्टी का सांसद सांसद है। वह जन प्रतनधि है। सत्ता में बैठकर जनता के साथ आप घात कर रहे हैं यदि जातीयता के ज़हर को फैलने से नहीं रोका गया। जनता का आशीर्वाद लोक तंत्र का तकाजा है। मगर वह जनता का आशीर्वाद लेकर आया है। अगर उसके साथ आप भेदभाव करते हैं तो नश्िचत रूप से मेरा यह मानना है कि उस लोकतंत्र की आत्मा को धकका दे रहे हैं, चाहे किसी भी पार्टी का सांसद हो। यह बड़ी घिनौनी बात बन रही है कि कोई एस.सी. का अधिकारी ऊंचे पद पर बैठा हुआ है, उसने अगर अपने विशेषाधिकार की बात की तो उसे कहा जाएगा कि वह एस.सी. का सांसद हमारे साथ बड़ी बुरी तरह से पेश आया। हमारे ही कुछ लोग उस पर धावा बोल कर उसे समाप्त करने का प्रयास करते हैं। जब तक लोकतंत्र में पारदर्िशता नहीं आएगी तब कुछ नहीं हो सकता। ममता जी ने बहुत अच्छी बात कही कि अगर इस राष्ट्र को एक सूत्र में बांधना है तो सब को मिल कर रहना होगा। इस देश को जातीयता के जहर में मत घोलो कयोंकि इससे देश टूट जाएगा। दुनिया इस देश का तमाशा देखेगी। अगर कहीं इस प्रकार की कोई बात आती है तो हम मिलजुल कर सारी समस्याओं को हल कर सकते हैं। मैं किसी समस्या को उजागर न करते हुए कहना चाहता हूं कि सारी समस्याओं का हल हो सकता है। मैं ऐसा नहीं कहता कि उन्हें आरक्षण नहीं दिया, नश्िचत रूप से आरक्षण दिया है कयोंकि अगर न दिया होता तो मेरे जैसा दलित-कुचला व्यकित आज यहां न होता। मैं अपने नेताओं की प्रशंसा करता हूं कि जिन कुचले लोगों को राजनीति में भागीदारी नहीं मिली हमारे नेताओं ने उन वगर्ों के लोगों को टिकट दिया और जो यहां चुन कर जीत कर आए। मैं इस बात की प्रशंसा करता हूं कि जो व्यवस्था आज हम लोगों ने यहां बनाई है, यह चिन्ता का विषय है। जिस तरीके से शर्मा जी ने अपनी रिपोर्ट दी है, मैं मंत्री जी से तथा समूचे सदन से अनुरोध करना चाहता हूं कि सांसदों की भावनाओं को समझें। अगर एक सांसद बोलता है तो १५ लाख लोकतंत्र के रक्षक बोलते हैं, इसलिए आप इनका विशेष ध्यान रखिए। । अगर ठीक तरीके से समाज को कुछ देना है, यदि वास्तव में प्रधानमंत्री जी की इच्छा इस वर्ग के लिए काम करने की है तो देश में जितनी बंजर जमीन पड़ी हुई है उसकी ठीक तरीके से व्यवस्था की जाए। गरीब लोगों को पट्टे दिए जाएं और एक परिवार से एक बच्चे को नौकरी दी जाए। जब देश के दबे-कुचले व्यकित को १०,००० तनख्वाह मिलेगी तो वह भी ठीक से पहन सकता है। जोगी जी ने जो शब्द इस्तेमाल किए मैं वह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता। मैं आपको कहना चाहता हूं- "निर्मल मन जन सो मोहे पावा, मोहे कपट छल छिद्र न भावा।" आपके यहां तराजू लगी है। ऐसा नहीं है कि किसी की जमींदारी न हो, वह किसी की जमींदारी नहीं मानता, वह पार ब्रहम है, वह किसी की नहीं मानता, जो जैसा करेगा उसको वैसा फल मिलेगा। ाह प्राकृतिक आपदा देश में कयों आ रही है? जब तक देश में महिलाओं और अनुसूचित जातियों के लोगों को सम्मान नहीं मिलेगा तब तक नश्िचत रूप से देश में प्राकृतिक आपदा आती रहेंगी, यह मेरी भावना है। आप यह सोचिए कि कोई तुम्हारे ऊपर भी बैठा हुआ है, हरेक के ऊपर कोई न कोई बैठा हुआ है। डा. अम्बेडकर ने एक के ऊपर एक बनाया है। अगर कोई व्यकित यह समझें कि सब कुछ मेरे हाथ में हैं तो यह इम्पोसिबल है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि किसी वर्ग को गाली न देकर अपने समाज को सुदृढ़ करने का प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज ने हमें महामहिम राष्ट्रपति जी का पद दिया, हमें बहुत कुछ दिया। समाज में कंट्रोवर्सी पैदा करके कुछ नहीं मिल पाएगा। गाली देने से समाज टूट जाएगा। समाज की व्यवस्था जिस प्रकार से की गई है यह चिन्ता का विषय है। आपने देखा होगा कि अगर आपको बुलंदशहर से आगरा जाना है तो २५ रूपए ३५ पैसे लगते हैं। २५ रुपए देंगे तो कंडेकटर पकड़ कर नीचे कर देगा। जब तक उसे ३५ पैसे नहीं मिलेंगे तब तक कंडैकटर ऊपर चढ़ने नहीं देगा। हाउस और लोकतंत्र के प्रहरी इस बात के गवाह है कि जब तक रेजगारी को सम्मान नहीं मिलेगा तब तक नोटों की वैल्यू नहीं होगी। यह एक आध्यात्िमक बात है। रुपए की वैल्यू तब होगी जब रेजगारी को गले लगा कर चला जाएगा। रेजगारी जिस दिन एक सूत्र में बंध जाएगी, उस दिन देश का भी कल्याण हो जाएगा। अगर रेजगारी की उपेक्षा की गई और वह जेब में फंस गई तो जेब फट जाएगी। कोई अप्रिय घटना भविष्य में देश में न घटे इस बात का ध्यान रखना होगा। श्री बी.डी. शर्मा ने जो रिपोर्ट दी है, उस पर माननीय सदस्यों ने अपनी भावनाएं व्यकत की हैं। आन्ध्र प्रदेश में लोकतंत्र की जिस प्रकार धज्िजयां उड़ायी गईं और वहां दलित महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ जो संघर्ष हुआ, वह इतिहास में लिखा जाएगा। हमारी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए माननीय प्रधान मंत्री जिम्मेदारी के साथ हमारी बात को गम्भीरता से लें और पारदर्िशता लाएं। जब तक हमारी भावनाओं को नहीं सुना जाएगा, तब तक कमजोर और कुचले लोगों का भला नहीं होगा। मैं पहले भी कह चुका हूं कि उत्पीड़न, क़ांति और रेजगारी को इकट्ठा मत होने दीजिए। देश में भाइचारे की भावना बनने से देश आगे बढ़ेगा। अगर गरीबों पर इसी प्रकार अत्याचार होते रहेंगे तो देश टूट जाएगा। आपने मुझे बोलने का जो मौका दिया, इसके लिए धन्यवाद।

> श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल) : आपने बोलने का समय दिया, इसके लिए धन्यवाद। माननीय कल्याण मंत्री श्रीमती मेनका गांधी द्वारा प्रस्तुत अनुसूचित जाति और जन जाति आयुकत के वर्ष १९८९-९१ के ३०वें प्रतिवेदन पर सदन को चर्चा करने का जो मौका दिया, उस पर कई सम्मानित सदस्यों ने अपने विचार रखे। मैं उसमें अपनी बात जोड़ते हुए कुछ कहना चाहूंगा। आज की चर्चा में मुझे बाबा भीमराव अम्बेड़कर जी और महात्मा गांधी जी की बात याद आ रही है। गांधी जी और अम्बेड़कर जी के बीच जो पूना पैकट हुआ था उस समय अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों ने आरक्षण पाकर संतोष किया था। देश का सौभाग्य है कि दूसरा अछूतिस्तान बनने से रुका। आज हमें यह चिंतन मनन करना होगा कि बीते पचास वषर्ों में देश ने कया खोया और कया पाया? अनुसूचित जाति और जन जाति से जुड़े बहुत से ऐसे सवाल हैं जिन पर कई सरकारों ने हमेशा इस बात की व्याख्या की कि हम उनके हितों की रक्षा करेंगे, उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं लाएंगे लेकिन आज तक जितनी बातें कहीं गई और कल्याणकारी योजनाएं लाईं गईं, वे जहां की तहां रह गईं और लंबित पड़ी रहीं। बहुत से सम्मानित सदस्यों ने आरक्षण की बात कही। अनुसूचित जाति और जन जाति के लोग चाहे देश के किसी कोने में हों या किसी प्रदेश में हों, उनमें यह एक भय बना रहा कि आरक्षण का संवैधानिक अधिकार कहीं समाप्त न हो जाए। जितने भी विभाग हैं चाहे वे केन्द्र सरकार के हों या राज्य सरकार के हों, वहां अनुसूचित जाति और जन जाति के रिकत पद आज तक नहीं भरे गए। कोई विभाग डंके की चोट पर यह नहीं कह सकता कि हमने सौ परसैंट आरक्षण को पूरा किया है। आज हम जिस स्िथति से गुजर रहे हैं, उस पर चिंतन और मनन करना होगा। आप रिकार्ड उठा कर देख सकते हैं। जोगी जी ने यहां आंकड़े प्रस्तुत किए। मैं उसमें नहीं जाना चाहूंगा। उच्च पदों की पोस्टस को उठा कर देख लें चाहे वे केन्द्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की हों, वहां अनुसूचित जाति और जन जाति के कितने लोग बैठे हैं इस पर विचार करना होगा। जब बजट सत्र चल रहा था मैंने माननीय प्रधान मंत्री जी को एक प्रतिवेदन दिया था कि भारत सरकार में सचिव पद या उच्च पदों पर पहले अनुसूचित जाति के बहुत सारे अधिकारी थे, लेकिन अब अनुसूचित जाति का कोई अधिकारी नहीं है । मैंने इस ओर प्रधानमंत्री जी का ध्यान आकृष्ट किया था, पता नहीं इस मामले में कुछ किया या नहीं, मैं इस में नहीं जाना चाहता। आज हम प्रोमोशन की बात करते हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों में बहुत से अधिकारी प्रोमोशन पाते हैं, जो योग्य हैं। यदि उनका प्रोमोशन होता है तो उनको अंडमान निकोबार भेजा जाता है लेकिन वे विवश होकर वहां जाना नहीं चाहते और प्रोमोशन को किल करके वहीं बने रहना चाहते हैं। अन्य जातियों के लोगों का प्रोमोशन होता है तो किसी अन्य जिले में भेजे जाते हैं। अगर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी अधिकारी का प्रोमोशन किया जाता है तो उत्पीड़न की भावना से उसे दूर फैंक दिया जाता है। यह सोचा जाता है कि वह दूर नहीं जायेगा और अपना आरक्षण विदड़ा कर लेगा। मेरा निवेदन है कि इस परस्िथति की ओर सरकार को ध्यान देना चाहिये। मैं कल्याण मंत्रालय से संबंधित योजनाओं पर बाद में बात करूंगा। उत्तर प्रदेश में आज भी दो आई.ए.एस अधिकारी ऐसे हैं, एक उनमें से एक सांसद श्रीमती रीना चौधरी के पति श्री बी. प्रसाद और दूसरा सासंद श्रीमती ओमवती के पति श्री आर.के. सिंह हैं जिन दोनों अधिकारियों को की-पोस्ट से अलग रखा गया । जब ये लोग उच्च न्यायलय में गये तो माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इन दोनों को विशेष पदों पर रखकर सम्मान दिया जाये। लेकिन आज भी उन दोनों अधिकारियों को न तो महत्वपूर्ण पदों पर रखा जा रहा है और न ही उनको सैलेरी दी जा रही है। मैं इस सदन के माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि यदि उच्च पदों पर बैठे अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के अधिकारियों के साथ इस प्रकार का उत्पीड़नपूर्ण व्यवहार सरकार द्वारा किया जायेगा तो हम लोग इस संसद में भाषण देकर कया करेंगे। सभापति महोदय, आज शाम के ७ बजे हम अनुसूचित जाति के सांसद इस विषय पर मीटिंग कर के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आई.ए.एस. या आई.पी.एस. अधिकारी जो ऊपर नहीं पहुंच पा रहे हैं एवं जिनके खिलाफ उत्पीड़न की कार्यवाही की जा रही है, उस पर विचार कर रहे हैं । इस पर सरकार को गंभीरता से सोचना होगा। मैं इस सदन के माध्यम से कहना चाहता हूं कि अलग अलग राज्यों में अलग अलग स्िथति है। कई राज्यों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति तथा पिछड़े वर्ग के लोगों को सुविधायें नहीं दी जा रही हैं, आरक्षण में कोटा नहीं रखा जा रहा है। उदाहरण के लिये आन्ध्र प्रदेश में पासी जाति को अनुसूचित जाति श्रेणी में नहीं रखा गया है और न उन्हें वे मूलभूत सुविधायें दी जा रही हैं जिनके वे हकदार हैं। मेरा एक सुझाव यह है कि जिस प्रकार मानवाधिकार आयोग , चुनाव आयोग या तमाम ऐसे आयोग, को वित्तीय या ज्युडशियल पावर्स दी गई हैं, उसी प्रकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग को वित्तीय और ज्युडशियल पावर्स देनी चाहिये जिससे हमारे अधिकारों की रक्षा हो सके। सभापति महोदय, अब मैं आदिवासी भाइयों की चर्चा करना चाहूंगा। चूंकि मैं उत्तर प्रदेश में कल्याण और वन मंत्री रह चुका हूं, मैं उनकी तकलीफों को जानता हूं। हमारे यहां सत्तापक्ष के माननीय सदस्य श्री काश्यप की ओर से बात कही गई और श्री जोगी जी ने भी कहा, इसलिये मैं भी कहना चाहूंगा कि सरकार को उनकी ओर विशेष ध्यान देना होगा। उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना होगा। जंगल से प्राकृतिक रूप से मिली वस्तुओं के उपयोग से उनका रोज़गार चलता है। उसी पर उनका और उनके बच्चों का भविष्य निर्भर करता है। सरकार ने आदिवासियों के कल्याण के लिये अनेकों योजनायें बना रखी हैं लेकिन वे उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इसलिये कहना चाहूंगा कि इस ओर विशेष ध्यान दिया जाये। अभी हमारे किसी साथी ने कहा कि कहां ऐसी व्यवस्था है और कहां ऐसी व्यवस्था की गई है, मैं बताना चाहूंगा कि गत ५० सालों में पिछली सरकारों ने जो गलतियां की हैं, आज सत्तापक्ष में बैठे हुये लोग आदिवासियों के कल्याण के लिये योजनायें बना सकते हैं और उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं।

15.35 hrs.(Dr. Laxminarayan Pandey in the Chair) हमारे निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत थागा जनपद फतेहपुर में सलेमपुर ऐसा गांव है जहां मैंने दौरा किया। वहां ६०० विद्यार्थी जिनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के हैं, उनके लिए एक अध्यापक है। मुझे जब यह पता लगा तो मैंने इस ओर शासन का ध्यान आकर्िषत किया। आज ऐसे सैकड़ों नहीं, हजारों गांव होंगे जहां बहुसंख्यक विद्यार्िथयों पर केवल एक या दो शिक्षक होते हैं। आज हम देखते हैं कि मिशनरी स्कूल या बड़े घरों के बच्चे जिन अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, वहां पांच या दस विद्यार्िथयों पर एक अध्यापक की व्यवस्था की गई है। इस प्रकार से मैं कहना चाहूंगा कि इस पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही साथ मैं आपको दूर-सुदूर देहात और गांवों की तरफ ध्यान आकर्िषत करना चाहूंगा जहां आज भी छुआछूत के नाम पर, अस्प्ृाश्यता के नाम पर उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। कई पूर्व वकताओं ने कहा कि आज भी गांवों में प्रथा है कि कोई भी अनुसूचित जाति और जनजाति का नौजवान यदि अपनी शादी करता है तो वह घोड़ी पर नहीं जा सकता। उसी प्रकार अगर वह गांव से गुज़रते हुए देखता है कि कहीं बड़े वर्ग के लोग बैठे हुए हैं, तो उसको रास्ता बदलना पड़ता है। बहुत से बड़े वर्ग के लोग ऐसे हैं जिनके सामने वे लोग चारपाई पर नहीं बैठ सकते। कई कुएं ऐसे हैं जहां से वे पानी नहीं पी सकते। मैं माननीय सदस्यों को याद दिलाना चाहूंगा कि उनके क्षेत्रों में खासकर जहां मेहतर जाति और वाल्मीकि जाति के लोग रहते हैं, उनको पानी भरने नहीं दिया जाता है। आज हमने अपने निर्वाचन क्षेत्र में उनके गांवों में दस घरों के बीच में एक हैंड पंप लगाने की बात की है। आज होता यह है कि जब पूरा गांव पानी भर लेता है तब वह पानी भरते हैं और पानी भरने के बाद उस हैँड पंप को मिट्टी से धोया जाता है। आज हमारे देश को आज़ाद हुए पचास वर्ष हो गए हैं लेकिन हम जहां के तहां पड़े हुए हैं। पट्टे के नाम पर उनको जमीनें चाहे कृषि योग्य जमीनें हों या मकान बनाने के लिए हों, गांवों के बाहर मकान बनाने के लिए दी जाती हैं और जंगलों में मकान बनाकर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग रहते हैं। वहां कृषि योग्य भूमि को देखें तो उनको या तो ऊसर जमीन दी जाती है, या उन जमीनों को दिया जाता है जहां पर दबंग या सरदार लोग उस पर कब्जा किये रहते हैं। इस पर भी हमें विशेष ध्यान देना होगा कि आज अगर उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाना है तो हमें उनको ऐसी जमीनें मुहैया करानी होंगी जहां से उत्पादन करके वे अपना जीवन स्तर उठा सकें। इसी प्रकार मैं याद दिलाना चाहूंगा कि आपकी कल्याणकारी योजनाओं के तहत अनुसूचित जाति के नाम पर हम लोन देते हैं। आज अनुसूचित जाति का व्यकित ऋण नहीं लेता है लेकिन बिचौलिये और दलाल उनके फर्जी दस्तखत करके, अंगूठा लगाकर लोन निकाल लेते हैं और बाद में उनके पास नोटिस आता है कि आपके घर की कुर्की होगी। इस पर भी आपको विशेष ध्यान देना होगा। इसी प्रकार से अनुसूचित जाति की बच्िचयों की शादी के लिए धन देते हैं। आप उत्तर प्रदेश का रेकार्ड निकालकर देख लीजिए कि वहां अनुसूचित जाति की बच्िचयों की शादी के लिए आपने कितना धन दिया और कितना खर्च हो पाया है। इस ओर मैं आपका ध्यान आकर्िषत करना चाहूंगा। इसी प्रकार से आई.ए.एस. और पी.सी.एस. की कई कोचिंग संस्थाएं उनके लिए खुली हैं। उत्तर प्रदेश की हालत इतनी बदतर है कि विद्यार्िथयों के रहने की जगह नहीं है। वहां अच्छे प्रोफेसरों की व्यवस्था नहीं है ताकि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आई.ए.एस. और पी.सी.एस. में बैठकर आगे बढ़ सकें। इस ओर भी मैं आपका ध्यान आकर्िषत करना चाहूंगा। आज हमें गांवों की तरफ विशेष ध्यान देना होगा। अगर गांवों के लोग खुशहाल नहीं होंगे और तरककी नहीं करेंगे तो देश खुशहाल नहीं होगा और तरककी नहीं कर सकता । मैं आपका ध्यान अनुसूचित जाति के लोगों पर पुलिस द्वारा किये जाने वाले उत्पीड़न की ओर भी आकर्िषत करना चाहूंगा। मैं आपका ध्यान खासकर अपने प्रदेश उत्तर प्रदेश की ओर दिलाना चाहूंगा। पूर्व में कुछ सदस्यों ने जीरो अवर और नियम ३७७ के अधीन यह समस्या उठाई है। अगर कहीं पर कोई चोरी-डकैती होती है, राहजनी होती है तो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ज़बर्दस्ती इनवॉल्व किया जाता है और उन पर फर्जी मुकदमे लगाए जाते हैं। उनको फर्जी मुठभेड़ में मारा जाता है। यह सब रोकना होगा। पुलिस विभाग में आरक्षण भी देखना होगा कि अनुसूचित जाति के कितने अधिकारी उच्च पदों पर हैं या थानों में एस.एच.ओ. तैनात हैं। इस पर भी विशेष ध्यान देना होगा। अतिक़मण के नाम पर एनक़ोचमैंट के नाम पर आज जितने भी अतिक़मण हटाये जाते हैं, चाहे जंगलों की बात हो, चाहे प्लेन्स की बात हो, ज्यादातर किसान, मजदूर अनुसूचित जाति के ही हैं। उनके घरों को गिराया जाता है। उसके बाद उनका पुनर्वास करने के लिए आपके पास कोई योजना नहीं है कि उनको किसी अच्छी जगह स्थापित करके उनके जीवन-स्तर को ऊपर उठाया जाए। सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये श्री शैलेन्द्र कुमार : हमें उन्हें संवैधानिक रोजगार देना होगा। जो अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के संवैधानिक रोजगार थे, उन्हें वे अधिकार देकर आर्िथक रूप से मजबूत करना होगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं ज्यादा कुछ न कहते हुए अपनी बात यहीं समाप्त करना चाहूंगा, चूंकि बहुत से हमारे सम्मानित सदस्य अनुसूचित जाति और जनजाति से आये हैं, वे भी अपनी भावनाएं यहां व्यकत करेंगे। आपने मुझे बोलने का समय दिया उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

15.41 hrs.> श्री रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदय, शेडयूल्ड कास्टस और शेडयूल्ड ट्राइब्स के कमिश्नर की ३०वीं रिपोर्ट पर बहस के लिए आपने इजाजत देकर बड़ी कृपा की है, देश के लिए बड़ा भारी काम किया है। इस बहस का विषय बहुत लाभदायक व प्रासंगिक है। लेकिन प्रधान मंत्री जी को कमिश्नर ने जो पत्र लिखा है, उसमें उन्होंने लिखा कि मैंने राज्यों और केन्द्र सरकार के सभी स्तरों पर कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया, उन पर कारगर कार्यवाही के लिए आग्रह किया, मुख्य मंत्रियों और राज्यपालों तक को पत्र लिखे, परंतु किसी का कोई असर नहीं हुआ और विडम्बना यह रही कि देश के एक-चौथाई लोगों के संवैधानिक अधिकार की अवमानना के मामले में, भारत के प्रधान मंत्री से, उनकी अन्य मामलों में व्यस्तता के कारण बात करने का अवसर नहीं मिला। रिपोर्ट को देखने से यह पता लगता है कि सब रिपोर्ट आर्िटकल ३३८ के प्रावधानों के बावजूद भी देश के एक-चौथाई हिस्से की कया स्िथति है। सभापति महोदय, दुनिया के मुल्कों का जब कोई सम्मेलन यू.एन.ओ. या किसी अन्य स्थान पर होता है तो जिस प्रकार शूद्र या आदिवासी को पीछे बैठाया जाता है, उसी तरह से हिंदुस्तान को दुनिया के अन्य मुल्कों के पीछे बैठाते हैं। इसका कया कारण है। इसका सबसे बड़ा और मूल कारण यही है कि जिस देश में एक-चौथाई आबादी को अछूत, दबा हुआ, शोषित, गरीब, आदिवासी, हरिजन, शेडयूल्ड कास्ट और कया -कया नामों से नहीं पुकारा जाता है, मैं और नाम बोलूंगा तो यहां झंझट होगा, इन लोगों को कया-कया नहीं कहा गया। जब तक ये लोग पीछे छूटे रहेंगे, जब तक उनका अपमान होता रहेगा, तब तक दुनिया के मुल्कों की बैठक में, दुनिया के पैमाने पर भी हिंदुस्तान आगे नहीं बैठ सकेगा और आगे बढ़ा हुआ नहीं कहा जा सकेगा। जब तक देश की एक-चौथाई आबादी को छोटा और नीचा समझा जायेगा, उनकी स्िथति में सुधार नहीं होगा।

... (व्यवधान) श्री शकुनी चौधरी (खगड़िया): बिहार के दलितों के साथ भी अन्याय हुआ है, पहले उसको सुधारें। सभापति महोदय : अभी बिहार नहीं आया है। श्री रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं शकुनी जी का बड़ा आभारी हूं कि उन्होंने असली बात कहने के लिए मुझे उत्प्रेरित कर दिया। गांधी जी, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण इन सभी से हम लोगों ने सीखा - "ऊंची जाति की कया पहचान, गिटपिट बोले करे न काम" यानी कि अंग्रेजी में बहस करके, बात बनाकर निकल जाते हैं, लेकिन काम नहीं करते। "ऊंची जाति की कया पहचान, काम करे और सहे अपमान"। हिंदुस्तान में जितने काम करने वाले लोग हैं, जितने मेहनत करने वाले लोग हैं जैसे अनाज पैदा करने वाला, खेत जोतने वाला, दौनी करने वाला, उसौनी करने वाला, रौनी करने वाला, निकौनी करने वाला, ठेला चलाने वाला, ईंट पाथने वाला, घर बनाने वाला, कपड़ा बनाने वाला, दूध पैदा करने वाला, तरकारी पैदा करने वाला आदि इन सबको अछूत कह दिया गया। सभापति महोदय, जो मेहनत करने वाले लोग हैं, उनको कह दिया कि वे छोटे हैं और जो बैठकर खाने वाले लोग हैं, उनको कह दिया कि वे बड़े हैं। ये ऊंचे हैं और वे नीचे हैं। यह समाज में जो अन्याय हुआ, उसके खिलाफ लड़ाई चल रही है। उसी को सामाजिक अन्याय कहते हैं। बिहार में गांधी जी, लोहिया जी, जयप्रकाश नारायण जी और स्व. कर्पूरी ठाकुर जी कहा करते थे कि देश में जो गरीब हैं, जिन्हें छोटा कहा जाता है, जब तक उनको आगे नहीं लाया जाता, जब तक गैर-बराबरी की लड़ाई नहीं जीती जाती, तब तक यह देश तरककी नहीं कर सकता है।

... (व्यवधान) श्री थावरचन्द गहलोत (शाजापुर): सभापति महोदय, मैं माननीय सदस्य से पूछना चाहता हूं। चूंकि वे मेरी बात को सुनने के लिए तैयार हैं। इसलिए मुझे उनसे एक प्रश्न करने का अवसर दिया जाए। माननीय सदस्य जो कुछ बोल रहे हैं, वह बहुत अच्छा बोल रहे हैं। उन्होंने आयुकत की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि आयुकत ने मुख्य मंत्रियों को पत्र लिखे, राज्यपालों को पत्र लिखे, लेकिन उसी में यह उल्लेख भी है कि उन्होंने बिहार के मुख्य मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव जी को दो पत्र लिखे, जिनका जवाब तक उन्होंने नहीं दिया। इस बात का भी उल्लेख उन्हें अपने उद्धरण में करना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया?

... (व्यवधान) श्री रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं उस बारे में भी बताऊंगा कि उन्होंने कयों जवाब नहीं दिया। सभापति महोदय, हम पढ़ते रहे कि नया जमाना आएगा जिसमें कमाने वाला खाएगा और लूटने वाला जाएगा। जो जमीन को बोए वही जमीन का मालिक होए। दुनिया में उस समय कार्ल मार्कस ने कहा था कि आर्िथक गैर-बराबरी है, गरीबी है। आर्िथक गैर-बराबरी और गरीबी दोनों चीजें एक ही हैं। हिन्दुस्तान में दो तरह की गरीबी है। एक मानसिक गरीबी और दूसरी आर्िथक गरीबी। एक मन की गरीबी और दूसरी पेट की गरीबी। हमारे देश की एक-चौथाई जनता आज पेट की गरीबी से पीड़ित है, लेकिन उससे भी अधिक जनता मानसिक गरीबी के कारण त्रस्त है। इसलिए इस तरह की कार्रवाई होनी चाहिए जिसके कारण हमारे देश के लोगों की मानसिक गरीबी दूर हो और जब तक मानसिक गरीबी दूर नहीं होगी, तब तक आर्िथक गरीबी भी दूर नहीं होगी। जब पेट में आग लगती है, तब कुछ नहीं होता, कोई बदलाव नहीं आता, लेकिन पेट की वही आग, पेट से ऊपर उठकर जब मस्ितष्क में लगती है, तब गैर-बराबरी के खिलाफ लड़ाई चलती है और बिहार में वही हो रहा है। जो मानसिक गरीबी है, जो मानसिक गैर-बराबरी है, उसके खिलाफ लालू प्रसाद यादव जी ने लड़ाई प्रारंभ की है। गरीबों को सम्मान देकर, उनको प्रतिष्ठा देकर, गरीबों को जगाने का काम कर के, गैर-बराबरी के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। उसका व्यावहारिक रूप बिहार में देखने में आता है जिससे तमाम गरीब, दलित और आदिवासी और सारे पिछड़े वर्ग के लोग महसूस करते हैं कि हम बराबर हैं, हम किसी से पीछे नहीं हैं, हम किसी से छोटे नहीं हैं। उन्हें प्रतिष्ठा मिल रही है, उन्हें सम्मान मिल रहा है। यही कारण है कि एक-दो पार्िटयों को छोड़कर लगभग सभी पार्िटयां बिहार में लालू जी के खिलाफ हो जाती हैं, फिर भी हम चुनाव में उनको परास्त कर देते हैं। यदि एकट्ठे १०० पहलवान भी मैदान में आ जाएं, तो भी बिहार में लालू जी के सामने कोई टिक नहीं पाएगा। अभी हाल ही में चुनाव हुए, वनांचल के मुद्दे पर चुनाव हुए, लेकिन कोडरमा क्षेत्र में लालू जी की जीत हुई। सभापति महोदय, अभी पटना के गांधी मैदान में इसीलिए एक रैली भी हुई। उस "खबरदार रैली" में बहुत बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। लालू जी जेल में हैं, लेकिन खबरदार रैली में पटना का पूरा गांधी मैदान लोगों से भरा हुआ था जिसमें सब लोग एक थे। वह खबरदार रैली, न केवल जानदार रैली थी, बल्िक शानदार और जोरदार तथा सफलतम रैली थी जिसमें लोगों ने संकल्प लिया है।

... (व्यवधान) श्री सुशील कुमार सिंह (औरंगाबाद)(बिहार): यहां रैली का कोई वास्ता नहीं है। सभापति महोदय : आप अपना भाषण जारी रखिये। श्री रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं जो कुछ बोल रहा हूं, वह कुछ लोगों को अभी नहीं बुझेगा, जिंदगी भर नहीं बुझेगा कयोंकि मैं गैर-बराबरी के खिलाफ और शोषण के खिलाफ बोल रहा हूं। गरीबों का हजारों वषर्ों से शोषण किया जाता रहा है, उनको अपमानित किया जाता है। उनके बारे में कया-कया शब्द नहीं कहे जाते, वह मैं सब नहीं बता सकता कयोंकि वे असंसदीय शब्द हो जायेंगे। इसलिए कुछ लोगों को छटपटाहट हो रही है। वहां की बात सुनने की उनमें क्षमता नहीं है। उनको बैचेनी लगने लगती है कि मैं कैसी वाजिब बात बोल रहा हूं। सभापति जी, बिहार में एक थारू इलाका है, पश्िचमी चम्पारण है जहां आदिवासी लोग, जंगली, वनवासी और गरिवासी भी रहते हैं। उन तमाम लोगों के लिए पीने के पानी का व्यवस्था नहीं है। कपड़ों की व्यवस्था नहीं है, घर नहीं है। वे पेड़ के पत्तों की छांव में रहते हैं। थारू जाति के लोगों की ऐसी हालत है। छारू जाति का जिक़ रिपोर्ट में भी आया है। बिहार में ३० फीसदी आदिवासियों की पढ़ाई-लिखाई की कोई सुविधा नहीं है। अगर उनके घर में कोई बीमार है तो उसके लिए दवाई का कोई इंतजाम नहीं है। वहां आदिवासियों की हालत बहुत खराब है। इसी तरह जो पहाड़ी लोग हैं, उनकी संख्या घट रही है। उनकी भी स्िथति ठीक नहीं है। जब यह देश आजाद हुआ तब संविधान निर्माताओं ने महसूस किया कि धारा ३३८ के अधीन एक कमिश्नर बहाल किया जाये। फिर कहा गया कि एक कमीशन बहाल हो जो उनकी स्िथति के संबंध में देखे ताकि उनका सामाजिक, आर्िथक, शैक्षणिक आदि हर तरह से उन्नयन हो सके, वहां गैर-बराबरी मिट सके इसलिए यह कमीशन बनाया गया। उसी कमीशन की रिपोर्ट पर आपने बहस चलाने की कृपा की। मध्य प्रदेश में आदिवासी इलाका है, बंगाल में आदिवासी इलाका है, वे सब आदिवासी लोग मिलकर कह रहे हैं कि हमें ब्ृाहत् झारखंड चाहिए। मध्य प्रदेश का आदिवासी हो, उड़ीसा का हो या बिहार का हो, ये साझिश करके कहते हैं कि आदिवासियों के हित में झारखंड बनाना है ताकि वहां उनका राज हो। बिहार में आदिवासियों की ३० फीसदी आबादी १६ जिलों में रहती है। गैर-आदिवासी लोग उन पर कब्जा कर लेंगे इसलिए ब्ृाहत् झारखंड की मांग है। यह उनकी आंखों में धूल झोंकने वाली बात है। ये गरीबों को कहते हैं कि बिहार का विभाजन करेंगे। वहां उन सबने एकजुट होकर कहा कि बिहार का विभाजन हमें कबूल नहीं है। सभापति जी, गरीब लोगों का बहुत शोषण होता है। बिहार की मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी हैं। प्रधानमंत्री यहां से जाते हैं और बुलाते हैं। कया वहां राबड़ी देवी जी फूल लेकर खड़ी रहती? वहां भगवान बुद्ध का उत्सव था जिसमें बड़े-बड़े देशों के बीसियों लोग बैठे हुए थे। प्रधान मंत्री वहां जाकर कहते हैं कि बिहार में माफिया राज है, जो बड़ी शर्मनाक बात है। कया वे संस्कृति जानते हैं? ये लोग संस्कृति के दुश्मन हैं। देश का प्रधान मंत्री इस तरह से एक महिला मुख्यमंत्री के खिलाफ और बिहार के १० करोड़ लोगों का अपमान करे, इसे सहन नहीं किया जा सकता।

... (व्यवधान)

SHRI TAPAN SIKDAR (DUMDUM): What is the subject? I am sorry to say that this is not the relevant subject. Whatever he says is not fair. (Interruptions) He has to confine himself to the subject of Scheduled Castes and Scheduled Tribes... (Interruptions) What is this? (Interruptions) Does whatever he says have any credibility? सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये।

... (व्यवधान) सभापति महोदय : काफी लोग बोलने वाले हैं।

... (व्यवधान) श्री रघुवंश प्रसाद सिंह: सभापति जी, हिन्दुस्तान में जो भगवान हुए हैं, उनको भी इन्होंने माखन चोर कहा ... (व्यवधान) सभापति महोदय : आप अपने विषय पर आइये। अब आप समाप्त करिये।

... (व्यवधान) श्री रघुवंश प्रसाद सिंह : ये जो दबे-कुचले, दलित लोग हैं, उनकी मानसिक गरीबी हटाने के लिए शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

... (व्यवधान)इनके इलाके में जो घर बन रहे हैं।

... (व्यवधान)साढ़े चौदह हजार घर बन रहे हैं। नीचे से बन गया, छत नहीं बनी, उनका घर बनने से रुक गया - मैं इंदिरा आवास के बारे में कह रहा हूं। गरीब आदमी के पास छत भी नहीं है, पुराना घर भी टूट गया। इसलिए जो अपूर्ण मकान है, ईंट, सीमेंट की कीमतें बढ़ने से ज्यादा पैसा लग रहा है। साढ़े चौदह हजार में लैंटर तक जाकर मकान बनना रुक गया, छत नहीं पड़ी और वे बिना घर के हो गए। बीस हजार रुपये मिलते हैं। तमाम गरीब लोग मांग करते हैं कि पकका मकान बनना चाहिए लेकिन उन्हें राशि कम मिलती है जिससे उनका घर अपूर्ण रह जाता है।

>15.58 hrs. श्री कड़िया मुण्डा (खूंटी) : सभापति महोदय, रिपोर्ट के संबंध में बोलने से पहले, अभी पूर्व प्रवकता ने जिस तरह से बोला, मैं उस विषय में कुछ बोलना चाहूंगा। उन्होंने बिहार के संबंध में बहुत लम्बी-चौड़ी बातचीत की और बिहार को छोटे-बड़े करने की भी बहुत आलोचना की। लेकिन इनको शायद पता नहीं है कि ये जिस क्षेत्र से आते हैं, वहां अनुसूचित जन जाति के लोग नहीं हैं। इनको पता नहीं है कि अनुसूचित जन जाति के लोग कहां रहते हैं, कैसे रहते हैं, कया खाते हैं, कया करते हैं। इन्होंने आरक्षण की बहुत तारीफ की कि जो पदाधिकारी आरक्षण का पालन नहीं करेगा, उसे दंड दिया जाएगा लेकिन बिहार में इससे घोर उल्टा काम होता है। ... (व्यवधान) (कार्यवाही-व्ृात्तान्त में सम्िमलित नहीं किया गया।) सभापति महोदय : यह रिकार्ड में नहीं जाएगा। श्री कड़िया मुण्डा : उससे पहले ढाई साल मंत्री थे।

... (व्यवधान)इस तरह प्रतिवेदन के विषय से अलग होकर दूसरे विषय पर बोलने लगे और बिहार के संबंध में इतनी बातें करने लगे, लगता है कि सारा बिहार उन्हीं के पास था।

... (व्यवधान) आज हम जिस रिपोर्ट पर चर्चा कर रहे हैं, उस रिपोर्ट को बने हुए करीब आठ-नौ साल हो गए हैं। इससे पता लगता है कि केन्द्र सरकार इस समाज के प्रति कितनी चिंतित है। आठ-नौ साल पहले रिपोर्ट बनकर तैयार हो और उसके बाद आज उस पर चर्चा हो, अटपटा सा लगता है। मैं समझता हूं कि उसमें जितनी सिफारिशें की गई हैं, उस समय जो संदर्भ था, जो परस्िथति थी और जो उन्होंने देखा-सुना होगा, वह आज कितना बदल गया है। इसलिए मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि जब भी कोई प्रतिवेदन इनके संबंध में बनता है तो उचित समय और तत्काल उस पर बहस होनी चाहिए ताकि सिफारिश की हुई बातों के संबंध में चर्चा हो और सरकार उस पर अमल करे।

16.00 hrs. सभापति महोदय : कड़िया मुण्डा जी, अब आप अपना भाषण कल जारी रखेंगे, जब यह चर्चा अब कल आयेगी। अब हम नियम १९३ के अन्तर्गत जो चर्चा जो श्री आरिफ मोहम्मद खान जी ने प्रारम्भ की थी, उसके अन्तर्गत आगे कार्रवाई करेंगे। इस पर चर्चा होगी ।

Now, Shri C. Gopal will speak. श्री शैलेन्द्र कुमार :माननीय सभापति जी, आपसे निवेदन है कि बहुत महत्वपूर्ण चर्चा हो रही थी, इसको कंटीन्यू किया जाये। बहुत से सम्मानित सदस्यों को इस पर बोलना है। सभापति महोदय : आज की जो बिजनेस लिस्ट है, उसमें इसे चार बजे लिया जाना है। श्री शैलेन्द्र कुमार : इसको कल के लिए रखा जाये। बहुत से माननीय सदस्यों को इस पर विचार रखने हैं। इस पर बहुत से माननीय सदस्य छूट गये हैं, मैं चाहूंगा कि आप उनको भी मौका दें और उनकी बात को भी आप सुनें। इस चर्चा को कंटीन्यू करने दिया जाये।

... (व्यवधान) सभापति महोदय : आप बैठिये। यह चर्चा समाप्त नहीं हुई है, यह चर्चा अब कल चलेगी। यह चर्चा समाप्त नहीं हुई है, यह चर्चा आगे जारी रहेगी, मैंने यही कहा है। कड़िया मुण्डा जी से मैंने कहा कि आप कल अपना भाषण जारी रखेंगे। चूंकि चार बजे तक इसके लिए समय नियत था, इसलिए एट्रासिटीज़ के विषय को जिसे चार बजे लेना था। अब लिया है। श्री रामानन्द सिंह (सतना): मध्य प्रदेश में भी आदिवासियों के साथ पिछले ४० साल में जो लूट और डकैती हुई है ... (व्यवधान) सभापति महोदय : आप बैठिये। श्री रामानन्द सिंह :आदिवासी योजनाओं के नाम पर अरबों रुपये बेकार चले गये, हम इस पर बोलना चाहते हैं। सभापति महोदय : इस विषय पर कल चर्चा होगी। श्री रामानन्द सिंह : आप हमें कल समय देंगे कया? सभापति महोदय : आप बैठिये। इस पर चर्चा होगी। श्री रामानन्द सिंह : यह रिपोर्ट तो कमिश्नर की है। कमिश्नर तो सरकारी पक्ष को ही लिखते हैं। योजनाओं के नाम पर जो अरबों रुपये की सरकारी लूट हो गई, उसका कया होगा?

... (व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Now, Shri C. Gopal will speak.

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