State Consumer Disputes Redressal Commission
Rajendra Singh Verma vs Indraprasth Sahkari Avas Samiti on 12 January, 2015
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2010/2137 (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Rajendra Singh Verma A ...........Appellant(s) Versus 1. Indraprasth Sahkari Avas Samiti a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE Virendra Singh PRESIDENT For the Appellant: For the Respondent: ORDER राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ। सुरक्षित अपील संख्या-2137/2010 (जिला उपभोक्ता फोरम, गौतमबुद्ध नगर द्वारा परिवाद संख्या-163/2010 में पारित निर्णय दिनांक 16.11.2010 के विरूद्ध) श्री राजेन्द्र सिंह वर्मा पुत्र श्री आर.आर.वर्मा, 106 मीकान अपार्टमेन्ट सी-58/10 सेक्टर 62 नोएडा। .........अपीलार्थी@परिवादी बनाम् दि कमेटी आफ मैनेजमेन्ट, मीकान इन्द्रप्रस्थ सहकारी आवास समिति लि0 58-10 सेक्टर 62 नोएडा। ........प्रत्यर्थी/विपक्षी समक्ष:- 1.
मा0 श्री चन्द्र भाल श्रीवास्तव, पीठासीन सदस्य।
2. मा0 श्री राज कमल गुप्ता, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री अनिल कुमार मिश्रा, विद्वान अधिवक्ता। प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित :श्री राकेश श्रीवास्तव के सहयोगी श्री आशुतोष शर्मा, विद्वान अधिवक्ता। दिनांक 15.10.15 मा0 श्री राज कमल गुप्ता, सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय
प्रस्तुत अपील जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम गौतमबुद्ध नगर के परिवाद संख्या 163/2010 में पारित निर्णय एवं आदेश दि. 16.11.2010 के विरूद्ध योजित की गई, जिसके अंतर्गत परिवाद को निरस्त किया गया है।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार है कि अपीलार्थी/परिवादी मीकान इंद्रप्रस्थ सहकारी आवास समिति का सदस्य है। प्रत्यर्थी एक पंजीकृत सहकारी समिति है। प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी को सूचित किया कि उसके विरूद्ध कुछ बकाया है, जिसे जमा किया जाए, जिस पर परिवादी/अपीलार्थी द्वारा कहा गया कि उसके द्वारा सभी विधिक देयों का भुगतान किया जा चुका है और अभिलेखीय साक्ष्य मांगे जिसे प्रत्यर्थी/विपक्षी ने उपलब्ध नहीं कराए। इस विवाद को कारपोरेट सोसायटी एक्ट में दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत आर्बीटेशन में उठाया गया। आर्बीटेटर ने अपीलार्थी के मांग को खारिज कर दिया, जिसके विरूद्ध कारपोरेट ट्रिब्यूनल में अपील भी दायर की गई।
पीठ ने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ताओं की बहस को सुना एवं पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों एवं साक्ष्यों का भलीभांति परिशीलन किया गया।
-2-पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि परिवादी/अपीलार्थी प्रत्यर्थी आवासीय सहकारी समिति का सदस्य है और इस सोसायटी के अंतर्गत उसको एक फ्लैट आवंटित है, जिसका उसे कब्जा प्राप्त है। अपीलार्थी/परिवादी व आवासीय सोसायटी के प्रबंध तंत्र से उसका विवाद है। अपीलार्थी/प्रत्यर्थी ने समिति पर कई आरोप लगाया है और आवश्यक सुविधाएं न उपलब्ध कराया जाना, अधिक धन लिया जाना समिति द्वारा कई गलत कार्य किया जाना पूर्णता प्रमाणपत्र न दिया जाना इमरजेन्सी पावर सप्लाई को न शुरू किया जाना, भुगतान की रसीद दिलाया जाना तथा खर्चों का विवरण आदि अंनेक मांगें रखी हैं, जिन्हें पालन कराए जाने के लिए उसके द्वारा परिवाद प्रस्तुत किया गया है। जिला मंच ने समस्त साक्ष्यों और अभिलेखों का अध्ययन करके यह पाया कि पक्षकारों के मध्य इतना विवाद है, जिसका निस्तारण व्यवहार न्यायालय द्वारा ही संभव है। जिला मंच ने यह भी पाया कि परिवादी को विपक्षी बकाएदार बताता है, जबकि परिवादी का स्वयं का कहना है कि उसके विरूद्ध कोई विधिक मांग देय नहीं है। जिला मंच ने यह पाया कि परिवादी ने जो परिवाद प्रस्तुत किया है, उसके संदर्भ में निर्णय दिया जाना व्यवहार न्यायालय द्वारा ही संभव है और उपभोक्ता फोरम से परिवादी को अनुतोष उपलब्ध कराया जाना संभव नहीं है।
पीठ जिला मंच के निष्कर्ष/निर्णय से सहमत है कि जो अनुतोष अपीलार्थी द्वारा अपने परिवाद में चाहा गया है वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत समरी कार्यवाही में निस्तारित नहीं किया जा सकता है। इसमें विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता होगी।
मा0 राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग नई दिल्ली ने समतुल्य तथ्यों पर आधारित प्रकरण Vishamber Sunderdas Badlani And Vs. Indian Bank and Ors.I (2008)CPJ 76 NC में निम्नांकित मत अभिव्यक्त किया:-
"Seeing various judgment of the Supreme Court and this Commission, It is evident that whenever not only the complicated questions of law but disputed questions of facts, relating to unauthorized representations made about paying higher rate of interest and requirement of recording voluminous evidence etc. and relating to forgery and conspiracy involving eight persons and other points mentioned earlier are involved. It would be desirable that the matter should not be dealt with by this Commission and could be relegated to the Civil Court. We feel that in the present state of law and the observations of the Supreme Court itself and the aforesaid circumstances, we cannot take any other view."-3-
उपरोक्त विवेचना के दृष्टिगत प्रस्तुत अपील निरस्त किए जाने योग्य है।
आदेश प्रस्तुत अपील निरस्त की जाती है।
पक्षकरान अपना-अपना अपील व्यय स्वयं वहन करेंगे।
(चंद्र भाल श्रीवास्तव) (राज कमल गुप्ता) पीठासीन सदस्य सदस्य राकेश, आशुलिपिक कोर्ट-2 e='text-decoration:none'> [HON'BLE MR. JUSTICE Virendra Singh] PRESIDENT