Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Constitution ... on 27 April, 2012

> Title: Further discussion on the motion for consideration of the Constitution (Amendment) Bill, 2010 (Amendment of the Eighth Schedule) moved by Shri Satpal Maharaj on the 19th August, 2011 (Bill Withdrawn).

श्री नवीन जिन्दल (कुरुक्षेत्र): महोदय, मेरे वरिष्ठ साथी श्री सतपाल महराज जी ने सदन के सामने गढ़वाली और कुंमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा है। मैं उनके द्वारा प्रस्तुत संविधान संशोधन विधेयक का पूर्णतः समर्थन करता हूं।

          महोदय, जन्म लेने के बाद बच्चा जिस भाषा में माता-पिता से लोरी सुनता है, जिस भाषा में अपने परिवार संगी-साथियों एवं अन्य परिजनों से बातचीत करता है, वह भाषा उसके तन-मन में समा जाती है। वह भाषा न केवल उसकी ज़ुबान पर विराजती है, बल्कि उसके खून में, उसके संस्कारों में और उसके स्वभाव में समा जाती है। ऐसी भाषा उसके अस्तित्व की मांग होती है। उसी मातृभाषा के सहारे लोगों में आपसी सद्भाव, स्नेह और प्रेम का विकास होता है। कहा भी है:

“अपनी भाषा यों फले जैसे मां का प्यार, मीठे बोलों से बने स्नेह भरा संसार। ”   अतः हर व्यक्ति की स्वाभाविक कामना होती है कि वह अपनी मातृभाषा का विकास, प्रचार-प्रसार करे, इसी पवित्र भावना से ही प्रेरित होकर सतपाल महराज यह विधेयक लेकर आए हैं। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिन्दी भारत की राजभाषा है तथा संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाएं इसके समकक्ष हैं। जब संविधान लागू हुआ, उस समय केवल 14 भाषाएं ही इस अनुसूची में शामिल थीं। आज इस अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं। बोडो, डोंगरी, कोंकणी, मैथिली, मणिपुरी, नेपाली, संथाली तथा सिंधी भाषाएं समय-समय पर, जनभावनाओं को देखते हुए इस सूची में जोड़ी गयी हैं।  इस विकास-क्रम में इस विधेयक को देखा जाना चाहिए। किसी भी जाति, समाज तथा देश की समृद्धि उसकी भाषा में रचे गए साहित्य से पहचानी जाती है। भारत अपनी जिस विद्या, ज्ञान और साहित्य के बल पर गौरव अनुभव करता है, उसमें सभी भारतीय भाषाओं और बोलियों का अपना-अपना योगदान है।
          मेरा निवेदन है कि भारतीय साहित्य, इतिहास और जीवन-शैली के विकास में हरियाणा और हरियाणवी भाषा के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। यह भाषा हरियाणा प्रदेश के अलावा पश्चिमी दिल्ली के हरियाणा प्रांत की सीमा से लगे भाग, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ प्रमुख जिलों तथा पंजाब एवम् राजस्थान के काफी हिस्सों में लगभग चार करोड़ लोगों द्वारा बोली तथा समझी जाती है।
          आज भी करोड़ों लोग हरियाणवी गीतों, रागिनियों, सांगों तथा हास्य-विनोदों का आनंद उटाते हैं। मैं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि हरियाणा में जन्में या हरियाणा से निकलकर विदेशों में बसे प्रतिष्ठित परिवारों में आज भी हरियाणवी भाषा बड़े चाव से बोली जाती है।
          अब मैं आपके माध्यम से माननीय सदन को हरियाणवी भाषा के उद्गम तथा विकास के बारे में कुछ जानकारी देना चाहता हूं। हरियाणवी भाषा हिन्दी की खड़ी बोली से जुड़ी हुई है। डा. जैनेन्द्र के अनुसार हिन्दी की व्याकरण हरियाणवी भाषा पर आधारित है। यदि अवधी और भोजपुरी हिन्दी के पेड़-पत्ते हैं तो हरियाणवी इसकी जड़ है। हरियाणवी भाषा में लगभग 400 वर्षों से साहित्यिक काम हो रहा है। 18वीं सदी के कवि निश्चल दास और गरीब दास हरियाणवी भाषा के माने हुए संत कवि हैं। महाकवि सूरदार हरियाणवी ब्रज के कवि हैं। 19वीं शताब्दी में अली बख्श और अहमद बख्श रेवाड़ी से लेकर कुरुक्षेत्र तक हरियाणवी भाषा में सांग करते रहे हैं। मेरठ निवासी शंकरदास, हरियाणवी भाषा में कविता करते थे। प्रसिद्ध सांगी पंडित लख्मीचंद, मांगेराम तथा उनके अनेक शिष्य आज भी हरियाणा में अत्यंत लोकप्रिय हैं। पंडित मेहर सिंह जैसे भजनी और नंदलाल कुंदनलाल जैसे प्रचारक पूरे इलाके में मशहूर हैं। सेठ किरोड़ीमल जैसे दानीजन इन महान कलाकारों के भजन सुनने के लिए रायगढ़ में बुलाते थे। कुल मिलाकर हरियाणा के सांगियों और भजनियों की दस हज़ार से भी ज्यादा रचनाएं हरियाणा में लोकप्रिय हैं।
          सभापति जी, एक रोचक तथ्य यह भी है कि हरियाणवी सांगों और भजनों के माध्यम से इकट्ठे किए दान से हरियाणा में करीब एक हज़ार गौशालाएं, पाठशालाएं, स्कूल, तालाब और कुएं बनवाए गए, जो आज भी हरियाणावासियों की सेवा कर रहे हैं। बल्लभगढ़, महरौली, नूह, गुड़गांव, पलवल, पहरावर की गौशालाएं हरियाणवी भाषा में रचित लख्मीचंद के सांगों के माध्यम से इकट्ठे किए गए दान से बनी हैं।
          मैंने अभी जिन-जिन कवियों और कलाकारों के नाम गिनवाए हैं, उनके द्वारा रचित साहित्य और सांगों द्वारा लंबे समय से आध्यात्मिक ज्ञान, जनजागरण तथा समाजसुधार का महान कार्य संपन्न होता आया है। अभी भी जगह-जगह पर हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, दिल्ली के पश्चिमी क्षेत्र तथा राजस्थान के कुछ भागों में हरियाणवी रागिनियां बड़े शौक से गाई तथा सुनी जाती हैं।
          मेरठ का नौचंदी मेला तथा गढ़मुक्तेश्वर के गंगा स्नान समागम में अभी भी हरियाणा के लोक गायक हरियाणवी भजन और रागिनियां गाते हैं और लोग बड़े चाव से सुनते हैं। यही समां हरिद्वार के कुम्भ के मेले में भी देखने को मिलता है। हरियाणा में लाखों की संख्या में जो लोग मेले और सम्मेलनों में आते हैं तो उनका विशेष आकर्षण हरियाणवी रागिनियां या लोकगीत सुनना होता है। पूरे भारत में हास्य के नाम पर अगर किसी भाषा को सुना जाता है, हरियाणवी हास्य को।
          सभापति जी, मैं आपके समक्ष यह विनम्र जानकारी देना चाहता हूं कि हरियाणवी भाषा एक ऐसी समृद्ध भाषा है जो संवैधानिक दर्जा पाए बिना भी अपना  भाषाई दायित्व निभाती चली जा रही है।
           सभापति जी, आज हरियाणवी भाषा के कवियों और साहित्यकारों की रचनाएँ बी.ए. से लेकर एम.ए. तक के पाठय़क्रम में पढ़ाई जा रही हैं। अनेक शोध-छात्र हरियाणवी साहित्य पर पी.एच.डी. कर रहे हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाएं हरियाणवी की कविताओं के साथ-साथ निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना और अनुवाद कार्य को प्रोत्साहन दे रही हैं। हिंदी की अनेक महानतम रचनाओं का हरियाणवी भाषा में अनुवाद किया जा चुका है। रामायण, गीता आदि ग्रंथों के अनेक हरियाणवी अनुवाद हो चुके हैं।
          यह भी रोचक तथ्य है कि उर्दू भाषा का जन्म हरियाणवी सिपाहियों की खड़ी बोली और फारसी भाषा बोलने वाले मुगल सिपहसालारों के आपसी तालमेल से हुआ है। वर्तमान हरियाणा तथा उसके आसपास के क्षेत्र में आमतौर पर सेना में भर्ती होने का प्रचलन रहा है।  आज भी प्रायः हर गांव से हरियाण के रण-बांकुरे भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की  सेवा कर रहे हैं। कभी सेना के विदेशी मुगल सिपाही फारसी बोलते थे तथा भारत के सैनिक खड़ी बोली बोलते थे। इन्हीं दोनों के आपसी संवाद से ही हरियाणवी भाषा अपने वर्तमान रूप में फली-फूली है।
          हरियाणा का अपना गौरवशाली इतिहास है। मेरा संसदीय क्षेत्र धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र भगवान श्री कृष्ण तथा सर्वश्रेष्ठ वीर अर्जुन के आपसी संवाद   ‘ गीता’  का गवाह है, जिसकी प्रसिद्धि विश्व के हर कोने में फैली हुई है। गीता विश्व का एक ऐसा ग्रंथ है जिसका अनुवाद हरियाणवी सहित विश्व की सबसे अधिक भाषाओं में हुआ है तथा जिसमें हर मानसिक व्यथा का समाधान और निदान निहित है। मुझे गर्व है कि इस संसद में मुझे इस धर्मक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य दो बार प्राप्त हो चुका है। मेरा आशय यह है कि हरियाणवी भाषा देशभक्तों और रणबांकुरों की भाषा है। इसे बोलने तथा समझने वालों की संख्या लगभग 4 करोड़ है। मेरा प्रस्ताव है कि हरियाणा प्रदेश तथा हरियाणवी बोलने व समझने वाले लोगों की भावनाओं का आदर करते हुए इस भाषा को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाए। ऐसा किए जाने से हर हरियाणवी गौरव महसूस करेगा तथा इस भाषा के समग्र विकास के लिए अधिक से अधिक प्रयत्न करेगा।
          मेरे से पहले इस चर्चा में भाग लेते हुए माननीय सदस्यों ने अपने प्रांत तथा वहां प्रचलित भाषा का गुणगान किया है। मैं उनके प्रांत-प्रेम तथा निज भाषा-प्रेम का आदर करता हूं। मुझे भी अपने प्रांत हरियाणा तथा वहां की भाषा हरियाणवी से उतना ही प्यार है। हरियाणा निवासी अपने सीधे-साधे अल्हड़ स्वभाव, मन की सादगी तथा विचारों की स्पष्टता के लिए प्रसिद्ध हैं। हरियाणवी में आपको भी कुछ बोलकर सुनाता हूं।
          एक बार एक आदमी हरियाणा में एक  ताऊ के पास गया और बोला कि ताऊ मने तेरी घोड़ी दे दे। ताऊ ने मना किया तो वो वापस चला गया। उसके बाद ताऊ ने उसे वापस बुला लिया और कहा कि घोड़ी तो कोई नहीं और होती तो भी  तन्ने  देता नहीं। हरियाणवी भाषा सुंदर, स्पष्ट, सरल तथा सीधी है। इसमें लाग-लपेट के लिए स्थान नहीं है। यही इसकी विशेषता है। यह वीरों की भाषा है। इसमें पराक्रम और अल्हड़पन का संगम है। आज भारत को इसी बेबाक पराक्रम की आवश्यकता भी है।
          अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। उस अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में हरियाणा के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत लोकगीत - मेरा झूमर मंगा दे रे, ओ नंदी के बीरा - ने धूम मचाकर सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति का स्थान प्राप्त किया था। जिन्होंने भी इस गीत तथा प्रस्तुति को देखा था वह आज भी उसे भुला नहीं सके हैं। इस प्रकार के लोकगीत, भजन, रागिनियां जीवन के हर प्रसंग से जुड़कर हरियाणवी भाषा को सुसज्जित कर रहे हैं           सभापति महोदय, यह भाषा सुनने वाले का मन मोह कर अपनी अमिट छाप छोड़ देती है। मैं माननीय मंत्री जी का, जो हमारे पड़ोस के राज्य राजस्थान से आते हैं, वे हरियाणा के लोगों की भावना का आदर करते हुए न केवल कुमाऊँनी, गढ़वाली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का अश्वासन देंगे, बल्कि हरियाणवी भाषा को भी आठवीं अनुसूची में शामिल करके देश के पौरष और अल्हड़पन को बनाए रखने का निश्चित आश्वासन प्रदान करेंगे।...( व्यवधान) आठवीं अनुसूची में राजस्थानी भाषा भी होनी चाहिए। हमारे पूर्वज जितनी अच्छी तरह से भाषाएं बोलते थे, उतनी अच्छी तरह से हम नहीं बोलते हैं। अगर हम अपने बच्चों को देखें तो वे अंग्रेजी के अलावा कुछ नहीं बोलते हैं, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इन क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षण और प्रोत्साहन दिया जाए। अगर हम इन भाषाओं को संरक्षण और प्रोत्साहन नहीं देंगे, तो आगे आने वाले 50 या 100 वर्षों में क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त हो जाएंगी और इसके लिए हम दोषी होंगे। सरकार की तरफ से इन भाषाओं को प्रोत्साहन और संरक्षण दिया जाना चाहिए। आज हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आपका हमें संरक्षण चाहिए, जिससे कि मंत्री जी हमारी प्रार्थना को मानें। मेरे कहने का सारांश है कि इन क्षेत्रीय भाषाओं को लुप्त होने से बचाने के लिए संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि सदन के सभी सदस्य इस बात से सहमत होंगे और माननीय मंत्री जी सदन की भावनाओं का सम्मान करेंगे।
          महोदय, मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर बोलने का मौका दिया।
 
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):महोदय, सतपाल महाराज जी प्राइवेट मेम्बर बिल के जरिये विधेयक प्रस्तुत किया है कि गढ़वाली और कुमाऊँनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाए, मैं इस विधेयक का पुरजोर समर्थन करता हूं।
  16.53 hrs. (Shri Satpal Maharaj in the Chair) मैं मानता हूं कि व्यक्ति सबसे ज्यादा अगर कुछ सीखता है, तो वह मातृभाषा द्वारा ही सीखता है। सबसे ज्यादा अगर व्यक्ति को ज्ञान हासिल होता है, तो वह मातृभाषा द्वारा ही होता है। मैं महात्मा गांधी जी की एक बात को सदन में कहना चाहता हूं। महात्मा गांधी जी जब 9 जनवरी, 1915 को अफ्रीका से भारत लौटे थे, तो वह दिन देश भर में प्रवासी दिवस के रूप में मनाया गया था। महात्मा गांधी जी ने कहा था - " मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे आत्महत्या ही करते हैं तथा यह उन्हें अपने जन्म सिद्ध अधिकार से वंचित करती है। "  अनिवार्य शिक्षा कानून में भी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण कराने का प्रावधान रखा गया है। मान्यवर, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आपने क्यों अनिवार्य शिक्षा का कानून पास किया है और महात्मा गांधी जी की बात को भी भुला दिया और राइट टू एजुकेशन एक्ट में भी लिखा है कि आठवीं कक्षा तक की शिक्षा आप मातृभाषा में देंगे और प्राइमरी शिक्षा तो मातृभाषा में ही देंगे। शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा अनुच्छेद 29 (2) एफ के बारे में कह रहा हूं।  मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आपने पूरे देश में राइट टू एजुकेशन एक्ट लागू कर दिया और उसमें 29 (2) एफ का  प्रावधान किया और  मातृभाषाओं को मान्यता नहीं दे  रहे हो, यह कन्ट्राडिक्शन हो रहा है। मैं आपके माध्यम से सरकार को यह चेतावनी देना चाहता हूं कि ऐसा कन्ट्राडिक्टरी कानून बनाने का क्या आपको अधिकार था और अगर बना भी लिया है, तो उसकी पालना क्यों नहीं की जा रही है।  मैं कहना चाहता हूं कि गढ़वाली को मान्यता मिले, कुमाऊनी को मान्यता मिले। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, श्री हुक्देव नारायण यादव जी यहां बैठे हुए हैं, यह अभी हमसे चर्चा कर रहे थे कि जब एनडीए का शासन था तो अटल जी के सामने मैथिली को मान्यता देने का मसला आया और मैथिली का सम्मान करते हुए अटल जी ने तनिक भी नहीं सोचा और तुंत ही मैथिली को मान्यता दिलाई। गृह मंत्रालय में मंत्री जी बैठे हैं, जब इश्यु आया कि भाषाओं को मान्यता दी जाए या नहीं दी जाए तो  उन्होंने एक सीता कान्ता महापात्रा कमेटी बनाई और सीता कान्ता महापात्रा कमेटी ने जितने भी प्रस्ताव पैंडिग थे, उन सबका अध्ययन किया। वैसे हम कहते हैं कि सबको मान्यता मिलनी चाहिए। लेकिन सीता कान्ता महापात्रा कहता है, वह एक एक्सपर्ट थे और उड़ीसा के थे। उन्होंने कहा कि भोजपुरी और राजस्थानी दो ऐसी भाषाएं हैं कि यदि इन्हें तुंत मान्यता दें तो कोई हर्ज नहीं है। उसके बाद हमारे सांसदों ने यह मामला उठाया। हालांकि जब से यह हाउस बना है, तब से लगातार राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलनी चाहिए, यह विषय आता रहा है। नागौर से डा.ज्योति मिर्धा जी अभी मेरे साथ हाऊस में  आ रही थीं, वह मुझसे कह रही थीं कि राजस्थानी के बारे में आप जोर से बोलना। मैं आपको बताना चाहता हूं कि पहले भारत सरकार यह ऑब्जैक्शन करती थी कि राजस्थान विधान सभा से सर्वसम्मत स्वीकृत प्रस्ताव नहीं है। इस कारण से हमारे प्रपोजल अटक जाते थे। मैं धन्यवाद दूंगा, उस समय कांग्रेस की सरकार थी और 25 अगस्त, 2003 को राजस्थान विधान सभा का ऐतिहासिक दिन था, जिस दिन मंत्री जी आपकी सरकार थी। आप भी एम.एल.ए. थे, हाउस में थे।

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री जितेन्द्र सिंह) : हां, तब मैं एम.एल.ए. था।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : हमारे सारे विपक्ष ने सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया कि राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलनी चाहिए, क्योंकि इस भाषा को दस करोड़ लोग बोलते हैं। उस समय यह विवाद था कि दस करोड़ लोग कहां होंगे। मैं आपको बताता हूं कि छः करोड़ लोग राजस्थान में हैं, एक करोड़ लोग नार्थ ईस्ट में कोलकाता, गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ में हैं, जो राजस्थानी भाषा बोलते हैं, अब चाहे वहां बस गये हों। उसके बाद एक करोड़ लोग शेष भारत में हैं और एक करोड़ लोग भारत को छोड़कर पूरे संसार में हैं, फिर लोगों ने कहां कि दस करोड़ कैसे हुए। हमारे एक करोड़   लोग पाकिस्तान में भी हैं। ऐसा करके दस करोड़ लोग हैं और यह दस करोड़ लोगों की भाषा है, यह बहुत पुरातन और प्राचीन भाषा है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब 25 अगस्त, 2003 का  विधानसभा प्रस्ताव आने  पर  संसद में चर्चा हुई और हमारे श्री श्रीप्रकाश जायसवाल जी  गृह राज्य मंत्री थे, उन्होंने 17 दिसम्बर, 2006 को लोक सभा में आश्वासन दिया, यह 14वीं लोक सभा का आश्वासन था, उन्होंने कहा था कि हम इसी सत्र में राजस्थानी और भोजपुरी भाषा को मान्यता देने के प्रस्ताव का बिल लेकर आयेंगे। मैं कहना चाहता हूं कि एक बार जब मैं चर्चा कर रहा था तो लोगों ने कहा कि इस हाउस की सैंक्टिटी कम हो रही है। मैं कहना चाहता हूं कि यह हाउस सबसे बड़ा हाउस है, इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है। अगर उस हाउस में किसी मंत्री के द्वारा कोई आश्वासन दिया जाता है तो उसकी पालना जरूर होनी चाहिए नहीं तो क्या होगा कुछ लोग कहेंगे We, the people of India फिर आप कहेंगे कि न्यायपालिका सक्रिय हो गई है, फिर आप कहेंगे की मीडिया सक्रिय हो गया है, क्यों नहीं होगा। जब हम अपने निर्णय की पालना नहीं करेंगे, अपने आश्वासन की पालना नहीं करेंगे तो मीडिया भी सक्रिय होगा और ज्यूडिशियरी भी सक्रिय होगी। इसलिए इस हाउस की सैंक्टिटी बनाये रखने के लिए जो भी आश्वासन श्री श्रीप्रकाश जायसवाल जी ने दिया था, जो उस समय गृह मंत्री थे, वह आश्वासन पूरा किया जाए और मेरा इससे भी आगे बढ़कर कहना है कि भोजपुरी, राजस्थानी, पहाड़ी, कुमाऊनी और अभी हमारे मित्र, श्री नवीन जिंदल हरियाणा की बात कर रहे थे, इन सबको भी मान्यता मिलनी चाहिए। जब हम महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानते हैं और महात्मा गांधी ने कहा था कि मातृभाषा में ही बच्चा सबसे ज्यादा सीखता है, सबसे ज्यादा विकसित होता है तो फिर क्या हम महात्मा गांधी जी को भी श्रद्धांजलि देना भूल गये।

17.00 hrs.           महोदय, मेरा आपके माध्यम से मंत्री जी से यह कहना है, मंत्री जी भी राजस्थान से आते हैं और इनके मंत्रालय में यह मामला अटका हुआ है। अटल जी ने मैथिली को सम्मान देने में तनिक भी समय नहीं लगाया था। हुक्मदेव यादव जी, शायद आपको याद होगा।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी): मैथिली के साथ और भी चार भाषाएं थीं।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : मैथिली के साथ और चार भाषाओं को सम्मान देने में अटल जी ने तनिक समय नहीं लगाया था। जितने भी प्रस्ताव पेंडिंग हैं, मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि इसमें क्या बजट लगता है? भारत सरकार कह सकती है कि इसमें तो बजट लगता है, इसके लिए बजटरी एलोकेशन नहीं है, इसलिए हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। मैं कहता हूं कि देश में जितनी भी बोली जाने वाली भाषाएं हैं और उनका इतिहास है, उनके लेख हैं, उनके साहित्यकार हैं तो उन्हें मान्यता देने में कौन सा बजट लगता है, उसमें कुछ बजट नहीं लगता है। यह काम तो ये कर ही सकते हैं। अभी हुक्मदेव जी कह रहे थे कि आप थोड़ा राजस्थानी में भी बोलना। ज्योति जी, क्या मैं कुछ राजस्थानी में भी बोलूं?

सभापति महोदय:  आप बोलिये।

अनेक माननीय सदस्य :  बोलिये।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : मंत्री जी भी आ गये हैं। मान्यवर, हमारी भाषा तो वह भाषा है, जो अकबर को भी सोने नहीं देती थी। अकबर के एक ही राजा कब्जे में नहीं आये थे, वे थे महाराणा प्रताप। एक हमारे राजस्थानी कवि ने लिखा है-

                                        माई एहडा पूत जन, जेहडा राणा प्रताप।

                                        अकबर सुतो औजके, जाने सिराने सांप।।

          महोदय, अकबर को रात को भी नींद नहीं आती थी कि कहीं महाराणा प्रताप आ तो नहीं गया है। जिस   भाषा  ने  अकबर को डराया था, हमारी ऐसी भाषा है। इस भाषा के बारे में कुछ कवियों ने यह भी कहा है, यह एक कवि की कल्पना है-

                                        रोटी-बेटी आपणी, भाषा अर बोवार।

                                        राजस्थानी है भाई, आडो क्यूं दरबार।।

          यह दरबार आडे क्यूं आ गया, दरबार का मतलब आप, नवीन जी मेरी बात को समझ गये हैं, इस दरबार का मतलब आप, दरबार का मतलब सरकार से है। रोटी-बेटी आपणी, भाषा अर बोवार, राजस्थानी है भाई, आडो क्यूं दरबार, वह आडे क्यूं आ गया है, सरकार यह ऑब्स्ट्रैक्शन पैदा क्यों कर रही है? एक कवि ने और लिखा है- मायड भाषा भली घणी, जो मातृभाषा होती है, वह मीठी लगती है, अच्छी लगती है, इसलिए लिखा है- मायड भाषा भली घणी, ज्यूं व्है मीठी खांड, जैसे चीनी मीठी होती है, ऐसे ही मायड भाषा मीठी होती है।

                              मायड भाषा भली घणी, ज्यूं व्है मीठी खांड।

                              पर भाषा नै बोलता, जाबक दीखै भांड।।

          मैं आपसे एक चीज और कहना चाहता हूं, अमेरिका ने जो इस राजस्थानी भाषा को सम्मान दिया है, वह मैं आपको बताना चाह रहा हूं। आप देखिये अमेरिका ने राजस्थानी भाषा को सम्मान दिया है। 24 जून 2011 को अमेरिका ने व्हाइट हाउस के प्रेसिडेंशियल अपाइंटमेंट की प्रक्रिया में राजस्थानी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं की सूची में सम्मिलित किया है। अमेरिका राजस्थानी भाषा को मान्यता दे रहा है, लेकिन भारत राजस्थानी को मान्यता नहीं दे रहा है, यह कैसी और किस तरह की अनदेखी है?

          महोदय, चूंकि आपका प्रस्ताव है, आप पीठ पर विराजमान हैं और माननीय मंत्री जी सामने बैठे हैं।

सभापति महोदय :  यह राजस्थानियों के लिए बड़े गौरव की बात है।

श्री अर्जुन राम मेघवाल :  महोदय, यह राजस्थान के लिए बहुत बड़े गौरव की बात है। यह वीरता की भाषा है, प्रेम की भाषा है। इतनी मीठी भाषा को अगर मान्यता नहीं मिलेगी तो इस सदन में भी मिठास थोड़ी कम रहेगी, मामला खट्टा हो जायेगा। अगर इस सदन की मिठास बढ़ानी है, तो  मातृभाषाओं को मान्यता देनी ही  होगी।   गांधी जी का यह सपना था कि मातृभाषा में ही बच्चा सबसे ज्यादा विकसित होता है, सबसे ज्यादा सीखता है, इसलिए माननीय मंत्री जी इसके लिए हमारा आपसे करबद्ध अनुरोध है। बहुत से लड़के हैं, जो विश्वविद्यालयों में भाषा पढ़ाते हैं, पढ़ते हैं, आकाशवाणी में काम करना चाहते हैं, उन्होंने नेट क्लियर किया हुआ है, ऐसा करने से बेरोजगारी की समस्या से उन्हें निजात मिलेगी। लोगों को रोजगार भी मिलेगा। राजस्थानी भाषा की   अस्मिता का सवाल है।

डॉ. ज्योति मिर्धा (नागौर): यहां पर भी एक-दो इंटरप्रैटर बैठेंगे और उन्हें भी रोजगार मिलेगा।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : हां, यहां भी एक इंटरप्रैटर होगा, इंटरप्रैटर की बात से ज्योति जी आपने ठीक याद दिलाया, गुजराती को इन्होंने 8वीं अनुसूची में सम्मिलित कर लिया, लेकिन यहां उस भाषा का इंटरप्रैटर नहीं है। मेरे माननीय साथी गुजराती में बोलना चाहते हैं तो इनसे कहा जाता है कि इंटरप्रैटर नहीं है। यह क्या समस्या है?

डॉ. ज्योति मिर्धा : उन्हें भी रोजगार मिलेगा।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : हां, रोजगार मिलेगा, इसलिए जितने भी 38 या 40 प्रपोजल हैं, मैं कह रहा हूं कि इसमें बजट  की समस्या आड़े नहीं आ रही है।  इन सबको मान्यता दे दो तो हमारी संस्कृति जीवित रहेगी, 40 इंटरप्रैटर भी लगेंगे और जिस क्षेत्र से लोग आएँगे, उस क्षेत्र से लोगों को इंप्लॉयमैंट भी मिलेगा और सम्मान भी मिलेगा। सम्मान के लिए ही यह देश है। यह संस्कृति तभी जीवित रहेगी, जब मातृभाषा को मान्यता मिलेगी। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

                                                                                                   

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):  सभापति महोदय, बड़ा ही अच्छा संयोग है कि माननीय सदस्य श्री सतपाल महाराज जो आसन पर विराजमान हैं, उनका ही यह विधेयक है और उस पर हमें समर्थन करने का मौका मिला। महोदय, यह विधेयक है कि कुमाऊँनी और गढ़वाली भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। मैं डॉ. लोहिया के आह्वान से शुरू करता हूँ कि -

          “अंग्रेज़ी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा   डॉ.लोहिया की अभिलाषा, चले देश में अपनी भाषा। ” महोदय, देशी भाषाओं की मर्यादा कम हुई है। अंग्रेज़ चले गए, लेकिन देश से अभी तक अंग्रेज़ी नहीं गई। देशी भाषाओं को लोगों ने कमज़ोर किया, इसकी उपेक्षा की गई।

          मैं इस विधेयक का पूरा समर्थन करता हूँ। मैं कुमाऊँनी के इतिहास में जाना चाहता हूँ। 1000 वर्ष से कम का इसका इतिहास नहीं है। वहाँ पहाड़ी हिन्दी कहा जाए, पहाड़ी भाषा कहा जाए, मध्य हिमालय में कुमाऊँनी और गढ़वाली, पश्चिम में गढ़वाली और पूर्व में कुमाऊँनी भाषाएँ वहाँ की पुरानी भाषाएँ हैं। ये बड़ी समृद्ध भाषाएँ हैं और इसका इतिहास है। इसमें एक से एक कलाकार हुए हैं, लेखक हुए हैं। हिन्दी में छायावाद के मशहूर कवि सुमित्रानन्दन पंत ने भी कुमाऊँनी में अपनी रचनाएँ की हैं। वे केवल ऐसे एक कवि नहीं हुए। मैं देखता हूँ कि पुराने समय से जिस समय कत्यूरी राजाओं का राज था, चंद राजाओं का राज था, वहाँ दो वंशों की हुकूमत चली है। दोनों वंशों की हुकूमत में राजभाषा जहाँ हिन्दी थी, वहाँ लोकभाषा और जनभाषा कुमाऊँनी और गढ़वाली थी। इसकी दस उपबोलियाँ थीं। हमारे देश में तो कहा जाता है -

          “कोसे कोसे पानी बदले, चार कोस पर बानी,  मुंडे मुंडे मतिर बदले, यह बात है पुरानी।” पुराने ज़माने से कहा जाता है कि कोस भर चलेंगे तो पानी बदल जाएगा। इस गाँव का पानी कुछ है तो अगले गाँव में कुछ और पानी होता है लेकिन चार कोस पर, यानी 12 किलोमीटर पर बोली बदलती है। हमारे देश में कितनी भाषाएँ हैं? जनगणना के मुताबिक 114 भाषाएँ हमारे देश में हैं और 212 मातृभाषाएँ हैं। दुनिया भर में तो 3000 से अधिक भाषाएँ हैं और कुछ भाषाएँ लुप्त हो रही हैं, कुछ भाषाओं को तो 15, 50  या 100 आदमी ही बोलते हैं। वे भाषाएँ लुप्त हो रही हैं। हमारे देश में भी भाषाएँ लुप्त हो रही हैं। उन भाषाओं को बचाना चाहिए, उस लिपि को बचाना चाहिए। अलग अलग भाषाओं की अलग अलग लिपियाँ हैं लेकिन गढ़वाली, कुमाऊँनी, मराठी और हिन्दी सभी की देवनागरी लिपि है। इसीलिए इसका बड़ा भारी महत्व है। कंप्यूटर के हिसाब से भी लोग कहते हैं कि यह सबसे वैज्ञानिक भाषा है। अंग्रेज़ी के लोग अंग्रेज़ी को धनी और विकसित भाषा कहते हैं, जहाँ शब्दों की इतनी कमी है कि दुनिया भर में अंग्रेज़ी शब्दों की संख्या लगभग सवा दो लाख होगी। देशी भाषाओं में शब्दों की संख्या सवा छः लाख है। अंग्रेज़ी को लोग धनी भाषा कहते हैं। महोदय, हमारे यहाँ रिश्ता होता है - साला है, जीजा है, बहनोई है।  

MR. CHAIRMAN :  Hon. Members, the time allotted for this discussion on the Bill is over.  I have five speakers on this Bill. If the House agrees, the time for the discussion on the Bill may be extended by one hour.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

MR. CHAIRMAN: The time for the discussion on the Bill is extended by one hour.

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, अंग्रेजी भाषा को लोग वैज्ञानिक समृद्ध कह रहे हैं। मैं बता रहा हूं कि हिन्दी भाषा में क्या खूबी है। जितना लिखना, उतना पढ़ना और उतना ही बोलना।  अंग्रेजी का through, बोलना डेढ़ अक्षर और लिखना t,h,r,o,u,g,h छः अक्षर लिखना। लिखना कुछ, बोलना कुछ और पढ़ना कुछ। इतना ही नहीं, एक जगह b,u,t बट तो दूसरी जगह p,u,t पुट। जहां बुट होना चाहिए वहां बट है और जहां पट होना चाहिए था, वहां पुट है। इसलिए जैसा चाहे वहां वैसा इस्तेमाल होता है। टी का उच्चारण कहीं, ट है, कहीं द है, कहीं स है और कहीं ब है। आप लेफ्टिनेंट की स्पैलिंग लिखकर देख सकते है। मैं भाषा विज्ञान में नहीं जाऊंगा, लेकिन मोटा-मोटी अंग्रेजी में सार और बहनोई में कुछ फर्क है! यह भाषा  की दरिद्रता है या धनीपन है। बर्दर इन लॉ मतलब सार, ब्रदर इन लॉ माने बहनोई। सार-बहनोई में अंग्रेजी में कोई फर्क ही नहीं है। हमारे यहां सभी के लिए अलग-अलग शब्द है। अलग-अलग व्यवहार है। कहते हैं कि अंग्रेजी धनी भाषा, काबिल लोगों की भाषा है। इसीलिए गड़बड़ी हुई है। देसी भाषा, अपनी मातृभाषा समृद्ध है। जितनी बात हम अपनी मातृ भाषा में कर सकते हैं, अनुसंधान कर सकते हैं, कह सकते हैं, बोल सकते हैं, अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में तो उसके लिए प्रयत्न करना होगा। इसीलिए कुमाऊंनी अपभ्रंश और शौरसेनी अपभ्रंश का इतिहास विवादित है। कोई कहता है कि शाक्य और कस्सय के हिसाब से पुराने जमाने में भाषा में हेर-फेर हुआ है। लेकिन ज्यादातर विद्वानों ने, जिनमें डॉ. नामवर सिंह ने यह सोच रखा है कि शौरसेनी अपभ्रंश से कुमाऊंनी और गढ़वाली का निर्माण हुआ है। शौरसेनी प्राकृत को भी कहते हैं। पुराने ज़माने से संस्कृत, प्राकृत, पाली, अपभ्रंश, मगधी, अर्द्धमाग्धी और जितनी भाषाएं हैं और फिर हिन्दी। अमीर खुसरो ने हिन्दी की शुरूआत की कि सरहपा जो सिद्ध के 80 योगी हुए हैं, सिद्ध हुए हैं, सरहपा के समय से हिन्दी की शुरूआत हुई। पहले तो खड़ी बोली ब्रज भाषा में चलता था। बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री, श्री भारतेन्दु हरिश्चंद्र के समय में विवाद हुआ कि नहीं हिन्दी और खड़ी हिन्दी में भी कविता की रचना की जा सकती है। नहीं तो पहले ब्रज भाषा में कविता चलती थी। इसलिए भाषा का बड़ा भारी जंजाल है। लेकिन कुमाऊंनी में लोकरत्न पंत कुमानी, महान कवि, उनका महान काव्य है। श्री कृष्ण पांडे, भारी कवि हुए हैं। श्री ज्वाला दत्त जोशी, श्री लीलाधर जोशी, श्री लालाधर जोशी, श्री चिंतामणि जोशी, बाइबिल, दुर्गा-चण्डी, पाठ सार का अनुवाद कुमाऊंनी में किया और फिर दस कुमार चरित का अनुवाद किया। श्री गौरी दत्त पांडे, श्री शिव दत्त सती। श्री सुमित्रानंदन पंत हिन्दी के मशहूर छायावादी कवि हैं। बाबू जयशंकर प्रसाद, श्री सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा महान कलाकार, साहित्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार हुए हैं। ये हिन्दी के स्तम्भ हुए हैं। दैदीप्यमान सितारे हैं। इन सभी पर हम को गौरव है। सुमित्रानंदन पंत ने कुमाऊंनी में रचना की। प्रोफेसर शेर सिंह बिष्ट अभी के विद्वान हैं। श्री जगदीश जोशी, श्री दीपक कार्ली, श्री बहादुर बोहरा श्री बंधु, ये सभी एक से एक महान कलाकार, साहित्यकार, उपन्यासकार, कवि और पत्रकार हुए हैं।         भाषा वह होती है जिसका व्याकरण हो, समृद्ध साहित्य हो, अथवा उनमें पत्रिकाएं निकलती हों।

          महोदय, हमें कुमाऊंनी का हजार वर्षों का इतिहास मिला है। लेकिन, हमें लगता है कि पुराने जमाने में जो ताम्र-पत्र आदि मिले हैं, उसके अनुसार गढ़वाली का 250-300 वर्षों का इतिहास मिलता है। पंडित लीलानन्द कोटनाला ने गढ़ गीता की रचना की। हरिकृष्ण दौरगादत्ती ने चेतावनी नामक ग्रंथ लिखा। श्री सत्य शरण रातुरी, श्री तारादत्त गैरोला, श्री महन्त योगेन्द्र पुरी, श्री चक्रधर बहुगुणा, श्री श्याम चन्द नेगी, श्री भजन सिंह, डॉ. शिवानन्द नौटियाल, डॉ. हरिदत्त भट्ट शैलेष, श्री ललित केशवान, डॉ. उमाशंकर समदर्शी, श्री अबोध बन्धु बहुगुणा इत्यादि ऐसे एक से एक महान कलाकार हुए हैं जिन्होंने साहित्य, उपन्यास, कविता, और महाकाव्य की रचना की है। मैं इन कलाकारों, साहित्यकारों, विद्वानों का नाम इसलिए ले रहा हूं क्योंकि सदन में मैं यह साबित करना चाहता हूं कि यह एक समृद्ध, सक्षम और लोक भाषा है।

          यह लोकतंत्र है। लोक भाषा, लोक भेष, लोक भूषा, सभी मिलकर लोकतंत्र होता है। लोकतंत्र वही होता है जहां लोक भाषा, लोक भेष, लोक भोजन चले। आजकल लोग नकल करके विदेशी चीज़ों को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। महोदय, लोकतंत्र के लिए लोक भाषा अपनी चीज है। इसको उजागर करने की जरूरत है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने भारत के संविधान की धारा 343 में हिन्दी के राजभाषा होने की घोषणा की। अनुच्छेद 344 में हिन्दी राजभाषा समिति का गठन किया गया। इसमें लोक सभा के बीस और राज्य सभा के दस सदस्य होंगे। गृह मंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं। यहां संसद ने वर्ष 1963 में इसके संबंध में कानून पारित किया। वर्ष 1963 में कानून बनाने के बाद वर्ष 1976 में नियमावली बनी कि राजभाषा कैसे लागू हो, देशी भाषा का कैसे विकास हो। इसलिए यह सवाल है कि देशी भाषा चलनी चाहिए।

          महोदय, अब मैं आठवीं सूची पर आ जाता हूं। आठवीं सूची में बाइस भाषाओं को दर्ज़ किया गया है। अटल जी ने मैथिली को शामिल किया। अभी उसमें 38 भाषाओं को शामिल करने की मांग की गयी है। श्री नवीन जिंदल हरियाणवी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने की मांग कर रहे थे। हरियाणवी कोई अलग भाषा नहीं है, वह तो हिन्दी है। पहाड़ी भी हिन्दी है। कुमाऊंनी और गढ़वाली को भी पहाड़ी हिन्दी कहते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में लोग अलग-अलग ढंग से इन्हें बोलते हैं। लेकिन इन सबका मूल एक है, ऐसा मैं कहना चाहता हूं। लेकिन, महोदय गृह मंत्रालय के पास आठवीं सूची में शामिल करने हेतु जिन 38 भाषाओं की सूची की मांग पड़ी हुई है, उसमें हरियाणवी नहीं है। अन्य सभी भाषाएं हैं।

          महोदय, अब मैं बताता हूं। उस समय बिना कायदा-कानून के, जैसे-तैसे बाइस भाषाओं को शामिल किया गया। अब देश भर से सवाल उठ गया है। वर्ष 2003 में सीताकांत महापात्रा कमेटी बनाई गयी। वर्ष 2004 में इसने रिपोर्ट दिया। सरकार ने इन आठ वर्षों में महापात्रा कमेटी की अनुशंसाओं के लिए क्या किया? उस पर आपने क्या कार्रवाई की है? आपने क्यों नहीं कार्रवाई की? यह किस कारण से रूका हुआ है, मैं यह सवाल उठाना चाहता हूं। आपकी नीति क्या कहती है? क्या महापात्रा कमेटी ने आपको मना किया? क्या कमेटी ने आपको कहा कि इस पर केवल विचार करते रहिए और कुछ नहीं करिए? इसलिए, यह सवाल उठ रहा है? कुमाऊंनी, गढ़वाली, और अन्य भाषाओं के लिए मांग बढ़ रही है। जैसे राजस्थानी भाषा के लिए श्री मेघवाल जी बोल रहे थे, उधर हरियाणवी भाषा के लिए माननीय सदस्य बोल रहे थे।

          महोदय, एक भाषा है भोजपुरी। विश्व भोजपुरी सम्मेलन का छठा सम्मेलन हो चुका। यहीं पर स्पीकर आसन से माननीय अध्यक्ष महोदया ने दो-दो बार जाकर उसे इनॉगोरेट किया है। जब विश्व भोजपुरी सम्मेलन होता है तो उसमें सभी पार्टी के बड़े-बड़े नेता गए। उसमें बाबू जय प्रकाश नारायण अग्रवाल भी गए होंगे। इन्हें तो विश्व भोजपुरी सम्मेलन में न्यौता मिलता ही है। आपके बिना वह कैसे चलेगा?  उसमें क्यों नहीं भोजपुरी का हुआ? क्या क्राइटेरिया है, सीताकांत महापात्रा कमेटी ने क्या कहा? 20-22 करोड़ की आबादी के लोग दुनिया भर में भोजपुरी बोलते हैं, वह भी समृद्ध भाषा है। बाबू कुंवर सिंह जी के उसमें चार-चार महाकाव्य हैं। “बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला गुलाल।” कुंवर सिंह जी का गीत वहां गांव-गांव में प्रचलित है। बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजी सल्तनत से चुनौती स्वीकार की थी। उन्होंने कई लड़ाईयों में अंग्रेजों को पराजित किया। उनका सेना-सिपाही, डगलस और ली ग्रांट एक से एक बहादुर सेनापति थे। बाबू कुंवर सिंह जी का नाम सुन कर अंग्रेजी सेनापति भाग गए थे। उसमें सारी गाथा है - “छुरी कटारी बिके इहमा, चूड़ी हारीन आवत नाहीं।” बाबू कुंवर सिंह को गोली लगी, उन्होंने गंगाजी में अपना हाथ डाल दिया। वहां काट कर चढ़ा दिया। एक कवि लिखते हैं कि पानी कहते हाथ को, बाबू कुंवर सिंह जी ने अपने हाथ को गंगाजी में डाल दिया, गंगाजी का पानी उसे बहाते हुए चल रहा है। उसे जमीन पकड़ रही है कि यह हमारा पानी है, हमारी इज्जत है, इसे हम आगे नहीं बढ़ने देंगे। ये सब भाषाओं में खूबियां हैं। इस तरह के भाव उनकी कविताओं में व्यक्त किए गए हैं। भिखारी ठाकुर, शेक्सपियर, अंग्रेजी के 80 हजार शब्द जानने वाले शेक्सपियर हो गए और भिखारी ठाकुर, उनका वहां प्रदर्शन हुआ, विधि व्यवस्था भंग हुई, वहां इतने लोग जुटे, वहां कभी शांतिपूर्वक कुछ हुआ ही नहीं। जैसे संस्कृत के कालीदास हुए, अंग्रेजी में शेक्सपियर हुए और भोजपुरी में भिखारी ठाकुर हुए। भिखारी ठाकुर की एक से एक रचना है और उनका जो प्रदर्शन हुआ, उनकी जो कला है तो भोजपुरी अभी तक क्यों नहीं हुई?

          श्री मेघवाल जी बता रहे थे कि इसमें तीन-चार बार सवाल उठा, ध्यान आकर्षण का प्रस्ताव आया।  सभी पक्ष से सभी माननीय सदस्यों ने उसका समर्थन किया, फिर क्यों नहीं हुआ? कहां, कौन सी शक्ति रोक रही है? श्री शिवराज पाटील, तत्कालीन होम मिनिस्टर ने सदन में कहा। श्री प्रकाश चंद जायसवाल ने सदन में कहा कि हम तुंत विचार करते हैं, कार्यवाही करते हैं, तुंत निर्णय करते हैं। इसे कौन सी कमेटी ने अभी तक रोका हुआ है। इसलिए हम जानना चाहते हैं, 38 भाषाओं की मांग है। उसमें एक वर्जिका लिच्छवी रिपब्लिक की भाषा है। राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा - “वैशाली जन का प्रतिपालक, गणका आदि विधाता, जिसे खोजता देश है आज, उस प्रजातंत्र की माता, रुको पथिक एक क्षण मिट्टी को शीश नवाओ, राजसिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ।” वैशाली, लिच्छवी रिपब्लिक वर्जी संघ के बारे में आप जानते होंगे कि आज से ढ़ाई हजार वर्ष पहले वहां भगवान बुद्ध गए थे। उन्होंने कहा - “बजिनाम सत् अपरिहानियां धम्मा।” पाली में, Certain virtues of Bajjians leading not to decline.  भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य से क्या कहा, आनन्द, यहां वर्जी संघ के लोग बार-बार असेम्बल होते हैं, एक साथ बैठते हैं। हम लोग एक साथ बैठे हुए हैं। ढ़ाई हजार वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने कहा कि जहां सात धर्मों का पालन होगा, वहां समाज तरक्की करेगा, उसकी अवनति नहीं होगी। मैं इन सात धर्मों के बारे में संक्षेप में बताता हूं। बजिनाम सत् अपरिहानियां धम्मा, यहां लोग बार-बार असेम्बल होते हैं। दूसरा, आपस में राय-मश्विरा करके निर्णय करते हैं, उसे लागू करते हैं। तीसरा, नियम बनाते हैं, तब हुक्म जारी करते हैं। यहां हम लोग नियम बनाते हैं, तब सरकार आदेश निकालती है। Democracy is the rule of law. वहां से शुरू हुआ, उस समय में दुनिया में डेमोक्रेसी का कोई नाम नहीं जानता था। हमें ये सिखाने आए हैं। हमने एब्राहम लिंकन से डेमोक्रेसी की परिभाषा नहीं सीखी है। हमारे पुरखों ने तीन हजार वर्ष पहले डेमोक्रेसी को पैदा किया है। चौथा, यहां बुजुर्गों की इज्जत है। जहां बुजुर्गों का कहा लोग मानते हैं। जिस समाज में बुजुर्गों की इज्जत होगी, सम्मान होगा, उनका कहा माना जायेगा-नम्बर चार। नम्बर पांच-यहां महिलाएं और बच्चे सुरक्षित हैं, महिलाओं और बच्चों की पूरी सुरक्षा है। नम्बर छः-यहां पवित्र स्थल का सम्मान है, उन्होंने चैत्य कहा, चैत्य पवित्र स्थल है, जन्मभूमि है, इन सभी का सम्मान होगा और फिर धर्माचार्य, ज्ञानी, विज्ञानी, ध्यानी, इनका भी सम्मान है, सुरक्षा है। जिस समाज में इन सात धर्मों का पालन होगा, वह समाज तरक्की करेगा, उसकी अवनति नहीं होगी। यह भगवान बुद्ध का वचन आज से 2500 वर्ष पहले वैशाली में शिष्य आनन्द से उन्होंने कहा, इसलिए वहां की भाषा बज्जिका है। महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने कहा कि बज्जिका जनतंत्र की भाषा है, यह लिच्छवी रिपब्लिक, बज्जी संघ की भाषा है। उसकी मांग भी सूची में है।

          उधर अंगिका, अंग देश पुराने जमाने में दानी राजा कर्ण के प्रदेश को लोग कहते थे...( व्यवधान)

सभापति महोदय : वह अंग देश का राजा था।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : इसलिए अंगिका का भी इसमें नाम है। अन्य जो 38 भाषाओं का नाम है, उन 38 भाषाओं में कौन-कौन सी भाषाएं यहां सरकार के पास पड़ी हुई हैं, अंगिका, बंजारा, बाजिका, भोजपुरी, भोटी, भोटिया, बुन्देलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली। महोदय, इसमें गढ़वाली भी यहां विचार में है। फिर गोंडी, गुज्जर/गुज्जरी, हो, कच्छी, कामतापुरी, कारबी, खासी, कोडावा, कोक बरक, कुमाऊंनी, कुरक है। ये सभी भाषाएं यहां पड़ी हुई हैं, इन पर क्यों निर्णय नहीं हुआ, क्यों सरकार अनिर्णय की स्थिति में है?

सभापति महोदय : कृपया संक्षिप्त करें।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : इसमें राजस्थानी भी है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हां, राजस्थानी भी है। इसमें लेप्चा, लिम्बू, मिजो, मगही, मुंडारी, नागपुरी, निकोबारी, पहाड़ी, राजस्थानी, सम्भलपुरी/कोसाली, सौरसेनी, सिराइकी, टेनयिडी और टुलू, ये सभी भाषाएं हैं। सरकार कौन सी उलझन में है और इनडिसीज़न में सरकार क्यों है? सीताकान्त महापात्र कमेटी की रिपोर्ट जब 2004 में आ गई तो आठ वर्षों तक सरकार ने क्या किया, जबकि यह सवाल यहां उठ रहा है? जनमत में सरकार हार का मुंह देख रही है, लोगों की मांग, सम्मेलन, आन्दोलन, ये सभी चल रहे हैं। उसके बाद भी सरकार बेखबर है और इसमें उखाड़-पछाड़, तोड़-फोड़ सरकार चाहती है कि जब वह होगा, तब लोगों की बात सुनी जायेगी? इसीलिए मैं सरकार को सावधान करना चाहता हूं, आपका जो निजी विधेयक आपने मूव किया है, इसमें कुमाऊंनी और गढ़वाली का समर्थन करते हुए अन्य भाषाएं जो हैं, भोजपुरी है, नहीं तो सरकार बताये कि इनको क्या कठिनाई है? नहीं तो वह बताये कि जो 22 का निर्णय हुआ है, उसका क्या क्राइटीरिया है।...( व्यवधान)

श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा (रोहतक):आपने हरियाणवी का समर्थन नहीं किया।...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हरियाणवी का जिक्र कैसे करें, यह तो आपकी सूची में है ही नहीं तो यहां भाषण करने से क्या होगा। हरियाणवी तो हिन्दी है, वह कौन सी अलग भाषा है।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : ये क्या करेंगे, सीताकान्त महापात्र की रिपोर्ट को इन्होंने संघ लोक सेवा आयोग को भेज दिया है, जिसने कहा है कि पेपर सैट करने वाले हमारे पास नहीं हैं। यह क्या तरीका है?...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिये, उनको बोलने दीजिए। माननीय सदस्य, अब समाप्त करें, कन्क्लूड करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : इसलिए सरकार इस पर संवेदनशील हो और सरकार सदन की, लोगों की राय की परवाह करे। यह डैमोक्रेसी नहीं चलती, जब लोगों की बात नहीं सुनी जाती, इसलिए महापात्र कमेटी आपने बताई, ठीक है। उस पर कार्रवाई को यदि रोक दिया तो यह भी बता दीजिए कि कमेटी को रोक दिया है, हमारे हाथ-पैर बांध दिये, हमको कुछ नहीं करना है और आठ वर्ष में आपने कुछ नहीं किया, 38 मांगें आपके पास पड़ी हुई हैं, उसमें यह सवाल अभी आया है, लेकिन भोजपुरी और अन्य सवाल हैं, उसमें हरियाणवी भी हो जाये तो हमको क्या हर्ज है, लेकिन आप प्रस्ताव तो राज्य सरकार से भिजवाइये।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : रघुवंश प्रसाद जी, अब समाप्त करिये।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यदि देशी भाषाएं मजबूत होंगी तो हिन्दी और समृद्ध होगी। महोदय, अभी हाल ही में श्री नौटियाल ने एक रिपोर्ट की है कि पहले दुनिया में 90 करोड़ लोग चीनी मंडारिन भाषा बोलते थे तो कहा जाता था कि ज्यादा लोग चीनी भाषा बोलते हैं। सेकेंड नंबर में अंग्रेजी बोलते हैं, थर्ड नंबर में हिंदी।  ऐसा नहीं है।  हाल ही में सर्वे हुआ है, अपने ही यहां के एक विद्वान ने सर्वेक्षण किया है, अब नंबर एक पर हिंदी बोली जा रही है, समझी जा रही है।  90-91 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी भाषा समझते, बोलते और बूझते हैं।  दुनिया की 124 यूनिवर्सिटीज में इसकी पढ़ाई शुरू हो गयी।  इसे वैज्ञानिक भाषा लोगों ने साबित किया कि यह कंप्यूटर की भाषा है।  सरकार इस पर निर्णय करे और इस ओर ध्यान दे।  इसका क्राइटेरिया भी सही है।  भोजपुरी क्राइटेरिया में छप रहा है, राजस्थानी क्राइटेरिया में छप रहा है, कुमाऊंनी या गढ़वाली में छप रहा है, तो सरकार इसे स्पष्ट करे।  यहां मंत्री जी उपस्थित हैं।  चिदंबरम जी को तो हिंदी भाषा बहुत बुझाती नहीं।  वह कहते हैं, “I do not know a word in Hindi.  Similarly, you do not know a word  of Tamil.”  हमने कहा कि तमिल के कई वर्ड्स को मैं जानता हूं, वणक्कम को जानता हूं, तिरूकुरल, तिरूवल्लुवर जो दक्षिण के कवि हुए हैं, उनकी कविता को ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  अब आप अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सुब्रमण्यम भारती और उधर के सब जो आलवार संत, नयनार संत और उधर से रामानुजाचार्य आदि सभी का जो दर्शन शुरू हुआ और इधर से डमरू बज गया, शंकर भगवान अगस्त ऋषि को भेज दिए, वहां दक्षिण में जाकर सिद्धा, उदयांत,यहां आयुर्वेद और पहाड़ में जाकर सोया-रिग्पा की पहाड़ी दवायें और भगवान बुद्ध के समय से ये सभी धन्वंतरि, सुश्रुत और चरकवचन जब से आया, उस समय से इलाज कर रहे हैं।  ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : मंत्री जी को जवाब भी देना है।  आपने प्रबल समर्थन दे दिया है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यह बात सरकार साफ करे, नहीं तो युद्ध के लिए तैयार रहे।  जनसंग्राम होगा, जब लोग बिगड़ेंगे, तो सरकार कहां टिकेगी? इसलिए मैं कहना चाहता हूं, नहीं तो इसको स्पष्ट करे।  जिस भाषा का उचित हक है, उसे वह मिले।  अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा, डॉक्टर लोहिया की अभिलाषा, चले देश में अपनी भाषा।

     

श्री जय प्रकाश अग्रवाल (उत्तर पूर्व दिल्ली) : सभापति महोदय, मैं आपका धन्यवाद करता हूं, जो प्रस्ताव आपने कुमाऊंनी और गढ़वाली का रखा है, मैं उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं, क्योंकि मेरा भी कोई न कोई हिस्सा वहां से जुड़ा हुआ है और वहीं से हम लोग दिल्ली में आए।  उसके साथ-साथ जो मांग दूसरी भाषाओं के लिए है, उसके समर्थन में भी मैं कुछ कहना चाहता हूं।

          दिल्ली का हमारा एक कल्चर है।  यहां लोग बाहर से बराबर आते रहे और यहां बसते रहे। बार-बार यहां पहनावा बदलता रहा, भाषा बदलती रही और आज एक बहुत बड़ी संख्या में भोजपुरी बोलने वाले लोग पूर्वांचल के दिल्ली में रहते हैं और तकरीबन पचास लाख से ज्यादा की उनकी आबादी है।  मेरा मानना है कि जब सरकार कुछ चीजों का ध्यान रखती है, तो यह जरूरी है कि हम उनकी भावनाओं का भी उतना सम्मान करें और उसकी कद्र करें।  बहुत दिन से यह मांग बदस्तूर हर सम्मेलन में रही है।  भोजपुरी बोलने वाले लोग सिर्फ हिंदुस्तान के किसी एक हिस्से में नहीं रहते हैं, बल्कि आज की तारीख में देश के हर प्रांत में रहते हैं, उसके अलावा विदेशों में भी शायद ही कोई शहर ऐसा बाकी होगा, जहां भोजपुरी बोलने वाले लोग जाकर न बसे हों।  दो ऐसे देश मॉरीशस और फिजी हैं, जिन्होंने उसे संवैधानिक दर्जा भी दिया, ताकि वहां लोग भोजपुरी को बोल सकें, पढ़ सकें।  इसका बहुत बड़ा-बड़ा इतिहास रहा है, अभी रघुवंश बाबू चले गए, उन्होंने इसका जिक्र भी किया, हुक्मदेव नारायण यादव जी ने भी इसका जिक्र किया, बहुत सारे ऐसे साहित्य हैं, जो लिखे गए।  बहुत सारे बड़े नाम लिए जा सकते हैं, आज की तारीख में बहुत सारी फिल्में जो बहुत पापुलर होती हैं, वह इसमें चलती हैं।  मैं सरकार से दरख्वास्त करूंगा कि हम एक मैच्योर पॉलिटिकल गवर्नमेंट चलाते हैं, तो यह जरूरी नहीं है कि जब कोई एजीटेशन हो, शोर मचे, लोग सड़कों पर आएं, आग लगाएं, उसके बाद यहां कोई बिल आप लाएं।  यह भी कोई पाबंदी नहीं है कि यदि कोई प्राइवेट मेंबर बिल यहां रखा जाए और वह अच्छा हो, जनता की मांग से जुड़ा हुआ हो, तो उसको मानने में भी कोई हर्जा नहीं है।  इससे सरकार कहीं छोटी नहीं होती है, आपको उसे जरूर मानना चाहिए।   यही भावना देश में रहने वाले बहुत बड़े तबके की है। पहले जैसे लोग दिल्ली में हिन्दी बोला करते थे फिर उसमें उर्दू का मिश्रण आया। उसके बाद हम अंग्रेजी के बहुत सारे शब्द हिन्दी में बोलते हैं। आज भोजपुरी का भी वही हाल है। कोई भी व्यक्ति यहां कोई सन्टेन्स बोलता है तो उसमें भी उसका कोई न कोई लफ्ज जरूर आता है। हम भी जब जाते हैं, यहां छठ पूजा मनती है। बहुत बड़ी तादाद में लोग उसे मनाते हैं। हर घर में तकरीबन दो, तीन या चार लोग हैं। उसका एक बड़ा अच्छा लफ्ज है - रउआ लोगन के स्वागत बा। इसका मतलब है कि मैं आप सब का बहुत-बहुत स्वागत करता हूं। हम राजनैतिक आदमी है। हम भी वहां जाते हैं तो हमें भी पढ़ने, सुनने और बोलने का मौका मिलता है। जो तादाद में ज्यादा होते हैं उनसे डर भी लगता है कि इनके आगे हाथ जोड़नी है, इनकी बात माननी पड़ेगी। सरकार से सिर्फ इतनी दरख्वास्त करूंगा कि आज वक्त है, आप नौजवान हैं, आप कुछ तब्दिली करें, बात मानें। एक बहुत अच्छा विषय और प्रस्ताव आपके सामने एक बहुत अच्छे व्यक्ति ने रखा है जो बहुत धार्मिक हैं और जिनके प्रवचन से सारी दुनिया लाभ उठाती है आज उसके प्रस्ताव का भी आपको लाभ उठाना चाहिए और माना जाना चाहिए। ...( व्यवधान) सर, मैंने सब की सिफारिश की।...( व्यवधान) महोदय, मैं हरियाणा की, राजस्थानी, मैथली  भोजपुरी इन सब का बहुत-बहुत समर्थन करता हूं।

    

SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Thank you Mr. Chairman for giving me this opportunity. 

          I stand to support the Bill introduced by hon. senior Member, Shri Satpal Maharaj, as it reflects the aspiration and emotional needs of the people of the State.  Language represents culture.  So, there is a link between culture and language.  What is the connection between them?  If you want to destroy a culture, kill the language, so goes a saying. 

          The Eighth Schedule of the Indian Constitution had originally listed 14 languages as Scheduled Languages and subsequently through so many amendments this number was raised to 22 languages.  Now the request of the hon. Member to include Garhwali and Kumaoni as Scheduled Languages requires serious consideration, of course, positively.  I fully support the ambition of hon. Member, Thiru Satpal Maharaj.

          Sir, this august House has eminent speakers who are well-versed in their mother tongue. Language is the light of the mind. When we speak in our mother tongue, we can put our thoughts very impressively.   So, everyone is very fond of his or her mother tongue. 

          When we promote one language, it should not be at the cost of other languages.  One of the ways of promoting a language is its use as official language.  At present, both Hindi and English have been recognized as official languages of the Union Government. I also have a strong desire like hon. Member, Shri Satpal Maharaj that my mother tongue – Tamil, which is an ancient language, should be made as one of the official languages of India for its promotion and development.   Even from the beginning, our Party has been giving a call to include Tamil, along with the other languages, in the Eighth Schedule as the official language of India. Our revered leader, hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. Puratchitalavi has been working hard to achieve this object.  This requires an amendment to article 343 of the Constitution.  This is a long felt demand of the people of not only Tamil Nadu but also other States. 

          India was re-organized into different States on the linguistic basis.   So, in my view, there is nothing wrong to include at least some important languages in the Eighth Schedule as official languages of the country fixing some criteria.

          I would like to take this opportunity to raise another important issue on which the Central Government should act early. This is with regard to conducting examinations of various Central Public Sector Undertakings and also of various Departments of Government for recruitment in both technical and non-technical posts. Now, for filling up these posts the examinations are being conducted only in Hindi and English, excepting a few Departments. The aspirants for such posts hailing from non-Hindi speaking areas are put to disadvantage. In order to ensure quality, parity and end discrimination, I would like to urge the Central Government to take suitable and immediate steps to permit candidates to write for these competitive examinations, for recruitment to various posts, in their regional languages, that is, their Mother Tongue. I would welcome the step taken by the Railway Ministry for permitting the candidates to write the Departmental examinations in Railways in the language of their own choice and also in their regional languages. I believe that the other Ministries will also follow the path of the Railway Ministry.

          Sir, before concluding, I would like to make it clear that I am not against any language but languages should flourish uniformly. ‘Rig Veda’ says that “one should respect his Motherland, his culture and his Mother Tongue because they are the givers of happiness.” In that sense, I fully support the Bill moved by Shri Satpal Maharaj for inclusion of Garhwali and Kumaon languages in the Eighth Schedule of the Indian Constitution. 

     

श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा (रोहतक):सबसे पहले मैं सभापति महोदय का धन्यवाद करना चाहता हूं कि हमें इस बहुत महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने का अवसर मिला। मैं भी अपनी ओर से गढ़वाली और कुमाउंनी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का पुरजोर समर्थन करता हूं। यह महत्वपूर्ण भाषा है। इनका इतिहास बहुत गौरवमय है। अभी रघुवंश प्रसाद जी और बाकी वक्ताओं ने इन भाषाओं के इतिहास के बारे में बताया। हमारा संबंध भी उस क्षेत्र से रहा है। पिछली तीन पीढ़ी से हमने वहां खेती की।

          सभापति महोदय, आप अच्छी तरह जानते हैं कि वहां बाजपुर पड़ता है। वहां हमने हल जोता है, ट्रैक्टर में हैरो जोती है, आप मान सकते हैं कि अब हल का जमाना नहीं रहा। हमने वहां खेती की है। यह भी एक इत्तिफाक की बात है कि कुमाऊं और गढ़वाल के बहुत से लोग मेरे लोक सभा क्षेत्र रोहतक में रहते हैं। उनकी बहुत बड़ी सभा भी है। इस बात में सफलता मिले न मिले, लेकिन मुझे यकीन है कि वे लोग आपको नागरिक अभिनंदन के लिए बुलाना चाहेंगे। मैं अपनी बात बहुत जल्दी समाप्त करते हुए कहना चाहता हूं कि हमारे सांसद नवीन जिंदल जी ने जो हरियाणवी भाषा को शामिल करने की बात रखी है, मैं उसका पुरजोर समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। उन्होंने बहुत लम्बी बात की है, मैं उन्हें दोहराना नहीं चाहूंगा।

    17.14 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair)           जब हम चर्चा कर रहे थे तो एक बात रखी गई कि राजस्थानी को इसीलिए शामिल किया जाए कि राजस्थानी बहुत मीठी भाषा है। मैं मानता हूं कि राजस्थानी भाषा को शामिल करना चाहिए। मगर यह भी कहना चाहता हूं कि यह कोई...( व्यवधान) चलिए, रिश्तेदारी भी है, इसलिए राजस्थानी भाषा को शामिल करना चाहिए। मगर केवल यह क्राइटेरिया नहीं, मैं कहना चाहता हूं कि हरियाणवी को इसलिए शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि हरियाणवी सबसे कड़वी भाषा हो, मगर बोलने वाले मीठे हैं, सच्चे-सीधे लोग हैं।...( व्यवधान)

श्री अर्जुन राम मेघवाल : हरियाणवी रागिनी को हम गाते हैं। जब हम वहां चुनाव प्रचार के लिए जाते हैं तो हरियाणवी रागिनी गाते हैं।...( व्यवधान)

श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा : बिल्कुल सही बात है।...( व्यवधान) हरियाणवी दिल से निकली हुई भाषा है और सच्चे-सीधे लोग हैं। हमारा देश हरियाणा, ये दूध-दही का खाना। सभापति महोदय, हमें विश्वासघात करना नहीं आता, हम सीधी बात करते हैं, सीधा बताते हैं। जो मन में है वह बात कहते हैं। जहां से हरियाणवी भाषा की शुरूआत हुई, मैं उसके बारे में बताना चाहूंगा। एक बार की बात है, भगवान शिव और पार्वती जी भ्रमण पर निकले हुए थे। -जब वे हिमालय से नीचे आये, तो एक ऐसी जगह पहुंचे, जहां खेत-खलिहान थे। वहां लोग बहुत खुश थे, खुशहाल थे। मगर पार्वती जी ने देखा कि वहां सारे गूंगे हैं, कोई बोल नहीं रहा। उन्होंने भगवान शिव से कहा कि हे प्रभु, आपका ऐसा क्या जुल्म है कि यहां पर कोई आदमी बोल नहीं रहा? भगवान शिव ने कहा कि पार्वती इनको यूं ही रहने दें।  ये जैसे हैं, वैसे ही रहने दें। मेरी बात मान, ज्यादा जिद नहीं करते। चलो, ये गूंगे हैं, गूंगे ही रह जायेंगे। कोई न कोई कारण है, कोई भेद है तने नहीं बताता, मगर इने गूंगा रहने दे। पार्वती जी ने उनको कहा कि नहीं, ये इतने खुश लोग हैं, इतने मेहनतकश लोग हैं, इतनी बढ़िया मेहनत कर रहे हैं, इन्हें आप भाषा जरूर देने का काम करें, बोली देने का काम जरूर करें। अगर नहीं देंगे, तो मैं आगे नहीं जाऊंगी, मैं यही रहूंगी। मैं भूख-हड़ताल पर बैठूंगी जब तक आप इन्हें भाषा नहीं देते। भगवान शिव ने काफी देर तक पार्वती जी को मना किया, मगर जब वे ज्यादा दुखी हो गये, तो उन्होंने अपनी जेब से एक जादू की लकड़ी निकाली और उनमें से एक को बुलाया कि यूं आ भाई।  जब आदमी उनके पास आया तो उसके मुंह पर, चूंकि वे गूंगे थे और मुंह सिला हुआ था, तो जो सिलाई थी, उसे हटाने का काम करना शुरू किया। जैसे ही थोड़ी सी सिलाई हटायी, उस आदमी ने झट से बोला कि अरे मूलड़, मेरे मुंह में यूं गुटका क्यों डालन लग रहा, इसे निकाल बाहर। कहने का मतलब यह है कि जो उनके मन में है, वही बात निकलती है। जो मन के अंदर बात है, वही बात निकालने का काम करते हैं, चाहे वह भगवान की बात हो या आम आदमी की बात हो।

          महोदय, यह शूरवीरों की भाषा है। शुरू से लेकर आखिरी तक आप हिन्दुस्तान का इतिहास देखेंगे, तो यहीं पर कुरुक्षेत्र की लड़ाई से लेकर पानीपत की लड़ाई हुई। आज भी यह भाषा हमारे देश की सारी सीमाओं पर बोली जाती है। हर दसवां सैनिक आज भी हरियाणा से आता है। चाहे कश्मीर की बात हो, कन्याकुमारी की बात हो, देश में अगर कहीं हमारी सीमा है और वहां कोई भाषा बोली जाती है, तो हरियाणा की भाषा बोली जाती है। यह भाषा हमारे किसानों की भाषा है। एक-तिहाई अनाज पूरे देश को देने का काम किसान करता है। गरीब, मजदूरों और व्यापारी की यह भाषा है। नवीन जी बता रहे थे कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चार करोड़ लोग इस भाषा को बोलते हैं। मैं इनको बताना चाहता हूं कि जब हम कोलकाता गये, तो इनके समाज के लोग हजारों की तादाद में हमारे स्वागत के लिए आये। मुझे लगता है कि वे हिन्दी भाषा नहीं बोल रहे थे। वे बंगाली बोल रहे थे या हरियाणवी भाषा बोल रहे थे। मैं जब अमेरिका पढ़ने और काम करने गया, तो मेरी गाड़ी में अगर कोई कैसेट या सीडी चलती थी, तो वह हरियाणवी रागिनियों की चलती थी। मैंने अमेरिका के अपने दोस्तों को भी हरियाणवी समझाने की पूरी कोशिश की। वहां पर मेरे जो हिन्दुस्तानी दोस्त थे, वे कहते थे कि भई, इन हरियाणवी कैसेटों को, रागिनियों को अपनी गाड़ी से निकाल दो और अंग्रेजी गीत इसमें डाल दो। मैंने उनको कहा कि भई ऐसा है, मेरे को तो हरियाणा से निकाल सकते हो, मगर मेरे भीतर से हरियाणवी नहीं निकाल सकते। यहां भी हरियाणवी रागिनी ठोकने का काम करूंगा। यह भाषा मेहनतकश लोगों की भाषा है। इस भाषा में खेत-खलिहान की सुगंध आती है। जैसे अभी नवीन जी ने बताया कि संत कवि निश्चल दास, गरीब दास हरियाणवी, महाकवि सूरदास हरियाणवी बृज, अहमद बख्श, मेरठ निवासी शंकर दास, पंडित लखमी चंद, मांगेराम, मेहरसिंह बरौनिया, नंदलाल आदि, चाहे वे भजनी हैं, कवि हैं या साहित्यकार हैं, 400 वर्ष से साहित्य का काम इस भाषा में हो रहा है। मैं मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि इनका लोक सभा क्षेत्र अलवर हरियाणा से सटा हुआ है। उसमें भी हरियाणवी भाषा का काफी प्रभाव है। उस बात को ध्यान रखते हुए मैं मंत्री महोदय से कहना चाहता हूं कि हरियाणवी को, जब तक यह आठवीं अनूसूची में शामिल होती है  और शामिल होने के बाद संविधान का संरक्षण मिलता है, तब तक हरियाणा में हमारी बाकी सारी भाषाएं जो बोली जाती है, चाहे वह देश की भाषा हो, बागड़ी, बृजभाषा की बात हो, पलवल और फरीदाबाद में बोली जाती हो या हमारी मेवाती की बात हो जो हमारे मेवात क्षेत्र में बोली जाती हैं। मैं बताना चाहता हूं कि अभी हमारा डेलीगेशन पाकिस्तान गया था। जैसे ही हमने पाकिस्तान मे कदम रखा, तो देखा कि हरियाणा से जो लोग वहां गये थे, उन्होंने उनको बॉर्डर पर बसाने का काम किया, क्योंकि ये लड़ाकुओं की भाषा है। जब हम बॉर्डर पर पहुंचे, तो मुझे लगा कि शायद पंजाबी बोलनी पड़ेगी। मगर जैसे ही बॉर्डर से अंदर गए, वहां पर उनको पता था कि हम हरियाणा से हैं, तो उनके मुं से हरियाणवी निकली। यह भी कमाल है, यहां पर हरियाणवी, बीच में पंजाबी और फिर पाकिस्तान में जाकर दुबारा हरियाणवी शुरू हो जाती है।  इस तरह से यह केवल भारत की ही नहीं, एक अंतराष्ट्रीय भाषा है। मैं बहुत से तर्क दे सकता हूं कि हरियाणवी क्यों होनी चाहिए, यह इसीलिए होनी चाहिए कि यह एक ऐसी भाषा है जिसमें आप हिन्दी भी बोल सकते हैं और अंग्रेजी भी बोल सकते हैं। मैं आपको हिन्दी भी हरियाणवी में बोलकर दिखा सकता हूं और अंग्रेजी भी हरियाणवी में बोलकर दिखा सकता हूं। यह ऐसी भी भाषा है कि इसमें जो शब्दावली है, उसके जैसा कोई अन्य शब्द दूसरी भाषाओं में नहीं मिलेगा। अब बताओ तोड़ शब्द का क्या मतलब है? तोड़ क्या चीज हैं, तोड़ करके दिखा लो, तोड़ ने भी तोड़ लो, तो हमारी हरियाणवी में इस तरह के शब्द हैं। इसीलिए इसका संरक्षण जरूरी है।

          सभापति जी ने कहा यह हिन्दी जैसी है, मैं मानता हूं और हिन्दी आंदोलन में हम भी पूरी तरह से शरीक हैं, हमारा पूरा साथ है, मगर हरियाणवी के अंदर इस तरह के शब्द मिलेंगे, जो किसी अन्य भाषा में न तो मिलेंगे, न ही उनका कोई मतलब आपको समझ में आएगा। उनका मतलब एक हरियाणवी दूसरे हरियाणवी को ही समझा सकता है। कहा जाता है कि क्या खिच-खिच हो रही है। अब इस खिच-खिच का क्या मतलब होता है? यह किसी अन्य भाषा में समझ में नहीं आ सकता है। इसे कोई हरियाणवी ही समझ सकता है।

          आज मैं सतपाल महराज जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इतना महत्वपूर्ण विषय उठाने का काम किया और मैं मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि हरियाणवी को शामिल करें। हरियाणवी के साथ हरियाणा में बोली जाने वाली अन्य भाषाओं जैसे बांगरू, बांगड़ी, बृज भाषा, मेवाती, देसवाली आदि को किस प्रकार से संरक्षण मिले, ताकि ये भाषाएं हम अपनी अगली पीढ़ी को 100 साल बाद भी देकर जा सकें। इस पर आप विचार करें।

 

सभापति महोदय : श्री बद्रीराम जाखड़ ।

श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा: राजस्थानी भाषा के लिए भी मेरा पूरा समर्थन है।

     

श्री बद्रीराम जाखड़ (पाली):  सभापति महोदय, मैं बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं कि राजस्थानी भाषा और भोजपुरी भाषा के बारे में बोलने का अवसर दिया। मैं आपको बताना चाहता हूं कि हमारी वेश-भूषा भी राजस्थानी है और सतपाल जी महाराज यहां हमारे राजा जैसा साफ़ा पहनकर बैठे हैं। राजस्थानी भाषा बहुत अच्छी भाषा है। मैं बताना चाहता हूं कि वीर तेजा जी महराज हुए थे, उनकी माताजी ने बोला " बेटा, तू बेलाड़ा पायलाड़ा मोती रीप जे " बरसात हो गई है तू जा, मोती रीप जे। बेटा ससुराल जा रहा था। बहन ससुराल बैठी है, तू पहले बहन को लेकर आ। यह इतनी मीठी भाषा है। राजस्थानी भाषा जीवरो-जीवरो बेरी। जीरो बायो और जीरो खराब है। जीवरो खराब हे गयो तो जीवरो-जीवरो बेरी मत बा, परणिया जियो। परणिया पत्ती को कहते हैं। मत बा जीरो, जीरो पड़ जा सी पीलो। खराब हो गयो जीरो। जीरा में खराब निकले हे। इतनी मीठी भाषा है कि आओ तो कहते हैं इठे पधारो और जाओ तो कहते हैं इठे पधारो। आपने कहा खम्मा घणी। राजा-महाराजा के समय से बोलते हैं खम्मा घणी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि हमारे यहां रामदेव जी महाराज हैं, जिन पर पिक्चर बनी थी। उस पिक्चर में था कि बहन राखी बांधने आयी तो उन्होंन बहन से कहा- बहन, तू मैला कपड़ा घरा क्यूं आयी! कांई हुयो थारे! क्यों मैला कपड़ा आयी है, कांई दुख पड़यो थारे! मैं बैठा हूं। लेकिन वह बतायी नहीं कि उसका बेटा खत्म हो गया है। रामदेव जी ने कहा- तू सांची बात बता बहन, तू मैला कपड़ा क्यूं कर आयी! यह एड़ी-एड़ी भाषा राजस्थान मायने है। एक भाषा राजस्थान में नहीं है। हमारे लोग राजस्थानी भाषा वाले अमरीका जाते हैं, वहां राजस्थानी भाषा के बारे में बताते हैं।

          आपने मुझे दो मिनट का टाइम दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): मैं सदन के माननीय सदस्यों की भावनाओं से सम्बद्ध हूं। आसन पर बैठे हुए आपकी भावनाओं से भी अपने को सम्बद्ध करता हूं। मैं समझता हूं कि इसमें कोई असहमति नहीं है कि सभी भाषाएं समृद्ध हैं, सभी भाषाएं  समाज को, कौम को जोड़ने का काम करती हैं। देश की सीमाओं पर त्याग और बलिदान के लिए उस शौर्य की गाथा उनकी कविताओं से, उनके साहित्य से उनको अंगीकार करती हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल करने के प्रश्न को लगातार इस सदन में आप उठाते आए हैं, जिसका आपने स्वयं अपने भाषण में भी उल्लेख किया और कहा कि जायसवाल जी, शिवराज पाटिल जी जो तत्कालीन गृह मंत्री भी रह चुके हैं, उनके समक्ष निवेदन किया। गृह मंत्री ही सरकार की तरफ से सक्षम हैं आठवीं अनुसूची में किसी भी भाषा को शामिल करने के मामले में और उत्तर देने के लिए। वह बात बहुत दूर तलक चली गई और इसके बावजूद हम उसे उसी सिरे से करें, तो हमें कोई एतराज नहीं। आज जो देश की भाषाएं हैं और इस देश की सीमाओं के बाहर जो हमारी भाषाएं बोली जाती हैं, चाहे गढ़वाली हो, चाहे हरियाणवी हो, राजस्थानी हो, इन भाषाओं को भी अगर संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए, तो इससे सरकार पर कोई वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। अलबत्ता, पूरे देश की जनता को एक सूत्र में हम पिरोने का काम करेंगे। अगर इन भाषाओं को संवैधानिक दर्जा मिलेगा, तो स्वाभाविक है कि वह पूरा समाज अपनी भाषा के प्रति, जिस तरह से उसे संविधान की मान्यता के बाद अपनी भाषा पर और फLा करेगा कि हमारे पूर्वजों की भाषा जो हमें उत्तराधिकार के रूप में मिली है, उसे एक रिकोग्नीशन मिल गई है। यह चीज भी कहीं न कहीं देश को एक ताकत और समृद्धि दिलाने में सहायक होगी।

          इस सवाल पर इस सदन में कई बार चर्चा हुई है। मंत्री जी, जैसा सभी ने कहा कि युवा मंत्री हैं और सहमति भी व्यक्त कर रहे हैं। यूपीए की चेयर पर्सन ने भी जब इस सदन में हमने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का सवाल यहां उठाया था, तो उस वक्त भी उन्होंने गृह मंत्री जी से एक बात कही थी। उस दिन पूरा सदन सहमत था। जो लोग भोजपुरी इलाके के नहीं हैं, जैसे जयप्रकाश जी अग्रवाल हैं, लेकिन सभी सदस्य एक-दूसरे की भाषा को, वैधानिक दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। क्या सदन में आने के बाद हमें देश की जनता की जनभावनाओं की अभिव्यक्ति करते हुए अपनी भाषा को एक संवैधानिक दर्जा देने की मान्यता नहीं दिला सकते, अगर कोई तकनीकी कठिनाई हो, तो मैं समझता हूं उसे दूर किया जा सकता है। मैं समझता हूं कि इसमें ब्यूरोक्रेसी आड़े आ रही है कहीं न कहीं, कोई न कोई रेडटिपिज्म है, लेकिन पोलिटिकल विल में कोई कमी नहीं है। सब राजनैतिक लोगों की इच्छा है कि उनकी भाषाओं की पहचान, मान्यता हो। जब मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिडाड, फिजी तक की बात होती है। दुनिया के दूसरे देशों में अगर भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा मिल चुका है तो अपने ही देश में यह भाषा बेगानी रहे, यह बात कितनी दर्दनाक होगी, जो हमें एक टीस की तरह सालती है। इसलिए मैं तो बहुत विनम्रता से मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, गढ़वाली आदि भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए, इसका मैं पुरजोर समर्थन करता हूं।

          मैं बताना चाहता हूं कि हमारे पूर्वज राजस्थान से आए, फिर वहां से गढ़वाल गए, हम लोग बुनियादी तौर से एस्कोट के ‘पाल’ हैं, फिर गढ़वाल से उत्तर प्रदेश गए। हमारी तो एक तरह से आज कर्मभूमि उत्तर प्रदेश है, हमारे पूर्वजों की मातृभूमि गढ़वाल है और उनके पूर्वजों की मातृभूमि राजस्थान है। इसीलिए भारत की विविधता में एकता है, जिसका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं कर सकता। इसलिए मैं आपसे अपील करूंगा कि तमाम भाषाओं को, खासकर भोजपुरी को गढ़वाली, राजस्थानी, हरियाणवी के साथ, जिनकी लगातार यहां मांग होती है, मंत्री जी अपने उत्तर में जरूर इस बात को कहेंगे कि संविधान की आठवीं अनुसूची में हम शामिल करते हैं। यह चीज सदन का एक इतिहास सृजित करेगी। इस सदन के लिए एक नया दस्तावेज प्रस्तुत होगा और आज इस सदन का यह दिन एक ऐतिहासिक दिन होगा, जब भारत के गृह मंत्री जी इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात कहेंगे।

          सभापति जी, आपने समय दिया, उसके लिए आपको धन्यवाद।

18.00 hrs श्री महाबल मिश्रा : सभापति महोदय, मैं आज माननीय सतपाल महाराज जी द्वारा अष्टम सूची में भाषाओं को शामिल करने के समर्थन में खड़ा हुआ हूं। दिल्ली में 40 से 50 लाख लोग बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग रहते हैं, 15-20 लाख लोग कुमाऊं और गढ़वाल के रहते हैं, उसी तरह से राजस्थान और हरियाणा के लोग रहते हैं। दिल्ली विभिन्न भाषाओं की संगम-स्थली हो गयी है, किसी एक भाषा की दिल्ली नहीं रही है। आज भोजपुरी यदि सूरीनाम और फिजी में बोली जाती है तो दिल्ली में, रायगढ़ में, लुधियाना में भी बोली जाती है। जहां-जहां कामगार गया वहां वह भोजपुरी भाषा का परिचायक हो गया है। माननीय शिवराज पाटिल साहब जब इसी हाउस में गृह मंत्री थे उन्होंने आश्वासन दिया था, उसके बाद माननीय श्रीप्रकाश जायसवाल गृह मंत्री जी ने भी आश्वासन दिया था और उसकी एक कमेटी बनी थी जिसमें कहा गया था कि भोजपुरी और राजस्थानी को अष्टम सूची में शामिल करने में कोई दिक्कत नहीं है। ये भाषा सिर्फ दिल्ली वालों की नहीं है, उत्तर प्रदेश की नहीं है बल्कि यह भाषा फिजी और सूरीनाम में भी बोली जाती है। आज सतपाल जी महाराज गढ़वाल की बात करते हैं, पूरी दिल्ली में गढ़वाल और कुमाऊं के लोग रहते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं को अष्टम सूची में शामिल करने से हमारा उससे संबंध जुड़ता है।

सभापति महोदय :  सभा की सहमति से आधा घंटा सभा की अवधि बढ़ाई जाती है।

श्री महाबल मिश्रा : आज चीन में लोग चीनी भाषा में बोलते हैं, अंग्रेजी में नहीं बोलते हैं। आज राजभाषा कमेटी में हम लोग जाते हैं तो क्षेत्रीय भाषा की बात आती है। आज चाहे बिहार के लोग हों, दिल्ली के लोग हों, उत्तर प्रदेश के लोग हों, रायपुर और लुधियाना के लोग हों, भोजपुरी को 17 करोड़ लोग बोलते हैं। चाहे हम बिहार में पैदा हुए हों, सतपाल जी महाराज गढ़वाल में पैदा हुए हों लेकिन दिल्ली में जो वहां के लोग रहते हैं वे दिल्ली के नागरिक हो गये हैं, एनसीआर के नागरिक हो गये हैं, इसलिए उनकी भाषा को नागरिकता मिलना जरूरी है। सभापति जी, आप तो पहले भी इस पर बोले हैं और जब हाउस में इस पर आश्वासन मिला है, इसके बाद कोई चीज बाकी नहीं रहती है। मैं माननीय मेघवाल जी के भाषण को सुन रहा था, माननीय गृहमंत्री जी के द्वारा दिया गया आश्वासन कार्यान्वित नहीं होगा तो मैं समझता हूं कि इस हाउस का औचित्य क्या रह जाएगा? इसलिए मेरा आपसे आग्रह है कि अष्टम सूची में जो भी भाषा मापदंड पर सही उतरती है, उस भाषा को अष्टम सूची में शामिल करें। गढ़वाली भाषा की बात है, कुमाऊंनी भाषा की बात है, राजस्थानी भाषा की बात है, भोजपुरी भाषा की बात है तो सारी भाषाओं का हम समर्थन करते हैं क्योंकि देश उससे समृद्ध होगा, एक दूसरे से जुड़ेगा। यूपीएससी की परीक्षा में भी भाषाओं की बात आई थी, वह हाउस की प्रोपर्टी है और जहां तक बोलने और लिखने की बात है, तो उसमें संविधान के तहत एक कमेटी ने राजस्थानी और भोजपुरी को अष्टम सूची में शामिल करने की बात कह दी थी क्योंकि ये सारे मापदंडों को पूरा करती हैं। मेरा आपसे आग्रह है कि अष्टम सूची में भोजपुरी और राजस्थानी को अविलम्ब शामिल करें और विभिन्न भाषाओं को जैसा कि सतपाल जी महाराज ने गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा को रखा है, उन्हें भी शामिल करें। आपने बोलने का वक्त दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     

श्री कमल किशोर ‘कमांडो’ (बहराइच) :  सभापति जी, आज बहुत खुशी की बात है कि माननीय सतपाल जी महाराज आज एक ऐसे प्रस्ताव को लाए हैं जिसपर पहले भी चर्चा लोक सभा में हो चुकी है और भोजपुरी, राजस्थानी, हरियाणवी और गढ़वाली भाषाएं बहुत मीठी भाषाएं हैं। इन्हें जो अष्टम सूची में शामिल करने की बात चल रही है तो मैं माननीय गृह मंत्री जी से निवेदन करुंगा कि वे इस पर गंभीरता से ध्यान देंगे। इन भाषाओं की आवाज जब दिल को छूती है तो निश्चित रूप से एक नयी ऊर्जा की उत्पत्ति होती है।  चाहे गढ़वाली हो, हरियाणवी हो, राजस्थानी हो, भोजपुरी हो, ये सब मीठी भाषाएं हैं। खासतौर पर मैं भोजपुरी भाषा के बारे में विस्तृत रूप से बात करुंगा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार का आधा भाग भोजपुरी और मैथिली भाषा को बोलता है। सभापति जी, आप भी उसी भाषा से संबंध रखते हैं और मुझे लगता है कि आपकी अध्यक्षता में जो हम इन भाषाओं पर चर्चा कर रहे हैं और माननीय सतपाल महाराज जी जो इन भाषाओं के संविधान की अष्टम सूची में जोड़ने की बात कह रहे हैं उन्हें निश्चित रूप से आप स्वीकृत कराने की कोशिश करेंगे। इन्हीं बातों के साथ मैं आपको बहुत धन्यवाद देता हूं और मुझे उम्मीद है कि इन्हें शामिल कराने में आप पूरा सहयोग करेंगे।

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HOME AFFAIRS      (SHRI JITENDRA SINGH): Mr. Chairman, Sir, this Constitution (Amendment) Bill, 2010 for inclusion of Garhwali and Kumaoni Languages in the Eighth Schedule of the Constitution was presented by Shri Satpal Maharaj in the Lok Sabha on 19.8.2011. Shri Hukmadeo Narayan Yadav, Shri Shailendra Kumar, Shri Gorakh Nath Pandey, Shri Mangni Lal Mandal, Shri Bhartruhari Mahtab, Shri Adhir Chowdhury, Shri Syed Shanawaz Hussain, Shri K.C. Singh ‘Baba’, Shri Naveen Jindal, Shri Arjun Ram Meghwal, Dr. Raghuvansh Prasad Singh, Shri J.P. Agarwal, Shri Deepender Singh Hooda, Shri Badri Ram Jakhar, Shri Jagdambika Pal, Shri Mahabal Mishra, and Shri Kamal Kishor ‘Commando’ have strongly supported the Bill for inclusion of Garhwali and Kumaoni Languages in the Eighth Schedule of the Constitution.

          Demands for inclusion of additional languages have been made from time to time. As of now, demands for inclusion of 38 languages are pending for consideration. A Committee under the Chairmanship of Shri Sitakant Mohapatra was constituted in 2003. The Committee submitted its Report in 2004 and made certain recommendations. No decision on the recommendations of the Sitakant Mohapatra Committee Report has been taken till now. Comments from various departments like DoPT, Culture, Registrar General of India, HRD etc. have been received.

          There is also the issue relating to the language of the UPSC Examination. In a matter relating to the inclusion of Bhojpuri and Rajasthani languages in the Eighth Schedule of the Constitution, it was decided that the inclusion of these languages in the Eighth Schedule of the Constitution may be deferred till a decision is taken by the Government on the language issue of the UPSC Examination. UPSC has made a request that the present link between the Eighth Schedule languages may be de-linked from the Commission’s scheme of examination in conducting the examinations in all the Eighth Schedule Languages. UPSC has constituted a High Level Standing Committee to examine the modalities for implementing the recommendations of the Parliamentary Resolution in a manner consistent with the high standards of UPSC, for the existing languages in the Eighth Schedule. It has been decided to await the Report of the High Level Standing Committee and Government’s decision to be taken thereon after which a fresh assessment of the demands of inclusion of languages will be made and a decision on Dr. Sitakant Mohapatra Committee’s Report taken.

          Therefore, it will not be advisable to consider inclusion of Garhwali and Kumaoni Languages in the Eighth Schedule of the Constitution in isolation of other pending similar demands. The case of these two languages will be decided alongside other pending demands.

          महोदय, मैं सम्मानीय सदस्य जिंदल साहब और दीपेन्द्र सिंह हुड्डा जी को धन्यवाद देना चाहूंगा, जिन्होंने हरियाणवी भाषा को भी आठवीं अनुसूची में लाने की बात सदन में रखी है। मैं कहना चाहूंगा कि हमारे पास 38 भाषाओं की जो डिमांड आई है, उनमें हरियाणवी भाषा अभी तक शामिल नहीं है। अगर राज्य सरकार से हमारे पास इसकी डिमांड आएगी, तो इसे इसी लिस्ट में जोड़ लिया जाएगा।

With these words, I request the hon. Member to withdraw the Constitution (Amendment) Bill and not to press for its consideration.

 

श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):सभापति महोदय, मैं मंत्री जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने वक्तव्य दिया।

मेरे वतन की बहारें जवान होने दो              महान है मेरा भारत, महान होने दो।

          किसी को सींच रहे हो और किसी पे पानी बंद                 तमाम खेतों की फसलें समान होने दो।

  गुबार दिल से ख्यालों से गद दूर करो              नई जमीन नया आसमान होने दो।

      सुभाष, गांधी, जवाहर की रुह भी कहती है                  तमाम देश को एक खानदान होने दो।

 

          महोदय, मैं सबसे पहले मेघवाल जी, हुड्डा जी, जाखड़ जी, महाबल मिश्रा जी, हरीश रावत जी का धन्यवाद देता हूं जिन्होंने मेरी बात का समर्थन दिया। हरीश रावत माननीय मंत्री जी आधे गढ़वाल के हैं,  मैं उन्हें बहुत धन्यवाद देता हूं। अनेक राज्य बने, गुजरात बना और गुजराती भाषा को मान्यता मिली। महाराष्ट्र राज्य बना और मराठी भाषा को मान्यता मिली। तमिलनाडु बना और तमिल भाषा को मान्यता मिली। इस प्रकार से राज्य बनने पर राज्य की भाषा को मान्यता मिलती है। उत्तराखंड नया राज्य बना है तो निश्चित रूप से उत्तराखंड में बोली जाने वाली कुमाउंनी और गढ़वाली भाषा को भी मान्यता मिलनी चाहिए। मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि आगे की सूची पर निश्चित रूप से विचार करें। भारत भाषाओं से और मजबूत होगा। मैं सदन का ध्यान उत्तराखंड की पहाड़ियों की तरफ ले जाना चाहता हूं, विशेषकर नीति घाटी में ले जाना चाहता हूं जहां इस समय हवा का सन्नाटा होगा, हवा का ठंडा प्रभाव होगा। वहां का व्यक्ति इस देश से इसी भावना से जुड़ा हुआ है कि मैं इस देश का नागरिक हूं। उसमें भावना रहती है कि मै इस देश का वासी हूं जिस देश में गंगा बहती है। अगर हम उसकी भाषा को मान्यता देंगे तो देश मजबूत होगा। आपने बहुत भाषाओं को मान्यता दी है। उसी क्रम में उत्तराखंड नया राज्य बना है। उत्तराखंड की दो प्रमुख भाषाएं हैं जिसमें कुमाउंनी भाषा की बहुत उपबोलियां हैं। स्थानीय रूप से इसमें बहुत भाषाएं विकसित हुई हैं जिनमें प्रधान भाषाएं खसपरजिया, चौगरखिया, फल्दकोटिया, पछाई, जकरखिया, कुमयां या कुमैता, गंगोला,  दानपुरिया, सीराली,सोरियाली, असकोटी, जोहारी, रउचोंभैंसी और भोटिया आती है।       गढ़वाली भाषा की बहुत उपबोलियां विकसित हुई जिनमें श्रीनगरिया, राठी,लोहलया, बधानी, दसौलया,मांज‑कुमैया, नागपुरिया, सलानी तथा टेहरी भाषाएं हैं। यह बहुत रिच भाषाएं हैं, इनका बड़ा व्याकरण है। माननीय मंत्री रावत जी यहां बैठे हैं। मैं इनसे आग्रह करता हूं कि इन भाषाओं का समर्थन करें।

          महोदय, भोजपुरी मॉरिशस और ट्रिनिडाड में बोली जाती है। यहां रसोई की भाषा भोजपुरी है। वहां वैसे तो फ्रेंच भाषा में बात करते हैं, अंग्रेजी भाषा में बात करते हैं लेकिन जब घर में आकर मां से रोटी मांगते हैं, बातें करते हैं तो मातृभाषा भोजपुरी में बात करते हैं। भोजपुरी भाषा के कारण वे भारत से जुड़े हुए हैं। आप मॉरिशस गए होंगे तो आपने गंगा तालाब देखा होगा। एक लोटा गंगा जल जब उस तालाब में डाला गया तब से उसे गंगा तालाब कहा गया। वे लोग पैदल चलकर यात्रा करते हैं और मानते हैं कि गंगा के दर्शन कर लिए। अगर आज इस भाषा को मान्यता मिलती है तो वे निश्चित रूप से भारत से जुड़ेगे जिससे हमारा बगीचा, उपवन और सशक्त होगा। आपको पता है कि इस भाषा को मान्यता मिलने से उत्तराखंड की  भावना बलवती होगी। एक सत्र हमारा गैरसेण में हो तो उससे और भावना बलवती होगी। मैं माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देते हुए इस बिल को वापिस लेता हूं।

MR. CHAIRMAN: Are you withdrawing?

SHRI SATPAL MAHARAJ : I beg to move for leave to withdraw the Bill further to amend the Constitution of India.

MR. CHAIRMAN:  The question is:

“That leave be granted to withdraw the Bill further to amend the Constitution of India.”   The motion was adopted.
SHRI SATPAL MAHARAJ : I withdraw the Bill.