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Lok Sabha Debates

Discussion Regarding Drought Situation Prevailing In Various Parts Of The ... on 24 April, 2000

14.18 hrs. Title: Discussion regarding drought situation prevailing in various parts of the country.

MR. DEPUTY-SPEAKER: The House will now take up Item No.17, discussion under Rule 193. Time allotted for this Item is two hours. Prof. Rasa Singh Rawat.

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर) : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, राजस्थान, गुजरात, आन्ध्रा प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा आदि राज्यों के अन्दर वर्षा के अभाव में घोर सूखे की स्थिति पैदा हो गई है और दुर्भिक्ष और भयावह अकाल की स्थिति अत्यन्त क्षोभजनक स्थिति में पहुंच चुकी है।

इसी संदर्भ में मैं आपका, कार्य मंत्रणा समति का तथा माननीय प्रधान मंत्री जी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए इसे राष्ट्रीय आपदा व सूखे के कारण देश के वभिन्न भागों में जो स्थिति उत्पन्न हुई है, उस स्थिति के दर्द को समझकर हाउस के अन्दर हमें चर्चा करने का, विचार-विमर्श करने का समय प्रदान किया है और इसके बाद में मदद के लिए कदम आगे बढ़ाने का निर्णय किया है, इसके लिए मैं आपके माध्यम से उन सब के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं। और भी प्रसन्नता का विषय है कि कल ही माननीय प्रधान मंत्री जी ने राष्ट्र के नाम पर दूरदर्शन और आकाशवाणी के ऊपर सारे देशवासियों के नाम से एक अपील जारी की है कि देश के अन्दर चाहे राजस्थान हो, चाहे गुजरात हो, चाहे कर्नाटक हो, चाहे मध्य प्रदेश हो, चाहे पश्चिमी बंगाल हो, चाहे उड़ीसा हो, चाहे आन्ध्रा प्रदेश हो, जहां पर भी सूखे की स्थिति पैदा हुई है, वह इतनी भयावह है कि उसे एक प्रकार से राष्ट्रीय आपदा मानकर जिस प्रकार से उड़ीसा में चक्रवात के समय सारे देश के निवासियों ने उदारतापूर्वक, मुक्त हस्त से सहयोग किया था और उसमें सारे समाज के लोगों ने हाथ बंटाया था और जिस प्रकार कारगिल में आपरेशन विजय के नाम पर प्रधान मंत्री की अपील पर सारे राष्ट्र ने राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए सहायता प्रदान की थी, उसी प्रकार से प्रधान मंत्री जी ने अपील की है कि नेशनल केलेमिटी फंड या प्रधान मंत्री सहायता कोष के लिए मदद दी जाए। यह भी सरकार की संवेदनशीलता का परिचायक है। इसके लिए मैं आपके माध्यम से उनका और सरकार का आभार व्यक्त करता हूं।

मैं राजस्थान की ओर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करूंगा। वैसे तो अकाल की स्थिति देश के किसी भी राज्य में हो, हमें अनुभूति होनी चाहिए। जैसे शरीर में एक अंगूठे में अगर कांटा चुभता है तो दर्द सारे शरीर में होता है। हाथ यह नहीं कहता कि केवल अंगूठे की चुभन है या आंख यह नहीं कहती कि यह अंगूठे का दर्द है। यह संवेदनशीलता सारे शरीर को अनुभव होती है। जब दर्द होता है अंगूठे में तो हाथ वहां बार-बार जाता है। आंख उस कांटे को देखकर कहती है कि इसे निकालो और जब वह कांटा निकल जाता है तो पूरे शरीर को आराम मिलता है। उसी तरह देश में कहीं भी पड़ने वाली प्राकृतिक विपदा में सभी देशवासियों को हाथ बंटाना चाहिए।

सभापति महोदय, राजस्थान में अकाल की बड़ी भयावह स्थिति है। राजस्थान में लगातार तीसरे वर्ष अकाल की स्थिति पैदा हो रही है। पिछले साल और उसके पहले के साल कम वर्षा हुई थी। इस बार तो वर्षा हुई ही नहीं, जिसकी वजह से खरीब और रबी की फसल बर्बाद हो गई। वर्षा नहीं हुई तो फसल नहीं हुई, फसल नहीं हुई तो किसानों की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई। गांवों की अर्थव्यवस्था पर बहुत दुष्प्रभाव पड़ा। इस कारण जानवरों के लिए चारा नहीं हुआ। इस वजह से मवेशियों को पालना मुश्किल हो गया है। गांवों में कुएं, हैंडपम्प, तालाब, बावड़ियां आदि सब सूख गए हैं। जहां कहीं पहले का थोड़ा सा पानी था और पानी नहीं आने के कारण वह भी सूख गया है। भूजल का स्तर बहुत नीचे हो गया है, क्योंकि उसका काफी मात्रा में दोहन कर लिया गया है। इससे पेयजल संकट गम्भीर रूप से उत्पन्न हो गया है।

मैं इस सम्बन्ध में कुछ आंकड़ों की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करूंगा। देश के कुल क्षेत्रफल का १०.७ प्रतिशत क्षेत्र राजस्थान के अंदर आता है। देश की कुल आबादी का ५.०१ प्रतिशत भाग राजस्थान के अंदर है, परन्तु देश के कुल जल संसाधन की तुलना में कुल एक या दो प्रतिशत जल संसाधन ही वहां उपलब्ध हैं। यह महत्वपूर्ण बात है। देश के कई और राज्यों में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। लेकिन राजस्थान में प्राकृतिक स्थित, भौगोलिक स्थिति विशेष बनी हुई है इसलिए उसको विशेष संवेदनशील राज्यों की श्रेणी में माना जाना चाहिए। वहां अधिकांश भाग थार का रेगिस्तान है, अरावली का पहाड़ी क्षेत्र है, वनों का अभाव है इसलिए वर्षा बहुत कम होती है। हर दूसरे या तीसरे साल अकाल पड़ता रहता है। सम्वत् २०५६ का यह अकाल काफी भयावह है। यहां माननीय पायलट जी बैठे हुए हैं, वे जानते होंगे कि गांव में इसे छपनियां का अकाल बोला जाता है। इस तरह का अकाल १९५६ में पड़ा था, तब लाखों लोग मौत के शिकार हुए थे। इस तरह से वहां बड़ी भयावह स्थिति पैदा हो रही है। देश में जितने जल संसाधन हैं, उसका केवल एक प्रतिशत वहां उपलब्ध है। इसलिए राजस्थान का ७६ प्रतिशत भाग असिंचित है। इसलिए वहां के लोग वर्षा के सहारे ही रहते हैं। अगर राम जी राजी हो गए तो वर्षा अच्छी हो जाती है और वर्षा अच्छी होने से किसान की खेती भी अच्छी हो जाती है। लेकिन अगर राम जी या राज रूठ गए तो स्थिति कैसी हो सकती है, उसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। वर्षा नहीं होने से जनता और पशुओं के सामने रोजी-रोटी और चारे की समस्या पैदा हो गई है। राजस्थान में कुल ३२ जिले हैं, जिनमें से २६ जिले ऐसे हैं जहां पर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई। कई जगहों पर केवल ०.१ या ०.२ इंच ही वर्षा हुई है। इसके परिणामस्वरूप राज्य में १२८.९० लाख हेक्टेयर की बुवाई का जो लक्ष्य था, उसकी तुलना में ११६.८४ लाख हेक्टेयर में फसल की बुवाई वर्षा ऋतु के समय हुई थी। फसल की बुवाई के समय पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण उत्पादन के निर्धारित लक्ष्यों के विपरीत अन्न के मामले में ५३ प्रतिशत की गिरावट आई है।

मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि अकाल पड़ने पर सारी चीजों की स्थिति पर प्रभाव पड़ता है।

१४२५ बजे (श्रीमती मारग्रेट आल्वा पीठासीन हुई) वर्षा नहीं होने के कारण, फसल पैदा नहीं होने के कारण कैसी स्थिति पैदा हो जाती है। अन्न के उत्पादन में ५३ प्रतिशत, दालों में ७३ प्रतिशत, खाद्यान्नों में ५६ प्रतिशत, तिहलन में २३ प्रतिशत, कपास में २६ प्रतिशत औऱ गवार, राजस्थान में पशुओं को खिलाने के लिए जो होता है, उसमें ३० प्रतिशत की हानि हुई। सरकारी अनुमान के अनुसार भी न््यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर २१५५.२० करोड़ रुपये की फसल की हानि राजस्थान में वर्षा नहीं होने से औऱ फसल की पैदावार वगैरह नहीं होने से हुई। २१ जिलों में से ३४६९३ गांवों में से २३४०६ गांव अकाल से प्रभावित हैं। मैं गांवों के आंकड़े इसलिए दे रहा हूं क्योंकि एक पंचायत के अंदर राज्य सरकार ने केवल साठ लोगों को लगाया है जबकि हर पंचायत के अंदर औसत गरीबी की रेखा से नीचे ३०० के लगभग लोगों की संख्या है औऱ ३०० आदमियों को काम मिलना चाहिए, वैसे अकाल पड़ा हुआ है तो गांव में हर आदमी जो काम करने लायक है, उसे काम मिलना चाहिए। गरीबी की रेखा से नीचे लोगों को लिया जाये तो ३०० आदमियों को काम एक पंचायत में मिलना चाहिए लेकिन पंचायत में ६० लोगों को काम मिल रहा है। मेरे अजमेर जिले में २७६ पंचायतें हैं औऱ उनमें से एक पंचायत में ६० हैं तो इसी से अनुमान लगाया जा सकता है। इसी तरह से अप्रैल २००० में संख्या बढाने में पढ़ाने की बात हुई है, वह भी ऊंट के मुंह में जीरा के तुल्य होगा। १८०८५ गांवों में से ७६ से १०० प्रतिशत तक और ५०२१ गांवों में ५० से ७४ प्रतिशत फसल की हानि हुई है। ये आंकड़े सरकार के पास पहले ही पहुंच गये होंगे, मैं केवल सरकार की जानकारी के लिए दे रहा हूं। दो करोड़ इकसठ लाख उन्यासी हजार जनसंख्या तथा तीन करोड़ पैंतालीस लाख साठ हजार पशु इस अकाल से प्रभावित हुए हैं। राजस्थान में जो सूखे की स्थिति है, मैं केवल राजस्थान के आंकड़े बता रहा हूं। गुजरात के या आन्ध्रा प्रदेश के आंकड़े नहीं हैं। गत वर्ष भी औऱ इस सब राज्यों में भीषण स्थिति है। राजस्थान औऱ गुजरात में कच्छ का इलाका तथा सौराष्ट्र का है जहां स्थिति काफी खराब है। उत्तरी गुजरात के इलाके में भी स्थिति काफी खराब है। पशुओं को चारा नहीं मिल रहा है औऱ वे मौत का शिकार हो रहे हैं। ये तीन करोड़ पैंतालीस लाख तथा साठ हजार पशु और दो करोड़ इकसठ लाख जनसंख्या सूखे से प्रभावित है। गत वर्ष भी सूखे के कारण लगभग २०६७९ गांवों में सूखा पड़ा था। निरंतर दो साल से सूखे के कारण जनता की क्रय शक्ति भी खत्म हो गई है औऱ रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गई है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बहुत से लोगों को एक नवम्बर से काम मिलने वाला था लेकिन पता नहीं कौन से झगड़े में एन.सी.एफ. और नेशनल फंड फॉर कैलेमिटी रिलीफ इस तरह के दो झगड़ों के अंदर हम कहते रहे कि राजस्थान सरकार के पास ३०० करोड़ रुपये है औऱ वह काम शुरु करे और वह कहती रही कि हमारे पास पैसा नहीं है, केन्द्र से पैसा नहीं आया। ९ जनवरी को राजस्थान के मुख्य मंत्री ने सांसदों की बैठक बुलाई थी और तब तक कोई भी राहत कार्य प्रारम्भ नहीं किया गया था जबकि पहली योजना के अनुसार एक नवम्बर स राहत कार्य प्रारम्भ करना था। इससे लोगों के सामने रोजी-रोटी की भयंकर समस्या पैदा हो गई थी। गांव के गांव खाली हो गये, मकानों में ताले लग गये औऱ जानवरों के तिलक लगाकर छोड़ दिया गया, वे भी मौत के मुंह में चले गये। गांवों के बाहर जाओ तो हडि्डयों के कंकालों के ढ़ेर दिखाई पड़ेंगे।

कत्लखाने जानवरों को भेजा जा रहा है। बहुत से लोग जो कत्लखाने नहीं भेजने देना चाहते हैं, रोकने का प्रयास करते हैं, तो उस स्थिति में तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। राजस्थान में गोवंश पशुधन एक्ट लागू है, परिणामस्वरूप गम्भीर स्थिति पैदा हो गई है। इसलिए पशुओं के सामने अस्तित्व की समस्या है। जिन गांवों में सूखा पड़ा है, उनमें २२.५९ लाख भूमिहीन और सीमान्त किसान हैं. यह ध्यान देने की बात है। एससी की संख्या ५२.७७ लाख है और एसटी की संख्या ४७.०८ लाख है। इसमें दक्षिणी राजस्थान, पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी राजस्थान और पूर्वी राजस्थान में मोटे अनुमान के अनुसार एससी, एसटी और लघु तथा सीमान्त किसान की बहुत बड़ी संख्या है। सरकारी लेखों के अनुसार ५२.३६ लाख परिवारों के लिए एक नवम्बर, १९९९ से रोजगार उपलब्ध कराना आवश्यक माना गया। परन्तु दिसम्बर तक जितनी भी मीटिंग हुईं, उनमें कोई भी अकाल राहत कार्य नहीं खोला गया, जबकि दो लाख जनता को काम देने का आश्वासन राजस्थान सरकार ने दिया था। लेकिन नेशनल कैलेमिटी फन्ड और नेशनल फन्ड फार कैलेमिटी रिलीफ, इन दोनों का चक्कर चलता रहा और कहा जाता रहा कि एक पैसा दे, तो राहत कार्य शुरू किया जाए। राजस्थान सरकार कहती रही कि हमारे पास पैसा नहीं है, हम तो काम करना चाहते हैं, जबकि केन्द्र ने सारा पैसा भेज दिया। केन्द्र की जितनी भी योजनायें गांवों के अन्दर चलती थीं, उन सबका पैसा भेज दिया गया, लेकिन राज्य सरकार द्वारा युटिलाइजेशन सर्टफिकेट न देने की वजह से योजनाओं का पैसा रुक गया और जो पैसा भेजा गया, वह अन्य कार्यों पर खर्च किया गया। इसके बारे में तो सरकार अपना ब्यान देगी, लेकिन मैं वस्तुस्थिति के बारे में सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

महोदय, मैं राजनीति के ऊपर उठकर अपनी बात कहना चाहता हूं। मैं किसी विशेष दल या सरकार की आलोचना नहीं कर रहा हूं। आप इसको अन्यथा न लें, वस्तुस्थिति सदन के सामने रखना मेरा कर्तव्य हैं। राजस्थान की वार्षिक योजना ५०२० करोड़ रुपए से घटा कर ३९०० करोड़ रुपए कर दी गई। योजनाओं के अन्दर जो चालू कार्य थे, वे बन्द कर दिए गए और नए कार्य शुरू करने पर रोक लगा दी गई। ऐसी स्थिति में भुखमरी और बेरोजगारी के कारण राज्य की जनता गुजरात, मध्य प्रदेश और दिल्ली में पलायन करने लगी। गांव के गांव खाली हो गए, पशुधन मर गए और गांव के लोगों को गरीबी और बेरोजगारी के अभाव में गांव छोड़कर जाना पड़ा। स्थिति बड़ी भंयकर है। इसलिए इसको राष्ट्रीय आपदा मानकर केन्द्रीय सरकार को खुले दिल से मदद करनी चाहिए, ताकि राजस्थान को इस संकट से निजाद मिल सके। जमीन सूख जाती हैं, तो फसल खराब हो जाती हैं और पानी का जल स्तर नीचे चला जाता है। ऐसी स्थिति में रिचार्जिंग होने में समय लगता है। भूमिक्षरण के कारण ठीक होने में दो-तीन साल लग जाते हैं। आने वाले समय में इस कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। अगर भगवान की कृपा से बारिश हो भी गई तो एक दम अच्छी फसल पैदा नहीं होती है। जून और मई का महीना तो बहुत ही खतरनाक है।

सभापति महोदय : आपकी तरफ से दस लोगों ने बोलना है। आप कृपया जल्दी समाप्त करें।

प्रो. रासासिंह रावत : महोदय, मैं वस्तुस्थिति के बारे में बता रहा था। अकाल के कारण वहां से पलायन शुरु हो गया। जैसा मैंने कहा ३४५.७ लाख पशु प्रभावित हुए और नागौर बैल, थारपरकर बैल, काकरा बैल जैसी नसलें सबसे अधिक प्रभावित हुई हैं। २६ जिलों के अन्दर चारे और पानी की समस्या पैदा हो रही है। आदमी को तो काम में थोड़ा बहुत पैसा मिल जाता है, लेकिन न्यूनतम मजदूरी जो मिलनीचाहिए, वह नहीं मिल रही है। ६० रुपए मजदूरी राजस्थान में हाई कोर्ट के आर्डर के मुताबित एक अप्रैल से शुरू हुई है।

आदमी तो जैसे-तैसे पेट भर लेगा, लेकिन पशुओं के चारे के लिए पैसा कहां से आएगा। इसलिए उनके लिए भी कुछ प्रबंध करना चाहिए। मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि राजस्थान सरकार को काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत, यहां खाद्य मंत्री जी बैठे हुए हैं वह उनके लिए २० किलो की जगह ३० किलों अनाज रियायती दरों पर प्रदान करें। अनाज मिलने से उन्हें अकाल के दिनों को काटने तथा अपने बाल-बच्चों का पालन-पोषण करने में कठिनाई नहीं होगी।

मैं पशुओं के लिए कुछ बातें कहना चाहूंगा। राजस्थान सरकार ने स्वीकार किया है कि पशुओं के लिए साढ़े तीन रुपए से लेकर चार रुपए प्रति किलो चारा मिलता है। एक पशु के लिए पांच किलोग्राम चारा चाहिए। इस हिसाब से जून, २००० तक आठ महीने के लिए एक पशु को बचाने के लिए ४८०० रुपए का चारा चाहिए। जहां रोजी-रोटी के लिए अकाल पीड़ित लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, उनके लिए महंगे भाव का चारा खरीद कर पशुओं को बचाने का विचार नहीं किया जा सकता है। इसलिए विवश होकर पशु मालिकों ने पशुओं को छोड़ना शुरू किया। जब एक पशु के लिए इतना चारा चाहिए तो हम चाहेंगे कि जहां राजस्थान के पशुधन को जो खेती के लिए महत्वपूर्ण साधन है, कृषि एक महत्वपूर्ण अंग है और उनके आर्थिक संसाधान का भी महत्वपूर्ण रुाोत है, उसे बचाने के लिए भी सरकार विशेष अनुदान प्राप्त करे और चारा जिन राज्यों में मिलता हो, वहां से उसे रेल गाड़ियों के अंदर मुफ्त में, बिना किराया लिए हुए चारा भिजवाने की व्यवस्था की जाए। राजस्थान के जहां-जहां चारे के डिपो या बड़े केन्द्र हैं, राज्य सरकार उन डिपो तक पहुंचा सके, पशुधन को बचाने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यह सभी व्यवस्था हो जाएगी लेकिन पेय जल कहां से आएगा। सबसे बड़ी समस्या यह है कि हैंड पम्प सूख गए। जयपुर जैसे शहर में पानी की समस्या है। जयसमन जैसी बड़ी झील सूख गई। उदयपुर के जल के रुाोत सूख गए। अजमेर के अंदर पानी का संकट है, शहरों के साथ-साथ गांवों में भी पेय जल का भंयकर संकट है।

मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि टैंकरों के द्वारा, रेल गाड़ियों के टैंकरों में पानी भर कर, जहां-जहां बहुत ज्यादा कमी है वहां पानी पहुंचाया जाए और राज्य सरकारों द्वारा भी टैंकरों के माध्यम से, केन्द्र द्वारा पैकेज की घोषणा करके जिन गांवों में पानी की कमी है वहां पानी दिया जाए। यह तो तात्कालिक उपाय है, इसलिए इसके साथ-साथ जमीन का जलस्तर ऊंचा उठे, इसके लिए तालाबों की सफाई बहुत आवश्यक है। तालाबों की मिट्टी निकलवाना, बांधों को ठीक करवाना, छोटी-छोटी नालियां बनवाना आवश्यक है ताकि पानी ठीक से निकल सके। ऐसा भी कोई प्रबंध करना बहुत आवश्यक है जिससे कि पानी को इकट्ठा किया जा सके और सूखा पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके। हर साल अकाल पड़ता है और हर साल यहां बहस हो जाती है तथा सरकार उत्तर दे देती है, कुछ तात्कालिक उपाय हो जाते हैं। लेकिन उसका जो फायदा मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। हम स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती और संविधान की स्थापना का भी स्वर्ण जयंती वर्ष मना रहे हैं, इन ५० वर्षों में भी अगर हम पेयजल के संकट का निवारण नहीं कर पाएं, अकाल की समस्या का स्थाई समाधान न खोज पाएं तो यह हम सब के आगे एक प्रकार का प्रश्न-चिन्ह है। राजस्थान की जो भयावह सूखे से उत्पन्न स्थिति है, यह तीन प्रकार का काल है- पानी, पशु और रोजी-रोटी का।... (व्यवधान) इसलिए तीनों की व्यवस्था के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा करें और काम के बदले अनाज योजना, पानी की समस्या और चारे की समुचित व्यवस्था करें। इन्हीं शब्दों के साथ आपने मुझे जो बोलने का समय दिया, उसके लिए मैं आभार व्यक्त करता हूं। धन्यवाद।

श्री शीश राम ओला (झुंझुनूं) : सभापति महोदया, मैं आभारी हूं कि यहां अकाल पर चर्चा हो रही है। इस समय कई प्रांतों में भयंकर अकाल है, किन्तु राजस्थान इससे सबसे ज्यादा ग्रस्त है। अकाल की मां ने अकाल से पूछा था कि बेटे, तू जा रहा है, यदि मैं बीमार हो गई तो कहां तलाश करूंगी। उसने कहा कि मां, यह पूछने की बात नहीं है, मेरा पक्का घर तो राजस्थान में है। मैं कहीं जाऊं या न जाऊं लेकिन राजस्थान में जरूर जाऊंगा। राजस्थान उन प्रांतों में से है, जो पाकिस्तान की लम्बी सीमा से मिला हुआ है.

यहां पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। बरसात के अभाव में गाय, भेंस और अन्य पशुओं को चारा उपलब्ध नहीं होता है। तीन साल से लगातार राजस्थान अकाल से पीड़ित है। कुल ३४६०९ गांवों में से २३५०० गांव में भयंकर अकाल की स्थिति है। वहां पर पौने चार करोड़ पशु और साढ़े तीन करोड़ मनुष्य अकाल से प्रभावित हैं।

राज्स्थान एक पशु-पालक राज्य है और यहां से दूध दिल्ली तक जाता है। अगर ऐसा ही रहा तो राजस्थान के साथ-साथ दिल्लीवासी भी दूध के लिए तरसेंगे। दुधारू पशुओं को किसान बड़ी मुश्किल से बचा पा रहा है। पशुओं के मालिकों की आंखों में आंसू हैं। मालिक चारे के अभाव में पशुओं के गले में लाल-धागा बांधकर आंसू भरे नेत्रों से उसे छोड़े देते हैं। वे जानते हैं कि वे उन्हें चारे के अभाव में बचा नहीं सकते हैं। केन्द्र सरकार इधर इस बात पर ध्यान नहीं दे रही है। राजस्थान सरकार के सीमित साधनों के बावजूद चार लाख से अधिक लोग राहत कार्य में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय राहत आपदा कोष से प्रधान मंत्री जी से राजस्थान के मुख्यमंत्री ने ११४५ करोड़ रुपये की मांग की थी। रासा सिंह जी कह रहे थे कि बहुत रुपया दिये हैं, दिये हैं तो कहां गये? केवल १०३ करोड़ रुपये दिये गये हैं जबकि ३२ जिलों में से २६ जिले संपूर्ण रूप से अकाल से पीड़ित हैं। …( व्यवधान) अकाल से निपटने के लिए ११४५ करोड़ रुपये की मांग की गयी थी। इससे पहले १९८८-८९ में भयंकर अकाल पड़ा था। स्वर्गीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी ने एक बार तीन-चार दिन और दूसरी बार दो-तीन दिन सड़कों के माध्यम से वहां के दौरे किये थे और ६०० करोड़ रुपये से अधिक अकाल से निपटने के लिए दिये थे। उस वक्त के भावों में और आज के भावों में बहुत अंतर हो गया है। राहत कार्य के लिए एक व्यक्ति को ४४ रुपये मजदूरी दी जाती थी, एक अप्रैल से वह राशि ६० रुपये कर दी गयी है, जबकि कितना अंतर भावों का बढ़ा है। जो १०३ करोड़ रुपया राहत के नाम पर दिया गया है वह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। मध्य प्रदेश के बाद क्षेत्रफल में राजस्थान का स्थान दूसरा है। यहां पर २३५०० गांव हैं। एक गांव में तीन-चार-पांच किलोमीटर पर दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह धाणियां हैं, वहां पानी पहुंचाना, वहां के पशुओं को बचाना और रोजगार कार्य शुरु करना, सरकार का कार्य होना चाहिए। वहां पर मई में ६ लाख, जून में ८ लाख लोगों को रोजगार मिले।

यह राज्य सरकार की ओर से प्रस्तावित है किन्तु जहां ३ करोड़ से अधिक लोग अकाल से प्रभावित है, वहां ८ लाख लोगों को रोजगार मिले, क्या लोग बच जायेंगे? वे अपने बच्चो को नहीं पाल पा रहे हैं, मवेशियों को नहीं बचा पा रहे है जबकि राजस्थान का पशुधन वहां के किसानों और लोगों के लिये जीवन निर्वाह का साधन है। अकाल की गंभीरता को देखते हुये केंद्र सरकार को चाहिये कि राजस्थान को अधिक से अधिक सहायता दी जाये। इसमें किसी प्रकार का विलम्ब नहीं होना चाहिये। राजस्थान में हज़ारों की संख्या में पशु मर रहे हैं, मां-बाप अपने बच्चों को खाना नहीं दे पा रहे हैं, मां-बाप असहाय हैं और खुद बच्चो की हालत देख कर रोते हैं।

सभापति महोदय, विगत वर्ष जब राजस्थान में अकाल पड़ा था, तब राजस्थान सरकार ने ५०० करोड़ रुपये खर्च किये जबकि केन्द्र सरकार ने केवल २१ करोड़ रुपया दिया था। इस साल राज्य ने ११४५ करोड़ रुपये की मांग की है जबकि मिले हैं केवल १०३ करोड रुपये। वहां दो-ढाई हजार करोड़ रुपया खर्च करना पड़ेगा तब जाकर पशुधन और इनसान को बचा पायेंगे। इसलिये यदि पशुधन और इनसान को मौत के मुंह से बचाना है तो उन लोगों को रोजगार मुहैया करना पड़ेगा। साथ ही राज्य सरकार ने जो सहायता राशि मांगी है, उसे केन्द्र सरकार अतिशीघ्र भेजने की व्यवस्था करे ताकि राहत कार्य और बढ़ाये जा सकें।

सभापति महोदय, राजस्थान में पीने के पानी की गंम्भीर समस्य़ा है। पेय जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, सारा क्षेत्र सूखा पड़ा है। जंगल से पशु निकलता है तो उसे चारा नहीं मिलता है। कहीं भी हरियाली नजर नहीं आ रही है। राजस्थान में नागौरी जाति की गाय , जो हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में छोटी जोत में काम आती है, उसकी नस्ल समाप्त हो जायेगी। यदि यह नस्ल समाप्त हो गई तो राजस्थान स्वयं बर्बाद हो जायेगा। उसके पास कोई दूसरा जरिया नहीं बचेगा। हमारे यहां कोई नहर नहीं है, पानी का कोई साधन नहीं है। पाकिस्तान के साथ मिलते हुये बार्डर पर किसान बहादुरी से बैठा है। मुझे याद है कि १९६२ की लड़ाई में बाड़मेर का कलेक्टर छोड़कर भाग गया था जबकि किसान बराबर वहीं डटा रहा। उधर पाकिस्तान की आबादी है और इधर भारत की ढाणियों में किसान अकेला बैठा रहा। वहां अब पानी नहीं रहा। इसलिये मैं आपसे निवेदन करूंगा कि राजस्थान की विषम स्थिति को देखते हुये अकाल राहत सहायता अविलम्ब भिजवाने की व्यवस्था करें । आज राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से पशुओं के लिये कई डिपो खोले हैं। यहां तक कि हमारे जालौर के सांसद सरदार बूटा सिंह जी जालौर और सिरोही जिले के लिये भूसे के ट्रक लाये हैं ताकि लोगों को राहत मिले। मैंने उनसे आज बातचीत की है। इन्होने कहा कि रेल के डिब्बे नहीं मिल रहे हैं, उन्होने भूसा इकट्ठा कर रखा है। चाहे वहीं ले जायं, कम से कम उनके जिले के लोगों को तो सुविधा मिलेगी। राजस्थान में २३५०० गांव हैं परन्तु कई ढाणियां हैं जहां चारे की कोई व्यवस्था नहीं है। व्य़वस्था न होने से पशुधन मर जायेगा, पीने के पानी की व्यवस्था नहीं की गई तो इन्सान नहीं बच सकेगा। इसलिये मेरा पुरजोर शब्दों में निवेदन है कि केन्द्र सरकार शीघ्रातिशीघ्र राज्य सरकार को अकाल राहत सहायता भिजवाये।

ताकि वहां के पशुधन और इंसानों को बचाया जा सके और अकाल से निपटा जा सके। मैं पुन: पुरजोर शब्दों में आपसे बहुत ही गंभीरतापूर्वक निवेदन करना चाहूंगा कि राजस्थान में अकाल की स्थिति को देखते हुए जहां कम से कम आठ लाख आदमी मजदूरी के लिए जून में प्रस्तावित हैं, वहां ३५-४० लाख लोगों को मजदूरी मिलनी चाहिए, ताकि ३५-४० लाख परिवार तो बचे सकें, ताकि उनके परिवारों को खाने के लिए अनाज मिल सके और पशुओं के लिए सस्ता चारा मिल सके, जगह-जगह डिपो खोले जाएं ताकि पशुधन को बचाया जा सके और पीने के पानी की विशेष व्यवस्था की जाए, ताकि पीने का पानी उपलब्ध हो सके। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देना चाहूंगा कि आपने मेरे राज्य के भीषण अकाल पर चर्चा में कुछ कहने का मुझे मौका दिया। धन्यवाद।

श्री महबूब जहेदी (कटवा) : मैडम चेयरपर्सन, मैं आपका आभारी हूं कि आपने जिंदगी और मौत के इतने महत्वपूर्ण सवाल पर मुझे बोलने का मौका दिया। मुझे याद है इसी सदन में कुछ रोज पहले तूफान और बाढ़ के बारे में बहुत जोर से और बहुत देर तक चर्चा हुई थी और उस चर्चा में हम लोगों ने सरकार को बहुत कुछ बोला था। मगर साथ-साथ हम लोग यह भी सोचते थे कि बाढ़ और तूफान के जाने के साथ अब सूखा आने वाला है, आखिर वही हुआ और सूखा आ गया। मैं इसमें नहीं जाना चाहता कि मेरे इधर और उधर के मित्रों ने वहां के बारे में क्या हिसाब-किताब दिया और भी बहुत से माननीय सदस्य बोलने वाले हैं। मगर सबसे बड़ी चीज यह है कि आज विज्ञान की इतनी तरक्की हो रही है। हमारे पास मैटरियोलोजिकल सिस्टम है। हम एटम बम बना रहे हैं और बहुत कुछ कर रहे हैं। हमें आजादी मिले आज ५२ साल हो गए हैं। अगर तीन साल छोड़ जाएं तो पंचवर्षीय योजना की परिकल्पना शुरू हुई थी। लेकिन जो सबसे बड़े सवाल बाढ़, वर्षा और सूखे के हमारे सामने थे, इनका समाधान नहीं हुआ। मैं आंकड़ो में नहीं जाना चाहता हूं, मैं केवल यही बोलना चाहता हूं कि आज जो चर्चा जो रही है वह राजस्थान, गुजरात और कच्छ आदि इलाकों के बारे में हो रही है। अभी इसमें सुधार नहीं हो सकता, अभी सूखे ने पूरे भारत में फैलना शुरू किया है। वर्ष १९९८ आपको याद होगा जब १३ राज्यों के ५२ जिलों में ऐसा सूखा पड़ा था और शायद आपको याद होगा कि उड़ीसा के तीन जिले ऐसे थे जिनकी आवाज आज भी यहां कायम है और अभी राजस्थान, गुजरात और कच्छ आदि की हालत बहुत खराब है, यह मेरे मित्रों ने यहां कहा है। लेकिन हम कहना चाहते हैं कि वहां के लोग गांवों को छोड़ रहे हैं। मैं सोचता था कि इस बारे में मेरे मित्र बोलेंगे। वहां पशुधन मर रहा है। मेरे मित्रों को याद होगा अभी कुछ रोज पहले अखबारो में एक तस्वीर गुजरात में ट्रक के पीछे मरे हुए पशुओं को टांग कर ले जाते हुए आई थी।

सभापति महोदया, वे जानवर बिना खाने और चारे तथा पानी के मर गए। इस प्रकार से यह काम तो उसी टाइम से शुरू हो गया और तभी से सूखा पड़ना और पशुओं का मरना प्रारंभ हो गया। एक दफा की बात है आपको याद होगा कि एक अखबार में खबर आई कि गाय और बैल खरीदकर वहां भेजे गए और उसमें कुछ झगड़े भी हुए, उन सबके बारे में खबर आई थी। इसका कारण यही है कि वहां का किसान इनको बेच देता है क्योंकि चारे और पानी की समस्या उनके सामने आ जाती है।

महोदया, मैं कहना चाहता हूं कि गुजरात और राजस्थान के गावों में पानी की बहुत भारी समस्या है। इसके कारण गांव छोड़कर लोग दूसरे प्रदेशों में जा रहे हैं। गुजरात के भावनगर के बारे में मैं बताना चाहता हूं और मैं सोच रहा था कि मेरे गुजरात के भाई इस बारे में जरूर बताएंगे, वहां सात दिन में से पांच दिन पानी नहीं आता, सिर्फ दो दिन पानी आता है। राजस्थान के अनेक गांवों में २०० फीट नीचे पानी चला गया है। मुझे मालूम है वहां पर एक लोटा पानी लेने के लिए एक आदमी रस्सी बांधकर और रबड़ का टयूब बांधकर कुए में उतर गया और एक लोटा पानी लेकर लौटा। बात यह है कि सारा पानी सूख गया है।

सभापति महोदया, मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस बार जो सूखा पड़ा है वैसा सूखा इससे पहले नहीं पड़ा। जहां तक वर्षा के मौसम में पानी की वर्षा का सवाल है वहां मैं बताना चाहता हूं कि १०० में से ९६ भाग पानी बरसा, लेकिन सब सूख गया। जो बड़े-बड़े ६४ डैम हैं उनमें पानी सूख गया, जो छोटे-छोटे डैम हैं उनमें भी पानी नहीं है। कुए, तालाब, नदी और नाले सब सूख गए हैं।

सभापति महोदया, हालात ये हैं कि ४०० गांवों को पानी पिलाने के लिए दो टैंकर दिए हुए। वे टैंकर भी एक गांव् में सप्ताह में केवल दो दिन १५ से २० मिनट पानी की सप्लाई करते हैं। आपने समाचारों में भी पढ़ा होगा कि इसी चक्कर में तीन आदमी मारे गए। १५ अप्रेल को डैम से पानी शहर ले जाने पर ग्रामवासियों ने ऐतराज उठाया और वे रास्ते पर बैठ गए, उनको हटाने के लिए पुलिस ने फायरिंग की जिसमें तीन आदमी मारे गए। गुजरात में ऐसा सूखा पिछले १०० साल में नहीं पड़ा, ये सरकारी आंकड़े बता रहे हैं।

15.00 hrs. यह लड़ाई चल रही है। १४३ डैम पूरे हैं। जो रिजर्वायर हैं, उनमें पहले से ही पानी नहीं है। आज के अखबार में यह आया है कि वे और भी छोटे होते जा रहे हैं। जिस डैम में पहले जितना पानी था, अब वह उससे भी नीचे जा रहा है। हमने आपको बताया है कि जामनगर में तीन आदमियों को गोली मारी गई। गाय और बैल तो यहां-वहां गिरे पड़े हैं। लोग उन्हें लेकर वहां से जा रहे हैं. बेच रहे हैं। कई गाय-बैल तो मर गये हैं। एक चैनल में हमने देखा कि गुजरात और राजस्थान में २५००० बैल मर गये। …( व्यवधान) आप बार-बार घंटी बजा रही हैं। यह ठीक है लेकिन अगर आप हमें दो मिनट का समय दे दें तो अच्छा होगा।

सूखा आना आज की बात नहीं है, यह तो पहले से ही चल रहा है। यदि १९९९-२००० के हिसाब से देखें तो १२५ डिस्टि्रक्ट्स में लोगों की क्राप्स खत्म हो गई। उससे ६४ करोड़ रुपये का नुकसान हो गया, १३४ हजार-लाख हैक्टेयर की जमीन बर्बाद हुई थी, ३६९ लाख पापुलेशन इससे प्रभावित हुई। इतनी सारी चीजें आ गयी हैं। यदि हम सिर्फ गुजरात को ही ले लें तो ६,२०० करोड़ रुपये का वहां नुकसान हुआ है। वह सूखा १८००० गांव में फैला हुआ है, और कितना बढ़ जायेगा, मुझे नहीं मालूम। सिर्फ गुजरात में १ करोड़ व्यक्ति इससे प्रभावित हुए हैं। सबसे ज्यादा सौराष्ट्र पिछड़ गया है जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा पैसा बनाता है। राजस्थान के बारे में सब मित्रों ने बताया कि वहां कितना नुकसान हुआ है। अभी तक दो हजार करोड़ रुपये दिये। प्रोडक्शन भी ५३ प्रतिशत नीचे गिर गया। वहां बिजली नहीं है। हम खुद वहां गये थे। राजस्थान में ८०० मेगावाट बिजली सिर्फ ८ घंटे के लिए देते हैं। बिजली नहीं है इसलिए पानी उठाने में दिक्कत हो रही है। मैं सरकार से सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि मैटरियोलॉजिकल डाटा पहले बता देता है कि कहां तूफान आ रहा है, क्या आ रहा है। हमने एटम बम तैयार किया, उसका परीक्षण किया तो क्या उससे तो कोई खराबी नहीं हुई ? इस बारे में भी हमको सोचना चाहिए। हम एटम बम बनाते हैं लेकिन हम सूखे को नहीं रोक सकते। सूखे को रोकने के लिए कुछ बंदोबस्त नहीं कर सकते।…( व्यवधान)

यह कहा जाता है कि हमें पहले से ही कोई उपाय करना चाहिए। हम जानते हैं कि सूखा होगा। यह जानते हुए भी कि सूखा आ रहा है, तब भी उसका कोई उपाय नहीं करते। आपने रिजर्वायर से, डैम से पानी क्यों छोड़ा। इससे पानी नहीं छोड़ना चाहिए। पहले पीने वाला पानी चाहिए, उसके बाद दूसरा कोई पानी छोड़ना चाहिए। यह तकदीर का फैसला है। बिहार के दोस्त हमारे साथ बैठे हैं। उनके बिहार में एक तरफ पूरा पानी है तो दूसरी तरफ पूरा सूखा है। अगर वैज्ञानिक सिस्टम से सूखे में पानी लायेंगे तो सूखा नहीं रहेगा और बाढ़ का पानी सूखकर वहां फिर आबादी हो जायेगी।

इसका कोई बन्दोबस्त नहीं है। .यह बिहार की हालत है। हम कहना चाहते हैं कि सूखा तैयार किया हुआ है। इसे भगवान, नेचर के ऊपर क्यों छोड़ दें कि नेचर ऐसा कहती है। नेचर पर कब्जा करने के लिए वैज्ञानिक हैं, उन्हें चिन्ता है। अगर हम नेचर पर कब्जा नहीं कर सकते तो यही कहेंगे। हम कहना चाहते हैं कि इसके लिए सरकार कसूरवार है। जब हम बाढ़ पर चर्चा करते हैं, यदि उसी समय राजस्थान को कह देते कि वह होशियार रहे तो ठीक होता। यदि एक आदमी मर जाए, एक पशु भी मर जाए तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उस सरकार को लेनी होगी जिस सरकार ने यह हालत तैयार की है और देख रही है कि भारत खत्म हो जाए। मै दो सुझाव देना चाहता हूँ । पहला सूखाग्रस्त क्षेत्रो में खाधान्न और पेयजल की व्यवस्था का जानी चाहिए। दूसरा, पशुधनको बचाने के लिए चारा दिया जाना चाहिए ।

(इति) 1506 hours SHRI K. YERRANAIDU (SRIKAKULAM): Madam Chairperson, we are today discussing the drought situation. Every year, in this august House, we are discussing about drought. This year, the problem is very severe in some parts of our country.

Our hon. Minister of Agriculture has answered a Question on the 8th March, 2000. He has admitted that the Governments of Andhra Pradesh, Gujarat, Himachal Pradesh, Jammu and Kashmir, Karnataka, Madhya Pradesh, Manipur, Mizoram, Rajasthan and Tripura had submitted memoranda of assistance from the NFCR in the wake of drought. The Central teams have already visited the affected areas except Karnataka and Himachal Pradesh.

Yesterday, the hon. Prime Minister has given a statement. He has addressed the nation. But he has mentioned only about Rajasthan and Gujarat. Of course, it depends upon the seriousness of the situation. But I would appeal to the hon. Minister through you that he should respond to the situation throughout the country, to the extent of the drought situation prevailing in each State at this moment.

Since 1995, Andhra Pradesh has been passing through natural calamities one after the other. Every year, we are facing cyclones and droughts. That is why the financial situation in Andhra Pradesh is very bad. I would like to draw the attention of this Government to the fact that out of 22 rural districts in Andhra Pradesh, 18 have been declared drought-affected. We have a total of 1099 revenue mandals in Andhra Pradesh. Out of them, we have declared 688 mandals affected by drought. Various districts have reported a fall in the level of ground water from 0.54 metres to 17 metres. If the same adverse condition continues, the ground water level is likely to reach 20 metres by the end of May-June, 2000.

The India Meteorological Department had, in their Report, predicted another normal monsoon year. They had submitted the Report in May, 1999. But the Government of India has no infrastructure. Every year, we are discussing about drought but we are not taking any preventive action.

In this country, we have sufficient water. We have a number of rivers, but 75 per cent of the water is going into the sea. If we do not provide water, we will face drought every year. I am watching for the last four years that we are only discussing, but there is no improvement; the Government of India is not formulating any new scheme to provide water facilities to farmers.

In various parts of Andhra Pradesh, 13,266 tube-wells had already dried up. The situation is alarming. In Andhra Pradesh, 619 protected water supply schemes have failed. We are now transporting drinking water to more than 1400 villages. The South-West monsoon has failed this year; the North-East monsoon also failed aggravating the situation further. So, I am appealing to the Union Government to look into it and take possible steps to help the Government of Andhra Pradesh. The agricultural labour, in search of employment, has started migrating, particularly from Telangana and Rayalaseema regions of the State due to substantial deficit of rainfall from the North-West monsoon. Fodder has become scarce resulting in severe hardship for cattle population in the affected areas of the State.

The Government of Andhra Pradesh has started all the employment generation schemes. We have already given instructions to the District Collectors to get the work done only through manual labour and there shall be no question of using any machinery. We want to provide employment to migrants. We are taking steps and the State Government has released Rs.90 crore to small and marginal farmers whose crops had been damaged due to severe drought.

In view of the magnitude of the problem, the Government is requested to release Rs.174.95 crore towards agricultural inputs subsidy. Already, a Central Government team had visited Andhra Pradesh. It has submitted a report to the Government of India. The Government of Andhra Pradesh had requested the Union Government to release Rs.700 crore, but the Government of India had sanctioned only Rs.75 crore as on 31st March 1999. Again we are requesting the Government to release the fund. The Chief Minister of Andhra Pradesh has written a letter to the hon. Prime Minister and also to the hon. Agriculture Minister for immediate release of Rs.250 crore.

For agricultural inputs subsidy, we need Rs.174.95 crore, for drinking water, Rs. 265 crore, for employment generation, Rs.116.69 crore, for fodder supply, Rs.65 crore, for special nutrition programme, Rs.28 crore and for health, Rs.1.22 crore, totalling Rs.645.36 crore. Out of that, we are asking the Government of India to at least release Rs.250 crore immediately.

There are many Centrally sponsored schemes. You can take the example of EAS. The Employment Assurance Scheme is intended to provide rural employment. Now, the situation is very severe and that is why, we are appealing through you, Madam Chairman, that instead of giving only one instalment this year, without waiting for audit and accounts reports, the Government of India releases the second instalment immediately.

The Tenth Finance Commission has provided nearly Rs.6000 crore for Calamity Relief Fund in which three-fourths is supported by the Centre and one-fourth is supported by the State Governments.

Naturally, the amount provided is very very meagre. Last year, the allocation made for Andhra Pradesh under Calamity Relief Fund was only Rs. 134 crore, but we have spent Rs. 300 crore. The Government of India has given only Rs. 75 crore under NCRF. Even the recommendations of the Tenth Finance Commission are not being accepted by the Government. They have provided only Rs. 700 crore for five years under NCRF. The Government of India has spent this amount in two years and there is no money for the remaining three years. I would like to ask the Planning Commission and the Finance Ministry as to how can we face the situation with this meagre money. Last year for supercyclone, the Government of India had provided Rs. 800 crore through a special provision. They get permission from the Finance Ministry. If the money is available in the NCRF pool and if there is any deficiency in any State, then immediately they can release the money to help the State Governments.

The State Government of Andhra Pradesh has taken several steps to provide immediate relief. Nearly fifty per cent of the area has been declared drought-affected and nearly 3.50 crores of people are affected by the drought. Collection of water charge has been postponed; and payment of crop loans are rescheduled. The Government has made a provision for releasing fresh loans; and exempted school and college fees. Due to all these reasons, our revenue receipts have come down. That is why we are facing financial crisis.

1518 hours (Shri Basu Deb Acharia in the Chair) Normally, in Andhra Pradesh, 80.16 lakh hectares of land is covered every year, but this year only 74.71 lakh hectares of land has been covered. Many crops, like groundnut, redgram, and sunflower, have been affected. Under minor irrigation, out of 12,264 tanks of water, only 4,424 tanks of water have been received. Under medium irrigation, out of 8.30 lakh acres of land, only 3.78 acres of land have been sown. So, Andhra Pradesh in general and Telengana and Rayalaseema in particular are facing severe drought condition. Of Rayalaseema region, Anantapur, Cuddapah,and Chittor are facing severe drought condition, and of Telengana region, Mehboobnagar, Prakasam and Nellore are facing severe drought condition. That is why I am requesting the Government of India to sanction second instalment for all the Centrally-sponsored schemes without waiting for the utilization certificates. Under MWS, the Central Government has already released the first instalment. Since there is a lot of scarcity for drinking water in these areas, the second instalment should be released without waiting for the utilization certificates. A team was sent to assess the situation which had already submitted its report in October. Already more than five months are over. Now, the situation has changed. If necessary, the Central Government can send one more team to study the present situation. Through that also the Centre can help the State of Andhra Pradesh. Thank you.

डा. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली) : सभापति महोदय, सूखे पर बहस की स्वीकृति आपने देकर बहुत अच्छा काम किया है। अपने देश में पुराने जमाने से सूखा पड़ता है, अकाल पड़ता है, वर्षा नहीं होती। एक बार राजा जनक ने स्वयं हल चलाया था तो वर्षा हुई थी। पुरानी संस्कृति है : ‘जाके राज प्रिय प्रजा दुखारी ते नृप होए नरक अधिकारी।’ पहले से लोग गांवों में वधि-विधान करते थे. योग तप करते थे कि वर्षा हो जाए। महिलाएं इन्द्र देवता की आराधना किया करती थीं कि वर्षा हो जाए। ‘हालि-हुलि वर्षा इन्द्र देवता, पानी बिनु जाइये परान होए।’ महिलाएं बैठकर इन्द्र भगवान की आराधना कर रही हैं कि किसी प्रकार से वर्षा हो जाए।

हिन्दुस्तान में खेती जुए के समान है। यदि वर्षा होती है तो कृषि मंत्री जी का भाग्य खुल जाता है। खूब उपज होती है, बीस करोड़ टन मेरे राज्य में पैदा हुआ और वर्षा नहीं हो तो ढ़ोल का पोल खुल जाता है। सारी सिंचाई व्यवस्थाएं धोखा हैं क्योंकि सूखे का मुकाबला वे व्यवस्थाएं नहीं कर पातीं। हमारे देश की खेती मानसून और प्रकृति पर निर्भर है। राजस्थान में पहले से सूखा पड़ता रहा है औऱ सूखा होने से तीन वर्ग के लोग पीड़ित होते हैं। सबसे पहले तो किसान प्रभावित होता है। उसकी उपज नहीं होती और पास की पूंजी भी लग जाती है। फिर गरीब आदमी को भोजन नहीं मिलता, काम नहीं मिलता। तीसरे नंबर पर जानवर को पानी नहीं मिलता, चारा नहीं मिलता। इससे भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाती है। अभी येरानायडु जी ने भी बताया है कि आन्ध्रा प्रदेश भी इस समस्या से प्रभावित है और कई राज्यों में कुछ हिस्से सूखे से प्रभावित हैं। बिहार में भी पलामू, गरवा औऱ गया ड्रॉट-प्रोन एरि़याज हैं। राजस्थान में वर्षा नहीं होती औऱ जैसे-जैसे पश्चिम की ओर जाते हैं, वर्षा कम होती जाती है। सरकार को इसका इंतजाम करना चाहिए। इस पर बहस हुई थी औऱ मांग हुई थी कि कैलेमिटी और राष्ट्रीय आपदा कोष में सौ करोड़ का बजट प्रावधान था। सारे दलों की ओर से सदन में सहमति थी कि राष्ट्रीय आपदा कोष का बजट बढ़ाना चाहिए। यदि इसे नहीं बढ़ाया गया तो मैं सरकार पर चार्ज करता हूं कि इनकी गड़बड़ी से सारी ग़ड़बड़ी होती है। सरकार के सामने क्या कठिनाई है ? वह राष्ट्रीय आपदा कोष का बजट क्यों नहीं बढ़ाना चाहती ? जहां सूखा पड़ता है तो राज्य सरकार की सूखा से मुकाबला करने की औकात ही क्या है ? फाइनेंस कमीशन ने अनुशंसा की है कि तीन चौथाई हिस्सा भारत सरकार देगी औऱ एक चौथाई हिस्सा राज्य सरकार देगी। फाइनेंस कमीशन ने यह महसूस किया कि राज्य सरकार की हैसियत सूखे से मुकाबला करने की नहीं है, इसलिए तीन चौथाई हिस्सा भारत सरकार देगी लेकिन वह रुटीन अफेयर है। इस सूखे से निपटने के लिए केन्द्र को आगे आना पड़ता है। सौ करोड़ रुपया नेशनल कैलेमिटी रिलीफ फंड में था। प्रधान मंत्री जी ने ऐलान कर दिया, पैकेज हो गया, सारे जाली पैकेज की घोषणा की जाती है। यह जले पर नमक छिड़कने के समान है। कहा जाता है कि राज्य को तो सैंट्रल असिस्टेंस मिलने वाली है।

यह मदद नहीं हुई, बल्कि धोखा हुआ। मेरा पहला प्रश्न है, अगल नेशनल कैलेमिटी फन्ड में एक हजार करोड़ रुपया नहीं हुआ है, तो सरकार को तुरन्त पहुंचाना चाहिए। यह सही है कि प्राकृतिक आपदा को रोकने का प्रयास नहीं हुआ है, लेकिन अगर प्राकृतिक आपदा हो जाए, तो सरकार को आगे आना पड़ता है। पहले कभी मुफ्त में अनाज दिया जाता था, लेकिन ब्रिटेन के एक इकोनोमिस्ट, कैन, के अनुसार गरीबों को अनाज कुछ-न-कुछ काम करके देना चाहिए। जब भोजन का अभाव हो जाए, पशुओं को भोजन नहीं मिले, सूखा हो जाए, तो ग्राउन्ड वाटर सबसे नीचे चला जाता है। जब वहां पर पीने का पानी नहीं होगा, तो पलायन होगा। लोग देश के दूसरे हिस्सों में जाने लगेंगे और अकाल की स्थिति होने पर पशुधन खत्म हो जाएगा। इससे देश की अर्थ व्यवस्था चौपट हो जाएगी और उसका मुकाबला नहीं किया जा सकता है। इसलिए केन्द्रीय सरकार को चौड़ी छाती और दिमाग से काम करना चाहिए और राज्य सरकार की पीठ पर खड़े होना चाहिए, ताकि राज्य सरकार की मदद की जा सके। जो प्रभावित क्षेत्र हैं, उनमें पीने के पानी और सिंचाई की व्यवस्था होनी चाहिए। सिंचाई की व्यवस्था ठीक रहती, तो सूखे से निपटा जा सकता है। सिंचाई योजना की परिभाषा है कि सुखाड़ की अवस्था है और नदी व नालों में पानी जमा हो जाए, तो उससे सिंचाई हो। इसी आधार पर इस देश में सिंचाई की योजनायें चलती हैं। लेकिन कुव्यवस्था के चलते सूखे की स्थिति से मुकाबला नहीं किया जा सकता है। इसलिए राहत के लिए केन्द्रीय सरकार को आगे आना चाहिए और रिलीफ फड में राहत देकर गरीबों की हिफाजत करनी चाहिए।

महोदय, पहले पीडीएस के माध्यम से अकाल के समय में गरीबों को बड़ी भारी मदद मिलती थी। फूड मनिस्टर सदन में उपस्थित नहीं हैं। पीडीएस में गेहूं की कीमत एपीएल के लिए ९ रुपए रखी है, जबकि बाजार में ६ रुपए है और आप ५.८० रुपए में खरीदते हैं। इतने भाव में खरीद कर आप ९ रुपए में बेच रहे हैं। इतना तो कोई मुनाफाखोर भी नहीं करता है। महोदय, आपको हम पंच मानते हैं, ६ रुपए बाजार में रेट हैं और पीडीएस में ९ रुपए किस हिसाब से कर दिया, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। क्या सरकार इस तरह से स्थिति का मुकाबला कर पाएगी। आपने यह कीमत किस आधार पर बढ़ाई है, अमत्र्य सैन के हिसाब से मैं नहीं बता रहा हूं, मैं भी साधारण तौर पर बता रहा हूं। इस सरकार की बुद्दि मारी गई है।

अकाल है, नदियां सूख रही हैं, पेड़-पौधे सूख रहे हैं। इन्होंने नौ रुपए किस हिसाब से रखे हैं, ये बताएं। मैं राजस्थान में जो सूखा पड़ा है उसके लिए बहुत परेशान और चिन्तित हूं। नौ रुपए गेहूं का भाव किस हिसाब से रखा, यह कौन से फार्मूले से रखा है। इस सब्सिडी को कम करके इन्होंने देश को लूट लिया है, उसका बदला आम उपभोक्ता से ले रहे हैं। छ: रुपए बाजार का भाव है और नौ रुपए पीडीएस का भाव है, यह तो अंधेर है। मैं समझता हूं कि WTO का दबाव है कि जन वितरण प्रणाली खत्म करो। गरीब को पांच रुपए गेहूं मिल रहा है, उसे दस रुपए कर दीजिए। आपको जनता ने वोट दिया है, आप उनको क्या जवाब देंगे। आपने मिट्टी के तेल की क्या कीमत कर दी। दुनिया भर में कहीं भी इस तरह कीमत नहीं बढ़ती है। जब और चीजों की कीमत बढ़ती थी तो इसकी भी थोड़ी-बहुत बढ़ती थी, लेकिन आपने दुगनी कीमत कर दी। मिट्टी के तेल का इस्तेमाल गरीब व्यक्ति करता है, आपने उसकी दुगनी कीमत कर दी। वह सूखे से कैसे मुकाबला करेगा, जहां सूखा नहीं है वहां भी प्रभाव डालना चाहते हैं। नेशनल केलेमिटी फंड में एक हजार करोड़ रुपए किए या नहीं और अगर नहीं किए तो आज हम इनके खिलाफ अविश्वास और निन्दा प्रस्ताव लाएंगे। पीडीएस के दाम का एक्सप्लेन करें। छ: रुपए बाजार में भाव है तो आप नौ रुपए क्यों करना चाहते हैं, मूल्य वृद्धि क्यों करना चाहते हैं। मुनाफाखोरों को कहते हैं कि तुम आओ और दाम बढ़ाओ, तुम कैसे उदार हो कि तुम नौ रुपए में बेचते हो। गुजरात, राजस्थान और जहां भी पीने का पानी नहीं है, वहां उनसे बात करनी चाहिए। पशुधन की रक्षा के लिए चारा, जहां कहीं से भी हो, मुफ्त चारा मिलना चाहिए। गरीबों के लिए मुफ्त राशन का इंतजाम होना चाहिए। ये जो दाम बढ़ रहे हैं, क्या ये मुफ्त राशन देने वाले हैं। फाइनेंस मनिस्टर ने ऐलान किया था कि एकदम बेहाल आदमी को हम दस किलो अनाज मुफ्त में देंगे। डेढ़ साल होने जा रहा है, ये बताएं कि कितना अनाज गरीब को मिला है। इन्हें वचन भंग और धोखाधड़ी में जेल भेजा जा सकता है। आप तो कानून के जानकार हैं। सदन में घोषणा की कि हम गरीबों को दस किलो अनाज देंगे, अन्नपूर्णा योजना करेंगे, लेकिन डेढ़ साल हो गया, कितना अनाज गरीबों को मिला है। ये गरीबों को कुछ नहीं दे सकते हैं। गरीब का नाम सुनने से इन्हें तकलीफ होती है, गुस्सा आता है कि गरीब क्यों हैं।... (व्यवधान)

महोदय, जहां कहीं भी सूखा है वहां राज्य सरकार से सहयोग करके, जो सूखे से प्रभावित किसान तकलीफ झेल रहे हैं, गरीबी रेखा से नीचे के लोग हैं, उनके लिए कुछ करना चाहिए। पीने के पानी का प्रबंध करना, अनाज मुहैया कराने का काम, रोजगार देने का काम होना चाहिए। पशुओं के लिए चारे का प्रबंध करना चाहिए।... (व्यवधान) प्रधानमंत्री जी ने ऐलान किया, अखबार में छपा कि बिहार को २६ हजार करोड़ का पैकेज। हम सवाल पूछते हैं कि प्रधानमंत्री जी ने २६ हजार करोड़ की घोषणा की, लेकिन उत्तर आया है कि कोई घोषणा नहीं है। जब इस तरह देश के प्रधान मंत्री वचन भंग करेंगे तो उनके ऊपर कौन सा मामला चलेगा।

इसलिए घोषणाएं बंद कीजिए प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए राज्य सरकारें, केन्द्र सरकार, स्वयंसेवी संस्थाएं सब मुस्तैद हों और मानवता की सेवा करें। पानी, भोजन, चारा और दवाओं का इंतजाम अकाल पीड़ित क्षेत्रों के लिए होना चाहिए। सिंचाई विभाग और उससे सम्बद्ध विभाग सब दुरूस्त हों। अकाल पीड़ित क्षेत्रों में मिट्टी का तेल गरीब आदमी को मुफ्त मिलना चाहिए, लेकिन इस सरकार ने तो गरीबों पर सारा बोझ बढ़ा दिया है। हमको इस सरकार पर भरोसा नहीं है।…( व्यवधान) इन सारी चीजों का मुकाबला करने में राजनीति नहीं आनी चाहिए। यह राष्ट्रेय आपदा है। हम सबको मिलकर पीड़ित मानवता की सेवा करनी चाहिए। किसानों और गरीबों को राहत मिलनी चाहिए और पी.डी.एस. में सुधार होना चाहिए। पी.डी.एस. में सुधार नहीं हुआ तो मूल्यवृद्धि होगी।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं एक बार फिर गुजरात और देश के अन्य अकाल पीड़ित प्रदेशों की प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।

SHRI P.S. GADHAVI (KUTCH): Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to speak. I also thank Prof. Rasa Singh Rawat for bringing up this issue of drought for discussion in this august House.

Drought is a very serious issue concerning millions of people of our country, particularly Rajasthan, Gujarat, Andhra Pradesh and other parts of the country. In Gujarat, there are three regions which are hard-hit by severe drought, that is, Sourashtra, North Gujarat and Kutch from where I am hailing. In Kutch we witnessed drought for 32 times during the last 52 years. Many people from my part have migrated as they had no work there and had to look for jobs outside my place. This process has been going for the last fifty two years. Once upon a time, Kutch was known as one of the best grasslands in Asia. There is a particular area known as Banni which had very good breed of buffaloes and cows. There were three to four lakh buffaloes and cows but gradually, due to drought, they are perishing. Many projects and programmes had been taken up by the Central Government and the State Government as drought relief measures. But people have not realised the result of such projects and programmes.

Where does the fault lie? There are so many Ministries and agencies working on this. Recently, one article has appeared in The Times of India, the title of which is: "Too-many water-related Ministries leave people high and dry." In the Central Government, we have got the Ministry of Water Resources, Ministry of Rural Development, Ministry of Irrigation, the Drinking Water Mission and many other Departments and agencies. But the problem remains there. So, this is a very serious problem. Our aim is not to blame this Government or that Government. Here, we are all concerned with the plight of the people. We have to consider what to do and why these people are not getting water.

There is a peculiar situation. In Bihar, there are many floods while in other parts, there is the problem of drought. So, what to do? How do we solve this problem? There are very big potentialities available to develop these regions like Kutch. If water is given to Kutch, then Kutch can prosper like anything. The only hope for the Kutch region and other areas to get water is to bring water from the South Gujarat rivers, particularly from the Narmada river. Had the Narmada Project been completed as per schedule, the Kutch region would not have faced the situation which it is facing today. Why has this happened?

Sir, many times, environmental issues come in the way of the project. In the name of some section of people, the Narmada Project is entangled in bitegation. About the Narmada Project, I would like to state that millions of gallons of water flow into the sea even today. So, my only humble request to this august House and to all those who are sitting here is to see that this type of a project is considered as a project of national importance. If some people are to be rehabilitated, definitely they should be rehabilitated. Some 30,000 to 40,000 people are to be rehabilitated. But the project should not be held up at the cost of three crore people. Please consider the plight of the people today. We cannot provide water to Kutch from anywhere. The Government of Gujarat is doing very well. It has started doing it in its own way. The Government of Gujarat has recently started one scheme called the Sardar Patel Jalsanchay Sahbhagi Yojana, that is, People’s Cooperation Scheme, in which 60 per cent is to be borne by the Government of Gujarat and 40 per cent is to be borne by the people. So, people are coming forward to fund. When rain is not there, how can we get water? We can get water only from the South Gujarat rivers. So, my suggestion to the hon. Minister is that the Government should take measures for giving water to Kutch and other parts which are on the coastal areas. If we put up the Reverse Osmosis Plant (the R.O. Plant) immediately, it would help. The long-term solution is to be there. In many parts of the Gulf countries, this R.O. Plant is put up. The Gulf countries are getting water from the sea. So, only if the sea water is converted or if the R.O. Plant is there, it can solve the problem. If there is the long-term solution, then the problem of water and all other problems can be solved. Kindly see the plight of the people. People are migrating. They have gone outside Kutch. As I said earlier, we can get water only from the South Gujarat rivers and the second solution is the putting up of the R.O. Plant.

A few days back, all the hon. Members of Parliament from our State met the hon. Agriculture Minister, Shri Sundar Lal Patwa Ji who is holding the charge of the Rural Development Ministry also. As soon as we approached him, he immediately told the Chief Minister of Madhya Pradesh to send fodder from Madhya Pradesh. He has already arranged it. Now, fodder is coming. But it costs a lot to get fodder from a long distance, from Madhya Pradesh or Punjab. If the provision of water is made on a long-term basis, it would go a long way. Long-term projects can be worked out for the Kutch region. I and other Members of Parliament from the drought-prone areas like Mehsana, Jamnagar, Patan Surendra Nagar and Banaskantha have called on the hon. Prime Minister. The hon. Prime Minister was kind enough to send a team. But the team has not still formulated any particular project for this part of Gujarat. I would suggest that the hon. Agriculture Minister and the other Ministers should formulate a long-term plan for getting water from the South Gujarat rivers. If a coordinated effort is not made, then these projects are not going to be carried out. The Central Government and the Gujarat Government should come forward to do something in this regard. The Kandla Port Trust has got reserve funds. The Gujarat Mineral Development Corporation has got funds. There is one scheme of providing Rs.800 crore for bringing water from the South Gujarat rivers.

Similarly, the Narmada Dam Project cannot be implemented immediately, but other projects are there like the project for getting water from the South Gujarat rivers at a cost of Rs.800 crore. In this project, if the State Government of Gujarat, the Central Government and other corporations like GMDC, GMB, Kandla Port Trust, IFFCO etc. contribute some money, then this problem can be solved. Otherwise, this problem will remain. We have not been able to solve the water problem for the past 50 years. We have been hearing about the Grid Project for so many years now. If that project had been implemented, this problem could have been solved.

Sir, yesterday, the hon. Prime Minister appealed to all our countrymen to contribute generously towards the Prime Minister’s Relief Fund. Everybody should consider this very seriously and contribute so that we can solve this problem. Many times, what happens is, whenever this type of situation arises, it attracts the attention of the media and politicians. We all talk about it, but thereafter nothing happens. I have seen a very good Editorial, which has appeared in The Times of India. It says:

"Searing pictures and live footage of hapless villagers risking their lives for a few precious drops of water seize public attention and provide a newsworthy backdrop for air-dashing politicians on rescue missions. Well-meaning and well-orchestrated charity drives are organised. And almost as soon as it all begin, it is over and things revert to the status quo."

So, we should not forget it. It is the responsibility of every citizen of the country and we are all duty-bound to help in solving this problem. Here, I would like to draw the attention of this august House to the Kandla cyclone which has completely ruined the Kandla Port Trust. During that cyclone, 3,000 poor people lost their lives and many people have lost their houses. Even today they are living in temporary sheds and they have no houses. This kind of thing should not happen again. Now, this problem has attracted the attention of this august House. So, we should formulate a permanent solution to this problem. Therefore, I would humbly request the Government that they should find both short-term as well as long-term measures to solve this water problem in States like Gujarat, Rajasthan, Andhra Pradesh and other parts of the country, so that we do not face this kind of a drought situation in future. (ends) डा.गरिजा व्यास (उदयपुर) : सभापति महोदय, मैं बहुत दर्द, पीड़ा और एन्गुइश होकर आज इस सदन में अकाल पर अपने विचार रखना चाहती हूं। अकाल चाहे आंध्रा प्रदेश में हो, गुजरात में हो, सौराष्ट्र में हो या राजस्थान में हो, अकाल, अकाल ही है। लेकिन अकाल जो विभीषिका इस वक्त राजस्थान में हैं, उसकी ओर मैं सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। मैंने अभी-अभी करीब २२ जिलों का दौरा किया और इन दौरों के दौरान जो पीड़ा, दुख और लोगों के आंसू मैंने देखे, उन्हें लेकर मैं यहा आई हूं और उन्हें सदन के सामने रखना मैं अपना कर्तव्य समझती हूं। अभी-अभी पायलट साहब कह रहे थे, इसलिए मैंने एक शेर कहा था -

कैसा कहर बरपा हुआ है मेरी जमीन पर, सूखी जमीन, सूखे शजर, प्यासे हैं जानवर।

हमारी जमीन पर आज बहुत मुश्किल है। इसलिए राजस्थान के बारे में बात करते हुए रावसिंह जी साहब ने एक बात कही थी कि जहां राजस्थान देश के १०.७ क्षेत्रफल में फैला है, वहीं पानी हम एक प्रतिशत ही ले पाते हैं और उसमें भी ७५ प्रतिशत जमीन जिसे बोया जा सकता था, उसे अकाल की स्थिति के कारण सिंचाई न होने के कारण, हम बो भी नहीं सकते हैं। मानसून लगातार अपर्याप्त रहता है और कभी-कभी वह स्थिति आती है, जब राजस्थान को पूरी तरह से अकाल की स्थिति से उबारा जा सके। इसीलिए राजस्थान के लोग कहा करते है कि राम तो रोज रूठता है, लेकिन राज नहीं रूठना चाहिए और उसी पर मैं अपनी बात कहूंगी। लेकिन इस समय राजस्थान में जो स्थिति है केवल जैसलमेर, भरतपुर और चित्तौड़गढ़ में ठीक-ठाक बरसात हुई थी, अन्यथा माइनस २० प्रतिशत से लेकर माइनस ७० प्रतिशत तक हमारे इलाके में बरसात हुई।

सभापति महोदय, सबसे कम बरसात बाड़मेर में निश्चित की गई। मेरा इलाका उदयपुर वैसे तो झीलों की नगरी है, लेकिन इस वर्ष बीकानेर, चुरू, गंगानगर, जालौर, सिरोही, पाली, अलवर, जयपुर और कोटा के बराबर बांसवाड़ा, राजसमुंद और उदयपुर में भी यही स्थिति रही। यही स्थिति दौसा से आने वाले हमारे माननीय सदस्य श्री पायलट साहब की भी है। वहां पर भी रेनफाल २० प्रतिशत से कम हुआ, आठ जिलों की सीमा का परिसीमन किया गया, अजमेर, भीलवाड़ा, नागौर, झुंझुनू, दौसा, धौलपुर, सीकर, बारा, बून्दी, झालावाड़, करौली, सवाई माधोपुर भी हैं। ऐसी स्थिति में जब वर्षा सन्तोषजनक न हो और तीसरे साल भी अकाल की विभीषिका से जूझना पड़े, तो आप उस धरती का अनुमान लगा सकते हैं। वह धरती, धरती न रह कर ऐसा लगता है कि वह अपने फटे हुए सीने को दिखा रही है। आप तालाब के पेटे में चले जाएं, दूर-दूर तक एक बूंद पानी नहीं दिखेगा बल्कि धरती फटी हुई दिखाई देगी। तीसरी बार जब अकाल पड़ा, तो भयावह स्थिति सामने आ गई और अभी जैसा मेरे पूर्व-वक्ता बोल रहे थे खरीफ की फसल तो खराब होनी ही थी, लेकिन रबी के हालात भी खराब हो गए और उसी के साथ-साथ १८०८५ गांवों में स्थिति गंभीर बनी हुई है जहां पर न तो खेती है और न खेती करने लायक कोई स्थिति बची है।

सभापति महोदय, जब कहीं भी अकाल पड़ता है, तो उसे तीन स्थितियों से आंका जाता है-वहां पड़ने वाली बरसात, वहां पर लोगों को दी जाने वाली सहायता और वहां की पेयजल स्थिति को सुधारने का तरीका, लेकिन राजस्थान एक ऐसा प्रान्त है जहां कभी हरितक्रांति नहीं आ सकती, परन्तु थोड़े से प्रयास से श्वेतक्रान्ति आ सकती है। मैं पहले एम्पलायमेंट जनरेशन की बात करूंगी। इस वर्ष जहां ३०४०६ गांव अकाल से ग्रस्त हैं, वहां २६ जिलों में अकाल पड़ा है जिसके घेरे में २६२ लाख आबादी आती है। आप अनुमान लगाइए कि पूरे राजस्थान की आबादी कुल ४४० लाख है, उसमें से आधी से अधिक आबादी में अकाल पड़ा है। उसे देखते हुए कितने बड़े पैमाने पर सरकार को एम्पलायमेंट जनरेशन के प्रयास करना चाहिए था।

सभापति महोदय, आप याद करें १९८६-८७ और १९८७-८८ के उत्तरार्ध का समय जब सबसे पहले वहां अकाल पड़ा था और वहां की सरकार ने उस समय केन्द्र सरकार से केवल ५०० करोड़ रुपए मांगे, किन्तु राजीव जी की संवेदनशीलता के कारण केन्द्र सरकार ने राजस्थान सरकार को वहां के अकाल की भयावहता को देखते हुए ६०० करोड़ रुपए दिए और उसके अतरिक्त २०० करोड़ रुपए आई.सी.डी.एस. और स्वास्थ्य तथा जलदाय की समस्याओं को हल करने के लिए मिले और इस प्रकार उस समय करीब ८००-९०० करोड़ खर्च हुए थे। अभी जो राजस्थान की टोटल पापुलेशन है उसकी २६१.१७ लाख एफैक्टेड है जिसमें छोटे और मार्जिनल फार्मर २२.५९ लाख हैं और उसमें से एग्रीकल्चरल और लैंडलैस लेबर ३६.३९ लाख हैं। उसके साथ-साथ एस.सी. और एस.टी. की संख्या ५२.७७ और ४७.७८ लाख है। ऐसी स्थिति में राजस्थान सरकार चाहती थी कि कम से कम ५२.३६ लाख परिवारों को रोजगार मिलता, लेकिन धन की कमी के कारण, जैसा अभी हमारे पूर्व वक्ता ने कहा था कि केवल पांच लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध करा पाए हैं। इस बार सरकार का लक्ष्य था दो लाख लोगों को नवंबर मास तक रोजगार दे दिया जाए और जून मास तक ११ लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध करा दिया जाए, लेकिन जून तक हम ८ से १० लाख लोगों को ही रोजगार उपलब्ध करा पाएंगे। अब इसका कारण क्या रहा, मुझे उसे कहने की जरूरत नहीं है।

सभापति महोदय, कल ही प्रधान मंत्री महोदय ने अपने संभाषण में और देश का आहवान करते हुए कहा था कि जब ऐसी आपत्ति हो, तो किसी को चुप नहीं बैठना चाहिए। मैं आपसे निवेदन करना चाहती हूं कि राजस्थान सरकार लगातार केन्द्र सरकार से अधिक धन देने की मांग अभावग्रस्त जिलों के लिए १११४ करोड़ रुपए की राहत की मांग करती रही कि इतना धन स्वीकार किया जाए। उसके लिए ज्ञापन भी दिया जो नवंबर एवं मार्च में दिया गया और उनमें बार-बार एक ही बात दोहराई गई कि हमारे अनुसार १११४ करोड़ रुपए राजस्थान की बहबूदी के लिए चाहिए, लेकिन उसके बाद सरकार ने केन्द्र की एक टोली जरूर भेज दी, परन्तु उसके बाद धन में कुछ भी बढोत्तरी नहीं हुई।

हाल ही में हमें केन्द्र सरकार से सिर्फ १०३ करोड़ रुपये मिले हैं। जैसा मैं कह रही थी कि इस बार अकाल का तीसरा वर्ष है। पिछला वर्ष दूसरा वर्ष था। उस वक्त हमने केन्द्र सरकार से ७०० करोड़ रुपये मांगे थे लेकिन केन्द्र सरकार ने सिर्फ २१ करोड़ रुपये राजस्थान सरकार को दिये। ६०० करोड़ रुपये की व्यवस्था राजस्थान सरकार ने अपने आप की थी। मैं याद दिलाऊं कि श्री भैरों सिंह शेखावत, जो कि उस समय के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने उस वर्ष के लिए ९०० करोड़ रुपये की मांग की थी। लेकिन राजस्थान सरकार जो तत्कालीन कांग्रेस की सरकार है, उनके ७०० करोड़ रुपये की मांग करने के बावजूद उन्हें को २१ करोड़ रुपये ही दिये गये। किसी तरह वह वर्ष बीत गया लेकिन उसके बाद की भयावह स्थिति और इसका अंदेशा भी नहीं था कि तीसरे वर्ष भी हमें लगातार अकाल से जूझना पड़ेगा।

राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है जहां पर श्वेत क्रान्ति आराम से लाई जा सकती है। ऐसी स्थिति मे श्वेत क्रान्ति के लिए जरूरी है कि हम कैटल कन्जर्वेशन और फौडर अरेंजमैंट के लिए प्रयास करते। अभी मैंने कहा कि नागौरी और राठी गाय काफी मशहूर हैं। जहां उनके संवर्धन करने की जरूरत थी, वहां आज उनका राजस्थान से पलायन ही नहीं हो रहा बल्कि काफी संख्या में वे अपनी जान से भी हाथ धो रही हैं। इसके लिए वालंटिरी एजेंसी से भी कहा गया है और उनके प्रयास भी किये जा रहे हैं लेकन जब तक केन्द्र सरकार अपना रवैया स्पष्ट नहीं करेगी तब तक हम कैटल के संबंध में कोई योजना निर्धारित नहीं कर पायेंगे।

अभी राज्य सरकार ने अपने निर्णयों के द्वारा कैटल को बचाने के लए काफी कुछ प्रयास करने शुरू किये हैं। जहां पर पहले केवल बड़े पशुओं के लिए छ: रुपये और छोटे पशुओं के लिए तीन रुपये दिये जाते थे, अब उसे बढ़ा कर बड़े पशुओं के लिए दस रुपये और छोटे पशुओं के लिए पांच रुपये कर दिये गये हैं। लेकिन आज भी पशुओं की स्थिति ठीक नहीं है। लोगों के पशु दर-दर भटकने और मरने को मजबूर हो गये हैं।

मैं एक बात आपसे कहना चाहती हूं कि मैं जिस इलाके से आती हूं, वहां राज समुद्र झील की खुदाई हो रही थी और उसमें पानी नहीं आ रहा था। उस समय एक पंडित ने राजा से यह बात कही कि जब तक संवेदना का अंश नहीं होगा तब तक तुम चाहे जितने भी प्रयास कर लो, उसमें सफलता नहीं मिलेगी। राजीव जी ने उस संवेदना के पंख को हमें दिया और लगातार चार-पांच बार बॉय रोड उन्होंने राजस्थान का दौरा किया। लेकिन इतनी विभीषका के आने के बाद भी केन्द्र सरकार के कितने मंत्री वहां पहुंचे हैं? आज स्थिति यह है कि न केवल राजस्थान में बल्कि राजस्थान से सटे हुए गुजरात और आंध्रा प्रदेश के कुछ जिलों में प्रधान मंत्री जी को अपने साथ लीडर ऑफ औपोजिशन को ले जाकर वहां की सही स्थिति के बारे में निर्धारण करना चाहिए। जहां अलग-अलग सरकारें अपनी स्थिति से उबरने का प्रयास कर रही हैं, जहां राजस्थान के साथ-साथ दो और राज्यों में अकाल की विभीषका है वहां पर एक राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। आप आंकड़ें देखिये। जहां पर छ: या सात डिस्टि्रक्ट्स में अकाल हो, मैं नहीं कहती कि वहां पर पैसा नहीं मिलना चाहिए, भरपूर पैसा मिलना चाहिए था लेकिन छ: या सात जिलों में डिस्टि्रक्ट्स में जितना पैसा दिया गया उतना पैसा २६ डिस्टि्रक्ट्स जहां पर अकाल के साथ पशु धन और पेय जल की स्केयरसिटी है, वहां नहीं दिया गया। यह एक राजनीतिकरण का द्योतक है। …( व्यवधान)

श्री श्रीचन्द कृपलानी (चित्तौड़गढ़) : सारा पैसा राजीव पाठशाला में लगा दिया गया है। …( व्यवधान)

वहां सारा काम राजनीतिक आधार पर हो रहे हैं। …( व्यवधान) आप अकाल की बात कर रही हैं।

…( व्यवधान)

डा. गरिजा व्यास : वह शिक्षा का पैसा था। हम अकाल की बात कर रहे हैं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठ जाइये।

डा. गरिजा व्यास : हमने आपकी सारी बातें सुनी। …( व्यवधान) आप भी कम से कम अपने उस पहलू को सुनिए। मैं बात कर रही थी कि इन सबके बावजूद भी राजस्थान सरकार जो कि कांग्रेस की सरकार है, प्रतिबद्ध है क्योंकि हम केवल शासन करने के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। हमारी प्रतिबद्धता होती है कि हम लोगों के दुख-दर्द में, गरीबी हटाने के लिए, लोगों को पेय जल और रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कार्य करें। …( व्यवधान)

डा. जसवंत सिंह जादव (अलवर) : सभापति जी, माननीय सदस्या ने कल के अखबार में घोषणा की है कि राजस्थान सरकार संवेदनशील नहीं है और वहां का कोई काम नहीं हो रहा है। यह आपका स्टेटमैंट छपा है। …( व्यवधान)

डा. गरिजा व्यास : मैंने राजस्थान सरकार से यही कहा कि आपको संवेदनशीलता से कार्य करना चाहिए था। मैंने पार्टी अध्यक्ष की तरफ से कहा। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : वे ईल्ड नहीं कर रही हैं।

श्री डा. जसवंत सिंह जादव : इसका मतलब यह है कि ये जनता में कुछ बोल रही हैं और यहां कुछ और बोल रही हैं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिये।

श्री लक्ष्मण सिंह : सभापति महोदय, ये राजस्थान के मसले को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। …( व्यवधान)

डा. गरिजा व्यास (उदयपुर) : सभापति महोदय, मैं यही बात कह रही हूं।…( व्यवधान)

16.00 hrs. सभापति महोदय : आप कृपया बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

डा. गरिजा व्यास : मैं पार्टी के प्लेटफार्म से भी वही बात करती हूं जो यहां पर कहने का दुस्साहस या साहस रखती हूं कि अकाल के मामले में हमें राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। यही वजह रही कि न केवल श्री राजीव गांधी ने बल्कि उसके बाद वाले समय में जब श्री राजीव गांधी प्रधानमंत्री नहीं थे, राजस्थान में कांग्रेस की सरकार नहीं थी, मैं माननीय सदस्यों से निवेदन करना चाहूंगी कि वे उस वक्त के आंकड़े देखें जब केन्द्र में हमारी सरकार न होते हुए भी राज्य सरकार को उतने ही पैसे दिए गए।

१६०१ बजे (श्री पी.एच. पांडियन पीठासीन हुए) मैं आज तत्कालीन मुख्य मंत्री माननीय भैरो सिंह जी का बयान उद्धृत करना चाहती हूं जिसमें उन्होंने कहा था कि केन्द्र में मेरी सरकार नहीं है लेकिन उसके बावजूद भी राजस्थान को सबसे ज्यादा पैसा मिलता है। यह केवल इसलिए कि हमने अकाल के मामले में, विकास के मामले में और सहायता के मामले में राजनीतिकरण नहीं किया। लेकिन आज एक संवेदनशील व्यक्ति जब देश के प्रधानमंत्री हैं, उस वक्त मैं प्रधानमंत्री जी से अपील करना चाहती हूं, वे कवि भी हैं, मैंने उनकी ५१ कविताएं पढ़ी हैं, यहां जो माननीय मंत्रीगण विराजे हुए हैं, उनके माध्यम से कहना चाहती हूं कि यदि वे राजस्थान की विभीषिका और उसके साथ लगते हुए गुजरात प्रान्त को अपनी आंखों से देख लें तो संभवत: वे १०२ कविताएं लिखेंगे और उन कविताओं में वह मर्म, दर्द और पीड़ा होगी जो हमारी जमीन, पेड़, पशुधन और हमारे लोग झेल रहे हैं।

मैं राजस्थान की पेयजल की समस्या पर थोड़ा निवेदन करना चाहूंगी। राजस्थान में २२२ अर्बन टाउन्स हैं। वहां के हालात ये हैं कि लोगों को आधा घंटा और एक घंटा पानी मुहैया हो रहा है। लेकिन आप रूरल सैक्टर की कल्पना कीजिए जहां ९३,९४६ छोटी-छोटी ढाणियां हैं जिनमें से ८३,९०० ढाणियां पूरी या पार्टली पेयजल के साधन से प्रभावित थीं। लेकिन अभी ९० प्रतिशत स्थानों पर पेयजल की गंभीरतम समस्या है जिसमें सबसे बड़ा इलाका बाड़मेर का है, दूसरा मेरा इलाका राजसमंद से लेकर डूंगरपुर और बांसवाड़ा तक चला जाता है। सरकारों ने कोशिश की कि करीब १.६५ लाख हैंडपम्प्स की व्यवस्था की जाए जो ६२ प्रतिशत पेयजल की समस्या को समाप्त कर सके। लेकिन उसके बावजूद भी हम उसमें कामयाब नहीं हुए और उसका सीधा कारण यह था कि केन्द्र से हमको जितनी मदद मिलनी चाहिए, उस हिसाब से दसवां हिस्सा मदद भी अभी राजस्थान सरकार को नहीं मिली है। इसके बावजूद भी मैंने कहा कि हम प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेंगे। इसलिए राजस्थान सरकार ने राहत कार्यों के १७,९४५ कार्य स्वीकृत किए हैं जिनमें से १०,४४२ कार्य अभी चालू हैं। मार्च में यह संख्या बढ़ाकर ४,३१,५०० कर दी गई है। आने वाले समय में इसे ८ लाख करने की अनुशंसा है। सरकार ने १८५० चारा डिपो स्वीकृत किए हैं जिनमें से ८८९ अभी कार्य कर रहे हैं। इसी प्रकार चारा और परिवहन ४० रुपये से बढ़ाकर ६० रुपये कर दिया है। इसी के साथ-साथ लोगों को इसमें ६० रुपये सबसिडी दी गई है। पशु शविर और गौशालाएं कार्य कर रही हैं। साथ ही हमने स्वयंसेवी संस्थाओं से निवेदन किया है कि वे भी इस कार्य में मदद करें। लेकिन स्थिति यह है, जैसा कहा गया है - वभक्षिता किम् न किरोति पाप:। आज भूख केवल एक पाप नहीं कर रही और अखबारों में आने वाली वे सभी खबरें गलत नहीं हैं जिनमें कहीं लूट-पाट की खबरें हैं तो कहीं मरने वाले पशुओं की संख्या बहुत ज्यादा है।

हम इसी के साथ आशंकित हैं कि टी.बी. जैसा रोग, अभी बाड़मेर से लेकर जालौर और जालौर से लेकर उदयपुर इलाके तक टी.बी. के बढ़ते हुए मरीजों की जो लिस्ट आई है, वह इस बात का साक्ष्य है कि भूख से केवल एक रोग या एक ही माइनस प्वाइंट नहीं होता, उसके बहुआयामी परिणाम होते हैं। इसलिए मैं केन्द्र सरकार से निवेदन करूंगी कि वे अपने सभी कार्यों को इधर डायवर्ट करने की कृपा करें। आपातकाले मर्यादा नास्ति - य़ह जो बात कही गई है, यह केवल कहावत के लिए नहीं कही गई है। भारत में आपातकाल में धर्म क्या हो, इसकी विस्तृत व्याख्या है। मैंने राज्य सरकारों से भी अपील की है और आपसे भी अपील करना चाहते हैं कि इस समय कानूनों के संशोधन और कानूनों को थोड़ा नर्म बनाने में सरकार पीछे नहीं हटे।

और समन्वित नीति और सामूहिक प्रयास इसके लिए आगे बढ़ें। इन कार्यों को करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता, सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता और लोगों का योगदान है। मैं केन्द्र सरकार से निवेदन करूंगा कि जहां बार-बार अकाल की विभीषिका से जूझना पड़ता है, एक अलग से सैल इस बात के लिए खोल देना चाहिए कि आने वाले समय को पूर्व से भांपकर पहले से उसकी व्यवस्था की जाये और राज्य सरकारों को भी निर्देशित किया जाना चाहिए कि राज्य सरकार अकाल तथा बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए पहले से प्रयास करे।

आज आन्ध्रा प्रदेश, गुजरात या राजस्थान में जो अकाल है, मैं फिर निवेदन करूंगी कि राजनीति से ऊपर उठकर सरकार कार्य करे। मैं एक बात विशेष तौर पर निवेदन करना चाहती हूं कि पहले सुनिश्चित रोजगार के कार्यक्रम राजस्थान में थे। मैं माननीय सदस्यों से, विशेषकर अपोजीशन के सदस्यों से आपके माध्यम से निवेदन करूंगी कि पहले के ए.ई.एस. के कार्य वहां पर नहीं हैं, यदि वे कार्य भीहोते तो उसमें लोगों को मजदूरी मिलती और आज हम लोग अप्रैल और मई में आकर वहां पर केवल पांच लाख लोग लगे हैं, इस बात की चर्चा नहीं करते। इसलिए केन्द्र की वे स्कीमें, जो रोजगार बढ़ाने वाली हों, वे स्कीमें जिनसे पेयजल का स्तर बढ़े, वे स्कीमें, जिनसे हमारे पानी और सिंचाई की बढ़ोतरी हो, उन स्कीम्स को फिर से लागू करना जरूरी है। इसलिए आज जब हम यहां पर चर्चा कर रहे हैं तो उस चर्चा में मैं सिर्फ यह निवेदन करना चाहती हूं कि चर्चा चर्चा न रह जाये और इसमें हम लोग समन्वित रूप से प्रयास करें और आने वाले समय के लिए पूरी जागरुकता के साथ हम इसमें आगे बढ़ें। राजनीति से ऊपर उठकर यहां पर एक निर्णय होना चाहिए कि प्रधान मंत्री जी भी अपनी यात्रा करें, हमारी अपोजीशन की नेता राजस्थान और गुजरात की यात्रा पर जा रही हैं, लेकिन यदि संसद के सभी सदस्यगण आज इस विभीषिका को जाकर देखें तो निश्चित तौर पर सरकार पर हैमर होगा। मैं इस शेर के साथ समाप्त करूंगी -

सूखी जमीन पर फसलें उगायें कहां तलक, अश्कों पे लोग प्यास बुझायें कहां तलक।

आज हम लोग आजिज आ चुके हैं, इसलिए मेहरबानी करके अकाल राहत को केवल एक दिया हुआ टुकड़ा न समझकर लोगों की संवेदनाओं के साथ अपने को जोड़ें और पूरा पैसा इन प्रदेशों को, विशेषकर राजस्थान को इस विभीषिका से जूझने के लिए दें। धन्यवाद।

श्री अनंत गंगाराम गीते (रत्नागरि) सभापति जी, राजस्थान में करीब २६ जिले सूखे की चपेट में आये हैं और लगभग २३,४०० गांव आज सूखाग्रस्त हैं। गुजरात में सौराष्ट्र कच्छ और उत्तरी गुजरात में सूखे से स्थिति बहुत गम्भीर बन चुकी है। आन्ध्रा प्रदेश और मध्य प्रदेश के भी कुछ जिले हैं, जहां पर सूखे की स्थिति है। कल दूरदर्शन पर प्रधान मंत्री जी का जो उन्होंने देश की जनता का आहवान किया, वह आहवान हमने सुना। करीब पांच करोड़ लोग इस सूखे से प्रभावित हैं और जिस तरह पांच करोड़ लोग इस सूखे से प्रभावित हैं, उसी तरह राजस्थान, गुजरात, आन्ध्रा प्रदेश और मध्य प्रदेश में जो पशुधन है, वह भी इससे पीड़ित है। वहां अनाज की कमी महसूस होने लगी है, चारे की कमी महसूस होने लगी है। वर्ष में एक या दो बार इस प्राकृतिक आपदा पर चर्चा हम इस सदन में करते हैं। कभी बाढ़ आती है, गांव के गांव बह जाते हैं। जीवित हानि होती है, धन की हानि होती है, सम्पत्ति की हानि होती है। कभी चक्रवात आ जाता है, चक्रवात से पूरा प्रदेश उजड़ जाता है।

कभी सूखे से पीने के लिए पानी भी मिलना मुश्किल हो जाता है। आज सूखे की समस्या केवल राजस्थान, गुजरात, आंध्रा प्रदेश या मध्य प्रदेश की समस्या नहीं, बल्कि इसे राष्ट्रीय आपदा मानना चाहिए। राष्ट्रीय आपदा मानकर भारत सरकार को जो भी सहायता सूखाग्रस्त प्रदेशों को करनी है, वह करनी चाहिए।

सभापति जी, एक ओर कभी ब्रहमपुत्र में बाढ़ आ जाती है, कभी बिहार में बाढ़ आ जाती है, कभी उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में बाढ़ आती है। बाढ़ के कारण जीवन तहस-नहस हो जाता है। एक ओर पानी के लिए भी आदमी को तरसना पड़ता है, जानवर भी तरसते हैं। इसलिए जो समस्या है, उसके लिए तुरन्त राहत जो दे सकते हैं, वह देनी चाहिए। लेकिन इन समस्याओं का सामना हमें हर वर्ष करना है इसलिए जैसे तुरन्त राहत देते हैं, वैसे कायम राहत पर भी विचार करने की आवश्यकता है। मैं महाराष्ट्र से आता हूं, वहां सौभाग्य से सूखे की स्थिति नहीं है। भगवान से प्रार्थना है वह स्थिति न आए।

श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव) : वहां गन्ने की क्या स्थिति है ?

श्री अनंत गंगाराम गीते : मैं उस पर आ रहा हूं। महाराष्ट्र में चार-साढ़े चार साल हमारी सत्ता रही।…( व्यवधान) सौभाग्य या दुर्भाग्य, यह तो समय ही बताएगा। उस समय सर्वोच्च प्राथमिकता यदि किसी को दी गई तो वह पीने के पानी को दी गई। हमारी सरकार ने पीने के पानी के लिए ७००० करोड़ रुपए की योजनाएं शुरू की थीं। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज सरकार बदल गई और जितनी भी योजनाएं पीने के पानी की चल रही थीं, वे सरकार ने बंद कर दी हैं। यहां मैं इस मुद्दे को राजनीति के लिए नहीं उठा रहा हूं। जो सौभाग्य मैं मान रहा हूं, यदि ये पानी की योजनाएं पूरी नहीं हो पाएंगी तो महाराष्ट्र के सूखे पर भी इस सदन में चर्चा होगी। वह समय नहीं आना चाहिए। चाहे भारत सरकार हो या राज्य सरकार हो, हमें निश्चय करने की आवश्यकता है कि किस विषय को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि हम पानी को प्राथमिकता देते हैं, उसके ऊपर ज्यादा खर्च करते हैं तो सूखे पर चर्चा करने की नौबत सदन में नहीं आएगी।

सभापति जी, आज सूखा पीड़ित जो प्रदेश हैं, वहां पर अनाज की कमी होती है। लेकिन साथ-साथ चारे की भी बहुत कमी महसूस हो रही है। इस कारण वहां का पशुधन नष्ट होता जा रहा है। महाराष्ट्र में गन्ना काफी होता है। करीब तीन लाख मीटि्रक टन गन्ना हर साल खेतों में पड़ा रहता है। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा चीनी मिल्स हैं, फिर भी किसानों का सारा गन्ना इन मिल्स तक नहीं पहुंच पाता। तकरीबन तीन लाख मीटि्रक टन से भी ज्यादा गन्ना खेतों में पड़ा रहता है।

इस गन्ने का पशु खाद्य के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। भारत सरकार से प्रार्थना है कि जो महाराष्ट्र में होने वाला सरप्लस गन्ना है औऱ यदि भारत सरकार उसे किसानों से खरीदती है तो जो किसान वहां पर गन्ने की पैदावार करते हैं, जिनका गन्ना खेत में सड़ जाता है, उनको मेहनत का दाम मिलेगा और इससे उनको राहत भी मिलेगी। जहां पर सूखा है, जहां पशु खाद्य की आवश्यकता है, वहां उसी गन्ने को पशु खाद्य के तौर पर हम उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

राजस्थान में सूखे की सबसे ज्यादा तीव्रता है। पानी का स्तर घटता जा रहा है। बोर वैल या कुएं से पानी नहीं मिल पा रहा है और इसीलिए वर्षा के पानी को रोकने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से पिछले तीन वर्षों से सबसे कम वर्षा राजस्थान में हुई है और वर्षा कम होने के कारण आज सबसे ज्यादा राजस्थान सूखे से प्रभावित है। इसलिए वर्षा के पानी को रोकने की आवश्यकता है। इस पानी को छोटे-छोटे डैम के जरिए, बड़े डैम के जरिए रोकने की आवश्यकता है। प्रकृति का कोई भरोसा नहीं है। तीन साल वर्षा नहीं हुई, इस साल क्या होगा, यह कहना मुश्किल है, इसलिए पानी की हर बूंद को रोकने की आवश्यकता है। हमारे देश में वर्षा कम नहीं होती है। अकेले राजस्थान में ही जितनी वर्षा होती है, यदि उस पानी को भी हम रोक पाते हैं तो साल भर के पीने के पानी की समस्या कम होगी और जमीन का जल स्तर ऊपर आएगा। वन संपत्ति औऱ खेती में भी बढ़ोतरी होगी और वन संपत्ति का असर वर्षा पर होता है। एक महत्वाकांक्षी योजना कई वर्षों से हम सुन रहे थे। गंगा का पानी दक्षिण की ओर ले जाना होगा। जब ब्रहमपुत्र में बाढ़ आती है तो सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। जैसे हमने सारे देश को रेल से जोड़ा है, हर कोने-कोने को रेल से जोड़ा है, वैसे ही पानी से भी देश को जोड़ने की आवश्यकता है। जिन नदियों में बाढ़ आती है, उनके पानी को जहां पर सूखा है, वहां तक ले जाने की आवश्यकता है, यह बड़ी जिम्मेदारी का काम है और बड़े खर्च का काम है। लेकिन हमें करना चाहिए, गंगा को विशेष रुप से करने की आवश्यकता है और इसलिए प्राथमिकता तय की जानी चाहिए। यदि केवल हम गंगा का पानी ही दक्षिण की ओर ले जाते हैं तो सारा भारत वर्ष सुजलाम सुफलाम हो जाएगा। फिर हमें यहां न सूखे की चर्चा करनी पड़ेगी और न बाढ़ की चर्चा करनी पड़ेगी। जो सूखाग्रस्त प्रदेश है, हमें उनकी सहायता करनी चाहिए और भविष्य में इस संकट से बचने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने हैं औऱ हमें गंभीरता पूर्वक इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): Mr. Chairman, Sir, it would be better if you tentatively fix the time of the reply by the hon. Minister. There are so many hon. Members from Andhra Pradesh, Rajasthan, Uttar Pradesh, Orissa, Haryana etc. who want to speak. I would be happy if the hon. Minister replies at about 7.30 p.m. MR. CHAIRMAN : It will be discussed with the hon. Speaker. We will let you know.

Hon. Member Shri Raj Babbar to speak now.

श्री राजबब्बर (आगरा ) : सभापति जी, सूखे के हालत को देखते हुए आज पूरा सदन इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त कर रहा है और लगता है कि सरकार के पास राष्ट्रीय जल नीति के बारे में सोचने के लिए समय नहीं है। सदन में बहस कराकर, सदन के विचार सुनकर सरकार शायद सोचती है कि उसने अपने दायित्व को निभा लिया है। लेकिन आज तक कभी यह कोशिश नहीं की कि इस देश की राष्ट्रीय जल-नीति के बारे में सोचा जाए। मैं अपनी बात को एक बड़े लेखक की कविता, जिसका नाम मैं बड़े आदर से लेता हूं - धुमिल, से शुरू करता हूं -

"एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है, और एक तीसरा आदमी जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है, बल्कि वह रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूं - वह तीसरा आदमी कौन है, लेकिन मेरे देश की संसद मौन है।"

महोदय, मुल्क मुसीबतों से गुजर रहा है और सरकार के कुछ मंत्री अपनी पीठ ठोंक-ठोंक कर एलान कर रहे हैं कि हम दुनिया में दो-नम्बर की ताकत है। मेहरबानी करके बता दें, अगर खुद पता नहीं है, तो आरएसएस से पूछकर बता दें, आप किधर से नम्बर-दो ताकत है, आगे से या पीछे से? मेरा मतलब है, अमरीका के बाद या इथोपिया के बाद, लोग बीमारी से मरें, तो वह भी सरकार के लिए शर्म की बात है। लोग रोटी के लिए मरें, तो वह भी इस सरकार के लिए डूब मरने की बात है, लेकिन आज हालात ऐसे बन गए हैं कि सरकार के पास चुल्लू भर पानी तक नहीं रह गया है। क्या गुजरात, क्या मध्य प्रदेश क्या राजस्थान, पूरे मुल्क में हाय-तौबा मची हुई है। देश में पौने छ लाख गांव हैं, जिसमें से आज दो लाख गांव पीने के पानी के लिए तड़प रहे हैं। आप अपनी पीठ ठोंक रहे हैं, लेकिन पता नहीं इस मुल्क को आप कहां ले जा रहे हैं। किस तरफ देख रहे हैं और कौन से नम्बर दो को देख रहे हैं। एक बात से मैं आगाह कर दूं कि अब तो कीचड़ भी सूखनी शुरू हो गई है और कीचड़ सूखने का मतलब ... इसे आप समझा दें। यह बात कई बार उधर के लोगों ने भी उठाई है, मैं नहीं जानता इसमें कितना सच है, लेकिन जनता की परेशानियों को लेकर उधर के ही कुछ लोगों ने वित्त मंत्री जी का घेराव किया था. उसमें सूखे के बारे में ही बातचीत हुई यह मुझे मालूम नहीं है क्योंकि उनकी बातें, बैठकें गुप्त हुआ करती है। मेरा इस हत्यारी सरकार पर सीधा आरोप है कि यह सरकार हत्या कर रही है। इसे इसी वक्त हटा देना चाहिए।

सभापति महोदय, मैं थोड़ा तल्ख हो रहा हूं …( व्यवधान) डायलाग अच्छे हैं, पढ़ा-लिखा आदमी हूं, आप भी पढ़-लिखकर आया कीजिए तो आप भी अच्छे डायलाग बोला करेंगे …( व्यवधान) यह अच्छे राइटर ने लिखे हैं, आप जैसे घटिया राइटर ने नहीं लिखे हैं। राज बब्बर भी वैसे अच्छे डायलाग बोलता है, यह फिल्म वाले भी जानते हैं। …( व्यवधान) इन्हें समझाने की जरूरत है, ये बेचारे आज तक कभी अच्छा बोले ही नहीं है। इनकी भाषा अच्छी नहीं है, इनके सोच-विचार अच्छे नहीं है। …( व्यवधान)

SHRI M. MASTER MATHAN (NILGIRIS): One must be able to deliver the goods. There is no need to be a good writer.

SHRI RAJ BABBAR (AGRA): Look, it is very important. Unless and until बहरों को नहीं सुनाया जायेगा तो गुड्स कहां डिलीवर होंगे। … (Interruptions)

डा.जसवंत सिंह यादव (अलवर) : उत्तर प्रदेश में दलितों पर गोली किसने चलाई थी।

श्री राज बब्बर (आगरा) : दलितों पर गोली किसने चलाई इस पर बाद में बात करेंगे।

यह सभी जानते हैं। …( व्यवधान) इन्हें समझाने की जरूरत है, ये बेचारे आज तक कभी अच्छा बोले ही नहीं है। इनकी भाषा अच्छी नहीं है, इनके सोच-विचार अच्छे नहीं है। …( व्यवधान)

SHRI M. MASTER MATHAN (NILGIRIS): One must be able to deliver the goods. There is no need to be a good writer.

SHRI RAJ BABBAR : Look, it is very important. Unless and until अच्छे शब्द बहरों को नहीं सुनाये जायेगे तो गुड्स कहां डिलीवर होंगे। … (Interruptions)

डा.जसवंत सिंह यादव (अलवर) : उत्तर प्रदेश में दलितों पर गोली किसने चलाई थी।

श्री राज बब्बर : दलितों पर गोली किसने चलाई इस पर बाद में बात करेंगे।

महोदय, चर्चा पानी की और सूखे की हो रही है, आप समझने की कोशिश करिए।... (व्यवधान) मुझे समझ में नहीं आता कि मैं जब भी बात करता हूं तो वहां से लोग शोर मचाना शुरू कर देते हैं। इन्हें क्या तकलीफ होती है। मैं चाहता हूं कि मेरी बात को सुनने की कोशिश करें। अच्छी भाषा, अच्छी जुबान सुनना कानों को अच्छा लगता है। उन्हें सुनना चाहिए, इनकी श्रवण शक्ति बढ़नी चाहिए। मैं आपसे सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आज हमारे पास रास्ता नहीं है कि हम इस सरकार को पद से हटाने का काम करें। मैं इनसे पूछना चाहता हूं कि पोखरन में बारूद तो छुड़वा सकते हैं, कच्छ में गोलियां भी चलवा सकते हैं और सब कुछ करने के बाद ये अपनी पीठ ठोकते हैं तो क्या इन्हें यह मालूम होता है कि वहां पीने के पानी से भी लोग मर रहे हैं। हम सीमाओं पर जान देने वालों के लिए नतमस्तक होते हैं, यह हमारा फर्ज है, लेकिन जो इस देश की रीढ़ की हड्डी है, इस देश के राष्ट्र निर्माण के लिए जो लोग अपनी सांसों को जिन्दा रखना चाहते हैं, वे पानी के लिए तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। उनके लिए हम क्या करें, क्या सरकार हमें जवाब देगी।

महोदय, प्रधानमंत्री जी ने देश से अपील की है कि पानी की किल्लत से कयामत बरपी है, उसके लिए देश मदद के लिए आगे आए। मैं प्रधानमंत्री जी के भावुक कवि ह्ृदय की सराहना करता हूं। हमारे एक माननीय सदस्य बोल रहे थे कि अगर प्रधानमंत्री जी वहां जाकर हल चलाएं या फावड़े से खोदे तो शायद कुछ पापों का बोझ कम हो सकता है। लेकिन वह हमारी बात को सुनने के लिए सदन में नहीं आए, हो सकता है कि बीमार हों। हम उनकी सेहतयाबी के लिए कामना करते हैं। मैं उनके कवि ह्ृदय की सराहना करता हूं, ये हादसे रोके जा सकते हैं। हमदर्दी मरने वाले लोगों के लिए तो है ही, मगर जो जिन्दे लोग हैं उनके लिए भी जागनी चाहिए। कई ऐसी जगहे हैं, जहां लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीते हैं, मैं उनके लिए कह रहा हूं जिन्हें कायदे से २पीपीएम से ज्यादा क्मिलोरीन ला पानी नहीं पीना चाहिए जबकि वे २पीपीएम से १०-१२ गुना ज्यादा क्लोरिन मिला पानी पी रहे हैं। पेट, आंत, फेफड़े, यहां तक कि आंखों से भी वे पानी पीकर अंधे हो रहे हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली ने इस पानी को न पीने का सुझाव दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने पेयजल की व्यवस्था को सुधारने के लिए कड़े से कड़े आदेश दिए हैं। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी संस्था, नागपुर वालों ने भी कहा है कि इंसान को तो छोड़िए, जानवर तक के लिए भी पीने के लिए इस पानी पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। दुनिया के तमाम देशों में क्लोरीन पानी में मिलाने के लिए मुमानियत हो गई है। ओजोन गैस का प्रयोग हो रहा है। मैं आगरा की बात कर रहा हूं। आगरा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शहर है और उस शहर में आज पीने का पानी नहीं है। वहां ३०० से ऊपर ऐसे गांव हैं, जिन गांवों में ५३ साल की आजादी के बाद भी पीने का पानी नहीं पहुंचा है। ६०० से ज्यादा आज भी ऐसे शहर में मोहल्ले हैं, जहां पीने के पानी का कोई प्रबंध नहीं है, पांच-पांच, सात-सात किलोमीटर से लोग पानी लेकर आते हैं। आगरा राजस्थान के पास आता है।

सूखे का प्रभाव धीरे-धीरे वहां पड़ रहा है। आगरा के बारे में हमारी कोई भी जल-नीति नहीं है जिसमें पीने के पानी की व्यवस्था के बारे में हम सोच सकें।

मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं। आगरा के लोग जो १०० मि. लीटर पानी पीते हैं उमसें २ लाख २० हजार जीवाणु पीते हैं जबकि उनकी मात्रा पांच हजार से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह इसलिए होता हैं क्योंकि दिल्ली ड्रेन, हरियाणा ड्रेन, शाहदरा और ओखला ड्रेन से पानी में गंदगी मिलकर जो पानी आगरा में जाता है उसके बारे में आज तक सोचा ही नहीं गया। सूखे के साथ-साथ इस तरफ भी देखना होगा।

हमारी जल-नीति क्या है? आगरा बैराज, जिसकी योजना १९८८ में पास हो गयी थी, आज एक सपना हो गया है। उसका शिलान्यास तो हुआ लेकिन आज तक उस बैराज का क्या हुआ, पता नहीं। यह बैराज पीने के पानी की समस्या को दूर करने के साथ-साथ पर्यावरण में भी सुधार लायेगा, वन्य-भूमि और कृषि-भूमि में सुधार लाने के साथ-साथ यातायात में भी सुधार होगा और भीषण गर्मी में यमुना भी नहीं सूखेगी।

सभापति महोदय, आगरा को अपने देश से ही नहीं विदेश से भी लोग देखने आते हैं। बाहर के लोगों का उसके प्रति मोह है। भाजपा के पुराने मित्र और अमरीका के महापुरुष क्िंलटन साहब जब आगरा आये थे तो उनके दो घंटे के विचरण के लिए करोड़ों रुपया व्यय किया गया लेकिन आगरा के लोगों की समस्याएं सुनने के लिए सरकार के पास समय नहीं है। पैसा नही है ।

सभापति महोदय, यदि जल ही जीवन है तो " जान पर बन आने पर जनता हिंसक प्रतक्रिया पर उतरती है" इसलिए समय रहते सरकारों को सूखाग्रस्त राज्यों में राशन, पानी, सहायता राशि देने के अलावा अकाल से निजात पाने की स्थाई उपायों पर क्रियान्वयन शुरू कर देना चाहिए।

सभापति महोदय, मैं अपनी अंतिम बात कहते हुए कहना चाहूंगा कि पानी आयात नहीं किया जा सकता। इसका इंतजाम हमें यहीं करना होगा और सरकार को इस पर सोचना होगा। धन्यवाद।

MR. CHAIRMAN : I have an announcement to make. The reply of the hon. Minister on this discussion will be at 6.30 p.m. We have a long list of speakers. Kindly be brief so that maximum number of speakers can participate in the discussion. We have already exhausted two hours, and we have got two more hours. The Minister will reply at 6.30 p.m. SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Mr. Chairman, Sir, what I wish to submit to you is that the hon. Speaker took a right approach today. Normally, any discussion under Rule 193, as a matter of convention of this House, is taken up at 4 o""""clock. However keeping in view the magnitude of drought, which was so severe, the Speaker was kind enough that he called us this morning and said that the House would not take up any other business and that we shall straightaway discuss the drought situation during the day. A lot of speakers, cutting across party lines, whose constituencies have been affected, have given their names and they want to explain their viewpoint. Therefore, I would humbly request you to take the sense of the House to let the hon. Minister reply at 7.30 p.m. instead of at MR. CHAIRMAN: That can be done. Since we have a long list of speakers, kindly be brief.

SHRI V.P. SINGH BADNORE (BHILWARA): Mr. Chairman, Sir, this august House is discussing the severest drought situation that has arisen. I hail from Rajasthan where we are having drought for the third consecutive year. Hon. Members Prof. Rasa Singh Rawat, Dr. Girija Vyas and others have very correctly picturised the severest conditions in Rajasthan caused by the third consecutive drought and famine.

I will not be repeating the things that have been mentioned. I would like to say that it is severe and it is another Chhappaniya. No one from those times is alive now to tell us about what Chhappaniya was like but people remember it and say that this is a repetition of Chhappaniya. It is the worst famine ever that we have faced so far. As has already been mentioned, 23,500 villages are affected; cattle are dying; and migration is taking place. All that is there. We have been discussing drought and famine for the last fifty years. Dr. Girija Vyas has very rightly said that Rajiv Gandhi visited Rajasthan when it was in the grip of a severe famine and he did a lot for the State. But have we really gone to the root cause? Is it only because of the failure of the monsoon that drought occurs or is it also sometimes man-made? Are the policies of the Government, of whichever Government they are, also not responsible for famine? I would like to take up a few points only in this regard because of the paucity of time.

I come from Mewar area from where Dr. Vyas also hails. We in that area are used to living in famine conditions. It is not only the people living in the Thar desert that are used to living in desert and famine conditions but we were also used to living in famine conditions for many decades. In Mewar area, every big village had a reservoir that was kept just as a reservoir and never used for irrigation. The Government had changed the policy and those reservoirs were started being used for irrigation purposes also. As a result of that we started having water problem in the villages. I remember that about twenty-five to thirty years ago in my own village there was no canal for the tank that we called Akshaya Sagar. They dug a canal and started using its waters for irrigation. We started having problems like depletion of water table in and around that area. After we realised this problem I stopped that practice. After that, even during the severest famine, my village did not have to face water problem. These are the things that we must get into.

For some time I served as the Minister of Irrigation in Rajasthan Government. I was interacting with the Department of Irrigation people then. I found that they never had a policy of upstream and downstream problems of the river. They never thought of depletion of water table in the basin villages because of the dams that have been constructed. They have a separate CCA and they talk and think about only the CCA. They never thought about the plight of the villages downstream of the river next to the dam, depletion of water table, etc. Do the people living in those areas not have a right to water? The gates of the dam were never closed.

They never had gates put to the dams. If they had put gates to these dams, then they could have let the water flown into the river and all these basin villages could send truck loads of tomatoes, potatoes and everything to Delhi and Mumbai as they used to do earlier. But today those villages are finding themselves in a sad plight because of the depletion of the water table. I asked those villagers whether they know that they have a right to get water and was told by them that they do not know about this right, namely the riparian right which is recognised in the whole world, even in the USA and in most of the countries. But in India, nobody talks about the riparian right.

I would like to give you the picture of what Bhilwara is today and how severe the drought is. But we must have some sort of a high level committee to go into the frequency of drought and famine. Can we put an end to drought and famine? We cannot, because there is the failure of the monsoon. It is also because of deforestation. There is no forest today. You have cut most of the forests.

There is also the phenomenon of El Nino. Sometimes we have a very good monsoon. Sometimes we do not have it. People talk of El Nino but they do not know about it much. We must have some sort of a high level Committee to go into it and its recommendations should be adhered to.

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL (PATAN): Sir, we are discussing about the great crisis of our country. The seriousness and magnitude of the crisis has increased on account of the crisis of character in this country and the rise in the prices of essential commodities, the crisis on account of mismanagement by the Government, and the crisis on account of failure on the part of the Central Government to rush requisite financial assistance to the respective State Governments, whether it is Gujarat, Rajasthan or Andhra Pradesh. The hon. Prime Minister is not here. But in his absence, I would like to invite the attention of the House to what he said in this House during discussion on water in the previous Lok Sabha, that is, 1998. He said:

"Water can also catch fire. "

The hon. Prime Minister was talking about water crisis in the country.

"The problem of water is going to be even more complicated. The problem of water is not just limited to India. This has become a global problem. It is possible that the next major source of tension in the world will be water table falling. We all see this in our Constituencies. "

As my friend, Shri Raj Babbar has pointed out about his Constituency, Agra and as my senior colleague from Maharashtra has also pointed out indirectly that there is no scarcity of water in his State, but there is the problem of water, we feel disturbed by the problem people are facing. We means we talk on behalf of the Government. Now I quote the important sentence:

"We are not giving an assurance that we will do everything in five years. "

The hon. Prime Minister spoke this in the year, 1998.

"Only in the case of water, we would like to give this assurance"

.

The hon. Prime Minister was not prepared to give an assurance on any other subject but he had given an assurance as far as water is concerned. I want the hon. Minister Shri Sunderlal Patwa to invite the kind attention of the hon. Prime Minister that he had gone on record in the year 1998 giving an assurance as far as drinking water is concerned. The assurance was, `Only in the case of water, we would like to give this assurance that in five years there should be clean drinking water everywhere and this is our commitment.’ Out of those five years, two-and-a-half years have already passed. I want to know from the Government what its drinking water policy is. What is the water management policy of this Government?

What has happened to the rivers flowing all over the country? I have taken bath in the flowing rivers of Saraswati, Sabarmati, Hathmati and Bhogavo. We have now got rivers flowing only in South Gujarat. The three rivers flowing there are Mahi, Tapi and Narmada. What has happened to Sabarmati? What has happened to Saraswati? What has happened to Bhogavo? I am told, river Saraswati is mentioned in the Vedas and Puranas. This is one of the most ancient rivers of the country. In the district of Kutch (Bhuj), we have an historical place called `Dhola-Vira’. We are told that historical civilisations sprung on river banks. Dhola-Vira is on the banks of river Saraswati and there was an historical civilisation. I am told that river Saraswati has gone into the Earth. It has disappeared because of the typical sand there. It passes through North Gujarat; it touches Kutch and Bhuj and goes to Pakistan. The Government of Pakistan has tapped the water from river Saraswati. They are using that water for irrigation and drinking purposes. The Government of India or the Government of Gujarat is not able to tap the water of river Saraswati, which starts flowing from India and a major portion of which flows through India, particularly Gujarat. This is the situation that I want to invite the attention of the Government to.

I also invite attention to what the hon. Prime Minister spoke on the 15th December, 1999. Many friends have mentioned about the Gujarat water riots and I thank them. Water riots have already taken place in Gujarat and they are going on. We had an incident on the 14th December, 1999 at Falla near Jamnagar. There, the water was being taken from the rural areas to the city. The villagers protested against it. They staged a demonstration. There was a point-blank range firing at the demonstrators and three youths were killed. We, the Members of Parliament from Gujarat brought this matter up during the `Zero Hour’ on the 15th December, 1999. The Prime Minster spoke for a few minutes on the 15th December, 1999 and said, `This is not a regional problem. This is a national problem. We will discuss about the drinking water problem in this House.’ Where has that promise gone? Why has it been forgotten? I want a reply from the Government on this also.

I am coming from a constituency called `Patan’, the most ancient town in Gujarat, which was established 1200 years ago. My entire constituency is affected due to drought. The talukas of Radhanpur, Santalpur and Sami are particularly greatly affected. On the one side, we have got Banaskantha from where my BJP friend Shri Haribhai Chaudhary has got elected. On the other side, there is Mehsana, which is worst affected. Then, you go to Kutch (Bhuj), the biggest district in Asia and see the position.

I will give you a few figures. I will not give much figures and take the time of the House. In Gujarat, we have got an arid zone of 62,180 kilometres where you cannot have trees or tanks for water. It is a saline land mass running miles together. If you go by road there, you will simply feel thirsty. Of this, 73 per cent is in Kutch (Bhuj).

You can just imagine the position there. The Government of Gujarat has officially declared scarcity in 9200 villages out of 18509 villages. Gujarat is a State where there is 37 per cent urbanisation, thus, the number of villages are less. Out of a total population of 4,15,00,000 of Gujarat, a total number of 1,25,00,000 people have been directly affected because of scarcity and drought; and equal number is indirectly affected because of the drought situation. The districts of Jamnagar, Rajkot, Porbunder, Junagadh, Surendranagar, Amreli, Patan, Mahsana are the worst affected districts. The opposition parties in Gujarat started requesting them in the month of October. Any man with little intelligence will be able to decide by Diwali, whether the monsoon has failed or not. The last rain came to Gujarat on 2nd September, which was the date of counting of votes in our State. After that, there were no rains. The senior retired officials from PWD, senior citizens, the NGOs and the entire opposition parties had requested the Government, since it was not raining. We cannot blame the Government; and the failure of monsoon cannot be attributed to the Government. पुराने जमाने में एक कहावत थी कि राजा पापी होता था तो बरसात नहीं होती थी। अभी यहां तो ७० राजा हैं। हम किसको राजा बोलें। We cannot blame anybody. But it was the duty of the State Government to declare scarcity, but that was not done. That was done only in the first week of January. As a result of the delay, migration has started taking place. People from Saurashtra, people from Sami, Radhanpur and Santalpur left their villages with cattle.

I want to invite the attention of this House to what happened yesterday in Sayla near Chotila of Rajkot district. one hundred and twenty five cows died there within an hour of taking grass – in the same cattle camp – due to the quality of grass. On account of killing of one cow, there was an agitation in Gujarat and one man was killed, while saving that cow. We had a strike all over Gujarat. Only one cow was involved in that incident. But in yesterday’s incident one hundred and twenty five cows died due to poisonous food. There was no strike in Gujarat. Why? There is no Hindutva there. वहां गाय मां नहीं है। कोई आदमी मार देता है तो मां बन जाती है। धरती को हम मां कहते हैं लेकिन उसको हम मां का ट्रीटमैंट नहीं देते। I am extremely sorry. The situation in Gujarat is very serious. The relief work was started only last month.

There is one very serious thing and I want to inform this House about that. On 06.04.2000, in Sebalia village, Khedbrahmi Taluk of Sabarkantha district, one man died of hunger at the work site. A man of 35 years with five children died at the relief work site, due to hunger. The body of that man was lifted after 27 hours. The post mortem was conducted below the tree at the work site; and the doctor has gone on record saying that there was not a single grain in his stomach. That man has not eaten anything for the last two days. No doubt, he was suffering from TB. But the main cause of death of that man of 35 years was only hunger, because the Government has failed to provide him anything.

Shri Sundar Lal Patwa is sitting here. I will speak about one or two more things and then I will conclude.

What kind of drought situation exists in our country? According to a report submitted to the Consultative Committee on 18th April, 2000, the total number of habitations in this country are 14,30, 543. As far as drinking water is concerned, fully covered habitations are 11,92,377, partially covered habitations are 2,11,685 and not covered habitations are 26,481. This is one part of the story. On page 5 of the same Report, the Ministry talks about the quality of drinking water. Just see what type of water the people are drinking in these fully covered and partially covered habitations. The number of villages where there is excess fluoride in water is 13,845; the number of villages where there is excess arsenic in water is 3,133; the number of villages where there is excess salinity in water is 34,478; and the number of villages, I think it is in Orissa and other Eastern part of the country, where there is excess iron in water is 61,942. So, the total comes to 1,38,398 habitations. The poor people are drinking fluoride, arsenic, salinity and iron. What are we discussing here today? The hon. Prime Minister appeared on the television and exhorted the people to come out with financial help. This is not an issue like Kargil where the Government should seek more and more financial help.

From the common men.

In my State, Gujarat, in the name of Kargil Rs. 23 crore were collected, but only Rs. 2 crore were spent and the balance had been put in the fixed deposit. The same Government will collect money in the name of drought, but will not give it to poor people. The money will go to fixed deposit where they will get commission. Sixteen crores of rupees are kept in the fixed deposit by the Chief Minister.This money should be transferred to Prime Minister Relief Fund.

SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Sir, the Member said that the money that comes to the Prime Minister Relief Fund will not be utilised and that it would be utilised for commission. I think that should not form part of the record.

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : I was talking about the State Government of Gujarat.… (Interruptions) Let the Minister reply. Digging the well when the fire is on, is not a solution. The Prime Minister is not like an ordinary teacher. He must know that the problems of drought, famine and scarcity are permanent in this country.

SHRI BIKRAM KESHARI DEO : If the hon. Member yields, I would like to say that we have inherited this legacy from the Congress Government. So, it will take time for us to settle the things. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Shri Bikram Keshari Deo, you can reply when your turn comes.

… (Interruptions)

ग्रामीण विकास मंत्री (श्री सुन्दर लाल पटवा) : जो भी बात करें., सुझाव दें और कम से कम गुस्सा करें।

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Now, I am coming to solutions. The solution to the problem of Gujarat lies in the successful completion and implementation of Sardar Sarovar Project. … (Interruptions)

THE MINISTER OF RURAL DEVELOPMENT (SHRI SUNDAR LAL PATWA): Please talk to Shri Digvijay Singh. … (Interruptions)

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Do not mix the issues. Is it the issue of Madhya Pradesh alone? I am very sorry that if this is going to be the attitude of the Central Government, then it can never succeed. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Let there not be any cross talks.

… (Interruptions)

श्री सुन्दर लाल पटवा : गुस्सा कम करें।

श्री प्रवीण राष्ट्रपाल (पाटन) : वह …( व्यवधान) आपके ऊपर हल्ला बोल देंगे।

…( व्यवधान)

१७.०० बजे श्री सुन्दर लाल पटवा : आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री था और माननीय चिमन भाई पटेल गुजरात के मुख्य मंत्री थे। पूरी तरह से एकमतेन, हमने बिना किसी मत विभक्ति के उस कार्यक्रम को चलाया। अब जो बात मैं आपसे निवेदन कर रहा हूं, विवाद राजस्थान या महाराष्ट्र के बारे में नहीं है, नर्मदा के बारे में जो विवाद है, वह गुजरात और मध्य प्रदेश के बीच में है, उतना ही मैंने निवेदन किया है। मैं किसी जिम्मेदारी से भाग नहीं रहा हूं और कम से कम हम इस संवेदनशील मामले को राजनीति का मुद्दा न बनायें तो बेहतर होगा।

श्री दिन्शा पटेल (कैरा) : आप दिग्विजय सिंह जी की बात मत करो, यही बात है न। आप केन्द्र के मंत्री हो न।…( व्यवधान)

श्री सुन्दर लाल पटवा : तो क्या मैं दिग्विजय जी का नाम लेना छोड़ दूं ? वे मेरे मित्र हैं।

MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record except what Shri Pravin Rashtrapal says.

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : The dispute is regarding resettlement of project affected area. The Central Minister does not know, there is no stay on construction of dam. There is no stay on utilisation of Narmada water. It can be canalised and taken anywhere in Gujarat. There is no stay on this. There is no stay on calling a meeting of the four beneficiary Chief Ministers. I would like to tell you, as also Shri C.P. Thakur, who is not present here, there is no ban from the Supreme Court. They have misunderstood it. The Chief Ministers of Madhya Pradesh, Gujarat, Rajasthan and Maharashtra are involved. During the election campaign in Gujarat, the hon. Prime Minister gave an assurance that once elected he will solve the issue of Narmada within 15 days on the pattern of Cauvery. What happened to that assurance? Why is he not calling a meeting of the four Chief Ministers involved? People are dying there without water. Cattle are dying there without water. People have migrated beyond Surat. Is this not a national issue? Writing poems, making expert speeches and appearing on television is very easy but to remain without water is very difficult. I would appeal to the Central Government, till it is not able to provide safe drinking water to the people of this country, it has no right to use mineral water bottles in all the conferences being held by the Central Government. Let us not drink Bisleri mineral water.

I request that the issue of Narmada project may be solved as early as possible. Even if the dam is not constructed in time, the water of Narmada may be allowed to flow in canal as a result of which the ground water level of the wells and the tanks in Gujarat will go up. With due respect to the Supreme Court, this is not a matter where the Supreme Court can interfere. Nobody can stop a child from drinking milk. Nobody can stop a mother from giving milk to her son. Narmada is our mother. We are its children. We want to drink Narmada water.

The State Government of Gujarat had requested the Central Government to give Rs.100 crore in the month of December. I would like to know from the Central Government, what has happened to that request. It is the BJP Government there in the State as also here. The State Government of Gujarat, which was a BJP Government, requested Rs.600 crore during Kandla cyclone. I have got the official figures that only Rs.52 crore were provided. What happened to that? I would like the hon. Minister to please enlighten all the Members from Gujarat in particular and the entire House in general, whenever a State Government is facing crisis on account of natural calamity and mis-management on account of the bureaucracy, what action the Central Government is going to take to help the Government of Gujarat which is in distress. Why the Ministers from Gujarat are going to Netherlands, Australia and United States for 10 to 12 days when the State is facing a crisis? I would request the Government of India to inquire into it. you.

 

SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY (CALCUTTA NORTH WEST): Sir, the whole country is really very anxious over the drought situation.

Gujarat, Rajasthan, Andhra Pradesh along with a few other States and ten districts of West Bengal are facing a serious drought situation. Sir, people are struggling just to remain alive. They do not know how to get water at this crucial juncture. Instead of blaming each other, the first step that the Government should take is to make sure that the affected people get water supply immediately.

Sir, India has enough and surplus water sources. It is not that India has a deficiency so far as the water is concerned. But the defect is that it is not managed scientifically and is not planned properly. The immediate task is to see water is sent through wagons and through roads to the drought affected areas from where there is more water. We should assure people that they are being provided with drinking water. This should be done without further delay.

Many people are leaving their villages. People are searching their relatives. We should open enquiry offices and emergency offices to supply proper information on a regular basis.

Sir, the water levels have fallen down. Rainfall is much below the average. The cash crops are totally ruined in the States which we have categorically mentioned. At this crucial juncture we have to see that war-footing efforts are made to fight the drought situation. The hon. Prime Minister’s appeal was necessary. The Prime Minister’s message to the nation was very necessary. We fully appreciate it. The whole nation should come forward and respond to the Prime Minister’s appeal.

We feel that some steps are to be taken in this regard. We are proceeding towards the 21st century. Whenever any natural calamity like drought or flood shower on us, we become helpless. Sir, I would propose a few methods for consideration of the Government for the permanent solution of the drought situation in the country.

Sir, the method of water conservation is very important. It has to be modernised. As I said earlier, we have enough water. Rather we have surplus water. So, if the scientific methods for the conservation of water are introduced this can give better results in future. In Israel, even the rain water harvesting takes place. So, could we not introduce this system in our country also? The Government should think about it. The micro level strategies are to be set up and proper investigations have to be done to see as to how this problem can be sorted out. The projects for protection of dams are also required. Another problem which sometimes create tremendous confusion is the inter-State river water. Unless inter-State river problems are sorted out considering all political aspects, we cannot solve this problem. We do not take decisions in time. Sometimes, we hesitate to take decisions. Sometimes, the inter-State river water problems genuinely affect the people of the States concerned.

Considering all these aspects we would feel that the crisis which has been precipitated this time would be effectively managed. People have many grievances. They are waiting for water. There was a news item that yesterday a few raindrops had fallen in some parts of Gujarat. Sitting in Delhi we got enthused thinking that some relief had come. But the actual report is that this rain is in no way helpful to those people who are affected by drought.

We want to listen from the Government today about the positive steps that it wants to take and the new direction that it wants to give. We would certainly appeal to the nation to generously respond to the Prime Minister""""s appeal to donate to the Prime Minister""""s Relief Fund, by which we can overcome this problem at this juncture.

 

SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Mr. Chairman Sir, today we are discussing drought. As you know, drought is a subject which is usually dealt with by the State Governments. I would like to thank my Government which has shown real concern for the drought affected people in various parts of the country, be it parts of Gujarat, Rajasthan, Orissa, Himachal Pradesh or Jammu and Kashmir.

The Meteorological Department forecast in May 1999 that there would be yet another normal monsoon this year. This is the twelfth normal monsoon in a row. In spite of this, there are pockets in Rajasthan, Gujarat, Madhya Pradesh and Orissa which received scarce rainfall. You would see that in Gujarat and Rajasthan the scarcity was very high. This has led to the damage of crops and fall in the ground water level below even the minimum level. This has also created the present human problem.

I would like to draw the attention of the House to a quotation of the Allahabad High Court about the right to life enshrined in the Constitution of India in article 21. The learned judges have said: "Right to life includes right to get water." This case for drinking water was started long ago as the people of Allahabad where Ganga and Jamuna both flow never got drinking water for themselves. So, one Shri Kabju went to the High Court with a public petition, placed the petition before the hon. High Court which then established that water was the primary need; it was a part of the right to life of a human being; and that it should be given the top-most priority.

Therefore, the NDA Government understands the fact that this right cannot be neglected. A lot of programmes have been started to which the hon. Minister will refer in his reply. I would like to cite certain drought-related problems. In a drought situation you will see things like migration and distress sale of children. There have been instances that in Kalahandi, one of the KBK districts of Orissa, in the district Nuapora Panaspunji, a mother sold her child for just Rs.40. This was the time when Late Shri Rajiv Gandhi had visited Kalahandi. In one of his speeches he said that whatever money was being given to the State, out of one rupee, only nineteen paise reached the poor or the objective for which the money was meant.

There are lots of programmes to mitigate drought. The present as well as the previous Central Governments have initiated the programmes to mitigate drought under the Drought Prone Area Programme, EAS and DRDA. But, I am sorry to state that in Orissa, in places like Kalahandi, Bolangir and Koraput, the EAS card which is given to labourers for one hundred days is being utilised only for seventeen days.

Only 17 days out of 100 days were utilised. So, how can we expect that the objective will be met? At that time, Congress Government was there in Orissa. Today, there are Congress Governments in Rajasthan and Maharashtra. They are unable to cope up with their resources. Hence, the Central Government will definitely give the money because we are bound by human tragedy caused by drought and the Government will definitely meet the situation. The hon. Prime Minister appealed to the country to help the Government as they are running short of money. It is a known fact as we have been having elections after elections thereby draining the exchequer. Therefore, a situation has come when drought has to be completely mitigated from the face of earth.

The prime necessity is drinking water. And today, we are discussing about it. Today, you will see that violence has erupted in Gujarat. There is loss of crop worth Rs.6200 crore. Eight thousand villages have been affected in Gujarat. I do not understand why Narmada Project has not been completed today. Shrimati Medha Patkar who is a great environmentalist should understand the position. We respect her, her environmental concerns and views. At the same time, she should understand that this is going to irrigate one of the most drought-prone areas in Gujarat, namely, Kutch and other regions thereby increasing foodgrains production in the country. Therefore, top priority should be given to this project and I think she should understand this point. You will see that the loss of pulse crops in Rajasthan amounts to 53 per cent, 73 per cent of the cotton crop has been damaged and 26 per cent of the oilseed crops had been damaged. Out of the 32 districts, there is drought in 26 districts of Rajasthan. There is drinking water scarcity. How do we solve this problem? I would like to remind the Government of the mega plan that had been drawn out to link Ganga with Cauvery. If that plan is initiated, that can also provide employment to the people of the country besides softening the drinking water problem.

Before I conclude, I would like to stress something about Orissa. As you know, Orissa was affected by supercyclone last year. It had inundated 14 districts of our State. You may understand that almost all the tubewells in the coastal Orissa have been completely damaged and are completely filled with mud and saline water. They have become completely defunct and cannot be put to use unless new tubewells are provided in the supercyclone hit areas. Thus, the miseries of Orissa have been compounded by cyclone and drought in the Western Orissa, namely, KBK districts where a lot of irrigation projects like Indirawati, Sukhtel, etc. which could recharge ground water of those districts are pending. Therefore, I request the Central Government to initiate these projects and provide adequate funds under AIDP to complete these projects. Besides these projects, there are a lot of drinking water and pipe water projects in KBK districts, Bhavanipatnam, Koraput and Navrangpur which are pending with the Central Government for clearance. I request the Government to clear the drinking water and pipe water projects for small and medium towns so that our people who are reeling under drought could get some respite. If you go to Bolangir and Kalahandi, you may find that the villages have become empty. You will find only disabled and old people, and infants. The able-bodied people have all migrated to Raipur which Shri Patwa very well knows.

 

He was the Chief Minister of Madhya Pradesh. Today, most of the labour class people in Raipur belong to our district because they do not have any employment opportunity in Kalahandi, Koraput and Bolangir. As I told you earlier, out of the 100 days’ projection of EAS, only 17 days have been utilised.

Besides the drinking water scarcity problem, I would like to lay stress on the global problems. A couple of days back, we read in the newspapers and magazines regarding the global warming. Sir, you know that the North Pole and the Arctic Circle are going to melt. The chance of the North Pole melting is there. The Ozone layer has completely been degraded. There is a big hole in the Ozone layer thereby influencing the hydrocarbons to be affected. Further, the ultra-violet rays are coming and melting the snows thereby getting global warming.

One of our friends Shri Vijendra Pal Singh was mentioning about the El Nino effect and the Greenhouse effect. These two effects are leading to the global warming. How do we erase this problem?

Now, I would like to show you the rainfall data. If you kindly see the rainfall data right from 1988 to 1999, you will see that there is a marked difference. The rainfall has been coming down gradually. There has been a decrease of about 30 per cent rainfall. From where does the ground water come? The ground water comes from rainfall, by water-harvesting and by recharging the dams. Today, what is the reservoir capacity of our country? Our country has got 68 important reservoirs. The mean reservoir level should be 129.5 TMC but this year it is only 95.3 TMC at the end of September, 1999 thereby leading to shortage of water. We should do something in this regard.

With these words, I thank you for giving me this opportunity. I would request the hon. Minister and the Government to show concern for the KBK districts because these districts are the misery of Orissa and also the misery of the country. The scarcity of water problem should be mitigated. Thank you.

श्री हन्नान मोल्लाह (उलूबेरिया) : महोदय, यहां बहुत ही गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है। हमारे हजारों भाई-बहन सौ से ज्यादा जिलों में मौत के साथ जूझ रहे हैं, जो अपने परिवार और पशुओं के साथ अपनी जिन्दगी की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं, उन सब के साथ, अपनी वेदना के साथ दो-चार शब्द बताना चाहूंगा। मैं दो-तीन दिन राजस्थान में घूम कर आया हूं और उनसे बातचीत करके आया हूं। वहां किस तरह से परिस्थिति चल रही है, देख कर आया हूं। सात-आठ राज्यों में जिस तरह अकाल चल रहा है, उनमें से राजस्थान और गुजरात सबसे ज्यादा अकाल पीड़ित है। राजस्थान की जो स्थिति है, पिछले २० साल में राजस्थान में १२ साल अकाल पड़ा, बीच के समय में थोड़ी राहत थी। यह कोई नई बात नहीं है, लगातार यह परिस्थिति चल रही है। इसका मुकाबला करने के लिए हमारी जो योजना होनी चाहिए, वाटर मैनेजमेंट की हो, वाटर सप्लाई की योजना हो या बेरोजगारों को काम देने का सवाल हो, ये सारी बात सब को मालूम है। मगर फिर भी हम हर साल चर्चा करते जा रहे हैं और समस्या वहीं की वहीं खड़ी रहती है। हमारे बहुत सारे साथियों ने बताया कि इससे हमारी नीयत पर भी आंच आती है, क्या हम सही मायनों में इसे खत्म करना चाहते हैं। हमारी एक योजना के बाद दूसरी योजना बनती है और करोड़ों रुपए का खर्चा हो रहा है मगर उससे कोई राहत नहीं मिल रही है।

हमारी योजनाओं पर योजनाएं बन रही हैं और उन पर करोड़ों रुपया भी खर्च हो रहा है लेकिन पीड़ितों को कोई राहत नहीं मिल रही है। राजस्थान में केवल फसल ही नष्ट नहीं हुई है, पशुधन की हानि ही नहीं हुई है, बल्कि इंसान भी मर रहे हैं। गुजरात से भी मौत की खबरें आ रही हैं। अगले दो-तीन महीनों में न जाने कितने लोगों को अकाल-मृत्यु मरना पड़ेगा।

राजस्था में पीने के पानी की समस्या को सभी लोगों ने उठाया है। वहां पर २० किलोमीटर दूर जाकर एक बाल्टी पानी लाना पड़ता है और कभी-कभी वह भी नहीं मिलता है। पानी लेवल से बहुत नीचे चला गया है। वहां पर बिजली से चलने वाले ७ लाख कुओं का बिजली न मिलने के कारण उपयोग नहीं हो पा रहा है। पानी न मिलने के कारण पशु तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। आज वहां पशुओं का चारा बहुत महंगा हो गया है। उदयपुर के लोग अकाल पड़ने पर गुजरात चले जाते थे लेकिन वहां पर भी विकट परिस्थिति के कारण न उन्हें काम मिल रहा है न अनाज मिल रहा है। मूंग का पत्ता जो वह पहले उठाकर खा लेते थे वह भी नहीं मिल रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि मर्दों के बाहर चले जाने के कारण वहां पर औरतें अपना शरीर बेचने के लिए मजबूर हैं। इन सारी परिस्थितियों का किस तरह से मुकाबला किया जा सकता है, इस पर हमें गंभीरता से सोचना होगा और रास्ता निकालना होगा। हमारे एक सांसद ने अभी बताया था कि राजस्थान के लिए ११४५ करोड़ रुपये की मांग की थी लेकिन केवल १०३ करोड़ रुपये दिये गये। सबसे बड़ी बाधा यह है कि हमारे जो ऑफिसर्स हैं उनमें संवेदनशीलता बिल्कुल नहीं है। वे लोग बैठे रहते हैं, मीटिंगे करते रहते हैं लेकिन जमीन पर जो खर्च करना चाहिए वह नहीं कर रहे हैं। इस पर भी मॉनटिरिंग होनी चाहिए। युद्ध-स्तर पर जिस तरह से इस वभषिका का मुकाबला करना चाहिए वह नहीं हो रहा है। प्रशासन के काम में काफी कमी नजर आ रही है। हमें इस बात को भी देखना होगा।

मैं सरकार से मांग करुंगा कि जल्दी से जल्दी पानी का वहां पर इंतजाम किया जाये और पानी को बचाने की कोई दीर्घकालिक योजना योजनाबद्ध तरीके से बनाई जाये। पशु कुछ बोलता नहीं है, वह अपनी व्यथा बता नहीं सकता है, उसके लिए चारे की व्यवस्था जल्दी से जल्दी करनी चाहिए।

मेरी मांग है कि जो अनाज हमारे गोदामों में लाखों टन बेकार पड़ा हुआ है वह पीड़ित लोगों को बड़े उदार ढंग से सरकार को देना चाहिए और काम के बदले अनाज योजना को अच्छे ढंग से चलाना चाहिए। मलेरिया और बहुत सारी दूसरी बीमारियों की इन क्षेत्रों से खबरें आ रही हैं। वहां पर जल्द से जल्द दवाइयां और मैडीकल टीम भेजने का प्रबंध सरकार को करना चाहिए।

आदिवासी क्षेत्र में परिस्थिति और खराब है। अगली उपज के लिये बीज और उसकी परिस्थिति अभी से तैयार करनी चाहिये। सुखाड़ के बाद काश्त का काम होता है उसकी तैयारी कैसे कर सकते हैं, तीन महीने के बाद ही हो पायेगा। पावर सप्लाई रैगुलर या कुछ घंटे बढ़ने में कैसे कर सकते हैं या दूसरे पावर ग्रिड से लेकर सप्लाई करने का इन्तजाम किया जा सकता है, इन सब बातों को जल्दी से जल्दी देखना चाहिये। राज्य सरकार ने केन्द्र से जो फंड्स मांगे हैं, जिस टीम ने सिफारिशें की हैं, वह पैसा जल्द से जल्द भेजना चाहिये। सरकार को राष्ट्रीय अकाल के रूप में ज्यादा पैसा भेजना चाहिये। जो टैक्स क्लैक्शन का कार्य है या जो कर्जा है, उसे माफ कर देना चाहिये। नदी योजना का कार्य जैसे सरदार सरोवर य़ोजना का काम राज्य सरकार से बात करके सहमति के आधार पर जल्द जल्द काम पूरा करना चाहिये। यह बहुत जरूरी है।

सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया, उसके लिये धन्यवाद।

डा. सुशील कुमार इन्दौरा (हिसार); सभापति महोदय, आज सूखे जैसी गम्भीर समस्या पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, उसके लिये आपका आभार प्रकट करता हूं।

देश में सूखे की स्थिति एक गंभीर समस्या है। इस पर चर्चा न केवल आज बल्कि जब से भारत आजाद हुआ है, इस विषय पर हर साल चर्चा होती रहती है। यदि बरासात न हो तो सूखे पर चर्चा होती है और यदि बरसात ज्यादा हो जाये तो बाढ़ पर चर्चा होने लगती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस समय देश में १०७ मलियन हैक्टेयर क्षेत्र सूखे से प्रभावित है। देश के ११ राज्यों के १२६ जिले पूरी तरह या पार्टली सूखे से प्रभावित हैं। इनमें खासतौर पर गुजरात, राजस्थान और आंध्रा प्रदेश प्रमुख हैं। गुजरात के ९५०० गांव और राजस्थान के ३२ जिलों में से २६ जिले तथा आन्ध्रा प्रदेश के २२ जिले सूखे से प्रभावित हैं। यह हमारे देश की विडम्बना ही है कि जहां बरसात न हो तो वह क्षेत्र सूखे से ग्रस्त हो जाता है। देश के कई इलाकों में ज्यादा बरसात आने से बाढ़ आ जाती है। क्या आज हम सूखे की स्थिति से निपटने के लिये कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठा सकते जिससे कि जो चर्चा हम आज कर रहे हैं या हर साल करते हैं, उसकी जरूरत न पड़े। अगर हमारे देश की भौगोलिक परिस्थिति देखी जाये तो मालूम होगा कि यह तीन तरफ से सागर से जुड़ा हुआ है और एक तरफ हिमालय है जो सारा साल बर्फ से ढका रहता है। हमारे लिये पानी का अच्छा रुाोत है। इसके बावजूद हमारे पास २० ऐसी नदियां हैं जो पानी के रुाोत साधन हैं।

हमारे यहां तकरीबन सौ छोटे-बड़े नदी-नाले एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, फिर भी हमारा देश सूखाग्रस्त होता है, पानी की कमी होती है। चाहे राजस्थान हो, उड़ीसा हो या आंध्रा प्रदेश हो, इतने साधन होने के बावजूद भी जो हमारे नदी-नाले हैं, उनमें जल प्रवाह की क्षमता के जो मेरे पास आंकड़े हैं, उसके अनुसार १८६९ मलियन क्यूबिक मीटर पानी है और जो हमारी जरूरत है, जिसका हम इस्तेमाल कर सकते हैं, वह सिर्फ १३०४ मलियन घन मीटर है। इतने पानी की उपलब्धता होने के बावजूद हमने कोई राष्ट्रीय जल नीति नहीं बनाई, हमने ऐसे कोई साधन नहीं जुटाये जिनसे हम पानी का सही इस्तेमाल कर सकते, जिससे कि न सूखे की स्थिति आये और न बाढ़ की स्थिति आये।

सभापति महोदय, १९८७ में एक राष्ट्रीय जल नीति की घोषणा जरूर की गई थी, लेकिन उस पर क्रियात्मक काम नहीं हुआ। वह सिर्फ कागजों पर रह गई। उस पर कोई ऐसा काम नहीं हो पाया कि हम उसे सही रूप से लागू करके जल का सही इस्तेमाल कर सकते। हमें यह तो मंजूर है कि रावी और व्यास नदियों का पानी पाकिस्तान में चला जाए, लेकिन यह मंजूर नहीं है कि एस.वाई.एल. नहर बनाकर हम उसी पानी का अपने लिए इस्तेमाल कर सकें। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हम इसके लिए लड़ रहे हैं पंजाब और हरियाणा की यह विवादास्पद निर्माणाधीन योजना वर्षों से लम्बित पड़ी हुई है। उस विवाद को हम सही रूप से नहीं सुलझा सके हैं। पानी पाकिस्तान में चला जाए, हमें इस पर कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन उससे लोगों को फायदा हो, उस पर हमें ऐतराज है।

सभापति महोदय, १९९१ में हुए सर्वे से पता चला था कि पानी का स्तर २२१३ घन मीटर था जो आज घटते-घटते १८७५ घन मीटर रह गया है। जल का स्तर जमीन के नीचे उतर रहा है। बरसात नहीं हो रही है, इसके भी कई कारण है। आज अगर देश में देखा जाए तो पर्यावरण की शुद्धता, संतुलित विकास और जल की आपूर्ति के लिए वन बड़े अच्छे साधन हैं। लेकिन यदि इस पर निगाह डालें तो आंकड़े कहते हैं कि हमारे देश की ३३ प्रतिशत भूमि पर वन होने चाहिए। जबकि सरकारी रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी २३ प्रतिशत भूमि पर ही वन है। लेकिन आज उपग्रह से जो चित्र खींचे गये हैं , वे यह हकीकत दर्शाते हैं कि देश में मात्र १२ प्रतिशत भूमि पर वन हैं। जो हमारे लिए न केवल पर्यावरण की शुद्धता, संतुलित विकास और जल आपूर्ति के लिए बहुत सहायक हैं, लेकिन वह सिर्फ १२ प्रतिशत रह गये हैं। हमारे देश में १२ करोड़ ९६ लाख हैक्टेअर भूमि आज भी बंजर पड़ी हुई है, जो पूरे देश की भूमि का कुल ४० प्रतिशत है। हमारे पास जल की कोई कमी नहीं है। जैसा पिछली सरकार की तरफ से बयान आया था कि पानी को भी हम राशन की तरह इस्तेमाल करेंगे औऱ पिछली सरकार में यहां तक कहा गया था कि जल का पैसा हम उपभोक्ता से कठोरात्मक ढंग से वसूल करेंगे। मैं आपको उदाहरण देना चाहूंगा कि देश में सबसे बड़ी गंगा नदी है, जो देश की सबसे प्रसिद्ध नदी है और धार्मिक प्रवृत्ति के हिसाब से भी शुद्ध मानी जाती है। हम उसके जल को शुद्ध मानते हैं और लोग उसकी पूजा करते हैं। यह नदी देश के सबसे ज्यादा प्रांतों से होकर गुजरती है।

सभापति महोदय, गंगा नदी सबसे ज्यादा प्रान्तों से होकर गुजरती है, उसके जल प्रवाह के अगर आंकड़े देखें, तो आपको वदित होगा कि ५२५.२४ मलियन क्यूसिक घन मीटर की उसकी क्षमता है जिसमें से उपयोग के लिए केवल २५० मलियन क्यूसिक घन मीटर जल का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन वर्तमान में हम केवल ३६.८४ मलियन क्यूसिक घन मीटर जल का ही उपयोग कर रहे हैं। इससे आपको वदित हो जाएगा कि इसमें कितना अन्तर है और हम कितने कम जल का उपयोग कर पा रहे हैं। हमारी जो निर्माणाधीन परियोजनाएं हैं जिन्हें गंगा नदी से निकाला जा सकता है, उनको भी यदि शामिल करें तो उनसे हमारी जरूरत की १७.१२ मलियन क्यूसिक घन मीटर जल की पूर्ति की जा सकती है और इस प्रकार सभी साधनों को मिलाकर देखें तो भी हम ८३.५२ मलियन क्यूसिक घन मीटर जल का ही उपयोग कर पा रहे हैं। चाहे पहले की सरकार हो या आज की सरकार हो, यदि हम गंगा के जल के ज्यादा उपयोग के लिए प्रयास करते, तो अवश्य हम उसका ज्यादा उपयोग कर सकते थे, लेकिन हम सिर्फ चर्चा करते हैं और पानी के उपयोग की तरफ ध्यान कम देते हैं।

सभापति महोदय, इसी तरह यदि मैं उदाहरण दूं, तो सौराष्ट्र का देना चाहूंगा जहां आज सबसे भयंकर सूखा पड़ा है। यदि वहां बहने वाली नदियों की वार्षिक क्षमता हम देखें, तो १५.१२ मलियन क्यूसिक घन मीट की क्षमता है जिसका हम उपयोग कर सकते हैं, लेकिन हम उसका सही उपयोग नहीं कर पाते। यदि हम गुजरात में बहने वाली नदियों के जल का सही उपयोग कर सके होते, तो गुजरात की सूखे के कारण आज जो हालत है वह कभी नहीं हुई होती। ये उदाहरण जो मैंने दिए हैं, ये गुजरात या उत्तर प्रदेश के लिए ही नहीं बल्कि सारे देश में जल के उपयोग की यही स्थिति है। जितने जल की हमारी उपलब्धता है, हम उसका बहुत कम भाग ही अपने उपयोग में ला पाते हैं।

सभापति महोदय, अभी हमारे जल संसाधन संस्थान, हैदराबाद की एक रिपोर्ट के आधार पर कुछ दिन पहले टी.वी. पर समाचार दिया गया था कि यदि हम बरसात के पानी को पोखरों में इकट्ठा कर के उसका सही इस्तेमाल करें, तो हम बहुत हद तक इस स्थिति पर काबू पा सकते हैं। जो भयावह स्थिति गुजरात और राजस्थान में आज है यदि हमने पानी का सही इस्तेमाल किया होता, तो वह स्थिति इतनी भयावह नहीं होती।

सभापति महोदय, राजस्थान हमारा पड़ौसी प्रदेश है और वहां जो आपत्ति आती है उससे हरियाणा प्रदेश भी प्रभावित होता है। मेरा सरकार से यह अनुरोध है कि जिस तरह से माननीय प्रधान मंत्री ने आग्रह किया है उस तरह से देश के ज्यादा से ज्यादा लोग तो इस समस्या के समाधान हेतु अधिक से अधिक सहयोग दें, लेकिन उसके साथ-साथ भारत सरकार भी अपनी जिम्मेदारी निभाए। माननीय खाद्य मंत्री जी ने अभी कुछ दिन पूर्व दूरदर्शन के समाचार में कहा था कि हमारे पास अन्न के भंडार भरपूर हैं, लेकिन हम उसी दर पर उसका वितरण करेंगे जिस दर पर हम पी.डी.एस. में देते हैं। मैं माननीय मंत्री जी से प्रार्थना करूंगा कि ऐसी हालत में जहां सूखा पड़ा है, लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हैं, उनसे हम अगर पैसा लेकर अन्न देते हैं, तो उससे बड़ा अन्याय उनके साथ और कोई नहीं होगा। मैं समझता हूं कि सरकार के पास अन्न कई सालों से गोदामों में भर पड़ा है, जरूरतमंद लोगों को उसका वितरण करके उस भंडार का सदुपयोग किया जा सकता है। आज उन लोगों की भावनाओं से जुड़ना देश के हर नागरिक का कर्तव्य बनता है, उनका सहयोग करना हर नागरिक का फर्ज बनता है।

सभापति महोदय, इसी के साथ-साथ मैं यह बात भी कहना चाहूंगा कि बहुत से लोग राजस्थान से हरियाणा में आ रहे हैं और खासकर दक्षिणी हरियाणा में आ रहे हैं। मेरा पार्लियामेंट्री एरिया का सिरसा एवं कुछ भाग राजस्थान की सीमा से लगता है, उसमें भी यदि देखा जाए, तो आज सूखे जैसी स्थिति विद्यमान है। इधर से वे आ रहे हैं।

MR. CHAIRMAN : Please conclude. That is all. You have exhausted so much of time.

श्री सुशील कुमार इन्दौरा : उन लोगों की हम दिली मदद कर सकें इसलिए न केवल हरियाणा के इलाके, दक्षिणी हरियाणा के इलाके, भिवानी, सिरसा के इलाके जो सूखे की चपेट में आये हैं, बल्कि जो लोग हरियाणा से आ रहे हैं, उनको हम राहत दे सकें, रहने के लिए ठिकाना दे सकें, चारे का इंतजाम कर सकें और पानी का इंतजाम कर सकें, उसके लिए सरकार को चाहिए कि वह हरियाणा सरकार की मदद करे ताकि हम भी उनके दुख के दिनों में सहायता कर सकें। धन्यवाद कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी (बाड़मेर) : सभापति जी, मैं आपका बहुत आभारी हूं की आपने आज अकाल जैसे मुद्दे पर चर्चा रखी। मैं बाड़मेर इलाके से आता हूं। पास में जालौर, जोधपुर, बीकानेर और नागौर है। वहां अकाल हमारे एक परिवार का सदस्य बना हुआ है। अगर वहां के आंकड़ें लें. मैंने लिये हैं, पिछले ५० साल में मेरे इलाके में ४० अकाल पड़े हैं और पिछले तीन साल से लगातार वहां पर अकाल पड़ रहा है। किसी सदस्य ने कहा कि कहीं अकाल है, कहीं बाढ़ है तो कहीं तूफान है। परन्तु अफसोस इस बात का है कि इसे सब जानते हैं कि वहां अकाल पड़ते हैं और यह परिचर्चा भी होती है कि इस आपदा के लिए कुछ लाँग टर्म प्लानिंग होनी चाहिए परन्तु इससे ज्यादा न भारत सरकार ने दिया और न ही राज्य सरकार ने दिया। होता यह है कि उसमें हर्जाना वहां के लोगों को उठाना पड़ता है। इस साल राजस्थान के साथ-साथ गुजरात और आंध्रा प्रदेश के कुछ इलाकों में भी अकाल पड़ा है। पिछले साल भर से मैं पार्लियामैंट में अलग-अलग मंच पर यह बात उठा रहा हूं कि आप कुछ करिये।

अभी मेरे साथी कह रहे थे कि प्रधान मंत्री जी जब पहली बार शपथ ले रहे थे तब उन्होंने कहा था कि हम यह करेंगे, वह करेंगे। किसी ने कहा कि आप सब कर देंगे तो प्रधान मंत्री जी ने खड़े होकर वायदा किया, मेरे साथी श्री प्रवीण राष्ट्रपाल जी ने उस कोट किया है कि हम और कुछ करें या न करें लेकिन हम सारी जगह पानी का इंतजाम कर देंगे। ढाई साल निकल गये हैं। क्या हुआ, इसके बारे में हम सबको पता है। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: You should not talk to Col. Sona Ram Choudhary directly.

कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : मैं आपसे कहना चाहता हूं कि १५ मार्च १९९९ को मैंने एक सवाल उठाया था, मेरा २५२१ नम्बर का अनस्टार्ड प्रश्न था। यह प्रश्न मैंने प्रधान मंत्री जी को चार महीने पहले लिखा था। उसका जवाब श्री अरूण शौरी जी ने दिया। मैं उसे कोट करता हूं :

" क्या राजथान लगातार तीसरे वर्ष भयंकर सूखे तथा अकाल की स्थिति से गुजर रहा है? क्या लोग अपने जीवनयापन की खोज के लिए पड़ोसी देशों की ओर पलायन कर रहे हैं क्योंकि उनकी फसल और मवेशी चारे तथा पेयजल की सख्त कमी के कारण बर्बाद हो रहे हैं। यदि हां, तो क्या थार रेगिस्तान की समस्या को कम करने के लिए आप विशेष पैकेज की घोषणा करेंगे ?"

पैकेज के बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन यह जरूर माना कि राज्य के ३२ जिलों में से २६ जिलो वर्षा न होने की वजह से सूखे की स्थिति से ग्रस्त हैं जिससे फसल को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है। इन क्षेत्रों में रोजगार, चारे तथा पेयजल की घोर कमी है। चारे और पेयजल की उपलब्धता न होने के कारण विशेषकर पश्चिमी जिलों में स्थिति और भी गंभीर है। इन क्षेत्रों से लोग कठिन समय में सामान्य रोजगार की खोज में पलायन करते हैं। परन्तु इस वर्ष पलायन बड़े पैमाने पर हो रहा है। आगे यह भी कहा कि राज्य में विनाश को कम करने के लिए १,३०० करोड़ रुपये के खर्च की योजना बनाकर यहां भेजी थी।

करीब पांच महीने पहले यह योजना बनाकर यहां भेजी थी। कुछ नहीं हुआ। सिर्फ १० दिन पहले ११४० करोड़ रुपये में से १०३ करोड़ रुपये दिए। मैं मानता हूं कि जो काम अक्टूबर-नवम्बर में शुरु होने चाहिए, राजस्थान सरकार ने उसे फरवरी के तीसरे हफ्ते में शुरु किया। उनकी भी माली हालत ऐसी है। लेकिन आप सदन में चार महीने पहले मानते हैं कि यह चीज है, केन्द्रीय अध्ययन दल वहां गया, उन्होंने महसूस किया लेकिन फिर भी कुछ नहीं किया। पिछले साल भी अध्ययन दल ने कहा था कि ९६० करोड़ रुपये की जरूरत है लेकिन राजस्थान सरकार को सिर्फ २१ करोड़ रुपये मिले। कुछ तो इंसाफ होना चाहिए। इसमें लोगों के साथ राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसका नतीजा कौन भुगत रहा है ? इसका नतीजा राजस्थान के गरीब अकाल पीड़ित लोग भुगत रहे हैं। आज की तारीख में आधे से ज्यादा पशुधन खत्म हो गया है। वहां खेती नहीं होती। ८० प्रतिशत लोग वहां पशुधन पर निर्भर रहते हैं। जिनके भेड़, बकरी, गाय मर गए, आप महसूस कर सकते हैं कि उनकी आज क्या हालत है। मैं कल वहां गया था। मुझे लोगों को देख कर दर्द होता है, रोना आता है। इसलिए मेरा आपसे यह कहना है कि इसके लिए भारत सरकार को कुछ करना चाहिए।

आप आज का हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार देखिए। उसमें मेरे क्षेत्र की फोटो आई है। एक जगह पशु मर गए, वल्चर खा रहे हैं और दूसरी तरफ रोजगार बहुत कम है, महिलाएं बहुत दूर से पानी ला रही हैं। मेरा कहना है कि जितनी जल्दी हो सके, उनकी मदद करें। लगातार तीन साल वर्षा न होने के कारण फसलें बर्बाद हो गई है, पीने का पानी नहीं है, मवेशियों के लिए चारा नहीं है, किसान बेरोजगार है, गांवों में से पलायन हो गया है। जैसा मेरे साथी कह रहे थे, पिछले साल ३२ जिलों में से २० जिले अकाल से पीड़ित थेजनकी जनसंख्या २०,००० थी। इस साल २६ जिलों में जिनमें ३५,००० लोग हैं, में से २४,०५० लोग प्रभावित हैं। इसी तरह अगर देखें तो कुल मिलाकर २.६५ करोड़ जनसंख्या इससे प्रभावित है। पशुधन साढ़े तीन करोड़ है। मेरे क्षेत्र में २,७६० गांव हैं। उससे पिछले साल २,७०० गांव थे, इस साल सारे २,७६० गांव प्रभावित हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिसे लगातार तीन साल मार पड़ती है, उसकी क्या हालत होती है। इसके सिवाए वहां करीब ११,००० ढाणियां हैं जिनमें से ८,००० ढाणियों में बिल्कुल पानी नहीं है। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कोई नीति नहीं है। पंडित जवाहरलाल नेहरू जी जब प्रधानमंत्री थे, उन्होंने १९५० में राजस्थान नहर जिसे आजकल इंदिरा गांधी नहर परियोजना कहते हैं, का प्लान किया। आज पानी देश में पहुंच गया।, उसके आगे गोदरा पाकिस्तान बार्डर पहुंच गया। दो-तीन साल में नहर पूरी हो जाएगी परन्तु उसकी पानी की स्कीमें नहीं बनी है। कुछ स्कीमें बन कर य़हां आ गई हैं क्योंकि उस योजना के लिए राजस्थान सरकार सारा बोझ नहीं उठा सकती, ये उसे क्लीयर नहीं कर रहे हैं। लोग दुख पाते हैं, आप पानी की स्कीम बनाइए। इसी तरह सरदार सरोवर डैम के लिए भी परियोजना बननी चाहिए। कहते हैं कि ३-४ साल में पानी आ जाएगा, पहले सुप्रीम कोर्ट का स्टे था, वह वेकेट हो गया है, अब आ जाएगा। उसके लिए सोच-समझकर लौंग टर्म प्लान होना चाहिए ताकि कुछ हो सके।

इसके सिवाए रोजगार की जो बात है, रोजगार में २.६५ करोड़ लोग अफैक्टेड हैं। राजस्थान से अभी जो आंकड़े आए हैं, उनमें से सिर्फ ४ लाख व्यक्तियों को रोजगार मिला है जबकि यदि एक फैमिली से ५ लोग लेते हों तो ५० लाख श्रमिकों को मिलना चाहिए, अगर १० भी लेते हों तो कम से कम २५ लाख व्यक्तियों को मिलना चाहिए। कहां २५ लाख और कहां ४ लाख। राजस्थान सरकार कहती है उनको आपात की योजना के तहत पैसे नहीं मिले, हमारे पास नहीं हैं। हम कहां जाएं।

आज प्रधान मंत्री जी यहां नहीं बैठे हैं, मंत्री जी यहां बैठे हैं, मेरा तो आपसे यह कहना है कि राजनीति से ऊपर उठकर जो लोग वहां तकलीफ उठा रहे हैं, उनकी हमें मदद करनी चाहिए। इसी तरह से पशुधन है। …( व्यवधान) मैंने तो कम ही टाइम लिया है। वहां पर करीब ३.५ करोड़ पशुधन है। उसमें से आधा पशुधन तो खत्म हो गया है। उसकी वजह यह है कि वहां काम बहुत देर से शुरू हुए। लेकिन जो पशु बचे हैं, उनको तो बचाओ। अभी भी उसके अन्दर कुछ हो सकता है। हम आपसे ज्यादा नहीं मांगते हैं, गरिजा व्यास जी कह रही थीं कि राजीव गांधी जी ने १९८८ में ६५०० करोड़ रुपये दिये थे, आपने सिर्फ १०३ करोड़ रुपये दिये हैं। यह कुछ नहीं है, आपका बहुत बड़ा खजाना है, जैसे अभी हमारी राजस्थान सरकार ने ७०० करोड़ रुपया मांगा है, आप अगर ७०० करोड़ रुपया देंगे तो आपको कोई घाटा नहीं होगा, आप बहुत अच्छा काम करेंगे। इसलिए मेरी आपसे सिफारिश है, आपसे दरख्वास्त है कि आप हमारी मांग पूरी करें।

वहां पर १८५० चारा डिपो होने चाहिए, लेकिन सिर्फ ८२५ खुले हैं। हालांकि बूटा सिंह जी तो बहुत पुराने हैं, पैसे वाले हैं, बड़े किसान हैं, ये तो रेल ले जाते हैं लेकिन हर एक कहां से रेल ले जायेगा। इसके लिए आप कुछ हमारी मदद करें ताकि हम काम करें। …( व्यवधान) नहीं साहब, मुझे टाइम दीजिए।

दूसरी बात मैं पेयजल के बारे में कहूंगा कि हमारे यहां रेगिस्तान है और वहां पर ४० लीटर एक आदमी को पानी मिलता है। यह पूरे हिन्दुस्तान में एक स्केल है, एक मापदण्ड है, लेकिन हमारे यहां ३० लीटर पशु के लिए होता है, टोटल ७० लीटर है। लेकिन मैंने वहां हिसाब लगाया तो जो ७० लीटर हमें आथोराइज्ड है, उसके अगेन्स्ट हमें २० लीटर भी पूरा पानी नहीं मिलता है, तो यह कहां का न्याय है। उधर से नर्मदा आ रही है, राजस्थान नहर पहुंच गई है। जैसा सैण्टर में प्रधान मंत्री जी ने वायदा किया है, हमको कुछ करके इस तरह से स्कीमें बनायें ताकि लोगों को ७० के बजाय कम से कम आधा, ३५ लीटर पानी तो मिले। दूसरा कहते हैं कि २००० में हिन्दुस्तान में कहीं भी १.६ किलोमीटर से ज्यादा दूर से पानी नहीं ले जायेगा, लेकिन सन् २००० खत्म होने जा रहा है, मेरी कांस्टीट्वेंसी में मैं ठीक कहता हूं, आप जाकर देखिये, अभी भी लोग १५-१५, २०-२० और २५-२५ किलोमीटर दूर से पानी ला रहे हैं। इसमें किसी को न्याय करना चाहिए और इन चीजों को नोट करना चाहिए। दूसरे मैं यह कहना चाहता हूं कि जो स्पेशल पैकेज की बात हमेशा आती है, प्रधान मंत्री जी ने हमसे वायदा किया था, जब हम उनके साथ गये थे, वहां जो न्यूक्लियर ब्लास्ट हुआ था तो उन्होंने मुझे वहां पर रेगिस्तान में कहा था कि यहां अकाल का बड़ा साम्राज्य है और हम आपको यहां के लिए, जैसे पहाड़ी इलाकों को और जिस तरह से उत्तर पूर्वी इलाकों को देते हैं, इस तरह से हम आपको भी कुछ अलग देंगे। उस बात को करीब ढाई-तीन साल हो गये हैं, लेकिन हमको अभी तक कुछ भी उसमें नहीं मिला है, इसलिए हमको उसको देना चाहिए।

इसी तरह से मैं आपसे यह और कहना चाहता हूं कि मेरे कुछ सुझाव हैं। एक सबसे बड़ा सुझाव यह है, जो मैंने आपसे पहले भी कहा है कि वक्त बहुत कम रह गया है, सिर्फ तीन महीने बचे हैं। खुदा करेगा तो बारिश हो जायेगी। इसमें आप उदारता के साथ में पैसा दीजिए। जैसा अभी गरिजा जी कह रही थीं, आपके यहां गुजरात में ३-४ जिले हैं, बनासकांठा मेरे जिले से लगता हुआ है, कच्छ मेरे जिले से लगता हुआ है, वहां पर आप उदारता से पैसा दे रहे हैं। हमारे तो २६ जिले हैं, आप वहां भी उसी प्रपोर्शन में हमको पैसा दें तो बहुत अच्छा रहेगा।

दूसरे पश्चिमी राजस्थान में लांग टर्म प्लान के लिए मेरा सुझाव है। जल संसाधन मंत्रालय के दो-तीन डिवीजन हमारे यहां हैं। कुछ जयपुर में हैं और एक जोधपुर में है, उन्हें बढ़ाना चाहिए। उनका काम यह होता है कि वे सर्वे करते हैं। राजस्थान सरकार के पास जितनी रिग्स, इक्विपमेंट और मशीनरी डीप खोदने के लिए होनी चाहिए, उतनी नहीं है, इसलिए यहां से इस क्राइसिस के अन्दर इस मंत्रालय से मैं प्रार्थना करूंगा कि आप तीन महीने के लिए हिन्दुस्तान की और जगह से लाकर वहां मशीनरी भेजें और हमारे यहां पानी के रुाोत जहां सूख गये हैं, उनके लिए नये रुाोत खोलें। दूसरी बात मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि इतनी गम्भीर स्थिति है, इस समय एक संसदीय दल यहां से समति बनाकर जाना चाहिए ताकि वहां जाकर वह जायजा ले सके। वह दल राजस्थान जाये, आन्ध्रा प्रदेश जाये, गुजरात जाये।

18.00 hrs. MR. CHAIRMAN : Many Members have spoken on behalf of the Congress Party.

कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : ताकि जाकर वह लोगों की हालत देखे। हमारे मुख्य मंत्री जी यहां आए थे और उन्होंने प्रधान मंत्री जी से कहा था कि आप हमें अनाज की सप्लाई कर दो ताकि हम वहां काम के बदले अनाज कार्यक्रम लागू कर सकें।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

SHRI E. AHAMED (MANJERI): Mr. Chairman, Sir, I have a humble submission to make before you. Hon. Members from all the Parties must be given an opportunity to speak. Of course, major Parties like the B.J.P. and the Congress will get more chance. But I would like to say that other Parties should also be considered. As it is a national issue, Members of different Parties, particularly smaller parties, may also be given an opportunity to express their feelings and reflect the mood of the country.

MR. CHAIRMAN : I will call you.

Hon. Member Shri Jaswant Singh Bishnoi to speak now.

श्री जसवंत सिंह बिश्नोई (जोधपुर) : सभापति महोदय, राजस्थान में पिछले दो वर्ष से अकाल पड़ रहा है, बारिश कम हो रही है। राजस्थान में बड़े-बड़े बांध जैसे जवाई बांध, पिछौला बांध, फतेह सागर, मेजार बांध, रामगढ़ आदि बांधों में पानी नहीं आया है, जिसके चलते वहां के लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गए न उबरै मोती, मानुष, चून॥ इस संसार में पानी के बिना कोई व्यक्ति जिंदा नहीं रह सकता और न ही वन्य प्राणी जिंदा रह सकते हैं। राजस्थान में एक कहावत है कि राजस्थान में कांग्रेस का शासन और काल दोनों साथ-साथ आते हैं।

१८०२ बजे (डा. रघुवंश प्रसाद सिंह पीठासीन हुए) सरदार बूटा सिंह (जालौर) : १९७७-७८ में भैरोंसिंह शेखावत मुख्य मंत्री थे, तब क्या हुआ था ?

श्री जसवंत सिंह बिश्नोई : राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी का शासन आठ वर्ष रहा, इस समय में वहां बाढ़ तो आई, लेकिन अकाल नहीं पड़ा। ऐसा वहां के लोग कहते हैं।

सभापति महोदय, पानी के बारे में मैं कुछ सुझाव देना चाहूंगा। हमारे यहां बड़े-बड़े गांव हैं। उनको बसाने से पहले तब के लोगों ने व्यवस्था की थी कि गांव के पास तालाब बनाए थे और पास ही में ओरनी थी। औरण का पानी तालाब में आता था। वह कैचमेंट एरिया था। धीरे-धीरे ओरनी पर लोगों ने कब्जा कर लिया, जिसकी वजह से ओरनी खत्म हो गई। इस तरह कैचमेंट एरिया खत्म होने से तालाब सूख गए। इसलिए जब तक उस व्यवस्था को हम फिर से नहीं लागू करेंगे वहां पानी की स्थिति ऐसे ही रहेगी। अगर हम पानी के पुराने रुाोतों को जीवित करेंगे तो वहां पानी की व्यवस्था हो सकती है।

कर्नल सोना राम जी यहां बैठे हैं। वे भी जानते हैं कि हमारे गांवों से दूर ढाणियां होती हैं, उनमें लोगों ने टांके बना रखे थे। जब-जब बरसात होती थी तो बरसात का पानी उन टांकों में भर जाता था। इस तरह छ:-सात, बारह महीनों तक लोग उस पानी को काम में लाते थे। हमारी सरकार से मांग है कि उन टांकों को बनाने के लिए भारत सरकार या राज्य सरकार हमें अनुदान दे। जब तक हम अनुदान नहीं देंगे, लोग टांके बनाने के लिए मोटिवेट नहीं होंगे। जब तक लोग मोटिवेट नहीं होंगे यह समस्या वैसी की वैसी ही रहेगी। इसलिए टांके बनाने के लिए मैं मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि पश्चिमी राजस्थान में इसकी बहुत जरूरत है इसलिए आप इन ढाणियों के लोगों को टांके बनाने के लिए अनुदान दें। जिससे आने वाले समय में वे पानी को इकट्ठा करके समय पर उसका उपयोग कर सकें।

राजस्थान में ३२ जिलों में से २६ जिलों में अकाल है। उसके परिणामस्वरूप १२८.९० लाख हेक्टेयर बुवाई के लक्ष्य की तुलना में ११६.८४ लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई है।

अन्न के उत्पादन में ५३ प्रतिशत, दालों में ७३ प्रतिशत, खाद्यान्नों में ५६ प्रतिशत, कपास में २६ प्रतिशत और गंवार में ३० प्रतिशत की हानि हुई है। सरकारी अनुमान के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर २१५५.२० करोड़ रुपये की फसल की हानि राजस्थान में हुई है। राजस्थान में सभी जिलों में ३४६९३ गांवों में से २३४०६ गांव अकाल से प्रभावित हुए हैं। तीन करोड़ पैंतालीस लाख तथा साठ हजार पशु और दो करोड़ इकसठ लाख जनसंख्या अकाल से प्रभावित हैं और उनके लिए चारे की व्यवस्था कर्नल साहब बता रहे थे कि पशु आहार के लिए चारा डिपो खोलने की बात की गई थी लेकिन इस पवित्र प्रांगण में मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि किसी भी चारा डिपो के लिए राज्य सरकार की तरफ से अनुदान नहीं दिया गया है। राजस्थान सरकार पत्र दे दिया और उस पत्र को लेकर लोगों ने लाना शुरु कर दिया। दो तरह की योजना वहां पर हैं। एक तो जी.एस.एस. ग्राम सेवा सहकारी समति है, जो चारा डिपो खोलकर चारा ला रही है और दूसरी ग्राम पंचायतें हैं जो चारा डिपो खोलकर चारा ला रही हैं। लेकिन जब तक अनुदान नहीं मिलेगा, चारा नहीं आ सकता । मैं कह सकता हूं कि राजस्थान की सरकार अकाल के प्रति बहुत संवेदनशील है। इस सरकार ने जुलाई अगस्त में जब पता चला कि वर्षा नहीं हुई है तो सितम्बर औऱ अक्तूबर में आगे प्लान के बारे में सोचना चाहिए था। राजस्थान की सरकार के मुख्य मंत्री श्री गहलोत ने ९.१.२००० को सारे सांसदों की बैठक बुलाई थी और कहा कि हम क्या करें। पांच महीने बाद सरकार चेती और उन्होंने कहा कि हम काम शुरु कर रहे हैं और फरवरी में जाकर काम शुरु हुआ है। आज भी आंकड़ों के अनुसार काम शुरु नहीं हुआ है। जोधपुर जहां से मैं निवार्चित होकर आया हूं, वहां ३६० पंचायतें हैं और १०७ पंचायतों में काम शुरु नहीं हुआ है औऱ वहां भी बराबर लेबर नहीं लगी है, नहीं के बराबर काम शुरु हुआ है। राजस्थान सरकार ने इस अकाल को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया। अगर सरकार गंभीरता से लेती तो राजस्थान सरकार जिन परिस्थितियों में गुजरी है, उनमें उसे गुजरना नहीं पड़ता। भारत सरकार ने केन्द्रीय दल भेजा और यह दल वहां के कलैक्टर औऱ कमिश्नर से मिला। हमने अखबारों में पढ़ा कि जोधपुर जिले के धाबा गांव में यह दल गया और वहां उन्हें काजू औऱ किशमिश खिलाये गये, ऐसा अखबारों में हमने पढ़ा। इस केन्द्रीय दल ने न तो वहां के जनप्रतनधि से बात की, न सांसदों से, न विधायकों से और न ही वहां के प्रधान औऱ सरपंच से बात की। केन्द्रीय अध्ययन दल जो भेजा जाता है तो सरकार रिपोर्ट देती है ऐसी रिपोर्टतो यहां बैठे-बैठे भी मंगा सकती है लेकिन जब तक जो जन प्रतनधि हैं, उनसे बात नहीं करेगा तो यहां आकर सारी बातें कैसे बता सकेगा ? आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।

     

SHRI P.H. PANDIYAN (TIRUNELVELI): Mr. Chairman Sir, I thank you very much for having given me this opportunity to participate in the discussion regarding drought situation prevailing in various parts of the country. On behalf of AIADMK, I associate myself with the views expressed by the Members regarding the drought situation prevailing in Rajasthan, Bihar, Orissa and Andhra Pradesh. … (Interruptions) At this juncture, I would like to say that without water, mankind cannot exist; without water, vegetation cannot grow and exist. There is a famous Tamil proverb neerillaamal amaiyaadhu ulagu. The word water is most important.

My colleague from the other side has said that the Supreme Court has interpreted that right to life includes right to live and eat. Right to potable water is a Fundamental Right now, as interpreted by the Supreme Court.

As far as Tamil Nadu is concerned, we have certain drought-prone districts in the northern part of Tamil Nadu. During summer, particularly in Chennai City, the people do not get water because of imminent drought conditions.

About 17 years ago, when MGR was the Chief Minister of Tamil Nadu and NTR was the Chief Minister of Andhra Pradesh, they both entered into an agreement on the Telugu Ganga Project. At that point of time, the foundation-stone to execute that project was laid by late Shrimati Indira Gandhi, but the water has not yet come to the City so far.

SHRI M.V.V.S. MURTHI (VISAKHAPATNAM): It is because of the drought conditions prevailing in Andhra Pradesh.

SHRI P.H. PANDIYAN : About four years ago, when the city municipal elections were in the offing, the Government announced the release of water. There was a function held, and that supply went on for a week; that is all. Last week, the State Government of Tamil Nadu announced that the people of Chennai are going to get Telugu Ganga water on 1st May. So, I would like to draw the attention of the House and also the Minister to see that the people of Chennai get this Krishna water at least … (Interruptions)

SHRI M.V.V.S. MURTHI : If there is water in the reservoir, then it will be released. If there is no water in the stream, where from will they release?

SHRI P.H. PANDIYAN : That is for you to answer. As far as Chennai City is concerned, there is an acute water problem.

In the northern part of Tamil Nadu where Tamiraparani River is flowing, storing is not being done properly, and there is no proper water management. If an expert goes to Israel and if he learns the art of water management, then there will not be any wastage of water, which otherwise is flowing into the sea.

Sir, Tamiraparani River originates from the hills of Podhigai; the water is flowing from those hills. However, due to mismanagement or improper management or lack of skill to manage it, it is resulting in wastage of water, which is flowing into the sea either at Tiruchendur or at Tuticorin, which is a port city.

My appeal to the hon. Minister is, he should see that the right man is in the right place. We are now in the computer age. We have enough water, but we are not able to conserve water or distribute water properly. We are not able to protect water. Along the seacoast, water is not potable; people are not able to drink that water because they get a number of diseases when they drink that water. Therefore, the Minister may take up this responsibility of seeing that protected water supply is given to the Northern parts of Tamil Nadu, which are drought-prone, particularly V.O. Chidambaranar District, which is a part of my constituency. The people in Ottapidaram constituency are not able to get drinking water because there is no water at all. During my election campaign, they asked for water. I said, "Yes". Now, from the MPLADS, I have given some money for providing water. In the adjacent Vilathikulam constituency also, there is no scheme to provide protected water supply. In the Tuticorin City, which is a port city, there is no water.

People come to me and say that they are not able to get water. The municipality of the city executed a scheme and built a tank there but that tank is not able to cater to the entire population of the city. It is the constitutional duty of the Government to see that the people of this great city are supplied with potable water.

As far as agriculturists are concerned, in some parts of Tamil Nadu they depend on rain water and in other parts they depend on rivers, Tamiraparani and Cauvery. Cauvery river water problem is known to everybody. Because of rainy season it is overlooked now but it will crop up again. It is a perennial problem and it has to be solved.

As far as river Tamiraparani is concerned, I raised it in the House under Rule 377 and mentioned that de-silting of the river had not been done ever since Independence and that the river was totally polluted. Following that, a team of officials from New Delhi visited my constituency Tirunelveli. They examined the issue and made an estimate. I was told that if the Government grants Rs.70 crore for the purpose, de-silting of the river can be done. Because the river supplies potable water to the whole of southern Tamil Nadu, this project should be taken up.

From Tamiraparani river water flows to adjacent Districts. Its waters are taken from Cheranmadhevi through pipes forty kilometres away to Vijayanarayanam, a place adjacent to my constituency, where a Naval establishment is located. However, these waters are not available for use to the people in the wayside villages as they are taken straight to the Naval establishment. If there is excess water available, the Government can consider supplying potable water to the wayside villages like Pathamadai. Let the Government consider whether it is feasible to supply water to the wayside villages. It is a serious problem. The Central Government has a duty to act and the State Government has a duty to obey. Both the Governments should perform their constitutional duty.

 

SHRI M.V.V.S. MURTHI (VISAKHAPATNAM): Mr. Chairman, Sir, Andhra Pradesh, Rajasthan, Gujarat are the States that are worst hit by the drought. Besides these, some districts of Orissa and West Bengal and some other areas in the country are also affected.

It is very unfortunate that even after fifty years of Independence, we are not able to tackle the problem of drinking water supply in the country. Our country is bestowed with Himalayas, Eastern Ghats and Western Ghats from where several perennial rivers flow. The water that flows through the length and breadth of the country can more than meet the irrigation and drinking water requirement in the country. However, unfortunately, we are not able to formulate a policy to harness these waters even for drinking purposes.

Even though there is a talk of industrial revolution in the country, ours is primarily an agrarian country. Seventy per cent of the country’s population is dependent on agriculture. These 70 per cent people depend on agriculture for their supply of food and water and then they supply food to the rest of the 30 per cent people also. Even then we are unable to tackle the water problem. Rain-fed agriculture is creating fodder and food problems for cattle and human beings. If things continue like this, a stage may come when we have to import these things.

I agree with Dr. Raghuvansh Prasad Singh when he said that because of lack of proper irrigation facilities, drought could not be fought in this country. The PDS rates have also gone up. On one side, we are tackling the issue of drought and, on the other side, the purchasing power of people has come down. For many years, we have been demanding that not only the people below the poverty line, but the population as a whole should be covered under EAS. When the rates have been increased, the poor man has no capacity to purchase food grains. I appeal to the hon. Minister and the Union Government to think of reducing the prices of the PDS, at least of wheat and rice till the drought conditions are solved. Otherwise, people will die. Today only the cattle are dying. If you increase the prices, tomorrow there will be starvation deaths. There are already starvation deaths in Andhra Pradesh. There are some starvation deaths in Rajasthan. Can’t we have a policy where millions of people at least have food to eat? Either you provide the money by way of drought relief or EAS or reduce the prices. Kindly look into these aspects.

The other point is, to assess the drought situation, a team was sent to Andhra Pradesh in October, 1999. They have released only Rs.70 crore recently whereas the State Government has asked for Rs.700 crore. The inordinate delays have to be cut in releasing the money. When the expert team gives its report, kindly act on that report. Don’t delay further. Any further delay will cause further damages and Rs.700 crore will become Rs.1,400 crore and the situation will aggravate. Kindly look into this aspect also without standing on formalities to release the funds. If need be, send another team. I would request the hon. Minister of Rural Development to visit all the States under drought and take a look and take some steps immediately.

The Tenth Finance Commission has said:

"75 per cent the Union Government should bear the cost of these calamity funds and 25 per cent the States will bear."

If that is the case, ask the States to spend 25 per cent. The Union Government can provide the balance 75 per cent as asked by states . The situation is very grave. That is why I have chosen to speak on this subject.

The Centre has announced its national policy on water and agrarian matters, way back in 1987. But no concrete steps have been taken. They have yet to implement at the earliest its 1998 annual policy which they have announced.

There are perennial rivers in North and South. In the South, there is a mighty river Godavari out of which we are using 700 TMC where the outflow into the sea is about 2,000 TMC. Shri P. V. Narasimha Rao our former Primer Minister promised that Polavaram project will be implemented. If it is implemented, the water could be routed through Krishna river and that water will reach Chennai at the earliest through Telugu Ganga. Now there is no sufficient water in Chennai. They have implemented the Telugu-Ganga project. There is no water in Krishna river upstream.

Karnataka and Andhra Pradesh are already fighting for the water that flows in river Krishna. There is no water in river Krishna to be given to Chennai. This is a serious problem.

The National Calamity Relief Fund should be Rs.1,000 crore per annum. It should not be a small amount like Rs.100 crore. If that much of money could be kept in the Fund, annually relief could be given as and when there are calamities. The National Calamity Relief Fund should also be a flexible fund so that whatever the Prime Minister is getting by way of Prime Minister’s Relief Fund could also be used. Otherwise, it is difficult for the States to overcome this problem everytime..

There are a lot of diseases caused by the drinking water that is available for human consumption. In Andhra Pradesh, there is already diarrhoea because of the sort of water that is being drunk. I would like you to take this into consideration. The Andhra Pradesh Government has implemented a long-range watershed policy for harnessing of rain water. This could be implemented in all the States so that the wastelands could also be cultivated.

The Employment Assurance Schemes have to be covered in areas where there is drought. There is an example. Jaisalmer in Rajasthan and Anantapur district in Andhra Pradesh are having the same lowest level of rainfall, about 500 millimetres annually. So, Anantapur is today really crying for water. The water in drought areas is carrying excess fluorides, arsenal and salinity. I would request the neighbouring States to come to the rescue of the affected States with supplies of food grain, and Fodder.

This is a serious situation. That is why I thought of bringing it to the notice of the hon. Minister to help Andhra Pradesh with enough money. I hope, they would release whatever money they have asked for in thisi hour of crisis..

SHRI E. AHAMED (MANJERI): Mr. Chairman, Sir, I stand here to express my deep-seated sentiments and concerns towards the people of the different States of the country, particularly the States of Gujarat, Rajasthan, Andhra Pradesh, etc., on the devastating droughts and the people’s sufferings in these States.

I also associate myself with the sentiments expressed by my hon. colleagues on the devastating droughts and the people’s sufferings in many of the States.

Today, the hon. Prime Minister has appealed to the people to help get rid of or wriggle out of the present situation. The people of the country, especially the drought-prone areas have been extended all support all over the country. There is sympathy for the people belonging to those areas.

I would like to ask how the performance of the Government is. The hon. Prime Minister should himself see whether the Ninth Plan allocations for rural development have been utilised properly. It is the duty of the Government and also of the Prime Minister to examine the performance of the desert development programme, the performance of the drought-prone area development programme, the performance of the accelerated water supply scheme and also the integrated wasteland development programme. I would say without any hesitation that the performance of these programmes in 1999-2000 was the worst in the last decade. It will be a testimony if the hon. Minister will read the Report laid on the Table of the House by the Standing Committee on Rural and Urban Development today. They have come out with a graphic picture of the failures of this Government. I would like to take this particular opportunity to tell the Government that the people’s co-operation will always be there.

Why does the Government wake up only when there is drought in this country? There was a drought-proofing programme in this country. I would urge the Minister to examine whether this programme has been taken care of by the administration. The administration may be sleeping and the administration may be lethargic in its approach to this whole problem. Only when there is drought, they go helter-skelter. How many animals have died due to drought, especially in Gujarat? When there is agitation against cow slaughter on the one side, we are losing the very cows on the other. How do we stand all these things? These things have to be taken care of by the Government.

My dear friend and colleague, Shri Pandiyan has mentioned that water supply is very acute in every State. Even in a State like Kerala where we have abundant water available, there are areas where there is not even a drop of water. We have the adage ‘Water water everywhere, not a drop to drink’. Why is it so? It is because there are problems.

I myself have been associated with the Rural Development Board as its Chairman for about five to six years in Kerala. We are implementing rural water supply schemes with the financial assistance of LIC, which has thousands of crores of rupees of public money with them. It has given money at one time, for implementation of water supply schemes for a State like Kerala. Why can the Minister not examine the possibility of making available such institutional finances for implementation of water supply schemes thoughout the country? If we do this, our rural economy would be developed. We have to implement these schemes scrupulously. We have to take care of the minutest details for implementation in rural areas in such a devastating situation, which will be of great help for the people.

Therefore, the Government must have a long-term policy as well as a short-term policy. The long term policy would at least be taken care of by implementing desert development programme, drought-prone area development programme, accelerated water supply programme, integrated wasteland development programme, etc. These programmes have been utter failures. Everybody is here to cooperate with the Government. If the Government is sincere at heart to do something to people, it can really go into these things and make available sufficient institutional finance in this country to tide over such a situation that we are facing.

श्री राजू राणा (भावनगर) : सभापति महोदय, सदन में सूखे की परिस्थिति पर जिन माननीय सांसद भाईयों तथा बहिनों ने अपने विचार प्रकट किये हैं, मैं आपके माध्यम से उन सभी का आभार प्रकट करता हूं। राजस्थान, गुजरात तथा आंध्रा् प्रदेश में जो अकाल की परिस्थिति उपस्थित हुई है, उसमें गुजरात में पिछले सौ वर्ष में ऐसा अकाल कभी नहीं आया है। यह ऐसा अभूतपूर्व अकाल है जिसे रेयरेस्ट ऑफ दी रेयर कहा गया है, ऐसा अकाल वहां इस साल पड़ा है। वर्षा कही हुई हैं, लेकिन जहां हुई हैं, कम हुई है। मोटे तौर पर देखा जाए तो मानसून फेल था। गुजरात के २५ जिलों में से १७ जिले अकाल की परिस्थिति से जूझ रहे हैं।

सभापति महोदय, मैं बताना चाहता हूं कि १८ हजार गांवों में से करीब ९२०० गांव इस समय भीषण सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं। हमारे यहां १७४ जलाशय हैं उनकी टोटल पानी की क्षमता जो है उनमें उसका २५ प्रतिशत से कम पानी है और वह भी दिन प्रति दिन तेज धूप के कारण सूखता चला जा रहा है और पानी की मात्रा घटती चली जा रही है। उनमें से भी ४४ तालाब ऐसे हैं जिनमें बिलकुल पानी नहीं है। ये सभी परिस्थितियां विशेषकर गुजरात के सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात का जो विस्तार है वहां देखने को मिलती हैं। ये क्षेत्र सूखे की चपेट में सबसे ज्यादा हैं, लेकिन उसका असर गुजरात की पूरी जनता पर पड़ रहा है। यह खाली सौराष्ट्र की बात नहीं है और खाली कच्छ और उत्तर गुजरात की भी बात नहीं है, जो परिस्थितियां वहां विद्यमान हैं उनसे वहां की ही नहीं बल्कि संपूर्ण गुजरात की जनता चिन्तित है और उनके ऊपर सूखे का पूरा असर पड़ रहा है।

सभापति महोदय, इन परिस्थितियों को द्ृष्टिगत रखते हुए नवंबर मास में मास्टर प्लान गवर्नमेंट ने तैयार किया। जनवरी में केन्द्र की टीम आई। उस समय ९२२ करोड़ रुपए का प्लान तैयार किया गया। उसके मुताबिक ड्राउट इफैक्टेड एरियाज को उन्हें दिखाने के लिए ले गए। वहां जाकर स्वयं उन्होंने देखा कम बारिश और बारिश फेल होने के कारण जो खेती है वह बहुत कम हुई है और चोखा, बाजरा और ज्वार के उत्पादन में कमी दिखाई दी। हमारे यहां की खेती ७७ प्रतिशत बारिश पर निर्भर है। वहां सिंचित भूमि बहुत कम है। दक्षिण गुजरात को छोड़ दीजिए। शेष क्षेत्र का बहुत बड़ा भाग खेती के लिए वर्षा पर निर्भर करता है। जो मास्टर प्लान ९२२ करोड़ रुपए का बना था उसके हिसाब से केन्द्रीय टीम से भी चर्चा हुई और विचार-विमर्श हुआ। जनवरी के बाद जो कुछ भी परिस्थिति बदली है उसके अनुसार उसमें वृद्धि हुई है और उसके अनुसार ११०० करोड़ रुपए एस्टीमेटेड कास्ट आती है। यह जो पूरे अकाल की परिस्थिति है उसमें तीन महत्वपूर्ण एरियाज हैं जिनमें पीने के पानी की व्यवस्था, दूसरी जो घास की उपलब्धता है और तीसरी कैटल कैम्प की बात है। लगभग ४०० एन.जी.ओ. और गवर्नमेंट के कैटल कैम्पों में पशु धन को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।

सभापति महोदय, मेरे मित्र प्रवीण जी ने जो उल्लेख किया था, वैसे हादसे भी होते हैं और हुए हैं। मैं कभी यह नहीं कहता कि सभी परिस्थितियों में सभी मुश्किलों को हल करना सभी के लिए संभव है या सभी उन्हें हल करने में सक्षम हैं। मैं ऐसा कभी नहीं कहता और न मानता हूं, लेकिन फिर भी कुल मिलाकर मुश्किल को हल करने की कोशिश अवश्य की जा सकती है और उसके मुताबिक मई जून तक का जो हमारा एस्टीमेट घास की जरूरत का है वह वर्तमान से दुगनी होने की आशा है। इसके अतरिक्त हम लोग महाराष्ट्र, पंजाब और हरिया आदि सभी प्रदेशों से ट्रेन से और ट्रकों से घास लाने की व्यवस्था कर रहे हैं। जहां तक पीने के पानी का संबंध है, जहां बारिश हुई ही नहीं, जो वाटर रिसोर्सेस अवेलेबल हैं, उनके बारे में भी मैंने बताया कि कितने तालाबों में कितने परसेंट पानी बचा है, नदी सूख गई। मैं सौराष्ट्र क्षेत्र से आता हूं। सौराष्ट्र क्षेत्र में तो बहती हुई नदी हमने देखी ही नहीं है। जब कभी हम दक्षिण गुजरात में जाते हैं और बहती नदी देखते हैं, तो वहां १५-२० मिनट रुक जाते हैं क्योंकि हमारे क्षेत्र में तो बहती नदी साक्षात देखने को मिलती नहीं है, सिर्फ चित्र में ही देखने को मिलती है। कच्छ और सौराष्ट्र में तो बहती नदी देखने को मिलती नहीं है।

जहां तक पीने के पानी का संबंध है, तो पीने के पानी की स्थिति गांव में बहुत बदतर है क्योंकि रिसोर्सिस कम हैं। जहां पीने के पानी का प्रबंध करने की आवश्यकता रही है, वहां सब जगह टैंकरों से पीने का पानी, मैं इरीगेशन की बात नहीं कर रहा हूं, पीने का पानी पहुंचाना, मुहैया करने की व्यवस्था कर रहे हैं। लेकिन उसमें भी जहां कहीं कुछ कमी है, उसको भी पूरा करने का प्रयत्न जो रिसोर्सिस उपलब्ध हैं, उसमें से करें। जो बड़ी सिटी हैं, उनमें पाइपलान द्वारा पीने के पानी की व्यवस्था की है।

मैं एक ही उदाहरण दूंगा कि हमारे अहमदाबाद में रास्का वीयर प्रोजैक्ट टाइम से पूरा हुआ है। जामनगर, सुरेन्द्रनगर, राजकोट, भावनगर आदि सब जगह पीने के पानी की व्यवस्था हम करने जा रहे हैं। उसमें भी आगे बढ़ रहे हैं। पूरी परिस्थितियों को देखते हुए क्योंकि दो साल में पांचवीं आफत है जिसका गुजरात सामना कर रहा है। दो फ्लड आये, दो साइक्लोन आये और यह अकाल आया। अभी तीन-चार दिन पहले पेपर में एक न्यूज पढ़ कर दिल की धड़कन रुक गई थी। पुणे के एक अभ्यासविद् ने कहा कि अगले महीने ६ से १२ मई के बीच में कच्छ में साइक्लोन आने की सम्भावना है। ऐसा उन्होंने पेपर मे दिया है। मुझे मालूम नहीं कि वह सच है या गलत। उन्होंने कह दिया और वह पेपर में भी आया है। यह पांचवी आफत है जिससे गुजरात सरकार और गुजरात की जनता दोनों जूझ रही हैं। मेरी आपके माध्यम से गवर्नमैंट ऑफ इंडिया से विनती है कि इन परिस्थितियों में कई करोड़ रुपये का खर्च हुआ है। गुजरात गवर्नमैंट ने वैसे तो २०० करोड़ रुपये से ज्यादा रुपये इस बजट में अकाल की स्थिति से जूझने के लिए रखे हैं, फिर भी यह सोर्स कम है। मैं उनसे रिक्वैस्ट करना चाहता हूं, गुजरात की जनता की ओर से रिक्वैस्ट करना चाहता हूं कि जितनी जल्दी हो सके, हमारी ११०० करोड़ रुपये की जो आवश्यकता है, वह पूरा करें। धन्यवाद।

श्री राम सागर (बाराबंकी) : सभापति महोदय, राजस्थान, गुजरात, आंध्रा प्रदेश पश्चिम बंगाल और देश के वभिन्न भागों में जो सूखे की भयंकर स्थिति है, जिस पर सदन में चर्चा हो रही है, मैं भी उसके बारे में कुछ कहने के लिए, सुझाव देने के लिए आपकी मेहरबानी से खड़ा हुआ हूं।

आज सूखे की जो भयंकर स्थिति है, वह आज से पहले जितने भी सूखे पड़े हैं, उनसे बिल्कुल भिन्न है। अभी गर्मी का प्रारम्भिक समय है। जो भीषण गर्मी मई, जून, जुलाई में पड़ती है, वह अभी आनी है। सूखे की स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि आज देश के कई सूबों के लोग पानी तथा चारे के अभाव में वहां से पलायन कर रहे हैं। वहां पर इतना अकाल पड़ा है कि लोगों का जी पाना मुश्किल है। अखबारों के माध्यम से, समाचार के माध्यम से राज्य सरकारों तथा भारत सरकार का ध्यान दिलाया गया है। सूबों की सरकारें भी बार-बार मांग कर रही हैं और अंत में आज सदन में चर्चा भी हो रही है और सारा सदन एक राय है और सरकार के ऊपर दबाव भी डाल रहा है कि राहत प्रदान करे। प्रधान मंत्री जी का बयान अब तक इतना आया है कि मुक्त कंठ से उन्होंने संवेदना व्यक्त की है और कहा है कि जनता सहायता करे। यहां चर्चा हो रही है, उसको सरकार सुन रही है या नहीं सुन रही है, यह तो बाद में पता चलेगा। जहां-जहां भयंकर सूखा है वहां की जनता सुन रही है, जो सूबे आपसे मांग कर रहे हैं, वे भी आपसे जानना चाहते हैं कि आपकी राहत की मंशा क्या है? हम तो सरकार से उम्मीद करते है कि एक राय व्यक्त करके जो संवंदेना व्यक्त की है, मांग की गई है, दबाव डाला गया है, उसका कोई नतीजा सरकार की तरफ से निकलेगा।

सरकार यह घोषणा करेगी कि राहत कार्य में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। पानी, अनाज और चारे से मनुष्य और जानवरों को मरने नहीं दिया जाएगा। सूखे की जो भयंकर स्थिति है, वह उन पांच सूबों के अतरिक्त दूसरे सूबों की तरफ भी बढ़ रही है। मैं अपने बाराबंकी जिले की बात बता रहा हूं कि वहां घाघरा, गोमती, रारी, कल्याणी ऐसी नदियां हैं जहां उनके किनारों का जलस्तर बहुत नीचे चला गया है और तमाम हैंडपम्प्स खराब हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के मंत्री बैठे हैं। जलाशयों में पानी कम हो गया है। यह ऐसी मुसीबत है जिससे लोगों को बचाया जा सकता है। इसके लिए हमेशा स्थायी योजना की चर्चा होती है लेकिन स्थायी योजना कभी नहीं बनाई गई। इसलिए इस बारे में सरकार की तरफ से स्थायी योजना बनाई जानी चाहिए ताकि आगे आने वाले समय में इस तरह की मुसीबत से लोगों को बचाया जा सके। जहां भयंकर अकाल है, चाहे राजस्थान, गुजरात हो या दूसरे राज्य हों, वहां लोग मर रहे हैं। मैं आपके माध्यम से सरकार से मांग करता हूं कि वहां पानी का इंतजाम हो और वसूलियां बंद होंनी चाहिए। जो लोग भुखमरी से मर रहे हैं, उनकी मदद करनी चाहिए। जिन भागों में स्थिति खराब होने वाली है, उनके लिए भी कोई योजना बनानी चाहिए।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं एक बार फिर सरकार से मांग करता हूं कि जो लोग इस परेशानी से जूझ रहे हैं, उनकी मदद में कोई कोताही न बरतें। हाउस में मूकदर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए और अच्छा मैसेज जाना चाहिए ताकि लोगों को भूखे-प्यासे मरने न दिया जाए।

डा. जसवन्त सिंह यादव (अल्वर) : सभापति महोदय, मैं सबसे पहले माननीय प्रधानमंत्री जी और भारत सरकार को धन्यवाद देना चाहूंगा कि अकाल के लिए प्रधानमंत्री जी ने देशवासियों की मदद की है, अकालग्रस्त क्षेत्रों की मदद करने के लिए अपील की है। मेरे से पूर्व वक्ताओं ने भी राजस्थान, गुजरात और सभी क्षेत्रों के सूखाग्रस्त क्षेत्रों और अकाल के बारे में चर्चा की। इसमें कोई शक नहीं कि राजस्थन के अंदर भयंकर अकाल की स्थिति है। लेकिन यह कोई आज नहीं हुआ है। राजस्थान सरकार इस बात को खूब जानती थी, जब पिछला मानसून बीत गया, राजस्थान में वर्षा नहीं हुई। राजस्थान सरकार ने इतनी संवेदनहीनता दिखाई कि लोगों में किसी तरह आतंक फैले और केवल भारत सरकार पर इसे मढ़ दिया जाए। गरदावरी से जो क्षेत्र चिन्हित करने थे, वह काम मानसून के बाद अक्टूबर में पूरा हो जाना चाहिए था। लेकिन राजस्थान सरकार ने उस काम को नहीं किया। मैं भी उस समय असैम्बली में था। हमने राजस्थान सरकार से अपील की थी कि यह काम जल्दी करवाकर अकाल के कार्य शुरु करवाए जाएं। राजस्थान सरकार ने सदन में घोषणा भी की थी कि नवम्बर से अकाल के कार्य शुरु हो जाएंगे। लेकिन उन्होंने गांवों को चिन्हित नहीं किया और केवल अखबारों में प्रचारित करते रहे। राजस्थान सरकार को पता भी था, केन्द्र सरकार के कैलेमिटी रिलीफ फंड से सभी राज्यों को निर्धारित राशि जाती है।

वह राजस्थान के पास भी गया था, राजस्थान सरकार के पास पैसा था। राजस्थान सरकार अगर चिन्तित होती, संवेदनशील होती तो उस काम को नवम्बर में ही शुरू कर देती, लेकिन राजस्थान सरकार ने नेशनल केलेमिटी फंड के लालच में लोगों को मरने दिया, स्थिति को बिगड़ने दिया। केवल इस लालच में रही कि केन्द्र सरकार से पैसा मिले। उनके पास जो पैसा था, उसका सदुपयोग नहीं किया और लालच के अन्दर ही लोगों की परवाह नहीं की। आज दुनिया भर की बातें मेरे पूर्व वक्तां ने, जो कांग्रेस के सदस्य बैठे हैं, उन्होंने कहीं, मैं बहुत छोटे उदाहरण दे रहा हूं। अकाल की बात तो संसद ने की है, अगर राजस्थान सरकार संवेदनशील होती, अकाल पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन हमारे मुख्य मंत्री राजस्थान में पहली बार बने हैं। उससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि जो बी.पी.एल. के लोग हैं, जिनको वृद्धावस्था पेंशन मिलती है, जब हमारे माननीय सदस्य मान रहे हैं कि वहां पर अकाल है तो राजनीति से ऊपर उठकर नेशनल केलेमिटी रिलीफ फंड के लालच को छोड़कर वहां वृद्धावस्था पेंशन में केन्द्र सरकार का पैसा पहुंच गया, बी.पी.एल. के लोग, वृद्ध लोग, जिनकी कोई सहायता करने को तैयार नहीं है, वे भूखे बैठे हुए हैं। उनको छ: महीने से, साल भर से वृद्धावस्था पैंशन नहीं दी गई, जबकि केन्द्र सरकार का पैसा वहां पर बहुत पहले पहुंच गया है।

इसी तरह पीने के पानी के लिए केन्द्र सरकार ने १२० करोड़ रुपया १९९९-२००० में पहुंचा। अभी एक महीना भी नहीं हुआ है, ८० करोड़ रुपया अब पहुंचा। आज अगर राजस्थान की स्थिति देखी जाये तो सरकार को पता था कि वर्षा कम हुई है तो हैण्डपम्प जो लगने थे, उनमें से ७५ परसेंट हैण्डपम्प अभी तक नहीं लगे। आज अगर वे हैण्डपम्प लग जाते तो वहां पानी का हाहाकार नहीं मचता। इसी तरह जिन गांवों के अन्दर पानी की और योजनाएं थीं, वे सब यों की यों पड़ी हुई हैं। राजस्थान सरकार कि इरादा सिर्फ यह है कि किसी भी तरह जनता को वहां आतंकित किया जाये। पिंक सिटी आपरेशन अभी लोगों को उजाड़ने के लिए शुरू किया है। राजस्थान सरकार को उसकी जो जल्दी थी, लेकिन जो हैण्डपम्प लगने थे, नल योजनाएं चालू करनी थीं, उनके बारे में सोचने की राजस्थान सरकार के पास फुरसत नहीं है। सबसे बड़ी बात…( व्यवधान)

श्री राम रघुनाथ चौधरी (नागौर) : आप मदद मांग रहे हैं या राजस्थान सरकार को कोस रहे हैं ?

डॉ. जसवंतसिंह यादव : जो सच्चाई है, जिस हालत को बदतर किया है, कम से कम आप लोगों को भी यह बात कहनी चाहिए कि रिलीफ का क्या करेंगे। जो पैसा केन्द्र सरकार से जायेगा, वह लोगों के काम तो आना नहीं।

श्री राम रघुनाथ चौधरी : जोधपुर में तो आपकी कांग्रेस सरकार ने नहर ला दी, इसलिए आपके यहां तो शान्ति है।

डॉ. जसवंतसिंह यादव : जो पैसा केन्द्र सरकार से सहायता के लिए जायेगा भी, जिसकी ये मांग कर रहे हैं, वह पैसा जनता के काम तो आना नहीं, क्योंकि राजस्थान सरकार को केवल अखबारों में प्रचारित करने के अलावा काम करने की फुरसत ही नहीं है। अगर राजस्थान सरकार को काम करने की फुरसत हो तो काम करके दिखाये। अभी वहां की कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष माननीय सदस्या गरिजा व्यास जी ने चार दिन पहले ही कहा कि राजस्थान सरकार संवेदनहीन है, संवेदनशील नहीं है, वहां के अधिकारी काम नहीं कर रहे हैं। आज राजस्थान सरकार कांग्रेस की सरकार है, राजस्थान में जो मुख्य मंत्री बैठे हैं, वे उसके जिम्मेदार हैं। जब बिहार के अन्दर गवर्नर किसी और को मुख्य मंत्री बनाता है तो ये कहते हैं कि केन्द्र सरकार उसके लिए इंटरफियर करती है। लेकिन वहां तो स्टेट गवर्नमेंट की जिम्मेदारी आ जाती है और जब रिलीफ के लिए सरकार काम नहीं कर रही, जहां पैसा पड़ा हुआ है, ३०० करोड़ रुपया पहला पड़ा हुआ था और सरकार वहां काम नहीं कर रही है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है। जो सरकार चलाता है, पहली जिम्मेदारी उसकी होती है, जो भी मुख्य मंत्री होता है, जिसकी सरकार होती है।…( व्यवधान)

माननीय सदस्य, आप पहले मेरी बात तो सुन लीजिए। …( व्यवधान)

सरदार बूटा सिंह (जालौर) : यह बी.जे.पी. की राजनीति है।…( व्यवधान)

श्री राम रघुनाथ चौधरी : ये देश और सदन को गुमराह कर रहे हैं।

डॉ. जसवंतसिंह यादव : आज राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है।

वह अपना पल्लू झाड़ ले और अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाए यह कहकर कि भारत सरकार से पैसा नहीं मिल रहा, मैं बताना चाहता हूं कि राज्य सरकार ने रोड टैक्स बढ़ा दिया, व्यावसायिक कर लगा दिया, दुनिया भर के टैक्स इन्होंने चार्ज किए हैं, फिर भी कहते हैं कि पैसा नहीं है। ११,००० करोड़ रुपये टैक्स के रूप में आए हैं। वहां के मुख्य मंत्री जी इसे अपनी जेब में रखकर बैठे हुए हैं…( व्यवधान) जब भैरोंसिंह जी शेखावत मुख्य मंत्री थे तो उनकी सरकार को जो पैसा मिला था, वह उनकी कुशलता के कारण मिला था और उन्होंने एक-एक पैसे का हिसाब पेश किया था तथा अपनी दक्षता का परिचय दिया था। आपके मुख्य मंत्री सिवाय अखबारों में छाए रहने के दूसरा काम नहीं करते। बजट सत्र समाप्त होने के बाद वे गांवों का दौरा करने गए। २१ तारीख को उन्होंने अपने मंत्रिमंडल को निर्देश दिया कि आप सब लोग अकाल क्षेत्रों में जाओ। इससे पहले क्या वहां के मुख्य मंत्री जी और अन्य मंत्री सो रहे थे…( व्यवधान)

सरदार बूटा सिंह : गुजरात के मुख्य मंत्री अमेरिका में बैठे हुए हैं, यहां लोग मर रहे हैं, क्या वह नजर नहीं आ रहा।

डा. जसवंतसिंह यादव : सभापति महोदय, मैं अपने माननीय सदस्यों को राजनीति से ऊपर उठकर इस विभीषिका का सामना करने की सलाह देना चाहता हूं। राजस्थान सरकार के पास पैसा पड़ा हुआ है। उसने इसमें खर्च न करके वहां की जनता को बर्बाद कर दिया है। यह ठीक है कि केन्द्र सरकार राज्य सरकार की मदद करे, लेकिन मेरा आपसे निवेदन है कि ऐसे संवेदनहीन मुख्य मंत्री को दुरुस्त करें, बल्कि अच्छा हो कि इन्हें हटाकर कोई ढंग का मुख्य मंत्री लाएं, जिससे प्रदेश भी बचे और अकाल से जूझ रहे लोगों को राहत मिले।

श्री राम रघुनाथ चौधरी (नागौर) : सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। राजस्थान की जनता इस समय दुर्भिक्ष का सामना करने के लिए हिम्मत जुटा रही है। इस अकाल को हम महाकाल कहें तो अच्छा रहेगा, क्योंकि वहां न तो पीने का पानी है, न मवेशियों के लिए चारा है और न मजदूरों को मजदूरी मिल रही है।

अभी अलवर से आने वाले माननीय सदस्य ने जो बातें कहीं, वे मेरे साथ कांग्रेस में रह चुके हैं। इसलिए मैं सारी बातें जानता हूं। अलवर में पानी की किल्लत नहीं है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान में या उन २६ जिलों में जहां अकाल है, देखें तो हमें आज भी आंसू आते हैं। जहां पीने का पानी न हो।

डा. जसवंतसिंह यादव : कितने हैंडपम्प लगाए जा रहे हैं। जो मंजूर किए हैं, उनमें से कितने लग गए और और जो खराब हैं वे २०-२५ रुपए के कारण वैसे ही पड़े हुए हैं।

श्री राम रघुनाथ चौधरी : राजस्थान में अकाल की स्थिति बहुत खराब है। वहां आज भी ऐसे गांव हैं जहां पीने का पानी मुहैया नहीं होता और लोग १०-१२ किलोमीटर दूर तक लोगों पानी लाना पड़ता है। पिछले साल नवम्बर में जब वहां की विधान सभा का सत्र चला था तो वहां अकाल पर चर्चा हुई थी। सब लोगों ने चाहे कांग्रेस के हों या बी.जे.पी. के हों, मिल-बैठकर कहा था कि राजस्थान की स्थिति खराब है इसलिए पानी और चारे के लिए अभी से ध्यान देना चाहिए। तब से लेकर अब तक निरन्तर राज्य सरकार भारत सरकार को लिखती रही है कि राजस्थान सरकार की माली हालत बहुत कमजोर है, हमारे यहां बरसात नहीं हुई है। कई गांवों में तो एक बूंद पानी तक नहीं पड़ा। किसानों की हालत दयनीय हो गई है। पानी और चारे की कमी का अंदेशा हो रहा है, ये सब बातें भारत सरकार को लिखीं, लेकिन उसने जितना ध्यान देना चाहिए था, उतना नहीं दिया। २७ मार्च को प्रधान मंत्री महोदय ने घोषणा की।

19.00 hrs जब राजस्थान सरकार ने ११४३ करोड़ रुपया मांगा तो १०३ करोड़ रुपये की मदद भेजी। प्रश्न इस बात का नहीं है कि राजस्थान सरकार कितना काम कर रही है। प्रश्न इस बात का नहीं है कि सरकार कांग्रेस की है या बी.जे.पी. की है। प्रश्न इस बात का है राजस्थान में जो अकाल पड़ा है, यह जनता के एक बहुत बड़े दुख की घड़ी है। भारत सरकार उनकी मदद करके उनको जिंदा रखने का प्रयत्न कर सकती है। आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि बाड़मेर, जैसलमेर और नागौर के इलाके में मवेशी किस कदर मर रहे हैं। रास्ते में जंगलों में, खेतों में मवेशियों की लाशें पड़ी हैं। वे इसलिए मर रहे हैं क्योंकि वहां चारा नहीं है, पानी नहीं है। भारत सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि इस तरह के अकाल को एक दुखदायी घटना मानकर समय रहते इसका प्रबन्ध करना चाहिए था। मेरा निवेदन है कि हमं इस मामले में चाहे बी.जे.पी. के हों या कांग्रेस के हों, हम सबको मिलकर सामना करना पड़ेगा। मैं यह कहना चाहता हं कि बी.जे.पी,. वाले हमें कोस रहे हैं, लेकिन हम उन्हें कोसना नहीं चाहते। हम तो भारत सरकार से निवेदन कर रहे हैं, राजस्थान सरकार निवेदन कर रही है औऱ हमें मदद मिलनी चाहिए। जैसे आपने गुजरात की मदद की है और वहां एक अच्छी स्थिति आई है, सरकार ने बहुत मदद की है। इसी तरह से राजस्थान को भी मदद मिलनी चाहिए। राजस्थान की धरती सोना उगलने वाली धरती है। डा. साहब जानते हैं झुनझुनू, नागौर आदि स्थानों की मिट्टी ऐसी है कि वहां पर पानी उपलब्ध हो तो आधे हिन्दुस्तान को हम भोजन दे सकते हैं लेकन वहां पानी नहीं है। जब गंगा नगर में इन्द्रा कैनाल आई तो आपने देखा कि आज गंगा नगर पंजाब से मुकाबला करता है औऱ आधे हिन्दुस्तान को अनाज पहुंचाता है। यहीं पानी पहुंचते-पहुंचते जैसलमेर गया औऱ आज वही हाल जैसलमेर में है। राजस्थान के लिए गंगा का पानी औऱ इन्द्रा नहर का पानी लेने के लिए योजनाएं बनी थीं और बीकानेर में आकर योजनाएं ठप्प हो गईं। जब ब्रहमपुत्र में बाढ़ आती है तो तबाही होती है। अगर इस पानी को डायवर्ट करके योजनाएं बनाकर, पैकेज बनाकर इसका उपयोग किया जाये तो पीने के पानी की समस्या के साथ और भी कई समस्याएं मिट जाएंगी। आज प्रधान मंत्री ने ढ़ाई साल पहले यह वचन दिया कि पीने के पानी की कठिनाई नहीं होगी। पीने के पानी की जो किल्लत आ रही है, वह मिट जानी चाहिए थी। जो भी व्यवस्था की जा सकती है, वह इस थोड़े समय में की जानी चाहिए और आगे आने वाले समय में यह देखा जाना चाहिए कि पूरे हिन्दुस्तान में चाहे गुजरात हो या बिहार हो, सभी को पोने का पानी मिलना चाहिए। राजस्थान में पहले तालाब होते थे, छोटे-छोटे बांध बनाये गये थे। बरसात का पानी इकट्ठा होता था। लेकिन पिछले सालों में इस तरह की सोच रही कि तालाबों का पानी पीने से नाल रोग हो जाता है, इसलिए जगह-जगह कुएं खुदवाये गये जिससे कुओं का पानी नीचे चला गया। पिछले साल में बरसात भी कम हुई औऱ तालाबों का पानी पीना बंद कर दिया गया। शहरों औऱ कस्बों में जहां तालाब थे, वहां कॉलोनियां बस गईं। आज हम सोचते हैं कि तालाब होते तो यह समस्या मिट जाती। आज पर्यटकों को हम बावड़ियां दिखाते हैं कि इसका यह नाम है, यह कितनी सुंदर है और इसका पानी काम आता था। हमें उन तालाबों को, बावड़ियों को उनमें पैसा लगाकर खोदना पड़ेगा। राजस्थान सरकार ने पिछले साल १३०० करोड़ रुपये की योजना भेजी थी। मंत्री जी जयपुर में आए थे, वहां उन्होंने मीटिंग की है। आज ही टी.वी. में हमने देखा कि मंत्री महोदय श्री सी.पी.ठाकुर बता रहे थे।

राजस्थान की ओर से हम बता दें, पानी के लिए मना नहीं किया, अगर मांगते तो पानी जरूर मुहैया कराते। मैं कल ही टीवी पर देख रहा था और हम आपसे निवेदन कर रहे हैं कि राजस्थान की सरकार निरन्तर नवम्बर से भारत सरकार से पानी की समस्या के बारे इंगित कर रही थी। उन्होंने कहा था कि आगे आने वाले समय में राजस्थान में पानी की समस्या भीषण होने वाली है। अगर पानी की समस्या मिट जाती है, तो चारे की समस्या अपने आप मिट जाएगी। राजस्थान की डेयरी से दिल्लीवासियों को पीने के लिए दूध मिलता है। अगर अजमेर और बीकानेर के मवेशियों की यह हालत होगी, तो कैसे दूध मिल सकता है। आंखों में आंसू उन जानवरों को देखते-देखते सूख जाते हैं। यह समय हमारे आपसी विवाद का नहीं है, समय इस बात का है कि आदरणीय प्रधान मंत्रीजी और संबंधित मंत्री राजस्थान में पानी मुहैया करायें, मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी मुहैया करायें।

महोदय, बाते तो बहुत हैं, लेकिन समय कम है। माननीय बूटा सिंह जी ने अपने प्रयास से उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि राज्यों से चारा का प्रबन्ध अपने क्षेत्र के लिए किया, लेकिन उससे पेट नहीं भरता है और न सब बूटा सिंह जी हो सकते हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं, एक गांय को पालने के लिए एक दिन में पचास रुपए की आवश्यकता होती है, यानि एक महीने में १५०० रुपए की जरूरत, लेकिन उस गाय की उतनी कीमत भी नहीं है। इसलिए आवश्यकता है कि सरकार उनके लिए अधिक से अधिक मदद करे।

इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी (कोकराझार) : महोदय, हिन्दुस्तान के कुछ प्रान्त सूखे से परेशान है और आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मैं बोडोलैंड के हिस्से से आया हुआ जनप्रतनधि हूं। पिछले साल भी और इस साल भी इस तस्वीर को देखकर मैं हैरान हो गया। हिन्दुस्तान को आजाद हुए, आज ५२ साल हो गए हैं और इन सालों में सेंट्रल इंडिया के लोगों को मौका मिला, लेकिन ट्राइबल लोगों को राज करने का मौका नहीं मिला। ५२ सालों की आजादी के बाद देश में विराजमान पानी की समस्या, सूखे की समस्या और अकाल की समस्या को देखकर हैरान हो रहा हूं। हिन्दुस्तान के प्रान्तों में, खास कर राजस्थान, गुजरात और आन्ध्रा प्रदेश में जिस ढंग से सूखा पड़ा है और लोगों को परेशानियां हो रही हैं, उसके लिए मैं संवेदन प्रकट करता हूं।

महोदय, हिन्दुस्तान के जिन-जिन प्रान्तों में ऐसी गम्भीर स्थिति है, उन प्रान्तों में केन्द्रीय सरकार द्वारा मदद की जानी चाहिए। हम देख रहे हैं कि इधर और उधर बैठने वाले लोग एक दूसरे के खिलाफ बात करते हैं, लेकिन उन्हें देश की समस्याओं की ओर पहले ध्यान देना चाहिए।

हमारे बोडो लैंड ऐरिया का भी यही प्रोब्लम है। Bodoland region is said to be the Land of rivers and water. वह इलाका नदियों से भरा हुआ है लेकिन फिर भी वहां के लोगों के लिए पीने का पानी नहीं है और खेती के लिए पानी के अभाव है,। कोकराझार से लेकर बाडालैंड और उत्तरांचल के लोगों को भूटान से, फॉरेन कंट्री से रुपए देकर पानी खरीदना पड़ता है। यह भारत के लिये बहुत शर्मिन्दगी का बात है।

Is India a free country? The people of Bodoland have been clamouring for drinking water. They have to purchase water from the Kingdom of Bhutan. It is shameful on the part of the Government of India. I strongly urge upon the Government of India to look into all these burning problems with positivity.

I would like to appeal to the Government of India to create a separate State of Bodoland so that we could get justice after formation of the Bodoland State.

हमारे यहां जो नदियां हैं उनके लिए भारत सरकार ने कुछ नहीं किया है। वहां जिस ढंग से काम होना चाहिए, उस ढंग से नहीं हुआ है।

I would again like to appeal to the Government of India to extend a helping hand to the suffering people of Andhra Pradesh, Gujarat, Rajasthan and so on and so forth. With these words, I conclude.

श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव) : सभापति महोदय, गुजरात, राजस्थान, आंध्राा और बंगाल, इसमें उड़ीसा भी शामिल है, इनके ऊपर आपत्ति आई है, लेकिन इस आपत्ति में भी अगर सरकार की तरफ से ध्यान दिया जाएगा तो यह आपत्ति दूर हो सकती है। मैं एक उदाहरण देता हूं, १९७२ में महाराष्ट्र में बहुत बड़ा अकाल पड़ा था। माननीय बूटा सिंह जी को मालूम है। उस समय वसंत राव नाइक जी मुख्य मंत्री थे, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से काम किया। महाराष्ट्र सरकार और केन्द्र सरकार से भी सहयोग मिला। यह मानव निर्मित है और मानव निर्मित से यह सरकार निर्मित है। मैं प्रचलित सरकार के बारे में अभी नहीं बोलता हूं। आज तो वाजपेयी साहब ने कमाल कर दिया, इसे जरा संभालो। सरकार खुद क्या करती है, इस बारे में बताएं, कितना करती है, यह पता नहीं। आपत्ति में पंथ प्रधान का काम लोगों को हिम्मत देना होता है, यह इन्होंने नहीं किया। मुझे बहुत दुख होता है कि इन्हें पानी के बारे में कोई चिन्ता नहीं है। हमारे नासिक जिले में एक तालाब है। गिरना डेम है, वहां बहुत पानी है। इसका उपयोग जलगांव में केला पैदा करने में किया गया और यह बहुत ज्यादा पैदा हो गया। नारखेड़े बंधु ने सहकारी सोसायटी निकाली और उन्होंने केले के चिप्स बनाए तथा आस्ट्रेलिया को भेज दिए। उसके बाद नारखेड़े और उनके बंधुओं पर खून-खराबे की नौबत आई और उन्हें सजा हो गई। नेहरू सरकार और प्रधानमंत्री जी की मित्रता थी और इस नारखेड़े बंधु ने आस्ट्रेलिया के पंथ प्रधान को नेहरू सरकार के लिए बोल दिया और ये छूट गए। इसलिए पानी का इतना महत्व है। यह मानव निर्मित का सवाल है। अगर शुरू से पानी की योजना हो जाती है तो कोई आपत्ति नहीं होती।

महाराष्ट्र में पश्चिमी वाहनी नदियां हैं जो समुद्र में जाकर मिल जाती हैं और उनके पानी का कोई उपयोग नहीं होता है। मेरी विनती है कि इन नदियों को पूर्व वाहनी करने के लिए जो प्रोजेक्ट दिया है, उसके बारे में सोचा जाये और जो पश्चिमी वाहनी नदियां हैं उनको पूर्व वाहनी कर दिया जाये। धन्यवाद।

 

SHRI K.P. SINGH DEO (DHENKANAL): Mr. Chairman Sir, in this whole debate, I have heard the distinguished Members speak. In my humble submission, the whole thing is the question of water and water management.

"Water, water, everywhere, And all the boards did shrink;
Water, water, everywhere, Not any drop to drink. "

Poet Coleridge said so many years back in The Ancient Mariner. Today, only 30 per cent of our cultivable land is irrigated and more than 60 per cent of the water goes to the sea. Unless, we change our entire attitude towards the natural calamities, whether it is drought or flood or cyclone, it is not going to solve this problem.

We are discussing drought today, we heard about floods -- Shri Sontosh Mohan Dev was mentioning about floods in his area. When we were discussing the Supercyclone of Orissa only two months back, many Members had the occasion to say that the constant companion of States like Orissa, some parts of Bihar, some parts of West Bengal, some parts of Andhra Pradesh is cyclone, drought, flood, back to cyclone and in between intermittent heat-wave and Sun stroke. Year before last, more than 1800 people died in Orissa, out of which 400 from my own area, due to Sun stroke. That is because, today the forest cover of the environment has been totally destroyed whether by the poor out of need or by the rich out of greed. Today, the fact is and the satellite imagery photographs and that it is only 11 to 12 per cent of forest cover, whereas 50 years back we had more than 36 per cent of forest cover.

The population is going on increasing. We are about to overtake China. At the same time, the water level is going down. Today, there is no water to drink. We have heard speakers say that people have to move 10 kms., 8 kms., 7 kms. to get potable water. We do not have water for the irrigation nor do we have enough for bathing nor do we have for the animals.

Hon. Dr. Venkateswarulu is sitting here. I am very grateful to him. When he was the Minister he had given us a lot of water projects. He gave a sum of Rs.20 crore for two projects in my constituency three years back. Today, that entire sum of Rs.20 crore is going to come back because the State Government has not been able to provide the margin money. Why? Because most of the States are impoverished, most of the States are chronically drought-affected, flood-affected and cyclone- affected. What can the poor hon. Minister do?

The Finance Commission has opined and recommended that it is mandatory for the Agriculture Minister to be the nodal Minister. There are no other Ministers here to listen to the debate or to contribute to the debate. So, what the poor hon. Agriculture Minister will do? He will do little gap filling. That is the Planning Commission""""s contribution in the last fifty years. Whether you abuse the Congress or the Janata Dal or the BJP, still droughts, floods, and cyclones will be with us even for the next fifty years. Therefore, the entire attitude has to change. I think, the hon. Member from Kalahandi was mentioning that Rajiv Gandhi is supposed to have said that only 16 paise are reaching to the people. Therefore, because of Rajiv Gandhi two new things came up. One was Jawahar Rozgar Yojana and the Panchayati Raj Institution. So that the Panchayat, and not the Planning Commission, would have a more intimate knowledge of the lay of the land, of the peculiar problems of their area.

So, this coercive planning, centralised planning must stop. The micro-level planning must come up. The district-level planning must come up. Therefore, we have to fortify them.

Shri Deve Gowda, the then Prime Minister, visited Bolangir and Kalahandi in 1996, which was supposed to be the worst drought of the century. In 1987 we also heard that that was the worst drought of the century. And now, this year we are also hearing that this is the worst drought of this century. What did Shri Deve Gowda say? He said that there were not enough officers at the cutting edge level of administration. You may give any amount of money. If the district administration fails, if the Revenue Department fails, neither Shri Patwa nor the entire Parliament can do precious little. Therefore, what is required is the micro-level planning and we must fortify them, strengthen them.

Then comes the question of dependable data. To whom we depend upon? We depend upon some peons. In the last cyclone in Orissa, the RIs did not reach every place because 14 districts out of 30 districts were affected. So, they sent peons and the peons sat under a tree and enumerated. Some people were given relief and some were not given relief. The whole thing is that people who were suffering were denied the basic necessity, which is a fundamental right. Therefore, we have to strengthen the local administration. And this is where, the Centre must think. The Planning Commission must change its attitude from the normal normative approach because we have 35 agro-climatic zones. Each zone has a peculiarity of its own.

Sir, the agricultural scientists have done an excellent job in their research laboratories. There was a little experiment which we did in Dhenkanal, which is my constituency, in 1996. At that time, that was considered to be the worst drought of the century. It was a communication exercise, convergence of all the agencies. In the previous year, the Crop Kalinga II of the Central Rice Research Institute, which had failed, was an unqualified success because the inter-personnel communication between the scientists, farmers and Bureaucrafts was so good that the same land gave 19 times yield, and the hon. Minister knows about it. I had mentioned this in the meeting of the Consultative Committee which was held last month.

Sir, when Sardar Buta Singh was the Agriculture Minister, he had laid stress on dry-land farming and up-land farming. Sixty per cent of our cultivable land in India is in up-land and they are rain-fed. So, attention and focus must be given to that.

श्री किशन सिंह सांगवान (सोनीपत); सभापति महोदय, आज सारा सदन देश की एक बहुत बड़ी समस्या सुखाड़ पर चर्चा कर रहा है। माननीय सासंदों ने अपने अपने प्रदेश और पूरे देश में सूखे से उत्पन्न हुये हालत का विस्तार से वर्णन किया है। हमारे देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि देश के किसी हिस्से में बाढ़ आती है तो किसी हिस्से में भंयकर सूखा पड़ता है, कहीं पर पहाड़ है तो कहीं रेतीला इलाका है, कहीं जंगल हैं तो कहीं पत्थर के पहाड़ हैं। इस देश में प्रतिवर्ष कभी बाढ़ से और कहीं सूखे से करोड़ों, अरबों-खरबों रुपये का नुकसान होता है। विशेषकर किसानों और गरीब लोगों की बर्बादी हर जगह होती है। यहां आज सूखे पर चर्चा हो रही है जिसमें गुजरात, राजस्थान और आन्ध्रा प्रदेश सूखे की चपेट में हैं। इसमें राजस्थान प्रतिवर्ष सूखे से ग्रसित रहता है। हालांकि हमारा हरियाणा प्रदेश छोटा जरूर है लेकिन विशेषकर आधा हरियाणा जिसे दक्षिणी हरियाणा कहा जाता है, उसकी सीमा राजस्थान से मिली हुई है। वहां सूखे के हालात वही है जो राजस्थान के है क्योकि वहां की सारी वही भौगोलिक परिस्थिति है, वह भी उसी तरह सूखे की चपेट में आता है। हर साल आधे हरियाणा में फ्लड रहती है और आधा हरियाणा सूखाग्रस्त रहता है और किसान हर हालत में बरबाद रहता है, चाहे वह फ्लड से हो या सूखे से हो। हरियाणा के १९ जिलों में १० जिले आज भी सूखे से प्रभावित हैं जिनमें महेन्द्रगढ़, भिवानी, रेवाड़ी, फतेहाबाद, झज्झर, रोहतक, सोनीपत, फरीदाबाद, हिसार प्रमुख हैं। यह वह बैल्ट है जिसे हम दक्षिणी हरियाणा कहते हैं, यह बुरी तरह से प्रभावित है। सभी अपने-अपने प्रांतों के लिए केन्द्र सरकार से सहायता की अपील करते हैं। यह हर एक का अधिकार भी है और मांगना उचित भी है। लेकिन ये प्राकृतिक आपदायें हैं, यह भगवान के ऊपर निर्भर करता है। लेकिन कुछ समस्याएं ऐसी हैं जिन्हें हम सरकारी स्तर पर, भाईचारे के स्तर पर हल कर सकते हैं। पिछली लोक सभा के दौरान माननीय वाजपेयी जी ने एक बहुत अच्छा मामला कावेरी जल विवाद का सुलझाया था। यह चार प्रांतों का झगड़ा था, वर्षों से लटक रहा था। लेकिन इस विवाद के सुलझने से चारों प्रांतों की पानी की बहुत बड़ी समस्या हल हो गई। लेकिन हमारे प्रांत हरियाणा और पंजाब के बीच जब से इन दोनों प्रांतों का निर्माण हुआ है, ३३ वर्षों से एक बहुत बड़ा झगड़ा एस.वाई.एल. नहर का चल रहा है। जिस पर हरियाणा सरकार और केन्द्र सरकार का हजारों करोड़ रुपया खर्च हो चुका है। १२१ किलोमीटर लम्बी नहर बन चुकी है, केवल छ: किलोमीटर का टुकड़ा बाकी है। इस छह किलोमीटर के टुकड़े की वजह से हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। हरियाणा के पानी में कुछ राजस्थान का भी हिस्सा है। अगर यह नहर पूरी हो जाए तो दक्षिणी हरियाणा, जिसका मैं आपके सामने जिक्र कर रहा हूं, उसकी समस्या हल हो सकती है, कुछ राजस्थान की भी समस्या हल हो सकती है। लेकिन वह पानी वेस्ट जा रहा है। हमें सबसे बड़ा अफसोस इस बात का है कि हमने पिछले ३३ सालों से पाकिस्तान में पानी जाने दिया, लेकिन हरियाणा को पानी नहीं मिला। कितनी बार इसमें समझौते हुए। कहीं इंदिरा अवार्ड है, कहीं राजीव-लौंगोवाल समझौता है, कही दूसरे समझौते हैं। समझौते होते रहे, लेकिन लागू कोई नहीं हुआ।

सभापति महोदय, पिछले समय भी हमने माननीय वाजपेयी जी से अनुरोध किया था, बार-बार सभी सांसद भी मिले, दूसरे जनप्रतनधि मिले और जनता भी मिली। उन्होंने आश्वासन दिया था कि इस समस्या को हम पंजाब के भाइयों के साथ मिल-बैठकर सुलझायेंगे। लेकिन बदकिस्मती से वह सरकार गिर गई। दोबारा चुनाव हुए और मुझे फख्र है कि श्री वाजपेयी जी आज भी इस देश के प्रधान मंत्री हैं और मुझे यह विश्वास है कि ३३ वर्षों से लटकी हुई इस समस्या का वह अवश्य समाधान करेंगे और दक्षिणी हरियाणा तथा राजस्थान की समस्या को हल करेंगे। मैं माननीय मंत्री जी से अनुरोध करुगा कि हरियाणा के लिए भी एक सर्वे टीम जाए, ताकि जो नुकसान हुआ है, उसकी पूर्ति के लिए हरियाणा को भी पूरी सहायता दी जाए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं धन्यवाद व्यक्त करता हूं।

सरदार बूटा सिंह (जालौर) : माननीय सभापति जी, आज अपने देश के सबसे मुसीबत में जीवन व्यतीत कर रहे लोगों के बारे में, उन क्षेत्रों में जहां पशु मर रहे हैं, जहां पेयजल का अभाव हो चुका है, जल स्तर खत्म हो चुका है, ऐसी भीषण समस्या के बारे में यह सदन बड़ी गंभीरता से विचार कर रहा है। सभी सांसदों ने अपने-अपने क्षेत्र, अपने-अपने प्रदेश का उल्लेख किया, बहुत से आंकड़े प्रस्तुत किये गये और राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की तरह-तरह की राय यहां दी जा चुकी है। मैं विवाद में जाना नहीं चाहूंगा। यहां जो डिस्कशन हो रहा है, मैं केवल उसके बारे में माननीय मंत्री जी से कहूंगा कि इसे राष्ट्रीय विपदा मानें। चाहे वह विपदा राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा या आंध्रा प्रदेश या किसी भी क्षेत्र में हो, उसे समूचे राष्ट्र की विपदा माना जाए और उसके प्रति केवल सहानुभूति ही नहीं, बल्कि वे देश के सामने कोई विकल्प रखें।

सभापति महोदय, इस भयंकर सूखे और इस भीषण सिचुएशन का सामना करने के लिए क्या-क्या प्रयास भारत सरकार कर रही है, वह बताए, यह सदन उसका पूरा-पूरा साथ देने के लिए तैयार है। जब आज हम यहां इस समस्या पर बहस कर रहे हैं, मेरे क्षेत्र बीकानेर, बाड़मेर, जैसलमेर, नागोर और जोधपुर आदि जो पश्चिमी राजस्थान कहलाता है, उसकी हालत यह है कि वहां जो दो मैटरोलौजीकल डिवीजन हैं उनमें से एक पूर्वी राजस्थान में और दूसरा पश्चिमी राजस्थान में है, उनके अनुसार पश्चिमी राजस्थान में ९२ प्रतिशत बारिश फेल हुई और पूर्वी राजस्थान में ६७ प्रतिशत बारिश फेल हुई। आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि जहां ९२ प्रतिशत पानी नहीं बरसा वहां की प्रकृति, वहां की वनस्पति और वहां के पशु तथा आदमी किस प्रकार अपना जीनव यापन कर सकेंगे और उनकी क्या हालत होगी।

सभापति महोदय, मेरे जालौर क्षेत्र में एशिया की सबसे बड़ी गौशाला गांव पतपेड़ा में है जिसे एक महात्मा चलाते हैं। वहां एक दिन में ७०० गाएं मर गईं। आज के अखबारों ने वहां की बहुत सी स्टोरियां छापी हैं। देश के सभी लीडिंग न्यूज पेपरों में राजस्थान के सूखे के बारे में छपा है। टाइम्स आफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, टि्रब्यून, पायनियर सभी समाचारपत्रों के संवाददाताओं ने राजस्थान में जाकर देखा है, वहां की जैसी हालत उन्होंने देखी है, उसके बारे में अलग-अलग अपने-अपने द्ृष्टिकोण से उन्होंने अखबारों में लिखा है। इसलिए मेरा मंत्री महोदय से यह निवेदन जरूर है कि वे सूखे की स्थिति का जायजा लेने के लिए आज के सभी प्रसिद्ध अखबारों को जरूर पढ़ लें।

सभापति महोदय, जिस प्रकार से माननीय प्रधान मंत्री महोदय ने देश के लोगों से अपील की है, उससे एक आशा की किरण जरूर बंधी है, लेकिन क्या हमारी स्थिति इतनी दयनीय हो गई है, हमारा इतदना बड़ा देश, क्या इसमें साइंसदां, आविष्कारक और तकनीशियन नहीं है, क्या इस देश में सारे के सारे ब्यूरोक्रेट्स ही बैठे हैं? क्या हम भिखमंगे हो गए हैं, क्या हम लोगों से भीख मांगकर अपने देश की जनता का पालन-पोषण करेंगे, क्या आज हमारी ऐसी स्थिति भी नहीं है कि हम अपने देश की जनता का पेट भर सकें, उसका पालन-पोषण कर सकें? मुझे इस बात की खुशी है कि प्रधान मंत्री जी पधार गए हैं। उन्होंने जो अपील की है, उसका तो मैं स्वागत करता हूं, लेकिन कहीं उनकी यह अपील ऐसी बनकर न रह जाए कि-

"तसल्ली दे जाए उनको जिन्हें दुश्वार था जीना अर्ज. यह थी कि मरना भी कहीं दुश्वार न हो जाए "

प्रधान मत्री जी आपकी अपील का असर है, लेकिन आपके लोगो ने जिस तरह से राजनीतिकरण करने की कोशिश की है अगर वैसी ही भावना रही, तो आपकी अपील में भी कोई असर नही रहेगा ।

सभापति महोदय, मैं अर्ज़ कर रहा था कि हमारे देश के साइंटिस्ट विकसित मुल्कों में जाकर नई-नई चीजें इजाद कर रहे हैं, तो क्या हम अपने देश में पानी भी उपलब्ध नहीं करा सकते। मैं ज्यादा आंकड़े और सुझाव नहीं दूंगा, लेकिन केवल दो तरह के सुझाव देना चाहूंगा। मैं देश का कृषि मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री, सहकारिता मंत्री और फर्टीलाइजर मंत्री रहा हूं, इसलिए मेरे अनुभव से देश को फायदा उठाना चाहिए और यह देश के लिए जरूरी भी है कि अनुभव का लाभ उठाया जाए। मैं आपका ध्यान वर्ष १९८६-८७ में पड़े अकाल की ओर आकर्षित करना चाहूंगा, जब देश का प्रधान मंत्री दिल्ली से जीप खुद चलाकर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जाता था। मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि देश् की जितनी बड़ी-बड़ी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटीज हैं, जैसे उ.प्र. में पंतनगर, पंजाब में लुधियाना, हरियाणा में रोहतक और गुजरात एवं अन्य प्रदेशों के बड़े कृषि विश्वविद्यालयों को आदेश दें कि उनके फार्मों में जितना भी चारा है, उसको राजस्थान, गुजरात और उड़ीसा या जहां-जहां पर कमी है वहां मुफ्त भेजा जाए। मेरा दूसरा सुझाव यह है कि आज देश में अन्न इतना ज्यादा पैदा हुआ है कि पंजाब में सड़कों पर रखने के लिए भी जगह नहीं है। प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के बच्चों की छुट्टी कर दी गई है और उनके भवनों में अन्न रखा जा रहा है। वहां अनाज को कोई पूछता नहीं है, अनाज गल-सड़ रहा है। भूसा इतना ज्यादा है कि हरियाणा और पंजाब के किसान गेहूं के भूसे को जला रहे हैं और राजस्थान तथा गुजरात में भूसे के अभाव में पशु मर रहे हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से भूसा अकालग्रस्त क्षेत्रों में ले जाया जाए। हमने कर के दिखाया है।

 

हमने चारे की दो गाड़ियां भरकर, एक गाड़ी में ढाई सौ ट्रक आते हैं, दो गाड़ियां भरकर हमने जालौर और सिरोही को दे दी। हर महीने भेजने की इच्छा थी परन्तु हमारे माननीय रेल राज्य मंत्री जी का कोई आदेश आया, उसके बाद से हमें गाड़ी नहीं मिली। मैंने उनको पत्र भी लिखा है कि ये गाड़ियां उपलब्ध करायें तो कम से कम मैं राजस्थान और गुजरात के सूखाग्रस्त क्षेत्र में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से इतना चारा भिजवा दूंगा कि सरकार को एक पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं होगी।

एक सुझाव मेरा यह है कि अपने देश में विश्व का, जिसको शुष्क खेती कहते हैं, उसका सबसे बड़ा संस्थान हमारे देश में है। आपने कभी वजिट किया हो या करें तो आपको पता चलेगा कि आंध्रा प्रदेश में टिकरी सेट नाम की एक इंस्टीटयूशन है जो दुनिया में ड्राईलैंड फार्मिंग के बारे में नयी-नयी खोजें निकालते हैं। बारिश के पानी को कैसे संभाला जाये, कौन-कौन सी फसल पैदा की जाये जो बिल्कुल पानी के बिना हो सकती है, हमने आज तक उसका फायदा नहीं उठाया। मैंने एक ही टीम उसकी निकाली थी, उस टीम ने जो हमें सुझाव दिये थे, कुछ फसलें चली थीं, वे कामयाब हैं। मैं चाहूंगा कि एग्रीकल्चर मनिस्टर साहब आप उस वल्र्ड आर्गनाइजेशन का फायदा उठायें जो हमारे देश में है और सारी दुनिया की सेवा कर रही है मगर भारत वर्ष की सेवा नहीं कर रही। हमारे वैज्ञानिक उसमें है।

अंत में रिमोट सैंसिंग के माध्यम से, डिफेंस मनिस्ट्री के माध्यम से हमने राजस्थान का सर्वेक्षण कराया था कि राजस्थान की धरती के नीचे सरस्वती नदी है, जिसकी हम पूजा करते हैं। श्रीमान प्रधान मंत्री जी, वह तो भागीरथ बने थे, आप उस सरस्वती को ऊपर ले आओ, आप भी भागीरथ बन जायेंगे। ये भारत सरकार उस सरस्वती नदी को, जो राजस्थान के रेगिस्तान इलाके के नीचे होकर कांडला की ओर बढ़ रही है, उसका जो सर्वेक्षण हो चुका है, लाखों रुपये खर्चे जा चुके हैं, उसको यदि आप देश के लिए हारनैस करें तो आप केवल राजस्थान को ही नहीं बल्कि पूरे देश को धन्य कर सकते हैं। इसलिए मेरा आपसे अनुरोध यह है कि घिसे-पिटे फार्मूले, जिनके माध्यम से पटवा जी आप जवाब देंगे कि इतना पैसा हमने दिया, इतना नहीं दिया, उससे कुछ होने वाला नहीं है। देश में तभी फायदा होगा जब हम नयी ग्राउंड ब्रेक करें और उससे हम अपने देश को धन्य कर सके। यह पानी की समस्या आदि समस्याओं का हल हो सकता है, यदि भारत सरकार के पास इच्छा हो और राज्य सरकारें उनका साथ दें। धन्यवाद।

१९३८ बजे(अध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए) श्री राजेश पायलट (दौसा) : स्पीकर साहब, माननीय सदस्य श्री बूटा सिंह ने कुछ सुझाव दिये। कुछ सुझाव तो उन्होंने कवर कर दिये। मेरे दो-तीन सुझाव हैं। इस पर विस्तार से बातचीत हुई और सभी साथियों ने अपनी-अपनी बात कही। जब नैशनल कैलेमिटी फंड बनाया गया था तो फाइनेंस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी थी, मेरा सुझाव मंत्री महोदय से यह है कि यह किसी ने नहीं सोचा था कि कभी-कभी किसी प्रांत में हर साल कैलेमिटी होगी। जब यह बनाया गया था तो यह सोचकर बनाया गया था कि जब कैलेमिटी होगी तो इतना पोर्शन केन्द्र सरकार देगी और इतनी पोर्शन राज्य सरकार दे देगी। आज उस फार्मूले का नुकसान यह हो रहा है कि राजस्थान जैसे प्रदेश को १९९८-९९ में २१.९८ करोड़ रुपये, हरियाणा को १४ करोड़ रुपये और सिक्किम को ८ करोड़ रुपये दिये गये। सिक्किम में तो कैलेमिटी कभी-कभी होती है। हरियाणा में भी कैलेमिटी कभी-कभी होती है। हर साल लगातार नहीं होती लेकिन फार्मूले के हिसाब से वह सैक्टर कवर नहीं होता और राजस्थान जैसे स्टेट को सफर करना पड़ता है। मेरा सुझाव है कि इस फार्मूले को अमैंड करके अगर स्पेशल फार्मूला ऐसा बना दिया जाये तो, जिन प्रदेशों मे लगातार बाढ़ और अकाल पड़ रहा है, असम जैसे प्रदेश में हमेशा बाढ़ आती रहती है और आंध्रा प्रदेश में साइक्लोन से इफैक्ट होता है। गुजरात और राजस्थान हमेशा अकाल से पीड़ित रहते हैं। इस फार्मूले को अमैंड करके अगर एक स्पेशल फार्मूला बना दिया जाये तो इन प्रदेशों को इतनी आफत नहीं होगी। जैसा हमारे सदस्य कह रहे थे कि वे पैसा दो ढाई हजार करोड़ रुपये मांगते हैं लेकिन यहां से ८० करोड रुपये जाता है। देश में एक संदेश यह जाता है जैसे उन्होंने भावना जताई कि यहां सरकार दूसरी पार्टी की है और वहां सरकार दूसरी पार्टी की है। अगर फार्मूला सही रूप से बन जाये तो यह भावना बिल्कुल खत्म हो जायेगी।

दूसरा मेरा सुझाव यह है कि सैंट्रल टीम हमेशा भेजी जाती थी। जब ऐसे हालत पैदा होते हैं तो सैंट्रल टीम हमेशा जाया करती थी और आकर एक रिपोर्ट दिया करती थी।

इस बार किसी कारण से सैंट्रल टीम अभी तक न राजस्थान में और न गुजरात में गई है। …( व्यवधान) ठीक है। हमारे सदस्य कह रहे थे कि १०३ करोड़ रुपये गए और वे भी खर्च नहीं किए। सैंट्रल टीम की रिपोर्ट सदन में दी जा सकती है जिससे हम सबको ज्ञान रहेगा। हो सकता है कि आज बी.जे.पी. की सरकार गुजरात में हो, हमारी सरकार राजस्थान में हो। मैं अपनी तरफ से सदस्यों को भरोसा दिला सकता हूं। मैं आज ही मुख्य मंत्री से कहूंगा कि हमारे बी.जे.पी. के जो सदस्य राजस्थान से चुनकर आते हैं, हम उनको एक-एक डिटेल भेजेंगे कि हमारी सरकार क्या कर रही है और यदि फिर भी कोई सवाल हो तो सरकार उनका जवाब देगी, यह उनका फर्ज है।

तीसरा प्वाइंट आदरणीय प्रधानमंत्री जी की अपील का है। सब लोगों ने जिक्र किया। श्री बूटा सिंह ने उसका चलते समय जिक्र किया। माननीय प्रधानमंत्री जी ने सारे देश से अपील की है। आज सदन की कार्यवाही चल रही है और हम ड्राउट को डिस्कस कर रहे हैं। मेरा सुझाव है कि एक टोकन मनी, पार्लियामैंट की तरफ से कुछ नहीं तो हम एक दिन का डी.ए. ड्राउट के लिए प्राइम मनिस्टर फंड में दे दें तो सारे देश में एक अच्छा संदेश जाएगा कि पार्लियामैंट ने शुरुआत की है, प्रधानमंत्री जी ने सारे देश से अपील की है। आज ऐसी हालत में हम अपनी तरफ से यदि एक दिन का वेतन भी भेजेंगे, मैं जानता हूं कि यह ज्यादा रकम नहीं है लेकिन हमारी एक भावना मुद्दे से जुड़ेगी।

प्रधानमंत्री जी आ गए हैं। जैसा बूटा सिंह जी ने कहा, उक्त राज्यों में चारा और अनाज ऐवेलेबल है, मिल सकता है। रेलवे मनिस्टर जी के बारे में कहा कि उन्होंने कुछ प्रावधान किए हैं। मेरी प्रधानमंत्री जे से प्रार्थना है, जब पहले कभी अकाल या फ्लड की हालत हुई तो सरकार रेलवे की तरफ से ट्रेन फ्री कर दिया करती थी और अगर कोई बहुत लम्बा काम हो तो उसमें सबसिडी दे दिया करती थी। डेढ़ महीने का सवाल है, उम्मीद है कि २५ मई या जून के पहले हफ्ते में मानसून आ जाए। अगर आप रेल की सुविधा दे दें तो हम बूटा सिंह जी का ऑफर आज ही मंजूर कर लेते हैं। ये हमें रेल दे दें और वे चारा और अनाज दे दें। अगर हमें राजस्थान और गुजरात के लिए रेलवे का प्रावधान मिल जाए तो दोनों सरकारें कोआर्डीनेट करके उनको पंजाब और हरियाणा से फौडर और अनाज में मदद कर सकते हैं। मैं सोचता हूं कि माननीय प्रधानमंत्री जी इस बात को कह सकते हैं कि अगर रोज की दो ट्रेन दी जाएंगी तो कोई ज्यादा कास्ट रेलवे मंत्रालय पर नहीं आएगी और अगर एक महीने के लिए ६० ट्रेन किसी एक प्रदेश में चली जाएंगी तो बहुत बड़ा फायदा हो जाएगा।

इन्हीं सुझावों के साथ मुझे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री जी इस पर ध्यान देकर हमारी मदद करेंगे और जो सुझाव मैंने सदन के सामने रखा है, यदि उससे सब साथी सहमत हों तो स्पीकर साहब उस सुझाव को मंजूर करके सरकार के पास एक दिन का वेतन भेज सकते हैं।

MR. SPEAKER : Now the hon. Minister to reply.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): Sir, please allow me.

MR. SPEAKER : No. SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, I waited for five hours. I do not think it is very fair.

MR. SPEAKER : The time allotted was two hours.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : It may be so. But everybody else has spoken and I waited till the end. … (Interruptions)

MR. SPEAKER : Many hon. Members spoke. Please understand.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, I would request you to please understand and give me another five minutes. I am sure, the hon. Prime Minister and the hon. Minister Shri Patwa will wait for that. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: If you want any clarifications to ask, you can ask them from the hon. Minister after the reply.

… (Interruptions)

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, this is the extent of study done. … (Interruptions) I deliberately waited because I do not belong to the drought-affected States. I submitted my name and was waiting. … (Interruptions)

PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU : Sir, Andhra Pradesh is also the worst-affected State. Please allow us also to bring out the situation in the State. … (Interruptions)

MR. SPEAKER : Shri Aiyar, you can ask any clarifications after the hon. Minister replies.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, mine are series of questions to be put. There is a major national problem. It is not a problem of Rajasthan and Gujarat. I, as a Tamilian, have got questions to ask. … (Interruptions)

PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU : Sir, you please see the size and extent of the damage that has occurred in Andhra Pradesh. … (Interruptions)

MR. SPEAKER : The time allotted to this was two hours. It has taken five-and-a-half hours. Please understand it.

PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU (TENALI): Sir, Andhra Pradesh is one of the worst-affected areas.

MR. SPEAKER : I will allow two minutes each to Shri Mani Shankar Aiyar and Prof. Ummareddy Venkateswhwarlu.

PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU : Sir, kindly give five minutes.

MR. SPEAKER : No. I will give two minutes each to the hon. Members. Shri Aiyar to speak now.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Mr. Speaker, Sir, I will send all the information that I have to the hon. Prime Minister. I have already drawn his attention, through the hon. Minister Shri Rajnath Singh who is here, to page 7 of the statistics of the Performance Budget of the Ministry of Rural Development. You will find, Sir, that in every single programme that has been drawn by the Ministry of Rural Development, in this year, there has been such poor physical performance that it has contributed in a major way to the disaster that has overtaken the States of Rajasthan and Gujarat.

As I do not have much time now, let me draw your attention to para 2.28 of the Report of the Standing Committee of Urban and Development that was presented this morning in the Parliament.

You will see that last year, we did not spend Rs. 800 crore of the money sanctioned by Parliament for the Rural Water Supply Scheme. The number of habitations covered has been cut by half compared to the previous year. There has been a total drop in any increase in physical achievement. The ratio of financial to physical achievement, which took 13 years to double until 1998-99, has reduced in a single year, in the year 1999-2000. There is a disaster overtaking the accelerated Rural Water Supply Scheme. Equally, on the DPAP … SHRI PRAKASH MANI TRIPATHI (DEORIA): Up to which date are these figures?

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : These figures are up to the year 2000.

SHRI PRAKASH MANI TRIPATHI : Up to which date are these figures? Are these figures up to November or December?

MR. SPEAKER: Hon. Member, the Minister can also give the reply.

SHRI PRAKASH MANI TRIPATHI : Sir, it is very pertinent because he had spent half-an-hour on page 7 on the same thing in another context. Sir, I am very curious because I also did some homework. I find that the Government fell in May, within two months of the financial year. These figures are for December and therefore, to castigate… SHRI MANI SHANKAR AIYAR : We are not castigating anybody.

SHRI PRAKASH MANI TRIPATHI : I just want to know whether these figures are for December. Did they give any chance to the Government?

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, I am not castigating anybody.

I am bringing to the attention of the Prime Minister that there has been a huge shortfall, on the basis of the figures supplied to the Standing Committee on Urban and Rural Development, which is chaired by a Member of the Shiv Sena. I am only quoting from the Report of the Standing Committee.

SHRI PRAKASH MANI TRIPATHI : Sir, it is very material to know whether it is up to December. It is a very important thing because a lot of time of this House has been taken on this issue that so much was sanctioned and only so much has been spent. If you look at the time given to this Government, then, you will find that this expenditure relates only to three months or maximum four months. These figures are being given again and again. So, it is a very material point to know. That is what I was curious about.

MR. SPEAKER: Please take your seat.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, my time is very limited. I plead with you that we can deal with these statistics later. I want to draw the attention of the Prime Minister to the fact that there has been a very poor performance of the accelerated Rural Water Supply Programme last year. The same thing has happened in the Drought Prone Areas Programme, DPAP. There has been a very sharp shortfall last year compared to the previous year. I am not comparing the years of the BJP Government to the years of the Congress. I am taking the BJP Government’s second year and comparing it with their first year.

Equally, with regard to the Desert Development Programme, which is also related exactly to the same subject, we have had a very serious shortfall. When it comes to Water Harvesting Structure – it is mentioned in the Annual Report of the Ministry of Rural Development - in the first batch, that was five years ago, Gujarat took Rs. 3 crore and Rajasthan took about Rs. 1.5 crore. In the last three years, batch after batch, there has been expenditure of zero rupees! No water harvesting structure has at all been made.

There has been such serious shortfalls with regard to Integrated Wastelands Development Programme, with regard to watershed approach to the DPAP and to the DDP that unless the Prime Minister himself takes up these enormous physical shortfalls in all the programmes of that Department - particularly those related to areas like Rajasthan and Gujarat which are suffering severe shortages of natural rain water - I am afraid, we will not be able to address these problems with the seriousness that they require.

I just wish to contrast in conclusion the way in which things have been going on over the last one year compared to what happened when we had such a major drought, famine in Rajasthan, Gujarat and rest of the country in the mid-80s. In consequence of that, in 1987, it was decided that we would adopt the watershed approach both in the Desert Development Programme, DDP as well as the Drought Prone Areas Programme, DPAP.

In the same year, 1987, we inaugurated a National Water Policy in which it was stated that drinking water would get the top priority. In 1989, we established the Integrated Wastelands Development Programme. It was in that year that we started the Oilseeds Mission Technology, which resulted in an enormous increase in oilseeds production in the later half of the 80s. The same thing was then applied as a mission mode to the drinking water programme, which is called the Rajiv Gandhi Drinking Water Mission. But now we find from the report of our Standing Committee that the Department itself does not seem to understand the difference between the mission mode and the Department. So, taking all these into account and taking advantage of the Prime Minister and the Finance Minister""""s presence over here, I would make a major plea to the Prime Minister. Sir, just give a few hours -- two or three hours -- to your Ministry of Rural Development and other Ministries concerned like that of Water Resources and Agriculture. Call them together with the bureaucrats, use this crisis as an opportunity for re-launching the social security net for the poor, which has just got tattered over the course of the last year or so. If you do this, I am sure that kind of drought proofing which we did in the mid 80s, which has saved Rajasthan and Gujarat for ten years, will not occur again. I would be more pleased than anybody else to praise you for your contribution to this, as much as I today would like to praise that Prime Minister who prevented such a disaster from overtaking Gujarat and Rajasthan for all of 15 years. Thank you, Sir.

PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU (TENALI): Mr. Speaker, Sir, I am thankful to you for having given me the opportunity to participate in the debate on the drought situation in the country. The country is passing through the worst phase, with regard to the natural calamity. Instead of blaming each other and trying to draw political mileage out of the discussions, the nation as a whole should be one in addressing this particular problem, whether it is in Orissa, Rajasthan, Gujarat, or Andhra Pradesh.

In fact, a few months ago, when there was a super-cyclone in Orissa, it was the Chief Minister of Andhra Pradesh who rose to the occasion. There is a severe drought situation particularly in Rajasthan, Gujarat and Andhra Pradesh. In most of these areas, one of the problems that has emerged is the inadequacy of drinking water; leave aside the protected water or potable water. For drinking purposes, at least, some water should be provided. There is inadequacy in most of these areas.

The second one is about the power shortage. We are just in the half way, in the month of April, and in the next two months, the situation is going to be much worse. Unless we draw a plan right now, we are not going to address this problem.

The third one is the fodder shortage. On several occasions, as and when this type of situation arose, we were thinking of maintaining fodder banks. What happened to these fodder banks? A fodder bank has never been maintained at any point of time. If a bank is maintained, then a situation of this type can be immediately addressed to.

The fourth one is about the accessibility of food to the poorer sections. All the people do not have the wage earning opportunities, which are normally required. The limited wage earning opportunity is another cause. As such, we will have to strengthen the Employment Assurance Scheme.

The next one is about the loss of crops and input subsidies that are extended. The re-schedulement of loans is one of the very important points, which has to be thought about. Then, speedy settlement of crop insurance claims is also not being done by most of the insurance companies.

These are some of the short-term and immediate steps that are to be taken. In the long-term, there has to be an expansion of the resource-base under the NCR, National Calamity Relief, and also under the National Fund for Calamity Relief.

We have got a very meagre amount – Rs.126 crore under NCR and Rs.140 crore under NFCR annually – when compared to the magnitude of disasters that take place. Cyclones, floods droughts, epidemics, etc., are taking place in a cycle. Whenever there is a drought situation, we perform the ritual of discussing it and then we forget about it. We have not been trying to expand this meagre resource base of Rs.266 crore under the two heads mentioned. The Tenth Finance Commission has also adequately mentioned about it. It is high time this resource base is expanded by allocating more money under these two heads.

In Andhra Pradesh, out of a total of 935 blocks, as many as 688 blocks in 18 Districts are worst hit by the drought. From 14th March to 11th April this year, Government of Andhra Pradesh had released about Rs.219.74 crore for input subsidy, drinking water, EAS, fodder procurement, reschedulement of loans, etc. The Chief Minister of Andhra Pradesh has been reviewing the drinking water and drought situations in the entire State on a day to day basis.

As against the drought of last year, the Government of India had sanctioned just about Rs.75 crore to Andhra Pradesh and that too after passage of six months. This year, it is yet to make up its mind on the amount to be sanctioned for the purpose. This is the state of affairs.

The Chief Minister of Andhra Pradesh had suggested that major amounts from MPLADS be immediately spent on drinking water schemes. However, funds under MPLADS for the year 1999-2000 are yet to be released by the Central Government. I would request the Central Government to release at least Rs.1 crore for each Member under MPLADS immediately so that it can be spent on drinking water schemes to relieve the situation. There are about 700 Members of Parliament. If an amount of one crore rupees is spent by each Member, Rs.700 crore would become available to address this drinking problem in the country. I would request the Government of India to rise to the occasion and do the needful for the affected States.

ग्रामीण विकास मंत्री (श्री सुंदर लाल पटवा) : अध्यक्ष महोदय, प्रो रासा सिंह रावत सहित जिन्होंने इस बहस का प्रारम्भ किया, उन सभी माननीय सदस्यों का मैं आभारी हूं। मैं सदस्यों की चिंता से अवगत और सहमत हूं जिन्होंने इस बहस में भाग लिया। समस्या की गंभीरता औऱ माननीय सदस्यों की चिंता का इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सदन के तीस सम्मानित सदस्यों ने इस बहस में भाग लिया। सर्वप्रथम एक व्यवस्था की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं कि हमारी संवैधानिक मर्यादाएं जो तय हैं, उनमें क्रियान्वयन राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और उसमें सहयोग केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। सभी माननीय सदस्यों को इस बात की अच्छी तरह से जानकारी है कि केन्द्र सरकार की भूमिका सहयोगी की है परंतु मूलत: जो योजनाएं या समस्याएं हैं, उनको दूर करने के लिए क्रियान्वयन करना राज्य सरकार के अधिकार का विषय है, ऐसी हमारी संवैधानिक मर्यादाएं तय हैं।

20.00 hrs. PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU (TENALI): If you say that all the responsibility lies with the States, then the Centre will shirk its responsibility.

श्री सुन्दर लाल पटवा : मैंने आपकी पूरी बात सुनी है। जो संवैधानिक मर्यादायें तय हैं, केवल मैंने उनकी ओर ध्यान दिलाया है। यह कह कर मैं केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार किसी को भी जिम्मेदारी से बरी नहीं करना चाहता हूं। यह राष्ट्रीय विपदा है। अभी हम राष्ट्रीय विपदा के घाव सहलाते हुए स्वस्थ नहीं हुए हैं, और दूसरी विपदा ने राष्ट्र को घेरा है। कई माननीय सदस्यों ने इसमें कहा है कि इस हम राजनीतिक द्ृष्टिकोण से थोड़ा परे हट कर, राष्ट्र के ऊपर आई हुई विपदा के रूप में इसका सामना करें। मैं उनकी भावना से सहमत हूं। जहां-जहां ये समस्यायें विकराल रूप में हैं, वहां मैं निरन्तर मुख्यमंत्रियों से सम्पर्क में हूं।

आज सुबह उठते ही, मैंने राजस्थान, गुजरात, आन्ध्रा प्रदेश, तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से स्वंय बात की है और उन्हें अद्यतन स्थिति की जानकारी देने के लिए कहा है। सर्वप्रथम उन्होंने जो वस्तुस्थिति की जानकारी भेजी है, वह मैं सदन के सामने रख रहा हूं।

गुजरात से जो जानकारी प्राप्त हुई, वह इस प्रकार है। गत वर्ष अपर्याप्त वर्षा के कारण गुजरात के १७ जिलों के १३५ ताल्लुकों में ९४२१ गांव अकाल की चपेट में है। लगभग ८० शहर और चार महानगर प्रभावित है। पानी की विशेष समस्या है। अन्य राज्यों से चारे की व्यवस्था की जा रही है। १५७ समूह जलपरियोजनाओं में राज्य सरकार द्वारा ७० समूह जलपरियोजनायें कार्यान्वित की गई हैं। राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार द्वारा वाटर ट्रेन के प्रस्ताव का स्वागत किया है। रेल द्वारा पानी का प्रबन्ध करने के लिए केन्द्रीय सरकार तत्पर है, यह मैंने उनको निवेदन किया है। उन्होंने कहा है कि तत्काल हमें इसकी आवश्यकता नहीं है, परन्तु हमने चार स्थानों पर इसका प्रबन्ध कर रखा है। राज्य सरकार तथा रेल मंत्रालय के अधिकारियों की बैठक आज हुई है। इस हेतु संघन प्रयास मैंने स्वयं किया है। मैने स्वयं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से चारा गुजरात और राजस्थान में भिजवाने का अनुरोध किया है। स्वयं मैंने उन्हें पत्र लिखे हैं और उन्होंने अनुकूल उत्तर दिया है। इस बार भंगवाल की कृपा है, मध्य प्रदेश में अच्छी मात्रा में गेहूं की फसल हुई है। साथ ही पंजाब में पर्याप्त मात्रा में भूसा उपलब्ध है। पंजाब में किसानों को मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस साल मेन्युअल लेबर से कटाई हुई है, वरना वहां हारवैस्ट कटर से होती तो भूसा चला जाता। उन्होंने भूसा पर्याप्त मात्रा में हरियाणा में उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है। केन्द्रीय सरकार की योजना के अनुरूप २० किलो गेहू अतरिक्त उपलब्ध करवाया जा रहा है।

राजस्थान से जो समाचार मिला है, उसके मुताबिक २६ जिले में से २३४०६ गांवों में अभाव की स्थिति है। ३० दिसम्बर, २००० तक राजस्व वसूल उन्होंने स्थगित किया है। ५० हजार से ज्यादा पशुओं की देखभाल गौशालाओं के माध्यम से की जा रही है। जून के माह तक एक लाख पशुओं को वभिन्न गौशालाओं में शरण की व्यवस्था की जा रही है। पेयजल हेतु योजना तैयार है। बन्द और खराब पड़े हैंडपम्प को सुधारने की प्रयास उन्होंने प्रारम्भ किया है। चार लाख श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। मजदूरी ४४ रुपए से लेकर ६० प्रतदिन की गई है। डेयरी डिपो संचालित करने के लिए बिना ब्याज के ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से चारे की व्यवस्था की जा रही है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा, मेरे स्वयं के आग्रह से, चारे की ट्रेन जोधपुर और बाड़मेर के लिए भेजी जा रही है।

आन्ध्रा प्रदेश में १८ जिलों में १७,४२१ गांवों में अभाव की स्थिति है।

वहां भी इसी प्रकार के प्रबंध किए जा रहे हैं। श्रीमान्, अपने बाकी के कथन के पहले मैं अपने मित्र श्री मणि शंकर अयर जी के कथन को उद्धृत करना चाहूंगा। आपने कह दिया कि डिजास्टर हो गया, रूरल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट ने बड़ा अनर्थ कर डाला, फेल हो गए, हम नीचे चले गए। मणि शंकर जी, आप तो विद्वान हैं, आपको जानकारी नहीं है, ऐसा मैं नहीं मानता। आपने जानबूझ कर कोई आरोप लगाया होगा, ऐसा भी मैं नहीं मानता, परन्तु क्या आपको यह पता नहीं है कि रूरल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट केवल फंड्स एवेलेबल करवाती है। हमने एक किश्त दे दी, लेकिन जब तक उसका यूटिलाइजेशन सर्टफिकेट न मिले तब तक हम दूसरी किश्त कैसे ले सकते हैं।... (व्यवधान)

सरदार बूटा सिंह (जालौर) : क्या यह गवर्नमेंट मोनिटरिंग नहीं करती।

श्री सुन्दर लाल पटवा : करती है।

सरदार बूटा सिंह : तो फिर आपका दायित्व भी उतना ही है।

श्री सुन्दर लाल पटवा : बूटा सिंह जी, मुझे बोल लेने दीजिए, जब आप बोल रहे थे तो मैंने आपको नहीं टोका।... (व्यवधान)

श्री किरीट सोमैया (मुंबई उत्तर पूर्व) : आप पहले पूरा जवाब सुन लीजिए।... (व्यवधान)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF COMMUNICATIONS (SHRI TAPAN SIKDAR): Sir, this is not the way. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: Dr. Girija Vyas, he is not yielding. Please take your seat.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: Let him conclude. He is not yielding. You know the procedure in the House.

… (Interruptions)

DR. GIRIJA VYAS (UDAIPUR): The hon. Prime Minister is also here. ... (व्यवधान)

श्री सुन्दर लाल पटवा : आप उत्तेजित मत होइए, मेरी बात पहले पूरी होने दीजिए।... (व्यवधान)

डा. गरिजा व्यास : मैं यह कह रही हूं, आपने जो कहा कि लगातार आपके सभी मंत्रिगण रोज इस सवाल का जवाब देते हैं कि आप इतना पैसा देते हैं। आप कहते हैं कि केन्द्र ने पैसा दे दिया, उसके बाद हमारी छुट्टी हो गई। माननीय प्रधानमंत्री जी यहां बैठे हैं, इसलिए मैं इनसे निवेदन कर रही हूं कि जब तक मोनिटरिंग की व्यवस्था नहीं होगी तब तक हम लोग इसी प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप करते रहेंगे।... (व्यवधान)

श्री सुन्दर लाल पटवा : अभी तो मैंने दो वाक्य पढ़े हैं, आपने साढ़े पांच घंटे की बहस को शांत बैठ कर सुना और मुझे अभी बोलते हुए साढ़े पांच मिनट भी नहीं हुए। हम उत्तेजना दिमाग से निकालें, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने छोड़ें। गरिजा जी, आपने कहा कि हम इसे राष्ट्रीय विपदा मान कर, बाकी सारी बातें बाजू रख कर इसका सामना करें। दो-ढाई महीने का समय है और बड़ा विकराल समय है। इसलिए हम आरोप-प्रत्यारोप की बजाए इस धारणा से, भावना से अगर इस विपदा का सामना करेंगे, मैं मानता हूं कि आज देश में वह क्षमता है, अभी कुछ कुदरत हमसे इतनी भारी नाराज है और हमें बर्बाद करना चाहती है, ऐसा नहीं है। अजमेर में १.६ मिली मीटर, धोलपुर में कुछ, कोटा में १.४ मिली मीटर, माउंट आबू में ११ मिली मीटर, जोधपुर में १.२ मिली मीटर, जैसलमेर में ०.१ मिली मीटर, चुरू में कुछ बोछार, माधवपुर में सात मिली मीटर, यह वर्षा की शुरूआत हमें कुछ आशा बंधाती है। बनासकाटा जिले के अंतर्गत गुजरात में उत्तरी भाग में, अम्बाजी में शनिवार को भारी वर्षा हुई, इसलिए हम कुदरत पर भी भरोसा करें। मैं मणि शंकर जी से कहना चाहता हूं कि इन्होंने जो बड़े जोरों से आरोप लगाया कि हम मोनिटर करने के बाद, बार-बार लिखने के बाद इम्प्लीमेंटेशन मेंशन करेंगे, आप जानते हैं कि यह हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए अगर उस खर्च में कुछ कमी आती है तो हम केवल दोषी नहीं है।... (व्यवधान)

श्री मणि शंकर अय्यर (मयिलादुतुराई) : मैं खर्च की बात नहीं कर रहा था, फजिकल एचीवमेंट की बात कर रहा था। आपसे बस यही अनुरोध है कि जो रिपोर्ट आज सुबह सदन में पेश की गई, उसे कृपया आप पढ़ लें।... (व्यवधान)

MR. SPEAKER: Let him conclude please.

श्री सुन्दर लाल पटवा : इतना कहने के बाद भी समझ में न आए तो मैं क्या करूं।...( व्यवधान)

श्री मणि शंकर अय्यर : यह आपकी रिपोर्ट नहीं है, हमारी कमेटी की रिपोर्ट है।

श्री सुन्दर लाल पटवा : मणि शंकर जी, फजिकल एचीवमेंट मेरे बस में नहीं है।

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : At this point, I do not know what we can do. He is saying that physical achievement is not in his hands. … (Interruptions)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF COMMUNICATIONS (SHRI TAPAN SIKDAR): The implementation is the duty of the State Government. … (Interruptions)

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Do you now see, Mr. Prime Minister why such a disaster – I repeat, such a disaster – is overtaking this country? Your Ministers do not understand their own schemes! This is the problem. … (Interruptions)

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर) : मान्यवर, यह आपत्तिजनक बात है, इस प्रकार की बात को कार्यवाही से निकाल दिया जाये…( व्यवधान)

SHRI RAJESH PILOT (DAUSA): Sir, the Minister has yielded. My appeal is that let him tell us which are the States which have not utilised Rs.800 crore, as per that report. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: He has not completed his reply. How can you interrupt him like this? Let him complete the reply first. … (Interruptions)

श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : पिछले ५० सालों में यह चिंता की होती तो देश की ऐसी हालत नहीं होती।…( व्यवधान)

श्री राजेश पायलट (दौसा) : यह देश एक साल में यहां नहीं आ गया है, पिछले ५० सालों में देश यहां पहुंचा है।…( व्यवधान)

श्री सुंदर लाल पटवा : अध्यक्ष महोदय, आज कुछ अखबारों में समाचार छपा है कि राजस्थान से, गुजरात से लोगों का पलायन शुरू हो गया है। मैंने तत्काल राजस्थान सरकार से संपर्क किया। मुझे जो राजस्थान सरकार से फैक्स मिला है वह यह है कि राजस्थान से अकाल के कारण रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन नहीं हुआ है -- it is not from me; it is from Shri Ashok Gehlot. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: Mr. Minister, please address the Chair and not the Members. This is always happening and we have been facing this problem. Both the Members and the Ministers are not addressing the Chair. You may please address the Chair now so that you can avoid all these things.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: When the hon. Minister is giving the reply, Members cannot obstruct him. This is not the proper way. What is this?

… (Interruptions)

SHRI SUNDAR LAL PATWA: The paper abstract mentions that there is a large scale migration from Gujarat because of drought. This is not based on facts. There is no migration due to drought.

श्रीमान, राष्ट्रीय आपदा राहत सहायता कोष की चर्चा हुई। सन् १९९५-९६ से १९९९-२००० की अवधि के लिए प्राकृतिक आपदाओं पर राहत सहायता खर्च के लिए धन की व्यवस्था और उसे खर्च करने की स्कीम दसवें वित्त आयोग द्वारा निश्चित की गयी है। पांच वर्ष के लिए ६३०४ रुपये की धनराशि के साथ आपदा राहत कोष गठित किया गया है। यह धन हर वर्ष राज्य सरकारों को आवंटन के अनुसार दिया जाता है। प्राकृतिक आपदा से उत्पन्न स्थितियों का सामना करने के लिए सरकार द्वारा प्रत्येक राज्य को आपदा राहत सहायता कोष से आवंटन किया जाना था। केन्द्रीय और राज्य सरकारों द्वारा आपदा राहत कोष में तीन और एक के अनुपात में अंशदान दिया जाता है। केन्द्रीय अंशदान ४७२८ करोड़ रुपये और राज्यों का अंशदान १५७६ करोड़ रुपये है। दसवें वित्त आयोग ने इस बात को समझते हुए कि आपदाएं विरल और गंभीरता वाली भी हो सकती हैं, सिफारिश की कि इस प्रकार की आपदाओं को निश्चित रूप से प्रति मामले के आधार पर आंका जायेगा। अन्य बातों के साथ आपदा की तीव्रता, उसका स्वरूप, आवश्यक राहत सहायता का स्तर, समस्या का सामना करने की राज्य की क्षमता, विकल्प और राहत देने की योजनाओं में उपलब्ध लचीलापन को ध्यान में रखते हुए, इस प्रकार की विरल क्षमता वाली आपदा के लिए १९९५-९६ से १९९९-२००० की अवधि के लिए ७०० करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी। इसमें भी तीन और एक का अनुपात था। लेकिन विरल महत्ता वाली आपदाएं होने के कारण सात सौ करोड़. रुपये की धनराशि दो वर्ष में समाप्त हो गयी।

राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से सहायता के लिये राज्यों की मांगों को देखते हुये जनवरी, १९९८ में १२० करोड़ रुपये की और वृद्धि की गई है। यह रकम १९९७-९८ में सारी समाप्त हो गई। उसके बाद राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में कोई रकम बाकी नहीं बची तो केन्द्रीय सरकार ने विरल गंभीरता वाली आपदाओं के संबंध में राज्यो को सहायता दी। वर्ष १९९५-९६ से १९९८-९९ तक, चार वर्ष की अवधि के दौरान राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से १२६४ करोड़ रुपये की कुल सहायता दी गई। इस सरकार के आने के बाद, इस तथ्य के बावजूद कि राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में कोई धन नहीं बचा था, केन्द्रीय सरकार ने विरल गंभीरता वाली आपदाओं का सामना करने के लिये वभिन्न राज्यों को १२९१ करोड़ रुपये की सहायता दी। पूरे चार वर्षो में १२६४ करोड़ रुपये और ६ महीने में १२९१ करद्वड्ढ;ेड़ रुपये दिये ग्:ठ्ठहद्व;ये। इनमें आन्ध्रा प्रदेश को ७५ करोड़ रुपया, बिहार को ३८ करोड़ रुपया, गुजरात को ५४ करोड़ रुपया, जम्मू कश्मीर को ७३ करोड़ रुपया, कर्नाटक को १७ करोड़ रुपया, मध्य प्रदेश को ३८ करोड़ रुपया, मणिपुर को ४ करोड़ रुपया, मिजोरम को ६ करोड़ रुपया, उड़ीसा को ८२८ करोड़ रुपया, राजस्थान को १०२ करोड़ रुपया दिया गया। एक उड़ीसा को छोड़कर बाकी सारे प्रदेशों को जो राशि दी गई, उसमें सब से ज्यादा भाग राजस्थान का है। इसमें त्रिपुरा को ५ करोड़, उ.प्र. को १६ करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल को २९ करोड़ रुपये दिया गया। इस प्रकार कुल मिलाकर १२९१ करोड़ रुपये राष्ट्रीय आपदा राहत सहायता कोष से, जो विरल आपदाओं का कोष है, चार साल में १२६४ करोड़ रुपया और ६ महीने में १२९१ करोड़ रुपया दिया गया।

अध्यक्ष महोदय, जब से प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी जी के नेतृत्व में नई सरकार आई है, उसने ६ महीने में १२९१ करोड़ रुपया राष्ट्रीय आपदा राहत सहायता कोष में बिना एक पैसे का फंड होते हुये राज्य़ों को उपलब्ध कराया। प्रधानमंत्री जी मुझे निरंतर निर्देश देते रहे हैं कि इन सारी विशेष आपदाओं के क्षेत्र के निरंतर सम्पर्क में रहो। मैं आगे यह बताना चाहूंगा कि राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में धनराशि की कोई रकम शेष न होने के बावजूद केन्द्रीय सरकार ने न केवल राज्य सरकारों को सहायता दी बल्कि १०वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार इस स्कीम के अंदर राज्यों को दिये जाने वाले २५ प्रतिशत अंशदान के लिये भी वित्त आयोग द्वारा कोई जोर नहीं दिया गया और जो भाग निर्धारित किया गया था, उस पर आग्रह नहीं किया। यह केन्द्रीय सरकार का १०० प्रतिशत अनुदान मानकर अभी तक दिया गया है। सूखे की स्थिति को देखते हुये गुजरात और राजस्थान राज्य सरकारों को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से क्रमश; ५४ करोड़ रुपया और १०२ करोड़ रुपया दिया गया । हालांकि मार्च महीने में पैसा नही था फिर भी विशेष सहायता के अंतर्गत ३१ मार्च तक यह राशि जारी की गई और आज की तारीख में इसी वजह से यह नियमित अंशदान उनके पास मौजूद है।

श्री राजेश पायलट ; यह बताइये कि गुजरात और राजस्थान ने कितनी सहायता धनराशि की मांग की है? उस रेशो को तो बताइये।

श्री सुन्दर लाल पटवा; गुजरात ने ७०० करोड़ और राजस्थान ने ११४५ करोड़ रुपये की मांग की है।

कर्नल सोना राम चौधरी (बाड़मेर); सहायता राशि देने में कितना पक्षपात किया गया है।…( व्यवधान)

श्री सुन्दर लाल पटवा; अध्यक्ष महोदय, यह जो परम्परा है, यह कोई वर्तमान सरकार की बनायी हुई नहीं है। वित्त आयोग की सिफारिश पर यह आयोग बना और उस आयोग ने यह मानदंड बनाया है।

फंड के क्रियान्वयन की जो पद्धति है वह तय की गई। आपदा राहत की जांच करने के लिए सैंट्रल टीम जाती है और वह रिकमेंड करती है।

सरदार बूटा सिंह : टीम ने कितना रिकमेंड किया ?

डा.गरिजा व्यास : टीम ने कितना रिकमेंड किया ?

श्री सुन्दर लाल पटवा : टीम ने जो रिकमेंड किया उसके अनुसार, बल्कि कही-कहीं उससे भी ज्यादा दिया गया। टीम की रिकमेंडेशन के आंकड़े इस समय मेरे पास उपलब्ध नहीं है। यदि आप चाहें तो वे आंकड़े मैं उपलब्ध करवा सकता हूं। परंतु टीम ने जितना रिकमेंड किया, उससे कम कहीं भी, किसी भी राज्य को हमने नहीं दिया। इतना मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं। टीम किसी पार्टी की नहीं थी। उससे कम किसी राज्य को नहीं दिया। प्राकृतिक आपदाओं के समय और केन्द्र सरकार के द्वारा इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए जो कदम उठाये गये, उनका मैं जिक्र करना चाहता हूं और अपेक्षा करता हूं कि माननीय सदस्य केन्द्र सरकार की संवेदना से अवगत होंगे।

रोजगार के प्रावधान की जरूरत एक महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। मजदूरी और रोजगार की सभी योजनाओं में मुख्यत: रोजगार आश्वासन योजना, जवाहर ग्राम समृद्धि योजना के अंतर्गत सरकार ने वर्ष १९९९-२००० के दौरान गुजरात को ७८ करोड़ रूपया और राजस्थान को १२२ करोड़ रूपया दिया। इसकी स्थिति को देखते हुए गुजरात और राजस्थान को विशेष रूप से जारी १२ करोड़ रुपये के अलावा हमारे पास ओवरऑल कुल मिलाकर कुछ योजनाओं में पैसा बचा हुआ था। गुजरात को १२ करोड़ और राजस्थान को दस करोड़, जो टोटल अमाउंट में से सेविंग्स इन योजनाओं की थी, उसमें से सरकार ने ३१ मार्च के पहले जारी किया और इम्पलीमेंटेशन, यूटीलाइजेशन सर्टीफिकेट इन सब का इंतजार न करते हुए गुजरात और राजस्थान को वर्ष २०००-२००१ के लिए क्रमश: छह करोड़ रुपये और १३ करोड़ रुपये की पहली किस्त भी निर्मुक्त कर दी है, दूसरी किस्त के लिए हमने आग्रह किया है कि आवश्यकता हो तो हमें बताइये, हम दूसरी किस्त भी बिना फोर्मेलिटीज का इंतजार किए हुए जारी करने के लिए तत्पर हैं। पूरी गंभीरता से इस विषय में चिंता करके बाकी सारी औपचारिकताओं को बाजू रखकर केन्द्र सरकार जो कर सकती है, जो हमारे पास उपलब्ध संसाधन हैं, उनके अंतर्गत अधिकतम सहायता करने के लिए हम तैयार हैं।

रोजगार आश्वासन योजना के अंतर्गत अन्य राज्यों को और जवाहर ग्राम समृद्धि योजना के अंतर्गत सभी राज्यों को पहली किस्त की निर्मुक्ति पृथक रूप से की जा रही है। यह भी उल्लेख किया जा सकता है कि सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम, मरुभूमि विकास कार्यक्रम, समेकित परती भूमि विकास कार्यक्रम और पनधाराओं के लिए वर्ष १९९९-२००० में गुजरात और राजस्थान को क्रमश: ५३ करोड़ रुपये और ८३ करोड़ रुपये की राशि निर्मुक्त की गई। सूखे के दौरान पेयजल की उपलब्धता एक प्रमुख कठिनाई होती है। वर्ष १९९९-२००० के दौरान गुजरात को ७४ करोड़ और राजस्थान को १२० करोड़ रुपये की सहायता निर्मुक्त की गई। वर्तमान वर्ष २०००-२००१ में गुजरात और राजस्थान राज्यों को क्रमश: ३५ करोड़ और ८१ करोड़ रुपये की राशि निर्मुक्त की जा चुकी है। पेयजल आपूर्ति विभाग के दलों ने २१ और २२ को राजस्थान और गुजरात का दौरा किया, ताकि राज्य में चल रही सूखे की स्थिति तथा पेयजल से संबंधित मुद्दों पर विचार किया जा सके। गुजरात ने केन्द्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने वभिन्न जिलों में ३६ कुएं जो उसके पास अवेलेबल थे, राज्य सरकार को सौंप दिये और १४० कुएं और राज्य सरकारों को सौंपे जाने के लिए तैयार हैं। राजस्थान में २१६ कुएं पहले राज्य सरकार को सौंपे जा चुके हैं। पशुपालन और डेयरी विभाग, चारा, बीज उत्पादन, फार्मों के सुद्ृढ़ीकरण, चारा बैंकों की स्थापना, पंजीकृत उत्पादकों के जरिये बीज उत्पादन, घास आरक्षित क्षेत्र के लिए चरागाह भूमि के विकास आदि के लिए सहायता प्रदान कर रहे हैं।

अध्यक्ष महोदय, रेल मंत्रालय ने चारे की ढुलाई को प्राथमिकता देने के निर्देश जारी कर दिए हैं।

सरदार बूटा सिंह (जालोर): फ्री होना चाहिए। प्राथमिकता देना और बात है।

प्रधान मंत्री (श्री अटल बिहारी वाजपेयी): अध्यक्ष महोदय, अभी-अभी मुझे रेल राज्य मंत्री ने सूचित किया है कि जो भी सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए चारा जाएगा, उसे रेलें ले जाएंगी और बिना किसी शुल्क के ले जाएंगी।

श्री सुन्दर लाल पटवा: अध्यक्ष महोदय, आर्थिक कार्यों से संबंधित मंत्रिमंडलीय समति ने पहले ही कुछ निर्णय ले लिए हैं जिनकी घोषणा की जा चुकी है। उनमें गुजरात और राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में गरीबी रेखा से ऊपर एवं नीचे रह रहे प्रत्येक परिवार को २० किलो खाद्यान्न बी.पी.एल. रेट पर दिया जाएगा। गुजरात और राजस्थान के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में दो किलोग्राम प्रति मानव दिवस काम के बदले खाद्यान्न उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया जा चुका है। ये तात्कालिक उपाय किए गए हैं।

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : What about foodgrains for work?

श्री सुन्दर लाल पटवा: अध्यक्ष महोदय, यह मैं कह चुका हूं कि काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत दो किलोग्राम अन्न प्रति दिन प्रति मानव कार्य दिवस के अनुसार बिलो पावर्टी लाइन रेट पर उपलब्ध कराया जाएगा। इस प्रकार के आदेश दिए जा चुके हैं और राज्य सरकारों को सूचित किया जा चुका है।

SHRI K. YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Sir, the hon. Minister has mentioned only two States where they are providing foodgrains. I would like to know whether this relief is extended to the whole country. There are not the only two States which are affected by drought. So many States are facing drought problem and people are migrating to other places.

श्री सुन्दर लाल पटवा: येरन्नायडू जी, आप आश्वस्त रहें। श्रीमन् मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूं कि आन्ध्रा प्रदेश भी इस सुविधा में शरीक है।

अध्यक्ष महोदय, कुछ दीर्घकालीन बातें भी हुई हैं। पिछले ५० वर्षों में हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है। मैं, यह सरकार थी या वह सरकार थी, इसने किया या उसने किया, इस प्रपंच में नहीं जाना चाहता हूं। अगर गलतियां की हैं, तो हम सबने मिलकर की हैं। अगर मुसीबत उठानी है, तो हम सबको मिलकर उठानी है और उसका हल भी निकालना है तो हम सबको मिलकर निकालना है। कुछ बातें ऐसी हैं जिन पर एक स्तर से ऊपर उठकर सोचना पड़ेगा। कुदरत के साथ जो खिलवाड़ किया है, जंगल काटे, चरागह बर्बाद किए, तालाब, कुए बावड़ियां सुखा दीं, दोहन किया, सिंचन नहीं किया, इन बातों का दीर्घकालीन उपाय सोचना पड़ेगा।

अध्यक्ष महोदय, मुझे खुशी है कि आज यहां पानी के नैशनल ग्रिड की चर्चा भी आई। हमने पावर का नैशनल ग्रिड बना दिया, रेलवे अपने आप में एक अलग ग्रिड है। दीर्घकालीन उपायों के बारे में सभी माननीय सदस्यों ने कहा है कि हमारे पास पानी की कमी है इसलिए प्यासे हैं, ऐसा नहीं है, बल्कि वास्तविकता यह है कि हमारे पास पानी पर्याप्त है फिर भी हम प्यासे हैं, दोष व्यवस्था का है। इसका दीर्घकालीन उपाय सोचना पड़ेगा। अभी भी वक्त है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ डूब गया है। सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या आए, फिर भी वक्त है।

इसलिए वॉटर ग्रिड, जलग्रहण मिशन, वॉटर शेड, मरुस्थल सुधार, परती भूमि सुधार आदि इन सभी योजनाओं को समेकित करके हमें एक दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। इससे हमारा देश कहलाता है- "अन्नपूर्णा वसुंधरा, रत्न गर्भा वसुंधरा, सश्य श्यामला वसुंधरा"। यह हरी-भरी धरती, यह अन्नपूर्णा धरती, यह रत्न गर्भा धरती। हम उस स्वप्न को फिर से साकार कर सकें, इस बात की दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। मैं सोचता हूं, अलग-अलग सब माननीय सदस्यों के उठाये गये सवालों का जवाब दूं, समय उसकी मुझे इजाजत नहीं देता। परन्तु माननीय बूटा सिंह जी, मैं आपसे सहमत हूं, राजेश पायलट जी से सहमत हूं। कुछ माननीय सदस्यों ने हमें केवल प्रताड़ना और लांछन के लिए भाषण दिये, उनसे भी मैं सहमत हूं। उनकी प्रताड़ना को मैं शिरोधार्य करने को तैयार हूं। तुलसीदास जी ने कहा है कि "निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटि छवाय " । आप सबका पुन: आभार मानते हुए, जिन्होंने भाषण दिया, उनका भी आभार और जिन्हें मौका नहीं मिला, उनका भी आभार। मैं फिर से एक प्रार्थना के साथ अपने कथन का समापन करना चाहूंगा कि दो महीने या ढाई महीने जो भी समय है, केन्द्र सरकार के पास अपने जो भी संसाधन हैं, उनसे भी आगे बढ़कर सभी आपदाग्रस्त क्षेत्रों को सहयोग देने के लिए हम तत्पर रहें। मैं निरंतर राज्य सरकारों से भी आग्रह करता हूं कि वे समस्या की गंभीरता को समझते हुए अपने क्रियान्वयन की जिम्मेदारी को और बखूबी तौर पर निभाने के लिए तत्पर हों और हम सब मिलकर इस राष्ट्रीय आपदा का सामना कर सकें, सफलता के साथ सामना कर सकें। चारे की कमी नहीं है। पानी की जहां कमी है, वहां भी प्रबंध करके हम अपने पशुधन को बचायें, अपने मानव को त्रासदी से बचायें। जो संभव है, वह करने के लिए हम सब सहयोग करके प्रबंध करें।

प्रधान मंत्री जी का मैं आभारी हूं। प्रधान मंत्री जी ने आहवान किया है। पायलट जी ने एक सुझाव दिया है, मैं उनसे सहमत हूं और मुझे आशा है कि सारा सदन उससे सहमत होगा। इसी निवेदन के साथ मैं पुन: सबका आभार मानते हुए, धन्यवाद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

MR. SPEAKER: The House stands adjourned to meet again tomorrow at 11 a.m. 2032 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Tuesday, April 25, 2000/Vaisakha 5, 1922 (Saka)

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