Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Compulsory Voting ... on 24 April, 2015
Sixteenth Loksabha an> title: Further discussion on the motion for consideration of the compulsory Voting Bills moved by Shri Janardhan Singh Singrival (not concluded).
HON. DEPUTY SPEAKER: The House shall now take up Item No. 54. Shri Janardan Singh Sigriwal you can continue.
श्री जनार्दन सिंह सीग्रीवाल (महाराजगंज) : उपाध्यक्ष महोदय,मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं कि आपने मुझे अनिवार्य मतदान विधेयक, 2014 पर चर्चा करने की अनुमति प्रदान की है। यह सर्वविदित है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और समय के साथ इसकी जीवंतता में उत्तरोतर वृद्धि हुई है। भारत निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। जिसने देश के लोकतांत्रिक जरूरतों के अनुसार समय-समय पर अनेक चुनाव सुधार किए हैं,लेकिन अभी और भी बड़े सुधार चुनावों में किए जाने की आवश्यकता है। इन्हीं महत्वपूर्ण चुनाव सुधारों में अनिवार्य मतदान भी एक है।
महोदय,देश में पहला आम चुनाव वर्ष 1952में हुआ था,जिसमें 61.17प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। तब से लेकर आज तक यह प्रतिशतता कभी 55प्रतिशत रही तो किसी आम चुनाव में यह 66प्रतिशत हो गयी। वर्ष 2014में हुए आम चुनाव में देश की जनसंख्या 1,23,63,44,631थी। उस समय कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 83,41,01,479थी। जिसमें से केवल 55,38,01,801मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। यह हालांकि आज तक का सर्वाधिक मतदान प्रतिशत है जिसमें 66.40प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। फिर भी लगभग 34प्रतिशत मतदाता देश की सरकार चुनने की प्रक्रिया से अलग-थलग रहे। यह तथ्य हमें आत्म मंथन करने पर विवश करता है और यही कारण है कि इस देश में मतदान को अनिवार्य करने की बात बड़ी मजबूती से उठती रही है। मुझे लगता है कि हमारे देश में लोकतंत्र को और जीवंत बनाने तथा और मजबूत करने के लिए अनिवार्य मतदान को कानूनी अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। हमारे देश में मौलिक और नागरिक अधिकारों की बात पुरजोर तरीके से की जाती है जो किसी भी लोकतंत्र को जीवंत और सफल बनाने वाले अतिआवश्यक और अतिमहत्वपूर्ण कारकों में से एक है।
लेकिन जब मौलिक और नागरिक-कर्त्तव्यों के पालन की बात आती है,तो एक नागरिक के रूप में हम कहीं न कहीं पिछड़ते हुए नज़र आते हैं। यही कारण है कि हमारे देश के 34प्रतिशत मतदाता सरकार चुनने की प्रक्रिया से अलग हैं। वे अपने मौलिक कर्त्तव्य का पालन नहीं करते हैं। आज़ादी के बाद हुए प्रथम आम चुनाव से लेकर आज तक 16बार लोक सभा के चुनाव हो चुके हैं,इन सभी चुनावों में कमोबेश एक-सी ही स्थिति रही है। किसी चुनाव में 40प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते,तो किसी चुनाव में इसकी प्रतिशतता 34हो जाती है। लेकिन पिछले 62वर्षों में इसमें कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिला है। यही कारण है कि पूर्ण जनादेश प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल को भी देश के बड़े मतदाता वर्ग के समर्थन से वंचित रहना पड़ता है। यह समावेशी लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है और इसका कहीं न कहीं समावेशी विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि इससे सम्मानित सदन में मतदान को अनिवार्य करने के लिए समय-समय पर मांग उठती रही है। जिस प्रकार हम अन्य कर्त्तव्यों,जैसे-टैक्स देना,न्याय में सहयोग देना,शिक्षा प्राप्त करना और उसके प्रचार-प्रसार का पालन करते हैं,उसी प्रकार मतदान करना भी एक नागरिक कर्त्तव्य है,जिसे हम सही तरीके से पालन नहीं कर पाते हैं,जिसका हमें पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए। लेकिन पिछले 62वर्षों के अनुभव से हमें पता चलता है कि हम स्वप्रेरणा से आज तक इस कर्त्तव्य का पालन नहीं कर पाए हैं। इसीलिए इसे कानूनी रूप देना अनिवार्य हो गया है।
ऐसा कहा जाता है कि मतदान का अधिकार अन्य अधिकारों की तरह ही है। लेकिन ऐसी बात नहीं है। मैं यह मानता हूँ कि मतदान का अधिकार एक असमान अधिकार है। हम कह सकते हैं कि यह सभी अधिकारों की आधारशिला है। आपके अधिकार आपके हैं। यह तभी संभव है,जब लोकतंत्र हो। लेकिन सामंतवाद या तानाशाही में शासन के द्वारा नागरिक अधिकारों की कोई मान्यता नहीं है। इसके विपरीत लोकतंत्र एक उत्तरदायी शासन है। अच्छा लोकतंत्र वही है,जिसमें शत-प्रतिशत मतदान होता है यानी सरकार बनाने में हर व्यक्ति की भागीदारी होती है। यदि यह स्वेच्छा से हो,तो सर्वश्रेष्ठ है। यदि 80-90प्रतिशत लोग वोट कर रहे हों,तो भी चलेगा। लेकिन रजिस्टर्ड मतदाताओं में से केवल 50-60प्रतिशत मतदाताओं का ही मतदान करना किसी भी तर्क से स्वीकार्य नहीं है।
गुजरात हमारे देश का एक मात्र राज्य है,जहाँ स्थानीय निकाय के चुनाव में अनिवार्य मतदान संबंधी कानून वहाँ की विधान सभा द्वारा वर्ष 2009में पारित किया गया था। तब हमारे प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। हालांकि तत्कालीन राज्यपाल ने इस व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 21का उल्लंघन मानते हुए विधेयक को वापस लौटा दिया था। राज्यपाल का यह तर्क था कि ऐसा करना लोगों पर मतदान को थोपना होगा,जो संविधान के विरुद्ध होगा। जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसे अनुशासन के जरिये लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए उठाया गया कदम बताया था। उनकी मान्यता है कि यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि राजनीति और राजनेता वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर सोच सकें और मतदाताओं को लुभाने के लिए अपनाये जाने वाले भ्रष्ट तौर-तरीकों पर रोक लग सके।
आज कालेधन का भी प्रयोग मतदाताओं को मतदान केन्द्र पर लाने,मतदाताओं को लुभाने,मतदाताओं को जाति और धर्म के आधार पर बांटने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। मेरा यह मानना है कि यदि कालेधन को चुनावों में प्रयोग होने से रोकना है,तो हमें अनिवार्य मतदान पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
आज हम अपने ही देश में यह चर्चा नहीं कर रहे हैं,बल्कि आज पूरे विश्व के 32देशों में अनिवार्य मतदान संबंधी कानून बने हुए हैं। वे देश हैं-आस्ट्रिया,अर्जेंटिना,आस्ट्रेलिया,बेल्जियम,बोलिविया,ब्राजील,चिली,साइप्रस,मिस्र,फिजी,फ्रांस,ग्रीस,इटली,मेक्सिको,फिलिपींस,सिंगापुर,स्वीट्जरलैंड,थाईलैंड,तुर्की आदि देशों में अनिवार्य मतदान के कानून बने हुए हैं।
16.00 hrs वहां अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू है और लोग सही मायने में इसका प्रयोग कर रहे हैं। जो लोग मतदान नहीं करते हैं,उनके ऊपर जुर्माना या सामुदायिक सेवा का प्रावधान भी वहां किया गया है। इसके साथ ही,वहां 18वर्ष से 70वर्ष तक के लोगों को अनिवार्य मतदान करना होता है, 70 वर्ष से ऊपर के मतदाताओं को अनिवार्य मतदान से छूट दी गयी है। जो मतदाता बीमार हों या 500किलोमीटर से अधिक दूर रहने वाले हैं,को भी इससे छूट दी गयी है। इस कानून को लागू करने के लिए अन्य उपाय भी किए गए हैं,जैसे मोबाइल मतदान केन्द्र। वहां पर मोबाइल मतदान केन्द्रों की व्यवस्था की गयी है,जो व्यक्ति किसी विशेष कारण से मतदान केन्द्र तक नहीं जा सकता,मतदान केन्द्र ऐसे लोगों के पास जाता है। इससे मतदान के विषय में वहां की सरकार की गंभीरता का पता चलता है। जहां तक भारत में इस कानून को लागू करने की बात है,हमारे समक्ष कुछ चुनौतियां आएंगी,क्योंकि हमारे देश में करोड़ों मतदाता आंतरिक पलायन के शिकार हैं,जो रोजगार की तलाश में अपने मूल निवास को छोड़कर दूरदराज शहरों में चले जाते हैं। इस प्रकार के मतदाता कैसे मतदान करेंगे,इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। जो मतदाता किसी भी कारण से असमर्थ हैं,उन्हें भी मतदान से छूट देने का प्रावधान करना होगा। जिन देशों में अनिवार्य मतदान संबंधी कानून लागू है,वहां मतदान नहीं करने पर दण्ड का भी प्रावधान किया गया है। मेरा सुझाव है कि अपने देश में इसके लिए दण्ड की व्यवस्था हो,इस पर लोकतांत्रिक तरीके से विचार किया जाना चाहिए,क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया अलोकतांत्रिक नहीं होनी चाहिए। समाज के सभी वर्गों के लोगों को किस प्रकार इस प्रक्रिया से जोड़ा जाए,सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। कभी-कभी हम यह देखते हैं कि अनिवार्य मतदान का प्रावधान करने से हम समाज के उन तमाम वर्गों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ पाएंगे जो अभी तक उससे अलग रहते हैं। ऐसा देखा जाता है कि समाज के वंचित वर्ग के लोगों को आज भी कई स्थानों पर मतदान केन्द्रों तक नहीं जाने दिया जाता है। कानून बन जाने से यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि ऐसे लोगों को किस प्रकार मतदान केन्द्र तक पहुंचाया जाए और उनका मतदान सुनिश्चित करने की व्यवस्था सरकार करेगी। दूसरा एक वर्ग ऐसा भी होता है जो खासकर किसी विषय पर मतभेद के कारण,जैसे दक्षिणपंथी,उग्रवादी,माओवादी और उत्तर-पूर्व के अन्य अलगाववादी लोग,जो यह घोषणा कर देते हैं कि हमारी यह मांग मानिए अन्यथा हम मतदान नहीं करेंगे,उन लोगों को भी मुख्यधारा में जोड़ने के लिए यह एक बड़ा अस्त्र होगा। जो लोग अपनी विचारधारा के कारण मतदान से बहिष्कार करते हैं,कानून बन जाने से उन लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में हम जोड़ सकेंगे। जब ये लोग सरकार बनाने की प्रक्रिया में जुड़ेंगे तो उनका शासन व्यवस्था से लगाव बढ़ेगा और सरकार के जनादेश का आधार भी व्यापक होगा। ऐसे लोग जो सरकार बनाएंगे,उसको चलाने में और पूरी व्यवस्था को सुधारने में अपना सहयोग दे सकेंगे।
मेरा आग्रह है कि लोकतंत्र की अनेक विशेषताओं में से दो विशेषताएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं -विकल्प चुनने का अधिकार और विरोध व्यक्त करने का अधिकार। जो लोग अनिवार्य मतदान को अलोकतांत्रिक बताकर उसका विरोध करते हैं,उनका तर्क है कि प्रत्याशियों की पूरी सूची से विरोध करने वाले के पास क्या विकल्प है,लेकिन चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार के क्रम में ही,नोटा यानि None of the above का विकल्प पिछले आम चुनाव से दिया है। इसका अर्थ है कि आप विरोध भी व्यक्त कर सकते हैं और अपने मताधिकार का प्रयोग भी कर सकते हैं। विरोध के साथ अपना मत भी डाल सकते हैं। नोटा के माध्यम से अनिवार्य मतदान को पूरी तरह से लोकतांत्रिक बना दिया गया है। नौटा के सफल प्रयोग से अनिवार्य मतदान को कानूनी रूप देने में कोई दिक्कत नहीं होगी,यह मेरा सदन से और सदन के माध्यम से सरकार से आग्रह है। अनिवार्य मतदान को व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए ई-वोटिंग की शुरूआत की जानी चाहिए।
16.05hrs (Shri Hukmdeo Narayan Yadav in the Chair) महोदय,चुनाव आयोग ने भी इसे काफी गम्भीरता से लिय़ा है और ई-वोटिंग के लिए उसने भी अपने तरीके से तर्क दिए हैं। चुनाव आयोग का यह भी कहना है कि आने वाले दिनों में मतदाताओं की संख्या बढ़ेगी और 2030तक भारत में एक अरब से अधिक मतदाता होंगे। इन सबका ब्यौरा रखना नामुमकिन होगा इसलिए चुनाव आयोग ने ई-वोटिंग पर चर्चा शुरू कर दी है। हमें ई-वोटिंग का प्रावधान करके अनिवार्य मतदान करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
शहरी क्षेत्र में रहने वाले दो प्रकार के मतदाता मतदान में भाग नहीं ले पाते। पहली श्रेणी में वृद्ध और बीमार लोग आते हैं,जो मतदान के समय लम्बी कतार में खड़े रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने में असमर्थ होते हैं और दूसरी श्रेणी में वे युवा आते हैं जो सॉफ्टवेयर कम्पनीज से या इस लाइन से जुड़े होते हैं। उन्हें अपना प्रोजेक्ट पूरा करना होता है,हालांकि मतदान के दिन सरकार द्वारा सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है,लेकिन अधिकांश युवा जो इस श्रेणी में आते हैं,वे छुट्टी के दिन भी अपने निजी कार्य में लगे रहते हैं। इस कारण मतदान के दिन सार्वजनिक अवकाश जो घोषित होता है मतदान करने के लिए,उसका इन युवाओं द्वारा सदुपयोग चुनाव के लिए होना चाहिए,वह नहीं हो पाता है।
महानगरों में यह भी देखने में आता है कि काफी संख्या में नौकरशाह मतदान के दिन मिले सार्वजनिक अवकाश का उपयोग मतदान करने की बजाए सैर-सपाटों के लिए करते हैं। इन सबको देखकर ई-वोटिंग का प्रावधान करने के लिए चुनाव आयोग ने जो अपने तर्क दिए हैं,वे काफी हद तक सही हैं,क्योंकि इसके होने से कोई भी व्यक्ति कहीं भी रहकर मतदान कर सकता है। इस कारण मतदान के प्रतिशत में भी गुनात्मक सुधार होगा और अनिवार्य मतदान को प्रभावी और लोकतांत्रिक तरीके ले लागू करने में बल मिलेगा।
भारत के साथ-साथ दुनिया के अन्य विकसित देशों में भी अनिवार्य मतदान पर गम्भीरता से विचार किया जा रहा है। दुनिया के जो विकसित देश हैं,जैसे अमेरिका है,ब्रिटेन है और अन्य देश हैं,वहां भी अनिवार्य मतदान पर चर्चा की जा रही है। इसके अलावा चाहे वैचारिक विश्लेषक हों,वे लोग भी अनिवार्य मतदान के बारे में अपने विचार और विश्लेषण व्यक्त कर रहे हैं कि क्यों अनिवार्य मतदान जरूरी है।
अनिवार्य मतदान का प्रावधान होने से भारत जैसे देश में जहां हमें कई कुरीतियों का सामना करना पड़ता है,उन्हें भी दूर करने में मदद मिल सकती है और उन पर अंकुश लगाने का काम हो सकता है। इसलिए हम आपसे आग्रह करेंगे कि अन्य देशों में ई-वोटिंग और अनिवार्य मतदान के बारे में वहां की सरकारें अपना कानून बना रही हैं,यहां भी कानून बनाना चाहिए। देश में चुनावी प्रक्रिया की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रिंट मीडिया के माध्यम से देश भर में प्रचार-प्रसार किया जाता है,जिससे चुनाव पर काफी खर्चा होता है। देश में 1952से लेकर अभी तक जितने भी चुनाव हुए हैं,चुनाव खर्च में बढ़ोत्तरी होती गई है और .यह काफी हुई है। आप मतदान करने जाएं,इसके लिए चुनाव आयोग भी बड़े पैमाने पर अपना धन खर्च करने को विवश होता है और देश का हर व्यक्ति वोट करे,इस बात को लेकर वह बार-बार प्रचार करता है। सन् 1952में जब पहली बार देश में लोक सभा चुनाव हुए तो उस समय 10करोड़ 45लाख रुपए खर्च हुए थे,वहीं 2014में लोक सभा के हुए चुनावों में,आपको सुनकर आश्चर्य होगा,करीब 18,000करोड़ रुपए सरकारी स्तर पर खर्च हुए हैं। यह मीडिया का अपना विश्लेषण है और उसने कहा है कि हो सकता है खर्च इससे भी अधिक हो। जहां तक इस चुनाव में काले धन की बात है तो उसका समावेश इस खर्च में शामिल नहीं है,अगर वह भी शामिल करें तो यह खर्च बहुत ज्यादा हो सकता है। इसलिए हम अनिवार्य मतदान कानून के रूप में पारित करेंगे तो इस पर भी रोक लगेगी। इसके लिए मेरा विशेष रूप से आग्रह है।
महोदय,आज देश भर में प्रचार-प्रसार पर काफी धन खर्च होता है,लेकिन मतदान के प्रतिशत में वृद्धि नहीं होती है। इतना धन खर्च करने के बाद भी सबसे अधिक मतदान 66प्रतिशत वर्ष 2014में हो पाया है। महोदय,यह पैसे किसके हैं?यह पैसे देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों के हैं और उस पैसे का हम चुनावों के लिए उपयोग करते हैं,लेकिन फिर भी इसका प्रतिशत बढ़ाने में पिछड़ रहे हैं। मुझे लगता है कि कानून के अभाव में लोग इसे गम्भीरता से नहीं लेते हैं। यदि किसी प्रकार का दण्ड न भी दिया जाए,लेकिन कानून बन जाने से लोगों में काफी परिवर्तन आएगा। इससे मतदाताओं की मतदान केन्द्रों पर पहुंचने की संख्या बढ़ जाएगी।
महोदय,वर्ष 1952से 2014तक के चुनाव खर्च का मैंने आंकड़ा दिया है। लेकिन इस खर्च के बाद भी हम चाह कर 66प्रतिशत से ऊपर नहीं बढ़ पाए हैं। चुनाव के प्रतिशत को सौ प्रतिशत लेकर जाना भारत के लोकतंत्र के लिए आवश्यक है,जिसको हम बढ़ा नहीं पाए हैं। इसलिए मेरा विशेष रूप से आग्रह है कि हम चुनावों में काले धन को भी इससे कम करेंगे और जो धन चुनावों में खर्च होता है,उसका अपव्यय होता है,जो कि भारतवासियों का है,उस पर भी हम अंकुश लगाने का काम करेंगे। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि देश की सरकार चुनने के लिए करदाताओं की इतनी बढ़ी रकम खर्च हो रही है,लेकिन भारत के मतदाताओं का 34प्रतिशत आज भी इस प्रक्रिया से अलग है,जो हमारे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। इस दूरी को पाटने का एकमात्र उपाय है अनिवार्य मतदान को कानूनी रूप देना। इसके साथ ही चुनावों में काले धन का बढ़ता प्रयोग भी चिंता का विषय है। विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए हमारे प्रधानमंत्री जी ने और सरकार ने पहल शुरू की है। यदि हम अनिवार्य मतदान करेंगे तो काले धन कमाने वालों पर भी अंकुश लगेगा। उसी प्रकार से आम चुनावों में और विधान सभा चुनावों में काले धन का बढ़ता प्रयोग भी चिंता का विषय है। यही कारण है कि समय-समय पर स्टेट फण्डिंग ऑफ इलेक्शन की बात उठती रही है। इस पर भी सरकार को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। हालांकि चुनाव सुधार से संबंधित एक अहम किन्तु पृथक मुद्दा है,जिस पर अलग से कानून बनाए जाने की आवश्यकता है। मैं विशेष रूप से सदन के माध्यम से सरकार से आग्रह करना चाहता हूं और विशेष रूप से निवेदन भी करना चाहता हूं कि सरकार की स्थिरता,वैधता,वास्तविक जनादेश के आधार को व्यापक बनाने के लिए और समाज के सभी वर्गों के लोगों की देश और राज्यों की सरकार चुनने में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य मतदान को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए। इससे हमारा लोकतंत्र और जीवंत होगा महोदय,मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मतदान बूथों पर मतदाताओं की रक्षा और सुरक्षा के लिए भी उपबंध किए जाएं। आप जहां से आते हैं और आप इन सभी चीजों को बरसों से जानते हैं कि किस तरह से कमजोर लोगों को बूथ तक नहीं जाने दिया जाता है। सरकार को उनकी सुरक्षा के प्रबंध करने चाहिए। जिन मतदाताओं ने अपना मतदान नहीं किया है,उनके नामों की सूची सरकार को भेजी जानी चाहिए। यह भी प्रबंध हो कि कितने मतदाता मतदान नहीं कर पाए हैं,इसकी एक सूची सरकार को और संबंधित व्यवस्था को भेजी जानी चाहिए। पर्याप्त संख्या में मतदान बूथ खोले जाएं और मतदाताओं और मतदान केन्द्रों के बीच की दूरी कम की जानी चाहिए। कहीं-कहीं तो मतदाताओं को मतदान केन्द्रों तक पहुंचने के लिए नदियों में से होकर जाना पड़ता है। सामने से वह दूरी भले ही दो या तीन किलोमीटर की हो,लेकिन यदि कोई नदी या नहर पार करनी हो तो उनको बहुत दिक्कतें आती हैं। मेरा मानना है कि पांच सौ मीटर से अधिक दूरी मतदान केन्द्रों की नहीं होनी चाहिए। मतदान केन्द्र लोगों के घरों के नजदीक होना चाहिए या ई-वोटिंग की सुविधा होनी चाहिए। जिससे वह मतदाता सुगमता से वोट देने का काम कर सके। मतदान कर्मचारीवृंद के लिए भी विशेष व्यवस्था की जाए। मेरा यह कहना है कि आज सिर्फ शिक्षक ही कमजोर कर्मचारियों में क्यों गिने जाते हैं कि कोई भी चुनाव हो तो शिक्षकों को लगा दो। उनकी डय़ूटी लगाने से प्राइमरी शिक्षा बंद होती है और सिर्फ उन्हीं पर यह जिम्मेदारी क्यों दी जाती है। आज इस देश में जो भी काम करने वाले लोग हैं,उन सबको भागीदार क्यों नहीं बनाया जाता है। चाहे मतदाताओं के गिनने की बात हो,जनगणना करने की बात हो,पशुओं को गिनने की बात हो,बस शिक्षक को लगा दो। शिक्षक मतदान भी करायेंगे,पशु गणना भी करेंगे और इस कारण वे शिक्षा व्यवस्था का काम ठीक से नहीं कर पायेंगे। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को भी दुरुस्त करने के लिए मेरा आपके माध्यम से अनुरोध है कि इसमें सबका सहयोग हो और सब लोग इस काम में लगाए जाएं तथा कानून के तहत इसकी व्यवस्था की जाए।
इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष व्यवस्था की जाए। जैसा मैने पहले ही कहा कि बुजुर्ग लोग,खासकर हमारी माताएं,बहनें जो 60-70साल की उम्र पार कर चुकी हैं,अगर उन्हें घंटों मतदान केन्द्र पर खड़ा होना पड़ता है तो वे वहां लाइन में खड़ी नहीं रह पाती हैं। इसलिए ई.वोटिंग से लेकर अगर अनिवार्य वोटिंग हो तो अनिवार्य वोटिंग करने की व्यवस्था सरकार कानून के तहत बनाये और चुनाव आयोग उस व्यवस्था को करने का काम करे। चुनाव आयोग ने अपने वक्तव्य में तय किया है कि किसी भी मतदाता,जिसकी उम्र 18साल हो गई है,उसे बाहर नहीं जाना पड़ेगा,उसके पास से उसका वोटिंग कार्ड पहुंच जायेगा,यानी इससे मतदाताओं की संख्या और बढ़ेगी। जब मतदाताओं की संख्या और बढ़ेगी तो मतदान करने की व्यवस्था को भी और सुदृढ़ करना होगा। इस तरफ मैं सदन का ध्यान दिलाना चाहता हूं और चुनाव आयोग भी इस पर विवश है और बार-बार अपने विचार भी दे रहा है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जैसे किसी मतदाता की उम्र 18साल हो जायेगी,ऐसे मतदाताओं के घर पर हम वोटर आई.डी. पहुंचाने का काम करेंगे और जब यह होगा तो हमें लगता है कि युवा मतदाताओं की जो जागरूकता है,उसकी संख्या भी और बढ़ेगी और 2030तक एक अरब से ज्यादा मतदाता होंगे,हमें लगता है कि जल्द ही वे एक अरब से ज्यादा पहुंच जायेंगे। इसलिए आज ऐसी व्यवस्था करने की आवश्यकता है।
महोदय,मेरा आपके माध्यम से पुनः सरकार से यह निवेदन है कि सरकार और सदन इस पर गंभीरता से विचार करें और देश और दुनिया में आज यह जो लागू किया गया है,उसे अपने यहां भी लागू करें। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र से हम दुनिया को यह संदेश देने का काम करें कि हम भारत में जब मतदान अनिवार्य करने का कानून बना सकते हैं,जिससे कि यहां के शत-प्रतिशत लोग अपनी सरकार चुनने में सहभागी होंगे,दुनिया के अन्य देशों में भी हमारी कम्पलसरी वोटिंग का संदेश जायेगा और इससे दुनिया में और अपने देश में इसका लाभ मिलेगा।
यही बात कहकर मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे ऐसे प्रमुख मुद्दे जिसमें कम्पलसरी वोटिंग के लिए चर्चा हो रही है,उस पर आपने मुझे विस्तार से बोलने का समय दिया। इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। जय हिन्द,जय भारत।
माननीय सभापति : प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ:
“कि देश में मतदाता द्वारा अनिवार्य मतदान तथा उससे संबधित मामलों का उपबंध करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए।” आगे के वक्ताओं से मेरा अनुरोध है कि इस विषय पर काफी सदस्य बोलना चाहते हैं,इसलिए कोई भी सदस्य बोले तो वह कोशिश करे कि दस मिनट के अंदर ही अपनी बात को समाप्त करे,जिससे मुझे घंटी बजानी न पड़े। श्री सत्यपाल सिंह जी,आप बोलिये।
डॉ. सत्यपाल सिंह (बागपत) : सभापति महोदय,आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया,इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। अभी सम्मानीय सदस्य,श्री सीग्रीवाल जी ने कम्पलसरी वोटिंग,अनिवार्य मतदान के लिए जो अपना प्रस्ताव किया है,वह इस देश के लिए और किसी भी प्रजातंत्र के लिए बहुत सुखदायक चीज है। दुनिया के अंदर 32देशों ने अनिवार्य मतदान का प्रावधान किया था। उसमें केवल 11ने उसे फोर्स के जरिये,छोटी-मोटी सजा के जरिये या फाइन के जरिये एनफोर्स करने की कोशिश की और चार देशों ने उसे एक्सपैरीमैन्ट करने के बाद,प्रयोग करने के बाद छोड़ दिया। इसलिए यह प्रयोग भारत जैसे इतने बड़े प्रजातंत्र के लिए कितना ठीक होगा,इसके ऊपर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। हम लोग कहते हैं कि प्रजातंत्र उस चीज का नाम है,जहां पर लोग कहते हैं कि government of the people, for the people and by the people. सरकार लोगों के द्वारा चुनी जाए,वे उसे चुनें और अपने लिए चुनें। अगर सब लोग,सारी की सारी जनता उसके लिए वोट नहीं डालती,उसे नहीं चुनती तो हम कह सकते हैं कि हमारे देश में प्रजातंत्र ठीक से नहीं बना है। लेकिन बहुत बार कहा जाता है कि हमारे देश के अंदर जिस प्रकार का प्रजातंत्र है,उस प्रजातंत्र के बारे में बहुत पढ़े-लिखे लोग बोलते हैं कि हमारे देश के अंदर डैमोक्रेसी इज़ मोबोक्रेसी है। जिसके पास ज्यादा भीड़ है,जिसके पास ज्यादा वोट है,वही चुना जाता है। ये ज्यादा वोट वाले कहां से आते हैं,कैसे आते हैं?अच्छे लोग,पढ़े-लिखे लोगों को बहुत बार देखा जाता है कि वे वोट नहीं डालते है।
आप शाम के समय देखेंगे कि लंबी लाईन में लगने वाले लोग,झोपड़पट्टी के लोग वोट डालने के लिए लगे हुए हैं। कई शहरों के अंदर मेरा खुद का अनुभव है,जहां मैं पुलिस कमिश्नर था,मैं जा कर के देखता था कि शाम के पांच बज रहे हैं और झोंपड़पट्टी के लोग लंबी लाइनों में,हज़ारों की संख्या में खड़े हैं। पता चलता था कि इसके पीछे दूसरा कारण है। वोट डालने की उनकी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन वोट उनसे डलवाई जा रही थी। वोट कैसे डलवाई जा रही थी?उनको पैसे दे कर वोट डलवाई जा रही थी। अंतिम रूप से कितने पैसे में उनका हिसाब होगा,इसका बाद में फैसला होता है। आज इस देश का दुर्भाग्य है कि जिसको दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र हम कहते हैं,उसमें जिसके पास वोट खरीदने की ताकत है,वह चुन कर आ जाता है। लेकिन एक बात यह है कि जहां मैजोरिटी जिसके पास हो,मुझे याद आता है कि रामायण के अंदर यह बात आती है कि जब भगवान राम वनवास में जाते हैं और भरत उनको मनाने के लिए जाते हैं,तो राम उनको समझाते हुए कहते हैं,राजतंत्र के बारे में जब बात करते हैं तो कहते हैं कि -हे भरत!मुझे यह बताओ कि एक तरफ एक हजार मूर्ख खड़े हैं और एक तरफ एक विद्वान खड़ा है,तो तुम विद्वान की बात मानते हो या मूर्खों की बात मानते हो?अच्छी राजसत्ता कहती है कि विद्वान की बात माननी चाहिए,मैजोरिटी की बात नहीं माननी चाहिए,बहुसंख्यक लोगों की बात नहीं माननी चाहिए। क्या प्रजातंत्र में यह बात सही है?अगर हम लोग अपना इलाज कराना चाहते हैं,एक तरफ दस एवरेज़ काइंड के मैडिकल डॉक्टर हैं,कौन होगा,कौन माँ-बाप होगा जो अपने बच्चे का इलाज एक साधारण डॉक्टर से कराएगा या एक एक्सपर्ट से कराना चाहेगा। कौन अपने बच्चे को दस साधारण टीचरों से पढ़वाना चाहेगा या एक अच्छे मास्टर से पढ़वाना चाहेगा। अगर हम एक प्रोजेक्ट बनाना चाहते हैं,एक रिपोर्ट तैयार करना चाहते हैं,वह रिपोर्ट हम एक इंजिनियर से तैयार कराना चाहते हैं,जो हाईली क्वालिफाईड इंजिनियर है या हम सौ टैक्निशियंस से तैयार कराना चाहते हैं?इस पर गंभीर रूप से बात करने की जरूरत है। जब देश के जनप्रतिनिधि चुनने की बात है,क्या उसमें सब लोग जब वोट डालेंगे,उस आधार पर किया जाए,मैजोरिटी के आधार पर उसको किया जाए या कैसे उसको किया जाए?
प्लेटो ने एक बात कही थी। प्लेटो बहुत बड़े दार्शनिक थे। उन्होंने यह कहा था कि अगर हम पॉलिटिकल प्रोसेस में,इलैक्टोरल प्रोसेस में भाग नहीं लेते हैं तो हमें क्रिटिसाइज़ करने का,कंडम करने का कोई अधिकार नहीं है कि हमारे जनप्रतिनिधि अच्छे नहीं है। अगर हम लोग वोट नहीं डालते हैं तो हमको यह कहने का अधिकार भी नहीं है कि हमारा जनप्रतिनिधि कैसा है। इसलिए पढ़े-लिखे लोगों को समझना पढ़ेगा। इस बार के इलैक्शन में मैं तो पहली बार चुनाव के मैदान में आया हूँ। मुझे मालूम पड़ा है कि हमारे बड़ौत के अंदर जो बिज़नस करने वाले लोग हैं,एक कम्युनिटी के लोग हैं,जिस दिन वोट डलते थे,उस दिन वे तीर्थ यात्रा के लिए निकलते थे। मैंने उनसे मीटिंग की,बात की,उन्होंने कहा कि हमको क्या लेना-देना,इस तरह के लोग चुने जाते हैं,जिनको न हमारे बारे में कुछ लेना है,न देश के बारे में उनको कुछ लेना-देना है। बड़ी मुश्किल से लोगों को सझाया तो लोग मानते हैं। मेरा कहने का मतलब है कि आज हमारे पास यह साधन है कि जिस प्रकार से कौटिल्य कहता था कि -सर्वे धर्मा,राजधर्मणी परिवसंते। दुनिया के सारे धर्म राजधर्म के अंदर परिवर्तित हो जाते हैं। लेकिन राजधर्म कैसा हो?हमारी राष्ट्रनीति कैसी हो?राष्ट्रनीति अगर अच्छी होगी तो शिक्षा नीति अच्छी हो सकती है। राष्ट्रनीति अगर अच्छी है तो कृषि नीति अच्छी हो सकती है। राष्ट्रनीति अच्छी है तो अर्थनीति अच्छी हो सकती है। राष्ट्रनीति अच्छी है तो विदेश नीति अच्छी हो सकती है। राष्ट्र नीति अच्छी है तो हमारी दूसरी जितनी भी नीतिया हैं,सब ठीक हो सकती हैं। इस राष्ट्र नीति को ठीक करने की जरूरत है कि हमारे जनप्रतिनिधि ठीक प्रकार से चुने जाएं। मुझे तो इस बात का बड़ा दुख होता है कि एक मूर्ख आदमी,एक गुंडा और बदमाश आदमी के वोट लेने के लिए जनप्रतिनिधि को उसके हाथ जोड़ने पड़ते हैं,क्योंकि उसकी वोट की कीमत भी उतनी ही है जितनी सज्जन और एक विद्वान आदमी की वोट की कीमत है। क्या हमें सुधार नहीं करना चाहिए?
जब हम इलैक्टोरल प्रोसेस की बात करते हैं,मैं तो इलैक्शन कमीशन और भारत सरकार से निवेदन करूंगा कि इसके बारे में भी सोचा जाए कि विद्वान और सज्जन आदमा के वोट की कीमत एक मूर्ख और क्रिमिनल की वोट से कम से कम दस गुना ज्यादा होना चाहिए। उसके वोट की कीमत क्यों नहीं हो सकती है?इस बात पर सोचने की जरूरत है। आज डिजिटल का जमाना है। जैसे सिग्रीवाल जी बोल रहे थे कि अगर हमारे पास ई-वोटिंग हो सकती है,अगर हमारे पास मोबाईल बूथ हो सकते हैं,हम एसएमएस से अपनी वोटिंग कर सकते हैं,हम पोस्टल बैलेट से अपनी वोटिंग कर सकते हैं,तो इस वहीं उसी बूथ पर जा कर वोटिंग की जाए,यह कंप्लसरी करने की मुझे जरूरत लगती नहीं है। निश्चित रूप से अगर हम ये सुविधाएं देंगे तो बहुत से लोग आगे आएंगे और वोट डालेंगे। डेमोक्रेसी,प्रजातंत्र,लोकतंत्र उसे कहते हैं,जहाँ लोगों के पास स्वतंत्रता हो,लोगों के पास आजादी हो,लेकिन हर एक बात पर अगर सरकार उनको इनफोर्स करे कि नहीं तुम्हें यह करना ही होगा,तो मुझे लगता है कि लोकतंत्र के अंदर कुछ कमी आ जाती है।
जैसा मैंने पहले कहा था,एक आस्ट्रेलिया को छोड़ दीजिए,आस्ट्रेलिया की जनसंख्या केवल चार करोड़ है,ब्राजील को छोड़ दीजिए,ब्राजील की जनसंख्या ज्यादा है,ऐसे छोटे-छोटे देश हैं,जिनका 90परसेंट लोग नाम तक नहीं जानते,जहाँ कंपल्सरी वोटिंग है। दुनिया के बड़े-बड़े देश,चाहे यूरोप हो,अमरीका हो,चाइना हो,जहाँ पर इतनी बड़ी संख्या है और जो अच्छे एडवांस कंट्रीज हैं,उनके अंदर कंपल्सरी वोटिंग नहीं है। जिस देश के अंदर 83करोड़ वोटर्स हैं,मान लीजिए अगर उसके दस परसेंट लोगों को भी फाइन करना पड़े,अगर कल को सरकार यह तय करे कि जो कंपल्सरी वोटिंग नहीं करेगा,उसको हम कोई न कोई सजा देंगे,उसको हम कोई न कोई फाइन करेंगे। क्या हम दस करोड़ लोगों को फाइन कर सकते हैं,क्या हमारे पास वह मैकेनिज्म है?आस्ट्रेलिया के अंदर यह बात आई कि 50डॉलर का फाइन लेने के लिए उन्हें तीन हजार से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। क्या भारत जैसा विकासशील देश इतना पैसा कंपल्सरी वोटिंग के लिए खर्च कर सकता है?इन बातों पर भी विचार करने की जरूरत है।
मैं पुनः आपसे निवेदन करूँगा कि आज इन्फार्म्ड वोटर्स बनाने की जरूरत है,पढ़े-लिखे लोगों की जरूरत है। मैं तो यह भी कहूँगा कि आज हमारे देश के अंदर 18साल की आयु के ऊपर मतदान का अधिकार है,बहुत देशों के अंदर ऐसा है कि जो 18साल से जो ऊपर हैं,उन्हें मतदान करने का अधिकार है। मैं तो यह कहूँगा कि जो बच्चे पढ़ते हैं,जो कॉलेजों के अंदर पढ़ते हैं,यूनिवर्सिटीज के अंदर पढ़ते हैं, वहाँ पर स्टूडेंट यूनियन के इलेक्शन होते हैं, चुनाव होते हैं। क्या शिक्षा संस्थानों के अंदर हमें चुनाव की राजनीति को लाना चाहिए? इसके ऊपर भी गंभीर जायज चर्चा करने की जरूरत है। जो बच्चे पढ़ते हैं, उनको पढ़ने का वातावरण देना चाहिए या उनको राजनीति का वातावरण देना चाहिए। इस पर भी हमें गंभीर विचार करने की जरूरत है। इतनी बात कहकर मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद अदा करता हूँ। धन्यवाद।
श्री प्रहलाद सिंह पटेल (दमोह) : महोदय,सबसे पहले मैं सीग्रीवाल जी को धन्यवाद दूँगा कि वे एक अच्छा विषय सदन में चर्चा के लिए लेकर आए हैं। भारत का लोकतंत्र परिपक्व है। पूरी दुनिया अधिकारों के लिए संघर्ष करती रही है। जो भी सरकार या समाज देने का काम करता है,उसका सम्मान सदैव होता रहा है और वह समाज मजबूत होता रहा है। सीग्रीवाल जी ने यह नहीं कहा है कि कानून केवल दण्ड के लिए बना दिया जाए। उन्होंने अपने भाषण में भी इस बात को साफ कहा है कि इस पर विचार होना चाहिए।
भारत एक बड़ा लोकतंत्र है। मुझे लगता है कि इस लोकतंत्र में हम सबके अपने नजरिए हो सकते हैं। मैं गाँव से आता हूँ,थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा भी हूँ,लेकिन जो अनुभव आता है,वह अनुभव ऐसा है कि जो पढ़े-लिखे,ताकतवर और सुविधा प्राप्त लोग हैं,वे लोकतंत्र के प्रति न तो उतने जवाबदेह हैं और न उनकी वोट डालने में उतनी रूचि है। मैं यह नहीं कहता कि पूरी तरह से वे रूचि नहीं रखते हैं,लेकिन जो आँकड़ा मैं देख रहा था,इसमें मैंने देखा कि जो हमारे कर्मचारियों का मत है,वह 13लाख 65हजार 625है,जो वर्ष 2014का आँकड़ा है। जो पोस्टल बैलेट प्राप्त हुए हैं,वे 11लाख, 54 हजार, 607 हैं। उसके बाद में जो वोट डला,उसमें भी अवैध हुए, 2 लाख 25 हजार, 300 अवैध हुए हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि पढ़े-लिखे लोग जो पोस्टल बैलेट लेते हैं,उसमें इतनी बड़ी संख्या निरस्त होने वाले अवैध मतों की है। उसमें नोटा के लोग भी हैं,जो 8हजार 524हैं। मैं उनकी बात कर रहा हूँ,जो पढ़े-लिखे कर्मचारी हैं,जिन्होंने अपना बैलेट इश्यू कराया।
महोदय,मैं तो सिर्फ इतना ही कहूँगा कि हम दो-तीन चुनौतियों को देखें,जो लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते,जो बुलेट की बात करते हैं,लेकिन बैलेट पर विश्वास नहीं करते। क्या इससे उनका जवाब निकल सकता है,अगर कंपल्सरी वोटिंग होगी,तो लोकतंत्र को न मानने के बावजूद भी चाहे वे नोटा का प्रयोग करें,उन्हें वोट के दायरे में आने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और मुझे लगता है कि यह देश के लिए बेहतर और बड़ी जरूरत है। जो अपने आपको रसूखदार मानते हैं,जो पैसे के दम पर या ताकत के दम पर मतदान को प्रभावित करने का काम करते हैं,ये परिणाम को बदलने की ताकत रखते हैं,यह हमारे लोकतंत्र की कमजोरी है,जहाँ जिन क्षेत्रों में ऐसा है,शायद इस पर भी प्रतिबन्ध लग सकता है।
तीसरी बड़ी समस्या इस देश के भीतर घुसपैठ की है। आजकल तो वोटर आईडी बड़ी आसानी से बन जाता है। इसलिए मुझे लगता है कि खाली इतना ही नहीं है,हमारे यहाँ अपने मतदाता को चिह्नित करने के परिणाम आपको देखने को मिलेंगे जब लोकतंत्र और मज़बूत होगा। जब से देश आज़ाद हुआ है,लोक सभा में अभी तक प्रतिशत में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। 1977को छोड़ दीजिए, 1989 को छोड़ दीजिए, 2014 का आपने देखा। इसके कारण हैं और अगर हम उसके पक्ष और विपक्ष को देखें तो बहुत बड़ा वोटों का परिवर्तन या स्विंग रहा हो,ऐसा मुझे नहीं लगता जैसा देश के आँकड़े बताते हैं। लेकिन एक तरफ कहा जाता है कि बहुत पढ़े लिखे लोगों की ज़रूरत लोकतंत्र के लिए है लेकिन पंचायत का चुनाव देश के किसी भी राज्य में हो,किसी भी सूबे में हो,ग्राम पंचायत के पंच से लेकर सरपंच तक वोटिंग का परसेंटेज कभी 90प्रतिशत से कम नहीं होता है। क्या इस पर विचार किया है?जब हम लोक सभा के चुनावों में जाते हैं तो वोटिंग का प्रतिशत गिर जाता है। मुझे लगता है कि ये ऐसी बातें हैं जिन पर कहीं न कहीं नियम और कानून बनाने की ज़रूरत है। मैं नहीं कहता कि दंड इतना सख्त हो कि उसमें आर्थिक दंड हो। यह चर्चा का विषय है कि हम तरीका क्या अपना सकते हैं। हम किसी को प्रोत्साहित करें जो मतदान करने के लिए जाता है या किसी को हतोत्साहित करें,यह भी एक रास्ता हो सकता है,इसमें कोई दंड जैसी बात मुझे नहीं लगती। लेकिन अगर कोई आंशिक रूप से चरणबद्ध कार्यक्रम हम बनाएँ,जैसे सीग्रीवाल जी ने कहा है कि वास्तव में कुछ देश ऐसे हैं जो वृद्धों को इस बात की छूट देते हैं। हम भी ऐसा कर सकते हैं। बीमार लोगों को छूट देते हैं,ऐसा हम भी दे सकते हैं। जहाँ पर भौगोलिक रूप से ऐसी परिस्थितियाँ हैं कि जहाँ पर आसानी से आया और जाया नहीं जा सकता,हम वहाँ पोलिंग बूथ पहुँचाते हैं,वह हम करते हैं। लेकिन इस सबके बावजूद भी लोग वोट डालने में रुचि नहीं रखते। इसलिए मुझे लगता है कि यह बहस बेहतर बहस है। मैं उन चुनौतियों से रूबरू होता रहा हूँ इसलिए मैं मानता हूँ कि निश्चित रूप से कोई न कोई ऐसा नैतिक कानून ही सही,कोई ऐसी नैतिक ताकत हमारे सामने खड़ी होनी चाहिए। एक होता है कि नेता और पार्टी जिसको जागरूकता का काम करना चाहिए।
सभापति महोदय,आपका अनुभव इतना विशाल अनुभव है कि आप इस बात को स्वीकार करेंगे। हमारी विचारधारा,हमारा नेतृत्व,हमारा राजनीतिक संगठन,उनकी जो गतिविधियाँ हैं या उनके जो काम करने के तरीके हैं,मुझे लगता है कि पहले हम जैसे लोग जब आए थे तो हम विचारों के आधार पर पार्टियों में आए थे। लेकिन आज जो परिस्थितियाँ हैं,वह आंदोलन खड़ा करने में विफल रही हैं,यह इस देश की सच्चाई है। इसलिए कानून की बात आ रही है। ऐसा नहीं है कि अचानक चर्चा सदन में आई है। यह परिस्थितियाँ इसलिए आई हैं कि जब कभी नेतृत्व इतना ताकतवर रहा कि जिसने समाज को आंदोलित किया,तो लोग उसके साथ चलकर सड़क पर भी आए हैं,और मतदान केन्द्रों तक भी जाने की कोशिश की है। या तो फिर पार्टी का विचार इतना ताकतवर होता है कि जब कभी समाज आंदोलित होता है तो वह सड़क पर भी आता है और मतदान केन्द्र पर जाने के लिए भी उत्साह के साथ और पूरे गौरव और गरिमा के साथ जाता है। आज वह परिस्थितियाँ हैं। कैडर हो,संगठन का तंत्र हो जो विचारधारा से अभिप्रेत हो,जब तीनों चीज़ें गिरावट की तरफ महसूस होती हैं,तब यह चर्चा आती है कि कहीं न कहीं किसी कानून की ज़रूरत है। वह कानून नैतिक मूल्यों पर आधारित होगा,वह दंडात्मक कार्रवाई आर्थिक रूप से करेगा या कोई नया कानून बनाएगा,मुझे लगता है कि इस पर ज़रूर बहस होनी चाहिए। बहुत सारे हमारे माननीय सदस्य जो तमाम जगहों से आते हैं,इस पर ज़रूर अपनी बात कहेंगे। मैं तो आपसे सिर्फ इतना ही आग्रह करूंगा कि मैं यह मानता हूँ कि निश्चित रूप से देश में मतदान अनिवार्य होना चाहिए। क्योंकि हमारा देश भारत 60प्रतिशत नौजवानों का देश है जिनकी उम्र 35वर्ष से कम है। इसलिए शिक्षा का सवाल हमारे सामने नहीं है। हमारे सामने सवाल है कि वह देश की नीतियों के प्रति रुचि रखते हैं या नहीं। वह देश की राजनीतिक पार्टियों के प्रति विश्वास रखते हैं या नहीं। वह देश की उन्नति में हिस्सेदार बनना चाहते हैं या नहीं। मैं मानता हूँ कि बुज़ुर्गों को तो रिलैक्सेशन मिलना ही चाहिए,लेकिन जो 60प्रतिशत आबादी है,जिनकी उम्र 35वर्ष से कम है,मैं मानता हूँ कि उनमें से अधिकांश पढ़े लिखे हैं और हो सकता है कि पाँच प्रतिशत पढ़े लिखे न हों। अधिकांश लोग इतने पढ़े लिखे ज़रूर हैं कि जो अखबार पढ़ सकते हैं,जो टीवी देखते हैं,जो देश की नीतियों पर विचार कर सकते हैं,दलों के विचारों को आत्मसात कर सकते हैं या उसकी आलोचना कर सकते हैं,संगठन में हिस्सेदारी कर सकते हैं। ज़रूरी नहीं है कि सारे लोग प्रोफैशनल तरीके से राजनीति करें। जो कुछ लोग कहते हैं,मैं उनको सिर्फ इतना ही कहूँगा कि चाहे लोहिया जी हों या दीनदयाल जी हों,उन्होंने कभी उपाधि के आधार पर नेता बनाने की बात नहीं की है। जिन्होंने ज़मीन पर दर्द को देखा और अपने आपको समाधान के रूप में प्रस्तुत किया,वे राजनीति करें। यह प्रबंधन की राजनीति दो दशकों की राजनीति है। इसके पहले की राजनीति नहीं है। इसलिए राजनीति की परिभाषा को बदलने की गलती कोई न करे। हिन्दुस्तान की धरती पर खड़े होकर यदि कोई ईमानदारी के साथ समस्या को आत्मसात करेगा तो मेरा विश्वास है कि वह उसका निदान ज़रूर देगा। उसको किसी उपाधि की आवश्यकता नहीं है। इसलिए मतदाता हो या राजनीतिक कार्यकर्ता हो,उसकी हैसियत को कम करके आँकना,उसको किसी दायरे में बाँधकर चलना कि कौन बुद्धिमान है और कौन कम बुद्धिमान है,यह फैसला करने का अधिकार हिन्दुस्तान का समाज नहीं देता।
मैं इतना जरूर मानता हूं। मैं इस अवसर पर सीग्रीवाल जी को धन्यवाद दूंगा और मैं इस विधेयक का समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं कि निश्चित रूप से इस देश में अनिवार्य मतदान की प्रणाली होनी चाहिए। सरकार इस पर जरूर विचार करे।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
माननीय सभापति: आपको भी धन्यवाद कि समय के अन्दर अपना वक्तव्य समाप्त कर दिया। श्री जगदम्बिका पाल।
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): अधिष्ठाता महोदय,मैं आपका अत्यन्त आभारी हूं कि आपने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर,जिसके सम्बन्ध में माननीय सदस्यों ने बहुत सारगर्भित और बहुत महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं,मुझे बोलने का अवसर दिया है।
मेरे हाथ में इलैक्टोरल कमीशन की एक रिपोर्ट भी है। मैं उसके बहुत विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं,लेकिन आज पूरी दुनिया में डिबेट हो रही है कि जिस तरह से डैमोक्रेसी की बात है,जो भी आज पार्लियामेंटरी डैमोक्रेसी की दुनिया में सबसे अच्छी एक गवर्नेंस की बात है,सुशासन की बात किसी भी देश में है,सभी मुल्कों में आज यह सबसे अच्छी प्रबन्धन व्यवस्था मानी जाती है। अगर दुनिया में डैमोक्रेसी एक सबसे अच्छी प्रणाली है और उस प्रणाली को दुनिया के अधिकांश देश स्वीकार कर रहे हैं तो निश्चित तौर से वह डैमोक्रेसी किसके द्वारा है, For the people, by the people, of the people, अगर देश की जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार देश की जनता के लिए या देश की जनता के द्वारा है तो आज निश्चित तौर से जब देश की जनता का पार्टीसिपेशन होगा,तभी किसी देश की सरकार के बारे में उसकी जनता की भावनाओं का रिफ्लैक्शन होगा। इस देश में बहुत सी महत्वपूर्ण बातें उठाई गईं,मैं उन महत्वपूर्ण बातों में नहीं जाना चाहता हूं कि आज इंग्लैंड में क्या डिबेट हो रही है,आस्ट्रेलिया में तो निश्चित तौर से पिछले 1924के चुनाव से लेकर 90प्रतिशत वोट लगातार पड़ रहे हैं,मैं उस पर भी नहीं जाना चाहता। मैं तो अपने मुल्क के परिप्रेक्ष्य में बात कहना चाहता हूं कि अपने मुल्क में जिस समय आजादी की लड़ाई हो रही थी,हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लड़ रहे थे तो आखिर क्या वे सत्ता के लिए लड़ रहे थे या इस देश की व्यवस्था के लिए लड़ रहे थे। गुलामी की दासता की जंजीरों से मुक्ति के लिए वे फांसी के फंदे को चूम रहे थे,हंसते-हंसते अपने जीवन का बलिदान कर रहे थे,बहनें अपने भाई को राखी बांधकर के स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में विदा करती थीं और मां अपने बेटे को बलिदान देने के लिए,अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार थीं,पत्नियां अपना सुहाग का बलिदान देने के लिए तैयार थीं। अगर देश को इतनी बड़ी कुर्बानियों के बाद आजादी मिली है तो क्या अब हम उस देश की आजादी के बाद 2015में इस बात की भी चिन्ता करें,इलैक्शन कमीशन इस बात की चिन्ता करे कि लोग मतदान के दिन अधिक से अधिक मतदान करें।
अगर किसी सरकार से आप अपेक्षा करते हैं,गुड गवर्नेंस की अपेक्षा करते हैं,सरकार से सुशासन की अपेक्षा करते हैं तो सरकार से तभी आपको कम्प्लेण्ट करने का अधिकार है,जब कम से कम आप अपने मतदान का प्रयोग करें। आज देश में जिस तरह की परिस्थितियां हैं,उनमें लगातार पूरी सरकारें इस बात का प्रयास करती हैं,इलैक्शन कमीशन इस बात का प्रयास करता है कि टर्नआउट ज्यादा से ज्यादा हो,लेकिन तब भी आप देखते हैं कि 50प्रतिशत, 55 प्रतिशत, 60 प्रतिशत,जिस तरीके का मतदान होता है तो उस मतदान में अगर लोग किसी भी राज्य में या देश में 30परसेंट, 35 परसेंट या 40परसेंट लोग मतदान नहीं कर रहे हैं और उसके बावजूद एक राइट टू कम्प्लेण्ट का अधिकार प्रयोग करना चाहें कि हमारा तो अधिकार है कि हम सरकार के खिलाफ कम्प्लेण्ट करें तो मैं समझता हूं कि उनको अपने दायित्व का भी निर्वहन करना चाहिए,उनको अपने कर्तव्य का भी बोध होना चाहिए कि अगर किसी सरकार से हमें कम्प्लेण्ट करने का अधिकार है तो उस सरकार को बनाने में भी उनकी सहभागिता होनी चाहिए,सरकार को बनाने में उनकी निश्चित तौर से भागीदारी होनी चाहिए।
हम यह कहना चाहते हैं कि अगर लोगों ने उस आजादी की लड़ाई में इन्न्यूमरेबल सैक्रीफाइसेज़ किये,जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने किया था तो उनकी इच्छा यही रही होगी कि जब देश आजाद होगा तो निश्चित तौर से लोगों को एक लिबर्टी होगी और लोग अपनी सरकार को स्वयं चुनेंगे तो वह एक परिकल्पना रही होगी कि देश का एक-एक व्यक्ति जो हमारा संविधान है,उस संविधान के आर्टीकल 19में जब हर व्यक्ति को समानता का अधिकार है, Right to freedom of speech and expression, right to liberty to settle anywhere, right to adopt any job. जब हिन्दुस्तान के हर व्यक्ति को संविधान के एक नागरिक के रूप में उस समतामूलक समाज की बराबरी का अधिकार है तो स्वाभाविक है कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने यही कल्पना की होगी कि एक-एक व्यक्ति का विचार किया होगा,जिसमें हैव या हैव नॉट की बात नहीं रही होगी,जिसमें गरीब और अमीर का सवाल नहीं रहा होगा। वज़ीर और फकीर का सवाल नहीं रहा होगा। आप तो उन संघर्षों से निकले हैं। आपने खुद कई बार इसका उल्लेख किया है कि अगर आप यहां मौज़ूद हैं तो यह उसी संविधान की देन है या उसी प्रजातांत्रिक प्रणाली की देन है। यह स्वाभाविक है कि अगर उस प्रजातांत्रिक प्रणाली में देश के सभी लोगों की सहभागिता होगी तो सही मायने में उसका प्रतिनिधित्व होगा। चाहे महात्मा गांधी जी रहे हों, भगत सिंह जी रहे हों, नेहरू रहे हों, उन लोगों ने ब्रितानिया हुकूमत से लड़ाई लड़ी और जाने-अनजाने कितने लोग शहीद हुए। अंडमान-निकोबार के सेल्यूलर जेल में वीर सावरकर से लेकर कई लोगों ने अपनी जिंदगी दे दी। मैं कहना चाहता हूं कि इसे आज एक सिविक डय़ूटी के रूप में लेना चाहिए।
यह ठीक है कि इस पर बहस हो रही है कि मतदान को कम्पलसरी किया जाए, लेकिन मैं एक नागरिक के रूप में समझता हूं कि जो व्यक्ति इस देश का नागरिक है, तो नागरिक होने के नाते उसकी सिविक डय़ूटी क्या है? अगर वह कम्पलसरी एजुकेशन की मांग करता है कि शिक्षा का अधिकार सब को मिले, तो हमारी सरकार उस दिशा में प्रयास कर रही है कि हम सभी को शिक्षा दें। आज हम डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी के तहत शिक्षा की बात कर रहे हैं या कम्युनिटीज़ के प्रति हमारी डय़ूटीज़ की बात हो रही है। अगर आप United Nations Universal Declaration of Human Rights की Charter of Demands को देखें तो उसमें टैक्सेशन की बात की गयी है कि टैक्स देना हर आदमी की जिम्मेदारी है, स्टेट को एजुकेशन देने की रिस्पॉन्सिब्लिटी दी गयी है, उसी तरीके से उस डिक्लेयरेशन में यह भी है कि वोटिंग भी व्यक्ति की सिविक डय़ूटी है।
आज हम यह अपेक्षा करते हैं कि वोट देना देश के हर नागरिक का कर्तव्य है। यह सदन देश के उन तमाम करोड़ों लोगों की भावनाओं को प्रदर्शित करने वाला है। इसकी चिंता हमारे तमाम माननीय सदस्यों ने की कि जिस दिन वोटिंग होती है, उस दिन लोग समझते हैं कि आज छुट्टी का दिन है, घर में हम टीवी देखेंगे, कहीं पिकनिक करने जाएंगे। क्या यह सही है कि लोग जब अपने अधिकारों की बात करते हैं और उन्हें अपने कर्तव्य का ज्ञान न हो? उन्हें जिस दायित्व का बोध होना चाहिए, अगर वह नहीं होगा तो फिर निश्चित तौर पर सदन में यह बात उठती है कि सभी के लिए वोटिंग को कम्पलसरी किया जाए। ऐसा नहीं है कि भारत में इसके लिए पहली बार कोई पहल हो रही है। वर्ष 2013 में जो रिपोर्ट आयी है, उसमें 22 देशों ने वोटिंग को कम्पलसरी किया है। इसमें अर्जेन्टीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील इत्यादि देश हैं। In Australia, it is compulsory for Federal and State elections for citizens of 18 years of age and above. In Brazil, it is compulsory for literate citizens between 18 and 65. इसी तरह,साइप्रस,इक्वेडोर,नॉरू,पेरू,सिंगापुर इत्यादि देश हैं। अगर इन मुल्कों ने उसे कम्पलसरी किया है तो हमें वहां से भी अनुभव लेने चाहिए।
महोदय,आपने जो कहा है,उसी के अनुसार मैं केवल दस मिनट में ही अपनी बात रखूंगा।
माननीय सभापति : आठ मिनट हो गए हैं।
श्री जगदम्बिका पाल: ठीक है। मैं कोशिश करूंगा कि इसे जल्दी समाप्त करूं।
महोदय, इस तरह से मैं समझता हूं कि हम जैसे पॉलिटीकल सिस्टम के लोग और देश के बहुत से नागरिक भी यह चाहते हैं कि इलेक्शन में अधिक से अधिक लोग अपने मताधिकार का उपयोग करें और हाई वोटर टर्न-आउट हो। मैं समझता हूं कि अगर वोटिंग कम्पलसरी होगी, तो high degree of political legitimacy will be there because they result in high voter turnout. इस संबंध में मैं यह भी कहना चाहूंगा कि जो नागरिक डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में रहते हैं,उनकी यह डय़ूटी है। इसका यह मतलब नहीं है कि वे डेमोक्रेसी को टेकेन-फॉर-ग्रांटेड ले लें,कि चाहे हम वोट करें या न करें। मैं समझता हूं कि उसका अधिकार तभी बनता है,जब वह वोट करे।
सिग्रीवाल साहब,जो इस विषय को लेकर आए हैं,इसमें इस देश के लोगों की इच्छा क्या है? The outcome of an election where voting is compulsory reflects more of the will of the people.देश में यहां अगर कंपल्सरी वोटिंग होगी,क्योंकि आज आस्ट्रेलिया में नब्बे प्रतिशत लोग मतदान करते हैं,दस प्रतिशत के लिए जैसा हमारे साथियों ने कहा,मैं उन बातों की पुनरावृत्ति नहीं करना चाहता हूं कि कोई बीमार है,हास्पिटलाइज है,तो उसका सर्टिफिकेट दें या जो वोट नहीं करता है,उसको पेनाल्टी किया जाए,फाइन लगाया जाए,ये सब उपाए उन्होंने बताये हैं। निश्चित तौर से सरकार इस बात पर विचार करे। गुजरात ने इसकी पहल की थी,वहां कारपोरेशंस के चुनाव में यह हुआ। ..(व्यवधान)मेरी बहन गुजरात का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में आज गुजरात मॉडल की प्रशंसा हो रही है। ...(व्यवधान)नहीं तो फिर उसकी प्रशंसा हो रही है कि मुख्यमंत्री जी बैठे रहें और एक व्यक्ति उनके सामने खुदकुशी कर लें। शायद यह देश के लिए सबसे बदनुमा दाग होगा। मैं कहना चाहता हूं कि निश्चित तौर से इसके लिए गुजरात ने पहल की है। वहां सारे कारपोरेशंस के इलेक्शन में या नगर पालिका संस्थाओं में कंपल्सरी वोटिंग है,तो आगे निश्चित तौर से इस स्टेज को पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में जहां पंचायती राज में थ्री टीयर सिस्टम है,उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका लोकसभा की है। ...(व्यवधान)
माननीय सभापति : आप समापन करें।
श्री जगदम्बिका पाल : महोदय,दो मिनट में आपनी बात समाप्त कर रहा हूं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि अपने देश में भी हमने गुजरात से प्रयास शुरू किया है और इसे आगे बढ़ाना चाहिए। सबसे बड़ी चिंता की बात मैं आखिरी कह दूं कि ऐसा लगता था कि हंग ही पार्लियामेंट आएगी,हंग असेंबलीज आएंगी। देश की आम जनता को चिंता होने लगी थी कि फ्रैक्चर्ड मैनडेट आ रहा है। जिस तरीके से गठबंधन की सरकारें होती थीं,उसमें कंपल्शंस होते थे और कई तरह की घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में हुईं। कई स्कैम इसलिए हुए कि पॉलिटिकल कंपल्शंस में केवल उनको जिस तरह से लिया गया,उस पर कोई अंकुश नहीं लगा। उसकी परिणति आपने देखी कि पूरी दुनिया के सामने भारत का सिर शर्म से झुक गया। इस देश में लोगों ने टर्न आउट किया,हाई टर्न आउट हुआ। आज देश में एक स्पष्ट बहुमत की सरकार बनी। आप देख रहे हैं कि चाहे मेक इन इंडिया की बात हो,क्लीन इंडिया की बात हो,डिजिटल इंडिया की बात हो,आज देश पहल कर रहा है। लोगों में विश्वास पैदा हो रहा है।
माननीय सभापति : आप समाप्त करिए,आपने तीन मिनट समय ज्यादा ले लिया है।
श्री जगदम्बिका पाल : मैं समझता हूं कि जो विषय सीग्रीवाल जी लाए हैं,यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण विषय है। मैं समझता हूं कि इससे एक्सपेंडीचर भी कम होगा। जो हमारी पॉपुलेशन है,वह भी इन्फार्म्ड होगी,जो हमारी हंग और पॉलिटिकल इनस्टैबिलिटी होती थी,वह भी कम होगी। इन सब चीजों को देखते हुए,जो वह प्रस्ताव लाए हैं,मैं उसका समर्थन करता हूं।
श्री रत्न लाल कटारिया (अम्बाला) : सभापति जी,श्रीमान सीग्रीवाल जी द्वारा जो कंपल्सरी वोटिंग का प्रस्ताव लाया गया है,मैं उस पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। राइट टू वोट बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की,संविधान निर्माताओं की हिंदुस्तान के आवाम को एक अनुपम भेंट है। उसी का ही यह परिणाम है कि आज हिंदुस्तान ने 16लोक सभा के चुनाव और राज्य के चुनावों को बहुत अच्छी तरह से निभाया है। हम एक जागरूक देश हैं। जहां हमने लोकतंत्र की खूबियों को बहुत अच्छी तरह से पहचाना है,उन पर काम भी किया है,वहीं हर सिस्टम के अंदर कहीं न कहीं कुछ कमियां भी आई हैं। अभी चार दिन पहले 15जनपथ के ऊपर बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय स्टडी सेंटर का उद्घाटन करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने वोट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि अगर बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हिंदुस्तान के संविधान के अंदर राइट टू वोट न दिया होता तो मैं आज यहां पर नहीं होता।
हमारे ही देश के अन्दर पहले रजवाड़ों को वोट डालने का अधिकार था,बड़े-बड़े लोग ही वोट डाल सकते थे,लेकिन संविधान निर्माताओं ने इस वोट के अधिकार को दलित वर्ग,पिछड़े वर्ग और महिलओं को भी वोट का अधिकार दिया है। भारत में जो निर्वाचन आयोग बना,वह भी एक अनुपम भेट है जिसने हिन्दुस्तान में समय-समय पर चुनावों को बहुत पारदर्शी तरीके से कराया है। हमने देश की आजादी के बाद ऐसा समय भी देखा है,हालांकि उस समय पंजाब के हालात बिगड़े हुए थे लेकिन पंजाब के एक चुनाव में ऐसा समय भी आया है कि एक-एक संसदीय क्षेत्र में दो-ढाई लाख वोट थे लेकिन कुल मतदान एक प्रतिशत हुआ और जिस व्यक्ति को 120वोट मिले,वह एम.एल.ए. बन गया। इसी तरह जब जम्मू-कश्मीर में चुनाव का बायकॉट हुआ तो वहां पर भी चुनाव बहिष्कार के ऐसे दृश्य देखने को मिले कि जब नाम मात्र वोट प्राप्त करने वाला व्यक्ति चुन कर सदन में चला आय। It is mockery of the Indian Constitution and it is mockery of the democratic system. जब जनमत को धन-बल के आधार पर प्राप्त कर लिया जाय,या कुछ दबंग काले धन का प्रयोग करके जनमत को प्रभावित करते हैं तो इससे हिन्दुस्तान का लोकतंत्र कलंकित होता है।
सभापति महोदय,इसी सदन में हालांकि वह डायरैक्ट वोटिंग नहीं थी,आप भी उस समय संसद के सदस्य थे और आज भी आप इस महान सदन के सदस्य हैं,वोट का क्या महत्व है,यह सारी दुनिया ने देखा है?जब भारत माता के लाल श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट से चली गयी थी। उस दृश्य को इस महान सदन के अंदर दुनिया ने देखा था कि वोट का महत्व क्या है,एक वोट का क्या महत्व है?एक वोट के कारण हिन्दुस्तान के 125करोड़ लोगों को दोबारा मतदान के अंदर झोंक दिया गया था। यह हमारे प्रजातंत्र के अंदर वोट के महत्व का दर्शाता है। आज 50प्रतिशत से ज्यादा कहीं पर वोटिंग होती है और कोई चुनकर सदन में आते हैं तो जनता की उसमें श्रद्धा नहीं होती है। ऐसे जनप्रतिनिधि के बारे में लोग सोचते हैं कि उनको तो 50प्रतिशत लोगों ने तो वोट ही नहीं दिया है। यह ठीक है कि वह अपना कार्यकाल पूरा कर लेते हैं लेकिन उसे पॉपुलर मैन्डेट हासिल नहीं होता है। इसलिए आज कम्पलसरी वोटिंग की बात उठ रही है। भारतवर्ष के अंदर जो डिजिटल क्रांति आ रही है,नये-नये उपकरण आ रहे हैं,चुनाव आयोग भी मतदान कराने के लिए मुहीम चलाता है और उस मुहीम का नतीजा भी हर चुनाव के अंदर देखने को मिल रहा है कि वोट का कुछ परसेन्टेज बढ़ रहा है। अगर इसे दूसरे ढंग से चलाया जाये,डिजिटल के माध्यम से चलाया जाये,वोट के इस राइट को कम्पलसरी भी कर दिया जाये और चुनाव आयोग आने वाले समय में ई-वोटिंग के माध्यम से सारे देश में एक प्रकार की व्यवस्था खड़ी कर दे,चाहे उसको प्रथम स्टेज या द्वितीय स्टेज,उसे इस प्रकार भी अपनाया जा सकता है। क्योंकि इतने बड़े देश में सारे सिस्टम को तैयार करने में भी कुछ समय लगेगा। आज वोट का महत्व इतना बढ़ गया है कि देश के प्रजातंत्र को मजबूत करने के लिए कम्पलसरी वोट होना बहुत जरूरी है। मैंने देखा है कि हिन्दुस्तान का मतदाता चाहे वह पढ़ा-लिखा है या अनपढ़ है,वह जिस प्रकार वोट करता है सारी दुनिया चकित रह जाती है।
संयोग से मैं वर्ष 2000में न्यूयार्क यूएनओ में एक चुनाव में पार्टीसिपेट करने गया था। उस समय अमरीका में भी राष्ट्रपति का चुनाव चल रहा था। हमने देखा कि एक महीने तक उस चुनाव का नतीजा ही नहीं निकल सका। पता नहीं क्या गड़बड़ हुई,किसी स्टेट में कम मतदान था। हिन्दुस्तान का मतदाता इतना तेज है कि जैसे ही वोटिंग मशीन का बटन दबाता है तो सारी दुनिया चकित रह जाती है। आपने 16वीं लोक सभा के चुनाव के नतीजे देखे होंगे। हिन्दुस्तान के युवाओं,पिछड़े,गरीब लोगों ने इस प्रकार के व्यक्ति में अपना विश्वास प्रकट किया जिन्होंने सारी दुनिया को दिखा दिया कि हिन्दुस्तान का लोकतंत्र कितना मजबूत है।
मैं आज यही अनुरोध करना चाहूंगा कि मतदान कम्पलसरी बनाने के लिए,मतदात को जागरूक करने के लिए,हिन्दुस्तान में चुनाव सुधार लागू करने के लिए जितने कदम उठाए जाएं,मैं उन सबका समर्थन करता हूं। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया,मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं।
श्री पी.पी.चौधरी (पाली) : सभापति महोदय, मैं सीग्रीवाल साहब का बहुत धन्यवाद अर्पित करता हूं कि वे कम्पलसरी वोटिंग बिल, 2014 चर्चा के लिए सदन में लेकर आए। जहां तक वोटिंग का सवाल है, यह ऐसा सिस्टम है जिसमें मतदाता वोट डालने के लिए ऑब्लाइज्ड है। अगर वह वोट नहीं दे पाता तो प्युनिटिव मेजर्स, सिविल लॉयबिलिटी या सिविल पैनल्टी आदि दी जा सकती है। कम्पलसरी वोटिंग में यह भी है कि सरकार द्वारा कई तरह के बैनिफिट्स जैसे सब्सिडी आदि दिए जाते हैं, इसलिए उसे वोटिंग में भाग लेना भी जरूरी है। जहां तक कम्पलसरी वोटिंग की बात है, हमें दूसरी कंट्रीज को भी देखना है। विश्व की लगभग 22 कंट्रीज ऐसी हैं जिन्होंने कम्पलसरी वोटिंग के लिए कानून बना रखा है। उसमें से लगभग 13 कंट्रीज उसे एनफोर्स भी कर रही हैं। जहां तक कानून बनाने की बात है, अर्जेंटिना ने 1912 में कानून बनाया, आस्ट्रेलिया ने 1924 में बनाया। वहां कम्पलसरी वोटिंग सक्सैसफुली चल रही है। आज की तारीख में माना जाता है कि हमें संविधान द्वारा वोट का जो अधिकार मिला है, वह सिविक राइट है, लेकिन सिविक डय़ूटी में कन्वर्ट नहीं हो पाया है। राइट टू वोट है लेकिन डय़ूटी टू वोट संविधान में अभी सम्मिलित नहीं हो पाया है। इसीलिए डय़ूटी टू पार्टीसिपेट इन डिसीजन मेकिंग आज के समय में बहुत जरूरी हो गया है। हमारे माननीय सदस्यों ने यह भी बताया कि पोलिंग की कम परसेंटेज होने की वजह से 11 प्रतिशत के कैंडिडेट भी जीत जाते हैं।
17.00 hrs राइट टू कम्पलसरी एजुकेशन के सिद्धांत को संविधान के मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है। संविधान में राज्यों के नीति निदेशक तत्व में संशोधन करके वोट डालने को सिविक डय़ूटी के रूप में कन्वर्ट करना चाहिए। वोट देना डय़ूटी टू कम्यूनिटी है। जहां सिविक डय़ूटी होगी वहां वोट डालना भी जरूरी होता है। यूनाइटेड नेशन के यूनिवर्सल डिक्लरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स में वोट देने को डय़ूटी टू कम्यूनिटी माना गया है। अगर वोट देना डय़ूटी टू कम्यूनिटी है तो कम्पलसरी वोटिंग बहुत जरूरी है। अनुच्छेद 19में फ्रीडम टू स्पीक एंड फ्रीडम नॉट टू स्पीक का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि सिविक डय़ूटी राइट टू वोट में सम्मिलित नहीं है। भारत में समय-समय पर संपन्न हुए चुनावों में वोटिंग ऑफ परसेंटेज बहुत कम होती है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि शहरी मतदाता कम वोट डालता है और गांव के लोग कम वोट डालते हैं। किसी गांव में मतदाता बहुत कम वोट डालते हैं और किसी गांव में बहुत ज्यादा वोट डालते हैं। मुंबई जैसे शहर में पोलिंग परसेंटेज बहुत कम होता है। कुल वोटिंग 50परसेंट होता है और 25-30परसेंट में सरकार बन जाती है। यह प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं है,इसलिए कम्पलसरी वोटिंग को लागू करना बहुत जरूरी है। ग्लोबोलाइजेशन के दौर में लोगों का बड़े पैमाने पर माइग्रेशन हुआ है। मेरे लोक सभा क्षेत्र पाली से सात लाख मतदाता माइग्रेट करके देश के भिन्न-भिन्न प्रांतों में गए हुए हैं। हमें ई-वोटिंग का प्रोसिजर शुरू कर देना चाहिए। कम्पलसरी वोटिंग तभी सफल होगी जब हम ई-वोटिंग पर विचार करेंगे। अगर हम ई-वोटिंग को लागू करेंगे तो मतदाता देश में चाहे 500या 1000किलोमीटर की दूरी पर भी होगा तब भी वह ई-वोटिंग के जरिए वह अपना मत दे सकेगा,तभी हम कम्पलसरी वोटिंग के सिद्धांत को लागू कर पाएंगे। इन्होंने जो प्रस्ताव रखा,इसके लिए मैं इनको बहुत धन्यवाद देता हूं। वोटिंग राइट के साथ-साथ एक सिविक डय़ूटी भी होनी चाहिए। यह डय़ूटी हम कम्यूनिटी के लिए करते हैं। हम सरकार से फायदा लेते हैं तो वोट देना अधिकार के साथ-साथ डय़ूटी भी होना जरूरी है। मैं बिल लाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।
17.04 hrs (DR. P. Venugopal in the Chair) श्री भर्तृहरि महताब (कटक) : सभापति महोदय, ऐसा नहीं है कि सभी को प्राइवेट मेम्बर बिल के सपोर्ट में ही बोलना चाहिए। मैं प्राइवेट मेम्बर बिल के विरोध में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।
I was expecting Shri Choudhary to speak on the part of legality of this Bill. This Bill has a number of flaws. The first and foremost flaw is about the incentive for voting. जैसा उन्नीसीवें पैरा में कहा गया है कि Any person who despite his illness or physical incapacity has exercised his right to vote in an election or any person who has exercised his right to vote at all elections held during a period of 15 years preceding the commencement of this Act without any break, he will get job or services under Central Government and he will get preference in admission to the institutions of higher education. What would be his age? The age of adult suffrage in our country is 18 years. अगर उसी साल वह वोट देने लायक बनता है,यानी वोटर लिस्ट में नाम आ जाता है और वह लगातार 15साल तक वोट देता रहे,तो by that time his age would be 33 years. And at the age of 33 years, what government service will he get?
श्री पी.पी.चौधरी: आप डिटेल में न जाकर प्रिंसिपल को फालो कीजिए। ...(व्यवधान)
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB: This is a Bill. I was expecting Mr. Chaudhary to go between the lines.
Secondly, which institute of higher education will admit a person who is above 33 or 35 years of age? And what is he going to learn? What higher study or research will he pursue at that age by casting his vote, which he was otherwise unable to get?
The other aspect which I would like to mention here is the penalty provision. I would say, our colleague Janardanji will explain it, that this penalty provision in effect targets the poor. This is a charge which I would say he has to explain. If somebody does not vote, there are provisions for fine of Rs.500, two-day imprisonment, forfeiture of his ration card, rendered ineligible for contesting any election for a period of ten years, ineligible for allotment of a plot or a house by a government-owned organization, ineligible for entitlement of any welfare scheme announced by the government. A majority of these penalties are targeting the poor. You are not targeting the rich.
Poor people do not go to cast their vote because they lose employment, they lose their earning. Unless somebody provides for that, they do not come to vote. You are forcing him to come to the polling booth and cast his vote, and if he does not do, you are denying him this type of things.
Many rich people also do not come to the polling booths to vote. They do not stand in queues unless there is a photo opportunity. Unless the electronic media comes there and takes photographs, they do not come to cast their votes. It may be happening in Delhi or in Mumbai but many rich people do not waste their time to come to the polling booth and cast their vote. It will not be a big thing to pay Rs.500 for them. Imprisonment for two days of course will deny them social prestige. Who is bothered about ration card? Rich people are not at all bothered. I would have been happy if certain amendments had come on how to target the rich people, the educated people who always deride our democratic process and at the same time take advantage of the provisions that our Constitution gives them.
I will come to the other aspects. Chaudhary sahab and Jagdambika Palji have very categorically mentioned about those countries which have compulsory voting mechanism in their country. I would say that since the time of Herodotus the word democracy has been used to denote the form of government in which the ruling power of a state is largely vested not in any particular class or classes or groups but in the members of the community as a whole. That is how the word democracy had come into existence. I believe a country cannot be regarded as fully democratic if a significant percentage of its electors does not exercise its right to vote.
Democracy can be a direct or indirect democracy. In a direct democracy, every person exercises the power of the Government. The people as a whole not only carry on the Government, but can even change the Constitution on their own.
In an indirect democracy, the people elect their representatives who carry on the administration of the Government directly. It is known as representative democracy. Our Constitution provides for representative democracy.
Indian Constitution has adopted the system of Universal Adult Suffrage to secure political justice. Right to vote is also provided under Representation of People Act. It provides, “No person who is not, and except as expressly provided by this Act, every person who is, for the time being entered in the electoral roll of the constituency shall be entitled to vote in that Constituency.” Since the elections are the life-blood of democratic procedure, it is via the act of voting that democratic principles are protected. The main purpose of the electoral system is to exchange votes cast by electors into seats in the Parliament. Compulsory voting is not a new concept. Some of the countries that introduced mandatory voting laws were Belgium in 1892, Argentina in 1914 and Australia in 1924.
Compulsory voting is a system in which electors are obliged to vote in election. If an eligible voter does not attend the polling place, he or she may be subject to punitive measures such as fine or community service. As on August 2013, 23 countries were recorded as having compulsory voting. Of these, only 10 countries today are actually enforcing it. When Queensland introduced compulsory voting in 1915, it became the first place in the then British empire to do so. There are currently 32 countries who have adopted compulsory voting, of which 19 countries including Australia pursue it through enforcement. Countries that enforce compulsory voting are Australia, Argentina, Austria, Brazil, Chile, Cyprus, Ecuador, Fiji, Greece, Liechtenstein, Mexico, Nauru, Peru, Singapore, Switzerland, Turkey and Uruguay.
What are the merits of compulsory voting? No doubt there are certain merits; otherwise why these countries would have compulsory voting? We have to judge between the merits that are there in favour of compulsory voting and also the demerits.
There are four basic merits in favour of compulsory voting. Firstly, compulsory voting gives a higher degree of political legitimacy because of larger turnout. The Victorious candidate represents a majority of people.
Secondly, if everyone must vote, restrictions on voting are easily identified and steps are taken to remove them.
Thirdly, compulsory voting encourages voters to find out who their candidate is and what the background is. In a way, it empowers the voters itself.
Fourthly, it increases voting participation and interest in other political activities.
Finally, smaller campaign funds, and this is more important, are needed to goad voters to go to vote. Otherwise, large amount of unaccounted money is spent in politics.
The demerits are, any compulsion affects the freedom of an individual. Voting is a civic right rather than a civic duty. Compulsory voting may infringe other rights. Compulsory voting is essentially a compelled speech which violates freedom of speech because the freedom to speak necessarily includes freedom not to speak.
Therefore, I would say, some say it is undemocratic to force people to vote as it is an infringement on liberty. The ignorant and those with little knowledge in politics are forced to come and cast their votes. What are the measures that are ultimately required? We want more number of people to come and participate in our process.
If we make a comparison in our country between what happened in 2009 and what was the vote percentage in 2014, we are in a much better stage. That shows the voter turnout soared to 55.1 crore. In 2009, the number of voters who cast their votes was 41.7 crore; in 2014, it went up to 55.1 crore. That shows a large number of people have come to vote. We have a young Indian society, with a large number of younger voters in our society. Some may say they are uneducated but they are politically active. They need not be the workers of any political party but they understand what is happening in this country. That large, silent population participates in a great way. They celebrate democracy on the election day. That is why I would say when our voting percentage is growing, a large number of people are coming to the polling booth to cast their votes, we have EVMs and ultra-modern machines to record votes, and we have one other method ‘none of the above’ to reject the candidates if we do not like, it is not to be left to the political parties alone to make democracy successful in a great way. Therefore, I say, democracy cannot be upheld or strengthened by coercion. Here is a Bill that coerces people to come to the polling booth, cast the votes; otherwise, you will be put in jail. India became independent after there was a long struggle to become free, not to go to jail. If I have to cast my vote, I have an equal right not to cast it.
The other aspect is, to prosecute a person or to apprehend a person saying that he has violated this law – if it becomes a law – means, you have to go through a process of justice, natural justice. How many cases will the Election Commission or the District Magistrate as an election officer file? How many courts are there? Are the courts competent enough and have that much strength to look into these cases? It is an Utopian idea that people should go and cast their votes because they are enjoying freedom in this country. This country is a free country and a democracy. I would say it is totally unimplementable.
I think the Minister would be saying this but I would also request that until and unless you come with a better Bill this Bill is unacceptable to us. I am reminded of the Fourteenth or Fifteenth Lok Sabha when a Member from the Treasury Benches, Shri Jai Prakash Agarwal, who was representing a constituency in Delhi had moved a similar Bill. I had requested him, ‘First try in your MCD; first, you try in your Delhi State. After that, you advise us to do it in the country.’ Should I advise Shri Janardhan to try this first in his constituency, in his State, in his municipality and then we can say we will have such compulsory voting? I am sure, it impinges on the right of every Indian citizen.
Thank you.
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी) : सभापति महोदय,सृष्टि के आदिकाल से इस बात का संघर्ष रहा है। पश्चिमी देश के एक विद्वान ने एक थ्योरी दी थी-स्ट्रगल फोर एग़ज़ीस्टेंस एण्ड सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट। बाद में चल कर हिन्दुस्तान के हमारे चिन्तकों ने कहा कि यह दर्शन दुनिया के लिए नहीं है। हमारे यहां दर्शन चलेगा-लिव एंड लेट लिव। जिओ और जीने दो। जब गांधी का युग आया तो उन्होंने कहा कि इससे आगे बढ़ो तब हमारा दर्शन आया-लिव फोर अदर्स। दूसरे के लिए जिओ। लोकतंत्र की बुनियाद है कि दूसरे के लिए जीना सीखो। लोकतंत्र तभी सफल होगा,सक्षम होगा,लोकतंत्र कुछ फलदायी होगा,जहां नागरिकों में यह चेतना आएगी कि हम अपने लिए नहीं करेंगे,जो कुछ करेंगे राष्ट्र के लिए करेंगे,राष्ट्र का मतलब है कि राष्ट्र के सम्पूर्ण नागरिक के लिए करेंगे। आखिर यह भावना कैसे पैदा होगी?यह दो चीजों से पैदा होगी।
अभी कई माननीय सदस्यों ने इन बातों को उठाया है कि एक ओर विद्वान,पढ़े-लिखे लोग,सबल,योग्य और सम्पन्न लोग हैं। लेकिन दूसरी तरफ अनपढ़,विपन्न,गंवार और मूर्ख हैं और उनके हाथ में सत्ता दोगे तो क्या चलाएंगे?डॉ. लोहिया ने कहा था कि मैं इस देश के सक्षम,सबल और विद्वान लोगों से पूछना चाहता हूं कि आखिर इस देश में 80प्रतिशत लोगों को सत्ता से दूर रखा गया केवल हिन्दुस्तान के 15या 20प्रतिशत लोगों के हाथ में सत्ता थी,राष्ट्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी तब हिन्दुस्तान बार-बार गुलाम क्यों हुआ?जब हिन्दुस्तान की सत्ता चलाने वाले सक्षम और योग्य लोग थे,तब सबसे ज्यादा हिन्दुस्तान गुलाम रहा और गांधी के नेतृत्व में जिस दिन गांव का निर्धन,निर्बल से लेकर बिरला तक एक स्वर में बोल उठा कि ‘ऐ अंग्रेजों भारत छोड़ो’उस दिन शक्तिशाली अंग्रेज भारत छोड़ कर चला गया। इसका मतलब है कि जब गांव का गरीब और मजदूर जागता है तभी देश सबल और सक्षम होता है। अगर लोकतंत्र की यह प्रक्रिया नहीं होती,सभी को समान वोट का अधिकार नहीं मिलता तो बिहार में एक गरीब का बेटा कर्पूरी ठाकुर क्या नेता बन सकता था। दूसरा बिहार के अंदर अनुसूचित जाति का भोला पासवान शास्त्री जिनकी पत्नी सड़क के किनारे भूंजा और कचरी बेचती थी,वह गरीब आदमी क्या बिहार का मुख्यमंत्री बन सकता था?क्या हिन्दुस्तान की गद्दी पर एक साधारण किसान का बेटा चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बन कर आ सकता था?क्या एक गरीब का बेटा चन्द्रशेखर कभी बढ़ते-बढ़ते भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था?आज मैं कहूं एक चाय बेचने वाला,रेलवे के फुटपाथ पर सोने वाला,मजदूरन का बेटा श्री नरेंद्र मोदी,क्या भारत का प्रधानमंत्री बनकर बैठ सकता था?यह इसी लोकतंत्र की देन है जहां सबको समान वोट देने का अधिकार मिला है।
महोदय,निर्धन हो या धनवान हो,सम्पन्न हो या विपन्न,नारी हो या नर,सभी को वोट देने का अधिकार है। नारी को अपने अधिकार के लिए इंग्लिस्तान में बहुत दिनों तक लड़ना पड़ा। इंग्लिस्तान की पार्लियामेंट में माइक उखाड़कर फैंके गए और स्पीकर का सिर तोड़ दिया गया तथा उनकी हत्या हुई। जिस इंग्लिस्तान में वहां की औरतों ने अपने अधिकार के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी थी, लेकिन हिंदुस्तान में गांधी जी की कृपा थी, हमारे अम्बेडकर जी और हमारे महापुरुषों की कृपा थी कि संविधान बना तो सभी लोगों को समान वोट का अधिकार मिला। डाक्टर लोहिया ने जाति प्रथा में लिखा है कि लोग कहते हैं कि मूर्ख लोगों को सभी लोगों को वोट का समान अधिकार दे दिया गया, यह उचित नहीं है। कभी-कभी मैं भी यह सोचता हूं कि यह उचित नहीं है लेकिन गंभीर चिंतन के बाद मुझे लगता है कि ये निर्धन, गरीब, दलित, पिछड़ी जाति के, अनुसूचित जाति के, जनजाति के जंगल में रहने वाले लोग एक न एक दिन वोट की ताकत को जानेंगे और जिस दिन वे वोट की ताकत को पहचानेंगे, उस दिन अपने वोट की ताकत से भारत की सत्ता पर कब्जा करेंगे और भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बदल कर रख देंगे। आज वह तबका जग गया है, उसने वोट की ताकत को पहचान लिया है, वह वोट के जरिए लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी चाहता है, साझेदारी चाहता है। वह आज अपनी हिस्सेदारी और साझेदारी के लिए लड़ रहा है।
मैं लोकतंत्र के मंदिर में खड़ा हो कर कहना चाहता हूं कि हमें आज भी तकलीफ होती है जब यह कहा जाता है कि अनुसूचित जाति को इतना दे दो, अनुसूचित जनजाति को इतना दे दो, ओबीसी को इतना दे दो। आज भी इस आज़ाद भारत में इन 84प्रतिशत लोगों को भिखमंगा बनकर,हाथ उठाकर क्यों मांगना पड़ रहा है?उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि आज भी उस समाज के लोग सोए हुए हैं। जिए दिन उस समाज के लोग जगेंगे और सत्ता पर कब्जा करेंगे,उस दिन वे मांगने वाले नहीं,बल्कि बांटने वाले होंगे। जिस दिन बांटने की ताकत उसके हाथ में आएगी,उस दिन उनके बच्चे किसी के आगे भिखमंगा बनकर नहीं खड़े होंगे। इसलिए आपसे मेरी विनम्र प्रार्थना है,सीग्रीवाल जी ने बहुत अच्छा काम किया है। उन लोगों को सजा दीजिए या नहीं दीजिए,लेकिन कुछ तो कीजिए। लोगों को कहिए कि भाई वोट गिराओ। यदि वोट नहीं गिराएंगे,सजा नहीं दी जाएगी,उन्हें कहा जाए कि तुम्हें दो साल के लिए या पाँच साल के लिए सरकारी सुविधा से वंचित कर देंगे,तुमको किसी बैंक से लोन नहीं देंगे,कुछ सुविधाएँ सरकार की ओर से नहीं दी जाएंगी,आखिर कहीं न कहीं भय लाना होगा। “विनय न माने जलधि,जड़,गये तीन दिन बीत,बोले राम सकोप तब,बिन भय होए न प्रीत।” बिना दण्ड के राज नहीं चलता है। इसलिए कुछ न कुछ भय होना चाहिए। मैं ज्यादा नहीं कहूँगा,लेकिन केवल इतना ही कहूँगा कि आज भी हिन्दुस्तान में दो धाराएँ हैं। जो पढ़े-लिखे लोग हैं,योग्य हैं,अपने को तथाकथित योग्य,शिक्षित,सबल,सक्षम,सम्पन्न कहते हैं। हम लोकतंत्र की परिभाषा में कहते हैं-लोगों का,लोगों के द्वारा,लोगों के लिए (of the people, by the people, for the people). बाई द पिपुल का मतलब क्या हुआ?इसका मतलब है-लोगों के द्वारा। ऐसा हम तब कह सकते हैं,जब उसमें सबका पार्टिसिपेशन हो,सबकी हिस्सेदारी हो,सबकी साझेदारी हो,सबका का उसमें मतलब हो,सबके हितों की कामना हो,तभी तो उनके द्वारा शासन होगा। आज भी हिन्दुस्तान में लोगों का,लोगों के द्वारा है,लेकिन यह लोगों के लिए नहीं है। यह क्यों नहीं लोगों के लिए है?आज भी हिन्दुस्तान में जो बहुसंख्यक हैं,वे आज भी अपने हक के लिए कहीं न कहीं हाथ पसार रहे हैं और कह रहे हैं कि कानून बनाओ,संविधान बनाओ। वह क्यों मांग रहे हैं?
इसलिए आपसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कहीं न कहीं इस कानून के जरिए या किसी के जरिए उन गरीब,निर्धन,निर्बल,पिछड़े,दलित,अनुसूचित जातियों के अंदर इस चेतना को जगाया जाए,उन्हें प्रेरित किया जाए कि वोट का अधिकार है,आप सब बाल-बच्चों के साथ वोट डालें। अब जागरुकता आयी है कि जो गरीब,निर्धन,निर्बल हैं,मेरे यहाँ अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति के लोग हैं,वे दो,चार,पाँच किलोमीटर अपने बच्चों के साथ,पति-पत्नी साथ-साथ जाकर,लाइन में खड़े होकर वोट डालते हैं और पढ़े-लिखे लोग घर में बैठे रहते हैं। वे कहते हैं कि बहुत गर्मी है,चमड़ी जल जाएगी,धूप में कहाँ जाएं,वर्षा में कहाँ भींगने जाएं। उन्हीं लोगों की बात यहाँ होती है कि वे योग्य हैं। इसीलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि सीग्रीवाल जी ने जो विधेयक लाया है,उसमें थोड़ा-बहुत सरकार सुधार करे,इस रूप में सरकार को यह न स्वीकार हो,तो सरकार इसे राह के रूप में ले। जयप्रकाश अग्रवाल जी ने इसे पन्द्रहवीं लोक में लाया था। हम लोग भी उस पर बहस किये थे। हमने इसे समर्थन दिया था।
अन्त में,मैं एक बात कहूँगा कि अनिवार्य मतदान की प्रक्रिया हो,लेकिन मैंने तब भी कहा था और आज भी कहता हूँ कि जो निर्धन,निर्बल,पिछड़े,दलित,अनुसूचित जातियों के लोग हैं,उनको वोट के दिन कम से कम मिनिमम वेज़ के हिसाब से सरकार भुगतान करे ताकि उसे रोटी के लिए चिन्ता न हो,कम से कम उनको मिनिमम वेज के हिसाब से मजदूरी दे दी जाए,ताकि सभी गरीब मतदान केन्द्र पर जाकर अपना वोट गिरावें। इस कानून में ऐसा प्रावधान भी जोड़ दिया जाए और तब इसे अनिवार्य बनाया जाए,तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
श्री भैरों प्रसाद मिश्र (बांदा) : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, माननीय जनार्दन सिंह सीग्रीवाल जी ने अनिवार्य मतदान का जो विधेयक लाये हैं, मैं उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूँ। निश्चित रूप से आज देश में, जैसा कि अभी सदन में सभी लोग चिन्ता कर रहे थे कि ऐसे बहुत से लोग हैं, जो मतदान के दिन स्वयं सुस्ती करते हैं और मतदान करने नहीं जाते हैं। यह निश्चित रूप से एक बहुत ही गंभीर बात है। यह लोकतंत्र प्रणाली के लिए बहुत दुखद भी है। यह जो बिल लाया गया है,निश्चित रूप से बहुत अच्छा कदम है और लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूत करने वाला है। जैसा कि सभी के संज्ञान में है कि 32देशों में ऐसा कानून लागू है और अपने देश में गुजरात में निकाय चुनावों में इसको लागू किया गया है। वहां की सरकार ने अनिवार्य मतदान की व्यवस्था की है। निश्चित तौर से,इससे बहुत ही सकारात्मक प्रभाव होगा और उससे लोकतंत्र सुदृढ़ होगा। आज स्थिति यह है कि 40से 60प्रतिशत तक मतदान होता है। अभी एक उपचुनाव हुआ हैं,वहां 40प्रतिशत मतदान हुआ। गर्मी में चुनाव होगा तो 30से 35प्रतिशत मतदान होता है। शहरों में मतदान का प्रतिशत 28से 30प्रतिशत होता है। शहरों के बारे में लोग मजाक में कहते हैं कि जिस दिन शहरों में मतदान होना हो,शहरों की बिजली सप्लाई बन्द कर देनी चाहिए,जिससे लोग कूलर और पंखों की हवा में न पड़े रहें,मतदान करने के लिए जाएं। एक बड़ा वर्ग मतदान से दूर रहता है,जो चिन्ताजनक है। अगर 40से 60प्रतिशत तक मतदान होता है तो उसमें भी 25से 35प्रतिशत मत पाने वाला प्रत्याशी जनप्रतिनिधि बन जाता है। अगर 40से 60प्रतिशत का एवरेज 50प्रतिशत मतदान मान लिया जाए और 25से 35प्रतिशत का एवरेज 30प्रतिशत मान लिया जाए तो 50प्रतिशत मतों में से तीस प्रतिशत मत अर्थात कुल मतों के लगभग 15प्रतिशत मत से जनप्रतिनिधि चुन लिया जाएगा,जो देश और लोकतंत्र के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। अनिवार्य मतदान का कानून बनना चाहिए,माननीय सिग्रीवाल जी जो बिल लाए है,इससे पहले भी इस सदन में यह बिल आ चुका है,लेकिन किसी कारण से स्वीकार नहीं हो सका था। आज मैं सदन से अनुरोध करना चाहता हूं कि इस पर विचार करें और इस बिल का स्वीकार करें।
आज मतदान को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत सी स्कीम्स चालू की गयीं,लेकिन हम मतदान को 60प्रतिशत से ऊपर नहीं ला पाए हैं। मैं समझता हूं कि अगर यही गति चलती रही तो इसे 100प्रतिशत लाने में हम कभी सफल नहीं होंगे। इसलिए अनिवार्य मतदान कानून बनना चाहिए। अभी सजा के प्रावधान की बात आई है,मैं कहना चाहता हूं उसके लिए कोई बड़ी सजा का प्रावधान न हो। 18वर्ष से 75वर्ष तक के लोगों को अनिवार्य मतदान में शामिल करना चाहिए और जो अति वरिष्ठ नागरिक हैं,अगर किन्हीं कारणों से वे चल-फिर नहीं पा रहे हैं तो उनको इससे बाहर रखना चाहिए। जो अशक्त हैं,कमजोर हैं,बीमार हैं,ऐसे लोगों के लिए गांव के सरपंच,पटवारी या अन्य पदाधिकारी प्रमाण पत्र दें कि किसी कारण से वह व्यक्ति मतदान में भाग नहीं ले सका है।
कुछ लोग इसके विरोध में बात करते हैं,मैं कहना चाहता हूं कि आखिर NOTAका विकल्प सामने है। लोग कहते हैं कि अगर हम मतदान के लिए जाएंगे तो उन प्रत्याशियों में से किसी एक को चुनना ही होगा,लेकिन अगर हमें उनमें से कोई प्रत्याशी पसन्द नहीं आता है तो उसके लिए चुनाव आयोग ने NOTAका विकल्प दिया है। इस विकल्प के बाद अनिवार्य मतदान निश्चित रूप से लागू हो जाना चाहिए,अब इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
मतदाताओं को सुविधा देने के लिए जिस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए,वह नहीं हुई है। पोलिंग स्टेशन्स में पीने के पानी की ठीक व्यवस्था नहीं होती है। वहां छाया बनाने के लिए आयोग का नियम है,लेकिन वहां लोगों को छाया देने की व्यवस्था नहीं होती है,लोग धूप में खड़े रहते हैं। इन कारणों से भी लोग मतदान के लिए जाने में हिचकते हैं। इसलिए पोलिंग बूथों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही,वहां पर कानून-व्यवस्था की स्थिति भी ठीक होनी चाहिए। जैसे जिस बुंदेलखण्ड क्षेत्र से मैं चुनकर आता हूं,वहां प्रदेश का सबसे बड़ा डकैत बलखड़िया रहता है। इसी तरह से तमाम अराजक तत्वों की ओर से फरमान जारी हो जाता है कि मतदान के लिए नहीं जाना है,इस वजह से भी लोग मतदान के लिए नहीं जाते हैं। कानून-व्यवस्था की स्थिति भी ठीक होनी चाहिए,जिससे लोग निर्भय होकर मतदान के लिए निकल सकें।
मतदान केन्द्र की दूरी की बात आई है,निश्चित रूप से अभी भी मतदान केन्द्र बहुत दूरी पर हैं,उनको 300तक की आबादी तक घटाया गया है,लेकिन अभी भी दूरी ज्यादा है। इसलिए मैं समझता हूं कि जहां भी 100लोगों तक का मजरा हो, 100 मतदाताओं की आबादी हो,वहां एक मतदान केन्द्र बनाया जाना चाहिए। दूरी के हिसाब से मतदाता को आधा किलोमीटर से एक किलोमीटर तक की दूरी से ज्यादा न चलना पड़े,विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। अभी ई-वोटिंग की बात कही गयी। निश्चित तौर से मतदान केन्द्र तक लोगों को जाना अनिवार्य करना चाहिए। अशक्त लोगों को इससे छूट दे सकते हैं, 75 साल से ज्यादा वाले लोगों को इससे छूट दे सकते हैं। लेकिन इसमें सब लोगों को मतदान केन्द्रों पर जाना चाहिए। अभी हमारे देश में एक सर्वे हुआ था और उस सर्वे के अनुसार 91प्रतिशत लोगों ने अनिवार्य मतदान के पक्ष में वोट दिया था। इससे यह साबित होता है कि देश की अधिकांश जनता चाहती है कि अनिवार्य मतदान होना चाहिए। इसलिए हमें अनिवार्य मतदान के लिए कानून बनाना चाहिए।
देश में कई ऐसे लोग हैं,जो रोजी-रोटी या रोजगार के लिए दूसरी जगह शिफ्ट होते रहते हैं या कटाई के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। मतदान के समय ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वे लोग या मजदूर मत देने के लिए अपने राज्य या अपने गांव पहुंच सकें। जैसा अभी हुक्मदेव जी कह रहे थे कि कुछ जगह पर मतदान के समय उद्योगपतियों द्वारा अपने मजदूरों को एक महीने की छुट्टी दी जाती है,और उन्हें एक महीने का वेतन भी दिया जाता है,जिससे वे अपने घर जाकर मतदान में हिस्सा ले सकें। मैंने ऐसा पिछले लोक सभा चुनावों के दौरान देखा भी है। इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूर होनी चाहिए कि कम से कम एक सप्ताह के लिए मजदूरों को छुट्टी दी जाए और जाने-आने का किराया दिया जाए,जिससे अपने घर जाकर मतदान कर सकें।
सचल मतदान केन्द्र भी अशक्त लोगों के लिए बनाए जा सकते हैं,इससे भी मत प्रतिशत में वृद्धि होगी। जो लोग मतदान के लिए न जाएं,उनके लिए दंड की व्यवस्था भी हो सकती है। जैसे उनका ड्राइविंग लाइसेंस है,पासपोर्ट है,उसे निलम्बित किया जा सकता है या जो सम्पन्न लोग हैं,आयकर देते हैं,उन्हें उसमें छूट न दी जाए या राशन कार्ड न बनाया जाए या बीपीएल कार्ड न दिया जाए। अगर कोई अनिवार्य मतदान का उल्लंघन करता है और मतदान करने का प्रमाण पत्र नहीं लाता है तो उससे ये सुविधाएं वापस ली जा सकती हैं। अगर ऐसा होगा तो निश्चित रूप से मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा।
इतना कहते हुए मैं इस बिल का समर्थन करता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।
HON. CHAIRPERSON : Hon. Members, two hours time allotted for the discussion of this Bill is almost complete. As there are five more Members to take part in the discussion of the Bill, the House has to extend the time for further discussion of the Bill. If the House agrees, can the time for the discussion of the Bill be extended by one hour?
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
HON. CHAIRPERSON: The time of the discussion of the Bill is extended by one hour.
श्रीमती जयश्रीबेन पटेल (मेहसाणा) : सभापति महोदय, श्री जनार्दन सिंह सीग्रीवाल द्वारा अनिवार्य मतदान सम्बन्धी जो बिल सदन में पेश किया गया है, मैं उसके पक्ष में अपने कुछ विचार यहां रखना चाहता हूं। इस बारे में कई माननीय सदस्यों ने अपने विचार यहां व्यक्त किये हैं। लोकतंत्र में चुनाव अनिवार्य है और चुनाव लोकमत का दर्पण है। चुनाव प्रजा के प्रतिनिधियों की पसंदगी और नापसंदगी की संवैधानिक प्रक्रिया है। चुनाव लोकतंत्र में रक्तहीन क्रांति कहलाती है।
आज तक भारत में लोक सभा और विधान सभा के 300 से ज्यादा चुनाव हुए हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां 70 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं। भारत का चुनाव आयोग दुनिया भर में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की प्रक्रिया में माहिर है। दुनिया के कई देश उससे सलाह लेते हैं। चुनावों ने नए-नए तौर तरीक अपनाए और कई अच्छे खासे सफल प्रयोग भी किए हैं। राज्यों के चुनाव आयोग भी निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की प्रक्रिया में समक्ष हैं। अनिवार्य मतदान की जो नई पहल है, उसे चैलेंज के रूप में लेना चाहिए।
अनिवार्य मतदान कई नई अवधारणा नहीं है। दुनिया में 30 से अधिक देशों में अनिवार्य मतदान का कानून मौजूद है और इसमें आस्ट्रेलिया, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देश शामिल हैं। अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में मतदान को नागरिकता का अधिकार माना गया है, तो कुछ देशों में वोटिंग करते हुए नागरिकता की संज्ञा भी दी गई है। लोकतंत्र वास्तव में अधिकारिक मतदान से ही मजबूत और समृद्ध होता है। आज चुनाव दर चुनाव मतदान के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हो रही है, जिसके पीछे नागरिकों में बढ़ रही जागरूकता और चुनाव आयोग के प्रयासों का योगदान भी है।
हम वोट डालकर अपना प्रतिनिधि इसलिए भी चुनते हैं कि वह हमारे हितों की आवाज उठाएगा, लेकिन ऐसे लोग भी काफी हैं जो मतदान दिवस को छुट्टी का दिवस मनाते हैं। ऐसे लोगों में मतदान के प्रति जागरूकता के लिए अनिवार्य मतदान का प्रावधान होना जरूरी है। आज हिंदुस्तान में 45करोड़ से ज्यादा लोग आंतरिक पलायन के शिकार हैं जिसमें बड़ी तादाद वयस्क मतदाता आबादी की है। भारत में दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा आंतरिक पलायन की गति बनी हुई है। भारत में आंतरिक अप्रवासन की संख्या 40करोड़ तक पहुंच गई है इसका मतलब है कि लोग अपने पैदाइशी स्थानों से रोजी-रोटी के वास्ते किसी दूसरी जगह चले गए हैं। मैं गुजरात से हूं। यह कानून वर्ष 2010में जब हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब बनाया था लेकिन कुछ कारणवश और कुछ सुझावों के साथ उनको इस विधेयक को लौटा दिया गया था। लेकिन अभी हमारी गुजरात की प्रथम महिला मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के जरिए और उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण पुनः अनिवार्य मतदान का विधेयक विधानसभा में पास करवा कर राज्यपाल जी की अनुमति के लिए भेज दिया था। वहां से अनुमति भी मिल गई है और राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त आईएएस की अध्यक्षता में अनिवार्य मतदान जागरुकता अभियान शुरू भी कर दिया है। प्रजा में इसका अच्छा रिस्पोंस मिल रहा है। उनका प्रथम प्रयोग अगले पंचायत और शहर ईकाई के चुनाव में अक्टूबर, 2015 में होने वाला है। अनिवार्य मतदान और नोटा के प्रावधान को एक नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। यह क़दम उठाना जरूरी है ताकि लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सके। अनिवार्य मतदान वास्तव में जनता में जागरुकता पैदा करने का आह्वान है ताकि जनविरोध का सामना न करना पड़े। कम मतदान की वजह से मतदाताओं की कुल संख्या का 50फीसदी से भी कम मत प्राप्त करने वाली पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं इसलिए देश भर में ऐसी व्यवस्था निश्चित रूप से की जानी चाहिए। निश्चित रूप से यह तथ्य इस विधेयक का सबसे ठोस तर्क है।
जहां तक मेरा मानना है जो लोग अनिवार्य मतदान के विरोध में हैं,वे इसकी प्रकृति और आवश्यकताओं को समझ नहीं पा रहे हैं। मतदान का अधिकार एक सामान्य अधिकार नहीं है। यह एक विशेष अधिकार है जो जनता को देश की सरकार द्वारा दिया गया है। ये सभी अधिकारों की आधारशिला है। प्रत्येक नागरिक को अवश्य मतदान करना चाहिए। नागरिक ऐसा नहीं करता है तो वह अपने बुनियादी कर्तव्य की अवहेलना भी करता है। यह अवहेलना जब बहुत अधिक बढ़ जाती है तो लगता है कि मतदान को अनिवार्य कर देना चाहिए। मेरा सुझाव है कि जो बच्चे 18साल में प्रवेश कर चुके हैं और 18साल से ऊपर की आयु के जो बच्चे हैं उनके लिए यूनिवर्सिटियों तथा स्कूलों में जाकर खास कर जागरुकता अभियान चलाना चाहिए तथा उनके प्रतिभाव लेने के लिए आनलाइन कार्यक्रम बनाया जाए। एनजीओज़ तथा अन्य एजेंसियों द्वारा प्रजामत का सर्वेक्षण किया जाए। मीडिया भी इसमें सकारात्मक भूमिका अदा कर सकता है। उसके द्वारा भी अनिवार्य मतदान के लिए मतदाताओं की मानसिकता को बढ़ाना चाहिए। कुछ मतदाता रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों में गए हैं,वहां भी वे मतदान कर सकें,इसीलिए अनिवार्य मतदान की प्रक्रिया को आनलाइन करना चाहिए। जैसे लोकतंत्र में 34और 40प्रतिशत लोग अपना मतदान नहीं करते हैं,ऐसे लोकतंत्र नहीं चल सकता है। प्रजातंत्र की रखवाली करनी है तो शत-प्रतिशत मतदान अनिवार्य है और मैं मानती हूं कि एक नैतिक कानून बनना चाहिए। अनिवार्य मतदान होना चाहिए। मैं इस विधेयक का समर्थन करती हूं। धन्यवाद।
श्री भगवंत मान (संगरूर): सभापति महोदय,मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।
बहुत ही गम्भीर विषय पर बहस चल रही है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और सिक्के का दूसरा पहलू भी है कि कुछ कमियां भी हैं। हमारे देश में बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं,जहां बहुत कम परसेंटेज वोट डाला जाता है,फिर भी वहां से चुने गए व्यक्ति को जनप्रतिनिधि कहा जाता है। कम वोटिंग क्यों होती है,इसके कारणों को जानने की जरूरत है। जब भी कहीं लोक सभा,विधान सभा या एमसी के इलेक्शन्स होते हैं तो अक्सर हम अखबारों और टीवी पर देखते हैं कि फलां-फलां गांव के लोगों ने एक बोर्ड लगा दिया कि इस बार हम किसी को वोट नहीं देंगे,जब तक हमारी ये मांगे पूरी नहीं की जाती हैं। फलां मोहल्ले ने वोटिंग का बायकॉट कर दिया कि हमारे क्षेत्र में कोई नेता वोट मांगने न आए,क्योंकि हम इस बात से नाराज हैं। इसलिए वोट न देने के कारणों को भी गहराई से देखना होगा। आज राजनीति से लोगों को यकीन उठ गया है,उस यकीन को कैसे बहाल किया जाए। इसके लिए हमें एफर्ट्स करने होंगे,कोशिशें करनी होंगी। जब मैं इलैक्शन में कैम्पेन कर रहा था तो मैं एक बात यह भी कहता था कि आप चाहे जिसे मर्जी वोट डाल देना,लेकिन वोट जरूर डालना,क्योंकि जो वोटर कोर्ड है,उस पर फोटो तो मतदाता तो है,लेकिन उस वोटर कार्ड में शहीदों के खून की सुगंध है। क्योंकि सांस तो लोग अंग्रेजों की गुलामी के समय भी लेते थे,शादियां,ब्याह,गिद्दे,भंगड़े तब भी होते थे,लेकिन फर्क क्या होता था,अंग्रेज वोट नहीं डालते देते थे। शहीद भगत सिंह,करतार सिंह,सराबा,राजगुरू,चंद्रशेखर आजाद और शहीद ऊधम सिंह जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के साथ लड़ाई लड़ी थी कि हमें वोट डालने का अधिकार दो,हम अपने नेता खुद चुनेंगे। इसी लड़ाई की वजह से उन्हें फांसी के तख्तों पर चढ़ा दिया गया। उसके बाद अंग्रेज चले गये और हमें वह वोटर कार्ड मिल गया। लेकिन अगर उस वोटर कार्ड के फर्ज को अगर हम नहीं निभाते है तो इसका कोई कारण होगा।
कुछ माननीय सदस्यों द्वारा कहा जा रहा है कि जो वोट नहीं डालते,उन पर जुर्माना लगाया जाए,उन पर सुविधाएं काटने की तलवार लटकाई जाए,उनकी नौकरी में बाधाएं पैदा की जाएं या जो सरकारी घर हैं,उन घरों से उन्हें वंचित रखा जाए। हर जुर्माना,हर जो दुविधा है,क्या वह जनता पर ही लगेगी। जो जनता की वोटों के द्वारा चुनकर आते हैं,अगर वे वायदे पूरे नहीं करते तो क्या उन पर कोई जुर्माना नहीं होना चाहिए। चुनाव के समय लोगों के सामने लिखकर इतने बड़े-बड़े मेनिफेस्टो रख दिये जाते हैं कि यह कर देंगे,वह कर देंगे,जिन लोगों ने उस मेनिफेस्टो को पढ़कर वोट दिया है,अगर उस मेनिफेस्टो का वायदा पांच सालों में पूरा नहीं हुआ तो उस वोटर के साथ जो विश्वासघात हुआ है,उसे आप कैसे पूरा करोगे। हर जुर्माना जनता के लिए है। मैं यह कहता हूं कि इसके लिए सामाजिक क्रांति की जरूरत है,हमें उन्हें एजूकेट करना चाहिए। लेकिन दुखद बात यह है कि गरीबों के एरिया में गांव में वोट डलते हैं,लेकिन पढ़े-लिखे लोग वोट के दिन को छुट्टी का दिन मानते हैं। वे इधर-उधऱ घूमने चले जाते हैं कि चलो आज तो छुट्टी का दिन है। उसके बाद आकर पांच सालों तक सरकारों को वही लोग कोसते हैं। गरीब कहता है कि मैंने अपनी वोट डाल दी,उस दिन मैं वोट डालने के बाद काम पर चला गया था,सरकार जो मर्जी आए,मुझे खुद कमाकर खाना है। लेकिन सिस्टम को कोसने वाले वही हैं,जो वोट नहीं डालते। लाइन में खड़ा होना उन्हें अच्छा नहीं लगता या धूप,सर्दी या बरसात में खड़ा होना उन्हें अच्छा नहीं लगता। मैं समझता हूं कि इसके लिए हमें एक क्रांति लाने की जरूरत है।
माननीय मंत्री जी यहां बैठे हैं,मैं सदन को बताना चाहता हूं कि जब हरियाणा में इलैक्शन हो रहे थे तो मुरथल के पास सड़क के किनारे बहुत से ढाबे हैं,मुझे एक भारतीय नागरिक होने के नाते यह पढ़कर बहुत खुशी हुई कि बहुत से ढाबे वालों ने अपनी तरफ से यह लिख रखा था कि जो हरियाणा में इतनी तारीख को वोट डालकर,वोट वाले दिन और अगले दिन अगर कोई आकर हमें वोट डालने का निशान उंगली पर दिखायेगा तो उसे इतने परसैन्ट खाने के बिल में हम छूट देंगे। अच्छी बात है,एक चाय की कंपनी ने एड बनाई थी कि तुम लोग सब सो रहे हो,आज वोटिंग का दिन है,तुम वोट डालने नहीं गये,जागो-जागो,उन्होंने अपनी चाय की एड बनाई थी। ऐसे सामाजिक विज्ञापन,चाहे वे पिक्चरों के जरिये हों या अखबारों में हों,लेकिन सिर्फ अखबारों में एड देने से लोग वोट देने के लिए नहीं जायेंगे। देश की अधिकतर दीवारों पर और सरकारी बसों पर लिखा हुआ है कि दुल्हन ही दहेज है,क्या इससे दहेज के मामले बंद हो गये,क्या लोगों ने दहेज लेना बंद कर दिया। सभी बसों पर लिखा हुआ है -दो ही काफी,और से माफी,क्या इससे जनसंख्या कंट्रोल हो गई। इसके लिए देश की जनता को जागरूक करना पड़ेगा। जुर्माना इसका हल नहीं है,इसके लिए लोगों को जागरूक करना पड़ेगा कि हमें यह अधिकार शहीदों ने अपना खून देकर दिया है,अगर तुम इसका इस्तेमाल नहीं करते हो तो यह शहीदों का अपमान है। ऐसी बातों को लोगों तक पहुंचाकर हम वोट परसैन्टेज बढ़ा सकते हैं।
महोदय,इसके अलावा देश से बाहर बहुत से एनआरआईज रहते हैं। आजकल ग्लोबलाइजेशन की वजह से पूरी दुनिया एक गांव बन गई है। अगर हमारे एनआरआईज कनाडा,अमंरीका,इंग्लैंड,हालैंड,बेल्जियम,फ्रांस,जर्मनी,इटली,नार्वे,सिंगापुर,दुबई,आस्ट्रेलिया आदि देशों में जहां भी बसते हैं और उनके पास भारतीय नागरिकता है तो उन्हें वोट देने का अधिकार है,अब चाहे वह ई-वोटिंग से हो,चाहे इसके लिए दूतावासों में प्रबंध किये जाए। उनमें से बहुत से तो हमारे देश के सिस्टम से तंग होकर,दुःखी होकर ही बाहर गए हैं। शायद वे वहाँ से अपने सिस्टम को ठीक करने में अपना हिस्सा डाल दें और वे वापस आ जाएं,उनकी वतन वापसी हो जाए।
महोदय,इसके लिए हमें प्रावधान करना होगा। वोटिंग की परसेंटेज बढ़ानी है तो उसके लिए हमें लोगों को जागरूक करना होगा और राजनीतिक लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी कि क्यों लोग वोट डालने से मुंह मोड़ रहे हैं?क्या हम उनसे जो वादे करते हैं,उन्हें पूरा कर पाते हैं?इसी वजह से अब नोटा आ गया है,यह बहुत अच्छी बात है। स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग में इलेक्शन कमीशन के ऑफिसर बता रहे थे कि अब इसके बाद हम वोटिंग मशीन पर फोटो लगाने का भी प्रावधान करेंगे,क्योंकि एक ही नाम वाले जो कुछ उम्मीदवार खड़े हो जाते हैं तो उनकी पहचान रहे। यह अच्छी बात है कि धीरे-धीरे सुधार हो रहे हैं। जैसे बाई इलेक्शन होता है,वह स्टेट इलेक्शन कमीशन के अंडर होती है और अक्सर स्टेट इलेक्शन कमिश्नर मुख्यमंत्री का चहेता आईएएस ऑफिसर होता है,इसीलिए बाई-इलेक्शन में अक्सर ज्यादा वोटिंग होती है,क्योंकि उसमें बूथ कैप्चरिंग भी हो जाती है। हमें इसके लिए प्रावधान करने पड़ेंगे। ऐसा करने से ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बच पाएगा। लोकतंत्र में लोग बड़े होते हैं,नेता बड़े नहीं होते हैं,जो नेता अपने आपको लोगों से बड़ा समझते हैं,लोग उनको धरती पर नीचे उतार लेते हैं। लोग जब चाहें,आदमी अर्श पर और लोग जब चाहें,आदमी फर्श पर। बड़े-बड़ों को लोगों ने हराया है।
महोदय,मैं यह बात आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूँ कि यह अच्छी बात है कि वोटिंग की परसेंटेज को बढ़ाने की बात सोच रहे हैं। उसके लिए सामाजिक विज्ञापन,सामाजिक कार्यकर्ता,एनजीओज सब मिलकर काम करें,ताकि लोगों को अपनी वोट का महत्व,अपनी वोट की कीमत पता लग सके। कितने शहीदों ने अपना खून देकर,अपनी जवानियां देश के नाम लगाकर यह वोट का अधिकार हमें दिया है। इसका मिसयूज भी न हो और यह भी न हो कि हम वंचित रह जाएं अपनी किसी छोटी-मोटी महत्वाकांक्षा के लिए। इसके लिए मैनिफेस्टोज को,इलेक्शन प्रोसेस को हमें और बेहतर बनाना होगा। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया,इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद,आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
श्री ओम बिरला (कोटा) : महोदय,माननीय जर्नादन सिंह जी ने जो निजी विधेयक पेश किया है,उनकी मंशा सही और सार्थक दिशा की ओर है। मेरा यह भी मानना नहीं है कि उन्होंने जो बिल प्रस्तुत किया है,उसे संसद पूरी तरह से पास कर दे,लेकिन यह चर्चा का विषय होना चाहिए,डिबेट का विषय होना चाहिए। हम जब यह कहते हैं कि हम विश्व के अंदर सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं,सबसे ज्यादा मतदाताओं वाले देश हैं,हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्थायें विश्व में सबसे ज्यादा मजबूत हैं और हमारे यहाँ डेमोक्रेसी में सबसे ज्यादा पारदर्शिता है तो उस समय अनिवार्य मतदान भी एक बहुत बड़ा पहलू है।
महोदय,हमारे चुनाव आयोग ने बहुत संशोधन किए,बहुत परिवर्तन किए और बहुत सुधार भी किए,लेकिन आज भी इस अनिवार्य वोटिंग करने के पहले हमें चुनाव की प्रक्रियाओं की ओर देखने की आवश्यकता है। हम सब जानते हैं कि इतने वर्षों के बाद भी,सोलह बार संसद का चुनाव हमारे देश में हो चुका है,वर्ष 1952से हमारे यहाँ चुनाव लड़े जा रहे हैं। हमारी मतदाता सूचियाँ जो बननी चाहिए,वह मतदाता सूची सही बने,हर व्यक्ति जो देश में रहता है,वह मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाए। हमारे यहाँ पर अभी अशिक्षा बहुत है,मजदूर है,बड़ी संख्या में लोग पलायन कर जाते हैं। कोई बिहार का व्यक्ति राजस्थान आ जाता है,राजस्थान का व्यक्ति बाहर चला जाता है। उसका मूल प्रदेश और गाँव में नाम होता है लेकिन हमारे देश में बहुत बड़ी संख्या में हमारा मतदाता पलायन करता है। यह संभव नहीं है कि 1000किलोमीटर दूर या 500किलोमीटर दूर वह मज़दूर जो दो समय की रोटी के लिए पलायन करता है,वह केवल वोट डालने आए,इस देश के अंदर यह संभव ही नहीं है।
इसलिए इस देश में सबसे पहले कम से कम मतदाता सूची में हर मतदाता का नाम हो और उसके अधिकार सुरक्षित रखने हैं तो मतदाता सूची में नाम होना अनिवार्य हो। लेकिन उसके साथ इस पहलू पर भी विचार करना होगा कि यह देश ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहाँ पर पड़ोसी देश के लोग पलायन करके हिन्दुस्तान में आकर मतदाता सूची में नाम जोड़ लेते हैं। इस धरती पर पैदा हुआ इस देश का व्यक्ति मतदाता सूची में हो तो उसके पहले पलायन करने वाले देशों का भी एक बार विवरण होना चाहिए। नहीं तो हमारे पड़ोसी देश से आज भी करोड़ों की संख्या में मतदाता बनकर हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदहाल करने की स्थिति में आ चुके हैं। कई प्रदेशों के हालात तो यह हैं कि वे आने वाले समय में वहाँ सरकार बनाने की स्थिति में आ जाएँगे। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने का प्रावधान,जब हम कहते हैं कि विदेशों के अंदर अनिवार्य मतदान कहीं है,कहीं नहीं है,तो विदेशों में नागरिकता प्राप्त करने के लिए जितना कठिन कानून है,शायद हिन्दुस्तान का सबसे सरल कानून और सबसे जल्दी राशन कार्ड बनाने का कानून यदि किसी देश में है,किसी लोकतंत्र में है तो वह हिन्दुस्तान में है। इसलिए मेरा निवेदन है कि इस सारी प्रक्रिया में अनिवार्य मतदान होना आवश्यक है। हमारे प्रधान मंत्री जी और गुजरात के तत्कालीन मुख्य मंत्री जी गुजरात में इसको 2009में लाए और 2011में इस विधेयक को लाए। इसलिए ज़रूरी है कि इस देश के लोकतंत्र को मज़बूत बनाना है तो हर व्यक्ति मतदान करे और सारे देश का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति संसद या विधान सभाओं के अंदर पहुँचे। यह बात सही है कि इसकी शुरूआत गुजरात से हुई है। हम जब लोगों का जनमत जानते हैं तो 99प्रतिशत जनमत यह कहता है कि अनिवार्य मतदान ज़रूरी है। जब जनमत यह कहता है तो निश्चित रूप से इसका कानून भी बनना चाहिए और कानून पर चर्चा भी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए जब तक हम देश में कोई हल्का सा कानून भी नहीं बनाएँगे तो हम देश में वोटों का प्रतिशत भी नहीं बढ़ा पाएँगे। आज हमें दोहरे मापदंड से गुज़रना पड़ता है।
वोटों का प्रतिशत बनाने के लिए राजनीतिक दलों को धन खर्च करना पड़ता है और कई बार उस लोकतंत्र के अंदर जो स्वतंत्र मताधिकार का प्रयोग करने की मंशा है,उसको लाने ले जाने में हम मतदाता को कहीं न कहीं आकर्षित करने का काम भी करते हैं। इसलिए जब कानून बनेगा और कानून कैसा बनना चाहिए,यह डिबेट का विषय है। जब कानून बनेगा तो व्यक्ति मतदान करने भी आएगा और स्वतंत्र रूप से मतदान भी करेगा और कभी देश के अंदर यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि 15प्रतिशत या 20प्रतिशत के आधार पर देश में लोकतंत्र की सरकारें बन गईं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि कानून बने। कानून के अंदर एक बार,दो बार या तीन बार अगर मतदाता मत नहीं डालता है तो उसे मतदाता सूची से वंचित किया जाए। कुछ प्रक्रिया ऐसी हो देश के लोकतंत्र में कानून बनाते समय क्योंकि हमारा देश ऐसा है कि जब तक उसको कानून में नहीं डालेंगे,वह शत प्रतिशत मतदान करने नहीं आएगा। शत प्रतिशत मतदान करना है तो कुछ कानून बनाने की आवश्यकता है। कानून पर डिबेट बहुत लंबी चर्चा और बहस का विषय है।
18.00 hrs माननीय सभापति महोदय,मेरा आपसे निवेदन है कि संसद में इस पर डिबेट होनी चाहिए,चर्चा होनी चाहिए। देश के लोकतंत्र को मजबूत करना है,प्रजातंत्र को मजबूत करना है,हर व्यक्ति की चुनी हुई सरकार हो,हर व्यक्ति के मौलिक अधिकार के साथ उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित हो,वह मतदान करने के साथ यह कह सके कि मेरी बनाई हुई सरकार है,कोई 30परसेंट, 50 परसेंट लोगों की बनाई हुई सरकार नहीं है। इसके लिए आवश्यकता है कि हमें मताधिकार के अनिवार्य कानून को लाने के लिए चाहे लचीला कानून बने,लेकिन कानून बनना चाहिए,ताकि अधिकतम लोग मतदान कर सकें।
मेरा इस पर यह मत है कि इस पर लम्बी डिबेट होनी चाहिए। कम समय में इसकी चर्चा नहीं हो सकती,इस पर डिबेट हो,लम्बी चर्चा हो और देश में इस तरीके का कानून बने,ताकि हर व्यक्ति लोकतंत्र के अन्दर सहभागी बन सके और जो वोट डालने का अधिकार उसको है,उस अधिकार को प्राप्त कर सके और उसकी चुनी सरकार देश और प्रदेश में बन सके।
आपने इस मौके पर बोलने का मौका दिया,उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
HON. CHAIRPERSON: Hon. Members, it is six o’clock. If the House agrees, we can extend the time of the House till the ‘Zero Hour’ is over.
SEVERAL HON. MEMBERS: Okay.
HON. CHAIRPERSON: Now, the ‘Zero Hour’; Shri Jagdambika Pal.