Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 1]

Allahabad High Court

Rishi Pal Singh vs State Of U.P. Thru Secy. Deptt. Of Home ... on 31 August, 2022

Author: Saurabh Shyam Shamshery

Bench: Saurabh Shyam Shamshery

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD "प्रकाशनार्थ स्वीकृत"

निर्णय सुरक्षित- 10.08.2022 निर्णय उद्घोषित- 31.08.2022 न्यायालय कक्ष-82
1. वाद :- रिट 'ए' संख्या-35066/2008 याचिकाकर्ता:- ऋषि पाल सिंह प्रतिवादी:- उत्तर प्रदेश शासन व अन्य याचिकाकर्ता के अधिवक्ता:- सिद्धार्थ खरे, अशोक खरे प्रतिवादी के अधिवक्ता:- मुख्य स्थायी अधिवक्ता
2. वाद :- रिट 'ए' संख्या-35068/2008 याचिकाकर्ता:- प्रेम पाल सिंह प्रतिवादी:- उत्तर प्रदेश शासन व अन्य याचिकाकर्ता के अधिवक्ता:- सिद्धार्थ खरे, अशोक खरे, अमित कुमार श्रीवास्तव प्रतिवादी के अधिवक्ता:- मुख्य स्थायी अधिवक्ता माननीय सौरभ श्याम शमशेरी, न्यायमूर्ति तथ्यात्मक रुपरेखा-
1. याचिकाकर्ता आरक्षीगण (ऋषिपाल सिंह व प्रेमपाल सिंह) व एक अन्य आरक्षी के विरुद्ध, निम्नलिखित घटना, घटित होने के कारण उत्तर प्रदेश अधीनस्थ श्रेणी के पुलिस अधिकारियों कर्मचारियों एवं अपील नियमावली 1991 (संक्षेप में नियमावली 1991) के अंतर्गत अनुशासनिक कार्यवाही प्रारम्भ करी गयी:
"आरक्षी 234 स0पु0 प्रेमपाल सिंह, आरक्षी 241 स0पु0 दिनेश चन्द्र गुप्ता एवं आरक्षी 96 स0पु0 ऋषिपाल सिंह के विरुद्ध दिनांक 09.7.2004 को रायफल कारतूस, हथकड़ी सहित केन्द्रीय कारागार बरेली से अभियुक्तगण राजेश, मनोज, जमील को मान0 न्यायालय में पेशी के उपरान्त मुरादाबाद से बरेली लाते समय अभियुक्तगण द्वारा दी गयी एल्कोहल का सेवन करके, बेहोश हो जाने व पुलिस अभिरक्षा से अभियुक्तगण के भाग जाने एवं बेहोशी हालत में स्टेशन पर उतारे जाने व मेडिकल परीक्षा में शराब का सेवन करने की पुष्टि हुई। "

2. उपरोक्त घटना के फलस्वरुप दिनांक 09.07.2004 से निलम्बित पाये जाने सम्बन्धी प्रकरण में उत्तर प्रदेश अधीनस्थ श्रेणी के पुलिस अधिकारियों/कर्मचारियों की दण्ड एवं अपील नियमावली, 1991 के नियम 14 (1) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही पीठासीन अधिकारी को अभिविष्ट की गयी जिसने 24.03.2005 को आरोप पत्र तैयार किया व उसी दिन आरोपित आरक्षीगण को प्रेषित किया गया व स्पष्टीकरण मांगा गया परन्तु दो अवसर देने के उपरान्त दोनों याचिकाकर्ता ने अपना-अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया, जिसमें मात्र कहा कि प्रकरण माननीय न्यायालय, मुरादाबाद में विचाराधीन है, अतः विभागीय कार्यवाही को स्थगित करा जाये व पुलिस रेगुलेशन के प्रस्तर 494 का अवलोकन किया जाये।

3. आरक्षीगण को दो बार नोटिस प्रेषित किया गया, कि वो साक्ष्य लेखबद्ध की कार्यवाही में सम्मलित हो परन्तु, नोटिस प्राप्त होने के उपरान्त भी वो कार्यवाही में सम्मिलित नहीं हुए। अतः उनकी अनुपस्थिति में 28.05.2005 को कुछ साक्षीगण के साक्ष्य लेखबद्ध किये गये। पुनः नोटिस प्रेषित किया गया व शेष साक्षी के कथन 10.6.2005 को लेखबद्ध किये गये, परन्तु आरक्षीगण कार्यवाही में उपस्थित नहीं रहे। इस कारणवश उनकी ओर से कोई जिरह नहीं हो पायी। साक्षी हे0कां0प्रो0 630 दिग्विजय शर्मा थाना जी.आर.पी. जंक्शन बरेली का कथन महत्वपूर्ण होने के कारण निम्न पुनरावर्त किया जा रहा है:

"दिनांक 9.7.2004 को वह व आरक्षी 534 मुकेश बाबू, कां0-45 उदयवीर, कां0 4620 प्रभुनाथ व हेड सैक्शन पी0ए0सी0 24 वीं वाहिनी मुरादाबाद के साथ थाने से रवाना होकर प्लेटफार्म जंक्शन बरेली पर जहर खुरानी गिरोह से सम्बन्धित संदिग्ध व्यक्तियों को चैकिंग में मामूर था। गाड़ी सं. 4312 डा0 गांधी धाम एक्सप्रेस के प्लेटफार्म नं0 1 पर चेकिंग करते हुए ए0सी0कोच से आगे लगे हुए स्लीपर में जब वह व हमराह स्टाफ पहुँचे तो आमने सामने की सीटों पर तीन सिपाही बार्बदी दुरुस्त लेटे मदहोश हालम में मिले। उनकी रायफले हथकड़ी व एक बैग पास में रखा था। तीनों सिपाहियों को उठाया तो नहीं उठे। एक सिपाही जिसे नशा कम था उठा और अपना नाम आरक्षी 234 ए0पी0 प्रेमपाल सिंह पुलिस लाइन बरेली बताया व साथी आरक्षियों का नाम 241 स0पु0 दिनेश चन्द्र गुप्ता, कां0 227 स0पु0 ऋषिपाल सिंह बताया। इसके अतिरिक्त आरक्षी प्रेमपाल सिंह ने बताया कि "हम तीनों आरक्षी सेंट्रल जेल बरेली से अभि0 गण छोटा जमील, राजेश व मनोज कुमार को मान0 न्यायालय मुरादाबाद में पेशी हेतु ले गये थे। पेशी के बाद जब रेलवे स्टेशन मुरादाबाद आये थे तब काशीनाथ विश्वनाथ एक्सप्रेस निकल चुकी थी तब अभि0 छोटा जमील के कहने पर वह सब लोग उसके रिश्तेदार के घर मिलने चढ्ढा सिनेमा के पास ले गये थे उसके बाद छोटा जमील के कहने पर एक होटल में खाना खाने गये थे अभि0 छोटा जमील ने पैसे देकर एक बैगपाइपर (अंग्रेजी शराब की बोतल) व 4 कोल्ड ड्रिंक्स अपने आदमी को पैसे देकर मंगाये। हम तीनों व उक्त तीनों अभियुक्तगण ने कोल्ड ड्रिंक्स में मिलाकर शराब पिलाई थी तथा स्वयं कोल्ड ड्रिंक्स पी थी तथा सबने मुर्गा साथ साथ खाया। वहां पर नशा अधिक हो गया था तभी उक्त तीनों मुल्जिमानों ने अपने हाथों से हथकड़ी निकाल ली थी और जब बरेली आने के लिये रेलवे स्टेशन मुरादाबाद जा रहे थे तभी स्टेशन के पास से तीनों अभियुक्त कोल्ड ड्रिंक्स लेने चले गये, इन्हे ज्यादा नशा हो गया था इसलिये यह लोग नहीं गये और बरेली आने वाली इस ट्रेन में बरेली के लिय बैठ गये। उकने व साथी हमराह कर्मचारियों द्वारा उक्त तीनों आरक्षियों को गाड़ी से उतार उनके सामान को कब्जे में लेकर थाना जी0आर0पी0 जंक्शन बरेली आये थे। आरक्षियों की रायफल सं0 6480, 0224 व 60 कारतूस दो हथकड़ी संख्या 250 व 712 दो रस्सा सूत व भोगें हुए तीनों अभियुक्तों के वारण्ट थाने पर दाखिल किये। उक्त तीनों आरक्षियों को बास्ते उपचार जिला अस्पताल बरेली में वह व हमराही लेकर गये वहां पर सिपाहियों को उपचार हेतु दाखिल कर थाना वापस आये। उक्त घटना के सम्बन्ध में उनके द्वारा थाना जी0 आर0पी0 जंक्शन बरेली पर मु0अ0सं0 352/2004 धारा 221/223/223/225 ए भा0 द0 के विरुद्ध आरक्षी 241 स0 पु0 दिनेश चन्द्र 96 स0पु0 ऋषिपाल सिंह, 234 स0पु0 प्रेमपाल सिंह पुलिस लाइन बरेली बन्दी राजेश पुत्र तेजपाल निवासी बेहटा जयसिंह थाना बहजोई मुरादाबाद, बन्दी मनोज पुत्र तेजपाल सिंह निवासी चितौरा थाना बहजोई मुरादाबाद, बन्दी जमील उर्फ छोटा पुत्र लल्लू अमीन निवासी हसइल्स बाली मस्जिद थाना मुगलपुरा जिला मुरादाबाद पंजीकृत करावाया। उक्त अभियोग का घटना स्थल जनपद मुरादाबाद रेलवे स्टेशन का होना पाये जाने पर थाना जी0 आर0पी0 जंक्शन मुरादाबाद में मु0 अ0 सं0 571/2004 धारा 221/223/224/225 ए भ0द0 व पंजीकृत होकर विवचेना की गयी है।" (महत्ता दी गयी)

4. जाँच अधिकारी ने अभिलेख साक्ष्य का विश्लेषण किया व इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सभी आरक्षीगण के विरुद्ध आरोप सत्य है व उपरोक्त कृत अत्यन्त लापरवाही पूर्ण, उदासीनता, अकर्मण्यता व अनुशासनहीनता पूर्ण है व स्पष्ट रुप से दोषी पाये जाने के कारण उनके आरक्षी पद की सेवा से पदच्युत किये जाने की संस्तुति करी गई। निष्कर्ष का महत्वपूर्ण अंश निम्न है:

"इस प्रकार सम्पूर्ण तथ्यों से यह पाया गया कि आरक्षीगण 234 स0 पु0 प्रेमपाल सिंह, आरक्षी 241 स0 पु0 दिनेशचन्द्र गुप्ता एवं आरक्षी 96 स0 पु0 ऋषिपाल सिंह द्वारा अभियुक्तों राजेश, मनोज व जमील उर्फ छोटा को मान0 न्यायालय में पेशी के उपरान्त जानबूझकर लालचवश उनके कहने पर घर ले जाकर परिजनों से मिलवाया गया तथा अभियुक्तों के साथ एक होटल पर बैठक अभियुक्तों द्वारा मंगाई गयी अंग्रेजी शराब/ कोल्ड ड्रिंक्स का सेवन करने के पश्चात् खाना मुर्गा खाया। आरक्षीगण के अत्यधिक नशे में होने के कारण बरेली आने के लिये रेलवे स्टेशन मुरादाबाद पर अभियुक्तगण इन्हे छोढ़कर कोल्ड ड्रिंक्स लेने के बहाने पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गये तथा मदाहोशी की हालत में उक्त तीनों आरक्षीगण बरेली के लिये आने वाली गांधीधाम एक्सप्रेस 4312 डाउन में स्लीपर कोच में बैठ/लेट गये जिनहें स्वयं का भी पता नहीं था कि हम कहां है। बरेली आने पर उक्त तीनों आरक्षीगण को मदाहोशी की हालत में थाना जी0आर0पी0 जंक्शन बरेली के हे0 का0 प्रो0 दिग्विजय शर्मा द्वारा मय हमराह कर्मचारियों की मदद से उतार कर थाने लाये व चिकित्सा परीक्षण/उपचार हेतु जिला चिकित्सालय बरेली ले जाकर दाखिल किया गया तत्समय समाचार पत्रों में भी उक्त घटित तथ्यों की खबर मुख्य रुप में प्रकाशित की गयी थी। जिसकी समाचार की कतरन भी पत्रावली पर उपलब्ध है। आरक्षीगण उक्त के इस कृत्य से पुलिस की छवि धूमिल हुई है। पुलिस जैसे अनुशासित बल में रहकर एक महत्वपूर्ण (मुल्जिम ड्यूटी/ राजकीय कार्य में अपने कर्त्तव्यों को अनदेखा करते हुए लालचवश उक्त आरक्षीगण 234 स0 पु0 प्रेमपाल सिंह, आरक्षी 241 स0 पु0 दिनेश चन्द्र गुप्ता व आरक्षी 96 स0पु0 ऋषिपाल सिंह द्वारा किया गया उपरोक्त कार्य अत्यन्त ही लापरवाही पूर्ण, उदासीनता, अकर्मण्यता व अनुशासनहीनता पूर्ण है और अभिलेखों से भी स्वतः प्रमाणित हैं जिसके लिये आरक्षी 234 स0 पु0 प्रेमपाल सिंह, आरक्षी 241 स0 पु0 दिनेश चन्द्र गुप्ता व आरक्षी 96 स0 पु0 ऋषिपाल सिंह पूर्ण रुपेण स्पष्ट रुप से दोषी पाये जाते हैं।" (महत्ता दी गयी)

5. उपरोक्त जांच आख्या को अनुशासनिक प्राधिकारी (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक) को प्रेषित की गयी। जिसके उपरान्त अलग-अलग 'कारण बताओ नोटिस' दिनांक 03.01.2006 को आरक्षीगण को प्रेषित किया गया कि वो अपना-अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। दोनों याचिकाकर्ता ने नोटिस का जबाव दिया, जिसके द्वारा घटना से इंकार नहीं किया गया परन्तु अपराधीगण के शातिर किस्म के होने व उनके द्वारा धोखे से शराब पिलाने के कारण घटना घटित हुई ऐसा स्पष्टीकरण दिया तथा डाक्टरी परीक्षण करने वाले डाक्टर का ब्यान अंकित न करना भी जाँच आख्या गलत होने का एक कारण बताया व प्रार्थीगण को जाँच कार्यवाही के दौरान नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों से वंचित किया गया। एक स्पष्टीकरण के मुख्य अंश निम्न है:

"2. यह कि दिनांक 09.07.2004 को तीनों अभियुक्तों की पेशी मुरादाबाद में होने के पश्चात् मय अभियुक्त व दो अन्य सहयोगियों के साथ गांधी धाम ट्रैन से मुरादाबाद से बरेली जा रहा था तो अभियुक्तगण प्रार्थी को एल्कोहल का सेवन करवाया और जिसका लाभ उठाकर उक्त तीनों अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा से भागने में सफल रहे। प्रार्थी व प्रार्थी के साथी बेहोशी हालत में मय दो अदद राइफल, 60 कारतूस व दो हथकड़ी थाना जी0आर0पी0 बरेली के कर्मचारियों द्वारा बरेली स्टेशन पर बरामद किया गया तथा प्रार्थी को बेहोशी हालत में ट्रेन से उतारा गया।
5. यह कि प्रार्थी को अभियुक्तगण ने बेहोश कर भाग गये इस स्थिति में घोर लापरवाही की कोई बात ही नहीं बनती।
6. यह कि यहां तक कि प्रार्थी के खिलाफ कोई भी विभागीय जांच नहीं की गयी और बिना विभागीय जांच के ही सीधे नैसर्गिक न्याय सिद्धान्त का उल्लंघन कर बिना किसी प्रकार का अवसर प्रदान किये गये प्रार्थी की सेवाओं की समाप्ति का नोटिस दे दिया गया जो कि विधि विरुद्ध है।
8. यह कि प्रार्थी के कोई इस तरह का कार्य नहीं किया है जिससे पुलिस फौजी फोर्स की बदनामी हो प्रार्थी को शराब पिलाकर एवं बेहोश कर शातिर किस्म के अपराधी प्रार्थी की बेहोशी का लाभ उठाकर भाग गये इस तरह अभियुक्त ने एक और अपराध किया है जिसके वे सजा के पात्र हैं।" (महत्ता दी गयी)

6. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बरेली ने आरक्षीगण का स्पष्टीकरण व जांच आख्या का अध्ययन व मनन कर, आरक्षीगण के स्पष्टीकरण के तथ्यों को निराधार माना व अलग-अलग आदेश दिनांक 24.1.2006 के द्वारा आरक्षीगण को तत्काल प्रभाव से पुलिस विभाग की सेवा से हटाये (पदच्युत) किये जाने का आदेश पारित किया, जिसके मुख्य अंश निम्न हैं:

"आरोपी कान्स0 का उक्त कथन मान्य नहीं है, और निराधार है, क्योंकि आरोपी के विरुद्ध अभियुक्तों के साथ लगाई गयी महत्वपूर्ण डियूटी के दौरान अभियुक्तों के साथ शराब पीने, खाना खाने, तथा नशे में हो जाने पर अभियुक्तों के इनकी अभिरक्षा से भाग जाने के गम्भीर आरोप है और इस प्रकार के गम्भीर आरोपों के संबंध में विभागीय कार्यवाही इस उद्देश्य से की जा सकती है कि वह अनुशासन एवं कार्य की योग्यता की दृष्टि से विभाग में बने रहने के योग्य है अथवा नहीं, तथा अपराधिक कार्यवाही केवल उसके द्वार घटित किये गये अपराध के संबंध में दण्डित किये जाने के उद्देश्य से की जाती है। और जिसका प्राविधान माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा कैप्टन एम.पाल. एन्थनी बनाम भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड एवं अन्य (1999) 3 एस.एस.सी. के निर्णय के प्रस्तर-20 एवं 22 में दिया गया है, इसी प्रकार माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा राजस्थान बनाम बी.के. मीना एवं अन्य एस.एस.सी. 1996 (6) में भी प्राविधान दिया गया है।
4. आरोपी कान्स0 द्वारा अपने प्रस्तुत स्पष्टीकरण में दूसरा बिन्दु यह अंकित किया है कि जांचकर्ता अधिकारी द्वारा जांच के दौरान उसके बयान अंकित करके उसे अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान नहीं किया गया है। आरोपी का यह कथन बिल्कुल असत्य एवं निराधार है क्यों कि प्रकरण में प्रा0 जांचकर्ता अधिकारी द्वारा आरोपी से पूछताछ की गयी है, और आरोपी द्वारा अपने साथी कां. 96 स.पु. रिषीपाल सिंह के बयानों का समर्थन किया गया है, इसके अतिरिक्त विभागीय कार्यवाही के दौरान भी पीठासीन अधिकारी द्वारा इन्हे अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पूरा-पूरा अवसर प्रदान किया गया है, जैसा कि दण्ड पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट है।
5. आरोपी कान्स0 द्वारा अपने प्रस्तुत स्पष्टीकरण में तीसरा तथ्य यह अंकित किया गया है कि विभागीय जाचं के मध्य डाक्टरी परीक्षण हेतु ले जाने वाले अधिकारी एवं डाक्टर का बयान अंकित नहीं किया गया है। आरोपी का यह कथन भी पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार असत्य एवं निराधार है क्योंकि पीठासीन अधिकारी द्वारा कार्यवाही के दौरान जी.आर.पी. थाना जंक्शन बरेली में नियुक्त हे.कां. प्रो0वे0 दिग्विजय शर्मा का कथन अंकित किया गया है, और जिसके द्वारा अपने बयानों में आरोपी को मेडीकल परीक्षण हेतु मय हमराह जिला अस्पताल ले जाना व्यक्त किया है, तथा मेडीकल परीक्षण रिपोर्ट पत्रावली पर उपलब्ध है, जिनसे आरोपी द्वारा शराब का सेवन किये जाने की पुष्टि होती है।
इस प्रकार सम्पूर्ण तथ्यों से यह स्पष्ट है कि आरक्षी 234 स0पु0 प्रेमपाल सिंह मय हमराह आरक्षी 241 स0पु0 दिनेश चन्द्र गुप्ता एवं आरक्षी 96 स0पु0 रिषीपाल सिंह के द्वारा दिनांक 9.7.04 को अभियुक्त राजेश, मनोज, व जीमल को वाद मा0 न्यायालय ए.सी.जे.एम. द्वितीय मुरादाबाद में पेशी के जानबूझकर लालचवश उसके साथ होटल पर शराब का सेवन किया गया और इनके नशे में हो जाने की हालत में अभियुक्त रेलवे स्टेशन मुरादाबाद पर इनसे कोल्ड ड्रिन्क लाने का बहाना करके इनकी अभिरक्षा से भागने में सफल हुये, एवं आरोपी को मय हमराह कान्स0 गण के बेहोशी की हालत में ट्रेन से रेलवे स्टेशन बरेली जंक्शन पर उतारा गया। इनके इस कृत्य से जनमानस में पुलिस की छवि खराब हुई, तथा अनुशासित बल का सदस्य होने के नाते आरोपी का उक्त कृत्य घोर अनुशासन हीनता, कर्तव्य के प्रति लापरवाही एवं अकर्मण्यता बरतने का प्रतीक है, तथा इसका यह कृ्त्य अपने पद के अयोग्य होने का परिचायक है। आरोपी का प्राप्त स्पष्टीकरण पूर्णतयाः असंतोषजनक एवं बलहीन है।" (महत्ता दी गयी)

7. प्रार्थीगण द्वारा उपरोक्त दण्ड आदेश के विरुद्ध नियमावली 1991 के नियम 20 के अन्तर्गत पृथक-पृथक अपील की गई, जो अपीलीय प्राधकारी पुलिस उपमहानिरीक्षक, बरेली परिक्षेत्र, बरेली के द्वारा गुण-दोष पर पृथक-पृथक आदेश दिनांक 28.4.2007 द्वारा अस्वीकार की गई। आदेश के महत्वपूर्ण अंश निम्न है:

"समस्त तथ्यों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि याची विचाराधीन बंदी राजेश, मनोज, जीमल जिन्हे यह माननीय न्यायालय ए.सी.जे.एम. द्वितीय, मुरादाबाद में पेशी हेतु केन्द्रीय करागार बरेली लेकर वापस आ रहे थे इनके द्वारा रास्ते में शराब का सेवन किया गया नशे हो जाने के कारण अभियुक्तगण इनकी अभिरक्षा से भाग गये। मेडीकल परीक्षण में इनके द्वारा शराब का सेवन किया जाना पाया गया। अपीलकर्ता द्वारा घोर अनुशानहीनता, कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही, अकर्मण्यता का परिचय दिये जिसके लिए पूर्णतः दोषी है, पुलिस विभाग की छवि धूमिल हुई। इनके विरुद्ध सम्पूर्ण कार्यवाही विधिवत की गई है जिसमें कोई त्रुटि अथवा अनियमितता नहीं है दण्डाधिकारी द्वारा पूर्ण साक्ष्यों के आधार पर याची को सेवा से हटाये जाने का आदेश पारित किया है वह पूर्णतयः नियमता है अतः याची की अपील अस्वीकार की जाती है।" (महत्ता दी गयी)

8. उपरोक्त संदर्भित आदेश दिनांक 24.1.2006 व 28.4.2007 प्रार्थीगण द्वारा पृथक-पृथक याचिका के माध्यम से आक्षेपित किये गये हैं।

याचिकाकर्ता का पक्ष-

9. श्री अशोक खरे, वरिष्ठ अधिवक्ता अपने सहयोगी सिद्धार्थ खरे, अधिवक्ता के साथ याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखा कि जांच की कार्यवाही पूर्णतः मौखिक साक्ष्य, जिसका कोई प्रतिपरीक्षा नहीं हुई के आधार पर एक पक्षीय पूर्ण की गई जो नैसर्गिक सिद्धान्त के विपरित है। याचिकाकर्ताओं की चिकित्सा जांच की आख्या, जाँच प्रक्रिया के दौरान पत्रावली पर नहीं लाई गयी, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता पूर्णतः शराब के नशे में थे। अगर यह मान भी लिया जाये की याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप सिद्ध होता है, फिर भी दिया गया दण्ड, आश्चर्यजनक रुप से अनुपातहीन है। दण्ड आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ता के पूर्व आचरण का संज्ञान किया गया जो अनुचित था, क्यों कि इस नाते उनको, कोई नोटिस या स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया था। अतः यह न्यायालय आक्षेपित आदेश को अपास्त करे।

प्रतिवादी का पक्ष-

10. श्री विक्रम बहादुर यादव, स्थाई अधिवक्ता ने उपरोक्त कथन का विरोध किया और प्रतिवेदन किया कि जांच अधिकारी ने आरक्षीगण को आरोप पत्र की एक प्रति भेजी व स्पष्टिकरण मांगा परन्तु मात्र एक याचिकाकर्ता द्वारा अपना स्पष्टीकरण दिया गया, जिसका उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है। दोनों याचिकाकर्ता को नोटिस दिनांक मई 2005 द्वारा यह सूचना दी गई कि 11.05.2005 से 14.05.2005 के मध्य अभियोजन साक्षियों के कथन अभिलिखित किये जायेंगे, इसके लिये वो जाँच अधिकारी के समक्ष उपस्थित रहें। परन्तु उक्त तिथियों में कोई कार्यवाही न होने के कारण अग्रिम तिथि 28 व 29.05.2005 निर्धारित की गई व इस नाते याचिकाकर्ता को पुनः नोटिस दिनांक 17.05.2005 भेजा गया, परन्तु दोनों याचिकाकर्ता नोटिस प्राप्त होने के उपरान्त भी 28.05.2005 को अनुपस्थित रहे। उस दिन जांच अधिकारी ने कुछ अभियोजन साक्षियों के कथन लेखबद्ध किये और अन्य के लिये दिनांक 10.06.2005 नियत की व पुनः एक नोटिस दिनांक 06.06.2005 आरक्षीगण को प्रेषित किया गया। उक्त नोटिस को याचिकाकर्ता प्रेमपाल सिंह द्वारा 08.06.2005 को प्राप्त किया परन्तु वो व अन्य आरक्षी 10.06.2005 को उपस्थित नहीं हुए उस दिन साक्षी हे.कां. (प्रो.) दिग्विजय सिंह का कथन लेखबद्ध किया परन्तु दोनों याचिकाकर्ता की अनुपस्थित के कारण जिरह नहीं हो सकी। याचिकाकर्ता को पूर्व सूचना होते हुए भी जांच कार्यवाही में भाग न लेना से विदित है, कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का पूर्व पालन हुआ व याचिकाकर्ता को जानकारी के होते हुये भी, जांच कार्यवाही में भाग न लेने के उपरान्त, उनका यह कथन की समस्त कार्यवाही, एक पक्षीय हुई, मान्य नहीं हो सकता है।

11. स्थाई अधिवक्ता ने आगे प्रतिवेदन किया कि हे.का. प्रो. 630 दिग्विजय शर्मा ने अपने साक्ष्य में स्पष्ट रुप से कहा कि दोनों याचिकाकर्ता व अन्य आरक्षी डा0 गांधी धाम एक्सप्रेस में स्लीपर कोच में लेटे हुए मदहोश हालत में मिले और होश आने पर घटना का विवरण दिया जिसके आधार पर आरोप प्रेषित किया गया। अनुशासनिक अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत स्पष्टीकरण में भी घटना घटित होने से इंकार नहीं किया गया है। परन्तु समस्त दोष अपराधीगण पर डालने का प्रयास किया गया, जो जाँच अधिकारी/ अनुशासनिक पदाधिकारी व अपीलीय अधिकारी ने सिरे से खारिज कर दिया, जो विधिक रुप से मान्य भी है।

12. अनुशासनात्मक कार्यवाही की न्यायिक समीक्षा की विधि :

"22. भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 136 के अंतर्गत संवैधानिक न्यायालयों द्वारा, विभागीय / अपीलीय अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले अनुशासनात्मक जांच के मामलों में, न्यायिक समीक्षा की शक्ति, मात्र उन विधिक व प्रक्रियात्मक त्रुटियों को सुधारने की सीमाओं तक सीमित है, जिसके फलस्वरूप प्रत्यक्ष रुप से अन्याय या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन प्रकट होता हो और यह समीक्षा अपीलीय प्राधिकरण के रूप में गुण दोष के आधार पर मामले के निर्णय करने के समान नहीं है, जिसको इस न्यायालय द्वारा तमिलनाडु बनाम. टी.वी. वेणुगोपालन : 1994 (6) एस सी सी 302 और बाद में टी.एन. सरकार व एक अन्य बनाम ए. राजपांडियन : 1995 (1) एस सी सी 216 और आगे इस न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने बी.सी. चतुर्वेदी बनाम. भारत संघ और अन्य : 1995 (6) एस सी सी 749 में परखा व निम्न निर्धारित किया:-
"अनुशासनिक प्राधिकारी, तथ्यों का एकमात्र न्यायाधीश होता है और जहां अपील प्रस्तुत की जाती है तो अपील प्राधिकारी के पास साक्ष्य या दंड की प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन करने की सह अस्तित्व व्यापक शक्ति होती है। एक अनुशासनात्मक जांच में, विधिक साक्ष्य की ठोस प्रमाणिकता व उस साक्ष्य पर निष्कर्ष, प्रासंगिक नहीं होते हैं। साक्ष्य की पर्याप्तता या साक्ष्य की विश्वसनीयता को न्यायालय या प्राधिकरण के समक्ष परखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। भारत संघ बनाम एच.सी. गोयल :(1964) 4 एससीआर 718, में इस न्यायालय ने प्रस्तर 728में यह निर्धारित किया कि अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा साक्ष्य पर विचार करने पर, दिया गया निष्कर्ष यदि विकारग्रस्त है या प्रत्यक्ष रुप से त्रुटिग्रस्त है या कोई साक्ष्य ही नहीं है, तब उत्प्रेषण लेख जारी किया जा सकता है।"

23. तत्पश्चात् इस न्यायालय के हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड बनाम महेश दहिया : 2017(1) एस सी सी 768, के निर्णय व हाल ही में इस न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने प्रवीण कुमार बनाम भारत संघ और अन्य : 2020(9) एस सी सी 471 के निर्णय में इसका लगातार अनुगमन किया जा रहा है।

24. इस प्रकार यह अवधारित किया गया है कि संवैधानिक न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति, निर्णय लेने की प्रक्रिया का मूल्यांकन है, न कि निर्णय के गुण दोष का। यह प्रक्रिया में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए है न कि निष्कर्ष की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए। न्यायालय/प्राधिकरण, अपचारी के विरुद्ध नियोजित कार्यवाही में हस्तक्षेप कर सकता है, यदि यह किसी भी तरह से प्राकृतिक न्याय के नियमों के असंगत है या उन वैधानिक नियमों का उल्लंघन हुआ है जो जांच के तरीके को निर्धारित करते हैं या जहाँ अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा जो निष्कर्ष दिया गया हो वो किसी भी साक्ष्य के आधारित न हो या निष्कर्ष इस तरह का हो जिस पर कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति कभी नहीं पहुँच पाये या जहां अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा साक्ष्य पर विचार करने पर निष्कर्ष विकृत होता है या पत्रावली के संदर्भ में प्रत्यक्ष रूप से आधारभूत त्रुटि से ग्रस्त होता है या किसी भी साक्ष्य पर आधारित नहीं होता है, तो उत्प्रेषण लेख जारी किया जा सकता है। संक्षेप में, वस्तुतः न्यायिक समीक्षा का दायरा, किसी प्राधिकरण के निर्णय की यथार्थता या तर्कसंगतता की परीक्षा की सीमा तक विस्तार नहीं किया जा सकता है।"

"27. यह सच है कि विभागीय जांच कार्यवाही पर साक्ष्य के सख्त नियम लागू नहीं होते हैं। हालांकि, विधि की एकमात्र आवश्यकता यह है कि अपचारी के विरुद्ध आरोप को ऐसे साक्ष्यों द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए, जिसके आधार पर एक तर्कसंगत व्यक्ति यथोचित एवं वस्तुपरक होकर दोषी कर्मचारी के विरुद्ध, निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि आरोप की गंभीरता को क़ायम रख पाये। यह सच है, कि विभागीय जांच कार्यवाही में भी केवल अनुमान या अटकलों पर आधारित अपराध बोध का निष्कर्ष मान्य नहीं किया जा सकता है।
28. संवैधानिक न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 136 के तहत न्यायिक समीक्षा के अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए विभागीय जांच कार्यवाही में तथ्यों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, सिवाय दुर्भावना या दुराग्रह के मामले में जहां निष्कर्ष के समर्थन में कोई भी साक्ष्य न हो या जहां कोई ऐसा निष्कर्ष हो, जो कोई भी यथोचित व्यक्ति तटस्थ होकर उस निष्कर्ष को मान्य कर सके और जब तक विभागीय प्राधिकारी द्वारा दिये गए निष्कर्ष का समर्थन करने के लिए कुछ साक्ष्य हैं, उसे बनाए रखा जायेगा।"

(देखें:- डिप्टी जनरल मैंनेजर (अपीलीय अथारिटी) व अन्य प्रति अजय कुमार श्रीवास्तव : (2021)2 SCC 612) (उपरोक्त प्रस्तर 22, 23, 24, 27 व 28 का हिन्दी अनुवाद न्यायालय द्वारा किया गया है) "13. यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पी. गुनासेकरन :(2015)2 SCC 610 के एक अन्य फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि साक्ष्य की पुन: मूल्यांकन करते हुए उच्च न्यायालय अनुशासनात्मक कार्यवाही में अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर सकता है। न्यायालय ने निम्न मापदंड निर्धारित किये जब उच्च न्यायालय अनुशासनात्मक कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगा:-

"13. संविधान का अनुच्छेद 226/227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय निम्न नहीं करेगा:-
(i) साक्ष्य का पुनः मूल्यांकन ;
(ii) विधि के अनुसार किए जाने की स्थिति में जांच के निष्कर्षों में हस्तक्षेप ;
(iii) साक्ष्य की पर्याप्तता की जाँच ;
(iv) साक्ष्य की विश्वसनीयता की जाँच ;
(v) यदि कोई कानूनी साक्ष्य है जिस पर यदि निष्कर्ष किसी विधिक साक्ष्य पर आधारित हो तो हस्तक्षेप;
(vi) तथ्य की त्रुटि, कितनी भी गंभीर क्यों न हो उसका सुधार ;
(vii) सजा की अनुपातिकता में हस्तक्षेप तब तक नहीं जब तक कि वह अन्तरण को आघात न दे। "

(देखें:- कर्नाटक राज्य व अन्य प्रति एन. गंगाराज, (2020)3 SCC 423) (उपरोक्त प्रस्तर 13 का हिन्दी अनुवाद न्यायालय द्वारा किया गया है) "24. ...... दंड विधि में, सबूत का भार अभियोजन पक्ष पर होता है और जब तक अभियोजन पक्ष " उचित संदेह से परे" आरोपी के अपराध को साबित करने में सक्षम नहीं होता है, तब तक उसे न्यायालय द्वारा दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। दूसरी ओर, एक विभागीय जांच में, "संभाव्यता की प्रबलता" के आधार पर किए गए निष्कर्ष पर अपचारी अधिकारी को दण्डित किया जा सकता है।"

(देखें:- यूनियन ऑफ इण्डिया एवं अन्य प्रति दलबीर सिंह , (2021)11 SCC 321) (उपरोक्त प्रस्तर 24 का हिन्दी अनुवाद न्यायालय द्वारा किया गया है) विश्लेषण व निष्कर्ष -
13. सर्वप्रथम यह निर्धारित करना है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन हुआ है या नहीं। जैसा की आक्षेपित आदेश में पूर्ण स्पष्ट रुप से वर्णन किया गया है कि तीनों आरक्षीगण को आरोप की प्रति भेजी गयी व दोनों याचिकाकर्ता ने स्पष्टीकरण भी प्रेषित किया, जिस पर विचार भी किया गया, परन्तु साक्षीगण के कथन के लेखबद्ध होने के तिथि की पूर्व सूचना होते हुए भी आरक्षीगण का अनुपस्थित होना तथा जिसके कारण उनकी ओर से जिरह का न हो पाना, यह निर्धारित करता है कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन किया गया परन्तु आरक्षीगण ने अपनी इच्छा से कार्यवाही में भागीदारी नहीं करी। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ अधिवक्ता का कथन की नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन नहीं हुआ व कार्यवाही एक पक्षीय करी गई, असत्य व पत्रावली पर उपस्थित तथ्यों के विपरीत होने के कारण बलहीन है, इसलिये है, इसलिये अस्वीकार किया जाता है।
14. आरक्षीगण के अनुशासनात्मक प्राधिकारी के समक्ष स्पष्टीकरण से यह स्पष्ट है कि घटना घटित होने से इंकार नहीं किया गया व यह भी इंकार नहीं किया गया कि आरक्षीगण शराब के सेवन के कारण मदहोश थे, जिसका लाभ उठाकर अपराधीगण रेलगाड़ी से मुरादाबाद से बरेली लाते समय हिरासत से भाग गये। अतः मात्र इस कारण से कि शराब सेवन की आरक्षीगण की चिकित्सा आख्या या डाक्टर जिसने मेडिकल किया, उसका साक्ष्य लेखबद्ध नहीं किया गया तो समस्त जाँच कार्यवाही दूषित हो गयी ऐसा नहीं माना जा सकता है। वो भी जब शराब सेवन से आरक्षीगण ने इंकार नहीं किया है।
15. इस नाते साक्षी हे0कां0 दिग्विजय शर्मा का कथन महत्वपूर्ण हो जाता है जिससे आरक्षीगण को शराब के सेवन के कारण मदहोश हालत में रेलगाड़ी के डिब्बे में देखा और सर्वप्रथम घटना का विवरण सुना व कार्यवाही का कथन किया।
16. जाँच कार्यवाही के दौरान उपरोक्त साक्षी के कथन से यह विदित होता है कि आरक्षीगण, अभियुक्तगण के कहने पर उनके रिश्तेदार के घर गये और सभी एक होटल में खाना खाने गये, वहां न केवल खाना खाया अपितु शराब का अत्यधिक सेवन भी किया जिससे नशा हो गया और बरेली जाने वाली ट्रेन में जब बैठे तब अभियुक्तगण कोल्ड ड्रिंक्स के बहाने हथकड़ी खोल कर भाग गये और आरक्षीगण रेलगाड़ी में मदहोश होकर सोते रहे। उपरोक्त तथ्यात्मक परिणाम को अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत सीमित समीक्षा का अधिकार के अंतर्गत अमान्य नहीं किया जा सकता।
17. जैसा की ऊपर विधि का उल्लेख किया गया है कि 'संभावना की प्रबलता' के सिद्धान्त व इस न्यायालय द्वारा अपीलीय अधिकारी की तरह शक्ति का उपयोग न करने के कारण उपरोक्त तथ्यात्मक परिणाम में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। अनुशासनात्मक कार्यवाही में किसी भी प्रकार का दोष नहीं है। नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का पूर्ण रुप से परिपालन किया गया। आरक्षीगण ने यह माना है कि उन्होने शराब का सेवन किया जिससे वो मदहोश हो गये जिसका लाभ उठाकर अपराधीगण फरार हो गये। उपरोक्त तथ्य की पुष्टि हेे.कां. दिग्विजय शर्मा के साक्ष्य से पूर्ण रुप से होती है।
18. अतः जांच आख्या व अनुशासनिक अधिकारी द्वारा लिये गये निर्णय, जिसके द्वारा आरक्षीगण द्वारा किया गया कृत सिद्ध होता है व उनके कृत से अनुशासनहीनता, घोर लापरवाही, अकर्मण्यता का परिचय होता है, में कोई भी विधिक त्रुटि नहीं है।
19. अन्त में न्यायालय को यह विचार करना है कि क्या दण्ड आश्चर्यजनक रुप से अनुपातहीन है। आरक्षीगण का यह कर्तव्य था कि वो अपराधियों को सकुशल मुरादाबाद से वापस बरेली ले कर आते। परन्तु उन्होने घोर लापरवाही की व अपराधीगण के साथ न केवल उनके रिश्तेदार के घर गये बल्कि उनके साथ होटल में खाना खाया और अधिक मात्रा में शराब का सेवन किया, जिससे उनको इतना भी होश नहीं रहा कि अपराधीगण हथकड़ी खोल फरार हो गये व आरक्षीगण मदहोश होकर सोये रहे। यह कृत न केवल अनुशासनहीनता का द्योतक है अपितु कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही व अकर्मण्यता का परिचय है। अतः 'सेवा से हटाने' का दण्ड किसी भी प्रकार से अनुपातहीन नहीं है। अतः दण्ड विधिक रुप से मान्य है। इसमें किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
20. उपरोक्त विश्लेषण का एक ही निष्कर्ष है कि दोनों याचिकायें निरस्त किये जाने योग्य है। अतः निरस्त की जाती है।
आदेश दिनाँक:-31.08.2022 अवधेश (सौरभ श्याम शमशेरी, न्यायमूर्ति)