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Lok Sabha Debates

Moved The Motion For Consideration Of The Land Acquisition (Amendment) Bill, ... on 4 December, 1998

NT> Title: Moved the motion for consideration of the Land Acquisition (Amendment) Bill, 1998. (Substitution of new section for section 16, etc.) 16.15 hrs. सभापति महोदय : सदन की सहमति हो तो इस विधेयक के लिए दो घंटे का समय निर्धारित किया जाए। बहुत से माननीय सदस्य : हम सब की इस पर सहमति है।

श्री भगवान शंकर रावत (आगरा) : महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं : " कि भूमि अर्जन अधनियम १८९४ में और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए।" महोदय, मैं भूमि अर्जन लैंड एकिवजिशन बिल के माध्यम से इसे प्रस्तुत कर रहा हूं। किसानों की समस्या भूमि अधिग्रहण से संबंधित है। इसलिए मैं इसे सदन के सम्मुख रखना चाहता हूं। महोदय, देश के विकास में किसानों के संदर्भ में बातें बहुत कही जाती हैं लेकिन सबसे ज्यादा किसान लुटता है। अगर आप कोई चीज बेचना चाहते हैं तो अपनी इच्छा से बेच सकते हैं और जो मूल्य मांगना चाहते हैं, मांग सकते हैं लेकिन किसान की जमीन पर चाहे सरकार की, चाहे स्थानीय निकाय की और चाहे किसी कम्पनी की गिद दृष्िट जाए, जिस ने कहा कि जमीन चाहिए, उसके लिए अनिवार्य रूप से अधिग्रहित कर लिया जाता है। उसके परिवारजनों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है। महोदय, १८९४ में भूमि अधिग्रहण कानून बना था। गुलामी का अवशेष और समाजवाद का प्रतीक यह कानून स्वतंत्र भारत में अभिशाप बना हुआ है। यह किसान को लूटता है। किसान की लहलहाती भूमि उसके जीवकोपार्जन का साधन होती है। उसका पूरा परिवारजन उस भूमि के माध्यम से अपने खून को पसीना बना कर, धरती का पेट चीर कर, अपना भरण-पोषण ही नहीं करता है, समूचे देश का भी भरण-पोषण करता है। उस किसान के घर में रातोंरात डकैती डाल कर कानून के माध्यम से उसे लूट लिया जाता है। डकैती डालने के सरकारी तंत्र ने उसे कानूनी अधिकार दिया है कि जब चाहो लूट लो, उसे विस्थापित बना कर सड़क के चौराहे पर खड़ा कर दो और उसके परिवारजनों को भूख से मरने के लिए विवश कर दो। इसलिए मैं यह संशोधन लेकर आया हूं। आज समाजवादी व्यवस्था की बात की जाती है लेकिन समाजवादी व्यवस्था में किसान सबसे ज्यादा लुटता है - चाहे वह अरबन लैंड सीलिंग एकट के माध्यम से या लैंड एकिवजिशन एकट के माध्यम से। अर्िथक नीतियों के बदलते हुए परिवेश में सामाजिक न्याय की बात की जाती है लेकिन इसमें कुछ लोग अपने नहित स्वाथर्ों की पूर्ित के लिए उसके अर्थ का अनर्थ करते हैं। आज किसान को सामाजिक न्याय दिलाने की आवश्यकता है। किसानों को रातोंरात विकास के नाम पर लूट लिया जाता है। उसे अपनी जमीन से वंचित कर दिया जाता है। भूखों मरने के लिये विवश कर दिया जाता है। इसलिए मैं इस संशोधन के माध्यम से इस सदन में २-४ बिन्दु यहां रख रहा हूं जो समूचे देश का नेत्ृात्व करते हैं और लोग किसानों की बाते करते हैं, लेकिन किसानों के दर्द को समझने की कोशिश नहीं करते हैं। यह कहा जाता है कि हम जमीन का अमुक योजना के लिये अधिग्रहण कर रहे हैं और वह जमीन अधिग्ृाहीत कर ली जाती है। यह भी बताया जाता है कि वह परियोजना अत्यंत आवश्यक है और एक लम्बी-चौड़ी कहानी बता दी जाती है कि इसके लिए यह जमीन अधिग्ृाहीत कर ली गई है। देखने में यह आया है कि सरकारी परियोजनाओं के लिये, चाहे वह स्थानीय निकायों के लिये हो, चाहे पंजीकृत कम्पनियों के लिये हो, भूमि का अधिग्ृाहण तो कर लिया जाता है किन्तु दस-दस साल तक वह जमीन खाली पड़ी रहती है, अनुपयोगी रहती है, उसका उपयोग नहीं किया जाता है और किसानों से कब्जा भी ले लिया जाता है। उसके बाद एक ओर अन्न उत्पादन की समस्या पैदा होती है तो दूसरी ओर जमीन का अतिक़मण शुरु हो जाता है। इसलिये मेरा इस संदर्भ में यह संशोधन है कि जिस जमीन को जिस परियोजना के लिये लिया गया हो, उसको पूरा करना चाहिये, उस पर काम प्रारम्भ हो जाना चाहिये । अगर परियोजना बड़ी है और काम पूरा नहीं हो सकता है तो उस जमीन पर कुछ कार्य शुरु हो ही जाना चाहिये। उसके लिये यह बताना होगा कि यह जमीन जिस परियोजना के लिये ली गई थी, उसके लिये कार्य शुरु कर दिया गया है। यदि दस साल के बाद भी उस पर कार्य शुरु नहीं किया जाता है तो वह जमीन किसानों को वापस मिल जानी चाहिये। साथ ही रजिस्ट्रेशन की राशि वापस न मांगी जाये बल्िक कहा जाये कि जितना मुआवज़ा दिया गया है, वह मुआवजा वापस कर दो और जमीन वापस ले लो। सभापति महोदय, दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि जमीन का मुआवजा देने की प्रक़िया इतनी वचित्र और जटिल है जिससे किसान हमेशा लुटता रहता है। भूमि अधिग्रहण का मामला वकील के लिये एक पैराडाइज़ हो सकता है, किन्ही चालाक, चतुर या बुद्धिमान लोगों के लिये व्यवसाय हो सकता है लेकिन उस गरीब किसान को कानून से न्याय नहीं मिलता है। कानून में कहा गया है कि अगर भूमि का अधिग्ृाहण किया जा रहा है तो ९० दिन के अंदर जिलाधिकारी को आपत्ित दे दे कि तो वह आपत्ित करना चाहता है तब मुआवजे की राशि के बारे में जिलाधिकारी क न्यायिक प्राधिकरण को उस मुआवजे की राशि का कवांटम कम होने के कारण उसकी आपत्ित अग्रसारित करता है अन्यथा नहीं करता है। वह गरीब किसान कानून नहीं जानता है और वह लुटता और कटता रहता है। उसके बाद वह पत्थर से मारा जाता है, मुआवजे की पूरी राशि उसे नहीं मिलती है और न्यायिक प्राधिकरण में वह अपनी बात कह नहीं पाता है । इसलिये मेरा सुझाव है कि ९० दिन के बाद भी यदि कोई वैध कारण हो तो किसान को आपत्ित दर्ज करने का अधिकार मिलना चाहिये। तीसरा सुझाव इस संशोधन के माध्यम से यह है कि किसान के लिये यह बाध्यता कहने के लिये है कि ९० दिन के अंदर अर्िजत भूमि के बारे में या उस मुआवजे की राशि के बारे में वह आपत्ित दर्ज कर दे, यदि नहीं करता है तो हमेशा के लिये उसे रोक दिया जाता है लेकिन अगर जिलाधिकारी दस साल तक उस प्रार्थना पत्र को अपने दफतर में रोके रखता है और न्यायिक प्राधिकरण को नहीं भेजा तो जिलाधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती। इस सबके बाद वह गरीब किसान चककर पर चककर काटता रहता है। इसलिये मेरा कहना है कि ९० दिन के अंदर जिलाधिकारी को वह संदर्भ भेजना आवश्यक होना चाहिये। अगर जिलाधिकारी न्यायिक प्राधिकरण को नहीं भेजता है तो उस किसान को यह अधिकार मिलना चाहिये कि वह सीधे न्यायिक प्राधिकरण में जाकर अपनी आपत्ित रख सके, अपना प्रार्थना-पत्र दे सके। सभापति महोदय, मैं एक- दो बातें और रखना चाहता हू। एक तो यह कि प्रक़िया इतनी जटिल कर दी गई है कि इस मुआवजे को देने के लिये तीन नियम बनाये गये हैं। एक कहता है कि हम बाजार मूल्य दे रहे हैं और दूसरा कहता है कि हम सांत्वना राशि दे रहे हैं। तीसरा कहता है कि जिस दिन से नोटफिकेशन हुआ, उसके बाद से जब अवार्ड बना, उस राशि में १२ प्रतिशत ब्याज की राशि देंगे। बाज़ार मूल्य पर तो ब्याज मिल जाता है, चाहे वह १० वर्ष बाद मिले तो उसका ब्याज देंगे, लेकिन सांत्वना राशि जिसे सेल्िशयम कहते हैं, उस राशि पर ब्याज नहीं मिलता है। वह किराये की राशि जो नोटफिकेशन के बाद से अवार्ड होने तक की समयावधि की होती है, उस पर भी ब्याज नहीं मिलता है। परिणाम यह होता है कि कहने को सरकार किसान को मुआवजे की राशि पर ब्याज दे रही है, पर वास्तविकता यह है कि किसान लुट जाता है। १०-२० साल तक मुकदमे चलते हैं लेकिन उसके बाद भी उसको ब्याज के नाम पर केवल एक अंश का ब्याज मिलता है और बाकी पैसा रह जाता है। बढ़ती हुई महंगाई और गिरते हुए रुपये की क़यशकित के कारण उसका पैसा खीखड़ी बन जाता है। वह लुट जाता है। इसलिए मेरा कहना है कि सब राशियों पर उसको ब्याज मिलनी चाहिए। एक और बड़ी वचित्र कहानी है कि ज़मीन का अधिग्रहण किया जाता है किसी स्थानीय निकाय के लिए, किसी सरकारी परियोजना के लिए, चाहे वह राज्य सरकार की हो या केन्द्र सरकार की हो, चाहे किसी लोकल बॉडी के लिए की जाती हो, विकास प्राधिकरणों के लिए की जाती हो, या नगर निगमों के लिए की जाती हो या किसी कंपनी के लिए की जाती हो, उस राशि को देने की जिम्मेदारी जिलाधिकारी की होती है और होनी भी चाहिए। लेकिन जिलाधिकारी के साथ साथ वह जो लाभान्िवत होने वाला पक्ष है, चाहे वह स्थानीय निकाय हो या दूसरा प्राधिकारी हो, जो उस ज़मीन का उपयोग कर रहा है, उसके ऊपर मुआवजे की राशि को चुकाने की जिम्मेदारी नहीं होती है। परिणाम यह होता है कि जब हाई कोर्ट से फैसला होता है, न्यायाधिकरण से फैसला होता है तो उस बढ़ी हुई राशि और जो लैण्ड ऐकवीजीशन अधिकारी राशि तय करता है, जब उसको चुनौती दी जाती है कि यह राशि कम है और उसके बाद न्यायाधिकरण फैसला करता है या हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से फैसला आता है और उसमें अगर किसान जीत गया तो जीतने के बाद भी बढ़ी हुई राशि की वसूली नहीं हो पाती। कयोंकि वह प्राधिकारी जो उस ज़मीन का उपयोग करता है उसकी मुआवजा देने की कोई जिम्मेदारी कानून के अंदर नहीं है। कलेकटर साहब कहते हैं कि मुझे जितना पैसा मिला, उतना मैंने लैण्ड ऐकवीज़ीशन ऑफिस में जमा कर दिया। नतीजा यह है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की डक़ियां लिये हुए, घोंदुए का पट्टा जिसे हम देहात में बोलते हैं, जिस आदेश का कोई महत्व नहीं है, कागज का वह टुकड़ा शो पीस बना रहता है और किसान दर-दर की ठोकरें खाता है। वह कभी नेताओं के चककर लगाता है और कभी अधिकारियों के चककर लगाता है और वह अधिकारी अगर भ्रष्ट हुआ तो उसकी मजबूरियों का भ्रष्टाचार के दरवाजे से फायदा उठाते हैं, उसको परेशान करते हैं। अगर कोई बहुत होशियार व्यकतु हुआ, किस्मत का धनी हुआ और वह अटक ही गया कि मर जाऊंगा लेकिन मुआवज़ा नहीं छोड़ूंगा तो पहले कलेकटर साहब की कुर्की लेने के लिए वह सोचता है कि कलेकटर साहब मुझसे नाराज़ न हो जाएं, इसलिए वह अधिकारी नहीं जाता है। कलेकटर को इतनी शकितयां राज्य सरकार ने दी हैं कि कलेकटर से बिगाड़कर कोई अधिकारी काम नहीं कर सकता, लेकिन अगर कुर्की कर दी तो पी.एल.ए. का आपको पता होगा। बेसिक शिक्षा के विद्यालयों के जो अध्यापक हैं, उनका वेतन उसमें जमा रहता है, उसकी कुर्की हो जाती है या किसी विकास कार्य के लिए जमा धनराशि की कुर्की हो जाती है। उसका परिणाम होता है कि वह विकास कार्य जिनके लिए धन जमा हुआ है, वह कुर्क हो जाता है और वह विकास कार्य रुक जाता है। कभी-कभी कर्मचारियों के वेतन का पैसा भी इस तरह से चला जाता है। इससे एक नयी समस्या खड़ी होती है और जब जिलाधिकारी राज्य सरकार से कहता है कि पैसा दीजिए तो वह पैसा नहीं मिलता है। पैसा कयों नहीं मिलता? कयोंकि राज्य सरकार या जो भी सरकार है जिसके आदेश पर ऐकवीज़ीशन हुआ, वह कहते हैं कि हमारा निजी हित नहीं है। इसलिए मेरा कहना है कि जो बेनफशियरी है जिसके लिए लैण्ड ऐकवीज़ीशन हो रहा है, उसकी भी जिम्मेदारी सांझे रूप से डाली जाए कि जब मुआवजे की राशि बढ़ गई तो उसकी राशि की देयता की जिम्मेदारी उसकी होगी। यह नैसर्िगक और प्राकृतिक न्याय की बात है। मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि एक और बड़ा वचित्र फैसला दे दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है, लेकिन यह जनता की सवर्ोच्च अदालत है, संविधान इसका प्रावधान है। वह कहते हैं कि नैसर्िगक न्याय हर जगह सुप्रीम कोर्ट देता है। कहता है कि देरी हो जाए तो सेकशन ५ जनरल कलोजेज एकट में कंडोनेशन ऑफ डिले का प्रावधान है, लेकिन वह नैसर्िगक न्याय का सिद्धांत इन गरीब किसानों पर लागू नहीं होता। यह सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया हुआ है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि अगर कहीं डिले होता है किसी काम में, तो कंडोनेशन ऑफ डिले का जो प्रोविज़न है, जो नैसर्िगक कानून अधिकांश मामलों में भारत के अंदर लागू होता है, उस प्रावधान का लाभ यहां भी किसान को मिलना चाहिए। एक और बड़ा वचित्र प्रावधान बन गया है न्यायिक प्रक़िया के माध्यम से कि अगर न्यायिक प्राधिकारी ने जो जिलाजज की हैसियत का होता है, अगर उसने किसी किसान की अधिग्रहीत ज़मीन के मुआवजे का मूल्य बढ़ा दिया तो उसका फायदा तो किसान को मिल सकता है लेकिन हाई कोर्ट के अंदर अगर कोई फैसला हो गया और वहां पर ज्यादा राशि बढ़ा दी गई तो हाई कोर्ट के फैसले जो सारे मामलों में नज़ीर बनते हैं, अगर किसी व्यकित ने सरेआम चौराहे पर हत्या भी की है और ऐसे किसी मामले में उसको छोड़ दिया गया तो उस तकरीर के आधार पर साम्य होने के कारण वह छूट जाता है, लेकिन किसान के पक्ष में आदेश हो तो उसको उसका फायदा नहीं मिलता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में वैसे ही मामलों में जो फैसले होते हैं, उसका लाभ किसान को नहीं होता है। उसको कहा जाता है कि अलग से वकील करो और उच्चतम न्यायालय के चककर काटो और मुकदमा लड़ो। मेरा निवेदन है कि वह व्यवस्था भी इसमें की जानी चाहिए। महोदय, १८९४ का जो यह कानून है यह सामन्ती प्रव्ृात्ित का प्रतीक है और इसलिए मेरा आपके माध्यम से अनुरोध है कि गुलामी की इस कालिमा को समाप्त करिये। जब हम किसानों के हित की बात करते हैं तो हमें एक ब्रॉड आउटलुक और खुले मन से किसान के हित के बारे में सोचना होगा। शहरों के इर्द-गिर्द की ज़मीनें जो ऐग्रीकल्चर लैण्डज़ हैं, वह किसी न किसी आधार पर अधिग्रण के कारण, चाहे वह अर्बन लैण्ड सीलिंग ऐकट के माध्यम से हुई हों या वह लैण्ड ऐकवीज़ीशन ऐकट के माध्यम से हुई हों, लेकिन उन कानूनों के कारण उन ज़मीनों पर पैदावार बंद कर दी गई। किसान देखता है कि वह खेत न जोत सकता है, न बो सकता है। भूखों मरने को वह विवश होता है और उसके बाद अगर ऐकवीजीशन का कुल्हाड़ा उसके ऊपर चल गया तो उसके बच्चों के लिए कानून में प्रावधान है कि अगर किसी की ज़मीन अधिग्रहीत हो रही है तो उसके परिवारजनों को नौकरी देंगे। उत्तर प्रदेश आवास-विकास परिषद के अध्यक्ष से मेरी बात हुई। उन्होंने कहा कि कानून की किताब में तो लिखा है लेकिन हमारे पास इतनी नौकरियां नहीं हैं। उनके परिवारजनों तथा आश्रितों को वह एक भी नौकरी नहीं दे सकते। चाहे वह उत्तर प्रदेश आवास-विकास परिषद हो या दिल्ली विकास प्राधिकरण हो, किसानों के परिवारजन बेरोज़गार ही घूमते हैं जबकि कानून में उनको नौकरी देने का प्रावधान है, लेकिन उसको अनिवार्य रूप से ऐनफोर्स नहीं किया जाता है। उनका मज़ाक उड़ाया जाता है और कहा जाता है कि अब तुम्हारे लिए नौकरी कहां से लाएं। यह गरीब लोगों के मुंह से निवाला तो छीन सकते हैं लेकिन उनको पीने को पानी नहीं दे सकते हैं। इसलिए इस कानून में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है और इसलिए मैंने प्रयास किया है कि सदन के माननीय सदस्यों के माध्यम से और आपके माध्यम से इसके बारे में गंभीरता से विचार किया जाए और राजनीति से ऊपर उठकर विचार किया जाए और समूचे देश में भूमि अधिग्रहण की जो व्यवस्था है, उसके लिए बने हुए जो वभिन्न कानून हैं, उनके अंदर एकरूपता लाई जाए और इस प्रकार के प्रावधान किये जाएँ जो ऐण्टी पीपल न हों। इस संशोधन विधेयक के माध्यम से मैंने यह प्रयास किया है और मेरा विश्वास है कि सदन के मेरे सभी सहयोगी साथी इस मानवीय, आर्िथक और सामाजिक समस्या को समवेत करके इसके बारे में एक निर्णय लेंगे और इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करेंगे। मैं सरकार से भी कहना चाहूंगा कि सरकार भी इसमें प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाये और सरकार सोचे कि परिवर्तन की जो आंधी इस देश में चली है, वह आंधी रुकेगी नहीं। इसलिए सोच में परिवर्तन लाइये और ऐसे काले कानूनों को जो जनता के हितों के विरोधी और शोषक हैं, इनको बदलने में आप अग्रदूत बनिये, वाहक बनिये। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को विराम देता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

-- सभापति महोदय : श्री रावत जी के विधेयक पर जो बहस चल रही है, उस पर श्री मोहन सिंह जी बोलिये।

> श्री मोहन सिंह (देवरिया): सभापति महोदय, मैं पहले माननीय भगवान शंकर रावत जी को धन्यवाद देता हूं कि जिन्होंने लोक कल्याणकारी एक अच्छे विधेयक को इस सदन के सामने रखा है। मेरा विश्वास है कि जो सरकार आज पदारूढ़ है, किसानों के भविष्य और उनके हित को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक की मंशा को समझते हुए जैसे इस सदन में सरकार ने अर्बन सीलिंग एकट को खत्म करने का विधेयक रखा है, उससे भी खराब कानून इस देश में १८९४ का भूमि अधिग्रहण अधनियम कानून है। यह अंग्रेजी राज की जोर-जबरदस्ती और भारत की गरीब जनता की लूट का एक बड़ा अवशेष है, इस अवशेष के बारे में सरकार को विचार करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में १९९३ में एक सरकार बनी थी और उसने इस कानून को अपने राज्य में स्थगित कर दिया था और यह कहा था कि किसानों की भूमि को किसी सार्वजनिक उद्देश्य से जो अधिग्ृाहीत करने का सरकार का अधिकार है, इस अधिकार को हम अपने राज में स्थगित करते हैं। जब सरकार को सार्वजनिक उपयोग के लिए किसी भूमि की आवश्यकता होती है तो जो मार्केट रेट है या जिस रेट पर किसान अपनी भूमि बेचने के लिए तैयार हो जाये, सरकार उसको खरीद सकती है। इस परिपाटी की शुरुआत १९९३ की उत्तर प्रदेश की सरकार ने की थी। बहुत अच्छा होता कयोंकि जिस मकसद से हम आम तौर पर देखते हैं, उलाहना होता है, बहाना होता है, किसी सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ित के लिए आसान किश्तों पर जिसको जिलाधिकारी चाहते हैं, दे देते हैं। कानून में तो लिखा है, उसको परिवर्ितत भी कर दिया गया है कि जो मार्केट रेट है, उसके आधार पर जमीन का अधिग्रहण किया जाये लेकिन मार्केट रेट का भी निर्धारण स्थानीय जिलाधिकारी करता है। जिलाधिकारी की जैसी रुचि होती है, जैसी भावना होती है और जितनी भूमि की उसको आवश्यकता होती है, सरकार की मंशा के अनुसार उस इलाके की भूमि के मुआवजे का निर्धारण या उस भूमि की किस्म का निर्धारण या किस्म के आधार पर उसकी कीमत का निर्धारण उस इलाके का जिला मजिस्ट्रेट करता है। जिसका नतीजा यह होता है कि जो कमजोर किस्म के किसान होते हैं, वह उनके एरिया की जमीन का बहुत औने-पौने दाम निर्धारित कर देता है। जो प्रभावशाली किसान होते हैं, जिनकी किसी खास उद्देश्य के लिए बड़े अधिकारियों, बड़े नेताओं के पास पहुंच होती है तो वे उनसे अपनी भूमि का स्वामित्व अधिग्ृाहित करना चाहते हैं। किसी लिटीग्रेशन वगैरह में है तो उस एरिया की कीमत वह मनमानी निर्धारित करता है और एक अच्छी खासी रकम पा लेता है। इस तरह का दोहरा व्यवहार हम आम तौर पर देखते हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं कि लखनऊ विकास प्राधिकरण अपनी कुछ आवासीय योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए कुछ इलाके का अधिग्रहण करना चाहती थी। इसकी जानकारी सभी अधिकारियों को हो गई जो इस व्यवस्था के हामी या इस चीज को जानते थे। उन्होंने उस इलाके में औने-पौने दामों में किसानों की जमीन खरीद ली। कुछ दिनों के बाद अपनी उस जमीन को लखनऊ विकास प्राधिकरण को मनमानी कीमत पर जैसी कीमत वह चाहते थे, बेच दी। उन्होंने वह जमीन १० हजार रुपए, १२ हजार रुपए या २० हजार रुपए बीघा में खरीदी थी और एक साल बाद वही जमीन डेढ़ लाख रुपए बीघा के हिसाब से लखनऊ विकास प्राधिकरण को अधिग्ृाहित करवा दी। इस तरह जो भूमाफिया हैं या जिनको हम मौटे तौर पर ऐसा कह सकते हैं कि भूमि के खरीद-फरोख्त के व्यवसाय के रूप में उसका इस्तेमाल करते हैं, इस धंधे में प्रवीण हैं और अपनी जमीन के मनमाना दाम निर्धारित करवाकर एक अच्छी खासी रकम लेने में सफल हो जाते हैं। दूसरी व्यवस्था यह है कि कहीं किसी स्थान पर सरकार को कचहरी का निर्माण करना था। किसान की जमीन का अधिग्रहण किया लेकिन उसके बाद सरकार ने विचार त्याग दिया या उसका १० एकड़ में ही काम चल गया। यदि उसने २० एकड़ जमीन ली है तो बाकी की १० एकड़ उसने किसी अन्य काम से दूसरे व्यकित या दूसरी संस्था को दे दी। दूसरी संस्था ने उस जमीन का अधिग्रहण करके उसको दुगुने या तिगुने दाम पर सरकार को ही बेचने का काम कर दिया। जिस व्यकित से मूल रूप से जमीन अधिग्ृाहित की गई, उसको वह बहुत ही मिट्टी के मोल में पड़ी। यह बड़ी वचित्र किस्म की विडम्बना है। इसलिए मैं ऐसा समझता हूं कि रावत जी का जो विचार है, किसान और भूस्वामी को लाभ पहुंचाने के लिए उनकी जो मंशा है, वह बहुत उचित है लेकिन इसमें केवल संशोधन की बात कही गई है। मैं इस पूरे के पूरे कानून को जैसे हदबंदी कानून को खत्म करने का विचार यह सरकार रखती है, इस भूमि अर्जन कानून को भी समाप्त किया जाना चाहिए, यह मांग मैं करना चाहता हूं। मैं यह आग्रह करता हूं कि इस कानून को समाप्त करने के लिए सरकार को गंभीरता पूर्वक सोचना चाहिए। इस विधेयक से आगे जाकर मेरी कुछ बाते हैं इसलिए मूल रूप से विधेयक का ही समर्थन करने से इस कानून में थोड़ा बहुत फेर-बदल करने से किसान का लाभ नहीं होने वाला है। गरीब किसानों का कोई लाभ नहीं होने वाला है। यदि आपने उनको लाभ पहुंचाना है तो पूरे कानून को खत्म कर देना चाहिए और सरकार के पास केवल इतना अधिकार रहना चाहिए कि जिस कीमत पर वहां किसान जमीन बेचना चाहे, यदि किसी सार्वजनिक काम के लिए सरकार को जमीन की जरूरत है तो किसान अपनी मर्जी से जिस कीमत पर बेचना चाहे, सरकार खरीद ले। यही व्यवस्था होनी चाहिए। इन्हीं शब्दों के साथ इस विधेयक द्वारा प्रस्तुत भावना का मैं पुरजोर समर्थन करता हूं।

> श्री के.डी.सुल्तानपुरी (शिमला): सभापति महोदय, श्री भगवान शंकर रावत ने यह जो प्रस्ताव पेश किया है, मैं उसका समर्थन करता हूं। मैं समझता हूं कि यह प्रस्ताव बहुत अच्छा है कयोंकि यदि देखा जाए तो सारे देश में किसानों का बहुत शोषण होता है। बड़े-बड़े पूंजीपति, जो इंडस्ट्री वाले हैं, वे किसानों की जमीन सस्ते भाव पर खरीदकर महंगे भाव पर दिखा देते हैं। वे स्टैम्प डयूटी कम लगाते हैं और उससे पैसा कमाते हैं। वे सरकार से लोन लेते हैं, लोन में ज्यादा दिखाते हैं, जमीन का भाव बढ़ाकर बताते हैं लेकिन किसानों को कम पैसा देते हैं। उद्योगपतियों ने रियासतों में, हर राज्य में इस तरह से किया है। यहां डी.डी.ए. है लेकिन हमारे वहां हाउसिंग बोर्ड है। राज्य सरकार जो मकान बनाती है, हाउसिंग बोर्ड वाले एक-एक मकान ४-५ लाख रुपये में बेचते हैं। इस तरह से किसानों को उनकी जमीन की सही कीमत नहीं मिलती और वह गरीबी की रेखा से भी नीचे चले जाते हैं। बड़े किसान, बड़े जमींदार गरीब लोगों की जमीन खरीदकर उसे महंगे भाव पर बेचते हैं। इससे भी वे परेशान होते हैं। जैसे यहां कहा गया, इस एकट को सौ साल होने जा रहे हैं लेकिन हर रियासत का बंदोबस्त अलग-अलग है। रियासत में हदबंदी नहीं होती कि कौन सी जमीन किसकी है। इससे शैडयूल्ड कास्टस के लोगों का सबसे ज्यादा शोषण हुआ है। वे शरीफ थे इसलिए जमींदार नहीं बन सके। उनको डंडे से मारकर मातहत कर दिया गया। इसी तरह से माईनौरिटीज़ के लोगों को भी दुख झेलना पड़ा है। वे पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए आज तक उनका शोषण होता रहा। अंग्रेजों ने इस तरह के कानून बनाए जिससे अपने लिए शहरों में बड़े-बड़े मकान बना लिए। मोहन सिंह जी ने ठीक कहा है। यदि आप देखें, सारे देश में जो बड़े-बड़े उद्योगपति हैं, उन्होंने इंडस्ट्री के लिए लोन लेकर इंडस्ट्री स्थापित की लेकिन आज वह बंद पड़ी हैं। इससे हजारों मजदूर बेकार हो गए हैं। ग्रांट का पैसा लिया, सबसिडी हासिल की लेकिन इंडस्ट्री वैसे ही बैकार पड़ी है। यदि सारे राज्यों के मुख्य मंत्री, उद्योग मंत्री कौन्फ्रैंस करके इसे देखें तो उनके करोड़ो रुपये भारत सरकार की तरफ निकलेंगे। उन्होंने जो फायदा उठाना था, उठा लिया। हाउसिंग बोर्ड की ओर से इंडस्ट्री के लिए प्लाॆट दिए जाते हैं। उसका अधिग्रहण करने के लिए सरकार को कहते हैं कि इसे नोटिस दो। इस तरह से उनको कुछ कम्पैंसेशन नहीं मिलता। आप देखें कि मुआवजे की राशि कया होनी चाहिए। आज जो नेशनल हाईवे बने हैं और स्टेट हाईवे बने हैं, उसमें किसानों की जमीनें गई हैं, चाहे किसी भी रियासत में हों, किसी भी स्टेट में हों। मैं यह कहना चाहता हूं कि किसानों को कभी भी पैसा उसके हिसाब से नहीं मिला। जिनको जमीन की जरूरत नहीं है, जो बड़े बिजनेसमैन हैं, वे हर जगह अपने मकान बना लेते हैं, कनाट प्लेस में बना लेते हैं और गरीब आदमी, जिन्होंने ये जमीनें दीं, उनको कोई नहीं पूछता है। उनके पास जमीनें नहीं हैं, वे बेचारे भटकते फिरते हैं कि हमारा अपना मकान होना चाहिए, लेकिन उनके पास मकान नहीं हैं। उनके पास न दुकान है, न मकान है, वे भारत माता की जय बोलते रहते हैं। सारे राष्ट्र के अन्दर इस तरह का माहौल बन गया है कि यह जो सरकार है, यह ऐसे आदमियों की मदद करती है, जो बड़े-बड़े पूंजीपति हैं। वही इंडस्ट्रीज़ लगाते हैं, वही उनकी जमीनों को हथियाते हैं, वही मजदूरों का शोषण करते हैं, वही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों का शोषण करते हैं। अगर आप सही मायनों में सारे देश के अन्दर इस तरह का कोई वातावरण तैयार करना चाहते हैं तो मैं यहां यह कहना चाहूंगा कि आपको चाहिए कि आप कम से कम राज्य सरकारों से तो पूछिये कि तुम्हारे इलाके में भारत सरकार के बैंकों ने कितना लोन दिया, किस-किस आदमी को दिया। वही आदमी आपको दिल्ली में मिलेगा, वही उत्तर प्रदेश में मिलेगा, वही मध्य प्रदेश में मिलेगा, वही आदमी हिमाचल में मिलेगा, बस उनके नाम बदल जाएंगे। एक इंडस्ट्री का नाम बदलकर दूसरी इंडस्ट्री का नाम वे दे देंगे और किसान का हमेशा शोषण होता जायेगा। अगर आप चाहते हैं कि किसानों का भला करना है तो हमारे ऊपर रहम करो, हमारे ऊपर दया करो और जो पिछड़े वर्ग हैं, गरीब लोग हैं, शैडयूल्ड कास्टस के लोग हैं, उनका भी इस राष्ट्र में हिस्सा है। उनको मजबूत करने के लिए जो उनके ऊपर मार-पीट करते हैं और उनका शोषण होता है, उनको बचाने के लिए आपका कोई काम साझा प्रोग्राम में हो तो वह जरा लोगों को बताइये। अगर यही साझा प्रोग्राम होना है कि प्याज हमसे तो पांच रुपये किलो खरीदेंगे और यहां ६० रुपये किलो बेचेंगे तो हमारा शोषण तो होगा ही, कयोंकि हम प्याज और आलू तो खा नहीं सकेंगे। हम उनको पैदा जरूर कर सकते हैं, लेकिन खुराना जी, हम उनको खा नहीं सकते। मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि जहां तक इस देश के किसानों का ताल्लुक है, चाहे वे पैदावार करते हैं, चाहे अनाज सारे मुल्क को देते हैं। बरनाला जी बैठे हुए हैं, आपने भाव तो ९५ रुपये बढ़ा दिया, दूसरी चीजों के भाव भी बढ़ा दिये, लेकिन कया आपने कभी सोचा कि जिन किसानों की आज जमीनें गई हैं और उस जगह चंडीगढ़ और बड़े शहर बने हैं, शिमला आज बिल्कुल ऐसा बन गया है, चाहे आप दिल्ली आयें, चाहे शिमला जायें, कोई भी शहर आप देखें, सारे किसानों की जमीनें सस्ते भाव में खरीदकर प्रापर्टी डीलरों ने बेच दी हैं। उनको खुली छुट्टी है, उन्होंने अपने फट्टे लगाये हुए हैं और प्रापर्टी डीलर इन्कम टैकस से भी वैसे ही बच जाते हैं, कयोंकि वे इधर का पैसा उधर करते हैं, वे सब कुछ कर सकते हैं। यहां वित्त मंत्री जी भी बैठे हुए हैं, मैं उनसे कहूंगा कि आप थोड़ा सा इसको भी देखिये कि आज हमारा जो ज्यादातर धन है, वह ऐसी इंडस्ट्रीज़ में लगा हुआ है, जो बिल्कुल बन्द पड़ी हैं और किसानों की जमीनें उन्होंने बिल्कुल मुफत के भाव में खरीदी हुई हैं। गवर्नमेंट ने उनको पैसा दिया है, उनको पांच साल हो गये, दस साल हो गये और फिर भी सारी इंडस्ट्रीज़ बन्द पड़ी हैं। मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि आप इस तरफ तवज्जो दें। मैं समझता हूं कि रावत साहब अच्छा प्रस्ताव लेकर आए हैं और मैं इसकी ताईद करता हूं। मैं आशा करता हूं कि वे इसे वापस नहीं लेंगे, कयोंकि आप सरकारी पार्टी के सदस्य हैं, अगर वापस लेंगे तो किसानों का शोषण होगा। इसलिए हम इसका समर्थन करते हैं। मेरा रावत साहब से अनुरोध है कि आपके नाम के साथ भगवान शंकर लगा है, आप शंकर जी की तरह मजबूत रहें, पीछे न हट जाएं और १८ दलों की जो यह सरकार है इससे इसको पास कराएं। हम भी इसमें आपको सहयोग देंगे।

> श्री चन्द्रशेखर साहू (महासुमन्द): सभापति जी, यह जो स्टेंडिंग कमेटी की आठवीं रिपोर्ट है उसमें भी लैंड एकिवजीशन के बारे में स्पष्ट अभिमत है। उसमें रिकमेंडेटरी नोटस हैं और १६ बिंदुओं पर स्टेंडिंग कमेटी की जो आठवीं रिपोर्ट दसवीं लोकसभा में प्रस्तुत हुई, उसमें लैंड एकिवजीशन एकट में जिक़ है कि कया-कया उसमें संशोधन करने चाहिए और कया-कया उसमें विसंगतियां हैं, इस पर विस्तार से चर्चा है। यही आधार बना है इस विधेयक का। माननीय भगवान शंकर रावत जी ने अपने सात खंडों में जो संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया है उसमें सबसे महत्वपूर्ण बिंदू जमीन की वापसी का है। इस हिंदुस्तान में जब जमीन की वापसी होने लगेगी तो जो अन्नदाता कहे जाते हैं, जो किसान हैं, जो हर प्रकार से पीड़ित हैं और जो इस देश के पीड़ितों को पालने वाले हैं उनकी किस्मत जाग जायेगी। आपके दिल में भी दर्द है। इसलिए दो घंटे निर्धारित किए लेकिन मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि आधा-पौना सदन में व्यर्थ गया। संजीदगी से चर्चा करने वाले जिस विधेयक पर लाखों-करोड़ों लोगों का भविष्य निर्भर है, उस पर वे चर्चा नहीं करना चाहते हैं। इस विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के विवरण में जो प्रावधान है, उसमें एक बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु जमीन वापसी का है। भूमि अर्जन कानून १८९४ से लागू है। इस कानून के १०५ साल पूरे हो रहे हैं। आप किसान को गुलामी के समय से लेकर आज तक गुलाम रखना चाहते हैं। आजादी के ५० साल बाद भी लाखों-करोड़ों की संख्या में किसान जमीन के मुआवजे के लिए भटक रहा है। सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि किसानों की जमीन का बांध, सड़क बनाने के लिए अधिग्रहण हुआ लेकिन उसे आज तक मुआवजा नहीं मिला। मेरे क्षेत्र में कुलार बांध बना था। उसके कारण लाखों की संख्या में आदिवासी विस्थापित हुए। उन्हें मुआवजा नहीं मिला और ब्याज दर का भुगतान नहीं हुआ। स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट में एक प्रावधान स्पष्ट रूप से है जिसे मैं पढ़ कर सुनाना चाहता हूं। इसके पैराग्राफ १६ में लिखा है क "It is further recommended that Section 28 also be amended by adding "he took possession of the land or the award is made, whichever is earlier"." आज भी सैकशन २८ के बदलने की बात को लेकर स्टैडिंग कमेटी एकमत है। उसने इस बारे में सिफारिश भी की है। इससे कोई बाधा आने वाली नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के नेत्ृात्व में यह सरकार चल रही है। उसने अपने घोषणा पत्र के पेज २६ के १८वें बिन्दु में कहा है: "परिष्कृत भूमि अधिग्रहण कानून निम्नलखित लक्षयों के साथ (क) किसानों को उसके जमीन के लिए बाजार मूल्य पर तुरन्त एवं पूर्ण क्षति पूर्ित (ख) ऐसे किसान जिन्हें औद्योगिक या नगरीकरण योजनाओं के लिए अपनी भूमि देनी पड़ी हो उन्हें इन योजनाओं में शेयर धारक बनाया जाना चाहिए। (ग) अगर कोई सार्वजनिक या निजी संस्था जो एक विशेष योजना के लिए कृषि योग्य भूमि ग्रहण करती हो और एक नियत समय में कार्यान्िवत नहीं कर पाता है तो सरकार उसे उसके संवर्दधकों से वापस ले लेगी।" यह एक महत्वपूर्ण बात है। भारतीय जनता पार्टी के सदस्य और कार्यकर्तता होने के नाते मैं कहना चाहता हूं कि घोषणा पत्र पर अमल करने की दृष्िट से इस विधेयक को कहीं न कहीं तरजीह दी जाए और जमीन वापसी के प्रावधान को पूरी तरह से लागू किया जाए। इससे आर्िथक आजादी का रास्ता खुलेगा और नया अध्याय बनेगा। इससे आजादी के ५०वें साल में हम कह सकते हैं कि १०५ साल पुराने कानून में सुधार हुआ। १९८४ में इसमें कुछ परिवर्तन हुआ। मुआवजे के विषय में विधेयक के खंड पांच में रावत जी ने स्पष्ट कहा है कि अभी तक मुआवजे के बारे में कोई स्पष्टीकरण और कोई स्पष्ट परिभाषा प्रस्तुत नहीं हुई है। उसमें उन्होंने साफ कह दिया है कि स्पष्टीकरण अभिव्यकित प्रतिकर, जैसाकि इस धारा और धारा ३४ में दिया गया है कि उसके अंतर्गत देय सभी रकम शामिल होगी। उसमें बाजार दर पर उनके प्रतिकर के साथ ब्याज और उसके साथ संदाय देयतायें शामिल होकर विधेयक में यह प्रावधान किया गया है। सभापति महोदय, यदि सारे भारत के आंकड़े देखे जायें या राज्यवार आंकड़े दिये जायें तो आज किसान की जो स्िथति है, उसमें कम से कम प्रत्येक जिले में सैंकड़ों, लाखों की संख्या में ऐसे लोग हैं जो आज भी मुआवजे से वंचित हैं। जो लोग न केवल सरकारी बल्िक गैर सरकारी योजनाओं के लिये योजना के नमित्त उजाड़े गये हैं या जिनकी जमीन ली गई है, वे आज भी मुआवजे से वंचित हैं। यदि सब के आंकड़ें इस सदन में रखे जायें तो आप लोगों को आश्चर्य होगा। सभापति महोदय, आज जो वैश्वीकरण का युग चल रहा है, उसमें भी एक उद्देश्य और कारणों के संबंध में स्पष्टीकरण देते हुये कहा गया है। जहां तक सतत् न्यायिक मत रहा है कि अर्जन के वैश्वीकरण परस्िथति होने के कारण अधनियम की धारा २३ के अंतर्गत संदाय देय राशि प्रतिकर का अभिन्न भाग है। सभापति मंहोदय, लिटीगेशन के मामले में किसान न्यायालय के दरवाजे खटखटाने में आज सक्षम नहीं है। आप उनकी माली हालत अच्छी तरह से जानते हैं। ऐसी स्िथति में उसे मुआवजा राशि के लिये भटकना पड़ता है जो प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। इसलिये ये जो ७ खंड प्रस्तुत हुये हैं, यद्यपि अशासकीय विधेयक है लेकिन पूरे तौर पर एप्रोपरियठ विधेयक है और सारे अनुभवों के आधार पर यह बिल तैयार किया गया है। श्री रावत जी इस सदन के वरिष्ठ सदस्य हैं और उनके द्वारा पूरे अनुभवों के आधार पर बिल बनाया गया है। अत: हम सब लोग समवेत रूप से इस विधेयक का समर्थन करते हैं और आप सब सदस्यों से इस सदन के माध्यम से गुज़ारिश करते हैं कि इसे समूल रूप से पारित करके अपने विशाल हृदय का परिचय दें और किसानों के हक में न्याय प्रदान करें। आज समय की मांग है। इसलिये इसी भावना को ध्यान में रखते हुये इस अशासकीय विधेयक का समर्थन करता हुआ अपनी बात समाप्त करता हूं। सभापति जी, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि इस च्रर्चा में भाग लेने के लिये आपने समय दिया।

>17.28 hrs. श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज): सभापति महोदय, माननीय सदस्य श्री भगवान शंकर रावत भूमि अधिग्रहण बिल के जरिये इस सदन के सामने किसानों की पीड़ा को चर्चा के रूप में लाये हैं और इस बिल के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्िषत कर रहे हैं, मैं रावत जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने किसानों की पीड़ा को इस सदन में चर्चा का विषय बनाया। सभापति महोदय, भूमि अधिग्रहण बिल में किसानों की बहुत सारी कठिनाइयां हैं। हर सत्र में इस सदन के अंदर किसानों की समस्याओं के बारे में पक्ष और विपक्ष दोनों द्वारा चर्चा की जाती है लेकिन किसानों की एक समस्या नहीं है। वह अनेक समस्यों से परेशान है जिसमें प्रमुख रूप से भूमि अधिग्रहण कानून है। भूमि अधिग्रहण कानून के माध्यम से सार्वजनिक उद्योंगों के लिये जो भूमि अर्िजत की जाती है, उसमें जिलाधिकारी को अधिकार मिलता है कि भूमि का मूल्य कितना तय करना है और कितना मुआवज़ा दिया जाना है। इस प्रक़िया में बड़े किसान इसलिये प्रभावित नहीं होते कयोंकि उनकी पहुंच या तो कलकटर तक होती है या नेताओं तक और मंत्रियों तक पहुंच होती है लेकिन छोटे और मंझौले किसान बुरी तरह से प्रभावित होते हैं। उनके माध्यम से वह अपनी ज़मीन बचाने में सक्षम हो जाते हैं, लेकिन जो मझौले और छोटे किसान हैं, जिनकी पहुंच कहीं नहीं है, उनका जो भूमि अधिग्रहण होता है तो सच पूछिये तो उनको बाज़ार मूल्य तक नहीं मिलता है। व्यावहारिक रूप में आप जानते हैं कयोंकि आप गांव से जुड़े हुए लोगों में हैं, कि जब किसान की ज़मीन अधिग्रहीत कर ली जाती है तो मूल्य निर्धारित करवाने के लिए भी वह कार्यालय के चककर लगाते हैं और उस कार्यालय के चककर में भी उन्हें ज़मीन का मुआवज़ा तो बाद में मिलता होगा, पहले कार्यालय का मुआवजा उन्हें चुकाना पड़ता है। कार्यालय का मुआवज़ा चुकाने के बाद भी उचित बाज़ार मूल्य का निर्धारण नहीं हो पाता है। कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि ज़मीन अधिग्रहीत हो गई, किसान उस भूमि पर जाने से भी वंचित हो गया, लेकिन मुआवज़ा पांच-दस वर्ष बाद भी किसानों को नहीं मिलता है और दस वषर्ों तक किसान कलेकटर के कार्यालय से लेकर अंचल कार्यालय तक, भू-हदबंदी कार्यालय तक चककर लगाया करते हैं। हमको लगता है कि छोटे किसान को जितनी ज़मीन का मुआवज़ा मिलता होगा, उससे ज्यादा खर्च उनके कार्यालय के चककर लगाने में लग जाता है और जो पांच-दस वषर्ों का गैप होता है, उस बीच में यदि वह उस पूंजी से कुछ कर पाता, तो पूंजी नहीं होने के कारण उनकी आर्िथक स्िथति चरमरा जाती है। हम आपसे अनुरोध करेंगे कि किसानों की जमीन का जब अधिग्रहण किया जाए तो उसका बाज़ार मूल्य निर्धारित किया जाए और जब से अधिग्रहण कर लिया जाता है, किसान को उस ज़मीन पर जाने से वंचित कर दिया जाता है, उसके जितने दिन बाद उसको पैसे का भुगतान होता है, उस बीच का सूद भी किसानों को दिलवाया जाए। तीसरा उसके साथ एक और शर्त लगाई जाए और पांच-दस वषर्ों की सीमा निर्धारित कर दी जाए कि यदि किसान की जमीन पर उतने समय में कोई सार्वजनिक उपक़म तैयार नहीं हुआ तो किसान की जमीन दस वर्ष बाद वापस कर दी जाएगी। हम बिहार की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहेंगे कि कैसे वहां किसानों को कठिनाई होती है। आपकी बिहार सरकार के समय की बात नहीं बल्िक पहले की कांग्रेसी सरकारों की हुकूमत का मैं उदाहरण देना चाहता हूं। किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण नहर निकालने के नाम पर किया गया। सिंचाई विभाग द्वारा अधिग्रहण किया गया और उस पर नहर खुदवाने का काम शुरू हुआ। अरबों रुपया खर्च हुआ होगा लेकिन बिहार में नहरों का काम पूरा नहीं हुआ। उससे कितना नफा-नुकसान किसानों को उठाना पडता है कि एक तरफ तो सिंचाई का लोभ दिया गया कि खेतों के लिए पानी सुविधा दी जाएगी और किसानों की ज़मीन गई, लेकिन उन्हें पानी की सुविधा नहीं दी गई। जिस समय खेतों में पानी चाहिए उस समय पानी नहीं मिलता है और जिस समय पानी की आवश्यकता नहीं है, उस समय पानी आ जाता है जिसके कारण बाढ़ की स्िथति हो जाती है। नहरों में बालू भर जाती है और पानी खेतों में आ जाता है जिससे किसान की फसल बरबाद हो जाती है। विकास कार्यालय के कर्मचारी अगल-बगल के किसानों पर वारंट निकालते हैं कि उनकी लापरवाही से खेतों में पानी भर गया और उन पर जुर्माना करते हैं। पैसे न चुकाने पर उनके मवेशी तक खोलकर ले जाते हैं। सिंचाई विभाग का कार्यालय भी वहां खुला हुआ है। वहां ऐकज़ीकयूटिव इंजीनियर है और तमाम अधिकारी हैं, चपरासी है, लेकिन पांच वषर्ों में हमें लगता है कि बिहार के ७५ सिंचाई के कार्यालय बंच हो चुके हैं। किसानों की ज़मीन चली गई। विकास के नाम पर कार्यालय खोले लेकिन कार्यालयों में तालाबंदी है। इसी तरह बिहार के कई जिलों में, खासकर हमें लगता है कि नये जिले छोड़कर पुराने जितने जिले हैं, उनमें आवास विभाग की तरफ से ज़मीन का अधिग्रहण आवास बनाने के नाम पर किया गया। कई जिलों में बहुत से आवास बने भी हैं, लेकिन उनका आबंटन सही नहीं होता। आज उनकी छत गिर रही है, नींव निकल रही है और गांव के लोग ईंटें निकालकर मवेशियों को खिलाने के लिए नदहा बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसी स्िथति में सरकार को सोचना चाहिए कि जिस काम के लिए हम ज़मीन का अधिग्रहण कर रहे हैं, उसमें सरकार कितनी सक्षम है। जब तक सरकार सक्षमता तय नहीं करेगी, तब तक किसानों की ज़मीन को नहीं लेना चाहिए, यह हमारा निवेदन है। खुराना जी किसानों की पीड़ा को नहीं समझ सकते हैं, आप जरूर समझ सकते हैं। इनके नसीब में किसानों की पीड़ा को नजदीक से देखने का अवसर नहीं आया। हम आपसे और सरकार से आग्रह करेंगे कि इस पर सरकार अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाये और माननीय रावत जी ने जो प्रस्ताव रखा है, उस प्रस्ताव को सरकार स्वीकार करे। जितने भी पक्ष और विपक्ष के सदस्य बोले हैं, कोई भी सदस्य इस प्रस्ताव के खिलाफ नहीं बोला है, सभी ने इसका समर्थन किया है। हमें विश्वास है कि इससे सदन सहमत है, इसलिए सरकार भी सहमत होगी। हमें आप पर यह विश्वास भी है कि यदि सदन सहमत नहीं होगी तो आप आसन की तरफ से सदन को सहमत कराने का प्रयास करेंगे। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

> श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल) : माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे श्री भगवान शंकर रावत जी द्वारा लैंड एकवीजीशन अमेंडमेंट बिल पर बोलने के लिए मौका दिया है, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। अभी जैसा पूर्व के सम्मानित सदस्यों ने अपनी बातें यहां रखी थीं, उनसे मैं अपने आपको सम्बद्ध करते हुए कुछ सुझाव के तौर पर इस सदन को जानकारी देना चाहूंगा कि आज ज्यादातर जो भूमि का अधिग्रहण हो रहा है, उसमें विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद, इंडस्ट्रीज या सरकारी आफिसेज बनाने के लिए किसानों की भूमि का अधिग्रहण हो रहा है। उसमें बहुतेरे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों की भूमि होती है। मुआवजे की राशि सरकारी नोमिनल रेट पर उन्हें दी जा रही है। जबकि वर्तमान में बहुत से ऐसे भू माफिया और दलाला हैं जो प्राधिकरण या सरकारी आफिसेज से मिलकर महंगी जमीने बेचकर आज किसानों का शोषण कर रहे हैं। मैं इस सदन से मांग करूंगा कि इस बिल में यह बात जरूर रखी जाए कि जब भी किसानों की भूमि का अधिग्रहण हो तो उन्हें वाजिब बाजार मूल्य पर मुआवजा दिया जाए। यहां तक होता है कि बहुत से सरकारी आफिसेज या इंडस्ट्रीज बनाये जाते हैं तो उनके परिवारों को प्रलोभन देने के नाम पर कहा जाता है कि उनको विभाग में नौकरी दी जायेगी। आज तमाम वायदों के बावजूद बहुत से ऐसे किसान परिवार पीड़ित हैं, जिन्हें नौकरी नहीं दी गई। कालोनियों के नाम पर हरे-भरे पेड़ों और बगीचों को काटा जाता है और कालोनियां बनाई जाती है। इन कालोनियों से किसानों को कोई उचित फायदा मुआवजे के नाम पर नहीं मिल पा रहा है। तमाम माननीय सदस्य यहां बैठे हुए हैं वे सभी जानते हैं कि माननीय उच्च न्यायालयों में आज भी तमाम ऐसे मुकदमे विचाराधीन हैं, जिससे किसान बहुत त्रस्त हैं। उन्हें वाजिब मूल्य पर जो मुआवजा मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा है। सभापति महोदय, इसी प्रकार से मैं सदन के माध्यम से मांग करूंगा कि इस अमेंडमेंट बिल में यह बात भी आनी चाहिए कि किसानों की भूमि जब भी अधिग्रहण हो तो उन्हें पट्टे की ऐसी जमीने दी जाएं जो खेती योग्य हों। अकसर देखा जाता है कि ऊसर जमीने उन्हें दे दी जाती है, विवादित जमीनें उन्हें दे दी जाती हैं, जहां किसान खेती नहीं कर पाते हैं। इस तरह से किसानो का खुले रूप में शोषण हो रहा है। तमाम जिलों के जिलाधिकारियों के पास मुआवजे की धनराशि जाती है, लेकिन मुआवजे की धनराशि देने में जिलाधिकारी सकारात्मक रवैया नहीं अपना पा रहे हैं, वे भी किसानों का शोषण कर रहे हैं। वे उन्हें मुआवजे की सही धनराशि नहीं दिये हैं, आधी दिये हैं और आधी रोके हुए हैं, कहते हैं कि सरकार की तरफ से अगर इसमें कुछ परिवर्तन होगा तो उसका भुगतान कराया जायेगा। साथ ही साथ नवनिर्माण उसी अधिग्रहित भूमि पर कराया जाए, जहां भी गांव सभा की तमाम ऐसी ऊसर जमीनें पड़ी हैं, उनका अधिग्रहण करके उन पर नवनिर्माण किया जाए। इसी प्रकार से उत्तर प्रदेश में वर्तमान समय में १५ ऐसे नये जनपद स्ृाजित हुए हैं, जहां सरकारी आफिसेज खुलने हैं, तमाम सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के रेसीडेंस बनने हैं। वहां कृषि योग्य जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है और किसानों का शोषण किया जा रहा है। हमें मालूम हैं और जैसा कि पूर्व सदस्यों ने कहा है कि उनको वाजिब मूल्य नहीं मिल पायेगा और न ही उन किसानों को सरकारी नौकरी दी जायेगी। इसलिए मैं मांग करूंगा कि जो नये १५ जनपद बने हैं, जहां पर सरकारी आफिसेज खुलेंगे, आवास बनेंगे, वहां तमाम ऊसर जमीने पड़ी हैं, उन जमीनों का अधिग्रहण करके उन पर निर्माण कराया जाए। हमारे इलाहाबाद क्षेत्र में विकास प्राधिकरण है। इलाहाबाद के अमरूद पूरे देश में मशहूर हैं। वहां पर विकास प्राधिकरण ने अमरूद के हरे-भरे पेड़ो को काटकर कालोनी बनाई है। आज तक उन किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाया है। उस कालोनी में न तो उनको मकान ही मिलता है न ही उनको जमीन मिलती है। इसलिए मैं चाहूंगा कि ऐसे काले कानून में अमेंडमैंट हो। साथ ही साथ आप देखें कि शहर के ज्यादातर बड़े-बड़े लोगों के फार्म हाउस बने हुए हैं। पांच-दस या पन्द्रह बीघा जमीन पर बड़े-बड़े लोगों के फार्म हाउस बने हुए हैं। बहुत से लोगों के ऐसे बंगले भी हैं जिसमें बीघों जमीन खाली पड़ी हुई है। उनकी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाता है। किसानों के पास अगर कृषि योग्य चार-पांच बीघा जमीन है तो उनकी जमीन का पहले अधिग्रहण किया जाता है कयोंकि वे कमजोर हैं। बड़े लोगों की जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाता है। माननीय भगवान शंकर रावत जी ने यहां पर जो बिल पेश किया है, उस पर मैं बल देता हूं और साथ-ही साथ इस सदन से मांग करता हूं कि शहरी भूमि सीमा रोपण जिसमें शहर से देहात को टच करते हुए २५-३० किलोमीटर का एरिया लिया गया है, उस शहरी भूमि सीमा रोपण को भी समाप्त किया जाना चाहिए ताकि किसानों के पास जो कृषि योग्य भूमि है, जहां पर फलों की पैदावार होती है, शहरों के लिए सब्िजयां उगाई जाती है और बाद में शहर में आती है जिसको सभी वर्ग के लोग खाते हैं, उसका अधिग्रहण न हो। ऐसे शहरी भूमि सीमा रोपण के अधनियम को समाप्त करते हुए इस काले कानून को समाप्त किया जाना चाहिए। मैं कहना चाहता हूं कि इसमें आमूल-चूल परिवर्तन करके इस काले कानून में परिवर्तन किया जाये। भगवान शंकर रावत जी द्वारा जो लैंड एकवीजीशन संबंधी बिल है, उस पर मैं बल देता हूं और उनसे मेरा निवेदन है कि वे इस बिल को वापिस न लें बल्िक इस बिल पर जोर दें ताकि इस बिल में अमेंडमैंट हो। वर्तमान समय में बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए जो पुराना कानून है और जो संशोधन बिल रखा गया है, उसमें परिवर्तन लाया जाये। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।

>SHRI M. SELVARASU (NAGAPPATTINAM): Mr. Chairman, Sir, I am very much thankful to you for giving me an opportunity to speak on this Bill. I wish to bring to your notice certain shortcomings in the Land Acquisition Act.

Sir, when a land is sought to be acquired for the purpose of distributing pattas for constructing houses for the harijans and people belonging to the backward classes, the land owners move the courts and get stay orders on purchase of such lands and they delay the implementation of the welfare schemes meant for the down-trodden people of the society. So, this Act should be suitably amended to ensure that the landlords are not allowed to move the courts and obtain stay orders so that the welfare schemes could get implemented quickly.

Again, when the land is acquired for industrial purposes or for use by the Government for purposes of irrigation and all that, a lot of promises are made to the local people including providing employment opportunities to the owners of such land. But those assurances and promises are never met. I have many such experience in my Parliamentary constituency. Even after the industry becomes fully operational, the due compensation is not paid to the party or to the owners of the land. In most of the cases, employment is denied to the owners of such land. One such experience is in the case of the Neyville Lignite Corporation. The Revenue Department gave so many assurances about providing opportunities to the landless persons there.

But till now people whose lands have been acquired and people who were using those lands have not got employment from the concerned Department of the Government. This is a fact.

In my constituency there is a company called Madras Refineries Limited. They had given many assurances and made tall promises but a lot of cases are still pending with them. Nobody got employment there so far. People whose lands have been taken over are agitated over this matter and are taking to the streets.

When the land is under the cultivation of a tenant, the matter is further worse. As a matter of routine, the tenant gives 25 per cent of the yield to the land-owner and takes the remaining 75 per cent of the yield. This is the meaning of tenancy. However, at the time of acquiring land, the Revenue Officer contacts the land-owner directly and disburses the total amount of compensation. The tenant who holds the right over the 75 per cent of the yield is not even informed of it. He is deprived of his livelihood. His family is left to starve. A provision should be made in the Bill to ensure that the tenant gets 75 per cent of the compensation corresponding to his right on the yield. There are many cases pending in the High Court in this regard. There are many such people who have not been given any compensation. When they are paid no compensation, there is no way left for these people but to go on to the streets. Tenant is a person who does not have a patta for the land he is cultivating. This is a very serious issue. I urge upon the Government of India to consider this issue very seriously and bring forth an amendment in the law to give compensation to the tenant also. I have seen how tragic things turn out to be for the land-user when a piece of land is acquired by the Government. The Revenue authorities acquire land because they have to acquire it. They do not consider the humanitarian aspects while acquiring land. I, therefore, once again urge upon the Government to look into the matter and come forward with an amendment to provide 75 per cent of the compensation to the land user.

I congratulate Shri Rawat for tabling this Bill on this very sensitive issue. I wish and hope that this will be passed on the floor of the House.

>SHRI B.M. MENSINKAI (DHARWARD SOUTH): Mr. Chairman, Sir, I am thankful to you for giving me the opportunity to speak on this Bill. Regarding the acquisition point of view, I would like to say that the Government has got the powers to acquire any land for the purpose of public utility. The law is clear about it. But then the question comes about the compensation. When the question of compensation comes, the market value is stated. But while considering the market value, there is black money used at the time of registering the document of purchase and sale in the Registration Office. Suppose the value of a land is Rs. 100 in the market, that is put in the Registration Office at the rate of Rs. 50 only. Like that, if the value of a land per acre is Rs. 50,000 in the market, it will be taken as Rs. 25,000 per acre in the Registration Office during the time of registration. So, it is very difficult for the Government to find out the real market value for acquiring the property of the agriculturists.

Secondly, they say that the solatium would be paid at the rate of 30 per cent. So, along with the solatium, the cost of the land is to be paid in lumpsum to the owner of the land, so that he can use that capital for some other purposes.

Thirdly, I would like to say that while acquiring the land, the fertile land should not be acquired. If it is acquired, then that property would be wasted for life long in the form of industrial purposes, residential purposes and some other purposes. This way, the whole area of fertile land will be reduced by that portion of land acquired. So, I suggest and press that the Government should not acquire the land which is very fertile. Sir, there should be a condition in the Bill that if it is acquired for industrial purposes, then those industries should pollution-free industries.

Fourthly, for the purpose of distribution of land to the homeless and shelterless people, I would request that the hilly area should be taken instead of area which is nearer to the city, because city area is the costliest area. That should be retained as agricultural land. That is why, I suggest that wherever the people are to be provided with shelter, at least, the fertile areas should not be taken. For this, some provision is to be made for the livelihood of those beneficiaries.

Fifthly and lastly, I would like to say that while returning the land, if it is not used by the Government or some other private agencies, it will be retained upto 10 years. It is stated in the Bill. I do not think, it is advisable that if the land is to be returned back to the tiller, the question of utility will be affected. Even the owner also will be affected.

Therefore, I would like to impress upon the Government that with these amendments and suggestions, this Bill may be permitted to be converted into an Act. With these words, I support this Bill and conclude my speech.

> श्री नकली सिंह (सहारनपुर): माननीय सभापति जी, हमारे विद्वान साथी आदरणीय भगवान शंकर रावत जी द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने का जो प्राइवेट मैंबर्स बिल प्रस्तुत किया गया है, मैं उसका पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं। कहने के लिए तो ठउत्तम खेती मध्यम बान, निपट चाकरी भीख निदान", पर आज कानूनों के कारण उल्टी स्िथति हो गई है। जो सन १८९४ से अब तक चला आ रहा है। देश को आजाद हुए भी ५० साल हो गए हैं और यह १०५ साल पुराना कानून अभी तक ज्यों का त्यों अमल में है। संविधान में भी कितने संशोधन हो गए होंगे, लेकिन इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। यह भी कहा जाता है कि किसान धरतीपुत्र है, सबसे बड़ा उत्पादक है, सबसे ब्रड़ा उपभोकता है, सबसे बड़ा मतदाता है, अन्नदाता और प्राणदाता है। लेकिन आज उसकी स्िथति देखें कि कया है। जब चाहे सरकार उसकी खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण कर सकती है। मुआवजा भी कितना दिया जाता है, यह सभी को मालूम है। वह इस सम्बन्ध में कहीं अपील भी नहीं कर सकता। अगर कोर्ट में जाए तो उसमें सालों-साल लग जाते हैं। यह सबको मालूम है कि जिस गति से उसकी ली हुई जमीन पर निर्माण कार्य चलते हैं उनको पूरा होने में दस-दस साल लग जाते हैं, लेकिन न तो उसे पूरा मुआवजा मिलता है और न ही जमीन वापस मिलती है। इन सब बातों को देखते हुए लगता है कि उत्तम खेती निपट चाकरी से तो अच्छा है उत्तम चाकरी निपट खेती, कयोंकि आज चाकरी उत्तम हो गई है। यह भी कहा जाता है कि भारत कृषि प्रधान देश है। अवर कल्चर इज एग्रीकल्चर है। मगर हकीकत में किसानों की दुर्दशा है। किसान की कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित की जाती है। शहरों के आसपास जितनी भी ग्रीन बैल्ट है वह सारी कृषि योग्य उत्तम भूमि है। वहां सब्िजयां पैदा होती हैं और सब्जी अच्छी जमीन में पैदा होती है। उत्तम जमीन लेने के बावजूद भी किसानों के साथ ऐसा बर्ताव कयों हो रहा है, यह समझ में नहीं आता। इस देश में किसान ८० प्रतिशत हैं। यही किसान हैं जिनके लड़के सेना में शामिल होकर नेफा और कश्मीर की सीमाओं पर देशी की रक्षा करते हैं। लेकिन सारी परस्िथतियों पर नजर डालें तो लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। इसलिए माननीय रावत जी ने जो प्रस्ताव पेश किया है, मैं उसका समर्थन करता हूं और सरकार से निवेदन करता हूं कि सारी प्ृाष्ठभूमि को देखते हुए सरकार भी इसको पास करने की कृपा करेगी, ऐसा मुझे विश्वास है। किसान इतना उदार है, वह और कोई काम नहीं कर सकता। वह और कोई काम जानता भी नहीं है। किसान खेती करते हैं इसलिए सामान्य रूप से बाकी लोगों से कम जानकार होते हैं। अगर किसान की जमीन ले ली जाए तो वह बर्बाद हो जाएगा। लेकिन अगर दुकानदार की दुकान चली जाए तो वह दूसरी दुकान कर लेगा, इसी तरह से कारखानेदार का कारखाना चला जाए तो वह दूसरा कारखाना लगा लेगा, लेकिन किसान सिवाय खेती के कुछ नहीं कर सकता। दिल्ली के अंदर देख लें, जहां हम बैठे हुए हैं वह संसद भवन और राष्ट्रपति भवन किसानों की जमीन पर ही बने हुए हैं, लेकिन उनकी महिलाएं यहां घास खोदने का काम करती हैं। खेता का काम सबसे कम दिमाग का काम है। बाजार में किसान अपना गन्ना आदि लेकर बुग्घी या ट्रैकटर-ट्राली पर लेकर जाता है तो लोग रास्ते में गन्ना खींचकर चूसने लगते हैं। यही अगर शहर में किसी मूंगफली वाले की रेहड़ी से एक दाना भी आप उठा लें तो देखिए कया तमाशा होता है, रास्ता जाम हो जाएगा। मेरा अनुरोध है कि अगर कलेकटर किसान की जमीन का अधिग्रहण करे तो उसे उचित नहीं, बाजार का दाम भी नहीं, बल्िक किसान जिसे स्वीकार करे, वह दाम मिलना चाहिए। कयोंकि किसान धरती को अपनी मां मानता है इस प्रकार वह अपनी मां आपको दे रहा है, जिससे देश का भला हो। देश के भले के लिए उसको उतना पैसा दिया जाना चाहिए कि वह संतुष्ट हो सके। आज यह भी व्यवस्था है कि उसकी जमीन लेने पर उसके परिवार में से एक व्यकित को नौकरी दी जाएगी, लेकिन यह बात अमल नहीं होती है। इसके लिए हमने देखा है ९० प्रतिशत किसान कलेकटर के आफिस में धकके खाते रहते हैं। वह कलेकटर से तो बात करना जानता नहीं इसलिए चपरासी के सामने गिड़गिड़ाता रहता है। अगर कभी डी.एम. साहब के दर्शन हो भी जाते हैं तो वे कहते हैं अभी मेरे पास समय नहीं है। इससे आपने अनुमान नहीं लगाया कि उसे कितना नुकसान होता है। जब आखिर में उसे मुआवजा मिलता है तो उसके पहले ही उसके हजारों रुपए खर्च हो चुके होते हैं, उस पर कर्जा चढ़ गया होता है। फिर उस पर यह होता है कि उसे देर से मिले मुआवजे का ब्याज भी नहीं मिलता। इसलिए भगवान शंकर रावत जी ने जो प्रस्ताव पेश किया है वह बहुत ही अच्छा है और किसान तथा देशहित में है। अगर किसान उठेगा तो गांव उठेगा, गांव उठेगा तो देश उठेगा। शहर वालों की खुशहाली भी गांव में और किसान की खुशहाली में छिपी है।

18.00 hrs. अस्सी प्रतिशत लोग, जब इनकी जेब में पैसे होंगे तो इनके गांव में भी खुशहाली होंगी। किसान जब खुशहाल होगा तो गांव का कुम्हार भी खुशहाल होगा। दुकानदार, सुनार खुश होगा और जब सारे लोग शहर की ओर चलेंगे और इनकी जेब में पैसे होंगे तो शहर में मोटर साइकिल वाले की साइकिल बिकेगी, कपड़े वाले का कपड़ा बिकेगा, लोहे वाले का लोहा बिकेगा और भट्टे वाले की ईंट बिकेगी। यह बात सही है कि गांव वालों की खुशहाली में शहर वालों की खुशहाली छिपी हुई है और शहर वालों की खुशहाली में गांव वालों की खुशहाली छिपी हुई है। इसलिए प्राइवेट मेम्बर बिल के द्वारा रावत जी ने जो प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, मैं उसका पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं और सरकार से भी विनम्र निवेदन करता हूं कि वह भी अपनी स्वीकृति प्रदान करें।

> डा. शकील अहमद (मधुबनी) : सभापति महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। मैं भगवान शंकर रावत जी को इतना महत्वपूर्ण बिल लाने के लिए धन्यवाद देता हूं। मैं सरकार से भी कहूंगा कि १८९४ का मामला है। लगभग एक सदी से ज्यादा समय गुजर चुका है। किसानों की इस बीच में कया स्िथति हुई है? हमारे देश में कल-कारखाने बढ़े हैं और सबके बढ़ने के लिए हमने सबसे ज्यादा टैकस वसूल किया है और वह किसानों की जमीन वसूल की है। किसानों की अब यह हालत है कि गांव में कोई भी सोशल काम के लिए, मैं अपने गांव की बात कहता हूं। जब नहर की बात आती है, नहर बन चुकी है और बाकी जो विस्तार होना है, किसानों के पास जमीन नहीं है। किसान नहर में बिजली का सब-स्टेशन मांगता है। लोगों की इच्छा है कि हम अपनी जमीन दें लेकिन सरकार की भूमि-अधिग्रहण की नीति इतनी दोषपूर्ण है कि कोई भी आदमी हृदय से भूमि देने के लिए तैयार नहीं होता। इसलिए मैं सरकार से और माननीय सदस्य से आग्रह करता हूं कि वह अपने बिल पर डटें रहें और अगर आज किसी कारण विदड़ॉ करेंगे कयोंकि सरकारी पक्ष है, हो सकता है। मैं सरकार से कहूंगा कि वह कभी एकट लाकर इसमें सुधार करे कयोंकि इसमें सुधार की आवश्यकता है कयोंकि एक तो मार्केट रेट पर जमीन नहीं मिलती। मार्केट रेट से बहुत कम करके सरकार जमीन का एकिवजिशन करती है और किसान कलप कर, मजबूरी में जमीन देता है। सौ रुपये में एक कट्ठा जमीन मिलती है और जब उसका भुगतान होता है, तो उस समय उसी जमीन की कीमत बहुत बढ़ गई होती है। जो पैसे का अन्तर है, उस पैसे का कोई महत्व नहीं रह जाता है। इसलिए एक नश्िचत कानून बनना चाहिए कि आज किसान से जमीन ली है तो उसको मार्केट-रेट पर जो जमीन का दाम मिलेगा, उसकी एक नश्िचत अवधि फिकस होनी चाहिए कि इस अवधि के अंदर उसे भुगतान मिल जाएगा। अगर किसी टैकनीकल बाधा के कारण किसान को भुगतान नहीं मिल पाता है तो इसमें किसान का कोई दोष नहीं होता। इसमें बाबुओं, अधिकारियों और पदाधिकारियों का दोष होता है। इसलिए अगर किसी कारणवश किसान को भुगतान नहीं हो पाता तो जो बैंक का इंटरेस्ट रेट मिलता है, सरकार वह किसानों को दें, ऐसा प्रावधान इस बिल में होना चाहिए। चूंकि एक मिनट का समय है, छ: बज चुके है। अत: मैं ज्यादा समय न लेते हुए सरकार से आग्रह करता हूं कि अगर माननीय सदस्य, मैं उनकी मजबूरी जानता हूं, वह बिल वापस भी लेते हैं तो सरकार एकट लाकर, कानून बनाकर इस एकट को बदलने का काम करें और किसानों को उनका जो उचित मुआवजा है, वह देने की कृपा करे।

----- डा. शफीकुर्रहमान बर्क (मुरादाबाद) : सभापति महोदय, संसदीय कार्य मंत्री जी अभी नहीं आये, उनको आधा घंटा हो गया है। डा. शकील अहमद (मधुबनी) : आधा घंटा हो गया है, मंत्री जी नहीं हैं। पहले एजूकेशन मनिस्टर चले गये अब पार्िलयामेन्ट्री अफेयर्स मनिस्टर चले गये हैं सभापति महोदय : माननीय संसदीय कार्य मंत्री को बुलाने के लिए गये हैं। अब रेल से संबंधित हाल की दुर्घटना के संबंध में माननीय रेल मंत्री का वकतव्य होगा।

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